Saturday, February 21, 2026

महाराज कुमार बाबू रंगनारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' (बस्ती जनपद के छंदकार संख्या 31)::आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

(नोट: रंगपाल जी से संबंधित 3 अन्य कड़ियां इसी शृंखला में पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें कड़ी संख्या 06 दिनांक 16 अप्रैल 2017 को परिचयात्मक रूप में; कड़ी संख्या 08 दिनांक 19 मई 2017को शृंगार रस के रूप में तथा कड़ी संख्या 18 दिनांक 07 मार्च 2020 को फाग गीत के रूप में पढ़ा जा सकता है।)
जीवन परिचय 
दरदीदिल की दरदको दरदी दिलहीजनाय। 
बेदरदी जानै कहां रंगपाल मुस्काय। 
   रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती मण्डल के नव सृजित सन्तकबीरनगर के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी, तदनुसार 20 फरवरी सन1864 ई को हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर वत्स पाल तथा माता का नाम श्रीमती सुशीला देवी था। कवि के बचपन का नाम रंग नारायण पाल जू वर्मा था। उनके पिता श्री विश्वेश्वर बक्श पाल जमींदार थे। पिता के विषय में स्वयं रंगपाल जी ने अपने ग्रंथ “वीर विरुद्ध” की पूर्णता के समय लिखा था। इसमें उनके वंश परम्परा का संक्षिप्त परिचय मिलता है - 
छत्रिय प्रवर सूर्यवंश रामचंद्र कुल 
ठाकुर प्रसाद पाल वीर वर दानिये ।
ईश्वरी प्रसाद पाल तिनके तनय अरु,
तिनके विश्वेश्वर बक्श पाल जानिए।
तिनको है सुत रंगपाल नाम धाम ग्राम, हरिहर पुर सरवार देश मानिए ।
ग्रंथ 'वीर विरुद्ध' बखान्यो विक्रमीयशुभ,
संवत उन्नीस सौ उन्यासी सुखखानिये।।

कवियित्री मां से मिली प्रेरणा
माता सुशीला देवी संस्कृत और हिंदी की विद्वान थीं। कवि पर अपनी माता का प्रभाव गहरा था। वही उनके बचपन की गुरु थीं। उनके पिता जी राजा महसों के राज्य के वंशज थे। वे एक समृद्धशाली तालुक्केदार थे। वे साहित्यिक वातावरण में पले हुए थे । विदुषी मा के सानिध्य और साहित्य का अटूट लगाव का पूरा प्रभाव रंगपाल पर पड़ा, जिसका परिणाम था कि स्कूली शिक्षा से एकदम दूर रहने वाले रंगपाल में संगीत की गहरी समझ आ गई थी। 
   ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान’ के भाग 1 में शोध कर्ता डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 59 से 90 तक 32 पृष्ठों में रंगपाल जी का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने इन्हें द्वितीय चरण के प्रथम कवि के रुप में चयनित किया है। वह एक आश्रयदाता, वर्चस्वी संगीतकार तथा महान कवि के रुप में प्रतिस्थिापित हुए हैं। उनके आश्रय में कवि महीनों उनके सान्निध्य में रहते थे और उन्हें बहुत सामान तथा पैसा के साथ वे विदा करते थे। उनकी शादी 18 वर्ष की उम्र में हुई थी। 
     युवा मन, साहित्यिक परिवेश, बचपन से ही तमाम कवियों व कलाकारों के बीच रहते-रहते उनके फाग में भाषा सौंदर्य श्रृंगार पूरी तरह रच-बस गया था। 
भाषा व श्रृंगार से ओतप्रोत
होली में रंगपाल के फाग का रंग बरसने लगता है। उनकी अंगादर्श, रसिकानंद, सज्जनानंद, प्रेम लतिका, शांत रसार्णव, रंगउमंग और गीत सुधानिधि, रंग महोदधि, ऋतु रहस्य , नीति चंद्रिका, मित्तू विरह वारीश, खगनामा, फूलनामा, छत्रपति शिवाजी, गो दुदर्शा, दोहावली तथा दर्पण आदि रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं में मधुरता के भाव, देसी अवधी ब्रजभाषा, भोजपूरी भाषा मिठास का भाव समाहित है। वसंत ऋतु से ही ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा-गांव-गांव सुनाई पड़ने लगते हैं। होली निकट आते ही इनके फागों की मिठास फिजा में घुलने लगी है।
प्रकाशित रचनायें :- 
उन्होंने अंगादर्श, रसिका नन्द, सज्जनानंद, प्रेम लतिका, शान्त रसार्णव, रंग उमंग और गीत सुधानिधि आदि थे। 
अप्रकाशित रचनाएं
अप्रकाशित ग्रंथों में रंग महोदधि, ऋतु रहस्य , नीति चन्द्रिका, मित्तू विरह वारीश, खगनामा, फूलनामा, छत्रपति शिवाजी, वीर विरुद,गो दुदर्शा, दोहावली तथा दर्पण आदि हैं। “छत्रपति शिवाजी” और “वीर विरुद्ध” के सैकड़ो छंद "सुकवि" और "रसराज" आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी में अनेक कवियों , संभा्रन्त जनों तथा पत्र पत्रिकाओं के पते तथा लिंक मिले है। 
    अपने शोध के दौरान स्मृति शेष डॉ. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’जी को बस्ती के कवि श्री भद्रसेन सिंह भ्रान्त/बन्धु से अनेक पाण्डुलिपि व डायरी देखने को मिली थी। जिससे उनका शोध प्रवन्ध बहुत ही प्रमाणिक बन पड़ा है। रंगपाल की कृतियों में सामाजिक समरसता, भाईचारा और सांप्रदायिक सौहार्द की झलक नजर आती है। ब्रजभाषा में रचनाएं लोक साहित्य की अमूल धरोहर है। फागुनी गीत की मिठास बरबस ही लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेती है। रंगपाल जी के फाग की देश में ही नहीं विदेशों में भी धूम रहती है। पुरानी परंपरा, मर्यादा, संस्कृति, सब भूलकर हम नई संस्कृति में जा रहे हैं, जो अपने मातृ भूमि के साथ धोखा है। मधुरता, भाव, देशी अवधी ब्रजभाषा, भोजपूरी भाषा मिठास का जो भाव मिलेगा वह किसी और में नहीं मिलेगा। रंगपाल जी की मृत्यु 62 वर्ष की अवस्था में भाद्रपद कृष्ण 13 संवत 1993 विक्रमी /1936 ई. में हुआ था। हरिहरपुर नगर पंचायत के राजघाट पुल के पास महाकवि रंगपाल का अंतिम संस्कार किया गया था। श्री रामभरोस पांडे, श्री भगवान दास गुप्त ने स्थानीय लोगों के सहयोग से समाधि स्थल का निर्माण करवाया था। जिसका लोकार्पण कवि रामधार त्रिपाठी ने 4 मार्च 1978 को किया था। हरिहरपुर नगर पंचायत की पहचान इन्हीं से जानी जाती है।
रंगपाल जी अविस्मरणीय हैं
महाकवि रंगपाल लोकगीतों, फागों व विविध साहित्यिक रचनाओं में आज भी अविस्मरणीय हैं। दुनिया भर में अपने फाग गीतों से धूम मचाने वाले महाकवि रंगपाल अमर हैं। फाल्गुन मास लगते ही “सखि आज अनोखे फाग ..../ बीती जाला फाल्गुन ,आए नहीं नंदलाला से …” रंगपाल के फाग का रंग बरसने लगता है। आज रंगपाल की धरती पर ही, फाग विलुप्त हो रहा है। इक्का-दुक्का जगह ही लोग फाग गाते हैं। महाकवि के जन्म स्थली पर संगोष्ठी के साथ फाग व चैता का रंग छाया रहा। 
झूमर फाग
एक झूमर फाग में महाकवि रंगपाल ने श्रीकृष्ण व राधा के उन्मुक्त रंग खेलने का मनोहारी चित्रण कुछ इस तरह किया है -
सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।
बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।
खेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत गोरी।
सखी फागुन बीति जाला, नहीं आये नंदलाला।
प्रेम बढ़ाय फंसाय लियो।
     रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अन्र्तात्मा में गूंज रहे थे। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। 
वियोग श्रंगार 
वियोग श्रंगार का उनके एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है - 
ऋतुपति गयो आय हाय
गुंजन लागे भौंरा।
भयो पपीहा यह बैरी,
नहि नेक चुपाय।
लेन चाहत विरहिनि कै
जिमरा पिय पिय शोर मचाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।
विरहि करेज रेज बैरी मधु 
दिये नेजन लटकाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
अजहुं आवत नहीं दैया, 
मधुबन रहे छाय।
रंगपाल निरमोही बालम, 
दीनी सुधि बिसराय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
      रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है -
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
राज प्रजा नर नारि सब 
घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।
होरी होरी है।
बरस बरस को दिन मन भायो, 
हिलि मिलि सब खेलहुयार।
होरी होरी है।
रंगपाल असीस देत यह 
सब मगन रहे फगुहार।
होरी होरी है।
यहि द्वारे मंगलचार 
होरी होरी है।
    रंगपाल जी भक्ति भावना उनके शान्त रसार्णव गंथ में सूर तुलसी तथा मीरा को भी मात देती है -
बोलिये जो नहिं भावत तो 
एक वारहि आंखि मिलाई तो देखो।
जो नहि हो तो सहाय कोऊ 
लखि दीन दशा पछताय तो देखो।
रंग जू पाल पिछानतो नाहिं
कछु कहि धीर धराइ तो देखो।
छोरि विपत्ति तो लेतो नहिं, 
भलाबुन्द दुह आंसू गिराय तो देखो।।

