इतिहास के अद्भुत रहस्य
Saturday, February 7, 2026
लछिराम के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रन्थ के आधार पर अयोध्या के महाराजा मानसिंह 'द्विजदेव' की जीवन गाथा ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
Thursday, February 5, 2026
साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक - अयोध्या के महाराजा मानसिंह आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृतआयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य कासृजन भी किया।
अतीत का इतिहास :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।
अनेक उपाधियो के धारक :-
महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली 'सर' की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ "वीर" या "साहसी" होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी ।के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित 'द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।
क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब 'लंबे समय तक चलने वाली' या 'दृढ़ता से लड़ी जाने वाली' लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा
द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।
जीवन परिचय :-
‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लक्षिराम जी ने निम्नलिखित छन्द पढ़ा था -
कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ । वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो । कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।
- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )
राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे -
1.राजा रामाधीन सिंह - बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।
2.राजा रघुबर दयाल सिंह -
दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे।वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।
3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह द्विजदेव :-
इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे।उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।"
राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव-
दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।
इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –
बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,
कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।
बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,
कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।
जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,
कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।
मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,
कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’
इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –
आजु तैं कोटि हार बरीस लौं,
रीति यहै नित ही चलि आई।
लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह,
कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।
ऐ नृपहंस! विचार विचारु,
रहौ किन आपने काज लजाई।
आपही दूरी बसे तो कहा
कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।
इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।
मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।
जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।
कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।
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मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद
कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।
विरोधियों को मात दिया :-
ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ, मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा।
प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:-
महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। "मैं अब अकेला हूँ... पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए," मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।
युद्ध और प्रशासन :-
अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।
सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया
एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। "तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं," सेनापति ने डरते हुए कहा, "यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।"
मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।" रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था। राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।
जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, "महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।" मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, "वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”
इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।
सूरजपुर के किले पर विजय:-
राजा मान सिंह ने सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और दिल्ली के राजा ने उन्हें "राजा-बहादुर" की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में "कायम - जंग" की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ "महाराजा " की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था।
सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :-
कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।
एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, "मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।"
उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।
शाहगंज के विद्रोहियों का दमन :-
सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।
प्रशासन में सुधार :-
युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, "युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।"
महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।
वंश और उत्तराधिकार :-
अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।
जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :-
1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।
'द्विजदेव' साहित्यिक उपाधि :-
रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम 'द्विजदेव' है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययन परक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।
1.'श्रृंगारबत्तीसी'
2.श्रृंगारलतिका'
3. 'शृंगार चालीसी'
4. 'अवमुक्त पंचदशी'
5. 'मान मयंक'
6. 'लतिका सौरभ'
श्रृंगारलतिका :-
'श्रृंगारलतिका' का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।
श्रृंगारबत्तीसी :-
'श्रृंगारबत्तीसी' भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।
'मान मयंक' :-
मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।
शृंगार चालीसी’:-
शृंगार चालीसी' में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है।
लतिका सौरभ:-
दोहा -
तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।
किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥
भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।
भाषा :-
इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था-
मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।
रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।
द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।
चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।
आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।
ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।
पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।
तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।
सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के
मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।
द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों
नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन
खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?
सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।
चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,
गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।
बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,
सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।
द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन
अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।
हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,
देखन न पाई वह मूरति सुधामई।
आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,
चलत समैं मे चल पलन दगा दई।
बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,
झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन।
द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,
भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन
पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,
बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।
एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,
बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।
भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,
फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।
द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,
कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं
आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,
बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।
पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,
कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।
घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,
छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।
द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव,
एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना
फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ,
एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।
हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,
कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
Wednesday, February 4, 2026
अयोध्या के राजा दर्शन सिंह की शौर्य गाथा ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी
अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे ।लगभग दो-ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार अपना विशिष्ट स्थान बना लिए थे । इस वंश के ज्ञात राजा के पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके उत्तराधिकारी पुरन्दरराम पाठक से वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।
लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय
हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' ने कवियों के आश्रयदाता थे। द्विजदेव, जिनका वास्तविक नाम मानसिंह था, अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –
पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम
चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि
दर्शन सिंह के बारे में लछिराम के भाव-
दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ, देस अवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गज पै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघु भूपालमनि, मानसिंह महाराज।जिन कीने लछिराम कौं,निजद्वारे कविराज।
अयोध्या के पलिया में हुआ था इनका पहला पड़ाव :- गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दरराम पाठक का विवाह अयोध्या जिले के पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था और पलिया में आकर बस गये थे। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते रहे हैं । पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम 1.ओरी उर्फ बख्तावर सिंह, 2.शिवदीन सिंह, 3 .दर्शन सिंह, 4.इच्छा सिंह और 5.देवी प्रसाद सिंह है। इनमें से तीन ओरी सिंह दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार कर लिए थे। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी देवी करणों या अपने विस्तारवादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व संभाल ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए गायब हो गए होंगे।
1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय ओरी पाठक प्रथम शासक :-
अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में अपनी राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर लिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुआ। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1780-1846 ई के आसपास का रहा। उन्होंने लगभग 1795 के आसपास 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवामुक्त कराकर नव्वाब साहब ने पहले ओरी को 8 सवारों का दफादार बनाकर अपनी अर्दली बनाया फिर नबाब की जान की सुरक्षा के परितोष में उन्हे पलिया की जागीर और सौ सवारों का अफसर बनाया। फिर अश्व सेनापति (रिसालेदार), फिर 1821 ई में राजा की उपाधि और बख्तावर सिंह टाइटिल दिया । उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया और अपने अन्य भाइयों को भी शासन- प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया।इनकी मृत्यु 1846 ई में हुई थी।
