Monday, July 20, 2026

अयोध्या की तरह कई बार बदली हनुमान गढ़ी की तस्वीर, हनुमत पीठ का रोचक दास्तान :✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

अमरावती के वैभव को मात देती अयोध्या :-

अयोध्या का मतलब जिसे युद्ध में जीता न जा सके। इसकी स्थापना स्वयं सूर्य पुत्र मनु ने की थी। वाल्मीकि अपने रामायण के प्रारंभ में भी अयोध्या की महान नगरी का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं –

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता ! 

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् !! (१-५-६ )

भावार्थ:अयोध्या नगरी जो तीनों लोको में विख्यात थी और इसका निर्माण स्वयं मनु ने अपने हाथों से किया था। ऐसे अयोध्या पर ईक्ष्वाकु वंश के महाराजा दिलीप, रघु, नहुष , अरण्य , दशरथ और भगवान श्री राम ने शासन किया । वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की वैभव शीलता का विस्तार से वर्णन है । जिस राज्य के राजा साक्षात सूर्य वंश से थे । जिसके राजाओं से स्वयं इंद्र भी सहायता मांगने आते थे । जिस राज्य के राजा नहुष को इंद्र का सिंहासन मिला था । जिस राज्य के महान राजा रघु के नाम पर रघुवंश पड़ा जिसमें साक्षात श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रुप में जन्म लिया। 

राम के बाद की अयोध्या :-

श्री राम के बाद की जानकारी कालिदास रचित महान ग्रंथ रघुवंशम् में दी गई है, जिसके अनुसार श्री राम के स्वर्गारोहण के पश्चात उनके सबसे बड़े पुत्र कुश ने कुशावती को, दूसरे पुत्र लव ने शरावती को, लक्ष्मण के पुत्रों ने करावती को, भरत के पुत्र पुष्कल ने पुष्करावती (पेशावर) को और शत्रुघ्न के पुत्रों ने मथुरा को अपनी राजधानियां बना शासन करना प्रारंभ किया था । इस प्रकार अयोध्या पूरी तरह से रघुवंश से विहीन हो गई थी।

रामकोट ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण:-

अयोध्‍या का रामकोट मोहल्ला धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यह वही स्थल है जहां भगवान श्रीराम अपने परिवार और परिकर सहित निवास करते थे। इसीलिए इस स्थान को “राम का किला” या “रामकोट” भी कहा जाता था। उन्होंने यहां एक विशाल किला बनवाया था जिसके मध्य भाग में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की स्थापना हुई है । 

अपनी ऊँची स्थलाकृति और एक तरफ सरयू नदी से घिरे रामकोट को अयोध्या के निवासियों द्वारा भगवान राम का किला माना जाता है। यह क्षेत्र अयोध्या के तीन सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों को समेटे हुए हैं - राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी और भव्य कनक भवन, सबका संबंध रामायण काल से है। अयोध्या धाम का वर्तमान रेलवे स्टेशन भी रामकोट में स्थित है।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस स्थान की रचना अत्यंत वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण से की गई थी, ताकि यह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहे।रामकोट आज भी लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। अयोध्या के पुराने लोग इस क्षेत्र की नित्य परिक्रमा करते थे। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान श्रीराम के पारिवारिक जीवन और उनके आदर्श शासन की झलक पाते हैं। प्रभु श्रीराम यहीं अपनी कचहरी लगाया करते थे और अयोध्या सहित पूरे अवध प्रदेश की प्रजा की समस्याओं का समाधान करते थे।

शिव जी द्वारा संकेत :-

भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की यह नगरी सरयू नदी के दाहिने किनारे पर बसी है। यहाँ का सबसे प्रमुख श्री हनुमान मन्दिर ‘हनुमान गढ़ी 'के नाम से विख्यात है। वह राजद्वार के सामने ऊँचे टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। श्री रुद्रयामलोक्त श्री अयोध्या माहात्म्य के श्लोक 30, पृष्ठ 87 पर श्रीशङ्कर जी पार्वती जी से श्री हनुमान जी का स्थान के बारे में इस प्रकार कहते हैं 

राजद्वारे हनूमान् वै वायुपुत्रस्तु तिष्ठति ।

तथा तिष्ठति सुग्रीवो दक्षिणे च हनूमतः ॥ 

श्रीशंकरजीने कहा - ( रामकोटके प्रधान) राजद्वार पर वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका स्थान है तथा श्रीहनुमान जी के दक्षिण भाग में सुग्रीव जी का स्थान है ।



हनुमान गढ़ी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

हनुमान गढ़ी (अयोध्या) एक बहुत ही प्राचीन और ऊँचे टीले पर स्थित मंदिर है। यह स्थान प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण के वध के बाद भगवान रामचंद्र सीता देवी और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए थे। हनुमानजी अपने परम प्रिय भगवान की सेवा करने के लिए अयोध्या में ही रुक गए। उन्हें हनुमान गढ़ी में निवास दिया गया।हनुमान भगवान राम से एक पल भी दूर नहीं रह सकते थे। 

पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भगवान राम का स्वर्गारोहण त्रेतायुग के अंत में हुआ था। वाल्मीकि रामायण में दिए गए ग्रहों की स्थिति के आधार पर आधुनिक शोध कर्ताओं (जैसे पुष्कर भटनागर और नीलेश ओक) का मानना है कि यह घटना लगभग 7000 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 9,000 वर्ष पहले) हुई थी। भगवान राम जब स्वर्गारोहण किया तो राम जी के निर्देश से हनुमान जी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमान गढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमान जी रामकोट की रक्षा करते थे।

हनुमान गुफा से होती थी अयोध्या की रखवाली :- 

वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के अनुसार, अजर-अमर हनुमान जी यहाँ एक गुफा में निवास करते थे। इन्हें 'रामकोट' का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीराम के दिव्य शासन की झलक मिलती है। 

शास्त्रों के अनुसार, जब प्रभु रामचंद्र साकेत धाम जा रहे थे, तब उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या में रहने और सूर्य और चंद्रमा के अस्तित्व के दौरान तथा भगवान राम की महिमा का गुणगान होने तक वहां शासन करने का निर्देश दिया था। उन्होंने हनुमान जी को भक्तों को पूर्णता की ओर मार्गदर्शन करने का भी निर्देश दिया था।

कुश ने फिर से बसाई थी अयोध्या :-

रघुवंशम के अनुसार एक बार कुश अपने महल में सोये हुए थे तो रात के अंधेरे में एक दिव्य स्त्री उनके सामने आई । कुश ने उनका परिचय पूछा तो उस स्त्री ने कहा,  वह अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्री राम के जाने के बाद अयोध्या पूरी तरह से स्वामी विहीन हो गई है और उसकी दुर्दशा हो गई है । अयोध्या की देवी ने कुश से अयोध्या वापस आने और उसे पुनः बसाने के लिए निवेदन किया था। कुश वापस आते हैं और फिर से अयोध्या को बसाते हैं। एक बार फिर अयोध्या अपने वैभव में लौट जाती है । 

कुश सरयू नदी के अंदर रहने वाले नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदनी से विवाह करते हैं और न्यायपूर्वक शासन चलाने लगते हैं । इंद्र के बुलावे पर कुश दुर्जय राक्षस को मारने के लिए इंद्र के साथ जाते हैं । इंद्र की सहायता मे कुश दुर्जय को मार डालते हैं लेकिन वो भी वीरगति को प्राप्त होते हैं। ऐसे में कुश के पुत्र अतिथि को अयोध्या का राजा बनाया जाता है। अतिथि भी न्यायपूर्वक शासन करते हैं। अतिथि के बाद कई अन्य राजा आते हैं जो अयोध्या वैसी ही वैभवशाली रहती है ।

राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के “साकेत” महाकाव्य के सर्ग 1 के पृष्ठ 2 पर अयोध्या का वैभव इस प्रकार व्यक्त किया है -

स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ

किंतु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?

वह मरों को मात्र पार उतारती;

यह यहीं से जीवितों को तारती।।

है अयोध्या अवनि की अमरावती,

इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती।

वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,

और नंदन वन बने आराम हैं।।

रघुवंश (सूर्यवंश) का अंतिम शासक का नाम सुमित्र था। पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उन्हें चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 362 ईसा पूर्व) में मगध के राजा महापद्मनंद ने पराजित किया था, जिसके बाद उन्हें अयोध्या छोड़नी पड़ी थी।

विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या ढाई हजार वर्ष पूर्व पुनः बसाया गया था :- 

यह शहर तब तक वीरान रहा जब तक उज्जैन के राजा विक्रम इसकी खोज में नहीं आए और इसे फिर से स्थापित नहीं किये। विक्रमादित्य का समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग 57 ईसा पूर्व) माना जाता है। भारतीय परंपरा और 'विक्रम संवत' के अनुसार, उन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में 57 ईसा पूर्व में अपने शासन काल की शुरुआत की थी। उनका समय 57 ईसा पूर्व से 19 ईस्वी तक रहा। उन्होंने प्राचीन खंडहरों को ढकने वाले जंगलों को कटवा डाला था, वहां रामगढ़ किला और 360 मंदिर बनवाए थे। 

स्कंद पुराण के अनुसार, करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने स्वप्नादेश प्राप्त होने के बाद अयोध्या धाम का जीर्णोद्धार कराया था। प्रयागराज से प्राप्त संकेतों के आधार पर राम जन्म भूमि सहित अन्य प्राचीन तीर्थस्थलों की पहचान की थी। राजा विक्रमादित्य ने 360 अन्य मंदिरों के साथ हनुमानगढ़ी का निर्माण करवाया था। 

10वीं शताब्दी का हनुमान मंदिर:-

कन्नौज के राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, उत्तरी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 10वीं शताब्दी  में अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र पर मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन था। जिसकी राजधानी कन्नौज थी और अयोध्या उनके साम्राज्य का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण हिस्सा था। हनुमान गढ़ी का पुनः निर्माण इस समय भी उल्लिखित मिलता है। इस अवधि के बाद, 11वीं शताब्दी के अंत  में इस क्षेत्र पर कन्नौज के गहडवाल वंश के राजा चंद्रदेव का आधिपत्य हो गया था। जिन्होंने सरयू नदी के किनारे चंद्रहरि या चंद्रदेव को समर्पित एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था। 

इसी समय अयोध्या स्थित 'हनुमान गढ़ी' भगवान हनुमान को समर्पित एक किले के आकार में निर्मित 10 वीं शताब्दी का प्राचीन तीर्थ मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है जहाँ 76 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचा जा सकता है। इसके प्रत्येक कोने में गोलाकार किलेबंदी है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान हनुमान ने एक गुफा में निवास किया था और पूरे शहर की रक्षा की थी।

मुगल शासक औरंगजेब ने राम जन्म भूमि की भांति कहा जाता है कि हनुमानगढ़ी को तोड़वाकर वहां एक मस्जिद बनवा दिया था। उर्दू उपन्यासकार मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की पुस्तक 'फसाना -ए-इब्रत, जिसका स्रोत 'साहिफा-ए- बहादुरशाही’ है और जिसे उन्होंने 1816 ईस्वी में प्रतिरूपित किया था, में उल्लेख है कि औरंगज़ेब ने हनुमानगढ़ी मंदिर को ध्वस्त कर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। बाद में, बक्सर में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद, बैरागियों ने 1855 ईस्वी में उस भूमि पर कब्जा कर लिया, मस्जिद को हटवा दिया और भक्त हनुमान के लिए एक नया मंदिर बनवाया। कुछ मुसलमानों का मानना था कि हनुमानगढ़ी एक मस्जिद पर बनी है। इसलिए उन्होंने कई बार मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

भक्त हनुमान जी के दोनों ओर भक्तों द्वारा भेंट की गई चांदी या सोने की गदाएं रखी हुई हैं। श्री राम के नाम से अंकित चांदी की तुलसी की माला हमेशा मूर्ति को सुशोभित रखती है। भक्त हनुमान जी के पीछे सीता, राम और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं। भक्त हनुमान जी की यह मूर्ति अत्यंत शक्तिशाली है और पूरे भार हनुमान जी की एकमात्र जीवित मूर्ति मानी जाती है। मंदिर के गर्भगृह में माता अंजना देवी की गोद में विराजमानभगवान हनुमान की छह इंच की भव्य प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा को हमेशा अनेक पुष्पमालाओं और सिंदूर से पूर्णतः सजाया जाता है। इसलिए, अधिकांश समय केवल भगवान हनुमान का नारंगी रंग का कमल नुमा चेहरा ही दिखाई देता है।

मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठते हैं। उसमें 76  सीढ़ी चढ़ने पर श्रीहनुमानजी का मन्दिर श्रीमारुति की एक और मूर्ति यहाँ है, वह केवल छः इंच ऊँची है । माना जाता है कि हर एक सीढ़ी किसी न किसी आध्यात्मिक पहलू को दर्शाती है। कुछ लोगों का कहना है कि ये 76 सीढ़ियाँ ईश्वर की ओर यात्रा में भक्ति के विभिन्न चरणों को प्रतिबिंबित करती हैं। मन्दिर बड़ा है और उसमें श्रीहनुमानजी की स्थानक मूर्ति है सदा पुष्पाच्छादित रहती है। 

स्थानीय मान्यता के अनुसार, हनुमान जी वास्तव में यहीं एक गुफा में निवास करते थे और अयोध्या तथा राम जन्मभूमि की रक्षा करते थे। कहा जाता है कि वह गुफा मुख्य मंदिर भवन के नीचे स्थित है। भक्त वास्तव में मानते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या के हनुमानगढ़ी स्थित अपने स्थान से शहर की रक्षा करते हैं ।


श्री हनुमान जी के भक्तों के लिये यह स्थान विशेष श्रद्धास्पद है। मन्दिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, उनमें साधु सन्त रहते हैं। लंका विजय के बादअयोध्या राज महल का जो स्वर्ण स्तम्भ रावण उठा ले गया था उसे भी हनुमान जी यहां लाकर स्थापित किया है। 

हनुमानगढ़ी क्षेत्र में उत्खनन भी हुआ :- 

1981-1982 ई. में अयोध्या के सीमित क्षेत्र में उत्खनन किया गया। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमान गढ़ी और लक्ष्मण घाट क्षेत्रों में हुआ था। हनुमान गढ़ी क्षेत्र से भी उत्तरी काली चमकीली मृण्भांड संस्कृति 

(लगभग 700 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच ) के अवशेष प्रकाश में आए हैं। साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के मृतिका वलय कूप तथा एक कुएँ में प्रयुक्त कुछ शंक्वाकार ईंटें भी मिली हैं। उत्खनन से बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं, जिनमें मुख्यत: आधा दर्जन मुहरें, 70 सिक्के, एक सौ से अधिक लघु मृण्मूर्तियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कुषाण शासक वासुदेव की एक मिट्टी की मुहर (दूसरी शती ई.), इसी काल का मूलदेव का एक सिक्का तथा एक भूरे रंग की केश-विहीन जैन मृण्मूर्ति है। हनुमानगढ़ी से प्राप्त अन्य मृण्मूर्तियाँ पहली-दूसरी शताब्दी ई. पू. की हैं। ये मृण्मूर्तियाँ अहिच्छत्र, कौशांबी, पिपरहवा और वैशाली आदि क्षेत्रों से प्राप्त मृण्मूर्तियों के समान ही हैं। इस प्रकार की मृण्मूर्तियों को वासुदेवशरण अग्रवाल ने विजातीय प्रकार से अभिहित किया है।


तीन सौ वर्ष पूर्व की वर्तमान संरचना:-

हनुमान गढ़ी की स्थापना लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्रीअभयारामदास जी ने की थी। कहते हैं प्राचीन काल में यहाँ हनुमानजी का एक विशाल मन्दिर था, जिसके कालान्तरमें भग्न होने से यह स्थान एक टीले में बदल गया, जिसे हनुमान् टीला कहा जाता था; उसी स्थान पर स्वामी अभयारामदास जी द्वारा स्थापित वर्तमान मन्दिर है। आप एक सिद्ध महात्मा थे तथा हनुमानजी ने आप को साक्षात् दर्शन भी दिया था। आप ने समाज की श्रद्धा-भावना के संरक्षणार्थ पहले यहाँ श्री निर्वाणी अखाड़ा की स्थापना की और फिर यहीं श्रीहनुमानजी की विधिवत् पूजा-आराधना एवं भोग-राग की व्यवस्था मर्यादित रूप से की। 

नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्या बाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए। 

अवध के नवाबों की उदारता की बड़ी बड़ी बातें मुस्लिम और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा की जाती है। 20 एकड़ या 52 बीघे भूमि का तथाकथित दान देने की बात आती है पर ऐसा हुआ है नहीं था । नवाब शुजा- उद- दौला या मंसूर अली द्वारा मालगुजारी (कर) में छूट की बात ही प्रमाणित होती है।

यह भी कहा गया है कि एक बार लखनऊ तथा फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली का पुत्र किसी भयंकर रोग से अत्यन्त पीडित हो गया। सुयोग्य वैद्यों और हकीमों के उपचारों से भी जब उसकी व्याधि नहीं मिटी, तब वह हनुमानगढ़ी के श्रीहनुमान जी की शरण में आया और अविलम्ब उसे उस भीषण रोग से मुक्ति मिल गयी। इसके प्रतिफल स्वरूप नवाब के मन में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा अंकुरित हो गयी। उसने कुछ सहयोग भी किया था। साधुओं की सुविधाके लिये विशाल इमली का बाग लगवा दिया और उसी समय श्री अभयाराम दास जी से प्रार्थना करके हनुमानजी का एक विशाल, भव्य एवं सुदृढ़ मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी हनुमान गढ़ी के नाम से विख्यात है। 

अयोध्या तथा आस-पास के कुछ जिलों के कई परिवार अपने कुल परम्परानुसार अपने बच्चों का मुण्डन और यज्ञोपवीत यहीं करवाते हैं। अयोध्या के बहुत से नेमी श्रद्धालु स्नान करके नित्य यहाँ आते हैं। हिन्दू भक्तों एवं दर्शनार्थियों के कारण यहाँ नित्य ही मेला-सा लगा रहता है। मंगलवार तथा शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि अयोध्या में युगल-सरकार की कृपा प्राप्ति के लिये हनुमान गढ़ी के श्री हनुमानजी की जितनी पूजा होती है, उतनी युगल-सरकार की भी नहीं होती।

दियारा के राजा का सहयोग :-

सुल्तानपुर की दियारा रियासत के राजा (और अन्य स्थानीय जमींदारों) ने संतों और अखाड़ों के माध्यम से मंदिर की रक्षा और इसके विस्तार (जिसे 'गढ़ी' या किले का रूप दिया गया) में आर्थिक और सैन्य सहयोग प्रदान किया था।

महाराजा मानसिंह द्वारा निपटारा :- महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई, में हुआ था। उनका शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। राज्य की सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। इनके समय में हनुमान गढ़ी विवाद हुआ था जिसका निपटारा करने पर महाराजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद मिला हुआ था। 

जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।

अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। "गुलाम हुसेन” नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनुमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर. मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गड़वा दिया जिसे “गंजशहीदाँ” कहते हैं। यह स्थल राम जन्मभूमि अधिगृहीत परिसर में स्थित था।

1855 में जब हिंदुओं ने हनुमानगढ़ी पर अधिकार कर लिया था, तब एक भीषण संघर्ष हुआ था। आज भी अयोध्या में मुस्लिम समुदाय का मानना है कि आगामी राम जन्मभूमि मंदिर से सटे पांच एकड़ का एक स्थान 'गंज-ए-शहीदान' है - हनुमान गढ़ी के बैरागियों द्वारा मारे गए मुसलमानों के सामूहिक दफन का स्थल है। जिसे 'गंज शहीदा' (शहीदों की समाधि) कहा जाता है।

मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा -


हम इश्क़ के बन्दे हैं 

मज़हब से नहीं वाक़िफ़।

गर काबा हुआ तो क्या,

बुतखाना हुआ तो क्या ?

बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारकबाद दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।

इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदत अली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पारसाहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। इस कारगुजारी के बदले बादशाह ने राजा मानसिंह को राजे- राजगान का पद दिया। राजा मानसिंह ने इसका पर्दाफाश करते हुए कूटनीति से विवाद को सुलझाया था।

इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।


वर्तमान समय की परम्परा :- 

अयोध्या के सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी में एक ऐसी परंपरा है, जहां के प्रमुख गद्दीनशीन किसी भी परिस्थितियों में परिसर के बाहर नहीं निकलते हैं। किसी महंत को 60 वर्ष की आयु के बाद ही गद्दीनशीन चुना जाता है। जहां प्रधानमंत्री (चार पट्टी के महंत) से लेकर राष्ट्रपति (गद्दीनशीन) का अपना कानून होता है। हनुमानगढ़ी में चार पट्टी हैं, जिसके चार महंत होते हैं और एक गद्दीनशीन यानी प्रमुख होता हैं। रामानंदी संप्रदाय के निर्माणी अखाड़े के अंतर्गत वैष्णो साधु होते हैं जो चार पट्टी में विभक्त हैं- उज्जैनिया, सागरिया, बसंती और हरिद्वारी। यह 4 महंत हनुमानगढ़ी के प्रधानमंत्री होते हैं। इनके ऊपर एक राष्ट्रपति हैं,जिसे गद्दीनशीन कहा जाता है।  हनुमानगढ़ी के प्रथम गद्दीनशीन अभयरामदास महाराज थे । हनुमानगढ़ी में वर्तमान गद्दीनशीन प्रेमदास हैं, जो 51वें गद्दीनशीन पर आसीन हैं। वर्तमान समय में सगरिया पट्टी के गद्दीनशीन बनाए गए हैं।

गद्दीनशीन का चयन प्रक्रिया:-

चार पट्टी के 3-3 लोगों का नाम अखाड़े में भेजा जाता है। अखाड़े के लोग चुनाव करते हैं कि वह व्यक्ति गद्दीनशीन बनने योग्य है या नहीं। चुनाव होने के बाद अखाड़ा पास करता है। उसके बाद बैठक होती है। बैठक में वरिष्ठ संत अखाड़े के लोग यह तय करते हैं कि कौन बनेगा गद्दीनशीन। फिर उसके बाद चुनाव होता है। तब सर्वसम्मति से गद्दीनशीन अपने आसन पर विराजमान होते हैं। गद्दीनशीन 60 वर्षों के बाद बनाए जाते हैं। जब उम्र का पड़ाव अंतिम छोर पर होता है। मोह माया तमाम चीजों से व्यक्ति दूर हो जाता है।उस समय उस व्यक्ति को गद्दीनशीन पर बैठाया जाता है ।

हनुमान जी का स्वरूप होते हैं गद्दीनशीन :-

हनुमानगढ़ी पंचायती अखाड़ा का मठ है। यहां महंत गद्दीनशीन की नियुक्ति गुरु-चेला की परंपरा पर आधारित नहीं होती है। इसका निर्णय पंचांयत अखाड़ा लेता है। उसी प्रकार चारों पट्टिओं के महंत की नियुक्ति भी पंचांयत अखाडे ही करते हैं। यहां पर सब को एक समान का अधिकार होता है। परंपरा के अनुसार गद्दीनशीन का पद संभालने के बाद हनुमानगढ़ी के अपने नियम और संविधान के अनुसार गद्दीनशीन महंत अपने अंतिम पड़ाव तक हनुमानगढ़ी के परिसर में ही रहता है। 52 एकड़ में फैले हनुमानगढ़ी का परिसर के बाहर गद्दीनशीन नहीं निकलता है। मृत्यु के बाद ही उनका शरीर परिसर के बाहर जा सकता है।गद्दीनशीन हनुमान जी की गद्दी मानी जाती है। ऐसे में उस पर आसीन होने वाले महंत को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।उस गद्दी पर आसीन होने वाले व्यक्ति का सिर्फ एक ही काम है। वह भगवान का भजन करें और आए हुए भक्तों को आशीर्वाद दे। गद्दीनशीन प्रसिद्ध सिद्ध गद्दी है। अगर गद्दीनशीन का किसी परिस्थितियों में तबीयत या कोई आरोप-प्रत्यारोप लगता है तो डॉक्टर से लेकर कोर्ट का प्रतिनिधि मंडल भी गद्दीनशीन यानी हनुमानगढ़ी परिसर में ही आएगा।गद्दीनशीन बाहर नहीं जाएगा। गद्दीनशीन पर आसीन होने के बाद महंत कि जब तक मृत्यु नहीं होती है तब तक वह गद्दी पर आसीन रहता है।



लेखक :

आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

वॉट्सप नं.+91 9412300183.

