Saturday, August 29, 2026

दारुक वन गुजरात का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

गुजरात के द्वारका के पास स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे प्राचीन काल में 'दारुक वन' कहा जाता था। यह गुजरात के सौराष्ट्र तट पर द्वारका शहर और भेंट द्वारका द्वीप के बीच में बसा है । नागेश्वर को दारुक वन के नाम से भी जाना जाता था, जो भारत के एक वन का प्राचीन नाम है। भगवान शिव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर, जो भूमिगत गर्भगृह में दुनिया के 12 स्वयंभू ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है।

गुजरात के द्वारकापुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर भगवान शिव का दसवां ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर महादेव स्थित है जिसके दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह इस ज्योतिर्लिंग का अभिषेक साधारण जल से नहीं किया जा सकता। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक केवल गंगाजल से किया जाता है जो कि मंदिर प्रशासन की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। इस मंदिर के बाह्य भाग पर महादेव की एक विशाल प्रतिमा है जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। ये इतनी विशाल है कि मंदिर की ओर जाते हुए ये कई किलोमीटर पहले से ही दिख जाती है।

शिव पुराण के अनुसार, इस वन में दारुक नामक राक्षस और उसकी पत्नी दारुका राज करते थे। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक भयानक राक्षस था जिसका नाम दारुक था। उसकी पत्नी दारुका ने कठिन तपस्या कर देवी पार्वती को प्रसन्न कर लिया और उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि जिस जंगल में वे रहते हैं वहाँ कोई उनसे जीत ना सके एवं वे अपनी इच्छानुसार इस जंगल को अपने साथ ले जा सकें। इस प्रकार के वर को प्राप्त कर उन्होंने पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा दी। वे जहाँ चाहते उस जंगल के साथ पहुँच जाते और अत्याचार करते किन्तु देवी पार्वती के आशीर्वाद के कारण कोई उनका कुछ अहित ना कर पाता। 

जब उनका आतंक हद से अधिक हो गया तो अन्य ऋषि-मुनि महर्षि और्व के पास पहुँचे और उनसे सहायता माँगी। जब ऋषि और्व ने उनका दुःख सुना तो उन्होंने क्रोधित हो दारुक और दारुका को श्राप दे दिया कि अगर वे किसी भी तप में लीन व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।

तब इस श्राप के भय से दारुक और दारुका ने अपने उस जंगल को समुद्र के बीचों बीच स्थित कर दिया और वहाँ से आने वाले व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया।

वहाँ से कुछ दूर नगर में सुप्रिय नाम का एक परम शिवभक्त वैश्य रहता था। एक बार वो अपनी पत्नी सहित व्यापार का सामान लेकर उसी समुद्र से गुजर रहा था कि उस वन में दारुक ने उसे पत्नी सहित बंदी बना लिया। उसपर अनेक अत्याचार किये गए और उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में भी सुप्रिय लगातार भगवान शिव की आराधना करते रहे। 

वैश्य सुप्रिय वहाँ भी अपनी पत्नी सहित भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन हो गया। एक बार दारुक ने उसे शिव पूजा में लीन देखा और क्रोधित हो उसे मारने हेतु उस कारगर में पहुँचा। शस्त्र सहित उस महाभयंकर असुर को देख कर भी सुप्रिय भयभीत नहीं हुआ और अपनी पूजा करता रहा। उसे विश्वास था कि भगवान शिव के रहते उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। 

जब दारुक ने देखा कि सुप्रिय पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने उसे मारने के लिए अपना खड्ग उठाया। तभी उसी जगह सूर्य के तेज को लज्जित करने वाले महारुद्र एक स्वर्ण सिँहासन पर प्रकट हुए। तब दारुक ने भयभीत होते हुए महादेव से कहा - "हे प्रभु! मुझ जैसे साधारण राक्षस को मारने के लिए आप स्वयं यहाँ आये हैं जो सर्वथा उचित नहीं है। आपके और मेरे बल का क्या मेल अतः अगर आप मुझ निर्बल पर प्रहार करेंगे तो ये अन्याय हो जाएगा। अगर ये सुप्रिय आपका इतना बड़ा भक्त है तो इसी को मेरा सामना करने दें।"

तब महादेव ने हँसते हुए सुप्रिय को अपना प्रलयंकारी पाशुपतास्त्र प्रदान किया जिसके प्रहार से सुप्रिय ने क्षण भर में ही दारुक का उसके सभी बंधू-बांधवों सहित नाश कर दिया। तब सुप्रिय ने भगवान शिव से उसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर महादेव वहाँ नागेश्वर नाम से स्थित हो गए। दारुक का विनाश करने के कारण उनका एक नाम दारुक नागेश्वर भी पड़ा। भक्ति भाव से लिप्त सुप्रिय अपनी पत्नी सहित शिवलोक को चला गया। जो कोई भी इस पवित्र तीर्थ का दर्शन करता है उसके समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है और वो निश्चय ही शिवलोक को प्राप्त करता है।

भक्त की अडिग भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध किया। तभी से यह स्थान नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक, बौने ऋषियों के समूह 'बालखिल्य' ने दारुक वन में काफी समय तक भगवान शिव की पूजा की। उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव उनके सामने नग्न अवस्था में प्रकट हुए, जिनके शरीर पर सिर्फ नाग (सांप) थे।

ऋषियों की पत्नियां उस संत से काफी आकर्षित हुईं और अपने पतियों को छोड़कर उनके पीछे चल पड़ीं। इससे ऋषि व्याकुल होने के साथ काफी क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया और तपस्वी को श्राप दिया कि उनका लिंग गिर जाए।

शिवलिंग पृथ्वी पर गिर गया और पूरी दुनिया कांप उठी। भगवान ब्रह्मा और विष्णु उनके पास आए और उनसे पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए अपना लिंग वापस लेने का अनुरोध किया। शिव ने उन्हें सांत्वना दी और अपना लिंग वापस ले लिया।

इस कथा का वर्णन वामन पुराण के 6ठें और 45वें अध्याय में देखने को मिलता है। इसके बाद भगवान शिव ने सदा-सदा के लिए दारुक वन में ज्योतिर्लिंग के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति का वचन दिया।


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की लगभग 125 फीट (25 मीटर) ऊंची भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसके दर्शन दूर से ही हो जाते हैं।

जटिल वास्तुकला और मनमोहक मूर्तियों के साथ मंदिर अपने आप में आध्यात्मिक सुकून का एहसास कराता है। शिव पुराण के मुताबिक, यहाँ दर्शन और आराधना करने से भक्तों को सभी प्रकार के विष, भय और सांप के काटने या कालसर्प दोष आदि से मुक्ति मिलती है और सांसारिक प्रलोभनों से रक्षा होती है।

