भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यात्रा-वृत्तान्त 'सरयू पार की यात्रा' (फरवरी 1879) हिन्दी साहित्य का एक प्रमुख और आरंभिक यात्रा-वृत्तान्त है। यह यात्रा उन्होंने रामनवमी के अवसर पर बनारस से अयोध्या के लिए की थी, जिसके दौरान वे बस्ती भी पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान भारतेन्दु जी को भीषण गर्मी, थका देने वाली यात्रा और भारी अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था।
उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी चुनाव प्रचार के सिलसिले में बस्ती में थे। बस्ती में जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो विपक्षी दलों पर निशाना साधना तो बनता था। योगी ने गिनाना शुरू किया- पहले यह नगर कूड़े का ढेर हुआ करता था। शोहदों का आतंक था। व्यापारी रंगदारी देने के लिए मजबूर रहता था। नगरों में कहीं जलजमाव की समस्या, कहीं पेयजल की समस्या रहती थी। पहले युवाओं के हाथों में तमंचे पकड़ाए जाते थे... आदि-आदि। यह सब कहते योगी को अचानक हिंदी के एक साहित्यकार का जुमला भी याद आ गया, जो उसने दशकों पहले बस्ती को लेकर कह दिया था। योगी जिस साहित्यकार के जिस जुमले की बात कर रहे थे, वो स्वतंत्र भारत से भी काफी पहले इस दुनिया से रुखसत कर गए थे। उन्हें सिर्फ 35 साल की उम्र मिली थी। यात्रा के शौकीन थे और सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि जिस हिंदी की राजनीति भाजपा करती है, उस भाषा के साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। उस साहित्यकार का नाम है- भारतेंदु हरिश्चंद। 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में जन्में भारतेंदु हरिश्चंद हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। सिर्फ 35 वर्ष की आयु में उन्होंने आधुनिक हिंदी को साहित्य में स्थापित करने के लिए बड़े-बड़े काम किए। हिंदी साहित्य का इतिहास में काल विभाजन के दौरान नामकरण में भारतेंदु के नाम से एक युग भी तय किया गया है। हिन्दी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उन्होंने काफी काम किया। 6 जनवरी 1885 को वाराणसी में उनका निधन हो गया था।
रचनाएं:-
उन्होंने ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाल विबोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक,निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।
काव्य विशेषता :-
भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
भाषा:-
भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।
रस अलंकार:-
भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।
प्रमुख कृतियाँ:-
मौलिकनाटक – वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(१८७३ई., प्रहसन) , सत्य हरिश्चन्द्र(१८७५) , श्रीचंद्रावली (१८७६, नाटिका), विषस्य विषमौषधम् (१८७६, भाण), भारत दुर्दशा(१८८०, ब्रज रत्नदास के अनुसार१८७६, नाट्यरासक),नीलदेवी (१८८१, प्रहसन), अंधेर नगरी(१८८१), प्रेम जोगनी (१८७५, प्रथम अंक में केवल चार अंकयागर्भांक, नाटिका), सतीप्रताप (१८८३, केवल चार अंक, गीति रूपक)
निबंधसंग्रह- भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसराखंड) में संकलितहै।,
“नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