इच्छासिंह :-
राजा दर्शनसिंह के भाई इच्छासिंह भी सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम= प्रबंधकर्ता ( सैन्य राज्यपाल)रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे।
मेहदौना की जागीर
राजा बख्तावर सिंह को जागीर पाने का सम्मान 1837 से 1842 के बीच प्राप्त हुआ था। जब बादशाह नसीरउद्दीन हैदर का देहान्त जुलाई 1837 में हुआ और मेजर लो रेजिडेण्ट मुहम्मद अली शाह 1837 से 1842 को तख्त पर बैठाने के लिये अपने साथ दरे-दौलत पर लाये, उस समय बादशाह बेगम और मुन्नाजान एक हज़ार हथियारबन्द सिपाहियों को लेकर महल में घुस आये। मुन्नाजान ने कहा कि सलतनत हमारी है। तख्त पर बैठ कर यह हुक्म दिया कि मुहम्मद अली शाह उसका बेटा अजमदअली शाह और उसके पोते वाजिदअली का बध कर दिया जाय। राजा बख़तावर सिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से मुहम्मदअली शाह के परिवार को छिपाया था। इतने में मड़िआवँ की छावनी लखनऊ से सेना आ गई थी । मुन्नाजान और बादशाह बेगम पकड़ लिये गये और मुहम्मद अली शाह तख्त पर बैठाये गये। मुहम्मदअली शाह ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट की और नानकार, गाँव माफ़ी और जागीर देकर उन्हें मेहदौना के राजा की पदवी दी। इसी समय बख़तावर सिंह को वह तलवार दी गई जिसे कि ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली के बादशाह मुहम्मदअली शाह को उपहार में दिया था और मुहम्मदशाह से नव्वाब सफ़दरजंग ने पाया था।
दोनों भाइयों ने 1500 गांवों की जमींदारी खरीदी :-
राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल कर लिए तब उनकी इच्छा हुई कि अब जमींदारी बढ़ानी चाहिए। दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बना लिया।उन्होंने इस दौरान अपने कुशल प्रबंधन से प्रजा को खुश रखा था।
मेहदौना खास एक रियासत बनी :-
यह अयोध्या जिले में एक गाँव रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से अवध के नवाबों और अयोध्या के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, जहाँ राजा बख्तावर सिंह और राजा दर्शनसिंह जैसे शासकों ने इलाका खरीदा और बाद में महाराजा मानसिंह जैसे प्रमुख हस्तियां इस क्षेत्र से जुड़ी रहीं, जो फैजाबाद के इतिहास और अयोध्या राजपरिवार के संदर्भ को दर्शाते हैं।
यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्कीपुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है । वर्तमान समय में यह दो राजस्व गांव के रूप में जानी जाती है।
मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना मिल्कीपुर ब्लॉक के बारुन बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह क्षेत्र स्थानीय जन जीवन ,व्यापार, इतिहास और सांस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है।
मेहदौना बारुन बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार या क्षेत्र है, यह बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या के निकट है।
शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :-
शाहगंज में बनवाई गई हवेली राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। समय के साथ यह खंडहर में बदल गई, पर लोगों के मन में राजा की धरोहर आज भी जीवित है। हवेली की दीवारों पर उकेरे गए नक्काशी और चित्र, राजा के गौरव और वीरता की गवाही देते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।
हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा की हवेली' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।
दर्शन सिंह सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख बने :-
ओरी पाठक के छोटे भाई दरसन सिंह समय लगभग (1800-1844 के दशक) में था ।अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें "बहादुर " के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए और राजा (राजा) की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।
शिवदीन डाकू का दमन :-
उन्हीं दिनों शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया गया और राजा को बहादुर का पद मिला। इसी तरह दोनों भाइयों की बादशाह नसीरुद्दीन के समय में उन्नति होती रही। उनकी वीरता, उनका दान, उनका न्याय और राज- विद्रोहियों (सर्कशों) का दमन संसार में प्रसिद्ध हुआ। इस अन्तिम काम के लिये उनको बादशाही से "सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर " की उपाधि मिली थी।
वैसवाड़े के नाज़िम :-
राजा दर्शनसिंह की वीरता बखान में इतिहास का यह अंश बहुत बढ़ गया। वे 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । वैसवाड़े के तालुकदार क्या बड़े क्या छोटे सरकारी जमा देना जानते ही न थे। उनका बल बहुत बढ़ा हुआ था और उनकी गढ़ियों पर तोपें चढ़ी रहती थीं।दर्शन सिंह ने कुछ बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों के नाम परवाने जारी किये जिनमें यह लिखा था कि अपनी भलाई चाहते हो तो तुरन्त उपस्थित होकर सरकारी जमा दाखिल करो।
ताल्लुकदारों ने परवाने पाकर युद्ध करने का निश्चय कर दिया। राजा दर्शनसिंह ने जब पहिले धावा मारकर मुरारमऊ की गढ़ी तोड़ी तो गढ़ी के रक्षक एक पगडण्डी के रास्ते निकल भागे। इस गढ़ी के टूटने से और ताल्लुकदारों के छक्के छूट गये। सब दर्शन सिंह के नियंत्रण में आ गया। पांच वर्षों तक वैसवाड़े के नाज़िम रहते हुए, राजा दर्शन सिंह ने अपने साहस और प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया।