वैसे तो ये मंदिर और शिवलिंग बहुत प्राचीन है किन्तु वर्तमान के मंदिर का निर्माण टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने 1996 ई में शुरू करवाया किन्तु बीच में उनकी हत्या हो जाने के बाद इसे उनके परिवार ने पूर्ण किया। इसके निर्माण में करीब एक करोड़ पच्चीस लाख का खर्च आया था जिसे गुलशन कुमार चैरिटबल ट्रस्ट ने अदा किया था। टी सीरीज द्वारा बनाये गए कई धार्मिक विडिओ में भी आपको इस मंदिर के दर्शन हो जाएंगे। मूल शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थित है जो काफी बड़े आकर का है। इसके ऊपरी हिस्से पर चाँदी का आवरण चढ़ाया गया और साथ ही साथ शिवलिंग के ऊपर चाँदी द्वारा निर्मित नाग की प्रतिमा है जो इसके नाम को सार्थक करती है। इस शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गयी है।

गर्भगृह में सभी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ केवल वही प्रवेश कर सकते हैं जिन्हे अभिषेक करवाना हो और पुरुष यहाँ केवल धोती धारण करके ही प्रवेश कर सकते हैं। 

इस शिवलिंग के अतिरिक्त भारत में तीन अन्य शिवलिंगों को नागेश्वर कहा जाता है। इसमें से एक हैदराबाद के निकटऔढ़ाग्राम में स्थित है और दूसरा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित शिवलिंग है जिसे नागेश्वर के साथ जागेश्वर महादेव भी कहा जाता है। हालाँकि इन दोनों जगह के स्थानीय निवासी इन्हे ही ज्योतिर्लिंग मानते हैं। अयोध्या में राम जी पुत्र कुश द्वारा स्थापित नागेश्वर नाथ मंदिर का भी इस क्षेत्र में बहुत महत्व है। शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की नगरी द्वारकापुरी के निकट नागेश्वर शिवलिंग को ही वास्तविक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)


श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की कुछ दुर्लभ जानकारी। ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


अयोध्या का श्यामा सदन (जिसे 'श्यामा सदन आश्रम' भी कहा जाता है) रामघाट क्षेत्र के कारसेवक पुरम में एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक विरक्त परंपरा का आश्रम/ मंदिर है । यह स्थान अपनी गहन साधना, संत परंपरा और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। त्याग तपस्या वैराग्य की नगरी अयोध्या में युग युगांतर से भजनानंदी संतो का बास रहा है और अपने त्याग तपस्या, भजन और सेवा के बल पर बड़े ही सरलता और माधुर्य स्वभाव से बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी परास्त कर दिया।
महंत रामदास जी संस्थापक रहे
संत गोपाल दास जी महाराज के गुरु का नाम परम हंस शिरोमणि परम हंशाचार्य 
महंत संत रामदास जी थे। उन्होंने 
Q6W7+RR4 पर 'श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की स्थापना किया था। तब से वहां संत सेवा गौ सेवा और समाज सेवा का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। 
तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज उमरिया बस्ती के मूल निवासी रहे 
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की धरती वशिष्ठनगर बस्ती जनपद में राम जानकी मार्ग चिलमा बाजार के दक्षिण उमरिया गांव में देवरहा बाबा के रूप में एक महान सन्त का जन्म हुआ था। जो अयोध्या से जनकपुर जाने वाले ऐतिहासिक राम जानकी मार्ग के दक्षिण पूण्य सलिला सरयू नदी के तट पर स्थित है। 

इसके अलावा यह उर्वरक भूमि सिद्ध सन्त बाबा निहाल दास और श्यामा सदन अयोध्या के महन्त गोपाल दास और हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास जी जैसे मूर्धन्य विद्वान को भी जना है।महंत राजू दास का जन्म उमरिया गांव के यादव परिवार में हुआ जब वे 4.5 वर्ष के थे तब उनके माता-पिता अयोध्या के हनुमानगढी में छोड़ गए थे। राजू दास का लालन पालन महंत रामदास जी ने किया गुरु के आशीर्वाद और कृपा से उन्होंने मंदिर में रहकर ही शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, उन्होंने साकेत महाविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) और एलएलबी (LLB) की डिग्री हासिल की है। और वह हनुमानगढ़ी के उज्जैनिया पट्टी के महंत संत रामदास के शिष्य बन गए।
      इन्हीं संतों की मणि माला में से श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज थे। उनका साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 को हुआ था। बाबा गोपाल दास ने गौ दान किए थे और प्रभु श्री राम की जन्मस्थली में अपने नश्वर शरीर का परित्याग किया था। उन्होंने अयोध्या धाम न छोड़ने के अपने व्रत का पालन भी किया था। संत गोपाल दास योग के भी अच्छे ज्ञानी रहे। उन्होंने मंदिर का विकास कराया। सभी भक्तों शिष्यों का कल्याण किया। सभी को सही मार्ग प्रदान किया। वे अच्छे निर्मल छवि के रहे। मंदिर के विकास के साथ- साथ संत सेवा गौ सेवा मैं हमेशा लीन रहते थे। मंदिर में निरंतर अष्टयाम सेवा चलती रहती थी।
     श्यामा सदन की विरक्त परंपरा के अनुसार संत गोपाल दास जी आजीवन मंदिर परिसर में ही रहकर साधना करते थे। संत गोपाल दास जी महाराज परमसंत थे। वे धार्मिक विद्वान रहे। कहीं कहीं उनके गुरु लाल जी महराज को कहा गया है।

महंत श्रीधर दास वर्तमान उत्तराधिकारी
श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज के साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 के बाद उनके दो शिष्य
महन्थ गोरखानन्द दास और मंहत श्रीधर दास के मध्य मन्दिर के महंती का विवाद सहायक अभिलेख अधिकारी अयोध्या के न्यायालय और तदोपरांत अयोध्या के जिलाधिकारी न्यायालय में चला था।जिसमें वसीयत के आधार पर महंत श्रीधर दास सम्पत्ति के उत्तराधिकारी घोषित किए गए थे। उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर वर्तमान महंत श्रीधर दास जी महाराज भी आश्रम में निरंतर सत्संग, कथा आयोजन, संत सेवा और गौ सेवा कर रहे है। वे भागवत कथा 
और राम कथा भी करते हैं।उनका यू ट्यूब चैनल भी चलता है।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,PIN - 272001
मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, August 28, 2026

चंद्रहरि मंदिर के कूप पर स्वर्गद्वारी मस्जिद ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

1785 में अयोध्या, जैसा कि घाघरा नदी से देखा गया; विलियम हॉजेस द्वारा चित्रित । इसमें स्वर्गद्वार घाट को दर्शाया गया है। उपरोक्त चित्र के पृष्ठभूमि में औरंगजेब काल की एक मस्जिद दिखाई गई है जो स्वर्गद्वारी मस्जिद प्रतीत होती है।

कुणाल, किशोर के "अयोध्या रिविजिटेड" 2016 , पृ. 439-440 : "यह उल्लेखनीय है कि विलियम हॉजेस, आर.ए., जिन्होंने 1783 में फैजाबाद और अयोध्या का दौरा किया था, ने स्वर्गद्वारी मस्जिद के साथ तटबंध का प्रसिद्ध चित्र बनाया था।

