Friday, October 16, 2026

अति विलक्षण प्रतिभा के पुंज प्रज्ञाचक्षु कवि श्री घनराज शास्त्री ( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 27)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भूमिका -
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से श्री घनराज शास्त्री जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय -
श्री शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद की खलीलाबाद तहसील के बेलहर कर्जा नामक ग्राम में सन् 1873 में हुआ था। आपके पिता का नाम नेपाल मिश्र था और आप जब केवल दो-ढाई वर्ष के ही थे तब चेचक के कारण आपकी दोनों आँखे जाती रही थी। आप वास्तव में प्रज्ञाचक्षु थे। आपकी विद्वत्ता की इतनी ख्याति थी कि भरतपुर, अलवर, छतरपुर, मझौली, मनकापुर तथा बाराबकी के राजाओ-महा राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में बुलाकर आपका सम्मान किया था। आपके विलक्षण बैदुष्य का इससे अधिक बडा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आपने इटावा की 'ज्ञानपीठ को वनस्पति चंद्रोदय' और उत्तर प्रदेश शासन को 'धनुर्वेद' नामक ग्रन्थों के निर्माण मे अपनी अपूर्व सहायता प्रदान की थी। आप जहाँ संस्कृत के 6 विषयों के आचार्य थे वहाँ फारसी के भी मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा में काव्य-रचना करने का उन्हे इतना अभ्यास था कि प्राय कथा-वाचन ब्रजभाषा-छन्दों में ही किया करते थे । आपका निधन सन् 1958 में लखनऊ में उस समय हुआ था जब आप उत्तर प्रदेश सरकार के निमन्त्रण पर वहाँ रहकर एक पुस्तक लिखा रहे थे।

विलक्षण प्रतिभा -
आपने अपनी अपूर्व मेंघा और धारणा- शक्ति के कारण भारतीय वाङ्मय के अनक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आप एक ही दिन से ढाई हजार श्लोक कण्ठाग्र कर लेते थे। बाल्यावस्था में ही आपने अनेक विद्वानों और सन्यासियों के सत्संग का लाभ उठाकर अनेक प्राचीन दुर्लभ ग्रन्थों की जानकारी प्राप्त कर ली थी । आपको कुल 83 लाख 40 हजार श्लोक कंठस्थ थे। कहा जाता है कि आपने डॉ० भगवानदास जेसे मनीषी को भी उनके 'प्रणववाद’ नामक ग्रन्थ की रचना में अपना सक्रिय सहयोग दिया था।’ ‘प्रणववाद' भारत रत्न से सम्मानित प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. भगवान दास द्वारा संपादित और प्रकाशित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनोखा ग्रंथ है। यह ग्रंथ 1910 से 1913 के बीच तीन भागों में प्रकाशित हुआ था। इसके मूल रचयिता डॉ. भगवान दास के अनुसार, यह ग्रंथ प्राचीन काल के महर्षि गार्ग्यायण द्वारा रचित एक अत्यंत दुर्लभ और अज्ञात ग्रंथ का सारांश है। डॉ. भगवान दास को यह ग्रंथ उनके थियोसोफिकल सोसायटी के मित्र पंडित धनराज ने अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति से मौखिक रूप से सुनाया था, जिसे भगवान दास ने लिपिबद्ध किया था। पंडित धनराज का इस पुस्तक के प्रकाशित होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। इस ग्रंथ में 'प्रणव' (ॐ) के आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व, वैदिक सिद्धांतों, महा - वाक्यों, और ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े गूढ़ रहस्यों की व्याख्या की गई है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Thursday, October 15, 2026

बस्ती के अल्प ख्यातित कवि :श्री बुध यदुनाथ जी (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 26)


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरणअथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से श्री बुध यदुनाथ जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
       श्री बुध यदुनाथ जी का जन्म बाँसी तहसील के जीवा नामक ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आसपास पैदा हुए थे। इनका जन्म भूमि ग्राम जीवा है ,जिसे जीवा या 'जुआ' भी कहा जाता है। यह उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिला के अंतर्गत बांसी तहसील बांसी कोतवाली और मिठवल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली एक ग्राम पंचायत है।यह क्षेत्र राप्ती नदी के मैदानी और तटीय प्रभाव वाले क्षेत्रों के निकट है, जिससे यहां बारिश या बाढ़ के मौसम में कभी-कभी जलभराव या स्थानीय रास्ते प्रभावित होने की खबरें आती रहती हैं।
     आपके बारे में 'उपहार' में लिखा है, आप सभी रसों के सिद्ध हस्त कवि थे। उन्होंने श्रृंगार, वीर, करुणा, हास्य और भक्ति जैसे सभी रसों में पारंपरिक छंदों (कवित्त, सवैया और दोहा) की अत्यंत उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं। इनकी रचनाओं में गंवई संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और शास्त्रीय छंद विधान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। क्षेत्र की साहित्यिक पत्रिकाओं और 'उपहार' पत्रिका में उनके जीवन और दुर्लभ छंदों को सहेज कर समय-समय पर प्रकाशित किया गया है। इनकी भाषा शैली बड़ी परिमार्जित एवं आकर्षक है। इनका काव्य संग्रह एक स्वतंत्र ग्रन्ध है।
प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 



Sunday, October 11, 2026

श्री सीताराम शुक्ल स्वतंत्रता सेनानी कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 29) ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के अध्याय 3 तृतीय चरण के फुटकर छंदकारों की सूची में पंडित सीताराम शुक्ल जी का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसे बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान , भाग 2, प्रकाशन वर्ष 2008 के पृष्ठ 233 पर अतिसंक्षेप में अधिसूचित किया गया है। श्री सीताराम शुक्ल जी का जन्म बस्ती-बांसी मुख्य मार्ग पर बस्ती से 13 किमी दूर वर्तमान में भानपुर तहसील के बस्ती - बांसी मार्ग पर सल्टौआ ब्लॉक में स्थित भादी खुर्द में गांव में श्री रंगनाथ शुक्ल व सूर्यकली के घर में 1897 ई.में हुआ था। इनका विवाह किशोरी शुक्ला से हुआ था। बस्ती में कांग्रेस की नींव रखने वाले सीताराम शुक्ल गुलामी के कारण प्राइमरी शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके थे, लेकिन स्वाध्याय से हिंदी, उर्दू, संस्कृत की जानकारी इनको हासिल थी। गुलामी की जंजीर इन्हें स्वीकार नहीं थी। पति-पत्नी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन की राह पकड़ ली थी।वर्ष 1919 में नासिक में कांग्रेस अधिवेशन में शुक्ल जी ने व्याख्यान दिया था , जिसके बाद वे ब्रिटिश सरकार की निगाह में आ गए थे। आजादी की लड़ाई में उनकी गाथा आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। उन्होंने इस लड़ाई में अपना सब कुछ दान कर दिया था। 

कई बार जेल भी गये -
नासिक अधिवेशन से लौटने के बाद बस्ती में कांग्रेस के संस्थापकों में रहने वाले सीताराम शुक्ल ने सभी आंदोलनों को लीड किया था और पांच बार जेल गए थे।1922 के असहयोग आंदोलन में शुक्ल को एक वर्ष, 1930 में नमक सत्याग्रह में छह माह, 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में तीन माह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास हुआ था। कुल मिलाकर उन्होंने चार साल तीन माह की सजा काटी थी। 

