राजा परमार्दिदेव का परिचय :-
गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना 8वी शताब्दी में उज्जयिनी में हुई थी।उनके वंशज बाद में उज्जयिनी के साथ साथ गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र कान्यकुब्ज (कन्नौज) पर भी शासन करते रहे। इसी वंश का शासक नागभट्ट द्वितीय के सामंत राजा चन्द्रवर्मन (नन्नुक) ने बुन्देलखण्ड वर्तमान उ. प्र. तथा म. प्र. का सीमान्त क्षेत्र में चंद्रात्रेय चन्डेल वंश की स्थापना किया था। इनकी राजधानी महोबा थी इनके अन्य प्रसिद्ध केन्द्र खजुराहो, कालंजर तथा अजयगढ़ रहे।
कौन थे राजा परमार्दिदेव- राजा
चण्डेल वंश में परमार्दिदेव का 1163- 1203 के मध्य शासन किया था। वह कालिंजर व महोबा के शासक थे। 1165 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे। उन्हें चंदेल वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक माना जाता है। चंदेलों का साम्राज्य यमुना-नर्मदा नदी के बीच फैला था, जिसमें वर्तमान बुंदेलखंड और दक्षिणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता था। परमार्दिदेव के सेनापति आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान से टक्कर ली। वह कन्नौज के राजा जयचंद्र के मित्र थे, इसलिए अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उनके प्रतिद्वंद्वी थे। इनकी सहायता से परमार्दिदेव ने अजमेर के चाहमान (चैहान) वंशी राजा पृथ्वीराज तृतीय पर आक्रमण किया था परन्तु ऊदल की मृत्यु के साथ परमार्दिदेव को पराजय का मुह देखना पड़ा था।
पृथ्वीराज के अधीन महोबा भी आ गया। परन्तु वहां पर वह अधिक दिन शासन नहीं कर पाया और वह क्षेत्र पुनः परमार्दि देव को वापस मिल गया। परमार्दिदेव के शासनकाल में मोहम्मद गोरी ने दो बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था। तराइन के द्वितीय युद्ध में 1192 ई. में पृथ्वीराज मारा गया था। 1194 ई. में मोहम्मद गोरी ने कन्नौज के गहड़वाल नरेश जयचन्द को चन्दवार में पराजित कर मार डाला था। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1202 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया। कुछ दिन तक लडऩे के बाद परमार्दिदेव ने हार मान ली। जिसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में अजमेर में चैहान वंश, कन्नौज में गहड़वाल वंश के पतन के साथ साथ बुन्देलखण्ड में चण्डेलवंश का भी पतन हो गया और भारत में मुस्लिम शासन का आधार मजबूत हो गया। परमार्दिदेव के समय बुन्देलखण्ड का चण्डेल वंशी शासन उत्तर भारत में गंगा यमुना की अन्तर्वेदी तक फैला हुआ था। इसमें कन्नौज मथुरा आगरा आदि पूरा ब्रज मण्डल समाहित था।
बटेसर अभिलेख का प्राप्ति स्थल विवादित
आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अंगिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे। बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में अनेक शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे। लेकिन अब कुछ सदियों से कैलाश , रावली, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राज राजेश्वर नामक केवल पांच ही शिव मंदिर शेष हैं। छठे शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह छठा शिव मंदिर आगरा के इष्ट देव नागराज अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजो महालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे। तेजो महालय को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था।
इतिहासकार पी एन ओक की पुस्तक अनुसार ताजमहल के हिन्दू निर्माण का साक्ष्य देने वाला काले पत्थर पर उत्कीर्ण एक संस्कृत शिलालेख लखनऊ के संग्रहालय के ऊपर तीसरी मंजिल में रखा हुआ है। यह सन् 1155 का है। उसमें राजा परमर्दिदेव के मंत्री संलक्षण द्वारा कहा गया है कि 'स्फटिक जैसा शुभ्र इन्दुमौलीश्वर (शंकर) का मंदिर बनाया गया। (वह इतना सुंदर था कि) उसमें निवास करने पर शिवजी को कैलाश लौटने की इच्छा ही नहीं रही। वह मंदिर आश्विन शुक्ल पंचमी, रविवार को बनकर तैयार हुआ था।
