Thursday, September 17, 2026

विकास खण्डों के गठन की प्रक्रिया,कप्तान गंज विकास यात्रा : जन प्रतिनिधियों के परिजनों का कब्जा (भाग 3)✍️डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


ब्लॉक प्रमुख (ब्लॉक-पंचायत-अध्यक्ष)- 
भारत में पंचायती राज व्यवस्था के मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति या ब्लॉक पंचायत या समकक्ष निकाय के निर्वाचित प्रमुख को संदर्भित करने वाला शब्द है । पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था का एक स्तर है । यह भारत में तहसील (ब्लॉक) स्तर पर एक ग्रामीण स्थानीय सरकारी निकाय है । यह तहसील के गांवों के लिए काम करती है, जिन्हें सामूहिक रूप से विकास ब्लॉक कहा जाता है। पंचायत समिति ग्राम पंचायत (ग्राम परिषद) और जिला परिषद (जिला पंचायत या जिला बोर्ड) के बीच की कड़ी है। सामान्यतः, ब्लॉक प्रमुख का चुनाव पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्यों में से किया जाता है।

ब्लॉक बनाने के जरूरत क्यों पड़ी -
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है.ऐसे में देश को कई इकाइयों में बांटा गया. सबसे पहले प्रदेश, उसके अंदर जिले, जिले में ब्लॉक, ब्लॉक के भीतर ग्राम पंचायतें और ग्राम पंचायतों में गांव या ग्राम सभा. एक ब्लॉक कई गांवों को मिलाकर बनाया जाता है. जिले में ब्लॉक की संख्या जिले के आकार के हिसाब से तय की जाती है. प्राय: हर ब्लॉक में 60 से 70 गांव होते हैं. कह सकते हैं कि ब्लॉक इन गांवो का मुख्यालय होता है, जहां गांवों के विकास कार्यों के लिए बैठकें और योजनाएं तैयार की जाती हैं. 
    भारत की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में खंड विकास स्तर (ब्लॉक स्तर) की पंचायत को क्षेत्र पंचायत / पंचायत समिति या जनपद पंचायत कहा जाता है, जो ग्राम पंचायत और जिला पंचायत के बीच का मध्यवर्ती स्तर है।क्षेत्र पंचायत के अंतर्गत आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने गए क्षेत्रीय सदस्य हैं ।उस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के प्रधान (मुखिया)।उस क्षेत्र के विधायक (MLA) और संसद सदस्य भी पंचायत के सदस्य होते हैं।
    प्रशासनिक रूप से ब्लॉक स्तर पर ब्लॉक डेवेलपमेंट ऑफिसर या BDO सबसे बड़ा सरकारी अधिकारी होता है जो विकास योजनाओं को क्रियान्वित कराने के लिए उत्तरदायी होता है।कार्यों के सुचारू संचालन के लिए विभिन्न समितियाँ (जैसे- निर्माण कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि एवं सामाजिक कल्याण) बनाई जाती हैं।ब्लॉक लेवल पर चुने हुए प्रतिनिधि के तौर पर ब्लॉक प्रमुख का पद सबसे बड़ा होता है.

ब्लॉक प्रमुख का चुनाव -
ब्लॉक प्रमुख को आम जनता सीधे नहीं चुनती. उसे जनता द्वारा चुने हुए क्षेत्र पंचायत सदस्य चुनते हैं. क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष या ब्लॉक प्रमुख का निर्वाचित क्षेत्र पंचायत सदस्यों के बीच से ही कोई सदस्य क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ता है और क्षेत्र पंचायत सदस्य उनका चुनाव करते हैं. ब्लॉक प्रमुख का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है. उत्तर प्रदेश में क्षेत्र पंचायत सदस्यों यानी बीडीसी के 75,255 पद हैं. यही बीडीसी यूपी के 826 ब्लॉक प्रमुख पदों के लिए वोट डालते हैं.

ब्लॉक प्रमुख के अधिकार -
क्षेत्र पंचायत में ऐसे कार्य किए जाते हैं, जिसमें एक से अधिक ग्राम पंचायतों का हित निहित होता है. जैसे यदि किसी ऐसी सड़क का निर्माण होना है जो एक गांव से दूसरे गांव को जोड़ती है और वह गांव के बाहर और जिला पंचायत के बीच की परिधि में आती है तो उसका निर्माण क्षेत्र पंचायत के माध्यम से कराया जाता है. इसके अलावा बिजली की व्यवस्था भी उन जगहों पर कराई जाती है जो 2 गांव के बीच हों या क्षेत्र पंचायत के अंतर्गत हों और जिला पंचायत की परिधि के बाहर हो. इसी तरह रास्तों का निर्माण भी क्षेत्र पंचायत विकास निधि के माध्यम से कराया जाता है. क्षेत्र पंचायत के कार्य इस प्रकार से होते हैं कि जहां पर दो या दो से अधिक ग्राम पंचायतों का हित निहित होता हो, लेकिन वह जिला पंचायत के कार्यक्षेत्र में न आता हो.

ब्लॉक प्रमुख करते क्या हैं -
ब्लॉक प्रमुख की जो भूमिका है वह यहीं से शुरू होती है. ब्लॉक प्रमुख के अधिकार के सवाल पर पूर्व संयुक्त निदेशक सुधन चंदौला कहते हैं कि क्षेत्र पंचायत की अध्यक्षता ब्लॉक प्रमुख करते हैं. बैठक के माध्यम क्षेत्र के विकास कार्य को लेकर क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा जो प्रस्ताव लाए जाते हैं उन प्रस्तावों को पास कराए जाने का काम क्षेत्र पंचायत प्रमुख यानी ब्लॉक प्रमुख करते हैं.केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से पंचायती राज्य व्यवस्था के बजट में पैसा आता है. यह पैसा खर्च किस तरह किया जाएगा, इसका एजेंडा ब्लॉक प्रमुख, क्षेत्र पंचायत के सदस्य और ग्राम प्रधान मिलकर तैयार करते हैं. क्षेत्र पंचायत की बैठक एक दो महीने में होती है. अभी तो नई क्षेत्र पंचायतों का गठन हो रहा है। तो 1 महीने के अंदर ही पहली बैठक हो जानी चाहिए. ऐसी पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत व्यवस्था बनाई गई है.

क्षेत्र पंचायत के अन्य कार्य -
इसके अलावा क्षेत्र पंचायत के अंतर्गत बीज गोदाम का निर्माण करना, उनका रखरखाव करने का काम भी होता है. क्षेत्र पंचायत सदस्यों के द्वारा जिस प्रकार के प्रस्ताव लाए जाते हैं. उसी के अनुरूप विकास कार्य कराए जाते हैं. इसके अंतर्गत कार्य योजना बनती है और उसी के अनुरूप विकास कार्य होते हैं.

बजट कितना मिलता है -
क्षेत्र पंचायत प्रमुख यानी ब्लॉक प्रमुख को क्षेत्र के विकास के लिए कितनी धनराशि आवंटित होने के सवाल पर पूर्व संयुक्त निदेशक कहते हैं कि क्षेत्र पंचायत के अंतर्गत होने वाले विकास कार्य के लिए दो प्रमुख मद से बजट का आवंटन होता है. इसमें राज्य वित्त आयोग की संस्तुतियों के अंतर्गत और केंद्रीय वित्त आयोग की संस्तुतियों के अंतर्गत विकास कार्यों को लेकर धनराशि आवंटित होती है. अभी क्षेत्र पंचायतों को जो धनराशि पिछले वित्तीय वर्ष में दी गई थी, उसमें एक करोड़ औसतन धनराशि दी गई थी. अगले वर्ष में प्रत्येक क्षेत्र पंचायत को लगभग 7 करोड रुपए की धनराशि प्राप्त होगी. किसी क्षेत्र पंचायत को यह धनराशि कुछ कम हो सकती है, तो किसी को कुछ ज्यादा हो सकती है. क्षेत्र पंचायतों में आबादी के आधार पर धनराशि आवंटित करने का काम होता है.

प्रमुख को अविश्वास प्रस्ताव से पांच साल से पहले हटाया जा सकता है -
ब्लॉक प्रमुख को अगर समय से पहले हटाना हो तो उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर ऐसा किया जा सकता है. चुनाव में चुने जाने के ढाई साल बाद ब्लॉक प्रमुख को साधारण बहुमत से हटाया जा सकता है. इसको ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसी क्षेत्र पंचायत में 50 सदस्यों हों और उसमें से 26 सदस्य ब्लॉक प्रमुख के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दें तो वह अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार माना जाएगा. इसके बाद ब्लॉक प्रमुख का चुनाव फिर से कराया जाएगा.

1947 से 1956 तक पंचायती व्यवस्था की कशमकश 
संयुक्त प्रान्त पंचायत राज अधिनियम 1947 दिनांक 7 दिसम्बर, 1947 ई0 को गवर्नर जनरल द्वारा हस्ताक्षरित हुआ और प्रदेश में 15 अगस्त, 1949 से पंचायतों की स्थापना हुई। इसके बाद जब देश का संविधान बना तो उसमें पंचायतों की स्थापना की व्यापक व्यवस्था की गई। संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद- 40 में यह निर्देश दिये गये हैं कि राज्य पंचायतों की स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठायें और ग्रामीण स्तर पर सभी प्रकार के कार्य एवं अधिकार उन्हें देने का प्रयत्न करें। 15 अगस्त, 1949 से उत्तर प्रदेश की तत्कालीन पाच करोड़ चालीस लाख ग्रामीण जनता को प्रतिनिधित्व करने वाली 35,000 पंचायतों ने कार्य करना प्रारम्भ किया। साथ ही लगभग 8 हजार पंचायत अदालतें भी स्थापित की गई। 1953-54 में पंचायतों की सक्रियता एवं विभिन्न विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों में उनका सहयोग बढ़ाने के लिए विधान सभा के सदस्यो की एक समिति नियुक्त की गयी। इस समिति के सुझावों को दृष्टि में रखकर पंचायत राज संशोधन विधेयक तैयार किया गया जो पंचायतों के अगले दूसरे आम चुनाव में क्रियान्वित हुआ। 

कैप्टनगंज’ का नामकरण -
कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टन गंज' कहा जाने लगा।प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था। कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती शहर में बस्ती तहसील मुख्यालय को 6 मई 1865 में बस्ती शहर में ही जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। उसी समय बस्ती जिले में बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरिया गंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। 
हर्रैया को पावर देकर कप्तानगंज का हक छीना गया -
1865 में कप्तान गंज में तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। बाद में अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था। फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। इसके बाद इसे विकास खण्ड के रूप में अपनी विकास यात्रा जारी रखना पड़ा। वर्तमान में यह तहसील और मुंसफी न्यायालय का अपना स्तर खो चुका है। इसे विधान सभा, ब्लाक तथा नगर पंचायत स्तर तक गुजरना पड़ा रहा है। 

कप्तान गंज विकास खण्ड का गठन -
109 ग्राम सभाओं/पंचायतों तथा 11 न्याय पंचायतों को समलित करते हुए 2 अक्टूबर 1956 को पुराना कैप्टनगंज अब नया कप्तानगंज विकास खण्ड का मुख्यालय घोषित किया गया। 
ब्लॉक प्रमुख बना सम्मानित पद -
भारत में पंचायती राज व्यवस्था के मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति या ब्लॉक पंचायत या समकक्ष निकाय के निर्वाचित प्रमुख को संदर्भित करने वाला शब्द है । पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था का एक स्तर है । यह भारत में तहसील (ब्लॉक) स्तर पर एक ग्रामीण स्थानीय सरकारी निकाय है । यह तहसील के गांवों के लिए काम करती है, जिन्हें सामूहिक रूप से विकास ब्लॉक कहा जाता है। पंचायत समिति ग्राम पंचायत (ग्राम परिषद) और जिला परिषद (जिला पंचायत या जिला बोर्ड) के बीच की कड़ी है। ब्लॉक प्रमुख, या ब्लॉक पंचायत के अध्यक्ष, पंचायती राज व्यवस्था के मध्यवर्ती स्तर का नेतृत्व करते हैं, जिसे पंचायत समिति के नाम से जाना जाता है, हालांकि इसका नाम और संरचना राज्यों के अनुसार भिन्न होती है।वह पंचायत समिति या ब्लॉक परिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है।वह संबंधित संस्था के निर्वाचित प्रमुख के रूप में कार्य करता/ करती है।

ब्लॉक प्रमुख का चुनाव -
ब्लॉक प्रमुख का चुनाव प्रत्येक राज्य में अलग-अलग होता है और यह संबंधित राज्य के पंचायती राज अधिनियमों द्वारा नियंत्रित होता है। सामान्यतः, ब्लॉक प्रमुख का चुनाव पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्यों में से किया जाता है। भारत में ब्लॉक प्रमुख (क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष) का चुनाव वर्तमान व्यवस्था के तहत क्षेत्र पंचायत सदस्यों (बीडीसी सदस्यों) द्वारा आपस में से ही चुना जाता है।

