इतिहास के अद्भुत रहस्य
Saturday, August 1, 2026
भगवान राम के शिक्षा से जुड़ा हुआ है अयोध्या का विद्या कुंड✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
Friday, July 31, 2026
संसद परिसर में बहुसंख्यक समाज का अपमान कब तक होगा ? :‘सनातन धर्म' ही निशाने पर क्यों होता है ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
सनातन परंपरा आस्था का उपहास :-
आलौकिक, पारलौकिक मान्यताओं से मन को खुशी प्रदान करने वाला, जन्म- मरण के बंधन से मुक्त करने वाला, सत्य- अहिंसा के मार्ग पर चलाने वाला, भक्ति के सागर में डूबकर पार लगाने वाला धर्म ही तो सनातन धर्म है। इसके मूल में दया, सहिष्णुता, अहिंसा, तपस्या आदि है।
यह अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से जीवन की ओर ले जाता है। इतनी खूबियों के बावजूद कुछ मानसिक रोग से ग्रसित सांसद साधु का वेश धारण कर नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सनातन परंपरा और हिंदू आस्था का देश के सबसे प्रबुद्ध वर्ग द्वारा उपहास किया गया है जो किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर पूरे साधु-संत समाज, पुजारियों और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को कटघरे में खड़ा करना अनुचित और निंदनीय है। भारत की संत परंपरा ने सदियों से समाज को आध्यात्मिक मार्गदर्शन, सेवा और संस्कृति का संदेश दिया है। यदि संसद परिसर में राजनीतिक विरोध के नाम पर भगवा, साधु-संतों या धार्मिक प्रतीकों का उपहास किया जाता है, तो यह करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला कदम है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन किसी भी धर्म या उसकी आस्था का अपमान ना तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और ना ही यह भारतीय संविधान के प्राविधानों के अनुकूल ही है। संसद परिसर में हुए इस कुकृत्य पर अधिकारिता होते हुए सत्ता दल , विपक्ष, लोकसभा/ राज्यसभा अध्यक्ष का मौन रहना पूर्णतः अलोकतांत्रिक है। स्वतः संज्ञान लेने वाला सर्वोच्च और उच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया ना मिलना भी चिंतनीय है। देश की बहुसंख्यक आम जनता ऐसे कुआचरण को किंकर्तव्य विमूढ़ता से देख रही है और उचित समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से अपना निर्णय भी देगी।
सनातन धर्म के अपमान के कुछ प्रमुख कारण:-
सनातन धर्म को निशाना बनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से राजनीतिक लाभ, चुनावी फायदा, वैचारिक मतभेद , सनातनी सहिष्णुता और अपनी कमियों को नजरंदाज करके सनातन को नीचा दिखाने की कुत्सित मानसिकता आदि भारतीय समाज की विसंगतियां हैं।
राजनीतिक लाभ के लिए :-
राजनीतिक लाभ के लिए प्रायः सनातन धर्म को निशाना बनाया जाता है। इसका मुख्य कारण विभिन्न विचारधाराओं का विशाल जनसमूह का होना, उन्हें ध्रुवीकरण करना , उनसे वैचारिक विरोध कर उनके वोट बैंक को अपने की ओर खींचना है। बहुसंख्यक समाज की आस्था से जुड़े इस विषय पर बयानबाजी कर दल अपने वैचारिक आधार को मजबूत करने और चुनावी लाभ पाने का प्रयास करते हैं। बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को साधने या उनके विरोध में बोलकर एक खास वर्ग के वोटों को एकजुट किया जाता है।
चुनावी फायदा :-
चुनावी फायदे के लिए धार्मिक भावनाओं और पहचान को उभार कर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती है। बहु संख्यकों की एकता में दरार डालकर अपने कुत्सित संगठन में एकता लाकर या उन्हें चकमा देकर वोट खींचना भी इसका एक कारण हो सकता है।
उचित ज्ञान का अभाव :-
इन हिंदू-विरोधी लोगों को सनातन धर्म का उचित ज्ञान नहीं है और वे अपने नेताओं द्वारा प्रचारित दर्शन की गलत व्याख्या के आधार पर अंध घृणा से ग्रसित हैं। ज्ञान और दार्शनिक सिद्धांतों का वह विशाल भंडार जो सहस्राब्दियों से विकसित होकर सनातन धर्म के रूप में जाना जाता है, जिसे एनी बेसेंट जैसी एक विदेशी ने "इतना परिपूर्ण, इतना वैज्ञानिक, इतना दार्शनिक, इतना आध्यात्मिक" बताया है, उसे ये हिंदू-विरोधी लोग़ तरह तरह से अपने पाले में डालने की कोशिश करते नजर आते हैं।
वैचारिक मतभेद :-
सनातन धर्म वैचारिक मतभेद के लिए इसलिए निशाने पर आता है क्योंकि इसकी प्राचीनता, व्यापक सामाजिक व्यवस्था, और स्पष्ट जीवन दर्शन इसे आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक बहसों का मुख्य केंद्र बनाते हैं। दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु, ने अनेक महान संत और विद्वान उत्पन्न किए हैं, जिनका सनातन धर्म में गौरवपूर्ण स्थान है। वैदिक काल के ऋषि अगस्त्य से लेकर मध्यकालीन रामानुजाचार्य और अव्वैयार तथा हाल के समय के रमण महर्षि तक, सनातन परंपरा के संत द्रविड़ भूमि से निकले हैं और पूरे देश में पूजनीय हैं।
द्रविड़ या क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रवादी हिंदुत्व की वैचारिक भिन्नताओं के बीच श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लगी हुई है।
तमिलनाडु में डीएमके नेताओं द्वारा सनातन धर्म और हिंदू धर्म की तुलना प्लेग, मलेरिया और डेंगू से करना और इसे "मिटाने" पर जोर देना सनातनी हिंदू विरोधी भावना का घिनौना चेहरा उजागर करता है।
सहिष्णुता :-
खुलापन और सहिष्णुता के कारणसनातन धर्म में विरोध या बहस की आज़ादी है, इसलिए लोग इस पर आसानी से बिना किसी कड़े प्रतिरोध के डर के टिप्पणी करते रहते हैं। जाति व्यवस्था और असमानता जैसी पुरानी कुप्रथाओं को आधार बनाकर पूरे धर्म की मूल विचार धारा पर सवाल उठाया जाता है।
विरोधाभासी दृष्टिकोण:-
अन्य मजहबों की तुलना में सनातन धर्म की परंपराओं और मान्यताओं को अधिक आसानी से आलोचना का केंद्र बना दिया जाता है । मुस्लिम सिक्ख आदि धर्मों पर बोलने से ‘शर तन से जुदा’ के फतवे जारी होने लगते हैं। फिर सबसे निरीह हालात तो सनातन की ही है।
अपनी कमियों को नजरंदाज करना :-
सांस्कृतिक और वैचारिक विभिन्नता होते हुए भी पाश्चत्य सोच से अंतर देखा जाता है। पश्चिमी देशों की एकात्मक धार्मिक सोच की तुलना में सनातन धर्म की विविधता और बहुदेववाद को आलोचक समझ भी नहीं पाते हैं। कभी कभी अज्ञानता में भी टीका टिप्पणी कर बैठते हैं।
बौद्धिक व वैचारिक संघर्ष : -
आधुनिकता और पंथनिरपेक्षता (सेकुलर ) के नाम पर पारंपरिक मूल्यों और आस्था के प्रतीकों को चुनौती दे दिया जाता है।ज्ञान को सामाजिक संगठन का आधार मानकर सनातन परंपरा में प्राचीन काल में जन्म आधारित विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया गया, न ही किसी प्रकार की पदानुक्रमिक व्यवस्था को संहिताबद्ध किया गया। माधवचार्य द्वारा रचित शंकर दिग्विजय में ज्ञान को सामाजिक संगठन का आधार बताया गया है और कहा गया है कि “जन्म से तो सभी शूद्र ही हैं। कर्मों से मनुष्य द्विज यानी फिर से जन्म लेने वाला बनता है। वेदों का अध्ययन करने से व्यक्ति विप्र बनता है और ईश्वर के ज्ञान से ब्राह्मण बनता है।”
जाति व्यवस्था का विकृत रूप :-
जन्म आधारित जातिवाद की बुराई वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप है। केवल अंबेडकर ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के महान व्यक्तित्व सावरकर ने भी इसका पुरजोर खंडन किया था। 1920 में अंडमान जेल से उन्होंने लिखा, “जिस प्रकार मैंने हिंदुस्तान पर विदेशी शासन के विरुद्ध विद्रोह करना उचित समझा, उसी प्रकार मैंने हिंदुस्तान में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के विरुद्ध भी विद्रोह करना उचित समझा।” आरएसएस के एक सुधारवादी प्रमुख बालासाहेब देवरस ने स्पष्ट रूप से कहा कि मनुस्मृति की कई बातें अप्रचलित हो चुकी हैं। उन्होंने कहा, “आधुनिक समय में इसके हर शब्द को मान्य मानना अब बुद्धिमानी नहीं है।” स्वयं को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी ने जाति को “राक्षस” कहा। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा, “वर्ण व्यवस्था की इसी विकृति ने हिंदू धर्म और भारत को पतित किया है।”
सही मतलब ना समझ गलत अर्थ निकालना :-
सनातन धर्म के तीन अर्थ हो सकते हैं: एक, शाश्वत चीजों में आस्था; दो, आत्मा और पुनर्जन्म में आस्था; तीन, जाति व्यवस्था में आस्था; चार, पवित्रता के सिद्धांत में आस्था।राजनेता अपने एजेंडे के अनुसार इसका अर्थ चुन-चुनकर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, यदि आपके मतदाता वर्ग को ब्राह्मण और जाति व्यवस्था पसंद नहीं है, तो आप कह सकते हैं कि सनातन धर्म जाति आधारित उन विशेषाधिकारों को संदर्भित करता है जिन्हें शाश्वत माना जाता है। भगवद् गीता में कृष्ण ने वर्ण व्यवस्था का उल्लेख किया है जो लोगों के गुणों कर्मों पर आधारित है और इसे शाश्वत बताया है।
सनातन धर्म शाश्वत तत्वों से युक्त :-
यदि मतदाता ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं और जाति आधारित आरक्षण से पीड़ित हैं, तो आप कह सकते हैं कि सनातन धर्म शाश्वत तत्वों - समय, स्थान, आत्मा और पुनर्जन्म - से संबंधित है। ऐसे में आप जाति और अस्पृश्यता का जिक्र करने से बचते हैं।
प्राचीन, शाश्वत अवधारणा