सीताराम शुक्ल के घर रुके नेहरू जी -
19 सितंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक जनसभा गोरखपुर में होनी थी। अंग्रेजों ने सभा निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दिया। 20 सितम्बर को नेहरू जी सीताराम शुक्ल के घर पहुंचे। यहीं पर गोरखपुर जनपद (जिसमें बस्ती जिला भी शामिल था) की कमेटी का गठन किया। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को जिला अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्यसमाजी देवव्रत को महामंत्री तथा सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया गया था। 1921 में गांधीनगर (पक्का-बजार) बस्ती में सीताराम शुक्ल के संयोजन में नेहरू जी की एक विशाल जनसभा कराई गई थी। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई थी। नौ अक्टूबर 1929 को बस्ती के गांधीनगर में होने वाली जनसभा में भाग लेने आए नेहरू जी इनके घर पर रुके थे। हालांकि, धारा 144 लागू होने के चलते यह जनसभा निरस्त हो गई थी। नाराज सीताराम शुक्ल ने इसी दिन हथियागढ़ में जनसभा कराई थी, जिसको महात्मा गांधी व पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संबोधित किया था।
हर्रैया से दो बार विधायक रहे -
आप उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 292 - हर्रैया (दक्षिण- पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। उनका कार्यकाल 1952-57 तक था।1973 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंडित सीताराम शुक्ल एवं उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को दिल्ली बुलाकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमाण-पत्र व ताम्र-पत्र देकर सम्मानित किया था। 

राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार -
2 फरवरी 1977 को लखनऊ के सिविल अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार कराया था।

चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति -
शुक्लजी चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे वक्ता, गायक, वादक, घुड़सवार भी रहे । वे एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक प्रखर कवि और लेखक भी थे। उन्होंने 14 पुस्तको का लेखन भी किया जिसमें अधिकांश कृतियां उचित संरक्षण के अभाव में समय के साथ लुप्त (गायब) हो गईं। वर्तमान में उपलब्ध उनके साहित्य में सबसे प्रमुख और प्रामाणिक कृति स्वराज्य का रास्ता है।
स्वराज्य का रास्ता : उनकी एकमात्र उपलब्ध कृति - 
गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ द्वारा हिंदी में 1939 में 129 पृष्ठों वाला यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था। पंडित सीताराम शुक्ल द्वारा लिखित और 1939 में गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ द्वारा प्रकाशित 'स्वराज्य का रास्ता' एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और राजनीतिक कृति है। यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में स्वराज्य की अवधारणा, आर्थिक स्वावलंबन, स्वदेशी अपनाने और सामाजिक एकता पर जोर देती है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए नागरिकों को मानसिक व सामाजिक दासता से मुक्त होने का संदेश देती है।

विद्वान वक्ता -
वे कुशल नेतृत्व कर्ता के साथ साथ विद्वान् वक्ता भी थे । उनका हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, था अंग्रेजी पर समान अधिकार था। वह एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी और वीर रस, राष्ट्रभक्ति व सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचनाएं करने वाले छंदकार थे। साहित्य और काव्य कला के क्षेत्र में, विशेषकर परंपरागत शास्त्रीय छंदों (दोहा, मनहरण कवित्त, और सवैया) की रचना में उनका गहरा अनुराग रहा है। उनके छंद पारंपरिक विधाओं जैसे कवित्त और सवैया में रचे गए थे, जो क्रांतिकारियों में जोश भरते थे। वे फुटकर कविता भी लिखते रहे हैं। उनके द्वारा रचित छंदों और इन तीनों पारंपरिक काव्य विधाओं का विवरण इस प्रकार है-

1. दोहा छंद-
दोहा एक मात्रिक अर्धसम छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। अंत में गुरु और लघु (।) का होना आवश्यक माना जाता है। इसके लक्षण: 13 + 11 = 24 मात्राएँ प्रति पंक्ति होती है।

2. मनहरण (कवित्त) छंद -
मनहरण को 'कवित्त छंद' भी कहा जाता है। यह एक प्रमुख वर्णिक मुक्तक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। इसमें 16 और 15 वर्णों पर यति (विराम) होती है और प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु (काव्य रूप से दीर्घ) होता है। इसके लक्षण: 16 + 15 = 31 वर्ण होते हैं।

3. सवैया छंद -
सवैया एक वर्णिक सम वृत्त छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण तक होते हैं। इसके अंतर्गत कई भेद आते हैं जैसे मत्तगयन्द सवैया, दुर्मिल सवैया, किरीट सवैया आदि, जो गणों (मगण, भगण आदि) के क्रम के आधार पर तय होते हैं। इनके लक्षण: 22 से 26 वर्णों का सुंदर संगीतात्मक प्रवाह होता है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Saturday, October 10, 2026

कलाधर-पाल-ब्रजेश के समय के लुप्तप्राय बस्ती के साहित्यक पुरोधा (बस्ती जनपद के छंदकार कड़ी 35) मूल लेखक:डा. मुनि लाल उपाध्याय "सरस"प्रस्तुति:आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन"


जिन साहित्यकारों ने “बस्ती” को एक खास पहचान दिलाई, लोगों में साहित्यिक चेतना पैदा की, आज अपने ही गांव - क्षेत्र और जिले में बेगाने होकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। जिन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में बस्ती को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। दुख इस बात का है कि यहीं के लोगों ने उन्हें भुला दिया। न साहित्य प्रेमियों को इन्हें याद करने की फुर्सत है और न ही शासन - प्रशासन को। कभी कभार आचार्य शुक्ल और रंगपाल जी को याद कर लिया जाता है। शेष लोग इतिहास के पन्नों में सिमट चुके हैं। कुछ अपने अपने सीमित साधनों से अपना अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं।

डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार

बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। इस अध्याय ने सर्वश्री भास्कर प्रसाद "भास", राजाराम शर्मा "अंचल", बद्री प्रसाद मिश्र "हरीश, रानी सौभाग्य सुन्दरी "सुन्दरअली", लाल श्रीकण्ठ सिंह "ब्रजदेव ", बाबू श्री बद्रीप्रसाद " पाल", श्रीरामदेव सिंह "कलाधर ", श्री अब्बास अली "वास", पण्डित मातादीन त्रिपाठी "दीन", श्रीगणेशदत्त पाण्डेय "विशिख", श्री सरस्वती प्रसाद शर्मा "वारिज, पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन", प० राम नारायण पाण्डेय "पागल,श्री केदारनाथ मिश्र "दीन”, पंडित रामचरित्र उपाध्याय, ,पंडित व्रज विहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश', श्री रामलाल श्रीवास्तव 'लाल', पण्डित अद्या प्रसाद पाण्डेय 'द्विजेंद्र' , श्री राम कृपाल पाण्डेय ,श्री राम आश्रय सिंह 'रसिकेन्दु' सहित बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। अधोलिखित 18 छन्दकारों की सूची जिनका पर्याप्त साहित्य न मिल कारण संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है।

अध्याय 3 तृतीय चरण के फुटकर छंदकारों के नामोलेख की सूची और संक्षिप्त परिचय -

[संदर्भ:बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान , भाग 2, प्रकाशन वर्ष 2008 , पृष्ठ 233 -34]

1.श्री बुध यदुनाथ जी
श्री बुध यदुनाथ जी का जन्म बाँसी तहसील के जीवा नामक ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आसपास पैदा हुए थे। आपके बारे में 'उपहार' में लिखा है, आप सभी रसों के सिद्ध हस्त कवि थे। भाषा शैली बड़ी परिमार्जित एवं आकर्षक है। इनका काव्य संग्रह एक स्वतंत्र ग्रन्ध है।