1965 में हुआ था प्रथम चुनाव -
स्वतंत्र भारत में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद कप्तानगंज विकासखंड 1956 में ही अस्तित्व में आ गया लेकिन ब्लाक प्रमुख का चुनाव पहली बार 1965 में हुआ ।

1.पहले ब्लॉक प्रमुख पंडित सूर्य दत्त त्रिपाठी को मिला तीन कार्यकाल -
ब्लाक प्रमुख कप्तान गंज का चुनाव पहली बार जब 1965 में हुआ तो उस समय क्षेत्र के जनप्रिय नेता पंडित सूर्य दत्त त्रिपाठी (जन्म 1 जुलाई 1930 ) पहले प्रमुख निर्वाचित हुए जो 10 जनवरी 1976 तक अपनी हत्या पर्यन्त तक अपने तीन कार्यकाल में इस पद पर बने रहे। इनका जन्म कप्तान गंज से सटे नकटीदेई में सामान्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
    अपने कार्यकाल में स्व. त्रिपाठी जी ने इन्दिरा गांधी के 1971 के बांग्लादेश के विजय से प्रभावित होकर 1972 में कप्तानगंज व्लाक मुख्यालय के सामने इन्दिरा गांधी उच्चतर माध्यमिक विद्याालय की स्थापना की थी। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है। इंदिरा गांधी इंटर कॉलेज, कप्तानगंज की स्थापना कर उन्होंने ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्र के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर प्रदान किया। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज को सशक्त, आत्म निर्भर और संस्कारवान बनाती है। इसी सोच के कारण आज भी यह संस्था उनके सपनों को साकार कर रही है। स्वर्गीय श्री सूर्यदत्त त्रिपाठी जी जनसेवा, शिक्षा और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व थे। वे बड़े आकर्षक और हंसमुख स्वभाव के कांग्रेसी व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन को समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुँचाने के लिए समर्पित कर दिया। पूर्व ब्लॉक प्रमुख के रूप में उनके कार्यकाल को निष्पक्षता, ईमानदारी और जन कल्याणकारी निर्णयों के लिए सदैव स्मरण किया जाता है। वे समस्याओं को धरातल पर समझकर समाधान करने वाले सच्चे जननेता थे।

2.उप ब्लाक प्रमुख राम लखन शर्मा स्थानापन्न प्रमुख रहे -
10 जनवरी 1976 को पण्डित सूर्य दत्त त्रिपाठी की हत्या के बाद उप ब्लाक प्रमुख पद पर आसीन रहे श्री राम लखन शर्मा को ब्लॉक प्रमुख पद का चार्ज मिला जो 1980 तक इस जिम्मेदारी का सम्यक रूप निर्वहन करते रहे। 

3.उपजिलाधिकारी हरैया प्रशासक रूप में रहे -
1980 से 1983 तक चुनाव न होने के कारण इस पद की जिम्मेदारी तत्कालीन हरैया के उपजिलाधिकारी निभाते रहे। 

4. बाबूराम दुबे के थे दो कार्यकाल -
1983 में हुए चुनाव में बाबूराम दुबे को मौका मिला जो दो कार्यकाल में 1995 तक इस पद पर काबिज रहे। दूबे जी ग्राम दुबौली दूबे के मूल निवासी थे। उन्होंने बेसिक शिक्षा विभाग में एक अध्यापक के रूप में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया 
था। बाद में तत्कालीन कांग्रेसी विधायक राम लखन सिंह और बाबू अम्बिका सिंह के सानिध्य का भरपूर उपयोग किया था।
वे बहुजन समाज पार्टी के टिकट से विधान सभा चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमाए थे। उस समय ब्लॉक प्रमुखों का चयन ग्राम प्रधानों द्वारा किया जाता था। कप्तान गंज विधान सभा और बिकास क्षेत्र में वे बहु चर्चित हो चुके थे।26 नवंबर को उनकी पुण्य तिथि है।
 

5.रामशंकर यादव -
त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू होने के बाद 1995 में भाजपा शासनकाल में पहली बार क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा कराए गए चुनाव में रामशंकर यादव विजयी रहे, जो सन 2001 तक बने रहे। 
कप्तान गंज और नगर बाजार के बीच गोपियापार के वे मूल निवासी थे। राम शंकर यादव उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कप्तानगंज विकासखंड के पूर्व ब्लॉक प्रमुख हैं। वह जगलाल बालिका महाविद्यालय के प्रबंधक और जिला सहकारी बैंक बस्ती के संचालक/पूर्व चेयरमैन भी रहे हैं। 

6.राजमणि चौधरी बसपा को मिला दो कार्यकाल-
2001 से 2005 तथा बसपा शासन काल में 2001से 2005 तक इस जिम्मेदारी के निर्वहन का मौका राजमणि चौधरी को मिला। वे कौड़ी कोल के मूल निवासी थे। उनके पिता जय राम चौधरी अपने समय के नामी व्यक्ति थे। बस्ती जिले के कप्तानगंज विकास खंड (ब्लॉक) में वर्ष 2010 से 2015 तक बसपा शासनकाल के दौरान राजमणि चौधरी ब्लॉक प्रमुख थे।

7. श्रीमती शोभा चौधरी : सांसद की 
परिचित -
इसी दौर में 2005 से 2010 तक इस पद पर शोभा चौधरी शोभायमान रही। वह मूल रूप से कप्तानगंज क्षेत्र के दुबौला गांव की निवासी थीं। वह बस्ती के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री/सांसद राम प्रसाद चौधरी के परिवार (उनकी भाई की पत्नी/रिश्तेदार) से जुड़ी रही हैं, जिनका पैतृक निवास स्थान दुबौला है।

8.श्रीमती माधुरी आर्य : विधायक की पुत्री-
कप्तानगंज की पूर्व ब्लॉक प्रमुख माधुरी आर्य पति संतोष कुमार बस्ती जिले के सोनहा थाना क्षेत्र के कलंदर नगर गांव की निवासी हैं। माधुरी आर्य उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री रामकरन आर्य की पुत्री हैं। उनका पैतृक और मुख्य निवास स्थान कलंदर नगर है।
2015 में हुए चुनाव में पूर्व मंत्री रामकरन आर्य की बेटी माधुरी आर्य ने कप्तान गंज के ब्लॉक प्रमुख पद पर कब्जा कर लिया। जो वर्ष 2018 के शुरुआती महीनों में वह इस पद पर थीं, 2017 में भाजपा सरकार आने के बाद से ही माधुरी आर्य के खिलाफ आवाज उठने लगी। 25 फरवरी 2018 को दूसरी बार हुए अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान में 33 क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर माधुरी आर्य को इस पद से अपदस्थ कर दिया। फरवरी 2018 में अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से उन्हें हटा दिया गया था। 

9.श्रीमती धनमन देवी -
कप्तानगंज क्षेत्र के करचोलिया गांव की निवासी थीं। वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़ी थीं और कप्तानगंज ब्लॉक की 9वीं ब्लॉक प्रमुख बनी थीं। वह भाजपा से जुड़ी थी। धनमन देवी को इस पद पर काबिज होने का मौका मिल गया। जो फरवरी 2018 में अविश्वास प्रस्ताव के बाद मतदान प्रक्रिया के जरिए धनमन देवी ब्लॉक प्रमुख पद पर काबिज हुईं थीं। 

10.वर्तमान प्रमुख: श्रीमती मिथिलेश निषाद -
जुलाई 2021 के पंचायत चुनाव में मिथिलेश निषाद (तेलियाडीह गांव निवासी) निर्विरोध ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुईं और वर्तमान तक इस पद पर कार्य कर रही हैं। कप्तानगंज विकासखंड की निर्विरोध निर्वाचित ब्लाक प्रमुख 38 वर्षीय मिथिलेश निषाद तेलियाडीह गांव निवासी है। इनके पति भोला निषाद बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक है।परिवार में पिछले 30 वर्षों से ग्राम प्रधानी चली आ रही है । 2015 से 20 तक यह स्वयं प्रधान के दायित्व का निर्वहन कर चुकी हैं। जबकि पहली बार क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव जीतकर प्रमुख बनने में सफल हुई। 
उनका कार्यकाल उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के निर्धारित नियमों के अनुसार सामान्यतः साल 2021 से 2026 तक का है ।वह इस पद पर वर्तमान में कार्यरत हैं। हाल ही में मई 2026 में उनकी अध्यक्षता में क्षेत्र पंचायत की बैठक भी संपन्न हुई थी। ब्लाक प्रमुख मिथिलेश निषाद ने बताया कि क्षेत्र पंचायत से मिलने वाले धन से पूरे क्षेत्र पंचायत में विकास के कार्य बीडीसी सदस्यों के प्रस्ताव पर कराए जा रहे हैं, जिसमें क्षेत्र पंचायत सदस्य तथा अन्य जनप्रतिनिधियों से विकास के लिए नए प्रस्ताव लिए जा रहे हैं। इससे क्षेत्र पंचायत से होने वाले कार्यों को धरातल पर उतारा जा सके। क्षेत्र पंचायत की बैठक में कप्तानगंज के विधायक अतुल चौधरी ने कहा कि विकास के लिए सभी जन प्रतिनिधियों को मिलजुल कर जनहित के मुद्दों पर काम करना होगा।


कप्तानगंज (बस्ती) शृंखला के कुछ अन्य आकर्षण आलेख -

भाग 1 में आलेख में जानिए- कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने बनाई थी कैप्टनगंज तहसील और मुन्सफी ।

भाग 2 के आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विधान सभा का इतिहास और भावी उम्मीदवार " ।

भाग 3 - के वर्तमान आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विकास क्षेत्र का इतिहास"।

भाग 4 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज नगर पंचायत का इतिहास"।

भाग 5…6 आदि -
समय समय पर अन्य आगामी आलेख में कप्तानगंज के इतिहास , समाज और संस्कृति के विभिन्न उपादानों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।


लेखक -
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,
Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 
मोबाइल नंबर +91 9412300183




Tuesday, September 15, 2026

बस्ती जिले के कप्तानगंज विधानसभा (भाग 2)✍️डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुसार, ब्रिटिश भारत में 1936-37 की सर्दियों में प्रांतीय चुनाव हुए थे । ये चुनाव तत्कालीन सभी ग्यारह राज्यपाल प्रांतों - मद्रास , मध्य प्रांत , बिहार , उड़ीसा , संयुक्त प्रांत (U P) , बंबई , असम , उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत , बंगाल , पंजाब और सिंध में हुए। ब्रिटिश प्रांतों दिल्ली , अजमेर-मेवाड़ , कूर्ग और बलूचिस्तान तथा रियासतों में चुनाव नहीं हुए थे।चुनाव के अंतिम परिणाम 20 फरवरी 1937 को घोषित किए गए थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पांच प्रांतों - बंबई, मद्रास, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत, बिहार और उड़ीसा - में सत्ता में आ गई थी। पंजाब, सिंध (जहां उसे बहुमत नहीं मिला), असम और बंगाल (जहां वह फिर भी सबसे बड़ी पार्टी थी) इसके अपवाद थे। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग किसी भी प्रांत में अपने दम पर सरकार बनाने में असफल रही थी।

      आजादी के पूर्व 1937- 39 में वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र 'संयुक्त प्रांत' कहलाता था, जहाँ हुए प्रांतीय चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। कुल 228 सीटें थीं। इनमें हिन्दू की140 सीटें , (123 ग्रामीण,17 शहरी) और मुस्लिम की 64 सीटें, (51 ग्रामीण और 13 शहरी क्षेत्र) थीं। इसके अलावा 34 हिन्दू MLC (29 ग्रामीण 5 शहरी) 17 मुस्लिम (12 ग्रामीण और 5 शहरी) क्षेत्रों में भी चुनाव सम्पन्न हुए थे।कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल करते हुए लगभग 1586 सीटों में से 706 सीटें जीतीं और सात प्रांतीय सरकारें बनाईं थी। उसने संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, बंबई और मद्रास में सरकारें बनाईं। 

संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)

संयुक्त प्रांत की विधानसभा में कुल 228 सीटें थीं। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 133 या 134 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। बहुमत मिलने के बाद कांग्रेस ने यहाँ अपनी सरकार बनाई थी। 

गोविंद वल्लभ पंत संयुक्त प्रांत के पहले प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री के समकक्ष) बने।

