गौतम राजपूत, भगवान राम के वंशज कुश से शुरू हुई सूर्यवंश शाखा से संबंधित हैं। वे कपिलवस्तु के प्राचीन शाक्य वंश से आते हैं, जिनके वंशज, सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) शाक्य कुल के थे। गौतम" गोत्र का पालन करने के कारण, गौतम क्षत्रिय अपनी परंपरा के अनुसार महर्षि गौतम या बौद्ध परंपरा के अनुसार गौतम बुद्ध (शाक्य) से संबंधित कहे जा सकते हैं।
गौतमों के प्राचीन राज्य : कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर,लश्करपुर ,कोराव, बारा (उन्नाव) और ओईया (बदायूं)था। वर्तमान समय में ये गाजीपुर, फतेहपुर, मुरादाबाद, बदायूं, कानपुर, बलिया, आजमगढ़, फैजाबाद, बांदा, प्रतापगढ, फर्रुखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर, बनारस, बहराइच, जिले (उत्तर प्रदेश) आरा, छपरा, दरभंगा (बिहार) चन्द्रपुरा, नारायण गढ (मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश) आदि जिलों में बसे हुए हैं।
गौतम राजपूतों की उत्पत्ति
वंश भास्कर के अनुसार -
भगवान राम के किसी वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया । इसी वंश मे महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा। इसकी राजधानी कपिलवस्तु (गोरखपुर) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये। संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल) उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध के वंशज " गौतम " राजपूत कहलाते हैं। इस वंश में राव, रावत, राणा, राजा आदि पदवी प्राप्त घराने हैं।
अश्वघोष के अनुसार -
गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था । उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था। कई इक्ष्वाकु- वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे ।कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम गोत्री कहलाए ।
गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी वंश में हुआ था। शाक्य राज्य पर कोशल नरेश विदुदभ द्वारा आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया गया था जिसके बाद बचे हुए शाक्य गौतम क्षत्रियों द्वारा अमृतोदन के पुत्र पाण्डु के नेतृत्व में अर्गल राज्य की स्थापना की गयी। अर्गल आज के पूर्वांचल के फतेहपुर जिले में स्थित है।
गौतमों का अर्गल राज्य -
ऐतिहासिक रूप से, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अरगल के राजा खुद को शाक्यवंशी गौतम मानते थे, और यह क्षेत्र उनका प्रमुख केंद्र रहा है। अरगल राज्य, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में स्थित एक प्राचीन और ऐतिहासिक गौतम राजपूत रियासत थी। जो अपनी शक्ति और समृद्ध इतिहास के लिए जानी जाती थी। पहले यह अयोध्या के सूर्य वंश से सम्बद्ध माना जाता था बाद में इसे बुद्ध के शाक्य वंश से भी जोड़ा जाने लगा। ये लोग गौतम ऋषि से दीक्षा लेने के कारण गौतम वंशी कहलाए। अरगल स्टेट पर अरगल राज्य के इतिहास को लेकर लिखी गई पुस्तक के चौथे खंड के पेज नंबर 31 पर अरगल स्टेट के राजा हिन्दू संस्कृति सभ्यता, धर्म एवं क्षत्रित्व की भावना से ओत-प्रोत रहे हैं। अपने धर्म एवं स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हर प्रकार के बलिदान देने को तत्पर थे।
प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी राजा अंगददेव ने अर्गल से 3 मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है। इनकी वंशावली इस प्रकार है –
१- राजा अंगददेव
२- बलिभद्रदेव
३- राजा श्रीमानदेव
४- राजा ध्वजमान देव
५- राजा शिवमान देव :-
राजा शिवमान देव ने अर्गल से 1 मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।
चंद्रावर का युद्ध -
वर्ष 1192 में मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान को पराजित करने के पश्चात गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। 1194 में चंद्रावर के मैदान (इटावा जनपद) में दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ। इस युद्ध में अरगल नरेश रत्नेश के भाई वीरसेन ने कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध जयचंद के सहायतार्थ मोर्चा संभाला और वीर गति को प्राप्त हुए थे। कन्नौज के राजा जयचंद की बहन अरगल नरेश रत्नसेन को विवाहित थी। जयचंद को मुस्लिम आक्रमण का आभास पहले से था। कहा जाता है इस कारण जयचंद ने अपना खजाना ऐबक के आक्रमण से पूर्व अरगल नरेश रत्नेश के पास स्थानांतरित कर दिया था। इस बात की पुष्टि इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया भी करता है।
13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था। उस समय अर्गल राज्य में अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर और बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे।1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व बैस ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था ) और फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है।
चौसा युद्ध हुमायूं हारा था -
अर्गल के गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली। जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया। फिर भी बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही।
यमुना तट पर विशाल सीकरी का किला-
अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया।
15वीं शताब्दी में, राजा मर्दन सिंह ने जो यमुना नदी के किनारे एक विशाल और मजबूत किला बनाया था, जो लगभग 60 बीघा में फैला था। यह क्षेत्र कन्नौज साम्राज्य का हिस्सा था और आज भी इसके खंडहर गौरवशाली अतीत के गवाह हैं। आज अरगल का किला खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन यह फतेहपुर के प्राचीन इतिहास और गौतमों के गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है।
अकबर का समय -
1556 ई. में अकबर के शासनकाल में कालपी के सूबेदार ने तत्कालीन अरगल नरेश राजा भैरोशाह को परास्त कर इस राज्य को मुगलों के अधीन कर लिया।यह रियासत अपने धर्म, स्वतंत्रता और वीरता के लिए जानी जाती थी। 16 वीं शताब्दी में राजा त्रिलोक चंद के समय यह काफी शक्तिशाली थी।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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