Tuesday, October 27, 2026

बस्ती जिले के कप्तानगंज विधानसभा (भाग 2)✍️डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुसार, ब्रिटिश भारत में 1936-37 की सर्दियों में प्रांतीय चुनाव हुए थे । ये चुनाव तत्कालीन सभी ग्यारह राज्यपाल प्रांतों - मद्रास , मध्य प्रांत , बिहार , उड़ीसा , संयुक्त प्रांत (U P) , बंबई , असम , उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत , बंगाल , पंजाब और सिंध में हुए। ब्रिटिश प्रांतों दिल्ली , अजमेर-मेवाड़ , कूर्ग और बलूचिस्तान तथा रियासतों में चुनाव नहीं हुए थे।चुनाव के अंतिम परिणाम 20 फरवरी 1937 को घोषित किए गए थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पांच प्रांतों - बंबई, मद्रास, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत, बिहार और उड़ीसा - में सत्ता में आ गई थी। पंजाब, सिंध (जहां उसे बहुमत नहीं मिला), असम और बंगाल (जहां वह फिर भी सबसे बड़ी पार्टी थी) इसके अपवाद थे। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग किसी भी प्रांत में अपने दम पर सरकार बनाने में असफल रही थी।

      आजादी के पूर्व 1937- 39 में वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र 'संयुक्त प्रांत' कहलाता था, जहाँ हुए प्रांतीय चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। कुल 228 सीटें थीं। इनमें हिन्दू की140 सीटें , (123 ग्रामीण,17 शहरी) और मुस्लिम की 64 सीटें, (51 ग्रामीण और 13 शहरी क्षेत्र) थीं। इसके अलावा 34 हिन्दू MLC (29 ग्रामीण 5 शहरी) 17 मुस्लिम (12 ग्रामीण और 5 शहरी) क्षेत्रों में भी चुनाव सम्पन्न हुए थे।कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल करते हुए लगभग 1586 सीटों में से 706 सीटें जीतीं और सात प्रांतीय सरकारें बनाईं थी। उसने संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, बंबई और मद्रास में सरकारें बनाईं। 

संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)

संयुक्त प्रांत की विधानसभा में कुल 228 सीटें थीं। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 133 या 134 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। बहुमत मिलने के बाद कांग्रेस ने यहाँ अपनी सरकार बनाई थी। 

गोविंद वल्लभ पंत संयुक्त प्रांत के पहले प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री के समकक्ष) बने।

गोविंद बल्लभ पंत एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थे, जो उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। पंत ने 17 जुलाई 1937 को संयुक्त प्रांत के प्रधान मंत्री (समकक्ष मुख्यमंत्री)के रूप में शपथ ली। उन्होंने गृह, वित्त, सामान्य प्रशासन और वन मंत्रालय का प्रभार भी संभाला। यह मंत्रालय 1939 तक चला जब ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में सभी कांग्रेस मंत्रालयों ने इस्तीफा दे दिया और प्रांतों को राज्यपाल शासन के अधीन कर दिया गया। कैलाश नाथ काटजू को कानून और न्याय मंत्री बनाया गया। रफी अहमद किदवई को वित्त विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। हालाँकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की कांग्रेस की मांगें पूरी नहीं हुईं, फिर भी भारत सरकार अधिनियम 1935 ने मताधिकार प्राप्त लोगों की संख्या में वृद्धि की, जो भारत के अवर सचिव लॉर्ड लोथियन की अध्यक्षता वाली 1932 की लोथियन समिति रिपोर्ट की सिफारिशों के साथ - साथ वायसराय के मंत्रिमंडल और प्रांतीय सरकारों की सिफारिशों पर आधारित थी। 

द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा के विरोध में देशी सरकार का इस्तीफा -

भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों से परामर्श किए बिना भारत को Viceroy Lord Linlithgow declared the country to be at war in World War II के फैसले के विरोध में अक्टूबर और नवंबर 1939 में कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया था।1945 में, ब्रिटिश लेबर सरकार ने प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए चुनाव का आदेशदिया।  कांग्रेस ने संयुक्त प्रांतों में 1946 के चुनावों में बहुमत जीता और पंत फिर से प्रीमियर बने। भारत की आजादी (1947) और संविधान लागू होने से पहले, ब्रिटिश काल में 1946 में संयुक्त प्रांत (यूनाइटेड प्रोविंस) की विधान परिषद/विधानसभा के लिए चुनाव हुए थे।


कप्तानगंज विधानसभा की विकास यात्रा:-

कप्तान गंज के बारे में अध्ययन करते समय देखा गया कि यह 1802 गोरखपुर के रूटलेज कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये। मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड की मदद ली। कप्तान माल्कोम मक्लोइड  ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के एक सैन्य अधिकारी थे। जिनका संबंध उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले और गोरखपुर क्षेत्र से था।उन्हें क्षेत्र में राजस्व (लगान) वसूली और कानून-व्यवस्था स्थापित करने के लिए जाना जाता है। गोरखपुर के पहले ब्रिटिश कलेक्टर 'रूटलेज' ने जब भूमि राजस्व की वसूली के लिए सख्त कदम उठाए, तो स्थानीय जमींदारों और जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। कलेक्टर के आदेशों को कड़ाई से लागू करने और राजस्व वसूलने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने ब्रिटिश सेना के साथ आगे बढ़कर प्रशासन की मदद की थी। इस सैन्य हस्तक्षेप के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर ही पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टनगंज' कहा जाने लगा।प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था।

1815 व 1816 ई. में जिले के सियारमार एक खानाबदोस जाति के लोगों ने लूटपाट करना शुरू कर दिया था। मई 1816 ई. में इस दल ने कैप्टनगंज से उस समय का 6,000 रूपया लूट लिया था। लूटपाट के लुकाछिपी का खेल 1857 ई तक पूरे जिले में चलता रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के 1857 के विद्रोह के समय पूरे देश में अंगे्रजों पर संकट के बादल मड़राने लगे थे। सभी अंग्रेज जान बचााकर भाग रहे थे। उन्हें व उनके परिवार पर संकट बरकरार था।  5 जून 1857 को पूर्वांचल में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह भड़क उठा था। 6 अंगे्रज भगोड़ों का एक दल नांव द्वारा अमोढ़ा होते हुए कप्तानगंज स्थित अंग्रेज कैप्टन के शरण में आया था। तहसीलदार ने उन्हें चेतावनी दिया था कि शीघ्र बस्ती छोड़ दें।

राजा सैयद हुसेन अली उर्फ मोहम्मद हसन उत्तर प्रदेश के बदायूं (सहसवान, काजी मोहल्ला) के मूल निवासी और स्वतंत्रता सेनानी थे, ने कर्नल लेनाक्स ,उनकी पत्नी तथा बेटी को अपनी संरक्षा में ले रखा था। बाद में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर पेप्पी ने इन्हें भी मुक्त कराया था। 12 अगस्त 1857 को मोहम्मद हसन के नेतृत्व में बागियों ने कैप्टनगंज को अपने अधीन कर रखा था।

कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती तहसील मुख्यालय को 6 मई 1865 में जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरियागंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। 1865 में यहां तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। बाद में अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था ।फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। इसके बाद इसे विकास खण्ड के रूप में अपनी विकास यात्रा जारी रखना पड़ा।

यह क्षेत्र विधान सभा के रूप में पहले भी नहीं था।1937 से 1969 तक यह क्षेत्र कभी यह बस्ती पूर्वोत्तर/ दक्षिण- पूर्व) कभी कप्तानगंज (पूर्वी)-कम-बस्ती (पश्चिम), कभी हर्रेया पूर्व-बस्ती पश्चिम, कभी 'कप्तानगंज (उत्तर) सह नगर पूर्व’ कभी बहादुरपुर कभी नगर आदि विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा। बाद में 1974 से स्वतंत्र कप्तानगंज क्षेत्र के रूप यह अपना पहचान बना पाया जिसमें ,गौर और दुबौलिया ब्लाक भी पूर्णतः या आंशिक रूप से समलित हुए हैं।