गोविंद बल्लभ पंत एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थे, जो उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। पंत ने 17 जुलाई 1937 को संयुक्त प्रांत के प्रधान मंत्री (समकक्ष मुख्यमंत्री)के रूप में शपथ ली। उन्होंने गृह, वित्त, सामान्य प्रशासन और वन मंत्रालय का प्रभार भी संभाला। यह मंत्रालय 1939 तक चला जब ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में सभी कांग्रेस मंत्रालयों ने इस्तीफा दे दिया और प्रांतों को राज्यपाल शासन के अधीन कर दिया गया। कैलाश नाथ काटजू को कानून और न्याय मंत्री बनाया गया। रफी अहमद किदवई को वित्त विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। हालाँकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की कांग्रेस की मांगें पूरी नहीं हुईं, फिर भी भारत सरकार अधिनियम 1935 ने मताधिकार प्राप्त लोगों की संख्या में वृद्धि की, जो भारत के अवर सचिव लॉर्ड लोथियन की अध्यक्षता वाली 1932 की लोथियन समिति रिपोर्ट की सिफारिशों के साथ - साथ वायसराय के मंत्रिमंडल और प्रांतीय सरकारों की सिफारिशों पर आधारित थी। 

द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा के विरोध में देशी सरकार का इस्तीफा -

भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों से परामर्श किए बिना भारत को Viceroy Lord Linlithgow declared the country to be at war in World War II के फैसले के विरोध में अक्टूबर और नवंबर 1939 में कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया था।1945 में, ब्रिटिश लेबर सरकार ने प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए चुनाव का आदेशदिया।  कांग्रेस ने संयुक्त प्रांतों में 1946 के चुनावों में बहुमत जीता और पंत फिर से प्रीमियर बने। भारत की आजादी (1947) और संविधान लागू होने से पहले, ब्रिटिश काल में 1946 में संयुक्त प्रांत (यूनाइटेड प्रोविंस) की विधान परिषद/विधानसभा के लिए चुनाव हुए थे।


कप्तानगंज विधानसभा की विकास यात्रा:-

कप्तान गंज के बारे में अध्ययन करते समय देखा गया कि यह 1802 गोरखपुर के रूटलेज कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये। मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड की मदद ली। कप्तान माल्कोम मक्लोइड  ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के एक सैन्य अधिकारी थे। जिनका संबंध उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले और गोरखपुर क्षेत्र से था।उन्हें क्षेत्र में राजस्व (लगान) वसूली और कानून-व्यवस्था स्थापित करने के लिए जाना जाता है। गोरखपुर के पहले ब्रिटिश कलेक्टर 'रूटलेज' ने जब भूमि राजस्व की वसूली के लिए सख्त कदम उठाए, तो स्थानीय जमींदारों और जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। कलेक्टर के आदेशों को कड़ाई से लागू करने और राजस्व वसूलने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने ब्रिटिश सेना के साथ आगे बढ़कर प्रशासन की मदद की थी। इस सैन्य हस्तक्षेप के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर ही पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टनगंज' कहा जाने लगा।प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था।

1815 व 1816 ई. में जिले के सियारमार एक खानाबदोस जाति के लोगों ने लूटपाट करना शुरू कर दिया था। मई 1816 ई. में इस दल ने कैप्टनगंज से उस समय का 6,000 रूपया लूट लिया था। लूटपाट के लुकाछिपी का खेल 1857 ई तक पूरे जिले में चलता रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के 1857 के विद्रोह के समय पूरे देश में अंगे्रजों पर संकट के बादल मड़राने लगे थे। सभी अंग्रेज जान बचााकर भाग रहे थे। उन्हें व उनके परिवार पर संकट बरकरार था।  5 जून 1857 को पूर्वांचल में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह भड़क उठा था। 6 अंगे्रज भगोड़ों का एक दल नांव द्वारा अमोढ़ा होते हुए कप्तानगंज स्थित अंग्रेज कैप्टन के शरण में आया था। तहसीलदार ने उन्हें चेतावनी दिया था कि शीघ्र बस्ती छोड़ दें।

राजा सैयद हुसेन अली उर्फ मोहम्मद हसन उत्तर प्रदेश के बदायूं (सहसवान, काजी मोहल्ला) के मूल निवासी और स्वतंत्रता सेनानी थे, ने कर्नल लेनाक्स ,उनकी पत्नी तथा बेटी को अपनी संरक्षा में ले रखा था। बाद में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर पेप्पी ने इन्हें भी मुक्त कराया था। 12 अगस्त 1857 को मोहम्मद हसन के नेतृत्व में बागियों ने कैप्टनगंज को अपने अधीन कर रखा था।

कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती तहसील मुख्यालय को 6 मई 1865 में जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरियागंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। 1865 में यहां तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। बाद में अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था ।फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। इसके बाद इसे विकास खण्ड के रूप में अपनी विकास यात्रा जारी रखना पड़ा।

यह क्षेत्र विधान सभा के रूप में पहले भी नहीं था।1937 से 1969 तक यह क्षेत्र कभी यह बस्ती पूर्वोत्तर/ दक्षिण- पूर्व) कभी कप्तानगंज (पूर्वी)-कम-बस्ती (पश्चिम), कभी हर्रेया पूर्व-बस्ती पश्चिम, कभी 'कप्तानगंज (उत्तर) सह नगर पूर्व’ कभी बहादुरपुर कभी नगर आदि विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा। बाद में 1974 से स्वतंत्र कप्तानगंज क्षेत्र के रूप यह अपना पहचान बना पाया जिसमें ,गौर और दुबौलिया ब्लाक भी पूर्णतः या आंशिक रूप से समलित हुए हैं।


प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक:-

1937- रामचरित्र पांडेय (कांग्रेस)-

बस्ती जनपद में राजनीति की शुरुआत स्वतंत्रता के बाद राम चरित्र पांडेय और देशराज नारंग से होती है। दोनों बड़ी हस्तियां थीं। रामचरित्र पांडेय जहां कांग्रेस के बड़े नेता थे वहीं ,’महंत गोकुल चन्द नारंग’ देशराज नारंग औद्योगिक घराने से संबंध रखते थे। ऐतिहासिक अभिलेख 'The Indian Year Book 1937-38' के अनुसार, इस चुनाव में महंत (या सर) गोकुल चंद नारंग ने बस्ती जिला (पूर्वोत्तर/दक्षिण-पूर्व) और आस- पास के क्षेत्रों से प्रमुखता से भाग लिया और अपनी राजनीतिक वसामाजिक उपस्थिति दर्ज कराई थी। नारंग उद्योग समूह और इस औद्योगिक घराने की स्थापना का श्रेय डॉ. सर गोकुल चंद नारंग को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1908 के आसपास इस औद्योगिक साम्राज्य की शुरुआत की थी। डॉ. सर गोकुल चंद नारंग अविभाजित पंजाब अब पाकिस्तान के एक बेहद विद्वान व्यक्ति, वकील और ब्रिटिश काल के मंत्री थे। उनके नेतृत्व में नारंग परिवार ने देश में चीनी मिलों आसवनी और वाइनरी के क्षेत्र में कदम रखा। 

बड़े उद्योगपतियों में शुमार देशराज नारंग ने बस्ती को अपना कार्य क्षेत्र चुना था। यहां औद्योगिक क्रांति का बीज उन्होंने ही बोया था। जिला मुख्यालय पर रेलवे स्टेशन के निकट नारंग चीनी मिल की स्थापना की। इसकी दूसरी शाखा दस किमी दूर वाल्टरगंज बाजार के निकट वर्ष 1932 में स्थापित की। इस प्रबंधन ने अपनी तीसरी नई इकाई अठदमा रुधौली में भी स्थापित कर दी थी । ये चीनी मिलें तब उद्योग का हब मानी जाती थीं।  इन मिलों से उत्पादित चीनी, गुणवत्ता के मामले में अव्वल मानी जाती रही।

राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक बेहद कद्दावर और ऐतिहासिक कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने जिले की शुरुआती राजनीति की दिशा तय की थी। वे मूल रूप से बस्ती जिले के हरैया तहसील अंतर्गत 'बेलभरिया राम गुलाम' गांव के रहने वाले थे। वह बेहद साधारण पृष्ठभूमि के एक जनप्रिय नेता थे। उस जमाने के जानेमाने उद्योगपति  देशराज नारंग भी चुनाव लड़े थे। एक तरफ धनपति दो दूसरी तरफ एक धनहीन जमीन से जुड़ा नेता था। क्षेत्रीय बुजुर्ग बताते है की लाख प्रयास और चुनाव मे पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी देशराज नारंग चुनाव हार गए थे।

उनकी उद्योगपति देशराज नारंग के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से मानी जाती है। उन्होंने एक बड़े ऐतिहासिक और चर्चित चुनाव में देशराज नारंग के परिवार से जुड़े बड़े औद्योगिक घराने के " गोकुल चंद नारंग" को चुनाव में पराजित किया था। वह अपने समय में बस्ती में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे।वर्तमान में भारत सरकार के अमृत सरोवर अभियान के तहत उनके गृह ग्राम 'बेलभरिया राम गुलाम' में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए "स्वर्गीय पंडित राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमृत सरोवर" का निर्माण किया गया है। 

1946 का प्रांतीय विधानसभा चुनाव -

आजादी से ठीक पहले जनवरी 1946 में उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रांत  में प्रांतीय विधानसभा के चुनाव हुए थे। कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में शानदार जीत हासिल की और अपना बहुमत साबित किया। मुस्लिम लीग ने भी मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर काफी सीटें जीतीं।

1946- राधेश्याम शर्मा (कांग्रेस)

1946 के संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज (पूर्वी)-कम-बस्ती (पश्चिम) विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार राधेश्याम शर्मा विधायक चुने गए थे। उनका मूल निवास पुरानी बस्ती के ओरियाना टोला / पांडे बाजार के समीप का क्षेत्र था। 

   राधेश्याम शर्मा के विरुद्ध हिंदू महासभा के प्रत्याशी दिग्विजय नाथ (गोरखनाथ पीठ के तत्कालीन महंत) को उतारा गया था। चुनावों में हिस्सा लेने के लिए अखिल भारतीय हिंदू महासभा के टिकट पर पर्चा जरूर भरा था, लेकिन उनका नामांकन पत्र अंग्रेज सरकार द्वारा खारिज हो गया था, जिसके कारण वे उस वर्ष का चुनाव लड़ ही नहीं सके थे। दिग्विजयनाथ 1934 में गोरखनाथ मंदिर के महंत बने थे, और उन्हीं के बाद से यह मठ कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का केन्द्र बना. दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे।1939 में सभी पंथों, मंदिरों, मठों और साधु- संन्यासियों को एकजुट करने के लिए ‘अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा’ का गठन किया गया था। दिग्विजय नाथ आजीवन इस संस्था के अध्यक्ष रहे। महात्मा गांधी के 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी महंत दिग्विजय नाथ काफी सक्रिय रहे।उनके ख़िलाफ़ अंग्रेज़ सरकार ने वारंट भी जारी किया था। महंत दिग्विजय नाथ ने 1944 में गोरखपुर में हिन्दू महासभा का आयोजन भी किया था । उनका नामांकन पत्र खारिज हो गया और वे चुनाव नहीं लड़ सके थे। इस प्रकार राधेश्याम शर्मा की जीत और आसान हो गई थी।1946 के इन प्रांतीय चुनावों के विजेताओं ने ही आगे चलकर भारत की संविधान सभा के सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया था।

1951-52 में आजादी के बाद प्रथम विधान सभा -

आजादी के बाद भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। 1951-52 में हुए देश के पहले आम चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में पहली निर्वाचित विधानसभा का गठन हुआ, जिसने प्रदेश की लोकतांत्रिक राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत की। 1952 के चुनाव में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 430 सीटों के लिए चुनाव हुआ था।कुल 347 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव कराया गया था। इनमें 264 एक-सदस्यीय और 83 दो-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे।चुनाव में कुल 2,604 उम्मीदवार मैदान में थे।चुनाव में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और 388 सीटें जीतीं थीं । सोशलिस्ट पार्टी को 20 सीटें मिलीं थीं। बाकी सीटों पर अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थीं ।चुनाव के बाद गोविंद बल्लभ पंत ने मुख्यमंत्री के रूप में सरकार का नेतृत्व किया था।

1952- कृपाशंकर श्रीवास्तव, कांग्रेस-

वर्ष 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाले हर्रैया पूर्व- बस्ती पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था।1952 में देश और उत्तर प्रदेश के पहले आम चुनावों के दौरान हर्रैया पूर्व (बस्ती पश्चिम) एक दोहरे सदस्य वाले निर्वाचन क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में था। इस ऐतिहासिक चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) ने सामान्य वर्ग से जीत हासिल की थी।