Friday, July 17, 2026

अयोध्या के ‘हनुमानगढ़ी’ और ‘सरयूकुंज’ पर रोजा इफ्तार और नमाज पढ़ने का प्रयास हुआ था ✍️डॉ.राधे श्याम द्विवेदी


भाईचारे में धर्म विरुद्ध आचरण होते होते बचा :-

जिस मंदिर में रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया था, उसके महंत युगल किशोर शरण शास्त्री (सरजू मंदिर के महंत) हैं। उन्होंने 1976 से 1985 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में कार्य किया। इस मामले में सपा सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। योगी जी अनावश्यक रूप से सपा को कोसकर इस विवाद में घसीट रहे हैं और प्रसाद चोरी के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं! तथ्य: आज योगी जी ने अपने संबोधन में अयोध्या के हनुमानगढ़ी में पिछली सरकार के दौरान नमाज अदा करने के बारे में एक बयान दिया। इससे तीव्र राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, लेकिन हम तथ्यों पर ही टिके रहेंगे। 

उस समय 2003 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार बनी हुई थी। तत्कालीन राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बीच हिंदू-मुस्लिम संवाद और भाईचारा बढ़ाने के लिए हनुमानगढ़ी के तत्कालीन महंत ज्ञानदास ने अपने निवास पर एक रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। इसमें बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी और सहित कई मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हुए थे। 

इस अवसर पर अयोध्या में हनुमानगढ़ी मंदिर की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ने का प्रयास हुआ था। जनमानस के भारी विरोध के चलते और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से नमाज सनातन धर्म के अग्रणी धर्म स्थल पर नमाज पढ़वाने का मामला टालना पड़ा था । उस समय हनुमानगढ़ी में महंत ज्ञानदास ने इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। 
ऐतिहासिक घटना का नया उल्लेख :-
उत्तर प्रदेश के वर्तमान माननीय मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगभग 23 वर्ष बाद इस मामले का उल्लेख क्या कर दिया कि सपा में खलबली मच गई। योगी आदित्यनाथ ने विगत 10 जुलाई 2026 को अयोध्या के सोहावल में सम्पन्न हुए एक कार्यक्रम में इसका उल्लेख करते हुए सपा और कांग्रेस पर निशाना साधा है। सपा नेता श्री पवन पाण्डेय और अन्य अनेक नेता इसके प्रमाण मांगते फिर रहे हैं। इसे लेकर सियासत तेज हो गई है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट से स्टे हुआ था -
मामला अदालत में भी गया था और वहां से इसके आयोजन पर रोक (स्टे) लगा दी गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंदिर परिसर में रोजा इफ्तार के आयोजनों पर रोक (स्टे) लगा दी गई थी। इसके बाद बढ़ते तनाव व विवाद के बाद महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार नहीं कराया जाएगा।
समाजवादी पार्टी के करीबी थे आयोजक -
महंत ज्ञानदास अयोध्या स्थित प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी के पीठाधीश्वर और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे समाजवादी पार्टी (विशेषकर मुलायम सिंह यादव) के करीबी माने जाते हैं और अक्सर विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। वे अपने बयानों और सांप्रदायिक सौहार्द की पहलों के लिए जाने जाते हैं, जिसमें 2003 में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर इफ्तार पार्टी का आयोजन करना भी शामिल था। 2003 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल के दौरान उनके आवास पर एक 'रोजा इफ्तार' का आयोजन किया गया था, जिसमें हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ने का प्रयास भी हुआ था, जो काफी विवादों में रहा था।

सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का हुआ था प्रयास :-
इफ्तार के समय नमाज अदा करने के लिए हनुमानगढ़ी मंदिर की सीढ़ियों और मुख्य मार्ग पर चटाइयां (सफ) बिछाने की कोशिश की गई थी । चूंकि हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों से ही महंत के घर का रास्ता जाता था, इसलिए भारी भीड़ होने के कारण सीढ़ियों का उपयोग करने का प्रयास हुआ था।

सुरक्षा बलों और संतों का विरोध :- 
तत्कालीन आईजी (लॉ एंड ऑर्डर) बृजलाल और पुलिस प्रशासन ने मंदिर की सीढ़ियों और मुख्य परिसर के भीतर नमाज पढ़ने का कड़ा विरोध किया था। पुलिस और स्थानीय संतों के विरोध के बाद सीढ़ियों से चटाइयां हटाई गईं और नमाज को महंत ज्ञान दास के निजी निवास/कक्ष के अंदर ही संपन्न कराया गया।

महंत धर्मदास की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई थी सुनवाई 
मंदिर परिसर के भीतर इस तरह के गैर-हिंदू धार्मिक आयोजनों और नमाज के प्रयासों का अयोध्या के संत समाज ने तीखा विरोध किया। इसके खिलाफ हनुमानगढ़ी के ही महंत धर्मदास ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक याचिका दायर की। याचिका में दलील दी गई कि सनातन परंपरा के इस पवित्र सिद्धपीठ की मर्यादा और पवित्रता के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट की रोक:-
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार या किसी भी प्रकार के अन्य धार्मिक आयोजनों पर पूरी तरह से रोक (Stay) लगा दी।भविष्य के आयोजनों पर विराम: इस कानूनी विवाद और अदालती आदेश के बाद वर्ष 2005 के आसपास महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में ऐसा कोई भी आयोजन नहीं किया जाएगा, क्योंकि उनकी सौहार्द बढ़ाने की पहल विवादों में घिर गई थी।
महंत ज्ञानदास का परिचय -
अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के पूर्व मुख्य पुजारी महंत ज्ञानदास अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं।राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी (मुलायम सिंह यादव) के करीबी माने जाने वाले ज्ञानदास उस समय चर्चा में आए थे, जब कथित तौर पर समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान उनके हनुमानगढ़ी स्थित निजी आवास (मंदिर के समीप) में नमाज का आयोजन करने का प्रयास किया गया था, जिसका पुलिस और हिंदू संगठनों ने विरोध किया था। जिसे लेकर बाद में राजनीतिक विवाद गहरा गया था। महंत ज्ञानदास हनुमानगढ़ी के प्रमुख संतों में से रहे हैं और उन्हें मुलायम सिंह यादव का करीबी और प्रशंसक माना जाता था। इस घटना को लेकर वर्तमान में भी राजनीतिक बयानबाजी होती रही है।
हनुमानगढ़ी के पूर्व महंत ज्ञानदास अभी भी जीवित हैं। वर्ष 2019 में उन्हें ब्रेन हैमरेज (मस्तिष्क आघात) हुआ था, जिसके बाद से उनका स्वास्थ्य काफी कमजोर हो गया है। जिसके बाद शिष्य उन्हें तत्काल लखनऊ लेकर पहुंच गए, पीजीआई में भर्ती कराया गया। महंत श्रीज्ञानदास को पूर्व में ब्लाकेज की समस्या पैदा हुई थी। इसके बाद पीजीआइ में उनकी एंजियोप्लास्टी हो चुकी है। वह अब पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन से दूर और एकांत में रहते हैं तथा आम लोगों या मीडिया से बातचीत नहीं करते हैं लेकिन समय समय पर अखिलेश यादव और बाकी समाजवादी एंजेट से मिलते रहते हैं।

सरयू कुंज मंदिर में 4 जून 2018 को हुआ था रोजा इफ्तार और नमाज :-
उक्त घटना के बावजूद विगत 4 जून 2018 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र के सरयू कुंज मंदिर में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था। इस अनूठी पहल में शामिल होने वाले मुस्लिम रोजेदारों को वही सात्विक पकवान (जैसे हलवा, फल और पकौड़ी) परोसे गए थे, जो भगवान को भोग लगाए जाते हैं।यह आयोजन मूल रूप से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच प्रेम और शांति का संदेश देने के लिए किया गया था। खास बात यह थी कि इसमें किसी भी राजनीतिक व्यक्ति या वीआईपी को आमंत्रित नहीं किया गया था, बल्कि सिर्फ स्थानीय आम लोग शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम में तीन दर्जन से अधिक मुस्लिम रोजेदारों ने शिरकत की थी। इस रोजा इफ्तार का आयोजन मंदिर के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री द्वारा किया गया था। 

मंदिर के अंदर पढ़ी गई नमाज :-
मंदिर के अंदर राम, सीता और ब्रह्मा की मूर्तियां हैं। इफ्तार के दौरान साधु अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी से आए हुए लड्डू बांट रहे थे। इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज भी मंदिर परिसर में ही की गई। इससे पहले सांप्रदायिकता के खिलाफ एक सेमिनार का आयोजन भी मंदिर में किया गया। सेमिनार में कॉलेज के छात्रों, शिक्षकों आदि ने हिस्सा लिया और सांप्रदायिक तनाव को कम करने की प्रतिज्ञा ली। इफ्तार में हिस्सा लेने वाले उर्दू के शायर मुजम्मिल ने कहा, 'अयोध्या में अल्पसंख्यक होकर भी हमें कभी डर नहीं लगा। हमारे हिंदू भाइयों को धन्यवाद, जिन्होंने कभी किसी खतरे से परेशान नहीं होने दिया।’

20 मई 2019 को अयोध्या में हुआ था रोजा इफ्तार :-
20 मई 2019 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र के सरयू कुंज मंदिर में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था। महंत युगल किशोर दास ने कहा कि रोजा इफ्तार का उद्देश्य था कि हिंदू और मुस्लिम भाई सब मिल-जुल कर रहें। उन्होंने कहा कि अयोध्या किसी एक समुदाय की नगरी नहीं है।यह सब के लिए पुण्य नगर है।
सूफी संत श्री किशोर शरण ने कहा, भेदभाव खत्म करने का संदेश अगर मिल सकता है तो अयोध्या से मिल सकता है।
युगल किशोर ने कहा कि अगर 6 दिसंबर 1992 के पहले इस तरीके की पहल की गई होती तो यह 6 दिसंबर की घटना न होती, वहीं इफ्तार में शामिल मुस्लिमों ने कहा कि हम देश के अमन-चैन की बात करते हैं और इस तरीके की पहल भाईचारे और अमन चैन के लिए की गई है। मुस्लिमों ने कहा कि हम हिंदुओं के त्यौहार पर भी शामिल हों और पूरे देश में अयोध्या से ही अमन चैन का संदेश दें।

इस कार्यक्रम में शामिल हुए एक रोजेदार मोहम्मद तुफैल का कहना था कि विवादित स्थल के बगल में ही है रामजानकी मंदिर है, जहां पर विवाद है और पूरी दुनिया में झगड़े की वजह है। वहीं इस मंदिर में रोजा इफ्तार कराके यह एकता और मानवता का संदेश भी दिया जा रहा है कि सभी धर्मों के लोगों को आपस में मिलकर रहना चाहिए।

एक अन्य रोजेदार जीशान ने कहा था कि जिस तरह हमलोग मंदिर में नमाज पढ़ सकते हैं, इससे यह मैसेज दिया जाता है कि आप हमारे घर आ सकते हैं। हम आपके घर आ सकते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब हम लोगों को यहां से सिखाई जाती है।मैं टीचर भी हूं तो अपने बच्चों को भी यह चीज सिखाता हूं जो समाज मे गंदगी फैल रही है, मानसिकता डैमेज हो रही है उसे सुधारा जाए।

इसी कार्यक्रम में शामिल एक अन्य रोजेदार मुजम्मिल फिजा ने कहा था कि हमारे यहां निर्गुण है, यहां मूर्ति की पूजा नहीं हो सकती लेकिन अगर आप आध्यात्मिक रूप से या बैठकर चिंतन मनन करेंगे तो जा सकते हैं।

महंत युगल किशोर शरण शास्त्री का परिचय -
युगल किशोर शरण शास्त्री का जन्म 1958 में बिहार के ज़िला सीतामढ़ी में हुआ। लगभग 45 साल से वह अयोध्या के सरयूकुंज रामजानकी मंदिर के महंत हैं। 1976 से 1985 तक वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, जहां उन्होंने जन एकता के लिए सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद को जाना। तब से ही सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। महंत युगल किशोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्व प्रचारक भी रहे हैं। यह आयोजन अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द (गंगा-जमुनी तहजीब) की एक अनूठी मिसाल के रूप में चर्चा में आया था। साम्प्रदायिक सद्भाव व मानव एकता के लिये वे लगभग तीन दशकों से समाजिक कार्य करते आ रहे हैं। पूरे भारत में दो दर्जन से अधिक शान्ति व सद्भाव यात्रा निकाल चुके हैं। हर सच्चाई को वे सामाजिक जीवन में मज़बूती से रखते आ रहे हैं। आठ पुस्तकों के लेखक हैं और आठ दर्जन से ज़्यादा लेख भी प्रकाशित हो चुके हैं। सामाजिक कार्यों के लिए आधा दर्जन से अधिक बार जेल भी जा चुके हैं।