"सनातन" एक प्राचीन, शाश्वत अवधारणा है। यह ध्यान रखना आवश्यक है किबौद्ध, जैन और हिंदू पौराणिक कथाओं में, उनका सिद्धांत शाश्वत है, और समय- समय पर ऐतिहासिक बुद्धों, तीर्थंकरों और ऋषियों द्वारा प्रसारित किया गया है। यह आस्था का विषय है, तथ्य का नहीं।
सभी का सम्मान करना आवश्यक :-
हिंदुओं के लिए समाज वर्ण/जाति पर आधारित है। विभिन्न समुदायों के अलग- अलग रीति-रिवाज और प्रथाएं हैं और सभी का सम्मान करना आवश्यक है। प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार, जन्म के समय प्राप्त लिंग और जीवन चक्र के अनुसार अपनी भूमिका निभाने के लिए बाध्य है। उसे परिवार, कुल, पूर्वजों, गुरुओं और समाज के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करना होता है। यह अटल और शाश्वत है। जब तक हम तीन ऋण नहीं चुकाते, तब तक हम मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। यह शाश्वत विश्वास ही सनातन धर्म है। यहाँ जाति चेतना सर्वोपरि है। जाति चेतना के साथ ही पवित्रता, अपवित्रता और अस्पृश्यता के विचार जुड़े हुए हैं।
19वीं शताब्दी की राजनीति : -
19वीं शताब्दी में भारत में न्याय और समानता की अवधारणाओं पर आधारित कई सुधार आंदोलन हुए। महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा था। सभी जातियों के लिए शिक्षा सुलभ कराई जा रही थी। पुरानी व्यवस्था ध्वस्त हो रही थी। इन आंदोलनों का नेतृत्व उन सुधारवादियों ने किया जिनके संगठन समाज के हित में काम करते थे। इनमें आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और सत्यशोधक समाज शामिल थे।
19वीं शताब्दी का समाज :-
सनातन संघर्ष 21वीं शताब्दी के वाम- दक्षिण संघर्ष के रूप में सामने आया है। आज, सनातन समूह जाति और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खुलकर वकालत नहीं करता है। लेकिन यह ब्राह्मण समुदाय को हिंदू समाज की नींव के रूप में महिमामंडित करता है। वे इस झूठे इतिहास का प्रचार करते हैं कि प्राचीन भारत में सभी लिंग और जातियाँ फली-फूलीं और कोई उत्पीड़न नहीं था। सभी उत्पीड़न मुसलमानों और मिशनरियों के आगमन के साथ शुरू हुए।
सनातन धर्म के लिए खतरा : -
धर्मांतरण का विचार एकेश्वरवादी धर्मों से आया है। इसे ईसाई और इस्लामी मिशनरियों ने लोकप्रिय बनाया। इसने यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में बहुदेववाद को समाप्त कर दिया। भारत ने एकेश्वरवाद के इस आक्रमण को रोका। मध्य एशिया के मुस्लिम सरदारों और बाद में यूरोपीय शासकों द्वारा आठ शताब्दियों के विदेशी शासन के बावजूद, 20 प्रतिशत से भी कम भारतीयों ने इस्लाम और ईसाई धर्म को अपनाया।
सनातन धर्म का उपहास :-
हिंदुओं को लंबे समय से गलत समझा जाता रहा है। दुनिया भर में, हिंदू मूर्तियों और गायों की पूजा करते हैं, इसलिए उनका उपहास किया जाता है। जाति और पुनर्जन्म के सिद्धांतों को लोगों को समझाना कठिन है। जहां वैज्ञानिक धर्मों पर हमले करते हैं, वहीं हिंदू धर्म खुद को अलग-थलग पाता है क्योंकि यह पश्चिम के प्रमुख एकेश्वरवादी धर्मों से बहुत अलग है। हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में रहने वाले राज नेताओं ने हिंदुओं को अपने रीति-रिवाजों और मान्यताओं के साथ सहज महसूस करने में सक्षम बनाया है।
टूटेआईने में सही शक्ल नहीं दिखती:-
सनातन धर्म पर स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो में हुए सन् 1893 की विश्व धर्मसभा में दिया गया यह भाषण कि 'मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी...। फल से ही वृक्ष का परिचय होता है। जब मैं देखता हूं कि जिन लोगों को मूर्ति-पूजक कहा जाता है, उन लोगों में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जिनकी तरह नीतिज्ञान, आध्यात्मिकता और प्रेम मैंने और कहीं नहीं देखा, तब मेरे मन में यह प्रश्न जागता है कि 'पाप से क्या कभी पवित्रता जन्म ले सकती है?’
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,
आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.
(वॉट्सप नं.+919412300183)
Sunday, July 26, 2026
अयोध्या का बार बार बदलता रहा स्वरूप✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
पुरातन अयोध्या :-
विराट पुरुष विष्णु के शरीर में सातों मोक्षदायिनी पुरियों की स्थिति बताई गई है। इनमें अयोध्या को श्री हरि का मस्तक कहा गया है -
विष्णोः पाद अवन्तिकां गुणवतीं मध्ये च कांचीपुरीं ,
नाभौ द्वारवतीं तथा च हृदये मायापुरीं पुण्यदाम् ।
ग्रीवामूलमुदाहरन्ति मथुरां नासाग्रे वाराणसी-
मेतद्वेदविदो वदन्ति मुनयोऽयोध्यापुरीं मस्तकम् ।।
विराट् पुरुष भगवान् विष्णु के चरणों में उज्जैन है, मध्य भाग में कांचीपुरी , नाभि में द्वारकाधाम है, हृदय में हरिद्वार है, ग्रीवा के मूल में मथुरा है। नासिकाग्र में काशीपुरी और मस्तक में अयोध्यापुरी का वास है जो अवध धाम कहलाता है। समस्त लोकों के द्वारा जो वन्दित है, ऐसी अयोध्यापुरी भगवन् आनन्द कन्द के समान चिन्मय अनादि है। यह आठ नामों - हिरण्या, चिन्मया, जया, अयोध्या, नन्दिनी, सत्या, राजिता और अपराजिता से पुकारी जाती है।
भगवान् की यह कल्याणमयी राजधानी साकेतपुरी आनन्द कन्द भगवान् श्रीकृष्ण के गोलोक का हृदय है। यहाँ पैदा होने वाले प्राणी अग्र जन्मा कहलाते हैं, जिनके चरित्रों से समस्त पृथ्वी के मनुष्य शिक्षा ग्रहण करते हैं। मानव सृष्टि सर्वप्रथम यहीं पर हुई थी।
यह अयोध्यापुरी सभी बैकुण्ठों (ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, विष्णुलोक, गोलोक आदि तथा सभी देवताओं के लोक बैकुण्ठ) का मूल आधार है तथा जो प्रकृति है (जिससे दुनियां पैदा हुई है) उससे भी श्रेष्ठ है। सदरूप है, वह ब्रह्ममय है, सत, रज, तम इन तीनों गुणों में से रजोगुण से रहित है।अयोध्या पुरी दिव्य रत्न रूपी खजाने से भरी हुई है और सर्वदा नित्यमेव श्रीसीताराम जी का विहार स्थल है।
स्वयमागता स्वयमागता स्वयमागतेति साकेत साकेत संज्ञा सविता ।
अर्थात् स्वयं (आप से आप) आविर्भूत होने के कारण अयोध्या को साकेत कहते हैं।
अयोध्यापुरी देवताओं की नगरी है। यह आठ चक्र और नौ द्वारों से शोभित है। इसमें स्वर्ण के समान हिरण्यमय कोष है जो दिव्य ज्योति से पूरी तरह घिरा है। कलिकाल में मथुरा, द्वारका और अयोध्या इन तीनों पुरियों का विशेष महत्व कहा गया है-
मथुरा द्वारकाऽयोध्या कलिकाले पुरीत्रयम्। धर्मार्थकामदं भूप मोक्षदं हरिवल्लभम् ॥
मथुरा को विष्णु जी का जन्म स्थान और द्वारका को क्रीड़ा स्थान होने के कारण धन्य बताया है परन्तु सभी कामनाओं को देने वाली अयोध्या जी को धन्यों का भी धन्य बताया है जहाँ स्वयं श्रीराम का पालन हुआ है।
धन्या सा मथुरा लोके यत्र जातो हरिः स्वयम् ।
द्वारका सफला लोके क्रीडितं यत्र विष्णुना।
धन्यानामपि सा पूज्या अयोध्या सर्वकामदा।
या स्वयं रामदेवेन पालिता धर्मबुद्धिना ॥
प्रभास और कुरुक्षेत्र में सौ वर्षों से जो फल मिलता है, आधे पल भर अयोध्या में बसते हुए पुरुषों को वही फल मिलता है।
प्रभासे च कुरुक्षेत्रे यत्फलं वत्सरैः शतैः। वसतां निमिषार्द्धन ह्ययोध्यायां च तद्भवेत्।
पद्मपुराण में अयोध्या का नामकरण अयुद्ध शब्द से बताया है। "नहियोद्धुम शक्या सा अयोध्या" जिसका अर्थ है जहां युद्ध न किया जा सके उसका नाम अयोध्या है। कुछ लोग इसका नामकरण इस प्रकार भी करते हैं कि "न कैश्चित् योधितुं शक्या इति अयोध्या", जिसको युद्ध में जीता न जा सके वह अयोध्या है।
स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के अनुसार-
अकारो ब्रह्म च प्रोक्तं यकारो विष्णुरुच्यते धकारो रुद्ररूपश्च अयोध्यानाम राजते ।।
अयोध्या में ‘अ’कार ब्रह्मा ‘य’कार विष्णु और ‘ध’कार रुद्र तीनों का समन्वित स्वरूप है। अयोध्या का महात्म्य पार्वती जी से कहते हुए शिव जी कहते हैं - अयोध्या सब नदियों में श्रेष्ठ श्री सरयू जी के दाहिने किनारे पर बसी हुई है। इसके महात्म्य का वर्णन करने की क्षमता शेष और शारदा में भी नहीं है।
अयोभिः विष्णुब्रह्मशिवैः ध्यायते
नित्यं स्मर्यते या सा अयोध्या”।
ब्रह्मा जी बुद्धि से, विष्णु जी चक्र से और शिव जी त्रिशूल से सदा अयोध्या की रक्षा करते रहते हैं। समस्त उत्पातक इससे युद्ध नहीं कर सकते। इसलिए इसे अयोध्या कहते हैं, इसका मतलब इसे युद्ध में जीता नहीं जा सकता ।
सर्वोपपातकैर्युक्तैर्ब्रह्महत्यादिपातकैः।। नायोध्या शक्यते यस्मात्तामयोध्यां ततो विदुः ।
विष्णोराद्या पुरी येयं क्षितिं न स्पृशति द्विज विष्णोः सुदर्शने चक्रे स्थिता पुण्यकरी क्षितौ ।
केन वर्णयितुं शक्यो महिमाऽस्यास्तपोधन यत्र साक्षात्स्वयं देवो विष्णुर्वसति सादरः।।
समस्त उपपातकों के साथ ब्रह्महत्या आदि महापातक इस पुरी से युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए इसे अयोध्या कहते हैं। यह भगवान् विष्णु की आदिपुरी है और विष्णु के सुदर्शन चक्र पर स्थित है। अतएव पृथ्वी पर अतिशय पुण्य दायिनी है। इस पुरी की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहां साक्षात विष्णु आदर पूर्वक निवास करते हैं।
अयोध्या परमं स्थानमयोध्या परमं महत् अयोध्यायाः समा काचित्पुरी नैव प्रदृश्यते।
पतितपावनी सरयू के बारे में कहा गया है : -
दक्षिणाच्चरणांगुष्ठान्निः सृता जाह्नवी हरेः। वामांगुष्ठान्मुनिवराः सरयूर्निर्गता शुभा।
