Sunday, August 16, 2026

“वंदे मातरम” की 150 साल की कहानी✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


1875 में श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला ‘वंदे मातरम’ अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का जयघोष बन गया था। 1937 में इसके दो छंद ही राष्ट्रीय आयोजनों तक सीमित कर दिये गए थे।1950 में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा  मिला पाया है।

150 साल के इस सफर में इस गीत ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं।अब 2026 में पूरे छह छंद फिर चर्चा में आ गया है । इसे अपना असली स्वरूप और मान्यता मिल पाया है। करीब 150 साल पहले लिखे गए इन दो शब्दों ने भारत की आजादी की लड़ाई में ऐसा रंग भरा कि यह गीत धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की पहचान बन गया। जुलूस निकले तो “वंदे मातरम” के नारे लगे। आंदोलन हुए तो इसकी आवाज सुनाई दी। अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की तो आंदोलन कारियों ने और जोर से गाया। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।  पूरे गीत के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद भी रहा। इसी वजह से सार्वजनिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में लंबे समय तक इसके शुरुआती दो छंद ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

अब 2026 में ‘वंदे मातरम’ फिर चर्चा में आ गया है। केंद्र सरकार ने इसी साल फरवरी में पहली बार राष्ट्रीय गीत के लिए विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल जारी किया है। इसके मुताबिक, जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों किसी कार्यक्रम में गाए या बजाए जाएंगे, तो पहले “वंदेमातरम” और उसके बाद “जन गण मन” होगा। आधिकारिक छह-छंद वाले संस्करण की अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड है। इसे आधिकारिक मौकों पर बजाने या गाने के दौरान सभा को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने की हिदायत दी गई है। 

हाल ही 2026 में समाप्त हुए मानसून सत्र के दौरान सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव किया है। संसद से ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। अब “वंदे मातरम” को “राष्ट्रीय गान” के साथ कानूनी संरक्षण मिला है।जानबूझकर इसके गायन को रोकने या इसमें बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। 26 मार्च 2026 से आकाशवाणी ने भी अपने सुबह के प्रसारण में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे करीब 65 सेकंड के दो-छंद वाले संस्करण की जगह छह-छंद वाला 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण प्रसारित करना शुरू किया। और अब 15 अगस्त 2026 को पहली बार लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस समारोह में “वंदे मातरम” राष्ट्रगान से पहले गाया गया। 

वंदे मातरम 1875 में लिखा गया-

वंदे मातरम के रचयिता बंगाल के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना। सरकार केवल प्रारंभिक 2 छंद ही प्रसारित कराती है। शेष 4 छंद नेहरू जी के जमाने से ही मुस्लिम लींग की आपत्ति के कारण प्रतिबंधित रहे हैं । इसे पूरा दिखाने में स्वतंत्र भारत में अब किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

वंदे मातरम’ का सरल अर्थ है- ‘मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।’ यहां मां से आशय मातृभूमि से है। आनंदमठ की कहानी संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें ‘संतान’ कहा गया है। ये लोग अपनी मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करते हैं। इसी कहानी में ‘वंदे मातरम’ गीत आता है। गीत में मातृभूमि को मां के रूप में देखा गया है और उसकी धरती, हरियाली, पानी, फसल और सुंदरता का वर्णन किया गया है।

1896 में पहली बार कांग्रेस के मंच पर गूंजा वंदे मातरम -

वंदे मातरम को राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी पहचान 1896 में मिली। कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहां रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम गाया। यही वह समय था जब यह गीत साहित्य की दुनिया से निकलकर देश के राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनने लगा। इसके बाद कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों में भी ‘वंदे मातरम’ की मौजूदगी बढ़ती गई।

1905 में वंदे मातरम नारे में बदल गया-

वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से ‘वंदे मातरम’ सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।

अक्टूबर 1905 में'वंदे मातरम संप्रदाय' बना -

वंदे मातरम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। अक्टूबर 1905 में उत्तरी कलकत्ता में 'वंदे मातरम संप्रदाय' नाम से एक समूह बनाया गया। इसके सदस्य हर रविवार प्रभात फेरियां निकालते और वंदे मातरम गाते थे। वे मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इन प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ ठाकुर भी शामिल होते थे। यानी गीत अब किताब और कांग्रेस के मंच से आगे निकलकर आम लोगों के बीच पहुंच चुका था।

अंग्रेजों ने 'वंदे मातरम' पर की सख्ती-

ब्रिटिश सरकार को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि वंदे मातरम लोगों को आंदोलन से जोड़ रहा है। इसीलिए इसे रोकने की कोशिश शुरू हुई। नवंबर 1905 में बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया। उन पर वंदे मातरम का जाप करने का आरोप था। पूर्वी बंगाल में स्कूल-कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या इसका नारा लगाने पर रोक लगाने वाले आदेश भी जारी किए गए। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। जिस गीत को रोकने की कोशिश की गई, उसकी आवाज और दूर तक पहुंचने लगी।

1906 में बारीसाल सम्मेलन में इस नारे पर रोक -

1906 में बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों का जुलूस एकत्र हो गया था।अप्रैल 1906 में बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम के नारे लगाने पर रोक लगा दी। सम्मेलन को भी रोक दिया गया। इसके बावजूद प्रतिनिधियों ने नारे लगाना जारी रखा और पुलिस की कार्रवाई का सामना किया। इसके बाद 20 मई 1906 को बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने वंदे मातरम के झंडे लेकर जुलूस निकाला। खास बात यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग शामिल थे। यह घटना बताती है कि शुरुआती दौर में ‘वंदेमातरम’ को लेकर आंदोलन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी भी थी।

1907-08 में देश के दूसरे हिस्सों में भी गूंजा -

‘वंदे मातरम’ का असर बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1907 में लाहौर में युवाओं के प्रदर्शनों में इसके नारे लगे। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में मजदूर आंदोलन के दौरान भी ‘वंदे मातरम: के नारे सुनाई दिए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मुकदमे के दौरान मुंबई में भी बड़ी संख्या में लोगों ने वंदे मातरम गाकर उनके प्रति समर्थन जताया। यानी बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में वंदे मातरम देश के अलग-अलग हिस्सों में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन चुका था।

पूरे ‘वंदे मातरम’ में विवाद का कारण-

यहीं से ‘वंदे मातरम’ की कहानी का सबसे संवेदनशील अध्याय शुरू होता है। ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता, हरियाली, पानी, फसल और मां के रूप में देश की तस्वीर दिखाई गई है। लेकिन बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों का जिक्र आता है। यही हिस्से बाद में विवाद का कारण बने। कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इन हिस्सों पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि सार्वजनिक राष्ट्रीय गीत में ऐसे धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सभी समुदायों के लिए सहज नहीं होगा। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब 1930 के दशक में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा समुदायों को साथ लेकर कैसे चलाया जाए।

वंदे मातरम’ के छंद कब और क्यों विवादित हुआ -

1930 के दशक में जब मोहम्मद अली जिन्ना की धर्म आधारित राजनीति उभार पर थी, तब ‘वंदे मातरम’ का विरोध शुरू हो गया। खासकर ‘वंदे मातरम’  के आखिरी चार छंदों को धार्मिक बताकर मुस्लिमों ने इसका विरोध किया। यह वही समय था, जब जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के अलग अधिकारों की वकालत की थी। बताया जाता है कि कांग्रेस ने अपने स्वतंत्रता आंदोलन को एकजुट रखने के लिए ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ दो ही छंदों के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। 1937 के फैजाबाद अधिवेशन में सीडब्ल्यूसी ने इससे जुड़ा प्रस्ताव पेश किया और कहा कि ‘वंदे मातरम’ के जो दो छंद सबसे ज्यादा गाए जाते हैं, उन्हें ही राष्ट्रीय आयोजनों में आगे गाया जाएगा। 

2003 में प्रकाशित हुई ‘वंदे मातरम’ किताब :-

द बायोग्राफी ऑफ अ सॉन्ग लिखने वाले सब्यसाची भट्टाचार्य के मुताबिक, 1937 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली एक समिति के मार्गदर्शन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कविता के उन हिस्सों को हटाने का फैसला किया, जिनमें खुले तौर पर मूर्ति पूजा वाले संदर्भ थे। इसी प्रारूप को बाद में संविधान सभा ने भी स्वीकार किया था।

1950 में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान, और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला ।

देश आजाद हो चुका था। अब सवाल था कि आजाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीक क्या होंगे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में इस पर फैसला हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान और दर्जा दिया जाएगा। 

वंदे मातरम’और ‘जन गण मन’ दोनों का महत्व कम नहीं -

वंदे मातरम आजादी के आंदोलन में बेहद लोकप्रिय था। लेकिन संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के बजाय राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। राष्ट्रगान के तौर पर जन गण मन को स्वीकार किया गया। वंदे मातरम को भी कम महत्व नहीं दिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि इसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा। इसलिए दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व दोनों का बहुत बड़ा है।

प्रथम छंद

वंदे मातरम्।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्।

वंदे मातरम्।।


इसमें मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है। जल से परिपूर्ण (सुजला), फलों से उपजाऊ (सुफला), मलय की हवाओं से शीतल और हरी-भरी फसलों से सुशोभित माँ (मातृभूमि) को प्रणाम है।

द्वितीय छंद

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्,

सुहासिनीं मधुरूभाषिणीम्,

सुखदां वरदां मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


चाँदनी रात की सुंदरता, खिले हुए फूलों वाले वृक्षों और माँ की मीठी हँसी व मधुर वाणी का वंदन किया गया है, जो सुख और वरदान देने वाली है।

तृतीय छंद 

कोटिकोटिकण्ठकलकल निनादकराले,

कोटि कोटि भुजैधृत खरकरवाले,

के बाले मा तुमि अबले,

बहुबलधारिणीं नमामी तारिणीम्,

रिपुदलवारिणीं मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


यह मातृभूमि की शक्ति और उसके रक्षक स्वरूप को समर्पित है। करोड़ों कंठों की आवाज़ और करोड़ों हाथों में तलवारें हैं; माँ अपने बाहुबल से शत्रुओं का नाश करने वाली और तारिणी (पार लगाने वाली) है।

चतुर्थ छंद

तुमि विद्या, तुमि धर्म,

तुमि हृदि, तुमि मर्म,

त्वं हि प्राणाः शरीरे।

बाहुते तुमि मा शक्ति,

,हृदये तुमि मा भक्ति,

तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।।

वंदे मातरम्।।


इसमें आध्यात्मिक व भक्ति भाव झलकता है। मातृभूमि ही विद्या, धर्म, हृदय और मर्म है; शरीर के प्राण है। भुजाओं में शक्ति और हृदय में भक्ति बनकर आप ही हर मंदिर में विराजमान हैं।

पञ्चम छंद

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,

कमला कमलदल विहारिणी,

वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,

नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,

सुजलां सुफलां मातरम्।।

वंदे मातरम्।।


माँ को विभिन्न देवियों का स्वरूप – दस शस्त्रों को धारण करने वाली माँ दुर्गा, कमल पर विहार करने वाली कमला (लक्ष्मी) और विद्या देने वाली वाणी (सरस्वती) के रूप में नमन किया गया है।

षष्ठम छंद

श्यामलाम् सरलाम्  सुस्मिताम्भूषिताम्,

धरणीम् भरणीम् मातरम्।।

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्।।


यह अंतिम छंद मातृभूमि के सौम्य, सरल, सुंदर और पालनहार रूप को समर्पित है। सभी का भरण-पोषण करने वाली और वसुंधरा (धरणी) रूपी इस माता को शत-शत नमन है।



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA (मोबाइल नंबर +91 9412300183)



Saturday, August 15, 2026

लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी भारत के हिस्से हैं -डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

बिना मूल आधारभूत दस्तावेज के भारतीय क्षेत्र को नेपाल अपना क्षेत्र कैसे कहता है? लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी भारत के हिस्से हैं -