संघी आतंकवाद:
युगल किशोर शरण शास्त्री 

हमारा देश भारत अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति एवं साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध रहा है, परन्तु कुछ असामाजिक तत्त्व इसकी इस विशेषता को समाप्त कर यहां के वातावरण में नफ़रत और साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने का प्रयास भारत-विभाजन के पहले ही से करते रहे हैं और आज उनकी ये कोशिशें अपने चरम पर हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘संघी आतंकवाद’ के लेखक युगल किशोर शरण शास्त्री चूँकि स्वयं भी एक लम्बे समय तक संघ-प्रचारक रह चुके हैं, इसलिए उन्होंने संघ की इस वैमनस्यपूर्ण तथा विघटनकारी मानसिकता को बहुत क़रीब से जाना और पूरी निर्भीकता के साथ, मुखर रूप से अपनी इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही उन्होंने इन असामाजिक तत्त्वों द्वारा इस्लाम के बारे में फैलायी जा रही ग़लतफ़हमियों को भी दूर करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक संघी आतंकवाद की मानसिकता को समझने तथा उसके बारे में लेखक के मुखर एवं स्पष्टवादी विचारों को जानने के लिए अवश्य पढ़ी जा सकती है।

अंग्रेज़ों ने फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत ऐसे विकृत इतिहास को परोसा, जिससे यहाँ के लोग मिल-जुल कर न रहने पायें। वे यहाँ से अपना आसन लेकर चले गये, परन्तु अपने गुर्गों को यहीं छोड़ गये। उनके गुर्गे आज भी अपने उस्ताद की नीतियों का अनुसरण करते हुए नया विकृत इतिहास रच रहे हैं, जिसका तथ्यों से कोई ताल्‍लुक़ नहीं है। यह विकृत एवं मनगढ़ंत इतिहास लोगों को भ्रम की स्थिति में छोड़ने में कामयाब रहा है। यह इतिहास यदि रचा नहीं गया होता तो शायद महात्मा गाँधी की हत्या नहीं होती, बाबरी मस्जिद नहीं तोड़ी जाती, गोधरा काण्ड के पश्‍चात गुजरात में मुस्लिम-संहार नहीं होता। इसके अलावा भी भारत में तमाम दंगे हुए जिसमें मानवता को भारी क्षति पहुँची है, उससे बचा जा सकता था। हिन्दू धर्म को ख़तरा हिन्दू, मुस्लिम, क्रिश्‍चियन, बौद्ध या अन्य किसी धर्म, मज़हब से नहीं है। इसे ख़तरा सिर्फ़ हिन्दू धर्म के साम्प्रदायिक गिरोहों से है। ये गिरोह धर्मान्ध हैं। धर्मान्धता अपने ही धर्म की अच्‍छाइयों को समझने नहीं देती। जो आस्था दूसरे मज़हबों के प्रति नफ़रत पैदा करे, जिससे देश की एकता और अखण्डता को ख़तरा हो, जो इन्सानियत पर कुठाराघात करे, वह आस्था न होकर आतंकवाद है, उत्पीड़न है, हैवानियत है। साम्प्रदायिक ताक़तें आस्था के नाम पर लोगों को हैवानियत की ओर ढकेलने को उतावली हैं। इस पुस्तिका का उद्‌देश्य है इतिहास के सही तथ्यों को समाज के समक्ष रखकर साम्प्रदायिक ताक़तों के कारनामों का पर्दाफ़ाश करना, जिससे देश में प्रेम, मुहब्बत, भाईचारा, समता, ममता, बन्धुता और एकता को बढ़ावा मिल सके।

दरअसल, 2003 में जब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सपा सरकार थी, तब महंत ज्ञान दास ने हनुमानगढ़ी में एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। उस इफ्तार में हाशिम अंसारी (बाबरी मस्जिद मामले के याचिकाकर्ता) और मुस्लिम नेता सादिक अली (बाबू दर्जी) सहित कई मुस्लिम प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। हालांकि, कुछ संतों ने आपत्ति जताते हुए कहा: क्या मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है? मामला अदालत तक पहुंचा और ऐसे आयोजनों पर रोक लगा दी गई। बढ़ते तनाव और विवाद के बीच, महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में कोई रोज़ा-इफ्तार आयोजित नहीं किया जाएगा। इसके बाद, 21 मई 2019 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र में स्थित सरयू कुंज मंदिर में रोज़ा-इफ्तार का आयोजन किया गया। और इस देश में, गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रचार स्वयं आरएसएस द्वारा किया गया। 

राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद: मिथक और तथ्य
इफ्तार आयोजित करने वाले उस महंत ने *राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद: मिथक और तथ्य* नामक पुस्तक लिखी। आपको इसे अवश्य पढ़ना चाहिए—इसमें उन्होंने मुसलमानों को अधिकार देने की बात कही है। आरएसएस के नेतृत्व में ही 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को घेरकर उसकी रक्षा की गई थी। अगर अयोध्या में आरएसएस से जुड़ा कोई राजनीतिक संत बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्यों के लिए इफ्तार का आयोजन करता है, तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दोषी ठहराए जाते हैं, लेकिन अगर उसी मंदिर में प्रसाद चोरी हो जाता है, तो न योगी और न ही मोदी दोषी। क्या यह सरासर पाखंड नहीं है! क्या राज्य के मुख्यमंत्री ने जनता को पूरी तरह मूर्ख समझ लिया है? इफ्तार पार्टी आयोजित करने वाले महंत शास्त्री जी का जन्म 1958 में बिहार के सीतामढ़ी में हुआ था; 1976 से 1985 तक वे आरएसएस प्रचारक रहे। आरएसएस के कहने पर ही उन्होंने गंगा-जमुनी तहज़ीब पर आधारित इफ्तार नमाज़ का आयोजन किया था। मुख्यमंत्री और भाजपा के संत श्री योगी जी को राजनीतिक इतिहास का अध्ययन करना चाहिए!  


लेखक :
डा. राधेश्याम द्विवेदी ,एडवोकेट
पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,
आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.
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Wednesday, July 15, 2026

शिव के कालभैरव स्वरूप के विविध रूप ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


कालभैरव, भगवान शिव के उग्र और रुद्र अवतार हैं, जिन्हें 'समय के देवता' और ‘पापियों के दंडदाता’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें "काशी का कोतवाल" भी माना जाता है, उनकी कृपा से सभी भय व नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती है। वे आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनका वाहन काला कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को भोजन कराने से भी भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।



उत्पत्ति की कथा :-

पौराणिक मान्यताओं (शिव पुराण) के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा को अपनी श्रेष्ठता पर अहंकार हो गया था और उन्होंने भगवान शिव का अनादर कर दिया था । इस अहंकार को तोड़ने और ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए, शिव के क्रोध से 'काल भैरव' की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक अभिमानी पांचवें सिर को काट दिया था।


     

 भैरव का अर्थ ‘भय को हरने वाला’ होता है। उनका यह स्वरूप काल का स्वामी और सदैव रौद्र रूप में होता है। शिव पुराण के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसके साथ ही काल भैरव को ‘दंडपाणी’ भी कहा जाता है। क्योंकि वह पापियों को दंड देते हैं।

ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करना पड़ा :-

ब्रह्मा का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्म हत्या' का पाप लगा। इस पाप के निवारण के लिए उन्हें कई वर्षों तक एक भिक्षु के रूप में भटकना पड़ा। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव ने त्रिलोक में भ्रमण किया। अंततः, जब वे पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) पहुँचे, तो ब्रह्मा का कटा हुआ सिर (कपाल) उनके हाथ से नीचे गिर गया। तब जाकर वह पाप मुक्त हुए। तब से, काल भैरव को काशी का मुख्य कोतवाल और रक्षक माना जाने लगा है।


काल भैरव का भयानक स्वरूप :- 

काल भैरव का रूप अत्यंत भयानक है। उनका रंग काला है, वे हाथों में त्रिशूल, डमरू और ‘ब्रह्मा का कपाल’ धारण करते हैं, और उनका वाहनमृत्यु) और भय (डर) पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

पूजन का विशेष समय :- 

काल भैरव की पूजा के लिए रविवार और मंगलवार का दिन विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, हर माह के कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' (कालाष्टमी) का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसिक शांति और बाधा मुक्ति के लिए "ॐ कालभैरवाय विद्महे काशीवासाय धीमहि। तन्नो भैरवः प्रचोदयात्।" मंत्र का जाप किया जा सकता है।


निष्कर्ष :-

काल भैरव, शिव का सबसे शक्तिशाली रूप है। काल भैरव की कथा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने के लिए है। भैरव धर्म की पुनर्स्थापना करने, अहंकार का नाश करने और सत्य की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उनका उग्र रूप स्पष्टता का प्रतीक है। भ्रम को दूर करने और अनुशासन में दृढ़ता से खड़े रहने का साहस ही भैरव का स्वरूप है। भैरव अष्टमी पर काशी में भैरव की पूजा करें या घर पर एक साधारण प्रार्थना के माध्यम से, आध्यात्मिक संदेश एक ही रहता है- सत्य अहंकार से श्रेष्ठ है, अनुशासन भय से अधिक शक्तिशाली है, और भक्ति तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच्ची और निरंतर हो। काल भैरव अंधकार का प्रतीक नहीं हैं। वे अंधकार के अंत का प्रतीक हैं। इसीलिए भक्त उन्हें निर्भयता और आंतरिक स्थिरता जगाने वाली रक्षक शक्ति के रूप में याद करते हैं।

     काल भैरव के शास्त्रीय स्वरूप :-

अष्ट भैरव-

अष्ट भैरवों को काल भैरव के अधीन बताया गया है, जिन्हें ब्रह्मांड में समय का सर्वोच्च शासक और भैरव का प्रमुख रूप माना जाता है। भैरव की पूजा केवल एक रूप में नहीं की जाती। हिंदू देवता भैरव के आठ रूप हैं । उन्हें आठ दिशाओं का रक्षक और नियंत्रक माना जाता है।भैरव बाबा के 8 प्रमुख रूप को अष्ट भैरव कहा जाता है।  माना जाता है कि प्रत्येक रूप रक्षा, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति के एक अलग पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएँ अष्ट भैरव नामों का वर्णन थोड़ा भिन्न ढंग से कर सकती हैं, फिर भी मूल अवधारणा एक ही रहती है। भैरव की उपस्थिति बहुआयामी है। इसका अर्थ यह है कि भैरव पूजा कोई एक निश्चित अभिव्यक्ति नहीं है। यह भक्त के आध्यात्मिक विकास और संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलती रहती है। आरंभिक साधकों के लिए सभी रूपों को याद करना आवश्यक नहीं है। इसका उद्देश्य जानकारी एकत्र करना नहीं है, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ भक्ति का निर्माण करना है। 



1.असितंगा भैरव :-

असितांग भैरव भगवान शिव के उग्र रूप, काल भैरव के आठ प्रमुख रूपों में से प्रथम हैं। मुख्य रूप से रचनात्मकता, ज्ञान की प्राप्ति, और वाक सिद्धि के लिए पूजे जाने वाले इस देवता का वर्ण अत्यंत काला है, जिसके कारण उन्हें 'असितांग' (असित + अंग) कहा जाता है। इनका रंग गहरा नीला या काला होता है। इनके तीन नेत्र हैं और ये गले में सफेद कपालों (खोपड़ियों) की माला धारण करते हैं। अन्य भैरवों का सामान्य वाहन कुत्ता (श्वान) होता है, लेकिन असितांग भैरव का वाहन 'हंस' है, जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। ये पूर्व दिशा के रक्षक माने जाते हैं। इनकी शक्ति 'ब्रह्माणी' हैं। भक्तों का मानना है कि इनकी उपासना सेरचनात्मक क्षमता बढ़ती है, शाप से मुक्ति मिलती है और गंभीर रोगों से राहत प्राप्त होती है।हालांकि इनकी पूजा भैरव मंदिरों में सामान्य रूप से होती है, लेकिन इनका एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर वाराणसी में वृद्ध कालेश्वर के निकट महामृत्युंजय मंदिर के पास कृतवासा पीठ के धार्मिक क्षेत्र में स्थित है।