अयोध्या के स्वर्गद्वार के आस-पास में कई प्राचीन मंदिर और पुरातात्विक अवशेष रहे हैं, जिनका इतिहास 11वीं-12वीं शताब्दी या उससे भी पुराना माना जाता है। ब्रिटिश लेखक बाल्फोर के अनुसार ‘अयोध्या की तीन मस्जिदें तीन हिन्दू मन्दिरों पर बनीं। ये मंदिर हैं : जन्म स्थान, स्वर्गद्वार तथा त्रेता का ठाकुर’ ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया एण्ड ऑफ ईस्टर्न एण्ड सदर्न एशिया, पृष्ठ 56)। 


जन्म स्थान के बाबरी मस्जिद पर राम जन्म भूमि मंदिर बन गया है। स्वर्गद्वार के चन्द्र हरि मंदिर के कूप पर नारंगी / स्वर्गद्वारी मस्जिद बना हुआ है । बाद में इस संरचना के बगल में चन्द्र हरि मंदिर को पुनः बनवाया गया है, जो अब भी बरकरार है । स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पौड़ी के तट पर स्थित 'त्रेता का ठाकुर' के पुराने मंदिर के अवशेषों पर औरंगजेब के शासनकाल में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया था। आज भी उस दौर के अवशेष और खंडहर मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से 'त्रेता का ठाकुर मस्जिद' या उससे जुड़े अवशेष के रूप में जाना जाता है। बाद में इस स्थान के समीप ही मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा दूसरा 'त्रेता के ठाकुर' मंदिर का जीर्णोद्धार -निर्माण कराया गया था, जहाँ भगवान राम और उनके दरबार के विग्रह स्थापित हैं।


समयानुसार सरयू नदी के बदलाव और ऐतिहासिक उठापटक के कारण यहाँ के कई प्राचीन स्थल और संरचनाएँ समय के साथ खंडहर में बदल गईं या लुप्त हो गईं। इनका उल्लेख इतिहासकार और ग्रंथों में मिलता है। 

मुगल शासन के तहत , अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था। यह शहर अवध प्रांत की राजधानी था (जिसे अंग्रेजों द्वारा "ओउध" उच्चारित किया जाता था), जिसे "अयोध्या" नाम का एक रूप भी माना जाता है। 

सन् 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, केंद्रीय मुस्लिम शासन कमजोर हो गया और अवध वस्तुतः स्वतंत्र हो गया, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। हालाँकि, शासक स्थानीय हिंदू सरदारों पर तेजी से निर्भर होते चले गए और मंदिरों और तीर्थ केंद्रों पर नियंत्रण शिथिल हो गया।

स्वर्गद्वारी मस्जिद राम की पैड़ी पर अङ्गड़ा चौराहा के पास स्थित है।  औरंगज़ेब ने सन 1680 में अयोध्या में आकर दो मंदिर स्वयं गिरवाए थे उनमें एक त्रेता के ठाकुर और दूसरा स्वर्गद्वार जिनके स्थान पर मस्जिद नुमा ढांचे बनवाए गए, उसी समय का है। यह ढांचा, जो मस्जिद नहीं बल्कि मस्जिदनुमा ढांचा है। समय के साथ उचित रखरखाव न मिलने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण इस इमारत का मुख्य हिस्सा गिर चुका है और अब केवल लखौरी ईंटों से बनी यह मीनार और मुख्य मेहराब का ढांचा ही बचा हुआ है।

पौराणिक महत्व -

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इसका उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इस पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान,हनुमान और परशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या भगवान श्री कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

प्राचीन कूप को ढककर  मीनारनुमा मस्जिद बनी :-

औरंगजेब ने फारसी में मंदिर तोड़ने का आदेश 1669 ईस्वी में दिया था। उसने फरमान जारी कर मुल्तान,काशी अयोध्या और मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने का आदेश दिया था। यह फरमान फारसी भाषा में है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप को तोड़कर उस स्थान पर मीनार बना दी गई है । इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। पहले यह मंदिर परिसर का प्राचीन कुआं रहा करता था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक हो जाते थे। 

स्कंध पुराण में इस स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्गद्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भगवान विष्णु की परम शक्ति का गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक की आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होता है। इसे बाद में नारंगी मस्जिद भी स्थानीय लोग कहते थे । कुछ लोग इसे स्वर्गद्वारी मस्जिद भी कहते हैं।  इसे औरंगजेब ने 1669 में चंद्र हरि विष्णु जी के मंदिर को तोड़वा कर बनवाया था। इसके नीचे चंद्र हरि कूप है।

इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया था और कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई थी जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l  इसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। इसे आसपास के लोगों द्वारा कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर फिदाई खान द्वारा ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। 

फिदाई खान कोका का जन्म मुजफ्फर हुसैन के नाम से हुआ था, एक मुगल सरदार थे जो अवध और लाहौर का गवर्नर था। अवध के सूबेदार इरादत खान की मृत्यु के बाद, उसे अवध और गोरखपुर का फौजदार बना दिया गया। 1674 में सम्राट ने फिदाई खान को काबुल का राज्यपाल नियुक्त किया था, जहाँ उन्होंने स्थानीय कबीलों के विद्रोहों को दबा दिया था। जलालाबाद के पास उन्होंने विद्रोही कबीलों के गाँवों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया था। सम्राट ने उनके प्रयासों की सराहना की और उन्हें अज़ीम खान कोका की उपाधि दी। 1676 में उन्हें दरबार में वापस बुलाया गया और बंगाल का गवर्नर  बनाया गया। 

अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और बिहार पटना  के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)






Thursday, August 27, 2026

पृथक निर्वाचिका की मांग असंवैधानिक, देश को बांटने का षड्यंत्र ✍️ डा राधेश्याम द्विवेदी

पृथक निर्वाचिका के साथ चुनाव की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी विशेष समुदाय या वर्ग के मतदाता केवल अपने ही समुदाय के उम्मीदवार को वोट देते हैं। इसमें अन्य समुदाय के लोग वोट नहीं डाल सकते हैं। इसके तहत किसी खास धर्म, जाति या वर्ग के लिए एक अलग मतदाता सूची और निर्वाचन क्षेत्र बनता है। उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाला और उसे वोट देने वाला व्यक्ति भी उसी समुदाय से होता है।

ब्रिटिश सरकार ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत सबसे पहले1909 के मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की शुरुआत की थी। इसके बाद 1919 के सुधारों में इसे ईसाइयों और एंग्लो-इंडियन तक बढ़ाया गया।1932 के सांप्रदायिक पंचाट में दलितों (शोषित व वंचित वर्गों) के लिए भी इसकी घोषणा की गई।

जिन्ना ने 1916 में मुस्लिम मतदाताओं के लिए इसी तरीके की मांग शुरू की थी और अंततः एक अलग राज्य चाहा था और यहीं से दो राष्ट्र सिद्धांत यानी कि ट्यू नेशन थ्योरी की नींव पड़ी।