बलरामपूर को नियंत्रित किया:-
वैसवाड़े की सफलता मिलने के बाद एक दिन राजा ने अपने सेनापतियों से कहा, "बलरामपुर की गढ़ियों पर हमला की योजना बनाओ। हमें यह साबित करना होगा कि अयोध्या की शक्ति केवल नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक है।" सेनापति ने डरते हुए उत्तर दिया, "साहब, वहां तीन हजार सिपाही हैं। यदि वे हमें घेर लें, तो...।"
राजा ने गंभीरता से देखा और कहा, "डर और संदेह की कोई जगह नहीं है। वीरता और बुद्धिमत्ता से हर मुश्किल का समाधान है। हमारे पास धर्म और न्याय का आशीर्वाद है।"
बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई के समय, राजा ने अपनी सेना को दिशा दी, एक-एक सिपाही की तरकीब और चालाकी से गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए।
बलरामपुर के ताल्लुकेदार राजा दिग्विजय सिंह जी सरकारी जमा नहीं देते थे। राजा दर्शनसिंह ने सेना समेत बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी। वहां के राजा गोरखपूर को भाग गये । जो दूसरे साल नेपाल की तराई होकर अपने देश को लौटना चाहते थे कि राजा दर्शनसिंह ने समाचार पाकर एक लम्बी दौड़ लगाई और राजा के डेरे पर धावा मार दिया। राजा अपना प्राण बचा कर भागे। उस दिन आने जाने में 45 कोस की दौड़ हुई। नैपाल के हाकिम गोसाई जयकृष्ण पुरी ने सीमा पार करके नेपाल राज में प्रवेश करने के लिये दर्शनसिंह की शिकायत नैपाल- दरबार मे की। नैपाल के रेज़िडेण्ट ने लखनऊ के रेजीडेण्ट को दर्शन सिंह के इस कृत्य की शिकायत लिख भेजी। बादशाही दरबार से जवाब लिया गया और यह निर्णय हुआ कि लूट पाट में नेपाल की प्रजा की जो हानि हुई है वह राजा दर्शन सिंह से दिलवा दिया जाय। राजा साहब ने हानि का रुपया 1453/-तुरन्त अदा कर दिया और फिर अपने काम पर बहाल हो गये। बादशाह अमजद अली शाह के अली शाह (शासन : 1842-1847) अवध के पांचवें नवाब थे, जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था।इस प्रकार 1842 में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। राजा साहब ने यहाँ तक इकरार नामा लिख दिया कि सरकारी जमा में जो कुछ बाक़ी रहेगा उसे हम दे देंगे।
अयोध्या-राज प्रासाद 1842 में :-
इसी समय में उनको कचहरी करने के लिये अयोध्या धाम का लालबाग़ क्षेत्र दे दिया गया जहाँ अयोध्या-राज का प्रासाद लगभग 20 एकड़ बिस्तार में अब तक विद्यमान है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में हो गया।1846 में बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी।
दर्शन सिंह के कुछ प्रमुख कार्य:-
उन्होंने हवेलियों, कुओं और सार्वजनिक बागानों घाटों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया था।
दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:-
धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। श्री दर्शनेश्वर नाथ महादेव राजसदन अयोध्या में शिवाला मन्दिर का निर्माण कराया। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि के प्रतीक बने।
दर्शन नगर बाजार और चार प्रवेश द्वार वाला प्राचीर का निर्माण:-
दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। राजा दर्शन सिंह के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा था।
दर्शननगर सूर्य कुंड व मंदिर का निर्माण:-
दर्शननगर बाजार के पास राजा दर्शन सिंह का बनाया हुआ सूर्य भगवान का सुन्दर सरोवर और मंदिर दर्शनीय है। वर्तमान काल में अयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर मेले की ब्यवस्था की देख भाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है।
जबकि सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।सरयू नदी के तट पर चारों ओर सीमेंट घाट और नागेश्वर नाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :-
राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का निर्माण कराया था। नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
अयोध्या शाकद्वीपी राजा ओरी पाठक 'बख्तावर सिंह' के पलिया और शाह गंज की दास्तान ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी
अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे । आज से लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार यहां के दफ़ादार, चौधरी , चकलेदार , रिसलदार, राजा और महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राज परिवार का आदि स्थान बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर - गोरखपुर, नन्दनगर - अमोढा -बस्ती, पलिया माफी - शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्या धाम हुआ करता है।
बिलासू से जुड़ाव :-
चेदि नरेश धृष्टकेतु ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है।अयोध्या के शाकवंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र - विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख मिलता है। उनके पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके अगले उत्तराधिकारी पुरन्दर राम पाठक वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।
मझवारीऔर नरहर से जुड़ाव :-
मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालकों को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे। यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।
नंद नगर बस्ती से जुड़ाव :-
