Saturday, May 16, 2026

भारतेंदु हरिश्चंद्र की सरयू पार की यात्रा प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यात्रा-वृत्तान्त 'सरयू पार की यात्रा' (फरवरी 1879) हिन्दी साहित्य का एक प्रमुख और आरंभिक यात्रा-वृत्तान्त है। यह यात्रा उन्होंने रामनवमी के अवसर पर बनारस से अयोध्या के लिए की थी, जिसके दौरान वे बस्ती भी पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान भारतेन्दु जी को भीषण गर्मी, थका देने वाली यात्रा और भारी अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। 

      उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी  चुनाव प्रचार के सिलसिले में बस्ती में थे। बस्ती में जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो विपक्षी दलों पर निशाना साधना तो बनता था। योगी ने गिनाना शुरू किया- पहले यह नगर कूड़े का ढेर हुआ करता था। शोहदों का आतंक था। व्यापारी रंगदारी देने के लिए मजबूर रहता था। नगरों में कहीं जलजमाव की समस्या, कहीं पेयजल की समस्या रहती थी। पहले युवाओं के हाथों में तमंचे पकड़ाए जाते थे... आदि-आदि। यह सब कहते योगी को अचानक हिंदी के एक साहित्यकार का जुमला भी याद आ गया, जो उसने दशकों पहले बस्ती को लेकर कह दिया था। योगी जिस साहित्यकार के जिस जुमले की बात कर रहे थे, वो स्वतंत्र भारत से भी काफी पहले इस दुनिया से रुखसत कर गए थे। उन्हें सिर्फ 35 साल की उम्र मिली थी। यात्रा के शौकीन थे और सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि जिस हिंदी की राजनीति भाजपा करती है, उस भाषा के साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। उस साहित्यकार का नाम है- भारतेंदु हरिश्चंद। 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में जन्में भारतेंदु हरिश्चंद हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। सिर्फ 35 वर्ष की आयु में उन्होंने आधुनिक हिंदी को साहित्य में स्थापित करने के लिए बड़े-बड़े काम किए। हिंदी साहित्य का इतिहास में काल विभाजन के दौरान नामकरण में भारतेंदु के नाम से एक युग भी तय किया गया है। हिन्दी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उन्होंने काफी काम किया। 6 जनवरी 1885 को वाराणसी में उनका निधन हो गया था। 

रचनाएं:- 

उन्होंने ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाल विबोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक,निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।

काव्य विशेषता :-

भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

भाषा:- 

भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।

रस अलंकार:- 

भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।

प्रमुख कृतियाँ:-

मौलिकनाटक –  वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(१८७३ई., प्रहसन) , सत्य हरिश्चन्द्र(१८७५) , श्रीचंद्रावली (१८७६, नाटिका), विषस्य विषमौषधम् (१८७६, भाण), भारत दुर्दशा(१८८०, ब्रज रत्नदास के अनुसार१८७६, नाट्यरासक),नीलदेवी (१८८१, प्रहसन), अंधेर नगरी(१८८१), प्रेम जोगनी (१८७५, प्रथम अंक में केवल चार अंकयागर्भांक, नाटिका), सतीप्रताप (१८८३, केवल चार अंक, गीति रूपक)

निबंधसंग्रह- भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसराखंड) में संकलितहै।,

“नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया

प्रमुख निबन्ध- नाटक, कालचक्र, लेवी प्राण लेवी,भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है, कश्मीर कुसुम

काव्यकृतियां- भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका (१८७१), प्रेममाधुरी (१८७५), प्रेम-तरंग (१८७७),, उत्तरार्द्धभक्तमाल (१८७६-७७), प्रेम-प्रलाप (१८७७), होली (१८७९), मधुमुकुल (१८८१), राग-संग्रह (१८८०), वर्षा-विनोद (१८८०), विनयप्रेमपचासा (१८८१), फूलोंकागुच्छा (१८८२), प्रेमफुलवारी (१८८३) कृष्णचरित्र (१८८३) दानलीला, तन्मयलीला, नयेज़मानेकीमुकरी, सुमनांजलि, बन्दरसभा (हास्यव्यंग)

बकरीविलाप (हास्यव्यंग)

    सरयू पार की यात्रा:-

      भारतेंदु जी के बस्ती आगमन और वहाँ के अनुभवों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

प्रथम पड़ाव:अयोध्या - 

कल सांझ को चिराग जले रेल पर सवार हुए, यह गए, वह गए। राह में स्टेशनों पर बड़ी भीड़ न जाने क्यों? और मजा यह कि पानी कहीं नहीं मिलता था। यह कम्पनी यजीद के खानदान की मालूम होती है कि ईमानदारों को पानी तक नहीं देती। या सिप्रस का टापू सरकार के हाथ आने से और शाम में सरकार का बन्दोवस्त होने से यह भी शामत का मारा शामी तरीका अख़तियार किया गया है कि शाम तक किसी को पानी न मिलै। स्टेशन के नौकरों से फरियाद करो तो कहते हैं कि डांक पहुंचावें, रोशनी दिखलावें कि पानी दें। 

    खैर, ज्यों त्यों कर अयोध्या पहुंचे । इतना ही धन्य माना कि श्रीरामनवमी की रात अयोध्या में कटी। भीड़ बहुत ही है, मेला दरिद्र और मैले लोगों का। यहां के लोग बड़े ही कंगालटिरें हैं। इस वक्‍त दोपहर को अब उस पार जाते हैं। ऊंट गाड़ी यहां से पांच कोस पर मिलती है। 

कैम्प हरेया बाजार-

अब तक तीन पहर का सफर हो चुका है और सफर भी कई तरह का और तकलीफ देने वाला। पहिले सर से गाड़ी पर चले । मेला देखते हुए रामघाट की सड़क पर गाड़ी से उतरे। वहां से पैदल धूप में गर्म रेती में सरजू किनारे गुदारा घाट पर पहुंचे। वहां से मुश्किल से नाव पर सवार होकर सरजू पार हुए। वहां से वेलवां, जहां कि डांक मिलती है और शायद जिसका शुद्ध नाम बिल्व ग्राम है, दो कोस है। सवारी कोई नहीं, न राह में छाया के पेड़, न कुआं, न सड़क । हवा खूब चलती थी इससे पगडंडी भी नहीं नजर पड़ती। बड़ी मुश्किल से चले और वड़ी ही तकलीफ हुई। खेर बेलवां तक रो रो कर पहुंचे। वहां से बैल की डांक पर नी बजे रात को यहां पहुंचे। यहां पहुंचते ही हरैया बाजार के नाम से यह गीत याद आया - 

“हरैया  लागल झबिआ के रे लैहें ना! । 

शायद किसी जमाने में यहां हरैया बहुत विकती होगी । इस के पास ही मनोरमा नदी है। मिठाई हरैया की तारीफ के लायक है। वालूसाही बिलकुल बालू साही, भीतर काठ के टुकड़े भरे हुए लड्डू भूरके । बरफी अहा हा हा! गुड़ से भी बुरी। खैर, लाचार होकर चने पर गुजर की। गुजर गई गुजरान- क्या झोपड़ी क्‍या मैदान, बाकी हाल कल के खत में। 

बस्ती :- 

परसों पहिली एप्रिल थी इस से सफर कर के रेती में बेवकूफ बनने का और तकलीफ में सफर करने का हाल लिख चुके हैं। अब आज आठ बजे सुबह रें रें कर के बस्ती पहुंचे। 

वाह रे बस्ती, 

झख मारने को बस्ती है ।

अगर बस्ती इसी को कहते हैं 

तो उजाड़ किस को कहेंगे। 

     सारी वस्ती में कोई भी पंडित बस्ती रामजी ऐसा पंडित नहीं। खैर !अब तो एक दिन यही बसती होगी। राह में मेला खूब था जगह जगह पर शहाबे का शहाबा। चूल्हे जल रहे हैं। सैकड़ों अहरे लगे हुए हैं। कोई गाता है, कोई बजाता है, कोई गप हांकता है। राम लीला के मेले में अवध प्रान्त के लोगों का स्वभाव रेल अयोध्या और इधर राह में मिलने से खूब मालूम हुआ।

       बैसवारे के यूरुष अभिमानी रूखे और रसिकमन्य होते हैं, रसिकमन्य ही नहीं वीरमन्य भी । पुरुष सब पुरुष और सभी भीम, सभी अर्जुन, सभी सूत पौराणिक और सभी वाजिदअली शाह। मोटी मोटी बातों को बड़े आग्रह से कहते सुनते हैं। 

नई सभ्यता अब तक इधर नहीं आई है। रूप कुछ ऐसा नहीं पर स्त्रियां नेत्र नचाने में बड़ी चतुर। यहां के पुरुषों की रसिकतर मोटी चाल सुरती और खड़ी मोंछ में छिपी है और स्त्रियों की रसिकता मैले वस्त्र और सूप ऐसी नथ में । अयोध्या में प्रायः सभी ग्रामीण स्त्रियों के गोल आते हुए मिले। उनका गाना भी मोटी रसिकता का। मुझे तो उनकी सब गीतों में “बोलो प्यारी सखियां सीताराम राम राम” यही अच्छा मालूम हुआ। राह में मेला जहां पड़ा मिलता था वहां बारात का आनन्द दिखलाई पड़ता था। 

     खैर ! मैं डांक पर बैठा बैठा सोचता था कि काशी में रहते तो बहुत दिन हुए परन्तु शिव आज ही हुए क्योंकि वृषभवाहन हुए। फिर अयोध्या याद आई कि हा! यह वही अयोध्या है जो भारतवर्ष में सब से पहले राजधानी बनाई गई। इसी में महात्मा इक्ष्वाकु, मान्धाता, हरिश्चन्द्र, दिलीप, अज, रघु, श्री रामचन्द्र हुए हैं और इसी के राजवंश के चरित्र में बड़े बड़े कवियों ने अपनी बुद्धिशक्त्रि की परिचालना की है। संसार में इसी अयोध्या का प्रताप किसी दिन व्याप्त था और सारे संसार के राजा लोग इसी अयोध्या की कृपाण से किसी दिन दबते थे वही अयोध्या अब देखी नहीं जाती। जहां देखिए मुसलमानों की कब्रें दिखाई पड़ती हैं। और कभी डांक पर बैठे रेल का दुःख याद आ जाता कि रेलवे कम्पनी ने क्‍यों ऐसा प्रबन्ध किया है कि पानी तक न मिले। 

     एक स्टेशन पर एक औरत पानी का होल लिए आई भी तो गुपला गुपला पुकारती रह गई, जब हम लोगों ने पानी मांगा तो लगी कहने कि “रह: हो पानियैं पानी पड़ल हो, फिर कुछ जियादा जिद में लोगों ने मांगा तो बोली “अब हम गारी देव” वाह! क्या इंतजाम था, मालूम होता था रेलवे कम्पनी स्वभाव (Nature) की बड़ी शत्रु है क्यौंकि जितनी बातें स्वभाव से सम्बन्ध रखती हैं अर्थात खाना, पीना, सोना, मल मूत्र त्याग करना इन्हीं का इस में कष्ट है। शायद इसी से अब हिन्दुस्तान में रोग बहुत हैं। कभी सराय की खाट के खटमल और भटियारियों का लड़ना याद आयाँ। यही सब याद करते कुछ सोते जागते हिलते हिलते आज बस्ती पहुंच गए। बाकी फिर। 