प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक:-

1937- रामचरित्र पांडेय (कांग्रेस)-

बस्ती जनपद में राजनीति की शुरुआत स्वतंत्रता के बाद राम चरित्र पांडेय और देशराज नारंग से होती है। दोनों बड़ी हस्तियां थीं। रामचरित्र पांडेय जहां कांग्रेस के बड़े नेता थे वहीं ,’महंत गोकुल चन्द नारंग’ देशराज नारंग औद्योगिक घराने से संबंध रखते थे। ऐतिहासिक अभिलेख 'The Indian Year Book 1937-38' के अनुसार, इस चुनाव में महंत (या सर) गोकुल चंद नारंग ने बस्ती जिला (पूर्वोत्तर/दक्षिण-पूर्व) और आस- पास के क्षेत्रों से प्रमुखता से भाग लिया और अपनी राजनीतिक वसामाजिक उपस्थिति दर्ज कराई थी। नारंग उद्योग समूह और इस औद्योगिक घराने की स्थापना का श्रेय डॉ. सर गोकुल चंद नारंग को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1908 के आसपास इस औद्योगिक साम्राज्य की शुरुआत की थी। डॉ. सर गोकुल चंद नारंग अविभाजित पंजाब अब पाकिस्तान के एक बेहद विद्वान व्यक्ति, वकील और ब्रिटिश काल के मंत्री थे। उनके नेतृत्व में नारंग परिवार ने देश में चीनी मिलों आसवनी और वाइनरी के क्षेत्र में कदम रखा। 

बड़े उद्योगपतियों में शुमार देशराज नारंग ने बस्ती को अपना कार्य क्षेत्र चुना था। यहां औद्योगिक क्रांति का बीज उन्होंने ही बोया था। जिला मुख्यालय पर रेलवे स्टेशन के निकट नारंग चीनी मिल की स्थापना की। इसकी दूसरी शाखा दस किमी दूर वाल्टरगंज बाजार के निकट वर्ष 1932 में स्थापित की। इस प्रबंधन ने अपनी तीसरी नई इकाई अठदमा रुधौली में भी स्थापित कर दी थी । ये चीनी मिलें तब उद्योग का हब मानी जाती थीं।  इन मिलों से उत्पादित चीनी, गुणवत्ता के मामले में अव्वल मानी जाती रही।

राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक बेहद कद्दावर और ऐतिहासिक कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने जिले की शुरुआती राजनीति की दिशा तय की थी। वे मूल रूप से बस्ती जिले के हरैया तहसील अंतर्गत 'बेलभरिया राम गुलाम' गांव के रहने वाले थे। उनके पिता जी का नाम श्री परमेश्वर दत्त था। पाण्डेय जी व्यक्तिगत सत्याग्रह में ब्रिटिश सरकार द्वारा 14 सितंबर 1940 को साढ़े चार माह की सजा काट चुके हैं। (संदर्भ: श्री चन्द्र बली मिश्र कृत -"बस्ती वसुधा", पृष्ठ -106)। वह बेहद साधारण पृष्ठभूमि के एक जनप्रिय नेता थे। उस जमाने के जानेमाने उद्योगपति  देशराज नारंग भी चुनाव लड़े थे। एक तरफ धनपति दो दूसरी तरफ एक धनहीन जमीन से जुड़ा नेता था। क्षेत्रीय बुजुर्ग बताते है की लाख प्रयास और चुनाव मे पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी देशराज नारंग चुनाव हार गए थे।

उनकी उद्योगपति देशराज नारंग के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से मानी जाती है। उन्होंने एक बड़े ऐतिहासिक और चर्चित चुनाव में देशराज नारंग के परिवार से जुड़े बड़े औद्योगिक घराने के " गोकुल चंद नारंग" को चुनाव में पराजित किया था। वह अपने समय में बस्ती में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे।वर्तमान में भारत सरकार के अमृत सरोवर अभियान के तहत उनके गृह ग्राम 'बेलभरिया राम गुलाम' में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए "स्वर्गीय पंडित राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमृत सरोवर" का निर्माण किया गया है। 

1946 का प्रांतीय विधानसभा चुनाव -

आजादी से ठीक पहले जनवरी 1946 में उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रांत  में प्रांतीय विधानसभा के चुनाव हुए थे। कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में शानदार जीत हासिल की और अपना बहुमत साबित किया। मुस्लिम लीग ने भी मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर काफी सीटें जीतीं।

1946- राधेश्याम शर्मा (कांग्रेस)

1946 के संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज (पूर्वी)-कम-बस्ती (पश्चिम) विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार राधेश्याम शर्मा विधायक चुने गए थे। उनका मूल निवास पुरानी बस्ती के ओरियाना टोला / पांडे बाजार के समीप का क्षेत्र था। 

   राधेश्याम शर्मा के विरुद्ध हिंदू महासभा के प्रत्याशी दिग्विजय नाथ (गोरखनाथ पीठ के तत्कालीन महंत) को उतारा गया था। चुनावों में हिस्सा लेने के लिए अखिल भारतीय हिंदू महासभा के टिकट पर पर्चा जरूर भरा था, लेकिन उनका नामांकन पत्र अंग्रेज सरकार द्वारा खारिज हो गया था, जिसके कारण वे उस वर्ष का चुनाव लड़ ही नहीं सके थे। दिग्विजयनाथ 1934 में गोरखनाथ मंदिर के महंत बने थे, और उन्हीं के बाद से यह मठ कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का केन्द्र बना. दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे।1939 में सभी पंथों, मंदिरों, मठों और साधु- संन्यासियों को एकजुट करने के लिए ‘अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा’ का गठन किया गया था। दिग्विजय नाथ आजीवन इस संस्था के अध्यक्ष रहे। महात्मा गांधी के 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी महंत दिग्विजय नाथ काफी सक्रिय रहे।उनके ख़िलाफ़ अंग्रेज़ सरकार ने वारंट भी जारी किया था। महंत दिग्विजय नाथ ने 1944 में गोरखपुर में हिन्दू महासभा का आयोजन भी किया था । उनका नामांकन पत्र खारिज हो गया और वे चुनाव नहीं लड़ सके थे। इस प्रकार राधेश्याम शर्मा की जीत और आसान हो गई थी।1946 के इन प्रांतीय चुनावों के विजेताओं ने ही आगे चलकर भारत की संविधान सभा के सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया था।

1951-52 में आजादी के बाद प्रथम विधान सभा -

आजादी के बाद भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। 1951-52 में हुए देश के पहले आम चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में पहली निर्वाचित विधानसभा का गठन हुआ, जिसने प्रदेश की लोकतांत्रिक राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत की। 1952 के चुनाव में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 430 सीटों के लिए चुनाव हुआ था।कुल 347 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव कराया गया था। इनमें 264 एक-सदस्यीय और 83 दो-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे।चुनाव में कुल 2,604 उम्मीदवार मैदान में थे।चुनाव में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और 388 सीटें जीतीं थीं । सोशलिस्ट पार्टी को 20 सीटें मिलीं थीं। बाकी सीटों पर अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थीं ।चुनाव के बाद गोविंद बल्लभ पंत ने मुख्यमंत्री के रूप में सरकार का नेतृत्व किया था।

1952- कृपाशंकर श्रीवास्तव, कांग्रेस-

वर्ष 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाले हर्रैया पूर्व- बस्ती पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था।1952 में देश और उत्तर प्रदेश के पहले आम चुनावों के दौरान हर्रैया पूर्व (बस्ती पश्चिम) एक दोहरे सदस्य वाले निर्वाचन क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में था। इस ऐतिहासिक चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) ने सामान्य वर्ग से जीत हासिल की थी।

1952- राम लाल, कांग्रेस -

भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 288 - बस्‍ती (पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया था। वे 1952- 57 के प्रथम विधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार राम गरीब को हराया था।

1952- प्रभु दयाल विद्यार्थी ,कांग्रेस -  

वर्ष 1952 में यह दो सदस्यीय सीट थी, जहाँ से कांग्रेस के ही प्रभुदयाल विद्यार्थी भी दूसरे विधायक बस्ती पश्चिम से चुने गए थे। 

1952-शिव नारायण, कांग्रेस -

वे हर्रैया पूर्व कम बस्ती पश्चिम के विधायक थे। उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 293 - हरैया (पूर्व) बस्‍ती (पश्चिम) विधान सभानिर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। 