डॉ.राधेश्याम द्विवेदी 


नेपाल प्राचीन आर्यावर्त का अंग रहा:-

सांस्कृतिक और पौराणिक संदर्भों में नेपाल प्राचीन आर्यावर्त (या अखंड भारत) का अभिन्न अंग था।वैदिक काल में वेदों और पुराणों के अनुसार, हिमालय का यह क्षेत्र जंबूद्वीप और आर्यावर्त की सीमाओं के भीतर माना जाता था। सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में प्राचीन काल से ही नेपाल की संस्कृति, धर्म और भाषा उत्तर भारत की वैदिक और सनातनी परंपराओं से गहराई से जुड़ी रही है। 

मौर्य साम्राज्य के अधीन रहा:- 

250 ई. पू. तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थयात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602–664 ई.) अपनी यात्रा की वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनकमुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है, जो निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में 5वी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई। 8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया। 

सुगौली संधि का दस्तावेज उपलब्ध नहीं विदेश मंत्री शिशिर खनाल का दावा :-

नेपाल ने भारत के साथ 1816 में हुई संधि के दस्तावेज़ खो दिए होंगे, जो उसके सीमा दावे का आधार है। नेपाल के विदेश मंत्री ने नेपाल के संसद में कहा है कि सरकार इस बात की पुष्टि नहीं कर सकती कि उसके पास 1816 की सुगौली संधि का मूल दस्तावेज है या नहीं। बालेन शाह ने पहले दावा किया था कि नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है। ये परस्पर विरोधी भी हैं और अतर्किक भी हैं।

नेपाल 1816 की सुगौली संधि के मूल दस्तावेज़ पर अपना अधिकार होने की पुष्टि नहीं कर सकता। नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेख आगार में संधि से संबंधित कुछ दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन मूल दस्तावेज की पुष्टि नहीं हो पाई है।

1816 की संधि नेपाल के आधुनिक क्षेत्रीय दावों का कानूनी आधार है। नेपाल ने संभवतः 1816 की सुगौली संधि के मूल दस्तावेज खो दिए हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिसिर खनाल ने नेपाल की संसद के निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) में संकेत दिया है कि सरकार इस बात की पुष्टि नहीं कर सकती कि उसके पास 1816 की सुगौली संधि का मूल दस्तावेज है या नहीं।

मंत्रीजी ने पुष्टि की है कि राष्ट्रीय अभिलेखाआगार में कुछ दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन राज्य के विभिन्न विभागों में व्यापक खोजबीन के बावजूद मूल हस्ताक्षरित दस्तावेज नहीं मिल सका है।

खानल ने कहा, "नेपाल सरकार के पास इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है कि क्या हमारे पास आधिकारिक संधि दस्तावेज मौजूद हैं। ऐसे रिकॉर्ड मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि कुछ संधियों से संबंधित दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखे गए हैं। लेकिन हमारे पास इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है कि क्या वे वास्तव में आधिकारिक संधियां हैं।"हो सकता है कि नेपाल 1816 की सुगौली संधि के असली दस्तावेज खो चुका हो। 

मंत्री ने बताया कि हालांकि नेशनल आर्काइव्स में कुछ कागजात मौजूद हैं, लेकिन सरकारी विभागों में बड़े पैमाने पर तलाशी के बावजूद संधि का वह पक्का और असली दस्तावेज नहीं मिल सका, जिस पर हस्ताक्षर किए गए थे।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा, "नेपाल सरकार के पास इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि हमारे पास आधिकारिक संधि दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। ऐसे रिकॉर्ड हैं, जिनसे पता चलता है कि कुछ संधियों से जुड़े दस्तावेज नेशनल आर्काइव्स में रखे गए हैं।लेकिन हमारे पास इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है कि क्या वे असल आधिकारिक संधियां हैं।" 2019 में, नेपाल के तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने कहा था कि नेपाल के पास संधियों की प्रतियां मौजूद हैं।

1816 में हुए एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद ब्रिटिश-शासित भारत (ईस्ट इंडिया कंपनी) के साथ हस्ताक्षरित सुगौली संधि, नेपाल के आधुनिक क्षेत्रीय दावों का मूलभूत कानूनी आधार है। इस संधि पर ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रैडशॉ और नेपाल के शासक, राजा गिरवन युद्ध बिक्रम शाह की ओर से राज गुरु गजराज मिश्रा ने हस्ताक्षर किए थे।

सुगौली संधि स्वतंत्रता-पूर्व का दस्तावेज है और भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद से वह नेपाल के साथ विदेश संबंध काफी हद तक अन्य दस्तावेजों के आधार पर ही संचालित करता रहा है, जबकि सुगौली संधि एक महत्वपूर्ण आधारभूत दस्तावेज बनी हुई है।

आज भारत-नेपाल सीमा का प्रबंधन भारत- नेपाल शांति और मैत्री संधि (1950) और संयुक्त द्विपक्षीय कार्य समूहों द्वारा तैयार किए गए तकनीकी दस्तावेजों के माध्यम से किया जाता है।

सीमा पर मुख्य विवाद भारत की सीमा के भीतर स्थित बृहत्तर हिमालय के 'कालापानी' क्षेत्र को लेकर है। जब गृह मंत्रालय ने 2019 में नए नक्शे जारी किए, तो नेपाल ने उन पर आपत्ति जताते हुए दावा किया कि उनमें इस क्षेत्र को नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रांत के 'दारचुला जिले का एक अनियोजित क्षेत्र' के रूप में दर्शाया गया है।

भारत-चीन के बीच लिपुलेख दर्रे को फिर से खोलने के समझौते के बाद भारत-नेपाल सीमा विवाद और भी तीव्र हो गया है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके क्षेत्र हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये क्षेत्र भारत का हिस्सा हैं।

इस साल जून में, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा किया कि काठमांडू द्वारा कथित भारतीय अतिक्रमण के बारे में लगातार शिकायतों के बावजूद, हिमालयी राष्ट्र ने भी भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी सहित विवादित सीमा क्षेत्रों के संबंध में नेपाल का आधिकारिक रुख अपरिवर्तित है और भारत के साथ राजनयिक वार्ता और आपसी समझ के माध्यम से अनसुलझे सीमा मुद्दों का समाधान किया जाएगा।

बाद के बयानों में, नेपाल ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को लंबा खींचने के बजाय इसका समाधान करना चाहता है, और स्पष्ट रूप से कहा है कि वह द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करना चाहता है।

बहु ध्रुवीय विश्व में चीन और दक्षिण एशिया पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन: क्षेत्रीय व्यवस्था में चीन-भारत-नेपाल त्रिपक्षीय संबंध विषय पर बोलते हुए नेपाल के विदेश मंत्री शिसिर खनाल ने कहा, "नेपाल अपने दोनों पड़ोसी देशों के निरंतर विकास और समृद्धि का हार्दिक स्वागत करता है। हम संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक लाभ और एक-दूसरे के वैध हितों और चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर भारत और चीन के साथ अपने दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों को स्वतंत्र रूप से और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"

खनाल ने आगे कहा, "नेपाल मित्रता, पारस्परिक सम्मान और पारस्परिक लाभ पर आधारित इन दीर्घकालिक संबंधों के अपार महत्व को पहचानते हुए भारत और चीन दोनों के साथ अपनी द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करना जारी रखेगा। साथ ही, नेपाल क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है जो संपर्क को बढ़ावा देता है, वाणिज्य को सुगम बनाता है, बाजारों का विस्तार करता है और सतत विकास में योगदान देता है।"

सुगौली सन्धि का मूल पाठ :- 

यह संधि 2 दिसंबर, 1815 को हस्ताक्षरित हुई और 4 मार्च, 1816 को इसकी पुष्टि हुई। इस पर नेपाल के महाराजा बिक्रम शाह का प्रतिनिधित्व करते हुए राज गुरु गजराज मिश्रा और चंद्र शेखर उपाध्याय तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैडशॉ ने सहमति व्यक्त की थी। संधि के पूर्ण पाठ में वे प्रमुख प्रावधान शामिल हैं जिन्होंने नेपाल की सीमाओं और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ उसके भविष्य के संबंधों को नया रूप दिया। सुगौली संधि का पूर्ण पाठ यहाँ दिया गया है-

ब्रिटिश दरबार:-

माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा महाराजा बिक्रम साह के बीच शांति संधि, माननीय कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैडशॉ द्वारा, जिन्हें महामहिम के सबसे माननीय प्रिवी काउंसिल के सदस्य, माननीय कंपनी के निदेशक मंडल द्वारा ईस्ट इंडीज के सभी मामलों का निर्देशन और नियंत्रण करने के लिए नियुक्त किया गया था, परम आदरणीय फ्रांसिस अर्ल ऑफ मोइरा नाइट ऑफ द मोस्ट नोबल ऑर्डर ऑफ द गार्टर द्वारा प्रदत्त पूर्ण शक्तियों के आधार पर, और महाराजा गिरमाउन जोडे विक्रम साह बहादुर, शमशेर जंग की ओर से श्री गुरु गुजराज मिसर और चंद्र शेखर उपाध्याय द्वारा, जिन्हें उक्त नेपाल के राजा द्वारा इस आशय की शक्तियां प्रदत्त की गई थीं, 2 दिसंबर 1815 को संपन्न हुई।

      चूंकि माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच युद्ध छिड़ गया है, और चूंकि दोनों पक्ष शांति और मैत्री के उन संबंधों को बहाल करने के लिए पारस्परिक रूप से इच्छुक हैं जो हाल के मतभेदों के उत्पन्न होने से पहले दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विद्यमान थे, इसलिए शांति की निम्नलिखित शर्तों पर सहमति हुई है:

अनुच्छेद – I

माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच चिरस्थायी शांति और मित्रता बनी रहेगी।

अनुच्छेद – II

नेपाल के राजा युद्ध से पहले दोनों राज्यों के बीच विवाद का विषय रही भूमि पर अपने सभी दावों का त्याग करते हैं और उन भूमि पर माननीय कंपनी के संप्रभुता के अधिकार को स्वीकार करते हैं। 

अनुच्छेद-III 

नेपाल के राजा एतद्द्वारा माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी को निम्नलिखित सभी क्षेत्र शाश्वत रूप से सौंपते हैं, अर्थात्- 

पहला : काली और राप्ती नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका।

दूसरा : राप्ती और गंडक नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका (बुटवल खास को छोड़कर)।

तीसरा : गंडक और कुशाहा नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका, जहाँ ब्रिटिश सरकार का अधिकार स्थापित हो चुका है या स्थापित होने की प्रक्रिया में है।

चौथा : मेची और तीस्ता नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका।

पाँचवाँ : मेची नदी के पूर्व में पहाड़ियों के भीतर का पूरा क्षेत्र, जिसमें नागरी किला और उसकी ज़मीनें तथा मोरंग से पहाड़ियों की ओर जाने वाला नगरकोट दर्रा शामिल है, साथ ही उस दर्रे और नागरी के बीच का क्षेत्र भी। उपरोक्त क्षेत्र को गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिनों के भीतर खाली कर दिया जाएगा।

अनुच्छेद IV.