2.आचार्य धनराज शास्त्री
ये प्रज्ञा चछु (जन्मांध) थे। इनका जन्म 1955 वि0 के आसपास हुआ था। आशुकविता करते थे। संस्कृत के हजारों श्लोक कंठस्थ थे। ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि थे। आशु कवित्व आप में कूट-कूट कर भरी थी। आपकी कविता सुन्दर होती थी।

3.महात्मा गूंगदास
राप्ती नदी के किनारे जिगिना ग्राम (संभवतः उतरौला बलरामपुर )में 1960 विक्रमी के आसपास आप ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे। ब्रजभाषा के अच्छे कवि होने के साथ उच्चकोटि के सन्त थे।

4.श्री चिन्तामणि त्रिपाठी
जन्म सम्वत् 1966 वि० ग्राम गजाधरपुर में हुआ था। ये घनाक्षरी और सवैया तथा दोहा व कुण्डलियां के अच्छे छन्दकार एवं बिरहा लोकगीत रचयिता के रूप में बहुचर्चित हैं।

5.सीताराम शुक्ल
इनका जन्म ग्राम भादी सम्वत् 1956 के आसपास हुआ था। ये छन्दों के अच्छे रचयिता थे। दोहा, मनहरण, सवैया छन्द फुटकर लिखा था। ये एम एल ए भी रहे।

6.अखण्डानन्द जी
डुमरियागंज तहसील में राप्ती के किनारे उद्भट सन्त उत्कृष्ट छन्दकार के रूप में जाने जाते है। इनका जन्म 1950 वि0 तदनुसार लगभग ईसवी सन 1893 के आसपास बताया जाता है। इन्होनें रामशक्ति से संबंधित फुटकर छन्द लिखा है।

7.पं० कमलापति त्रिपाठी 'जोकरेश'
इनका जन्म सं० 1963 में हुआ था। दोहा बहुत अच्छा लिखते थें सवैया और मनहरण के छन्दकार होने के साथ-साथ राम चरित मानस के अच्छे ज्ञाता थे।

8.श्री सत्यदेव ब्रम्हाचारी (सत्य)
मेंहदावल के पास जोखा ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आस-पास पैदा हुए थे। उपहार में लिखा है- शैशवकाल से ही आप हिन्दी में कविता लिखते थे। आपने बेलवा के महन्थ जी के बारे में एक महाकाव्य लिखा है। उसमें अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सहज ही दर्शन होता है। रीतिकालीन भाव व्यंजना में आप प्रवीण है।

9.श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र)
बस्ती के पास चननी ग्राम में सं० 1965 वि० में पैदा हुए थे। आपकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के स्वर के साथ ब्रजभाषा का लालित्य देखने को मिलता है।

10.सन्त फागू दास जी
जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे। इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में उपहार आदि में विशेष प्रशंसा की गयी है।

11.पं० रामयज्ञ त्रिपाठी 'कंचन'
ये जुलाई सं० 1978 विक्रमी में कटया ग्राम में पैदा हुए थे तथा एक अच्छे छन्दकार थे।

12.श्री चन्द्रशेखर भारती
आप तामेश्वरनाथ के गोस्वामी परिवार में 1960 वि० के आसपास पैदा हुए थे। अच्छे छन्दकार के रूप में बहुचर्चित हुए।

13.प० राम लखन मिश्र 
सं० 1960 वि० में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा में डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० चमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे।

14.रतिमाथ झाँ
बांसी तहसील के तलपुरवा नामक ग्राम में सम्वत् 1979 में उत्पन्न हुए थे। दोहा
धनाक्षरी सवैया के साथ खड़ी बोली
 के अच्छे कवि के रूप में प्रतिष्ठा पा रहे हैं। 
15.मातादीन लाल 'मुक्तार'
डुमरियागंज में सम्वत् 1965 वि० के आसपास पैदा हुए थे। अच्छे छन्दकार के रूप में प्रतिष्ठा पा चुके हैं।

16.नरेन्द्र देव पाण्डेय 'साहित्य रत्न' 
चैत शुक्ल 10 सं० 1978 ग्राम धपोखरा तहसील खलीलाबाद में पैदा हुए थे। वे ब्रज भाषा और खड़ी बोली के छन्दकार थे। 

17.पं० चन्द्रबली त्रिपाठी
जन्म सं० 1962 विक्रमी में पैदा हुए थे। वे संस्कृत हिन्दी के विद्वान थे। ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली के छंदकार के रूप में बहुचर्चित हैं।

18.वासुदेव लाल मुक्तार
इनका जन्म सम्वत् 1970 विक्रमी के आसपास हरैया में बताया जाता है। ये ब्रज भाषा के मंजे मंजाये कवि थे। इनके मनहरण और सवैया छन्द हाकिम, हक्कामों के बीच बहुचर्चित रहते थे। इनका एक छन्द उपहार में छपा मिला हैं-

छवि है अनोखी और शान है निराली तेरी।
सकल सुजन जिसे प्राण सम पाले हैं।
निपट अद्वैत कोई द्वैत नही तेरा हुआ।
योगी मुनी ज्ञानी सभी ध्यान माला डाले है।
परमानन्द चित्त हो रहा है आज बासुदेव ।
होली में सहेली स्नेह सुरा शुचि ढाले है।
डाल डाल प्रेम रंग पावैगें असीम सुख।
प्रेम में तुम्हारे कृष्णमय मतवाले है।।

     इस चरण तक जो साहित्य लिखा गया है उससे बस्ती जनपद के छंद भण्डार को पर्याप्त समृद्धि मिली है। ब्रजभाषा, खड़ी बोली एवं भोजपुरी पर समान प्रयास डाला गया है। तृतीय चरण चतुर्थ चरण की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि स्वरूप जनपदीय 
छन्द परम्परा के विकास में अपना महत्वपूर्ण गौरव रखता है।

इस चरण के कुल18 कवियों की संक्षिप्त जानकारी लगभग आधे दशक पूर्व संकलित की गई है। इस पर विशद विवेचन परवर्ती साहित्यकार द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

Thursday, October 8, 2026

इतिहास के पन्नों में ओझल हुए बस्ती के हमारे ये पुरोधा साहित्यकार (बस्ती के छंदकार कड़ी 34 ) ✍️स्मृतिशेष डॉ मुनि लाल उपाध्याय "सरस"; प्रस्तुति:आचार्य डा.राधेश्याम द्विवेदी


जिन साहित्यकारों ने “बस्ती” को एक खास पहचान दिलाई, लोगों में साहित्यिक चेतना पैदा की, आज अपने ही गांव - क्षेत्र और जिले में बेगाने होकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। जिन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में बस्ती को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। दुख इस बात का है कि यहीं के लोगों ने उन्हें भुला दिया। न साहित्य प्रेमियों को इन्हें याद करने की फुर्सत है और न ही शासन - प्रशासन को। कभी कभार आचार्य शुक्ल और रंगपाल जी को याद कर लिया जाता है। शेष लोग इतिहास के पन्नों में सिमट चुके हैं। कुछ अपने अपने सीमित साधनों से अपना अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं।
डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” 