तस्मादिमे पुण्यतमे नद्यौ देवनमस्कृते। एतयोः स्नानमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति।।
भगवान विष्णु के दाहिने चरण के अँगूठे से गङ्गा जी और बायें चरण के अँगूठे से शुभकारिणी सरयू जी निकली हैं इसीलिए ये दोनों नदियाँ परम पवित्र तथा सभी देवताओं से वन्दित हैं। इनमें स्नान करने मात्र से मनुष्य ब्रह्म हत्या का नाश कर डालता है।
तुलसीदास जी ने अयोध्या के वैभव का वर्णन करते हुए कहा है श्रीनारद जी और सनकादि ऋषि-मुनि श्रीराम जी का दर्शन करने प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और नगर की भव्यता देख वैराग्य भूल जाते हैं।
नारदादि सनकादि मुनीसा।
दरसन लागि कोसलाधीसा ।।
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं ।
देखि नगरू बिरागु बिसरावहिं ।।
जातरूप मनि रचित अटारीं।
नाना रंग रुचिर गच ढारीं ।।
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर।
रचे कँगूरा रंग रंग बर ।।
एक जनश्रुति यह भी है -
गंगा बड़ी गोदावरी
तीरथ राज प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी,
जहँ राम लियो अवतार।
अयोध्या भगवान राम के बाएं पैर के अंगूठे से निकली पावन सरिता ‘सरयू’ के दक्षिण तट पर बसा हुआ है। इसकी स्थापना सूर्य पुत्र मनु ने स्वयं किया था । वाल्मीकि अपने रामायण के प्रारंभ में भी अयोध्या की महान नगरी का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं –
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता !
मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् !!
(बालकाण्ड 5/6 )
भावार्थ:अयोध्या नगरी जो तीनों लोको में विख्यात थी और इसका निर्माण स्वयं मनु ने अपने हाथों से किया था। उन्होंने सर्व प्रथम अपनी राजधानी बनाया था। उस समय इसकी राजधानी 120 मील कोस और चौड़ाई 30 मील 48 कोस थी।यह एक अत्यंत समृद्ध और आधुनिक शहर था। इसमें विशाल राजसभाएँ थीं जो हमेशा पानी से तर रहती थीं और उन पर सुगंधित फूल बिखरे रहते थे। शहर द्वारों और मेहराबों से घिरा हुआ था। सभी घरों के अग्रभाग सुंदर थे। इमारतें कीमती रत्नों से जड़ी हुई थीं। कई इमारतें बहुमंजिला थीं, कुछ सात मंजिला तक थीं। पानी प्रचुर मात्रा में था और गन्ने के रस जैसा स्वाद वाला था। कई वैदिक विद्वान और ऋषि यहाँ निवास करते थे और वातावरण अत्यंत शांत और निर्मल था। यहाँ सभी प्रकार के कुशल शिल्पकार थे। यह आम, अनार और अंगूर के बागों और पेड़ों से घिरा हुआ था। यह एक विशाल दीवार से सुदृढ़ रूप से किलेबंद था जो शहर को घेरे हुए आभूषण की तरह सुंदर थी। इसके आगे एक चौड़ी खाई थी जो शत्रुओं को प्रवेश करने से रोकती थी। यह शहर मशीनरी, हथियारों और तोपों से सुसज्जित बुर्जों से सुरक्षित था। यहाँ घोड़े, ऊँट, गाय और गधे थे।
स्कन्द पुराण के अनुसार यह सुदर्शन चक्र पर बसी हुई है। भूतशुद्धितत्त्व के अनुसार यह श्री राम जी के धनुषाग्र पर बसी हुई है
‘श्रीरामधनुषाग्रस्था अयोध्या सा महापुरी।’
इस अयोध्या पर ईक्ष्वाकु वंश के महाराजा दिलीप, रघु, नहुष , अरण्य , दशरथ और भगवान श्रीराम ने शासन किया था, जो महाराजा इक्ष्वाकु के 62 पीढ़ियों के बाद अवतरित हुए थे। भगवान राम के समय इस नगरी का घेरा 84 कोस में था। इसके चारों दिशाओं में 4पर्वत : पूर्व में श्रृंगारादि, पश्चिम में नीलाद्रि , उत्तर में मुक्ताद्रि और दक्षिण में मणिकूट (मणि पर्वत) स्थित है। प्रत्येक के आश्रित तीन तीन कुल बारह वन थे।
अयोध्याधाम के बारह वनः-
१. श्रृङ्गारवन (आज का श्रृंगार हाट)
२. विहारवन
३. तमालवन
४. रासालवन
५. चम्पकवन
६. चन्दनवन
७. दिव्यपारिजातवन
८. अशोकवन
९. प्रमोदवन (आज भी अस्तित्व में है)
१०. कदम्बवन
११. अनन्तवन
१२. श्रीनागकेशरवन।
इन बारहों वनों में युगल सरकार विहार करते थे। होली आदि का उत्सव इन्हीं वनों में होता था। यह वर्णन जानकी चरितामृत नामक ग्रन्थ में वर्णित है।
कई बार बसी अयोध्या :-
अयोध्या को कई बार बसाया गया था। पहली बार स्वयं वैबस्वत मनु ने इसे बसाया था। श्रीरामचन्द्रजी जब अपनी प्रजा सहित अपने दिव्यधाम को चले गये तो अयोध्या उजाड़ हो गई। जिसकी चर्चा रामायण के उत्तरकाण्ड में उल्लिखित है कि महाराज ऋषभ ने भी इसे पुनः बसाया था । राम जी के पुत्र कुश द्वारा भी इसे बसाने का उल्लेख मिलता है। कालान्तर में यह पुनः उजड़ गई और किवदन्ती यह कहती है कि विक्रमादित्य ने भी इसे फिर से बसाया था।
राज्य की वैभवशीलता :-
वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की वैभवशीलता का विस्तार से वर्णन है । जिस राज्य के राजा साक्षात सूर्य वंश से थे, जिसके राजाओं से स्वयं इंद्र भी सहायता मांगने आते थे, जिस राज्य के राजा नहुष को इंद्र का सिंहासन मिला हुआ था , जिस राज्य के महान राजा रघु के नाम पर रघुवंश पड़ा जिसमें साक्षात श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रुप में जन्म लिया। उसका नाम अयोध्या है। प्राचीन भारतीय संस्कृत भाषा के महाकाव्यों, जैसे रामायण और महाभारत में अयोध्या नामक एक पौराणिक शहर का उल्लेख है, जो राम सहित कोसल के प्रसिद्ध इक्ष्वाकु राजाओं की राजधानी थी। बाद में इसे साकेत भी कहा जाता था परंतु न तो इन ग्रंथों में, न ही वेदों जैसे पहले के संस्कृत ग्रंथों में साकेत नामक शहर का उल्लेख है।
श्रीराम के बाद की अयोध्या :-
श्रीराम के बाद की जानकारी कालिदास रचित महान ग्रंथ रघुवंशम् में दी गई है, जिसके अनुसार श्री राम के स्वर्गारोहण के पश्चात उनके सबसे बड़े पुत्र कुश ने कुशावती को, दूसरे पुत्र लव ने शरावती को, लक्ष्मण के पुत्रों ने करावती , भरत के पुत्र पुष्कल ने पुष्करावती (पेशावर) और शत्रुघ्न के पुत्रों ने मथुरा को अपनी राजधानियां बनाकर शासन करना प्रारंभ किया था । इस प्रकार अयोध्या पूरी तरह से रघुवंश की अधिष्ठात्री होते हुए भी रघुवंशी राजाओं से विहीन हो गई थी।
शिव जी द्वारा अयोध्या का परिचय :-
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की यह नगरी सरयू नदी के दाहिने किनारे पर बसी है। यहां स्थित श्री हनुमान मन्दिर ‘हनुमान गढ़ी 'के नाम से विख्यात है। वह राजद्वार के सामने ऊँचे टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। श्री रुद्रयामलोक्त श्री अयोध्या माहात्म्य के श्लोक 30, पृष्ठ 87 पर श्रीशङ्कर जी पार्वती जी से श्री हनुमान जी का स्थान के बारे में इस प्रकार कहते हैं -
राजद्वारे हनूमान् वै वायुपुत्रस्तु तिष्ठति ।
तथा तिष्ठति सुग्रीवो दक्षिणे च हनूमतः ॥
श्रीशंकरजीने कहा - ( रामकोटके प्रधान) राजद्वार पर वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका स्थान है तथा श्रीहनुमान जी के दक्षिण भाग में सुग्रीव जी का स्थान है ।
पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भगवान राम का स्वर्गारोहण त्रेतायुग के अंत में हुआ था। वाल्मीकि रामायण में दिए गए ग्रहों की स्थिति के आधार पर आधुनिक शोध कर्ताओं (जैसे पुष्कर भटनागर और नीलेश ओक) का मानना है कि यह घटना लगभग 7000 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 9,000 वर्ष पहले) हुई थी।
कुश ने भी बसाई थी अयोध्या :-
रघुवंशम के अनुसार एक बार कुश अपने महल में सोये हुए थे तो रात के अंधेरे में एक दिव्य स्त्री उनके सामने आई । कुश ने उनका परिचय पूछा तो उस स्त्री ने कहा, वह अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्री राम के जाने के बाद अयोध्या पूरी तरह से स्वामी विहीन हो गई है और उसकी दुर्दशा हो गई है । अयोध्या की देवी ने कुश से अयोध्या वापस आने और उसे पुनः बसाने के लिए निवेदन किया था। कुश वापस आते हैं और फिर से अयोध्या को बसाते हैं। एक बार फिर अयोध्या अपने वैभव में लौट जाती है ।
कुश सरयू नदी के अंदर रहने वाले नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदनी से विवाह करते हैं और न्यायपूर्वक शासन चलाने लगते हैं । इंद्र के बुलावे पर कुश दुर्जय राक्षस को मारने के लिए इंद्र के साथ जाते हैं । इंद्र की सहायता मे कुश दुर्जय को मार डालते हैं लेकिन वो भी वीरगति को प्राप्त होते हैं। ऐसे में कुश के पुत्र अतिथि को अयोध्या का राजा बनाया जाता है। अतिथि भी न्यायपूर्वक शासन करते हैं। अतिथि के बाद कई अन्य राजा आते हैं जो अयोध्या वैसी ही वैभवशाली रहती है ।
राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के “साकेत” महाकाव्य के सर्ग 1 के पृष्ठ 2 पर अयोध्या का वैभव इस प्रकार व्यक्त किया है -
स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ
किंतु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?
वह मरों को मात्र पार उतारती;
यह यहीं से जीवितों को तारती।।
है अयोध्या अवनि की अमरावती,
इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती।
वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,
और नंदन वन बने आराम हैं।।
रघुवंश (सूर्यवंश) का अंतिम शासक का नाम सुमित्र था। पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उन्हें चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 362 ईसा पूर्व) में मगध के राजा महापद्मनंद ने पराजित किया था, जिसके बाद उन्हें अयोध्या छोड़नी पड़ी थी।
पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों से पता चलता है कि वर्तमान अयोध्या का स्थल ईसा पूर्व पाँचवीं या छठी शताब्दी तक एक शहरी बस्ती के रूप में विकसित हो गया था। इस स्थल की पहचान प्राचीन साकेत शहर के स्थान के रूप में की गई है।
अयोध्या के सबसे व्यापक ऐतिहासिक विवरणों में से एक एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय के इतिहासकार हंस बैकर द्वारा लिखित है। बैकर ने अपने शोध को अपनी पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ अयोध्या : फ्रॉम द 7वीं सेंचुरी बी सी टू द मिडिल ऑफ द 18वीं सेंचुरी' (1986) में प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि अयोध्या भारत के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है, जो काशी जितना ही प्राचीन है। प्राचीन काल में इसे 'साकेत' के नाम से जाना जाता था। इसका उदय भारतीय इतिहास के 'द्वितीय शहरीकरण काल' के दौरान हुआ, जो 600 - 200 ईसा पूर्व का है।
यह स्पष्ट नहीं है कि पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आस पास मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा कोसल पर विजय प्राप्त करने के बाद साकेत का क्या हुआ। अगली कुछ शताब्दियों तक शहर की स्थिति के बारे में ऐतिहासिक स्रोतों की कमी है। यह संभव है कि शहर माध्यमिक महत्व का एक वाणिज्यिक केंद्र बना रहा, लेकिन मगध के राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित नहीं हुआ, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र में स्थित थी।
लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, राजा अजातशत्रु ने कोसल को मगध में मिला लिया था। समय के साथ, साकेत मौर्य साम्राज्य के अधीन एक छोटा व्यापारिक नगर बन गया। यहाँ मिले पुरातात्विक अवशेषों से पता चलता है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में यहाँ कई बौद्ध संरचनाएँ बनाई गई थीं। मौर्य काल में, साकेत एक द्वितीयक महत्व का व्यापारिक केंद्र था।
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान शहर में कई बौद्ध इमारतों का निर्माण किया गया होगा। ये इमारतें संभवतः अयोध्या में वर्तमान मानव निर्मित टीलों पर स्थित थीं। अयोध्या में खुदाई के परिणाम स्वरूप एक बड़ी ईंट की दीवार की खोज हुई है, जिसे पुरातत्वविद् बी बी लाल ने एक किले की दीवार के रूप में पहचाना है। यह दीवार संभवतः तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की अंतिम तिमाही में बनाई गई थी।
लगभग 170 ईसा पूर्व, मौर्य साम्राज्य के पतन के दौरान, साकेत पर आक्रमण हुआ। इस आक्रमण में इंडो-ग्रीक राजा डेमेट्रियस ने भाग लिया, जो पाटलिपुत्र को जीतने के उद्देश्य से निकला था। इस जानकारी का प्रमाण महान संस्कृत व्याकरणविद् ऋषि पतंजलि से मिलता है।
मौर्योत्तर काल में, साकेत एक छोटा स्थानीय राज्य था जो मगध के शुंगों को कर देता था। तीन पुराणों : युग पुराण, वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण - में साकेत के 'सात शक्ति शाली राजाओं' के शासनकाल का वर्णन है, जिन्होंने उत्तर भारत से यवनों के पीछे हटने के बाद इस क्षेत्र पर शासन किया था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, साकेत पुष्यमित्र शुंग के शासन के अधीन आ गया प्रतीत होता है।
साकेत के इन सात राजाओं के ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में मिले देव राजाओं के सिक्कों से प्राप्त प्रमाणों से होती है। इन सिक्कों से कम से कम पांच राजाओं के नाम ज्ञात होते हैं, जो फुलदेव, वायुदेव, विशाखदेव, पथदेव और धनदेव थे। धनदेव के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने वहां एक राज्यपाल नियुक्त किया था।
दूसरी शताब्दी ईस्वी में, साकेत कुषाण साम्राज्य के अधीन आ गया था, जिसके शासक सम्राट कनिष्क थे। हाल तक, साकेत पर कुषाण शासन के प्रमाण यहाँ पाए गए बड़ी संख्या में सिक्कों के भंडार और कुषाण कालीन मूर्तियों के टुकड़ों पर आधारित थे। लेकिन 1993 में, अफगानिस्तान के रबातक गाँव में एक कुषाणकालीन शिलालेख मिला, जिसमें राजा कनिष्क ने गर्व से अपने शासन की घोषणा की थी।
विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या ढाई हजार वर्ष पूर्व पुनः बसाया गया था :-
यह शहर तब तक वीरान रहा जब तक उज्जैन के राजा विक्रम इसकी खोज में नहीं आए और इसे फिर से स्थापित नहीं किये। विक्रमादित्य का समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग 57 ईसा पूर्व) माना जाता है। भारतीय परंपरा और 'विक्रम संवत' के अनुसार, उन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में 57 ईसा पूर्व में अपने शासन काल की शुरुआत की थी। उनका समय 57 ईसा पूर्व से 19 ईस्वी तक रहा। उन्होंने प्राचीन खंडहरों को ढकने वाले जंगलों को कटवा डाला था, वहां रामगढ़ किला और 360 मंदिर बनवाए थे।
विक्रमादित्य कई गुप्त राजाओं की एक उपाधि थी, और जिस राजा ने राजधानी को अयोध्या में स्थानांतरित किया, उसे स्कंदगुप्त के रूप में पहचाना जाता है। बेकर का सिद्धांत है कि अयोध्या की ओर कदम पाटलिपुत्र में गंगा नदी की बाढ़, पश्चिम से हूणों की प्रगति को रोकने की आवश्यकता और स्कंदगुप्त की खुद की तुलना राम से करने की इच्छा रही। जिनका इक्ष्वाकु वंश पौराणिक अयोध्या से संबंध जुड़ा हुआ था।
गुप्त काल:अयोध्या का पुनरुद्धार और 'विष्णु अवतार' :-
कुषाण शासन के बाद गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ, जिसमें साकेत ने अपनी भव्यता की नई ऊंचाइयों को छुआ।गुप्त साम्राज्य में, तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध से साकेत का स्वर्ण युग शुरू हुआ।गुप्तों के शासनकाल में, उपमहाद्वीप में हिंदू धर्म का भी व्यापक पुनरुद्धार हुआ। इसी दौरान भारत के सबसे पुराने पत्थर के मंदिरों का निर्माण हुआ। गुप्त शासकों ने 'दिव्य राजाओं' की अवधारणा को प्रोत्साहित किया, जैसा कि सम्राट समुद्रगुप्त के इलाहाबाद शिलालेख से स्पष्ट होता है, जिसमें उन्हें "पृथ्वी पर निवास करने वाले देवता" के रूप में वर्णित किया गया है, जो केवल मानव जाति के रीति-रिवाजों का पालन करने के लिए ही नश्वर रूप धारण करते हैं।
गुप्त साम्राज्य के दौरान, 'दिव्य राजाओं' की अवधारणा के साथ-साथ, पृथ्वी पर देवताओं के अवतारों का सिद्धांत भी लोकप्रियता हासिल करने लगा था।गुप्त सम्राटों के शासनकाल के दौरान, पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में, साकेत को 'अयोध्या' के नाम से जाना जाने लगा और इसे त्रेता युग के इक्ष्वाकु राजाओं की राजधानी के रूप में मान्यता मिली। साकेत को 'अयोध्या' के रूप में संदर्भित करने वाला सबसे पुराना ज्ञात संदर्भ शहर से लगभग 24 किमी दूर करमदंडा गाँव में मिले एक शिलालेख में मिलता है। 435 ईस्वी के इस शिलालेख में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ईस्वी) के मंत्री पृथ्वीसेना द्वारा 'अयोध्या के ब्राह्मणों' को दिए गए दान का उल्लेख है । इस प्रकार, गुप्त काल से पहले इस शहर को 'अयोध्या' के नाम से नहीं जाना जाता था।
सम्राट कुमारगुप्त प्रथम, वाकाटक वंश के राजा रुद्रसेन द्वितीय की पत्नी प्रभावतीगुप्त के सौतेले भाई थे। इतिहासकार हंस बैकर के अनुसार, प्रभावतीगुप्त विष्णु के राम अवतार के सबसे प्रारंभिक ज्ञात भक्तों में से एक थे। ऐसा माना जाता है कि सम्राट स्कंदगुप्त (लगभग 455-467 ईस्वी) ने पाटलिपुत्र में भीषण बाढ़ आने पर अपनी राजधानी अयोध्या स्थानांतरित कर दी थी। गुप्त सम्राटों ने साकेत नगर को 'भगवान राम की अयोध्या' के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहन दिया। उनका मानना था कि इस पवित्र भूमि से जुड़ाव उन्हें धार्मिक वैधता प्रदान करेगा।
चौथी शताब्दी के आसपास, यह क्षेत्र गुप्तों के नियंत्रण में आ गया, जिन्होंने ब्राह्मणवाद को पुनर्जीवित किया।वायु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण प्रमाणित करते हैं कि प्रारंभिक गुप्त राजाओं ने साकेत पर शासन किया था। वर्तमान अयोध्या में गुप्तकालीन कोई पुरातात्विक परत नहीं खोजी गई है, हालाँकि यहाँ बड़ी संख्या में गुप्तकालीन सिक्के मिले हैं। यह संभव है कि गुप्त काल के दौरान, शहर में बस्तियाँ उन क्षेत्रों में स्थित थीं जिनकी अभी तक खुदाई नहीं हुई है। खोतानी-कुषाण आक्रमण के दौरान जिन बौद्ध स्थलों को विनाश का सामना करना पड़ा था, वे वीरान बने हुए प्रतीत होते हैं।
पाँचवीं शताब्दी के चीनी यात्री फैक्सियन का कहना है कि उसके समय में "शा-ची" में बौद्ध इमारतों के खंडहर मौजूद थे। एक सिद्धांत शा-ची की पहचान साकेत से करता है, हालाँकि यह पहचान निर्विवाद नहीं है। यदि शा-ची वास्तव में साकेत है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि पांचवीं शताब्दी तक, शहर में अब कोई समृद्ध बौद्ध समुदाय या कोई महत्वपूर्ण बौद्ध भवन नहीं था जो अभी भी उपयोग में था।
गुप्त काल के दौरान एक महत्वपूर्ण विकास साकेत को इक्ष्वाकु वंश की राजधानी, अयोध्या के प्रसिद्ध शहर के रूप में मान्यता देना था। कुमार गुप्त प्रथम के शासनकाल के दौरान जारी 436 ईस्वी के करमदंड (कर्मदंड) शिलालेख में, अयोध्या को कोसल प्रांत की राजधानी के रूप में नामित किया गया है, और कमांडर पृथ्वीसेन द्वारा अयोध्या के ब्राह्मणों को दान देने का रिकॉर्ड है। बाद में गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र से अयोध्या स्थानांतरित कर दी गई।