1957- कृपाशंकर , कांग्रेस -

कृपा शंकर 1957 का द्वितीय विधानसभा  चुनाव में भी उन्होंने इस क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पकड़ मजबूत रखी और  विधायक के पुनः चुने गए। बस्ती जिले के बस्तीपूर्व /'नगर' विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की ओर से चुनाव जीतकर विधायक चुने गए थे। नगर (Nagar) विधानसभा सीट (यह उस समय एक द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था, जहां से दो विधायक चुने जाते थे)। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 1957 के चुनाव में उन्हें 41,741 वोट मिले थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार शकुंतला नायर को हराया था।1957 के चुनावों के दौरान यह बस्ती जिले के अंतर्गत बस्ती पूर्व विधान सभा सीट (वर्तमान में महादेवा/बस्ती निर्वाचन क्षेत्र के नाम से प्रभावित) के रूप में जानी जाती थी। 

1962- शकुंतला नैय्यर (जनसंघ)-

शकुंतला नैय्यर (नायर) ने 1962 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 'भारतीय जनसंघ' पार्टी के टिकट पर बस्ती जिले के 'नगर’ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उन्होंने कुल 17,352 वोट (38.56% मत प्रतिशत) हासिल किए और कांग्रेस के उम्मीदवार राम शंकर लाल को 1,931 वोटों के अंतर से हराया था।

1967- रामलखन सिंह  (कांग्रेस)-

रामलखन सिंह वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश की बहादुरपुर (कप्तानगंज) विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने थे। रामलखन सिंह मूल रूप से बस्ती जिले के महुआडाबर के निवासी थे।उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार डी. बी. पाल को हराया था। इसके बाद राम लखन सिंह ने 1969,1974 के विधानसभा चुनाव में भी यहाँ से दोबारा विधायक चुने गए थे।

1969- रामलखन सिंह (कांग्रेस)- 1969 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहादुरपुर (बस्ती) सीट से कांग्रेस उम्मीदवार रामलखन सिंह ने भारतीय क्रांति दल के उम्मीदवार कृष्ण कुमार पाल को हराया था। इसके ठीक दो साल बाद 1969 में फिर से विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में भी रामलखन सिंह को जीत मिली थी। 

1974- रामलखन सिंह (कांग्रेस)-

कप्तानगंज विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1974 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले इस क्षेत्र के हिस्से मुख्य रूप से 'बस्ती नगर' और 'हर्रैया पूर्व' विधानसभा सीटों के अंतर्गत आते थे। इस सीट से पहले विधायक राम लखन बने थे, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में जीत हासिल की थी।

जातीय समीकरण

कप्तानगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC), कुर्मी और ब्राह्मण आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो लगभग 21% हैं। इसके बाद कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% और ब्राह्मण मतदाताओं की करीब 13% है, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग 12% हैं। वहीं यादव मतदाताओं की संख्या करीब 7%, ठाकुर मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 6%, राजभर मतदाता करीब 4%, मौर्या मतदाता लगभग 3% और बनिया मतदाता करीब 3% हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं। 

1974: कांग्रेस ने मारी बाजी

1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम लखन विजयी हुए। उन्होंने नेशनल कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन (NCO) के जितेंद्र सिंह को 12,242 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम लखन को 22,352 वोट मिले, जबकि जितेंद्र सिंह को 10,110 वोट मिले ।

आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव

1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। 

सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।

1977: पहली बार जनता पार्टी के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह ने जीता चुनाव

1977 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी (JNP) के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम लखन को 15,170 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह को 33,811 वोट मिले, जबकि राम लखन को 18,641 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी तेज बहादुर रहे, जिन्हें चुनाव में 3,801 वोट मिले।

1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार ओम प्रकाश उर्फ राम मिलन सिंह ने चुनाव जीता था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( के प्रत्याशी राम लखन सिंह को हराया था।


राजनीतिक अस्थिरता का समय

हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधान सभाओं को फिर भंग कर दिया गया।

विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। 


1980 का चुनाव अंबिका सिंह (कांग्रेस)-

1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) के अंबिका सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के सत्या राम को 6,479 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अंबिका सिंह को 23,091 वोट मिले, जबकि सताया राम को 16,612 वोट मिले। इस प्रकार कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार अंबिका सिंह ने जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार सत्या राम को हराया था।


1985- अंबिका सिंह (कांग्रेस) ने दोहराई जीत

इस चुनाव में भी कांग्रेस की अंबिका सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में उन्होंने लोकदल के राम प्रसाद चौधरी को 6,276 वोटों से हराया। इससे पहले 1980 के चुनाव में भी कांग्रेस (आई) के टिकट पर उन्होंने जनता पार्टी  के उम्मीदवार सत्या राम को हराया था।


1989 और 1991 में निर्दलीय कृष्ण किंकर सिंह ने मारी बाजी

वहीं 1989 और 1991 के चुनाव की बात करे तो, निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह विजयी हुए। 1989 के चुनाव में कृष्ण किंकर सिंह ने जनता दल के सुखपाल पांडे को 27,992 वोटों से हराया, जबकि 1991 के चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के राम प्रसाद चौधरी को 15,304 वोटों से हराया।

राना कृष्ण किकर सिंह का राजनैतिक सफर 

बस्ती के राना कृष्ण किकर सिंह ने राजनीतिक सफर वर्ष 1977 में एपीएन कालेज के छात्र संघ अध्यक्ष से की। इसके बाद वह प्रधान चुने गए। वर्ष 1983 और 1988 में बहादुरपुर के ब्लाक प्रमुख रहे। वर्ष 1989 और 1991 में कप्तानगंज विधान सभा सीट से निर्दल विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 1995 में जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने। पिछले चुनाव में वह कप्तानगंज सीट से कांग्रेस से लड़े थे और हार गए। राणा कृष्ण किंकर सिंह और उनके सुपुत्र राणा नागेश प्रताप सिंह अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा की सदस्यता ग्रहण की. अभी कुछ ही दिन पूर्व विधायक ने अपने समर्थकों के साथ बसपा का दामन थामा था लेकिन भाजपा की जनकल्याणकारी नीतियों से प्रभावित होकर और प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों से प्रभावित होकर पूर्व विधायक राणा कृष्ण किंकर सिंह और नागेश प्रताप सिंह ने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया।

1991- कृष्ण किंकर सिंह (निर्दल)-

वर्ष 1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से निर्दलीय विजेता राना कृष्ण किंकर सिंह ने समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1989 और 1991 में लगातार दो बार यहां से निर्दलीय प्रत्याशी राणा कृष्ण किंकर सिंह जीते थे।


1993- राम प्रसाद चौधरी ,पहली बार जीती सपा- 

1993 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीतला को 33,848 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राम प्रसाद चौधरी को 55,755 वोट मिले, जबकि शीतला को 21,907 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कृष्ण किंकर रहे, जिन्हें चुनाव में 20,744 वोट मिले।


1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से।कुर्मी बिरादरी में उन्हें "कुर्मी क्षत्रप" की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं। वर्ष 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार शीतला को हराया था।

1996- राम प्रसाद चौधरी (बसपा) की एंट्री कराए-

1993 के चुनावों के बाद राम प्रसाद चौधरी बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए और 1996 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। उन्होंने  बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था और समाजवादी पार्टी  के उम्मीदवार महेश सिंह को हराया था।

2002- राम प्रसाद चौधरी (भाजपा)-

इस चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज सीट से पाला बदलकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के महेश सिंह को 4,019 वोटों से हराया।

2007- राम प्रसाद चौधरी (बसपा) -

वर्ष 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से पुनः पाला बदलते हुए बहुजन समाज पार्टी से टिकट लेकर राम प्रसाद चौधरी ने निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह राणा को हराया था।

2012- राम प्रसाद चौधरी (बसपा)-

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार त्रयम्बक नाथ त्रिपाठी को हराया था।

राम प्रसाद चौधरी के कार्य -

राम प्रसाद चौधरी कप्तानगंज विधान सभा सीट से 5 बार विधायक रह चुके हैं और तीन बार यूपी सरकार में उन्हे मंत्री का पद भी मिला था।रामप्रसाद चौधरी की पिछड़ी जाति के वोटरों में अच्छी खासी पकड़ हैं, इसलिए कुर्मी वोटरों के वे क्षत्रप नेता भी माने जाते हैं। कृषि महाविद्यालय की स्थापना पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी के द्वारा ही लाया गया था। इसके अलावा मानपुर माझा पर पुल, पंडुल घाट पुल, परखट्टी पूल, दुबौलिया ब्लॉक का गठन और भवन निर्माण सहित कई सड़कों का भी निर्माण कराया था। इसके बाद भी कप्तानगंज विकास के रेस में काफी पीछे छूट गया। रोजगार की दिशा में पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी ने कुछ काम नहीं किया, जिसका खामियाजा उन्हें वर्ष 2017 के विधानसभा में झेलना पड़ा।