कुआनो नदी:- 

यहां एक नदी है उसका नाम कुआनो। डेढ़ रुपया पुल का गाड़ी का महसूल लगा। बस्ती के जिले की उत्तर सीमा नैपाल, पश्चिमोत्तर की गोंडा, पश्चिम दक्षिण अयोध्या और पूरब गोरखपुर है। नदियां बड़ी इस में सरयू और इरावती। सरयू के इस पार बस्ती उस पर फैजाबाद। छोटी नदियों में कुवानो मनोरमा, कठनईया , आमी, बानगंगा और जमबर है। बखिरा ताल और जिरजिरवा (चंदों) दो बड़ी झील भी हैं। बांसी, बस्ती और मग़हर तीन राजा भी हैं। बस्ती सिर्फ चार पांच हजार की बस्ती है पर जिला बड़ा है क्यौंकि जिले की आमदनी चौदह लाख है। साहब लोग यहां कुल दस बारह हैं, उतने ही बंगाली हैं। 

पुरानी बस्ती

पुरानी बस्ती खांई के बीच में बसी है। राजा के महल बनारस के अर्दली बाजार के किसी मकान से उमदा नहीं। महल के सामने मैदान, पिछवाड़े जंगल और चारों ओर खांई है। पांच सौ खटिकों के घर महल के पास हैं जो आगे किसी जमाने में राजा के लूटमार के मुख्य सहायक थे। अब राजा के स्टेट के मैनेजर कूक साहब हैं। यहां के बाजार का हम बनारस के किसी भी बाजार से मुकाबिला नहीं कर सकते । महज बेहैसियत | महाजन एक यहां हैं वह टूटे खपड़े में बैठे थे। तारीफ यह सुना कि साल भर में दो बेर कैद होते हैं क्यौंकि महाजन पर जाल करना फर्ज है और उस को भी छिपाने का शऊर नहीं। यहां का मुख्य ठाकुर द्वारा दो तीन हाथ चौड़ा और उतना ही लम्बा और उतना ही ऊंचा बस। पत्थर का कहीं दर्शन भी नहीं। यह हाल बस्ती का है। कल डांक ही नहीं मिली कि जायं।

मेंहदावल की सड़क 

 मेंहदावल की कच्ची सड़क है इस से कोई सवारी नहीं मिलती आज कहार ठीक हुए हैं। भगवान ने चाहा तो शाम को रवाना होंगे। कल तो कुछ तबीअत भी गड़वड़ा गई थी इस से आज खिचड़ी खाई। पानी यहां का बड़ा बातुल है। अकसर लोगों का गला फूल जाता है, आदमी ही का नहीं कुत्ते और सुग्गे का भी। शायद गला फूल कबूतर यहीं से निकले हैं। बल अब कल मेंहदावल से खत लिखेंगे। 

मेंहदावल :-

आज सुबह सात बजे मेंहदावल पहुंचे । सड़क कच्ची है, राह में एक नदी उतरनी पड़ती है उस का नाम आमी है। छह आना पुराना महसूल लगा। रात को ग्यारह बजे पालकी पर सवार हुए। बदन खूब हिला। अन्न भी नहीं पचा। इस वक्‍त यहां पड़े हैं। यहां मक्खी बहुत हैं और आबादी बहुत है। दो लड़कों के स्कूल हैं और एक लड़कियों का स्कूल है और एक डाक्टर खाना है। बस्ती शहर है मगर उस से यह मेंहदावल गांव बहुत आबाद है। 

फैजाबाद में 5॥) (साढ़े पांच रुपये) बस्ती तक डांक का लगा और बस्ती से मेंहदावल तक 3॥) (तीन रुपये बारह आने) पालकी का। अभी एक गंवार भाट आया था। बेतरह बका। फूहर औरतों की तारीफ में एक बड़ा भारी पचड़ा पढ़ा | यहां गरमी बहुत है और मक्खियां लखनऊ से भी जियादा । दिन को बड़ी बेचैनी है। यहां की औरतों का नाम श्यामतोला, गमतोला, मनतोरा इत्यादि विचित्र होता है और नारंगी को भी यही श्यामतोला कहते हैं जो संगतरा का अपभ्रंश मालूम होता है क्योंकि यहीं के गंवार संतोला कहते हैं। यहां एक नाऊ बड़े पंडित थे। उन से किसी पंडित ने प्रश्न किया “कि दूध” (तुम कौन जात हो) तब नाई ने जवाब दिया 

“चटपटाक चटपटाक” (नाई)।

 तब ब्राह्मण ने कहा “तं दूर! (तुम दूर जाओ), तब नाई ने जवाब दिया “कि छौरं! (तब मूड़ कौन मूड़ैगा)। 

एक का बाप डूब कर मर गया उस के बाप का पिंडा इस मन्त्र से कराया गया।

 “आर गंगा पार गंगा बीच में पड़ गई रेत। 

तहां मर गए नायका चले बुज बुजा देत।"

धर दे पिडवा | 

कुछ फुटकर हाल भी यहां का सुन लीजिए। कल मजहब का हाल हमने नीचे लिखा था। उस का अच्छी तरह से हाल दरयाफ्त किया तो मालूम हुआ कि हमारे ही मजहब की शाखा है। इनके ग्रन्थों में हमने एक श्लोक श्रीमहाप्रभुजी की सुवोधिनी की कारिका का देखा, इसी से हम को सन्देह हुआ। फिर हम ने बहुत खोद खाद कर पूछा तो यह साफ मालूम हुआ कि इसी मत से यह मत निकला है क्योंकि एक बात वह और बोले कि हमारा मत श्री बललभाचारज की टीका में लिखा है। इन लोगों के उपास्य श्रीकृष्ण हैं और एकादशी,शालग्राम, मूर्त्तिपूजा, तीर्थ किसी को नहीं मानते। इन के पहिले आचार्य्य देवचन्द जी थे, जो जात के कायस्थ  थे और दूसरे प्रणनाथजी, जो कच्छ के क्षत्री (भाटिया) थे। इमारे ही मत की शाखा सही पर विचित्र मत है। वैष्णव होकर मूर्त्तिपूजा का खंडन करने वाले यही लोग सुने। यहां बूढ़े को ख़बीस, व्रत को बेनी राम, भोजन को बुननी, जात को दूध, ऐसे ही अनेक विचित्र विचित्र बोली हैं। गांव गन्दा वड़ा है और लोग परले सिर के बेवकूफ । यहां से चार मील पर एक मोती झील वा बखरा ताल नामक झील है! दर हकीकत देखने के लायक है। कई कोस लम्बी झील है और जानवर तरह तरह के देखने मे आते हैं। पहाड़ से चिड़ियां हजारों ही तरह की आती हैं 3॥रुपए में मछली भी इफ़रात। पेड़ों पर बन्दर भी | मेंहदावल में कोई चीज भी देखने लायक नहीं। जहां देखो वहां गन्दगी। लोग बज्र मूर्ख, क्षत्री ब्राह्मण जियादा। एक यहां प्राननाथ का मजहब है और दस बीस लोग उस के मानने वाले हैं। ये लोग एकादशी तीर्थ वगैरह को नहीं मानते और सुने सुनाए दो तीन श्लोक जो याद कर लिए हैं बस उसी पर चूर हैं। 

“मदीनास्यां शरदां शर्तं' और 

“गोविंद गोकुलानन्द मक्केश्वरं” 

यहश्लोक पढ़ के कहते हैं कि वेद में मक्का मदीने का वर्णन है। ऐसे ही बहुत वाहियात बात कहते हैं और कोई कितना भी कहै कुछ सुनते नहीं। कहते हैं कि गोलोक का नाश है और गोलोक ऊपर एक “अखंड मंडलाकारं” लोक है, उस में मेरे कृष्ण हैं। इन का मजडब एक प्राणनाथ नामक एक क्षत्री ने पन्‍ना में करीब तीन सौ बरस हुए चलाया था। यहां चैत सुदी भर रात को औरतें जमा, होकर माता का गीत गाती हैं और बड़ा शोर करती हैं। असभ्य बकती हैं। व्यभिचार यहां बेतकल्लुफ है।

विचित्र ब्राह्मण:-

सरयू पार के ब्राह्मण बड़े विचित्र हैं। मांस मछली सब खाते हैं। कुएं के जगत पर एक आदमी जो पानी भरता हो दूसरा आदमी चला आवे तो अपना घड़ा फोड़ डालें और उससै घड़े का दाम ले। घड़ा कोई कहै तो घड़ा छू जाय क्योंकि  घड़ा मुसलमानी लफ़्ज है, दाल कहै तो छू जाय क्योंकि दाल मुसलमानी है। सूरज वंशी छत्री राजा बाबू को छाता नहीं लगता। क्यौंकि वे तो सूरज वंशी हैं, सूरज से क्या छाता लगावें। नेम बड़ा धर्म्म बिलकुल नहीं। एक ब्राह्मण ने कोहार से नई सनहकी मोल लेकर उस में पूरी बनाकर खाया, इस से वह जात से निकाल दिया गया क्योंकि जैसे बर्तन में मुसलमान खाना बनावैं उस आकार के बरतन में इसने हिन्दू होकर खाना बनाया। ह हा हा! और मजा यह कि ताजिए को सब मानते हैं। मेंहदावल में एक थाना है। थानेदार यहां के बादशाह हैं। एक डाक्टरखाना भी है। यह बड़ा सरकार का पुन्य है। बस हम को तो सरकार के पुन्य के कसर यही मालूम होती है कि पुलों पर महसूल लिया जाता है क्यौंकि भला नाव या ऐसे पुल पर महसूल लगै तो ठीक है जिसकी हर साल मरम्मत हो, पक्के पर भी महसूल । 

बस्ती में अगरवाला नहीं, एक हैं सो जूता उतार कर लायची खाते हैं। मेंहदावल में एक अगरवाले हैं। मुसलमान फर्श पर यहां नहीं बैठते हैं ।पिंडारे जिनको इस जिले में जमीन मिली हैं अव नवाब हो गए हैं और उन की मुस्तैठी आराम से बदल गई है। यहां कहीं कहीं धारू लोगों का रक्खा सोना खोदने से अब तक मिलता है। यहां के बाबू ऐसे हठी कि बंगला गिर पड़ा पर जूता उलटा था।खिदमतगार को पुकारा वह न आया, इस से आप वहां से न चले और दब कर मर गए।। 

संदर्भ स्रोत : पुस्तक : 'भारतेंदु के निबंध',

संपादक : केसरीनारायण शुक्ल 

रचनाकार : भारतेंदु हरिश्चंद्र 

प्रकाशन : सरस्वती मंदिर जतनबर,बनारस।



प्रस्तुतकर्ता लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183

भोजशाला के ऐतिहासिक सत्य की जीत: सच आने में लगे हजारों साल ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

परमार वंश के महानतम सम्राट राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) विद्या के एक महान संरक्षक होने के नाते, धार में एक सरस्वती महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में  भोजशाला के नाम से जाना जाने लगा जहां दूर-दूर से छात्र अपनी बौद्धिक प्यास बुझाने और नए नए ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे।

कमाल मौलाना मस्जिद कब बना 

मध्य प्रदेश के धार में स्थित कमाल मौला मस्जिद (भोजशाला परिसर) का निर्माण 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी द्वारा करवाया गया था। बाद में, 1514 ईस्वी के आसपास महमूद शाह खिलजी द्वितीय के शासनकाल में मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके इस ढांचे को मस्जिद का रूप दिया गया और सूफी संत कमाल मौला के नाम से जोड़ा गया।

कौन थे कमाल मौला-

कमालुद्दीन मालवी को कमाल मौला के नाम से जाना जाता था. 13वीं-14वीं सदी के दौरान वे चिश्ती संप्रदाय से जुड़े एक सूफी संत थे। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक वे प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य और समकालीन थे। माना जाता है कि कमालुद्दीन दिल्ली से मालवा क्षेत्र की यात्रा पर निकले और धार में बस गए थे । यहां उन्होंने लगभग चार दशकों तक इस्लामी शिक्षाओं और सूफी परंपराओं का प्रचार-प्रसार किया था।वक्त के साथ इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी भोजशाला परिसर के साथ गहराई से जुड़ गई थी। 