अध्याय - 1 
प्रमुख कवि -
पीताम्बर भट्ट
भवानी बक्स
बलदेव उर्फ बलदी
हनुमन्त भट्ट
रामगरीब चतुर्वेदी "गगाजन"
भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी "दिनेश"
श्रीनारायण चतुर्वेदी
रामलोचन भट्ट
विश्वेश्वर वत्स “पाल”
महाराज शीतला बक्स सिंह "महेश"
लाल त्रिलोकी नाथ “भुवनेश”
पण्डित गौरीनाथ शर्मा
आचार्य लछिराम भट्ट 
कुल 14 साहित्यकार विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
अध्याय - 2
प्रमुख कवि -
श्री बाबू रंगनारायण पाल 'वीरेश’
पंडित वलराम मिश्र "द्विजेश”
पंडित बुद्धिसागर मिश्र "पंचानन"
पं०रामचरित्र पाण्डेय ‘पावन’
पंडित रामनारायण चतुर्वेदी
लाल रुद्रनाथ सिंह "पन्नगेश"
पंडित भगौतीप्रसाद मिश्र "नन्दन”
पंडित रामभरोसे पाण्डेय "सूर्य"
पंडित रामाज्ञा द्विवेदी "समीर" 
पंडित जनार्दन नाथ त्रिपाठी "गोपाल"
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 
कुल 11 साहित्यकार विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
अध्याय - 3
प्रमुख कवि -
श्री भास्कर प्रसाद "भास"
राजाराम शर्मा "अंचल"
बद्री प्रसाद मिश्र "हरीश”
रानी सौभाग्य सुन्दरी "सुन्दरअली"
लाल श्रीकण्ठ सिंह "ब्रजदेव "
बाबू श्री बद्रीप्रसाद " पाल"
श्रीरामदेव सिंह "कलाधर "
श्री अब्बास अली "वास"
पण्डित मातादीन त्रिवाठी "दीन"
श्रीगणेशदत्त पाण्डेय "विशिख"
श्री सरस्वती प्रसाद शर्मा "वारिज”
पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन"
प० राम नारायण पाण्डेय "पागल”
श्री केदारनाथ मिश्र "दीन”
पंडित रामचरित्र उपाध्याय
पंडित व्रज विहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश'
श्री रामलाल श्रीवास्तव 'लाल'
पण्डित अद्या प्रसाद पाण्डेय 'द्विजेंद्र' 
श्री राम कृपाल पाण्डेय 
श्री राम आश्रय सिंह 'रसिकेन्दु' 
कुल - 20 कवि का विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
फुटकर छंदकारों नामोलेख सूची -
सर्व श्री बुध यदुनाथ जी
आचार्य धनराज शास्त्री
महात्मा गुंगदास
पण्डित चिन्तामणि त्रिपाठी
पं० सीताराम शुक्ल
सन्त अखंडानंद जी 
सत्यदेव ब्रह्मचारी "सत्य" 
पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र "अग्र"
सन्त फागूदास
रामयज्ञ त्रिपाठी "कंचन"
चन्द्रशेखर भारती 
राम लखन मिश्र "रामायणी"  
कमला पति त्रिपाठी "जोकरेश"
सुकवि रतिनाथ जी 
मातादीन लाल "मुख्तार"  
श्रीनरदेव पाण्डेय "साहित्यरत्न"
सुकवि चन्द्रवली त्रिपाठी
बासुदेव लाल "मुख्तार"  
कुल18 कवियों की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

अध्याय - 4. 
प्रमुख कवि -
सर्वश्री राम लखन मिश्र "मुदुल"
शारदा शरण चतुर्वेदी "मौलिक" 
रामनरेश पाण्डेय "पद्‌मेश"
घनश्याम प्रजापति "दंगल"
चिन्ताहरण पाण्डेय "फूल"
प्रेमशंकर मिश्र
जनार्दन नाथ पाण्डेय "ईश”
पं० राम सुमिरन पाण्डेय "सुमन"
पण्डित कंदर्प नारायण शुक्ल "कंदर्प"
ठाकुर भूरी सिंह "बालसोम" 
पण्डित ब्रजभूषण उपाध्याय "ब्रजचंद 
प० राममूर्ति मिश्र "सुधाकर", 
कृष्ण विहारी लाल "राही", 
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय "सरस"
राम कृष्ण लाल "जगमग"
राम लखन मौर्य "मयूर"
कुल 16 छन्दकार का विशद विवरण प्रकाशित है।
नामोलेख सूची -
श्री धर्मेन्द्रनाथ त्रिपाठी
पं० सुरेश धर "भ्रमर"
प० हरिशंकर मिश्र, 
पण्डित हरिनाथ उपाध्याय "अटल"
पण्डित रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी
पण्डित लम्बोदर पाण्डेय "अरुण"
सुकवि जगई भइया
पं० परमानन्द आनन्द
चन्द्रशेखर पाण्डेय 
रामरक्षा भारती "विकल" 
पण्डित सरस्वती प्रसाद शुक्ल "चंचल" रामनरेश सिंह "मंजुल"
पण्डित रामदास पाण्डेय गम्भीर"
पं० केशरीधर द्विवेदी
पं० उमाकान्त मिश्र "क्रंदन"
श्याम लाल यादव 
ठाकुर जगदंबिका सिंह "लल्लू बाबू"
रामेश्वर वर्मा 
माहेश्वर तिवारी "शलभ"
डा श्याम तिवारी
स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 
माधव सिंह गौतम
डा. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन"
भद्र सेन सिंह "भ्रांत"
गोपाल जी शुक्ल 
कृष्ण दत्त तिवारी "प्रेम"
गीतकार श्री शिव पूजन राय 
श्री सतीश श्रीवास्तव 
श्री विद्याधर द्विवेदी 
श्री राम शरण जायसवाल 
श्री चन्द पटवा 
श्री नरेंद्र कुमार पाण्डेय 
डा. सत्य देव द्विवेदी "सत्य"
श्री रामदेव मिश्र "पिंगल"
डा.सत्य प्रकाश उपाध्याय शास्त्री ' सत्य‘
इंजीनियर श्री अतुल द्विवेदी 
श्री कैलाश नाथ ओझा आदि।

इस अध्याय में कुल 37 साहित्यकारों की सूची प्रस्तुत है। पूरा शोध प्रबंध ग्रंथ कुल एक शतक कवियों पर आधारित बन पड़ा है। लगभग आधी संख्या के साहित्यकारों पर विशद विवेचन किया गया है। आधे पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है।



Tuesday, October 6, 2026

बस्ती की महान विभूति: आचार्य रामचंद्र शुक्ल( बस्ती के छंदकार श्रृंखला 33) ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भेड़ी गांव देवरिया पुस्तैनी गांव -
हिंदी के प्रथम आचार्य पंडित रामचंद्र शुक्ल की आज 142 वीं जयंती है. हिंदी साहित्य का इतिहास संसार के सामने लाने वाले आचार्य का पैतृक गांव देवरिया में राप्ती नदी के दोआब पर बसा एक छोटा सा गांव भेड़ी है. चारों तरह खेत-खलिहान और बीच से कल-कल बहती राप्ती की इसी मिट्टी से निकले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य को वैज्ञानिक आधार दिया.
देवरिया जिले का रुद्रपुर तहसील और इसी में छोटे से गांव भेड़ी के बुजुर्ग बताते हैं कि आचार्य के पूर्वज भेड़ी गांव के हीं मूल निवासी थे. उनके पिता चंद्रबलि शुक्ल का जन्म यहीं हुआ था.
सदर कानूनगो होने के कारण उनका तबादला बस्ती जिले में हुआ, जहां अगौना गांव में वह जाकर बसे. तब आचार्य जी की उम्र महज 4-5 साल थी. रोजी-रोटी के लिए एक बार यह गांव छूट गया तो फिर से नाता नहीं जुड़ नहीं पाया. लेकिन उनकी लेखनी में इस गांव की मिट्टी की महक हमेशा बनी रही.आचार्य जी अपने पिता की चौथी संतान थे. देवरिया के खेड़ी गांव से संबंध की वजह से आज भी उनके नाम पर रामचंद्र कॉलोनी है, जहां पार्क में उनकी प्रतिमा लगी है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल इंटर कॉलेज भी है, वहां भी प्रतिमा स्थापित है. दोनों प्रतिमाओं का अनावरण तत्कालीन डीएम सुबोध नाथ झा ने किया था.बाद में वह मिर्जापुर और बनारस में बसे. काशी में हीं पंडितजी ने अंतिम सांस ली थी.