छठी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के पतन और मिहिरकुल के नेतृत्व में हूणों के आक्रमणों के कारण अयोध्या का राजनीतिक और आर्थिक शक्ति केंद्र के रूप में पतन हो गया, और यह शक्ति केंद्र कन्नौज में स्थानांतरित हो गया, जो वर्तमान लखनऊ के निकट लगभग 250 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। लेकिन भगवान राम और रामायण से अयोध्या का गहरा संबंध इसे एक प्रमुख तीर्थ स्थल बना चुका था और इस प्रकार इसे श्रावस्ती, कौशांबी, राजगीर और वैशाली जैसे कई प्राचीन शहरों के पतन से बचा लिया।
विष्णु पूजा और राम भक्ति का उदय :-
पांचवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी तक, साकेत/अयोध्या भारत के सबसे महत्वपूर्ण वैष्णव धार्मिक केंद्रों में से एक था । ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से पहले, अयोध्या के अधिकांश मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित थे, जिनमें भगवान राम की मूर्तियाँ भी थीं।
10वीं शताब्दी के मंदिर:-
कन्नौज के राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, उत्तरी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 10वीं शताब्दी में अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र पर मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन था। जिसकी राजधानी कन्नौज थी और अयोध्या उनके साम्राज्य का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस अवधि के बाद, 11वीं शताब्दी के अंत में इस क्षेत्र पर कन्नौज के गहडवाल वंश के राजा चंद्रदेव का आधिपत्य हो गया था। जिन्होंने सरयू नदी के किनारे चंद्रहरि या चंद्रदेव को समर्पित एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था।
दिल्ली सल्तनत का काल :-
सन् 1193 ईस्वी में, कन्नौज के राजा जयचंद को मुहम्मद गोरी ने पराजित किया, जिसके बाद अयोध्या दिल्ली सल्तनत के अधीन आ गया। हैरानी की बात यह है कि उस समय अयोध्या में नष्ट हुआ एकमात्र ज्ञात मंदिर प्रसिद्ध आदिनाथ जैन मंदिर था।
दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ ही भारत में भक्ति आंदोलन का भी उदय हुआ। कर्मकांडों से दूर हट कर, भक्ति प्रचारकों ने व्यक्तिगत ईश्वर के प्रति भक्ति की अवधारणा का प्रचार किया। इसी दौरान विष्णु के राम और कृष्ण अवतार अत्यंत लोकप्रिय हुए, क्योंकि आम लोगों के लिए उनसे जुड़ना आसान था। छोटे-छोटे मंदिरों से आगे बढ़कर, पूरे भारत में विष्णु के राम अवतार को समर्पित मंदिर बनने लगे। ऐसा माना जाता है कि 12वीं शताब्दी ईस्वी तक अयोध्या में भगवान राम को समर्पित तीन मंदिर बनाए गए थे, हालांकि आज उनके कोई निशान नहीं मिलते।
अयोध्या में कई मंदिर मुगल शासन के दौरान नष्ट कर दिए गए थे। सन् 1528-29 ईस्वी में मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ने एक मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह 'बाबरी मस्जिद' का निर्माण करवाया। मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में भी यहां कई मंदिर ध्वस्त किए गए थे।
अवध के नवाबों के अधीन अयोध्या :-
मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में असहिष्णुता और विनाश का युग समाप्त हुआ और अवध के अधिक सहिष्णु नवाबों का शासन स्थापित हुआ। औरंगजेब की मृत्यु के बाद, कई प्रांतीय राज्यपाल अर्ध-स्वतंत्र हो गए। इनमें अवध के शिया नवाब भी शामिल थे। दिलचस्प बात यह है कि 'अवध' नाम ही 'अयोध्या' शब्द से लिया गया है।
नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्याबाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए।
जब 1855 में स्थानीय सुन्नी नेता मौलवी अमीर अली अमेथावी के नेतृत्व में इस्लामी कट्टरपंथियों ने अयोध्या के मंदिरों पर कब्जा करने का प्रयास किया, तो अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने इसे दबाने के लिए अपनी सेना भी भेजी, और अमीर अली अमेथावी और उनके 300 समर्थक बाराबंकी जिले में हुई एक लड़ाई में मारे गए।
दुर्भाग्य से, इस घटना ने अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम कलह के बीज बो दिए, और इसी दौरान कुछ हिंदू साधुओं ने प्रतिशोध में अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर हमला कर दिया। 1883 में, हिंदू साधुओं के एक अन्य समूह ने बाबरी मस्जिद के पास चबूतरे पर एक मंदिर बनाने का प्रयास किया। मामला अदालतों में गया और 1886 में मुकदमा खारिज कर दिया गया।
1946 में, हिंदू महासभा की एक शाखा, अखिल भारतीय रामायण महासभा (एबीआरएम) ने बाबरी मस्जिद की भूमि पर अधिकार के लिए आंदोलन शुरू किया। 1949 में, गोरखनाथ मठ के संत दिग्विजय नाथ एबीआरएम में शामिल हो गए और उन्होंने नौ दिनों तक लगातार रामचरित मानस का पाठ आयोजित किया। पाठ के अंत में, हिंदू कार्यकर्ताओं ने मस्जिद में घुसकर राम और सीता की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि मूर्तियाँ 'चमत्कारिक रूप से' मस्जिद के अंदर प्रकट हुई हैं।
1980 के दशक तक, भाजपा ने एल.के. आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में 'राम जन्मभूमि आंदोलन' को पुनर्जीवित किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप पूरे भारत में दंगे भड़क उठे। 1992 में, कम से कम 75,000 हिंदुओं की एक संगठित भीड़ ने अयोध्या की एक मस्जिद - बाबरी मस्जिद पर हमला किया और भारतीय अधिकारियों की तमाशा देखते हुए हथौड़ों, लाठियों और फावड़ों से उसे ध्वस्त कर दिया। इस हमले के बाद, कई भारतीय शहरों में अंतर धार्मिक दंगे भड़क उठे और हिंसा के अंत तक एक हजार से अधिक लोग मारे गए। अयोध्या और पूरे देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बदलाव आए। इस घटना के तुरंत बाद देश भर में दंगे भड़क उठे और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह की सरकार सहित चार अन्य प्रदेशों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया। विध्वंस के कुछ ही घंटों बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और प्रमुख नेताओं पर मुकदमे दर्ज कर लिए गए।
2002 में उस समय हिंसा फिर से भड़क उठी जब भाजपा ने राम मंदिर की नींव रखने के लिए अयोध्या तक हजारों हिंदू राष्ट्रवादियों का जुलूस निकाला था। इस घटना के बाद, अयोध्या से लौट रही हिंदुओं की एक ट्रेन पर बम से हमला किया गया; हमले का आरोप मुसलमानों पर लगाया गया, जिससे भाजपा-नियंत्रित गुजरात राज्य में और अधिक दंगे भड़क उठे। लगभग 2,000 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे। कई लोगों ने भाजपा पर हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। हालांकि, राम मंदिर निर्माण के भाजपा के वादे राजनीतिक रूप से कारगर साबित होते रहे। 2002 में गुजरात के भाजपा नेता नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री चुने गए। परिस्थितियां काफी बदली और अयोध्या के पुनरुद्धार के अनुकूल हुईं।
2003 का पुरातात्विक सर्वेक्षण:-
पुरातत्वविदों ने अदालत के निर्देशानुसार एक सर्वेक्षण शुरू किया ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या उस स्थान पर कोई हिंदू मंदिर मौजूद था। सर्वेक्षण में मस्जिद के नीचे एक मंदिर के साक्ष्य मिले हैं, लेकिन कई पुरातत्वविद और मुसलमान इन निष्कर्षों पर विवाद कर रहे हैं।
जून 2009 लिबरहान आयोग की रिपोर्ट :-
मस्जिद विध्वंस के 17 साल बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में भाजपा और उसके वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कई नेताओं को मस्जिद विध्वंस के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। आडवाणी सहित कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं पर मुकदमा चला और कुछ को सजा भी मिली और कुछ मुख्य टाइटल शूट के बाद छोड़ भी दिए गए।
तीन बराबर भागों में देने का निर्णय :-
दशकों तक चले टाइटल शूट मुकदमे के बाद, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अयोध्या की भूमि को तीन बराबर भागों में विभाजित करने का अधिकार तीनों दावेदारों को है, हालांकि हिंदुओं को वह भाग मिला जहां मस्जिद स्थित थी और उन्हें मंदिर बनाने का अधिकार भी प्राप्त हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय ने पूरा हिंदुओं को दिया :-
हिंदू और मुस्लिम दोनों याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थल पूरी तरह से हिंदुओं को सौंप दिया ।अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया गया।भारत के अयोध्या में ध्वस्त बाबरी मस्जिद के स्थल पर भगवान राम को समर्पित एक हिंदू मंदिर, राम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
2019 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने भूमि का स्वामित्व एक हिंदू ट्रस्ट को दे दिया था। 5 फरवरी, 2020 को मंदिर के निर्माण और प्रबंधन की देखरेख के लिए 15 सदस्यीय श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना की गई है।भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हिंदू देवता राम के भव्य मंदिर का उद्घाटन किया है। 5 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री ने आधारशिला रखी। मोदी ने मंदिर की आधारशिला रखी और इसकी पट्टिका का अनावरण किया।
