Tuesday, March 3, 2026

नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की शहादत और उनके उत्तरावर्ती वंशजों का पुनर्स्थापना ::✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां :- 

बस्ती जिला मुख्यालय से आठ किमी दूर बस्ती-कलवारी रोड (एनएच 233) से जुड़ा बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित, एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। बौद्धों के समय से यह एक नगरीय क्षेत्र घोषित रहा । बाद में भरों की सत्ता के समय इसे चंद्रनगर के रूप में जाना जाता रहा। तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक अर्गल राज्य (जिला फतेहपुर) त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त अवध के बस्ती जिले के इस भूभाग पर यहां आकर सुरक्षा की दृष्टि से बस गए थे। यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच मनोरमा नदी के दोनों तटों पर एक लघु राज्य की स्थापना किये । प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग पर ) बादमें नगर खास/नगर बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी। अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था । बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हराकर उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना  नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह नगर के राजा बने। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने। राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी गनेशपुर पिपरा, पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं। 


(उपाध्याय स्टेट नगर बाजार के यशस्वी विद्वान डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' राष्ट्रपति महोदय महामहिम डा अब्दुल कलाम से शिक्षक पुरस्कार ग्रहण करते हुए) 

एक नया उपाध्याय स्टेट अस्तित्व में आया 

राजा नगर और उनके दरबारीगण नगर राजमहल के पास स्थित उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और शास्त्र और ज्योतिष के आचार्य पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय' से प्रतिदिन संस्कृत पुराण और अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्हें अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द में मकान बनवा दिए थे। गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र थे। जब 1765 में उतरौला के राजा सुलेमान खां ने 5000 सैनिकों को लेकर नगर राज्य पर आक्रमण कर दिया तो नगर राजा की तरफ से पंडित सीताराम उपाध्याय जी ने सुलेमान खां को समझा - बुझाकर लड़ाई होने से बचा लिया था। इससे खुश होकर उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी तक फैला और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीताराम जी को दान कर दिया था । इस पर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने सीतारामपुर नामक एक नया गांव बसा लिया था। (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4)

वीर स्वाभिमानी देशभक्त शासक उदय प्रताप नारायण का समय :- 

व्रिटिस काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ। राजा उदय प्रताप नारायण सिंह बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। उनका जन्म सन् 1812 ई. में हुआ था और वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय पड़ोस गांव सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 90 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। जिनके उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था। लक्ष्मण दत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय स्टेट” की जमींदारी संभालते थे। (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10) 

    अंग्रेज़ों के शासनकाल में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह अंग्रेज़ी सत्ता को कभी भी स्वीकार नहीं किया और 1857 की स्वतन्त्रता आन्दोलन की क्रांति में राष्ट्र के प्रति वफादारी निभाते हुए सक्रिय भूमिका निभाई थी। 

अनेक बार अंग्रेजों को मात दिया

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध साहस पूर्वक युद्ध किया। सीमित संसाधनों और स्वदेशी हथियारों के बल पर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। रणनीति और युद्धकौशल से उन्होंने कई बार अंग्रेज़ों को रोकने में सफलता पाई थी, किंतु भारी हथियारों, तोप और गोला बारूद से लैस अंग्रेज़ी सेना के आगे वे टिक ना सके और अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा था।

घाघरा तट पर 6 सैनिकों को मारे 

गोरखपुर गजेटियर के मुताबिक 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर ने 1857 में अग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का आह्वान किया था। नगर के राजा उदय प्रताप सिंह अपनी रियासत को अंग्रेजों से अपना राज्य स्वतंत्र घोषित कर इस जंग में कूद पड़े थे। उन्होंने अपने बहनोई अमोढ़ा नरेश “राजा जालिम सिंह” से सलाह-मशविरा किया। उनकी सहमति मिलने पर उन्होंने अंग्रेज सैनिकों के जलमार्ग को बाधित करने का निर्णय लिया, जो सरयू नदी से होकर जाता था। उन्होंने अपने राज्य से होकर गुजर रही सरयू नदी के तट पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया था। अंग्रेजों की सेना को घाघरा नदी के तट पर  रोक दिया। जब सेना फैजाबाद की तरफ से गोरखपुर की तरफ बढ़ रही अंग्रेज सैनिकों की नाव पर धावा बोल दिया और 6 सैनिकअधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था।

बचा सैनिक छिपकर अपने मुखिया को सूचना दिया

इन्हीं में से किसी तरह एक अंग्रेज सैनिक    बच गया था। वह अपनी जान बचाकर पैदल गोरखपुर पहुंचा और अपने मुखिया को पूरी घटना की जानकारी दी। उसके बाद गोरखपुर से अंग्रेजी सेना नगर राज्य पर हमला करने के लिए कूच कर दी थी।

घुसेरिया मैदान में हुई थी लड़ाई

29 अप्रैल 1857 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर बाजार स्थित राजा के किला के पास पहुंच गई । सेना ने राजा नगर के किले से एक किमी दूर घुसुरिया गांव के पास अपनो बेड़ा लगा लिया था। सितम्बर 1857 में हुई लड़ाई के दौरान अंग्रेजों ने गोला- बारूद के साथ तोपों का भरपूर प्रयोग किया था। बाद में अतिरिक्त सेना भी बुलाई गई थी । अंग्रेज सैनिकों के तोप का मुकाबला नगर के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की फौज ने सामान्य हथियारों से भरपूर  किया था। 

अंग्रेजों ने  किला ध्वस्त किया

गुरिल्ला वार में माहिर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने जब 1857 में अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की तो गोरी सेना ने उनके किले की घेराबंदी कर दी थी। राजा उदय प्रताप के किला में छिपे होने की आशंका में उस पर तोप से हमला कर दिया गया। हालांकि राजा उदय प्रताप किला की सुरंग के रास्ते बाहर निकल गए, लेकिन अंग्रेज नहीं मानें और तोप से किले को ढहा दिए। व्रिटिस सरकार ने इस मिट्टी के किले को नष्ट करवाकर समतल करवा दिया था। 

    अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर राज्य के अन्य गौतम जमीदारों के किले और महलों को अपना निशाना बना नष्ट किया था। अंग्रेजों की तोप और उनकी बर्बरता के आगे किसी अन्य की एक न चली और नगर बाजार का ऐतिहासिक किला ध्वस्त हो गया। अब भी किले के अवशेष अंग्रेजों के बर्बरता की दास्तां बयां कर रहे हैं।

रियासतों का अधिग्रहण और बिक्री

ब्रिटिश शासन के दौरान विद्रोह में भागीदारी करने और नगर राज्य के लगातार विद्रोह में भाग लेने के कारण, इसे रुधौली के बाबूओं, बांसी के राजा, बस्ती के राजा (कल्हंस राजपूत) और अन्य क्षेत्रीय प्रमुखों (जैसे बांसी और बस्ती के राजाओं) के साथ संघर्ष के बाद नगर राज्य को और कई अन्य प्रमुखों जैसे अन्य मालिकों को बेच दिया गया था।

नगर सहित छह किले ध्वस्त हुए थे 

नगर बाजार से पश्चिम कप्तानगंज मार्ग पर एक खंडहरनुमा संरचना में शहीद स्थल, दुर्गादेवी मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। प्रवेश द्वार के पास दीवाल में हिंदी भाषा के देवनागरी लिपि में एक शिलालेख संगमरमर के पत्थर पर खुदा है। अभिलेख में यह उल्लेख आया है कि अंग्रेजों ने केवल नगर का ही किला जमींदोज नहीं किया था, बल्कि नगर के आसपास के गौतमों के गौतम राजपूत के पांच अन्य के लिए भी नष्ट किए थे । ये नाम है मझगवां, भेलवल, पिपरा गौतम, बैरागल और गणेशपुर।

       अभिलेख की शब्दावली - 

 १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी    'राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर'   

                  स्मारक

“नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह ने १८५७ स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सेना एवं स्थानीय देश भक्तों के साथ अंग्रेजों की सेना से कई स्थानों पर घमासान युद्ध किया। युद्ध के दौरान कतिपय स्थानीय स्वार्थी गदारों ने अंग्रेजों को राजा की सेना के भेद को बता कर राजा को बन्दी बनवा दिया । राजा के बन्दी हो जाने पर नगर, मजगबा, भोलवल, पिपरा गौतम बैरागल तया गनेशपुर किलों को अंग्रेजों ने तोपों से ध्वस्त कर डाले और नगर राज्य बांसी के राजा को बतौर बक्शीस दे दिया। राजा साहब को गोरखपुर जेल में बन्दी बनाकर रखा गया। अंग्रेजों ने उन्हें अपमानित करके फांसी देने की योजना बनाई । इस अपमान जनक फांसी के बदले राजा साहब ने अपनी ही कटार से अपनी मृत्यु श्रेयस्कर समझकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।”

पत्नी को सुरक्षित निकाल लिया था 

अंग्रेजी सेना से घिरता देख राजा उदय प्रताप सिंह अपनी गर्भवती पत्नी के साथ भूमिगत हो गए। रानी को एक शुभचिंतक के यहां अठदमा में शरण दिला दिया। नगर के राजा की छावनी मजगवा निकट पोखरा बाजार में थी। नगर बाजार से मजगवां तक सुरंग थी, जिसके सहारे राजा सुरक्षित निकल गए। 

बहराइच में छिपे ,छलपूर्वक गिरफ्तारी 

अंग्रेजों के आगे आत्मसमपर्ण करने की बजाए उदय प्रताप सिंह ने बहराइच के जंगलों में शरण लिया। काफी प्रयास के बाद भी अंग्रेज अधिकारी उन्हें पकड़ नहीं पाए। उसके बाद फूट डालो राज करो की नीति अपनाते हुए अंग्रेज अधिकारियों ने राजा नगर के विश्वास पात्रों को फोड़ लिया। लोग बताते हैं कि यहां से भाग कर राजा उदय प्रताप गोंडा के टिकरी जंगल में पहुंच गए थे। अंग्रेजों के दलाल उन्हें भ्रमित कर फिर से नगर बाजार लाए और कैद करवा दिया। उनकी निशानदेही पर अंग्रेजों ने धोखे से गोंडा के टीकरी जंगल/ सिकरी नामक स्थान पर गिरफ्तार कर लिया। उनकी सारी जागीर सरकार ने जप्त कर ली गयी थी। 

अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई 

स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होने अपनी पदवी और जागीर दोनों खो दी थी। नगर के राजा एवं उनके आदमियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध अपने वंश परिवार तथा सारी सम्पत्ति को दांव पर लगा दिया। वे पराजित हुए उन्हें कैद कर गोरखपुर के पुलिस लाइन स्थित जेल में डाल दिया गया। उन पर केस चला और अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुना दी गई। अंग्रेज उन्हें सार्वजनिक स्थान पर फांसी देकर विद्रोहियों को कड़ा संदेश देना चाहते थे। लेकिन राजा को अंग्रेजों के हाथों मौत गवारा नहीं था। 

