Friday, March 20, 2026

डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी की आत्मकथा ✍️ डा.राधेश्याम द्विवेदी 'नवीन'

       जन्म तिथि :10 अप्रैल 1942

        मृत्यु तिथि: 30 मार्च 2012


“सरस" युगपुरुष का सादर अभिनंदन है।

जनजन के स्वरों का सस्वर नव बंदन है।।

तुझसे ज्ञान पाकर हजारों जन आगे बढ़े।

तुझसे गुण की सीख लोगबाग खूब कढ़े।। 

तेरे दिव्य रूप से है धरा में रोशनी आती।

सूक्ष्म रूप जनजन को रोमांचित कराती।।

        - आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी 


उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के सदर तहसील के दक्षिणांचल में बहादुरपुर विकास खंड के  नगर राजा द्वारा पोषित  'उपाध्याय इस्टेट' के 'सीतारामपुर' नामक गांव की पावन धरती उस क्षण धन्य हुई जब पण्डित सीताराम उपाध्याय के कुल में महराजराम की पट्टी में गृहस्थ साधू 'केदारनाथ' के आंगन में बहु प्रतीक्षित “मुनिलाल” जैसा वंशवृक्ष का किसलय अंकुरित हुआ। यह भूक्षेत्र अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अखंड भारत में अग्रणी भूमिका निभाता चला आ रहा है। राज्य का वैभव और राज भोग को तिलांजलि देते हुए जन - जन में राष्ट्रीयता और आजादी की अलख जगाने में यह क्षेत्र सदैव तत्पर रहा। 


    उस समय इस “इतिवृत” के लेखक के पिता केदारनाथ घर गृहस्थी का कार्य परंपरागत रूप में देखते थे। पूरे परिवार की जिम्मेदारी इनके ऊपर ही थी। इनके तीनों भाई परमेश्वर दत्त, तमेश्वर दत्त और चंद्रिका प्रसाद तथा भतीजे रामबरन, रामसुन्दर इनके साथ कृषि कार्य में लगे रहते थे। वंशमणि कपिलदेव और सर्वदेव में से वंशमणि और कपिलदेव उस समय विद्यालय पढ़ने जाते थे। सर्वदेव गोचारण करते थे । ये तीनों लोग में कपिलदेव सबसे होनहार सुपुत्र थे। बौद्धिक रूप से वे लोग काफी प्रबुद्ध थे।


मेरा जन्म तब हुआ था जब मेरे पिता की 42 वर्ष की अवस्था में तीसरी शादी हुई थी । मैं तीसरी शादी का उनका बहु प्रतीक्षित पहला पुत्र था। मेरे पिता की पहली शादी हुई गांव रेंगी तिवारी में हुई थी। दूसरी शादी गांव भरथापुर कप्तानगंज में हुई थी। उनकी तीसरी ससुराल लहुरादेवा तिवारी खानदान में हुई जो मेरा ननिहाल है। पिता केदारनाथ की पहली दो पत्नियाँ मर चुकी थीं। उनके कोई सन्तान नहीं थी। 


मेरे पितामह महराजराम और उनकी पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर पिता जी ने 42 वर्ष की अवस्था में तीसरी शादी की थी। जिससे आश्विन मास के कृष्ण (इंदिरा) एकादशी तिथि को संवत 1997 विक्रमी तदनुसार 28 सितम्बर सन् 1940 ई. को शनिवार के दिन मै पैदा हुआ था। (यह मेरी वास्तविक जन्म तिथि है जो सरकारी रिकॉर्ड से अप्रमाणित है।सरकारी रिकॉर्ड में मेरी जन्म तिथि 10.04.1942 दर्ज है।)


मेरे आजी, बाबा , पिता जी और हमारी पट्टी के लोगों ने मेरे जन्म पर कई दिनों तक खूब उत्सव मनाये थे। 1945 ई. में हमारी बहन शोभावती का जन्म हुआ था और 1950 ई.में हमारे छोटे भाई वशिष्ठ प्रसाद का जन्म हुआ था।


जिस समय मेरे परिवार का बंटवारा हुआ उस समय 1950 से 1955 तक का समय महराज राम जी की पट्टी का सर्वोच्च उत्कर्ष का समय था । गाँव, जवार, पट्टीदार, हाकिम और हुक्काम सबमें परमेश्वरनाथ व केदारनाथ का सम्मान था। बंटवारे से गृह कलह की अशान्ति ये दोनों वरिष्ठ कुल पुरुष नहीं देख सके। सन् 1956 ई में परमेश्वर नाथ जी दिवंगत हो गये तदोपरांत केदारनाथ बेचैन रहने लगे थे। वे जहाँ भी जाते रोते हुये यही कहते, “बाबू चले गये।” एक वर्ष के अन्दर बेचैन, केदारनाथ जी 12 अक्टूबर सन 1957 ई. को घर का बोझिल भार मुझ अनाथ बालक मुनिलाल उपाध्याय पर सौंपकर साकेत वासी हो गये थे। 


सन् 1956 में महराज राम के पुत्रों में बटवारा पेश हुआ था। लेखपाल दुबरीलाल के नेतृत्व में बँटवारा पाँच भागों में किया गया था। उस समय चार भाई - परमेश्वर नाथ, केदार नाथ, तमेश्वर नाथ, चन्द्रिका प्रसाद बँटवारे में मैजूद ही थे। पाँचवां हिस्सा बाबा महराजराम के आदेश का पालन करते हुये श्रीमती श्यामराजी का लगा था,जो दिवंगत ईश्वर नाथ की धर्म पत्नी थीं। दुबरी लाल लेखपाल काफी प्रबुद्ध थे। उन्होंने बंटवारा करके सभी फरीकों को अपना-अपना कब्जा दिलाकर घर में गृह कलह की लड़ाई पूर्ण होने से बचा लिया।


बाबा महराजराम की पटटी के चारो घर जब अलग-अलग हो गये तो एक विभक्त पारिवारिक स्वरूप, सबको दुखी बनाने लगा। जहाँ पूरे परिवार का नाम पूरे क्षेत्र में था वहाँ घर में टुकड़े-टुकड़े ने इसे आपसी कलह का ज्वलन्त रूप प्रदान कर दिया था।


घर के बंटवारे के पश्चात् महराज की पट्टी का समस्त ऐश्वर्य टूटी हुई मोतियों की माला के समान बिखर गया। वह मकान जिसमें एक आदमी का वर्चस्व था जब टुकड़ों में ऐसा बँटा कि बड़े-बड़े बरामदो में चूल्हे चौकी पड़ गये। इस दयनीय दैन्यता को देखकर परमेश्वर नाथ और केदारनाथ का दिवंगत होना स्वाभाविक था। क्योंकि जब सर्प की मणि उससे छीन ली जाती है तो मणिहीन सर्प अपना अस्तित्व खोकर नहीं जी पाता है। इन दोनों प्रबुद्ध भाग्य शाली परिजनों के निधन से एक निराशा का वातावरण उत्पन्न हो गया। परिवार के वे लोग जो एक साथ बैठकर भोजन करते थे, वे एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी हो गये। 


मेरे पिता केदारनाथ उपाध्याय अपने भाईयों के विशेष प्रतिष्ठित थे। संयुक्त परिवार से अलग होने का दंश वे नहीं झेल सके थे। उनके परम धाम में जाने के पश्चात् मेरी स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई। मेरी विदुषी माँ हताश व हतप्रभ हो गई। मेरी अवस्था उस समय 16 वर्ष और मेरे भाई वशिष्ठ प्रसाद अवस्था 6 वर्ष की थी। मेरे ऊपर जैसे विपत्ति का आसमान फट पड़ा, लेकिन मेरी माँ ने मुझे सदैव उत्साहित ही किया।


     वर्ष 1960 में माता जी के आदेशों का पालन करते हुये मेरे और उत्तमादेवी के सम्पर्क से पुत्री कमला देवी का जन्म हुआ। 1962 में ज्येष्ठ पुत्र सत्यप्रकाश और 1964 में कनिष्ठ पुत्र ज्ञानप्रकाश का जन्म हुआ। उत्तमा देवी मेरे साथ थी जरूर, लेकिन मानसिक सन्तुलन खराब होने से मेरा दाम्पत्य जीवन सामान्य ना  रहा।


परमेश्वरनाथ जी के बड़े पुत्र रामबरन बड़े उदार थे। केदार नाथ के मरने से वे काफी दुखी हुये, क्योंकि वे इस परिवार से बहुत पहले से जुड़े रहते थे। घर के अगुवा और परिवार के सर्वप्रिय थे। पूरी खेती बाड़ी और उससे जुड़ा कार्य रामबरन ही देखते थे। यद्यपि अब वे संयुक्त परिवार से अलग हो गये थे ,लेकिन वे घर के अगुवा और पूरे परिवार के सर्वप्रिय थे। पूरी खेती बारी व उससे जुड़कर नित्य मेरे पिता के कार्यों में अपना सहयोग पूर्ववत रखते थे। 

-:बचपन शिक्षा और नौकरी:- 

उन्नीस सौ चलीस में मेरा जन्म हुआ वह समय अंग्रेजों का था। देश गुलाम था। जमीदारों का बोलबाला था। गाँव की प्रजा असामी कही जाती थी। हारी- बेगारी से लोग परेशान थे।  मेरा पालन-पोषण काफी ध्यान देकर किया गया। मेरी विदुषी माँ यह हमेशा आजी से कहा करती थी, “यह मेरा बेटा जरूर भाग्यशाली होगा क्योंकि इसके छ: अंगुलियाँ हैं।”

      हमारे जन्म के समय पं. अद्वैवर दत्त दूबे और उनके पिता पं. भगवान दत्त दूबे ग्रह नक्षत्र देखने के लिये बुलाये गये थे। वे मेरे पुरोहित थे। मेरा टिपना कुण्डली जन्म पत्री बनाने के लिए तैयार किया गया। उस समय मेरे बाबा महराज राम व हमारे पट्टी के गजराज राम व धर्मराज राम दरवाजे पर पुत्रोत्सव की खुशी में मौजूद थे। पं.भगवान दत्त बहुत अच्छे ज्योतिषी थे। उन्होंने कहा, “महराज बाबू ! केदार बाबू का यह प्रथम पुत्र बड़ा भाग्यशाली होगा। यह धीर ललित और धीर प्रशान्त गुण का है। सरस्वती का पुत्र होने के साथ लक्ष्मी का भी पुत्र होगा। इस में राजअंश मौजूद है।”


    रामलाल हलवाई द्वारा एक मन चने के बेसन का लड्डू बनाकर रखवाया गया था। वहाँ इसे दो - तीन सौ लोगों में बाँटा गया। खूब चहल-पहल के बीच पं.कामता प्रसाद ज्योतिषी, जो मेरे पिता के मित्र थे, आये हुए थे। उन्होंने पं. भगवान दत्त से मेरे बारे में पूछा। उन्होंने जन्म पत्री का टिपना लाकर रख दिया। वे टिपना देखकर बहुत प्रसन्न हुये। आज मेरे जन्म का ग्यारहवाँ दिन था। मेरी आजी ने लाकर मुझे उनके चरणाम्बुजों पर सुला दिया। वे मुझ को देखकर बोले, “बाबू केदारनाथ 'चौथेपन पायो सुतचारी' के समान आप इसका पालन पोषण करो।”


यह बच्चा बहुत भाग्यशाली होगा विद्वता इसके अंश में है खूब पढ़ेगा। नामी ग्रामी होगा यह जो कुछ मैं लिख रहा हूँ। यह सब मेरी माँ मुझे बताती रहती थी। सारी बातें उनके सुनकर याद किया था। उसे आज लिख रहा हूँ। वे उन विद्वानों के आशीष से विश्वस्त थी कि हमारा यह पुत्र बहुत भाग्यशाली होगा। इसलिये वे सदैव मेरी देख-रेख करती थी। वे कहा करती थी कि मेरे गाँव लहुरादेवा में सुमेर तिवारी के इसी तरह बायें हाथ में छ: अंगुली थी। वे लखपती थे। 