देखत काहि सोहाय भला अरु 
को दृग जोरि कै नय सुख जोवै।
कौन सुनै गुनै पाछिलिहि प्रीतिहि 
यातेन काहूय जाय कै रोवै।
रंग जू पाल पड़े सो सहै औ 
रह्यो सह्यो भ्रम काहू पै खोवै।
वर्षा गीत
वर्षा गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है, जिसमें मनभावन छटा झलकता है-
मुदित मुरैलिन के कूकत कलापी आज,
तैसे ही पपीहा पुंज पीकहि पुरारै री।
लपटि तरुन लोनी लतिका लवंगन की ,
चहुं दिशि उमगि मिले हैं नदी नारे री।
रंगपाल एरी बरसा की य बहार माहि,
आये नहि हाय प्रान प्रीतम हमारे री।
धूरिये धारे धुरदान, चहु धाय धाय,
गरजि गरजि करैं हियै में दरारे री।।
    इसी क्रम में बसन्त ऋतु का एक चित्रण दर्शनीय है -
भूले भूले भौंर चहु ओर भावंरे से भरैं,
रंगपाल चमके चकोर समुदाई है।
कुसुमित तरु जू भावन लगे हैं मन,
गावन त्यों कोकिल को गांवन सुहाई है।
सुखप्रद धीरे धीरे डोलत समार सीरो,
उड़त पराग त्यों सुगंध सरसाई है।
विपिन समाज में दराज नवसाज भ्राज,
आज महाराज ऋतुराज की अवाई है।।
शरद गीत
शरद गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है इसकी छटा भी निराली है -
अमल अवनि आकाश चन्द्र प्रकाश रास हरि।
कुंद मालती कासकंस कुल विमलक सर सरि।
चंहकित हंस चकोर भंवर धुनि खंजन आवन।
पूजन पितृ सुदेव सुखिन मगधावनि धावन।।
अरु उदित अगस्त पयान नृप दीपावलि गृहचित्र तिमि।
घन श्वेत साजहू वरनि के रंगपाल ऋतु सरद इमि।।
 वरिज विकास पर मालती सुवास पर ,
माते मधु पालिनी के सरस विलास पर।
भनय रंगपाल निम लाई आस पास पर ,
कुसुमित कास पर हंसन हुलास पर।
फैली अलबेली आज सुषमा सरद वारी,
जलज निवास पर अवनि अकास पर।
तारागण भास पर चांदनी सुहास पर,
चन्द्र छवि रास पर राधा वर रास पर।।
डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस द्वारा मूल्यांकन :- 
“रंगपालजी ब्रज भाषा के प्राण थे। श्रृंगार रस के सहृदयी कवि और वीर रस के भूषण थे। उन्होंने अपने सेवाओं से बस्ती जनपद छन्द परम्परा को गौरव प्रदान किया। उनके छन्दों में शिल्प की चारुता एवं कथ्य की गहराई थी। साहित्यिक छन्दों की पृष्ठभूमि पर लिखे गये फाग उनके गीत संगीत के प्राण हैं। रीतिकालीन परम्परा के समर्थक और पोषकरंगपालजी की रचनाओं में रीतिबद्ध श्रृंगार और श्रृंगार बद्ध मधुरा भक्ति का प्रयोग उत्तमोत्तम था।......आपकी रचना भारतेन्दु जी के समकक्ष है।..... आपका युगान्तकारी व्यक्तित्व साहित्य के अंग उपांगों को सदैव नयी चेतना देगा एसा विश्वास है।”
संस्कृतिक विभाग से रचनाओं का संग्रहण 
उत्तर प्रदेश संस्कृतिक विभाग के माध्यम से उनकी रचनाओं को संग्रहित- संकलित कर परीक्षण कराने का प्रयास हो रहा है। अपने कार्यकाल के दौरान रंगपाल की कृतिया और उनसे जुडे साज सामान कोसांस्कृतिक धरोहर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पाल सेवा संस्थान तथा उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग प्रति वर्ष पाल जी के जन्म का उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने कहा कि रंगपालजी की समाधि स्थल जो कष्टहर्णी नदी के स्थल पर है काफी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। मरम्मत कराने के साथ ही संग्रहालय बनाने की जरूरत है। 
    हरिहरपुर में मशहूर कवि जो रंगपाल जी के साथ कविता लिखते हैं - बद्री प्रसाद, आद्या प्रसाद, शिवेन्द्र, शिवबदन चतुर्वेदी, मातादीन त्रिपाठी के स्मृति में मुख्य चौराहे पर पांच मूर्तियां लगाने के लिए जिला अधिकारी से आग्रह किया जा चुका है।
रीतिकालीन कवियों के आश्रय दाता
कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रयदाता कवियों में गिने जाते हैं। उनकी फाग रचनाओं में जहां श्रृंगार रस की प्रधानता है तो वहीं देशभक्ति के गीतों में वीर रस का समावेश है। उनके देशभक्ति के गीतों में महान सपूतों और वीरांगनाओं की वीरता का रोमांचक वर्णन है।
कालजयी रचनाएं
कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएं देश भक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। 
रंगपाल के फाग’ प्रकाशित 
श्री राधेश्याम श्रीवास्तव श्याम हरिहरपुरी संत कबीर नगर द्वारा संपादित तथा चैहान पब्लिकेशन्स सैयद मोदी स्मारक गीताप्रेस गोरखपुर से ‘रंगपाल के फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें रंग उमंग भाग १ व भाग २ तथा रंग तरंगिणी का अनूठा संकलन किया गया है। इसमें विविध उमंगों में फाग के विविध प्रकारों को श्रेणीबद्ध किया गया है। डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने अपने शोध ग्रंथ बस्ती के छन्दकार में रंग उमंग के दोनों भागों का प्रकाशन की सूचना दी है। यह हनुमानदास गया प्रसाद बुकसेलर नखास चैक गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है।
लोकगीत अंतरात्मा में गूंजते हैं 
रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अंतरात्मा में गूँजते रहे हैं। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। 
 मंगलाचरण :- 
फाग गीतों के संयोग और वियोग दोनो पक्षों को उजागिर किया गया है। दोनों के प्रारम्भ में दो-दो दोहों में मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया है- 
आनन्द मंगल रास रस हसित ललित मुख चंद।
रंगपाल हिय ललित नित , ध्यान युगल सुखचन्द।
रंग उमंग तरंग अंग , रस अमंग सारंग।
रंगपाल बाधा हरण, राधा हरि नव रंग।।
रंग उमंग भाग 1 में 32 पृष्ठ है। कुछ छन्द प्रस्तुत हैं - 
ऋतु कन्त बिन हाय, लगो जिय जारने।
बिरहिन बौरी कान आम ये बौरे बौरे।
गुंजत भुंग गात मत्त मधु दौरे मधु दौरेभौरे।
बैरी विषय पपीहा पिय पिय यह लागी शोर मचाय -बानसो मारने।।1।।

फूले टेसु अनार और कचनार अपारे।
दहके जन चहुं ओर जो निरपूम अंगारे।
बीर समीर सुगंध बगारत,
बिरहांगिनियां थपकाय लगे अब बारने।2

अमितपराग उड़ातजात लखि चित्त उड़ाई।
करि चहचही चकोर देत् हठि चेत भगाई।
कारी कोइलिया दई मारी,
दिन रतियां कूक सुनाय लगी हियफारने।3

पीर भीर मैं धीर धरहूं को नहिं आवै।
रहै लोक की लाज चहै जावै मन भावै।
करि योगिनी को भेष भ्रमब अब
सखि रंगपाल वलि जाय पिया कारने।4।

झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है। –
अति धूमधाम की आज होरी ह्वै रही।
डारहिं केसर रंग झपट भरि भरि पिचकारी
झमकिअबीर की झोरिझेलिदेवैकिलकारी।
मेलहिं मूठ गुलाल परसपर ,
क्वउ रहत नहीं कुछ बाज होरी ह्वै रही।1

कहहिं कबीर निशंकझूमिझुकिबांहपसोरी।
उछल विछलि मेड़राय विहंसिदेवै करतारी।
नाचत गावत भाव बतावत,
बहु भांति बजावहिं बाज होरी रही।।।2।।

विविध स्वांग रचि हंसि हंसाय देवैं होहकारी।
फूले अंग न समहिं नारि गन गावै गारी।
पुलकित आनंद छाक छके सब,
सजिनिज निज साज समाज होरी ह्वै रही।
ढपटि लपटि मुख चूमि लेहि घूुघट पर टारी।।
रोरी मलहिं कपोल भजहिं कुमकुमा प्रहारी।
रंगपाल तजि लाज गई भजि ,
मदन को राज होरी ह्वै रही।।4।। 

चैताली झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है यह कैसी बानि तिहारी अहो प्रीय प्यारी।
बैठी भोहें तानि जानि क्यों होहु अनारी।
आपुते लीजे जानि बिरह दुख कैसो भारी।
लेति बलाय एक तूहि बलि ,
जियरा की जुड़ावन हारी अहो पिय प्यारी।।1।।
केती इत उत करहिं अनैसी झूठी चोरी।
मुख पर चिकनी बात, देहिं पीछे हंसि तारी 
आगे आगि लगाये कुटिल पुनि ,
बनि जांहि बुझावन हारी अहो पिय प्यारी।।2।।
रंग उमंग भाग 1 के एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है-
ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा।
भयो पपीहा यह बैरी, नहि नेक चुपाय।
लेन चाहत विरहिनि कैजिमरा पिय पिय शोर मचाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।
विरहि करेज रेज बैरी मधु दिये नेजन लटकाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
अजहुं आवत नहीं दैया, मधुबन रहे छाय।
रंगपाल निरमोही बालम, दीनी सुधि बिसराय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।

रंग उमंग भाग 2 :-
प्रथम भाग की तरह रंग उमंग भाग 2 फाग गीतों की बासंती छटा विखेरता है। वे ना केवल रचयिता अपितु अच्छे गायक भी थे। सारे गीत बड़े ही मधुर हैं। कुछ के बोल इस प्रकार हैं-
हाय बालम बिनु दैया।
पिय बनही से बोलो उनहीं के घूघट खोलो,
कहो कौन की चोरी फगुनवा में गोरी ,
दोउ खेलत राधा श्याम होरी रंग भरी,
सखि आज बंसुरिया बाला, गजब करि डाला,
कहां बालम रैनि बिताये भोर भये आये।।
आदि गीत मनको बरबस हर लेते हैं। रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
राज प्रजा नरनारि सब घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।होरी होरी है।
बरस बरस को दिन मन भायो,
हिलि मिलि सब खेलहुयार।
होरी होरी है।
रंगपाल असीस देत यह सब मगन रहे फगुहार।
होरी होरी है।
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
‘रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक के उमंग भाग 4 एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है। यह गीत रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है-
सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।
बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।
रेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत झोरी।
कुमकुम चोट चलाय परस्पर ,
अति बिहंसहिं युत अनुराग,
बरसहिं सुमन कली ।।1।।
तिहि छल छलिया छैल बरसि रंग करि रस बोरी ।
प्यारी की मुख चूमि मली रोरी बरजोरी ।
तबलौं आतुर छमकि छबीली,
छीनी केसरिया पाग लीनी पकर अली।।2।
चुनि चूनरि पहिराय दई रोरी अंजन बरजोरी 
नारि सिंगार बनाया कपोलन मलि देई रोरी।
तारी दै दै हंसति कहति सब,
बोलहुं किन श्याम सभाग सुनियत रामबली।।3।।
अपनों करि पुनि छोड़ि कहति नन्द किशोरी 
भूलि न जइयो बीर रंगीली आज की होरी ।
रंगपाल वलि कहहिं देवगन,
धनि धनि युग भाग सुहाग-अली प्रेम पली।।
सखि आज0।।
     रंग उमंग भाग 1 व 2 की तरह गीत सुधा निधि में डा. सरसजी ने 200 फाग व होरी गीतों तथा कजली गीतों के प्रकाशन की सूचना दी हैं। यह ग्रंथ प्रथम बार पूना बाद में गोरखपुर से प्रकाशित हुई है। सम्पूर्ण पुस्तक में प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में वर्णन का वियोग और संयोग पक्ष अपने में न्यारा है। एक छन्द प्रस्तुत है-
गरजत मंद मंद घन घेरे,
बरसत झर झर सलिलि दामिनी दम कि रही चहुं फेरे।
झिल्ली गन दादुर धुनि पूरित पिय पिय पपिहन टेरे।
मत्त मुरैलिन मध्य मोर नचि कूकत धाम मुड़ेरे।
झूलत मुदित प्रिया अरु प्रीतम, दोउ मणि मंदिर मेरे।
अलि मडराहिं सहस सौरभ लहि देति चंबर अलि फेरे।
रंगपाल बारत रति कामहिं उपमा मिलत न हेरे।।
     कवि रंगपाल को उनकी उत्कृष्ट रचना के लिये हिंदी साहित्य के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद जी ने उन्हें महाकवि की उपाधि से अलंकृत किया था। यों तो कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएँ देशभक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों कीलोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रय दाता कवियों में गिने जाते हैं। 