प्रमुख निबन्ध- नाटक, कालचक्र, लेवी प्राण लेवी,भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है, कश्मीर कुसुम
काव्यकृतियां- भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका (१८७१), प्रेममाधुरी (१८७५), प्रेम-तरंग (१८७७),, उत्तरार्द्धभक्तमाल (१८७६-७७), प्रेम-प्रलाप (१८७७), होली (१८७९), मधुमुकुल (१८८१), राग-संग्रह (१८८०), वर्षा-विनोद (१८८०), विनयप्रेमपचासा (१८८१), फूलोंकागुच्छा (१८८२), प्रेमफुलवारी (१८८३) कृष्णचरित्र (१८८३) दानलीला, तन्मयलीला, नयेज़मानेकीमुकरी, सुमनांजलि, बन्दरसभा (हास्यव्यंग)
बकरीविलाप (हास्यव्यंग)
सरयू पार की यात्रा:-
भारतेंदु जी के बस्ती आगमन और वहाँ के अनुभवों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:
प्रथम पड़ाव:अयोध्या -
कल सांझ को चिराग जले रेल पर सवार हुए, यह गए, वह गए। राह में स्टेशनों पर बड़ी भीड़ न जाने क्यों? और मजा यह कि पानी कहीं नहीं मिलता था। यह कम्पनी यजीद के खानदान की मालूम होती है कि ईमानदारों को पानी तक नहीं देती। या सिप्रस का टापू सरकार के हाथ आने से और शाम में सरकार का बन्दोवस्त होने से यह भी शामत का मारा शामी तरीका अख़तियार किया गया है कि शाम तक किसी को पानी न मिलै। स्टेशन के नौकरों से फरियाद करो तो कहते हैं कि डांक पहुंचावें, रोशनी दिखलावें कि पानी दें।
खैर, ज्यों त्यों कर अयोध्या पहुंचे । इतना ही धन्य माना कि श्रीरामनवमी की रात अयोध्या में कटी। भीड़ बहुत ही है, मेला दरिद्र और मैले लोगों का। यहां के लोग बड़े ही कंगालटिरें हैं। इस वक्त दोपहर को अब उस पार जाते हैं। ऊंट गाड़ी यहां से पांच कोस पर मिलती है।
कैम्प हरेया बाजार-
अब तक तीन पहर का सफर हो चुका है और सफर भी कई तरह का और तकलीफ देने वाला। पहिले सर से गाड़ी पर चले । मेला देखते हुए रामघाट की सड़क पर गाड़ी से उतरे। वहां से पैदल धूप में गर्म रेती में सरजू किनारे गुदारा घाट पर पहुंचे। वहां से मुश्किल से नाव पर सवार होकर सरजू पार हुए। वहां से वेलवां, जहां कि डांक मिलती है और शायद जिसका शुद्ध नाम बिल्व ग्राम है, दो कोस है। सवारी कोई नहीं, न राह में छाया के पेड़, न कुआं, न सड़क । हवा खूब चलती थी इससे पगडंडी भी नहीं नजर पड़ती। बड़ी मुश्किल से चले और वड़ी ही तकलीफ हुई। खेर बेलवां तक रो रो कर पहुंचे। वहां से बैल की डांक पर नी बजे रात को यहां पहुंचे। यहां पहुंचते ही हरैया बाजार के नाम से यह गीत याद आया -
“हरैया लागल झबिआ के रे लैहें ना! ।
शायद किसी जमाने में यहां हरैया बहुत विकती होगी । इस के पास ही मनोरमा नदी है। मिठाई हरैया की तारीफ के लायक है। वालूसाही बिलकुल बालू साही, भीतर काठ के टुकड़े भरे हुए लड्डू भूरके । बरफी अहा हा हा! गुड़ से भी बुरी। खैर, लाचार होकर चने पर गुजर की। गुजर गई गुजरान- क्या झोपड़ी क्या मैदान, बाकी हाल कल के खत में।
बस्ती :-
परसों पहिली एप्रिल थी इस से सफर कर के रेती में बेवकूफ बनने का और तकलीफ में सफर करने का हाल लिख चुके हैं। अब आज आठ बजे सुबह रें रें कर के बस्ती पहुंचे।
वाह रे बस्ती,
झख मारने को बस्ती है ।
अगर बस्ती इसी को कहते हैं
तो उजाड़ किस को कहेंगे।