2.रुरु भैरव :-

रुरु भैरव भगवान शिव (रुद्र) के सबसे प्रमुख आठ रूपों में से दूसरा स्वरूप हैं। इन्हें 'आनंद भैरव' या 'गुरु भैरव' भी कहा जाता है। ज्ञान, उदारता, और कला-संगीत के प्रतीक इस भैरव की पूजा मुख्य रूप से बुद्धि, शत्रुओं पर विजय, धन प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'रुरु' शब्द का अर्थ रुद्र का मुख माना जाता है। यह उग्र होने के साथ-साथ अत्यंत ज्ञानवान और सही मार्ग दिखाने वाले गुरु के समान हैं। इनका वाहन सफेद बैल है और उनकी पत्नी महेश्वरी मातृका हैं। लाभ: इनकी आराधना से विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, कलाकारों को रचनात्मकता, और साधकों को भय तथा तंत्र-बाधा से मुक्ति मिलती है। रुरु भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सरल बीज मंत्र है:”ॐ भ्रं रुरु भैरवाय नमः।” वाराणसी अष्ट भैरव यात्रा के अंतर्गत इनका मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हनुमान घाट (B. 4/16) के पास स्थित है। श्रद्धालु यहाँ रिक्शा या ऑटो से सोनारपुरा चौराहे तक पहुँच सकते हैं। स्थानीय लोग इन्हें आनंद भैरव के नाम से भी पुकारते हैं। “वे भगवान शिव के ही एक अंश हैं और ज्ञान, उदारता, प्रेम तथा सही मार्गदर्शन के प्रतीक हैं।


3.चंदा भैरव :-

भगवान चंदा का भैरव का प्रकट होना बताया गया है। विनाश के देवता भगवान शिव, दुष्ट आत्माओं का नाश करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने और ब्रह्मांड में शुद्ध एवं सकारात्मक वातावरण स्थापित करने के लिए भगवान भैरव का रूप धारण करते हैं। भगवान भैरव कवचधारी, आक्रामक और भयभीत देवता हैं। आठ भैरवों में, भगवान चंदा भैरव अष्ट भैरव का तीसरा रूप हैं। वे नीले वस्त्रों में प्रसन्न और सौम्य हैं, विश्वास और विश्वसनीयता के प्रतीक हैं, शांति को बढ़ावा देते हैं और सभी कार्यों में सौम्यता का सम्मान करते हैं। वे अपने चार हाथों में अग्नि ज्वाला, गदा, भाला, धनुष और बाण धारण किए हुए, अपनी पत्नी देवी कुमारी (देवी पार्वती) के साथ अपने वाहन मोर पर बैठे हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर होते हैं। इस दिन होमम करने से जातकों को आनंदमय स्वभाव, शांति और सद्भाव, ऊर्जा और गतिशीलता, सकारात्मक रूप, जीवन में आत्मविश्वास, बाधाओं पर विजय, शत्रुता से मुक्ति और प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

चंदा भैरव भगवान की पूजा प्रतिस्पर्धा, शत्रुता और प्रतिद्वंद्वियों को दूर करते हैं और विकास, सफलता, विजय और व्यावसायिक उन्नति के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे शुभ ऊर्जा, धन, सर्वोच्चता, विकास की शक्ति, जीवन की वृद्धि, समृद्धि, उत्सव और समग्र खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। वे दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। उनका वाहन मोर है। भगवान चंदाभैरव मूल मंत्र है -

“ॐ ह्रीं सर्व शक्ति रूपाय नील वर्णाय

महा चंदा भैरवाय नमः।” पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपरोक्त मंत्र का 22 दिनों तक 1008 बार जाप करने से श्री चंदा भैरव का आशीर्वाद प्राप्त होगा, मंगल दोष और मंगल दशा के प्रभाव दूर होंगे और बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलेगी। जीवन में उन्नति और अद्भुत क्षणों का अनुभव होगा।

लाभ :-

आत्म-जागरूकता और प्रभावशाली रूप को आशीर्वाद दें, घृणा को दूर करें। अंतरात्मा को आशीर्वाद दें, बुरी धारणाओं और हानिकारक प्रभावों को दूर करें।स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद, अज्ञानता का निवारण करें। मंदी से मुक्ति, बाधाओं और परेशानियों को दूर करना होता है।वित्तीय ऋणमुक्ति का निवारण हो, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिले।अस्थिरता की परिस्थितियों को दूर करो, रोगमुक्त जीवन का आशीर्वाद दो।


4.क्रोध भैरव :-

क्रोध भैरव हिंदू धर्म में भगवान शिव के उग्र रूप और अष्ट भैरवों में से एक हैं।यह स्वरूप दुष्ट बाधाओं, शत्रुओं के विनाश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय माना जाता है।  क्रोध भैरव का स्वरूप उग्र और भयंकर होता है। इनका वर्ण लाल (रक्त) है, चार भुजाएँ हैं और ये खड्ग (तलवार), त्रिशूल, खप्पर (खोपड़ी का पात्र) तथा डमरू धारण करते हैं।अन्य भैरवों की तरह इनका वाहन भी काला कुत्ता (श्वान) है। यह स्वरूप तंत्र-मंत्र, तामसिक शक्ति और गुप्त साधनाओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इनकी पूजा मुख्य रूप से रात या श्मशान में की जाती है और इसे हमेशा किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 

लाभ: क्रोध भैरव की उपासना से साधक का आत्मबल बढ़ता है, तंत्र-मंत्र का प्रभाव नष्ट होता है और सभी प्रकार के कष्ट व शत्रु बाधा समाप्त होते हैं।

5.उन्मत्त भैरव :-

उन्मत्त भैरव, भगवान शिव के अष्ट भैरव स्वरूपों में से पांचवें स्वरूप हैं। उन्हें मुख्य रूप से माँ वाराही का भैरव माना जाता है। उन्मत्त भैरव का स्वरूप साधक के मन से नकारात्मक विचारों, कामुकता और दूषित आदतों को नष्ट कर सकारात्मक ऊर्जा और उत्कृष्ट वाणी प्रदान करने के लिए अत्यंत पूजनीय है।

लाभ - इस साधना से सभी प्रकार की तंत्र बाधाएं दूर होती हैं, शत्रुओं से रक्षा होती है, और निर्णय लेने की क्षमता व भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। मानसिक स्थिरता के लिए आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते हुए उनके मंत्रों का 21 दिनों तक धीमी आवाज़ में (उपांशु) जाप किया जाता है। उन्मत्त भैरव साधना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

गायत्री मंत्र: “ॐ महामंत्राय विद्महे । वाराहि मनोहराय धीमहि । तन्नौ उन्मत भैरव प्रचोदयात्।”


6.कपाल भैरव :-

कपाल भैरव, भगवान शिव के उग्र और तांत्रिक स्वरूप हैं।यह अष्ट भैरवों में से चौथे प्रमुख भैरव हैं। मुख्यतः वाराणसी (काशी) में इन्हें 'लाट भैरव' के रूप में पूजा जाता है, जहाँ ये नगर के रक्षक माने जाते हैं। इनकी साधना विशेषकर कानूनी विवादों, शत्रुओं और तंत्र बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, दंड और कपाल (मानव खोपड़ी) होता है। उनका वाहन काला कुत्ता है।इनका मूल मंत्र 'ॐ कपाल भैरवाय नमः' है।

लाभ- हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इनकी पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है, अटके हुए कार्य पूरे होते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है。वाराणसी के अलावा, पूरे भारत में अन्य शिव और भैरव मंदिरों में भी इनकी आराधना की जाती है। कपाल भैरव का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिर वाराणसी में अलापुर (सारनाथ मार्ग) में स्थित है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 4-5 किलोमीटर है। आशापुर चौराही (चौमुहानी) से सारनाथ जाने वाले मार्ग पर बाएँ न मुड़कर, दाहिने मुड़कर लगभग 2 किलोमीटर आगे जाने पर मंदिर पहुँचा जा सकता है।


7.भीषण भैरव :- 

भीषण भैरव को 'भूत भैरव' भी कहा जाता है। भगवान शिव के उग्र और शक्तिशाली अवतार, अष्ट भैरव में से सातवें भैरव हैं। वे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी आत्माओं और तंत्र-मंत्र के प्रभावों को नष्ट करने वाले रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह प्राचीन मंदिर क.63/28, भूतभैरव (ज्येष्ठेश्वर के निकट) में स्थित है। भीषण भैरव को क्रूरता, अज्ञानता और अहंकार के विनाशक के रूप में जाना जाता है, जो भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। वाराणसी की पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा द्वारा राक्षस दुर्गासुर का वध करने के बाद नगर की रक्षा के लिए आठ भैरवों को स्थापित किया गया था, जिनमें से भीषण भैरव एक हैं। 

लाभ - शक्तिशाली मंत्रभक्त नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से मुक्ति के लिए उनके बीज मंत्र का जाप करते हैं:॥ ॐ भ्रं भीषण भैरवाय फट् ॥बुरी नज़र और कष्टों के निवारण के लिए इस मूल मंत्र का भी उपयोग किया जाता है:॥ ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय सर्व शाप निवारणाय मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ॥


8. संहार भैरव:-

संहार भैरव भगवान शिव का सबसे उग्र और रौद्र स्वरूप हैं, जो ‘अष्ट भैरव’ में से एक हैं। 'संहार' का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि बुराइयों, नकारात्मक ऊर्जाओं और पापों का अंत कर धर्म की पुनर्स्थापना करना है। इनकी आराधना से भक्तों को निर्भयता और साहस की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, संहार भैरव एक कूप (कुएं) से स्वयं प्रकट हुए थे।स्वरूप: इन्हें दश-भुजी (दस भुजाओं) वाले देवता के रूप में दर्शाया गया है, जिनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, शंख, गदा, चक्र, तलवार और खप्पर आदि सुशोभित रहते हैं। इनका वर्ण बिजली जैसा पीला-नारंगी माना जाता है। संहार भैरव का मुख्य और प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर वाराणसी में पाटन दरवाजा, गाय घाट के पास स्थित है। 

लाभ - विशेष रूप से भय, अज्ञात चिंताओं और पुराने कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल का दीपक जलाना फलदायी होता है।काले तिल, उड़द और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है।इनके वाहन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यधिक शुभ माना जाता है। भक्त नकारात्मक शक्तियों और भय से मुक्ति के लिए इस बीज मंत्र और मूल मंत्र का जाप करते हैं:बीज मंत्र: ॐ भ्रां भैरवाय नमःमूल मंत्र: ॐ नमो भगवते संहार भैरवाय भूत प्रेता पिशाच ब्रह्मराक्षस उकताया उकताया संहारय संहारय सर्व भय छेदनं कुरु कुरु स्वाहा।


शक्तिशाली भैरव रूपों का विवरण


1.काल भैरव :- इन्हें सबसे उग्र और सर्वोच्च माना जाता है। मान्यता है कि इन्होंने ही अहंकार में चूर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था।इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है और इनके बिना काशी में कोई भी कार्य या अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है।

2.स्वर्णाकर्षण भैरव :- यह भैरव का वह स्वरूप है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार के आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है और अपार धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।

3.बटुक भैरव :- यह भैरव का सौम्य और बाल रूप है। इन्हें बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है और इनकी पूजा विशेष रूप से त्वरित फल देने वाली और भय-बाधाओं को नष्ट करने वाली मानी गई है।


भारत में काल भैरव के प्रमुख मन्दिर :-

भारत में काल भैरव भगवान शिव के उग्र अवतार के कई प्रमुख और सिद्ध मंदिर हैं। उन्हें मुख्य रूप से बुराई के विनाशक और 'क्षेत्रपाल' (रक्षक) माना जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के कालभैरव स्वरुप की उत्पत्ति मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए उत्तम मानी जाती है और ऐसी मान्यता है इस दिन काल भैरव की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। काल भैरव की पूजा न सिर्फ भारत बल्कि नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत जैसे कई देशों में होती है।भारत में कई स्थानों पर प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर है जिसका अपना अलग-अलग महत्व है। 