हत्या या आत्म बलिदान

उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। परंतु उन्होंने आत्म सम्मान से समझौता नहीं किया। वहां उन पर अत्याचार कर करके उन्हें तोड़ने का प्रयास किया गया। जब अंग्रेज कामयाब नहीं हुए तो जेल में उनकी हत्या कर दी गयी और बाहर यह खबर फैलाई गई कि फांसी के एक दिन 18 दिसंबर 1858 को पहले बैरक के बाहर तैनात संतरी से पानी मांगा। इसी बहाने उसकी राइफल को छीनकर उसमें लगी कटार को अपने गले में भोंक कर आत्म बलिदान देकर अपने प्राण त्याग दिए।उनका यह बलिदान देशभक्ति, वीरता और स्वाभिमान का अनुपम उदाहरण है।

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के जीवन पर आधारित विजुवल :- 

इसे अवश्य देखे - 

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पोखरनी में फिर से अस्तित्व में आया ये रियासत : 

पोखरनी का शब्दार्थ :- 

पुष्करिणी ( पोखरनी ) का हिंदी अर्थ

हथिनी या छोटा जलाशय होता है । इसके अलावा वास्तुशास्त्र शब्दावली में पुष्करणी पुष्करणि या पोखरनी मंदिर परिसर में निर्मित "तालाब" या "कुंड" को संदर्भित करता है। यह आमतौर पर सीढ़ीदार कुएँ या तालाब को दर्शाता है।साथ ही पुष्करणि शब्द का अनुवाद "कमल का तालाब" भी हो सकता है। इसे कल्याणी नाम से भी जाना जा सकता है ।

      भारत में सदियों से, हर गाँव के मंदिर में पुष्करणी नामक एक तालाब होता आया है। " पुष्करणी" शब्द " पुष्करम" से आया है , जिसका अर्थ है "जो उर्वरता प्रदान करता है", और पुष्टि का अर्थ है "स्वास्थ्य"।

    जब प्रत्येक गांव के केंद्र में, आमतौर पर मंदिर के पास, पानी को एकत्रित और संग्रहित किया जाता है, तो पूरे गांव में जल स्तर भरा रहता है और न केवल गांव के दैनिक उपयोग जैसे पीने और नहाने के लिए पानी उपलब्ध कराता है, बल्कि पूरे गांव की उर्वरता भी बढ़ाता है।

    एक भरा हुआ, साफ मंदिर का तालाब देखने में बहुत सुंदर लगता है। ये तालाब सदियों से स्थानीय लोगों द्वारा समाज के हितैषी के रूप में बनाए गए थे।

   दैनिक स्नान और स्थानीय मंदिरअनुष्ठानों के अलावा, इन तालाबों का मुख्य उद्देश्य जल संचयन करना था। इस गांव का चयन और यहां राज कुल को पुनर्स्थापना करना पुराने लोगों ने बहुत सोच समझ कर किया होगा।

पोखरनी की अवस्थिति:- 

पोखरनी,उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लॉक में नगर बाजार के पड़ोस का एक छोटा सा गांव है। यह जिला मुख्यालय बस्ती से दक्षिण की ओर 13 किमी.और बहादुरपुर से 5 किमी.दूर स्थित है। अंग्रेजो ने जब नगर राजकोट में स्थित राजपरिवार को नेस्सनाबूत कर दिया तो बांसी के राजा द्वारा इन्हें गुजारा के लिए पोखरनी आदि कुछ गांव दिए थे, जहां नगर राजा साहब के परिजनों ने नए सिरे से दूसरा राजमहल खड़ा किये। स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांति के बाद के निम्न लिखित वंशजों ने इस वंश परम्परा का उत्तरोत्तर विकसित किया था । यहां पोखरनी में अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह उच्चतर माध्यमिक  विद्यालय इनके परिजनों द्वारा संचालित किया जा रहा है। यह स्कूल अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में संचालित है। साथ ही एक प्राइमरी विद्यालय भी यहां चल रहा है। ये स्थल स्थानीय क्षेत्र में शिक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं । 

    पोखरनी स्थित पौराणिक महाकाली मंदिर परिसर में चल रहे नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा हर तीसरे साल आयोजित होती रहती है। लगभग पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के 80 फीसदी परिवार की जीविका चलाने वाले लोग खाड़ी देशों से लेकर केंद्र और प्रदेश की सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में सहभागिता निभा रहे हैं। यही नहीं, नौ दिन पूरे गांव के श्रद्धालु घर के बाहर ईशान कोण पर या फिर महाकाली मंदिर परिसर में भोजन पका कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। साथ ही हवनोत्सव के दिन सांस्कृतिक व तांत्रिक अनुष्ठान कर असाध्य रोगों से निजात पाते हैं।

        प्रमुख उत्तराधिकारी

1.विश्वनाथ प्रताप सिंह 

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की। उपाध्याय स्टेट के रिटायर्ड सूबेदार ने लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा थे। 1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राज कोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजन कर उन्हें राजा के पद पर राज्याभिषेक किया।

2.लाल रूपेंद्र नारायण सिंह 

1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हो गए थे। कचूरे स्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबर सलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए।(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)

      इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर रुपया 5000/- जमा करवाया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया।    (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)

    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह तृतीय 1913-1918 थे। इन्हीं के कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमसन आने वाले थे और क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा होने वाली थी। उन लोगों का चन्दो ताल के आसपास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय स्टेट सीता राम पुर के दोनों दरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर स्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय स्टेट के धर्मराज और महराजराम को स्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय स्टेट की मान्यता दी गई। (डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)

3.भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह 

लाल रूपेन्द्र नारायण के उत्तराधिकारी लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह थे। ये कुश्ती के बड़े शौकीन थे। इन्हें शिक्षा और धर्म संस्कृति में भी रुचि थी। फलत: इनके शुभ चिंतकों ने इन्हें सम्मान देने के लिए राजा भूपेंद्र प्रताप नारायण संस्कृत विद्यालय नारायण पुर तिवारी महराज गंज बस्ती में स्थापित कराया था।

     लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण का विवाह वर्तमान अंबेडकर नगर जिले के 'हंसवर' स्टेट के ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह की बेटी सुश्री सौभाग्य सुंदरी देवी 'सुंदर अली' से हुआ था। पोखरनी स्टेट में पहुंचते ही सुन्दरी जी का मन संगीत और साहित्य में बहुत रमा। सुन्दरी जी ने श्रृंगार और भक्ति को माध्यम बना कर के वाद्ययंत्रों पर गाये जाने वाले लोकगीतों की लयात्मक छन्दों और पदों की स्वयं रचना करने लगी थीं। महाराज भूपेन्द्र बहादुर सिंह के निधन के बाद रानी साहिबा के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होनें अपने आध्यात्मिक गुरू कुदरहा बस्ती निवासी महन्थ राम सुन्दर दास की प्रेरणा से अयोध्या में कनक भवन के पास “सुन्दर भवन” का निर्माण करवाया और अपना अधिकाधिक समय कनक बिहारी भगवान श्रीराम की सेवा में लगाना शुरू किया। इन्होनें सैकड़ों पद, कवित्त, सवैया के साथ-साथ उर्दू गजल लिखा । इनके गीतों में भावुकता के साथ तत्लीनता है , आत्म सुख की भावविभोरता है और आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की आकुलता है।

4.लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह 

लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण के पुत्र वीरेंद्र प्रताप सिंह हैं। शहीद स्थल राजकोट नगर बाजार बस्ती पर एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ने कहा था - आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं , ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

5.लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह

लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह ने इस वंश परम्परा को आगे बढ़ाया।

6.लाल आर्नेश प्रताप सिंह

लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल आर्नेश प्रताप सिंह जी वर्तमान में परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । 

    इस परिवार वालों का कहना है कि हमें अपने पूर्वज पर गर्व की अनुभूति होती है और अभी भी उनसे जुड़ी सामग्री बतौर निशानी व धरोहर के रूप में इनके राजमहल में रखी गई है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके त्याग व बलिदान को याद कर सकें।

राजकोट नगर बाज़ार बस्ती में है स्मारक स्थल 

नगर बाजार से पश्चिम कप्तान गंज मार्ग पर एक खंडहर नुमा संरचना में शहीद स्थल, देवी दुर्गा मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ फूल पत्ती पेड़ पौधे लताओं का झुरमुट भी देखा जा सकता है। यहाँ राजा का ध्वस्त किला स्मारक और एक शहीद स्थल मौजूद है ।

29 अप्रैल 1858 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के नगर किले को ध्वस्त कर दिया गया था। यहाँ नगर बाजार पंचायत द्वारा हर साल 18 दिसंबर को यहाँ मेले का आयोजन किया जाता है, जो स्थानीय स्तर पर देशभक्ति का बड़ा आयोजन बनता है।

किले में कुल देवी माता का एक मंदिर

मान्यता है कि राजा उदय प्रताप के किले में माता का एक मंदिर भी था। अंग्रेजों के हमले में किला ध्वस्त होने के साथ वह भी ध्वस्त हो गया। कुछ साल बाद स्थानीय लोगों को मां दुर्गा का स्वप्न आया कि जहां किला ध्वस्त हुआ वहां वह विराजमान हैं। मंदिर के पुजारी गिरीश महाराज ने बताया कि स्वप्न की बात लोगों के बंगाली बाबा से कही, जिसके बाद उन्होंने अपने शोध से पता लगाया। खोजबीन के बाद ध्वस्त किले में माता की पिंडी मिली। बाद में यहां एक मंदिर का निर्माण हुआ।पुजारी जी ने बताया कि राजकोट की माता गौतम क्षत्रिय वंश की कुलदेवी हैं। इस मंदिर को लेकर लोगों मे बड़ी आस्था है। यहां सच्चे मन से जो भी भक्त अपनी मुराद लेकर आता है, राजकोट की माता उसकी मुराद पूरी करती हैं। नवरात्र और दशहरे के मौके पर यहां बहुत भीड़ होती है, दूर-दूर से भक्त माता का दर्शन करने आते हैं। आजादी के सात दशक बाद भी जंग ए आजादी के साक्षी इस किले के संरक्षण व संवर्धन का कोई खास प्रशासनिक इंतजाम नहीं हो सका है। किले को सुरक्षित करने के लिए सरकार गंभीर नहीं शहीद राजा उदय प्रताप के प्रपौत्र लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं कि आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं l ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