सारी वस्ती में कोई भी पंडित बस्ती रामजी ऐसा पंडित नहीं। खैर !अब तो एक दिन यही बसती होगी। राह में मेला खूब था जगह जगह पर शहाबे का शहाबा। चूल्हे जल रहे हैं। सैकड़ों अहरे लगे हुए हैं। कोई गाता है, कोई बजाता है, कोई गप हांकता है। राम लीला के मेले में अवध प्रान्त के लोगों का स्वभाव रेल अयोध्या और इधर राह में मिलने से खूब मालूम हुआ।
बैसवारे के यूरुष अभिमानी रूखे और रसिकमन्य होते हैं, रसिकमन्य ही नहीं वीरमन्य भी । पुरुष सब पुरुष और सभी भीम, सभी अर्जुन, सभी सूत पौराणिक और सभी वाजिदअली शाह। मोटी मोटी बातों को बड़े आग्रह से कहते सुनते हैं।
नई सभ्यता अब तक इधर नहीं आई है। रूप कुछ ऐसा नहीं पर स्त्रियां नेत्र नचाने में बड़ी चतुर। यहां के पुरुषों की रसिकतर मोटी चाल सुरती और खड़ी मोंछ में छिपी है और स्त्रियों की रसिकता मैले वस्त्र और सूप ऐसी नथ में । अयोध्या में प्रायः सभी ग्रामीण स्त्रियों के गोल आते हुए मिले। उनका गाना भी मोटी रसिकता का। मुझे तो उनकी सब गीतों में “बोलो प्यारी सखियां सीताराम राम राम” यही अच्छा मालूम हुआ। राह में मेला जहां पड़ा मिलता था वहां बारात का आनन्द दिखलाई पड़ता था।
खैर ! मैं डांक पर बैठा बैठा सोचता था कि काशी में रहते तो बहुत दिन हुए परन्तु शिव आज ही हुए क्योंकि वृषभवाहन हुए। फिर अयोध्या याद आई कि हा! यह वही अयोध्या है जो भारतवर्ष में सब से पहले राजधानी बनाई गई। इसी में महात्मा इक्ष्वाकु, मान्धाता, हरिश्चन्द्र, दिलीप, अज, रघु, श्री रामचन्द्र हुए हैं और इसी के राजवंश के चरित्र में बड़े बड़े कवियों ने अपनी बुद्धिशक्त्रि की परिचालना की है। संसार में इसी अयोध्या का प्रताप किसी दिन व्याप्त था और सारे संसार के राजा लोग इसी अयोध्या की कृपाण से किसी दिन दबते थे वही अयोध्या अब देखी नहीं जाती। जहां देखिए मुसलमानों की कब्रें दिखाई पड़ती हैं। और कभी डांक पर बैठे रेल का दुःख याद आ जाता कि रेलवे कम्पनी ने क्यों ऐसा प्रबन्ध किया है कि पानी तक न मिले।
एक स्टेशन पर एक औरत पानी का होल लिए आई भी तो गुपला गुपला पुकारती रह गई, जब हम लोगों ने पानी मांगा तो लगी कहने कि “रह: हो पानियैं पानी पड़ल हो, फिर कुछ जियादा जिद में लोगों ने मांगा तो बोली “अब हम गारी देव” वाह! क्या इंतजाम था, मालूम होता था रेलवे कम्पनी स्वभाव (Nature) की बड़ी शत्रु है क्यौंकि जितनी बातें स्वभाव से सम्बन्ध रखती हैं अर्थात खाना, पीना, सोना, मल मूत्र त्याग करना इन्हीं का इस में कष्ट है। शायद इसी से अब हिन्दुस्तान में रोग बहुत हैं। कभी सराय की खाट के खटमल और भटियारियों का लड़ना याद आयाँ। यही सब याद करते कुछ सोते जागते हिलते हिलते आज बस्ती पहुंच गए। बाकी फिर।
कुआनो नदी:-
यहां एक नदी है उसका नाम कुआनो। डेढ़ रुपया पुल का गाड़ी का महसूल लगा। बस्ती के जिले की उत्तर सीमा नैपाल, पश्चिमोत्तर की गोंडा, पश्चिम दक्षिण अयोध्या और पूरब गोरखपुर है। नदियां बड़ी इस में सरयू और इरावती। सरयू के इस पार बस्ती उस पर फैजाबाद। छोटी नदियों में कुवानो मनोरमा, कठनईया , आमी, बानगंगा और जमबर है। बखिरा ताल और जिरजिरवा (चंदों) दो बड़ी झील भी हैं। बांसी, बस्ती और मग़हर तीन राजा भी हैं। बस्ती सिर्फ चार पांच हजार की बस्ती है पर जिला बड़ा है क्यौंकि जिले की आमदनी चौदह लाख है। साहब लोग यहां कुल दस बारह हैं, उतने ही बंगाली हैं।
पुरानी बस्ती