शाकद्वीपीय राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।
अयोध्या के पलिया में हुआ था पड़ाव :-
सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते थे। पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं।
पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहबगंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण की ओर तथा मिल्कीपुर से 17 किमी. उत्तर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।ओरी पाठक राजा बख़तावर सिंह
1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय :-
मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के समय 1722 में सहादत अली खां प्रथम (1722 से 1739 ईस्वी ) को अवध का नवाब ए वजीर नियुक्त किया गया था। इसी समय से अवध एक स्वायत्त राज्य बन गया था। अवध के नवाब शुजाउद्दौला (5 अक्टूबर 1754 से 26 जनवरी 1775) ने फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाई थी । उस समय फैजाबाद व्यापार कला व संस्कृति का केंद्र बन गया था। उनके बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में यह राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर दिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुए। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था ।
गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा रहा:-
इस राजवंश के महाराजा ओरी पाठक राजा बख़तावर सिंह हुये। महाराजा साहब गर्ग गोत्र के थे और इनके पूर्व पुरुष गाजीपुर के बिलासू गाँव में रहते थे। यह गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है और राजा धृष्टकेतु से मिला था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला जाता है। इसी कारण महाराजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा है।
पूरा परिवार शासन में:-
पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी अपने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे।
लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय
हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' अनेक कवियों के आश्रयदाता थे। वे अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –
पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम
चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि।
पूर्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पुलिस सुरक्षाधिकारी
ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1798-1846 के आसपास का रहा। उन्होंने 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रिसाले (अश्व सेना)में नौकरी करने लगे थे और लार्ड कार्नवलिस के साथ कई लड़ाइयों में वीरता दिखाई थी। एक बार छुट्टी लेकर लखनऊ की सैर को आये हुए थे। जब वे बेलीगारद के सामने अपने एक मित्र से बात-चीत कर रहे थे कि उधर से अवध के नव्वाब सआदत अली खाँ (जन्म 1752, शासनकाल 21 जनवरी 1798 से 11 जुलाई 1814 ) की सवारी निकली हुई थी।ओरी बहुत अच्छे डील डौल के वीर पुरुष थे। नव्वाब साहब ने उनको बहुत पसन्द किया और चोबदार से बोले कि इस जवान से कहो कि हमारी सरकार में नौकरी करे।
ओरी ने उत्तर दिया कि हम आपकी सेवा करने में अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं परन्तु हम अंग्रेजी सरकार के नौकर हैं। नव्वाब साहब ने तुरन्त लखनऊ के रेजिडेण्ट डेली साहब को लिखा और ओरी को 8 सवारों का दफादार बना कर अपनी अर्दली में रक्खा। दफादार का अर्थ सेना या पुलिस में एक छोटा अधिकारी होता है, जो सिपाहियों के एक समूह का नेतृत्व करता है; यह जमादार या कॉर्पोरल/सार्जेंट के बराबर का पद है, जो "समूह का धारक" या "दफा (समूह/भाग) का प्रमुख" होता है, और यह पद भारतीय सेना में एक ऐतिहासिक रैंक को दर्शाता है।
पलिया जागीर और सौ अश्वारोहियों का अश्वपति :-
एक दिन नव्वाब साहब हवादार पर बाहर निकले थे। रास्ते में उन पर किसी ने तलवार चलाई। वह हवादार को तान में लगी। दूसरा वार फिर करना चाहता था कि वीर ओरी ने झपट कर उसको एक ऐसा हाथ मारा कि वह वहीं मर गया। इस पर नव्वाब साहब बहुत प्रसन्न हुये और ख़िलअत देकर पलिया उनकी जागीर कर दी और जमादारी का ओहदा देकर उनका सौ सवारों का अफसर बनाया।
घुड़सवार सेना का कमांडर :-
इसके कुछ ही दिन पीछे रिसालदार बना दिये गये।रिसालदार भारतीय और पाकिस्तानी सेना की घुड़सवार और बख्तरबंद इकाइयों में एक मध्य-स्तरीय कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी (JCO) का पद है। यह फारसी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ "रिसाला" (घुड़सवार सेना के दल या रेजिमेंट) का कमांडर या नेता होता है।उनका नाम ओरी से बदल कर बख्तावर सिंह कर दिया गया। बख्तावर का अर्थ है सौभाग्य लाने वाला, सौभाग्यशाली होता है।
राजा की उपाधि:-
नव्वाब सआदत अली खाँ के मरने पर जब ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह हुये तो उन्हें 1821 में बख्तावर सिंह को राजा की उपाधि मिली। उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया जो किसी दूसरे को प्राप्त न था।
बख्तावर सिंह की उपाधि :-
इसी उपाधि के बाद उन्हें राजा बख्तावर सिंह कहा जाने लगा। बख्तावर का मतलब सौभाग्य शाली होता है। इस प्रकार उनको अच्छे भविष्य की कामना पूर्ण नाम की सौगात शासन प्रशासन से मिली।बताया गया कि राजा बख्तावर सिंह कुशल सूझबूझ के एक अच्छे प्रबंधक और वीरता से परिपूर्ण सेना नायक थे।
