Monday, September 7, 2026

कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने बनाई थी कैप्टनगंज तहसील और मुन्सफी ✍️डॉक्टर राधेश्याम द्विवेदी (भाग 1)


नवंबर 1801 में अवध के नवाब शुजा- उद- दौला का उत्तराधिकारी सआदत अली खान ने गोरखपुर को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा था तब गोरखपुर को एक जिला बनाया गया था। जिसमे मौजूद जिला बस्ती और आसपास के क्षेत्र का भी समावेश था। सन् 1801 के पूर्व यह अवध प्रान्त के अंतर्गत मुगलों के अप्रत्यक्ष नियंत्रण में आता था । उस समय यह क्षेत्र वाराणसी मंडल के गोरखपुर जिले की सीमा का हिस्सा था। 1801 में अंगेजों के अधीन बस्ती एक तहसील की इकाई के रूप में आया है। तभी से यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया, उस समय यहां कानून-व्यवस्था और राजस्व वसूली एक बड़ी चुनौती थी। 


गोरखपुर के पहले कलेक्टर श्री रूटलेज थे।1829 में, गोरखपुर को इसी नाम के एक डिवीजन का मुख्यालय बनाया गया था, जिसमें गोरखपुर, गाजीपुर और आज़मगढ़ के जिले शामिल थे। श्री आर.एम. बिराद को पहली बार आयुक्त नियुक्त किया गया था।

कैप्टन माल्कोम मक्लोइड राजस्व वसूली के लिए नियत

रूटलेज कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये। आदेश को लागू करने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने मदद के लिए सेना बढा दिया था। कप्तान माल्कोम मक्लोइड  ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के एक सैन्य अधिकारी थे। जिनका मुख्य ऐतिहासिक संबंध उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले और गोरखपुर क्षेत्र के इतिहास से है। उन्हें मुख्य रूप से क्षेत्र में राजस्व (लगान) वसूली और कानून- व्यवस्था स्थापित करने के लिए जाना जाता है।


गोरखपुर के पहले ब्रिटिश कलेक्टर 'रूटलेज' ने जब भूमि राजस्व की वसूली के लिए सख्त कदम उठाए, तो स्थानीय जमींदारों और जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। कलेक्टर के आदेशों को कड़ाई से लागू करने और राजस्व वसूलने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने ब्रिटिश सेना के साथ आगे बढ़कर प्रशासन की मदद की थी। इस सैन्य हस्तक्षेप के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

1865 में, बस्ती नया जिला बना

1865 में, नया जिला बस्ती गोरखपुर से बनाया गया था जहां अंग्रेज इस क्षेत्र से अधिक से अधिक राजस्व की वसूली कर रहे थे , वही स्थानीय शासक भी अपनी मनमानी करते रहे हैं। अवध (फैजाबाद) के सीधे नियंत्रण के बावजूद पटना, जौनपुर तथा बहराइच के नबाबों व सरदारों ने भी लूटपाट मचाया रखा था। परगना अमोढ़ा तो अंग्रेजों के अधीन सबसे बाद में आया है। अकबर के समय तक यह अवध का भाग ही बना रहा। चूंकि अंग्रेज इसे जब तक पूर्णरूपेण अपने अधीन नहीं कर लिए, उनकी गतिविधियां इस क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही रही है।


कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम कैप्टन गंज नाम मिला :-

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्थित 'कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर ही पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टनगंज' कहा जाने लगा।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में विद्रोह की आग भड़की, तब ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा था। इतिहास के स्थानीय संदर्भों के अनुसार, स्थिति को नियंत्रित करने और ब्रिटिश सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ बस्ती और उसके आस-पास के क्षेत्रों की ओर कूच किया था।

प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था। मैलकाम मैकलाॅज की तैनाती के दौरान इस सीमावर्ती क्षेत्र (बुटवल और नेपाल सीमा) में गोरखाओं के साथ ब्रिटिश सेना की कई झड़पें हुईं। इस क्षेत्र की अशांति और सामरिक महत्व को देखते हुए उनके सैन्य अभियानों ने आगे चलकर ऐतिहासिक एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814– 1816) की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई थी।

1815 व 1816 ई. में जिले के उत्तरी क्षेत्र बांसी तथा मगहर में सियारमार एक खानाबदोस जाति के लोगों ने लूटपाट करना शुरू कर दिया था। मई 1816 ई. में इस दल ने कैप्टनगंज से उस समय का 6,000 रूपया लूट लिया था। एसा लुका छिपी का खेल 1857 ई तक पूरे जिले में चलता रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के 1857 के विद्रोह के समय पूरे देश में अंगे्रजों पर संकट के बादल मड़राने लगे थे। सभी अंग्रेज जान बचााकर भाग रहे थे । उन्हें व उनके परिवार पर संकट बरकरार था। 

बस्ती कल्कट्री पर पहले अफीम तथा ट्रेजरी की कोठी हुआ करती थी। यहां 17वीं नेटिव इनफेन्ट्री की एक टुकड़ी सुरक्षा के लिए लगाई गई थी। इस यूनिट का मुख्यालय आजमगढ ़बनाया गया था। जहां 5 जून 1857 को विद्रोह भड़क उठा था। 6 अंगे्रज भगोड़ों का एक दल नांव द्वारा अमोढ़ा होते हुए कप्तानगंज स्थित अंग्रेज कैप्टन के शरण में आया था। तहसीलदार ने उन्हें चेतावनी दिया था कि शीघ्र बस्ती छोड़ दें।

दिल्ली व अवध के नबाब के प्रतिनिधि राजा सैयद हुसेन अली उर्फ मोहम्मद हसन उत्तर प्रदेश के बदायूं (सहसवान, काजी मोहल्ला) के मूल निवासी थे। वह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के सम्राट और अवध के नवाब के प्रमुख प्रतिनिधि और एक महान क्रांतिकारी सेनानी थे। उन्होंने कर्नल लेनाक्स ,उनकी पत्नी तथा बेटी को अपनी संरक्षा में ले रखा था। पेप्पी ने इन्हें भी मुक्त कराया था। 12 अगस्त 1857 को मोहम्मद हसन के नेतृत्व में बागियों ने कैप्टनगंज को अपने अधीन कर रखा था।

अमोढ़ा के देशी सैनिकों से 17 अप्रैल तथा 25 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों को बुरी तरह मात खाना पड़ा था। छः अंग्रेज अधिकारियों को छावनी में अपने जान गवाने पड़े थे। फैजाबाद से सेना बुलाकर विद्रोह को दबाना पड़ा था। छावनी बाजार के पीपल के पेड़ पर 150 विद्रेहियों को फांसी पर लटकाया गया था। अनेक अंग्रेजों की कब्रें व स्मारक भी सरकार ने बनवाये हैं। राफक्राफ्ट कैप्टनगंज आ गया तथा जून 1858 के आरम्भ तक यहां कैम्प किया था। अंग्रेजी सेना मो. हसन के पीछे पड़ी थी। वह भागते छिपते अंग्रेजी सेना के शरण में 4 मई 1859 को चला आया था । उसे क्षमा करते हुए सीतापुर की एक छोटी सी रियासत गुजारे में दी गई थी। गोपाल सिंह नामक सूर्यवंशी एक जमीदार को कैप्टनगंज का तहसील देकर कृतकृत्य किया गया था। उसे अनुदान में जमीन भी दिया गया था।

बांसी के राजा को उपहार में मिला था रतास गांव :-

कैप्टनगंज जो रतास नामक एक छोटा सा गांव था , कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1865 में यहां तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। रतास अंग्रेजो द्वारा राजा बांसी को दिया गया भेंट था क्योंकि उन्होने अंग्रेजों की काफी मदद की थी। प्रतीत होता है कि बांसी के राजा को स्थायी प्रदान करने के कारण रतास का नाम पड़ा होगा। यही रतास आगे चलकर कैप्टनगंज ब्रिटिस टाउन मुंसफी व तहसील की शक्ल लिया था। आजादी के बाद इसका नाम कप्तानगंज कर दिया गया।

1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती तहसील मुख्यालय को 1865 में जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरियागंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। विशाल भूभाग तथा अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था। फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। 109 ग्राम सभाओं/पंचायतों तथा 11 न्याय पंचायतों को समलित करते हुए 2 अक्टूबर 1956 को पुराना कैप्टनगंज अब नया कप्तानगंज विकास खण्ड का मुख्यालय घोषित किया गया। 