1952- राम लाल, कांग्रेस -

भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 288 - बस्‍ती (पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया था। वे 1952- 57 के प्रथम विधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार राम गरीब को हराया था।

1952- प्रभु दयाल विद्यार्थी ,कांग्रेस -  

वर्ष 1952 में यह दो सदस्यीय सीट थी, जहाँ से कांग्रेस के ही प्रभुदयाल विद्यार्थी भी दूसरे विधायक बस्ती पश्चिम से चुने गए थे। 

1952-शिव नारायण, कांग्रेस -

वे हर्रैया पूर्व कम बस्ती पश्चिम के विधायक थे। उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 293 - हरैया (पूर्व) बस्‍ती (पश्चिम) विधान सभानिर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। 

1957- कृपाशंकर , कांग्रेस -

कृपा शंकर 1957 का द्वितीय विधानसभा  चुनाव में भी उन्होंने इस क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पकड़ मजबूत रखी और  विधायक के पुनः चुने गए। बस्ती जिले के बस्तीपूर्व /'नगर' विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की ओर से चुनाव जीतकर विधायक चुने गए थे। नगर (Nagar) विधानसभा सीट (यह उस समय एक द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था, जहां से दो विधायक चुने जाते थे)। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 1957 के चुनाव में उन्हें 41,741 वोट मिले थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार शकुंतला नायर को हराया था।1957 के चुनावों के दौरान यह बस्ती जिले के अंतर्गत बस्ती पूर्व विधान सभा सीट (वर्तमान में महादेवा/बस्ती निर्वाचन क्षेत्र के नाम से प्रभावित) के रूप में जानी जाती थी। 

1962- शकुंतला नैय्यर (जनसंघ)-

शकुंतला नैय्यर (नायर) ने 1962 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 'भारतीय जनसंघ' पार्टी के टिकट पर बस्ती जिले के 'नगर’ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उन्होंने कुल 17,352 वोट (38.56% मत प्रतिशत) हासिल किए और कांग्रेस के उम्मीदवार राम शंकर लाल को 1,931 वोटों के अंतर से हराया था।

1967- रामलखन सिंह  (कांग्रेस)-

रामलखन सिंह वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश की बहादुरपुर (कप्तानगंज) विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने थे। रामलखन सिंह मूल रूप से बस्ती जिले के महुआडाबर के निवासी थे।उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार डी. बी. पाल को हराया था। इसके बाद राम लखन सिंह ने 1969,1974 के विधानसभा चुनाव में भी यहाँ से दोबारा विधायक चुने गए थे।

1969- रामलखन सिंह (कांग्रेस)- 1969 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहादुरपुर (बस्ती) सीट से कांग्रेस उम्मीदवार रामलखन सिंह ने भारतीय क्रांति दल के उम्मीदवार कृष्ण कुमार पाल को हराया था। इसके ठीक दो साल बाद 1969 में फिर से विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में भी रामलखन सिंह को जीत मिली थी। 

1974- रामलखन सिंह (कांग्रेस)-

कप्तानगंज विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1974 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले इस क्षेत्र के हिस्से मुख्य रूप से 'बस्ती नगर' और 'हर्रैया पूर्व' विधानसभा सीटों के अंतर्गत आते थे। इस सीट से पहले विधायक राम लखन बने थे, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में जीत हासिल की थी।

जातीय समीकरण

कप्तानगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC), कुर्मी और ब्राह्मण आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो लगभग 21% हैं। इसके बाद कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% और ब्राह्मण मतदाताओं की करीब 13% है, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग 12% हैं। वहीं यादव मतदाताओं की संख्या करीब 7%, ठाकुर मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 6%, राजभर मतदाता करीब 4%, मौर्या मतदाता लगभग 3% और बनिया मतदाता करीब 3% हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं। 

1974: कांग्रेस ने मारी बाजी

1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम लखन विजयी हुए। उन्होंने नेशनल कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन (NCO) के जितेंद्र सिंह को 12,242 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम लखन को 22,352 वोट मिले, जबकि जितेंद्र सिंह को 10,110 वोट मिले 

आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव

1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। 

सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।

1977: पहली बार जनता पार्टी के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह ने जीता चुनाव

1977 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी (JNP) के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम लखन को 15,170 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह को 33,811 वोट मिले, जबकि राम लखन को 18,641 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी तेज बहादुर रहे, जिन्हें चुनाव में 3,801 वोट मिले।

1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार ओम प्रकाश उर्फ राम मिलन सिंह ने चुनाव जीता था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( के प्रत्याशी राम लखन सिंह को हराया था।


राजनीतिक अस्थिरता का समय

हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधान सभाओं को फिर भंग कर दिया गया।

विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। 


1980 का चुनाव अंबिका सिंह (कांग्रेस)-

1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) के अंबिका सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के सत्या राम को 6,479 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अंबिका सिंह को 23,091 वोट मिले, जबकि सताया राम को 16,612 वोट मिले। इस प्रकार कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार अंबिका सिंह ने जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार सत्या राम को हराया था।


1985- अंबिका सिंह (कांग्रेस) ने दोहराई जीत

इस चुनाव में भी कांग्रेस की अंबिका सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में उन्होंने लोकदल के राम प्रसाद चौधरी को 6,276 वोटों से हराया। इससे पहले 1980 के चुनाव में भी कांग्रेस (आई) के टिकट पर उन्होंने जनता पार्टी  के उम्मीदवार सत्या राम को हराया था।


1989 और 1991 में निर्दलीय कृष्ण किंकर सिंह ने मारी बाजी

वहीं 1989 और 1991 के चुनाव की बात करे तो, निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह विजयी हुए। 1989 के चुनाव में कृष्ण किंकर सिंह ने जनता दल के सुखपाल पांडे को 27,992 वोटों से हराया, जबकि 1991 के चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के राम प्रसाद चौधरी को 15,304 वोटों से हराया।

राना कृष्ण किकर सिंह का राजनैतिक सफर 

बस्ती के राना कृष्ण किकर सिंह ने राजनीतिक सफर वर्ष 1977 में एपीएन कालेज के छात्र संघ अध्यक्ष से की। इसके बाद वह प्रधान चुने गए। वर्ष 1983 और 1988 में बहादुरपुर के ब्लाक प्रमुख रहे। वर्ष 1989 और 1991 में कप्तानगंज विधान सभा सीट से निर्दल विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 1995 में जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने। पिछले चुनाव में वह कप्तानगंज सीट से कांग्रेस से लड़े थे और हार गए। राणा कृष्ण किंकर सिंह और उनके सुपुत्र राणा नागेश प्रताप सिंह अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा की सदस्यता ग्रहण की. अभी कुछ ही दिन पूर्व विधायक ने अपने समर्थकों के साथ बसपा का दामन थामा था लेकिन भाजपा की जनकल्याणकारी नीतियों से प्रभावित होकर और प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों से प्रभावित होकर पूर्व विधायक राणा कृष्ण किंकर सिंह और नागेश प्रताप सिंह ने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया।

1991- कृष्ण किंकर सिंह (निर्दल)-

वर्ष 1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से निर्दलीय विजेता राना कृष्ण किंकर सिंह ने समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1989 और 1991 में लगातार दो बार यहां से निर्दलीय प्रत्याशी राणा कृष्ण किंकर सिंह जीते थे।


1993- राम प्रसाद चौधरी ,पहली बार जीती सपा- 

1993 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीतला को 33,848 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राम प्रसाद चौधरी को 55,755 वोट मिले, जबकि शीतला को 21,907 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कृष्ण किंकर रहे, जिन्हें चुनाव में 20,744 वोट मिले।


1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से।कुर्मी बिरादरी में उन्हें "कुर्मी क्षत्रप" की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं। वर्ष 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार शीतला को हराया था।

1996- राम प्रसाद चौधरी (बसपा) की एंट्री कराए-

1993 के चुनावों के बाद राम प्रसाद चौधरी बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए और 1996 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। उन्होंने  बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था और समाजवादी पार्टी  के उम्मीदवार महेश सिंह को हराया था।

2002- राम प्रसाद चौधरी (भाजपा)-

इस चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज सीट से पाला बदलकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के महेश सिंह को 4,019 वोटों से हराया।

2007- राम प्रसाद चौधरी (बसपा) -

वर्ष 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से पुनः पाला बदलते हुए बहुजन समाज पार्टी से टिकट लेकर राम प्रसाद चौधरी ने निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह राणा को हराया था।

2012- राम प्रसाद चौधरी (बसपा)-

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार त्रयम्बक नाथ त्रिपाठी को हराया था।

राम प्रसाद चौधरी के कार्य -

राम प्रसाद चौधरी कप्तानगंज विधान सभा सीट से 5 बार विधायक रह चुके हैं और तीन बार यूपी सरकार में उन्हे मंत्री का पद भी मिला था।रामप्रसाद चौधरी की पिछड़ी जाति के वोटरों में अच्छी खासी पकड़ हैं, इसलिए कुर्मी वोटरों के वे क्षत्रप नेता भी माने जाते हैं। कृषि महाविद्यालय की स्थापना पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी के द्वारा ही लाया गया था। इसके अलावा मानपुर माझा पर पुल, पंडुल घाट पुल, परखट्टी पूल, दुबौलिया ब्लॉक का गठन और भवन निर्माण सहित कई सड़कों का भी निर्माण कराया था। इसके बाद भी कप्तानगंज विकास के रेस में काफी पीछे छूट गया। रोजगार की दिशा में पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी ने कुछ काम नहीं किया, जिसका खामियाजा उन्हें वर्ष 2017 के विधानसभा में झेलना पड़ा।

2017- सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल बीजेपी-

2017 के विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल ने जीत दर्ज की थी और उन्होंने बहुजन समाज पार्टी  के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से। कुर्मी बिरादरी में उन्हें "कुर्मी क्षत्रप" की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं । 2017 में यह लंबा दबदबा टूट गया । भाजपा के चंद्र प्रकाश शुक्ला ने जीत दर्ज कर सीट पर पहली बार कमल खिलाया।

2022- काविंद्र चौधरी सपा -

2022 के विधानसभा चुनाव में कप्तान गंज सीट कुर्मी बिरादरी की सियासत के लिए जिले भर में खास पहचान रखती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने मौजूदा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला पर फिर भरोसा जताया था।उनके सामने सपा ने काविंद्र चौधरी को उतारा था।कांग्रेस से अंबिका सिंह और बसपा से जहीर अहमद भी मैदान में थे।दिलचस्प बात यह रही कि पूरे बस्ती जिले में सबसे ज्यादा मतदान इसी सीट पर हुआ था ,करीब 59.09 प्रतिशत, जो जिले की बाकी चारों सीटों से आगे था। पांच साल पहले 2017 में जिस सीट पर भाजपा ने पहली बार खाता खोला था, वहां सिर्फ एक ही कार्यकाल के बाद सत्ता पलट गई। साथ ही यह उस "कुर्मी क्षत्रप" राजनीतिक विरासत की भी वापसी मानी गई, जिस पर दशकों तक रामप्रसाद चौधरी के परिवार का असर रहा है।


2027- सबसे सशक्त वर्तमान विधायक कविंद्र चौधरी अतुल जी -

कविंद्र चौधरी (अतुल) उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की 308-कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के वर्तमान विधायक हैं।वह वरिष्ठ नेता राम प्रसाद चौधरी के पुत्र हैं और उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

विधायक निधि से विभिन्न गांव और चौराहों को मुख्य मार्ग से जोड़ने की बात हो या छोटी-छोटी आबादी को कीचड़, गंदगी और जल जमाव से निजात दिलाने का प्रयास। विधायक ने अपने अब तक के कार्यकाल में अपनी निधि से यह छोटे-छोटे निरंतर प्रयास किए हैं।बहुत सारी जगह पर न सिर्फ छोटी सड़कों के निर्माण से लोगों को आवागमन में राहत मिली है, बल्कि अन्य कार्यों से भी लोग प्रभावित रहे हैं। आरसीसी, खड़ंजा, इंटरलाकिंग हाई मास्ट लाइट के साथ महापुरुषों की स्मृतियों में सहेजने में भी अपने मद का सदुपयोग किए हैं। बड़ी संख्या में पूरे विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख चौराहों और स्थलों पर विभिन्न महापुरुषों को आमजन की यादों में जीवित रहने का कार्य किया गया है। विधायक कविंद्र चौधरी अतुल ने अपने स्वभाव और छवि को कभी नकारात्मक और विवादित नहीं बनने दिया।धार्मिक स्थलों के विकास के लिए भी प्रयास किया। कैंसर पीड़ित के उपचार में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करते हुए पांच लाख रुपए की सहायता उपलब्ध कराई। वर्ष 2023- 24 में पांच करोड़ की लागत से 44 विभिन्न सड़क, स्मृति द्वार, सीसी रोड, नाली निर्माण सहित अन्य प्रमुख कार्य करवाए गए।