2017- सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल बीजेपी-

2017 के विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल ने जीत दर्ज की थी और उन्होंने बहुजन समाज पार्टी  के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से। कुर्मी बिरादरी में उन्हें "कुर्मी क्षत्रप" की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं । 2017 में यह लंबा दबदबा टूट गया । भाजपा के चंद्र प्रकाश शुक्ला ने जीत दर्ज कर सीट पर पहली बार कमल खिलाया।

2022- काविंद्र चौधरी सपा -

2022 के विधानसभा चुनाव में कप्तान गंज सीट कुर्मी बिरादरी की सियासत के लिए जिले भर में खास पहचान रखती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने मौजूदा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला पर फिर भरोसा जताया था।उनके सामने सपा ने काविंद्र चौधरी को उतारा था।कांग्रेस से अंबिका सिंह और बसपा से जहीर अहमद भी मैदान में थे।दिलचस्प बात यह रही कि पूरे बस्ती जिले में सबसे ज्यादा मतदान इसी सीट पर हुआ था ,करीब 59.09 प्रतिशत, जो जिले की बाकी चारों सीटों से आगे था। पांच साल पहले 2017 में जिस सीट पर भाजपा ने पहली बार खाता खोला था, वहां सिर्फ एक ही कार्यकाल के बाद सत्ता पलट गई। साथ ही यह उस "कुर्मी क्षत्रप" राजनीतिक विरासत की भी वापसी मानी गई, जिस पर दशकों तक रामप्रसाद चौधरी के परिवार का असर रहा है।


2027- सबसे सशक्त वर्तमान विधायक कविंद्र चौधरी अतुल जी -

कविंद्र चौधरी (अतुल) उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की 308-कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के वर्तमान विधायक हैं।वह वरिष्ठ नेता राम प्रसाद चौधरी के पुत्र हैं और उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

विधायक निधि से विभिन्न गांव और चौराहों को मुख्य मार्ग से जोड़ने की बात हो या छोटी-छोटी आबादी को कीचड़, गंदगी और जल जमाव से निजात दिलाने का प्रयास। विधायक ने अपने अब तक के कार्यकाल में अपनी निधि से यह छोटे-छोटे निरंतर प्रयास किए हैं।बहुत सारी जगह पर न सिर्फ छोटी सड़कों के निर्माण से लोगों को आवागमन में राहत मिली है, बल्कि अन्य कार्यों से भी लोग प्रभावित रहे हैं। आरसीसी, खड़ंजा, इंटरलाकिंग हाई मास्ट लाइट के साथ महापुरुषों की स्मृतियों में सहेजने में भी अपने मद का सदुपयोग किए हैं। बड़ी संख्या में पूरे विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख चौराहों और स्थलों पर विभिन्न महापुरुषों को आमजन की यादों में जीवित रहने का कार्य किया गया है। विधायक कविंद्र चौधरी अतुल ने अपने स्वभाव और छवि को कभी नकारात्मक और विवादित नहीं बनने दिया।धार्मिक स्थलों के विकास के लिए भी प्रयास किया। कैंसर पीड़ित के उपचार में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करते हुए पांच लाख रुपए की सहायता उपलब्ध कराई। वर्ष 2023- 24 में पांच करोड़ की लागत से 44 विभिन्न सड़क, स्मृति द्वार, सीसी रोड, नाली निर्माण सहित अन्य प्रमुख कार्य करवाए गए।

2027 में भाजपा के लिए सबसे कठिन विधानसभा सीट कप्तानगंज -

कप्तानगंज में सपा के मौजूदा विधायक अतुल चौधरी (कविंद्र चौधरी) रामप्रसाद चौधरी के बेटे हैं। रामप्रसाद चौधरी यहां पहले कई बार विधायक रह चुके हैं और अब बस्ती लोकसभा से सांसद हैं। कुर्मी समाज में उनकी मजबूत पकड़ है। 2022 में अतुल चौधरी ने भाजपा के सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला को करीब 24 हजार वोटों से हराया था। आज जब सपा-भाजपा की सीधी टक्कर हो रही है और त्रिकोणीय मुकाबला नहीं दिख रहा, तो पिछड़ा- दलित- अल्पसंख्यक का माहौल और भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।दलित, कुर्मी और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। ऐसे में सिर्फ हवा-हवाई या नाम की ताकत से जीत मुश्किल है। प्रत्याशी को बूथ-बूथ पर संगठन मजबूत करना होगा, गैर-कुर्मी ओबीसी, ब्राह्मण और दलित वोटों को एकजुट करने की ठोस रणनीति बनानी होगी तथा स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहना होगा।



2027 के भाजपा के कुछ संभावित प्रत्याशी -

1.सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला भाजपा के सबसे सशक्त पूर्व विधायक -

चंद्र प्रकाश शुक्ला  एक भारतीय राजनीतिज्ञ और उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य  रहे हैं । वे उत्तर प्रदेश के कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। शुक्ला उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं।2017 से वे कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किए हैं और भाजपा के सदस्य हैं। 2017 के चुनावों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को 6,827 वोटों के अंतर से हराया था । वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जीते भाजपा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला ने कप्तानगंज को नगर पंचायत का दर्जा दिलाने  में सफल रहे। कस्बे को जलजमाव से मुक्त कराने और पिपरौल घाट पर पुल बनवाने का वादा पूरा किया। राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे विधानसभा क्षेत्र में ट्रामा सेंटर अभी भी आश्वासन की श्रेणी में ही है।कुछ वादे पूरे हुए हैं लेकिन सड़क शिक्षा पानी और बेरोजगारी के मुद्दे पर जनता के सवाल अभी भी मुखर हैं। कप्तानगंज दुबौलिया मार्ग पर वायरलेस चौराहे तक 1 किलोमीटर दोनों तरफ नाली व सीसी रोड बन जाने से जलजमाव से फिलहाल मुक्ति मिली, इसके साथ पिपरौल घाट पर पुल बनने से भटहा नारायणपुर सरवरिया सहित दर्जनों गांव के लोगों की राह आसान हो गई। 930 करोड़ की लागत से भाव फ्री विद्युत उप केंद्र पिपरौल घाट, सर्विया 1270 के पुलों का निर्माण 50 करोड़ से, बभनान गौरव एरिया मार्ग का निर्माण 23 करोड़ से, कप्तानगंज- दुबौलिया  और मार्ग 15 करोड़ से, डिलीट से कप्तानगंज 21 करोड़ की लागत से दुगोला पचपेड़वा 6:30 करोड़ की लागत से बना है। इसके अलावा पैकोलिया- शिवा घाट मार्ग का निर्माण सहित 150 करोड़ से 200 छोटी सड़कें पूर्वांचल विकास निधि और विधायक के 9 करोड रुपये से कई अन्य विकास के कार्य कराया गया है । इसके अलावा 125 करोड़ से कटाया चांदपुर गौरा तटबंध का काम 500 से ज्यादा लोगों को चिकित्सा सुविधा के लिए धनराशि और दुबौलिया में रंगशाला बनवाया गया है। सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला ने विभिन्न गांवों में जनसंपर्क कर लोगों से जुड़े रहे हैं। इस दौरान उन्होंने शोकाकुल परिवारों से मुलाकात करते रहते हैं, बीमार लोगों का हाल चाल जानते रहते रहे हैं। बिजली और स्वास्थ्य समस्या पर अधिकारियों से तत्काल बात भी कर निदान कराते रहे हैं। जमीनी स्तर पर कप्तान गंज में अगर कोई काम किया है तो सीए चंद्रप्रकाश शुक्ला जी हैं।

2.राणा दिनेश प्रताप सिंह-

राना दिनेश प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक प्रमुख भाजपा नेता, समाजसेवी और उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के प्रदेश अध्यक्ष हैं।वह बहादुरपुर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख हैं। उनकी पत्नी नीलम सिंह राणा नगर पंचायत नगर (बस्ती बाजार) की चेयरमैन हैं, और वह उनके कार्यों में भी सहयोग करते हैं।उन्होंने दिसंबर 2021 में लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालय में औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी  की सदस्यता ली थी। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंचायती राज और सामाजिक विकास के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