मेरा यह लड़का भी जरूर लखपती होगा। जिस तरह से एक कृषक कार्तिक में बोये खेत को प्रातः सायं बढ़ता हुआ देखकर खुश होता है। उसी तरह से मेरे माता-पिता व आजी तथा परिवार के अन्य लोग मुझे बढ़ता देखकर निरन्तर खुश होते थे। हमारे पिता के छोटे भाई तमेश्वर नाथ जी मेरे लिये फुलिया गाय का दो किलो दूध का लोटा भरकर मेरी माँ के पास प्रातः 6 बजे ही भेज देते थे। रामबरन भाई जब भी बाजार जाते थे, मेरे लिए मूंगफली, पेड़ा और जलेबी जरूर लाकर देते थे।


धीरे-धीरे जब मेरी अवस्था 5 वर्ष की हुई तो ईश्वर दत्त अठदमा वाले हमारे पिता के साथ आये हुये थे। उनके पास मेरी विदुषी माँ जो पढ़ी तो नहीं थी लेकिन शिक्षा के प्रति अगाध निष्ठा रखती थी, मुझे ले गई। मैं बहुत ही भीरु और कमजोर था। पंडित जी को देखकर रोने लगा। इस पर पं. जी ने मुझे गोद में उठा लिया और अपनी जेब से किसमिस के आठ - दस दाने देते हुये बोले, “लो इनको खावो। ये मीठे हैं।” 


मेरी माँ ने उन दानों को अपनी गोद में लेकर मुझे खिलाया और बोली, “ पं. बाबू इनकी आजी इनका नाम मुन्नीलाल रखना चाहती हैं, क्योंकि छोटे नाती का नाम रंगीलाल रख रही हैं। उनका कहना है, घर के राम लखन जैसे दोनों लड़कों का नाम मुन्नी लाल और रंगी लाल रक्खा जायगा। पं. ईश्वर दत्त इस पर बहुत प्रसन्न हुये ।उन्होंने कहा, “आप घर की आर्या है । अपना आशीष बच्चों को दें, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है?” तब रंगी लाल को लेकर उनकी माँ आकर दूर बैठी। आजी ने उनको लाकर पं. जी का चरण स्पर्श कराया। वे मुझ से दो वर्ष छोटे थे। 


पं. ईश्वर दत्त ने कहा कि “अब मुन्नीलाल का नामकरण आज हो गया है। इन्हें आज से पढ़ाई शुरू करा दो।”  पं. ईश्वर दत्त की बात सुनकर माँ ने मुझे उनकी गोद में बैठा दिया। पं. जी ने बड़े प्यार से लेकर मुझे अपनी तरफ करके बोलकर कहा, “काकी लो, अब मुन्नीलाल गुरुमुख हो गये , इन्हें अभी रोज 'बाबू' कहो । इन्हें सुबह-शाम क ख ग याद करावो । जब यह कुछ बोलने लगे तो इनसे इसे लिखाओं। मैं कुछ दिन के पश्चात् आऊँगा। 


    इसी बीच मेरे बड़े भाई कपिलदेव जी आ गये, जो प्राइमरी में पढ़ते थे, बोले, “काकी मैं रोज भाईया को क ख ग पढ़ाया करूँगा। यह तोते की तरह खूब बोलता है।” 

     नित्य प्रातः काल मेरी विदुषी माँ और चचेरे भाई कपिलदेव क ख ग आदि पढ़ाने लगे। 15 दिन के अन्दर मुझे क से ज्ञ तक का ज्ञान मौखिक रूप से हो गया।पढ़ाई में मेरी रुचि लगने लगी। धीरे-धीरे घर पर ही वर्णमाला का ज्ञान मुझे हो गया । खेलते - खाते मुझे लगभग एक वर्ष से अधिक बीत गये। मेरे गाँव से नगर बाजार 4 कि.मी.की दूरी पर बसा हुआ है । उस समय वहाँ ही प्राथमिक विद्यालय था । अब मैं लगभग सात वर्ष का हो गया। खेलने दौड़ने लगा। मेरी माँ गाय का दूध रोज एक सेर पिलाती थी। घी और मक्खन खूब खिलाती थी। अक्टूबर का महीना था। 


सन् 1947 में देश आजाद हुआ था। नगर बाजार में रामलीला का कार्यक्रम चल रहा था। मैं अपनी माँ से कहकर पिता की चोरी से सर्वदेव भाई के साथ रात्रि में रामलीला देखने पैदल चला गया । उस समय मेरी अवस्था सात वर्ष के करीब थी। रात्रि में जब लौटकर आया तो दूसरे दिन हमारे पिता को मालूम हो गया। उन्होंने रामबरन भाई को बुलाकर कहा, “ यह रात्रि में रामलीला देखने नगर पैदल गया था। यह अब नगर आ जा सकता है। इसको स्कूल में पढ़ने के लिये नाम लिखा दो।”


     बाबू रामबरन जी के साथ जब मैं प्राइमरी स्कूल नगर बाजार पहुँचा, तो वे मुझे “छोटी गोल” के अध्यापक रामदेव जी के पास ले गये। रामबरन जी उसी स्कूल से पढ़े थे। इसलिये उन्हें रामदेव जी जानते थे। मेरा नाम सुनते ही वे बोले, “मुन्नीलाल नाम तो बनियों का नाम है, दूसरा नाम रक्खे।” बाबू राम बरन जी ने कहा, “यह आजी का रक्खा नाम है, इसे बदला नहीं जायगा।” रामदेव जी बोले , ”ठीक है जैसा चाहें।”


      सन् 1947 के अक्टूबर मास में मेरा नामांकन कक्षा एक के प्रथम गोल “छोटी गोल” में हुआ। मैं घर पर ही वर्णमाला का ज्ञान कर चुका था। इसलिये मुंशी रामदेव में कहा, “तुम तक्थी लेकर स्कूल आवो।” दिसम्बर तक में छोटी गोल के लड़कों में सीनियर हो गया। मेरी अवस्था सात वर्ष की थी लेकिन रामबरन भाई ने कहा था, “लोग इसको बड़ा भाग्यशाली बता रहे हैं, यह जरूर पढ़ेगा। मुंशी रामदेव जी ! इसकी अवस्था कम लिखी जाय।” 1940 के स्थान पर उन्होंने मेरी जन्म तिथि 10-4-1942 लिखा दिया।


    “पटवारी का बिगाड़ा गाँव और माता पिता का बिगाड़ा नाम हमेशा के लिए पक्का हो जाता है।” मुन्नीलाल को मुंशी जी आदर से देखने लगे और जनवरी 1948 में कक्षा की बड़ी गोल में कर दिये। कक्षा एक में मुझे स्वर और व्यंजन का लिखने पढ़ने का ज्ञान हो गया। गिनती 100 तक पहाड़ा 10 तक बाल फ्रेम से गिनती आदि गिनाता था। मैं कक्षा का मानीटर बन गया। ग्रामीण अंचल का छात्र था। इसलिये पढ़ाई के अतिरिक्त और कोई कार्य से रुचि नहीं रखता था। कक्षा 1 से पाँच तक मुंशी रामरत्न, मुंशी रामदेव, मुंशी रामनरेश पं. यमुना प्रसाद मिश्र पं. शिव कुमार त्रिपाठी आदि की सदैव कृपा का पात्र मैं बना रहा। 



30 जनवरी सन् 1950 में जब गाँधी जी की हत्या हुई थी तो सारा नगर बाजार शोक सभा मनाने दुर्गा मन्दिर के पोखरे पर गया था। उस समय प्राइमरी स्कूल के छात्र भी गये थे, हजारों लोगों ने पोखरे में स्नान किया था। गाँधी जी को लोग राष्ट्र पिता मानकर उनका क्रिया कर्म भी किये थे। सारा क्षेत्र दुखी था। रोज हफ्तों तक शोक सभायें होती रही कोई न कोई नेता श्रद्धा सुमन चढ़ाने नगर बाजार आता रहता था।


 सन् 1950 में जिस समय मेरी अवस्था 10 वर्ष की थी। मेरा विवाह अठ्ठारह वर्षीय उत्तमा देवी के साथ हो गया। यह बाल विवाह बड़ा ही विसंगति पूर्ण था। मैं कक्षा 4 का छात्र था। शारदा ऐक्ट का कोई प्रभाव नहीं था। जब मैं 12 वर्ष का हुआ और कक्षा सात का छात्र था तो मेरे साथ मेरी धर्म पत्नी श्रीमती उत्तमा देवी का गौना आ गया था। 


 सन् 1952 में मैं कक्षा 5 उत्तीर्ण कर जूनियर हाईस्कूल नगर बाजार में प्रवेश लिया। उस समय मुंशी नीबरराम कक्षा 6 के शिक्षक थे। कक्षा 6 में मैं सबसे तेज छात्र माना गया। 1953 में जिस वर्ष मैं कक्षा 7 में पहुँचा उस समय बाबू मुशाफिर सिंह शिक्षक थे। उनको बच्चों को पढ़ाने का अच्छा ज्ञान था। 1954 में मैं कक्षा 8 का छात्र रहा। वहाँ मुंशी नोहरराम यादव प्रधानाध्यापक थे। कक्षा 8 में मैं सबसे तेज छात्र था। सभी अध्यापकों को प्रिय था। अपने सरल स्वभाव से ऐसी चर्चित हो रहा था कि लोग कहते थे कि यह लड़का आगे बढ़ेगा। जब मैं यह सब अपनीविदुषी माता से कहता था तो वे बहुत खुश होती थी। उस समय ट्यूटर रखने की कोई प्रथा नहीं थी। लोग पैसे के अभाव में थे।


      मैंने कक्षा 8 में बड़ी मेहनत से पढ़ाई की मुंशी नोहरराम निःशुल्क कक्षा 8 के छात्रों को रात्रि में पढ़ाते थे। मेरा गाँव 4 कि.मी. था फिर भी मैं रात्रि को पढ़ने पैदल आता था। उस समय गरीबी थी। लोगों के पास मात्र एक ही कपड़ा पहनने को रहता था। स्वेटर आदि का पता नहीं था। जूनियर के छात्रों में कुछ लड़के हाफ पैट पहनते थे। अधिकाशतः अण्डर वीयर पहनकर पढ़ने आते थे। हमारे साथ के पढ़ने वालों में राम सूरत, जटाशंकर, जोखू राम, बाबूलाल, जगलाल, राम अवध, जयनाथ सिंह और राजाराम आदि प्रमुख थे। कक्षा 8 मेहनत करके मैंने द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण किया क्योंकि उस समय कक्षा 8 की परीक्षा जिला परिषदीय थी।



 राम बरन के ही सहयोग से मेरा नाम खैर इण्टर कालेज बस्ती में कक्षा 9 में 1955 में लिखा गया था।  मेरी देख-रेख में वे अपना भी सहयोग देते थे। मैं बस्ती जाकर पढ़ा। वे अपनी पुरानी साइकिल से दाल, चावल, आटा कभी हमारे कभी अपने घर से लाकर पहुंचाते रहते थे। मेरे पिता के मरने के बाद बाबू राम बरन का सहयोग मुझे काफी मिला और मैं अपनी आसन्न कठिनाइयों से लड़ने में सफल हुआ। उस समय वहाँ मकबूल अहमद प्रधानाचार्य थे जो जिले के चर्चित प्रधानाचार्यों में एक थे। छमाही की परीक्षा में कक्षा 9 में मुझे गणित में 50 में 45 अंक मिले जो सर्वाधिक थे। इससे मकबूल साहब मुझे तभी से व्यक्तिगत रूप से जानने लगे और बोले, “तुम भावी मकबूल बनोगे।” हुआ ऐसा ही मैं इण्टर कालेज का प्रिन्सपल 1973 में हुआ और उन्हीं की तरह आगे चलकर 2002 में राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हुआ।