     इसे और आकर्षित बनाया जा सकता है। इसे पर्यटक स्थल विकसित करने की पूर्ण संभावना है। इस पर वांछित देखरेख का अभाव देखा जा रहा है। इसकी देखभाल पहले राजकोट दुर्गा मन्दिर समिति करती थी, उस वक्त तक यहां साफ सफाई व अन्य व्यवस्था दुरूस्त थी लेकिन पूर्व के मण्डलायुक्त विनोद शंकर चैबे ने शहीद स्थल की देखरेख और इसके सुन्दरीकरण की जिम्मेदारी वन विभाग को सौंप दिया था । यहीं से शहीद स्थल की उपेक्षा शुरू हो गयी। धीरे धीरे यह जंगल में तब्दील हो गया। शहीद स्थल पर प्रशासनिक अधिकारी पुष्प चक्र भी अर्पित करने नही जाते हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता पुष्प अर्पित करने न आयें तो नई पीढ़ी को शहीद स्थल के बारे में नई पीढ़ी को पता ही न चले। पूर्व के जिलाधिकारी हरिभजन सिंह ने शहीद स्थल के सुन्दरीकरण और देखरेख की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग को सौपने के प्रस्ताव के साथ शासन को पत्र लिखा था। इसका कोई खास असर नही दिखा। यहां पानी की टंकी, सीमेण्ट की बनीं कुर्सियां, पुल, इंजन, हैण्ड पाइप आदि बेकार पड़े हैं। वर्षों से ये उपयोग में नही है। पहले शहीद स्थल राजकोट दुर्गा मन्दिर के नाम से दर्ज था लेकिन प्रशासनिक हस्तक्षेप से इसे अभिलेखों में वन विभाग के नाम दर्ज करा दिया था। इसका हाई कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। वर्तमान में शहीद स्थल में चारों ओर झाड झंखाड़ है। 18 दिसम्बर 2000 को तत्कालीन उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री धनराज यादव ने यहां राजा उदय प्रताप सिंह की प्रतिमा का लोकार्पण किया था।

नगर में लगता है अमर शहीद मेला

आदर्श नगर पंचायत नगर में अमर शहीद मेला आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन नवगठित नगर पंचायत द्वारा किया जाता है। जहां अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर नमन किया जाता है। मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले अमर बलिदानी को स्मरण कर नगर पंचायत के विद्यार्थियों को मंच प्रदान करना शहीद मेले का मुख्य उद्देश्य है। युवाओं को अमर बलिदानी राजा नगर के जीवन से प्रेरणा लेकर देश और समाज की सेवा का संकल्प दिलाया जाता है। दौड़ ,गायन, नृत्य प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और मेडिकल कैम्प लगाकर मरीजों के उपचार किए जाते हैं।

REFRENCES:

1. Report of tours in the Central Doab and Gorakhpur in 1875-76

2. Gazetteer of Basti

3. Rag Pankaj (1998). 1857, Need of Alternative Sources

4. Agazetteer being volume XXXII of the district Gazetteer of the united Province of Agra and Oudh( बस्ती ए डिस्टिक गजेटियर आफ दी यूनाइटेड प्राविंसेज आफ आगरा एण्उ अवध लेखक एच. आर. नेविल, 1907, पृ. 94.95) 

5. डा. वीरेंद्र श्रीवास्तव की शोध पुस्तक 'स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान'।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)





 









पण्डित चंद्रशेखर मिश्र का "सीता” खण्ड काव्य ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

जीवन परिचय 
भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा,
सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित
1942 के आंदोलन में गोविंद प्रसाद जी और मामा सत्य नरायण दुबे जी के गिरफ्तारी के बाद मिश्र जी अपने  साथियों के संग परसीपुर स्टेशन को आग लगा दिया था। उस जगह से वे इलाहाबाद फरार हो गए थे, जहाँ उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा था।  

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण
आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया। 

एक युग का अवसान
17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

पुरस्कार एवं सम्मान - 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में 'अवन्तिबाई सम्मान' से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है। 

खड़ी बोली की कृति “सीता” खण्ड काव्य

सीता खण्ड काव्य में अयोध्या से जब सीता जी निष्कासित की गयीं, तब भगवान राम, लक्ष्मण, अयोध्यावासियों व स्वयं माता जानकी के मन कुछ अनुत्तरित प्रश्न अवश्य उठे होंगें। ऐसे ही कारुणिक भावों व तथ्यों को "सीता" खण्ड काव्य में अपने कुशल काव्य शिल्प के माध्यम से प्रगट किया है महाकवि पं चन्द्रशेखर मिश्र जी ने। इनकी खड़ी बोली में सीता बेहतरीन खण्डकाव्य है जो देवी सीता के जीवन पर आधारित है। यथा - 

ऐसा ना दण्ड विधान बना
निर्दोष रहे, नृप तो भी सजा दे ।
देवो को सारवी बनायेगा कौन
सुरेश से जाके कोई समझा दे । 

शोभा न देता है राम के राज्य में
सत्य को आ के असत्य दबा दे । 
अग्नि में भी नही साहस था ,
जो सिया तन में एक दाग लगा दे ।।


सूरज के नाम पर वंश के गुमान वाले
समय कहेगा कौन खोटा,कौन है खरा।
सारी राजनीति एक दासी थी पलट गयी
खानदान खूब पहचानती थी मंथरा ।

बाप ने तो पूत को दिया था बनवास पर,
पूत ने तो एक पग और आगे है धरा । 
राम ने कलंक हीन नारी को निकालने की,
रवि-वंश में चलायी है नई परम्परा ।।


राम हो कि रावन हो, बलि चाहे बावन हो
यश-अपयश शेष दुनिया में रहेंगे । 
जब-जब चर्चा चलेगी रघुनाथ जी की,
सीय तेरी ! महिमा में तृण सम बहेंगे । 

आगे आगे राम सदा, पीछे पीछे सीय चली
किन्तु अब सीय आगे, राम पीछे रहेंगे ।
राम-सीता, राम-सीता , कोइ न कहेगा,
लोग सीताराम ! सीताराम ! सीताराम ! कहेंगे ।।

इस खंडकाव्य को लक्ष्मण द्वारा व्यक्त किए गए विचार इतने उदात्त हैं कि बरबस मन में जगह बना लेते हैं। इस लिंक का विजुवल  निश्चित आप के अंतर्मन में बस जाएगी। अवश्य अनुशीलन करें - 

https://www.facebook.com/reel/842585078735889/?app=fbl


लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

Thursday, February 26, 2026

राजमहल में भक्ति साधना से ओतप्रोत रानी सौभाग्य सुन्दरी देवी 'सुन्दरीअली' (बस्ती जिले के छंदकार संख्या 32) : ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

मायके के परिवार का धर्म से रहा अटूट नाता :- 

रानी सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म फैजाबाद जिले के हंसवर स्टेट में हुआ था। उनके पिता ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह बड़े ही शान शौकत के व्यक्ति थे। इनकी विदुषी माता जानकी कुँअरि के जीवन का स्पष्ट प्रभाव इनके ऊपर पड़ा है। अयोध्या से 70-80 मील दूर स्थित हंसवर का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है। इस रियासत के शासक रणविजय सिंह और उनकी पत्नी जयकुमारी ने उस समय के अन्य हिंदू शासकों के साथ मिलकर राम जन्मभूमि पर मीर बाकी द्वारा बाबरी मस्जिद के निर्माण का कड़ा विरोध किया था। बाबरी मस्जिद का हिस्सा बनने के बाद भी जन्मभूमि परिसर 15 दिनों तक रणविजय सिंह के नियंत्रण में रहा, जिसके बाद मुगल सेना के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई थी। 

ससुराल पक्ष रहा स्वतन्त्रता आन्दोलन का अप्रतिम बलिदानी:- 

1857 की क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के कुल बधू के रूप में रानी सौभाग्य सुन्दरी देवी जानी जाती है। राजा उदय प्रताप नारायण जी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अति साहस पूर्वक युद्ध किया था। सीमित संसाधनों और स्वदेशी हथियारों के बावजूद उन्होंने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। रणनीति और युद्धकौशल से उन्होंने कई बार अंग्रेज़ों को रोकने में सफलता पाई, किंतु भारी हथियारों से लैस अंग्रेज़ी सेना के आगे अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा। अंग्रेज़ों द्वारा छलपूर्वक गिरफ़्तार किए जाने के बाद उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। परंतु उन्होंने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया और अपना आत्मबलिदान देकर अपने प्राण त्याग दिए। उनका यह बलिदान देशभक्ति, वीरता और स्वाभिमान का अनुपम उदाहरण है।

सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म : - 

सौभाग्य सुन्दरी देवी का जन्म आषाढ शुक्ल दशमी सं०1958 वि. /1901 ई. वर्तमान अंबेडकर नगर जिले के हंसवर स्टेट में हुआ था। इनका उपनाम सुन्दर अली है। इनके पिता ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह बड़े ही शान शौकत के व्यक्ति थे। इनकी विदुषी माता जानकी कुँअरि के जीवन का स्पष्ट प्रभाव इनके ऊपर पड़ा। उर्दू, फारसी, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी की शिक्षा-दीक्षा इन्हें हंसवर स्टेट में मिली। सन 1917 ई में 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह बस्ती जनपद के पोखरनी स्टेट के प्रसिद्ध गौतम राज घराने के लाल भूपेन्द्र नारायण सिंह के साथ हुआ था। ये गौतम वंश के बड़े ही प्रशंसित राजा थे। पोखरनी स्टेट में पहुंचते ही सुन्दरी जी का मन संगीत और साहित्य में बहुत रमा। सुन्दरी जी ने श्रृंगार और भक्ति को माध्यम बना कर के वाद्ययंत्रों पर गाये जाने वाले लोकगीतों की लयात्मक छन्दों और पदों की स्वयं रचना करने लगी थीं। 


अध्यात्म - भक्ति और साहित्य के प्रति लगाव :- 

महाराज भूपेन्द्र बहादुर सिंह के निधन के बाद रानी साहिबा के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होनें अपने आध्यात्मिक गुरू कुदरहा बस्ती निवासी महन्थ राम सुन्दर दास की प्रेरणा से अयोध्या में कनक भवन के पास “सुन्दर भवन” का निर्माण करवाया और अपना अधिकाधिक समय कनक बिहारी भगवान श्रीराम की सेवा में लगाना शुरू किया। इन्होनें सैकड़ों पद, कवित्त, सवैया के साथ-साथ उर्दू गजल लिखा । इनके गीतों में भावुकता के साथ तत्लीनता है , आत्म सुख की भाव विभोरता है और आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की आकुलता है।

              प्रकाशित साहित्य

1.प्रेम प्रकाश :- 

15 अगस्त 1978 प्रेम प्रकाश के का प्रकाशन हुआ था। भाव भरे इन छन्दों में कवयित्री सुन्दरी जी का व्यक्तित्व उमड़ पड़ा है। उनका भावुक मन आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि पर आत्मसुख के पुकार के लिए आकुल हो उठा । प्रेम प्रकाश के छन्दों में पद अधिक है।