2027 में भाजपा के लिए सबसे कठिन विधानसभा सीट कप्तानगंज -

कप्तानगंज में सपा के मौजूदा विधायक अतुल चौधरी (कविंद्र चौधरी) रामप्रसाद चौधरी के बेटे हैं। रामप्रसाद चौधरी यहां पहले कई बार विधायक रह चुके हैं और अब बस्ती लोकसभा से सांसद हैं। कुर्मी समाज में उनकी मजबूत पकड़ है। 2022 में अतुल चौधरी ने भाजपा के सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला को करीब 24 हजार वोटों से हराया था। आज जब सपा-भाजपा की सीधी टक्कर हो रही है और त्रिकोणीय मुकाबला नहीं दिख रहा, तो पिछड़ा- दलित- अल्पसंख्यक का माहौल और भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।दलित, कुर्मी और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। ऐसे में सिर्फ हवा-हवाई या नाम की ताकत से जीत मुश्किल है। प्रत्याशी को बूथ-बूथ पर संगठन मजबूत करना होगा, गैर-कुर्मी ओबीसी, ब्राह्मण और दलित वोटों को एकजुट करने की ठोस रणनीति बनानी होगी तथा स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहना होगा।



2027 के भाजपा के कुछ संभावित प्रत्याशी -

1.सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला भाजपा के सबसे सशक्त पूर्व विधायक -

चंद्र प्रकाश शुक्ला  एक भारतीय राजनीतिज्ञ और उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य  रहे हैं । वे उत्तर प्रदेश के कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। शुक्ला उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं।2017 से वे कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किए हैं और भाजपा के सदस्य हैं। 2017 के चुनावों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को 6,827 वोटों के अंतर से हराया था । वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जीते भाजपा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला ने कप्तानगंज को नगर पंचायत का दर्जा दिलाने  में सफल रहे। कस्बे को जलजमाव से मुक्त कराने और पिपरौल घाट पर पुल बनवाने का वादा पूरा किया। राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे विधानसभा क्षेत्र में ट्रामा सेंटर अभी भी आश्वासन की श्रेणी में ही है।कुछ वादे पूरे हुए हैं लेकिन सड़क शिक्षा पानी और बेरोजगारी के मुद्दे पर जनता के सवाल अभी भी मुखर हैं। कप्तानगंज दुबौलिया मार्ग पर वायरलेस चौराहे तक 1 किलोमीटर दोनों तरफ नाली व सीसी रोड बन जाने से जलजमाव से फिलहाल मुक्ति मिली, इसके साथ पिपरौल घाट पर पुल बनने से भटहा नारायणपुर सरवरिया सहित दर्जनों गांव के लोगों की राह आसान हो गई। 930 करोड़ की लागत से भाव फ्री विद्युत उप केंद्र पिपरौल घाट, सर्विया 1270 के पुलों का निर्माण 50 करोड़ से, बभनान गौरव एरिया मार्ग का निर्माण 23 करोड़ से, कप्तानगंज- दुबौलिया  और मार्ग 15 करोड़ से, डिलीट से कप्तानगंज 21 करोड़ की लागत से दुगोला पचपेड़वा 6:30 करोड़ की लागत से बना है। इसके अलावा पैकोलिया- शिवा घाट मार्ग का निर्माण सहित 150 करोड़ से 200 छोटी सड़कें पूर्वांचल विकास निधि और विधायक के 9 करोड रुपये से कई अन्य विकास के कार्य कराया गया है । इसके अलावा 125 करोड़ से कटाया चांदपुर गौरा तटबंध का काम 500 से ज्यादा लोगों को चिकित्सा सुविधा के लिए धनराशि और दुबौलिया में रंगशाला बनवाया गया है। सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला ने विभिन्न गांवों में जनसंपर्क कर लोगों से जुड़े रहे हैं। इस दौरान उन्होंने शोकाकुल परिवारों से मुलाकात करते रहते हैं, बीमार लोगों का हाल चाल जानते रहते रहे हैं। बिजली और स्वास्थ्य समस्या पर अधिकारियों से तत्काल बात भी कर निदान कराते रहे हैं। जमीनी स्तर पर कप्तान गंज में अगर कोई काम किया है तो सीए चंद्रप्रकाश शुक्ला जी हैं।

2.राणा दिनेश प्रताप सिंह-

राना दिनेश प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक प्रमुख भाजपा नेता, समाजसेवी और उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के प्रदेश अध्यक्ष हैं।वह बहादुरपुर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख हैं। उनकी पत्नी नीलम सिंह राणा नगर पंचायत नगर (बस्ती बाजार) की चेयरमैन हैं, और वह उनके कार्यों में भी सहयोग करते हैं।उन्होंने दिसंबर 2021 में लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालय में औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी  की सदस्यता ली थी। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंचायती राज और सामाजिक विकास के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

3.राणा नागेश प्रताप सिंह -

नगर थाने के रानीपुर  बेलाड़ी निवासी पूर्व विधायक राना कृष्ण किंकर सिंह के बेटे और भाजपा नेता राना नागेश प्रताप सिंह भाजपा के एक नामचीन उम्मीदवार हैं। वे विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक, समाज सेवी और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं।दो वर्ष पूर्व 24/25 सितम्बर 2024 को बस्ती जिले के बहुचर्चित शक्ति सिंह हत्याकांड में वांछित आरोपी भाजपा नेता नागेश प्रताप सिंह ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया। जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है। इस समय भी वे जेल में हैं।

4.डॉ.ममता पांडे -

प्रदेश महिला मोर्चा की टीम में बस्ती के हर्रैया विधानसभा क्षेत्र की डॉक्टर ममता पांडेय को प्रदेश मंत्री बनाया गया है। वह हर्रैया से 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। वह पिछले विधानसभा चुनाव में भी टिकट की दावेदार थी। महिला मोर्चा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने से कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर है।

डॉ. ममता पांडे उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की हर्रैया और कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी एक सक्रिय भारतीय जनता पार्टी की नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कप्तानगंज विधानसभा संख्या 308 और हर्रैया, जिला बस्ती, उनका प्रिय क्षेत्र रहा है । ममता जी आर्थिक रूप से सबसे दमदार प्रत्याशी हैं।

 5.दिग्विजय सिंह राणा -

दिग्विजय सिंह राना उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक वरिष्ठ भाजपा नेता, हिन्दू विश्व महासंघ के प्रदेश महामंत्री और जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि हैं। उन्होंने देश में जनसंख्या वृद्धि पर चिंता जताते हुए एक सशक्त जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग की है और इस संबंध में राष्ट्रपति को ज्ञापन भी भेजा है। इसके अलावा वे स्थानीय स्तर पर पार्टी के संगठनात्मक कार्यक्रमों और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

6.गणेश नारायण मिश्रा -

गणेश नारायण मिश्रा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उत्तर प्रदेश के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हैं। वे प्रदेश भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भी हैं। वह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बस्ती और कप्तानगंज क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। वह पार्टी के कार्यक्रमों, सामाजिक कार्यों और संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

 7. उमाशंकर पटवा जी -

पटवा जी मुस्लिम का भी वोट पा सकते हैं निषाद का पूरा वोट पा सकते हैं। सारी बिरादरियों का वोट पा सकते हैं पटवा जी ऐसे नेता हैं जो सभी जातियों का वोट पा सकते हैं। सपा के प्रत्याशी डर रहे हैं कहीं पटवा जी  को भाजपा से टिकट मिल गया तो सपा को हारना निश्चित है।बनिया समाज पूरा पटवा के साथ रहेगा।

8..ब्रह्मदेव यादव देवा-

भारतीय जनता पार्टी ने जनपद बस्ती में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करते हुए वरिष्ठ नेता ब्रह्मदेव यादव ‘देवा’ को जिला उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी है। इससे पहले पिछड़ा वर्ग के जिलाध्यक्ष के रूप में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। वे पूर्व ब्लॉक प्रमुख और वर्तमान जिला पंचायत सदस्य भी हैं।पिछड़ा वर्ग के जिलाध्यक्ष रहते हुए ब्रह्मदेव यादव ने संगठन को मजबूती प्रदान की थी। उनकी रणनीतिक सोच और जनसंपर्क क्षमता से जिले में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और अधिक सशक्त होने की उम्मीद जताई जा रही है।

9.जटा शंकर शुक्ल-

जटाशंकर शुक्ल उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्रिय नेता और कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र (308) से जुड़े प्रमुख राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।वह गौर ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि और क्षेत्र के सामाजिक व राजनीतिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे  हैं।


10.विवेकानंद मिश्र-

विवेकानंद मिश्र वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के बस्ती जिले के जिलाध्यक्ष हैं। वे लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से लेकर भाजपा जिला महामंत्री और अन्य संगठनात्मक पदों पर कार्य कर चुके हैं। उन्हें पार्टी संगठन में उनके 20 साल के अनुभव के लिए जाना जाता है।


11.इंजीनियर वीरेंद्र कुमार मिश्र -

इंजीनियर वीरेंद्र कुमार मिश्र बस्ती जिले के कप्तानगंज क्षेत्र के एक सक्रिय भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता और विशिष्ट पदाधिकारी हैं।स्थानीय स्तर पर पार्टी के कार्यक्रमों (जैसे तिरंगा यात्रा व अन्य सामाजिक-राजनीतिक आयोजनों) में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।

12.रमा कांत पांडेय 

रमाकांत पांडेय भारतीय जनता पार्टी के एक स्थानीय नेता हैं, जो कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र (बस्ती/गोरखपुर क्षेत्र) में सक्रिय हैं। वह क्षेत्र में जनसुनवाई और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं। विधान सभा कप्तानगंज (308, बस्ती) में उन्होंने हमेशा क्षेत्र की जनता के लिए पूरी निष्ठा से काम किया है। 2017 और 2022 में भले टिकट न मिला हो, लेकिन  सेवा और समर्पण में वे कभी नहीं रुके। अब 2027 की तैयारी के साथ वह फिर मैदान में हैं, भारतीय जनता पार्टी के लिए 24 घंटे तत्पर हैं। 

13.विपिन कुमार त्रिपाठी

विपिन कुमार त्रिपाठी बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के एक स्थानीय नेता और संभावित/ भावी उम्मीदवार के रूप में सक्रिय हैं।

14.नीतीश पांडेय मन्नू -

नीतीश पांडेय 'मन्नू' उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से जुड़े भारतीय जनता पार्टी  के एक युवा नेता और सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। 

15.वैभव पांडेय -

पूर्व जिला उपाध्यक्ष भाजपा बस्ती श्री वैभव पाण्डेय जी को भारतीय जनता पार्टी गोरखपुर क्षेत्र का क्षेत्रीय मंत्री नियुक्त किया गया है।

16.विनोद चौधरी

कप्तानगंज, बस्ती (विधानसभा संख्या 308): इस क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर विनोद चौधरी सक्रिय हैं, जो भाजपा जिला कार्य समिति के सदस्य हैं और जिन्हें स्थानीय समर्थकों द्वारा भावी प्रत्याशी के रूप में देखा जाता है। वे पूर्व जिला पंचायत सदस्य भी रहे और नगर पंचायत कप्तान गंज बस्ती के अध्यक्ष पद पर चुनाव भी लड़ चुके हैं।

क्षेत्र का समुचित विकास ना होते हुए भी जातीय समीकरण हावी -

30/35 वर्ष से कोई अगर राम प्रसाद चौधरी से कप्तानगंज से नहीं लड़ पा रहा है तो उसका भी कारण है। जब चुनाव आता है तब सब नेता लड़ने तो पार्टियों के भरोसे तो लड़ते है मगर अगर 5 वर्ष मेहनत से क्षेत्र में रहे तो कोई बड़ी बात नहीं हटाने में । यहां प्रायः अधिकांश नेता पैराशूट से आते है चुनाव जीतना चाहते हैं, फिर जीतना ख्वाब ही रह जाता है । कप्तानगंज पिछड़ा बाहुल्य इलाका माना जाता है।विकास के मामलों में यह इलाका अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।कप्तानगंज विधानसभा सीट पर पूर्वांचल के छात्र नेता और पूर्व मंत्री सपा के राष्ट्रीय सचिव राम प्रसाद चौधरी का 25 साल तक कबजा रहा और इस बार उनके बेटे अतुल चौधरी कप्तानगंज विधानसभा सीट से विधायक हैं।बावजूद इसके विकास के नाम पर कोई विशेष काम नहीं हुआ है।जनता मानती है कि पिछड़े समाज के बड़े नेता राम प्रसाद चौधरी हैं और उनके प्रभाव में एक बड़ा वर्ग उनके साथ रहता है, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलता है और वह हर चुनाव फतेह कर लेते हैं। इस बार 2027 में ऊंट कौन सा करवट लेगा यह अभी निश्चित करना मुश्किल है। सभी उम्मीदवारों और यहां की प्रबुद्ध जनता को अनन्त शुभकामनाएं।

इस श्रृंखला से संबंधित कुछ अन्य कड़ियां

भाग 1 में आलेख में जानिए- कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने बनाई थी कैप्टनगंज तहसील और मुन्सफी 

भाग 2 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विधान सभा का इतिहास" 

भाग 3  के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विकास क्षेत्र का इतिहास"

भाग 4  के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज  नगर पंचायत का इतिहास"

समय समय पर अन्य आगामी आलेख में कप्तानगंज के इतिहास , समाज और संस्कृति के विभिन्न उपादानों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,

Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183


Thursday, September 10, 2026

कर्नाटक सरकार द्वारा भारत के कानून का खुलेआम उल्लंघन 🙏डॉ राधेश्याम द्विवेदी

क्या कर्नाटक सरकार भारत के कानून का उल्लंघन कर सकती है? क्या वह भारत के संसद द्वारा पारित कानून का उल्लंघन नहीं कर रही है? ऐसे तो भारत का संघीय ढांचा कब तक स्थिर रह सकेगा? क्या माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय और भारत का माननीय सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेकर राज्य सरकार के असंवैधानिक कृत्य पर रोक नहीं लगानी चाहिए?