पुरानी बस्ती खांई के बीच में बसी है। राजा के महल बनारस के अर्दली बाजार के किसी मकान से उमदा नहीं। महल के सामने मैदान, पिछवाड़े जंगल और चारों ओर खांई है। पांच सौ खटिकों के घर महल के पास हैं जो आगे किसी जमाने में राजा के लूटमार के मुख्य सहायक थे। अब राजा के स्टेट के मैनेजर कूक साहब हैं। यहां के बाजार का हम बनारस के किसी भी बाजार से मुकाबिला नहीं कर सकते । महज बेहैसियत | महाजन एक यहां हैं वह टूटे खपड़े में बैठे थे। तारीफ यह सुना कि साल भर में दो बेर कैद होते हैं क्यौंकि महाजन पर जाल करना फर्ज है और उस को भी छिपाने का शऊर नहीं। यहां का मुख्य ठाकुर द्वारा दो तीन हाथ चौड़ा और उतना ही लम्बा और उतना ही ऊंचा बस। पत्थर का कहीं दर्शन भी नहीं। यह हाल बस्ती का है। कल डांक ही नहीं मिली कि जायं।
मेंहदावल की सड़क
मेंहदावल की कच्ची सड़क है इस से कोई सवारी नहीं मिलती आज कहार ठीक हुए हैं। भगवान ने चाहा तो शाम को रवाना होंगे। कल तो कुछ तबीअत भी गड़वड़ा गई थी इस से आज खिचड़ी खाई। पानी यहां का बड़ा बातुल है। अकसर लोगों का गला फूल जाता है, आदमी ही का नहीं कुत्ते और सुग्गे का भी। शायद गला फूल कबूतर यहीं से निकले हैं। बल अब कल मेंहदावल से खत लिखेंगे।
मेंहदावल :-
आज सुबह सात बजे मेंहदावल पहुंचे । सड़क कच्ची है, राह में एक नदी उतरनी पड़ती है उस का नाम आमी है। छह आना पुराना महसूल लगा। रात को ग्यारह बजे पालकी पर सवार हुए। बदन खूब हिला। अन्न भी नहीं पचा। इस वक्त यहां पड़े हैं। यहां मक्खी बहुत हैं और आबादी बहुत है। दो लड़कों के स्कूल हैं और एक लड़कियों का स्कूल है और एक डाक्टर खाना है। बस्ती शहर है मगर उस से यह मेंहदावल गांव बहुत आबाद है।
फैजाबाद में 5॥) (साढ़े पांच रुपये) बस्ती तक डांक का लगा और बस्ती से मेंहदावल तक 3॥) (तीन रुपये बारह आने) पालकी का। अभी एक गंवार भाट आया था। बेतरह बका। फूहर औरतों की तारीफ में एक बड़ा भारी पचड़ा पढ़ा | यहां गरमी बहुत है और मक्खियां लखनऊ से भी जियादा । दिन को बड़ी बेचैनी है। यहां की औरतों का नाम श्यामतोला, गमतोला, मनतोरा इत्यादि विचित्र होता है और नारंगी को भी यही श्यामतोला कहते हैं जो संगतरा का अपभ्रंश मालूम होता है क्योंकि यहीं के गंवार संतोला कहते हैं। यहां एक नाऊ बड़े पंडित थे। उन से किसी पंडित ने प्रश्न किया “कि दूध” (तुम कौन जात हो) तब नाई ने जवाब दिया
“चटपटाक चटपटाक” (नाई)।
तब ब्राह्मण ने कहा “तं दूर! (तुम दूर जाओ), तब नाई ने जवाब दिया “कि छौरं! (तब मूड़ कौन मूड़ैगा)।
एक का बाप डूब कर मर गया उस के बाप का पिंडा इस मन्त्र से कराया गया।
“आर गंगा पार गंगा बीच में पड़ गई रेत।
तहां मर गए नायका चले बुज बुजा देत।"
धर दे पिडवा |
कुछ फुटकर हाल भी यहां का सुन लीजिए। कल मजहब का हाल हमने नीचे लिखा था। उस का अच्छी तरह से हाल दरयाफ्त किया तो मालूम हुआ कि हमारे ही मजहब की शाखा है। इनके ग्रन्थों में हमने एक श्लोक श्रीमहाप्रभुजी की सुवोधिनी की कारिका का देखा, इसी से हम को सन्देह हुआ। फिर हम ने बहुत खोद खाद कर पूछा तो यह साफ मालूम हुआ कि इसी मत से यह मत निकला है क्योंकि एक बात वह और बोले कि हमारा मत श्री बललभाचारज की टीका में लिखा है। इन लोगों के उपास्य श्रीकृष्ण हैं और एकादशी,शालग्राम, मूर्त्तिपूजा, तीर्थ किसी को नहीं मानते। इन के पहिले आचार्य्य देवचन्द जी थे, जो जात के कायस्थ थे और दूसरे प्रणनाथजी, जो कच्छ के क्षत्री (भाटिया) थे। इमारे ही मत की शाखा