बंदउँ गुरू पद मंगलकारी।

कोमल कमल चरण रज सेवत 

दूरि भक्ति भ्रमहारी। 

चाहत नित दृग दोष दुसह 

दुख तेज पुंज सुखकारी। 

पाप प्रमाद प्रपंच मिटावत 

हरत हृदय अंधियारी। 

अंगारति सजिकै इस सजधज 

पर बार-बार बलिहारी।।

    विनती सुनिये नाथ हमारी आदि पदों के साथ-साथ होली, झूलन आदि के सुन्दर प्रयोग हुए है। इस पुस्तक के बीच-बीच में उर्दू की शायरी भी प्रस्तुत की गई है। सुन्दरी जी का यह प्रेम प्रकाश उनकी भावुकता भरी भावात्मक कृति है। सर्वत्र गेयता से भरे पदों और कविताओं में भक्ति की प्यास छिपी हुई है।

2.सुन्दरी पद-संग्रह:- 

        सुन्दरी पद संग्रह लगभग 60 पृष्ठ की एक पाण्डुलिपि देखने को मिली। इस पाण्डु लिपि में कुछ कवित्त कुछ घनाक्षरी और कुछ सवैया है। एक छन्द की आकुलता दर्शनीय है - 

किंकिरी हूं पद रज प्रियतम के पायन की, विरह व्यथा सी तपी प्रेम की पियासी हूं। रातों दिन विकल मैं बिताती वयस,      अली रम्य रूप रस बिन्दु की उपासी हूं।

नाहक लग्यो है दोष नेह में दिवानी हुई, उस दिलदार की नयन वाण गांसी हूं। सकल प्रपंच छोड़ी सिया की सहेली बनी, रूप रामचन्द्र की सनेहमयी दासी हूं।।

     एक सवैया छन्द दर्शनीय है :-

पलकों में बिराजती जो छवि है,

वह मोहिनी रूप निहारा करूं। 

मतवाली मराल सी चालन पै, 

तन औ मन जीवन वारा करूं।

सुन्दरी एक है भूलिये ना, 

मन से नित ध्यान तुम्हारा धरूं। 

लगते क्यों कठोर बता दो प्रिये, 

क्या कहूं किस भांति पुकारा करूं।।

     पुनः एक पद और देखिए - 

कभी डूबी निरासा के सागर में, 

कभी आशा सरों में तिरा करते। 

अरमान भरे हुए जो उर में, 

बनके वह आंसू गिरा करते।

तस्वीर हृदय में सदा रहती,

अभिलाषा के मेघ गिरा करते। 

मुख फेरने से अब होता है क्या, 

जब वे नजरों में फिरा करते।।

     सुन्दरी जी के छन्दों में भक्ति भाव की तत्लीनता है एवम् प्रियतम के मिलन की व्यापक उत्कृष्ठता है। पाण्डुलिपि के इस पुस्तक में गजलों के साथ उर्दू थे शेष दोहे, संगीत के ताल बिहाग, ताल खेमटा, ताल मलार, ताल बधाई, ताल चावरा होरी आदि के अनूठे चित्र प्रस्तुत किये गये हैं। इस पाण्डुलिपि में सवैया, बोहा और मनहरण के दर्जनों अनूठे छन्द सुन्दरी जी के संग्रहीत किये गये हैं। बयहं आदि के पद बड़े मनोहारी हैं यथा -

नृप गृह शोभा वरराणि ना जाई। 

जग निवास प्रभु प्रगट भये है, 

आनंद मंगल छाई। 

बंदनवार पताका सोहै, 

कंचन कलश धराई। 

सिंह पौरि पर नौबत बाजे,

जुवतिन मंगल गाई।

विप्रन दान दियो मन भायो, 

भूषन वसन लुटाई। 

श्री सुन्दरी निछावरि पाई, 

अपनी रूचि मनभाई।।

    इसके अतिरिक्त राम और सीता के जोड़ी का चित्रण :-

लखहु सखि सिय दुलहिनि गृह आई। सुषमा शील सकल गुण आगरि 

सागर रूप लुनाई। 

पटतरिं योग एकनहिं आवत 

उमा रमा सकुचाई। 

श्री सुन्दरि ई मनोहर जोरी 

राखिय नैन बसाई।।

    पुनः एक पद और दर्शनीय है। -

कितै गयो श्यामल राजकुमार। 

चितवत चकित चहूं दिसि सीता 

पलकन है दुखभार। 

तन-मन विवस कियो किन मेरो 

मन्त्र मोहिनी डार। 

सुन्दरी अली कुंअरि बरबांके 

मुनि मख के रखवार।।

    इसी ही कम में -

बांके दोऊ नैन बिहारी के। 

कसकत भौंह कमान बान हिय 

मानो जखम कटारी के। 

सुन्दरि अली फिरत चंचल चख 

छाके मद मतवारी के।।

    होरी गीत का एक चित्र देखिये -

अवध किशोर रचिन होरी।

मिथिलापुर की सब गोरी 

नव ससुराल नवल नव नेही। 

नव नागर नवला गोरी 

अवध किशोर रचे होरी। 

सिद्धि कुंजरि सरहज संखियन 

लै रंग गुलाल भरि ओरी। 

कर छल कपट गहे रघुनंदन 

गोल कपोलन मल रोरी। 

सुन्दरी अली करी मन भाई 

पीताम्बर लीन्हेन छोरी।।

   भूलना का एक चित्र देखिये -

धीरे-धीरे से झुलाओ डरपति जियरा । 

चहुं ओर घनघोर धुके आये बदरा । 

मैं हूं आली सुकुमारी अभी वयस कीबारी। 

मिथिलेश की दुलारी बाटै कोमल हियरा। सुनौ कौशल किशोर तन-मन चितचोर। बहे नैनन की कोर काले काले कजरा।।

     पुनः एक विहाग का छन्द देखिए -

जुगल दोऊ झूलत रंग भरे।

वन प्रमोद विच सघन लतान में 

होमो दृष्टि परे। 

ओ मन हरन अनोखी झांकी 

रति पति मान हरे। 

जनक लड़ैती वसो दृग मेरे 

टारेहु पल ना टरे।।

     सुन्दरी जी के अधिकांशतः गीतों में माधुर्य के साथ-साथ आत्मा की आकुलता भरी हुई है। इन पदों और गीतों को रानी साहिबा जी स्वयं गा-गा करके कनक भवन के कनक बिहारी युगल किशोर को सुनाती रहती थीं। हर गीतों में तल्लीनता है। लयात्मक सौन्दर्य है और सरस भाषा का प्रवाह है। भावों की तल्लीनता में जीवन की गहराई और अभिव्यक्ति बड़ी सफाई के साथ प्रस्तुत की गई है। हृदय के भक्ति और भाव भरे इन गीतों में मधुरता ही नहीं अपितु हृदय का संवेदनशील स्वर मुखरित हुआ। सुन्दरी जी तृतीय चरण की एक उत्कृष्ट कवियित्री ही नहीं अपितु इस जनपद की साहित्यिक परम्परा की गौरव थीं। मीरा और महादेवी आदि के समान ही सुन्दरी जी का भी काव्य रस से अनुप्राणित देखा जाता है। 

     सुन्दरी जी के साहित्य के प्रकाशन से उन्हें सहृदय समाज अवश्य समाहत करेगा। सुन्दरी जी इस जनपद की अनुपम निधि है और उनकी साहित्यिक सेवायें समादर योग्य हैं। सुन्दरी जी की मृत्यु के उपरांत उनकी रियासत उनके दत्तक पुत्र लाल वीरेन्द्र प्रताप सिंह पुत्र माता प्रसाद सिंह मूल गांव पोखरा, हाल मुकाम साकिन पोखरनी को प्राप्त हुई जो उक्त गाॅव के जमीनदार एवं राजा थे। 


(संदर्भ: बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान ,भाग 2, रचयिता: डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस',पृष्ठ 7-11)


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Wednesday, February 25, 2026

नगर के गौतम राज्य का प्रारंभिक इतिहास ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


अर्गल से प्रवासित होकर आए घोलराव इस वंश के आदिपुरुष संस्थापक रहे - 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित था। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है।

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पूर्वांचल के महान कवि साहित्यकार एवं इतिहासविद् डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘‘सरस’’ ने अनुश्रुतियों को आधार लेकर लिखा है कि तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा  नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बस गए थे। चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन खिलजी के उत्तर भारत में आक्रामक विजय अभियानों विशेषकर1301-1311 के दौरान के चलते, अरगल राज्य के गौतम गोत्री राजपूत नृपति घोलराव ने अपना राज्य छोड़ दिया था । वे अवध के बस्ती क्षेत्र में आकर बस गए और यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया। यह पलायन खिलजी के खौफ और राज्य विस्तार नीति का परिणाम स्वरूप बना हुआ था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच एक लघुराज्य की स्थापना किये थे। प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग) पर बाद में नगर खास/बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे।

बैरागल (राम जानकी मार्ग) में हुई थी लड़ाई  - 

नगर साम्राज्य पहले राहिला नामक डोम कटार राजाओं के अधीन रहा। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही समृद्ध और स्वतंत्र शासकों के अधीन रहा है। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। पठानों की बहुत बड़ी सेना नई राजधानी की तरफ आगे बढ़ी। राव जगदेव ने उनका मुकाबला करते हुए उनके कमानडर को मौत के घाट उतार कर बैरागल की लड़ाई जीत लिया।

     17वीं-18वीं शताब्दी तक आते आते नगर के गौतम राजाओं का इस क्षेत्र पर काफी प्रभाव हो गया था और बाद में अंग्रेजी शासन के दौरान भी इनका उल्लेख मिलता है। राव जगदेव, अरगल का एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में निरीक्षण अभियान पर थे। उस समय इस भूभाग पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। वह गौतम राजपूतों से पराजित हुआ। बैरागल का युद्ध अर्गल के महाराजा ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें (बैरागल) नगर के पड़ोसी क्षेत्र का राजा घोषित किया।

राजा जगदेव सिंह ने नगर राजधानी बनाई

इस वंश के गौतमवंशी संस्थापक जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। इनकी पत्नी विसेन वंशी क्षत्रिय कन्या थी। राव जगदेव, अरगल के एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में अभियान पर थे। उस समय नगर पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। ये लोग गौतम राजपूतों द्वारा पराजित कर भगा दिये गये थे। 

खूबसूरत और आकर्षक चन्दो ताल- 

प्राकृतिक सौंदर्य को खुद में समेटे बस्ती जनपद का चन्दो ताल देखने में बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक है। बाद में इस ताल को पक्षी विहार का भी दर्जा प्राप्त हो गया है। यह बस्ती जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर चंदों गांव में स्थित है। 5 किमी. लम्बी व 750 हेक्टेयर में फैला यह ताल 17 वीं शताब्दी का बना हुआ है।17 वीं शताब्दी में यह ताल राजभरो के चंद्रनगर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इनके अवशेष यहां पर तालाब की खुदाई के दौरान मिले भी थे। राव जग देव गौतम ने चन्दो तालाब के किनारे राजा का कोट नामक अपना किला बनवाया था। इसे राजा का कोट कहा जाता है। वर्तमान समय में यह अवशेष रूप में देखा जा सकता है।