वंदे मातरम के केवल दो श्लोक गाए जाएंगे: कर्नाटक प्रशासन ने विवाद की पृष्ठभूमि तैयार की

 कर्नाटक प्रशासन ने विवाद की पृष्ठभूमि तैयार की है। कर्नाटक सरकार के आदेश में कहा गया है, "राज्य सरकार ने राष्ट्रगान 'वंदे मातरम' के गायन/बजाने में एकरूपता, सम्मान और उचित प्रोटोकॉल बनाए रखना आवश्यक समझा है।"

वंदे मातरम के केवल दो श्लोक गाए जाएंगे: कर्नाटक प्रशासन ने विवाद की पृष्ठभूमि तैयार कीडीके शिवकुमार सरकार का यह निर्णय कांग्रेस के दृढ़ रुख को दर्शाता है।

कर्नाटक सरकार ने आदेश दिया कि आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो श्लोक ही गाए जाएं।इस आदेश का उद्देश्य राजकीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम गाने में एकरूपता और सम्मान बनाए रखना है।यह निर्णय सरकारी समारोहों में पूर्ण वंदे मातरम गाने के केंद्र के आदेश का विरोध करता है।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य सरकार के कार्यक्रमों और आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम के गायन को मानकीकृत करने का आदेश जारी किया है । आदेश में कहा गया है कि कर्नाटक सरकार के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो श्लोक ही गाए जाने चाहिए। इसमें यह भी कहा गया है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस गीत ने राष्ट्रवाद, एकता और देशभक्ति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

कन्नड़ में जारी आदेश के मोटे तौर पर अनुवाद में लिखा है, "भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के आधिकारिक संस्करण और विभिन्न सरकारी और सार्वजनिक समारोहों में इसके गायन या वादन के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन अवसर के अनुसार उचित रूप से किया जाना चाहिए।" 

इसमें आगे कहा गया है, "राज्य सरकार ने राज्य में आयोजित विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और समारोहों की प्रकृति और संदर्भ के अनुसार राष्ट्रगान 'वंदे मातरम' बजाने/गाने के लिए एकरूपता, सम्मान और उचित प्रोटोकॉल बनाए रखना आवश्यक समझा है।" 

डीके शिवकुमार सरकार का यह निर्णय केंद्रीय गृह मंत्रालय के उस आदेश का कड़ा विरोध करने वाले पार्टी के रुख को दर्शाता है जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान को पूर्ण रूप से गाने का निर्देश दिया गया है। पिछले महीने, कांग्रेस कार्य समिति ने 1937 के अपने उस प्रस्ताव का पालन करने का निर्णय लिया था कि पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो श्लोक ही गाए जाएंगे।

फरवरी में, केंद्र ने सार्वजनिक सभाओं और आधिकारिक कार्यक्रमों में पूरे वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था और संसद में एक विधेयक पारित किया था जिसमें राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालने या उसे रोकने को आपराधिक अपराध घोषित किया गया था।

कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि वंदे मातरम पर उसका रुख 1937 में शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिए गए निर्णय के अनुरूप है - जो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल की उपस्थिति में लिया गया था।

अगस्त में, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे को गोवा में एक कार्यक्रम में वंदे मातरम का "अधूरा" संस्करण गाने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा था। भाजपा द्वारा तुष्टीकरण के आरोपों के जवाब में, उन्होंने कहा कि उन्होंने वही संस्करण गाया है जो गांधी, नेहरू, पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी ने गाया था। उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि अगर इस संस्करण को गाना अपराध है, तो उन नेताओं के खिलाफ भी पुलिस केस दर्ज किए जाने चाहिए।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा अपने उपन्यास आनंद मठ में रचित वंदे मातरम को सर्वप्रथम 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। लेकिन बाद में मुस्लिम लीग के नेताओं ने हिंदू देवियों के संदर्भों के कारण इसे इस्लाम विरोधी बताते हुए आपत्ति जताई। 1937 में, कांग्रेस कार्य समिति ने निर्णय लिया कि वंदे मातरम के केवल दो श्लोक ही गाए जाएंगे।

वंदे मातरम की पूरी कहानी इस लिंक से जानी जा सकती है -
https://rsdwivedi.blogspot.com/2026/08/150.html

कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने बनाई थी कैप्टनगंज तहसील और मुन्सफी (भाग 1) ✍️डॉक्टर राधेश्याम द्विवेदी


नवंबर 1801 में अवध के नवाब शुजा- उद- दौला का उत्तराधिकारी सआदत अली खान ने गोरखपुर को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा था तब गोरखपुर को एक जिला बनाया गया था। जिसमे मौजूद जिला बस्ती और आसपास के क्षेत्र का भी समावेश था। सन् 1801 के पूर्व यह अवध प्रान्त के अंतर्गत मुगलों के अप्रत्यक्ष नियंत्रण में आता था । उस समय यह क्षेत्र वाराणसी मंडल के गोरखपुर जिले की सीमा का हिस्सा था। 1801 में अंगेजों के अधीन बस्ती एक तहसील की इकाई के रूप में आया है। तभी से यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया, उस समय यहां कानून-व्यवस्था और राजस्व वसूली एक बड़ी चुनौती थी। 


गोरखपुर के पहले कलेक्टर श्री रूटलेज थे।1829 में, गोरखपुर को इसी नाम के एक डिवीजन का मुख्यालय बनाया गया था, जिसमें गोरखपुर, गाजीपुर और आज़मगढ़ के जिले शामिल थे। श्री आर.एम. बिराद को पहली बार आयुक्त नियुक्त किया गया था।

कैप्टन माल्कोम मक्लोइड राजस्व वसूली के लिए नियत

रूटलेज कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये। आदेश को लागू करने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने मदद के लिए सेना बढा दिया था। कप्तान माल्कोम मक्लोइड  ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के एक सैन्य अधिकारी थे। जिनका मुख्य ऐतिहासिक संबंध उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले और गोरखपुर क्षेत्र के इतिहास से है। उन्हें मुख्य रूप से क्षेत्र में राजस्व (लगान) वसूली और कानून- व्यवस्था स्थापित करने के लिए जाना जाता है।


गोरखपुर के पहले ब्रिटिश कलेक्टर 'रूटलेज' ने जब भूमि राजस्व की वसूली के लिए सख्त कदम उठाए, तो स्थानीय जमींदारों और जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। कलेक्टर के आदेशों को कड़ाई से लागू करने और राजस्व वसूलने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने ब्रिटिश सेना के साथ आगे बढ़कर प्रशासन की मदद की थी। इस सैन्य हस्तक्षेप के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

1865 में, बस्ती नया जिला बना

1865 में, नया जिला बस्ती गोरखपुर से बनाया गया था जहां अंग्रेज इस क्षेत्र से अधिक से अधिक राजस्व की वसूली कर रहे थे , वही स्थानीय शासक भी अपनी मनमानी करते रहे हैं। अवध (फैजाबाद) के सीधे नियंत्रण के बावजूद पटना, जौनपुर तथा बहराइच के नबाबों व सरदारों ने भी लूटपाट मचाया रखा था। परगना अमोढ़ा तो अंग्रेजों के अधीन सबसे बाद में आया है। अकबर के समय तक यह अवध का भाग ही बना रहा। चूंकि अंग्रेज इसे जब तक पूर्णरूपेण अपने अधीन नहीं कर लिए, उनकी गतिविधियां इस क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही रही है।


कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम कैप्टन गंज नाम मिला :-

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्थित 'कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर ही पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टनगंज' कहा जाने लगा।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में विद्रोह की आग भड़की, तब ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा था। इतिहास के स्थानीय संदर्भों के अनुसार, स्थिति को नियंत्रित करने और ब्रिटिश सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ बस्ती और उसके आस-पास के क्षेत्रों की ओर कूच किया था।

प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था। मैलकाम मैकलाॅज की तैनाती के दौरान इस सीमावर्ती क्षेत्र (बुटवल और नेपाल सीमा) में गोरखाओं के साथ ब्रिटिश सेना की कई झड़पें हुईं। इस क्षेत्र की अशांति और सामरिक महत्व को देखते हुए उनके सैन्य अभियानों ने आगे चलकर ऐतिहासिक एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814– 1816) की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई थी।

1815 व 1816 ई. में जिले के उत्तरी क्षेत्र बांसी तथा मगहर में सियारमार एक खानाबदोस जाति के लोगों ने लूटपाट करना शुरू कर दिया था। मई 1816 ई. में इस दल ने कैप्टनगंज से उस समय का 6,000 रूपया लूट लिया था। एसा लुका छिपी का खेल 1857 ई तक पूरे जिले में चलता रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के 1857 के विद्रोह के समय पूरे देश में अंगे्रजों पर संकट के बादल मड़राने लगे थे। सभी अंग्रेज जान बचााकर भाग रहे थे । उन्हें व उनके परिवार पर संकट बरकरार था। 

बस्ती कल्कट्री पर पहले अफीम तथा ट्रेजरी की कोठी हुआ करती थी। यहां 17वीं नेटिव इनफेन्ट्री की एक टुकड़ी सुरक्षा के लिए लगाई गई थी। इस यूनिट का मुख्यालय आजमगढ ़बनाया गया था। जहां 5 जून 1857 को विद्रोह भड़क उठा था। 6 अंगे्रज भगोड़ों का एक दल नांव द्वारा अमोढ़ा होते हुए कप्तानगंज स्थित अंग्रेज कैप्टन के शरण में आया था। तहसीलदार ने उन्हें चेतावनी दिया था कि शीघ्र बस्ती छोड़ दें।

दिल्ली व अवध के नबाब के प्रतिनिधि राजा सैयद हुसेन अली उर्फ मोहम्मद हसन उत्तर प्रदेश के बदायूं (सहसवान, काजी मोहल्ला) के मूल निवासी थे। वह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के सम्राट और अवध के नवाब के प्रमुख प्रतिनिधि और एक महान क्रांतिकारी सेनानी थे। उन्होंने कर्नल लेनाक्स ,उनकी पत्नी तथा बेटी को अपनी संरक्षा में ले रखा था। पेप्पी ने इन्हें भी मुक्त कराया था। 12 अगस्त 1857 को मोहम्मद हसन के नेतृत्व में बागियों ने कैप्टनगंज को अपने अधीन कर रखा था।

अमोढ़ा के देशी सैनिकों से 17 अप्रैल तथा 25 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों को बुरी तरह मात खाना पड़ा था। छः अंग्रेज अधिकारियों को छावनी में अपने जान गवाने पड़े थे। फैजाबाद से सेना बुलाकर विद्रोह को दबाना पड़ा था। छावनी बाजार के पीपल के पेड़ पर 150 विद्रेहियों को फांसी पर लटकाया गया था। अनेक अंग्रेजों की कब्रें व स्मारक भी सरकार ने बनवाये हैं। राफक्राफ्ट कैप्टनगंज आ गया तथा जून 1858 के आरम्भ तक यहां कैम्प किया था। अंग्रेजी सेना मो. हसन के पीछे पड़ी थी। वह भागते छिपते अंग्रेजी सेना के शरण में 4 मई 1859 को चला आया था । उसे क्षमा करते हुए सीतापुर की एक छोटी सी रियासत गुजारे में दी गई थी। गोपाल सिंह नामक सूर्यवंशी एक जमीदार को कैप्टनगंज का तहसील देकर कृतकृत्य किया गया था। उसे अनुदान में जमीन भी दिया गया था।