1.काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश):-

क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। उज्जैन मध्यप्रदेश के उज्जैन में भगवान शिव का प्राचीन और फेमस ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस जगह पर भगवान शिव काल भैरव स्वरूप भी विराजते हैं। भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्‍थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।बाबा कालभैरव भगवान सदाशिव के स्वरूप हैं। वे कलियुग की बाधाओं का शीघ्र निवारण करने वाले देवता माने जाते हैं। खासतौर से प्रेत व तांत्रिक बाधा के दोष उनके पूजन से दूर हो जाते हैं। संतान की दीर्घायु हो या गृहस्वामी का स्वास्थ्य, भगवान भैरव स्मरण और पूजन मात्र से उनके कष्टों को दूर कर देते हैं। भगवान भैरव के पूजन से राहु-केतु शांत हो जाते हैं। उनके पूजन में भैरव अष्टक और भैरव कवच का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे शीघ्र फल मिलता है। साथ ही तांत्रिक व प्रेत बाधा का संकट टल जाता है। 

       जहां उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सरकार द्वारा कॉरिडोर बनाकर दर्शन पूजन के सुलभ अवसर रुपया 250/- में उपलब्ध है, वही काल भैरव में रुपया 500/- देकर सुलभ दर्शन का विधान है,परंतु प्रत्यक्ष अनुभव से यह राशि भी बड़ी दिखती है तथा यहां सुलभ दर्शन का कोई विशेष सुविधा भी नहीं दी जाती यात्री है। ना तो सरकारी पुलिस और ना ही मंदिर के वॉलेंटियर जनता को वांछित सहयोग दे पाते हैं। 500 रूपये की भारी भरकम सुलभ शुल्क देने के बावजूद कई-कई घंटे लाइन में लगकर श्रद्धालु अपने आराध्य का दर्शन किसी प्रकार कर पाते हैं, जबकि महाकाल मन्दिर में कम समय में सुलभ और सुगम दर्शन व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो जाता है।


2.काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश): -

वाराणसी में स्थित काल भैरव मंदिर शहर के सबसे प्राचीन और पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है, जो भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। मान्यता है कि काल भैरव की अनुमति के बिना कोई भी काशी में प्रवेश नहीं कर सकता है।इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले भक्त काल भैरव के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं और काशी के कोतवाल से अनुमति लेते हैं। काशी के कोतवाल / संरक्षक के रूप में विख्यात काल भैरव को शहर का रक्षक माना जाता है। इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद बाबा काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है, अन्यथा यात्रा अधूरी मानी जाती है। ये काशी विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 


3. बटुक भैरव मंदिर, नई दिल्ली:-

 विनय मार्ग (चाणक्यपुरी) पर स्थित यह मंदिर पांडवकालीन माना जाता है। इसे 'पांडव कालीन बटुक भैरव मंदिर' भी कहते हैं । बाबा बटुक भैरव की मूर्ति यहां पर विशेष प्रकार से एक कुएं के ऊपर विराजित है। यह प्रतिमा पांडव भीमसेन ने काशी से लाए थे। यहाँ विशेष रूप से तेल और मीठी रोटी चढ़ाई जाती है। 

4.बटुक भैरव मंदिर, पांडव किला  दिल्ली-

बटुक भैरव मंदिर पांडव किला  दिल्ली में बाबा भैरव बटुक का मंदिर प्रसिद्ध है। इस मंदिर की स्थापना पांडव भीमसेन के द्वारा की गई थी। वास्तव में पांडव भीमसेन द्वारा लाए गए भैरव दिल्ली से बाहर ही विराज गए तो पांडव बड़े चिंतित हुए। उनकी चिंता देखकर बटुक भैरव ने उन्हें अपनी दो जटाएं दे दीं और उसे नीचे रख कर दूसरी भैरव मूर्ति उस पर स्थापित करने का निर्देश दिया।


5. घोड़ाखाल बटुक भैरव मंदिर, नैनीताल (उत्तराखंड): -

यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ भैरव बाबा को 'गोलू देवता' के रूप में भी पूजा जाता है। यहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर चिट्ठी लिखकर चढ़ाते हैं।भवाली से महज पांच किमी की दूरी पर स्थित सैनिक स्कूल के पीछे चाेटी पर बने इस मंदिर में हजारों घंटियां हैं। यहां नैसर्गिक सौंदर्य हर किसी को मुग्ध कर देता है।गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है। इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर पुकारा जाता है। गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है। इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है। गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है।


6.आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार :- 

आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार में स्थित है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। धार्मिक मान्यता है कि आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार के कोतवाल हैं। यहां श्रद्धालु अपनी परेशानियां बताते हैं और भगवान आनंद भैरव अपने भक्तों की सभीबाधाओं को दूर करते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर अनादि काल से हैं। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू का है। आनंद भैरव, भगवान शिव का सबसे आनंदमयी रूप है।


7.बाजनामठ भैरव मंदिर, जबलपुर :-

मध्यप्रदेश के जबलपुर में बाजना मठ मंदिर के पास महाकाल भैरव का मंदिर है। यहां पर होने वाले हवन की अग्नि में कई देवी-देवताओं की आकृति दिखती है। यह मंदिर तंत्र साधना के लिए भी जाना जाता है। बताया जाता है कि रानी दुर्गावती द्वारा गोंडवाना काल के दौरान मंदिर में प्रतिमा की स्थापना की गई थी। इस मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर परिसर में महाकाल भैरव के हवन के समय जिस भी देवता के नाम की यज्ञकुंड में आहुति दी जाती है, अग्नि में उस देवता की आकृति उबरती है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर 24 घंटे में महाकाल भैरव 52 बार रूप बदलते हैं।


8. राजा बटुक भैरव लखनऊ:-

लखनऊ के कैसरबाग में राजा बटुक भैरव मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और इनको सुरों का राजा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि यहां पर मांगने वाली मन्नत भी संगीत, साधना और कला से जुड़ी होती है। बटुक बाबा भगवान शिव के 5वें अवतार माने जाते हैं और यह मंदिर कला साधना का वर्षों पुराना केंद्र है।


लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.)



Tuesday, July 14, 2026

भगवान शिव के 116 भैरव स्वरूप और उनके परिवार✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


64 उग्र शक्तिशाली भैरव :-

भगवान शिव ने सृष्टि में शिव तत्त्व की रक्षा के लिए भैरव के आठ मुख्य सहित 64 उग्र शक्तिशाली रक्षक और 52 शक्तिपीठ रक्षक भैरव स्वरूपों का सृजन किया है। ये सब ब्रह्मांड की विभिन्न ऊर्जाओं और दिशाओं के रक्षक माने जाते हैं। भैरव भगवान शिव के ही स्वरूप हैं और वे भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। यह चतुःषष्टि भैरव नामावली उनके 64 स्वरूपों का आह्वान है। इसके नियमित पाठ से जहाँ एक ओर सभी भय दूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर शत्रुओं का भी नाश होता है। प्रत्येक अष्ट भैरव को आठ अधीनस्थ भैरवों का स्वामी माना जाता है, कुल मिलाकर 64 विश्व रक्षक भैरव होते हैं।  हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में भगवान शिव के रौद्र अवतार माने जाने वाले कुल 8 मुख्य भैरव (अष्टभैरव) हैं। इसके साथ ही, व्यापक वर्गीकरण में 8 प्रमुख भैरवों के 8-8 उप-भैरव कुल संख्या में 64 भैरव होते हैं।

52 शक्तिपीठों के रक्षक भैरव :-

इसके अलावा 52 शक्तिपीठों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अलग-अलग भैरव स्वरूप नियुक्त किए, जिन्हें 52 भैरव कहा जाता है।

दोनों की अलग-अलग गणनाएँ हैं- 

64 भैरव पूरे ब्रह्मांड और तंत्र साधना से जुड़े हैं, जबकि 52 भैरव शक्तिपीठों की सुरक्षा से संबंधित हैं। मूल रूप में ये सब उन्हीं के अलग-अलग नाम और रूप हैं। इस प्रकार भैरव की कुल संख्या 116 होती है जो शिव के अलग-अलग उद्देश्य और लक्ष्यों को पूरा करते हैं ।

अष्ट भैरव स्वरूप :- 

अष्टभैरव भगवान शिव के आठ शक्तिशाली रूप हैं, जिनमें से प्रत्येक को आठ दिशाओं के संरक्षक के रूप में पूजा जाता है। ये तीव्र और गतिशील रूप शिव की अपार ऊर्जा और उग्र उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो बुराई की शक्तियों के नाश और धर्म की समर्पित रक्षा का प्रतीक हैं। वे आध्यात्मिक मुक्ति की ओर अपने भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, उन्हें गहन ज्ञान और शक्ति से मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रत्येक अष्टभैरव अद्वितीय है, जिसमें विशिष्ट प्रतीकवाद, विशेषताएं और दिव्य भूमिकाएं हैं, जो उन्हें हिंदू पूजा और परंपरा के समृद्ध ताने-बाने में पिरोती हैं। उनकी सशक्त उपस्थिति न केवल श्रद्धा को प्रेरित करती है, बल्कि ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाली दिव्य शक्तियों के साथ गहरे संबंध को भी प्रोत्साहित करती है।

अष्टभैरवों की उत्पत्ति की कहानी:-

अष्टभैरवों की उत्पत्ति हिंदू पौराणिक कथाओं, विशेष रूप से शिव के उग्र अवतार भैरव की कथाओं में निहित है। शिव पुराण के अनुसार, भैरव की उत्पत्ति सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा और संरक्षक भगवान विष्णु के बीच वर्चस्व को लेकर हुए ब्रह्मांडीय संघर्ष से हुई। इस विवाद के दौरान, ब्रह्मा ने अहंकार पूर्वक शिव के सर्वोच्च अधिकार को नकार दिया और उनकी दिव्यता को कमतर आंका।

ब्रह्मा के अहंकार का निवारण :-

ब्रह्मा के अहंकार के फलस्वरूप, शिव ने दिव्य क्रोध में आकर काल भैरव का भयंकर रूप धारण किया, जो त्रिशूल और ढोल धारण किए एक भयावह आकृति थे। भैरव ने अपनी अपार शक्ति से ब्रह्मा के पाँच सिरों में से एक सिर काटकर उन्हें विनम्र किया और उनके अहंकार को परास्त किया। यह कार्य अहंकार और अज्ञान के नाश का प्रतीक था। यद्यपि ब्रह्मा का सिर काटने से ब्रह्महत्या (ब्राह्मण की हत्या) का पाप लग गया। इस पाप से मुक्ति पाने और ब्रह्मांडीय संतुलन बहाल करने के लिए, शिव ने अष्टभैरवों को प्रकट किया, जो उनके आठ उग्र रूप बन गए। प्रत्येक रूप को ब्रह्मांड के विभिन्न लोकों की देखरेख करने और सृष्टि को बुराई से बचाने का कार्य सौंपा गया।

अष्टभैरवों के नाम और प्रतीकवाद :-

अष्टभैरव केवल क्रोध के प्रतीक नहीं हैं; वे शक्तिशाली संरक्षक और रक्षक हैं, जो ब्रह्मांड में सामंजस्य स्थापित करने वाली दिव्य ऊर्जाओं का संचार करते हैं। प्रत्येक भैरव एक विशिष्ट दिशा से जुड़ा है, एक अद्वितीय शस्त्र धारण करता है, एक शक्तिशाली वाहन पर सवार होता है और एक समर्पित संगिनी के साथ होता है, जिनमें से प्रत्येक गहन प्रतीकात्मक अर्थों को प्रतिबिंबित करता है जो हमारे जीवन में संतुलन और शक्ति को प्रेरित करते हैं।

असितंगा भैरव :-

इनकी दिशा पूर्व है। यह सृष्टि के मूल तत्वों और सार का प्रतिनिधित्व करता है। असितांग भैरव पवित्रता और अस्तित्व के मूलभूत स्वरूप का प्रतीक है। इनका शस्त्र तलवार है। इनका वाहन हंस है। इनके संगिनी का नाम ब्राह्मी (सरस्वती का एक रूप) है। असितांग भैरव को अक्सर एक शांत लेकिन शक्तिशाली देवता के रूप में चित्रित किया जाता है, जो जीवन की शुरुआत करने और सद्भाव बनाए रखने के लिए आवश्यक रचनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