लेखक का परिचय
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वर्डसैप्प नम्बर + 91 9412300183)







Friday, February 20, 2026

अयोध्या राजशाही की वर्तमान समय की विभिन्न गतिविधियां और राजसदन को उच्चीकृत किया जान :: ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


शैलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र वर्तमान प्रमुख हैं 

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात हुआ था। विमलेंद्र मिश्रा के छोटे भाई शैलेंद्र प्रताप मिश्र अयोध्या के साकेत महा विद्यालय की प्रबंध समिति के अध्यक्ष हैं।

वेअयोध्या राजवंश से जुड़ी व्यवस्था को देखते हैं। विमलेंद्र के निधन के बाद, उनके छोटे भाई शैलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र इस परंपरा और राजवंश के संरक्षक के रूप में जाने जाते हैं, जो अयोध्या के सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सक्रिय हैं।

अपर्णा मिश्र

अपर्णा मिश्र अयोध्या के राजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की वंशावली में चौथी पीढ़ी में राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की पाँचवीं सन्तान के रूप में हैं। डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्व विद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। साहित्य के अध्ययन, अनुशीलन के साथ ही अपर्णा मिश्र ने संगीत की भी शिक्षा ली है। वे आकाशवाणी केन्द्र, लखनऊ की अवधी लोकगायन विधा में ‘बी-हाई ग्रेड’ की नियमित कलाकार हैं। सन् 2003 से अयोध्या स्थित महाराजा पब्लिक स्कूल का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए उसकी अवैतनिक निदेशिका के तौर पर कार्यरत हैं। उन्हें अवधी के लोकगीतों के संरक्षण और संकलन में विशेष रुचि है। 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार ने मलाला दिवस के अवसर पर, जिसे ‘कन्या शिक्षा और सुरक्षा दिवस’ घोषित किया गया है, इन्हें सम्मानित किया। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

मंजरी मिश्रा

विमलेंद्र प्रताप मिश्र की मंजरी मिश्रा बेटी है। जो मां की स्मृति में कला शिल्प की एक संस्था “शिल्प मंजरी” चलाती है। राजकुमारी मंजरी मानती हैं, कि “वह बहुत भाग्यशाली थीं कि, उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जिसकी इतनी समृद्ध विरासत रही है।” वह अवध में ही पली- बढ़ीं हैं। राजकुमारी मंजरी मिश्र का अपना खुद का व्यवसाय है, जिसमें वह साड़ी, कपड़ा और आभूषणों का व्यापार करती हैं। उनके ब्रांड का नाम "शिल्प मंजरी" है। अयोध्या या अवध अपनी पारंपरिक हस्तकला जैसे आरी, जरदोजी और चिकनकारी के लिए प्रसिद्ध है। इस हुनरमंद काम को करने वाले कई कारीगर अयोध्या और फैजाबाद में रहते थे तथा पीढ़ियों से मिश्र परिवार के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन चूँकि स्थानीय स्तर पर उनके लिए पर्याप्त काम नहीं था, इसलिए इनमें से कई कारीगरों को जीविकोपार्जन के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ता था। हालांकि राजकुमारी मंजरी मिश्र इनके लिए अँधेरे में चिराग लेकर आई, और "शिल्प मंजरी" नामक एक शिल्प परियोजना उन्होंने इन्हीं कारीगरों की मदद करने के लिए शुरू की है। इस परियोजना के माध्यम से, वह कई होनहार कारीगरों को रोजगार देती है, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम होते हैं।

यतींद्र मोहन प्रताप मिश्र 

विमलेंद्र प्रताप मिश्र के बेटे यतींद्र प्रताप सहित्यकार हैं। यतीन्द्र मिश्र युवा हिन्दी कवि, सम्पादक, संगीत और सिनेमा अध्येता हैं। वे  प्रख्यात संगीतकार और राष्ट्रीय कवि हैं। यतींद्र ने लता मंगेशकर पर ‘लता सुर गाथा’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जिस पर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।उनके अब तक चार कविता- संग्रह- ‘यदा-कदा’, ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’, ‘ड्योढ़ी पर आलाप’ और ‘विभास’; शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर एकाग्र ‘गिरिजा’, नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद पर आधारित ‘देवप्रिया’ तथा शहनाई उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के जीवन व संगीत पर ‘सुर की बारादरी’ प्रकाशित हैं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर ‘विस्मय का बखान’, कन्नड़ शैव कवयित्री अक्क महादेवी के वचनों का हिन्दी में पुनर्लेखन ‘भैरवी’, हिन्दी सिनेमा के सौ वर्षों के संगीत पर आधारित ‘हमसफ़र’ के अतिरिक्त फ़िल्म निर्देशक एवं गीतकार गुलज़ार की कविताओं एवं गीतों के चयन क्रमशः ‘यार जुलाहे’ तथा ‘मीलों से दिन’ नाम से सम्पादित हैं। गिरिजा’ और ‘विभास’ का अंग्रेज़ी, ‘यार जुलाहे’ का उर्दू तथा अयोध्या शृख़ला कविताओं का जर्मन अनुवाद प्रकाशित हुआ है। इनके अतिरिक्त वरिष्ठ रचनाकारों पर कई सम्पादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ फैलोशिप, रज़ा सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, हेमन्त स्मृति कविता सम्मान सहित भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय की कनिष्ठ शोधवृत्ति एवं सराय, नयी दिल्ली की स्वतन्त्र शोधवृत्ति मिली हैं। इन्होंने दूरदर्शन (प्रसार भारती) के कला-संस्कृति के चैनल डी.डी. भारती के सलाहकार के रूप में सन् 2014-2016 तक अपनी सेवाएँ दी हैं।    

     साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु भारत के प्रमुख नगरों समेत अमेरिका, इंग्लैण्ड, मॉरीशस एवं अबु धाबी की यात्राएँ की हैं। अयोध्या में रहते हैं तथा समन्वय व सौहार्द के लिए ‘विमला देवी फाउण्डेशन न्यास’ के माध्यम से सांस्कृतिकगतिविधियाँ संचालित करते हैं।

      दिनांक 7 अप्रैल 2017 को फिल्म समारोह निदेशालय, भारत सरकार द्वारा वाणी प्रकाशन से आई यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक 'लता सुर-गाथा' को 'स्वर्ण कमल' से सम्मानित करने की घोषणा की गयी थी। वह विविध भारती में अपनी सेवा दे चुके हैं. अभी विमलेंद्र मिश्र मां विमला देवी के नाम से समाजसेवी संस्था 'विमला देवी फाउंडेशन न्यास' चलाते हैं. संस्‍था राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, संगीत, कला के लिए काम करती है.यतीन्द्र मोहन प्रताप मिश्र ख्यातिलब्ध साहित्यकार होने के साथ- साथ विविध भारती के सलाहकार के पद पर कार्यरत हैं। वे प्रख्यात संगीतकार और राष्ट्रीय कवि हैं। यतींद्र ने लता मंगेशकर पर ‘लता सुर गाथा’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जिस पर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

राजमहल को हेरिटेज होटल की शक्ल देकर नयी पहचान देने की कोशिश

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान्  श्रीराम की नगरी में आध्यात्म के साथ-साथ धार्मिक नगरी की शानो शौकत का प्रतीक अयोध्या राजपरिवार का राजमहल को अब हेरिटेज होटल की शक्ल देने की तैयारी पूरी की जा रही है और इसका खाका तैयार कर लिया गया है। प्रदेश सरकार से इसकी अनुमति भी मिल गयी है। अयोध्या नगर के बीचों बीच स्थित राजसदन के विशाल प्रांगण में अयोध्या के राजपरिवार के सभी सदस्य रहते हैं, लेकिन अयोध्या राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के अनुरोध पर प्रदेश सरकार ने इस राजमहल को एक हेरिटेज होटल के रूप में विकसित करने का रास्ता साफ़ कर दिया है। वहीं राजपरिवार ने भी हेरिटेज होटल के रूप में राजसदन का पंजीकरण करा लिया है।

आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस होगा

दुनिया में धार्मिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध अयोध्या को विश्व के पर्यटन मानचित्र पर उभारने के लिए राजस्थान और मध्य प्रदेश के पुराने शहरों में स्थित राज महलों की तर्ज पर अयोध्या राजवंश परिवार के राजसदन को हेरिटेज होटल की शक्ल के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसके लिए निर्माण सम्बन्धी खाका तैयार किया जा रहा है। राजमहल के विशाल परिसर में स्थित सुन्दर भवन और उसमें बने विभिन्न कमरों का रंग रोगन कर उन्हें नर्इ शक्ल दिए जाने की योजना है। वहीं परिसर में मौजूद प्राचीन स्थापत्य कला के नमूनों को भी संरक्षित कर उन्हें पर्यटकों के सामने पेश करने की योजना है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)







 


आजादी के बादअयोध्या की राजशाही: विमलेंद्र मिश्र 'पप्पू भइया' राजसदन के मुखिया ✍️ आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


विमला देवी “बच्ची साहिबा”अयोध्या की राजमाता 

राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को अयोध्या का राजा घोषित किया गया था, और उन्होंने 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू होने तक अयोध्या राज पर शासन किया था। उनका शासन काल 1909 से 1955 तक रहा। राजा जगदंबिका प्रताप की एक ही ही बेटी थीं विमला। उनके पुत्र नहीं था। विमला की शादी डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र से हुई थी। बाद में जगदंबिका प्रताप सिंह ने विमला देवी बच्ची साहिबा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने दामाद डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र बच्चा साहब को गोद लिया था। जिन्होंने स्वतंत्र भारत में अयोध्या राज की कमान संभाली और विधान परिषद के लिए चुने गए। दामाद जी का परिवार भी ब्राम्हण रहा। गोद लेने के बाद ही इस राजपरिवार के सदस्यों के नाम के आगे मिश्रा उपनाम जुड़ा।

विमलेंद्र मिश्र 'पप्पू भइया' राजसदन के मुखिया 

महारानी विमला देवी बच्ची साहिबा के दो पुत्र विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राजा साहब और शैलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र हुए, जिसमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के बड़े होने के कारण उन्हें इस राजवंश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और उन्हें राजा अयोध्या के रूप में जाना जाने लगा। वे अयोध्या के राज परिवार के मुखिया के रूप में उभरे।

असल में अयोध्या के राजा विमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र जी मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिला के बेहटा गाँव के थे. इनका गोत्र काश्यप और पुर महुलार्क (महरसिया) था. इनके पिता स्वर्गीय डॉक्टर रमेन्द्रमोहन मिश्र जी का विवाह महाराज अयोध्या की राजकुमारी से हुआ था. चूंकि अयोध्या महाराज को कोई पुत्र नहीं था, इसीलिए उनको अयोध्या महाराज ने अयोध्या में ही घर जमाई बनाकर रख लिए थे.