इस गाँव का नाम शायद इसलिए पड़ा क्योंकि अवध प्रशासन के दौरान या ब्रिटिश शासन शुरू होने के कुछ समय बाद तक यह एक छोटा मिलिट्री स्टेशन था। यह बस्ती से नौ मील पश्चिम में, फैजाबाद से गोरखपुर जाने वाली प्रांतीय सड़क के दक्षिण में टप्पा नवाई में स्थित है (26° 40' N और 82° 35' E)। बुकानन के समय में यहाँ सिर्फ़ 25 दुकानें थीं, लेकिन बाद में तहसील और मुंसिफ़ का केंद्र बनने के कारण इसका महत्व बढ़ गया। 1876 में तहसील को हरैया स्थानांतरित कर दिया गया और तब से कैप्टनगंज का महत्व कम हो गया। यहाँ अभी भी एक पुलिस स्टेशन, एक पोस्ट-ऑफिस, एक लोअर प्राइमरी स्कूल और 1996 में बना एक पशु-बाड़ा (cattle-pound) है। वर्तमान समय का थाना पुरानी तहसील की इमारत में स्थित है, जो 1857 के विद्रोह के दौरान लड़ाई का केंद्र थी, थाने के पास के बाग में उस घर के अवशेष हैं जहाँ कभी सैनिकों के कमांडर अधिकारी रहते थे। कई वर्षों तक इसका उपयोग मुंसिफ़ कोर्ट के रूप में किया जाता रहा है, लेकिन मुंसिफ़ कोर्ट के हरैया स्थानांतरित होने के बाद से यह इमारत खंडहर हो गई है। गाँव में एक सुंदर मस्जिद है, जिसे हाल ही में एक मुस्लिम निवासी ने बनवाया था; यह एक कलात्मक संरचना है और इसे कुशल कारीगरों ने काफी लागत से बनाया था। गाँव के पूर्व में स्थित पुरानी सराय का उपयोग अभी हाल तक किया जाता है। 

यहाँ मुख्य रूप से कुंजड़े और कुचरी जातियाँ रहती हैं। रतास गाँव का कुल क्षेत्रफल 238 एकड़ है, जिसमें से लगभग 190 एकड़ में खेती होती है; राजस्व 350 रुपये है और इसके मालिक बांसी के राजा हैं, जिनके पूर्वज को यह विद्रोह के बाद सरकार से उपहार के रूप में मिला था। राजस्व मौज़े का पुराना नाम रतास है।

(स्रोत:बस्ती डिस्ट्रिक गजेटियर: एच. आर. नोविल ,1907, पृष्ठ 202)

चूंकि ब्रिटिशकाल में यह 10 से अधिक वर्षों तक तहसील मुख्यालय का गौरव प्राप्त कर चुका है इसलिए इसे तहसील घोषित करने के लिए सारी परिस्थितियां भी अनुकूल हैं। इससे यह क्षेत्र मण्डल के अन्य तहसीलों की भांति विकास के पथ पर चल सकेगा। यह स्थान एक तो राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर स्थित है तथा यह रामजानकी मार्ग के दुबौलिया तथा लखनऊ गोरखपुर रेलवे लाइन के टिनिच व गौर नामक स्टेशनों से जुड़ा भी है। विकास की दृष्टि से जब से यहां से तहसील हर्रैया गई यह क्षेत्र पिछड़ता ही रह गया था। यह कस्बे से ज्यादा कुछ नहीं हो सका। यहां विकास की असीम सम्भावनाएं है। 

(क्रमशः...आगे भी जारी रहेगा । )

भाग 2 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विधान सभा का इतिहास" 

भाग 3 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज विकास क्षेत्र का इतिहास"

भाग 4 के आगामी आलेख में जानिए- "कप्तानगंज नगर पंचायत का इतिहास"

समय समय पर अन्य आगामी आलेख में कप्तानगंज के इतिहास , समाज और संस्कृति और कला के विभिन्न उपादानों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8, निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,

Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183



Sunday, September 6, 2026

रानी की वाव, एक विशिष्ट वास्तु प्रारूप, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ✍️डॉ राधेश्याम द्विवेदी