3.राणा नागेश प्रताप सिंह -

नगर थाने के रानीपुर  बेलाड़ी निवासी पूर्व विधायक राना कृष्ण किंकर सिंह के बेटे और भाजपा नेता राना नागेश प्रताप सिंह भाजपा के एक नामचीन उम्मीदवार हैं। वे विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक, समाज सेवी और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं।दो वर्ष पूर्व 24/25 सितम्बर 2024 को बस्ती जिले के बहुचर्चित शक्ति सिंह हत्याकांड में वांछित आरोपी भाजपा नेता नागेश प्रताप सिंह ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया। जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है। इस समय भी वे जेल में हैं।

4.डॉ.ममता पांडे -

प्रदेश महिला मोर्चा की टीम में बस्ती के हर्रैया विधानसभा क्षेत्र की डॉक्टर ममता पांडेय को प्रदेश मंत्री बनाया गया है। वह हर्रैया से 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। वह पिछले विधानसभा चुनाव में भी टिकट की दावेदार थी। महिला मोर्चा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने से कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर है।

डॉ. ममता पांडे उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की हर्रैया और कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी एक सक्रिय भारतीय जनता पार्टी की नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कप्तानगंज विधानसभा संख्या 308 और हर्रैया, जिला बस्ती, उनका प्रिय क्षेत्र रहा है । ममता जी आर्थिक रूप से सबसे दमदार प्रत्याशी हैं।

 5.दिग्विजय सिंह राणा -

दिग्विजय सिंह राना उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक वरिष्ठ भाजपा नेता, हिन्दू विश्व महासंघ के प्रदेश महामंत्री और जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि हैं। उन्होंने देश में जनसंख्या वृद्धि पर चिंता जताते हुए एक सशक्त जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग की है और इस संबंध में राष्ट्रपति को ज्ञापन भी भेजा है। इसके अलावा वे स्थानीय स्तर पर पार्टी के संगठनात्मक कार्यक्रमों और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

6.गणेश नारायण मिश्रा -

गणेश नारायण मिश्रा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उत्तर प्रदेश के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हैं। वे प्रदेश भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भी हैं। वह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बस्ती और कप्तानगंज क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। वह पार्टी के कार्यक्रमों, सामाजिक कार्यों और संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

 7. उमाशंकर पटवा जी -

पटवा जी मुस्लिम का भी वोट पा सकते हैं निषाद का पूरा वोट पा सकते हैं। सारी बिरादरियों का वोट पा सकते हैं पटवा जी ऐसे नेता हैं जो सभी जातियों का वोट पा सकते हैं। सपा के प्रत्याशी डर रहे हैं कहीं पटवा जी  को भाजपा से टिकट मिल गया तो सपा को हारना निश्चित है।बनिया समाज पूरा पटवा के साथ रहेगा।

8..ब्रह्मदेव यादव देवा-

भारतीय जनता पार्टी ने जनपद बस्ती में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करते हुए वरिष्ठ नेता ब्रह्मदेव यादव ‘देवा’ को जिला उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी है। इससे पहले पिछड़ा वर्ग के जिलाध्यक्ष के रूप में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। वे पूर्व ब्लॉक प्रमुख और वर्तमान जिला पंचायत सदस्य भी हैं।पिछड़ा वर्ग के जिलाध्यक्ष रहते हुए ब्रह्मदेव यादव ने संगठन को मजबूती प्रदान की थी। उनकी रणनीतिक सोच और जनसंपर्क क्षमता से जिले में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और अधिक सशक्त होने की उम्मीद जताई जा रही है।

9.जटा शंकर शुक्ल-

जटाशंकर शुक्ल उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में भारतीय जनता पार्टी के एक सक्रिय नेता और कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र (308) से जुड़े प्रमुख राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।वह गौर ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि और क्षेत्र के सामाजिक व राजनीतिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे  हैं।


10.विवेकानंद मिश्र-

विवेकानंद मिश्र वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के बस्ती जिले के जिलाध्यक्ष हैं। वे लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से लेकर भाजपा जिला महामंत्री और अन्य संगठनात्मक पदों पर कार्य कर चुके हैं। उन्हें पार्टी संगठन में उनके 20 साल के अनुभव के लिए जाना जाता है।


11.इंजीनियर वीरेंद्र कुमार मिश्र -

इंजीनियर वीरेंद्र कुमार मिश्र बस्ती जिले के कप्तानगंज क्षेत्र के एक सक्रिय भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता और विशिष्ट पदाधिकारी हैं।स्थानीय स्तर पर पार्टी के कार्यक्रमों (जैसे तिरंगा यात्रा व अन्य सामाजिक-राजनीतिक आयोजनों) में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।

12.रमा कांत पांडेय 

रमाकांत पांडेय भारतीय जनता पार्टी के एक स्थानीय नेता हैं, जो कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र (बस्ती/गोरखपुर क्षेत्र) में सक्रिय हैं। वह क्षेत्र में जनसुनवाई और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं। विधान सभा कप्तानगंज (308, बस्ती) में उन्होंने हमेशा क्षेत्र की जनता के लिए पूरी निष्ठा से काम किया है। 2017 और 2022 में भले टिकट न मिला हो, लेकिन  सेवा और समर्पण में वे कभी नहीं रुके। अब 2027 की तैयारी के साथ वह फिर मैदान में हैं, भारतीय जनता पार्टी के लिए 24 घंटे तत्पर हैं। 

13.विपिन कुमार त्रिपाठी

विपिन कुमार त्रिपाठी बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के एक स्थानीय नेता और संभावित/ भावी उम्मीदवार के रूप में सक्रिय हैं।

14.नीतीश पांडेय मन्नू -

नीतीश पांडेय 'मन्नू' उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से जुड़े भारतीय जनता पार्टी  के एक युवा नेता और सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। 

15.वैभव पांडेय -

पूर्व जिला उपाध्यक्ष भाजपा बस्ती श्री वैभव पाण्डेय जी को भारतीय जनता पार्टी गोरखपुर क्षेत्र का क्षेत्रीय मंत्री नियुक्त किया गया है।

16.विनोद चौधरी

कप्तानगंज, बस्ती (विधानसभा संख्या 308): इस क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर विनोद चौधरी सक्रिय हैं, जो भाजपा जिला कार्य समिति के सदस्य हैं और जिन्हें स्थानीय समर्थकों द्वारा भावी प्रत्याशी के रूप में देखा जाता है। वे पूर्व जिला पंचायत सदस्य भी रहे और नगर पंचायत कप्तान गंज बस्ती के अध्यक्ष पद पर चुनाव भी लड़ चुके हैं।

क्षेत्र का समुचित विकास ना होते हुए भी जातीय समीकरण हावी -

30/35 वर्ष से कोई अगर राम प्रसाद चौधरी से कप्तानगंज से नहीं लड़ पा रहा है तो उसका भी कारण है। जब चुनाव आता है तब सब नेता लड़ने तो पार्टियों के भरोसे तो लड़ते है मगर अगर 5 वर्ष मेहनत से क्षेत्र में रहे तो कोई बड़ी बात नहीं हटाने में । यहां प्रायः अधिकांश नेता पैराशूट से आते है चुनाव जीतना चाहते हैं, फिर जीतना ख्वाब ही रह जाता है । कप्तानगंज पिछड़ा बाहुल्य इलाका माना जाता है।विकास के मामलों में यह इलाका अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।कप्तानगंज विधानसभा सीट पर पूर्वांचल के छात्र नेता और पूर्व मंत्री सपा के राष्ट्रीय सचिव राम प्रसाद चौधरी का 25 साल तक कबजा रहा और इस बार उनके बेटे अतुल चौधरी कप्तानगंज विधानसभा सीट से विधायक हैं।बावजूद इसके विकास के नाम पर कोई विशेष काम नहीं हुआ है।जनता मानती है कि पिछड़े समाज के बड़े नेता राम प्रसाद चौधरी हैं और उनके प्रभाव में एक बड़ा वर्ग उनके साथ रहता है, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलता है और वह हर चुनाव फतेह कर लेते हैं। इस बार 2027 में ऊंट कौन सा करवट लेगा यह अभी निश्चित करना मुश्किल है। सभी उम्मीदवारों और यहां की प्रबुद्ध जनता को अनन्त शुभकामनाएं।

इस श्रृंखला से संबंधित कुछ अन्य कड़ियां

भाग 1 में आलेख में जानिए- कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने बनाई थी कैप्टनगंज तहसील और मुन्सफी 