श्रीमती ज्योत्सना मिश्रा पति से पहले दिवंगत हुई थी 

राजा विमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र का विवाह ज्योत्सना मिश्रा से हुआ था। उनकी धर्मपत्नी ज्योत्सना मिश्रा का निधन 63 वर्ष की आयु में हो गया। वह अस्वस्थ चल रही थीं। ब्रेन हैमरेज की शिकायत के बाद उन्हें लखनऊ के एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। वहां उनकी सर्जरी भी हुई और उनका स्वास्थ्य सुधार की ओर था कि अचानक सायंकाल उनके सभी अंग शिथिल हो गये और वह बच नहीं पाई। उनका अंतिम संस्कार सरयू तट के किनारे शुक्रवार की सुबह किया जाएगा। सूचना मिलते ही लोग शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए राज सदन पंहुचने लगे। सांसद लल्लू सिंह, सपा के पूर्व मंत्री तेजनारायण पांडे, विधायक वेद प्रकाश गुप्ता, पूर्व अध्यक्ष अभिषेक मिश्र, पूर्व मेयर ऋषिकेश उपाध्याय, मेयर गिरीश पति त्रिपाठी, हनुमान गढ़ी के पुजारी रमेश दास, अंशुमान पाठक, सुनील अवस्थी, राहुल सिंह, अभय यादव निरंकार पाठक, और अजीत सिंह विशेन आदि मौजूद रहे।


 डॉ. अपर्णा मिश्रा 

राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की तीसरी और चौथी संतान के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। पाँचवीं सन्तान के रूप में डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसीविश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

     पूर्व उत्तराधिकारी राजा विमलेंद्र मोहन मिश्रा जी को श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट का भारत सरकार द्वारा ट्रस्टी और रिसीवर नियुक्त किया गया है। इन्होने इसके लिए पूर्व में श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट को दस एकड़ जमीन दान दे रखा है।  

विमलेंद्र का बचपन कड़ी सुरक्षा में  विमलेंद्र अयोध्या राजवंश में कई पीड़ियों के बाद जन्म लेने वाले पुरुष उत्तराधिकारी थे। उनसे पहले तक गोद लिए हुए बेटों को ही राजवंश की विरासत सौंपी जाती रही। यही कारण था कि विमलेंद्र का बचपन कड़ी सुरक्षा में गुजरा। महारानी विमला देवी ने उन्हें बाहर पढ़ाने नहीं भेजा, इसकी बजाए स्थानीय स्कूल में ही उनकी शिक्षा हुई। 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें अपनी हम उम्र लड़के साथ खेलने तक की इजाजत नहीं थी।

शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने कई डिग्री कॉलेज और इंटर कॉलेजों की अध्यक्षता की और शिक्षा कोबढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए. महाराजा इंटर कॉलेज, महाराजा पब्लिक स्कूल और साकेत महा विद्यालय जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में उनका विशेष योगदान रहा. उन्होंने अयोध्या में शिक्षा की अलख जगाई और विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य देने के लिए महत्व पूर्ण पहल की.

चुनावी राजनीति में असफल रहे 

वैसे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने 2009 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट से बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाया था। लेकिन वह यहां जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली। बताया जाता है कि महारानी विमला देवी विमलेंद्र के बसपा से चुनाव लड़ने के निर्णय के खिलाफ थीं।हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री ने हराया। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। प्राचीन दौर में अयोध्या का ये राजपरिवार कांग्रेस पार्टी का करीबी माना जाता था। विमलेंद्र प्रताप मिश्र डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश की हेरिटेज योजना की कार्यकारिणी के सदस्य चुने जा चुके थे।

राम मंदिर ट्रस्ट के अहम सदस्य

अयोध्या राजा विमल मोहन प्रताप मिश्रा आरंभ से ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। रामघाट स्थित न्यास कार्यशाला में राम मंदिर के लिए पत्थर की तराशी उन्हीं की जमीन पर हुई। जिसे बाद में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दे दिया है।

     1992 में विवादित ढांचा टूटने के बाद उन्होंने रामलला के विराजमान होने के लिए चांदी का सिंहासन दिया। इसके बाद 5 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो राजा विमलेंद्र मोहन को इसका वरिष्ठ सदस्य बनाया गया। 5 फरवरी 2020 को भूमि पूजन के दौरान राम लला सहित चारों भाइयों केविराजमान होने के लिए उन्होंने पुनः भव्य चांदी का सिंहासन राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दिया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय उन्होंने अयोध्या के वरिष्ठ संतो के साथ अयोध्या की विवाद के समाधान का प्रयास किया।

राममंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका 

जब राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, उसके बाद ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ओर से सबसे पहले जिस वरिष्ठ सदस्य को चुना गया, वे थे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र। तब तक श्रीराम जन्मभूमि परिसर के रिसीवर की जिम्मेदारी अयोध्या के कमिश्नर के पास थी, लेकिन जैसे ही ट्रस्ट अस्तित्व में आया, पहला चार्ज औपचारिक रूप से मिश्र को सौंपा गया। इससे पहले यह प्रभार अयोध्या केआयुक्त के पास था। 

धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित जीवन

उनका जीवन धार्मिक और सामाजिक कार्यों को समर्पित रहा। राजा विमलेन्द्र प्रताप मोहन मिश्र को लोग प्यारसे ‘पप्पू भैया जी’ भी कहते थे। लोग उन्हें अयोध्या का राजा कहकर पुकारने लगे।वहअयोध्या रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य भी थे। वैसे विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य अकेले ऐसे सदस्य रहे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष सभी नेताओं से सम्मान मिलता था। परिवार भले ही राम जन्मभूमि के करीब था लेकिन वह तटस्थ ही रहते थे। यही कारण था कि राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में दोनों ही पक्षों से उन्हें सम्मान मिलता था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब विवादित ढांचा गिरा तब विमलेंद्र प्रताप मिश्र के घर से ही रामलला की प्रतिमा स्थल पर पहुंचाई गई। ये प्रतिमा उनके घर में बने अस्थायी मंदिर में विराजमान थी।

जनता के बीच लोकप्रिय व्यक्तित्व

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र हमेशा अयोध्या की जनता के सुख-दुख में शामिल रहते थे. राज परिवार के दरवाजे आम जनता के लिए हमेशा खुले रहते थे. जो भी व्यक्ति राजसदन आता, उसे सम्मानपूर्वक मुलाकात का अवसर दिया जाता है।

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन

अयोध्या के राजा 75 वर्षीय स्मृति शेष श्री विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में स्थित राज सदन में अपनी अंतिम सांस ली। हाल ही में उनके रेट की हड्डी का ऑपरेशन हुआ था और लखनऊ में इसे चेकअप भी कराया गया था जो सामान्य रहा फिर भी रात के 11:00 बजे उनका बीपी को हुआ और उन्हें श्री राम हॉस्पिटल अयोध्या दिखाया गया जहां उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। उनका निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात  हुआ था। उनका अंतिम संस्कार 24 अगस्त 2025 को सरयू तट पर स्थित बैकुंठ धाम में किया गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र यतींद्र मिश्र ने उन्हें मुखाग्नि दी थी।

     अयोध्या के राजा विमलेंद्र प्रताप की अंतिम यात्रा स्थानीय राज सदन से निकली थी। अयोध्या वासियों ने उन्हें गमगीन माहौल में अंतिम विदाई दी थी। अंतिम यात्रा में जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पूर्व प्रदेश सचिव अवनीश अवस्थी, अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद , राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे समेत कई भाजपा नेता, संत-महंत व अयोध्या वासी सम्मिलित हुए। उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुख जताया था।

असंख्यक संवेदकों की उपस्थिति रही

अयोध्या के राजा विमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र जी के गोलोक गमन का समाचार से अपने संपूर्ण शाकद्वीपी ब्राह्मण समाज के साथ - साथ अयोध्यावासी ,भारतवासी आहत ,मर्माहत है. दुख संवेदना व्यक्त करने वालों में भवेन्द्र मोहन मिश्र, बेहटा वर्तमान में गोरखपुर, हितेंद्र मोहन मिश्र (संजीव मिश्र), बेहटा, शैलजा मिश्रा, नरेन्द्र मिश्र (सेवा निवृत भारतीय वन सेवा अधिकारी),विजय प्रकाश मिश्र (लखनऊ), अशोक मिश्र राँची, सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र (बहराइच, उत्तर प्रदेश), रमेश चन्द्र मिश्र, मालती बेदौलिया, समस्तीपुर (ये सभी सेवानिवृत डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज), राजू मिश्र, श्रीधर मिश्र, रेखा मिश्रा,रमेश मिश्र, उमेश मिश्र मिथिलेश मिश्र, ममता मिश्रा, ललिता मिश्रा, राजेश चन्द्र मिश्र (पप्पू जी),पल्लवी मिश्रा, ब्रजेश चन्द्र मिश्र, रंजीत मिश्र , रौशन चन्द्र मिश्र (सभी पूर्णियाँ), अनुराग मिश्र (बॉबी), स्मिता मिश्रा, मदन मोहन मिश्र, निगम मिश्र, ज्योति मिश्रा , हरिनाथ मिश्र (आईपीएस(सभीभागलपुर), कौशल भट्ट, जयेंद्र कुमार भट्ट, विजेन्द्र कुमार भट्ट, शिवजी भट्ट, धीरेन्द्र कुमार भट्ट, डॉक्टर सौरभ शेखर, श्रीधर भट्ट, भोले भट्ट, बजाज आलियांज लाईफ इंश्योरेंस के सीनियर सेल्स मैनेजर विकास कुमार मिश्र (सभी समस्तीपुर), डॉक्टर कौशल किशोर मिश्र (पटना), डॉक्टर राकेश दत्त मिश्र , संपादक दिव्य रश्मि, संपादक ज्ञान वर्धन मिश्र, संपादक जी. एन. भट्ट, प्रख्यात पत्रकार लव कुमार मिश्र, संडे गार्डियन के पत्रकार अभिनंदन मिश्र (नई दिल्ली), पटना हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष छाया मिश्रा, पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता शशिरंजन मिश्र, हाजीपुर कोर्ट के वकील जितेन्द्र कुमार मिश्र,राँची हाई कोर्ट के वकील प्रवीण शर्मा, लखनऊ हाईकोर्ट के एडवोकेट आलोक कुमार मिश्र, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विभव मिश्र, मुन्ना कुमार, सेवानिवृत डीएसपी मदन मोहन पांडे, बिहारशरीफ में बाल संरक्षण पदाधिकारी शिशिर चन्द्र पांडेय, मनरेगा पदाधिकारी डॉक्टर नीलमणि पाठक, अखिल कुमार मिश्र (डीजीएम, भारतीय स्टेट बैंक), नई दिल्ली,अंकिता पाठक- बड़ोदरा ,गुजरात, महेश नंदन पाठक, बीहट, बेगूसराय, मग धर्म संसद के राष्ट्रीय संयोजक शैलेश कुमार पाठक,डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय,पूसा, समस्तीपुर के वाईस चांसलर डॉक्टर पुण्यव्रत शुभिमलेंदू पांडेय, नवीन चंद्रा (अमेरिका), डॉक्टर करुणा मिश्रा (इंग्लैंड) गिरीन्द्र मोहन मिश्र, संस्थापक, शाकद्वीपी ब्राह्मण सांसद व दीगर हजारों, लाखों लोग रहे थे।

     


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Tuesday, February 17, 2026

अयोध्या के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के आधार पर राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहिबा के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा रहे हैं।

     राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को राजा घोषित किया गया और 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू करने तक अयोध्या राज पर राज किया। राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह बाघों का शिकार किया करते थे। असंख्य कमरों वाले उनके राजमहल में दो कमरे उनकी ट्रॉफियों से भरे हुए हैं। अयोध्या में स्थित कामता प्रसाद सुंदर लाल महाविद्यालय के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में एक सभागार भी बना हुआ है ।

अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से खास लगाव 

अवधी रवायत बेगम अख़्तर का ज़िक्र बग़ैर यह कहानी अधूरी रहेगी।वह अवध की मशहूर तवायफ थीं। बेगम अख़्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी का समय 7अक्टूबर 1914 से 30अक्टूबर  1974 रहा। वह भारत की एक  प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी।उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्मश्री तथा सन 1975  में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया था। उन्हें "मल्लिका- ए-ग़ज़ल" के ख़िताब से नवाज़ा गया था।

बालिका अख़्तरी को बचपन से ही संगीत से कुछ ऐसा लगाव था कि जहाँ गाना होता, छुप छुप कर सुनती और नकल करती। घर वालों ने पहले तो इन्हें रोकना चाहा; पर समुद्र की उत्तुंग तरंगो को भला कौन रोक सकता था! यदि कोई चेष्टा भी करता, तो शायद लहरों का वह सशक्त ज्वारभाटा उसे ही ले डूबता। 2014 की फ़िल्म “डेढ़ इश्क़िया” में विशाल भारद्वाज ने बेगम अख़्तर की प्रसिद्ध ठुमरी “हमरी अटरिया पे” का आधुनिक रीमिक्स रेखा भारद्वाज की आवाज में प्रस्तुत किया है।उन्होंने दिल के टूटने को भी दिलकश बना दिया था।

  उसके ही जमाने में महाराज जगदम्बिका प्रताप सिंह अयोध्या के राजा थे। अख्तरी बाई फैजाबाद में बेगम अख़्तर नाम से जानी जाती थी। वह राजा साहब की रक्षिता थीं और अयोध्या राज दरबार की प्रतिष्ठित गायिका भी।जगदम्बिका प्रताप सिंह आज़ादी तक अयोध्या के राजा रहे। राजा साहब बेगम अख़्तर के एक दादरे पर ऐसे फ़िदा हुए कि पचास एकड़ का एक बाग उनके नाम कर दिया था।अख्तरी बाई उनके दरबार की लम्बे समय तक गायिका रही।

     अख्तरी बाई जब फैजाबाद छोड़ कर जाने लगीं तो वह बाग राजा साहब को लौटाने गयीं। राजा साहब ने मना किया तो वह अड़ गई और कही, “हुज़ूर आपने मेरी वजादारी की । इसके लिए ताउम्र मैं आपकी शुक्रगुज़ार रहूंगी। लेकिन अगर मैं इसे बेचकर जाती हूं, तो फैजाबाद के लोग मेरे बारे में क्या सोचेगें? तवारीख़ मुझे माफ नहीं करेगी कि एक गाने वाली बाई ने राजा के उपहार में दिए बाग का सौदा कर लिया। इसलिए आप इसे रख लें ताकि इतिहास में आपके साथ ही मेरा नाम भी सम्मान के साथ लिया जाय। राजा साहब के मना करने पर उन्होंने राजा साहब के दामाद डा. रमेन्द्र मोहन मिश्र को वह बाग लौटा दिया।

      आज भी दस्तावेज़ों में उस ज़मीन का कागज़ अख़्तरी बाई फैजाबादी बनाम डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र के तौर पर दर्ज है।रमेन्द्र जी, राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की इकलौती बेटी राजकुमारी विमला देवी जी के पति थे।पद्मभूषण छन्नूलाल लाल मिश्र ने यहीं शागिर्दी कर संगीत में अपनी पहचान बनाई।उनका पानी की तरह हारमोनियम पर चलता हाथ यहीं सधा।वे यहीं पहले बजाते थे बाद में गाने लगे। भारतीय संगीत की दुनिया के कई बड़े नाम चतुर्भुज स्थान में ही पले और बढ़े हुए हैं।

अख्तरी बाई की दुखद मौत

30 अक्टूबर 1974 को नीलम गमाडिया, उनकी मित्र, जिन्होंने उन्हें अहमदाबाद आमंत्रित किया था, की बाहों में उनका निधन हो गया , जो उनका अंतिम प्रदर्शन बन गया।  1974 में तिरुवनंतपुरम के पास बलरामपुरम में अपने आखिरी संगीत कार्यक्रम के दौरान , उन्होंने अपनी आवाज़ का स्वर ऊंचा कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनका गायन उतना अच्छा नहीं था जितना वे चाहती थीं और वे अस्वस्थ महसूस कर रही थीं। उन्होंने खुद पर जो तनाव डाला, उसके परिणाम स्वरूप वे बीमार पड़ गईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

'पसंद बाग’ ठाकुरगंज , लखनऊ में समाधि

अख्तरी बाई की समाधि लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में स्थित उनके घर 'पसंद बाग' के भीतर एक आम के बगीचे में बनाई गई है । उन्हें उनकी माता मुश्तरी साहिबा के साथ दफनाया गया था। हालांकि, वर्षों से बढ़ते शहर के कारण बगीचे का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया है और समाधि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। लाल ईंटों से घिरे संगमरमर के मकबरे को 2012 में पिएत्रा ड्यूरा शैली के संगमरमर जड़े के साथ पुनर्स्थापित किया गया था। लखनऊ के चाइना बाजार में 1936 में बने उनके घर को संग्रहालय में परिवर्तित करने के प्रयास जारी हैं। 


लेखक 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

अयोध्या के महाराजा प्रतापनारायण सिंह 'वीरेश'/'ददुवा साहब' ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर हो गया था । महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह/प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब ' भी शासक रहे। महाराजा मान सिंह दो-दो शादी करने के बावजूद एक कन्या के पिता बन सके थे। जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा था। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रताप नारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ था। ददुआ साहब महाराज मानसिंह के वौहित्र थे। जिन्हें महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले रखा  था। ददुवा साहब नाबालिक थे। अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता था और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही। 

     लाल प्रताप नारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।

इमारतें व सार्वजिक कार्यों का शौक 

महाराजा प्रतापनारायण सिंह, मानसिंह के बाद सिंहासन पर बैठे। उनका शासन लगभग बीस वर्षों तक चला। महाराजा जी का समय विद्याव्यसन में बीतता था। उनके राज्य में फैजाबाद, गोण्डा, नवाब गंज, बाराबंकी, लखनऊ और सुल्तान पुर के 609 गांव,124 पट्टियां थीं।

      दिसंबर 1895 में उन्होंने प्रताब - ए - धर्म उद्देश्य के लिए उत्तर भारत के अनेक क्षेत्र गांव घर में पर्याप्त मात्रा में अचल संपत्तियां का दान किया। इस दान का मूल उद्देश्य अयोध्या फैजाबाद वाराणसी वृन्दावन हरिद्वार इलाहाबाद और लखनऊ में स्थित मंदिर घाट धर्मशालाओं और भवनों के मरम्मत पूजा पाठ भोग तथा खर्चे को जुटाने के लिए किया गया।उन्हें इमारत बनवाने का बड़ा शौक़ था। उन्होंने अयोध्या में कई ऐतिहासिक इमारतें और सार्वजनिक कार्य करवाए। उन्होंने अयोध्या के प्राचीन शहर के नए पैलेस तथा बंगलों प्रवेशद्वारों और मंदिरों के निर्माण के लिए और कुछ भवनों के मरम्मत और पुनरुद्धार के लिए भी कार्य योजना बना रखा था।

      अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों के गौरव, वीरता और धर्म परायणता का स्मरण करते रहते हैं। सिंहासन की आभा, हवेलियों की भव्यता, मंदिरों की दिव्यता और तालाबों की शांति- सभी कुछ उनके इतिहास की जीवित यादें कभी भी देखी जा सकती हैं। अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों की वीरता, धर्मपरायणता और प्रशासनिक कुशलता का स्मरण करते हैं।

     राज्य में स्थिरता के साथ-साथ समाज में शिक्षा, धर्म और कला का विकास भी हुआ। महाराजा प्रतापनारायण सिंह ने विद्वानों और ब्राह्मणों का संरक्षण किया। युवा राजकुमारों और राजकुमारियों को नीति, युद्ध और धर्म की शिक्षा दी गई।

महाराजा जी की प्रमुख उपाधियां

लाल प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया था। ब्रिटिश सरकार ने प्रताप नारायण सिंह को 1887 में महाराजा  की उपाधि से सम्मानित किया।1890 में, "महदोना राज"' का नाम बदलकर “अयोध्या राज” कर दिया गया। 1895 में, उन्हें नाइट कमांडर्स स्टार्स ऑफ़ इंडिया (KCSI) की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाद में 1896 में "महामहोपाध्याय" की उपाधि दी गई। वे दो साल के लिए उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे। उन्हें "अयोध्या-नरेश" की उपाधि भी मिली हुई थी। उन्हें "ददुआ महाराज" के नाम से भी जाना जाता था। महाराजा साहब की साहित्यिक रुचि भी थी। वे “वीरेश” उप नाम से साहित्य की सर्जना करते थे। उनका रचा हुआ “रस कुसुमाकर” ग्रन्थ उनके साहित्यिक प्रतिभा का सजीव प्रारूप है।

राज सदन का स्थापत्य कला

अयोध्या का राजसदन और उसके भीतर कोठी मुक्ताभास उनकी सुरुचि और कारीगरी का अच्छा नमूना कहा जा सकता है।महाराजा लाल प्रताप नारायण सिंह ने अयोध्या में राजसदन का निर्माण कराया था। जो अयोध्या की स्थापत्यकला की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का एक अद्भुत प्रमाण है। अयोध्या के मध्य में, पूजनीय हनुमानगढ़ी मंदिर के निकट स्थित यह महल न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि भक्ति और कलात्मकता का सार समेटे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भी है। अपनी सुंदरता के बावजूद, राज सदन रखरखाव संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है, जो इसके समग्र आकर्षण को कम कर देती हैं। वास्तुकला आश्चर्यजनक है, लेकिन उखड़ा हुआ पेंट और इसके इतिहास के बारे में जानकारी देने वाले बोर्डों की कमी इसे और भी आकर्षक बनाती है। फिर भी, यहाँ का वातावरण आध्यात्मिकता और विरासत की भावना से ओतप्रोत है, जो हिंदू धर्म की गहरी परंपराओं को जानने में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है।

राज सदन की रणनीतिक स्थिति इसे पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण बनाती है, जो लोकप्रिय वेब सीरीज़ की शूटिंग के लिए एक पृष्ठभूमि के रूप में और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करता है। राज सदन घूमने के लिए भी आमंत्रित करता है, जो ऐतिहासिक रहस्य और स्थापत्य कला की भव्यता का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है, जिससे यह अतीत से जुड़कर वर्तमान का आनंद लेने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए एक उल्लेखनीय गंतव्य बन जाता है। यह भव्य महल, जो मूल रूप से एक जर्जर इमारत थी, 'प्रकाश झा प्रोडक्शंस' की रचनात्मक दृष्टि से पुनर्जीवित हुआ है। इसे फिर से जीवंत करने में लगभग पाँच महीने लगे। प्राचीन महाराजा काल को प्रतिबिंबित करने वाली जटिल पारंपरिक वास्तुकला आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देती है और इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती है। 

लछिराम राजा प्रताप नारायण सिंह के राज कवि

महाराजा मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' 'दादुवा साहब' अयोध्या नरेश कवि के आश्रय दाता बने। एक बार राजा साहब ने ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा उन्होनें निम्नलिखित छन्द सुनाया-

वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं। 

मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं। 

कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं। महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह, 

कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।”

   अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा इन्होनें ' प्रताप रत्नाकर' नामक ग्रन्थ की रचना किया। -(सन्दर्भ: डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस’ “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 43)

लछिराम कृत:प्रताप रत्नाकर

मानसिंह जी के जमाने से ही राजकवि के रूप में महदौना राज दरबार के प्रतिष्ठित लछिराम ने प्रताप रत्नाकर अयोध्या नरेश राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' के प्रति लिखा गया ग्रन्थ है। इसके प्रथम तरंग में मंगलाचरण के अन्तर्गत गणेश, राम, राधा और कृष्ण की वन्दनायें हैं। दूसरे तरंग में राजवंश का वर्णन है। तीसरे तरंग में राधा रमण की परम् अनूप लीला का वर्णन प्रथम भाग के रूप में हैं। चौथे तरंग में द्वितीय याम, पाचवें तरंग में तृतीय याम, छठे तरंग में चतुर्थ याम, सातवें तरंग में पंचम याम, आठवें तरंग में षष्ठ याम, नवें तरंग में सप्तम् याम, दसवें तरंग में अष्टम् याम का वर्णन है। सम्पूर्ण ग्रंथ में श्रृंगाररस की प्रधानता है। राधा कृष्ण के श्रृंगारिक रूपों के परिप्रेक्ष्य में रचना अत्यन्त सरस हो उठी है। राधा के कुचाग्र, विपरित रति, सुरति, नितम्ब, त्रिवली आदि के वर्णन में अश्लीलत्य की प्रधानता दर्शनीय है। -(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत : “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 44)

प्रतापनारायण 'वीरेश' : 'रसकुसुमाकर' 

प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' का यह ग्रंथ संवत 1849 ई. में पूर्ण हुआ और संवत 1951/सन 1894 ई. में प्रयाग राज के 'इण्डियन प्रेस' से मुद्रित हुआ था। इसमें रस के अंगों की सुंदर विवेचना और उदाहरण मिलते हैं। यह 515 छन्दों का ग्रंथ है। यह उत्कृष्ट रीति का ग्रंथ माना जाता है। लक्षण ग्रंथों की परम्परा में इसका महत्त्व इसलिए भी स्वीकार किया जाता है कि जहाँ पूर्ववर्त्ती अन्य लक्षण ग्रंथों में विषय का प्रतिपादन पंचशैली में हुआ है, वहीं इसमें गद्य के माध्यम से लक्षणों का रोचक एवं सरस निरूपण हुआ है।

ग्रन्थ में पंद्रह कुसुम /अध्याय

‘रसकुसुमाकर’ में पंद्रह कुसुम हैं। प्रथम में ग्रंथ परिचय, उद्देश्य, और द्वितीय में स्थायी भावों के लक्षण और उदाहरण दिये गए हैं। तृतीय में संचारी भावों, चतुर्थ में अनुभाव और पंचम में हावों का वर्णन किया गया है। छठे कुसुम में सखा-सखी, दूती आदि तथा सातवें-आठवें विभाग के अंतर्गत ऋतु और उद्दीपन सामग्री का वर्णन है। नवें, दसवें, ग्यारहवें कुसुमों में स्वकीया, परकीया और सामान्या तथा दसविध नायिकाओं का वर्णन है। ग्यारहवें कुसुम में नायक भेद का विस्तार से निरूपण किया गया है। तेरहवें और चौदहवें कुसुमों में श्रृंगार के भेदों और वियोग दशाओं का चित्रण हुआ है। पंद्रहवाँ रस कुसुम है, जिसमें श्रृंगार को छोड़कर अन्य रसों का विवरण है। अन्त में काव्य प्रशंसा के साथ ग्रंथ की समाप्ति हुई है। इस ग्रंथ में यथा स्थलों पर भावों के अनुरूप कुछ विशिष्ट चित्र भी दिए गये हैं। इन चित्रों से ग्रंथ की महत्ता निश्चय ही बढ़ गई है।

  चौधरी बंधुओं की सत्प्रेरणा और साहचर्य से अयोध्या नरेश ने इस युग के प्रसिद्ध छंदशास्त्र और रसग्रंथ 'रसकुसुमाकर' की रचना की थी। इसकी  व्याख्या शैली, संकलन, भाव, भाषा, चित्र चित्रण में आज तक इस बेजोड़ ग्रंथ को चुनौती देने में कोई रचना समर्थ नहीं हो सकी है; यद्यपि यह ग्रंथ निजी व्यय पर निजी प्रसारण के लिए मुद्रित हुआ था।

   ‘रसकुसुमाकर’ में लक्षण गद्य में दिये गए हैं और विषयों का सुंदर तथा व्यवस्थित विवेचन उपस्थित किया गया है। इस ग्रंथ में आये उदाहरण बड़े सुंदर हैं। उदाहरण के रूप में देव, पद्माकर, बेनी, द्विजदेव, लीलाधर, कमलापति, संभु आदि कवियों के सुंदर छन्द दिये गए हैं। उदाहरणों के चुनाव में ददुआ जी (महाराजा साहब) की सहृदयता और रसिकता प्रकट होती है। इस ग्रंथ के अंतर्गत अनेक भावों,संचारियों और अनुभावों के चित्र भी दिये गए हैं, जो बड़े सुंदर और अर्थ के द्योतक हैं।श्रृंगाररस का विवेचन विशेष रोचकता और पूर्णता के साथ हुआ है।

   महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के "रू" से राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहेब के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा हैं।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Sunday, February 15, 2026

जेल के दीवारों के पीछे की डरी-सहमी दुनिया ✍️प्रस्तुतकर्ता आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी


एक बुजुर्ग कैदी की आप बीती दास्तान
दीवानी न्यायालय से रुष्ट मेरे अपने खास की दाल जब नही गली तो उसने फौजदारी का फंदा फेंका। उसने मेरे नाम की तीन जमीन जिसे मैंने बेचा था , पर 419/420 का केस तैयार करवाया। न्यायालय के अधिकारियों को प्रभावित करके मेरे ऊपर तीन पुलिस केस दर्ज करवाया। मुझे जेल की सीखचों में डालने और मेरे मरने के लिए दाढ़ी मूँछ भी बढा लिया था। वह यह जानता था कि हत्या करने से मैं ही पकड़ा जाऊँगा, इसलिए पुलिस को पैसा देकर मुझे फँसाने का हथकंडा अपनाया गया। मेरा मुकदमा सी. जे. एम. के यहाँ दर्ज कराकर कोतवाली में पुलिस केस बनवाकर आग में घी डालने का काम किया गया। दरोगा को जब तफ्तीश मिली तो वह उन्हें प्रभावित करके मुझे पकड़वाने पर पूर्णतया तुल गया। पुलिस पैसे की यार कैसे होती है? इसे मैंने देखा और समझा। पुलिस के कुछ दलाल मेरे पीछे पड़ गये और कहने लगे , "प्रिन्सपल साहब आप पर बहुत कड़ा मुकदमा दर्ज हो गया है। बिना जमानत आप को जेल जाना पड़ेगा। आप पैसा खर्च करें नहीं तो बड़ी बेइज्जती होगी।" उस समय मेरे पास छठे वेतन की वृद्धि से एक लाख से ऊपर रुपया था । मैंने देखा कि पुलिस पीछे पड़ गयी है। दरोगा कह रहे हैं कि आप जेल नहीं जायेंगे , यदि पैसा खर्च करेंगे। दलालों ने रात दिन एक कर दिया और मुझसे 67 हजार रुपये चौकी इंचार्ज और कुछ अधिकारियों ने मिलकर हड़प लिया।
     मेरे कुलीन कुल में जन्में हमारे खास ने मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति प्राप्त करने हेतु मुझ पर 11 मुकदमे कर चुका है । फिर भी वह अपने अनैतिक कार्य में असफल रहा। उसने छल कपट के साथ-साथ आतंक का भी सहारा लिया। वह प्रचार करने लगा कि यदि मुझे नगर बाजार बस्ती का मकान ना लिखा गया तो मैं गोली मार कर ले लूँगा। जब उसके सारे प्रयत्न कामयाब नहीं हुए तब उसने पुलिस और फौजदारी के मजिस्ट्रेट का दामन पकड़ा। उसने निर्णय लिया कि मुझे कारागार में भेजकर विवश कर देगा।
      मेरे उस खास को केवल एक चीज सामने थी कि कब मुझे जेल भेज दें। इसके लिए उसने कुछ राजनीतिक लोगों का शरण लिया और रूपये पेसे खर्च करने का दृढ़ निश्चय किया। उसने अपनें बालों को बढ़ाया और दाढ़ी मूँछ को रखा लिया कि जब हमारा बाप जेल चला जायेगा तभी हम दाढ़ी मूँछ बनवायेंगे। उसने फर्जी ऐसे मुकदमे बनवाये जिसमे मुझे 419/420 का मुलजिम बनना पड़ा। प्रथम मुकदमे का कुछ लोगों ने पुलिस में बीच-बचाव करके मुझसे 67 हजार रुपये दिलवा दिये। मैं दरोगा के कहने पर निश्चिन्त भी हो गया था कि मुझे जेल नहीं जाना पड़ेगा। क्योंकि 419/420 का मुकदमा लोवर कोर्ट से जमानत नहीं होती है । इसको जिला एवम् सत्र न्यायाधीश जमानत दे सकते हैं। मैं नहीं समझता था कि मेरा खास मुझे जेल निश्चित रूप से भिजवाने के लिए पूर्ण रूप से प्रयत्नशील है।
       उसके आतंक में करुणा नहीं आतंक का बोलबाला होता है। आतंकी परपीड़ा को देंखने का शौकीन होता है। यही स्थिति उसकी थी । उसने मेरे एक खेत का मामले में मुझे 419/420 का मुलजिम पुनःबनवा दिया । अपने सोर्स से उसने ए.सी.जे.एम. कोर्ट से मुकदमा दर्ज करने हेतु कोतवाली बस्ती को भेजवा दिया और प्रयत्न करने लगा कि शीघ्र मुझे जेल भेज दिया जाय। उसकी मदद करने के लिए उसको वहीं मनमाफिक दरोगा मिल गये जिन्होंने दलालों के माध्यम से मुझसे 27 हजार रुपया ले लिया था।
       बस्ती न्यायालय में मेरा मुकदमा था मैंने अपने शुभ चिंतक अयोध्या के एक महंत जी से निवेदन किया कि वे हमारी जीप से बस्ती मेरे कार्य हेतु चलने का कष्ट करें। क्योंकि उनको जीप चलाने काअच्छा ज्ञान है। मैं जीप से जब बस्ती पहुँच गया तो वह अपनी जीप व सफारी गाड़ी से बस्ती पहुँचा और मुझे पकड़ने के लिए दरोगा से सम्पर्क किया। मेरे पीछे उसके आदमी पड़ गये। मैं जहाँ-जहाँ जाता वे मोबाइल से उसे सूचना देते रहते थे। अन्त में उसने उसी दरोगा को काफी पैसा देकर एक एम.एल.सी. से सोर्स लगाकर मेरे पीछे पड़ गया। मुझे कुछ भी मालूम नहीं था । हाँ! यह पता था कि मेरा अपना खास अपने दल-बल के साथ कचेहरी में घूम रहा है। मैं 05.03.2010 को अपराह्न 2:00 बजे अपनी जीप से महन्त जी के साथ जब अयोध्या के लिए चला तो उसकी जीप मेरे जीप का पीछा करने लगी थी। मैं निश्चिन्त था और महन्त जी से कुछ अध्यात्म की चर्चा कर रहा था । मेरी जीप जिस पर मैं और महन्त जी बैठे थे वह हरैया के पास पहुँची । उसी समय मेरे खास की जीप, जिस पर एक दरोगा सवार थे, ने मेरी जीप को रोकते हुए बोले, तुम्हारी जीप से कई लोग कुचल उठे हैं। सीधे इसे घटना स्थल पर ले चलो। मैंने कहा कोई ऐसी दुघर्टना इस जीप से नहीं हुई है । उसनें कहा कुछ नहीं। आप तुरन्त इसे वापस ले चलें। मैं मजबूर हो गया और जीप को लेकर वापस महाराजगंज पुलिस चौकी पर जब आया तो दरोगा जो मुझसे 27 हजार रुपये ले लिये थे, वे पहुँच गये थे ।
       वे बोले, "प्रिन्सपल महोदय आपने मुझे खूब छकाया। तुम्हारे ऊपर 419/ 420 का वारण्ट है और तुम बस्ती में घूम रहे हो। चलो बस्ती चलना है।" मेरे साथ के महन्त जी अवाक् हो गये । वह कुछ बात करने के लिए आतुर थे कि दरोगा ने मुझे मेरे खास की जीप में बैठने का आदेश दिया और कड़ा रुख अपनाया। मैं अपनी जीप से उतरकर महन्त जी से कहा कि मैं बस्ती जा रहा हूँ। आप जीप लेकर अयोध्या जाकर बता दें। मेरा खास बस्ती में दरोगा से फोन पर फोन कर रहा था कि मैंने एम.एल.सी. के सोर्स से एस.पी. साहब से कहवा दिया है कि शीघ्र बन्द करके जेल भेज दो। कुछ नम्र रुख अपनाते हुए दरोगा ने कहा कि अब हर कीमत पर तुम्हें जेल जाना है।
         मैं अपने जीवन में कभी किसी फौजदारी के मुकदमे का मुलजिम नहीं था। सारा जीवन शान्तिमय था। मुझे कारागार शब्द पढ़ने को जरूर मिला था लेकिन मैने देखा नहीं था। आज मैं हार्ट का मरीज हूं। शरीर थरथर कांप रहा है। 70 वर्ष का बूढा हूँ। पेट के अल्सर का मरीज हूँ, शुगर मेरा बहुत ज्यादा है। रोज 100 रु. तक की दवा खा रहा हूँ। इस जर्जर अवस्था में जेल जाकर कैसे रहूँगा। मेरे जीवन के इस दुःखद क्षण में भगवान भी मेरे प्रति करुणा हीन हो गया है। यही सब मैं सोच रहा था। परमात्मा के प्रति जो गहरी निष्ठा थी, वह चूर- चूर हो रही थी। आस्थावादी होते हुए भी मैं अपने भाग्य को कोसने लगा और इस स्थिति में अपने को भूल सा गया।
        दरोगा पुलिस चौकी पर ले जाकर बैठाया और बोला कि बूढ़े हो नहीं तो जमीन पर बैठाता बेंच पर बैठो। अभी मुझे वारंट तैयार करके तुम्हें जेल भेजना है। मेरे पास, वहाँ कोई नहीं था मैं अनाथ था। दरोगा जेल भेजने की तैयारी में लगा था क्योंकि वह मेरे खास से पूर्णतया प्रभावित था। उसकी जीप मेरे स्वागत में खड़ी थी, दरोगा का सम्पर्क उससे बना हुआ था। सायं होने वाली थी। चिड़िया अपने घोसलों में चहचहाती जा रही थी। पथिक अपने घरों की ओर थे। मैं पुलिस के चंगुल में था। मुझको जेल भिजवाने का संकल्पी मेरा खास अपने कुकृत्य से आह्लादित था। सायं सात बजे मेरा वारंट बना । मैं दरोगा द्वारा दबोचकर जेल के फाटक तक पहुँचा दिया गया और दरोगा एक पुलिस के सहयोग से जेल के सिपाहियों से यह कहकर चला गया देखियेगा।
        जिस तरह से राजा उग्रसेन, जो कंस के पिता थे ,को कंस ने निर्दयता के साथ जेल में डाल दिया था। उस स्थिति में मेरे खास ने दरोगा के सहयोग से मुझे जेल में डाल दिया। 5 मार्च 2010 का सायं काल का समय था। जब मैं जीवन में प्रथम बार जेल के विशाल उदर में घुसाया गया। मेरे जेल के प्रथम कक्ष में पहुंचते ही जेल के सिपाहियों ने घेर लिया। मेरी तलाशी अंगप्रत्यंग की लेने लगे। यहाँ तक अण्डकोश तक को नहीं छोड़ा। कहने लगे कि बहुत से लोग चूतड़ के पास रुपये छिपाकर से आते हैं। वे तरह-तरह से प्रताड़ित करके वहीं ले गये। जहाँ वो गन्दे काले कम्बल और एक लोहे का कटोरा मिलता है। मेरे पास कुछ सामान नहीं था। एक बीस रुपये की नोट भी उसे एक सिपाही ने निकाल लिया। मैं कारागार के कई द्वारों को पार कर 5 नम्बर की बैरक में ले जाया गया।
      सायं हो चुकी थी जिस बैरक में मुझे ले जाया गया। उसमें 125 से अधिक कैदी थे। रात्रि में जब मैं बैरक में पहुंचा तो नीचे जमीन पर लोगों का विस्तरा लगा था। मुझे भी किसी तरह से जमीन पर कम्बल बिछाने को मिला तभी संयोंग से चार-पाँच लोग जो उसी बैरक में थे ने मुझे देखा। वे मेरे पास आये बोले, साहब आप कैसे यहाँ आ गये। मैंने कहा बाबू विधि का विधान विचित्र होता ? हमारे खास ने फर्जी मुकदमा बनाकर मुझे 419/420 में जेल में भिजवा दिया है । सब लोग उसे धिक्कारते हुए संवेदना प्रकट करने लगे। ओमप्रकाश जी एक शिक्षक भी वहां थे वे बोले ,यह तो बड़ा विचित्र हुआ मैंने भूषण की कविता पढ़ी है-