पूर्वोक्त अनुच्छेद द्वारा सौंपी गई भूमि के हस्तांतरण से नेपाल राज्य के सरदारों और बरहदारों के हितों को होने वाले नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से, ब्रिटिश सरकार नेपाल के राजा द्वारा चयनित सरदारों को प्रति वर्ष दो लाख रुपये की कुल पेंशन देने के लिए सहमत है, और यह पेंशन राजा द्वारा निर्धारित अनुपात में होगी। चयन होते ही, गवर्नर जनरल की मुहर और हस्ताक्षर के तहत पेंशन के लिए सन्नुद जारी किए जाएंगे।

अनुच्छेद – V

नेपाल का राजा अपने लिए, अपने उत्तराधिकारियों और वारिसों के लिए, काली नदी के पश्चिम में स्थित देशों से किसी भी प्रकार का दावा या संबंध त्यागता है और उन देशों या वहाँ के निवासियों से कभी कोई संबंध न रखने का वचन देता है।

अनुच्छेद - VI

नेपाल का राजा सिक्किम के राजा को उसके क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने में कभी भी परेशान न करने का वचन देता है; परन्तु यदि नेपाल राज्य और सिक्किम के राजा या दोनों में से किसी की प्रजा के बीच कोई मतभेद उत्पन्न होता है, तो ऐसे मतभेदों को ब्रिटिश सरकार के मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा, और नेपाल का राजा उस निर्णय का पालन करने का वचन देता है।

अनुच्छेद-VII 

नेपाल के राजा एतद्द्वारा वचन देते हैं कि वे ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश नागरिक को, या किसी यूरोपीय या अमेरिकी राज्य के नागरिक को, अपनी सेवा में न तो लेंगे और न ही रखेंगे।

अनुच्छेद – VIII

दोनों राज्यों के बीच स्थापित मैत्री और शांति के संबंधों को सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए, यह सहमति हुई है कि प्रत्येक राज्य के मान्यता प्राप्त मंत्री दूसरे राज्य के दरबार में निवास करेंगे।

अनुच्छेद – IX 

नौ अनुच्छेदों वाली इस संधि की पुष्टि नेपाल के राजा द्वारा इस तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर की जाएगी, और पुष्टिकरण लेफ्टिनेंट-कर्नल ब्रैडशॉ को सौंपा जाएगा, जो बीस दिनों के भीतर, या यदि संभव हो तो उससे पहले, गवर्नर-जनरल का पुष्टिकरण प्राप्त करने और उसे सौंपने का वचन देते हैं।

सुगौली में 2 दिसंबर 1815 को संपन्न हुआ। पेरिस ब्रैडशॉ, लेफ्टिनेंट कर्नल, पीए ने 4 मार्च 1816 को दोपहर ढाई बजे मुकवानपुर घाटी में नेपाल के राजा के प्रतिनिधि चंद्र शेखर उपाध्याय से यह संधि प्राप्त की, और ब्रिटिश सरकार की ओर से उन्हें प्रतिपक्ष संधि सौंपी।

सुगौली संधि की शर्तें:- 

संधि की शर्तें निम्नलिखित थीं: -

1- ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच सदैव शांति और मित्रता रहेगी।

2- नेपाल के राजा उन सभी भूमि दावों का परित्याग कर देंगे जो युद्ध से पहले दोनो राष्ट्रों के मध्य विवाद का विषय थे और उन भूमियों की संप्रभुता पर कंपनी के अधिकार को स्वीकार करेंगे।

3- नेपाल के राजा शाश्वत रूप से निम्न उल्लिखित सभी प्रदेशों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देंगे:

(क) काली और राप्ती नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।

(ख) बुटवाल को छोडकर राप्ती और गंडकी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।

(ग) गंडकी और कोशी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अधिकार स्थापित किया गया है।

(घ) मेची और तीस्ता नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।

(च) मेची नदी के पूर्व के भीतर प्रदेशों का सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र। साथ ही पूर्वोक्त क्षेत्र गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिन के भीतर खाली किया जाएगा।

4- नेपाल के उन सरदारों और प्रमुखों, जिनके हित पूर्वगामी अनुच्छेद (क्रमांक 3) के अनुसार उक्त भूमि हस्तांतरण द्वारा प्रभावित होते हैं, की क्षतिपूर्ति के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी, 2 लाख रुपये की कुल राशि पेंशन प्रतिवर्ष के रूप में देने को तैयार है जिसका निर्णय नेपाल के राजा द्वारा लिया जा सकता है।

5- नेपाल के राजा, उनके वारिस और उत्तराधिकारी काली नदी के पश्चिम में स्थित सभी देशों पर अपने दावों का परित्याग करेंगे और उन देशों या उनके निवासियों से संबंधित किसी मामले में स्वयं को सम्मिलित नहीं करेंगे।

6- नेपाल के राजा, सिक्किम के राजा को उनके द्वारा शासित प्रदेशों के कब्जे के संबंध में कभी परेशान करने या सताने की किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं होंगे। यदि नेपाल और सिक्किम के बीच कोई विवाद होता है तो उसे ईस्ट इंडिया कंपनी की मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।

7- एतद्द्वारा नेपाल के राजा, ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश, अमेरिकी या यूरोपीय नागरिक को अपनी किसी भी सेवा में ना तो नियुक्त करेंगे ना ही उसकी सेवाओं को बनाये रखेंगे।

8- एतद्द्वारा नेपाल और ब्रिटेन (ईस्ट इंडिया कंपनी) के बीच स्थापित शांति और सौहार्द के संबंधों की सुरक्षा और उनमें सुधार के उद्देश्य से, यह सहमति बनती है कि एक का मान्यता प्राप्त मंत्री, दूसरे की अदालत में रहेगा।

9- इस संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा इस तारीख से 15 दिनों के भीतर किया जाएगा और उसे लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रेडशॉ को सौंपा जाएगा, जो उसे अगले 20 दिनों में या उससे पहले (यदि साध्य हो), गवर्नर जनरल से अनुमोदित करा कर राजा को सुपुर्द करेंगे।

10. इसके बाद दिसम्बर 1816 में एक उत्तरगामी समझौते पर सहमति बनी जिसके अनुसार नेपाल को मेची नदी के पूर्व और महाकाली नदी के पश्चिम के बीच का तराई क्षेत्र वापस लौटा दिया गया। इस समझौते के फलस्वरूप दो लाख रुपए प्रतिवर्ष की क्षतिपूर्ति राशि के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। एक भूमि सर्वेक्षण के द्वारा दोनों राष्ट्रों के बीच की सीमा को तय करने का प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया था।

संधि की वैधता :-

1. संधि के अनुच्छेद 9 के अनुसार संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा होना अनिवार्य था, लेकिन राजा गीर्वान युद्ध बिक्रम शाह द्वारा अनुमोदित संधि का अभिलेख निर्णायक रूप से नहीं मिलता है।

 2. दिसम्बर 1815 को इस संधि पर नेपाल सरकार की ओर से राज गुरु गजराज मिश्रा और उनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय थे और कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ द्वारा हस्ताक्षर किये गये। 4 मार्च 1816 को चंद्र शेखर उपाध्याय और जनरल डेविड ऑक्टरलोनी द्वारा मकवानपुर में संधि की हस्ताक्षरित प्रतियों का आदान प्रदान किया गया। 

संधि के अनुसार कुमाऊं, गढ़वाल, दार्जिलिंग आदि के बदले लगभग आधा मिथिला नेपाल को दे दिया गया था। ये संधि दो विदेशियों के बीच हुआ था लेकिन इसके कारण हमारे अपने ही मैथिल हमारे लिए विदेशी हो गए। संधि ब्रिटिश सरकार भी नहीं बल्कि एक फॉरेन कम्पनी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी और तो और इसके क्लाउज 9 के अनुसार नेपाली राजा का सिग्नेचर जरूरी था लेकिन उसके बदले राजगुरु गजराज मिश्रा का सिग्नेचर से खानापूर्ति कर दी गई। दो विदेशियों के संधि का फ़ल मिथिला अपने घर के बंटवारे से भोगता रहा है। कानूनन इलीगल इस संधि के आज लगभग 200 वर्ष हो चुके हैं लेकिन किसी सरकार का ध्यान इस पर नहीं गया, आज भी वहाँ नेपाल में मैथिलों को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर मधेशी कहा जाता है और कई नागरिक सुविधाओं से वंचित रक्खा गया है। 

3. कुछ लोगों कहना है कि चूंकि संधि, नेपाली राजशाही और अंग्रेजों के बीच हुई थी इसलिए इसे नेपाल गणराज्य और भारत गणराज्य के मध्य लागू नहीं किया जा सकता।

भारत-नेपाल में किन जगहों पर है विवाद 

भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे वाले व्यापार मार्ग को फिर से खोलने के समझौते के बाद भारत-नेपाल सीमा विवाद और बढ़ गया है।नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके इलाके हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये इलाके भारत का हिस्सा हैं।इस साल जून में, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा किया कि हिमालयी देश ने भारतीय इलाके पर कब्जा किया है, जबकि काठमांडू लगातार भारत पर कब्जे का आरोप लगाता रहा है।नेपाल के विदेश मंत्रालय ने फिर से कहा कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी समेत विवादित सीमावर्ती इलाकों के बारे में नेपाल का आधिकारिक रुख वही है और सीमा से जुड़े अनसुलझे मुद्दों को भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत और आपसी समझ से सुलझाया जाएगा।

नेपाल के रुख में अब आ रही नरमी -

बाद के बयानों में नेपाल ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को लंबा खींचने के बजाय सुलझाना चाहता है और साफ तौर पर कहा है कि वह द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करना चाहता है। बदलते क्षेत्रीय माहौल में चीन- भारत-नेपाल त्रिपक्षीय संबंध' विषय पर आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा, "नेपाल अपने दोनों पड़ोसियों के लगातार विकास और समृद्धि का दिल से स्वागत करता है। हम भारत और चीन के साथ अपने पुराने द्विपक्षीय संबंधों को स्वतंत्र रूप से और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह प्रतिबद्धता संप्रभु समानता, आपसी सम्मान, आपसी लाभ और एक-दूसरे के जायज हितों व चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता पर आधारित है।"

खनाल ने आगे कहा, "नेपाल भारत और चीन दोनों के साथ अपनी द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करना जारी रखेगा। हम दोस्ती, आपसी सम्मान और आपसी लाभ पर आधारित इन पुराने संबंधों के बहुत ज्यादा महत्व को समझते हैं। साथ ही, नेपाल क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भी पूरी तरह प्रतिबद्ध है, जिससे कनेक्टिविटी बढ़े, व्यापार आसान हो, बाज़ारों का विस्तार हो और टिकाऊ विकास में योगदान मिले।"

 अंग्रेजों द्वारा नेपाल को विशेष दर्जा :- 

अंग्रेजों ने नेपाल का केवल कुछ भू-भाग अपने साम्राज्य में मिलाया, लेकिन वे नेपाल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने और सम्मान करने पर मजबूर हुए क्योंकि वे नेपाल को अपने उत्तर की ओर एक बफर स्टेट के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे। मार्च 1816 में नेपाल ने अपनी कुछ भूमि अंग्रेजों को दे दी और काठमांडू में अंग्रेजी रेजीडेंसी की स्थापना हो गई। 21 दिसंबर 1923 को ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई थी। औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को एक पूर्ण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाई।

गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत हुई :-

नेपाली सैनिकों की बहादुरी ने अंग्रेजों को काफी प्रभावित किया था जिसके परिणाम स्वरूप गोरखाओं की भर्ती ब्रिटिश सेना में होने लगी थी। अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत में भी यह परम्परा कायम है। गोरखा आज भी भारतीय सेना का एक अभिन्न और अत्यंत सम्मानित हिस्सा है। ब्रिटिश सेना के लिए यह एक बहुत ही शक्तिशाली और वफादार सैन्य टुकड़ी साबित हुई।

राणा शासन और अंग्रेजों की मित्रता:-

1846 से 1951 के बीच नेपाल में राणा शासन था राणा शासक अंग्रेजों के पक्के समर्थक बन गए और उन्होंने 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दबाने में अंग्रेजों की भारी मदद की थी बदले में अंग्रेजों ने नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति अपनाई। राणाओं ने 1951 तक ब्रिटिश भारत के समर्थन से 104 वर्षों तक नेपाल पर शासन किया, और शाह वंश के राजाओं को केवल नाममात्र का शासक बनाकर रखा। सत्ता में बने रहने के लिए, राणा प्रशासन ब्रिटिश कठपुतली शासन में तब्दील हो गया और नेपाल को अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय संबंधों से अलग-थलग रखा गया। राणाओं ने अपने अन्यायपूर्ण शासन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने के लिए 1923 में ब्रिटेन के साथ शाश्वत शांति और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। वे प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल थे और उन्होंने ब्रिटिश सेना को नेपाली भाड़े के सैनिक मुहैया कराए । यह प्रथा आज भी जारी है। नेपाल ने 4 सितंबर, 1939 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की, द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा मोर्चे पर लड़ा और अंग्रेजों को सामग्री और सैन्य सहायता प्रदान की।      

1950 के दशक में लोकतांत्रिक आंदोलनों ने राणाओं को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और भारतीय शासकों के समर्थन से शाह वंश के एक राजा ने फिर से सत्ता संभाली। ऐतिहासिक रूप से राजा, राणाओं और लोकतांत्रिक दलों के बीच 1950 के दिल्ली समझौते के रूप में जाना जाता है। ब्रिटिश भारत के दबावों के अलावा, नेपाल ने 1950 तक किसी बड़े साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का सामना नहीं किया।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं. +91 9412300183)