भाग 2 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विधान सभा का इतिहास" 

भाग 3  के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विकास क्षेत्र का इतिहास"

भाग 4  के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज  नगर पंचायत का इतिहास"

समय समय पर अन्य आगामी आलेख में कप्तानगंज के इतिहास , समाज और संस्कृति के विभिन्न उपादानों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,

Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183


इतिहास के पन्नों में ओझल हुए बस्ती के हमारे ये पुरोधा साहित्यकार (बस्ती के छंदकार कड़ी 34 ) ✍️स्मृतिशेष डॉ मुनि लाल उपाध्याय "सरस"; प्रस्तुति:आचार्य डा.राधेश्याम द्विवेदी


जिन साहित्यकारों ने “बस्ती” को एक खास पहचान दिलाई, लोगों में साहित्यिक चेतना पैदा की, आज अपने ही गांव - क्षेत्र और जिले में बेगाने होकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। जिन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में बस्ती को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। दुख इस बात का है कि यहीं के लोगों ने उन्हें भुला दिया। न साहित्य प्रेमियों को इन्हें याद करने की फुर्सत है और न ही शासन - प्रशासन को। कभी कभार आचार्य शुक्ल और रंगपाल जी को याद कर लिया जाता है। शेष लोग इतिहास के पन्नों में सिमट चुके हैं। कुछ अपने अपने सीमित साधनों से अपना अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं।
डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” 

अध्याय - 1 
प्रमुख कवि -
पीताम्बर भट्ट
भवानी बक्स
बलदेव उर्फ बलदी
हनुमन्त भट्ट
रामगरीब चतुर्वेदी "गगाजन"
भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी "दिनेश"
श्रीनारायण चतुर्वेदी
रामलोचन भट्ट
विश्वेश्वर वत्स “पाल”
महाराज शीतला बक्स सिंह "महेश"
लाल त्रिलोकी नाथ “भुवनेश”
पण्डित गौरीनाथ शर्मा
आचार्य लछिराम भट्ट 
कुल 14 साहित्यकार विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
अध्याय - 2
प्रमुख कवि -
श्री बाबू रंगनारायण पाल 'वीरेश’
पंडित वलराम मिश्र "द्विजेश”
पंडित बुद्धिसागर मिश्र "पंचानन"
पं०रामचरित्र पाण्डेय ‘पावन’
पंडित रामनारायण चतुर्वेदी
लाल रुद्रनाथ सिंह "पन्नगेश"
पंडित भगौतीप्रसाद मिश्र "नन्दन”
पंडित रामभरोसे पाण्डेय "सूर्य"
पंडित रामाज्ञा द्विवेदी "समीर" 
पंडित जनार्दन नाथ त्रिपाठी "गोपाल"
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 
कुल 11 साहित्यकार विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
अध्याय - 3
प्रमुख कवि -
श्री भास्कर प्रसाद "भास"
राजाराम शर्मा "अंचल"
बद्री प्रसाद मिश्र "हरीश”
रानी सौभाग्य सुन्दरी "सुन्दरअली"
लाल श्रीकण्ठ सिंह "ब्रजदेव "
बाबू श्री बद्रीप्रसाद " पाल"
श्रीरामदेव सिंह "कलाधर "
श्री अब्बास अली "वास"
पण्डित मातादीन त्रिवाठी "दीन"
श्रीगणेशदत्त पाण्डेय "विशिख"
श्री सरस्वती प्रसाद शर्मा "वारिज”
पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन"
प० राम नारायण पाण्डेय "पागल”
श्री केदारनाथ मिश्र "दीन”
पंडित रामचरित्र उपाध्याय
पंडित व्रज विहारी चतुर्वेदी 'ब्रजेश'
श्री रामलाल श्रीवास्तव 'लाल'
पण्डित अद्या प्रसाद पाण्डेय 'द्विजेंद्र' 
श्री राम कृपाल पाण्डेय 
श्री राम आश्रय सिंह 'रसिकेन्दु' 
कुल - 20 कवि का विस्तृत विवरण प्रकाशित है।
फुटकर छंदकारों नामोलेख सूची -
सर्व श्री बुध यदुनाथ जी
आचार्य धनराज शास्त्री
महात्मा गुंगदास
पण्डित चिन्तामणि त्रिपाठी
पं० सीताराम शुक्ल
सन्त अखंडानंद जी 
सत्यदेव ब्रह्मचारी "सत्य" 
पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र "अग्र"
सन्त फागूदास
रामयज्ञ त्रिपाठी "कंचन"
चन्द्रशेखर भारती 
राम लखन मिश्र "रामायणी"  
कमला पति त्रिपाठी "जोकरेश"
सुकवि रतिनाथ जी 
मातादीन लाल "मुख्तार"  
श्रीनरदेव पाण्डेय "साहित्यरत्न"
सुकवि चन्द्रवली त्रिपाठी
बासुदेव लाल "मुख्तार"  
कुल18 कवियों की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

अध्याय - 4. 
प्रमुख कवि -
सर्वश्री राम लखन मिश्र "मुदुल"
शारदा शरण चतुर्वेदी "मौलिक" 
रामनरेश पाण्डेय "पद्‌मेश"
घनश्याम प्रजापति "दंगल"
चिन्ताहरण पाण्डेय "फूल"
प्रेमशंकर मिश्र
जनार्दन नाथ पाण्डेय "ईश”
पं० राम सुमिरन पाण्डेय "सुमन"
पण्डित कंदर्प नारायण शुक्ल "कंदर्प"
ठाकुर भूरी सिंह "बालसोम" 
पण्डित ब्रजभूषण उपाध्याय "ब्रजचंद 
प० राममूर्ति मिश्र "सुधाकर", 
कृष्ण विहारी लाल "राही", 
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय "सरस"
राम कृष्ण लाल "जगमग"
राम लखन मौर्य "मयूर"
कुल 16 छन्दकार का विशद विवरण प्रकाशित है।
नामोलेख सूची -
श्री धर्मेन्द्रनाथ त्रिपाठी
पं० सुरेश धर "भ्रमर"
प० हरिशंकर मिश्र, 
पण्डित हरिनाथ उपाध्याय "अटल"
पण्डित रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी
पण्डित लम्बोदर पाण्डेय "अरुण"
सुकवि जगई भइया
पं० परमानन्द आनन्द
चन्द्रशेखर पाण्डेय 
रामरक्षा भारती "विकल" 
पण्डित सरस्वती प्रसाद शुक्ल "चंचल"

 रामनरेश सिंह "मंजुल"
पण्डित रामदास पाण्डेय गम्भीर"
पं० केशरीधर द्विवेदी
पं० उमाकान्त मिश्र "क्रंदन"
श्याम लाल यादव 
ठाकुर जगदंबिका सिंह "लल्लू बाबू"
रामेश्वर वर्मा 
माहेश्वर तिवारी "शलभ"
डा श्याम तिवारी
स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 
माधव सिंह गौतम
डा. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन"
भद्र सेन सिंह "भ्रांत"
गोपाल जी शुक्ल 
कृष्ण दत्त तिवारी "प्रेम"
गीतकार श्री शिव पूजन राय 
श्री सतीश श्रीवास्तव 
श्री विद्याधर द्विवेदी 
श्री राम शरण जायसवाल 
श्री चन्द पटवा 
श्री नरेंद्र कुमार पाण्डेय 
डा. सत्य देव द्विवेदी "सत्य"
श्री रामदेव मिश्र "पिंगल"
डा.सत्य प्रकाश उपाध्याय शास्त्री ' सत्य‘
इंजीनियर श्री अतुल द्विवेदी 
श्री कैलाश नाथ ओझा आदि।

इस अध्याय में कुल 37 साहित्यकारों की सूची प्रस्तुत है। पूरा शोध प्रबंध ग्रंथ कुल एक शतक कवियों पर आधारित बन पड़ा है। लगभग आधी संख्या के साहित्यकारों पर विशद विवेचन किया गया है। आधे पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है।



Saturday, October 24, 2026

आचार्य शुक्ल की पुत्री दुर्गावती और दामाद पं०चन्द्रबली त्रिपाठी( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 33 ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