बैरागल की लड़ाई के बाद राजा घोषित- अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव की बहादुरी के लिए उन्हें बैरागल (वर्तमान नगर) का राजा घोषित किया। उनके राज्याभिषेक के बाद, बड़े सैनिकों के साथ पठानों ने बैरागल के नए राज्य पर चढ़ाई कर दी थी। राव जगदेव ने वीरतापूर्वक युद्ध किया। पठानों के सेनापति को मार डाला और बैरागल की लड़ाई जीत ली। 

राजा भगवन्त राव - 

जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी।  अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था ।

राजा चंदे राव- 

बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हरा उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना  नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।

डोंगरापुर युद्ध- 

कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह थे जो नगर के राजा बने। एक युद्ध में राजा हरबंस सिंह वीरगति मिली जिसके परिणाम स्वरूप राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। उन्होंने डोंगरापुर युद्ध में अपनी विरासत का हिस्सा खोया था। डोंगरापुर संभवतः कलवारी के पास स्थित डींगरापुर मुस्तकम, डींगरापुर एहतमाली गांव हो सकता है। जिसके युद्ध में हरबंस सिंह  वीरगति को प्राप्त हुए और इस एवज़ में राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने।

     राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी ग्राम पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं। 

गनेशपुर भी रहा मुख्यालय - 

राजा गजपति राव ने अपना मुख्यालय गनेशपुर ले आये थे। उनके चार पुत्रों को गनेशपुर के 54 गांव प्राप्त हुये थे। ये नगर के गौतम वंशी राजाओं के हिस्से में आया था। इन लोगों ने यहां मिट्टी का एक किला बनवाया था जिसके किनारे -किनारे खाईयां लगवाई थी। इसके चारों ओर बॉस के बेड़े से सुरक्षित घेरा बनाया गया था । 

    व्रिटिस काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ था। उनके पौत्र राजा जय प्रताप सिंह डेंगरपुर के मिल्कियत के लिए हुए दंगे में मारे गये थे।

     नगर के राजा गजपतिराव सिंह के वारिस उनके बड़े पुत्र हरवंश सिंह हुए जिन्होने अपने छोटे पुत्र को 60 गांव दिया। इसके पांच पीढ़ी के बाद  राजा अम्बर सिंह के समय 60 और गांव या तो निकल गये या तो वेंच दिये गये। जिससे लगान की भरपाई की गई थी । यद्यपि राजा ने अपने आदमियों से बराबर के गांवों को जप्त कर लिया था। अम्बर सिंह के पौत्र निःसंतान थे। सम्पत्ति पुनः पैतृक शाखा में वापस चली आयी।

   1811-12 में राजस्व न दे पाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने इस संपत्ति को पिंडारियो को बेच दिया गया।1818 में बीबी मोती खानम द्वारा राजस्व ना दे पाने के कारण इस सम्पत्ति को पुनः बेच दिया गया। सरकार को उस समय रु 8343/– मिले थे। इसे अमीर खान पिंडारी के सेनापति कादिर बक्स ने ले लिया था। जिसने मराठा युद्ध के समय अपने को यहां सुरक्षित किया था और उसे पारितोषिक के रूप में मिला था। (संदर्भ : बस्ती का गजेटियर 1983 पृष्ठ 254-55)

विश्वनाथ सिंह पिपरा राज्य के राजा - 

इसी वंश परम्परा में विश्वनाथ सिंह शासक बने। उन्होंने नगर राज्य (पिपरा तालुक) का शासन संभाला था। राजा गजपति के छोटे पुत्रों को 60 गाँवों वाला पिपरा तालुक प्राप्त हुआ था । पिपरा के राव राम बक्श सिंह; उनके वंशजों ने इस तालुक पर शासन किया। इनके भाग के बारह गांव लगभग 7000 एकड़ वाला क्षेत्र ब्रिटिश अधिकारी मि. कुक को दिया गया। इसके बावजूद गौतमों ने उसे अपने नियंत्रण में ही ले रखा था। ये क्षेत्र पिपरा ,कलवारी, दुखरा और कनौला में लगभग 10,000 एकड़ में फैला हुआ था। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्ति पिपरा के राम बक्श सिंह थे। (नेविल का 1907 का गजेटियर पृष्ठ 248 )


रुधौली का बझेरा राज्य - 

राजा गजपति सिंह (गौतम राजपूत) उत्तर प्रदेश के बस्ती के रुधौली क्षेत्र के ऐतिहासिक "नगर" तालुके के भी प्रमुख शासक थे, जो अपनी वीरता और गौतम राजपूत वंश से संबंध के लिए जाने जाते हैं। यह यह रुधोली का प्रमुख गांव है जो बांसी के श्रीनेत्र राजा द्वारा स्वीकृत उत्तर वशी और रिश्तेदारों को मिला था। रुधौली के आसपास बझेरा एक प्रमुख भू भाग रहा है जो बरसात में पानी से भर जाता था । यह लगभग 1,792 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें लगभग 1,000 एकड़ में खेती होती है। इसका राजस्व रुपया 1,505 बनता है। ज्यादातर भूमि 1,565 एकड़ भैया जय लाल सिंह आनरेरी मजिस्ट्रेट के कब्जे में रहा है। भैया माधो प्रसाद सिंह के कब्जे में 4,338 एकड़ भू भाग रहा है। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ 260 )

अठदमा स्टेट - 

अठदमा के भैया बद्री प्रसाद के पास इस परगना की लगभग 8,572 एकड़ भूमि रही है। जिनके साथ अच्छा नहीं हुआ। वे आपस के काश्तकारों में उलझे रहे।इस प्रकार यह जिले का सबसे खराब गांव के रूप में बन गया था। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ  260 ) बाद में इस कुल ने अपनी स्थिति मजबूत की । ये अठदमा गांव के 'विलास कुंज' में अपना आशियाना बनाए। रुधौली के अंतर्गत अठदमा के राजा आदित्यविक्रम सिंह के पिता स्वर्गीय दिवाकर विक्रम सिंह यूपी सरकार में कई बार मंत्री और विधायक भी रह चुके हैं, उनकी इस विरासत को उनके बेटे आदित्य विक्रम सिंह ने भी संभाला और वे भी रुधौली सीट से विधायक बनते रहे। अब उनकी इस राजनीतिक विरासत को उनके बेटे पुष्कर विक्रम सिंह भी संभाल रहे हैं।



लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Monday, February 23, 2026

गौतम राजपूतों की उत्पत्ति और उनका प्रारंभिक अर्गल राज्य का परिचय✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

    गौतम राजपूत, भगवान राम के वंशज कुश से शुरू हुई सूर्यवंश शाखा से संबंधित हैं। वे कपिलवस्तु के प्राचीन शाक्य वंश से आते हैं, जिनके वंशज, सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) शाक्य कुल के थे। गौतम" गोत्र का पालन करने के कारण, गौतम क्षत्रिय अपनी परंपरा के अनुसार महर्षि गौतम या बौद्ध परंपरा के अनुसार गौतम बुद्ध (शाक्य) से संबंधित कहे जा सकते हैं।
गौतमों के प्राचीन राज्य : कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर,लश्करपुर ,कोराव, बारा (उन्नाव) और ओईया (बदायूं)था। वर्तमान समय में ये गाजीपुर, फतेहपुर, मुरादाबाद, बदायूं, कानपुर, बलिया, आजमगढ़, फैजाबाद, बांदा, प्रतापगढ, फर्रुखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर, बनारस, बहराइच, जिले (उत्तर प्रदेश) आरा, छपरा, दरभंगा (बिहार) चन्द्रपुरा, नारायण गढ (मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश) आदि जिलों में बसे हुए हैं।

        गौतम राजपूतों की उत्पत्ति

वंश भास्कर के अनुसार -
भगवान राम के किसी वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया । इसी वंश मे महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा। इसकी राजधानी कपिलवस्तु (गोरखपुर) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये। संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल) उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध के वंशज " गौतम " राजपूत कहलाते हैं। इस वंश में राव, रावत, राणा, राजा आदि पदवी प्राप्त घराने हैं।
अश्वघोष के अनुसार - 
गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था । उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था। कई इक्ष्वाकु- वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे ।कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम गोत्री कहलाए ।
      गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी वंश में हुआ था। शाक्य राज्य पर कोशल नरेश विदुदभ द्वारा आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया गया था जिसके बाद बचे हुए शाक्य गौतम क्षत्रियों द्वारा अमृतोदन के पुत्र पाण्डु के नेतृत्व में अर्गल राज्य की स्थापना की गयी। अर्गल आज के पूर्वांचल के फतेहपुर जिले में स्थित है।
गौतमों का अर्गल राज्य - 
ऐतिहासिक रूप से, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अरगल के राजा खुद को शाक्यवंशी गौतम मानते थे, और यह क्षेत्र उनका प्रमुख केंद्र रहा है। अरगल राज्य, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में स्थित एक प्राचीन और ऐतिहासिक गौतम राजपूत रियासत थी। जो अपनी शक्ति और समृद्ध इतिहास के लिए जानी जाती थी। पहले यह अयोध्या के सूर्य वंश से सम्बद्ध माना जाता था बाद में इसे बुद्ध के शाक्य वंश से भी जोड़ा जाने लगा। ये लोग गौतम ऋषि से दीक्षा लेने के कारण गौतम वंशी कहलाए। अरगल स्टेट पर अरगल राज्य के इतिहास को लेकर लिखी गई पुस्तक के चौथे खंड के पेज नंबर 31 पर अरगल स्टेट के राजा हिन्दू संस्कृति सभ्यता, धर्म एवं क्षत्रित्व की भावना से ओत-प्रोत रहे हैं। अपने धर्म एवं स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हर प्रकार के बलिदान देने को तत्पर थे।
     प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी राजा अंगददेव ने अर्गल से 3 मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है। इनकी वंशावली इस प्रकार है – 
१- राजा अंगददेव
२- बलिभद्रदेव
३- राजा श्रीमानदेव
४- राजा ध्वजमान देव
५- राजा शिवमान देव :-
      राजा शिवमान देव ने अर्गल से 1 मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।
चंद्रावर का युद्ध - 
वर्ष 1192 में मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान को पराजित करने के पश्चात गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। 1194 में चंद्रावर के मैदान (इटावा जनपद) में दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ। इस युद्ध में अरगल नरेश रत्नेश के भाई वीरसेन ने कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध जयचंद के सहायतार्थ मोर्चा संभाला और वीर गति को प्राप्त हुए थे। कन्नौज के राजा जयचंद की बहन अरगल नरेश रत्नसेन को विवाहित थी। जयचंद को मुस्लिम आक्रमण का आभास पहले से था। कहा जाता है इस कारण जयचंद ने अपना खजाना ऐबक के आक्रमण से पूर्व अरगल नरेश रत्नेश के पास स्थानांतरित कर दिया था। इस बात की पुष्टि इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया भी करता है। 
    13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था। उस समय अर्गल राज्य में अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर और बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे।1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व बैस ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था ) और फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है।
चौसा युद्ध हुमायूं हारा था - 
अर्गल के गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली। जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया। फिर भी बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही।
यमुना तट पर विशाल सीकरी का किला- 
अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया।
15वीं शताब्दी में, राजा मर्दन सिंह ने जो यमुना नदी के किनारे एक विशाल और मजबूत किला बनाया था, जो लगभग 60 बीघा में फैला था। यह क्षेत्र कन्नौज साम्राज्य का हिस्सा था और आज भी इसके खंडहर गौरवशाली अतीत के गवाह हैं। आज अरगल का किला खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन यह फतेहपुर के प्राचीन इतिहास और गौतमों के गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। 
अकबर का समय - 
1556 ई. में अकबर के शासनकाल में कालपी के सूबेदार ने तत्कालीन अरगल नरेश राजा भैरोशाह को परास्त कर इस राज्य को मुगलों के अधीन कर लिया।यह रियासत अपने धर्म, स्वतंत्रता और वीरता के लिए जानी जाती थी। 16 वीं शताब्दी में राजा त्रिलोक चंद के समय यह काफी शक्तिशाली थी। 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