22 जनवरी, 2024 को मंदिर का अभिषेक किया गया। कुछ भागों का निर्माण अभी बाकी होने के बावजूद, राम मंदिर का अभिषेक हो चुका है।अयोध्या में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया जिसमें प्रमुख हस्तियां, हिंदू आध्यात्मिक नेता और मोदी शामिल हुए।इस समारोह में मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है और राम की प्रतिमा को भवन के गर्भगृह में स्थापित किया जाता है। यह मंदिर मंगलवार से आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए खुल गए हैं। मंदिर का उद्घाटन धार्मिक विजय के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को हिंदू-प्रधान राष्ट्र में बदल रहा है। मुस्लिम पक्ष को अयोध्या से 18 किमी दूरी पर मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ दूसरी जगह जमीन दे दिया गया । जहाँ 'मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह मस्जिद' का निर्माणाधीन है और अस्पताल और शैक्षणिक केंद्र बनाने की भी योजना है।
लेखक :
आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी
पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,
आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.
वॉट्सप नं.+91 9412300183.
Monday, July 20, 2026
अयोध्या की तरह कई बार बदली हनुमान गढ़ी की तस्वीर, हनुमत पीठ का रोचक दास्तान :✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
अमरावती के वैभव को मात देती अयोध्या :-
अयोध्या का मतलब जिसे युद्ध में जीता न जा सके। इसकी स्थापना स्वयं सूर्य पुत्र मनु ने की थी। वाल्मीकि अपने रामायण के प्रारंभ में भी अयोध्या की महान नगरी का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं –
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता !
मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् !! (१-५-६ )
भावार्थ:अयोध्या नगरी जो तीनों लोको में विख्यात थी और इसका निर्माण स्वयं मनु ने अपने हाथों से किया था। ऐसे अयोध्या पर ईक्ष्वाकु वंश के महाराजा दिलीप, रघु, नहुष , अरण्य , दशरथ और भगवान श्री राम ने शासन किया । वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की वैभव शीलता का विस्तार से वर्णन है । जिस राज्य के राजा साक्षात सूर्य वंश से थे । जिसके राजाओं से स्वयं इंद्र भी सहायता मांगने आते थे । जिस राज्य के राजा नहुष को इंद्र का सिंहासन मिला था । जिस राज्य के महान राजा रघु के नाम पर रघुवंश पड़ा जिसमें साक्षात श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रुप में जन्म लिया।
राम के बाद की अयोध्या :-
श्री राम के बाद की जानकारी कालिदास रचित महान ग्रंथ रघुवंशम् में दी गई है, जिसके अनुसार श्री राम के स्वर्गारोहण के पश्चात उनके सबसे बड़े पुत्र कुश ने कुशावती को, दूसरे पुत्र लव ने शरावती को, लक्ष्मण के पुत्रों ने करावती को, भरत के पुत्र पुष्कल ने पुष्करावती (पेशावर) को और शत्रुघ्न के पुत्रों ने मथुरा को अपनी राजधानियां बना शासन करना प्रारंभ किया था । इस प्रकार अयोध्या पूरी तरह से रघुवंश से विहीन हो गई थी।
रामकोट ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण:-
अयोध्या का रामकोट मोहल्ला धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यह वही स्थल है जहां भगवान श्रीराम अपने परिवार और परिकर सहित निवास करते थे। इसीलिए इस स्थान को “राम का किला” या “रामकोट” भी कहा जाता था। उन्होंने यहां एक विशाल किला बनवाया था जिसके मध्य भाग में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की स्थापना हुई है ।
अपनी ऊँची स्थलाकृति और एक तरफ सरयू नदी से घिरे रामकोट को अयोध्या के निवासियों द्वारा भगवान राम का किला माना जाता है। यह क्षेत्र अयोध्या के तीन सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों को समेटे हुए हैं - राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी और भव्य कनक भवन, सबका संबंध रामायण काल से है। अयोध्या धाम का वर्तमान रेलवे स्टेशन भी रामकोट में स्थित है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस स्थान की रचना अत्यंत वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण से की गई थी, ताकि यह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहे।रामकोट आज भी लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। अयोध्या के पुराने लोग इस क्षेत्र की नित्य परिक्रमा करते थे। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान श्रीराम के पारिवारिक जीवन और उनके आदर्श शासन की झलक पाते हैं। प्रभु श्रीराम यहीं अपनी कचहरी लगाया करते थे और अयोध्या सहित पूरे अवध प्रदेश की प्रजा की समस्याओं का समाधान करते थे।
शिव जी द्वारा संकेत :-
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की यह नगरी सरयू नदी के दाहिने किनारे पर बसी है। यहाँ का सबसे प्रमुख श्री हनुमान मन्दिर ‘हनुमान गढ़ी 'के नाम से विख्यात है। वह राजद्वार के सामने ऊँचे टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। श्री रुद्रयामलोक्त श्री अयोध्या माहात्म्य के श्लोक 30, पृष्ठ 87 पर श्रीशङ्कर जी पार्वती जी से श्री हनुमान जी का स्थान के बारे में इस प्रकार कहते हैं
राजद्वारे हनूमान् वै वायुपुत्रस्तु तिष्ठति ।
तथा तिष्ठति सुग्रीवो दक्षिणे च हनूमतः ॥
श्रीशंकरजीने कहा - ( रामकोटके प्रधान) राजद्वार पर वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका स्थान है तथा श्रीहनुमान जी के दक्षिण भाग में सुग्रीव जी का स्थान है ।
हनुमान गढ़ी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-
हनुमान गढ़ी (अयोध्या) एक बहुत ही प्राचीन और ऊँचे टीले पर स्थित मंदिर है। यह स्थान प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण के वध के बाद भगवान रामचंद्र सीता देवी और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए थे। हनुमानजी अपने परम प्रिय भगवान की सेवा करने के लिए अयोध्या में ही रुक गए। उन्हें हनुमान गढ़ी में निवास दिया गया।हनुमान भगवान राम से एक पल भी दूर नहीं रह सकते थे।
पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भगवान राम का स्वर्गारोहण त्रेतायुग के अंत में हुआ था। वाल्मीकि रामायण में दिए गए ग्रहों की स्थिति के आधार पर आधुनिक शोध कर्ताओं (जैसे पुष्कर भटनागर और नीलेश ओक) का मानना है कि यह घटना लगभग 7000 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 9,000 वर्ष पहले) हुई थी। भगवान राम जब स्वर्गारोहण किया तो राम जी के निर्देश से हनुमान जी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमान गढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमान जी रामकोट की रक्षा करते थे।
हनुमान गुफा से होती थी अयोध्या की रखवाली :-
वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के अनुसार, अजर-अमर हनुमान जी यहाँ एक गुफा में निवास करते थे। इन्हें 'रामकोट' का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीराम के दिव्य शासन की झलक मिलती है।
शास्त्रों के अनुसार, जब प्रभु रामचंद्र साकेत धाम जा रहे थे, तब उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या में रहने और सूर्य और चंद्रमा के अस्तित्व के दौरान तथा भगवान राम की महिमा का गुणगान होने तक वहां शासन करने का निर्देश दिया था। उन्होंने हनुमान जी को भक्तों को पूर्णता की ओर मार्गदर्शन करने का भी निर्देश दिया था।
कुश ने फिर से बसाई थी अयोध्या :-
रघुवंशम के अनुसार एक बार कुश अपने महल में सोये हुए थे तो रात के अंधेरे में एक दिव्य स्त्री उनके सामने आई । कुश ने उनका परिचय पूछा तो उस स्त्री ने कहा, वह अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्री राम के जाने के बाद अयोध्या पूरी तरह से स्वामी विहीन हो गई है और उसकी दुर्दशा हो गई है । अयोध्या की देवी ने कुश से अयोध्या वापस आने और उसे पुनः बसाने के लिए निवेदन किया था। कुश वापस आते हैं और फिर से अयोध्या को बसाते हैं। एक बार फिर अयोध्या अपने वैभव में लौट जाती है ।
कुश सरयू नदी के अंदर रहने वाले नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदनी से विवाह करते हैं और न्यायपूर्वक शासन चलाने लगते हैं । इंद्र के बुलावे पर कुश दुर्जय राक्षस को मारने के लिए इंद्र के साथ जाते हैं । इंद्र की सहायता मे कुश दुर्जय को मार डालते हैं लेकिन वो भी वीरगति को प्राप्त होते हैं। ऐसे में कुश के पुत्र अतिथि को अयोध्या का राजा बनाया जाता है। अतिथि भी न्यायपूर्वक शासन करते हैं। अतिथि के बाद कई अन्य राजा आते हैं जो अयोध्या वैसी ही वैभवशाली रहती है ।
राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के “साकेत” महाकाव्य के सर्ग 1 के पृष्ठ 2 पर अयोध्या का वैभव इस प्रकार व्यक्त किया है -
स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ
किंतु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?