Friday, August 7, 2026

भारत में कावड़ यात्रा का इतिहास और शास्त्रीय विवेचना ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

हिंदू पुराणों में कांवड़ यात्रा का संबंध  क्षीरसागर के मंथन से है। जब अमृत से पहले विष निकला और दुनिया उसकी गर्मी से जलने लगी, सभी उससे दूर भागने लगे तो शिवजी ने विष को अपने गले के अंदर धारण कर लिया था। लेकिन, इसे अंदर लेने के बाद वे विष की नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित होने लगे थे। त्रेता युग में, शिव के भक्त रावण ने कांवड़ का उपयोग करके गंगा का पवित्र जल लाया और इसे पुरामहादेव में शिव के मंदिर पर डाला। रावण द्वारा देवघर में वैद्यनाथ में जल अर्पण का विवरण भी मिलता है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को पीने से शिवजी का गला जलने लगा था। इस स्थिति में देवी- देवताओं ने गंगा जल से प्रभु का जलाभिषेक किया गया था जिससे प्रभु को विष के प्रभाव से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा माना जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई है।

सृष्टि की मान्यताओं का अंकन :-

प्रतीकात्मक तौर पर कांवड यात्रा का संदेश इतना भर है कि आप जीवनदायिनी नदियों के लोटे भर जल से जिस भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हें वे शिव वास्तव में सृष्टि का ही दूसरा रूप हैं। धार्मिक आस्थाओं के साथ सामाजिक सरोकारों से रची कांवड यात्रा वास्तव में जल संचय की अहमियत को भी उजागर करती है। कांवड यात्रा की सार्थकता तभी है जब आप जल बचाकर और नदियों के पानी का उपयोग कर अपने खेतों की सिंचाई करें, वृक्ष लगाकर पर्यावरण को हरा भरा रखें और अपने निवास स्थान पर पशु पक्षियों और पर्यावरण को पानी उपलब्ध कराएं तो प्रकृति की तरह उदार शिव और सहजता से प्रसन्न हो सकेंगे।

सावन माह में शिव भक्त गंगा या अन्य किसी पवित्र नदी जलाशय के तट पर कलश में गंगाजल भरते हैं और उसको कांवड़ पर बांध कर कंधों पर लटका कर अपने अपने इलाके के शिवालय में लाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा करने से भगवान शिव सभी भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं और जीवन के सभी संकटों को दूर करते हैं।

शिवजी को प्रसन्न करने का सहज साधन :-

पुराणों में बताया गया है कि कांवड़ यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सहज रास्ता है। कांवड़ धारी ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की कठिन से कठिन बाधाओं को पार कर लेता है। कांवड़ लाने वाले भक्तों को कांवड़िया और भोला कहा जाता है। यह कावड़ आम या सेमला के पेड़ों की लकड़ी से बनाए जाते हैं। कावड़ बनाने वाले में बढ़ई और कलाकार दोनों के कौशल का मिश्रण होता है। दो मटकियों में किसी नदी या पवित्र सरोवर का जल भरा जाता है और फिर उसे आपस में बंधी हुई बांस की तीन स्टिक पर रखकर उसे बांस के एक लंबे डंडे पर बांधा जाता है। इस अवस्था में आकृति किसी तराजू की तरह हो जाती है। आजकल तांबे के लोटे में जल भरकर इसे कंधे पर लटकाकर यात्रा की जाती है। इस दंड में दोनो छोर पर जल के दो घड़े या पात्र (डिब्बे या बोतल) टांग लेता है। एक तरफ पानी और दूसरे तरफ यात्री का अन्य सामान्य भी हो सकता है। कावड़ , पवित्र नदियों से पानी ले जाने के लिए टोकरियों के रूप में हो सकता है। लोग कावड़ लेकर शिव भगवान की यात्रा करने जाते हैं। लोग भगवान शिव की तीर्थ यात्रा के लिए पवित्र नदियों से जल ले जाने के लिए टोकरियों का उपयोग करते हैं।

        हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं इस यात्रा को कांवड़ यात्रा बोला जाता है। कांवड़ यात्रा हमेशा सावन के पहले सोमवार से शुरू होती है, वहीं समापन ऐसे दिन पर करते हैं जब दिन सोमवार, प्रदोष या शिवरात्रि हो।

       -: कांवड़ यात्रा की परंपरा:-

1.सभी देवों द्वारा शिव जी का अभिषेक :-

कांवड़ यात्रा को लेकर प्रथम मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब महादेव ने हलाहल विष का पान कर लिया था, तब विष के प्रभावों को दूर करने के लिए भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया गया था। ताकि विष के प्रभाव को जल्दी से जल्दी कम किया जा सके। सभी देवता मिलकर गंगाजल से जल लेकर आए और भगवान शिव पर अर्पित कर दिया। उस समय सावन मास चल रहा था। मान्यता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो गई थी।

2.परशुराम द्वारा पुरा महादेव जी का अभिषेक:-

मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए थे और यूपी के बागपत के पास स्थित 'पुरा महादेव' का गंगाजल से अभिषेक किया था। उस समय सावन मास ही चल रहा था, इसी के बाद से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई। आज भी इस परंपरा का पालन किया जा रहा है। लाखों भक्त गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर जाते हैं और पुरा महादेव पर जल अर्पित करते हैं।

3. रावण द्वारा भी पुरा महादेव जी का अभिषेक:-

प्राचीन ग्रंथों में रावणको पहला कांवड़िया बताया है। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था, तब भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था और वे तभी से नीलकंठ कहलाए थे। लेकिन हलाहल विष के पान करने के बाद नकारात्मक शक्तियों ने भगवान नीलकंठ को घेर लिया था। तब रावण ने महादेव को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त के लिए रावन ने ध्यान किया और गंगाजल भरकर 'पुरा महादेव' काअभिषेक किया, जिससे महादेव नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त हो गए थे। तभी से कांवड़ यात्रा की परंपरा भी प्रारंभ हो गई।

4. श्रवण कुमार माता पिता को लेकर

 हरिद्वार से कावड़ लाया गया :-

कुछ विद्वान का मानना है कि सबसे पहले त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी। श्रवण कुमार ने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर लेजाने के लिए कांवड़ बैठया था। श्रवण कुमार के माता पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की थी, माता पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार कांवड़ में ही हरिद्वार ले गए और उनको गंगा स्नान करवाया। वापसी में वे गंगाजल भी साथ लेकर आए थे। बताया जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी।

5. रावन द्वारा बैद्यनाथ जी का अभिषेक :-

जनश्रुति एवं पुराणों के अनुसार भगवान शिव को खुश करने के लिए लंकेश्वर रावण ने हरिद्वार से कांवर में जल लाकर बाबा बैद्यनाथ पर जलार्पण किया था।

6. भगवान राम द्वारा बैद्यनाथ जी का अभिषेक:-

आनंद रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे।भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था। उस समय सावन मास चल रहा था।राज्याभिषेक के पश्चात राम अपनी पत्नी सीता एवं तीनों भाईयों के साथ देवघर आए थे और बाबा बैद्यनाथ पर जलाभिषेक किए थे।

      -:कांवड़ के पांच मुख्य प्रकार :-

कांवड़ मुख्यत: पांच प्रकार की होती हैऔर हर कांवड़ यात्रा के नियम और महत्व अलग अलग होते हैं। इनमें सामान्य कांवड़, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़, दांडी कांवड़ कहते हैं। जो व्यक्ति जैसी कांवड़ लेकर जाता है, उसी हिसाब से उसकी तैयारियां भी की जाती है। अब त्रिशूल कांवर और शिव स्वरूप रथमय कांवर भी दिखाई देने लगे हैं।

1. सामान्य कांवड़ :-

सामान्य कांवड़ यात्रा के लिए कांवड़िये रास्ते में आराम करते हुए यात्रा करते हैं और फिर अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं। इसके नियम बेहद सहज और सरल होते है। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि कांवड़ियां बीच रास्ते में कभी भी आराम कर सकता है और फिर यात्रा शुरू कर सकता है।

2.डाक कांवड़ :-

डाक कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये नदी से जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने तक लगातार चलना होता है। एक बार यात्रा शुरू करने के बाद जलाभिषेक के बाद ही यात्रा खत्म की जाती है। शिव मंदिरों में जलाभिषेक के लिए विशेष व्यवस्था भी की जाती है। इन्हें प्रशासन भी वरीयता के साथ रास्ता खाली रखने का प्रयास करता है।इसके नियमों का पालन करने के लिए शिव भक्त को बहुत मजबूत बनना पड़ता है, क्योंकि इस यात्रा में कांवड़ को पीठ पर ढोकर या हाथ में लेकर दौड़ लगा कर लगातार चलना पड़ता है।

3. खड़ी कावड़ :-

खड़ी कावड़ यात्रा सामान्य यात्रा से थोड़ी मुश्किल होती है। इस कांवड़ यात्रा में लगातार चलना होता है। इसमें एक कांवड़ के साथ दो से तीन कांवड़िएं होते हैं। जब कोई एक थक जाता है, तो दूसरा कांवड़ लेकर चलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यात्रा में कांवड़ को नीचे जमीन पर नहीं रखते। इसी कारण इसे खड़ी कांवड़ यात्रा कहते हैं।

4.दांडी कांवड़ :-

दांडी कांवड़ को सबसे कठिन यात्रा माना जाता है। इसमें कांवड़िए को बोल बम का जयकारा लगाते हुए दंडवत करते हुए यात्रा करते हैं। कांवड़िए घर से लेकर नदी तक और उसके बाद जल लेकर शिवालय तक दंडवत करते हुए जाते हैं। इसमें सामान्य कांवड़ यात्रा से काफी समय लगता है। इसमें एक या एक से अधिक सहयोगी भी होते हैं।

5.झूला कांवड़ :-

झूला कांवड़ का नाम उसके विशेष डिजाइन के कारण रखा गया है। यह लकड़ी या बांस से बना एक विशेष कांवड़ होता है, जिसके दोनों सिरों पर मटके लटकाए जाते हैं, जिनमें गंगाजल भरा होता है। इसे मयूर पंख और घंटियों से सजाया जाता है। यात्रा के दौरान भक्त इसे अपने कंधों पर रखकर चलते हैं, लेकिन जब आराम करना होता है तो इसे नीचे जमीन पर रखना सख्त मना होता है। इसके लिए भी विशेष झूला स्टैंड का उपयोग किया जाता है। झूला कांवड़ में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि इसे संतुलित रखना होता है। दोनों मटकों में बराबर वजन होना चाहिए, नहीं तो कांवड़ का संतुलन बिगड़ सकता है और यात्रा मुश्किल हो सकती है। इसके नियम और सावधानी इसे शारीरिक से ज्यादा मानसिक चुनौती बनाते हैं।

जल की यात्रा का पर्व:-

श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं। पानी आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु - पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक वस्तु है। उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यहां के मैदानी इलाकों में मानव जीवन नदियों पर ही आश्रित है ।

यम नियम और संयम :-

कांवड़ यात्रा ले जाने के कई नियम होते हैं, जिनको पूरा करने का हर कांवड़िया संकल्प करता है। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा, मदिरा, मांस और तामसिक भोजन वर्जित माना गया है। कांवड़ को बिना स्नान किए हाथ नहीं लगा सकते, चमड़ा का स्पर्श नहीं करना, वाहन का प्रयोग नहीं करना, चारपाई का उपयोग नहीं करना, वृक्ष के नीचे भी कांवड़ नहीं रखना, कांवड़ को अपने सिर के ऊपर से लेकर जाना भी वर्जित माना गया है।

अश्वमेघ यज्ञ का फल :-

शास्त्रों में बताया गया है कि सावन में शिवभक्त सच्ची श्रद्धा के साथ कांधे पर कांवड़ रखकर बोल बम का नारा लगाते हुए पैदल यात्रा करता है, उसे हर कदम के साथ एक अश्वमेघ यज्ञ करने जितना फल प्राप्त होता है। उसके सभी पापों का अंत हो जाता है। वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। मृत्यु के बाद उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।