Saturday, February 21, 2026

महाराज कुमार बाबू रंगनारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' की काव्य साधना (बस्ती जनपद के छंदकार संख्या 31)::आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

(नोट: रंगपाल जी से संबंधित 3 अन्य कड़ियां इसी शृंखला में पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें कड़ी संख्या 06 दिनांक 16 अप्रैल 2017 को परिचयात्मक रूप में; कड़ी संख्या 08 दिनांक 19 मई 2017को शृंगार रस के रूप में तथा कड़ी संख्या 18 दिनांक 07 मार्च 2020 को फाग गीत के रूप में पढ़ा जा सकता है।)

जीवन परिचय 
दरदीदिल की दरदको दरदी दिलहीजनाय। 
बेदरदी जानै कहां रंगपाल मुस्काय। 
   रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जू वर्मा 'वीरेश' का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती मण्डल के नव सृजित सन्तकबीरनगर के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी, तदनुसार 20 फरवरी सन1864 ई को हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर वत्स पाल तथा माता का नाम श्रीमती सुशीला देवी था। कवि के बचपन का नाम रंग नारायण पाल जू वर्मा था। उनके पिता श्री विश्वेश्वर बक्श पाल जमींदार थे। पिता के विषय में स्वयं रंगपाल जी ने अपने ग्रंथ “वीर विरुद्ध” की पूर्णता के समय लिखा था। इसमें उनके वंश परम्परा का संक्षिप्त परिचय मिलता है - 
छत्रिय प्रवर सूर्यवंश रामचंद्र कुल 
ठाकुर प्रसाद पाल वीर वर दानिये ।
ईश्वरी प्रसाद पाल तिनके तनय अरु,
तिनके विश्वेश्वर बक्श पाल जानिए।
तिनको है सुत रंगपाल नाम धाम ग्राम, हरिहर पुर सरवार देश मानिए ।
ग्रंथ 'वीर विरुद्ध' बखान्यो विक्रमीयशुभ,
संवत उन्नीस सौ उन्यासी सुखखानिये।।

कवियित्री मां से मिली प्रेरणा
माता सुशीला देवी संस्कृत और हिंदी की विद्वान थीं। कवि पर अपनी माता का प्रभाव गहरा था। वही उनके बचपन की गुरु थीं। उनके पिता जी राजा महसों के राज्य के वंशज थे। वे एक समृद्धशाली तालुक्केदार थे। वे साहित्यिक वातावरण में पले हुए थे । विदुषी मा के सानिध्य और साहित्य का अटूट लगाव का पूरा प्रभाव रंगपाल पर पड़ा, जिसका परिणाम था कि स्कूली शिक्षा से एकदम दूर रहने वाले रंगपाल में संगीत की गहरी समझ आ गई थी। 
   ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान’ के भाग 1 में शोध कर्ता डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 59 से 90 तक 32 पृष्ठों में रंगपाल जी का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने इन्हें द्वितीय चरण के प्रथम कवि के रुप में चयनित किया है। वह एक आश्रयदाता, वर्चस्वी संगीतकार तथा महान कवि के रुप में प्रतिस्थिापित हुए हैं। उनके आश्रय में कवि महीनों उनके सान्निध्य में रहते थे और उन्हें बहुत सामान तथा पैसा के साथ वे विदा करते थे। उनकी शादी 18 वर्ष की उम्र में हुई थी। 
     युवा मन, साहित्यिक परिवेश, बचपन से ही तमाम कवियों व कलाकारों के बीच रहते-रहते उनके फाग में भाषा सौंदर्य श्रृंगार पूरी तरह रच-बस गया था। 

         रंगपाल जी के फाग की देश में ही नहीं विदेशों में भी धूम रहती है। पुरानी परंपरा, मर्यादा, संस्कृति, सब भूलकर हम नई संस्कृति में जा रहे हैं, जो अपने मातृ भूमि के साथ धोखा है। मधुरता, भाव, देशी अवधी ब्रजभाषा, भोजपूरी भाषा मिठास का जो भाव मिलेगा वह किसी और में नहीं मिलेगा।

प्रकाशित रचनायें :- 

उनकी अंगादर्श, रसिकानंद, सज्जनानंद, प्रेम लतिका, शांत रसार्णव, रंग उमंग और गीत सुधानिध आदि रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

अप्रकाशित रचनाएं

अप्रकाशित ग्रंथों में रंग महोदधि, ऋतु रहस्य , नीति चन्द्रिका, मित्तू विरह वारीश, खगनामा, फूलनामा, छत्रपति शिवाजी, वीर विरुद,गो दुदर्शा, दोहावली तथा दर्पण आदि हैं। “छत्रपति शिवाजी” और “वीर विरुद्ध” के सैकड़ो छंद “सुकवि” और “रसराज” आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी में अनेक कवियों , संभा्रन्त जनों तथा पत्र पत्रिकाओं के पते तथा लिंक मिले है। 

    अपने शोध के दौरान स्मृति शेष डॉ. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’जी को बस्ती के कवि श्री भद्रसेन सिंह भ्रान्त/बन्धु से अनेक पाण्डुलिपि व डायरी देखने को मिली थी। जिससे उनका शोध प्रवन्ध बहुत ही प्रमाणिक बन पड़ा है। 

समाधि स्थल

रंगपाल जी की मृत्यु 62 वर्ष की अवस्था में भाद्रपद कृष्ण 13 संवत 1993 विक्रमी /1936 ई. में हुआ था। हरिहरपुर नगर पंचायत के राजघाट पुल के पास महाकवि रंगपाल का अंतिम संस्कार किया गया था। श्री रामभरोस पांडे, श्री भगवान दास गुप्त ने स्थानीय लोगों के सहयोग से समाधि स्थल का निर्माण करवाया था। जिसका लोकार्पण कवि रामधार त्रिपाठी ने 4 मार्च 1978 को किया था। हरिहरपुर नगर पंचायत की पहचान इन्हीं से जानी जाती है।

    पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने कहा कि रंगपालजी की समाधि स्थल जो कष्टहर्णी नदी के स्थल पर है काफी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। मरम्मत कराने के साथ ही संग्रहालय बनाने की जरूरत है। 

    हरिहरपुर में मशहूर कवि जो रंगपाल जी के साथ कविता लिखते हैं - बद्री प्रसाद, आद्या प्रसाद, शिवेन्द्र, शिवबदन चतुर्वेदी, मातादीन त्रिपाठी के स्मृति में मुख्य चौराहे पर पांच मूर्तियां लगाने के लिए जिला अधिकारी से आग्रह किया जा चुका है।

रंगपाल जी अविस्मरणीय हैं

महाकवि रंगपाल लोकगीतों, फागों व विविध साहित्यिक रचनाओं में आज भी अविस्मरणीय हैं। दुनिया भर में अपने फाग गीतों से धूम मचाने वाले महाकवि रंगपाल अमर हैं। फाल्गुन मास लगते ही 

सखि आज अनोखे फाग ..../ 

बीती जाला फाल्गुन ,आए नहीं नंदलाला से

रंगपाल के फाग का रंग बरसने लगता है।  आज रंगपाल की धरती पर ही, फाग विलुप्त हो रहा है। इक्का-दुक्का जगह ही लोग फाग गाते हैं। महाकवि के जन्म स्थली पर संगोष्ठी के साथ फाग व चैता का रंग छाया रहा। 

झूमर फाग

एक झूमर फाग में महाकवि रंगपाल ने श्रीकृष्ण व राधा के उन्मुक्त रंग खेलने का मनोहारी चित्रण कुछ इस तरह किया है -

सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।

बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।

खेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत गोरी।

सखी फागुन बीति जाला, नहीं आये नंदलाला।

प्रेम बढ़ाय फंसाय लियो।

     रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अंतरात्मा में गूंज रहे थे। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। वियोग श्रंगार का उनके एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है - 

ऋतुपति गयो आय हाय

गुंजन लागे भौंरा।

भयो पपीहा यह बैरी,

नहि नेक चुपाय।

लेन चाहत विरहिनि कै

जिमरा पिय पिय शोर मचाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।

विरहि करेज रेज बैरी मधु 

दिये नेजन लटकाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

अजहुं आवत नहीं दैया, 

मधुबन रहे छाय।

रंगपाल निरमोही बालम, 

दीनी सुधि बिसराय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

    रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है -

यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।

राज प्रजा नर नारि सब 

घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।

होरी होरी है।

बरस बरस को दिन मन भायो, 

हिलि मिलि सब खेलहुयार।

होरी होरी है।

रंगपाल असीस देत यह 

सब मगन रहे फगुहार।

होरी होरी है।

यहि द्वारे मंगलचार 

होरी होरी है।

    रंगपाल जी भक्ति भावना उनके शान्त रसार्णव गंथ में सूर तुलसी तथा मीरा को भी मात देती है -

बोलिये जो नहिं भावत तो 

एक वारहि आंखि मिलाई तो देखो।

जो नहि हो तो सहाय कोऊ 

लखि दीन दशा पछताय तो देखो।

रंग जू पाल पिछानतो नाहिं

कछु कहि धीर धराइ तो देखो।

छोरि विपत्ति तो लेतो नहिं, 

भलाबुन्द दुह आंसू गिराय तो देखो।।


देखत काहि सोहाय भला अरु 

को दृग जोरि कै नय सुख जोवै।

कौन सुनै गुनै पाछिलिहि प्रीतिहि 

यातेन काहूय जाय कै रोवै।

रंग जू पाल पड़े सो सहै औ 

रह्यो सह्यो भ्रम काहू पै खोवै।

वर्षा गीत

वर्षा गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है, जिसमें मनभावन छटा झलकता है-