हाई स्कूल पास होने के बाद मेरा एडमिशन सक्सेरिया स्कूल में कराया गया था। इसी साल जब मेरे पिता का निधन 12 अक्टूबर 1957 ई को हो गया, मैं अनाथ हो गया।  उस समय मैं सक्सेरिया कालेज में कक्षा 11 में पढ़ता था । पिता जी के पिण्डदान आदि में मुझे महीनों बीत गये और मेरी पढ़ाई छूट गई। मेरे समस्त मनोरथ चूर्ण- चूर्ण हो जाने से मेरी माता किंकर्तव्य विमूढ हो गई। उसी समय एक सन्त मेरे घर आये हुए थे। वे मेरे पिता के समय से आते रहते थे। मेरे दुःखी परिवार को देखकर स्वयं दुखी हुये। बोले, “इस बच्चे को पढ़ने भेजो। यह घर पर क्या करेगा।” उन्होंने मेरी माँ से कहा, “तुम घर के अन्दर से बाहर आओ इस बच्चों को पढ़ाओ। यह तुम्हारे कुल का नाम करेगा। बड़ा भाग्यशाली है।” मेरी माँ ने कहा, “यह पढ़ने नहीं जाना चाहता है महराज!” महराज बोले, “क्यों रे! तुम तो भाग्यशाली है । बिना पढ़े कैसे तेरा मनोरथ पूर्ण होगा।” उन्होंने मेरा हाथ देखा और बोले, “तेरे अंश में विद्या खूब है यह क्या हो रहा है।” कुछ देर ध्यानस्थ होने के बाद वे बोले, “कल से तुम्हें पढ़ने जाना है।” 


मैं कुछ नहीं बोला। फिर वे आवाज कड़ी करके बोले, “कान पकड़ मैंने भूल किया कह!” मैं संकोच करने लगा लेकिन मेरी माँ ने उठकर मेरा कान पकड़ लिया और तीन बार उठाया बैठाया। महराज जी बोले, “बोल मैं स्कूल जाऊँगा।” मै तीन बार बोला, मेरी माँ ने इशारा किया मैंने तीन बार कहा कि “मैं स्कूल जाऊँगा।” उन्होंने मेरी माँ से कहा, “बच्चा सुधर जायगा । कल इसे स्कूल भेजो।” 


   माता जी ने बाबू रामबरन जी को बुलाया और बोली कि “बाबू इनको कल स्कूल ले जाओ। नाम यदि कट गया हो, तो लिखा दीजिये। मास्टर यदि बोले तो हमारी विपत्ति उनसे कह दें।”


     11 नवम्बर को बाबू राम बरन जी के साथ मैं सेक्सेरिया कालेज बस्ती गया। वहाँ कक्षा 11 के हमारे क्लास टीचर बाबू धर्मराज लाल मुझको सर मुड़ाये देखकर समझ गये कि इस के पिता या माता का देहान्त हो गया है। इसलिये नहीं आता था। बाबू रामबरन जी से पूछे, “आप इसके गार्जियन हैं ।” वे बोले ,”हाँ साहब! इसका नाम कट गया है ।” “एक दरखास्त के साथ इकतीस रुपया दो महीने की फीस जमा कर दीजिये।”


    बाबू रामबरन जी ने पैसा जमा किया मेरा नाम लिखा गया। मैं जैसे प्रथम पीरियड में कक्षा में गया सब लड़के अवाक से हो गये। सबों ने मेरे तरफ करुणा भरी दृष्टि डाला और पूछा यह क्या हो गया। मैं रोने लगा, कुछ बच्चे रोने लगे। इसी बीच अंग्रेजी के लेक्चरर इदरीश साहब आ गये। अस्त- व्यस्त कक्षा देखकर पहले तो उन्होंने जोर से डांटा। लेकिन जब उन्होंने मुझे देखा और सुना कि इस लड़के के पिता का देहान्त हो गया है, इसलिये सभी लड़के दुःखी है । 


उन्होंने लड़कों को अपनी- अपनी सीट पर खड़ा किया और बोले, ”बेटो! आज हमारे बीच का छात्र दुःखी है। हम सब इसके पिता को श्रद्धाजंलि देकर इसको आशीष दें और ईश्वर से कामना करें इसके पिता स्वर्ग में सुखी रहे।” छात्र की आत्मीयता से से में भाव विभोर हो गया।


 बाबू धर्मराज लाल श्रीवास्तव हमारे कक्षा के कक्षा अध्यापक थे। मेरी स्थिति से अवगत होने से ये मुझ पर ध्यान रखने लगे थे। मैं विज्ञान का विद्यार्थी था। 12 किमी. से साइकिल से पढ़ने जाता था। गाँव का छात्र था। मैथ और फिजिक्स विषय की गम्भीरता से भयभीत हो गया। एक दिन मुझसे रामसूरत दूबे ने कहा कि “तुम विज्ञान विषय छोड़ दो ,आर्ट साइड ले लो नहीं तो 11 में ही फेल हो जावोगे सारी पढ़ाई छूट जायगी।” मैंने कहा, “अब कैसे होगी।” उसने कहा, “चलो नाशाद जी से कहता हूं ।” मैं उसके साथ नाशाद जी के पास गया। वे इतिहास के लेक्चरार और उपाचार्य थे। बोले, “कल इसको आर्ट साइड दिला दो लेकिन इतिहास जरूर पढ़ेगा।” मैने कहा, “जरूर पढ़ेगा।”


      दूसरे दिन 11 बजे एक दरखास्त लिखकर उस पर हस्ताक्षर करके प्राचार्य मुनीम चन्द्र अस्थाना जी के पास मुझे लेकर पहुँचे और मेरी परिस्थिति में अवगत कराकर कक्षा 11 अ में नामांकित करा दिया। मेरा नाम आर्ट साइड में आ गया। मेरे कक्षाध्यापक श्रीसंकटा  प्रसाद श्रीवास्तव हुये । वे बड़े कड़े विचार के थे। बेलाड़ी के पहलवान सिंह उसी क्लास में थे जिनसे सारा स्कूल डरता था। मैं भी उनका साथी हुआ।


    दिसम्बर में षटमासिक परीक्षा चल रही थी।  तीसरे महीने मेरे पिता के बरखी की तिथि ऐसी पड़ी कि उसी दिन मेरा संस्कृत का पेपर था। एक तो लेट विषय लिया दूसरे प्रश्न पत्र छूट गया। षटमासिक परीक्षा में लगभग सभी विषयों में उत्तीर्ण हुआ। लेकिन संस्कृत का एक पेपर छूट गया दूसरे में 50 में 10 नं. कुल 100 में दस नम्बर फेल होने का संकेत देने लगा। धीरे-धीरे वार्षिक परीक्षा का समय आ गया मेरी विपन्नता और विपत्ति मुझे पढ़ने को निरन्तर बाधा डालने लगी। 


मैं घर की खेती बारी की देख रेख के पश्चात् कभी- कभी स्कूल जाता। मेरी पढ़ाई कमजोर होने लगी । मेरे साथी भूपत सिंह ने मुझ से कहा तुम ढीले  रहोगे तो कक्षा 11 में ही फेल हो जावोगे। मैंने कहा क्या करें उन्होंने कहा अब रेजल्ट बन रहा है चलो क्लास टीचर से कह दें । संकटा प्रसाद श्रीवास्तव बड़े नियमित विचार के थे। उन्होंने कहा यह लड़का संस्कृत में फेल हो जायगा । पं. राममिलन जी दूसरी स्लिप बनाकर नम्बर बढ़ा दें तो पास हो जायगा। मैंने कहा साहब मुझे फेल न करे। मैं विपत्ति का मारा हूँ । अगले वर्ष मेहनत करूँगा। उनकी उदारता से मुझे उत्तीर्ण होने का अवसर मिला। 


 1968 में मैं कक्षा 12 का छात्र था उस समय अंग्रेजी अनिवार्य थी। मैं घर से 12 कि. मी. से सक्सेरिया कालेज पढने आता था। सप्ताह में 4 दिन स्कूल और दो दिन घर का काम देखता था। कक्षा की पढाई और विषय की पूर्ण तैयारी न होने से मैं काफी परेशान था और परीक्षा न देने को सोच रहा था। उस समय मेरे रिस्तेदार राम बक्स द्विवेदी लखनऊ पुलिस लाइन में हवलदार थे ।उनके पास मैंने पत्र लिखा कि मैं परीक्षा नहीं देना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा अभी जनवरी का महीना है मार्च में परीक्षा होगी। परीक्षा मत छोड़ों उनका सुझाव मुझे प्रेरणास्पदं लगा। 


मैंने मन लगाकर पढ़ना प्रारम्भ किया। खूब तैयारी किया। परीक्षा में सभी प्रश्नपत्र सन्तोष जनक होने लगे, और जब अंग्रेजी का पेपर ठीक हो गया तो मैंने समझ लिया कि अब मैं उत्तीर्ण हो जाऊँगा। जून में परीक्षाफल निकला मैं पास हुआ। 



 मेरे इण्टर कॉलेज पास करने के  समय 1969 में बस्ती में डिग्री कॉलेज नहीं था। जुलाई 1969 में किसान डिग्री कालेज खुला था। मैंने बी. ए. में प्रवेश लिया और पढ़ाई का सिल सिला आगे बढ़ा। उस समय बी. ए. में सामान्य अंग्रेजी और भारतीय संस्कृति विषय अनिवार्य थी। मेरी अंग्रेजी कमजोर थी। अत्यधिक प्रयास करने के पश्चात् भी मैं अंग्रेजी में कमजोर था। बी. ए. की परीक्षा गोरखपुर हुयी थी जहाँ परीक्षा के समय बड़ी असुविधा उठानी पड़ी थी और रेलवे स्टेशन पर रहकर परीक्षा देनी पड़ी थी। परीक्षाफल निकला मैं अनुत्तीर्ण हो गया। 


     मेरी माता जी ने दबाव दिया कि फिर नाम लिखाओ। पुनः नाम लिखाया गया। इस वर्ष परिश्रम करने से परीक्षाफल माफिक रहा। 1962 में निरन्तर परिश्रम करके बी. ए. उत्तीर्ण करने में सफल रहा। 


 अब बी. ए. के पश्चात क्या किया जाय ऊहापोह की स्थिति में था। गोरखपुर से एम. ए. करो मेरी माँ ने मुझे मेरे मउसियाने भड़सार भेजा जहाँ मेरे मौसेरे भाई सदा नन्द मिश्र मुझे लेकर गोरखपुर विश्व विद्यालय गये। वहाँ उन्होंने मुझ से एम. ए. के प्रवेश का फार्म भराया और मैं घर आने की तैयारी में था कि मेरे साथी वीरेन्द्र सिंह मिल गये। उन्होंने कहा मेरे साथ फैजाबाद चलो मैं तुम्हारा बी. एड्. में नाम लिखा दूँगा।



 जुलाई के महीने का अन्त चल रहा था। आम पककर सड़कों पर आ गये थे। गोरखपुर में पानी खूब बरस रहा था। उस समय बसों की स्थिति आज जैसी नहीं थी। सायं किसी तरह से बस्ती की बस मिली 7 बजे बस्ती पहुँच गया। लकड़मंडी की बस पकड़ा। हम और वीरेन्द्र सिंह रात्रि में लकड़मंडी बैठकर रात्रि व्यतीत किये। प्रातः स्टीमर से अयोध्या आये। उस समय अयोध्या का पुल नहीं था। अयोध्या से हम वीरेन्द्र सिंह के साथ फैजाबाद साकेत कालेज गये। मैंने बी. एड् के लिये कोई प्रवेश परीक्षा नहीं दिया था।