बस्ती से रहा वास्ता- 
बस्ती के छन्दकार भाग 1 की कृति में डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस ने पृ. 179 पर लिखा है कि आचार्य शुक्लजी के पितामह पं. देवी दत्त शुक्ल थे। इन आचार्य शुक्लजी की मातामही (दादी ) राजा नगर हाल मुकाम पोखरनी के राजा विश्वनाथ प्रताप नारायण सिंह की कृपा पात्री थी। उन्हें अगोना में 40 बीघा जमीन गुजारे के लिए दिया गया था। जहां एक छोटा सा मकान बनाकर आचार्य जी ने 5 वर्षों तक निवास किया था। इसके बाद वे अपने पैतृक आवास मिर्जापुर अपने पिताजी के साथ चले गये थे।आचार्य शुक्ल जी ने कवियों के बारे में जो सटीक व वैज्ञानिक सम्मत टिप्पणी व विवेचना की है वह एक गद्यकार कभी नहीं कर सकता है। उनमें कवि हृदय था वे कविता भी करते थे और उसकी सारी बारीकियों से विज्ञ भी थे।
जीवन परिचय -
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4अक्टूबर, 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अगौना नामक गाँव में हुआ था। आरंभिक शिक्षा मिर्ज़ापुर में हुई, फिर कायस्थ पाठशाला प्रयाग से इंटर किया। 1895 से 1903 ई० तक शुक्ल जी अंग्रेजी के व्यापक एवं गम्भीर अध्येता श्री रामगरीब चौबे के सम्पर्क में रहे । चोबेजी की अध्ययनशीलता उन्माद की सीमा तक पहुँची हुई थी । वे शुक्लजी के लिए चुनी हुई पुस्तकें जुटा दिया करते थे। “चौबेजी के सम्पर्क से शुक्कजी को मिडिल पास करते-करते अंग्रेजी का उतना ज्ञान हो गया था जितना उस समय एफ० ए० के विद्याथियों को भी बहुत कम होता था । (डॉ० रामचन्द्र तिवारी लिखित "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल "विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी प्रथम संस्करण 1985,पृष्ठ 8 ) आगे फिर उन्होंने स्वाध्याय से ज्ञान अर्जन किया और इस क्रम में उर्दू, अँग्रेज़ी, बांग्ला और हिंदी भाषा एवं साहित्य का गंभीर अध्ययन किया। मिर्ज़ापुर में ही वह भारतेंदु युग के महत्त्वपूर्ण रचनाकार चौधरी बदरीनारायण प्रेमघन के संपर्क में आए और ‘आनंद कादंबिनी’ पत्रिका के संपादन में उनका सहयोग किया। इस कार्य से उनमें साहित्य और संपादन की समझ तो विकसित हुई ही, वह भारतेंदु युग के साहित्य और समकालीन साहित्य-कर्म से भी परिचित हुए। इस दौरान उनका साहित्य लेखन भी आरंभ हो चुका था। वह ब्रज भाषा और खड़ी हिंदी में कविता-लेखन करते रहे थे। ‘कविता क्या है’ निबंध का प्रारंभिक रूप इसी अवधि में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। 1903 में उनकी कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ भी प्रकाशित हो चुकी थी। सन् 1908 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल मिर्ज़ापुर से काशी आ गए जहाँ काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा तैयार किए जा रहे 'हिंदी शब्द सागर’ से सहायक संपादक के रूप में जुड़े। इस कोश के प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास थे। सन् 1927 में इस कोश का कार्य पूरा हुआ जिसकी लंबी भूमिका आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखी। यही भूमिका बाद में परिवर्तित रूप में ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के रूप में प्रकाशित हुई।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रध्यापक के रूप में -
सन् 1919 में रामचंद्र शुक्ल काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रध्यापक भी नियुक्त हो चुके थे। सन् 1937 में श्यामसुंदर दास के निधन के बाद वह हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने और इस भूमिका में रहते उन्होंनेपाठ्य सामग्री के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के प्रकाशन के साथ हिंदी साहित्य का एक ढाँचा बनकर तैयार हो गया था। उन्होंने सूरदास के ‘भ्रमरगीत’ संबंधी पदों का संग्रह किया और उसकी एक विस्तृत भूमिका लिखी। इसी तरह उन्होंने ‘जायसी ग्रंथावली’ का संपादन किया और उसकी भी एक लंबी भूमिका लिखी। इस बीच शुक्लजी ने काव्यशास्त्र और साहित्य सिद्धांतों का भी गंभीर अध्ययन किया जो बाद में उनकी पुस्तक ‘रस मीमांसा’ और ‘चिंतामणि’ में सुचिंतित रूप में व्यक्त हुई। हिंदी आलोचना को संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रभाव से मुक्त कराने तथा हिंदी का अपना व्यवस्थित शास्त्र निर्मित करने की दृष्टि से ‘रस मीमांसा’ एक महत्त्वपूर्ण कृति है। ‘चिंतामणि’ में उन्होंने मनोविकार संबंधी निबंधों के साथ-साथ साहित्य-सिद्धांतों का भी विश्लेषण-मूल्यांकन किया। 

अद्भुत प्रकृति-प्रेम :-
आचाय॑ शुक्ल का प्रकृति-प्रेम सर्वविदित है। इसका मल कारण उनके किशोर मन पर पड़ा हुआ विन्ध्याचल के प्राकृतिक वैभव का सहज संस्कार है। थे प्रायः अपने . समवयस्क साथियों के साथ बस्ती से दूर हरे-भरे खेतों और निर्जन पर्बन-उपत्यकाओं की ओर निकल जाते थे । प्रकृति के अद्भुत आकर्यण पर मुग्ध होकर वे तस्मय हो जाया करते थे । प्रकृति के इस मोहक रूप ने ही शुक्लजी को उसे स्वतस्थ स्प से सम का 'आलस्बन मानने की प्रेरणा दी थी।

उनकी आरम्मिक कविताओं में रमई पढ़ी के विशिष्ट जनों ओर आसपास के प्राकृतिक दृश्यों का मोहक चित्र देखा जा सकता है अपने 'मधुर भार' शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-- 
नगर से दूर कुछ गाँव की-सी बस्ती एक, हरे-भरे खेतों के समीप अति अभप्िराम | जहाँ पत्रजाल अन्तराल से झलकते हैं, लाल खपरल, इ्वेत छज्जों के सँवारे धाम । 
'बीचों-बीच वट वृक्ष खड़ा है विशाल एक लते है बाल कभी जिसकी जटाएँ थाम चढ़ी मंजु मालती लता है जहाँ छाई हुई ।पत्थर की पट्टियों की चौकियाँ पड़ी हैं श्याम ॥ 1॥

 बेंठते हूँ नित्य यहाँ घर्म के धुरीण एक क्षत्रिय कुलीन वृद्ध 'भद्र! भीष्म के समान। नाना इतिहास ओ पुराण के प्रसंग यहाँ छिड़े हुए रहते हैं करते पवित्र कान। 