भोजशाला का कमाल मौला से जुड़ाव 

 कमाल मौला कई सालों तक भोजशाला परिसर के पास ही रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद इस परिसर के पास ही एक मजार या फिर समाधि बनाई गई। धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों ने इस संत के साथ क्षेत्र के जुड़ाव की वजह से इस जगह को कमाल मौला मस्जिद कहना शुरू कर दिया था । बाद में यह दोहरी पहचान भारत के सबसे संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों में से एक का केंद्र बन गई थी।

विवाद की पृष्ठभूमि: 

भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित 11वीं शताब्दी का एक स्मारक है। हिंदू समुदाय इसे देवी सरस्वती (बाग्देवी) का मंदिर मानता था, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे मस्जिद मानता था। 2003 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक व्यवस्था की जिसके तहत हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दी गई थी ,जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी । ऐसा कांग्रेस की नीति के तहत पुरातत्व विभाग के गजट नोटिफिकेशन के तहत हुआ था।

     इस भोजशाला  या सरस्वती मंदिर के अवशेष आज भी प्रसिद्ध कमाल मौलाना मस्जिद में अनेक स्थलों पर बहुतायत से देखे जा सकते हैं, जिसे धार के बाद के मुस्लिम शासकों ने मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था। मस्जिद में एक विशाल खुला प्रांगण है जिसके सामने बरामदा, किनारों पर स्तंभ और पश्चिम की ओर पीछे एक बड़ा प्रार्थना कक्ष है। मस्जिद के ऊपर लगे नक्काशीदार स्तंभ और प्रार्थना कक्ष की सूक्ष्म नक्काशीदार छतें भोज शाला से संबंधित प्रतीत होती हैं। मस्जिद की दीवारों पर लगी नक्काशीदार पत्थर की शिलाओं से बहुमूल्य कला कृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

विष्णु और कूर्म अवतार की स्तुति और अन्य श्लोक खुदे इन शिलाओं पर प्राकृत भाषा में विष्णु के  कुर्मावतार अवतार की दो स्तुतियाँ लिखी हुई हैं। स्थल पर सर्पबंध  स्तंभों पर दो शिलालेख भी हैं, जिनमें से एक में संस्कृत वर्णमाला और संज्ञा एवं क्रिया के मुख्य विभक्ति रूप अंकित हैं, और दूसरे में संस्कृत व्याकरण के दस कालों और भावों के व्यक्तिगत रूप अंकित हैं। ये शिलालेख 11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी के अक्षरों में हैं। इसके ऊपर  अनुष्टुप  छंद में दो संस्कृत श्लोक खुदे हुए हैं। पहला श्लोक राजा भोज के तुरंत बाद गद्दी पर बैठने वाले परमार राजाओं उदयदित्य और नरवर्मन की स्तुति करता है। दूसरे श्लोक में कहा गया है कि स्तंभ शिलालेख उदयदित्य द्वारा स्थापित किया गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजा भोज का सरस्वती महाविद्यालय या मंदिर यहीं स्थित था और इसका विकास उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया गया था।

    गहन खोज और निरीक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि मेहराब की अस्तर बनाने वाली दो विशाल काली पत्थर की शिलाओं के पीछे की ओर शिलालेख पाए गए हैं। ये शिलालेख शास्त्रीय संस्कृत में रचित एक नाट्य रचना है। यह अर्जुन वर्मा देव के शासनकाल (1299-10 से 1215- 18 ईस्वी) के दौरान उत्कीर्ण की गई थी। इस नाट्य रचना को राजगुरु मदन ने काव्य रूप में लिखा था, जो प्रसिद्ध जैन विद्वान आशाधरा के शिष्य थे। आशाधरा परमारों के दरबार की शोभा बढ़ाते थे और उन्होंने ही मदन को संस्कृत काव्यसिखाया था। इस नाट्य को  कर्पूर मंजरी कहा जाता है और इसका मंचन वसंत उत्सव के दौरान धार में किया जाता था। यह अर्जुन वर्मा देव के सम्मान में रचा गया था, जिन्हें उन्होंने शिक्षा दी थी और जिनके दरबार की शोभा बढ़ाई थी। यह नाट्य परमारों और चालुक्यों के बीच हुए युद्धों को संदर्भित करता है, जिनका अंत वैवाहिक संधि द्वारा हुआ था।

    “धार में उस समय व्याप्त सभ्यता और परिष्कार की उच्च अवस्था की झलक मिलती है, जिसे महलों का शहर और उसके चारों ओर पहाड़ियों पर फैले सुंदर उद्यानों वाला शहर बताया गया है। लोग भोज की महिमा पर गर्व करते थे, जिन्होंने धारा को मालवा की रानी बनाया था।” धार के संगीतकारों और विद्वानों की उत्कृष्टता का भी उल्लेख किया गया है। यह शाला, जिसकी स्थापना संभवतः भोज ने की थी और जिसे उनके योग्य उत्तराधिकारियों ने संरक्षण दिया था, 14वीं शताब्दी ईस्वी में एक मस्जिद में परिवर्तित हो गई थी।

     यह मूल रूप से सरस्वती (ज्ञान की देवी) का मंदिर था, जिसका उल्लेख कवि मदन ने संभवतः अपने नाटक में किया है। कहा जाता है कि यह मंदिर धरणनगरी के 84 चौकों की शोभा था, जो महलों, मंदिरों, महाविद्यालयों, रंगमंचों और उद्यानों का शहर था। देवी सरस्वती की प्रतिमा अब लंदन संग्रहालय में है। धार के आसपास से सरस्वती की एक और प्रतिमा मिली है, जो देवी की पहली प्रतिमा से काफी मिलती-जुलती है।

     उच्च न्यायालय के आदेश ने 500 वर्षों का अवैध कब्जे को खारिज किया मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने घोषणा की है कि भोजशाला में विवादित ऐतिहासिक स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है। एएसआई की रिपोर्ट में यहां 94 हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और परमार कालीन सिक्के मिलने की पुष्टि हुई थी।

     हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए, न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा:

"हमने इस स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता देखी है, हालांकि समय के साथ इसमें नियमन हुआ है... हमें यह जानकारी मिली है कि इस स्थान का ऐतिहासिक साहित्य इसे राजा भोज से जुड़े संस्कृत शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित करता है... यह धार में देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर के अस्तित्व को इंगित करता है... इसलिए, इस क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप भोजशाला माना जाता है, जिसमें देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है।"

     न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 2003 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें परिसर के भीतर पूजा करने के हिंदुओं के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया था और मुस्लिम समुदाय को वहां नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।हालांकि, मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए, न्यायालय ने उन्हें धार जिले के भीतर मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी। न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसा आवेदन किया जाता है, तो राज्य कानून के अनुसार उक्त आवेदन पर विचार कर सकता है।

        मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने और पक्षों के बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए, यदि प्रतिवादी संख्या 8 (मौलाना कमालुद्दीन कल्याण समिति) धार जिले में मस्जिद या प्रार्थना स्थल के निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है, तो राज्य उक्त आवेदन पर कानून के अनुसार विचार कर धार जिले में मुस्लिम समुदाय को उपयुक्त और स्थायी भूमि का आवंटन कर सकता है, जिसका प्रतिनिधित्व प्रतिवादी संख्या 8, हस्तक्षेपकर्ताओं या विधिवत गठित वक्फ निकाय के माध्यम से मस्जिद और संबंधित धार्मिक सुविधाओं के निर्माण और प्रशासन के लिए किया जा सकता है। तदनुसार, याचिका संख्या 10497/2022 और याचिका संख्या 10484/2022 को स्वीकार कर लिया गया है और उनका निपटारा कर दिया गया है।

        केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर और परिसर में स्थित संस्कृत शिक्षण के प्रशासन और प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। एएसआई के पास परिसर का समग्र प्रशासन बना रहेगा। न्यायालय ने कहा - "प्रत्येक सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह न केवल ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के मंदिरों सहित प्राचीन स्मारकों और उनकी संरचनाओं के संरक्षण और सुरक्षा को सुनिश्चित करे, बल्कि गर्भगृहों के साथ-साथ आध्यात्मिक महत्व के देवी- देवताओं की भी रक्षा करे।"

     लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में वर्तमान में रखी मूर्ति को वापस लाने और पुनर्स्थापित करने की याचिका के संबंध में, अदालत ने फैसला सुनाया -

       याचिकाकर्ताओं ने भारत सरकार को पहले ही कई अभ्यावेदन दिए हैं। भारत सरकार लंदन संग्रहालय से देवी सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने और उसे संग्रहालय परिसर में पुनः स्थापित करने के लिए उनके अभ्यावेदनों पर विचार कर सकती है। 

      15 मई को एक ऐतिहासिक फैसले में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने घोषणा की कि धार शहर में स्थित भोजशाला परिसर हिंदू ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है, न कि एक इस्लामी स्थल। 

      न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए, इस स्थल के ऐतिहासिक चरित्र को 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा के केंद्र के रूप में पुष्टि की।

      अदालत ने हिंदू पूजा की निरंतरता का हवाला दिया, हालांकि नियमों और प्रतिबंधों के साथ, भोजशाला परिसर के ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और हाल ही में एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण का हवाला दिया जिसमें संरचना में शामिल मंदिर के अवशेष दिखाए गए थे। पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण  ने कोर्ट में 2100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। कोर्ट ने रिपोर्ट के तथ्यों को महत्वपूर्ण माना, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे गलत बताया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया।

     98 दिनों तक चले सर्वे के बाद तैयार रिपोर्ट में कई अहम तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार खुदाई के दौरान मूर्तियां, सिक्के और कई ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। इसमें कहा गया कि परमारकालीन भवन की नींव के पत्थरों पर बाद में निर्माण किया गया, जबकि सर्वे में मिले स्तंभों और वास्तुकला से संकेत मिलता है कि ये पहले मंदिर का हिस्सा रहे होंगे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण में उपयोग किया गया।

     रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि परिसर में चारों दिशाओं में 106 खड़े और 82 आड़े स्तंभ मिले, यानी कुल 188 स्तंभ पाए गए। इन स्तंभों की बनावट से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे मूल रूप से मंदिर स्थापत्य का हिस्सा थे। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया कि स्तंभों पर बनी देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में औजारों से क्षतिग्रस्त किया गया था।

दीवारों पर मिलीं देवी-देवताओं की आकृतियां

सर्वे के दौरान टीम को भोजशाला की दीवारों पर देवी-देवताओं की आकृतियां मिलीं। रिपोर्ट में उन मूर्तियों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें पहले परिसर से निकालकर मांडू संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था। बताया गया कि ये मूर्तियां भी भोजशाला परिसर से ही मिली थीं और संरक्षण के उद्देश्य से संग्रहालय में रखी गई थीं। खुदाई में मिली कलाकृतियां संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से तैयार की गई थीं। इनमें गणेश, नृसिंह, भैरव, देवी-देवताओं और पशुओं की आकृतियों के चिन्ह मिले हैं।

    सर्वे में दो ऐसे स्तंभ भी मिले हैं, जिन पर “ॐ सरस्वत्यै नमः” लिखा हुआ है। सर्वे रिपोर्ट के पेज नंबर 148 में उल्लेख किया गया है कि भोजशाला में मौजूद स्तंभों की वास्तुकला यह दर्शाती है कि वे पहले मंदिर का हिस्सा थे और मस्जिद निर्माण के दौरान बेसाल्ट के ऊंचे चबूतरों पर उनका दोबारा उपयोग किया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक स्तंभ पर देवी-देवता की आकृति मौजूद है। पूर्वी हिस्से में स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राकृत भाषा की दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 छंद हैं। पश्चिम में स्थित मेहराब की दीवारें बेसाल्ट से बने चबूतरे से सटी हुई हैं, जिनके नीचे नक्काशी दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार चबूतरे और मेहराब की दीवारों की निर्माण शैली अलग-अलग है।