रानी की वाव
रानी की वाव को रानी की बावड़ी भी कहा जाता है, गुजरात के पाटन में स्थित एक ऐतिहासिक बावड़ी है। यह सरस्वती नदी के किनारे पर बनी है। यह एक प्रसिद्ध और भव्य सीढ़ीदार कुआँ (बावड़ी) है। यह एक प्रमुख भूमिगत जल संरचना है जो मध्य कालीन गुजरात में सीढ़ीदार कुओं के निर्माण के उच्च स्तर को दर्शाती है।
स्थान
रानी की वाव गुजरात के पाटन में सरस्वती नदी के तट पर स्थित है । यह पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थित है और इस क्षेत्र का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है।
निर्माण
इसका निर्माण 11वीं शताब्दी के चालुक्य राजा भीम प्रथम की रानी उदयमती द्वारा करवाया गया था। इसे मूल रूप से राजा के स्मारक के रूप में बनाया गया था।
काल
रानी की वाव 11वीं शताब्दी ईस्वी की है। यह सीढ़ीदार कुआँ भूमिगत जल स्रोतों और भंडारण संरचनाओं के निर्माण की पारंपरिक भारतीय प्रथा के परिपक्व चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
उद्देश्य
यह संरचना धार्मिक और कार्यात्मक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करती थी। इसे एक उल्टे मंदिर के रूप में डिजाइन किया गया था जो भूजल तक पहुंच प्रदान करते हुए जल की पवित्रता पर जोर देता था।
संरचना
रानी की वाव में एक सीढ़ीदार गलियारा, चार मंडप, एक तालाब और एक गहरा कुआँ है। संरचना के पश्चिमी छोर की ओर मंडपों की मंजिलें बढ़ती जाती हैं।
रानी की वाव का इतिहास
रानी की वाव आधुनिक काल में उत्खनन और जीर्णोद्धार से पहले सदियों से पर्यावरणीय और ऐतिहासिक परिवर्तनों से गुज़री है।
चौलुक्य काल की संरचना:
रानी की वाव का निर्माण चौलुक्य वंश के शासनकाल में हुआ था । जैन भिक्षु मेरुतुंगा द्वारा रचित 1304 के ग्रंथ 'प्रबन्ध-चिंतामणि' में उदयमती द्वारा श्रीपट्टाना में बावड़ी के निर्माण का उल्लेख है, जो पाटन से जुड़ा ऐतिहासिक नाम है।
निर्माण तिथि: 
मेरुतुंगा के विवरण के अनुसार, बावड़ी का निर्माण 1063 में शुरू हुआ और 20 वर्षों में पूरा हुआ। एक अन्य वास्तुशिल्पीय व्याख्या माउंट आबू के विमलवासाही मंदिर से समानताओं के आधार पर इसके निर्माण को लगभग 1032 के आसपास मानती है।
बाढ़ और गाद: बाद में सरस्वती नदी में बाढ़ आ गई और व्यापक गाद जमा हो गई। 13वीं शताब्दी में हुए भू-विवर्तनिक परिवर्तनों ने नदी के तल को बदल दिया और अंततः रानी की वाव को जल कुएँ के रूप में कार्य करने से रोक दिया।
पुनर्खोज
हेनरी कौसेन्स और जेम्स बर्गेस ने 1890 के दशक में दबी हुई संरचना को दर्ज किया था। केवल कुएं का शाफ्ट और कुछ खंभे ही दिखाई दे रहे थे क्योंकि सीढ़ीदार कुआं का अधिकांश भाग भूमिगत ही रह गया था।
उत्खनन
1940 के दशक में बड़ौदा राज्य के अंतर्गत किए गए उत्खननों में रानी की वाव का पता चला। 
जीर्णोद्धार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1981 और 1987 के बीच व्यापक उत्खनन और जीर्णोद्धार कार्य किया।.
वास्तुकला और संरचनाएं
इसमें जल प्रबंधन, धार्मिक प्रतीकवाद और बारीक पत्थर की नक्काशी का अद्भुत संगम है। रानी की वाव मारू-गुर्जर स्थापत्य परंपरा का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
रानी की वाव कार्यात्मक जल वास्तुकला को विस्तृत मूर्तिकला और विशिष्ट मारू-गुर्जर शैली के संयोजन के लिए प्रसिद्ध है ।
आयाम
बावड़ी लगभग 65 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 28 मीटर गहरी है। इसके पश्चिमी भाग का व्यास 10 मीटर है और यह 30 मीटर की गहराई तक जाती है।
सात स्तर: संरचना को सीढ़ियों के सात स्तरों में विभाजित किया गया है। ये स्तर भूमिगत जल क्षेत्र की ओर उतरते हैं और इनमें समृद्ध नक्काशीदार स्थापत्य और मूर्तिकला तत्व मौजूद हैं।
सबसे निचला स्तर: 
चौथा स्तर सीढ़ीदार संरचना का सबसे गहरा हिस्सा है। यह 23 मीटर की गहराई पर स्थित 9.5 मीटर गुणा 9.4 मीटर के आयताकार टैंक तक जाता है।
मंडप और स्तंभ
सीढ़ीदार गलियारे के साथ चार बहुमंजिला मंडप बने हुए हैं। रानी की वाव में सजावटी दीवारों, बीमों, ब्रैकेटों और स्तंभों के साथ 212 स्तंभ हैं।
मूर्तिकला की समृद्धि: 
बावड़ी को 500 से अधिक मुख्य मूर्तियों और 1,000 से अधिक छोटी मूर्तियों से सुशोभित किया गया है। इनमें धार्मिक, पौराणिक और धर्मनिरपेक्ष चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें साहित्यिक परंपराओं के संदर्भ भी शामिल हैं।
देवता
मूर्तियों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, कुबेर, लकुलीश, भैरव, सूर्य, इंद्र, हयग्रीव, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती, चामुंडा, दुर्गा और सप्तमातृकाएं शामिल हैं।
विष्णु प्रतिमाएं
शेषशायी विष्णु, विश्वरूप विष्णु और दशावतार जैसी प्रतिमाओं के माध्यम से विष्णु को विशेष महत्व दिया गया है। ये मूर्तियां स्मारक की धार्मिक प्रतिमाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
सजावटी आकृतियाँ: 
नक्काशी में अप्सराएँ, पशु, पक्षी, पौधे, कल्पवृक्ष, कीर्तिमुख और मकर शामिल हैं। स्थानीय पटोला वस्त्र परंपराओं से मिलती-जुलती ज्यामितीय जालीदार आकृतियाँ और डिज़ाइन भी सजावट में दिखाई देते हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल
रानी की वाव को जल वास्तुकला, शिल्प कौशल, धार्मिक छवियों और संरचनात्मक डिजाइन के असाधारण संयोजन के कारण अंतरराष्ट्रीय विरासत की मान्यता प्राप्त हुई।
रानी की वाव को 22 जून 2014 को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था । इसे एक असाधारण भूमिगत सीढ़ीदार कुएं के रूप में इसके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए मान्यता प्राप्त है।
यूनेस्को मानदंड: 
स्मारक उत्कृष्ट कलात्मक और रचनात्मक उपलब्धि के लिए मानदंड (i) और भूमिगत जल संसाधन और भंडारण संरचना के एक असाधारण उदाहरण के रूप में मानदंड (iv) को पूरा करता है।
अखंडता
अधिकांश प्रमुख वास्तुशिल्पीय घटक अभी भी मौजूद हैं, हालांकि कुछ मंडप की मंजिलें गायब हैं। 13वीं शताब्दी की बाढ़ के बाद जमा हुई गाद ने स्मारक और कई मूर्तियों को सात शताब्दियों से अधिक समय तक संरक्षित रखने में मदद की।
प्रामाणिकता: 
रानी की वाव अपनी सामग्री, डिजाइन, कारीगरी और सार में उत्कृष्ट प्रामाणिकता बरकरार रखती है। जहां संरचनात्मक सहायता आवश्यक थी, वहां सीमित पुनर्निर्माण किया गया, और पुनर्निर्मित भागों को दृश्य रूप से अलग रखा गया है।
संरक्षण
रानी की वाव राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है और इसे प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अधिनियम, 1958 (2010 में संशोधित) के तहत संरक्षित किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस संपत्ति का प्रबंधन करता है।
संरक्षित क्षेत्र: 
वास्तुशिल्प संरचना के चारों ओर 100 मीटर का एक प्रतिबंधित विकास क्षेत्र है। विरासत संपत्ति के आसपास अनुपयुक्त विकास को नियंत्रित करने के लिए इसके बफर क्षेत्र को द्वितीय संशोधित विकास योजना में शामिल किया गया है।
रानी की वाव का महत्व
रानी की वाव मध्यकालीन भारत में जल प्रबंधन, धार्मिक विचार, वास्तुकला और कलात्मक अभिव्यक्ति के संगम का प्रतिनिधित्व करती है।
जल वास्तुकला
भारतीय उपमहाद्वीप में बावड़ियाँ विशिष्ट भूमिगत जल प्रणालियों के रूप में विकसित हुईं। रानी की वाव इस स्थापत्य परंपरा का एक उन्नत चरण प्रस्तुत करती है, जो व्यावहारिक जल उपलब्धता को भव्य डिजाइन के साथ जोड़ती है।
सांस्कृतिक महत्व: 
यह स्मारक देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों, मनुष्यों, जानवरों, पक्षियों और पौधों की एक विशाल दृश्य दुनिया प्रस्तुत करता है। इसकी मूर्तियां धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष कलात्मक परंपराओं के महत्वपूर्ण पहलुओं को संरक्षित करती हैं।
स्थापत्य महत्व:
इसके सात स्तर, मंडप, टैंक, कुआँ और व्यापक नक्काशी मारू-गुर्जरा परंपरा से जुड़ी स्थापत्य और शिल्प कौशल की उपलब्धियों को प्रदर्शित करते हैं।
राष्ट्रीय मान्यता: 
रानी की वाव को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया और 2016 के भारतीय स्वच्छता सम्मेलन में इसे भारत का " सबसे स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थान " नामित किया गया।
नोटों पर रानी की वाव
जुलाई 2018 से, रानी की वाव को नई श्रृंखला के ₹100 के नोट के पीछे की तरफ चित्रित किया गया है, जिससे स्मारक को व्यापक राष्ट्रीय मान्यता मिली है .
(साभार: वाजीराम एण्ड रवि)


Saturday, September 5, 2026

श्रीकृष्ण के षडगर्भ भाइयों की अजूबा दास्तान ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


ब्रह्मा पुत्र मरीचि की संतानें :-

मरीचि ब्रह्मा के मानसपुत्र थे। इन्हें ब्रह्मा जी के मन या नेत्र से उत्पन्न हुआ माना जाता है। ये ब्रह्मा जी के दस मुख्य प्रजापतियों में गिने जाते हैं, जिन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा गया था। इनका विवाह कला या संभूति, पूर्णिमा और ऊर्णा से हुआ था। कला पत्नी से मरीचि के दो पुत्र कश्यप और पूर्णमवास हुए थे। कश्यप ऋषि से ही आगे चलकर देवता, असुर, और समस्त जीव-जंतुओं की उत्पत्ति हुई।

ऊर्णा मरीचि की दूसरी पत्नी थीं। ऊर्णा के छह पुत्र थे। उन्होंने ब्रह्मा को अपनी पुत्री के पीछे भागते देखकर हँसी उड़ाई। एक महान व्यक्तित्व का अपमान करने के इस अपराध के कारण, उन्हें राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा। ब्रह्मा के श्राप के कारण वे पहले हिरणाक्ष के पौत्र और कालनेमी के पुत्रों के रूप में और अगले जन्म में वासुदेव और देवकी के पुत्रों के रूप में पैदा हुए । ये छह बच्चे ही श्री कृष्ण के बड़े भाई ‘षडगर्भ’ कहलाए थे, जिन्हें कंस ने जन्म के तुरंत बाद मार डाला था।

जय और विजय हिरणाक्ष और हिरण्यकशिपु हुए थे -

हिरणाक्ष महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। उसका उद्धार वराह अवतार में बिष्णु जी ने किया था। वह हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई था जिसका वध बाद में भगवान विष्णु जी ने नृसिंह अवतार लेकर किया था। हिरणाक्ष की एक बहन भी थी जिसका नाम होलिका था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु असल में वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। चार कुमारों सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा था।