नीम तले पास हो पुरोहित का द्वार वह रहती है जहाँ शिष्य मण्डली विराजमान। 
पढ़े-लिखे लोगों का निवास ही विशेष यहाँ 
घर है दो-चार गोप नापित भी गुणवान।।
(डॉ० रामचन्द्र तिवारी लिखित "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल "विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी ,1985,पृष्ठ 14)
शुक्ल जी की करुणाद्रता -
शुक्लजी की करुणाद्रता का अनुमान तो इसीसे हयाया जा सकता है कि ये पशु पक्षियों तक को परतंत्र नहीं देख सकते थे । फर्डों और खूताओं के निकट अंठकर उनसे घंटे बातें किया करते थे। किसी को दुःखी देखकर उसकी सहायता में तत्पर हो जाते थे। स्वभाव की इसी प्रवृत्ति से प्ररित होकर उन्होंने महाकाब्यों मे अंगोभाव से अलग करुणा और प्रेम की कल्पना बीज-भाव के रूप में की हो और करुणा को लोकमंगल की साधना का मूल आधार माना हो, तो आश्चर्य नहों । आचार्य शुक्ल के व्यक्तित्व में गम्भीरता का तत्व कहने की वस्नु नहीं है। वह सर्वत्र लक्षित है । प्रवृत्या गंभीर होने के नाते ही वे विचार और विवेचन के क्षेत्र में आगे बढ़ते गये।अध्ययन भी विज्ञान, दर्शन और काव्यशास्त्र जैसे बिधयां का किया और जो कुछ लिखा वह स्थायी महत्त्व का लिखा । तात्पर्य यह कि आचार्य शुक्ल का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनके व्यक्तित्व में स्वाभिमान, दुढ़ता, आत्मविश्वास, संवेदनशीझता, कर्णादता, गंभीरता, मर्गादा-प्रियता आदि गुणों के साथ प्रत्युत्पन्नमतित्व और रंजन की प्रवृत्तियां भी उक्षित होती हैं। उनके व्यक्तित्व के अनेक आयामों का विकास उनके जीवन-गंधर्प से जुड़ा हैं । उन्हें एक खास तरह से सोचने-समझने, निर्णय लेने और अपने व्यक्तित्व को विकमित करने की दिशा में उनके परिवेश ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं। उनकी रचनाओं में उनके व्यक्तित्व की छाप है । कहा जा सकता हैं कि आचार्य शुक्ल का जीवन-संघर्ष-व्यक्तित्व और रचना- दृष्टि एक-दूसरे से बहुत गहरे स्तर पर जुड़े हैं। इसलिए इन्हें अलग-अलग करके नहों देखा जा सकता ।
 (डॉ० रामचन्द्र तिवारी लिखित "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल "विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1985, पृष्ठ 16)
अंतिम यात्रा के कुछ दुर्लभ छाया चित्र 
दुर्लभ तस्वीरें 
बस्ती के लाल आचार्य रामचंद्र शुक्ल के महाप्रयाण की है ,इसे नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष माननीय व्योमेश शुक्ला ने अपनी फेसबुक वाल पर आचार्य शुक्ल की जयंती चार अक्टूबर पर साझा की है। वर्तमान पीढ़ी ने केवल आचार्य रामचंद्र शुक्ल को पढ़ा है,और उनकी केवल एक ही तस्वीर को देखा है जिसमें वे सूट और टाई में है। इन चित्रों पर नागरी प्रचारिणी सभा का स्वत्वाधिकार है। हम इसे आभार सहित हिंदी प्रेमियों के अवलोकन हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी का निधन 1 फ़रवरी 1941को हुआ था।अंतिम यात्रा के कुछ दुर्लभ छाया चित्र नीचे दिए जा रहे हैं -














पारिवारिक विवरण -
राम चंद्र शुक्ला की शादी सावित्री देवी से हुई थी और उनके दो बेटे केशव चंद्र और गोकुल चंद्र और तीन बेटियाँ दुर्गावती, विद्या और कमला थीं। वह एक चित्रकार भी थे और उन्होंने अपना खुद का घर डिज़ाइन किया था, जो 1941 में उनकी मृत्यु के समय अधूरा था।

आचार्य शुक्ल साहित्य शोध संस्थान -
आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान , उनके नाम पर 1972 ई.में स्थापित एक शोध संस्थान , साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र है। इसका निर्माण उनके पुत्र गोकुल चंद्र शुक्ल की इच्छा और वाराणसी के स्थानीय अधिकारी द्वाराप्रदान की गई भूमि पर किया गया था। बाद में इसे भवन और बुनियादी ढांचे के लिए उत्तर प्रदेश राज्य सरकार से वित्तीय मदद मिली। इसके प्रथम सचिव कुसुम चतुर्वेदी ने एक नियमित पत्रिका “नया मंडल” प्रकाशित किया, जिसने महिलाओं, उत्तर आधुनिकतावाद, दलित साहित्य आदि पर अपने विशेष अंकों के लिए प्रतिष्ठा स्थापित की। इसके लेख और शोध पत्र हिंदी और भारतीय भाषा साहित्य में प्रशंसित हैं। साहित्य के जानकार कुसुम चतुर्वेदी की मृत्यु के बाद ज्ञानदत्त चतुर्वेदी सचिव बने। उनकी मृत्यु के बाद, कुसुम चतुर्वेदी और ज्ञानदत्त चतुर्वेदी के पुत्र डॉ॰ मंजीतचतुर्वेदी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान के सचिव (मंत्री) का पदभार संभाला; इसकी अध्यक्ष (अध्यक्ष) हिंदी कहानियों की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. मुक्ता हैं। कुसुम चतुर्वेदी और मुक्ता ने दूरदर्शन के लिए आचार्य शुक्ल पर एक वृत्तचित्र बनाया है और उनकी प्रामाणिक जीवनी प्रकाशित की है।

समादृत लेखक और आलोचक-
रामचंद्र शुक्ल हिंदी के अत्यंत समादृत लेखक और आलोचक हैं। डॉ. रामविलास शर्मा उन्हें आलोचना के क्षेत्र में उतने ही महत्त्व से रखते हैं, जो महत्त्व प्रेमचंद का उपन्यास में है और निराला का कविता में। उन्होंने हिंदी में व्यवस्थित साहित्य - सिद्धांतों की नींव रखी, जिनके आधार पर हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा और हिंदी साहित्य की व्यावहारिक आलोचना की। उन्होंने हिंदी-साहित्य के अध्ययन- अध्यापन के लिए व्यवस्थित रूप से पाठ्यक्रम का निर्माण किया। इसके साथ ही उन्होंने निबंध लेखन और अनुवाद का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके पत्र और अख़बारों को भेजी गई टिप्पणियाँ भी प्रकाशित हैं। उनका समस्त रचना-कर्म एक-दूसरे का पूरक बना रहा। ‘चिंतामणि’ पर उन्हें अत्यंत प्रतिष्ठित मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया।