पहले भी हो चुका है भोजशाला का सर्वे- 

रिपोर्ट में बताया गया कि अंग्रेज शासन काल में भी भोजशाला का सर्वे हुआ था। इसके अलावा वर्ष 1987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिंदू धर्म से जुड़ी 32 मूर्तियां मिली थीं। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान संरचना यानी कमाल मौला दरगाह के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया था। 

     खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा-पाठ के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया था और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।

     उच्च न्यायालय ने कहा है कि मुस्लिम समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए धार जिले में वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिसे राज्य सरकार को कानून के अनुसार करना चाहिए। संरक्षित स्मारक का समग्र प्रशासन एएसआई के पास रहेगा , और केंद्र सरकार तथा एएसआई को मंदिर और संस्कृत विरासत के उचित प्रबंधन और संरक्षण के लिए निर्देश दिए गए हैं।

   11 मार्च 2024 को उच्च न्यायालय ने  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को भोजशाला परिसर में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन करने का निर्देश दिया  था । एएसआई ने 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय को 2,189 पृष्ठों की सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत की। सर्वेक्षण रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मौजूदा संरचना पूर्व में मौजूद मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई थी, जिसे संशोधित करके मस्जिद में परिवर्तित किया गया था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जांच के  दौरान 12वीं से 20वीं शताब्दी तक के शिलालेख मिले  हैं, जो संस्कृत, प्राकृत, नागरी लिपि में स्थानीय बोलियों, अरबी और फारसी सहित कई भाषाओं और लिपियों में लिखे गए हैं।

       मध्य प्रदेश की हाईकोर्ट ने धार भोज शाला मामले में बड़ा फैसला आया है।  हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह परिसर हिंदू मंदिर है। हाईकोर्ट ने धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिरऔर संस्कृत शिक्षा का केंद्र माना है।इसी के साथ हिंदुओं को पूजा का अनुमति भी मिल चुकी है।  इतना ही नहीं कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिए धार जिले में अलग जमीन के लिए सरकार से संपर्क करने की छूट दी गई है।     

    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा धार की पवित्र भोजशाला को माँ वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष की आस्था एवं पूजा-अर्चना के अधिकार को मान्यता देना सनातन संस्कृति, सत्य और इतिहास की महत्वपूर्ण विजय है।

      भोजशाला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का गौरवशाली प्रतीक है। वर्षों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विषय पर आया यह निर्णय न्यायपालिका के प्रति विश्वास को और सशक्त करता है।

      वर्तमान कार्यवाही स्थल के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से संबंधित कई याचिकाओं के परिणामस्वरूप शुरू हुई है। पहली याचिकाओं में से एक में हिंदू समुदाय के लिए स्थल को पुनः प्राप्त करने की मांग की गई थी, जबकि मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने से रोकने की मांग की गई थी। इसके मद्देनजर, उच्च न्यायालय ने स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था , जिसे मुस्लिम समुदाय की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी रूप से रोक दिया था। बाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने , पक्षों को प्रतियां उपलब्ध कराने और अंतिम सुनवाई में उनकी आपत्तियों पर विचार करने के लिए एक समय बद्ध प्रक्रिया निर्धारित की ।

     इस आदेश के अनुसरण में, वर्तमान कार्यवाही 6 अप्रैल को उच्च न्यायालय के समक्ष शुरू हुई । इसके बाद, उच्च न्यायालय ने एएसआई को सर्वेक्षण कार्यवाही के वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने और संबंधित पक्षों को इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। 

     हिंदू समुदाय से संबंधित याचिका कर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील ने तर्क दिया कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के शासनकाल का एक मंदिर था, जो देवी सरस्वती को समर्पित था और वर्तमान संरचना में पुरातात्विक, ऐतिहासिक और शिलालेख-आधारित साक्ष्य मौजूद हैं जो एक पूर्व-अस्तित्व वाले हिंदू धार्मिक स्थल को दर्शाते हैं । 

     मुस्लिम समुदाय से संबंधित पक्षों के वकीलों ने तर्क दिया कि खिलजी काल के ऐतिहासिक अभिलेखों और समकालीन लेखों में धार में स्थित किसी भी सरस्वती मंदिर के विध्वंस का उल्लेख नहीं है । वकीलों ने धार के तत्कालीन शासक द्वारा 1935 में जारी किए गए उस आदेश की वैधता का भी हवाला दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को मंदिर स्थल पर नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। 

     जैन समुदाय से संबंधित पक्षों के वकीलों ने प्रार्थना करने के अधिकार की मांग करते हुए तर्क दिया कि ब्रिटिश संग्रहालय में मिली मूर्ति जैन देवी अंबिका की है। वकीलों ने दावा किया कि यह स्थल माउंट आबू के मंदिरों के समान स्थापत्य विशेषताओं को प्रदर्शित करता है। 

      सरकार के वकील ने तर्क दिया कि 1935 का ऐलन अमान्य था क्योंकि यह स्थल पहले से ही 1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित घोषित किया जा चुका था । इसके बाद, 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत, एएसआई ने इस स्थल के संरक्षक और अभिभावक के रूप में कार्य किया। 

      यह फैसला भारत की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, सनातन परंपरा के सम्मान और ऐतिहासिक सत्य की पुन: र्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,

Pin 272001,उत्तर प्रदेश, (INDIA)

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Friday, May 15, 2026

कस्सपा बुद्ध और उनकी विरासतें✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


कस्सप बुद्ध पालि परम्परा में परिगणित चौबीसवें बुद्ध थे। संस्कृत परम्परा में कस्सप बुद्ध को 'कश्यप बुद्ध' के नाम से जाना जाता है। जो इस विश्व व्यवस्था के 28 बुद्धों में से एक थे। कस्सप बुद्ध ठीक गौतम बुद्ध से पहले के बुद्ध थे। 

जन्म सारनाथ के हिरण उद्यान में :- 

इनका जन्म सारनाथ के इसिपताना स्थित हिरण उद्यान में हुआ था।जहाँ गौतम बुद्ध ने वर्षों बाद अपना पहला उपदेश दिया था। 'काश्यप' गोत्र में उत्पन्न कस्सप के पिता का नाम ब्रह्मदत्त और माता का नाम धनवती था। उनके जन्मकाल में वाराणसी में राजा किकी राज्य करते थे। कस्सपा ने अपने गृहस्थी में दो हजार वर्ष बिताए, तीन अलग-अलग महलों में। ये महल हैं हंस, यस और श्रीनंद। (बु.ए. 217 में) पहले दो महलों को हंसवा और यसवा कहा गया है।) उनकी प्रमुख पत्नी सुनंदा थीं और उनका एक पुत्र था जिसका नाम विजितसेन था।

सांसारिक जीवन का त्याग :- 

कस्सपा ने सांसारिक जीवन त्याग दिया और अपने महल (पासादा) में यात्रा की। उन्होंने केवल सात दिनों तक तपस्या की। ज्ञान प्राप्ति से ठीक पहले उन्होंने अपनी पत्नी से दूध-चावल का भोजन ग्रहण किया और 'सोम' नामक एक व्यक्ति ने आसन के लिए घास दिये थे। कस्सपा का शरीर बीस हाथ ऊँचा था। बोधि वृक्ष जिस वृक्ष के नीचे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया वह एक बरगद का वृक्ष था। उन्होंने इसिपताना में अपने साथ संसार त्याग चुके भिक्षुओं की सभा को अपना पहला उपदेश दिया। सुंदरनगर के बाहर एक आसन वृक्ष की तलहटी में कस्सपा ने दो चमत्कार किए। उन्होंने अपने शिष्यों की केवल एक ही सभा आयोजित की; उनके सबसे प्रसिद्ध धर्मांतरणों में एक यक्ष, नारदेव का धर्मांतरण शामिल था। उनके प्रमुख शिष्यों में भिक्षुओं में तिस्सा और भारद्वाज, और भिक्षुणियों में अनुला और उरुवेला थे। उनके निरंतर सेवक सब्बामित्त थे। उनके संरक्षकों में सुमंगला और घट्टीकार, विजितसेना और भद्दा सबसे प्रख्यात थे। कस्सप के काल में बोधिसत्त का जन्म एक ब्राह्मण के रुप में हुआ था, जिनका नाम ज्योतिपाल था। 

प्राचीन सेतव्या नगर के कई समीकरण

कस्सपा का निधन चालीस हजार वर्ष की आयु में हुआ था। सेतव्या नगर के कई समीकरण मिलते हैं। कोसला (डी.ii.316) में एक नगर , जिसके पास उक्कत्था था । अंगुत्तरा निकाय (अ.ii.37) में बुद्ध और ब्राह्मण दोनो के बीच हुई बातचीत का वर्णन है , जिनसे बुद्ध की मुलाकात उक्कत्था से सेतव्या जाने वाले मार्ग पर हुई थी। यह नगर बावरी के शिष्यों (एस.एन.श्लोक 1012) द्वारा सावत्थी /श्रावस्ती से राजगृह जाने वाले मार्ग पर स्थित था और सावत्थी के बाहर पहला पड़ाव था। इसके आगे कपिलवस्तु , कुसिनारा , पावा आदि नगर थे।

        सेतव्या के उत्तर में सिम्सपावन था , जहाँ कुमार कस्सपा रहते थे, और जहाँ उन्होंने ब्राह्मण पायसी को पायसी (दो या दो से अधिक ऐसे तरल पदार्थों का मिश्रण होता है जो सामान्यतः आपस में घुलते या मिश्रित नहीं होते हैं) से संबंधित सूत्र का उपदेश दिया, जो वहाँ एक शाही जागीर रखते थे (डी.ii.316)।

       अंगुत्तरा टीका (ए.ए.ii.504) कहती है कि कस्सपा बुद्ध का जन्म सेतव्या में हुआ था, लेकिन बुद्धवंश और उसकी टीका दोनों कहती हैं कि उनका जन्म बनारस में हुआ था (बु.xxv.33; बु.ए.217)। बुद्धवंश टीका (बु.ए.223) आगे बताती है कि कस्सपा की मृत्यु सेतव्या के सेताराम में हुई थी, लेकिन यह भी बताती है कि सेतव्या काशी का एक शहर था ।

स्तूप निर्माण की योजना 

बुद्ध कश्यप के  निधन स्थल के सम्मान में और उनके अवशेषों को रखने के लिए एक योजन ऊँचा विशाल स्वर्ण स्तूप बनाया गया था।  जिसकी प्रत्येक ईंट एक करोड़ रुपये की थी।

      प्रारंभ में, स्तूप के आकार और निर्माण सामग्री को लेकर मतभेद थे। इन मुद्दों के सुलझने के बाद स्तूप का निर्माण शुरू हुआ। लेकिन फिर नागरिकों को पता चला कि उनके पास स्तूप को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है ।

       सोरता नामक एक अनागामी भक्त ने जंबूद्वीप के मानव जगत में यात्रा की और स्तूप के निर्माण के लिए लोगों से धन का अनुरोध किया। जैसे-जैसे उन्हें धन प्राप्त होता गया, वे उसे भेजते गए, और जब उन्हें पता चला कि काम पूरा हो गया है, तो वे स्तूप की पूजा करने के लिए निकल पड़े। कहा जाता है कि संभवतः लुटेरों ने उन्हें जंगल में पकड़ लिया और उनकी हत्या कर दी, जिसे बाद में अंधवन के नाम से जाना है। 