हिरण्याक्ष हिंदू पौराणिक कथाओं सनातन धर्म में एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य (राक्षस) था, जिसका वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार (सूअर के रूप) में किया था। भागवत पुराण) के अनुसार एक अन्य कालनेमि विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का पौत्र (तथा हिरण्यकशिपु का भतीजा था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही असुर कालनेमि बाद में द्वापरयुग में मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के रूप में पैदा हुआ था, जिसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। 

षडगर्भ भाइ कालनेमी के पुत्र रहे -

कालनेमी के छह पुत्र थे: हंस, सुविक्रम, क्रथा, दमना, रिपुरमर्दना और क्रोधहंत। इन्हे हिरण्यकशिपु का श्राप था। हरि-वंश (विष्णु-पर्व का द्वितीय अध्याय) में लिखा है कि हंस, सुविक्रम, क्रत, दमन, रिपु-मर्दन और क्रोध-हंता, जिन्हें षड-गर्भ (छह अजन्मे बच्चे) के रूप में जाना जाता है, राक्षस कालनेमि के पुत्र हैं। उन्होंने अपने दादा हिरण्यकशिपु को बिना बताए, सर्वपिता ब्रह्मा की उपासना के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्मा उनकी अत्यावश्यकता से प्रसन्न होकर, उनकी प्रार्थनाओं के अनुसार उन्हें मृत्यु से सुरक्षा का वरदान प्रदान किया। बाद में, जब हिरण्यकशिपु को इस घटना के बारे में पता चला, तो वह क्रोधित हो गया और बोला, “तुमने मुझे बिना बताए ब्रह्मा की पूजा की है, इसलिए मैं तुम जैसे धृष्ट लोगों से कोई स्नेह नहीं रखता। तुम्हारे पिता स्वयं तुम सबको मार डालेंगे। अगले जन्म में तुम छहों देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और तुम्हारे पिता कालनेमि कंस के रूप में जन्म लेंगे। वही कंस तुम्हारा हत्यारा होगा।” हिरण्यकशिपु के इस श्राप के कारण वे देवकी के गर्भ में जन्म लिए और कालनेमि के अवतार कंस द्वारा मारे गए।

श्री कृष्ण ने मां को षडगर्भ पुत्रों का दर्शन कराया था -

श्रीमद्-भागवत (10.85.47-57) में उल्लेख है कि माता देवकी की प्रार्थना के कारण श्री राम और श्री कृष्ण उनके छह मृत पुत्रों को श्री बलिराज की सुतल-पुरी से वापस लाए थे। सुतलपुरी जाने के बाद श्री कृष्ण ने दैत्यों के राजा बलि से कहा, “हे दैत्यों के स्वामी, स्वायंभुव के मन्वंतर में महर्षि मरीचि की पत्नी ऊर्णा देवी के गर्भ से छह देव जैसे पुत्र उत्पन्न हुए। ब्रह्मा को अपनी पुत्री (सरस्वती) के पीछे भागते देख उन्होंने उनका उपहास किया। इस पाप के फलस्वरूप – हिरण्यकशिपु के भाई के पुत्र कालनेमि के पुत्रों के रूप में राक्षसी योनि में जन्म लिया। फिर वहाँ से योगमाया के द्वारा उन्हें देवकी के गर्भ में जन्म लेने के लिए विवश किया गया और कंस द्वारा मार डाला गया। माता देवकी उनके लिए शोक मना रही है, उन्हें अपने पुत्रों के समान मानती है। वे इस समय आपके धाम में निवास कर रहे हैं। उनके मातृ शोक को कम करने के लिए मैं उन्हें इस स्थान से उनकी माता से मिलाने के लिए ले जाऊँगा। अंततः, वे अपने श्राप और शोक से मुक्त होकर देवताओं के लोकों में लौट जाएँगे। 

ब्रह्मा की तपस्या और श्राप दोनों मिला-

ब्रह्मा की तपस्या करने के कारण, उनके दादा हिरण्यकशिपु ने पहले उन्हें पाताल में लंबे समय तक सोने का श्राप दिया, और फिर उनके श्राप को बदलकर उन्हें देवकी के पहले छह पुत्रों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश दिया । पिता, कालनेमी, उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और उनके मामा होंगे, जो जन्म के तुरंत बाद उन सभी की हत्या कर देंगे। भागवत पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, देवकी के पहले छह पुत्रों को जन्म लेते ही अत्याचारी कंस ने मार दिया था। कारागार में जन्म होने और मृत्यु के भय के कारण इनका नामकरण संस्कार नहीं हो पाया था।श्रीकृष्ण के वे छह भाई, जिन्हें 'षद्गर्भ' कहा जाता है, कंस द्वारा अपने जन्म के तुरंत बाद मार दिए जाने के कारण अल्पायु रहे। इसके पीछे पौराणिक कथा यह है कि वे पूर्व जन्म में मरीचि ऋषि के पुत्र थे और उन्हें हिरण्यकशिपु का श्राप मिला था। हरिवंश पुराण के अनुसार, ये प्रत्यूष वसु के पुत्र थे। इन्हें देवर्षि और वेदों-उपनिषदों का मर्मज्ञ माना गया है।

ब्रह्मा जी ने षड गर्भ को शाप दिया था 

एक बार उन छहों ऋषिकुमारों ने किसी बात पर ब्रह्मा जी का उपहास (मजाक) उड़ा दिया था।इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया था। वे असुरराज कालनेमि के पुत्र बने, जो बाद में हिरण्यकशिपु के वंश से जुड़े और 'षड-गर्भ' कहलाए। 

हिरण्यकशिपु ने भी श्राप दिया था :- 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये छहों राजकुमार हंस, सुविक्रम, क्रथ, दमन, रिपुमर्दन और क्रोधहंता पूर्व जन्म में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पोते थे। उन्होंने अपने पिता या कुल के विपरीत जाकर ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था। इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपने ही पिता के हाथों अगले जन्म में मारे जाएंगे।

कालनेमि का कंस के रूप में संहारक:- 

वही कालनेमी नामक असुर पुनर्जन्म लेकर मथुरा का क्रूर राजा कंस बना, जो इन छहों भाइयों का पूर्व जन्म में पिता था।श्राप के प्रभाव और अपनी करनी के कारण वे छहों आत्माएं देवकी और वसुदेव के यहाँ 'षद्गर्भ' के रूप में जन्मीं। कंस को भविष्यवाणी से भय था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा, इसलिए उसने देवकी के जन्म लेते ही इन छहों संतानों को एक-एक करके मार डाला।देवकीजी के छ: पुत्रों को जन्म होते ही क्रूर कंस ने एक एक करके मार दिया। 

सातवें भाई बलराम (संकर्षण) बच निकले :-

जब देवकी के छह पुत्रों का नाश हो जाता है, तब यह जानना चाहिए कि सातवाँ पुत्र अनंतदेव के रूप में प्रकट होता है, जो परमेश्वर के निवास, विश्राम स्थल और पलंग, छत्र आदि के रूप में प्रकट होते हैं।देवकी के गर्भ से सातवें बालक के रूप में भगवान बलराम का जन्म हुआ। योगमाया की प्रेरणा से इनका गर्भ देवकी के गर्भ से स्थानांतरित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया था। इन्हें 'संकर्षण' और 'बलभद्र' भी कहा जाता है। 

श्री कृष्ण आठवीं संतान थे -

जिस प्रकार प्रेम-भक्ति के प्रकट होने के बाद स्वयं परमेश्वर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्री भगवान देवकी के आठवें पुत्र के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। यही देवकी के गर्भ में परमेश्वर के प्रकट होने का सार है।आठवीं संतान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। स्वयं भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस का उद्धार किया था। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने पाताल लोक से उनकी आत्माओं को लाकर अपनी माता देवकी को उनके दर्शन भी कराए थे।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा,बस्ती,Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183



Thursday, September 3, 2026

श्रीकृष्ण का अंश (वहन) योगमाया का अवतरण भी जन्माष्टमी को हुआ था ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


योगमाया किसे कहते हैं :-

भगवान की अचिन्त्य शक्ति का नाम ‘योगमाया’ या ‘महामाया’ है।‘अचिन्त्य’ का अर्थ होता है अचिंतनीय । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं। जब भी हम भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को पढ़ते हैं तो अक्सर योगमाया का नाम आता है ।  