 वीरेन्द्र सिंह साकेत कालेज के प्राचार्य डॉ. एच. सी. जैन से अपना परिचय बना चुके थे। जब मुझे ले जाकर उन्होंने प्राचार्य के सम्मुख प्रस्तुत किया तो मेरा स्वरूप सुदामा के समान था। एक फटा पैजामा और एक फटी कमीज में मैं उन्हें एक यतीम सा लगा। उन्होंने पूछा, “कौन जाति हो ? मैंने कहा, “ब्राह्मण”।फिर पूछा, “क्या पढे हो?” मैंने कहा, “साहब बी. ए. इसी वर्ष किया है।” उन्होंने पूछा, “प्रवेश परीक्षा दिये हो ?” मैने कहा, “साहब नहीं जानता।” प्राचार्य जी वीरेन्द्र की तरफ देखकर मुस्कराते हुये बोले, “बिना प्रवेश परीक्षा कैसे नामांकन हो सकता है?” हँसते हुए वीरेन्द्र ने कहा, “साहब! आज सुदामा की परीक्षा हो गई। ये एक गरीब ब्राह्मण है। बी. एड्. में 30 सीट बढ़ी है आज ही लास्ट डेट है आदेश दे दें।”


    मेरी दयनीय स्थिति को देखकर प्राचार्य जी बहुत प्रभावित हुये बोले, “ नब्वे रुपये फीस लेकर दो बजे तक जमा करो।” मेरे पास 15 रु. मात्र था । मैं भागा हुआ गाँव के पुलिस श्रीराम उजागिर बाबा के पास गया। वे फैजाबाद पुलिस लाइन में थे। उनसे कहा, “बाबा! आप चलकर आज ही नाम लिखा दो ।”  


     फैजाबाद से साकेत पहुँचने में काफी देरी हो गई। प्राचार्य जी कक्ष में बैठे थे। उजागिर बाबा पुलिस की वर्दी में जाकर सलूट मारे। बोले, “सरकार! भतीजा है नाम लिखाने आया हूँ।” प्राचार्य जी की कृपा से और राम उजागिर बाबा के सहयोग से मेरा नामांकन अगस्त 1962 को बी. एड्. कक्षा में साकेत कालेज में हो गया।


     सितम्बर का महीना था मैने 1962 में अगस्त में अपना नाम साकेत डिग्रीकालेज फैजाबाद में बी. एड्. में लिखाया और पैसे की व्यवस्था में घर चला आया था। राम उजागिर बाबा का रुपया देना था और अपने खाने रहने की व्यवस्था करनी थी। किसी तरह साइकिल लेकर 60 किमी.की दूरी तय करते हुए अयोध्या पहुँचा। जब दूसरे दिन कालेज गया तो कक्षा में हाजिरी के समय मेरा नाम नहीं बोला गया। मैं खड़ा हुआ और बोला, “सर! मेरा नाम नहीं बोला गया।”


     उन्होंने कहा आज पद्रहवाँ दिन है। तुम नहीं आये तो तुम्हारा नाम कट गया। इस तरह से तीन लोगों के नाम कटे हैं जो दूसरे वेटिंग लिस्ट से भरने वाले हैं। तुम शीघ्र हेड साहब से मिलो नहीं तो तुम्हारा एंडमीसन निरस्त हो जायगा। मैं अवाक हो गया । स्वर्ग से गिरा खंजूर पर लटका की स्थिति हो गई। मैं हेंड साहब के पास गया। श्री आशुतोष उपाध्याय हेड थे, मैंने अपनी बात कही साहब मैं बाढ़ क्षेत्र का निवासी हूँ । गाँव पर बाढ़ थी आने में देर हो गई नाम कट गया है लिखा दें। पहले तो वे कड़क कर बोले तुम इतन ढीले हो  बी. एड. कैसे करोगे।


उनके पास प्रोफेसर शरण साहब बैठे थे बोले ,”एक दरखास्त लिखो जो तुम कह रहे हो।” मैं प्रार्थना पत्र वहीं लिखने लगा। शरण साहब ने कहा उपाध्याय जी यह लड़का आप की बिरादरी का है। गरीब ब्राह्मण लगता है इसका कल्याण करिये। डॉ. अशुतोष उपाध्याय मिलीटरी से रिटायर थे। वे बड़ा नियम के पक्के थे। बोले शरण साहब आप के कहने से इसका नामांकन करा दे रहा हूँ। नहीं तो कल 5 लोगों का नाम कटा है। प्राचार्य जी ने वेटिंग से भरने का आदेश दे दिया है। उपाध्याय जी ने बाबू को बुलाया और मेरा नाम पुनः लिखा गया। 

मैंने पुलिस लाइन फैजाबाद में श्री राम उजागिर बाबा के यहाँ शरण लिया। उनके पास अपना क्वार्टर छोटा था। बगल के मन्दिर में मुझे रहने का स्थान मिला। वहाँ उस समय 15 रु. मासिक पर भोजन मिलता था। वहाँ मैं दो मास रहा। उस समय बस्ती के एक छात्र शिव शंकर सिंह मेरे साथ क्षत्रीय बेर्डिंग में गये और वहाँ पर अपने साथ मुझे रहने को स्थान दिला दिये। वहाँ पर भी उनके साथ मैं 4 मास रहा।


     मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। मैं प्रत्येक शनिवार को साइकिल से घर आता था और सोमवार को साइकिल से 60 कि. मी. घर से अयोध्या जाता था। पैसे की तंगी थी मेरी माँ काफी दुखी रहती थी क्योंकि इसी बीच मेरी पत्नी उत्तमा देवी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी।उनके पास  मेरे पुत्र सत्य प्रकाश की आयु 6 मास थी। मैं 15 दिन पर जब घर आया तो घर की दशा देखकर अवाक हो गया। मैं उस समय लगभग 22 वर्ष का था लेकिन शरीर से दुबला था। दूसरे दिन मेरी माँ ने कहा कि रेंगी चले जाओ।  मैं साइकिल से रेंगी गया और चेतराम तिवारी की माँ के सहयोग से उत्तमा को रेंगी भेजा। 


 मेरी माँ ने कहा तुम अपनी पढ़ाई का ध्यान लेकर मैं अयोध्या पहुंचा और फैजाबाद में 2 रु. 10 आने प्रति सिक्के की दर से पैसे का अभाव था मेरी माँ ने अपना पुराना चाँदी का दो सौ रुपया दिया। उसको रक्खो। यह विपत्ति है - 

" धीरज धरै सो उतरै पारा, 

नाही तो डूब जाय मजधारा।"


        मैं 420 रु. प्राप्त किया। मेस और बाकी बकाया दिया। क्षत्रिय छात्रावास में भीड में पढ़ाई नहीं हो पा रही थी।   दिसम्बर का महीना बीत चुका था। जनवरी आकार परीक्षा का संदेश दे रही थी। हम दोनों लोग अयोध्या में सरयू दासी माता के मन्दिर में कमरा लिये और परीक्षा की तैयार में लग गये।


     बी. एड्. एक वर्ष का कोर्स होता है लेकिन इसका पाठ्यक्रम बड़ा गम्भीर होता है । जरा सी लापरवाही से छात्र फेल हो जाता है, ऐसी चर्चा लोग करते थे। अप्रैल का महीना था बी. एड्. की प्रयोगिक परीक्षा चल रही थी। मेरे पास कोई ड्रेस नहीं था न तो कोई अप्रोच था। परीक्षा में इसलिये तृतीय श्रेणी मिली। इसी तरह से लिखित परीक्षा भी अप्रेल में सम्पन्न हुई। लिखित परीक्षा सन्तोष जनक होने से मुझे विश्वास हो गया कि मैं बी. एड्. जरूर पास कर लूँगा। 



परीक्षा के उपरान्त में अपने ग्राम सीताराम पुर आया। उस वर्ष आम खूब पके थे। गाँव के लोग अक्सर बागों में दिन भर पड़े रहते थे। मेरे पास भी आम का बागीचा था। जून का महीना था। दस बारह लड़कों के साथ मैं आम और जामुन खाँ रहा था कि पोस्टमैन आया। उसने कहा, “मुन्नीलाल किसका नाम है ?” कपिलदेव भाई ने मुझे बुलाया। उसने कहा, “तुम अपनी डाक लो।” मेरे हाथों में जैसे डाक आई उसमें बी. एड्. का रेजेल्ट था। जिसे मेरे बी. एड्. के मित्र जगदीश मिश्र ने गोण्डा से भेजा था। लोगो ने पूछा यह क्या है? मैंने कहा मैंने जो परीक्षा बी. एड्. की दिया था पास हो गया। साथ के सभी लोगों ने खूब हर्ष मनाया।


 नन्द जी ने कहा हमारे गाँव में एक मास्टर हो गये इससे गाँव की तरक्की होगी। पास में बैठे चन्द्रिका काका ने कहा तुम बहुत भाग्य शाली हो जो सबसे अधिक पढ़ डाले। वहाँ पर बैठे जंग बहादुर बाबू ने कहा तुम हमारे कुल के दीपक हो तुम्हारी पढ़ाई से हम लोगों को बड़ी खुशी है क्योंकि अब तक हमारे बाबा के अलावा खानदान में कोई इण्टर नहीं पास किया है। तुम्हारे ऊपर इतनी मुसीबत होते हुये तुमने मास्टरी की परीक्षा पास कर लिया है।


 रामबरन भाई ने कहा मैं इसको लेकर हमेशा दौड़ता हूँ कि यह पढ़कर परिवार में नाम करे। पं. कामता प्रसाद और भगवान दत्त ने कहा है कि इसकी कुण्डली के ग्रह नक्षत्र बलवान है यह प्रतापी और तेजस्वी होगा।


बी. एड्. उत्तीर्ण होने के पश्चात मेरी नियुक्ति किसान मा. विद्यालय मरहा कटया बस्ती में सहायक अध्यापक के पद पर हो गई। वहाँ के प्रबन्धक श्री गोमती सिंह इलाके के पुरुषार्थी आदमी थे। वे मेरे परिवार को खूब जानते थे। वहाँ मैंने पहली जुलाई 1963 को कार्य भार ग्रहण किया और परिश्रम से कार्य करने लगा। 

“समीर”जी ने नाम संशोधित कराया 

समीर जी तो वैसे प्राचीन समय के एम ए होते हुए भी प्राचार्य थे। उनका अमिलिया फैजाबाद में जन्म हुआ था। वे सीतापुर के मूल निवासी थे। उन्होंने  "संसार के साहित्यिक" और"अवधी कोश" लिखा है।नवम्बर का मास था, 1964 ई. थी । बस्ती जनपद के गौरव और हिन्दी जगत के प्रख्यात विद्वान पं. रामाज्ञा प्रसाद द्विवेदी “समीर” एक बार विद्यालय पर आये। उनको देखने के लिये तमाम लोग विद्यालय पर उपस्थित हुये। पं. काशी प्रसाद मिश्र से वे पूर्णतया परिचित थे, और पं. बुद्धि सागर मिश्र 'पंचानन' के वे रिस्तेदार थे। उनके स्वागत में एक गोष्ठी विद्यालय पर हुई। मैंने उनका स्वागत गान पढ़ा। वे बहुत खुश हुये जब गोष्ठी समाप्त हुई। उन्होंने पं. काशी राम जी को पास मुझे बुलाकर परिचय पूँछा। जब मैंने अपना नाम मुन्नीलाल उपाध्याय बतलाया तो उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पिता कितना पढ़े थे?”  