1.काशी का राजघाट

काशी के सेतव्य उद्यान में उनका परि निर्वाण हुआ। यहाँ प्रसिद्ध 'सिंशपावन' या शीशम के वृक्षों का वन था, जहाँ बुद्ध के रुकने और उपदेश देने के साक्ष्य मिलते हैं। काशी के सेतव्या स्थित सेतव्य आश्रम संभवतः राजघाट में हुआ था। सेतव्य उद्यान को श्वेत द्वीप या आदि केशव क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। वाराणसी में वरुणा और गंगा नदी के संगम पर आदि केशव घाट पर राजघाट के पास, मालवीय पुल के उत्तर-पूर्व में यह स्थित हो सकता है। यह काशी के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक प्राचीन और पवित्र स्थान है, जहाँ पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने काशी में सबसे पहले कदम रखा था। यह विष्णु पादोदक तीर्थ के नाम से भी प्रसिद्ध है।

2.श्रावस्ती के पास अंधवन टंडवा की खोज 

पारंपरिक रूप से, यह स्थान भारत में श्रावस्ती या उसके आसपास के घने वनों (अंधवन = अंधेरा जंगल) से जोड़ा जाता है। चूंकि कश्यप के अस्तित्व का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है, इसलिए उन्हें पौराणिक चरित्र की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन थेरवाद बौद्धों और अधिकांश अन्य बौद्धों के लिए , कश्यप एक वास्तविक व्यक्ति थे जो बुद्ध बने ।

कस्सप बुद्ध का गाँव टंडवा था :- 

सेतव्य के अवशेष उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती  एक प्रमुख बौद्ध स्थल है, के आसपास के क्षेत्र में माने जाते हैं, जो बुद्ध की शिक्षाओं से जुड़ी समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं। यह प्राचीन श्रावस्ती और कपिलवस्तु के मार्ग पर स्थित था। 

       कस्सप बुद्ध के गाँव में प्राप्त साक्ष्य के अनुसार सबसे पहले सम्राट अशोक गए थे। वहाँ उन्होंने उनकी स्मृति में दो स्तूप बनवाए थे। ये बात ह्वेनसांग ने बताई है। फिर पाँचवी सदी में कस्सप बुद्ध के जन्म - स्थल पर फाहियान पहुँचे। उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव का नाम " टू - वेई " बताया है। फिर सातवीं सदी में कस्सप बुद्ध के गाँव ह्वेनसांग पहुँचे। उन्होंने उनका गाँव श्रावस्ती से 16 ली की दूरी पर उत्तर - पश्चिम में बताया है। आधुनिक काल में कस्सप बुद्ध के गाँव की खोज में कनिंघम पहुँचे। उन्होंने 1863 एवं 1876 में दो बार उस गाँव की यात्रा की।

टंडवा गांव का स्तूप

कश्यप बुद्ध  का स्तूप भारत में उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के पास तांडवा गाँव में स्थित माना जाता है। कनिंघम ने फाहियान द्वारा कस्सप बुद्ध के बताए गए गाँव " टू - वेई " की पहचान टंडवा गाँव के रूप में की। यह टंडवा गाँव श्रावस्ती से पश्चिम 14 किमी. की दूरी पर है, जो काफी हद तक चीनी यात्रियों के बताए गए स्थान से मेल खाता है।

    कनिंघम ने देखा कि टंडवा गाँव ईंट के खंडहरों के बीच बसा है। गाँव के उत्तर - पश्चिम में उन्होंने 800 फीट लंबा और 300 फीट चौड़ा ईंट के खंडहरों का टीला देखा। ह्वेनसांग ने नगर के उत्तर दिशा में कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप का आँखों देखा वर्णन किया है। कनिंघम को विश्वास हो गया कि वो यही स्तूप है, जिसे सम्राट अशोक ने कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर बनवाए थे।

स्तूप का विशाल आकार :- 

स्तूप का व्यास 74 फीट था, जिसका रेखांकन कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में किया है। तब वह स्तूप खेतों से 18 फीट ऊँचा था। कनिंघम ने आसपास की सफाई करवाई। स्तूप का तोरण - द्वार और रेलिंग के अवशेष मिले। एक शिलालेख भी मिला, जिस पर " स्थाहनवा आराम " लिखा था। कनिंघम ने हनुमान गढ़ी टीले को दूसरे स्तूप के रूप में शिनाख्त की।फिर उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव की रूपरेखा का रेखांकन तैयार किया।

कनिंघम स्तूप के बीचों - बीच खुदाई कराना चाहते थे। लेकिन वे इसकी खुदाई नहीं करा पाए। कारण कि विशाल स्तूप के ऊपर शिवलिंग और सीता माई का मंदिर स्थापित था।

     यदि कनिंघम स्तूप के बीचों बीच खुदाई कराने में सफल हो गए होते तो कस्सप बुद्ध के अस्थि - अवशेष और कुछेक सबूत इतिहास के लिए मिल गए होते। लेकिन स्तूप के ऊपर सीता माई के मंदिर और शिवलिंग स्थापित होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।

3.सिसवनिया देवरांव

आधुनिक संदर्भ में इसे उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुंवानो नदी तट स्थित सिसवनिया देवरांव नामक पुरातात्विक स्थल से की है। यह महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है । बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। यह आकार में बड़ा है, इसे नगर साइट कहा जा सकता है। कुंवानो सुन्दरीका नदी की धारा इस भूस्थल को दो तीन भागों में विभक्त कर रखा है।

     यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। यह देखा गया है कि इस प्राचीन स्थल की औसत ऊंचाई 20 मीटर से अधिक रही है। देवराव और सिसवनिया पच्चीसा नदी के तट पर स्थित एकल सांस्कृतिक परिसर के टीले रहे हैं। ये टीले धीरे धीरे समाप्त प्राय होते जा रहे हैं। इनका अधिग्रहण संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

     सिसवनिया में उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है। 

देवरांव बौद्ध विहार:- 

इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है।  साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देखी गयी है। यह आकार में छोटा है। इसे मठ विहार का स्थल कहा जा सकता है।

4.काठमांडू में बौद्धनाथ स्तूप :-

नेपाल के काठमांडू में बौद्धनाथ नामक विशाल स्तूप कस्सप बुद्ध की स्मृति में बना हुआ है। चीनी यात्री फ़ाह्यान और ह्वेनसांग ने भी कस्सप बुद्ध के तीर्थ स्थलों की चर्चा की है।यह बुद्ध समुदाय के लोगों का धार्मिक चैत्य है। यहा साक्यमुखी बुद्ध की प्रतिमा है। शाक्यमुखी" शब्द का सीधा संदर्भ शाक्यमुनि से है, जो गौतम बुद्ध का एक प्रमुख नाम है। यह एक पर्वत की चोटी पर स्थित है, यहा नेपाल की धार्मिक भावनाओं का संगम देखने को मिलता है।

    काठमांडू शहर के पूर्वी भाग में स्थित बौद्धनाथ स्तूप दुनिया के सबसे बड़े गोलाकार बौद्ध स्तूपों में से एक है । जिसके भीतर मुख्य रूप से कश्यप बुद्ध का पवित्र अवशेष (अस्थियां) रखा गया है।

     महान जरुंग काशोर स्तूप , जो वर्तमान में बोधनाथ , काठमांडू , नेपाल में निर्मित है , एक प्रसिद्ध स्तूप है जिसका निर्माण छोटी पूर्णा और संवरी के नाम से जानी जाने वाली एक माता और उनके चार पुत्रों ने बुद्धों के धर्मकाया मन के समर्थन के रूप में किया था। इसके मूल अभिषेक में बुद्ध कश्यप के अवशेष स्थापित किए गए थे। इसे पूरा होने में सात वर्ष लगे। अभिषेक के समय, पुत्रों ने तिब्बत में पुनर्जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की ताकि वे बुद्ध की शिक्षाओं को उत्तरी क्षेत्रों में ला सकें और उनका प्रचार कर सकें। पुत्रों का पुनर्जन्म राजा त्रिसोंग देत्सेन , खेनपो शांतारक्षित , गुरु पद्म संभव और राजा के मंत्री नानम दोरजे दुदजोम के रूप में हुआ । 

     यह एक प्रमुख यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह 14वीं शताब्दी का लगभग 36 मीटर ऊँचा और 100 मीटर व्यास वाला एक पवित्र आध्यात्मिक केंद्र है, जिसे तिब्बती बौद्ध धर्म के लिए अत्यंत महत्व पूर्ण माना जाता है। यह नेपाल का सबसे बड़ा वृत्ताकार स्तूप है ।

       इस स्तूप का इतिहास विशेष रूप से प्राचीन तिब्बती बौद्ध संप्रदाय, या न्यिंगमा संप्रदाय से संबंधित है और इसका वर्णन न्यिंगमा संप्रदाय के धार्मिक इतिहास और लेखन और ग्रंथों में मिलता है।

14वीं शताब्दी में पुनर्निर्माण 

दक्षिण से मुगल आक्रमण के बाद 14वीं शताब्दी में बोधनाथ का निर्माण हुआ था। प्राचीन स्तूप लगभग 1400-1500 साल पुराना माना जाता है, जिसे 5वीं शताब्दी में लिच्छवी राजा मानदेव ने बनवाया था और बाद में पुनर्निर्मित किया गया था।

     यह विशाल गुंबद, ऊपर की ओर जाती सीढ़ियां और बुद्ध की आंखें (जो ज्ञान का प्रतीक हैं) इसके प्रमुख आकर्षण हैं।

2072 बी.एस. के भूकंप के बाद बोधनाथ का पुनर्निर्माण

1979 में संयुक्त राष्ट्र की विश्व धरोहर सूची में शामिल बोधनाथ, 2072 ईसा पूर्व के विनाशकारी भूकंप से क्षतिग्रस्त हो गया था। भूकंप के कारण ढह गए बोधनाथ स्तूप का पुनर्निर्माण कार्तिक 2073 ईसा पूर्व में बोधनाथ क्षेत्र विकास समिति के समन्वय, पुरातत्व विभाग की तकनीकी सहायता और विभिन्न संगठनों और निकायों की वित्तीय सहायता से पूरा हुआ। 2072 ईसा पूर्व में मंगसिर में शुरू हुआ पुनर्निर्माण कार्य कार्तिक 2073 ईसा पूर्व में पूरा हुआ। पुनर्निर्मित बोधनाथ चैत्य का उद्घाटन प्रधानमंत्री प्रचंड ने किया। तीन दिनों की वैदिक पूजा के बाद आयोजित उद्घाटन समारोह में बौद्ध रिनपोचे, विभिन्न धार्मिक नेता, राजनयिक निकायों के प्रतिनिधि और उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी उपस्थित थे। बोधनाथ क्षेत्र विकास समिति ने कहा है कि पुनर्निर्माण कार्य सरकार के किसी भी वित्तीय निवेश के बिना पूरा किया गया, जिसमें स्थानीय समुदाय और विभिन्न बौद्ध धर्मों के नेताओं के दान शामिल थे।



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183




Thursday, May 14, 2026

अवध के ऐतिहासिक स्मारक संरक्षण के बढ़ते संकट का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट संकलन डा. राधेश्याम द्विवेदी

अवध के ऐतिहासिक स्मारक बढ़ते संरक्षण संकट का सामना 

अभी कल हम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ मंडल की 41 वीं स्थापना दिवस मना रहे थे। आज समाचार पत्रों आउटलुक में सीएजी के हवाले संरक्षण से संबंधित कुछ ऑब्जर्वेशन आयी है। इसे जैसे का तैसा प्रस्तुत किया जा रहा है।

सीएजी की हालिया रिपोर्ट में अवैध अतिक्रमण, लापता भूमि अभिलेखों और प्रशासनिक विफलताओं पर प्रकाश डाला गया है, जो अवध के कुछ सबसे प्रतिष्ठित स्मारकों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित स्मारकों पर अवैध अतिक्रमण का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट में राज्य भर में, विशेषकर लखनऊ में, जो पूर्ववर्ती अवध क्षेत्र का केंद्र है, संरक्षित स्मारकों की बिगड़ती स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

इन निष्कर्षों ने इस लंबे समय से चली आ रही चिंता को और मजबूत किया है कि अनधिकृत निर्माण, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और आवासीय बस्तियां धीरे-धीरे इन अमूल्य स्थलों की संरचनात्मक और ऐतिहासिक अखंडता को नष्ट कर रही हैं।

विरासत विशेषज्ञों के लिए, मुद्दा केवल क्षतिग्रस्त दीवारों और सिकुड़ती सीमाओं का नहीं है। यह अवध की समन्वित विरासत को संरक्षित करने का है, एक ऐसा काल जो मुगल, फारसी और स्थानीय स्थापत्य शैलियों के उल्लेखनीय मिश्रण के साथ-साथ सह-अस्तित्व और कलात्मक उत्कृष्टता का जश्न मनाने वाली संस्कृति के लिए जाना जाता है।

लखनऊ के स्मारक जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँच गए हैं।

लखनऊ के कई केंद्रीय संरक्षित स्मारक जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँच गए हैं। कई ऐतिहासिक इमारतों में गहरी दरारें, प्लास्टर का उखड़ना और स्तंभों का कमजोर होना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। संरक्षण अधिकारियों का कहना है कि अतिक्रमण से यह क्षति और भी बढ़ रही है।

अवैध निर्माण अक्सर जीर्णोद्धार कार्यों में बाधा डालते हैं और कभी-कभी सदियों पुरानी इमारतों की नींव को सीधे प्रभावित करते हैं। यह समस्या विशेष रूप से सआदत अली खान के मकबरे, काज़मैन रौज़ा, रूमी दरवाज़ा और रेजीडेंसी जैसे ऐतिहासिक स्थलों के आसपास गंभीर है। ये सभी व्यावसायिक और आवासीय अतिक्रमणों से घिरे हुए हैं।

संरक्षित स्मारकों के निकट निर्माण के संबंध में कानून क्या कहता है?