कवि रूप में आचार्य शुक्ल जी- 
बस्ती के छन्दकार भाग 1 की कृति डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 180 पर लिखा है कि आचार्य शुक्लजी ब्रजभाषा और खड़ीबोली में फुटकर कविताएँ लिखीं तथा एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ‘बुद्ध चरित’ के नाम ब्रजभाषा में पद्यानुवाद आठ सर्ग 25 भागों में किया। शुक्ल जी ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि “रामकृष्ण की इसी लीला भूमि पर भगवान् बुद्धदेव भी हुए हैं जिनके प्रभाव से एशिया खंड का सारा पूर्वार्द्ध भारत को इस गिरी दशा में भी प्रेम और श्रद्धा की दृष्टि से देखता चला जा रहा है। रामकृष्ण के चरितगान का मधुर स्वर भारत की सारी भाषाओं में गूँज रहा है पर बौद्ध धर्म के साथ ही गौतम बुद्ध की स्मृति तक जनता के हृदय से दूर हो गई है। 'भरथरी' और 'गोपीचन्द' के जोगी होने के गीत गाकर आज भी कुछ रमते जोगी स्त्रियों को करुणार्द्र करके अपना पेट पालते चले जाते हैं पर कुमार सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण की सुधा दिलानेवाली वाणी कहीं भी नहीं सुनाई पड़ती है। जिन बातों से हमारा गौरव था उन्हें भूलते-भूलते आज हमारी यह दशा हुई। यह 'बुद्धचरित' अंग्रेजी के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का हिन्दी काव्य के रूप में अवतरण है। यद्यपि ढंग इसका ऐसा रखा गया है कि एक स्वतन्त्र हिन्दी काव्य के रूप में इसका ग्रहण हो पर साथ ही मूल पुस्तक के भावों को स्पष्ट करने का भी पूर्ण प्रयत्न किया गया है। दृश्य वर्णन जहाँ अयुक्त या अपर्याप्त प्रतीत हुए वहाँ बहुत कुछ फेरफार करना या बढ़ाना भी पड़ा है। यदि काव्य परंपरा के प्रेमियों का कुछ भी मनोरंजन होगा तो मैं अपना श्रम सफल समझूँगा। जिस वाणी में कई करोड़ हिन्दी भाषी रामकृष्ण के मधुर चरित का स्मरण करते आ रहे हैं उसी वाणी में भगवान् बुद्ध को स्मरण कराने का यह लघु प्रयत्न है। यद्यपि यह वाणी ब्रजभाषा के नाम से प्रसिद्ध है पर वास्तव में अपने संस्कृत रूप में यह सारे उत्तरपथ की काव्य भाषा रही है।“ - रामचन्द्र शुक्ल के अनुवाद का एक नमूना प्रस्तुत है-

कर्म को सिद्धांत है यह, लेहु याको जानि।
पाप के सब पुंज की ह्नै जाति है जब हानि,
जात जीवन जबै सारो लौ समान बुताय।
तबै ताके संग ही यह मृत्यु हू मरि जाय।।
 
'हम रहे,' 'हम हैं', 'होयँगे हम' कहौ जनियहबात,
समझौ न पथिकन सरिस पल के घरन में बहु,भ्रात!
तुम एक छाँड़त गहत दूजो करत आवत बास,
सुधि राखि अथवा भूलि जो कछु होत दु:ख सुपास।।
 
रहि जात है कछु नाहिं प्राणी मरत है जा काल,
चैतन्य अथवा आतमा नसि जात है ज्यों ज्वाल।
रहि जात केवल कर्म ही है शेष विविध प्रकार,
बहु खंड तिनसों लहत उद्भव जन्म जोरनहार।।
 
जग माहिं तिनको योग प्रगटत जीव एक नवीन,
सो आप अपने हेतु घर रचि होत वामें लीन।
ज्यों पाटवारो कीट आपहि सूत कातत जाय,
पुनि आप वामें बसत है जो लेत कोश बनाय।।
 
सो गहत भौतिक सत्व औ गुण आपही रचि जाल- 
ज्यों फूटि विषधर अंड केंचुर दंष्ट्र गहत कराल,
ज्यों पक्षधार शरबीज घूमत उड़त नाना ठौर,
लहि वारितट कहुँ बढ़त, फेंकत पात, धारत मौर।।
 
या नए जीवन की प्रगति शुभ अशुभ दिशि लै जाय।
जब हनत काल कराल पुनि निज क्रूर करहि उठाय।
रहि जात तब वा जीव को जो शेष शुद्धि विहीन,
सो फेरि झंझावात झेलत सहत ताप नवीन।।
 
पै मरत है जब जीव कोऊ पुण्यवानसुधीर,
बढ़ि जाति जग की संपदा कछु, बहत सुखद समीर।
मरु भूमि की ज्यों धार बालू बीच जाति बिलाय।
ह्नै शुद्ध निर्मल फेरि चमकति कढ़ति है कहुँ जाय।।
 
या भाँति अर्जित पुण्य अर्जित करत है शुभकाल,
यदि पाप ताको देत बाधा रुकति ताकी चाल।।

प्रमुख कृतियाँ
        काव्य में रहस्यवाद, विचार वीथि (मनोविकार संबंधी लेखों का पहला संग्रह), चिंतामणि-1 (विचार वीथि का परिवर्द्धित और परिष्कृत रूप), चिंतामणि-2 (काव्य में प्राकृतिक दृश्य, रहस्यवाद, अभिव्यंजना- वाद संबंधी लेखों का संग्रह। सं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र), चिंतामणि-3 (कुछ अप्रकाशित लेखों का संग्रह। सं. नामवर सिंह), त्रिवेणी (सुर, तुलसी, जायसी पर तीन निबंधों का संग्रह), हिंदी साहिय का इतिहास, रस मीमांसा, मालिक मुहम्मद जायसी, गोवास्मी तुलसीदास, साहित्य शास्त्र: सिद्धांत और व्यवहार पक्ष, भाषा, साहित्य और समाज विमर्श। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली (सं. ओमप्रकाश सिंह) के आठ खंडों में उनकी रचनाओं को संग्रहीत किया गया है।

आचार्य शुक्ल पुस्तकालय अग़ौना दयनीय हालत में:- 
बस्ती शहर से 25 किमी दूर रामजानकी मार्ग पर समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्म स्थली अगौना स्थित है। हिंदी साहित्य का इतिहास समेत कई कालजयी रचनाएं देने वाले आचार्य शुक्ल के गांव में कहने को उनके नाम से एक पुस्तकालय स्थापित है।आचार्य शुक्ल के पौत्र रामेंद्र त्रिपाठी (आइएएस) के प्रयास से यहां धर्मशाला और पुस्तकालय की स्थापना हुई है । उनके जाने के बाद से यहां की दशा देखने वाला कोई नहीं है। गांव में न कोई साहित्य प्रेमी पहुंचता है और न ही शासन - प्रशासन की तरफ से कोई आयोजन होता है। हिंदी साहित्य को जन - जन तक पहुंचाने वाले आचार्य अपने ही क्षेत्र में गुम हो कर रह गए हैं। पास के एक शिक्षा विद डा. के. पी. मिश्रा साल में एक बार आचार्य जी की जयंती जरूर मना लेते हैं। ये ही आचार्य राम चन्द्र शुक्ल बालिका विद्यालय के प्रबंधक भी है। इनकी पत्नी इस कालेज की प्रधानाचार्य भी रह चुकी हैं। 

जनता इण्टर कॉलेज नगर बाजार बस्ती के पूर्व प्राचार्य डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' अपने कार्यकाल और जीवन पर्यन्त इस स्थल के उत्तरोत्तर विकास के लिए प्रयासरत रहे। अभी भी शुक्ल जी की जयंती के अवसर पर अग़ौना में विविध सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं।