मैंने कहा, “कुछ नहीं।” पुनः उन्होंने कहा, “तभी तो अनाप-सनाप नाम रख दिये। अच्छा अब तुम अपने नाम का संशोधन करो।” मैंने पूछा, “क्या करूँ?” उन्होंने हँसते हुये कहा, “कहो मेरा नाम मुनिलाल उपाध्याय है। कागज पत्रों में संशोधन कठिन है। लेकिन अब अपना नाम यही लिखो और बतलाओ भी।” मैंने कहा, “ सर ! ऐसा ही करूँगा।” पुनः उन्होंने पूछा, “क्या तुम कविता लिखते हो?” मैंने कहा, “जी हाँ, प्रयास कर रहा हूँ।” उन्होंने मेरी पीठ थपथपा कर बोले, “बेटा ठीक है। तुम हमारे जिले के प्रतिभाशाली कवि बनो, मेरा आशीष है।”


    वहाँ बैठे दर्जनों लोगों ने कहा, “मुनिलाल जी! तुम बड़े भाग्यशाली हो। ये समीर जी हिन्दी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय विद्वान हैं। इनका आशीष निश्चित ही तुम्हें बड़ा बनायेगा।”मैंने समीर जी का चरण छुआ। उन्होंने पुनः हँसते हुये कहा, “मुनिलाल तुम कवि का अशीष आज पा रहे हो। आज तुम्हारा पूरा नाम मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' रहेगा। तुम सरस जी के नाम से साहित्य जगत में सम्मानित रहो। यह भी मेरा आशीष लो।” वहाँ बैठे दर्जनों लोगों के मध्य मैं बहुत प्रसन्न हुआ और अपने नाम का संशोधन कर लिया।


नाटककार पण्डित लक्ष्मीनारायण मिश्र 


1965 का फागुन का महीना था। फरवरी मास हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा का सन्देश दे रहा था। मैं किसान मा. विद्यालय मरहा कटया बस्ती में सहायक अध्यापक के पद पर कार्य करते हुये बच्चों और क्षेत्र की जनता में चर्चित था। विद्यालय चल रहा था दो बजे के करीब एक कार से कुछ लोग जैसे उतरे।


 

             पं. काशी प्रसाद मिश्र 


प्रधानाचार्य सुखनंदन प्रसाद सहित पं. काशी प्रसाद मिश्र आदि सभी लोग उनके कार के पास पहुंचे।कार में बढ़नी के पं. बुद्धि सागर मिश्र 'पंचानन' के साथ कुछ लोग बढ़नी मिश्र ग्राम के थे। उनके साथ हिन्दी समस्या नाटक के राष्ट्र विख्यात रचनाकार पं.लक्ष्मी नारायण मिश्र विराजमान थे। सभी लोगों के साथ मैंने भी उनका चरण छुआ। लक्ष्मी नारायण मिश्र प्रसिद्ध नाटककार और साहित्यकार के रूप चर्चित के उनके आने की खबर बस्ती शहर तक फैल गई। शहर से हिन्दी विद्वानों की का आने लगी। पं. लक्ष्मी नारायण मिश्र के पूर्वज इसी बढनी ग्राम से आजमगढ़ गये थे। वे अपनी पूर्वज भूमि बढ़नी देखने गये थे। विद्यालय पर उनके बैठने का खुला इन्तजाम किया गया। पडोस के प्रबुद्ध लोगों के साथ 500 से अधिक की भीड़ हो गई। यहाँ पर भी पं. काशी प्रसाद मिश्र जी ने मुझे स्वागत गान करने को कहा यहाँ मेरा नाम मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' करके पुकारा गया। 


मैंने जो स्वागत गान किया वह माधूर्य पूर्ण था 'सरस' उपनाम सुनकर पं. लक्ष्मी नारायण मिश्र जी ने हँसते हुये खुलकर आशीर्वाद दिया। वे बोले, “तुम यथा नाम तथा गुण वाले व्यक्ति लगते हो।” मैंने उनका आशीष पाकर चरण छुआ। 'पंचानन' जी ने कहा, “महोदय! यह हमारे विद्यालय के रत्न हैं।” प्रधानाचार्य सुखनन्दन प्रसाद चौहान जी ने कहा, “सर ये भविष्य में अच्छे कवि होंगे। इन्हें समीर जी का आशीष प्राप्त हुआ है।” मुस्काराते हुये पं. लक्ष्मीनरायण मिश्र जी ने कहा,  मैंने भी तो अपना आशीष  'सरस' जी को हृदय खोलकर दे दिया है।” तमाम बैठे लोगों ने कहा कि श्री मिश्र जी प्रतिष्ठित नाटककार होने के साथ-साथ महाकवि है। यह इस समय कर्ण महाकाव्य लिख रहे हैं। हजारों छन्दों के रचनाकार हैं। एम. ए. में इनकी “सिन्दूर की होली” नाटक हम लोग पढ़ा रहे हैं। आज विद्यालय का सौभाग्य है कि इतना विराट व्यक्तित्व हमारे मध्य है। सरस जी को आशीष देने वाले मिश्र जी हिन्दी जगत के सूर्योदय है। इससे निश्चित ही सरस को सम्मान मिलेगा।


जुलाई 1963 से जून 1965 तक मैं किसान माध्यामिक विद्यालय मरहा कटया बस्ती में सहायक अध्यापक के पद पर कार्य कर रहा था। इसी बीच 1965 के दिसम्बर में क्षेत्र के शिक्षित नागरिकों की एक बैठक पं. शिवकुमार त्रिपाठी और नगर बाजार के उप प्रधान हाफिज अब्दुल गनी जी ने बुलाई। पं. शिवकुमार जी से मेरा छात्र जीवन से सम्बन्ध था। उन्होंने मुझसे कहा कि नगर बाजार में एक हाईस्कूल खोलने पर विचार किया जा रहा है क्योंकि मैंन ए.सी.ओ. से कहकर मुनेश्वर बरई के पीछे तीन एकड़ जमीन छुड़वाया है। तुम इसमें सहयोग करो मैं चाहता हूँ, कि तुम्हीं को प्रिन्सिपल बनाया जाय। मैंने कहा हाँ पं. जी यदि नगर बाजार में हाईस्कूल खोला जाय तो ठीक चलेगा।


 बैठक के दिन जू. हाईस्कूल नगर बाजार के बरामदे में क्षेत्र के लगभग 500 लोगों की बैठक हुई सभी लोगों ने हाई स्कूल खोला जाय के प्रस्ताव का समर्थन किया। पं. शिवकुमार त्रिपाठी जी ने बतलाया कि स्कूल के नाम जो जमीन छूटी है उसको ग्राम समाज से प्रस्ताव करके स्कूल के नाम कराया जाय। बैठक में लोगों ने प्रस्ताव किया कि स्कूल का नाम जनता माध्यमिक विद्यालय नगर बाजार - रक्खा जाय। 


सर्व सम्मत से इसका समर्थन किया गया और हाफिज अब्दुल तथा प. शिव कुमार त्रिपाठी को एक संचालक मण्डल बनाने को अधिकृत किया गया। पं.शिव कुमार जी ने मुझे वायलाज आदि बनाने के लिये विद्यालयों से सम्पर्क करने को कहा।     


 सन 1965 मार्च का महीना था। पं. शिवकुमार त्रिपाठी और हाफिज अब्दुल गनी उपप्रधान नगर ने नगर बाजार बस्ती जू हाईस्कूल पर नगर बाजार हाईस्कूल खोलने की मीटिंग बुलाई थी। इस बैठक में जवार के लगभग सभी प्रतिष्तिव्यक्ति आये हुए थे। बहादुरपुर क्षेत्र के ब्लाक प्रमुख श्री विन्देश्वरी सिंह पाण्डेय भी उपस्थित थे।विद्यालय समिति का बायलाज बनाकर लाया गया था। महंत सिंह के साथ नगर अदालत पंचायत के सरपंच श्री शिव मोहरनाथ रजिस्टर्ड होने के लिए कमेटी के पदाधिकारियों का चयन किया जाना था।


 इस बैठक में समिति के गठन के लिए 12 सदस्यों का चयन और पदाधिकारियों का नाम दिया जाना था। समिति में श्री शिवकुमार त्रिपाठी श्री हाफिज अब्दुल गनी श्री यमुना सिंह, श्री महंथ सिंह, श्री विन्देश्वरी सिंह, श्री जंग बहादुर उपाध्याय, श्री राधेश्याम उपाध्याय, श्री गुरुप्रसाद, श्री घोलर पाण्डेय, श्री सरजू भगत, श्री सालिक पाण्डेय, श्री रामप्यारे पाण्डेय सदस्य चुने गये। श्री महंत सिंह को अध्यक्ष और श्री शिव मोहर नाथ पाण्डेय को प्रबन्धक तथा श्री विदेश्वरी सिंह को मंत्री बनाया गया जब कमेटी बनकर घोषित हुई तो श्री यमुना सिंह ने यह दोहा पढ़ा- 

सचिव वैद्य गुरु तीन, 

जौ प्रिय बोलै भय आस।

राज-धर्म-तन तीन कर, 

होत वेग ही नास।


 विद्यालय समिति के सदस्यों को इस कमेटी में एक पक्षीय निरंकुश भावधारा दिखाई पड़ी। तमाम उपस्थित होने के सुझाव से मुझे विद्यालय का प्रधान अध्यापक बनाया गया। उस समय मैं किसान माध्यमिक विद्यालय का अध्यापक था। पं. शिव कुमार जी प्रारम्भ में विद्यालय खोलने में कोई बाधा आने देना नहीं चाहते थे। उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यालय खोलने की पूरी तैयारी की जाय। 


जुलाई 1965 में प्रथम तारीख से विद्यालय का प्रवेश प्रारम्भ हुआ और पं. शिवकुमार जी ने मुझे और हाफिज अब्दुल्लगरी जी को वायलाज के रजिस्ट्रेशन कराने का कार्य सौंपा उस समय रजिस्ट्रेशन का कार्यालय लखनऊ में था अगस्त में वायलाज पंजीकृत होते ही जू. हाईस्कूल की मान्यता भी मिल गई। विद्यालय के प्रबन्धक श्री शिव मोहरनाथ पाण्डेय को समिति संचालन का ज्ञान था, क्योंकि वे कोपरेटिव सोसईटी के अध्यक्ष और कई वर्षों से नगर बाजार के सरपंच रह चुके थे।


 जिस समय जुलाई 1965 में मैं जनता मा० विद्यालय नगर बाजार, बस्ती का प्रधानाध्यापक हुआ उस समय मेरे एक पुत्री कमला तथा दो पुत्र सत्य प्रकाश और ज्ञान प्रकाश का जन्म क्रमशः 1960, 1962 और 1964 में  हो चुका था। मैं सदैव इस प्रयास में था  कि इसे शीघ्र हाईस्कूल और इण्टर मीडिएट स्तर तक मान्यता मिल जाय। उस समय इण्टर कालेज हाईस्कूल और प्राइवेट हाईस्कूल व्यवस्था जिला विद्यालय निरीक्षक की देखरेख में होती थी। प्रति उप विद्यालय निरीक्षक केवल विद्यालय का यदा-कदा निरीक्षण करते थे जो छात्रों की क्षतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के प्रकरण से जुड़ा होता था। 


मुझे जिले के उच्च श्रेणी के प्रधानाचायों के साथ बैठको में बैठने का अवसर मिलने लगा। इससे तमाम अनुभवी प्रधानाचार्यों से मिलने व जानकारी करने का अवसर मिला। उस समय खैर इण्टर कॉलेज के मकबूल अहमद, कलवारी इण्टर कालेज के श्री उमाशंकर जी पाण्डेय, नारंग इण्टर कालेज के श्री प्रेमनारायण शुक्ल, मुण्डेरवा इण्टर कालेज के श्री धर्मेन्द्र नाथ त्रिपाठी,किसान इ.का. के श्री दयाराम मिश्र व मरहा इ.का. के श्री सुखनन्दन प्रसाद चौहान, दुबौलिया इण्टर कालेज के श्री स्वामीनाथ त्रिपाठी आदि से सदैव मुझे प्रोत्साहन मिलता रहा। इन प्रधानाचार्यों के अलावा श्री शान्ति नारायण जी, श्री सत्य नारायण पाठक, श्री भूधर द्विवेदी, श्री रामायण सिंह, श्री रमाशंकर पाण्डेय आदि जिला विद्यालय निरीक्षकों का सर्वाधिक आशीष मुझे मिला और मैंने परिश्रम के साथ विद्यालय को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।


 विद्यालय की प्रबन्ध समिति के लोगों को स्कूल संचालन के बारे में कोई बहुत जानकारी नहीं थी लेकिन विद्यालय के प्रबन्धक हमारे किसी कार्य में कभी में हस्तक्षेप नहीं करते थे। 1968 में विद्यालय को जू.हा. स्कूल तक की स्थायी गन्यता मिली और 1970-71 में विद्यालय हाईस्कूल तक मान्यता प्राप्त हो गया। हाईस्कूल की मान्यता मिलने से विद्यालय का विकास बड़ी तेजी से होने लगा और हाईस्कूल का प्रथम बैच निकलते ही इण्टरमीडिएट की मान्यता 1973 में जुलाई से मिल  गयी।