प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम के अंतर्गत, संरक्षित स्मारक के 100 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार का निर्माण वर्जित है। इसके अगले 200 मीटर का क्षेत्र विनियमित क्षेत्र है, जहाँ निर्माण के लिए विशेष अनुमति आवश्यक है। उल्लंघन करने पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना और दो वर्ष तक का कारावास हो सकता है। इन सख्त नियमों के बावजूद, प्रवर्तन कमजोर रहा है, जिसके कारण वर्षों से अतिक्रमण बढ़ता ही जा रहा है।

धरोहर स्थलों के आसपास लगभग 400 अतिक्रमणों की पहचान की गई

यह मुद्दा सबसे पहले 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंचा था, जब लखनऊ के वकील सैयद मोहम्मद हैदर रिजवी ने अवैध अतिक्रमणों को हटाने और ऐतिहासिक स्मारकों की बेहतर सुरक्षा की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 2014 में अदालत को दिए अपने जवाब में कथित तौर पर लखनऊ के 60 संरक्षित स्मारकों में से 25 के आसपास लगभग 400 अतिक्रमणों को स्वीकार किया था। इनमें चाय की दुकानें, बिरयानी की दुकानें, आवासीय भवन और यहां तक कि सरकारी कार्यालय भी शामिल हैं, जो निर्माण से मुक्त रहने के लिए निर्धारित भूमि पर बनाए गए हैं।

आसफी इमामबाड़ा के पास स्थित सिकंदर बाग और नौबत खाना जैसी जगहों को भी ऐसे उदाहरणों के रूप में उद्धृत किया गया है, जिनमें सार्वजनिक अधिकारियों पर ही विरासत भूमि पर कब्जा करने का आरोप लगाया गया है।

ऑडिट में लापता स्मारकों और प्रशासनिक विफलताओं का खुलासा हुआ

संरक्षण संकट अवैध निर्माण से कहीं अधिक व्यापक है। सीएजी की 2025 की रिपोर्ट संख्या 36 में पाया गया कि उत्तर प्रदेश में केंद्र द्वारा संरक्षित 31 स्मारकों को अब आधिकारिक तौर पर "अज्ञात" के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका अर्थ है कि वे सरकारी अभिलेखों में तो मौजूद हैं, लेकिन अनियंत्रित शहरीकरण और वर्षों की उपेक्षा के कारण वास्तविक रूप से गायब हो चुके हैं।

ऑडिट में दस्तावेज़ीकरण संबंधी गंभीर कमियाँ भी सामने आईं, जिनसे विरासत स्थलों की सुरक्षा करने की एएसआई की क्षमता कमज़ोर हो गई है। उत्तर प्रदेश के 487 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों में से 456 का प्रबंधन बिना कानूनी भूमि स्वामित्व प्रमाण पत्रों या पूर्ण स्वामित्व अभिलेखों के किया जा रहा है। इसके अलावा, लगभग 86 प्रतिशत स्मारक अधिसूचनाओं में स्थल की सीमाओं का स्पष्ट रूप से निर्धारण नहीं किया गया है, जिससे अदालत में अनधिकृत कब्जे या निर्माण को चुनौती देना मुश्किल हो जाता है।

रिपोर्ट में पाया गया कि लखनऊ सर्किल सहित राज्य में एएसआई के किसी भी सर्किल ने अनिवार्य स्थल प्रबंधन योजना या दीर्घकालिक संरक्षण रणनीति तैयार नहीं की थी।

जीर्णोद्धार के प्रयासों पर भी चिंताएं जताई गई हैं। ऑडिट में कई ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है जिनमें स्मारकों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को खतरे में डालने वाले अनुचित संरचनात्मक परिवर्तन किए गए हैं। इसमें यह भी पाया गया कि प्राचीन वस्तुएं जर्जर अवस्था में संग्रहित की जा रही हैं, जबकि 2026 तक राज्य की केवल लगभग 20 प्रतिशत विरासत कलाकृतियों का ही डिजिटलीकरण किया जा सका था।

उच्च न्यायालय ने प्रशासन पर निष्क्रिय समिति को पुनर्जीवित करने का दबाव डाला

2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद, लखनऊ में संरक्षित स्मारकों के आसपास अतिक्रमणों से निपटने के लिए एक जिला स्तरीय उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया गया था। हालांकि, समिति को यह दायित्व सौंपे जाने के बावजूद, अगले दशक में इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई।

2023 के अंत में प्रशासनिक कार्रवाई में तेज़ी आई, जब संभागीय आयुक्त रोशन जैकब ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), हुसैनबाद और संबद्ध ट्रस्ट (एचएटी) और नागरिक एजेंसियों को संयुक्त सर्वेक्षण करने और अवैध कब्जेदारो की पहचान करने और उन्हें हटाने के लिए एक समन्वित योजना तैयार करने का निर्देश दिया। पहले चरण में, केंद्र द्वारा संरक्षित पांच स्मारकों पर लगभग 50 परिवारों द्वारा किए गए अतिक्रमणों को हटाया गया।

मार्च 2026 में न्यायिक जांच और भी तेज हो गई, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने समिति की उपलब्धियों पर अद्यतन जानकारी मांगी और उत्तर प्रदेश भर में हजारों विरासत स्थलों के खतरे में होने की चिंताओं को लेकर केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्रालयों को नोटिस जारी किए। इसका एक तात्कालिक परिणाम यह रहा कि स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत छोटा इमामबाड़ा के तीन ऐतिहासिक द्वारों के जीर्णोद्धार के लिए 6 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। संरक्षण कार्य INTACH संरक्षण संस्थान द्वारा किया जा रहा है।

लखनऊ में कई स्मारकों का प्रबंधन करने वाले हुसैनबाद एंड एलाइड ट्रस्ट ने कार्यकर्ताओं और एएसआई द्वारा उद्धृत कुछ आंकड़ों पर आपत्ति जताई है। ट्रस्ट के अधिकारियों का तर्क है कि कुछ कब्जेदार अवैध अतिक्रमणकारी नहीं बल्कि लंबे समय से किराएदार हैं और छोटा इमामबाड़ा के बाहर स्थित पुलिस स्टेशन जैसी कुछ सुविधाएं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

अवध की विरासत भारत के लिए क्यों मायने रखती है?

अवध के स्मारक महज़ स्थापत्य कला के नमूने नहीं हैं। वे एक अद्वितीय सांस्कृतिक युग के जीवंत प्रमाण हैं, जो हिंदू और इस्लामी कलात्मक परंपराओं का मिश्रण है और भारत की सबसे समृद्ध कलात्मक विरासतों में से एक को संजोए हुए है। भव्य प्रवेश द्वारों और अलंकृत मकबरों से लेकर उद्यानों और इमामबाड़ों तक, ये संरचनाएं इस क्षेत्र के इतिहास, पहचान और सामूहिक स्मृति को समाहित करती हैं।

सीएजी की रिपोर्ट ने उस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है जिसे संरक्षणवादी वर्षों से उजागर करते आ रहे हैं। अदालती जांच तेज होने और प्रशासनिक एजेंसियों पर कार्रवाई का दबाव बढ़ने के साथ, आने वाले महीने अवध के ऐतिहासिक स्मारकों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

फिलहाल, सवाल यह बना हुआ है कि क्या अधिकारी सर्वेक्षणों और नोटिसों से आगे बढ़कर भारत की सबसे असाधारण सांस्कृतिक विरासतों में से एक के लिए सार्थक संरक्षण प्रदान कर सकते हैं।

(विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर)
 साभार आउट लुक )

पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सीएजी की रिपोर्ट अवध के स्मारकों के बारे में क्या कहती है?

रिपोर्ट में अवैध अतिक्रमण, अपूर्ण भूमि अभिलेख, सीमाओं का अभाव और संरक्षण योजनाओं की कमी को उजागर किया गया है, जो लखनऊ और पूरे उत्तर प्रदेश में संरक्षित स्मारकों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।

2. लखनऊ में कौन से स्मारक सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं?

रूमी दरवाजा, सआदत अली खान का मकबरा, काज़मैन रौज़ा, रेसिडेंसी और छोटा इमामबाड़ा जैसी जगहों को अतिक्रमण और संरचनात्मक जीर्णता का सामना करने वाली जगहों के रूप में उद्धृत किया गया है।

3. उत्तर प्रदेश में कितने स्मारकों को अज्ञात श्रेणी में रखा गया है?

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में केंद्र द्वारा संरक्षित 31 स्मारक आधिकारिक तौर पर लापता के रूप में सूचीबद्ध हैं।

4. संरक्षित स्मारकों के निकट निर्माण कार्य के संबंध में भारतीय कानून क्या कहता है?

किसी भी संरक्षित स्मारक के 100 मीटर के दायरे में निर्माण की अनुमति नहीं है, जबकि अगले 200 मीटर के भीतर निर्माण के लिए प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है।

5. अवध की विरासत महत्वपूर्ण क्यों है?