बांसी के राजा को उपहार में मिला था रतास गांव :-

कैप्टनगंज जो रतास नामक एक छोटा सा गांव था , कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1865 में यहां तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। रतास अंग्रेजो द्वारा राजा बांसी को दिया गया भेंट था क्योंकि उन्होने अंग्रेजों की काफी मदद की थी। प्रतीत होता है कि बांसी के राजा को स्थायी प्रदान करने के कारण रतास का नाम पड़ा होगा। यही रतास आगे चलकर कैप्टनगंज ब्रिटिस टाउन मुंसफी व तहसील की शक्ल लिया था। आजादी के बाद इसका नाम कप्तानगंज कर दिया गया।

1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती तहसील मुख्यालय को 1865 में जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरियागंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। विशाल भूभाग तथा अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था। फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। 109 ग्राम सभाओं/पंचायतों तथा 11 न्याय पंचायतों को समलित करते हुए 2 अक्टूबर 1956 को पुराना कैप्टनगंज अब नया कप्तानगंज विकास खण्ड का मुख्यालय घोषित किया गया। 

इस गाँव का नाम शायद इसलिए पड़ा क्योंकि अवध प्रशासन के दौरान या ब्रिटिश शासन शुरू होने के कुछ समय बाद तक यह एक छोटा मिलिट्री स्टेशन था। यह बस्ती से नौ मील पश्चिम में, फैजाबाद से गोरखपुर जाने वाली प्रांतीय सड़क के दक्षिण में टप्पा नवाई में स्थित है (26° 40' N और 82° 35' E)। बुकानन के समय में यहाँ सिर्फ़ 25 दुकानें थीं, लेकिन बाद में तहसील और मुंसिफ़ का केंद्र बनने के कारण इसका महत्व बढ़ गया। 1876 में तहसील को हरैया स्थानांतरित कर दिया गया और तब से कैप्टनगंज का महत्व कम हो गया। यहाँ अभी भी एक पुलिस स्टेशन, एक पोस्ट-ऑफिस, एक लोअर प्राइमरी स्कूल और 1996 में बना एक पशु-बाड़ा (cattle-pound) है। वर्तमान समय का थाना पुरानी तहसील की इमारत में स्थित है, जो 1857 के विद्रोह के दौरान लड़ाई का केंद्र थी, थाने के पास के बाग में उस घर के अवशेष हैं जहाँ कभी सैनिकों के कमांडर अधिकारी रहते थे। कई वर्षों तक इसका उपयोग मुंसिफ़ कोर्ट के रूप में किया जाता रहा है, लेकिन मुंसिफ़ कोर्ट के हरैया स्थानांतरित होने के बाद से यह इमारत खंडहर हो गई है। गाँव में एक सुंदर मस्जिद है, जिसे हाल ही में एक मुस्लिम निवासी ने बनवाया था; यह एक कलात्मक संरचना है और इसे कुशल कारीगरों ने काफी लागत से बनाया था। गाँव के पूर्व में स्थित पुरानी सराय का उपयोग अभी हाल तक किया जाता है। 

यहाँ मुख्य रूप से कुंजड़े और कुचरी जातियाँ रहती हैं। रतास गाँव का कुल क्षेत्रफल 238 एकड़ है, जिसमें से लगभग 190 एकड़ में खेती होती है; राजस्व 350 रुपये है और इसके मालिक बांसी के राजा हैं, जिनके पूर्वज को यह विद्रोह के बाद सरकार से उपहार के रूप में मिला था। राजस्व मौज़े का पुराना नाम रतास है।

(स्रोत:बस्ती डिस्ट्रिक गजेटियर: एच. आर. नोविल ,1907, पृष्ठ 202)

चूंकि ब्रिटिशकाल में यह 10 से अधिक वर्षों तक तहसील मुख्यालय का गौरव प्राप्त कर चुका है इसलिए इसे तहसील घोषित करने के लिए सारी परिस्थितियां भी अनुकूल हैं। इससे यह क्षेत्र मण्डल के अन्य तहसीलों की भांति विकास के पथ पर चल सकेगा। यह स्थान एक तो राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर स्थित है तथा यह रामजानकी मार्ग के दुबौलिया तथा लखनऊ गोरखपुर रेलवे लाइन के टिनिच व गौर नामक स्टेशनों से जुड़ा भी है। विकास की दृष्टि से जब से यहां से तहसील हर्रैया गई यह क्षेत्र पिछड़ता ही रह गया था। यह कस्बे से ज्यादा कुछ नहीं हो सका। यहां विकास की असीम सम्भावनाएं है। 

(क्रमशः...आगे भी जारी रहेगा । )

भाग 2 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विधान सभा का इतिहास" 

भाग 3 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विकास क्षेत्र का इतिहास"

भाग 4 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज नगर पंचायत का इतिहास"

समय समय पर अन्य आगामी आलेख में कप्तानगंज के इतिहास , समाज और संस्कृति और कला के विभिन्न उपादानों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8, निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,

Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183



Sunday, September 6, 2026

रानी की वाव, एक विशिष्ट वास्तु प्रारूप, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ✍️डॉ राधेश्याम द्विवेदी

रानी की वाव
रानी की वाव को रानी की बावड़ी भी कहा जाता है, गुजरात के पाटन में स्थित एक ऐतिहासिक बावड़ी है। यह सरस्वती नदी के किनारे पर बनी है। यह एक प्रसिद्ध और भव्य सीढ़ीदार कुआँ (बावड़ी) है। यह एक प्रमुख भूमिगत जल संरचना है जो मध्य कालीन गुजरात में सीढ़ीदार कुओं के निर्माण के उच्च स्तर को दर्शाती है।
स्थान
रानी की वाव गुजरात के पाटन में सरस्वती नदी के तट पर स्थित है । यह पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थित है और इस क्षेत्र का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है।
निर्माण
इसका निर्माण 11वीं शताब्दी के चालुक्य राजा भीम प्रथम की रानी उदयमती द्वारा करवाया गया था। इसे मूल रूप से राजा के स्मारक के रूप में बनाया गया था।
काल
रानी की वाव 11वीं शताब्दी ईस्वी की है। यह सीढ़ीदार कुआँ भूमिगत जल स्रोतों और भंडारण संरचनाओं के निर्माण की पारंपरिक भारतीय प्रथा के परिपक्व चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
उद्देश्य
यह संरचना धार्मिक और कार्यात्मक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करती थी। इसे एक उल्टे मंदिर के रूप में डिजाइन किया गया था जो भूजल तक पहुंच प्रदान करते हुए जल की पवित्रता पर जोर देता था।
संरचना
रानी की वाव में एक सीढ़ीदार गलियारा, चार मंडप, एक तालाब और एक गहरा कुआँ है। संरचना के पश्चिमी छोर की ओर मंडपों की मंजिलें बढ़ती जाती हैं।
रानी की वाव का इतिहास
रानी की वाव आधुनिक काल में उत्खनन और जीर्णोद्धार से पहले सदियों से पर्यावरणीय और ऐतिहासिक परिवर्तनों से गुज़री है।
चौलुक्य काल की संरचना:
रानी की वाव का निर्माण चौलुक्य वंश के शासनकाल में हुआ था । जैन भिक्षु मेरुतुंगा द्वारा रचित 1304 के ग्रंथ 'प्रबन्ध-चिंतामणि' में उदयमती द्वारा श्रीपट्टाना में बावड़ी के निर्माण का उल्लेख है, जो पाटन से जुड़ा ऐतिहासिक नाम है।
निर्माण तिथि: 
मेरुतुंगा के विवरण के अनुसार, बावड़ी का निर्माण 1063 में शुरू हुआ और 20 वर्षों में पूरा हुआ। एक अन्य वास्तुशिल्पीय व्याख्या माउंट आबू के विमलवासाही मंदिर से समानताओं के आधार पर इसके निर्माण को लगभग 1032 के आसपास मानती है।
बाढ़ और गाद: बाद में सरस्वती नदी में बाढ़ आ गई और व्यापक गाद जमा हो गई। 13वीं शताब्दी में हुए भू-विवर्तनिक परिवर्तनों ने नदी के तल को बदल दिया और अंततः रानी की वाव को जल कुएँ के रूप में कार्य करने से रोक दिया।
पुनर्खोज
हेनरी कौसेन्स और जेम्स बर्गेस ने 1890 के दशक में दबी हुई संरचना को दर्ज किया था। केवल कुएं का शाफ्ट और कुछ खंभे ही दिखाई दे रहे थे क्योंकि सीढ़ीदार कुआं का अधिकांश भाग भूमिगत ही रह गया था।
उत्खनन
1940 के दशक में बड़ौदा राज्य के अंतर्गत किए गए उत्खननों में रानी की वाव का पता चला। 
जीर्णोद्धार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1981 और 1987 के बीच व्यापक उत्खनन और जीर्णोद्धार कार्य किया।.
वास्तुकला और संरचनाएं
इसमें जल प्रबंधन, धार्मिक प्रतीकवाद और बारीक पत्थर की नक्काशी का अद्भुत संगम है। रानी की वाव मारू-गुर्जर स्थापत्य परंपरा का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
रानी की वाव कार्यात्मक जल वास्तुकला को विस्तृत मूर्तिकला और विशिष्ट मारू-गुर्जर शैली के संयोजन के लिए प्रसिद्ध है ।
आयाम
बावड़ी लगभग 65 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 28 मीटर गहरी है। इसके पश्चिमी भाग का व्यास 10 मीटर है और यह 30 मीटर की गहराई तक जाती है।
सात स्तर: संरचना को सीढ़ियों के सात स्तरों में विभाजित किया गया है। ये स्तर भूमिगत जल क्षेत्र की ओर उतरते हैं और इनमें समृद्ध नक्काशीदार स्थापत्य और मूर्तिकला तत्व मौजूद हैं।
सबसे निचला स्तर: 
चौथा स्तर सीढ़ीदार संरचना का सबसे गहरा हिस्सा है। यह 23 मीटर की गहराई पर स्थित 9.5 मीटर गुणा 9.4 मीटर के आयताकार टैंक तक जाता है।
मंडप और स्तंभ
सीढ़ीदार गलियारे के साथ चार बहुमंजिला मंडप बने हुए हैं। रानी की वाव में सजावटी दीवारों, बीमों, ब्रैकेटों और स्तंभों के साथ 212 स्तंभ हैं।
मूर्तिकला की समृद्धि: 
बावड़ी को 500 से अधिक मुख्य मूर्तियों और 1,000 से अधिक छोटी मूर्तियों से सुशोभित किया गया है। इनमें धार्मिक, पौराणिक और धर्मनिरपेक्ष चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें साहित्यिक परंपराओं के संदर्भ भी शामिल हैं।
देवता
मूर्तियों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, कुबेर, लकुलीश, भैरव, सूर्य, इंद्र, हयग्रीव, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती, चामुंडा, दुर्गा और सप्तमातृकाएं शामिल हैं।
विष्णु प्रतिमाएं
शेषशायी विष्णु, विश्वरूप विष्णु और दशावतार जैसी प्रतिमाओं के माध्यम से विष्णु को विशेष महत्व दिया गया है। ये मूर्तियां स्मारक की धार्मिक प्रतिमाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
सजावटी आकृतियाँ: 
नक्काशी में अप्सराएँ, पशु, पक्षी, पौधे, कल्पवृक्ष, कीर्तिमुख और मकर शामिल हैं। स्थानीय पटोला वस्त्र परंपराओं से मिलती-जुलती ज्यामितीय जालीदार आकृतियाँ और डिज़ाइन भी सजावट में दिखाई देते हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल
रानी की वाव को जल वास्तुकला, शिल्प कौशल, धार्मिक छवियों और संरचनात्मक डिजाइन के असाधारण संयोजन के कारण अंतरराष्ट्रीय विरासत की मान्यता प्राप्त हुई।
रानी की वाव को 22 जून 2014 को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था । इसे एक असाधारण भूमिगत सीढ़ीदार कुएं के रूप में इसके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए मान्यता प्राप्त है।
यूनेस्को मानदंड: 
स्मारक उत्कृष्ट कलात्मक और रचनात्मक उपलब्धि के लिए मानदंड (i) और भूमिगत जल संसाधन और भंडारण संरचना के एक असाधारण उदाहरण के रूप में मानदंड (iv) को पूरा करता है।
अखंडता
अधिकांश प्रमुख वास्तुशिल्पीय घटक अभी भी मौजूद हैं, हालांकि कुछ मंडप की मंजिलें गायब हैं। 13वीं शताब्दी की बाढ़ के बाद जमा हुई गाद ने स्मारक और कई मूर्तियों को सात शताब्दियों से अधिक समय तक संरक्षित रखने में मदद की।
प्रामाणिकता: 
रानी की वाव अपनी सामग्री, डिजाइन, कारीगरी और सार में उत्कृष्ट प्रामाणिकता बरकरार रखती है। जहां संरचनात्मक सहायता आवश्यक थी, वहां सीमित पुनर्निर्माण किया गया, और पुनर्निर्मित भागों को दृश्य रूप से अलग रखा गया है।
संरक्षण
रानी की वाव राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है और इसे प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अधिनियम, 1958 (2010 में संशोधित) के तहत संरक्षित किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस संपत्ति का प्रबंधन करता है।
संरक्षित क्षेत्र: 
वास्तुशिल्प संरचना के चारों ओर 100 मीटर का एक प्रतिबंधित विकास क्षेत्र है। विरासत संपत्ति के आसपास अनुपयुक्त विकास को नियंत्रित करने के लिए इसके बफर क्षेत्र को द्वितीय संशोधित विकास योजना में शामिल किया गया है।
रानी की वाव का महत्व
रानी की वाव मध्यकालीन भारत में जल प्रबंधन, धार्मिक विचार, वास्तुकला और कलात्मक अभिव्यक्ति के संगम का प्रतिनिधित्व करती है।
जल वास्तुकला
भारतीय उपमहाद्वीप में बावड़ियाँ विशिष्ट भूमिगत जल प्रणालियों के रूप में विकसित हुईं। रानी की वाव इस स्थापत्य परंपरा का एक उन्नत चरण प्रस्तुत करती है, जो व्यावहारिक जल उपलब्धता को भव्य डिजाइन के साथ जोड़ती है।
सांस्कृतिक महत्व: 
यह स्मारक देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों, मनुष्यों, जानवरों, पक्षियों और पौधों की एक विशाल दृश्य दुनिया प्रस्तुत करता है। इसकी मूर्तियां धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष कलात्मक परंपराओं के महत्वपूर्ण पहलुओं को संरक्षित करती हैं।
स्थापत्य महत्व:
इसके सात स्तर, मंडप, टैंक, कुआँ और व्यापक नक्काशी मारू-गुर्जरा परंपरा से जुड़ी स्थापत्य और शिल्प कौशल की उपलब्धियों को प्रदर्शित करते हैं।
राष्ट्रीय मान्यता: 
रानी की वाव को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया और 2016 के भारतीय स्वच्छता सम्मेलन में इसे भारत का " सबसे स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थान " नामित किया गया।
नोटों पर रानी की वाव
जुलाई 2018 से, रानी की वाव को नई श्रृंखला के ₹100 के नोट के पीछे की तरफ चित्रित किया गया है, जिससे स्मारक को व्यापक राष्ट्रीय मान्यता मिली है .
(साभार: वाजीराम एण्ड रवि)