पूना समझौता -

पूना पैक्ट की उत्पत्ति अगस्त 1932 के सांप्रदायिक पुरस्कार से जुड़ी हुई है, जिसमें मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों और दलित वर्गों सहित विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों के लिए अलग-अलग निर्वाचक मंडल आवंटित करने की मांग की गई थी। इस परिणाम में, केंद्रीय विधायिका में 71 सीटें विशेष रूप से दलित वर्गों के लिए आरक्षित की गई थीं। 

गांधीजी का अनशन -

गांधी ने यरवदा जेल में दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया था और आमरण अनशन शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा। जिसके बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 1932 में पूना पैक्ट हुआ था। इस समझौते के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका को समाप्त कर दिया गया और इसके बदले संयुक्त निर्वाचन में ही उनके लिए सीटें आरक्षित कर दी गईं।

सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीट पर सहमति -

24 सितंबर, 1932 को अंबेडकर ने जेल में गांधी से मुलाकात की और उन्होंने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए। अलग-अलग निर्वाचक मंडलों के बजाय, अछूतों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित की जातीं, जिससे प्रांतीय विधानसभाओं में सीटों की संख्या 78 से बढ़कर 148 हो जाती।

संविधान के अनुच्छेद 325 का उल्लंघन-

आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों ने इस मांग को संविधान के अनुच्छेद 325 के खिलाफ और देश के सामाजिक ताने- बाने को विभाजित करने वाला करार दिया है। कुछ ने इसकी तुलना ऐतिहासिक रूप से विभाजनकारी राजनीतिक कदमों से भी की है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि देश के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए धर्म, मूलवंश ,जाति या लिंग के आधार पर कोई अलग या विशेष मतदाता सूची नहीं होगी और न ही किसी व्यक्ति को केवल इन आधारों पर मतदाता सूची में शामिल होने से अयोग्य ठहराया जाएगा।

चन्द्र शेखर रावण ने पृथक निर्वाचिका की संसद में की मांग -

नगीना से सांसद और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चन्द्र शेखर आजाद 'रावण' ने संसद में दलितों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग 17 अप्रैल 2026 को उठाई है। उनका तर्क है कि मौजूदा आरक्षित सीटों पर सभी जातियों के मतदाता वोट करते हैं, जिससे कई बार चुनकर आने वाला प्रतिनिधि अपने समाज के प्रति स्वतंत्र न होकर अपनी पार्टी के प्रति वफादार होता है। उनका मानना है कि बिना स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आरक्षण केवल एक संख्या बनकर रह जाता है, जिससे वास्तविक सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण संभव नहीं है।

नेता पर अंकुश लगे - 

दशकों बाद नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण उसी पुराने पन्ने को फिर से खोल रहे हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ सबका विकास और एक भारत श्रेष्ठ भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के कुछ ऐसे चेहरे समाज में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। चंद्रशेखर आजाद की सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग का मतलब है एक ऐसा भारत जहां हिंदू समाज को जातियों के आधार पर पूरी तरीके से बांट दिया जाए। मौजूदा समय में जिस तरीके से व्यवस्था है उनसे जो दलित होते हैं उनके लिए अलग-अलग क्षेत्र में सीटें आरक्षित होती है। लेकिन यहां पर चंद्रशेखर रावण का यह मांग है कि ना सिर्फ अलग सीटें चाहिए बल्कि जो वोट करने वाले लोग हो वो भी दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भी अलग हों। यानी कि उनका पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग किया जा रहा है। 

उन्होंने बाबा अंबेडकर की अस्वीकार की गई मांग को दुबारा उठा दिया है। यह मांग ब्रिटिश काल के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा उठाई गई उस ऐतिहासिक मांग की पुनरावृत्ति मानी जा रही है, जिसे बाद में 1932 के पूना पैक्ट  के तहत समाप्त कर दिया गया था।

 जनता में जबरदस्त गुस्सा -

चन्द्र शेखर रावण की इस मांग को लेकर के सोशल मीडिया पर जनता काजबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा है। जो देश के एक बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है। यह मांग देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली है और बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए पूरे पैक्ट की भावना के भी खिलाफ है। वे इस मांग से जातियों में और भी ज्यादा खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जो कि आगे चलकर के एक अलग राष्ट्र बनाने की नींव भी डाल सकता है। भारत के पहले से दो टुकड़े बनकर देश के विरुद्ध अघोषित युद्ध जैसी हालत कर रखी हैं। अब और टुकड़े कर इसे और छूट नहीं दी जा सकती है। यही वजह है कि लोग जो है वह यह कह रहे हैं कि चंद्रशेखर आजाद रावण के खिलाफ एनएसए लगाया जाए।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)






 





Tuesday, August 25, 2026

संसद में नेता नहीं कुर्सी के व्यापारी हैं (कविता)✍️डा राधेश्याम द्विवेदी ‘नवीन’


संसद में नेता नहीं कुर्सी के व्यापारी हैं।

पक्ष हो या विपक्ष सबकी यही यारी है।

सिलेक्टेड इशू पर इन सबकी तैयारी है।

देश नहीं अगली चुनाव की जो पारी है।।


वे जानते जब लोग साथसाथ खड़े होंगे ।

तरह- तरह उनसे सवाल जब पूछेंगे ।

हर गली में एक दीवार खड़ी करते हैं।

दिल में बीज एक शक का बो देते हैं ।।


जाति दलित अगड़ी पिछड़ी का नाम ले ।

धर्म मजहब संख्या भागीदारी अंजाम ले।

भाषा या बोली उत्तर दक्षिण का नाम ले ।

दरार बनाकर एक रिश्ते का नाम ले ।।


हर पहचान को हथियार बना देते हैं।

हर इंसान को वे शैतान बना देते हैं।

ऊंचा पद लेकर शोषित बने रहते हैं ।

अचूक कमाई कर दलित बने रहते हैं।।


स्कूलों से ज्यादा कोरे नारों की चिंता है।

 अस्पतालों से ज्यादा सभाओं की चिंता है।

रोजगार से ज्यादा राजनीति की चिंता है।

काम से ज्यादा ‘मनकी बात’ की चिंता है।।


एक एक कर वे अपना ईमान बेचते हैं  ।

सुधार के नाम पर  संस्था को बेचते हैं ।

लोगों के विश्वास औ भरोसे को बेचते हैं।

देश का पूरा का पूरा भविष्य बेच देते हैं ।।


त्रासदी नहीं ऐसा नेता पैदा हो जाता है। 

उसकी लड़ाई  को अपना समझ लेता है।

मीडिया अखबार की सुर्खी बन जाता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है।।