रुरु भैरव :-

इनकी दिशा दक्षिण-पूर्व है। ये ज्ञान, बुद्धि और कला के संरक्षक हैं। वे रचनात्मकता और बौद्धिक विकास को प्रेरित करते हैं। इनका शस्त्र अक्षमाला (माला), पुस्तक, वीणा (लतील), और खटवांगा (खोपड़ी के शीर्ष वाला दंड) है। इनका वाहन बैल है। इनकी पत्नी महेश्वरी है। रुरु भैरव की शिक्षाएं भक्तों को ज्ञान प्राप्ति के मार्ग के रूप में सीखने और कलात्मक अभिव्यक्ति को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

चंदा भैरव:-

ये दक्षिण दिशा के रक्षक होते हैं। ये शक्ति और वीरता के प्रतीक हैं, जो भक्तों को शत्रुओं से बचाते हैं और उन्हें धर्म के मार्ग पर मार्गदर्शन करते हैं। इनका शस्त्र डमरू (ढोल), त्रिशूल खटवांगा (खोपड़ी के शीर्ष वाला दंड) और तलवार है। इनका वाहन मोर है। इनकी संगिनी कौमारी है।भैरव के इस रूप की पूजा साहस, दृढ़ता और आंतरिक एवं बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए की जाती है।

क्रोध भैरव :- 

ये दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। दैवीय क्रोध के अवतार, क्रोध भैरव अपनी ऊर्जा का उपयोग बुराई को नष्ट करने और धर्म की रक्षा करने के लिए करते हैं। इनका शस्त्र शक्ति (भाला), डमरू (ढोल), खेतका (ढाल) और खड्ग (तलवार) है। इनका वाहन ईगल है। इनकी संगिनी वैष्णवी है। क्रोध भैरव का धार्मिक क्रोध नकारात्मक शक्तियों के नाश को सुनिश्चित करता है और साथ ही गुणी लोगों की रक्षा करता है।

उन्मत्त भैरव :- 

ये पश्चिम दिशा के अधिपति हैं,जो दिव्य परमानंद, आनंद और परमानंद का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे भक्ति और ध्यान के माध्यम से प्राप्त पारलौकिक अवस्था के प्रतीक हैं। इनका शस्त्र डमरू (ढोल), पाश (फंदा), शूल (भाला) और कपाल (खोपड़ी का कटोरा)।घोड़ा इनका वाहन है। इनके संगिनी का नाम वराही है।

भैरव का यह रूप भक्तों को आंतरिक सुख और आध्यात्मिक साधनाओं से उत्पन्न होने वाले दिव्य आनंद की तलाश करने के लिए प्रेरित करता है।

कपला भैरव :- 

ये उत्तर पश्चिम दिशा के भैरव हैं। ये कपाल पवित्र अनुष्ठानों के रक्षक हैं और आध्यात्मिक प्रथाओं की पवित्रता सुनिश्चित करते हैं। इनका शस्त्र कपाल (खोपड़ी का कटोरा), खड्ग (तलवार), पाशा (फंदा) और डमरू (ढोल) है । हाथी इनका वाहन है। इनके संगिनी का नाम इंद्राणी है। अनुष्ठानों के संरक्षक के रूप में उनकी भूमिका पूजा में अनुशासन और पवित्रता बनाए रखने के महत्व को उजागर करती है।

भीषण भैरव :-

ये उत्तर दिशा के रक्षक होते हैं। भयंकर होते हुए भी दयालु, भीषण भैरव भय का नाश करते हैं और अपने भक्तों को शांति प्रदान करते हैं। इनका शस्त्र त्रिशूल,डमरू, खटवांग और घंटा है। सिंह इनका वाहन है। इनके संगिनी का नाम चामुंडी है।

भीषण भैरव भक्तों को साहस औरविश्वास के साथ अपने भय और चुनौतियों पर काबू पाने की शक्ति प्रदान करते हैं।

संहार भैरव :- 

ये उत्तर-पूर्व दिशा के स्वामी हैं। संहार भैरव, जो परम संहारक हैं, अज्ञान, बुराई और आसक्तियों का नाश करके मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इनका शस्त्र खड्ग (तलवार), खटवांग (खोपड़ी के शीर्ष वाला दंड), पाश (फांसी) और डमरू (ढोल) है। कुत्ता इनका वाहन है। इनके संगिनी का नाम चंडिका है।संहार भैरव की ऊर्जा का मुख्य उद्देश्य नकारात्मकता का पूर्णतः नाश करना और भक्तों को मोक्ष (मुक्ति) की ओर मार्गदर्शन करना है।

अष्टभैरव की पत्नियाँ:अष्टमातृकाएँ

प्रत्येक भैरव के साथ उनकी संगिनी होती हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से अष्ट मातृकाएँ कहा जाता है। ये दिव्य स्त्री शक्तियाँ भैरवों की सुंदरता को निखारती हैं और शिव (पुरुष शक्ति का प्रतीक) और शक्ति (स्त्री शक्ति का सार) के सामंजस्यपूर्ण मिलन का प्रतीक हैं। संगिनियाँ ज्ञान, वीरता और पोषण सहित दिव्य शक्ति के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो ब्रह्मांड की बहुआयामी प्रकृति को दर्शाती हैं।

1. ब्रह्माणी :-

असितांग भैरव से संबद्ध ब्राह्मी ज्ञान, बुद्धि और सृजन की तेजस्वी प्रतिमा हैं। वे सरस्वती के रूप में प्रकट होती हैं, जो विद्या की पूजनीय देवी हैं और साधकों को समझ और रचनात्मकता की गहराई में उतरने के लिए प्रेरित करती हैं।

2.महेश्वरी: -

रुरु भैरव की पत्नी, महेश्वरी प्रभुत्व, शक्ति और संरक्षण की आभा बिखेरती हैं। उनकी उपस्थिति शक्ति और अधिकार का संचार करती है, और वे अपने भक्तों को दयालु नेतृत्व से मार्गदर्शन करती हैं।

3. कौमारी :-

चंदा भैरव से जुड़ी कौमारी युवा ऊर्जा, शक्ति और वीरता का प्रतीक हैं। उनका जीवंत सार उनका आह्वान करने वाले सभी लोगों को स्फूर्ति प्रदान करता है, और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस और रोमांच की भावना को प्रेरित करता है।

4.वैष्णवी :- 

समृद्धि और संरक्षण की प्रतीक, वैष्णवी क्रोध भैरव के साथ खड़ी रहती हैं और आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक क्रोध प्रकट करती हैं। वे अपने भक्तों की आकांक्षाओं का पोषण करती हैं और साथ ही धर्म के मूल्यों की रक्षा भी करती हैं।

5.वराही :-

उन्मत्त भैरव से संबद्ध वराही, पोषण, साहस और दिव्य स्त्रीत्व के पालन-पोषण संबंधी ऊर्जाओं से प्रतिध्वनित होती हैं। वे न केवल शारीरिक रूप से पोषण प्रदान करती हैं बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास को भी बढ़ावा देती हैं।

6.इंद्रानी :-

कपाल भैरव की पत्नी, इंद्रानी अद्वितीय शक्ति, प्रभुत्व और धर्म के संरक्षण का प्रतीक हैं। उनकी प्रखर आत्मा सत्य और न्याय का समर्थन करने वालों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है।

7. चामुंडा :-

भीषण भैरव से जुड़ी चामुंडी, बुरी शक्तियों को नष्ट करने वाली प्रचंड और परिवर्तन -कारी शक्ति का प्रतीक हैं। उनकी उपस्थिति उनके अनुयायियों को सशक्त बनाती है और उनमें नकारात्मकता और अंधकार पर विजय पाने का संकल्प जगाती है।

8. चंडिका :- 

संहार भैरव की शक्तिशाली पत्नी, चंडिका शक्ति का उग्र रूप हैं, जिन्हें अज्ञान का नाश करने और मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सौंपा गया है। उनकी तीव्र ऊर्जा आत्मा को जागृत करती है, भक्तों को ज्ञान और परम स्वतंत्रता की ओर मार्गदर्शन करती है।

अष्ट भैरव का विस्तार : चौसठ भैरव :-

यह संख्या तांत्रिक और शैव परंपराओं से जुड़ी है।सबसे पहले अष्ट भैरव (8 प्रमुख रूप) होते हैं जो आठ दिशाओं के रक्षक हैं।इन्हीं 8 भैरवों के 8-8 उप-स्वरूप होते हैं, जिससे कुल 64 भैरव बनते हैं।इन 64 भैरवों का संबंध 64 योगिनियों से भी होता है। संपूर्ण चतुःषष्टि भैरव नामावलि इस प्रकार है -


असिताङ्गो विशालाक्षो मार्तण्डोमोदकप्रियः 

स्वच्छन्दो विघ्नसन्तुष्टः खेचरः सचराचरः ॥ 


रुरुश्च क्रोड-दंष्ट्रश्च तथैव च जटाधरः ।

विश्वरूपो विरूपाक्षो नानारूपधरः परः ॥ 


वज्रहस्तो महाकायश्चण्डश्च प्रलयान्तकः ।

भूमिकम्पो नीलकण्ठो विष्णुश्च कुलपालकः


मुण्डमालः कामपालः क्रोधो वै पिङ्गलेक्षणः 

उग्ररूपो धरापालः कुटिलो मन्त्रनायकः ॥ 


रुद्रः पितामहाख्यश्च व्युन्मत्तो बटुनायकः ।

शङ्करो भूत-वेतालस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तकः ॥ 


वरदः पर्वतावासः कपालः शशिभूषणः ।

हस्तिचर्माम्बरधरो योगीशो ब्रह्मराक्षसः ॥ 


सर्वज्ञः सर्वदेवेशः सर्वभूतहृदिस्थितः ।

भीषणाख्यो भयहरः सर्वज्ञाख्यस्तथैव च ॥ 


कालाग्निश्च महारौद्रौ दक्षिणो मुखरोऽस्थिरः 

संहारश्चातिरिक्ताङ्गो कालाग्निश्च प्रियङ्करः


घोरनादो विशालाङ्गो योगीशो दक्षसंस्थितः 

चतुःषष्टीरूपधृग्देवो भैरवः स सदाऽवतु ॥ 


64 भैरवों के नाम :-

प्रथम श्लोक के 8 नाम -

1. असिताङ्गः - काले शरीर वाले

2. विशालाक्षः - विशाल नेत्रों वाले

3. मार्तण्डः - सूर्य के समान तेजस्वी

4. मोदकप्रियः - मोदक प्रिय (लड्डू पसंद)

5. स्वच्छन्दः - स्वतंत्र विचरण करने वाले

6. विघ्नसन्तुष्टः - विघ्नों से संतुष्ट होने वाले

7. खेचरः - आकाश में विचरण करने वाले

8. सचराचरः - चर-अचर सबमें व्याप्त

द्वितीय श्लोक के 8 नाम -

1. रुरुः - रुरु नामक भैरव

2. क्रोडदंष्ट्रः - विशाल दाढ़ों वाले

3. जटाधरः - जटा धारण करने वाले

4. विश्वरूपः - विश्व रूप धारण करने वाले

5. विरूपाक्षः - विकृत नेत्रों वाले

6. नानारूपधरः - अनेक रूप धारण करने वाले

7. परः - परम श्रेष्ठ अर्थात सर्वोच्च, अनंत और माया से परे माना जाता है। वह सभी भयों के नाशक, काल के नियंत्रक और साधकों के परम रक्षक 

तृतीय श्लोक के 8 नाम-

1. वज्रहस्तः - हाथों में वज्र धारण करने वाले

2. महाकायः - विशाल शरीर वाले

3. चण्डः - उग्र स्वभाव वाले

4. प्रलयान्तकः - प्रलय का अंत करने वाले

5. भूमिकम्पः - भूकंप उत्पन्न करने वाले

6. नीलकण्ठः - नीले कंठ वाले (शिव स्वरूप)