भगवान की ऐश्वर्य-शक्ति है योगमाया:-

योगमाया भगवान की अत्यन्त प्रभावशाली वैष्णवी ऐश्वर्य-शक्ति है जिसके वश में सम्पूर्ण जगत रहता है । उसी योगमाया को अपने वश में करके भगवान लीला के लिए दिव्य गुणों के साथ मनुष्य जन्म धारण करते हैं और साधारण मनुष्य से ही प्रतीत होते हैं । इसी मायाशक्ति का नाम योगमाया है ।

असली रूप छिपाकर लीला करते हैं लीलाधारी :-

भगवान जब मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं तब जैसे बहुरूपिया किसी दूसरे स्वांग में लोगों के सामने आता है, उस समय अपना असली रूप छिपा लेता है; वैसे ही भगवान अपनी योगमाया को चारों ओर फैलाकर स्वयं उसमें छिपे रहते हैं । साधारण मनुष्यों की दृष्टि उस माया के परदे से पार नहीं जा सकती; इसलिए अधिकांश लोग उन्हें अपने जैसा ही साधारण मनुष्य मानते हैं । गीता (७।२५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘मैं सबके सामने प्रकाशित क्यों नहीं होता, लोग मुझे पहचानते क्यों नहीं ? क्योंकि मैं योगमाया से अपने को ढका रखता हूँ ।’

भगवत लीला का आयोजन योगमाया द्वारा ही होता है :- 

भगवान की लीला का आयोजन योगमाया ही करती है । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं । यह योगमाया शक्ति वही है, जिसे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में स्वयं अवतरित होने से पूर्व ही अपनी लीला के सम्पादन के लिए भूतल पर भेज दिया था । गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया था -

गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम् ।’ 

‘हे देवि ! आप ग्वालों और गौओं से सुशोभित व्रज में जाओ और मेरा कार्य-संपादन करो।’ 

-(श्रीमद्भागवत १०।२।७) ।

तब योगमाया ने पूछा था-‘भगवन् ! यह व्रज कहां है और वहां क्या करना है ?’

भगवान ने कहा था- ‘देवि ! व्रज-भूमि मेरी अपनी निज भूमि है । मैं अजन्मा होते हुए भी व्रज में जन्म लेता हूँ । नित्य तृप्त होते हुए भी व्रजांगनाओं की छछिया भर छाछ पीने के लिए उनके इशारों पर नाचता हूँ । व्रजवासियों की रूखी-सूखी, ‘अरे’, ‘ओरे’ की बोली (भाषा) मुझे वेद की स्तुति से भी अधिक प्रिय है । मैं परमेश्वर, सर्वेश्वर हूँ; परन्तु वात्सल्यमयी मां यशोदा मुझे प्रेम की डोरी से लपेट कर बांध देती हैं । उसी व्रज के व्रजराज श्रीनन्दबाबा के घर में उनकी धर्मपत्नी यशोदा के गर्भ से तुम्हें कन्या के रूप में प्रकट होना हैं और मैं अपने समस्त ज्ञान, बल, आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा ।’

विविध नामों से पूज्य जाने का बरदान-

भगवान की आज्ञा पाते ही भगवती योगमाया जब व्रजमण्डल में पधारीं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया - ‘सभी लोग तुम्हें देवी मानकर तुम्हारे नाम और स्थान पर मन्दिर बनाएंगे । व्रज में दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा, अम्बिका आदि नामों से तुम विख्यात होगी । तुम लोगों को मुंहमांगे वरदान देने में समर्थ होगी । तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर भक्त घनघोर शब्द करने वाले घण्टों, लम्बी- लम्बी- लाल- पीली- केसरिया ध्वजाओं से एवं गन्ध, अक्षत, फल, फूल, धूप-दीप, मिष्ठान्न, श्रीफल नारियल, भेंट आदि विभिन्न सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे क्योंकि आप ही सर्वकाम वरप्रदायिनी हैं।’ इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के सृजन और विस्तार के लिए योगमाया को रंगमंच तैयार कराने का आदेश दिया था।

   -(श्रीमद्भागवत १०।२।१०-१२)

श्रीकृष्ण की वहन हैं योगमाया :-

द्वापरयुग से जुड़ी यह घटना है। भगवान विष्णु की माया कन्या अष्टभुजी रूप में अपने इष्टदेव के कार्य सिद्धि के लिए अवतरित होती है। अष्टभुजी मां भगवान कृष्ण की बहन के रूप में भी जानी जाती है। पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को पति सहित कारागार में कैद कर लिया था। अपने विनाश के भय से वह देवकी की कोख से जन्म लेने वाले हर बच्चे को वध करता गया। कंस का कारागार, भाद्रप्रद कृष्ण अष्टमी की अर्धनिशा में जब श्रीकृष्णचन्द्र का प्राकट्य हुआ, तब वह चतुर्भुज रूप माता देवकी की प्रार्थना करने पर देखते- ही- देखते शिशु बन गया, बंदीगृह की बेड़ियां ताले स्वत: खुल गए । इसी बीच भगवान श्री कृष्ण की प्रेरणा से ही उनके पालक मां यशोदा के कोख से ज्ञान की देवी अष्टभुजी अवतरित होती है। वसुदेवजी अपने उस हृदयघन को गोकुल में जाकर नन्दभवन में रख आए और यशोदाजी को जन्मी योगमाया को ले आए ।जब कंस उस कन्या का वध करने के लिए शिला पर पटक रहा था, तब वे योगमाया कंस के हाथ से छूट कर गगन में अष्टभुजा हो गईं । उनके हाथ में धनुष, त्रिशूल,बाण,  ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा- ये आठ आयुध थे । 

उस समय योगमाया ने कंस से कहा-‘तेरे पूर्वजन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए किसी स्थान पर पैदा हो चुका है ।’ योगमाया कंस के हाथों से छूट कर विंध्याचल पहाड़ी पर विराजमान होती है और तब से मां विंध्य वासिनी अपने भक्तों को अभय प्रदान कर रही हैं। 

शक्ति-सिद्ध - मणिपीठ है विंध्याचल

मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश- विंध्याचल धाम में सती का कोई अंग नहीं गिरा था। यह मंदिर एक शक्तिपीठ है। पुराणों में विन्ध्याचल को शक्तिपीठ, सिद्धपीठ व मणिपीठ कहा गया है। यह एक पूर्ण पीठ माना जाता है, जहां माता स्वयं विराजमान हैं। योगमाया को विंध्यवासिनी, महामाया और एकानंशा के नाम से भी जाना जाता है, यह एक हिंदू देवी हैं। वैष्णव परंपरा में, उन्हें नारायणी की संज्ञा दी गई है, और वह विष्णु की माया की शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं। भागवत पुराण में देवी को देवी दुर्गा का परोपकारी पहलू माना गया है। शाक्त उन्हें आदि शक्ति का रूप मानते हैं। हिंदू साहित्य में उनका जन्म यादव परिवार में नंद और माता यशोदा की बेटी के रूप में हुआ है। मान्यता है कि यहां देवी दुर्गा ने खुद को स्थापित किया था।विन्ध्य पर्वत माला की आंचलों में स्थित यह विंध्याचल शक्तिपीठ अनादिकाल से ही शक्ति की लीला भूमि रही है। शास़्त्रों के अनुसार देवी सती  के पृष्ठभाग का विपार्थ हुआ था। कहा जाता है कि मां देवी पार्वती ने यहीं पर तप कर अर्पणा नाम पाया व भगवान शिव को प्राप्त किया। इस क्षेत्र को साधना व तपस्या हेतु जागृत प्रदेश माना जाता है। 

नारायण को सुदर्शन चक्र यहीं पर प्राप्त हुआ था:-

विन्ध्य क्षेत्र में ही नारायण ने महादेव की आराधना कर चक्र सुदर्शन प्राप्त किया था। इसके पीछे कथा यह है कि भगवान विष्णु की आराधना से जब महादेव प्रसंन हुए तो बदले में उनका नेत्र मांगा और जैसे ही विष्णु ने चाकू से अपनी आंख निकालने की कोशिश की, महादेव नेे रोक लिया और विश्व कल्याण व सुरक्षा के लिए सुदर्शन चक्र भेंट किया। इसके बाद यहीं पर मां लक्ष्मी ने शिवशंकर की तपस्या की तथा महादेव से स्त्री यौवन व सदैव युवती रहने का वरदान प्राप्त किया। कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के वक्त जब दानव देवों पर भारी पड़ने लगे तब स्वयं देवों के देव महादेव, ब्रह्मा एवं विष्णु ने मां विन्ध्य वासिनी के गर्भगृह में बने कुंड में हजारों साल तक तपस्या कर मां के आर्शीवाद से दानवों को परास्त कर सके थे।