सीमा बॉर्डर पर खड़ा सैनिक नहीं पूछता। 

साथी जवान किस जाति से वहां आता ।

किस धर्म और भाषा को वह अपनाता ।

उसकी हर सांस में भारत का नाम आता।। 


जबाव ना सुन केवल सवाल पूछते हैं ।

भीड़ को भड़काकर नारे लगवाते हैं  । 

देश के टुकड़े तोड़ने की बातें करते हैं ।

सामने वाले को बेवकूफ ही समझते हैं।।


साजिशन दुश्मन सीमा को घेर लेता है।

छिप छिपकर आतंकी हमला कर देता है।

हारता है मानता नहीं देशकी गद्दी के लिए

अपने ही घर में वह आग लगा देता है।।


चाहे दिल्ली का ग्राउंड रामलीला हो ।

जंतर मंतर या विशाल छू मंतर हो ।

संसद भवन मकर द्वार की नौटंकी  हो ।

पीएम सीएम के आवास का घेराव हो।।


देश के किसी कोने में कोई भी जमाव हो ।

तरह-तरह नारों की अचूक भरमार हो ।

सनातन धर्म के मूल्यों का तिरस्कार हो।

टुकड़े गैंग  शिरफिरों का चित्कार हो।।


देश नहीं टूटता बाहरी संकट जब आता।

सैनिकों को छुपछुप कर शहीद कर जाता।

सरकारी संसाधन और सुरक्षा की आड़ में 

हमारा नेता प्रजातंत्र को चुनौती दे जाता।।


आरक्षण छेड़ने पर ईट से ईंट बजा देंगे।

जरूरत पड़ गई तो सरकार को गिरा देंगे।

अपने लोगों से सबको  नीचा दिखा देंगे।

मीडिया संसाधन मशीनरी को लगा देंगे।।


पुलिस अपनो पर लाठियां भांजवाता है।

आंसू गैस पानी की बौछार चलवाता है।

बसों ट्रकों में खींच खींचकर ठूसवाता है।

लेजाकर ना जाने कहां पर छुपवाता है।।


देश में नफरत की खेती पनपाया जाता।

विदेशों में देश की छवि को गिराया जाता।

विश्व में भारत की कमियां गिनाया जाता।

कुर्सी के लिए देशका गौरव गिराया जाता।


भारत के नेता यदि नफरत को छोड़ देंगे।

विकास की राजनीति को जबसे चुन लेंगे।

 सबसे बड़ी हार इंसानियत की तब होगी।

पक्ष विपक्ष की नहीं भ्रष्ट राजनीति होगी।।




कवि :

डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,Pin 2720901,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183



















अयोध्या के पौराणिक चंद्रहरि मन्दिर की महत्ता और उस पर आसन्न खतरा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

श्रीहरि विष्णु ने राक्षस संस्कृति के विनाश के लिए अयोध्या में राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। यह अवातर त्रेता युग में हुआ था। इसके पहले भी श्री हरि के अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा 84 कोस में लेने से जुड़े होने के संकेत मिलते हैं।अयोध्या में प्राचीन काल में हरि अर्थात भगवान विष्णु के 16 अति प्रसिद्ध मंदिर थे। कालांतर में अयोध्या में चक्रहरि चंद्रहरि धर्महरि विष्णुहरि ,गुप्तहरि, पुण्यहरि और बिल्लहरि आदि केवल सात हरि स्थान ही बचे हैं। इन स्थानों में कइयों की स्थिति वर्तमान में अत्यंत दयनीय हो चुकी है।


श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इन श्लोकों में श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं - 

सत्यायां सप्तहरयो वर्तन्ते पुण्यवर्धनाः । गुप्तहरिश्चक्रहरिस्तथा  विष्णुहरिः प्रिये ॥

धर्महरिर्बिल्वहरिस्तथा पुण्यहरिः शुभः ।  

एतेषां दर्शनाद् देवि पुण्यवृद्धिः प्रजायते।।

हे प्रिये! सत्या अर्थात् अयोध्या पुरी में सात 'हरि' हैं। इन सातों के दर्शन से पुण्य बढ़ता है। उनके नाम क्रमशः चन्द्रहरि, चक्रहरि, गुप्तहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि हैं। हे देवि! इनके दर्शनों से पुण्य की वृद्धि होती है ।

चन्द्र हरि की महत्ता भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी मां पार्वती से इस प्रकार कहते हैं - 

तस्माच्चन्द्रहरेः पूजा कर्तव्या च विचक्षणैः  

द्विजपूजा चन्द्रपूजा हरिपूजा विधानतः ॥ 

तीर्थ सेवी विद्वानों को चन्द्रहरि की पूजा करनी चाहिये, साथ ही ब्राह्मण, चन्द्रदेव तथा भगवान् श्रीहरि की भी विधान पूर्वक पूजा करनी चाहिये ।

वासुदेवप्रसादेन तत्स्थानं जातमद्भुतम् ।

तद्धि गुह्यतमं स्थानं वासुदेवस्य सुव्रते ॥ 

हे सुन्दर व्रत को धारण करनेवाली पार्वती! महाविष्णु के प्रसाद से वह चन्द्रहरि नामक तीर्थ अद्भुत महिमा वाला हो गया। महा विष्णु का वह तीर्थ अति गुप्त है ।

सर्वेषामेव  भूतानां  हेतु र्मोक्षस्य    सर्वदा ।

तस्मिन् सिद्धाः सदा विप्रा गोविन्दव्रतमास्थिताः ।

यह चन्द्रहरि नामक तीर्थ सम्पूर्ण जीवों को मोक्ष देनेवाला है। इस तीर्थ में निरन्तर विष्णु व्रत का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं ।

नानालिङ्गधरा नित्यं विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः । 

अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।

विष्णु लोक की प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले जीवन्मुक्त जन इन्द्रियों को जीतकर तथा अनेक प्रकार के शरीरादि धारण कर यहाँ परम योग का अभ्यास करते हैं ।

यथा धर्ममिहाप्नोति न तथान्यत्र कुत्रचित् । 

दानं व्रतं तथा होमः सर्वमक्षयतां व्रजेत् ॥ 

जितना धार्मिक अनुष्ठानों का फल इसतीर्थ में मिलता है,उतना अधिक फल अन्यकहीं, किसी भी तीर्थ में नहीं मिलता। यहाँ पर किया गया दान, व्रत एवं होमादि सत्कर्म- ये सब कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होते हैं।

सर्वकर्मफलावाप्तिर्जायते प्राणिनां सदा।

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं दानं च विविधं तु वै ॥ 

यहाँ सदा समस्त जीवों को उनके समस्त कर्मों के फल की प्राप्ति होती है। इसलिये सकाम तीर्थ सेवी को इस तीर्थ में अनेक प्रकार के दानों को अवश्य करना चाहिये।

अन्नदानं भूमिदानं गजदानं गवां तथा।

अश्वदानं रथानां च शिविकायास्तथैव च ॥ 

इस तीर्थ में अन्नदान, भूमिदान, गज दान, गोदान, अश्वदान, रथदान तथा पालकी दानादि यथाशक्ति करना चाहिये ।

दानादिकं विप्रपूजा दम्पत्योश्च विशेषतः । 

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पंचदश्यां विशेषतः । 

तस्य साम्वत्सरी यात्रा देवैश्चन्द्रहरेः स्मृता ॥ 

ये दानादि सत्कार्य ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि में सर्वोत्तम हैं और यहाँ पर सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करके दिया गया दान विशेष फलप्रद है। ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी को उन चन्द्रहरि जी की वार्षिकी तीर्थ यात्रा देवताओं के द्वारा समर्थित है ।