ताजमहल के काले पत्थरों को जान- बूझकर वटेश्वर शिलालेख बनाया गया
ताजमहल के उद्यान में काले पत्थरों का एक मंडप था, यह एक ऐतिहासिक उल्लेख है। उसी में वह संस्कृत शिलालेख लगा था। उस शिलालेख को कनिंघम ने जान-बूझकर वटेश्वर शिलालेख कहा है ताकि इतिहासकारों को भ्रम में डाला जा सके और ताजमहल के हिन्दू निर्माण का रहस्य गुप्त रखा जा सके। वास्तव में आगरे से 70 मिल दूर बटेश्वर में वह शिलालेख नहीं पाया गया है। अत: उसे बटेश्वर शिलालेख कहना अंग्रेजी षड्यंत्र का हिस्सा है।
राजा परमार्दिदेव से जुड़ा एक शिलालेख भी यही कहता है। यह शिलालेख बटेश्वर में एक टीले पर वर्ष 1888 में कराए गए उत्खनन में मिला था। यह राजा परमार्दिदेव के शासन विक्रमी संवत् 1252 (1195 ईस्वी) से जुड़ा है। शिलालेख पर दो फुट चौड़ाई और करीब एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में 24 श्लोक उत्कीर्ण हैं।
शाहजहाँ ने तेजोमहल में जो तोड़ फोड़ और हेराफेरी की, उसका एक सूत्र सन् 1874 में प्रकाशित भारतीय पुरातत्व विभाग (आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वार्षिक वृत्त के चौथे खंड में पृष्ठ 216 से 17 पर अंकित है। उसमें लिखा है कि हाल में आगरे के वास्तु संग्रहालय के आंगन में जो चौखुंटा काले बसस्ट का प्रस्तर स्तम्भ खड़ा है। वह स्तम्भ तथा उसी की जोड़ी का दूसरा स्तंभ उसके शिखर तथा चबूतरे सहित कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित थे।
इससे स्पष्ट है कि लखनऊ के वास्तु संग्रहालय में जो शिलालेख है वह भी काले पत्थर का होने से ताजमहल के उद्यान मंडप में प्रदर्शित था।
परमार्दिदेव का विक्रम 1252- 1195 ई. का बटेश्वर अभिलेख एक प्राचीन टीले पर प्राप्त होना बताया जाता है। ताजमहल के पूर्वी गेट से यमुना किनारे मिला शिलालेख (जिसे बटेश्वर शिलालेख भी कहा जाता है) 1195 ईस्वी / विक्रमी संवत् 1252 का है, जो शाहजहाँ से लगभग 500 वर्ष पूर्व का है। यह शिलालेख 'तेजो महालय' यानी शिव मंदिर के अस्तित्व की ओर इशारा करता है। शिलालेख मूल रूप से ताज उद्यान क्षेत्र में स्थापित था, जिसे बाद में हटाया गया।
ए सी एल कार्लाइल 1871- 72 में इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन व सर्वेक्षण किया था । उस समय तक उसे यह अभिलेख नहीं प्राप्त हुआ था। मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1873-74 भाग 7 के पृ. 5 पर बटेश्वर आगरा से प्राप्त होना बताते हैं। पुनः मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1883-84 भाग 21 के पृ. 82 क्रम संख्या 52 पर इसे बगरारी के तालाब के तट पर दो टुकड़ों में प्राप्त होना बताते हैं। बगरारी को मथुरा के निकट सिंघनपुर के पास होना भी बताया जाता है। अधिकांश अभिलेखीय साक्ष्य इसे आगरा जिले में स्थित बटेश्वर का अभिलेख मानते हैं।
1886 में हुलुतज ने Zeitechrift D Morg. Ges. के भाग 11 के पृ. 51-54 में प्रतिलिप्यान्तर कराया था। बाद में 1888 में प्रो. एफ. कीलहर्न ने इसका अध्ययन कर Epigraphia Indica के भाग 1 में पृ. 207-214 में प्रकाशित कराया था। इन दोनों संदर्भों में इस अभिलेख की प्रतिकृति नहीं प्रस्तुत की गयी है। प्रसिद्ध पुरालेख शास्त्री हरिहर विट्टल त्रिवेदी ने इस अभिलेख को उक्त संदर्भों के अतिरिक्त अन्य़ कहीं नहीं देखा था। उनके निवेदन पर लखनऊ राज्य संग्रहालय के निदेशक ने इस अभिलेख का स्याही के छाप की अनुमति दी थी।
श्री त्रिवेदी इसे Corpus Inscriptions Indicarem के खण्ड 7 भाग 3 में क्रम सं. 139 पृ. 473-78 प्लेट 126 पर प्रकाशित कराया है। अभिलेख के विषय वस्तु के अनुसार यहां प्राचीन विष्णु एवं शिव मंदिरों के निर्माण कराने की बात कही गयी है। एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।
पूर्णिमा की रात को या फिर उन रातों को जब चंद्र अच्छी रौशनी देता है उसकी रौशनी शिवलिंग पर पड़ती थी तो सफ़ेद शिवलिंग रात को चमकता था। ये मंदिर कहां थे यह शोध का विषय है ?