भूमिका :-
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो वर्ष 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से एक श्री चन्द्रबली त्रिपाठी जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय :-
स्वर्गीय पंडित चन्द्र बली त्रिपाठी का जन्म 
सिद्धार्थ नगर के बढ़नी ब्लॉक के सेखुई 
कोटिया ग्राम में 1893 ई में हुआ था। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, संस्कृत व दर्शनशास्त्र के प्रकांड विद्वान और लेखक थे। वे महामना मदन मोहन मालवीय जी के बेहद करीबी सहयोगी भी रहे थे। वे संस्कृत हिन्दी के विद्वान थे। ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली के छंदकार के रूप में बहुचर्चित हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का पं० चन्द्रबली त्रिपाठी दामाद और दुर्गावती त्रिपाठी पुत्री थी। दुर्गावती त्रिपाठी जन्म 13 अक्टूबर 1902 में मिर्ज़ापुर में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की पुत्री (बेटी) के रूप में हुआ था उन्होंने अपने ज़माने की सोच, समझ और व्यवहार से बहुत बहुत आगे रहीं।
       उनका विवाह पं० चन्द्रबली त्रिपाठी के साथ हुआ जो संस्कृत और हिंदी के उच्चकोटि के प्रख्यात विद्वान और छंदकार थे।      
     पं० चन्द्रबली त्रिपाठी और प्रकाशक दुर्गावती त्रिपाठी का मूल निवास उत्तर प्रदेश का प्राचीन बस्ती वर्तमान सिद्धार्थ नगर जिला रहा । जहां कोटिया नामक गांव शोहरतगढ़ तहसील में बढ़नी ब्लॉक में स्थित एक आबाद गाँव है। 2011 की जनगणना के अनुसार, यहाँ 70 परिवारों में 400 लोग रहते हैं और इसका क्षेत्रफल 33.39 हेक्टेयर है। स्थानीय संदर्भों में नखही ग्राम पंचायत, जोगिया खास सीडी ब्लॉक शामिल हैं । उनका निकटतम शहर सिद्धार्थ नगर है, जो वहां से लगभग 36 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रमुख कार्य -
पं० चन्द्रबली त्रिपाठी एक प्रतिष्ठित लेखक थे, जिन्होंने 'उपनिषद रहस्य' तथा 'धर्मराज युधिष्ठिर' जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। उनके परिवार का साहित्यिक जुड़ाव शुक्ल जी की विरासत से बहुत गहरा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने 1957 में प्रकाशित हुई पुस्तक 'महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (संस्मरण)' का संपादन भी किया था, जिसकी प्रकाशक उनकी धर्म पत्नी श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी थीं।
    पंडित चंद्रबली मणि त्रिपाठी बस्ती में अधिवक्ता थे। बस्ती जिला मुख्यालय के मालवीय रोड पर इनका अपना खुद का मकान है। यही से रहकर इन्होंने अपने पुत्र चंद्रचूड़ मणि को पढ़ाया था। जिसके बाद बेटा प्रोफेसर बना । सेखुई कोटिया गांव में स्थित इनकी निजी भूमि पर परिवार के सदस्य खेती किसानी करते है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कोटिया ग्राम के मूल निवासी पण्डित चन्द्रबली त्रिपाठी से विवाह के उपरान्त मुख्यालय बस्ती में रह कर उन्होंने वो कर दिखाया जो किसी 'ब्राह्मण' कुलवधू के लिए आज भी संभव नहीं। घर के 'उठाऊ इज़्ज़तघर' की सफाई करने वाले गोकुल नामक भंगी के गंभीर रूप से रुग्ण होने पर स्वयं भोजन और पथ्य ले कर दो मील पैदल चल कर लगभग पंद्रह दिन उसकी सेवा-सुश्रूषा करना; पड़ोस के नन्दौर गाँव के मौलवी हसन अली के घर आने पर उन्हें घर के बर्तनों में भोजन कराने तथा उनके बीमार होने पर अपने हाथों उनकी हर तरह से उनकी तीमारदारी, साफ़ सफाई और देखरेख; बिहार में आये 1934 के भीषण भूकम्प और 1943 में बंगाल के दुर्भिक्ष में अन्न-वस्त्र-धन जुटा कर भेजना; औपचारिक शिक्षा के बिना बांग्ला, पाली, ब्राह्मी में प्रवीणता, बौद्ध धर्म में गहरी अभिरुचि; लुम्बिनी, श्रावस्ती, सारनाथ, महादेवा और सिसवनिया जैसे प्राचीन ढूहों, टीलों, पुरास्थलों का भ्रमण अवगाहन; स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी; उनके व्यक्तित्व के विलक्षण पहलुओं के द्योतक हैं। इतना ही नहीं, अपने संकलन में से लखनऊ संग्रहालय को पुरावेष भेंट किए और बस्ती में संग्रहालय की स्थापना करायी। कोपिया के प्राचीन टीले का निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला कि यहाँ शीशा गलाने के प्राचीन कालीन उद्योग रहे होंगे और सन 2004 के आस पास आलोक कुमार कानूनगो द्वारा कराए गए उत्खनन से उसकी पक्की तस्दीक हुई, समझती हैं। 
     'दुर्गावती दादी अम्माँ' की शख्शियत ऐसी अपनी रही कि जिसने 'वटवृक्ष के नीचे किसी और वृक्ष के न पनपने' और किसी स्त्री की पहचान उसके पिता, पति या पुत्र-पौत्रों की पहचान से जुडी होने' जैसी आम धारणाओं को अपने मामले में पूरी तरह झुठला दिया। वे केवल इसलिए नहीं जानी जाएंगी कि वे हिंदी के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य राम चंद्र शुक्ल जी ज्येष्ठा पुत्री और तब के पूर्वांचल के जाने माने पण्डित चंद्रबली त्रिपाठी की धर्मपत्नी रहीं; ना ही इसलिए कि उन्होंने जन्म दिया सुविख्यात चार-चार प्रतिभाशाली पुत्रों को डॉक्टर चंद्रचूड़ मणि - बौद्ध विद्वान, श्री चंद्रमौलि मणि - प्रखर मेधा के धनी और रेलवे के उच्चाधिकारी, श्री श्री चन्द्रभाल त्रिपाठी - पिछली शती के पांचवें दशक के जाने माने छात्र नेता, लखनऊ विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष, चिंतक और मानव शास्त्री तथा श्री चंद्रधर त्रिपाठी - भारतीय प्रशानिक सेवा (आई ए एस), और ना तो इस कारण कि उनके पौत्रों ने महा निदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय, आई आई टी दिल्ली में गणित के प्रोफेसर अथवा दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जैसे ऊंचे ऊंचे मुकाम हासिल किए। वे जानी जाती रहेंगी अपनी दुर्लभ प्रतिभा की बदौलत, माँ, अम्माँ, दादी अम्माँ के ममत्व भाव से कहीं ज्यादा करुणामूर्ति, विदुषी और क्रांतिकारी के रूप में। 
     बस्ती वालों को तो इस बात का गौरव भान रहेगा ही कि 'ऐसी निराली दादी अम्माँ रहीं हमरे कोटिया वाली, इससे आगे बढ़ कर वे पूरे पूर्वांचल, देश और मानवता के लिए वे सदैव एक अजस्र प्रेरणा-स्रोत बनी रहेंगी। समाज का ताना-बाना सुदृढ़ हो कर टिका रहता है ऐसी ही विभूतियों के योगदान से।
     दुर्गावती के पति पण्डित चन्द्र बली त्रिपाठी की प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय समाज में नारी आदर्शों का विकास' के हिंदी संस्करण का प्रकाशन "दुर्गावती त्रिपाठी प्रकाशन, बस्ती, उत्तर प्रदेश" द्वारा वर्ष 1991 में किया गया था। पण्डित जी की मृत्यु 1985 ई में हुई थी।

सिसवनिया पच्चीसा जिला बस्ती में पुरातात्विक खोज :-
बस्ती जिले के सदर बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं उनके पुत्र चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:”बस्ती बसुधा”, पृष्ठ 84 )
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनन: 
बाद के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. बी.आर. मणी बचपन में अपने दादी मां श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं पिता डॉ चंद्र मणि त्रिपाठी के अनुभवों और स्मृतियों को चिर स्थाई करते हुए एक उत्खनन दल गठित करते हुए वर्ष 1995-96 और 1996-97 के दौरान यहाँ वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत उत्खनन कार्य कराया था। सिसवनिया में मुख्य उत्खनन के साथ-साथ डॉ. बी. आर. मणी की देखरेख में बस्ती और सिद्धार्थनगर जिलों में व्यापक सर्वेक्षण भी किया गया, जिसके तहत लगभग 126 नए पुरातात्विक स्थलों की खोज की गई थी। इसी दौरान देउरांव, पिपरी, ओरई, धर्मसिंहवा और मुंडियार जैसे निकटवर्ती क्षेत्रों में भी प्रारंभिक परीक्षण खुदाई की गई थी।