Saturday, September 5, 2026

श्रीकृष्ण के षडगर्भ भाइयों की अजूबा दास्तान ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


ब्रह्मा पुत्र मरीचि की संतानें :-

मरीचि ब्रह्मा के मानसपुत्र थे। इन्हें ब्रह्मा जी के मन या नेत्र से उत्पन्न हुआ माना जाता है। ये ब्रह्मा जी के दस मुख्य प्रजापतियों में गिने जाते हैं, जिन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा गया था। इनका विवाह कला या संभूति, पूर्णिमा और ऊर्णा से हुआ था। कला पत्नी से मरीचि के दो पुत्र कश्यप और पूर्णमवास हुए थे। कश्यप ऋषि से ही आगे चलकर देवता, असुर, और समस्त जीव-जंतुओं की उत्पत्ति हुई।

ऊर्णा मरीचि की दूसरी पत्नी थीं। ऊर्णा के छह पुत्र थे। उन्होंने ब्रह्मा को अपनी पुत्री के पीछे भागते देखकर हँसी उड़ाई। एक महान व्यक्तित्व का अपमान करने के इस अपराध के कारण, उन्हें राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा। ब्रह्मा के श्राप के कारण वे पहले हिरणाक्ष के पौत्र और कालनेमी के पुत्रों के रूप में और अगले जन्म में वासुदेव और देवकी के पुत्रों के रूप में पैदा हुए । ये छह बच्चे ही श्री कृष्ण के बड़े भाई ‘षडगर्भ’ कहलाए थे, जिन्हें कंस ने जन्म के तुरंत बाद मार डाला था।

जय और विजय हिरणाक्ष और हिरण्यकशिपु हुए थे -

हिरणाक्ष महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। उसका उद्धार वराह अवतार में बिष्णु जी ने किया था। वह हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई था जिसका वध बाद में भगवान विष्णु जी ने नृसिंह अवतार लेकर किया था। हिरणाक्ष की एक बहन भी थी जिसका नाम होलिका था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु असल में वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। चार कुमारों सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा था।

हिरण्याक्ष हिंदू पौराणिक कथाओं सनातन धर्म में एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य (राक्षस) था, जिसका वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार (सूअर के रूप) में किया था। भागवत पुराण) के अनुसार एक अन्य कालनेमि विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का पौत्र (तथा हिरण्यकशिपु का भतीजा था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही असुर कालनेमि बाद में द्वापरयुग में मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के रूप में पैदा हुआ था, जिसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। 

षडगर्भ भाइ कालनेमी के पुत्र रहे -

कालनेमी के छह पुत्र थे: हंस, सुविक्रम, क्रथा, दमना, रिपुरमर्दना और क्रोधहंत। इन्हे हिरण्यकशिपु का श्राप था। हरि-वंश (विष्णु-पर्व का द्वितीय अध्याय) में लिखा है कि हंस, सुविक्रम, क्रत, दमन, रिपु-मर्दन और क्रोध-हंता, जिन्हें षड-गर्भ (छह अजन्मे बच्चे) के रूप में जाना जाता है, राक्षस कालनेमि के पुत्र हैं। उन्होंने अपने दादा हिरण्यकशिपु को बिना बताए, सर्वपिता ब्रह्मा की उपासना के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्मा उनकी अत्यावश्यकता से प्रसन्न होकर, उनकी प्रार्थनाओं के अनुसार उन्हें मृत्यु से सुरक्षा का वरदान प्रदान किया। बाद में, जब हिरण्यकशिपु को इस घटना के बारे में पता चला, तो वह क्रोधित हो गया और बोला, “तुमने मुझे बिना बताए ब्रह्मा की पूजा की है, इसलिए मैं तुम जैसे धृष्ट लोगों से कोई स्नेह नहीं रखता। तुम्हारे पिता स्वयं तुम सबको मार डालेंगे। अगले जन्म में तुम छहों देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और तुम्हारे पिता कालनेमि कंस के रूप में जन्म लेंगे। वही कंस तुम्हारा हत्यारा होगा।” हिरण्यकशिपु के इस श्राप के कारण वे देवकी के गर्भ में जन्म लिए और कालनेमि के अवतार कंस द्वारा मारे गए।

श्री कृष्ण ने मां को षडगर्भ पुत्रों का दर्शन कराया था -

श्रीमद्-भागवत (10.85.47-57) में उल्लेख है कि माता देवकी की प्रार्थना के कारण श्री राम और श्री कृष्ण उनके छह मृत पुत्रों को श्री बलिराज की सुतल-पुरी से वापस लाए थे। सुतलपुरी जाने के बाद श्री कृष्ण ने दैत्यों के राजा बलि से कहा, “हे दैत्यों के स्वामी, स्वायंभुव के मन्वंतर में महर्षि मरीचि की पत्नी ऊर्णा देवी के गर्भ से छह देव जैसे पुत्र उत्पन्न हुए। ब्रह्मा को अपनी पुत्री (सरस्वती) के पीछे भागते देख उन्होंने उनका उपहास किया। इस पाप के फलस्वरूप – हिरण्यकशिपु के भाई के पुत्र कालनेमि के पुत्रों के रूप में राक्षसी योनि में जन्म लिया। फिर वहाँ से योगमाया के द्वारा उन्हें देवकी के गर्भ में जन्म लेने के लिए विवश किया गया और कंस द्वारा मार डाला गया। माता देवकी उनके लिए शोक मना रही है, उन्हें अपने पुत्रों के समान मानती है। वे इस समय आपके धाम में निवास कर रहे हैं। उनके मातृ शोक को कम करने के लिए मैं उन्हें इस स्थान से उनकी माता से मिलाने के लिए ले जाऊँगा। अंततः, वे अपने श्राप और शोक से मुक्त होकर देवताओं के लोकों में लौट जाएँगे। 

ब्रह्मा की तपस्या और श्राप दोनों मिला-

ब्रह्मा की तपस्या करने के कारण, उनके दादा हिरण्यकशिपु ने पहले उन्हें पाताल में लंबे समय तक सोने का श्राप दिया, और फिर उनके श्राप को बदलकर उन्हें देवकी के पहले छह पुत्रों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश दिया । पिता, कालनेमी, उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और उनके मामा होंगे, जो जन्म के तुरंत बाद उन सभी की हत्या कर देंगे। भागवत पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, देवकी के पहले छह पुत्रों को जन्म लेते ही अत्याचारी कंस ने मार दिया था। कारागार में जन्म होने और मृत्यु के भय के कारण इनका नामकरण संस्कार नहीं हो पाया था।श्रीकृष्ण के वे छह भाई, जिन्हें 'षद्गर्भ' कहा जाता है, कंस द्वारा अपने जन्म के तुरंत बाद मार दिए जाने के कारण अल्पायु रहे। इसके पीछे पौराणिक कथा यह है कि वे पूर्व जन्म में मरीचि ऋषि के पुत्र थे और उन्हें हिरण्यकशिपु का श्राप मिला था। हरिवंश पुराण के अनुसार, ये प्रत्यूष वसु के पुत्र थे। इन्हें देवर्षि और वेदों-उपनिषदों का मर्मज्ञ माना गया है।

ब्रह्मा जी ने षड गर्भ को शाप दिया था 

एक बार उन छहों ऋषिकुमारों ने किसी बात पर ब्रह्मा जी का उपहास (मजाक) उड़ा दिया था।इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया था। वे असुरराज कालनेमि के पुत्र बने, जो बाद में हिरण्यकशिपु के वंश से जुड़े और 'षड-गर्भ' कहलाए। 

हिरण्यकशिपु ने भी श्राप दिया था :- 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये छहों राजकुमार हंस, सुविक्रम, क्रथ, दमन, रिपुमर्दन और क्रोधहंता पूर्व जन्म में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पोते थे। उन्होंने अपने पिता या कुल के विपरीत जाकर ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था। इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपने ही पिता के हाथों अगले जन्म में मारे जाएंगे।

कालनेमि का कंस के रूप में संहारक:- 

वही कालनेमी नामक असुर पुनर्जन्म लेकर मथुरा का क्रूर राजा कंस बना, जो इन छहों भाइयों का पूर्व जन्म में पिता था।श्राप के प्रभाव और अपनी करनी के कारण वे छहों आत्माएं देवकी और वसुदेव के यहाँ 'षद्गर्भ' के रूप में जन्मीं। कंस को भविष्यवाणी से भय था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा, इसलिए उसने देवकी के जन्म लेते ही इन छहों संतानों को एक-एक करके मार डाला।देवकीजी के छ: पुत्रों को जन्म होते ही क्रूर कंस ने एक एक करके मार दिया। 

सातवें भाई बलराम (संकर्षण) बच निकले :-

जब देवकी के छह पुत्रों का नाश हो जाता है, तब यह जानना चाहिए कि सातवाँ पुत्र अनंतदेव के रूप में प्रकट होता है, जो परमेश्वर के निवास, विश्राम स्थल और पलंग, छत्र आदि के रूप में प्रकट होते हैं।देवकी के गर्भ से सातवें बालक के रूप में भगवान बलराम का जन्म हुआ। योगमाया की प्रेरणा से इनका गर्भ देवकी के गर्भ से स्थानांतरित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया था। इन्हें 'संकर्षण' और 'बलभद्र' भी कहा जाता है। 

श्री कृष्ण आठवीं संतान थे -

जिस प्रकार प्रेम-भक्ति के प्रकट होने के बाद स्वयं परमेश्वर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्री भगवान देवकी के आठवें पुत्र के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। यही देवकी के गर्भ में परमेश्वर के प्रकट होने का सार है।आठवीं संतान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। स्वयं भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस का उद्धार किया था। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने पाताल लोक से उनकी आत्माओं को लाकर अपनी माता देवकी को उनके दर्शन भी कराए थे।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

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