विंध्यवासिनी जागृत शक्तिपीठ है :- 

मां विंध्यवासिनी ऐसी जागृत शक्तिपीठ है, जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर जो तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। शायद यही वजह है जब देवासुर संग्राम के वक्त देवों पर दानव भारी पड़ने लगे तो देवों के देव महादेव, ब्रह्मा व विष्णु ने भी इस धाम में तप की और मां के आर्शीवाद से विजय हासिल की। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं। वे वहां से अन्तर्ध्यान हो गईं हैं। वे ही परमात्मा श्रीकृष्ण की पराशक्ति योगमाया पवित्र भारतभूमि के चारों ओर अनेक नाम व रूपों से निवास कर रहीं हैं । जैसे -

उत्तर में - जम्मू-कश्मीर में वैष्णवी 

पूर्व में -असम में कामाख्यादेवी

दक्षिण में - तमिलनाडु में कन्यका कुमारी

पश्चिम में- गुजरात में अम्बिका माता। 

ये प्रसिद्ध सिद्धपीठ आज भी भारतवर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान हैं । श्रीमद

भागवत के दशम् स्कन्ध में ‘श्रीरास- पंचाध्यायी’ के आरम्भ में ही भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया शक्ति की उपासना की है-

भगवानपि ता रात्री:शरदोत्फुल्लमल्लिका:।

वीक्ष्य रन्तुं मनश्चके योगमायामुपाश्रित: ।

वैसे तो भगवान सर्वसमर्थ हैं, परन्तु जब श्रीकृष्ण ने शरद् पूर्णिमा की धवल रात्रि में व्रजगोपियों के संग रास लीला की, तब वे रासेश्वरी श्रीराधारानी रूप योगमाया के पास गए; क्योंकि बिना योगमाया के रास नही हो सकता था । रस के समूह को ‘रास’ कहते हैं । ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं; किन्तु रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है । योगमाया ने इस रात्रि को छ: माह के बराबर कर दिया था; इसीलिए यह रासलीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी।जीव और ईश्वर का मिलन ही रास लीला है । 

योगमाया के अनेक अर्थ और रूप :-

विद्वानों ने योगमाया के अनेक अर्थ किए हैं । जैसे-भगवान से बिछड़े हुए संसारी जीवों का भगवान के साथ योग कराने, मिलाने के लिए भगवान के हृदय में जो कृपा है, वह योगमाया है । योगमाया ही मुरली नाद है । योगमाया श्रीराधारानी हैं ।

व्रज में योगमाया ‘मां कात्यायनी’ के नाम से जानी जाती हैं । व्रज में श्रीधामवृन्दावन में श्रीराधा बाग स्थित केशवाश्रम में विराजमान मां कात्यायनी श्रीकृष्ण की कृपाशक्ति का ही नाम है । मनुष्य को यदि सौभाग्य, शोभा, सम्पत्ति की कामना हो तो उसे महामाया मां कात्यायनी का दर्शन, सेवा, पूजन, प्रणाम और भजन करना चाहिए । योगमाया मां कात्यायनी ने सभी के मनोरथ पूर्ण किए हैं । व्रज गोपियों ने मां कात्यायनी से अपना अभीष्ट वर मांगा-

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।

नन्दगोपसुतं देवी पतिं मे कुरु ते नम: ।। 

-(श्रीमद्भागवत, १०-२२-४)

हे कात्यायनि ! हे महामाये ! हे महायोगिनि ! हे अधीश्वरि ! हे देवि ! नन्दगोपकुमार श्रीकृष्णचन्द्र को हमारा पति बना दीजिए हम श्रद्धापूर्वक आपको प्रणाम करती हैं। 

महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी ने अपनी ‘सुबोधिनी’ टीका में लिखा है—‘मां कात्यायनी ! आप बड़े भाग वाली हैं, तभी तो भगवान ने आपको व्रज में यशोदाजी के गर्भ में प्रकट होने की आज्ञा दी है । आपको भगवान ने अपनी बहिन बना लिया और वह भी बड़ी बहिन; इसलिए आप महाभागा हैं । आप ही सुयोग बनाने वाली हैं । देवकी के सप्तम गर्भ का आकर्षण करके रोहिणी जी के गर्भ से संकर्षण रूप से प्रकट करने वाली योगिनी आप ही हैं । आप भगवान की अंतरंगा शक्ति है, भगवान पर अधिकार करके आप ही रखती हैं, क्योंकि आप अधीश्वरी हैं ।अत: नंदगोपकुमार श्रीकृष्ण को हमारा पति बना दीजिए। कृष्णरूप फल प्रदान करने वाली देवी, हम आपको प्रणाम करती हैं ।’दु:ख संतप्त मनुष्य का श्रीकृष्ण से अटूट सम्बन्ध कराने में जिनकी कृपा-शक्ति परम आवश्यक है, उन्हीं मां कात्यायनी का आश्रय लेकर मनुष्य परमात्मा श्रीकृष्ण की अविचल भक्ति प्राप्त कर सकता है और जन्म- जन्मान्तरों के कर्म-बंधनों को काटकर भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकता है ।

योगमाया ने दी थी कंस को चेतावनी :-

माँ अष्टभुजी महामाया ने कंस को चेतावनी दी थी- “तुम्हारे जैसा दुष्ट मेरा क्या बिगाड़ लेगा?” तुम्हें मारने वाला पहले ही पैदा हो चुका है।” ऐसा कहकर देवी आकाश की ओर उड़ गईं और विंध्य पर्वत पर उतर गईं, जिसका वर्णन मार्कंडेय ऋषि ने दुर्गा सप्तशती में इस प्रकार किया है ।

"नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ संभव, ततस्तो नष्टयिष्यामि विंध्याचल निवासिनी।

विन्ध्य क्षेत्रे परम् दिव्यम् नास्ति ब्रह्मांड गोलके ।”

अर्थात विन्ध्याचल जैसा स्थान, जहां मां भगवती के तीनों रुप मां लक्ष्मी, मां काली मां सरस्वती एक ऐसे त्रिकोण पर विराजमान है, जो पूरे ब्रहमांड में कहीं नहीं है।

विंध्य वासनी मां के मंदिर की अवस्थिति :-

प्राकृतिक गोद में बसा हुआ मां विंध्य वासनी मंदिर बड़ा दिव्य और रमणीक है। यह स्थान अपने शांत और सुंदर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है। तभी से मां विंध्य वासिनी विंध्य पर्वत पर निवास कर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती आ रही हैं। नवरात्रि के दौरान विंध्यधाम में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। अष्टभुजा देवी मंदिर में अष्टभुजा देवी की पूजा और दर्शन के बिना त्रिकोण परिक्रमा अधूरी है। विंध्य क्षेत्र के एक तरफ आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी हैं, जबकि दूसरी तरफ महाकाली और महासरस्वती (अष्टभुजा देवी) हैं, जो इस क्षेत्र को एक पवित्र तीर्थ स्थल बनाती हैं।

पूरे देश में श्रीकृष्णजन्माष्टमी की धूम:-

देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई जाती है। देश के विभिन्न मंदिरों में खास तैयारियां की जाती हैं और सुबह से ही श्रद्धालुजन मंदिर में कान्हा के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं। भगवान कृष्ण के जन्मस्थली मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी के भव्य तैयारियां होती हैं और भक्तों के लिए खास व्यवस्था की जाती है। लोग अपने घरों को सजाते हैं, दही-हांडी प्रतियोगिता आयोजित करते हैं और भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा करते हैं। यह त्योहार प्रेम, करुणा और सच्चाई के प्रतीक भगवान कृष्ण की याद मेंमनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण को छप्पन भोग लगाया जाता है। साथ ही विशेष पोशाकपहनाकर उनका श्रृंगार भी किया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन व्रत रखने, दान करने और भगवान कृष्ण के मंदिरों में जाने का विशेष महत्व होता है।

भगवान कृष्ण की सहचरी योगमाया देवी के जन्मोत्सव की उपेक्षा क्यों ?