हाथरस का परसरा परंपरागत कावड़ वाला गांव :-

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. ज्ञानेंद्र श्रीवास्तव ने इस गांव का सर्वेक्षण अपने आगरा के कार्यकाल में किया था। उनकी विवेचना के अनुसार “परसरा बस्ती के लोगों को बाबाजी और जोगी भी कहते हैं। इनकी छोटी छोटी मढ़ियाँ भी होती हैं। ये लोग काँवड़ लेकर चलते रहते हैं। सावन में विशेषकर इनके साथ और लोग भी जल लेने और जगह जगह थानों और शिवालयों में चढ़ाने जाते हैं । उस समय वहाँ उनके 18-20 घर थे किंतु अधिकांश लोग बाहर गये हुये थे।

प्राचीन काल से योगी या जोगी ( योग साधना करने वाले), यति (जती ईश्वरोपासना के यत्न या जतन करने वाले), तपस्वी या तपसी ( तप या तपस्या करने वाले जिसमे व्रत, उपवास,आसन, शयन,एकांतवास, ठंढ या ताप सहने की अनेकानेक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।), मुनिजन ( मौन साधक ) आदि ईश्वरोपासक संप्रदायों की परंपरा रही है। यह भारतवर्ष की विशेषता रही है कि सामान्य जन सदैव इनसे जुड़कर इनकी देखभालएवं सुविधा का ध्यान रखता रहा है । सामान्य जन गृहस्थ धर्म का पालन करते हुये जोगी -जती आदि साधकों के साथ मिलकर उनके समारोहों को भी भव्य बनाता रहा है और इसी क्रम में वह इनके साथ यात्रा आदि पर भी निकलने लगा तथा अन्य तीर्थों का भ्रमण कर साधु-संतों के दर्शन तथा तीर्थयात्रा का प्रसाद लेने लगा।

शैव धर्म में कालांतर में इसमें पाशुपत, कापालिक, मत्तमयूर , अघोरादि पाँच व्यवस्थित साधना वाले सम्प्रदाय विकसित हुये। पाशुपत सम्प्रदाय का उत्थान गुजरात के आचार्य लकुलीश की महत्ता से हुआ जो ओडिसा से लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत में फैल गया । इसी सम्प्रदाय में आचार्य पराशर नामक महान् शैवाचार्य हुये जिनके नाम से पाराशरेश्वर नामक अनेकानेक शिवमंदिर भी मिलते है एवं परसरा , परसौंजा आदि अपभ्रंश नामों वाले सेटलमेंट या गांव भी मिलते हैं जो इस संप्रदाय के अनुसरण करने वालों के जीवंत केंद्र थे। समय के साथ यद्यपि विशिष्ट साधना सम्प्रदाय ओझल हो गये किंतु लोकमत में उनकी मान्यता बनी रही और यह सब मनुष्य की जीवन शैली में रच बस गया। इस प्रकार रुद्र या शिव के जलाभिषेक हेतु कांवड़ यात्रा लोकजीवन का अभिन्न अंग बन गयी।”



लेखक परिचय :-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)




Tuesday, August 4, 2026

शिव के कालभैरव स्वरूप के विविध रूप ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


कालभैरव, भगवान शिव के उग्र और रुद्र अवतार हैं, जिन्हें 'समय के देवता' और ‘पापियों के दंडदाता’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें "काशी का कोतवाल" भी माना जाता है, उनकी कृपा से सभी भय व नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती है। वे आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनका वाहन काला कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को भोजन कराने से भी भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।



उत्पत्ति की कथा :-

पौराणिक मान्यताओं (शिव पुराण) के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा को अपनी श्रेष्ठता पर अहंकार हो गया था और उन्होंने भगवान शिव का अनादर कर दिया था । इस अहंकार को तोड़ने और ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए, शिव के क्रोध से 'काल भैरव' की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक अभिमानी पांचवें सिर को काट दिया था। इस कथा का विजुअल इस लिंक से भी देखा जा सकता है -

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 भैरव का अर्थ ‘भय को हरने वाला’ होता है। उनका यह स्वरूप काल का स्वामी और सदैव रौद्र रूप में होता है। शिव पुराण के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसके साथ ही काल भैरव को ‘दंडपाणी’ भी कहा जाता है। क्योंकि वह पापियों को दंड देते हैं।

ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करना पड़ा :-

ब्रह्मा का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्म हत्या' का पाप लगा। इस पाप के निवारण के लिए उन्हें कई वर्षों तक एक भिक्षु के रूप में भटकना पड़ा। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव ने त्रिलोक में भ्रमण किया। अंततः, जब वे पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) पहुँचे, तो ब्रह्मा का कटा हुआ सिर (कपाल) उनके हाथ से नीचे गिर गया। तब जाकर वह पाप मुक्त हुए। तब से, काल भैरव को काशी का मुख्य कोतवाल और रक्षक माना जाने लगा है।


काल भैरव का भयानक स्वरूप :- 

काल भैरव का रूप अत्यंत भयानक है। उनका रंग काला है, वे हाथों में त्रिशूल, डमरू और ‘ब्रह्मा का कपाल’ धारण करते हैं, और उनका वाहनमृत्यु) और भय (डर) पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

पूजन का विशेष समय :- 

काल भैरव की पूजा के लिए रविवार और मंगलवार का दिन विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, हर माह के कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' (कालाष्टमी) का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसिक शांति और बाधा मुक्ति के लिए "ॐ कालभैरवाय विद्महे काशीवासाय धीमहि। तन्नो भैरवः प्रचोदयात्।" मंत्र का जाप किया जा सकता है।


निष्कर्ष :-

काल भैरव, शिव का सबसे शक्तिशाली रूप है। काल भैरव की कथा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने के लिए है। भैरव धर्म की पुनर्स्थापना करने, अहंकार का नाश करने और सत्य की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उनका उग्र रूप स्पष्टता का प्रतीक है। भ्रम को दूर करने और अनुशासन में दृढ़ता से खड़े रहने का साहस ही भैरव का स्वरूप है। भैरव अष्टमी पर काशी में भैरव की पूजा करें या घर पर एक साधारण प्रार्थना के माध्यम से, आध्यात्मिक संदेश एक ही रहता है- सत्य अहंकार से श्रेष्ठ है, अनुशासन भय से अधिक शक्तिशाली है, और भक्ति तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच्ची और निरंतर हो। काल भैरव अंधकार का प्रतीक नहीं हैं। वे अंधकार के अंत का प्रतीक हैं। इसीलिए भक्त उन्हें निर्भयता और आंतरिक स्थिरता जगाने वाली रक्षक शक्ति के रूप में याद करते हैं।

     काल भैरव के शास्त्रीय स्वरूप :-

अष्ट भैरव-

अष्ट भैरवों को काल भैरव के अधीन बताया गया है, जिन्हें ब्रह्मांड में समय का सर्वोच्च शासक और भैरव का प्रमुख रूप माना जाता है। भैरव की पूजा केवल एक रूप में नहीं की जाती। हिंदू देवता भैरव के आठ रूप हैं । उन्हें आठ दिशाओं का रक्षक और नियंत्रक माना जाता है।भैरव बाबा के 8 प्रमुख रूप को अष्ट भैरव कहा जाता है।  माना जाता है कि प्रत्येक रूप रक्षा, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति के एक अलग पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएँ अष्ट भैरव नामों का वर्णन थोड़ा भिन्न ढंग से कर सकती हैं, फिर भी मूल अवधारणा एक ही रहती है। भैरव की उपस्थिति बहुआयामी है। इसका अर्थ यह है कि भैरव पूजा कोई एक निश्चित अभिव्यक्ति नहीं है। यह भक्त के आध्यात्मिक विकास और संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलती रहती है। आरंभिक साधकों के लिए सभी रूपों को याद करना आवश्यक नहीं है। इसका उद्देश्य जानकारी एकत्र करना नहीं है, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ भक्ति का निर्माण करना है। 



1.असितंगा भैरव :-

असितांग भैरव भगवान शिव के उग्र रूप, काल भैरव के आठ प्रमुख रूपों में से प्रथम हैं। मुख्य रूप से रचनात्मकता, ज्ञान की प्राप्ति, और वाक सिद्धि के लिए पूजे जाने वाले इस देवता का वर्ण अत्यंत काला है, जिसके कारण उन्हें 'असितांग' (असित + अंग) कहा जाता है। इनका रंग गहरा नीला या काला होता है। इनके तीन नेत्र हैं और ये गले में सफेद कपालों (खोपड़ियों) की माला धारण करते हैं। अन्य भैरवों का सामान्य वाहन कुत्ता (श्वान) होता है, लेकिन असितांग भैरव का वाहन 'हंस' है, जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। ये पूर्व दिशा के रक्षक माने जाते हैं। इनकी शक्ति 'ब्रह्माणी' हैं। भक्तों का मानना है कि इनकी उपासना सेरचनात्मक क्षमता बढ़ती है, शाप से मुक्ति मिलती है और गंभीर रोगों से राहत प्राप्त होती है।हालांकि इनकी पूजा भैरव मंदिरों में सामान्य रूप से होती है, लेकिन इनका एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर वाराणसी में वृद्ध कालेश्वर के निकट महामृत्युंजय मंदिर के पास कृतवासा पीठ के धार्मिक क्षेत्र में स्थित है।


2.रुरु भैरव :-

रुरु भैरव भगवान शिव (रुद्र) के सबसे प्रमुख आठ रूपों में से दूसरा स्वरूप हैं। इन्हें 'आनंद भैरव' या 'गुरु भैरव' भी कहा जाता है। ज्ञान, उदारता, और कला-संगीत के प्रतीक इस भैरव की पूजा मुख्य रूप से बुद्धि, शत्रुओं पर विजय, धन प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'रुरु' शब्द का अर्थ रुद्र का मुख माना जाता है। यह उग्र होने के साथ-साथ अत्यंत ज्ञानवान और सही मार्ग दिखाने वाले गुरु के समान हैं। इनका वाहन सफेद बैल है और उनकी पत्नी महेश्वरी मातृका हैं। लाभ: इनकी आराधना से विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, कलाकारों को रचनात्मकता, और साधकों को भय तथा तंत्र-बाधा से मुक्ति मिलती है। रुरु भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सरल बीज मंत्र है:”ॐ भ्रं रुरु भैरवाय नमः।” वाराणसी अष्ट भैरव यात्रा के अंतर्गत इनका मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हनुमान घाट (B. 4/16) के पास स्थित है। श्रद्धालु यहाँ रिक्शा या ऑटो से सोनारपुरा चौराहे तक पहुँच सकते हैं। स्थानीय लोग इन्हें आनंद भैरव के नाम से भी पुकारते हैं। “वे भगवान शिव के ही एक अंश हैं और ज्ञान, उदारता, प्रेम तथा सही मार्गदर्शन के प्रतीक हैं।


3.चंदा भैरव :-

भगवान चंदा का भैरव का प्रकट होना बताया गया है। विनाश के देवता भगवान शिव, दुष्ट आत्माओं का नाश करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने और ब्रह्मांड में शुद्ध एवं सकारात्मक वातावरण स्थापित करने के लिए भगवान भैरव का रूप धारण करते हैं। भगवान भैरव कवचधारी, आक्रामक और भयभीत देवता हैं। आठ भैरवों में, भगवान चंदा भैरव अष्ट भैरव का तीसरा रूप हैं। वे नीले वस्त्रों में प्रसन्न और सौम्य हैं, विश्वास और विश्वसनीयता के प्रतीक हैं, शांति को बढ़ावा देते हैं और सभी कार्यों में सौम्यता का सम्मान करते हैं। वे अपने चार हाथों में अग्नि ज्वाला, गदा, भाला, धनुष और बाण धारण किए हुए, अपनी पत्नी देवी कुमारी (देवी पार्वती) के साथ अपने वाहन मोर पर बैठे हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर होते हैं। इस दिन होमम करने से जातकों को आनंदमय स्वभाव, शांति और सद्भाव, ऊर्जा और गतिशीलता, सकारात्मक रूप, जीवन में आत्मविश्वास, बाधाओं पर विजय, शत्रुता से मुक्ति और प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