श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इसकी महत्ता इस प्रकार की गई है - 

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चन्द्रहरिं विभुम् 

वपनं तत्र कुर्वीत धर्मी तत्र विचक्षणः ॥ 

स्वर्गद्वार में तीर्थ व्रतधारी विद्वान् पुरुष स्नान करके और विभु चन्द्रहरि जी का दर्शन करके सर्वप्रथम वहीं मुण्डन कराये।

अयोध्यानिलयं विष्णुं ज्ञात्वाशीतांशुरुत्सुकः

आगच्छत् तीर्थमाहात्म्यंसाक्षात्कर्तुं सुधानिधिः ।

आगत्य चात्र चन्द्रोऽथ तीर्थयात्रां चकार सः।

अयोध्या में महाविष्णु श्रीरामचन्द्र जी सदैव निवास करते हैं, इस बात को जानकर चन्द्र देव दर्शन के लिये अति उत्कण्ठित हुए। उन सुधा निधि चन्द्र देव ने तीर्थ-महिमा जानने के अनन्तर उसका प्रत्यक्ष करनेके लिये इस अयोध्या में आकर तीर्थ यात्रा की।

क्रमेण विधिपूर्वेण नानाश्चर्यसमन्वितः । 

समाराध्य ततो विष्णुं तपसा दुश्चरेण वै ॥ 

चन्द्रमा ने अनेक प्रकार की आश्चर्यमयी घटनाओं को देखकर विधि पूर्वक क्रम से यात्रा करके अति कठिन तपश्चर्या के द्वारा महाविष्णु की आराधना की।

तत्प्रत्यक्षं समासाद्य स्वाभिधानपुरस्सरम् ।

हरिं संस्थापयामास तेन चन्द्रहरिः स्मृतः ॥ 

महाविष्णु के सामने उपस्थित होने पर चन्द्रमा ने यही वर माँगा कि आप यहाँ सदैव निवास करें तथा मेरे नाम से पीछे आपका नाम रहे, अर्थात् चन्द्र हरि नाम से आपकी प्रसिद्धि हो। इस प्रकार चन्द्र देवने अपने नाम को पूर्व में रखकर चन्द्र हरि जी की स्थापना की, अतः यह तीर्थ चन्द्र हरि नाम से विख्यात है ।

     यह माना जाता है कि ये सप्त हरि स्थानों का अस्तित्व और प्रमाण अयोध्या में लगभग 12वी शताब्दी से पूर्व से रहा है । इनमे चंद्र हरि मंदिर को 16 हरियों में चौथा स्थान प्राप्त है


चंद्रहरि मन्दिर की अवस्थिति:-

अयोध्या तीर्थ के स्वर्गद्वार की महानता को जानकर, चंद्रदेव ने वहाँ तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की सोची थी। चंद्रदेव ने भगवान विष्णु की एक प्रतिमा स्थापित कर उसकी पूजा की थी। यह प्रतिमा चंद्रहरि के नाम से प्रसिद्ध हुई। चंद्रहरि का प्राचीन मंदिर अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पैडी के पास स्थित सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर परिसर में भी कुल 5 मंदिर हैं। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में चंद्रहरि भगवान विराजमान हैं, जबकि उसके दाहिने ओर मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, बाईं ओर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर है।


द्वादश ज्योतिर्लिंग : शिव-विष्णु एकता: मंदिर के गर्भगृह में 12 शिवलिंग एक ही बड़ी 'योनि' पर स्थापित हैं, जो 'शिव मंडल' (शिव का विस्तारित परिवार) का प्रतीक हैं। ये द्वादश ज्योतिर्लिंग एक विशाल अर्घ्य के ऊपर है और वह भी मूर्ति में साक्षात ओमकार का दर्शन कराता है। चंद्र जी मंदिर का पावन वैभव अति विशिष्ट है। यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही मंदिर के परिसर में स्थित मुख्य गर्भगृह में विराजमान काले कसौटी के एक ही पत्थर में 11 मूर्तियां मौजूद हैं, जो अति महत्वपूर्ण मानी जाती हैं l माना जाता है इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और नित्य दर्शन से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस स्थान पर यह मंदिर भगवान चन्द्रमा द्वारा स्थापित किया गया था। सैकड़ों वर्षों पूर्व इस मंदिर को महाराज विक्रमादित्य द्वारा पुनः जीर्णोद्धार किया गया। तब से लेकर आज भी यह मंदिर स्थापित है।

मान्यता है कि चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने चंद्रमा को आशीर्वाद दिया कि वे जहां विराजे, वहीं चंद्रहरि मंदिर होगा।मंदिर के गर्भगृह में एक काले कसौटी के पत्थर में ही भगवान राम गरुड़ पर विराजमान हैं. जिनके साथ किशोरीजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, नल, नील अंगद, जामवंत, हनुमान और गरुण विराजमान हैं। चंद्रमा द्वारा पूजित हरि अर्थात नारायण ही चंद्र जी महादेव हैं। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन एवं धार्मिक महत्व रखता है।

         मंदिर के ठीक सामने यहां वर्तमान में राम की पैड़ी बनी हुई है, वहां सरयू की धारा प्रवाहित होती थी और त्रेता युग में यहां चंदन वन हुआ करता था। चंद्रमा द्वारा उपासना के बाद इसी वन में नारायण जी ने चंद्रमा को दर्शन दिया था।  वैसे तो अयोध्या का कण-कण सिद्धि की खान है, लेकिन स्वर्गद्वार तीर्थ अत्यंत महत्व का है और उसमें भी चंद्रहरि में हरि और हर दोनों के दर्शन होते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन:-

इस मंदिर में भगवान चंद्र्हरेश्वर के साथ बारह ज्योतिर्लिंग स्थापित है। चंद्र्हरी का मतलब होता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु की परम शक्ति वहां पर उपस्थित है और द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना भी किया गया है। पृथ्वी पर विद्यमान बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए कई स्थानों पर जाते है और उस स्थान के पुण्य प्राप्ति के लिए वह सिर्फ अयोध्या के इस चन्द्र हरि में दर्शन करने से प्राप्त होता है । जो व्यक्ति जो कमाना लेकर आता है उसे उस प्रकार की फल की प्राप्ति होती है।