श्री कृष्णा की सहचरी और उनके लक्ष्य की सहायिका के जन्म के क्षण को देश वह सम्मान नहीं दे रहा है जो मिलना चाहिए। "यस्य नार्यस्तु पुजंते रमंते तत्र देवता" 

वाले देश में इस देवी का जन्मोत्सव भी श्री कृष्ण जन्मोत्सव के समान ही मनाया जाना चाहिए। इसमें तनिक भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए। हर श्रीकृष्णा के पंडाल में प्रमुखता के साथ मां जगदंबिका का जन्मोत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया जाना चाहिए।

विंध्यवासिनी के तीन मुख्य स्वरूप :-

विंध्यवासिनी एक मात्र ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। यहां देवी के 3 रूपों का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है. शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदि शक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )

पता मकान नम्बर 8/ 2785, आनंद नगर, कटरा बस्ती। Pin- 2720901 उत्तर प्रदेश।  INDIA 


Saturday, August 29, 2026

दारुक वन गुजरात का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

गुजरात के द्वारका के पास स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे प्राचीन काल में 'दारुक वन' कहा जाता था। यह गुजरात के सौराष्ट्र तट पर द्वारका शहर और भेंट द्वारका द्वीप के बीच में बसा है । नागेश्वर को दारुक वन के नाम से भी जाना जाता था, जो भारत के एक वन का प्राचीन नाम है। भगवान शिव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर, जो भूमिगत गर्भगृह में दुनिया के 12 स्वयंभू ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है।

गुजरात के द्वारकापुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर भगवान शिव का दसवां ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर महादेव स्थित है जिसके दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह इस ज्योतिर्लिंग का अभिषेक साधारण जल से नहीं किया जा सकता। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक केवल गंगाजल से किया जाता है जो कि मंदिर प्रशासन की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। इस मंदिर के बाह्य भाग पर महादेव की एक विशाल प्रतिमा है जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। ये इतनी विशाल है कि मंदिर की ओर जाते हुए ये कई किलोमीटर पहले से ही दिख जाती है।

शिव पुराण के अनुसार, इस वन में दारुक नामक राक्षस और उसकी पत्नी दारुका राज करते थे। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक भयानक राक्षस था जिसका नाम दारुक था। उसकी पत्नी दारुका ने कठिन तपस्या कर देवी पार्वती को प्रसन्न कर लिया और उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि जिस जंगल में वे रहते हैं वहाँ कोई उनसे जीत ना सके एवं वे अपनी इच्छानुसार इस जंगल को अपने साथ ले जा सकें। इस प्रकार के वर को प्राप्त कर उन्होंने पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा दी। वे जहाँ चाहते उस जंगल के साथ पहुँच जाते और अत्याचार करते किन्तु देवी पार्वती के आशीर्वाद के कारण कोई उनका कुछ अहित ना कर पाता। 

जब उनका आतंक हद से अधिक हो गया तो अन्य ऋषि-मुनि महर्षि और्व के पास पहुँचे और उनसे सहायता माँगी। जब ऋषि और्व ने उनका दुःख सुना तो उन्होंने क्रोधित हो दारुक और दारुका को श्राप दे दिया कि अगर वे किसी भी तप में लीन व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।

तब इस श्राप के भय से दारुक और दारुका ने अपने उस जंगल को समुद्र के बीचों बीच स्थित कर दिया और वहाँ से आने वाले व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया।

वहाँ से कुछ दूर नगर में सुप्रिय नाम का एक परम शिवभक्त वैश्य रहता था। एक बार वो अपनी पत्नी सहित व्यापार का सामान लेकर उसी समुद्र से गुजर रहा था कि उस वन में दारुक ने उसे पत्नी सहित बंदी बना लिया। उसपर अनेक अत्याचार किये गए और उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में भी सुप्रिय लगातार भगवान शिव की आराधना करते रहे। 

वैश्य सुप्रिय वहाँ भी अपनी पत्नी सहित भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन हो गया। एक बार दारुक ने उसे शिव पूजा में लीन देखा और क्रोधित हो उसे मारने हेतु उस कारगर में पहुँचा। शस्त्र सहित उस महाभयंकर असुर को देख कर भी सुप्रिय भयभीत नहीं हुआ और अपनी पूजा करता रहा। उसे विश्वास था कि भगवान शिव के रहते उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। 

जब दारुक ने देखा कि सुप्रिय पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने उसे मारने के लिए अपना खड्ग उठाया। तभी उसी जगह सूर्य के तेज को लज्जित करने वाले महारुद्र एक स्वर्ण सिँहासन पर प्रकट हुए। तब दारुक ने भयभीत होते हुए महादेव से कहा - "हे प्रभु! मुझ जैसे साधारण राक्षस को मारने के लिए आप स्वयं यहाँ आये हैं जो सर्वथा उचित नहीं है। आपके और मेरे बल का क्या मेल अतः अगर आप मुझ निर्बल पर प्रहार करेंगे तो ये अन्याय हो जाएगा। अगर ये सुप्रिय आपका इतना बड़ा भक्त है तो इसी को मेरा सामना करने दें।"

तब महादेव ने हँसते हुए सुप्रिय को अपना प्रलयंकारी पाशुपतास्त्र प्रदान किया जिसके प्रहार से सुप्रिय ने क्षण भर में ही दारुक का उसके सभी बंधू-बांधवों सहित नाश कर दिया। तब सुप्रिय ने भगवान शिव से उसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर महादेव वहाँ नागेश्वर नाम से स्थित हो गए। दारुक का विनाश करने के कारण उनका एक नाम दारुक नागेश्वर भी पड़ा। भक्ति भाव से लिप्त सुप्रिय अपनी पत्नी सहित शिवलोक को चला गया। जो कोई भी इस पवित्र तीर्थ का दर्शन करता है उसके समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है और वो निश्चय ही शिवलोक को प्राप्त करता है।

भक्त की अडिग भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध किया। तभी से यह स्थान नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक, बौने ऋषियों के समूह 'बालखिल्य' ने दारुक वन में काफी समय तक भगवान शिव की पूजा की। उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव उनके सामने नग्न अवस्था में प्रकट हुए, जिनके शरीर पर सिर्फ नाग (सांप) थे।

ऋषियों की पत्नियां उस संत से काफी आकर्षित हुईं और अपने पतियों को छोड़कर उनके पीछे चल पड़ीं। इससे ऋषि व्याकुल होने के साथ काफी क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया और तपस्वी को श्राप दिया कि उनका लिंग गिर जाए।

शिवलिंग पृथ्वी पर गिर गया और पूरी दुनिया कांप उठी। भगवान ब्रह्मा और विष्णु उनके पास आए और उनसे पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए अपना लिंग वापस लेने का अनुरोध किया। शिव ने उन्हें सांत्वना दी और अपना लिंग वापस ले लिया।

इस कथा का वर्णन वामन पुराण के 6ठें और 45वें अध्याय में देखने को मिलता है। इसके बाद भगवान शिव ने सदा-सदा के लिए दारुक वन में ज्योतिर्लिंग के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति का वचन दिया।


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की लगभग 125 फीट (25 मीटर) ऊंची भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसके दर्शन दूर से ही हो जाते हैं।

जटिल वास्तुकला और मनमोहक मूर्तियों के साथ मंदिर अपने आप में आध्यात्मिक सुकून का एहसास कराता है। शिव पुराण के मुताबिक, यहाँ दर्शन और आराधना करने से भक्तों को सभी प्रकार के विष, भय और सांप के काटने या कालसर्प दोष आदि से मुक्ति मिलती है और सांसारिक प्रलोभनों से रक्षा होती है।

वैसे तो ये मंदिर और शिवलिंग बहुत प्राचीन है किन्तु वर्तमान के मंदिर का निर्माण टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने 1996 ई में शुरू करवाया किन्तु बीच में उनकी हत्या हो जाने के बाद इसे उनके परिवार ने पूर्ण किया। इसके निर्माण में करीब एक करोड़ पच्चीस लाख का खर्च आया था जिसे गुलशन कुमार चैरिटबल ट्रस्ट ने अदा किया था। टी सीरीज द्वारा बनाये गए कई धार्मिक विडिओ में भी आपको इस मंदिर के दर्शन हो जाएंगे। मूल शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थित है जो काफी बड़े आकर का है। इसके ऊपरी हिस्से पर चाँदी का आवरण चढ़ाया गया और साथ ही साथ शिवलिंग के ऊपर चाँदी द्वारा निर्मित नाग की प्रतिमा है जो इसके नाम को सार्थक करती है। इस शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गयी है।