पलिया के प्रथम शासक :-
इस कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह राजा पद आसीन होने का उल्लेख मिलता है। अयोध्या के वर्तमान राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के 'शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और समय समय पर उनके कार्यों में उच्चता को देखते हुए उनके ओहदे बढ़ाते गए । वर्तमान में इस गांव को 'राजा का पलिया' भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलिया माफी भी है जो ब्लाक और तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में स्थित है।
पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी मिल्कीपुर ब्लॉक और तहसील में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास और शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है। यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी को व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।
शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :-
हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा की हवेली' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।
यहाँ पर कई पुराने हिन्दू मन्दिर तथा एक मस्जिद है। यहाँ स्थित महल तथा किला को अयोध्या के राजाओं ते सम्बन्धित किया जाता है। राजा दर्शन सिंह के कब्जे में आने के बाद इस स्थान का महत्त्व और बढ़ गया। 1857 ई० के विद्रोह के समय राजा मान सिंह ने यहाँ यूरोपियों का स्वागत किया था। उस समय पह जिला अजेय माना जाता था । और उसके चारों ओर मिट्टी की सुदृढ़ रक्षा प्राचीर थीं। उसके ऊपर 14 तोपों का निर्माण हुआ था। इस स्थल का पुरातात्विक सर्वेक्षण करते समय इस स्थल से मिट्टी के अनेक पात्र प्राप्त हुए हैं। एक मृदभांड पर पोस्ट फायरिंग स्क्रैच डिजाइन बना हुआ है। कुछ पत्ते फैब्रिक वाले धूसर पात्र- परम्परा के वर्तन हैं। इन्हें एन.बी.पी.डब्लू . (उत्तरी काले चमकीले पात्र) कहा जाता है। इस संस्कृति को प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल से जोड़ा जा सकता है। इस स्थान पर अन्य पात्र मध्य काल तक की आबादी के प्रमाण मिले हैं।(सन्दर्भ: फैजाबाद जनपद का पुरातत्व: विजय प्रकाश वर्मा; डी. फिल. शोध प्रबन्ध,1993 ; पृष्ठ 104-105)
यह विशेष रूप से राजा बख्तियार सिंह और राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा स्थल है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने पलिया - मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं।यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण फैजाबाद रायबरेली रोड पर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित है। गांव के चारों तरफ हरे-भरे बाग बगीचे हैं और तालाब से घिरे हुए प्राकृतिक स्थल हैं।प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ग्राम सभा चारों तरफ से कि तालाब और बाग-बगीचे है।
प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ऐतिहासिक शिव मंदिर तथा कि ग्रामसभा के प्रवेश द्वार मां विंध्यवासिनी का मंदिर अपने अद्भुत और वैभवशाली झलक प्रस्तुत कर रहा है।यहां वर्तमान में एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र बचा हुआ है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है।
शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है। इसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज की हवेली 70 बीघे में बनी हुई है जो दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी ।
उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।भाई दर्शन सिंह को भी आगे बढ़ाया:-
अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। दर्शनसिंह ने भी अपने कुशल सैन्य क्षमता व प्रबंधन के चलते अवध दरबार में बहादुर का पद हासिल कर लिया। नवाब नसीरउद्दीन हैदर के काल 1827 से 1837 में दोनों ही भाइयों की उन्नति होती रही।
पलिया अयोध्या के राजा बख्तावर सिंह को अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह के शासनकाल के दौरान, लगभग 1837 से 1842 ईस्वी के बीच महदौना (मेहंदौना) की जागीर और 'राजा' की पदवी मिली थी। उन्होंने अपनी वीरता और प्रशासनिक क्षमता से इस रियासत को स्थापित किया और बाद में इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में राजा मान सिंह को सौंप दिया।
उस समय किसी कारण से राजा बख्तावर सिंह बादशाही में नजरबन्द हो गए थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर मान सिंह ने उन्हें भी छुड़ाया था और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये थे। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में राजा बख्तावर सिंह के जीवन काल में ही हो गया था। इधर राजा बख्तावर सिंह भी नि:संतान रहते हुए बूढ़े हो गये तो उन्होंने महाराजा मानसिंह को लखनऊ बुलाया और अपना पद, अपना राजा, उनके नाम लिख कर बादशाही सरकार में अर्ज़ी दे अपने भाई दर्शन सिंह के पुत्र राजा मान सिंह के हक में वसीयत नामा कर दिया था।उनकी अर्ज़ी मंजूर हो गई। वसीयत नामा के अनुसार उनकी मृत्यु के बाद मानसिंह को राजा के रूप में प्रतिष्ठित होना था। जब राजा बख्तावर सिंह की 1846 में मृत्यु हुई , तो मान सिंह अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन राज्य का प्रबन्ध संभाल लिए थे।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)