गोदांबा महोत्सव:-

इस मंदिर की परंपरानुसार प्रत्येक वर्ष के एक माह तक धनुर्मास महोत्सव का आयोजन होता है। जिसे श्री गोदाम्बा पर्व कहा जाता है। मंदिर का वार्षिकोत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसमें एक महीने तक प्रतिदिन खीर और खिचड़ी से भगवान की सेवा की जाती है। इसका प्रसाद सैकड़ों लोगों में वितरित किया जाता है। 14 जनवरी को समापन के दिन भव्य भंडारा और संत सेवा होती है। मंदिर की परंपरा और पूजन पद्धति आगम है। मंदिर परिसर में गोदांबा जी का मंदिर भी निर्माणाधीन है. गोदांबा जी साक्षात लक्ष्मी जी ही हैं, जो भगवान रंगनाथ की पटरानी हैं और भगवान रंगनाथ अयोध्या के कुलदेवता हैं। इस नाते गोदांबा जी अयोध्या की कुलदेवी हुईं। मंदिर पर निरंतर पूजन स्त्रोत का पाठ आदि चलता रहता है।

उद्धार की प्रतीक्षा में खंडहर हो चुके प्राचीन धर्मस्थल का असलियत :-

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इस स्थान का उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इन पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान , हनुमान और पराशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की भगवान जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

मंदिर के प्राचीन कूप को हमेशा हमेशा के लिए ढककर बना दी गई मीनार नुमा मस्जिद :-

इस मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक होते हैं। स्कंध पुराण में स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्ग द्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते है। तथा लिखा है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु की परम शक्ति व गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होती है। इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l इस स्थान पर मस्जिद के अवशेष बचे हैं, जिसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। अब यह खंडहर बन गया है। इसे आसपास के लोगों को कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और अयोध्या के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। इस मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l ये स्थल सैकड़ों साल से वीरान होकर अब खंडहर बन चुके हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं ।


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लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

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Thursday, August 20, 2026

गोस्वामी तुलसीदास जी की जीवनगाथा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि थे। उन्हें महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है । उनके मन में उनके माता-पिता की कोई छवि नहीं उभरती रही है । उन्होंने उनको देखा ही नहीं था। उन्होंने सुना था कि उनके पिता पंडित आत्माराम दूबे, चित्रकूट के निकट राजापुर गाँव के रहने वाले थे। वे एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी थे। माता हुलसी तुलसी के जन्मते ही स्वर्ग सिधार गईं थी। पिता जी की ज्योतिषीय गणना के अनुसार तुलसीदास का जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र में हुआ था,जो माता-पिता के लिए प्राणघातक था। माता जन्मते ही मर गई थी। इससे भयभीत और दुखी पिता ने बालक का तुरंत त्याग कर संन्यास की राह पकड़ लिया। 

ज्योतिष शास्त्र में अभुक्तमूल ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम चरण और मूल नक्षत्र के शुरुआती चरण के मिलने का एक अत्यंत संवेदनशील और अशुभ संधि-काल (गंडांत) है। इस विशेष समयावधि में जन्म लेने वाले जातक के लिए विशेषज्योतिषीय शांति और उपाय कराए जाते हैं। इस काल में जन्म लेने वाले जातक के बाल्यकाल में स्वास्थ्य, परिवार या माता-पिता के लिए कुछ कठिनाइयाँ या कष्टप्रद लाते हैं। इस दोष के शमन के लिए जन्म के 27वें दिन (जब दोबारा वही नक्षत्र आए) या योग्य विद्वान पंडित से गंडमूल शांति पूजा और हवन विधान करवाना अनिवार्य माना जाता है। 

तुलसी दास का बचपन काफी अभावों और कठिनाइयों में बीता था। उनको ग्रह शांति का कोई अवसर ना बन पाया। माता जी की मृत्यु और पिता जी द्वारा गृह त्याग के बाद घर की दासी चुनिया के जिम्मे में वे पड़े। वह उन्हें उठा कर अपने मायके ले गई। चुनिया, को तुलसी माई कहता था, उसकी अति क्षीण छवि तुलसी के मन में उभरती है, क्योंकि पाँच साल की आयु होते-होते वह भी स्वर्ग सिधार गई। 

चुनिया माई के यहाँ कभी-कभी अयोध्या की पार्वती अम्मा नाम की एक विधवा ब्राह्मणी आती थी, जिसे सब लोग माईजी कहते थे। कहते हैं माईजी ने ही उसबालक का नाम ‘रामबोला’ रखा था। चुनिया माई के मरने के बाद बालक पार्वती माईजी के संरक्षण में पहुँच गया। माईजी भीख मांग कर पेट पालती थी। माईजी के साथ बालक भी भीख मांगने जाने लगा। माईजी ने उसे यह भजन सिखाया –

 “जय सियाराम जय जय सियाराम, 

जय जय विघ्नहरन हनुमान”। 

राम बोला और माईजी द्वार-द्वार पर यही भजन गाते थे। माईजी राम के नाम पर और अनाथ रामबोला का पेट पालने के नाम पर भीख मांगती थी। राम बोला अनाथ पर दया कर लोग थोड़ी ज्यादा भीख देते थे। यह सिलसिला लगभग दो साल चला जब तक माईजी स्वयं स्वर्ग न चली गईं।

माई जी के मर जाने से रामबोला मारा- मारा भटकने लगा। यद्यपि माईजी के ढर्रे पर वह भी भीख मांगने निकलता था, उसे भीख से ज्यादा भोजन की जरूरत थी। इसलिए वह लोगों से विनती करता था कि भीख के बजाय उसे भोजन दें। वह छोटे ही क्षेत्र में घूम-फिर कर भीख मांग पाता था। इसलिए ज्यादातर गृहणियाँ उसे पहचान गई थीं। उनमें कुछ तो बड़ी दयालु थीं, जो उसे पेट भर भोजन दे दिया करती थीं। लेकिन कुछ बड़ी कंटही थीं । वे उसे ‘मरभुक्खा’ कह कर भगाती थीं और कई बच्चे उसे ‘मरभुक्खा’ कह कर चिढ़ाते और दौड़ाते हुए ढेले मारते थे। ऐसी हालत में वह जोर-जोर से “जय सियाराम जय जय सियाराम जय जय विघ्नहरन हनुमान” चिल्लाता हुआ भागता था और बच्चे हँसते  रहते थे।

तुलसी को बचपन के दुखदायी गरीबी के वे पुराने दिन नहीं भूलते हैं – कथरी ओढ़े हुए, हाथ में मिट्टी का लोटा लिए हुए, वह माईजी के पीछे-पीछे घर-घर घूमता था। दांत निपोर कर, पेट ठोंक-ठोंक कर, लोगों के पैरों पड़कर, राम के नाम पर भीख माँगता था। माई जी के गुजर जाने के बाद तो लोग बड़ी हिकारत से उसे रामबोलवा कह कर बुलाते थे।

माईजी ने उसे सिखा रखा था कि सबके पेट रामजी और उनके सेवक हनुमानजी पालते हैं । अकेले में वह रामजी को गोहराता था, खासकर तब जब उसे भूख लगती थी और बच्चों के डर से भीख मांगने की हिम्मत न जुटा पाता था। वह हनुमान जी से बच्चों की शिकायत करता था कि ‘हे हनुमान स्वामी, उसे खदेड़ने वाले बच्चों को मार-मार के भगाओ।’

इस तरह रामबोला अनाथ हो गया था,जब भीख में दिक्कत आती तो वह अपने मामा के घर आ गया। मामा ने उसका पालन पोषण किया। जब-जब भी वह मामा से अपने माता-पिता के बारे में प्रश्न करता था, तब उत्तर में मामा बालक से कहते थे कि ‘राम जी ही उसके माता-पिता हैं।’ 

थोड़ा बड़ा होने पर उन्हें यह समझ में आया कि, छोटे बच्चों के माँ-बाप सदा उनके पास रहते हैं, उनसे वे दूर नहीं जाते हैं।उन्हें आश्चर्य हुआ कि उसके माता-पिता रूपी रामजी उसे अकेला छोड़ उस मन्दिर के वैभव कैसे रहते हैं? सदा लोगों की भीड़ के बीच कैसे रहते हैं? 