चंदा भैरव भगवान की पूजा प्रतिस्पर्धा, शत्रुता और प्रतिद्वंद्वियों को दूर करते हैं और विकास, सफलता, विजय और व्यावसायिक उन्नति के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे शुभ ऊर्जा, धन, सर्वोच्चता, विकास की शक्ति, जीवन की वृद्धि, समृद्धि, उत्सव और समग्र खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। वे दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। उनका वाहन मोर है। भगवान चंदाभैरव मूल मंत्र है -

“ॐ ह्रीं सर्व शक्ति रूपाय नील वर्णाय

महा चंदा भैरवाय नमः।” पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपरोक्त मंत्र का 22 दिनों तक 1008 बार जाप करने से श्री चंदा भैरव का आशीर्वाद प्राप्त होगा, मंगल दोष और मंगल दशा के प्रभाव दूर होंगे और बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलेगी। जीवन में उन्नति और अद्भुत क्षणों का अनुभव होगा।

लाभ :-

आत्म-जागरूकता और प्रभावशाली रूप को आशीर्वाद दें, घृणा को दूर करें। अंतरात्मा को आशीर्वाद दें, बुरी धारणाओं और हानिकारक प्रभावों को दूर करें।स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद, अज्ञानता का निवारण करें। मंदी से मुक्ति, बाधाओं और परेशानियों को दूर करना होता है।वित्तीय ऋणमुक्ति का निवारण हो, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिले।अस्थिरता की परिस्थितियों को दूर करो, रोगमुक्त जीवन का आशीर्वाद दो।


4.क्रोध भैरव :-

क्रोध भैरव हिंदू धर्म में भगवान शिव के उग्र रूप और अष्ट भैरवों में से एक हैं।यह स्वरूप दुष्ट बाधाओं, शत्रुओं के विनाश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय माना जाता है।  क्रोध भैरव का स्वरूप उग्र और भयंकर होता है। इनका वर्ण लाल (रक्त) है, चार भुजाएँ हैं और ये खड्ग (तलवार), त्रिशूल, खप्पर (खोपड़ी का पात्र) तथा डमरू धारण करते हैं।अन्य भैरवों की तरह इनका वाहन भी काला कुत्ता (श्वान) है। यह स्वरूप तंत्र-मंत्र, तामसिक शक्ति और गुप्त साधनाओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इनकी पूजा मुख्य रूप से रात या श्मशान में की जाती है और इसे हमेशा किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 

लाभ: क्रोध भैरव की उपासना से साधक का आत्मबल बढ़ता है, तंत्र-मंत्र का प्रभाव नष्ट होता है और सभी प्रकार के कष्ट व शत्रु बाधा समाप्त होते हैं।

5.उन्मत्त भैरव :-

उन्मत्त भैरव, भगवान शिव के अष्ट भैरव स्वरूपों में से पांचवें स्वरूप हैं। उन्हें मुख्य रूप से माँ वाराही का भैरव माना जाता है। उन्मत्त भैरव का स्वरूप साधक के मन से नकारात्मक विचारों, कामुकता और दूषित आदतों को नष्ट कर सकारात्मक ऊर्जा और उत्कृष्ट वाणी प्रदान करने के लिए अत्यंत पूजनीय है।

लाभ - इस साधना से सभी प्रकार की तंत्र बाधाएं दूर होती हैं, शत्रुओं से रक्षा होती है, और निर्णय लेने की क्षमता व भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। मानसिक स्थिरता के लिए आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते हुए उनके मंत्रों का 21 दिनों तक धीमी आवाज़ में (उपांशु) जाप किया जाता है। उन्मत्त भैरव साधना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

गायत्री मंत्र: “ॐ महामंत्राय विद्महे । वाराहि मनोहराय धीमहि । तन्नौ उन्मत भैरव प्रचोदयात्।”


6.कपाल भैरव :-

कपाल भैरव, भगवान शिव के उग्र और तांत्रिक स्वरूप हैं।यह अष्ट भैरवों में से चौथे प्रमुख भैरव हैं। मुख्यतः वाराणसी (काशी) में इन्हें 'लाट भैरव' के रूप में पूजा जाता है, जहाँ ये नगर के रक्षक माने जाते हैं। इनकी साधना विशेषकर कानूनी विवादों, शत्रुओं और तंत्र बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, दंड और कपाल (मानव खोपड़ी) होता है। उनका वाहन काला कुत्ता है।इनका मूल मंत्र 'ॐ कपाल भैरवाय नमः' है।

लाभ- हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इनकी पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है, अटके हुए कार्य पूरे होते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है。वाराणसी के अलावा, पूरे भारत में अन्य शिव और भैरव मंदिरों में भी इनकी आराधना की जाती है। कपाल भैरव का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिर वाराणसी में अलापुर (सारनाथ मार्ग) में स्थित है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 4-5 किलोमीटर है। आशापुर चौराही (चौमुहानी) से सारनाथ जाने वाले मार्ग पर बाएँ न मुड़कर, दाहिने मुड़कर लगभग 2 किलोमीटर आगे जाने पर मंदिर पहुँचा जा सकता है।


7.भीषण भैरव :- 

भीषण भैरव को 'भूत भैरव' भी कहा जाता है। भगवान शिव के उग्र और शक्तिशाली अवतार, अष्ट भैरव में से सातवें भैरव हैं। वे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी आत्माओं और तंत्र-मंत्र के प्रभावों को नष्ट करने वाले रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह प्राचीन मंदिर क.63/28, भूतभैरव (ज्येष्ठेश्वर के निकट) में स्थित है। भीषण भैरव को क्रूरता, अज्ञानता और अहंकार के विनाशक के रूप में जाना जाता है, जो भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। वाराणसी की पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा द्वारा राक्षस दुर्गासुर का वध करने के बाद नगर की रक्षा के लिए आठ भैरवों को स्थापित किया गया था, जिनमें से भीषण भैरव एक हैं। 

लाभ - शक्तिशाली मंत्रभक्त नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से मुक्ति के लिए उनके बीज मंत्र का जाप करते हैं:॥ ॐ भ्रं भीषण भैरवाय फट् ॥बुरी नज़र और कष्टों के निवारण के लिए इस मूल मंत्र का भी उपयोग किया जाता है:॥ ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय सर्व शाप निवारणाय मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ॥


8. संहार भैरव:-

संहार भैरव भगवान शिव का सबसे उग्र और रौद्र स्वरूप हैं, जो ‘अष्ट भैरव’ में से एक हैं। 'संहार' का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि बुराइयों, नकारात्मक ऊर्जाओं और पापों का अंत कर धर्म की पुनर्स्थापना करना है। इनकी आराधना से भक्तों को निर्भयता और साहस की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, संहार भैरव एक कूप (कुएं) से स्वयं प्रकट हुए थे।स्वरूप: इन्हें दश-भुजी (दस भुजाओं) वाले देवता के रूप में दर्शाया गया है, जिनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, शंख, गदा, चक्र, तलवार और खप्पर आदि सुशोभित रहते हैं। इनका वर्ण बिजली जैसा पीला-नारंगी माना जाता है। संहार भैरव का मुख्य और प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर वाराणसी में पाटन दरवाजा, गाय घाट के पास स्थित है। 

लाभ - विशेष रूप से भय, अज्ञात चिंताओं और पुराने कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल का दीपक जलाना फलदायी होता है।काले तिल, उड़द और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है।इनके वाहन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यधिक शुभ माना जाता है। भक्त नकारात्मक शक्तियों और भय से मुक्ति के लिए इस बीज मंत्र और मूल मंत्र का जाप करते हैं:बीज मंत्र: ॐ भ्रां भैरवाय नमःमूल मंत्र: ॐ नमो भगवते संहार भैरवाय भूत प्रेता पिशाच ब्रह्मराक्षस उकताया उकताया संहारय संहारय सर्व भय छेदनं कुरु कुरु स्वाहा।


शक्तिशाली भैरव रूपों का विवरण


1.काल भैरव :- इन्हें सबसे उग्र और सर्वोच्च माना जाता है। मान्यता है कि इन्होंने ही अहंकार में चूर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था।इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है और इनके बिना काशी में कोई भी कार्य या अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है।

2.स्वर्णाकर्षण भैरव :- यह भैरव का वह स्वरूप है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार के आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है और अपार धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।

3.बटुक भैरव :- यह भैरव का सौम्य और बाल रूप है। इन्हें बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है और इनकी पूजा विशेष रूप से त्वरित फल देने वाली और भय-बाधाओं को नष्ट करने वाली मानी गई है।


भारत में काल भैरव के प्रमुख मन्दिर :-

भारत में काल भैरव भगवान शिव के उग्र अवतार के कई प्रमुख और सिद्ध मंदिर हैं। उन्हें मुख्य रूप से बुराई के विनाशक और 'क्षेत्रपाल' (रक्षक) माना जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के कालभैरव स्वरुप की उत्पत्ति मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए उत्तम मानी जाती है और ऐसी मान्यता है इस दिन काल भैरव की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। काल भैरव की पूजा न सिर्फ भारत बल्कि नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत जैसे कई देशों में होती है।भारत में कई स्थानों पर प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर है जिसका अपना अलग-अलग महत्व है। 


1.काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश):-

क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। उज्जैन मध्यप्रदेश के उज्जैन में भगवान शिव का प्राचीन और फेमस ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस जगह पर भगवान शिव काल भैरव स्वरूप भी विराजते हैं। भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्‍थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।बाबा कालभैरव भगवान सदाशिव के स्वरूप हैं। वे कलियुग की बाधाओं का शीघ्र निवारण करने वाले देवता माने जाते हैं। खासतौर से प्रेत व तांत्रिक बाधा के दोष उनके पूजन से दूर हो जाते हैं। संतान की दीर्घायु हो या गृहस्वामी का स्वास्थ्य, भगवान भैरव स्मरण और पूजन मात्र से उनके कष्टों को दूर कर देते हैं। भगवान भैरव के पूजन से राहु-केतु शांत हो जाते हैं। उनके पूजन में भैरव अष्टक और भैरव कवच का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे शीघ्र फल मिलता है। साथ ही तांत्रिक व प्रेत बाधा का संकट टल जाता है। 

       जहां उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सरकार द्वारा कॉरिडोर बनाकर दर्शन पूजन के सुलभ अवसर रुपया 250/- में उपलब्ध है, वही काल भैरव में रुपया 500/- देकर सुलभ दर्शन का विधान है,परंतु प्रत्यक्ष अनुभव से यह राशि भी बड़ी दिखती है तथा यहां सुलभ दर्शन का कोई विशेष सुविधा भी नहीं दी जाती यात्री है। ना तो सरकारी पुलिस और ना ही मंदिर के वॉलेंटियर जनता को वांछित सहयोग दे पाते हैं। 500 रूपये की भारी भरकम सुलभ शुल्क देने के बावजूद कई-कई घंटे लाइन में लगकर श्रद्धालु अपने आराध्य का दर्शन किसी प्रकार कर पाते हैं, जबकि महाकाल मन्दिर में कम समय में सुलभ और सुगम दर्शन व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो जाता है।


2.काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश): -

वाराणसी में स्थित काल भैरव मंदिर शहर के सबसे प्राचीन और पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है, जो भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। मान्यता है कि काल भैरव की अनुमति के बिना कोई भी काशी में प्रवेश नहीं कर सकता है।इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले भक्त काल भैरव के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं और काशी के कोतवाल से अनुमति लेते हैं। काशी के कोतवाल / संरक्षक के रूप में विख्यात काल भैरव को शहर का रक्षक माना जाता है। इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद बाबा काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है, अन्यथा यात्रा अधूरी मानी जाती है। ये काशी विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 


3. बटुक भैरव मंदिर, नई दिल्ली:-

 विनय मार्ग (चाणक्यपुरी) पर स्थित यह मंदिर पांडवकालीन माना जाता है। इसे 'पांडव कालीन बटुक भैरव मंदिर' भी कहते हैं । बाबा बटुक भैरव की मूर्ति यहां पर विशेष प्रकार से एक कुएं के ऊपर विराजित है। यह प्रतिमा पांडव भीमसेन ने काशी से लाए थे। यहाँ विशेष रूप से तेल और मीठी रोटी चढ़ाई जाती है। 