लेखक परिचय :-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Monday, October 19, 2026

विजय की नहीं मुक्ति के लिए रावण द्वारा मृत्यु का वरण✍️ आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

रामायण के अनुसार, रावण ने अपनी मुक्ति (मोक्ष) पाने के लिए भगवान श्री राम के हाथों मृत्यु का वरण किया था, न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए। रावण जानता था कि श्री राम साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार हैं और उनके हाथों मृत्यु प्राप्त करने से उसे परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।

पूर्व जन्म का श्राप : -

रावण और कुंभकर्ण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनत्कुमारों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक असुर योनि में जन्म लेना था, जहाँ भगवान विष्णु स्वयं उनका वध करके उन्हें पुनः वैकुंठ लाते।

भक्ति का अनोखा मार्ग (द्वेष भक्ति) :- रावण जानता था कि एक साधारण मनुष्य की तरह भक्ति करने से उसे मोक्ष मिलने में लंबा समय लगेगा। इसलिए उसने 'शत्रु भाव' (द्वेष भक्ति) का मार्ग चुना, ताकि भगवान हर क्षण उसके स्मरण में रहें और वह जल्दी मुक्त हो सके।

माता सीता का हरण :- 

रावण ने सीता जी का हरण लंका विजय या वासना के लिए नहीं, बल्कि श्री राम को युद्ध के लिए आमंत्रित करने के लिए किया था, जिससे उसकी मृत्यु का मार्ग प्रशस्त हो सके।


नीलकंठ पक्षी दर्शन:-

विजयादशमी (दशहरा) के पर्व पर नीलकंठ पक्षी (इंडियन रोलर) के दर्शन को अत्यंत शुभ, सौभाग्यशाली और भगवान शिव का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है।

नीलकंठ दर्शन का विधान और नियम

दर्शन का समय : -

दशहरे के दिन सुबह से लेकर शाम तक किसी भी समय नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना शुभ माना जाता है, हालांकि प्रातःकाल (सूर्योदय के आसपास) का समय श्रेष्ठ माना गया है।

दर्शन न होने पर :-

यदि प्रत्यक्ष में नीलकंठ पक्षी दिखाई न दे, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है; मान्यता है कि आप मन में भगवान का ध्यान करके या किसी डिजिटल माध्यम/चित्र के जरिए भी उनके दर्शन कर सकते हैं।

देखने पर क्या करें :-

जब भी नीलकंठ के दर्शन हों, तो हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए।

विशेष मंत्र एवं प्रार्थना :-

दर्शन होने पर निम्नलिखित मंत्रों या परंपरागत वचनों का जाप करना चाहिए:-

पारंपरिक श्लोक / मंत्र:


'कृत्वा नीराजनं राजा बालवृद्धयं यता बलम्। 

शोभनम खंजनं पश्येज्जलगोगोष्ठसंनिघौ।। 

नीलग्रीव शुभग्रीव सर्वकामफलप्रद। पृथ्वियामवतीर्णोसि खञ्जरीट नमोस्तु तो।।'

पौराणिक लोक मान्यता का वचन :-

“नीलकंठ तुम नीले रहियो, 

सारी बात राम से कहियो।”

शिव मंत्र :-

‘ॐ नीलकंठाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥'

ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

पिंजरे में बंद पक्षी न खरीदें  :-

पिंजरे में कैद नीलकंठ को खरीदना या देखना शुभ नहीं माना जाता; यह भगवान शिव का रूप है, इसलिए उसे स्वतंत्र रूप में ही देखना फलदायी होता है।

धार्मिक महत्व :-

पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले भगवान श्री राम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसी वजह से विजयदशमी पर इनके दर्शन से जीवन में विजय, यश, धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 




                

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32) आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  प० राम लखन मिश्र जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय:-

ऐसे ही कवियों में पण्डित राम लखन मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि, राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो सं० 1960 वि० तदनुसार सन 1903 ई में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा , डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० यमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 283 - डुमरियागंज (उत्‍तर पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़कर जीता था। उनका बतौर विधायक कार्यकाल 1952 से 1957 तक रहा। विधायक बनने से पूर्व उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

     इतने महत्वपूर्ण राजनेता ,स्वतंत्रता सेनानी और कवि के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो रही है। आज के आत्म कुटुंब और स्वजातीय प्रशस्ति युग में ऐसा घटित होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इनके परिवारी जन शुभ चिन्तक और आम जन जिन्हें भी इन महानुभाव के बारे में किंचित जानकारी हो वह बस्ती मण्डल की गरिमा के लिए उसे आम जन में साझा करना चाहिए। हिन्दी भाषी विश्विद्यालय अपने शोध विषय में उक्त व्यक्तित्व को सम्मिलित करके महान योगदान कर सकते हैं।



Sunday, October 18, 2026

श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 31)आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डा. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 
जीवन परिचय -
ऐसे ही कवियों में श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि हैं, जिनका जन्म विक्रम संवत 1965 (लगभग 1908 ईस्वी) में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पास चननी ग्राम में हुआ था। बस्ती सदर तहसील और विकास खंड के अंतर्गत आने वाला एक छोटा गाँव है, जो बस्ती शहर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।जनगणना के अनुसार यहाँ लगभग 16 परिवार और 102 के आसपास की आबादी निवास करती है। चननी, दुधौरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है, जिसका नेतृत्व निर्वाचित ग्राम प्रधान करते हैं।
श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) की काव्य शैली और रचनाओं की दो सबसे प्रमुख विशेषताएँ हैं:
राष्ट्रीयता का स्वर: 
उनकी रचनाओं में देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति और समाज को जागरूक करने की गहरी भावना दिखाई देती है।
ब्रजभाषा का लालित्य: 
उन्होंने ब्रजभाषा का बहुत ही सुंदर, मधुर और कलात्मक (लालित्यपूर्ण) प्रयोग किया है, जो पाठकों को आकर्षित करता है।


Saturday, October 17, 2026

राप्ती की रेती के सन्त फागूदास जी की समाधि(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 30)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

भूमिका -

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी ने अपने शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” में  मध्योत्तर (तृतीय) ‘कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार’ नामक अध्याय का नाम दिया है। “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। जिसका नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों काऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी इसके पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  संत फागू दास जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय - 

सिद्धार्थनगर जिले में चौखड़ा गांव और बाजार डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में है। यह डुमरियागंज  तहसील मुख्यालय से लगभग 5 किमी. दूरी पर स्थित है।सन्त फागू दास जी का जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे। 

मन्दिर और समाधि -

मान्यता है कि संत फागू बाबा कहीं बाहर से आए और चौखड़ा में रह गए। यहां स्थित महाविद्यालय के पास उनकी समाधि है। यह भूमि पशुचर भूमि है। सन्त फागू दास जी के मृत्यु के बाद पेड़ के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। जहां उनकी समाधि रखी गयी, वहां पहले सूखा था। समाधि बनने के बाद वह क्षेत्र हरा-भरा हो गया। प्रत्येक गुरुवार को वहां मेला लगने लगा था । फागू बाबा के निधन को 100 वर्ष अधिक हो चुके हैं। उनके समाधि स्थल पर हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग आते हैं। 10 वर्ष पूर्व वहां विधायक निधि से कमरा बनवा दिया गया था जिसे कुछ लोगों ने मजार का स्वरूप देने का प्रयास किया था। इस  तथा कथित मजार के रूप में हुए अतिक्रमण को स्थानीय विधायक के अनुरोध पर प्रशासन ने हटवा दिया है। यह गांव उत्तर में 'बूढ़ी राप्ती नदी' और दक्षिण में 'राप्ती नदी' के बीच के मैदानी इलाके में स्थित है। यह मां बटवासनी मंदिर (गलापुर) जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।

धनाक्षरी और सवैया का उत्कृष्ट प्रयोग-

वे संतों और कवियों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में धनाक्षरी और सवैया छंद का बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। इन छंदों का प्रयोग वे अपनी भक्ति, दर्शन और नीतिपरक बातों को कहने के लिए करते थे।इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में “उपहार” पत्रिका में विशेष प्रशंसा की गयी है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)