शुभ्र शिव मंदिर तेजोमहालय (ताजमहल) :-
राष्ट्रवादी विचारक विष्णु मंदिर को मथुरा का द्वारिकाधीश तथा शिव मंदिर को आगरा का तेजेश्वर महादेव मंदिर (ताज महल) के रुप में जोड़ते हैं। बटेश्वर शिला लेख में राजा परमार्दिदेव के मंत्री सलक्षणा द्वारा भव्य वैष्णव व शैव मंदिर बनवाने का जिक्र है। लखनऊ संग्रहालय में रखे वर्ष 1195 के इस शिलालेख में दो फुट चौड़ाई व एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा के 34 श्लोक हैं। शिलालेख मंदिरों की जगह के बारे में कुछ नहीं कहता। मगर, इतिहासकार प्रो. पी. एन. ओक ने इसमें उल्लिखित शिव मंदिर को ताजमहल बताया था। श्री पी. एन. ओक अपनी पुस्तक Tajmahal is a Hindu Temple Palace में 100 से भी अधिक प्रमाण एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। यह तेजा जी के नाम से बनाया गया था । इसके अनुक्रमांक 30 पर बटेश्वर शिलालेख का उल्लेख है।
बटेश्वर एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया इस शिलालेख को ‘बटेश्वर शिलालेख’नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने बहुत बड़ी भूल की है, क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि यह बटेश्वर में पाया गया था।
आज जहाँ पर ताजमहल है, वहां पर हज़ारों साल पहले अंगिरा ऋषि ने शिवमंदिर बनाया था उसका नाम तेजोमहालय रखा था, कुछ लोग इसे अग्रेश्वर महादेव के नाम से भी सम्बोधित करते रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस शिलालेख का नाम ‘तेजोमहालय शिलालेख’ होना चाहिये क्योंकि यह ताज के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर फेंक दिया गया था शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archaeological Survey of India Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है जिसमें लिखा है-
Great square black balistic pillar which, with the base and capital of another pillar....now in the grounds of Agra,...it is well known, once stood in the garden of Tajmahal".
इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, "एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।" यह अभिलेख प्रशंसात्मक रुप में प्रशस्ति गाथा है।
इस अभिलेख के तीन प्रमुख भाग हैं- प्रथम भाग में 13 पद्य हैं जिसमें चण्डेल वंश की परम्परा का वर्णन किया गया है। द्वितीय भाग पद्य 14 से 24 तक है। इसमें राजा के मुख्यमंत्री के वंश परम्परा का वर्णन किया गया है। तृतीय खण्ड मुख्य है । इसमें पद्य 25 से 29 तक अभिलेख का उद्देश्य का वर्णन आता है। पद्य 30 से 34 तक लिखने वाले का परिचय दिया गया है।
इस खण्ड का पद्य 25 व 26 दो विशाल मंदिरों के निर्माण का वर्णन करता है। इसका मूल पद्य ,अंग्रेजी व हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रासादो वैष्णवस्तेन निमर्मितोन्तव् र्वहन्हरिम्। मू द् ध् र्ना स्पृसशति यो नित्यं पदमस्यैव मध्यमम्।।
He (King Parmadidev) erected a temple of Vishnu, containing a image of Hari which with its top always touches his own middle stride.
उन्होंने विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया था जिसमें हरि की एक मूर्ति स्थापित थी। इस मंन्दिर का शिखर इतना ऊंचा था कि मध्य आकाश को स्पर्श करता था।
अकारयच्च स्फटिकावदातमसाविदम्मन्दिरमिन्दुमौलेः। न जातु यस्मिन्निवसन्स देवः कैलासवासाय चकार चेतः।।
And he also caused this crystal white habitation of the moon crested (Siva) to be built, residing in which the God has never turned his thoughts to dwelling on Kailas.
चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले शिव मंन्दिर का निर्माण स्फटिक के समान धवल रंग से प्रकाशित हो रहा था जिसमें निवास करने के कारण भगवान शिव ने कैलाश पर निवास करने का विचार छोड़ दिया।
लेखक:
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी , पूर्व पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001मोबाइल नंबर +91 9412300183