सही पर विचित्र मत है। वैष्णव होकर मूर्त्तिपूजा का खंडन करने वाले यही लोग सुने। यहां बूढ़े को ख़बीस, व्रत को बेनी राम, भोजन को बुननी, जात को दूध, ऐसे ही अनेक विचित्र विचित्र बोली हैं। गांव गन्दा वड़ा है और लोग परले सिर के बेवकूफ । यहां से चार मील पर एक मोती झील वा बखरा ताल नामक झील है! दर हकीकत देखने के लायक है। कई कोस लम्बी झील है और जानवर तरह तरह के देखने मे आते हैं। पहाड़ से चिड़ियां हजारों ही तरह की आती हैं 3॥रुपए में मछली भी इफ़रात। पेड़ों पर बन्दर भी | मेंहदावल में कोई चीज भी देखने लायक नहीं। जहां देखो वहां गन्दगी। लोग बज्र मूर्ख, क्षत्री ब्राह्मण जियादा। एक यहां प्राननाथ का मजहब है और दस बीस लोग उस के मानने वाले हैं। ये लोग एकादशी तीर्थ वगैरह को नहीं मानते और सुने सुनाए दो तीन श्लोक जो याद कर लिए हैं बस उसी पर चूर हैं।
“मदीनास्यां शरदां शर्तं' और
“गोविंद गोकुलानन्द मक्केश्वरं”
यहश्लोक पढ़ के कहते हैं कि वेद में मक्का मदीने का वर्णन है। ऐसे ही बहुत वाहियात बात कहते हैं और कोई कितना भी कहै कुछ सुनते नहीं। कहते हैं कि गोलोक का नाश है और गोलोक ऊपर एक “अखंड मंडलाकारं” लोक है, उस में मेरे कृष्ण हैं। इन का मजडब एक प्राणनाथ नामक एक क्षत्री ने पन्ना में करीब तीन सौ बरस हुए चलाया था। यहां चैत सुदी भर रात को औरतें जमा, होकर माता का गीत गाती हैं और बड़ा शोर करती हैं। असभ्य बकती हैं। व्यभिचार यहां बेतकल्लुफ है।
विचित्र ब्राह्मण:-
सरयू पार के ब्राह्मण बड़े विचित्र हैं। मांस मछली सब खाते हैं। कुएं के जगत पर एक आदमी जो पानी भरता हो दूसरा आदमी चला आवे तो अपना घड़ा फोड़ डालें और उससै घड़े का दाम ले। घड़ा कोई कहै तो घड़ा छू जाय क्योंकि घड़ा मुसलमानी लफ़्ज है, दाल कहै तो छू जाय क्योंकि दाल मुसलमानी है। सूरज वंशी छत्री राजा बाबू को छाता नहीं लगता। क्यौंकि वे तो सूरज वंशी हैं, सूरज से क्या छाता लगावें। नेम बड़ा धर्म्म बिलकुल नहीं। एक ब्राह्मण ने कोहार से नई सनहकी मोल लेकर उस में पूरी बनाकर खाया, इस से वह जात से निकाल दिया गया क्योंकि जैसे बर्तन में मुसलमान खाना बनावैं उस आकार के बरतन में इसने हिन्दू होकर खाना बनाया। ह हा हा! और मजा यह कि ताजिए को सब मानते हैं। मेंहदावल में एक थाना है। थानेदार यहां के बादशाह हैं। एक डाक्टरखाना भी है। यह बड़ा सरकार का पुन्य है। बस हम को तो सरकार के पुन्य के कसर यही मालूम होती है कि पुलों पर महसूल लिया जाता है क्यौंकि भला नाव या ऐसे पुल पर महसूल लगै तो ठीक है जिसकी हर साल मरम्मत हो, पक्के पर भी महसूल ।
बस्ती में अगरवाला नहीं, एक हैं सो जूता उतार कर लायची खाते हैं। मेंहदावल में एक अगरवाले हैं। मुसलमान फर्श पर यहां नहीं बैठते हैं ।पिंडारे जिनको इस जिले में जमीन मिली हैं अव नवाब हो गए हैं और उन की मुस्तैठी आराम से बदल गई है। यहां कहीं कहीं धारू लोगों का रक्खा सोना खोदने से अब तक मिलता है। यहां के बाबू ऐसे हठी कि बंगला गिर पड़ा पर जूता उलटा था।खिदमतगार को पुकारा वह न आया, इस से आप वहां से न चले और दब कर मर गए।।
संदर्भ स्रोत : पुस्तक : 'भारतेंदु के निबंध',
संपादक : केसरीनारायण शुक्ल
रचनाकार : भारतेंदु हरिश्चंद्र
प्रकाशन : सरस्वती मंदिर जतनबर,बनारस।
प्रस्तुतकर्ता लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183