अवध के स्मारक मुगल, फारसी और स्थानीय स्थापत्य प्रभावों के एक अद्वितीय मिश्रण को दर्शाते हैं और भारत की सबसे समृद्ध सांस्कृतिक और कलात्मक विरासतों में से एक का प्रतिनिधित्व करते हैं।


प्रस्तुतीकरण
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
मोबाइल नंबर +91 9412300183

Wednesday, May 13, 2026

पशुपतिनाथ है नेपाल का अद्भुत शिव मंदिर ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल के सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है जो काठमांडू शहर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व में सुंदर और पवित्र बागमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ पर रोज हजारों की संख्या में भक्त दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरा करते  हैं। 'पशुपति' के - पशु का मतलब 'जीवन'और 'पति' का मतलब ‘स्वामी’ या ‘मालिक’ होता है , यानी 'जीवन के मालिक' या 'जीवन के देवता' को पशुपति भगवान कहा गया है । यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है। मुख्य पगोडा शैली का मंदिर सुरक्षित आंगन में स्थित है जिसका संरक्षण नेपाल पुलिस द्वारा किया जाता है।  पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने का प्रयास किया गया है।

पौराणिक मान्यताएं :- 

1. इस मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।

2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।

3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद अपने ही बंधुओं की हत्या करने की वजह से पांडव बेहद दुखी थे। उन्होंने अपने भाइयों और सगे संबंधियों को मारा था। इसे गोत्र वध कहते हैं। उनको अपनी करनी का पछतावा था और वे खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। खुद को इस दोष से मुक्त कराने के लिए वे शिव की खोज में निकल हुए थे।

     शिव जी नहीं चाहते थे कि जो जघन्य कांड  पांडवों ने किया है, उससे उनको इतनी आसानी से मुक्ति दे दी जाए। इसलिए पांडवों को अपने पास देखकर उन्होंने एक बैल का रूप धारण कर लिया और वहां से भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन पांडवों को उनके भेद का पता चल गया और वे उनका पीछा करके उनको पकड़ने की कोशिश में लग गए। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। इसी भागा दौड़ी के दौरान शिव जमीन में लुप्त हो गए और जब वह पुन: अवतरित हुए, तो उनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर बिखर गए। 

     शिव जी ने नेपाल की पूरी भौगोलिक स्थिति को इस्तेमाल करते हुए एक तांत्रिक शरीर की रचना की, ताकि वहां रहने वाले सभी लोग और हरेक प्राणी एक बड़े मकसद के साथ जिए।


नेपाल के पशुपति नाथ में उनका मस्तक गिरा था और तभी इस मंदिर को तमाम मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। केदारनाथ में बैल का कूबड़ गिरा था। बैल के आगे की दो टांगें तुंगनाथ में गिरीं। यह जगह केदार के रास्ते में पड़ता है। बैल का नाभि वाला हिस्सा हिमालय के भारतीय इलाके में गिरा। इस जगह को मध्य-महेश्वर कहा जाता है। यह एक बहुत ही शक्तिशाली मणि पूरक लिंग है। बैल के सींग जहां गिरे, उस जगह को कल्पनाथ कहते हैं। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग जगहों पर मिले।

मन्दिर का विस्तार :- 

यह मंदिर आश्रमों के साथ एक बड़े हिस्से में फैला हुआ है जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को एक अलग परम शांति का अनुभव करवाता है। यह मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। मंदिर की द्वी स्तरीय छत का निर्माण तांबे से किया गया है जिनपर सोने की परत चढाई गई है। 

     मंदिर वर्गाकार के एक चबूतरे पर बना है जिसकी आधार से शिखर तक की ऊंचाई 23मी.7 सेमी.है। मंदिर का शिखर सोने का है जिसे गजुर कहते हैं। परिसर के भीतर दो गर्भगृह है एक भीतर और दुसरी बाहर। भीतरी गर्भगृह वह स्थान है जहां शिव की प्रतिमा को स्थापित किया गया है जबकि बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है। भीतरी आंगन में मौजूद मंदिर और प्रतिमाओं में वासुकि नाथ मंदिर, उन्मत्ता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मूर्ति, और 184 शिवलिंग मूर्तियां प्रमुख रूम से मौजूद है जबकि बाहरी परिसर में राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग और पंद्र शिवालय गुह्येश्वरी मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट स्थिति है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है। किसी समय  यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी।

    पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।

निर्माण का समय :- 

इस मंदिर का इतिहास 400 ईसा पूर्व का है, जिसका निर्माण नेपाल के पूर्ववर्तियों द्वारा समय-समय पर कराया गया है। सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में इस मंदिर का निर्माण कराया था। 605 ईस्वी में अमशु वर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुगृहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया था।

     यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला के कारण 1979 ईस्वी में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया है। यह मंदिर नेपाली पैगोडा शैली में पुनर्निर्मित है, जिसकी छत सोने की है और चारों द्वार चांदी से मढ़े हुए हैं।  अप्रैल 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में पशुपति नाथ मंदिर के कुछ बाहरी इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थी जबकि पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर और मंदिर की गर्भगृह को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई थी।

पंचमुखी शिवलिंग :- 

मंदिर में भगवान शिव की एक पांच मुंह वाली मूर्ति है। पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर देख रहा मुख वामवेद या अर्धनारीश्वर है, तो दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोर कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है।

सोने की छत और चांदी के दरवाजे और असीम सम्पत्ति :- 

इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। मंदिर में सोने और चांदी का बहुतायत से प्रयोग किया गया है, जो इसकी भव्यता और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। यह मुख्य मंदिर नेवारी वास्तुकला शैली में निर्मित है। इसकी दो मंजिला छतें तांबे की हैं जिन पर सोने की परत चढ़ी हुई है । मंदिर के द्वार चांदी की चादरों से ढके हुए हैं। हाल ही में, मंदिर के शिवलिंग के चारों ओर एक सोने की 'जलहरी' भी स्थापित की गई है, जो मंदिर की समृद्ध विरासत का हिस्सा है।

     नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के पास नौ किलो सोना, 316 किलो चांदी है. इसके अलावा मंदिर का 1.29 अरब रुपया (नेपाली मुद्रा) बैंकों में जमा है. इसका जिक्र एक मीडिया रिपोर्ट में किया गया है।मंदिर के शासी निकाय की ओर से प्रकाशित आंकड़ों के अनसार, मंदिर में पिछले 56 साल में चढ़ावे के रूप में 9.27 किलो सोना, 316 किलो चांदी चढ़ाए गए हैं। माना जाता है कि पशुपतिनाथ मंदिर शुमार नेपाल के सबसे ज्यादा पैसे वाला हिंदू मंदिरों में शुमार है. यहां रोज हजारों नेपाली और भारतीय नागरिक पैसे, सोना और चांदी का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इन आंकड़ों का जिक्र हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट में की गई है।

पीतल का विशाल नन्दी :- 

पश्चिमी द्वार की ठीक सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है जिसका निर्माण पीतल से किया गया है। इस परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है। 

भारतीय ,नेपाली ब्राह्मण पुजारी :-

पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। बाद में 'मल्ल राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को मंदिर का प्रधान पुरोहित नियुक्त कर दिया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे थे। बाद में में प्रचंड सरकार के काल में भारतीय ब्राह्मणों का एकाधिकार खत्म कर नेपाली लोगों को पूजा का प्रभाव सौंप दिया गया।

दर्शन का समय :-

ये मंदिर प्रत्येक दिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। केवल दोपहर के समय और साय पांच बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर में जाने का सबसे उत्तम समय सुबह सुबह जल्दी और देर शाम का होता है। पुरे मंदिर परिसर का भ्रमण करने के लिए 90 से 120 मिनट का समय लगता है।

मन्दिर का विजुअल लिंक -

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लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183




Tuesday, May 12, 2026

बौद्धकाल का महाआश्रम महसों और सेतव्या का स्तूप✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


     उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले में कुवानों नदी (जिसका पुराना नाम सुन्दरीका रहा) के तटपर स्थित महसों एक एतिहासिक गाँव है। इस गांव का तप्पा कपरी महसों विकास क्षेत्र व तहसील भी बस्ती ही है। बौद्ध काल में इसे ब्राह्मण का आश्रम, जिसे पहले महाआश्रम कहा जाता था। बाद में इसे महातीर्थ भी कहा जाने लगा था। सुन्दरी भारद्वाजसूत्त में कहा गया है कि भगवान बुद्ध ने सुन्दरिका नदी (कुवानों नदी) के तट पर ब्राह्मण सुन्दरिका भारद्वाज से धर्म से सम्बंधित शास्त्रार्थ किया था। यह स्थान सुन्दरिका भारद्वाज आश्रम के रुप में भी पहचाना गया तथा स्तूप का अवशेष भी मिला है। 

संदर्भ: (-पुरातत्व संख्या:21, पृ. 45 एवं प्रागधारा संख्या: 8, पृ.113 )  

      यहां कपिल नामक ब्राह्मण की भार्या से पिप्पली नामक संभवतः महाकश्यप पुत्र उत्पन्न हुआ था।

(-संदर्भ:बुद्धचर्या पृ. 38 ) 

     बौद्ध परंपरा और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पिप्पली और महाकाश्यप एक ही व्यक्ति के दो नाम या चरण हैं। महा काश्यप का जन्म का नाम 'पिप्पली' (या पिप्पली मानव) था। जब वे भगवान बुद्ध के शिष्य बने, तो बुद्ध ने उन्हें महाकाश्यप (महान ऋषि) नाम उपाधि स्वरूप प्रदान किया था।

     महाकाश्यप बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे और वे अपनी तपस्या और तपस्वी प्रथाओं (धुतांग) के लिए जाने जाते थे। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, उन्होंने प्रथम बौद्ध संगीति का नेतृत्व किया था।

सुन्दरिका भारद्वाज प्रसिद्ध बौद्ध ब्राह्मण :- 

सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध परंपरा के एक प्रसिद्ध ब्राह्मण हैं, जिनका उल्लेख मज्झिम निकाय सप्तम वत्थसुत्त में मिलता है। वे सुन्दरिका नदी के तट पर अग्निपूजा और अग्निहोत्र का पालन करते थे। सुन्दरिका कोसल में एक नदी, जो पापों को धोने में कारगर मानी जाती है। 

  (-संदर्भ:मज़्झिम निकाय 39)।

    वहाँ सुंदरिका भारद्वाज ने अग्नि के सम्मान में यज्ञ किए और ऐसे ही एक यज्ञ के दौरान बुद्ध से मुलाकात की।   

   (-संदर्भ:संयुक्त निकाय,आई.167,

संयुक्त निकाय, पी.पी.79)

भगवान बुद्ध से भेंट: सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न देखा। शुरुआत में वे बुद्ध को मुंडक (सिर मुंडवाया हुआ) समझकर उनसे पीछे हटने लगे, लेकिन फिर उनके पास जाकर धर्म-चर्चा की।

     एक समय बुद्ध सुंदरिका नदी के किनारे कोसल प्रांत में रह रहे थे। उस समय ब्राह्मण जाति के सुंदरिका भारद्वाज सुंदरिका नदी के किनारे अग्नि यज्ञ कर रहे थे। फिर उसने चारों दिशाओं में देखा और सोचने लगा, “अब मैं इस भेंट का भोजन किसे दूं?

     महज क्षुद्र राजनीति के लिए गौतम, मौर्य, बैस ,सेंगर जैसे प्राचीन क्षत्रिय वंशों से पृथक राजपूत उत्पत्ति की मनगढ़ंत थ्योरी गढ़ने वाले मूर्ख वामियों के लिए ये पृष्ठ 3rd- 1c Bce,मतलब 2000 वर्ष पहले , पाली भाषा की सुत्तपिटक के खुद्दक निकाय से है जिसमें "राजपुत्तो" शब्द क्षत्रिय पर्याय के रूप में आया है, जिसमें स्वयं बुद्ध सुन्दरिका भारद्वाज नामक ब्राह्मण से कह रहे हैं....

न ब्राह्मणो नोम्हि न राजपुत्तो, 

न वेस्सायनो उद कोचि नोम्हि।

गोत्तं परिञ्‍ञाय पुथुज्‍जनानं, 

अकिञ्‍चनो मन्त चरामि लोके ।।

      सुन्दरिका भारद्वाज ने देखा कि बुद्ध एक वृक्ष की जड़ में ध्यान कर रहे थे और उन्होंने अपना वस्त्र सिर और चेहरे पर ओढ़ रखा था। अपने बाएं हाथ में भोजन और दाएं हाथ में घड़ा लेकर वह बुद्ध के पास पहुंचा। जब बुद्ध ने सुंदरिका के कदमों की आहट सुनी, तो उन्होंने अपना सिर और चेहरा खोल दिया।सुंदरिका ने सोचा, "यह तो गंजा आदमी है, इसका सिर मुंडा हुआ है!"और वह वापस मुड़ना चाहता था।

      लेकिन सुंदरिका के मन में एक दूसरा विचार आया, “ ब्राह्मण जाति के कुछ पुजारी भी गंजे होते हैं। क्यों न मैं उनके पास जाकर उनकी जाति के बारे में पूछ लूँ?”