4.बटुक भैरव मंदिर, पांडव किला  दिल्ली-

बटुक भैरव मंदिर पांडव किला  दिल्ली में बाबा भैरव बटुक का मंदिर प्रसिद्ध है। इस मंदिर की स्थापना पांडव भीमसेन के द्वारा की गई थी। वास्तव में पांडव भीमसेन द्वारा लाए गए भैरव दिल्ली से बाहर ही विराज गए तो पांडव बड़े चिंतित हुए। उनकी चिंता देखकर बटुक भैरव ने उन्हें अपनी दो जटाएं दे दीं और उसे नीचे रख कर दूसरी भैरव मूर्ति उस पर स्थापित करने का निर्देश दिया।


5. घोड़ाखाल बटुक भैरव मंदिर, नैनीताल (उत्तराखंड): -

यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ भैरव बाबा को 'गोलू देवता' के रूप में भी पूजा जाता है। यहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर चिट्ठी लिखकर चढ़ाते हैं।भवाली से महज पांच किमी की दूरी पर स्थित सैनिक स्कूल के पीछे चाेटी पर बने इस मंदिर में हजारों घंटियां हैं। यहां नैसर्गिक सौंदर्य हर किसी को मुग्ध कर देता है।गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है। इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर पुकारा जाता है। गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है। इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है। गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है।


6.आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार :- 

आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार में स्थित है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। धार्मिक मान्यता है कि आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार के कोतवाल हैं। यहां श्रद्धालु अपनी परेशानियां बताते हैं और भगवान आनंद भैरव अपने भक्तों की सभीबाधाओं को दूर करते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर अनादि काल से हैं। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू का है। आनंद भैरव, भगवान शिव का सबसे आनंदमयी रूप है।


7.बाजनामठ भैरव मंदिर, जबलपुर :-

मध्यप्रदेश के जबलपुर में बाजना मठ मंदिर के पास महाकाल भैरव का मंदिर है। यहां पर होने वाले हवन की अग्नि में कई देवी-देवताओं की आकृति दिखती है। यह मंदिर तंत्र साधना के लिए भी जाना जाता है। बताया जाता है कि रानी दुर्गावती द्वारा गोंडवाना काल के दौरान मंदिर में प्रतिमा की स्थापना की गई थी। इस मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर परिसर में महाकाल भैरव के हवन के समय जिस भी देवता के नाम की यज्ञकुंड में आहुति दी जाती है, अग्नि में उस देवता की आकृति उबरती है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर 24 घंटे में महाकाल भैरव 52 बार रूप बदलते हैं।


8. राजा बटुक भैरव लखनऊ:-

लखनऊ के कैसरबाग में राजा बटुक भैरव मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और इनको सुरों का राजा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि यहां पर मांगने वाली मन्नत भी संगीत, साधना और कला से जुड़ी होती है। बटुक बाबा भगवान शिव के 5वें अवतार माने जाते हैं और यह मंदिर कला साधना का वर्षों पुराना केंद्र है।


लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.)



Monday, August 3, 2026

लोक आराध्य देवता हनुमानजीऔर उनके प्रमुख मंदिर ✍️डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

हनुमान जी भारतीय पौराणिक कथाओं में एक शक्तिशाली और सम्मानित हिंदू देवता हैं । सदियों से उन्हें साहस, निस्वार्थता और शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता रहा है। रामायण में हनुमान की भूमिका भगवान राम के प्रति गहरी भक्ति अटूट विश्वास ,निष्ठा और वीरता का प्रतीक है। उनकी भूमिका बहुआयामी और  महत्वपूर्ण है, जो हमें वफादारी, भक्ति, साहस और विनम्रता में मूल्यवान सबक सिखाती है। वे राम के परम भक्त थे और अनेक कथाएँ उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। उनकी वीरता और बल ने उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा बनाया, साथ ही उन्होंने लंका से चुराई गई संजीवनी बूटी को वापस लाकर रामायण युद्ध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई कथाओं में कहा जाता है कि उनके जन्म में वायु की भूमिका थी। बचपन में, हनुमान ने सूर्य को फल समझ चखने की कोशिश की,जिसके कारण उनकी बोलने की क्षमता चली गई। धनुर्धर के रूप में उनकी कुशलता और बल ने उन्हें एक दुर्जेय योद्धा बना दिया। राम और रावण के युद्ध के दौरान, हनुमान ने जंबुमाली, अक्ष और महापार्श्व सहित कई राक्षस योद्धाओं को मार गिराया था। वे समुद्र के ऊपर से छलांग लगाकर लंका पहुंचे और अपनी जलती हुई पूंछ से लंका को प्रज्वलित कर दिया था।

राम के गुणों और वीरता से प्रेरित होकर हनुमान ने उनके प्रति अपनी अमर भक्ति की प्रतिज्ञा की, इस प्रकार उन्होंने वफादारी, बहादुरी और अटूट प्रतिबद्धता से चिह्नित यात्रा की शुरुआत की। हनुमान परमात्मा और मानव के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे एक आदर्श भक्त के रूप में हमें निष्ठा, भक्ति, साहस और विनम्रता के मूल्यवान पाठ पढ़ाते हैं। बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना सेवा करने की उनकी इच्छा, विपरीत परिस्थितियों में उनका साहस, और धार्मिकता के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता ; सभी ऐसे गुण हैं जो प्रेरणा देते रहते हैं। हनुमान का चरित्र हमें भक्ति की शक्ति, विनम्रता की शक्ति और धार्मिकता के लिए खड़े होने का साहस सिखाता है।

प्रमुख हनुमान प्रतिमा और मंदिर :-

श्री हनुमंत कथा में भगवान हनुमान के जन्म, उनके बालपन के पराक्रम और श्री राम के प्रति उनकी अगाध भक्ति की पावन गाथा है। जिसमें मुख्य रूप से माता अंजनी के यहाँ उनका अवतार, सूर्य को फल समझ कर निगलने की लीला और लंका दहन जैसे प्रसंग आते हैं। उनकी कथा आज पूरे भारत में प्रचलित है, और अन्य  हिंदू देवताओं की तरह ही उनके सम्मान में अनेक मंदिर पूरे देश में जगह जगह पर स्थापित हैं। भारत के हर राज्य में उनकी प्रतिमाएं पा जाती हैं। 

हनुमान की मूर्तियाँ और उनके प्रसिद्ध मंदिर अपनी अनोखी बनावट, भव्यता और चमत्कारों के लिए जाने जाते हैं। वैसे भारत के कोने कोने में राम दरबार में हनुमान प्रतिमा तो मिलती ही है। स्वतंत्र रूप से हनुमान की प्रतिमा और मन्दिरों की भी बहुत प्रसिद्धि है।  20 फिट लम्बी लेटे हुए हनुमान की शयन मुद्रा की मूर्ति वाला मंदिर प्रयागराज का मुख्य आकर्षण है। यहां उनके पुत्र मकर ध्वज की मूर्ति भी स्थापित की गई है।76 सीढ़ियों वाली हनुमानगढ़ी अयोध्या का सर्वाधिक लोकप्रिय मंदिर है, जहां राम जन्म भूमि से भी ज्यादा श्रद्धालु दर्शन और आराधना करते हैं। संकटमोचन मंदिर वाराणसी की महिमा भी कम नहीं है। हनुमान धारा चित्रकूट में ऊंचाई पर स्थित अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर हैं। सामान्यतः मंदिरों में गदा लिए हुए खड़े या बैठे हुए मुद्रा की मूर्तियां मिलती हैं। भारत में कई स्थानों आन्ध्र प्रदेश, दिल्ली और ओडिशा में 100 फीट से भी ऊंची विशाल मूर्तियाँ स्थापित हैं। 

अलीगंज लखनऊ में अति प्रसिद्ध हनुमान मंदिर गोमती के पुल के पास स्थित है। सालासर हनुमान मंदिर चूरू(राजस्थान) कुछ प्रमुख मंदिर हैं। राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ बालाजी हनुमान मंदिर मेहंदीपुर भी प्रसिद्ध मंदिर है।

गुजरात के भेट-द्वारका से चार मील की दूरी पर मकरध्वज के साथ में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित है।डुल्या मारुति, पूना (महाराष्ट्र) पूना के गणेशपेठ में बना यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है।श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर (गुजरात) अहमदाबाद-भावनगर के पास स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर 12 मील दूरी पर स्थित है। हंपी, कर्नाटक बेल्लारी जिले के हंपी शहर में एक प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है। इन्हें यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। नारी रूपा गिरजा बंध हनुमान मंदिर रतनपुर बिलासपुर में, उल्टे हनुमान जी का मंदिर सांवरे इंदौर मध्य प्रदेश में स्थित है। प्राचीन कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर , बाल हनुमान मन्दिर , जाम नगर गुजरात , पंचमुख आञ्जनेयर हनुमान मंदिर तमिलनाडु और महाबीर मंदिर पटना आदि प्रमुख हनुमान मंदिर हैं।

हनुमान गढ़ी अयोध्या

हनुमान गढ़ी (अयोध्या) एक बहुत ही प्राचीन और ऊँचे टीले पर स्थित मंदिर है। यह स्थान प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण के वध के बाद भगवान रामचंद्र सीता देवी और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए थे। हनुमानजी अपने परम प्रिय भगवान की सेवा करने के लिए अयोध्या में ही रुक गए थे। 

हनुमान गुफा से होती थी अयोध्या की रखवाली :- 

वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के अनुसार, अजर-अमर हनुमान जी यहाँ एक गुफा में निवास करते थे। इन्हें 'रामकोट' का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीराम के दिव्य शासन की झलक मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, जब प्रभु रामचंद्र साकेत धाम जा रहे थे, तब उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या में रहने और सूर्य और चंद्रमा के अस्तित्व के दौरान तथा भगवान राम की महिमा का गुणगान होने तक वहां शासन करने का निर्देश दिया था। उन्होंने हनुमान जी को भक्तों को पूर्णता की ओर मार्गदर्शन करने का भी निर्देश दिया था।

अयोध्या स्थित 'हनुमान गढ़ी' भगवान हनुमान को समर्पित एक किले के आकार में निर्मित 10 वीं शताब्दी का प्राचीन तीर्थ मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है, जहाँ 76 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचा जा सकता है। इसके प्रत्येक कोने में गोलाकार किलेबंदी है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान हनुमान ने एक गुफा में निवास किया था और पूरे शहर की रक्षा की थी।

मुगल शासक औरंगजेब ने राम जन्म भूमि की भांति कहा जाता है कि हनुमानगढ़ी को तोड़वाकर वहां एक मस्जिद बनवा दिया था। उर्दू उपन्यासकार मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की पुस्तक 'फसाना -ए-इब्रत, जिसका स्रोत 'साहिफा-ए- बहादुरशाही’ है और जिसे उन्होंने 1816 ईस्वी में प्रतिरूपित किया था, में उल्लेख है कि औरंगज़ेब ने हनुमानगढ़ी मंदिर को ध्वस्त कर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। बाद में, बक्सर में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद, बैरागियों ने 1855 ईस्वी में उस भूमि पर कब्जा कर लिया, मस्जिद को हटवा दिया और भक्त हनुमान के लिए एक नया मंदिर बनवाया। कुछ मुसलमानों का मानना था कि हनुमानगढ़ी एक मस्जिद पर बनी है। इसलिए उन्होंने कई बार मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

भक्त हनुमान जी के दोनों ओर भक्तों द्वारा भेंट की गई चांदी या सोने की गदाएं रखी हुई हैं। श्री राम के नाम से अंकित चांदी की तुलसी की माला हमेशा मूर्ति को सुशोभित रखती है। भक्त हनुमान जी के पीछे सीता, राम और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं। भक्त हनुमान जी की यह मूर्ति अत्यंत शक्तिशाली है और पूरे भार हनुमान जी की एकमात्र जीवित मूर्ति मानी जाती है। मंदिर के गर्भगृह में माता अंजना देवी की गोद में विराजमानभगवान हनुमान की छह इंच की भव्य प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा को हमेशा अनेक पुष्पमालाओं और सिंदूर से पूर्णतः सजाया जाता है। इसलिए, अधिकांश समय केवल भगवान हनुमान का नारंगी रंग का कमल नुमा चेहरा ही दिखाई देता है।

मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठते हैं। श्रीहनुमानजी का मन्दिर में श्रीमारुति की एक और मूर्ति यहाँ है, वह केवल छः इंच ऊँची है । माना जाता है कि हर एक सीढ़ी किसी न किसी आध्यात्मिक पहलू को दर्शाती है। कुछ लोगों का कहना है कि ये 76 सीढ़ियाँ ईश्वर की ओर यात्रा में भक्ति के विभिन्न चरणों को प्रतिबिंबित करती हैं। मन्दिर बड़ा है और उसमें श्रीहनुमानजी की स्थानक मूर्ति है सदा पुष्पाच्छादित रहती है। 

श्री हनुमान जी के भक्तों के लिये यह स्थान विशेष श्रद्धास्पद है। मन्दिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, उनमें साधु सन्त रहते हैं। लंका विजय के बादअयोध्या राज महल का जो स्वर्ण स्तम्भ रावण उठा ले गया था उसे भी हनुमान जी यहां लाकर स्थापित किया था। यहां पास  में हनुमान कुण्ड भी है जिसे राज्य सरकार ने सौंदर्यीकृत कराया है।

हनुमानगढ़ी क्षेत्र में उत्खनन

हनुमानगढ़ी क्षेत्र में 1981-1982 ई. में  सीमित क्षेत्र में उत्खनन किया गया। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमान गढ़ी और लक्ष्मण घाट क्षेत्रों में हुआ था। हनुमान गढ़ी क्षेत्र से भी उत्तरी काली चमकीली मृण्भांड संस्कृति (लगभग 700 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच ) के अवशेष प्रकाश में आए हैं। साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के मृतिका वलय कूप तथा एक कुएँ में प्रयुक्त कुछ शंक्वाकार ईंटें भी मिली हैं। उत्खनन से बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं, जिनमें मुख्यत: आधा दर्जन मुहरें, 70 सिक्के, एक सौ से अधिक लघु मृण्मूर्तियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कुषाण शासक वासुदेव की एक मिट्टी की मुहर (दूसरी शती ई.), इसी काल का मूलदेव का एक सिक्का तथा एक भूरे रंग की केश-विहीन जैन मृण्मूर्ति है। हनुमानगढ़ी से प्राप्त अन्य मृण्मूर्तियाँ पहली-दूसरी शताब्दी ई. पू. की हैं। ये मृण्मूर्तियाँ अहिच्छत्र, कौशांबी, पिपरहवा और वैशाली आदि क्षेत्रों से प्राप्त मृण्मूर्तियों के समान ही हैं। इस प्रकार की मृण्मूर्तियों को वासुदेवशरण अग्रवाल ने विजातीय प्रकार से अभिहित किया है।

तीन सौ वर्ष पूर्व की वर्तमान संरचना:-

वर्तमान में स्थित हनुमान गढ़ी की स्थापना लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्रीअभयारामदास जी ने की थी। कहते हैं प्राचीन काल में यहाँ हनुमानजी का एक विशाल मन्दिर था, जिसके कालान्तरमें भग्न होने से यह स्थान एक टीले में बदल गया था, इसे हनुमान् टीला कहा जाता था;  उसी स्थान पर स्वामी अभयारामदास जी द्वारा स्थापित वर्तमान मन्दिर है। आप एक सिद्ध महात्मा थे तथा हनुमानजी ने आप को साक्षात् दर्शन भी दिया था। आप ने समाज की श्रद्धा-भावना के संरक्षणार्थ पहले यहाँ श्री निर्वाणी अखाड़ा की स्थापना की और फिर यहीं श्रीहनुमानजी की विधिवत् पूजा-आराधना एवं भोग-राग की व्यवस्था मर्यादित रूप से की। 

नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्या बाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए। 

अवध के नवाबों की उदारता की बड़ी बड़ी बातें मुस्लिम और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा की जाती है। 20 एकड़ या 52 बीघे भूमि का तथाकथित दान देने की बात भी आती है पर ऐसा हुआ है नहीं था । नवाब शुजा- उद- दौला या मंसूर अली द्वारा मालगुजारी (कर) में छूट की बात ही प्रमाणित होती है।

यह भी कहा गया है कि एक बार लखनऊ तथा फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली का पुत्र किसी भयंकर रोग से अत्यन्त पीडित हो गया। सुयोग्य वैद्यों और हकीमों के उपचारों से भी जब उसकी व्याधि नहीं मिटी, तब वह हनुमानगढ़ी के श्रीहनुमान जी की शरण में आया और अविलम्ब उसे उस भीषण रोग से मुक्ति मिल गयी। इसके प्रतिफल स्वरूप नवाब के मन में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा अंकुरित हो गयी। उसने कुछ सहयोग भी किया था। साधुओं की सुविधा के लिये विशाल इमली का बाग लगवा दिया और उसी समय श्री अभयाराम दास जी से प्रार्थना करके हनुमानजी का एक विशाल, भव्य एवं सुदृढ़ मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी हनुमान गढ़ी के नाम से विख्यात है। 


दर्शन,पूजन,मुण्डन और यज्ञोपवीत :

अयोध्या तथा आस-पास के कुछ जिलों के कई परिवार अपने कुल परम्परानुसार अपने बच्चों का मुण्डन और यज्ञोपवीत यहीं करवाते हैं। अयोध्या के बहुत से नेमी श्रद्धालु स्नान करके नित्य यहाँ आते हैं। हिन्दू भक्तों एवं दर्शनार्थियों के कारण यहाँ नित्य ही मेला-सा लगा रहता है। मंगलवार तथा शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि अयोध्या में युगल-सरकार की कृपा प्राप्ति के लिये हनुमान गढ़ी के श्री हनुमानजी की जितनी पूजा होती है, उतनी युगल-सरकार की भी नहीं होती।

दियारा के राजा का सहयोग :-

सुल्तानपुर की दियारा रियासत के राजा (और अन्य स्थानीय जमींदारों) ने संतों और अखाड़ों के माध्यम से मंदिर की रक्षा और इसके विस्तार (जिसे 'गढ़ी' या किले का रूप दिया गया) में आर्थिक और सैन्य सहयोग प्रदान किया था।

महाराजा मानसिंह द्वारा विवाद का निपटारा :-

अयोध्या के तत्कालीन महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई, में हुआ था। उनका शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। राज्य की सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। 

जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।

अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। "गुलाम हुसेन” नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनुमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर. मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गड़वा दिया जिसे “गंज - शहीदाँ” कहते हैं। यह स्थल राम जन्मभूमि अधिगृहीत परिसर में स्थित था।

1855 में जब हिंदुओं ने हनुमानगढ़ी पर अधिकार कर लिया था, तब एक भीषण संघर्ष हुआ था। आज भी अयोध्या में मुस्लिम समुदाय का मानना है कि आगामी राम जन्मभूमि मंदिर से सटे पांच एकड़ का एक स्थान 'गंज-ए-शहीदान' है - हनुमान गढ़ी के बैरागियों द्वारा मारे गए मुसलमानों के सामूहिक दफन का स्थल है। जिसे 'गंज शहीदा' (शहीदों की समाधि) कहा जाता है।

मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा -

हम इश्क़ के बन्दे हैं 

मज़हब से नहीं वाक़िफ़।

गर काबा हुआ तो क्या,

बुतखाना हुआ तो क्या ?

बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारकबाद दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।

इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदत अली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पारसाहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। 

इस समय यहां राजा मानसिंह शासक थे।इसी समय में हनुमान गढ़ी विवाद हुआ था जिसका निपटारा करने पर महाराजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद मिला हुआ था।  राजा मानसिंह ने इसका पर्दाफाश करते हुए कूटनीति से विवाद को सुलझाया था। इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।

वर्तमान समय की परम्परा :- 

अयोध्या के सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी में एक ऐसी परंपरा है, जहां के प्रमुख गद्दीनशीन किसी भी परिस्थितियों में परिसर के बाहर नहीं निकलते हैं। किसी महंत को 60 वर्ष की आयु के बाद ही गद्दीनशीन चुना जाता है। जहां प्रधानमंत्री (चार पट्टी के महंत) से लेकर राष्ट्रपति (गद्दीनशीन) का अपना कानून होता है। हनुमानगढ़ी में चार पट्टी हैं, जिसके चार महंत होते हैं और एक गद्दीनशीन यानी प्रमुख होता हैं। रामानंदी संप्रदाय के निर्माणी अखाड़े के अंतर्गत वैष्णो साधु होते हैं जो चार पट्टी में विभक्त हैं- उज्जैनिया, सागरिया, बसंती और हरिद्वारी। यह 4 महंत हनुमानगढ़ी के प्रधानमंत्री होते हैं। इनके ऊपर एक राष्ट्रपति हैं,जिसे गद्दीनशीन कहा जाता है।  हनुमानगढ़ी के प्रथम गद्दीनशीन अभयरामदास महाराज थे । हनुमानगढ़ी में वर्तमान गद्दीनशीन प्रेमदास हैं, जो 51वें गद्दीनशीन पर आसीन हैं। वर्तमान समय में सगरिया पट्टी के गद्दीनशीन बनाए गए हैं।

गद्दीनशीन के चयन की प्रक्रिया:-

चार पट्टी के 3-3 लोगों का नाम अखाड़े में भेजा जाता है। अखाड़े के लोग चुनाव करते हैं कि वह व्यक्ति गद्दीनशीन बनने योग्य है या नहीं। चुनाव होने के बाद अखाड़ा पास करता है। उसके बाद बैठक होती है। बैठक में वरिष्ठ संत अखाड़े के लोग यह तय करते हैं कि कौन बनेगा गद्दीनशीन। फिर उसके बाद चुनाव होता है। तब सर्वसम्मति से गद्दीनशीन अपने आसन पर विराजमान होते हैं। गद्दीनशीन 60 वर्षों के बाद बनाए जाते हैं। जब उम्र का पड़ाव अंतिम छोर पर होता है। मोह माया तमाम चीजों से व्यक्ति दूर हो जाता है।उस समय उस व्यक्ति को गद्दीनशीन पर बैठाया जाता है ।

हनुमान जी का स्वरूप ही होते हैं गद्दीनशीन :-

हनुमानगढ़ी पंचायती अखाड़ा का मठ है। यहां महंत गद्दीनशीन की नियुक्ति गुरु-चेला की परंपरा पर आधारित नहीं होती है। इसका निर्णय पंचांयत अखाड़ा लेता है। उसी प्रकार चारों पट्टिओं के महंत की नियुक्ति भी पंचांयत अखाडे ही करते हैं। यहां पर सब को एक समान का अधिकार होता है। परंपरा के अनुसार गद्दीनशीन का पद संभालने के बाद हनुमानगढ़ी के अपने नियम और संविधान के अनुसार गद्दी नशीन महंत अपने अंतिम पड़ाव तक हनुमानगढ़ी के परिसर में ही रहता है। 52 एकड़ में फैले हनुमानगढ़ी का परिसर के बाहर गद्दीनशीन नहीं निकलता है। मृत्यु के बाद ही उनका शरीर परिसर के बाहर जा सकता है। गद्दीनशीन हनुमान जी की गद्दी मानी जाती है। ऐसे में उस पर आसीन होने वाले महंत को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।उस गद्दी पर आसीन होने वाले व्यक्ति का सिर्फ एक ही काम है। वह भगवान का भजन करें और आए हुए भक्तों को आशीर्वाद दे। गद्दीनशीन प्रसिद्ध सिद्ध गद्दी है। अगर गद्दीनशीन का किसी परिस्थितियों में तबीयत या कोई आरोप- प्रत्यारोप लगता है तो डॉक्टर से लेकर कोर्ट का प्रतिनिधिमंडल भी गद्दीनशीन यानी हनुमानगढ़ी परिसर में ही आएगा। गद्दीनशीन बाहर नहीं जाएगा। महंत कि जब तक मृत्यु नहीं होती है तब तक वह गद्दी पर आसीन रहता है।


लेखक :-

आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.