 1968 में जब विद्यालय जू.हा. स्कूल हो गया तो विद्यालय के प्रबन्धक श्री मोहर नाथ पाण्डेय ने पं. शिवकुमार त्रिपाठी के माध्यम से मेरे छोटे भाई वशिष्ठ  प्रसाद जो उस समय अठारह वर्ष का था, के विवाह का प्रस्ताव अपनी लड़की से रखा। पहले तो मैंने विवाह को टालने का प्रयास किया लेकिन बाद में यह रिश्ता तय करना पड़ा। यहीं से मेरे पीछे स्वार्थ का कुत्ता चक्कर लगाने लगा। शिवमोहर नाथ, अपनी लड़की और दामाद के लिए परोक्ष रूप से मेरे ऊपर अंकुश रखने लगे। मेरी किसी भी आमदनी पर उनकी निगाहें तीव्र हो गयी। यहाँ तक यदि घर की कुर्सी क्रय किया तो ते पता लगाते थे कि एक कुर्सी ली गयी की दो। मैं भी समझ गया कि अब जीवन के प्रत्येक पहलुओं पर यदि वशिष्ठ प्रसाद को नहीं जोड़ता हूँ तो अपने कार्य में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता हूँ। 


 मैं अपने विकास के साथ-साथ अपने भाई वशिष्ठ प्रसाद के विकास में लग गया। वशिष्ठ को एम. ए. तक शिक्षा देने का अवसर दिया। मेरा भाई वशिष्ठ क्रमशः पढ़ने में लगा रहा उसने हिन्दी से एम.ए. किया और तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक श्री भूधर द्विवेदी के सहयोग से  किसान डिग्री कॉलेज बस्ती से एल.टी. किया। मेरा जनता विद्यालय इण्टरमीडिएट तक हो चुका था। प्रबन्धक के भतीजे श्री बलराम जी प्रधान लिपिक तथा पुत्र रामसागर पाण्डेय विद्यालय में सहायक लिपिक के पद पर नियुक्त हो चुके थे जो नियम विरुद्ध था किन्तु प्रबन्धक जी भी छ बीस के सौ के पक्षधर थे, उनका कहना था कि अब आप रिश्तेदार हैं विद्यालय से भरपूर लाभ लेने का प्रयत्न कर वशिष्ठ प्रसाद को भी सहायक अध्यापक बनाया जाय।पहले नगर बाजार के स्कूल में नियुक्ति बाद में पिपरा गौतम ट्रांसफर कराया।


मेरा अनुज जनता इण्टर कालेज नगर बाजार बस्ती में मेरे प्रयास से में अध्यापक नियुक्त हुआ था। बाद में यहाँ से इन्हें गौतम इण्टर कालेज पिपरा गौतम में स्थानान्तरण कराया गया। संयोग से मैं जिस कालेज में प्रधानाचार्य था उसके प्रबन्धक माननीय श्री शिव मोहरनाथ पाण्डेय की पुत्री से वशिष्ठ प्रसाद का विवाह हो गया था। यहीं से मेरे उत्कर्ष और अपकर्ष दोनों ने जीवन में परोक्ष रूप से पदार्पण कर लिया था । 


 मैंने भाई के व्यामोह में एक मकान की जमीन साझी में स्थानीय नगर बाजार में खरीदा। उसमें भवन भी बनवाया था। बाद में भाई - भाई में बंटवारा की स्थिति बन गई । मुझ पर अनुचित दबाव डालने के लिए मेरे कालेज के मैंनेजर महोदय के अपने भतीजे रामकृपाल ने हर तरह का दबाव बनाना शुरू कर दिया था। एक दिन ऐसा आया कि मुझे निलंबित कर सेवा मुक्त करने की कार्यवाही कर दी गई। मेरे मित्रगण मुझे समझौता करने पर बाध्य कर दिये। मैं मजबूर होकर अपनी 25 वर्ष की कमाई गवाँ बैठा। क्योंकि मैं इण्टर स्तर का प्रधानाचार्य था। नौकरी चली जाने पर बेहाल हो गया था । प्रबन्धक जी नेक विचार के समझौता वादी व्यक्ति थे उन्होंने कहा मैं परिवार से दुःखी हूँ। आप की सहायता उनसे ऊपर होकर नहीं कर सकता हूँ। 


    प्रबन्ध समिति का रिलेशन और मेरे सगे भाई होने के कारण वशिष्ठ प्रसाद का इस कॉलेज में सहायक अध्यापक होना सम्भव नहीं था। लेकिन प्रबन्धक जी के आदेशों के पालन में वशिष्ठ प्रसाद की नियुक्ति स.अ. के पद पर इसी विद्यालय में सम्पन्न हो गयी। प्रबन्धक जी के कुछ शत्रुओं ने आपत्ति किया। इस पर वशिष्ठ प्रसाद को गौतम इ.का. पिपरा गौतम में ट्रान्सफर द्वारा कर दिया गया। वशिष्ठ प्रसाद और प्रबन्धक जी के भतीजे रामकृपाल उनसे शिकायत करने लगे कि प्रिन्सिपल आपकी बिना जानकारी में बहुत सा धन राशि कमा ले रहे हैं। 


उन लोगों की शिकायत से मुखातिब होकर प्रबन्धक जी मुझ पर कड़ी दृष्टि रखने लगे। इधर वशिष्ठ प्रसाद अपनी स्त्री के मदद से घरेलू समस्या में विस्तार करने लगे। विद्यालय निरन्तर विकासोन्मुख था। लगभग 40 का स्टाफ व एक हजार से ऊपर छात्रों का दाखिला हो चुका था। लोग क्या वशिष्ठ प्रसाद प्रबन्धक जी से कहने लगे कि हमारे पिपरा गौतम में प्रबन्धक जी को प्रिन्सिपल 5 हजार की दर से पैसा देते हैं। आपके यहाँ तो हमारे यहाँ से अधिक लड़के हैं। बाबू अपने हैं लगा दें कि वे प्रतिमास 10 रु. प्रतिछात्र की दर से वसूली कर लिया करें। 


प्रबन्धक जी ने यह प्रस्ताव मेरे पास रखा। मैंने कहा स्कूल में जो रुपया वसूल हो वह यहाँ की बिल्डिंग कार्य में लगाया जाय तब तो ठीक है नहीं तो इन्क्वायरी होते पर मुझे फ़सना पड़ेगा। मैनेजर के भतीजे रामकृपाल ने कहा आप बैठे रहे हम सब लोग यह कार्य करेंगे। 


     अगस्त 1986 का महीना था प्राइवेट तमाम छात्र अपना परीक्षा फार्म भर रहे बाबुओं की मदद से राम कृपाल ने 100/- वसूली के लिए लगाया। मेरे पास प्रस्ताव आया मैंने कहा कि विद्यालय में कोई वसूली नहीं होगी। इस पर रामकृपाल ने कहा विद्यालय प्रिंसपल का नाहीं प्रबन्धक का होता है। हम वसूल करेंगे। इन समस्याओं को लेकर 6 अगस्त को मेरे पास 10 बजे आये और चिल्ला-चिल्लाकर कहने वसूली को लेकर मुझसे वे पूर्णतया वाद-विवाद पर उतर आये। 


मैंने भी विरोध किया। समस्या बडी विकट हो गयी। प्रबन्धक जी ने अपने भतीजे रामकृपाल के कहने पर मुझको  निलम्बित और बाद में सेवा मुक्ति भी प्रदान कर दिये। मैंने जरा सा भी आह नहीं भरी क्योंकि दफ्तर के लोगों की पूर्ण मदद मुझे मिलती रही। एक तरफ विद्यालय में प्रबन्धक जी द्वारा मुझे चक्रव्यूह में डाल दिया गया। दूसरी तरफ मेरे घरेलु मामले में मेरा भाई वशिष्ठ अपनी पत्नी के साथ निश्चिन्त होकर मुझसे भिड़ गया। इस समय जब मैं पूर्ण खुशहाली में था तो वशिष्ठ प्रसाद अपने साले राम कृपाल व श्वसुर श्री शिवमोहर नाथ की राय से मेरी नौकरी अपने झोले में लेकर चलने लगा। घर पर बटवारे का मामला और स्कूल में नौकरी का मामला दोनों संगीन हो गया। 


 अपने हाथ से बनाए विद्यालय से साजिशन निकाले जाने के बाद बहुत कुछ आगे - पीछे देखकर मुझे 1988 में बंटवारे का समझौता करना पड़ा था। मेरे दफ्तर पर बेरहमी के साथ प्रबन्धक जी के परिवार बालो ने ताला लगा दिया और मैं झोला लिए कभी नगर बाजार, कभी बस्ती इन्स्पेक्टर आफिस का चक्कर लगाने लगा। जो लोग मिलते थे यही कहते थे कि भूमिहार का चाटा किसुली नहीं जमती है। आप कहाँ चक्कर में पड़ गये। सरेन्डर कर लो नहीं तो नौकरी ताल की जलकुम्भी की तरह जाने में देर नहीं लगेगी। जो मैनेजर से झगड़ा करता है वह कहीं का नहीं रहता धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का। एक दिन रामनवल सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा-

पौला पहिन कै खेत निरावै 

बोझ लिहे पर गावै। 

सारे के साथे बहिन पठावै 

भकुहा उहै कहावै ।।


     मैंने कहा रामनवल बाबू इसका क्या मतलब? उन्होंने मुस्कराते हुए फिर कहा कि प्रिन्सिपल साहब जब आप मैनेजर के यहाँ शादी किये थे तो यह नही जाने थे कि तलवार में दो धार है। पलट जाने पर मेरी रक्षा भी कर सकती है और उलट जाने घर जान भी ले सकती है। आज आपकी वही स्थिति है। मैंने कहा कि समय का फेरा है। कौन जानता था कि भाई ही कालरात्र हो जायेगा। उन्होंने कहा क्यों आप नहीं जानते बालि सुग्रीव और रावण-विभीषण एक दूसरे के शत्रु होकर बरबाद हो गये। भाई के समान न तो कोई हित होता है और न भाई के समान कोई शत्रु। आप पढ़े लिखे हैं आपस में मामला किसी तरह से निपटा लीजिए। शिवमोहर आपकी कमाई का सारा बटवारा चाहते हैं। वे चाहते हैं कि अगर आपको नौकरी करनी हो तो सम्पूर्ण कमाई का आधा वशिष्ठ को देकर अपना गला छुड़ायें। मैंने राम नवल सिंह के विचारों पर कई मित्रों से विचार विमर्श किया। हमारे एक शुभ चिंतक मित्र राजाराम हमारी परिस्थितियां देख कर बोले 


 प्रिंसिपल साहब! सुनिये एक गीदड़ था जंगल में उसने एक हृष्ट-पुष्ट ऊँट को देखा उसने सोचा कि अगर यह ऊँट मारा जाता तो इसकी मांस और हड्डियों को खाकर मेरा पेट भर जाता। उसने ऊँट से कहा हे भाई नदी के उस पार मकई का खेत लगा है यदि आप मुझे लेकर चलें तो चलकर दिखा दूँ। भुट्टे खूब खाने को मिलेंगे। ऊँट के मुँह में पानी भर आया।गीदड़ को पीठ पर बैठाकर नदी पार करके खेत में गया। गीदड़ ने कहा कि ऊँट भाई मैं हुँआ रहा हूँ क्योंकि मेरा टाइम हो गया है। 


उसने जैसे ही हुआँ हुआँ किया खेत वाले दौड़ पड़े और ऊँट को मारे-पीटे, गीदड़ भाग कर नदी के किनारे पहुँचा बोला ऊँट भाई मैं मरने से बच गया। जल्दी मुझे नदी के पार कर दो। ऊँट ने गीदड़ को बैठाकर नदी में पानी में डूबने लगा और बोला तुम जल्दी निकलो नहीं तो डूब जाओगे। गीदड़ किसी तरह जैसे किनारे आया तैसे कुत्ते उसे नोचने टूट पड़े। वह पुनः चिल्लाने लगा। ऊँट ने उसे फिर बुलाया और पीठ पर बैठाकर कहा-