बालक तुलसीदास अत्यंत निर्मल मन के थे। अतः उन्हें मामा के शब्दों पर पूर्ण विश्वास था। एक दिन रात्रि के समय वे मन्दिर में गए और श्री राम की मूर्ति के समीप पहुँचे।उन्हें बडी जोर की भूख व प्यास लगी हुई थी, इसी कारण वे रोने लगे तथा मूर्ति के पास ही उन्होंने कुछ खाने को माँगा। उनकी निष्पाप प्रवृत्ति को देखकर स्वयं प्रभु श्रीराम जी भी विचलित हो गये और उन्होंने थोड़ा प्रसाद उन्हें  खाने के लिए दिया। 

इस कारण तुलसीदास के मन में इस बात का जरा भी संदेह नहीं रहा कि रामजी ही उनके सच्चे माता-पिता थे। फिर तुलसी दास ने श्रीराम से पूछा कि वे अकेले ही क्यों हैं और अपने बच्चों की चिंता क्यों नहीं करते? किंतु मूर्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। हमें अपने माता-पिता के पास ही रहना चाहिए, ऐसा सोचकर तुलसीदास ने उस मूर्ति को घर ले चलने का विचार किया। मूर्ति ले जाते समय हुई थोड़ी आवाज के कारण मंदिर के पुजारी की नींद खुल गई। 

उन्होंने तुलसीदास को रूकने के लिए कहा। तुलसीदास ने कहा कि वे अपने माता-पिता को घर ले जा रहे हैं और उन्हें मंदिर में रखने का पुजारी को कोई अधिकार नहीं। पुजारी तुलसीदास के पीछे पीछे चलने लगे। तुलसीदास यथा सम्भव तेजी से दौड़े। दौड़ते - दौड़ते वे तुलसीजी के वन में पहुँचे और वहाँ पहुँचकर बेहोश हो गये।

(एक अन्य कथा में कहा गया है कि बचपन में भीख मांगते हुए कुछ बच्चे तुलसीदास को दौड़ा रहे थे और वे “जय सियाराम जय जय सियाराम, जय जय विघ्नहरन हनुमान” भजन भूल कर “हे राम जी मुझे बचाओ, हे हनुमान जी बचाओ,” चिल्लाता हुआ भाग रहा था कि सामने से आकर एक व्यक्ति ने उनकी बांह पकड़ ली और शरारती बच्चों को डांटकर भगाया और बालक तुलसी को बचाया था।)

कृपालु भगवान बालक के प्रेम व सत्य से अत्यंत प्रभावित हुए। उसी समय सरयू नदी के तट पर स्थित गोण्डा जिले के सुकरखेत के रामानन्द संप्रदाय के नरहरि दास नामक संत वहाँ पहुँचे, उन्होंने उस बालक को उठाया और उसे सांत्वना दी। तुलसीवन में मिलने के कारण स्वयं नरहरि दास ने ही बालक का नाम तुलसीदास रखा। संत नरहरि दास ने तुलसी को बताया कि रामजी ने उन्हें उसके माता-पिता के रूप में भेजा है। उस सत्पुरुष द्वारा दी गई प्रेम की वर्षा से बालक तुलसीदास अत्यंत संतुष्ट व आनन्दित हुए। 

गुरु ने ही उन्हें राम-कथा सुनाई, जिससे उनके मन में श्री राम के प्रति अटूट भक्ति जागी। तब से वे तुलसीदास के रूप में पहचाने जाने लगे। संत नरहरि दास ने उन्हें केवल आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उनके लिए उपयुक्त शिक्षा देकर उनके मन व हृदय में भक्ति की नींव भी डाली। वह व्यक्ति एक संत थे, जो तुलसी की स्थिति देख कर बहुत द्रवित हुए थे। वे उस अनाथ को अपने आश्रम में ले गए। उस समय बालक की उम्र कोई सात साल की रही होगी। वहाँ अन्य साधुओं के विरोध के बावजूद उन्होंने उसे आश्रम में रखा; उनका ब्राह्मणोचित संस्कार कराया; उनका नाम रामबोला से बदल कर तुलसीदास रखा और विद्यारंभ कराया। ये संत थे रामानंदी वैरागी साधू नरहरिदास थे जिन्हें बालक बाबा कहने लगा था। अगले आठ सालों तक बाबा ही उसके गुरु, शिक्षक और संरक्षक रहे।

विवाह -

तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नाम की विदुषी कन्या से हुआ था। वे अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी के उलाहने (कि जितना प्रेम इस देह से करते हो, उतना श्री राम से करते तो बेड़ा पार हो जाता) ने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और सन्यास धारण कर लिया।

प्रमुख रचनाएँ -

तुलसीदास जी ने संस्कृत और अवधी दोनों भाषाओं में दर्जनों रचनाएँ कीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'रामचरित मानस' है। उनकी कुछ अन्य प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

रामललानहछू

वैराग्य संदीपनी

बरवै रामायण

पार्वती-मंगल

जानकी-मंगल

रामाज्ञाप्रश्न

दोहावली 

कवितावली 

गीतावली

श्रीकृष्ण-गीतावली

विनयपत्रिका

सतसई

छन्दावली रामायण

कुण्डलिया रामायण

राम शलाका

संकट मोचन

करखा रामायण

रोला रामायण

झूलना

छप्पय रामायण

कवित्त रामायण

कलिधर्माधर्म निरूपण

हनुमान चालीसा

रामचरितमानस की रचना -

तुलसीदास जी ने अयोध्या में रामचरित मानस की रचना शुरू की और इसे काशी (वाराणसी) में पूर्ण किया। यह ग्रंथ आज हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथों में से एक है, जिसने श्री राम की कथा को घर-घर तक पहुँचाया।

मृत्यु (निर्वाण) –

तुलसीदास जी ने अपना अंतिम समय काशी के असीघाट पर व्यतीत किया। 1623 ईस्वी (संवत् 1680) में उन्होंने अपनी देह त्यागी। उनकी मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध है-

संवत् सोरह सौ असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्योशरीर।

निष्कर्ष -

तुलसीदास जी ने लोक-भाषा (अवधी) में रामायण लिखकर भक्ति को जन-साधारण के लिए सुलभ बना दिया। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को नैतिकता, धैर्य और भक्ति की प्रेरणा देती हैं।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

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