मुदित मुरैलिन के कूकत कलापी आज,

तैसे ही पपीहा पुंज  पीकहि पुरारै री।

लपटि तरुन लोनी लतिका लवंगन की ,

चहुं दिशि उमगि मिले हैं नदी नारे री।

रंगपाल एरी बरसा की य बहार माहि,

आये नहि हाय प्रान प्रीतम हमारे री।

धूरिये धारे धुरदान, चहु धाय धाय,

गरजि गरजि करैं हियै में दरारे री।।

बसन्त गीत

इसी क्रम में बसन्त ऋतु का एक चित्रण दर्शनीय है -

भूले भूले भौंर चहु ओर भावंरे से भरैं,

रंगपाल चमके चकोर समुदाई है।

कुसुमित तरु जू भावन लगे हैं मन,

गावन त्यों कोकिल को गांवन सुहाई है।

सुखप्रद धीरे धीरे डोलत समार सीरो,

उड़त पराग त्यों सुगंध सरसाई है।

विपिन समाज में दराज नवसाज भ्राज,

आज महाराज ऋतुराज की अवाई है।।

शरद गीत

शरद गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है इसकी छटा भी निराली है -

अमल अवनि आकाश चन्द्र प्रकाश रास हरि।

कुंद मालती कासकंस कुल विमलक सर सरि।

चंहकित हंस चकोर भंवर धुनि खंजन आवन।

पूजन पितृ सुदेव सुखिन मगधावनि धावन।।

अरु उदित अगस्त पयान नृप दीपावलि गृहचित्र तिमि।

घन श्वेत साजहू वरनि के रंगपाल ऋतु सरद इमि।।

वरिज विकास पर मालती सुवास पर ,

माते मधु पालिनी के सरस विलास पर।

भनय रंगपाल निम लाई आस पास पर ,

कुसुमित कास पर हंसन हुलास पर।

फैली अलबेली आज सुषमा सरद वारी,

जलज निवास पर अवनि अकास पर।

तारागण भास पर चांदनी सुहास पर,

चन्द्र छवि रास पर राधा वर रास पर।।

डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस द्वारा मूल्यांकन :- 

“रंगपालजी ब्रज भाषा के प्राण थे। श्रृंगार रस के सहृदयी कवि और वीर रस के भूषण थे। उन्होंने अपने सेवाओं से बस्ती जनपद छन्द परम्परा को गौरव प्रदान किया। उनके छन्दों में शिल्प की चारुता एवं कथ्य की गहराई थी। साहित्यिक छन्दों की पृष्ठभूमि पर लिखे गये फाग उनके गीत संगीत के प्राण हैं। रीतिकालीन परम्परा के समर्थक और पोषक रंगपालजी की रचनाओं में रीतिबद्ध श्रृंगार और श्रृंगार बद्ध मधुरा भक्ति का प्रयोग उत्तमोत्तम था। श्रृंगारेतर रचनाएं राष्ट्रीयता की भाव भूमि पर मुखरित हो सश्वर गूंज उठी है। आपकी रचना पर पद्धति युग अनुरूप साहित्यिक प्रवृत्ति एवं विषय वस्तु की अर्वाचीन और वर्तमान साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकक्ष है। आपकी काव्य कला रसिकता की चारुता साधना की भाव भूमि पर बड़ी ही मनोहारी है प्रकृति के परिपेक्ष में आलंबन और उद्दीपन के चित्र मन को मुग्ध कर लेते हैं। आपके सानिध्य में बस्ती जनपद के छंदकारों को जो सहयोग मिला उसका वर्णन आज के जनपदीय साहित्यिक समृद्धि के परिपेक्ष में जितना भी किया जाए कम है। कुल 15 ग्रंथों में प्रकाशित अप्रकाशित जो भी हो रंगपाल के काव्य कला का रूप अपना अनूठा है। आपके ग्रन्थों पर एक वृहद स्वतंत्र शोध की अपेक्षा है । अप्रकाशित पुस्तक प्रकाशित होकरके हिंदी काव्य धारा का प्राण बने ऐसा मंतव्य है। आपका युगान्तकारी व्यक्तित्व साहित्य के अंग उपांगों को सदैव नयी चेतना देगा एसा विश्वास है।”

संस्कृतिक विभाग से रचनाओं का संग्रहण 

उत्तर प्रदेश संस्कृतिक विभाग के माध्यम से उनकी रचनाओं को संग्रहित- संकलित कर परीक्षण कराने का प्रयास हो रहा है। अपने कार्यकाल के दौरान रंगपाल की कृतिया और उनसे जुडे साज सामान को सांस्कृतिक धरोहर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पाल सेवा संस्थान तथा उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग प्रति वर्ष पाल जी के जन्म का उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। 

रीतिकालीन कवियों के आश्रय दाता

कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रयदाता कवियों में गिने जाते हैं। उनकी फाग रचनाओं में जहां श्रृंगार रस की प्रधानता है तो वहीं देशभक्ति के गीतों में वीर रस का समावेश है। उनके देशभक्ति के गीतों में महान सपूतों और वीरांगनाओं की वीरता का रोमांचक वर्णन है।

कालजयी रचनाएं

कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएं देश भक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। 

'रंगपाल के फाग’ प्रकाशित 

श्री राधेश्याम श्रीवास्तव श्याम हरिहरपुरी संत कबीर नगर द्वारा संपादित तथा चैहान पब्लिकेशन्स सैयद मोदी स्मारक गीताप्रेस गोरखपुर से ‘रंगपाल के फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें रंग उमंग भाग १ व भाग २ तथा रंग तरंगिणी का अनूठा संकलन किया गया है। इसमें विविध उमंगों में फाग के विविध प्रकारों को श्रेणीबद्ध किया गया है। डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने अपने शोध ग्रंथ बस्ती के छन्दकार में रंग उमंग के दोनों भागों का प्रकाशन की सूचना दी है। यह हनुमानदास गया प्रसाद बुकसेलर नखास चैक गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है।

लोकगीत अंतरात्मा में गूंजते हैं 

रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अंतरात्मा में गूँजते रहे हैं। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। 

मंगलाचरण :- फाग गीतों के संयोग और वियोग दोनो पक्षों को उजागिर किया गया है। दोनों के प्रारम्भ में दो-दो दोहों में मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया है- 

आनन्द मंगल रास रस हसित ललित मुख चंद।

रंगपाल हिय ललित नित ध्यान युगल सुखचन्द।

रंग उमंग तरंग अंग , रस अमंग सारंग।

रंगपाल बाधा हरण, राधा हरि नव रंग।।

रंग उमंग भाग 1 में 32 पृष्ठ है। कुछ छन्द प्रस्तुत हैं - 

ऋतु कन्त बिन हाय, लगो जिय जारने।

बिरहिन बौरी कान आम ये बौरे बौरे।

गुंजत भुंग गात मत्त मधु दौरे मधु दौरेभौरे।

बैरी विषय पपीहा पिय पिय यह लागी शोर मचाय -बानसो मारने।।1।।

फूले टेसु अनार और कचनार अपारे।

दहके जन चहुं ओर जो निरपूम अंगारे।

बीर समीर सुगंध बगारत,

बिरहांगिनियां थपकाय लगे अब बारने।2।

अमितपराग उड़ातजात लखि चित्त उड़ाई।

करि चहचही चकोर देत् हठि चेत भगाई।

कारी कोइलिया दई मारी,

दिन रतियां कूक सुनाय लगी हियफारने।3

पीर भीर मैं धीर धरहूं को नहिं आवै।

रहै लोक की लाज चहै जावै मन भावै।

करि योगिनी को भेष भ्रमब अब

सखि रंगपाल वलि जाय पिया कारने।4।

झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है। –

अति धूमधाम की आज होरी ह्वै रही।

डारहिं केसर रंग झपट भरि भरि पिचकारी

झमकिअबीर की झोरिझेलिदेवैकिलकारी।

मेलहिं मूठ गुलाल परसपर ,

क्वउ रहत नहीं कुछ बाज होरी ह्वै रही।1

कहहिं कबीर निशंकझूमिझुकिबांहपसोरी।

उछल विछलि मेड़राय विहंसिदेवै करतारी।

नाचत गावत भाव बतावत,

बहु भांति बजावहिं बाज होरी रही।।।2।।

विविध स्वांग रचि हंसि हंसाय देवैंहोहकारी।

फूले अंग न समहिं नारि गन गावै गारी।

पुलकित आनंद छाक छके सब,

सजिनिज निज साज समाज होरी ह्वै रही।

ढपटि लपटि मुख चूमि लेहि घूुघट पर टारी।।

रोरी मलहिं कपोल भजहिं कुमकुमा प्रहारी।

रंगपाल तजि लाज गई भजि ,

मदन को राज होरी ह्वै रही।।4।। 

चैताली झूमर फाग के कुछ छन्द प्रस्तुत है 

यह कैसी बानि तिहारी अहो प्रीय प्यारी।

बैठी भोहें तानि जानि क्यों होहु अनारी।

आपुते लीजे जानि बिरह दुख कैसो भारी।

लेति बलाय एक तूहि बलि ,

जियरा की जुड़ावन हारी अहो पिय प्यारी।

केती इत उत करहिं  अनैसी झूठी चोरी।

मुख पर चिकनी बात, देहिं पीछे हंसि तारी 

आगे आगि लगाये कुटिल पुनि ,

बनि जांहि बुझावन हारी अहो पिय प्यारी।

रंग उमंग भाग 1 के एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है-

ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा।

भयो पपीहा यह बैरी, नहि नेक चुपाय।

लेन चाहत विरहिनि कैजिमरा पिय पिय शोर मचाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।

विरहि करेज रेज बैरी मधु दिये नेजन लटकाय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

अजहुं आवत नहीं दैया, मधुबन रहे छाय।

रंगपाल निरमोही बालम, दीनी सुधि बिसराय।

हाय गुंजन लागे भौंरा।

रंग उमंग भाग 2 :-

प्रथम भाग की तरह रंग उमंग भाग 2 फाग गीतों की बासंती छटा विखेरता है। वे ना केवल रचयिता अपितु अच्छे गायक भी थे। सारे गीत बड़े ही मधुर हैं। कुछ के बोल इस प्रकार हैं-

हाय बालम  बिनु दैया।

पिय बनही से बोलो उनहीं के घूघट खोलो,

कहो कौन की चोरी  फगुनवा में गोरी ,

दोउ खेलत राधा श्याम होरी रंग भरी,

सखि आज बंसुरिया बाला, गजब करि डाला,

कहां बालम रैनि बिताये भोर भये आये।।

उनके गीत मनको बरबस हर लेते हैं।  रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-

यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।

राज प्रजा नरनारि सब 

घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।

होरी होरी है।

बरस बरस को दिन मन भायो,

हिलि मिलि सब खेलहुयार।

होरी होरी है।

रंगपाल असीस देत यह 

सब मगन रहे फगुहार।

होरी होरी है।

यहि द्वारे मंगलचार ।

होरी होरी है।

‘रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक के उमंग भाग 4 एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है। यह गीत रंगपालके फाग’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है-

सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।

बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।

रेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत झोरी।

कुमकुम चोट चलाय परस्पर ,

अति बिहंसहिं युत अनुराग,

बरसहिं सुमन कली ।।1।।

तिहि छल छलिया छैल बरसि रंग करि रस बोरी ।

प्यारी की मुख चूमि मली रोरी बरजोरी ।

तबलौं आतुर छमकि छबीली,

छीनी केसरिया पाग लीनी पकर अली। 2।

चुनि चूनरि पहिराय दई रोरी अंजनबरजोरी 

नारि सिंगार बनाया कपोलन मलि देईरोरी।

तारी दै दै हंसति कहति सब,बोलहुं किन श्याम सभाग सुनियत रामबली।4।

अपनों करि पुनि छोड़ि कहति नन्दकिशोरी 

भूलि न जइयो बीर रंगीली आज की होरी 

रंगपाल वलि कहहिं देवगन,धनि धनि युग भाग सुहाग-अली प्रेम पली।।5।।

सखि आज0।।

     रंग उमंग भाग 1 व 2 की तरह गीत सुधा निधि में डा. सरसजी ने 200 फाग व होरी गीतों तथा कजली गीतों के प्रकाशन की सूचना दी हैं। यह ग्रंथ प्रथम बार पूना और बाद में गोरखपुर से प्रकाशित हुई है। सम्पूर्ण पुस्तक में प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में वर्णन का वियोग और संयोग पक्ष अपने में न्यारा है। एक छन्द प्रस्तुत है-

गरजत मंद मंद घन घेरे,

बरसत झर झर सलिलि दामिनी दम कि रही  चहुं फेरे।

झिल्ली गन दादुर धुनि पूरित पिय पिय पपिहन टेरे।

मत्त मुरैलिन मध्य मोर नचि कूकत धाम मुड़ेरे।

झूलत मुदित प्रिया अरु प्रीतम, दोउ मणि मंदिर मेरे।

अलि मडराहिं सहस सौरभ लहि देति चंबर अलि फेरे।

रंगपाल बारत रति कामहिं उपमा मिलत न हेरे।।

     कवि रंगपाल को उनकी उत्कृष्ट रचना के लिये हिंदी साहित्य के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद जी ने उन्हें महाकवि की उपाधि से अलंकृत किया था। यों तो कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएँ देशभक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं। कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रय दाता कवियों में गिने जाते हैं। 



लेखक का परिचय
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वर्डसैप्प नम्बर + 91 9412300183)







Friday, February 20, 2026

अयोध्या राजशाही की वर्तमान समय की विभिन्न गतिविधियां और राजसदन को उच्चीकृत किया जान :: ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


शैलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र वर्तमान प्रमुख हैं 

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात हुआ था। विमलेंद्र मिश्रा के छोटे भाई शैलेंद्र प्रताप मिश्र अयोध्या के साकेत महा विद्यालय की प्रबंध समिति के अध्यक्ष हैं।

वेअयोध्या राजवंश से जुड़ी व्यवस्था को देखते हैं। विमलेंद्र के निधन के बाद, उनके छोटे भाई शैलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र इस परंपरा और राजवंश के संरक्षक के रूप में जाने जाते हैं, जो अयोध्या के सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सक्रिय हैं।

अपर्णा मिश्र

अपर्णा मिश्र अयोध्या के राजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की वंशावली में चौथी पीढ़ी में राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की पाँचवीं सन्तान के रूप में हैं। डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्व विद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। साहित्य के अध्ययन, अनुशीलन के साथ ही अपर्णा मिश्र ने संगीत की भी शिक्षा ली है। वे आकाशवाणी केन्द्र, लखनऊ की अवधी लोकगायन विधा में ‘बी-हाई ग्रेड’ की नियमित कलाकार हैं। सन् 2003 से अयोध्या स्थित महाराजा पब्लिक स्कूल का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए उसकी अवैतनिक निदेशिका के तौर पर कार्यरत हैं। उन्हें अवधी के लोकगीतों के संरक्षण और संकलन में विशेष रुचि है। 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार ने मलाला दिवस के अवसर पर, जिसे ‘कन्या शिक्षा और सुरक्षा दिवस’ घोषित किया गया है, इन्हें सम्मानित किया। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

मंजरी मिश्रा

विमलेंद्र प्रताप मिश्र की मंजरी मिश्रा बेटी है। जो मां की स्मृति में कला शिल्प की एक संस्था “शिल्प मंजरी” चलाती है। राजकुमारी मंजरी मानती हैं, कि “वह बहुत भाग्यशाली थीं कि, उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जिसकी इतनी समृद्ध विरासत रही है।” वह अवध में ही पली- बढ़ीं हैं। राजकुमारी मंजरी मिश्र का अपना खुद का व्यवसाय है, जिसमें वह साड़ी, कपड़ा और आभूषणों का व्यापार करती हैं। उनके ब्रांड का नाम "शिल्प मंजरी" है। अयोध्या या अवध अपनी पारंपरिक हस्तकला जैसे आरी, जरदोजी और चिकनकारी के लिए प्रसिद्ध है। इस हुनरमंद काम को करने वाले कई कारीगर अयोध्या और फैजाबाद में रहते थे तथा पीढ़ियों से मिश्र परिवार के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन चूँकि स्थानीय स्तर पर उनके लिए पर्याप्त काम नहीं था, इसलिए इनमें से कई कारीगरों को जीविकोपार्जन के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ता था। हालांकि राजकुमारी मंजरी मिश्र इनके लिए अँधेरे में चिराग लेकर आई, और "शिल्प मंजरी" नामक एक शिल्प परियोजना उन्होंने इन्हीं कारीगरों की मदद करने के लिए शुरू की है। इस परियोजना के माध्यम से, वह कई होनहार कारीगरों को रोजगार देती है, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम होते हैं।

यतींद्र मोहन प्रताप मिश्र 

विमलेंद्र प्रताप मिश्र के बेटे यतींद्र प्रताप सहित्यकार हैं। यतीन्द्र मिश्र युवा हिन्दी कवि, सम्पादक, संगीत और सिनेमा अध्येता हैं। वे  प्रख्यात संगीतकार और राष्ट्रीय कवि हैं। यतींद्र ने लता मंगेशकर पर ‘लता सुर गाथा’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जिस पर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।उनके अब तक चार कविता- संग्रह- ‘यदा-कदा’, ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’, ‘ड्योढ़ी पर आलाप’ और ‘विभास’; शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर एकाग्र ‘गिरिजा’, नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद पर आधारित ‘देवप्रिया’ तथा शहनाई उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के जीवन व संगीत पर ‘सुर की बारादरी’ प्रकाशित हैं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर ‘विस्मय का बखान’, कन्नड़ शैव कवयित्री अक्क महादेवी के वचनों का हिन्दी में पुनर्लेखन ‘भैरवी’, हिन्दी सिनेमा के सौ वर्षों के संगीत पर आधारित ‘हमसफ़र’ के अतिरिक्त फ़िल्म निर्देशक एवं गीतकार गुलज़ार की कविताओं एवं गीतों के चयन क्रमशः ‘यार जुलाहे’ तथा ‘मीलों से दिन’ नाम से सम्पादित हैं। गिरिजा’ और ‘विभास’ का अंग्रेज़ी, ‘यार जुलाहे’ का उर्दू तथा अयोध्या शृख़ला कविताओं का जर्मन अनुवाद प्रकाशित हुआ है। इनके अतिरिक्त वरिष्ठ रचनाकारों पर कई सम्पादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ फैलोशिप, रज़ा सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, हेमन्त स्मृति कविता सम्मान सहित भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय की कनिष्ठ शोधवृत्ति एवं सराय, नयी दिल्ली की स्वतन्त्र शोधवृत्ति मिली हैं। इन्होंने दूरदर्शन (प्रसार भारती) के कला-संस्कृति के चैनल डी.डी. भारती के सलाहकार के रूप में सन् 2014-2016 तक अपनी सेवाएँ दी हैं।    

     साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु भारत के प्रमुख नगरों समेत अमेरिका, इंग्लैण्ड, मॉरीशस एवं अबु धाबी की यात्राएँ की हैं। अयोध्या में रहते हैं तथा समन्वय व सौहार्द के लिए ‘विमला देवी फाउण्डेशन न्यास’ के माध्यम से सांस्कृतिकगतिविधियाँ संचालित करते हैं।

      दिनांक 7 अप्रैल 2017 को फिल्म समारोह निदेशालय, भारत सरकार द्वारा वाणी प्रकाशन से आई यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक 'लता सुर-गाथा' को 'स्वर्ण कमल' से सम्मानित करने की घोषणा की गयी थी। वह विविध भारती में अपनी सेवा दे चुके हैं. अभी विमलेंद्र मिश्र मां विमला देवी के नाम से समाजसेवी संस्था 'विमला देवी फाउंडेशन न्यास' चलाते हैं. संस्‍था राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, संगीत, कला के लिए काम करती है.यतीन्द्र मोहन प्रताप मिश्र ख्यातिलब्ध साहित्यकार होने के साथ- साथ विविध भारती के सलाहकार के पद पर कार्यरत हैं। वे प्रख्यात संगीतकार और राष्ट्रीय कवि हैं। यतींद्र ने लता मंगेशकर पर ‘लता सुर गाथा’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, जिस पर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

राजमहल को हेरिटेज होटल की शक्ल देकर नयी पहचान देने की कोशिश

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान्  श्रीराम की नगरी में आध्यात्म के साथ-साथ धार्मिक नगरी की शानो शौकत का प्रतीक अयोध्या राजपरिवार का राजमहल को अब हेरिटेज होटल की शक्ल देने की तैयारी पूरी की जा रही है और इसका खाका तैयार कर लिया गया है। प्रदेश सरकार से इसकी अनुमति भी मिल गयी है। अयोध्या नगर के बीचों बीच स्थित राजसदन के विशाल प्रांगण में अयोध्या के राजपरिवार के सभी सदस्य रहते हैं, लेकिन अयोध्या राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के अनुरोध पर प्रदेश सरकार ने इस राजमहल को एक हेरिटेज होटल के रूप में विकसित करने का रास्ता साफ़ कर दिया है। वहीं राजपरिवार ने भी हेरिटेज होटल के रूप में राजसदन का पंजीकरण करा लिया है।

आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस होगा

दुनिया में धार्मिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध अयोध्या को विश्व के पर्यटन मानचित्र पर उभारने के लिए राजस्थान और मध्य प्रदेश के पुराने शहरों में स्थित राज महलों की तर्ज पर अयोध्या राजवंश परिवार के राजसदन को हेरिटेज होटल की शक्ल के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसके लिए निर्माण सम्बन्धी खाका तैयार किया जा रहा है। राजमहल के विशाल परिसर में स्थित सुन्दर भवन और उसमें बने विभिन्न कमरों का रंग रोगन कर उन्हें नर्इ शक्ल दिए जाने की योजना है। वहीं परिसर में मौजूद प्राचीन स्थापत्य कला के नमूनों को भी संरक्षित कर उन्हें पर्यटकों के सामने पेश करने की योजना है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)