सबन के ऊपर ठाढ़ रहिबे के योग
ताहिं खड़ा कियो छ हजारन के नियरे।

        आपने कई विषयों से एम.ए. किया है। पी-एच.डी. हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हैं। 42 वर्ष तक प्रधानाचार्य रहे हैं। यह कैसे आप का समय बदल गया। आप 420 हैं? यह किस अधिकारी और दरोगा ने लिखकर आपको जेल भेज दिया। आप घबराये नहीं । यह आपके धैर्य की परीक्षा हो रही है। हाँ ! यहाँ पर राक्षसों जैसा कैदियों का व्यवहार होता है । यहाँ का भोजन पशु आहार सा होता है। यहाँ मुर्दे से भी कफन लिया जाता है। आपका मामला पेंचीदा है। आपकी जमानत होने में कई महीने भी लग सकते हैं। आपको हम लोग अधिक से अधिक प्रसन्न रखने का प्रयास करेंगे। सम्पत्ति हड़पने के लिए आप का अपना खास इतना बड़ा दुष्कर्म कर रहा है।
        संसार बड़ा विचित्र है। आपको समझाना क्या? समय बड़ा बलवान होता है।  मैंने देखा था कि आपके दफ्तर में बड़े-बड़े लोग आया जाया करते थे। एक हजार के ऊपर छात्र और 50 से ऊपर कर्मचारियों के आप संरक्षक थे। आज आप इस जेल में कैदी हैं। मुझे अपार दुख है।
       सायंकाल जो लोग जेल जाते हैं उनको भोजन आदि नहीं मिलता है क्योंकि जेल के कैदी शाम 06 बजे तक खाकर अपने बैरिकों में बन्द हो जाते हैं। इन कैदियों की देखरेख जेल की पुलिस करती है और इसी में पुराने कैदियों को सरदार बन दिया जाता है ,जो सदैव गालियों से ही बोलते हैं। यहाँ बैरिकों में सदैव ये कैदी सरदार लोगों से कठोर काम लेते हैं। यहाँ तक पाखाने की नाली तक साफ कराते हैं। कारागार में जो कार्य करना नहीं चाहते वहाँ बैठकी देनी पड़ती है। यह बैठकी छह से सात सौ रुपए तक की है। मैंने भी बैठकी देने का वचन दिया। उस समय मेरे पास एक रुपया भी नहीं था। मैं विकल था। शनिवार के दिन मिलाई नहीं होती है। मैं शुक्रवार को सायं जेल गया। लोगों ने कहा कल रविवार को मिलाई होगी, आप किसी से कुछ हजार रुपये मंगा कर दे दें। नहीं तो , ये सिपाही परेशान करेंगे। मैंने कहा ठीक है , कल की स्थिति देखकर बताऊँगा। वे बोले, रुपया देकर बैठकी करा लें नहीं तो काम करना पड़ेगा। इन कैदियों के मुँह पर हमेशा गाली सवार रहती है। 
       जेल में सर्वत्र गाली-गलौझ देखने को मिलती है। यह मानव की अज्ञानता और असभ्यता का प्रतीक है। देश आजाद हुए 60 वर्ष हो गया। लेकिन इस समय जेल की स्थिति नारकीय स्थिति के समकक्ष है। मैं दूसरे दिन जेल के विस्तृत परिसर को देख रहा था। दस से पन्द्रह फुट ऊँची बाउण्ड्री दीवाल कारागार की कवच है। कैदियों को पशुवत बैरिकों में रखा जाता है। जहाँ उसकी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। यदि कोई बैरक के सरदार की बात नहीं मानता है तो पाँच-छः कैदी मिलकर वहीं बेरहमी से उसकी पिटाई करते हैं। सर्वत्र आतंक व उत्पीड़न का स्वर निनादित होता है। सौ से अधिक कैदियों पर एक शौचालय, ऊँट के मुँह में जीरा का कार्य करता है। रात्रि में सभी कैदी पशुओं के समान बैरिकों में बन्द कर दिये जाते हैं।
       कारागार का एक दिन बीत रहा था । दिन में एक दर्जन और अधिक लोग मेरे परिचित निकले। सभी लोग मेरी मदद करते रहे। दूसरे दिन 10 बजे श्री कृष्ण चन्द्र सिंह पूर्व ब्लाक प्रमुख बस्ती ने जेलर के पास बैठकर मुझे बैरक से बुलवाया। मैं जेलर साहब के पास गया । वहाँ मेरा अच्छा सम्मान हुआ। उसे देखकर जेल पुलिस के लोग विशेष प्रभावित हुए। जेल के अन्दर मिलने वाले भी आये। इन मिलने वालों से मुझे आत्मबल मिला। मैं जेल में था । मेरा स्वास्थ्य खराब था। हार्ट का पेसेन्ट था। जेल में लोगों ने कहा कि जो लोग विशेष क्रिमिनल हैं । उन्हें पूर्ण सुविधा मिलती है। शेष का शोषण किया जाता है।
        मैं जेल में था जो कभी सोचा नहीं था कि मेरा खास मेरी सम्पत्ति लेने के लिए इसे अपना अन्तिम प्रयास समझता था। वह यह जानता था कि यह जेल की यातना से घबरा जायेंगे और चिल्लाकर अपनी सम्पत्ति मुझे दे देंगे। जेल में लोग मुझसे यही कहते थे कि जो जेल एक बार आ जाता है उसे तीन बार जेल में आना पड़ता है। इसलिए जो जेल में आ गये हैं उन्हें इस उक्ति का ध्यान रखना चाहिए- "जेल में आओ, पेल के खाओ।" जेल से डरना नहीं चाहिए। यहाँ विधि के विधान यही है। अच्छे और बुरे दोनों लोग यहां आते हैं। लेकिन सबके लिए एक ही बैरिक है। जो मानवता की छाया ग्राहिणी है। यहाँ सर्वत्र घृणा और ईर्ष्या का बोलबाला है। मनुष्यता नहीं है। विद्रोही जेल के कैदियों का सुधार किया जाना चाहिए। इससे देश का कल्याण सुनिश्चित होगा।
         कारागार में सर्वत्र चौकसी और धन वसूली का कार्य चरम सीमा पर रहा है। कैदियों की चार बार गिनती होती है। जहाँ कुछ कैदी गाली से लेकर मार भी खाते हैं। सर्वत्र शोषण और उत्पीड़न शक्तिशाली है। जो कैदी सप्ताह में दो बार से अधिक अपने परिजनों से मिलता है । उसे 20 रु. रोज शुल्क देना पड़ता है। रोज जो कैदी मिलने के लिए जाता है जब वह लौटता है तो उसकी तलाशी लेते समय बीस से 30 रुपये कैदी से वसूल किया जाता है। ऐसा कार्य दो से तीन स्थानों पर होता है जो कैदी रोज मिलता है उसे 10 से लेकर 30 रु. प्रतिदिन देना पड़ता है। इस शोषण और उत्पीड़न यज्ञ से मैं अलग नहीं रहा। प्रतिदिन मिलने वाले से पैसा माँगकर मैं बाँटता था और अपनी बैठकी का समय काटता था। जेल को सुधार गृह की संज्ञा दी जानी चाहिए । इसलिए कैदियों को सुविधा देकर उन्हें अच्छा बनाने का प्रयास किया जाय। सामान्य कोटि के कैदियों को अपराधिक प्रवृत्ति के कैदियों से दूर रखा जाय। ऐसे कैदी जो किसी कारण से जेल तक पहुँचा दिये गये हैं । उनकी सुनवाई के लिए एक जेल मजिस्ट्रेट की व्यवस्था की जानी चाहिए। सामान्य मामले में फँसे कैदियों की व्यावहारिक समीक्षा करके उन्हें जेल से शीघ्र जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
         जब मैं जेल चला गया तो मेरे खास ने उसी दिन अपने बालों और मूँछ को मुण्डा कराया। यह मुण्डन रात्रि 10 बजे बस्ती में हुआ। नाई को 100 रु. दिया गया। और यह प्रचार किया गया कि हमारे पिता का देहान्त हो गया। मेरा खास कल बल छल से उत्पीड़न करता रहा। वह प्रयास में था कि मेरी जमानत न हो और मैं जेल में महीनों रहूँ। मेरे सहयोगी बाहर निकालने के प्रयास में लगे हुए थे।
         दिनांक 12.03.2010 को रात्रि के समय मैं सोया हुआ था। सबेरा हो रहा था जेल के वृक्षों की सघनता मनोहारी थी। फागुन के महीने में पवन सुहावना हो जाता है। जेल के क्यारियों में पुष्प लगाये गये थे। आम्रवृक्षों पर कोयल और पपीहे बोल रहे थे। प्रातः का सुहाना समय बैरकों में सोये कैदियों की स्मृतियों को सजग कर देता है। उसी बीच एक नवयुवक कैदी अकस्मात् रोने लगा। पूछने पर मालूम हुआ कि वह स्वप्न देख रहा था कि उसकी पत्नी कह रही थी कि मुझे अकेली छोड़कर तुम वहाँ चले गये। विधाता बड़ा निठुर है । जो मेरे रंग में भंग कर दिया। कुछ नवजवान अपने घरों की याद करने लगे और पछताने लगे। यहाँ यदि उन्हें व्यावहारिक रूप से देखा जाता तो उनमें सुधार की भावना जाग्रत हो जाती। 
    मानव एक चिन्तनशील प्राणी है उसमें सुधार लाकर उसे मनुष्य बनाया जाना चाहिए। लेकिन ये जेल मानव से पशुवत व्यवहार करके उसे जघन्य अपराधी बना देती हैं।
       बस्ती का कारागार पुराना कारागार है। इसी कारागार में मुझे मिलते जुलते समय गिनते ग्यारह दिन बीत गये। मेरी जमानत ग्यारहवें दिन हो गयी। मेरे खास ने लोक लाज से बचने के लिए चिल्लाने लगा, मैंने जमानत करवाया है। अपराधी भी अपने कुकृत्यों पर प्रश्चाताप करता है, किन्तु वह अपने अपराध को स्वीकार करके उसके प्रति निषेधात्मक रूप बना ले तो उसमें अच्छे संस्कारों का उदय हो सकता है। बार-बार अपराध करने वाला जघन्य अपराधी बन जाता है। इस कंसावतार में मेरा खास अपने अपराधों की चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने मुकदमों की संख्या बढ़ा दिया और गलत ढंग से मेरे सरस साहित्य कुटीर नगर बाजार बस्ती पर अपना कब्जा कर लिया। उसके आतंक से क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति सहयोग देने से कतराता है।
       मैं दिनांक 15.03.2010 को 11.00 बजे रात्रि बस्ती कारागार का अतिथि रहकर वापस अयोध्या आया। जो 11 मुकदमे मेरे ऊपर मेरे खास के चल रहे हैं। सब निराधार हैं किन्तु परेशानी के हेतु हैं। वह नाजायज पैसे से अधिकारियों को खरीदने में सक्षम है क्योंकि आज का अधिकारी मुकदमों को टालता है। फैसले के लिए कुछ लेन देन का तराजू रखता है, जो तौल में उतर जाता है उसका कल्याण हो जाता है।
(सन्दर्भ: “वंशावली में कनखजूरों का आतंक” मूल लेखक और प्रकाशक डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' , प्रकाशन वर्ष 2011, पृष्ठ 113 से 119 )


प्रस्तुतकर्ता का परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


लाल अंबिका प्रताप सिंह शाहगंज अयोध्या के वर्तमान राजा ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


अवस्थिति

अयोध्या जिले के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा का किला' या 'राजा की हवेली' स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है । इस वंश की स्थापना राजा दर्शन सिंह जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है। यहां राजा दर्शनसिंह ने सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये थे। जहां वह, उनके परिवार और उनके वंशज रहते हैं। यह बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      1857 के गदर हो जाने पर महाराजा मानसिंह अंग्रेजों से मिल गए थे। उनके पास कोई सामान न था तो भी उन्होंने अपना धन और अपना प्राण अंग्रेजों को निछावर करके फैजाबाद के तीस अंग्रेजों मेमों और बच्चों समेत अपने शाहगंज के किले में सुरक्षित रक्खा था और विद्रोहियों का सामना करने के के लिये डटे रहे। फिर उनको अपने सिपाहियों की रक्षा में गोला गोपालपूर पहुंचा दिया। इसी अवसर में चार मेमें और आठ अंग्रेजी बच्चे घाघरे के मांझा में बिना अन्न-जल मारे-मारे फिरते थे। महाराजा साहब ने सवारियाँ भेज कर उन्हें बुला लिया और पन्द्रह दिन तक अपने घर में रक्खा और फिर उनके कहने पर सौ कहार और 36 पालकी कर के उनको प्रासबर्न साहब के पास बस्ती भेज दिया। 

    इसी समय बागियों ने शाहगंज की गढ़ी घेर ली और महाराजा साहब के लाखों रुपये के मकान खोद डाले और जला दिये गए और बहुत सा धन लूट ले गये। डेढ़ महीने के घेरे पर बड़ी वीरता से महाराजा साहब ने विद्रोहियों को मार भगाया । इसी अवसर पर राजा रघुवीर सिंह के घर का बहुत सा सामान जो अयोध्या में लाला ठाकुर प्रसाद के घर पर धनवावाँ से भेज दिया गया था विद्रोहो लूट ले गये।

       राजा मान सिंह के बाद शाहगंज की गद्दी उनके बड़े भाई राजा रामअधीन सिंह के हाथ में आई।वह पक्के शिव भक्त थे , उनके शाप के कारण हमेशा वंशहीन होने की शापित हो गई है। जो भी मुख्य राजा होता है उसे पुत्र प्राप्ति नहीं होती है । आज शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह जी है उन्हें भी केवल पुत्री है पुत्र नहीं । 

    शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई. में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। बाद मे ब्रज बिलास कुंवर ने राजा त्रिलोकी नाथ को दत्तक पुत्र बना राजा बनाया। मान सिंह की बेटी जगदम्बा देवी थी। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था।  फिर कोर्ट में त्रिलोकी नाथ सिंह और लाल प्रताप नारायण सिंह के मध्य बहुत दिनों तक मामला चलता रहा। लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली वारिस हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया । 

    अयोध्या स्थित राज सदन बाद में सत्ता के केंद्र में आया, परन्तु धर्म नगरी के कारण यहां सत्ता की चमक दमक शाहगंज और मेहदौना से ज्यादा रही। दिवंगत राज्य के प्रतिनिधि श्री विमलेंद्र मोहन मिश्र जी द्वारा राजा लिखे जाने पर शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप पाठक सिंह जी मुकदमा भी दायर किया हुआ है इसीलिए विमलेंद्र जी द्वारा कभी खुद को राजा नहीं लिखा गया वो हमेशा राजसदन के मुखिया के तौर पर जाने जाते थे।

    महाराज दर्शन सिंह जी शाहगंज मेहदौना के प्रारंभिक राजा थे ।अयोध्या इन्ही के अंतर्गत आता था वर्तमान में शाहगंज हवेली जो कि 70 बीघे में दर्शन  सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका सिंह जी और अन्य  परिवारो का हाल ठीक नहीं है जबकि अयोध्या महल में रह रहे इनके वंशज ( इनकी बाद की वंशावली के पुत्रियों के पुत्र) विमलेंद्र मोहन मिश्रा जो की अयोध्या के मुखिया है वे लोग शान शौकत से रह रहे हैं।


शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं 

अयोध्या जिले में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। क्षेत्र के आम जनमानस व दूरदराज से राजा की हवेली देखने आने वाले लोग कीचड़ में फिसल कर गिर जाते हैं जिससे उनको काफी चोटें भी आ जाती है, वाहन भी फस जाते हैं जिनको बाहर निकालने के लिए ट्रैक्टर की व्यवस्था करानी पड़ती है। शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह का कहना है कि कई बार उन्होंने मुख्य मार्ग को ठीक करवाने के लिए शासन प्रशासन से कहा, लेकिन  हवेली को आने वाले मुख्य मार्ग को ठीक नहीं कराया जा सका है। जिससे मुझसे मिलने वाले व पास पड़ोस के जिलों से हवेली देखने आने वाले लोग इस कीचड़ युक्त गड्ढे में गिर कर चोट खा जाते हैं।

         लोग इस हवेली को इस नाते देखने के लिए आते हैं कि धर्म नगरी अयोध्या से पुराना और गहरे रूप में जुड़ा है। अयोध्या के महाराजा ददुआ के वंशज आज भी शाहगंज हवेली में रह रहे हैं। 


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)