      तब सुंदरिका बुद्ध के पास गई और पूछा, “हे प्रभु, आप किस जाति में पैदा हुए थे?”

बुद्ध:

       किसी के जन्म के बारे में मत पूछो।इसके बजाय, मुझसे पूछो कि मैं अपना जीवन कैसे जीता हूँ।

कोई भी लकड़ी आग पैदा कर सकती है। “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति निम्न जाति का है या उच्च जाति के परिवार से। यदि वह व्यक्ति ऊर्जावान, बुद्धिमान है और गलत काम करने के अपराध बोध से प्रेरित होकर बुराई से दूर रहता है, तो वह लोगों में एक उत्कृष्ट व्यक्ति है।”

   “कुछ ऐसे श्रेष्ठ पुरुष हैं जो जीवन के सत्य को जानकर शांत हो गए हैं। वे ज्ञान के उच्चतम स्तर तक पहुँच चुके हैं। उन्होंने आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण कर ली है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को ही उपहार दिए जाने चाहिए जो भेंट के योग्य हों।”

सुंदरिका:

     “मेरा यज्ञ सफल रहा होगा, तभी तो आज मुझे ऐसे महान व्यक्ति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! क्योंकि मैंने पहले कभी आप जैसा कोई नहीं देखा था, इसीलिए पहले साधारण लोग मेरे अर्पण का भोजन ग्रहण करते थे।भोज कीजिए, गुरु गौतम, आप सचमुच एक ब्राह्मण हैं। ”

बुद्ध:

    “मेरे श्लोकों को सुनने के बाद मुझे दिया गया भोजन मेरे खाने योग्य नहीं है। सुंदरिका, सत्य को जानने वालों का यह मार्ग नहीं है।बुद्ध श्लोकों के उच्चारण के बाद अर्जित उपहारों को अस्वीकार करते हैं।

     सुंदरिका, यही बुद्धों का शुद्ध आचरण है, यही उनका जीवन जीने का तरीका है। अन्य प्रबुद्ध भिक्षु भी हैं जो दोष और संदेह से मुक्त हैं। उन्हें अपना भोजन और पेय अर्पित करो। वे पुण्य साधकों के लिए उपजाऊ भूमि हैं। ”

      सुंदरिका ने पूछा, “तो फिर, हे गौतम स्वामी, मुझे इस प्रसाद का भोजन किसे देना चाहिए?”

     “सुंदरिका, इस संसार में, जहाँ देवता, मार, ब्रह्मा और मनुष्य विद्यमान हैं, बुद्ध या उनके शिष्य के सिवा कोई ऐसा नहीं है जो इस दूध-चावल को खाकर ठीक से पचा सके। इसलिए, सुंदरिका, इस दूध-चावल को किसी घासविहीन स्थान पर या ऐसे जल में फेंक दो जहाँ कोई जीव-जंतु न हों।”

     तो सुंदरिका ने दूध-चावल को निर्जीव जल में डाल दिया। पानी में डालते ही दूध-चावल से सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। जैसे दिन भर गर्म की गई लोहे की गेंद को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आती है, धुआँ निकलता है और भाप निकलती है, ठीक वैसे ही दूध-चावल को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। तब सुंदरिका घबराकर, रोंगटे खड़े होते हुए, भगवान बुद्ध के पास गए और उनके निकट खड़े हो गए। भगवान बुद्ध ने सुंदरिका से श्लोकों में कहा:

     “सुंदरिका, यह मत सोचो कि लकड़ी जलाने से तुम्हारा जीवन शुद्ध हो जाएगा। यह तो केवल बाहरी जलन है। कुशल और श्रेष्ठ जन इस प्रकार की शुद्धि को स्वीकार नहीं करते।“मैंने लकड़ी जलाना छोड़ दिया है। सुंदरिका, मैं अपने भीतर प्रकाश प्रज्वलित करता हूँ।

     यह ज्ञान का निरंतर प्रकाश है। मेरा मन सदा एकाग्र रहता है। मैं मुक्त मन से अपना प्रबुद्ध जीवन जीता हूँ।”

    “सुंदरिका, तुम अपने तपस्वी आधिपत्य के अहंकार से बोझिल हो। तुम्हारा जीवन क्रोध में जल रहा है और झूठ की राख छोड़ रहा है। तुम्हारी जीभ यज्ञ में इस्तेमाल होने वाले चम्मच के समान है। परन्तु, तुम्हारे हृदय में प्रकाश प्रज्वलित होना चाहिए। एक प्रशिक्षित मन उज्ज्वल होता है।”

       “सुंदरिका, बुद्ध का धम्म, सद्गुणों से घिरे किनारों वाला एक सरोवर है । शांत मन से जीना सदा श्रेष्ठ लोगों द्वारा प्रशंसित है। धम्म के कुशल अभ्यासी उस सरोवर में स्नान करते हैं और बिना भीगे दूसरे किनारे तक पहुँच जाते हैं ।”

     “सुंदरिका , सत्य, श्रेष्ठ धम्म, संयमपूर्ण जीवन और ब्रह्मचर्य जैसे अच्छे गुणों का अभ्यास करने से व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है ।

इसलिए, आपको सद्गुणों से युक्त श्रेष्ठ व्यक्तियों की पूजा करनी चाहिए । मैं ऐसे व्यक्ति को 'धम्म का अनुसरण करने वाला' कहता हूँ।”

    जब बुद्ध ने इस धम्म का उपदेश दिया, तब सुंदरिका ने बुद्ध से कहा:

     “उत्कृष्ट, गुरु गौतम! उत्कृष्ट! जैसे कोई उलटी चीज़ को सीधा कर दे, छिपी हुई चीज़ को प्रकट कर दे, भटके हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में दीपक जला दे ताकि अच्छी नज़र वाले लोग देख सकें, उसी प्रकार गुरु गौतम ने मुझे धम्म का उपदेश दिया, जो अनेक रूपों में स्पष्ट है। मैं गुरु गौतम, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ। भंते, क्या मैं आपके अधीन भिक्षु बन सकता हूँ?”

      और वे बुद्ध के शिष्य बन गए। दीक्षा लेने के कुछ ही समय बाद, भंते सुंदरिका भारद्वाज, जो एकांत में रहते हुए, एकांत प्रिय, लगनशील, भावुक और दृढ़ थे, ने इसी जीवन में आध्यात्मिक मार्ग के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर लिया । उन्होंने अपनी बुद्धि से उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जिसके लिए एक पुत्र गृहस्थ जीवन छोड़कर भिक्षु बनता है।

        उन्होंने यह अहसास किया: “पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो गया है। आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हो गई है। दुखों को समाप्त करने के लिए जो करना था, वह हो चुका है। अब पुनर्जन्म नहीं होगा।” अतः भंते सुंदरिका भारद्वाज प्रबुद्ध भिक्षुओं में से एक बन गए।

(-संदर्भ:संयुक्त निकाय 7.9 सुंदरिका सुत्त: सुंदरिका)


सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान् को कहा था “आश्चर्य! हे गौतम!! आश्चर्य! हे गौतम! यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम के पास मैं प्रब्रज्या (= संन्यास) पाऊँ, उपसम्पदा पाऊँ।”

      सुन्दरिका भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् के पास प्रब्रज्या, उपसम्पदा पाई। उपसम्पदा पाने के बाद, आयुष्मान् भारद्वाज एकान्त में प्रमादरहित, उद्योग युक्त, आत्मनिग्रही हो विहरते, थोड़े ही समय मे जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य के अन्त में (निर्वाण) को, इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्त कर विहरने लगे। ‘जन्म क्षीण हो गया नहीं है’ जान लिया। सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने के बाद आयुष्मान भारद्वाज के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आयुष्मान् भारद्वाज अर्हतों में से एक हुये। 


सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव:- 

बाद में यह स्थान सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव बन गया। और महाश्रम से बिगड़ कर महसों नाम कहा जाने लगा। ।जैसे सरनत राजपूतों के उद्गम की सटीक जानकारी नहीं है उसी प्रकार इस वंश की भी सटीक जानकारी नहीं मिलती है।


      अनुश्रूतियों के अनुसार कत्यूर साम्राज्य आधुनिक उत्तराखण्ड के कुमायूं मण्डल के राजा ब्रह्मदेव थे। ब्रह्मदेव के पौत्र अभय पाल देव ने पिथैरागढ़ के असकोट में अपनी राजधानी बनायी थी। उनके शासन के बाद उनके पुत्र अभयपाल के समय यह साम्राज्य विघटित हो गया। अभयपाल देव के दो छोटे पुत्र अलखदेव और तिलकदेव थे। महाराजा अलख देव और तिलकदेव असकोट को छोड़कर एक बड़ी सेना लेकर 1305 में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गोरखपुर व गोण्डा में आ गये। यह क्षेत्र भयंकर दलदल तथा बनों से आच्छादित था। यहां पर राजभर आदि वासियों का आधिपत्य था। इस क्षेत्र के दक्षिण में  घाघरा तथा पूर्व में राप्ती बहती है जिनसे क्षेत्र की रक्षा होता थी। इन दो राजाओं ने महुली को अपनी राजधानी बना कर पाल वंश का नया प्रशासन प्रारम्भ किया। इसी प्रकार ये फैजाबाद जिले के पूरा बाजार में भी बस गये थे। कहा यह भी जाता है कि ये बाराबंकी के राजा हर्ष से जुड़े थे। पूरा बाजार के परिवार में आदिपुरुष लालजी शाह थे। जबकि बस्ती के महुली के आदि पुरुष अलख देव और तिलकदेव दो भाइयों के वंशज हैं। संभव है ये दोनो एक दूसरे से जुड़े रहे हों। अनुश्रूतियों के अनुसार दोनों भाइयों ने राजभरों के मुखिया कौलविल से महुली की सम्पत्ति अधिग्रहीत की थी। समय बीतते बीतते उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया था। ये अनेक परिवारों में विभक्त हो गये थे। इन घरों के प्रमुखो ने पाल उपनाम धारण किया था । 

(संदर्भ : “बस्ती : एक गजेटियर आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के जिला गजेटियर का वॉल्यूम 23, एचआर नेविल ,आईसीएस, इलाहाबाद द्वारा एफ लुकर, अधीक्षक सरकारी प्रेस, संयुक्त प्रांत द्वारा मुद्रित, 1907 है।)


सिसवानिया सेतव्या सिंसपावन नगर-

बस्ती तहसील का सिसवनिया पच्चीसा गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। यह आकार में बड़ा है, इसे नगर साइट कहा जा सकता है। कुंवानो सुन्दरीका नदी की धारा इस भूस्थल को दो तीन भागों में विभक्त कर रखा है।

     पचीसा नाम पच्चीस विशिष्ट लोगों या पच्चीस विशिष्ट गांवों के सम्मिलित स्वरूप की तरफ भी इंगित करता है। यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। यह देखा गया है कि इस प्राचीन स्थल की औसत ऊंचाई 20 मीटर से अधिक रही है। देवराव और सिसवनिया पच्चीसा नदी के तट पर स्थित एकल सांस्कृतिक परिसर के टीले रहे हैं। ये टीले धीरे धीरे समाप्त प्राय होते जा रहे हैं। इनकाअधिग्रहण संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।



      पचीसा ग्राम पंचायत में - मुख्य गांव : पचीसा, छरुआछा उर्फ शोखापुरवा और निपानिया आदि हैं। 2021 में पचीसा की जनसंख्या 594 थी। सिसवनिया में उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है। 

देवरांव बौद्ध विहार:- 

इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है।  साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देखी गयी है। यह आकार में छोटा है। इसे मठ विहार का स्थल कहा जा सकता है।



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आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

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