7. विष्णुः - विष्णु स्वरूप

8. कुलपालकः - कुल की रक्षा करने वाले

चतुर्थ श्लोक के 8 नाम -

1. मुण्डमालः - मुण्डों की माला पहनने वाले

2. कामपालः - कामनाओं की पूर्ति करने वाले

3. क्रोधः - क्रोध स्वरूप वाले

4. पिङ्गलेक्षणः - पिंगल नेत्रों वाले

5. उग्ररूपः - उग्र रूप वाले

6. धरापालः - पृथ्वी की रक्षा करने वाले

7. कुटिलः - कुटिल (रहस्यमय) स्वरूप

8. मन्त्रनायकः - मंत्रों के स्वामी

पंचम श्लोक के 8 नाम -

1. रुद्रः - रुद्र स्वरूप

2. पितामहः - ब्रह्मा स्वरूप

3. व्युन्मत्तः - मस्त (उन्मत्त) स्वरूप

4. बटुनायकः - बटुकों के स्वामी

5. शङ्करः - कल्याण करने वाले

6. भूतवेतालः - भूत-प्रेतों के स्वामी

7. त्रिनेत्रः - तीन नेत्रों वाले

8. त्रिपुरान्तकः - त्रिपुर का नाश करने वाले

षष्ठ श्लोक के 8 नाम-

1. वरदः - वरदान देने वाले

2. पर्वतावासः - पर्वतों पर निवास करने वाले

3. कपालः - कपाल धारण करने वाले

4. शशिभूषणः - चन्द्रमा से अलंकृत

5. हस्तिचर्माम्बरधरः - हाथी की खाल पहनने वाले

6. योगीशः - योगियों के स्वामी

7. ब्रह्मराक्षसः - ब्रह्मराक्षस स्वरूप

सप्तम श्लोक के 7 नाम-

1. सर्वज्ञः - सब कुछ जानने वाले

2. सर्वदेवेशः - सभी देवताओं के स्वामी

3. सर्वभूतहृदिस्थितः - सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले

4. भीषणः - भयानक स्वरूप

5. भयहरः - भय का हरण करने वाले

6. सर्वज्ञः (पुनः) - सर्वज्ञ (बल देने के लिए)

7. तथैव इसी प्रकार के 

अष्टम श्लोक के 8 नाम-

1. कालाग्निः - कालाग्नि स्वरूप

2. महारौद्रः - महारौद्र स्वरूप

3. दक्षिणः - दक्षिण मुखी भैरव

4. मुखरः - मुखर (बोलने वाले)

5. अस्थिरः - अस्थिर (गतिशील)

6. संहारः - संहार करने वाले

7. अतिरिक्ताङ्गः - अतिरिक्त अंगों वाले

8. प्रियङ्करः - प्रिय करने वाले

नवम श्लोक के 3 नाम -

1. घोरनादः - भयंकर नाद करने वाले

2. विशालाङ्गः - विशाल अंगों वाले

3. दक्षसंस्थितः - दक्षिण दिशा में स्थित

शक्ति पीठों की सुरक्षा के लिए : बावन  भैरव का विस्तार :-

यह संख्या मुख्य रूप से 52 शक्तिपीठों से जुड़ी हुई है।मान्यता के अनुसार, माता सती के शरीर के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ एक शक्तिपीठ बना। हिंदू धर्म में 52 भैरवों का उल्लेख किया गया है, जो भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं। ये भैरव विभिन्न स्थानों पर स्थित हैं और उनकी पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है। 52 शक्तिपीठों की रक्षा के लिए 52 भैरवों का भी उल्लेख मिलता है। सनातन धर्म और 'तंत्र चूड़ामणि' के अनुसार माता सती के 52 शक्तिपीठों में से प्रत्येक के साथ शिव का एक 'भैरव' स्वरूप रक्षक के रूप में विद्यमान है। यहाँ सभी 52 प्रमुख शक्तिपीठ उनकी शक्ति, उनकी भैरवी और भैरव की संपूर्ण सूची दी जा रही है-


1.  हिंगलाज

      शक्ति- कोटरी (भैरवी-कोट्टवीशा) 

      भैरव का नाम - भीमलोचन 

2.  शर्कररे (करवीर)

       शक्ति- महिषासुरमर्दिनी

       भैरव का नाम - क्रोधिश 

3.   सुगंधा- सुनंदा

       शक्ति है सुनंदा

       भैरव का नाम - त्र्यंबक

4.  कश्मीर- महामाया

        शक्ति है महामाया

        भैरव का नाम - त्रिसंध्येश्वर 

5.  ज्वालामुखी- सिद्धिदा (अंबिका)

      शक्ति है सिद्धिदा (अंबिका) 

      भैरव का नाम - उन्मत्त 

6.  जालंधर- त्रिपुरमालिनी

      शक्ति है त्रिपुरमालिनी

      भैरव का नाम - भीषण 

7.  वैद्यनाथ- जयदुर्गा

       शक्ति है जय दुर्गा 

      भैरव का नाम - वैद्यनाथ 

8.  नेपाल- महामाया ( गुहेश्वरी )

       शक्ति है महशिरा (महामाया) 

      भैरव का नाम - कपाली 

9.  मानस- दाक्षायणी

       शक्ति है दाक्षायनी

       भैरव का नाम - अमर 

10.  विरजा- विरजाक्षेत्र

        शक्ती है विमला

        भैरव का नाम - जगन्नाथ 

11.   गंडकी- गंडकी

         शक्ती है चण्डी

         भैरव का नाम - चक्रपाणि 

12.  बहुला- बहुला (चंडिका)

         शक्ति है देवी बाहुला

         भैरव का नाम - भीरुक 

13.   उज्जयिनी- मांगल्य चंडिका

         शक्ति है मंगल चंद्रिका

         भैरव का नाम - कपिलांबर 

14.   त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी

         शक्ति है त्रिपुर सुंदरी

        भैरव का नाम - त्रिपुरेश 

15.   चट्टल - भवानी

         शक्ति है भवानी

         भैरव का नाम - चंद्रशेखर 

16.   त्रिस्रोता- भ्रामरी

         शक्ति है भ्रामरी

         भैरव का नाम - अंबर और   भैरवेश्वर

17.   कामगिरि- कामाख्‍या

         शक्ति है कामाख्या 

         भैरव का नाम - उमानंद 

18.   प्रयाग- ललिता

         शक्ति है ललिता

         भैरव का नाम - भव

19.   जयंती- जयंती

         शक्ति है जयंती

         भैरव का नाम - क्रमदीश्वर

20.  युगाद्या- भूतधात्री

        शक्ति है भूतधात्री

        भैरव का नाम - क्षीर खंडक

21.  कालीपीठ- कालिका

        शक्ति है कालिका 

        भैरव का नाम - नकुशील

22.  किरीट- विमला (भुवनेशी)

        शक्ति है विमला 

        भैरव का नाम - संवर्त्त 

23.  वाराणसी- विशालाक्षी

        शक्ति है विशालाक्षी‍ मणिकर्णी

        भैरव का नाम - काल भैरव 

24.  कन्याश्रम- सर्वाणी

        शक्ति है सर्वाणी

        भैरव का नाम - निमिष 

25.  कुरुक्षेत्र- सावित्री

        शक्ति है सावित्री

        भैरव का नाम - स्थाणु

26.  मणिदेविक- गायत्री

        शक्ति है गायत्री 

        भैरव का नाम - सर्वानंद

27.  श्रीशैल- महालक्ष्मी

        शक्ति है महालक्ष्मी

        भैरव का नाम - शम्बरानंद

28.   कांची- देवगर्भा

         शक्ति है देवगर्भा

         भैरव का नाम - रुरु 

29.   कालमाधव- देवी काली

         शक्ति है काली

         भैरव का नाम - असितांग 

30.   शोणदेश- नर्मदा (शोणाक्षी)

         शक्ति है नर्मदा

         भैरव का नाम - भद्रसेन 

31.   रामगिरि- शिवानी

         शक्ति है शिवानी

         भैरव का नाम - चंड 

32.  वृंदावन- उमा

        शक्ति है उमा 

        भैरव का नाम - भूतेश 

33.  शुचि- नारायणी

        शक्ति है नारायणी 

        भैरव का नाम - संहार

34.   पंचसागर- वाराही

         शक्ति है वराही

         भैरव का नाम - महारुद्र

35.   करतोयातट- अपर्णा

         शक्ति है अर्पण

         भैरव का नाम - वामन

36.  श्रीपर्वत- श्रीसुंदरी

        शक्ति है श्रीसुंदरी

        भैरव का नाम - सुंदरानंद

37.  विभाष- कपालिनी

        शक्ति है कपालिनी (भीमरूप)

       भैरव का नाम - शर्वानंद 

38.  प्रभास- चंद्रभागा

        शक्ति है चंद्रभागा 

        भैरव का नाम - वक्रतुंड

39.  भैरवपर्वत- अवंती

        शक्ति है अवंति

        भैरव का नाम - लम्बकर्ण

40.   जनस्थान- भ्रामरी

         शक्ति है भ्रामरी

         भैरव का नाम - विकृताक्ष

41.  सर्वशैल स्थान

        शक्ति है रा‍किनी

        भैरव का नाम - वत्सनाभम

42.    गोदावरी तीर :

         शक्ति है विश्वेश्वरी

         भैरव का नाम - दंडपाणि

43.   रत्नावली- कुमारी

        शक्ति है कुमारी

        भैरव का नाम - शिव 

44.   मिथिला- उमा (महादेवी)

        शक्ति है उमा

        भैरव का नाम - महोदर

45.  नलहाटी- कालिका तारापीठ

        शक्ति है कालिका देवी 

        भैरव का नाम योगेश

46.  कर्णाट- जयदुर्गा

        शक्ति है जयदुर्गा

        भैरव का नाम - अभिरु 

47.  वक्रेश्वर- महिषमर्दिनी

       शक्ति है महिषमर्दिनी 

       भैरव का नाम - वक्रनाथ

48.  यशोर- यशोरेश्वरी

        शक्ति है यशोरेश्वरी

       भैरव का नाम - चण्ड 

49.  अट्टाहास- फुल्लरा

       शक्ति है फुल्लरा

       भैरव का नाम - विश्वेश

50.  नंदीपूर- नंदिनी

       शक्ति है नंदिनी और 

       भैरव का नाम नंदिकेश्वर

51.  लंका- इंद्राक्षी

       शक्ति है इंद्राक्षी

       भैरव का नाम - राक्षसेश्वर

52.  मगद - सर्वानन्दकरी

       शक्ति है सर्वानन्दकरी

       भैरब का नाम व्योमकेश

भैरव मंत्र :-

भैरव आराधना के लिए इनमे से कोई भी मंत्र ले सकते हैं 

- 'ॐ कालभैरवाय नम:।'

- ॐ भयहरणं च भैरव:।'

- 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।'

- 'ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।'

- 'ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।'

उपरोक्त मंत्र जप आपके समस्त शत्रुओं का नाश करके उन्हें भी आपके मित्र बना देंगे। आपके द्वारा सच्चे मन से की गई भैरव आराधना और मंत्र जप से आप स्वयं को जीवन में संतुष्ट और शांति का अनुभव करेंगे।

भैरव उपासना की दो शाखाएं

कालान्तर में भैरव-उपासना की दोशाखाएं विकसित हुईं - जो बटुक भैरव तथा काल भैरव के रूप में प्रसिद्ध हुईं। 

बटुक भैरव :-

भगवान शिव के बाल या कुमार रूप हैं, जिन्हें अत्यधिक सात्विक, दयालु और शीघ्र फलदायी माना जाता है।यह भक्तों को भय, शत्रुओं और बुरी नजर से बचाने वाले रक्षक देवता हैं।इनकी पूजा विशेष रूप से मंगलवार और रविवार को की जाती है। बटुक भैरव अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात हैं ।बटुक भैरव को भैरवनाथ का बाल रूप कहा गया है। इन्हें एक सुंदर, तेजस्वी और चंचल बालक के रूप में दर्शाया जाता है।इनके हाथों में त्रिशूल, डमरू और कपाल होता है, और इनका वाहन काला कुत्ता होता है।इनकी साधना और मंत्र जाप से जीवन के संकट, ऊपरी बाधाएं, और शनि या राहु-केतु के दोष दूर होते हैं। इनका सबसे सरल और प्रभावी मंत्र है:ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ। मंगलवार को भैरव मंदिर में काले कुत्ते को मीठी रोटी या इमरती खिलाने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।

काल भैरव:-

काल भैरव, भगवान शिव के उग्र और रुद्र अवतार हैं, जिन्हें 'समय के देवता' और पापियों के दंडदाता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें "काशी का कोतवाल" माना जाता है, और उनकी कृपा से सभी भय व नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं।काल भैरव आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। काल भैरव की पूजा के लिए रविवार और मंगलवार का दिन विशेष फलदायी माना जाता है।इसके अलावा, हर माह के कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' (कालाष्टमी) का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसिक शांति और बाधा मुक्ति के लिए "ॐ कालभैरवाय विद्महे काशीवासाय धीमहि। तन्नो भैरवः प्रचोदयात्।" मंत्र का जाप किया जाता है। इनका वाहन काला कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को भोजन कराने से भी भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.