आचार्य शुक्ल’ विषयक विशेष परिचर्चा वाराणसी में आयोजित -
बीएचयू के मुक्ताकाशी मंच ‘पुलिया प्रसंग’ की ओर से हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल की 142वीं जयंती पर रविवार को ‘हिंदी आलोचना में आचार्य शुक्ल’ विषयक विशेष परिचर्चा हुई। अध्यक्षता कर रहे प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को रीढ़ दी। उन्होंने आलोचना के देशज स्वरूप की खोज की। वे पश्चिम से टकराते हुए हिंदी आलोचना को स्वाधीनता प्रदान करते हैं। मुख्य वक्ता प्रो.कमलेश वर्मा ने शुक्लजी की आलोचना को ‘साधनावस्था की आलोचना’ कहा। उनका स्पष्ट मत था कि साहित्य में जब किसी ‘वाद’ की प्रधानता हो जाती है, तो वह नष्ट हो जाता है। उन्होंने भावों के उन्नयन और साधारणीकरण पर विशेष बल दिया। डॉ.महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि शुक्लजी स्वप्नदृष्टा आलोचक थे। उन्होंने आलोचना में गुण-दोष विवेचन से उठकर समग्र मूल्यांकन को महत्व दिया। डॉ.विंध्याचल यादव ने कहा शुक्लजी की आलोचना स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना से अनुप्राणित थी जिसमें लोकमंगल की अवधारणा प्रमुख थी। डॉ.उपेंद्र सत्यार्थी, डॉ.शैलेंद्र कुमार सिंह, डॉ.आर्यपुत्र दीपक, डॉ.उदय पाल, अमित कुमार, पंकज यादव ने भी विचार रखे। संचालन शिवम यादव और धन्यवाद ज्ञापन राकेश गुप्ता ने किया।

देश भर में श्रद्धांजलि का तांता 
आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार, समीक्षक और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर देशभर के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल दिनेश शर्मा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा, "आधुनिक हिंदी के महान साहित्यकार, समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।"

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी आचार्य शुक्ल को याद किया। उन्होंने लिखा, "हिन्दी साहित्य के महान आलोचक एवं साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन! उन्होंने अपनी गहन साहित्यिक दृष्टि, आलोचनात्मक चिंतन और प्रभावशाली लेखनी से हिन्दी साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उनका अमूल्य योगदान हिंदी जगत में सदैव स्मरणीय रहेगा।"

बिहार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने अपने संदेश में कहा, "महान समीक्षक, लेखक एवं प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। हिंदी साहित्य के विकास में उनके अतुलनीय योगदान और उनकी समृद्ध साहित्यिक विरासत को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।"

मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने लिखा, "हिन्दी साहित्य के समृद्ध विकास में अतुलनीय योगदान देने वाले महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें सादर नमन करता हूं। साहित्य के प्रति उनका गहन चिंतन एवं उनकी कालजयी कृतियां आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेंगी।"

भाजपा नेता बजरंग बहादुर सिंह ने आचार्य शुक्ल को युगद्रष्टा बताते हुए लिखा, "हिन्दी साहित्य के युगद्रष्टा आलोचक एवं महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन ! अपनी अद्वितीय साहित्यिक दृष्टि, गहन चिंतन और सशक्त लेखनी के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध करते हुए उसे नई दिशा प्रदान की।"

वहीं भाजपा नेता आशुतोष त्रिपाठी ने कहा, "हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार एवं मूर्धन्य समीक्षक, आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में उनके अतुलनीय योगदान को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनकी साहित्यिक दृष्टि और विचारधारा आज भी साहित्य जगत को मार्गदर्शन प्रदान करती है।"

बस्ती शहर के बड़ेबन चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी है। जिलाधिकारी आवास के तिराहे पर भी उनकी एक आदम कद प्रतिमा लगी हुई है। बस्ती की जनता उनके नाम से विश्व विद्यालय की मांग भी करती आ रही है। टाउन हाल बस्ती पुस्तकालय तथा बस्ती रेलवे पुस्तकालय भी आचार्य शुक्ल जी समर्पित है। हम आज उनके जन्म दिवस के अवसर पर उन्हें सादर नमन करते हैं।




Thursday, October 1, 2026

अन्तर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अब दुनिया के आधे देशों में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 75 वर्ष से अधिक हो गई है, जो 1950 की तुलना में 2030 तक 25 वर्ष अधिक होने का अनुमान है। एक अनुमान के अनुसार, वैश्विक स्तर पर वृद्धों की संख्या युवाओं से अधिक है और विकासशील देशों में यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। सम्पूर्ण विश्व में अक्टूबर-मास के प्रथम दिनांक को मनाया जाता है । इस दिन पर वरिष्ठ नागरिकों और वरिष्ठ सम्बन्धिओं का सम्मान किया जाता है। वरिष्ठों के हित के लिए चिन्तन भी होता है। साम्प्रतं वृद्धसमाज विफलीकरण से अत्यधिक ग्रस्त हैं। यद्यपि वरिष्ठजन सर्वाधिकतया अनुभवी होते हैं, तथापि कोई भी व्यक्ति उनका अभिप्राय वा परामर्श स्वीकरते नहीं। अतः “हम प्रयोजनहीन हैं” ऐसा वे वृद्धजन अनुभव करते हैं। इस कारण से हमारा वृद्धसमाज सर्वथा दुःखी ही दिखाई देता है। अतः वृद्धजनो का और वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए इस दिवस का आचरण किया जाता है।

इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है- 
हमारे वरिष्ठ नागरिकों के योगदान, ज्ञान, गरिमा और जरूरतों को स्वीकार करने और उनकी भलाई सुनिश्चित करने के लिए हमारे प्रयासों को फिर से समर्पित करने का अवसर प्रदान करना।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग, स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के साथ मिलकर कम उम्र से ही छात्रों में वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता के मूल्यों को विकसित करने में मदद करने के लिए पूरे अक्टूबर महीने में कई गतिविधियों का आयोजन कर रहा है। यह पहल युवाओं के बीच वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान और देखभाल को बढ़ावा देगी। इससे अंतर- पीढ़ीगत जुड़ाव और सहानुभूति को बढ़ावा मिलेगा। इस संबंध में, निम्नलिखित प्रमुख पहल प्रस्तावित हैं:

1.दादा-दादी दिवस का आयोजन
शैक्षिक संस्थान पीढ़ियों को आपस में जोड़ने के लिए वार्षिक दादा-दादी दिवस का आयोजन कर सकते हैं। इस अवसर पर विभिन्न गतिविधियों जैसे- कहानी कहने और गेम्स आदि करवाए जा सकते हैं। छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान की प्रतिज्ञा के लिए शपथ ग्रहण समारोह भी आयोजित कर सकते हैं, इन प्रतिज्ञाओं को संस्थानों में एक अनुस्मारक के रूप में प्रमुखता से प्रदर्शित किया जा सकता है।

प्रात: सभाओं या भाषा कक्षाओं के हिस्से के रूप में, बड़ों के सम्मान के महत्व पर प्रकाश डालने वाली  कविताएँ या श्लोक सुनाने के लिए छात्रों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इन्हें भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से लिया जा सकता है, जो छात्रों के साथ गहराई से जुड़ती है।

2.वरिष्ठ नागरिक विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से संवाद 

शैक्षणिक संस्थान नियमित सत्र शुरू कर सकते हैं जहां छात्र और वरिष्ठ नागरिक विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से संवाद कर सकते हैं, जैसे कहानियां साझा करना, इतिहास पर चर्चा करना या पारंपरिक शिल्प के बारे में सीखना। इससे छात्रों के अंदर वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों और ज्ञान के प्रति सराहना विकसित करने में मदद मिलेगी।

3.मेंटरशिप कार्यक्रम
छात्रों को वरिष्ठ नागरिकों के साथ समाज सेवा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने से अंतर-पीढ़ीगत एकजुटता, आपसी सम्मान और समझ को बढ़ावा मिलेगा। शैक्षणिक संस्थान स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर मेंटरशिप कार्यक्रम बना सकते हैं जहां वरिष्ठजन कला, संस्कृति और व्यावसायिक कौशल में छात्रों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। यह पहल छात्रों को मूल्यवान अंतर्दृष्टि और वरिष्ठ नागरिकों को उद्देश्य तथा जुड़ाव प्रदान करके दोनों पीढ़ियों को लाभान्वित करेगी।