वह मरों को मात्र पार उतारती;
यह यहीं से जीवितों को तारती।।
है अयोध्या अवनि की अमरावती,
इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती।
वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,
और नंदन वन बने आराम हैं।।
रघुवंश (सूर्यवंश) का अंतिम शासक का नाम सुमित्र था। पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उन्हें चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 362 ईसा पूर्व) में मगध के राजा महापद्मनंद ने पराजित किया था, जिसके बाद उन्हें अयोध्या छोड़नी पड़ी थी।
विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या ढाई हजार वर्ष पूर्व पुनः बसाया गया था :-
यह शहर तब तक वीरान रहा जब तक उज्जैन के राजा विक्रम इसकी खोज में नहीं आए और इसे फिर से स्थापित नहीं किये। विक्रमादित्य का समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग 57 ईसा पूर्व) माना जाता है। भारतीय परंपरा और 'विक्रम संवत' के अनुसार, उन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में 57 ईसा पूर्व में अपने शासन काल की शुरुआत की थी। उनका समय 57 ईसा पूर्व से 19 ईस्वी तक रहा। उन्होंने प्राचीन खंडहरों को ढकने वाले जंगलों को कटवा डाला था, वहां रामगढ़ किला और 360 मंदिर बनवाए थे।
स्कंद पुराण के अनुसार, करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने स्वप्नादेश प्राप्त होने के बाद अयोध्या धाम का जीर्णोद्धार कराया था। प्रयागराज से प्राप्त संकेतों के आधार पर राम जन्म भूमि सहित अन्य प्राचीन तीर्थस्थलों की पहचान की थी। राजा विक्रमादित्य ने 360 अन्य मंदिरों के साथ हनुमानगढ़ी का निर्माण करवाया था।
10वीं शताब्दी का हनुमान मंदिर:-
कन्नौज के राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, उत्तरी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 10वीं शताब्दी में अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र पर मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन था। जिसकी राजधानी कन्नौज थी और अयोध्या उनके साम्राज्य का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण हिस्सा था। हनुमान गढ़ी का पुनः निर्माण इस समय भी उल्लिखित मिलता है। इस अवधि के बाद, 11वीं शताब्दी के अंत में इस क्षेत्र पर कन्नौज के गहडवाल वंश के राजा चंद्रदेव का आधिपत्य हो गया था। जिन्होंने सरयू नदी के किनारे चंद्रहरि या चंद्रदेव को समर्पित एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था।
इसी समय अयोध्या स्थित 'हनुमान गढ़ी' भगवान हनुमान को समर्पित एक किले के आकार में निर्मित 10 वीं शताब्दी का प्राचीन तीर्थ मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है जहाँ 76 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचा जा सकता है। इसके प्रत्येक कोने में गोलाकार किलेबंदी है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान हनुमान ने एक गुफा में निवास किया था और पूरे शहर की रक्षा की थी।
मुगल शासक औरंगजेब ने राम जन्म भूमि की भांति कहा जाता है कि हनुमानगढ़ी को तोड़वाकर वहां एक मस्जिद बनवा दिया था। उर्दू उपन्यासकार मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की पुस्तक 'फसाना -ए-इब्रत, जिसका स्रोत 'साहिफा-ए- बहादुरशाही’ है और जिसे उन्होंने 1816 ईस्वी में प्रतिरूपित किया था, में उल्लेख है कि औरंगज़ेब ने हनुमानगढ़ी मंदिर को ध्वस्त कर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। बाद में, बक्सर में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद, बैरागियों ने 1855 ईस्वी में उस भूमि पर कब्जा कर लिया, मस्जिद को हटवा दिया और भक्त हनुमान के लिए एक नया मंदिर बनवाया। कुछ मुसलमानों का मानना था कि हनुमानगढ़ी एक मस्जिद पर बनी है। इसलिए उन्होंने कई बार मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
भक्त हनुमान जी के दोनों ओर भक्तों द्वारा भेंट की गई चांदी या सोने की गदाएं रखी हुई हैं। श्री राम के नाम से अंकित चांदी की तुलसी की माला हमेशा मूर्ति को सुशोभित रखती है। भक्त हनुमान जी के पीछे सीता, राम और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं। भक्त हनुमान जी की यह मूर्ति अत्यंत शक्तिशाली है और पूरे भार हनुमान जी की एकमात्र जीवित मूर्ति मानी जाती है। मंदिर के गर्भगृह में माता अंजना देवी की गोद में विराजमानभगवान हनुमान की छह इंच की भव्य प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा को हमेशा अनेक पुष्पमालाओं और सिंदूर से पूर्णतः सजाया जाता है। इसलिए, अधिकांश समय केवल भगवान हनुमान का नारंगी रंग का कमल नुमा चेहरा ही दिखाई देता है।
मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठते हैं। उसमें 76 सीढ़ी चढ़ने पर श्रीहनुमानजी का मन्दिर श्रीमारुति की एक और मूर्ति यहाँ है, वह केवल छः इंच ऊँची है । माना जाता है कि हर एक सीढ़ी किसी न किसी आध्यात्मिक पहलू को दर्शाती है। कुछ लोगों का कहना है कि ये 76 सीढ़ियाँ ईश्वर की ओर यात्रा में भक्ति के विभिन्न चरणों को प्रतिबिंबित करती हैं। मन्दिर बड़ा है और उसमें श्रीहनुमानजी की स्थानक मूर्ति है सदा पुष्पाच्छादित रहती है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, हनुमान जी वास्तव में यहीं एक गुफा में निवास करते थे और अयोध्या तथा राम जन्मभूमि की रक्षा करते थे। कहा जाता है कि वह गुफा मुख्य मंदिर भवन के नीचे स्थित है। भक्त वास्तव में मानते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या के हनुमानगढ़ी स्थित अपने स्थान से शहर की रक्षा करते हैं ।
श्री हनुमान जी के भक्तों के लिये यह स्थान विशेष श्रद्धास्पद है। मन्दिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, उनमें साधु सन्त रहते हैं। लंका विजय के बादअयोध्या राज महल का जो स्वर्ण स्तम्भ रावण उठा ले गया था उसे भी हनुमान जी यहां लाकर स्थापित किया है।
हनुमानगढ़ी क्षेत्र में उत्खनन भी हुआ :-
1981-1982 ई. में अयोध्या के सीमित क्षेत्र में उत्खनन किया गया। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमान गढ़ी और लक्ष्मण घाट क्षेत्रों में हुआ था। हनुमान गढ़ी क्षेत्र से भी उत्तरी काली चमकीली मृण्भांड संस्कृति
(लगभग 700 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच ) के अवशेष प्रकाश में आए हैं। साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के मृतिका वलय कूप तथा एक कुएँ में प्रयुक्त कुछ शंक्वाकार ईंटें भी मिली हैं। उत्खनन से बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं, जिनमें मुख्यत: आधा दर्जन मुहरें, 70 सिक्के, एक सौ से अधिक लघु मृण्मूर्तियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कुषाण शासक वासुदेव की एक मिट्टी की मुहर (दूसरी शती ई.), इसी काल का मूलदेव का एक सिक्का तथा एक भूरे रंग की केश-विहीन जैन मृण्मूर्ति है। हनुमानगढ़ी से प्राप्त अन्य मृण्मूर्तियाँ पहली-दूसरी शताब्दी ई. पू. की हैं। ये मृण्मूर्तियाँ अहिच्छत्र, कौशांबी, पिपरहवा और वैशाली आदि क्षेत्रों से प्राप्त मृण्मूर्तियों के समान ही हैं। इस प्रकार की मृण्मूर्तियों को वासुदेवशरण अग्रवाल ने विजातीय प्रकार से अभिहित किया है।
तीन सौ वर्ष पूर्व की वर्तमान संरचना:-
हनुमान गढ़ी की स्थापना लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्रीअभयारामदास जी ने की थी। कहते हैं प्राचीन काल में यहाँ हनुमानजी का एक विशाल मन्दिर था, जिसके कालान्तरमें भग्न होने से यह स्थान एक टीले में बदल गया, जिसे हनुमान् टीला कहा जाता था; उसी स्थान पर स्वामी अभयारामदास जी द्वारा स्थापित वर्तमान मन्दिर है। आप एक सिद्ध महात्मा थे तथा हनुमानजी ने आप को साक्षात् दर्शन भी दिया था। आप ने समाज की श्रद्धा-भावना के संरक्षणार्थ पहले यहाँ श्री निर्वाणी अखाड़ा की स्थापना की और फिर यहीं श्रीहनुमानजी की विधिवत् पूजा-आराधना एवं भोग-राग की व्यवस्था मर्यादित रूप से की।
नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्या बाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए।
अवध के नवाबों की उदारता की बड़ी बड़ी बातें मुस्लिम और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा की जाती है। 20 एकड़ या 52 बीघे भूमि का तथाकथित दान देने की बात आती है पर ऐसा हुआ है नहीं था । नवाब शुजा- उद- दौला या मंसूर अली द्वारा मालगुजारी (कर) में छूट की बात ही प्रमाणित होती है।
यह भी कहा गया है कि एक बार लखनऊ तथा फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली का पुत्र किसी भयंकर रोग से अत्यन्त पीडित हो गया। सुयोग्य वैद्यों और हकीमों के उपचारों से भी जब उसकी व्याधि नहीं मिटी, तब वह हनुमानगढ़ी के श्रीहनुमान जी की शरण में आया और अविलम्ब उसे उस भीषण रोग से मुक्ति मिल गयी। इसके प्रतिफल स्वरूप नवाब के मन में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा अंकुरित हो गयी। उसने कुछ सहयोग भी किया था। साधुओं की सुविधाके लिये विशाल इमली का बाग लगवा दिया और उसी समय श्री अभयाराम दास जी से प्रार्थना करके हनुमानजी का एक विशाल, भव्य एवं सुदृढ़ मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी हनुमान गढ़ी के नाम से विख्यात है।
अयोध्या तथा आस-पास के कुछ जिलों के कई परिवार अपने कुल परम्परानुसार अपने बच्चों का मुण्डन और यज्ञोपवीत यहीं करवाते हैं। अयोध्या के बहुत से नेमी श्रद्धालु स्नान करके नित्य यहाँ आते हैं। हिन्दू भक्तों एवं दर्शनार्थियों के कारण यहाँ नित्य ही मेला-सा लगा रहता है। मंगलवार तथा शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि अयोध्या में युगल-सरकार की कृपा प्राप्ति के लिये हनुमान गढ़ी के श्री हनुमानजी की जितनी पूजा होती है, उतनी युगल-सरकार की भी नहीं होती।
दियारा के राजा का सहयोग :-
सुल्तानपुर की दियारा रियासत के राजा (और अन्य स्थानीय जमींदारों) ने संतों और अखाड़ों के माध्यम से मंदिर की रक्षा और इसके विस्तार (जिसे 'गढ़ी' या किले का रूप दिया गया) में आर्थिक और सैन्य सहयोग प्रदान किया था।
महाराजा मानसिंह द्वारा निपटारा :- महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई, में हुआ था। उनका शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। राज्य की सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। इनके समय में हनुमान गढ़ी विवाद हुआ था जिसका निपटारा करने पर महाराजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद मिला हुआ था।
जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।
अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। "गुलाम हुसेन” नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनुमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर. मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गड़वा दिया जिसे “गंजशहीदाँ” कहते हैं। यह स्थल राम जन्मभूमि अधिगृहीत परिसर में स्थित था।
1855 में जब हिंदुओं ने हनुमानगढ़ी पर अधिकार कर लिया था, तब एक भीषण संघर्ष हुआ था। आज भी अयोध्या में मुस्लिम समुदाय का मानना है कि आगामी राम जन्मभूमि मंदिर से सटे पांच एकड़ का एक स्थान 'गंज-ए-शहीदान' है - हनुमान गढ़ी के बैरागियों द्वारा मारे गए मुसलमानों के सामूहिक दफन का स्थल है। जिसे 'गंज शहीदा' (शहीदों की समाधि) कहा जाता है।
मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा -
हम इश्क़ के बन्दे हैं
मज़हब से नहीं वाक़िफ़।
गर काबा हुआ तो क्या,
बुतखाना हुआ तो क्या ?
बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारकबाद दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।
इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदत अली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पारसाहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। इस कारगुजारी के बदले बादशाह ने राजा मानसिंह को राजे- राजगान का पद दिया। राजा मानसिंह ने इसका पर्दाफाश करते हुए कूटनीति से विवाद को सुलझाया था।
इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।
वर्तमान समय की परम्परा :-
अयोध्या के सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी में एक ऐसी परंपरा है, जहां के प्रमुख गद्दीनशीन किसी भी परिस्थितियों में परिसर के बाहर नहीं निकलते हैं। किसी महंत को 60 वर्ष की आयु के बाद ही गद्दीनशीन चुना जाता है। जहां प्रधानमंत्री (चार पट्टी के महंत) से लेकर राष्ट्रपति (गद्दीनशीन) का अपना कानून होता है। हनुमानगढ़ी में चार पट्टी हैं, जिसके चार महंत होते हैं और एक गद्दीनशीन यानी प्रमुख होता हैं। रामानंदी संप्रदाय के निर्माणी अखाड़े के अंतर्गत वैष्णो साधु होते हैं जो चार पट्टी में विभक्त हैं- उज्जैनिया, सागरिया, बसंती और हरिद्वारी। यह 4 महंत हनुमानगढ़ी के प्रधानमंत्री होते हैं। इनके ऊपर एक राष्ट्रपति हैं,जिसे गद्दीनशीन कहा जाता है। हनुमानगढ़ी के प्रथम गद्दीनशीन अभयरामदास महाराज थे । हनुमानगढ़ी में वर्तमान गद्दीनशीन प्रेमदास हैं, जो 51वें गद्दीनशीन पर आसीन हैं। वर्तमान समय में सगरिया पट्टी के गद्दीनशीन बनाए गए हैं।
गद्दीनशीन का चयन प्रक्रिया:-
चार पट्टी के 3-3 लोगों का नाम अखाड़े में भेजा जाता है। अखाड़े के लोग चुनाव करते हैं कि वह व्यक्ति गद्दीनशीन बनने योग्य है या नहीं। चुनाव होने के बाद अखाड़ा पास करता है। उसके बाद बैठक होती है। बैठक में वरिष्ठ संत अखाड़े के लोग यह तय करते हैं कि कौन बनेगा गद्दीनशीन। फिर उसके बाद चुनाव होता है। तब सर्वसम्मति से गद्दीनशीन अपने आसन पर विराजमान होते हैं। गद्दीनशीन 60 वर्षों के बाद बनाए जाते हैं। जब उम्र का पड़ाव अंतिम छोर पर होता है। मोह माया तमाम चीजों से व्यक्ति दूर हो जाता है।उस समय उस व्यक्ति को गद्दीनशीन पर बैठाया जाता है ।
हनुमान जी का स्वरूप होते हैं गद्दीनशीन :-
हनुमानगढ़ी पंचायती अखाड़ा का मठ है। यहां महंत गद्दीनशीन की नियुक्ति गुरु-चेला की परंपरा पर आधारित नहीं होती है। इसका निर्णय पंचांयत अखाड़ा लेता है। उसी प्रकार चारों पट्टिओं के महंत की नियुक्ति भी पंचांयत अखाडे ही करते हैं। यहां पर सब को एक समान का अधिकार होता है। परंपरा के अनुसार गद्दीनशीन का पद संभालने के बाद हनुमानगढ़ी के अपने नियम और संविधान के अनुसार गद्दीनशीन महंत अपने अंतिम पड़ाव तक हनुमानगढ़ी के परिसर में ही रहता है। 52 एकड़ में फैले हनुमानगढ़ी का परिसर के बाहर गद्दीनशीन नहीं निकलता है। मृत्यु के बाद ही उनका शरीर परिसर के बाहर जा सकता है।गद्दीनशीन हनुमान जी की गद्दी मानी जाती है। ऐसे में उस पर आसीन होने वाले महंत को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।उस गद्दी पर आसीन होने वाले व्यक्ति का सिर्फ एक ही काम है। वह भगवान का भजन करें और आए हुए भक्तों को आशीर्वाद दे। गद्दीनशीन प्रसिद्ध सिद्ध गद्दी है। अगर गद्दीनशीन का किसी परिस्थितियों में तबीयत या कोई आरोप-प्रत्यारोप लगता है तो डॉक्टर से लेकर कोर्ट का प्रतिनिधि मंडल भी गद्दीनशीन यानी हनुमानगढ़ी परिसर में ही आएगा।गद्दीनशीन बाहर नहीं जाएगा। गद्दीनशीन पर आसीन होने के बाद महंत कि जब तक मृत्यु नहीं होती है तब तक वह गद्दी पर आसीन रहता है।
लेखक :
आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी
पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,
आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.
वॉट्सप नं.+91 9412300183.