ऊँट चढ़े पर कुकुर काटै 

देखला तू होशियारी। 

जैसे तू हमरे संग कइला 

सो भई दशा तुम्हारी ।।


      मैंने कहा यह कैसे, उन्होंने कहा जिस स्वार्थ के लिए आप ने मैनेजर के यहाँ रिश्ता किया उसका नतीजा यह निकला कि झोला लिए आप दर-दर घूम रहे हैं। दे लेकर सुलह करो। ऊँट देखकर अबलालच में न पड़े।


       मैंने देखा कि स्वार्थ की आँधी जब मंडराने लगे तो पड़ गवाना चाहिए। यह समय उड़ने का नहीं पड़ गवाने का है। मैंने श्री चिन्तामणि को माध्यम बनाकर के अपनी सारी कमाई का दो भाग करके अपने को छोटा बनाकर सुलह कर लिया था और उसके बाद किसी तरह से सीता गाता नौकरी के बीस वर्ष काटा। आज पेंशन पाकर खुश हैं। सम्पूर्ण जीवन से यह शिक्षा मिली कि स्वार्थियों के बिछे जाल से  सदैव बचना चाहिए। यदि मैनेजर से संधि न किया होता तो घर की सम्पत्ति अलग नष्ट होती और विद्यालय की नौकरी अलग जाती। भविष्य के प्रति आगाह रहना ही मानव कर्तव्य है।

पश्चाताप मार्ग दिखलावे 

भय से हो चौकसी निरन्तर।


मैं जिस कालेज में प्रधानाचार्य था उस पर प्रबन्धक जी की स्वार्थी पकड़ दिन प्रति दिन बढ़ने लगी। मेरा जीवन एक संघर्ष के चक्रव्यूह में फँस गया। प्रबन्धक के पुत्र रामकृपाल पाण्डेय जो शिवमोहर नाथ पाण्डेय जूनियर हाईस्कूल के प्रधान अध्यापक हो गये, उनकी पकड़ मेरे नौकरी पर बहुत कूटनीत पूर्ण बन गयी। उन्होंने 1986 में मुझे टर्मिनेट करके सूचना माध्यमिक शिक्षा आयोग इलाहाबाद को दे दिया। यह बात केवल प्रबन्धक श्री रामविलास पाण्डेय और श्री रामकृपाल पाण्डेय ही जानते थे। समिति का कोई सदस्य इस बात की जानकारी नहीं रखता था। सन् 1992 में पूर्व प्रबन्धक श्री शिवमोहर नाथ के हस्तक्षेप से मैं जनता इण्टर कालेज के कार्यालय में बैठने लगा। 


 मेरे पीछे छूटा जयन्त की तरह टर्मिनेशन का वारण्ट इलाहाबाद तक परोक्ष रूप से अपना कार्य कर रहा था। प्रबन्ध तन्त्र का यह गोपनीय मामला 2000 ई. तक चलता रहा। मैं पूर्णतया निश्चिन्त हो अपना कार्य कर रहा था।



 सन् 2000 ई. का अक्टूबर माह था कई लोगों ने प्रस्ताव रखा कि आप एक योग्य प्रधानाचार्य हैं। चार विषयों में एम.ए., पी-एच.डी. हैं शिक्षक के नेशनल एवार्ड के लिए प्रार्थना पत्र दें। मैंने लोगों की बात मानकर प्रार्थना पत्र दे दिया जब राम कृपाल जी को मालूम हुआ तो उन्होंने एक पड़ोस के प्रधानाचार्य के माध्यम से आपत्ति भेज दिया। मेरा प्रकरण विवादास्पद था इसलिए मेरा फार्म लखनऊ से रिजेक्ट हो गया। 

सन 2000 ई. का मेरा आवेदन पत्र जब रिजेक्ट हो गया तो मैंने मा. शिक्षा आयोग इलाहाबाद से सम्पर्क किया वहाँ अपने केश की पैरवी किया।आयोग ने मुझे आपत्तियों से मुक्त कर दिया। और मैंने पुनः शिक्षक नेशनल एवॉर्ड आवेदन पत्र पर विभाग ने पूर्णतया ध्यान दिया और मुझे 05.09.2002 के पुरस्कार के लिए आवेदन पत्र दिया। मैं एक योग्य प्रधानाचार्य  के रूप में महामहिम राष्ट्रपति भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया।


 सेवानिवृत्ति के पश्चात् मुझे नेशनल एवार्ड मिला। जिसको नेशनल एवार्डम 30 जून सन 2002 ई. को मैं साठ वर्ष की अवस्था में सेवानिवृत्त है उसकी सेवाओं का कार्य काल दो वर्ष राज्य सरकार बढ़ा देती है। मैं रिटायर होने के बाद अपनी सेवावृद्धि का प्रयास करने लगा। जि वि नि बस्ती और मैनेजर महोदय मेरे प्रार्थना पत्र पर आपत्ति लगाकर भेज चुके थे। मैंने सचिव स्तर पर प्रयास किया कि जो व्यक्ति सेवा वृद्धि के लिए अर्ह हो उसकी सेवा वृद्धि की जाय। ऐसा बहुत से लोगों के प्रकरण में हो चुका था। मेरा प्रकरण बिल्कुल साफ़ था। इसलिए सचिव स्तर से मेरा आवेदन पत्र स्वीकृत होकर राष्ट्र स्तर तक मंजूर हुआ। मैं अपने कार्य में पूर्णतया सफल हुआ। 20 मार्च 2003 को जे डी महोदय बस्ती मण्डल बस्ती के सहयोग से मुझे अपने पूर्व कालेज में पूर्व पद पर प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करने की स्वीकृत मिली और मुझे जुलाई 2002 से प्रधानाचार्य मानते हुए मेरी सेवाओ को सतत तारतम्यता प्रदान की गयी।


 जिस समय दो वर्ष की सेवावृद्धि पर मैं जनता इण्टर कालेज नगर बाजार में सेवारत हुआ उसी समय राज्य सरकार ने अपने माध्यमिक शिक्षकों का कार्यकाल 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया। मैंने अपनी सेवावृद्धि के लिए पुनः सचिव स्तर पर आवेदन पत्र दिया। मेरा प्रार्थना पत्र 10 लोगों के साथ था। शासन स्तर से मुझे दो वर्ष की सेवावृद्धि पुनः प्राप्त हो गयी। मैं प्रसन्नता से भर गया अब मैं 2004 के स्थान पर 2006 में रिटायर हूँगा, सुनकर विद्यालय के छात्र शिक्षक व अभिभावक प्रसन्न हो गये। 


मैं अपनी 64 वर्षीय सेवाओं का लाभ ले रहा था। पूरा विद्यालय परिवार मुझसे खुश था केवल प्रबन्धक जी और उनके पुत्र रामकृपाल मन ही मन जल रहे थे और मेरे रिटायर होने के दिन की प्रतीक्षा अहर्निश कर रहे थे। वे इस ताक में थे कि ये 2002 के स्थान पर 2006 तक का लाभ हम लोगों के बिना चाहे कैसे ले रहे हैं। यह कुयोग था कि प्रबन्धक जी के दो भतीजे इसी विद्यालय में प्रधान लिपिक और सहायक लिपिक थे। विद्यालय का सारा रिकार्ड उनकी मुट्ठी में था। प्रबन्धक जी यह जानते थे कि सारा रिकार्ड हमारे भतीजों के पास है। अगर प्रधानाचार्य के रिटायर के समय नो-आब्जेक्शन की सर्टीफिकेट नहीं दी जायेगी इनकी पेंशन नहीं लगेगी। उस समय ये मेरे पैरों पर शरणागत होंगे। संयोग से न तो मैं उनका शरणागत हुआ और न तो मेरे कागजों पर उन्होंने हस्ताक्षर किया। पेंशन 25 हजार रुपया, जी पी एफ की अमानत पर जे.डी. स्तर से स्वीकृत गयी।


      मेरी पेंशन जे.डी. स्तर से स्वीकृत हो जाने पर प्रबन्धक जी अवाक रह गये। इस स्तर पर उतर आये कि स्पेशल आडिट कराके प्रधानाचार्य को फंसाया जाय। सब कुछ हुआ लेकिन मेरे कार्यों से सन्तुष्ट उनके घर के बाबुओं ने मेरा लेकर आडिट कराया और मैं पूर्णतया निर्दोष निकला। आज उनके पक्ष के बाबू रिटायर होकर कार्य करते हुए मेरे व्यवहार से खुश हैं। जबकि प्रबंधक जी और उनके पुत्र रामकृपाल मेरी खुशहाली को देखकर ग्लानि के आग में आकण्ठ स्नान कर रहे हैं। आज शिक्षा में आज के प्रदूषण का माहौल बड़ा घिनौना और कुकृत्यपूर्ण हो गया है। आज प्रबन्धक भी अपने पुत्रों और पौत्रों को उत्पादनों की कोई रोक नहीं। आज विद्यालय की प्रबन्ध समितियाँ वैसी रमेणीका कर्मचारी बनाकर लिपिक बनाने की सोच रखता है।


         केदार आश्रम अयोध्या 

 इसके पूर्व जब कि 30.06.02 को सेवानिवृत्त हुआ था तो मुझे जी.पी.एफ. की धनराशि मिल चुकी सोचा कि अब चौथापन है किसी धार्मिक स्थान पर रहकर समय व्यतीत जाय। मैंने सबसे उत्तम श्री अवध को निवास माना। वहाँ मकान बनाने के सादेश्य से 2 बिस्वा जमीन 5 लाख में परिक्रमा मार्ग पर खरीद लिया। सन् 2002 में 5 सितंबर  को माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित होने के पश्चात् मैं अपनी सेवा वृद्धि में लग गया था। संयोग से मेरी सेवा का विस्तार क्रमशः 2002 से 2004 एक और पुनः 2004 से 2006 तक हो गया । मैंने अयोध्या की क्रय की गयी भूमि दो बिस्से पर गृह निर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया था। 


दिनांक 5 मार्च से 15 मार्च 2010 ग्यारह दिनों तक अपने कुछ खास लोगों ने मुझे कुछ गलत मुकदमों में फंसाकर एक षडयंत्र के तहत भारतीय कारागार के यथार्थ से रूबरू करा दिया। कारागार किसी भी रूप में सुधार गृह नहीं कहा जा सकता है। अपितु यह शोषण, दण्ड और षडयंत्र का एक प्रयोगशाला जैसा हो गया है, जहां पैसे और रसूक वालों को सरकारी संरक्षण मिलता है। सामान्य जन को तरह तरह की यंत्रणाएं दी जाती है। इसका विवरण मेरे इतिवृत आत्मकथा “वंशावली में कनखजूरों का आतंक” के पृष्ठ संख्या 111 से 119 तक वर्णित किया गया है,  जिसे इस आत्मकथा वृत्तांत में  समलित करना उचित नहीं समझता हूं।



 मैंने अपने कुलीन कुल का वर्णन किया  जिस कुल में लछिमन दत्त ने पैदा होकर विद्वान सीताराम बाबा का नाम रोशन किया, इसी कूल में साहबराम, आज्ञाराम उत्पन्न होकर दरोगा के पदों को गौरवान्वित करके कुल की मर्यादा को स्थापित किया। जिस कुल को महराज राम, गजराज राम, धर्मराज राम ने समृद्धि की चरमसीमा पर पहुँचाया तथा जिस कुल को केदारनाथ ने अपने पाँच माइयों के साथ कुल 40 परिवार को एक साथ रखकर सुख-समृद्धि प्रदान किया तथा जिस कुल में उत्पन्न होकर मैंने 16 वर्ष की अवस्था में पितहीन होते हुए भी अपने छः वर्षीय सहोदर वशिष्ठ प्रसाद को एम.ए.एल.टी. कराकर टीचर बनाया। 


 मैं इस कुल का छोटा सदस्य हूँ जिसको बाल्यकाल में विपत्तियों का सामना करना पड़ा। 16 वर्ष की अवस्था में मेरे पिता का निधन हो गया। उस समय मैं कक्षा 11 का छात्र था। कोई भी संरक्षक मेरी देखरेख करने वाला नहीं था। मेरी माँ जो भी विपत्तियों का शिकार थीं ने सदैव मुझे उत्साहित किया। मैं माँ की प्रेरणा से शिक्षा प्राप्ति में लगा रहा। जुलाई 1965 को मैं बी.ए., बी.एड्. करने के पश्चात् जनता मा. विद्यालय में प्रधानाध्यापक और जुलाई 1973 में उसी विद्यालय में इण्टर स्तर तक प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त हुआ।


     साहित्यिक आयोजन नगर बाजार


मैंनें अपने अध्यवसाय से चार विषय हिन्दी, संस्कृत, मध्यकालीन इतिहास, प्राचीन इतिहास, भारतीय संस्कृति एवं पुरातत्त्व में एम.ए. किया। साहित्यरत्न किया और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से साहित्याचार्य किया। शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए बी.एड्. किया तथा कठोर श्रम करके हिन्दी विषय में पी-एच.डी. किया। साथ ही साथ 42 वर्षों तक उक्त विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य करते हुए लगभग बीस पुस्तकों का रचनाकार हुआ। सम्पादकों, कवियों, साहित्यकारों में अच्छा नाम कमाया। आकाशवाणी और दूरदर्शन से दर्जनों बार मेरे साहित्य का प्रसारण हुआ। 



मैने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश के 100 से अधिक रचनाकारों से परिचय प्राप्त किया। लगभग 50 बालसाहित्यकार जो देश के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार थे को मैंने बाल साहित्य संस्कृति विकास मंच से सम्मानित किया। साथ ही ‘‘बालसेतु’’ नामक त्रयमासिक पत्रिका प्रकाशन भी किया है। सबका स्नेह मुझे मिला। पं. श्री धर शास्त्री द्वारा आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन में मैं बीसो बार सम्मिलित होकर सैकड़ों साहित्यकारों का परिचय प्राप्त किया। तमाम मंचों पर मैं सम्मानित होकर काव्य पाठ किया । 


15 अगस्त 1984 में उन्होंने बस्ती जनपद के छंदकारों का जीवन परिचय नामक शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है। इसमें विभिन्न चरणों में लगभग 60 कवियों का सम्यक और लगभग 40 कवियों का संक्षिप्त परिचयात्मक स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।उस समय 1984 तक उनकी लगभग 4 दर्जन पुस्तकें लिखी गई हैं। 


प्रकाशित पुस्तकें : 

गूँज नैसर्गिकी, विजयश्री, बलिदान, मधुरिमा, बासन्ती, वृत्तान्त, संकुल, सौरभ, जयभरत, विवेकानन्द, बस्ती जनपद के छन्दकारों का योगदान भाग-1, भाग-2

अप्रकाशित पुस्तकें : 

चन्द्रगुप्त (महाकाव्य), क्षमा, प्रतिशोध, नगर से नागपुर, विषपान, छन्द बावनी, बस्ती जनपद के छन्दकारों का योगदान भाग-3 आदि।

बाल साहित्य - 

नेहा- स्नेहा, जलेबी, बाल प्रयाण, बाल त्रिशूल भाग 1,2 व 3 , बाल बताशा, पुलुू-लुलू झॅइयक झम,गाबड़गिल, चरणपादुका, बाल कथाएं, साहित्य - परिक्रमा भाग 1 , 2 इत्यादि। उनकी परवर्ती कृतियां थीं। वे आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से भी जुड़े रहकर दर्जनों प्रसारण कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर का लाभ उठाए थे। 

कुछ चयनित छन्द - 

ये सम्पूर्ण कृतियां  सुधी समीक्षको की समीक्षा के लिए प्रस्तुत है। उदाहरण के लिए कुछ छन्द प्रस्तुत हैं - 

सृजन  का अनुराग लेकर

कौन मुखरित प्राण करता ।

और किससे गंध लेकर 

चल रहा सुरभित मलय है।

कौन करता वेणु स्वर

है गुंजरित जिसमें दिशाएँ

और किसको तृप्ति देती

चातकी की वीन लय है।

कौन सायं रजत कर से

विश्व को विश्राम देता ।

और किसके स्वर्ण किरणों से

दमक उठता निलय है।

कौन नीले व्योम पट पर 

तारिका दीपक सजाता ।

और किसके वक्र चितवन से

हुआ करता प्रलय है।

पुन. एक सवैया छन्द -

रीझ औ खीझ के बीच सदा 

मन का मनुहार छिपा रहता है।

सूझ औ बूझ के बीच सदा 

उर का मृदु प्यार छिपा रहता है। 

दारुण शीत में ज्योति लिये 

सुख का उपहार छिपा रहता है। 

सांझ के गोद में मोट भरा 

जग की भिनुसार छिपा रहता है।। 


विद्वानों द्वारा सम्मानित व प्रशंसित रहा


मेरा सम्पर्क समाज के अच्छे लोगों से सदैव रहा है। मैंने सदैव राष्ट्रहित का कार्य किया है। 42 वर्ष की निर्विघ्न सेवा इसका प्रमाण है । मेरी प्रकाशित 25 पुस्तकें विद्वानों द्वारा सदैव सम्मानित व प्रशंसित की गयीं। 1975 ई में नागपुर महाराष्ट्र में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में समलित होकर बस्ती जनपद का प्रतिनिधित्व करने का सुअवसर मिला था। उसके उपरान्त इन्होंने कामरूप, जौहाटी, शिलांग, चेरापूँजी, जयगाँव, गंगटोक, कोलकाता, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, जमशेदपुर, गया, बैजनाथ धाम, कोणार्क के सूर्य मन्दिर, नन्दनकानन, नाथद्वारा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, उदयपुर, जनकपुर, किन्नौर, माण्डू, धार, विदिशा, उज्जैन, पोरबन्दर, अजमेर, आगरा, दिल्ली, मथुरा, नैनीताल, मंसूरी, हरिद्वार, ऋषिकेश, काठमाण्डु, पोखरा, तानसेन, दाडंग, नेल्लोर, तिरुपति, मदुरै, रामेश्वरम्, कन्याकुमारी, धनुषकोटि, औरंगाबाद, ऐलोरा, देवगिरी, त्र्यम्बकेश्वर, खुल्दाबाद, ओकारेश्वर, भोपाल, झाँसी, मथुरा, उज्जैन, चित्रकूट, रेणुकूट, हरिद्वार, देहरादून, यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, त्रियुगी नारायण, बद्रीनाथ, देवप्रयाग, जोशीमठ, मैहर, पन्ना, खजुराहो, जंबू, पठानकोट, चण्डीगढ़, अम्बाला, वैष्णोदेवी, शिमला, चम्बा, डलहौजी, कुल्लू, मनाली. टनकपुर, कांगड़ा, मैसूर, मंगलौर, तिरुअनन्तपुरम्, गोवा, मैसूर, बंगलौर, कालीकट, उडपी, उडमंगलम्, वृन्दावन, गार्डेन आदि नगरों की यात्राएँ करके यात्रा वृत्तान्त लिखा है।

डॉ. सरस पचीसों बार आकाशवाणी तथा कई बार दूरदर्शन पर भी अपना कार्यक्रम देते रहे हैं। बाल साहित्य कला विकास संस्थान, नगरबाजार-बस्ती (उ०प्र०) की स्थापना करके डॉ० सरस ने संस्थान के अखिल भारतीय बाल साहित्यकार सम्मेलन में 50 से अधिक राष्ट्रीयस्तर के बाल साहित्यकारों को सम्मानित किया है।

  

 मैं एक मिलनसार साहित्यकार के रूप में चर्चित हूँ। डॉ. राष्ट्रबन्धु कानपुर, डॉ. अनुजप्रताप सिंह अमेठी, डॉ. शोभनाथ लाल बलिया, डॉ. नयनकुमार राठी इन्दौर, डॉ. कृष्णकुमार अष्ठाना इन्दौर, पं० राजमणि शुक्ल, बस्ती, डॉ. श्री प्रसाद वाराणसी, डा. वेदप्रकाश द्विवेदी, अम्बेडकरनगर, डॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी कानपुर, डा. भैरू लाल गर्ग भीलवाड़ा, डॉ. सतीश श्रीवास्तव बस्ती, डॉ. जयप्रकाश भारती दिल्ली, आदि सैकड़ों साहित्यकारों का आशीष मुझे मिलता रहा है। अपने ही कुल के श्री जंगबहादुर उपाध्याय आज से 25 वर्ष पूर्व ने यह कहा था कि तुम हमारे कुल के वेदव्यास हो। यह पुस्तक हमारे कुल के 250 वर्षों का इतिहास संजोकर लिखी गयी है। जो खानदान के इतिहास से जुड़ी हुई है।


उपाध्याय कुल इस क्षेत्र का मर्यादित कुल है जिसमें ग्राम के कई वंश वृक्ष जुड़े हैं। रामऔतार चौहान से रामधनी चौहान, बंसू चौहान से रामफेर चौहान ग्राम के प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य हैं। रामनाथ चौहान से मनोहर, भवानीभीख चौहान अपने कुल की मर्यादा बढ़ा रहे हैं। जंगमोहन यादव से राम किशोर और बुधिराम यादव इस कुल से सदा जुड़े रहे। इसी प्रकार बलराज कहाँर से राम अधार, कौलेश्वर और रजपाल कहाँर से रमेश्वर से मुन्नू कहाँर जुड़े रहे। ग्राम के इन घरानों से उपाध्याय परिवार का मधुर संबंध सैकड़ों वर्ष से बना हुआ है।


पं. सीताराम उपाध्याय हमारे कुल के संस्थापक थे जिनके नाम पर यह सीतारामपुर ग्राम स्थापित हुआ। सीतारामपुर का भूभाग चार सौ बीघा था, जो पुराने समय में जंगल था। खड़ौवा खुर्द ग्राम के दक्षिण मनवर सरिता तक फैले इस भूभाग में हमारे पूर्वजों ने इस ग्राम की स्थापना किया था। इसका प्राकृतिकवैभव अति सुन्दर है। इसके सीवान का नाम विचित्र है। दक्षिण में विगहिया का सीवान है जहाँ जंगल में विगवा भेड़िये अधिक रहते थे। पश्चिमोत्तर में सँपहवा कासीवान है जहाँ सर्पों का निवास था। दक्षिण पूर्व में हड़हवा का सीवान था जहा हड्डे-बरै, झाड़ियों में रहते थे। पूर्वजों ने प्राचीन जंगल को काटकर खेती योग्य जमीन बनाया और उसका नाम भी उसी के अनुसार रखा।


सेवामुक्त होने के बाद सरस जी अयोध्या के नये घाट स्थित परिक्रमा मार्ग पर केदार आश्रम बनवाकर रहने लगे। उनका जीवन एक बानप्रस्थी जैसा हो गया था और वह निरन्तर भगवत् नाम व चर्चा से जुड़े रहे। 70 वर्षीया डा. सरस की मृत्यु 30 मार्च 2012 शुक्रवार की रात्रि चैत शुक्ल अष्टमी संबत 2069 विक्रमी को लखनऊ के बलरामपुर जिला चिकित्सालय में हुई थी। अगले दिन चैत राम नवमी के दिन अवध धाम में उनका दैहिक काया पंच तत्वों में विलीन हो गया और एक संघर्ष शील मानव की यश कीर्ति को लोगों ने हमेशा हमेशा के लिए भुला दिया। उनकी मृत्यु से शिक्षा तथा साहित्य जगत में बहुत बड़ी अपूर्णनीय क्षति हुई जो शायद ही आगे भरा जा सके।


-(मूल सन्दर्भ: डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत : इतिवृत्त कथा: “वंशावली में कनखजूरों का आतंक”, पृष्ठ 79 से 93, 99 से 107, 111, 120, 121 एवं 122 तक)