गर्भगृह में सभी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ केवल वही प्रवेश कर सकते हैं जिन्हे अभिषेक करवाना हो और पुरुष यहाँ केवल धोती धारण करके ही प्रवेश कर सकते हैं। 

इस शिवलिंग के अतिरिक्त भारत में तीन अन्य शिवलिंगों को नागेश्वर कहा जाता है। इसमें से एक हैदराबाद के निकटऔढ़ाग्राम में स्थित है और दूसरा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित शिवलिंग है जिसे नागेश्वर के साथ जागेश्वर महादेव भी कहा जाता है। हालाँकि इन दोनों जगह के स्थानीय निवासी इन्हे ही ज्योतिर्लिंग मानते हैं। अयोध्या में राम जी पुत्र कुश द्वारा स्थापित नागेश्वर नाथ मंदिर का भी इस क्षेत्र में बहुत महत्व है। शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की नगरी द्वारकापुरी के निकट नागेश्वर शिवलिंग को ही वास्तविक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)


श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की कुछ दुर्लभ जानकारी। ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


अयोध्या का श्यामा सदन (जिसे 'श्यामा सदन आश्रम' भी कहा जाता है) रामघाट क्षेत्र के कारसेवक पुरम में एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक विरक्त परंपरा का आश्रम/ मंदिर है । यह स्थान अपनी गहन साधना, संत परंपरा और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। त्याग तपस्या वैराग्य की नगरी अयोध्या में युग युगांतर से भजनानंदी संतो का बास रहा है और अपने त्याग तपस्या, भजन और सेवा के बल पर बड़े ही सरलता और माधुर्य स्वभाव से बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी परास्त कर दिया।
महंत रामदास जी संस्थापक रहे
संत गोपाल दास जी महाराज के गुरु का नाम परम हंस शिरोमणि परम हंशाचार्य 
महंत संत रामदास जी थे। उन्होंने 
Q6W7+RR4 पर 'श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की स्थापना किया था। तब से वहां संत सेवा गौ सेवा और समाज सेवा का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। 
तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज उमरिया बस्ती के मूल निवासी रहे 
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की धरती वशिष्ठनगर बस्ती जनपद में राम जानकी मार्ग चिलमा बाजार के दक्षिण उमरिया गांव में देवरहा बाबा के रूप में एक महान सन्त का जन्म हुआ था। जो अयोध्या से जनकपुर जाने वाले ऐतिहासिक राम जानकी मार्ग के दक्षिण पूण्य सलिला सरयू नदी के तट पर स्थित है। 

इसके अलावा यह उर्वरक भूमि सिद्ध सन्त बाबा निहाल दास और श्यामा सदन अयोध्या के महन्त गोपाल दास और हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास जी जैसे मूर्धन्य विद्वान को भी जना है।महंत राजू दास का जन्म उमरिया गांव के यादव परिवार में हुआ जब वे 4.5 वर्ष के थे तब उनके माता-पिता अयोध्या के हनुमानगढी में छोड़ गए थे। राजू दास का लालन पालन महंत रामदास जी ने किया गुरु के आशीर्वाद और कृपा से उन्होंने मंदिर में रहकर ही शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, उन्होंने साकेत महाविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) और एलएलबी (LLB) की डिग्री हासिल की है। और वह हनुमानगढ़ी के उज्जैनिया पट्टी के महंत संत रामदास के शिष्य बन गए।
      इन्हीं संतों की मणि माला में से श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज थे। उनका साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 को हुआ था। बाबा गोपाल दास ने गौ दान किए थे और प्रभु श्री राम की जन्मस्थली में अपने नश्वर शरीर का परित्याग किया था। उन्होंने अयोध्या धाम न छोड़ने के अपने व्रत का पालन भी किया था। संत गोपाल दास योग के भी अच्छे ज्ञानी रहे। उन्होंने मंदिर का विकास कराया। सभी भक्तों शिष्यों का कल्याण किया। सभी को सही मार्ग प्रदान किया। वे अच्छे निर्मल छवि के रहे। मंदिर के विकास के साथ- साथ संत सेवा गौ सेवा मैं हमेशा लीन रहते थे। मंदिर में निरंतर अष्टयाम सेवा चलती रहती थी।
     श्यामा सदन की विरक्त परंपरा के अनुसार संत गोपाल दास जी आजीवन मंदिर परिसर में ही रहकर साधना करते थे। संत गोपाल दास जी महाराज परमसंत थे। वे धार्मिक विद्वान रहे। कहीं कहीं उनके गुरु लाल जी महराज को कहा गया है।

महंत श्रीधर दास वर्तमान उत्तराधिकारी
श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज के साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 के बाद उनके दो शिष्य
महन्थ गोरखानन्द दास और मंहत श्रीधर दास के मध्य मन्दिर के महंती का विवाद सहायक अभिलेख अधिकारी अयोध्या के न्यायालय और तदोपरांत अयोध्या के जिलाधिकारी न्यायालय में चला था।जिसमें वसीयत के आधार पर महंत श्रीधर दास सम्पत्ति के उत्तराधिकारी घोषित किए गए थे। उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर वर्तमान महंत श्रीधर दास जी महाराज भी आश्रम में निरंतर सत्संग, कथा आयोजन, संत सेवा और गौ सेवा कर रहे है। वे भागवत कथा 
और राम कथा भी करते हैं।उनका यू ट्यूब चैनल भी चलता है।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,PIN - 272001
मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, August 28, 2026

चंद्रहरि मंदिर के कूप पर स्वर्गद्वारी मस्जिद ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

1785 में अयोध्या, जैसा कि घाघरा नदी से देखा गया; विलियम हॉजेस द्वारा चित्रित । इसमें स्वर्गद्वार घाट को दर्शाया गया है। उपरोक्त चित्र के पृष्ठभूमि में औरंगजेब काल की एक मस्जिद दिखाई गई है जो स्वर्गद्वारी मस्जिद प्रतीत होती है।

कुणाल, किशोर के "अयोध्या रिविजिटेड" 2016 , पृ. 439-440 : "यह उल्लेखनीय है कि विलियम हॉजेस, आर.ए., जिन्होंने 1783 में फैजाबाद और अयोध्या का दौरा किया था, ने स्वर्गद्वारी मस्जिद के साथ तटबंध का प्रसिद्ध चित्र बनाया था।

अयोध्या के स्वर्गद्वार के आस-पास में कई प्राचीन मंदिर और पुरातात्विक अवशेष रहे हैं, जिनका इतिहास 11वीं-12वीं शताब्दी या उससे भी पुराना माना जाता है। ब्रिटिश लेखक बाल्फोर के अनुसार ‘अयोध्या की तीन मस्जिदें तीन हिन्दू मन्दिरों पर बनीं। ये मंदिर हैं : जन्म स्थान, स्वर्गद्वार तथा त्रेता का ठाकुर’ ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया एण्ड ऑफ ईस्टर्न एण्ड सदर्न एशिया, पृष्ठ 56)। 


जन्म स्थान के बाबरी मस्जिद पर राम जन्म भूमि मंदिर बन गया है। स्वर्गद्वार के चन्द्र हरि मंदिर के कूप पर नारंगी / स्वर्गद्वारी मस्जिद बना हुआ है । बाद में इस संरचना के बगल में चन्द्र हरि मंदिर को पुनः बनवाया गया है, जो अब भी बरकरार है । स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पौड़ी के तट पर स्थित 'त्रेता का ठाकुर' के पुराने मंदिर के अवशेषों पर औरंगजेब के शासनकाल में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया था। आज भी उस दौर के अवशेष और खंडहर मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से 'त्रेता का ठाकुर मस्जिद' या उससे जुड़े अवशेष के रूप में जाना जाता है। बाद में इस स्थान के समीप ही मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा दूसरा 'त्रेता के ठाकुर' मंदिर का जीर्णोद्धार -निर्माण कराया गया था, जहाँ भगवान राम और उनके दरबार के विग्रह स्थापित हैं।


समयानुसार सरयू नदी के बदलाव और ऐतिहासिक उठापटक के कारण यहाँ के कई प्राचीन स्थल और संरचनाएँ समय के साथ खंडहर में बदल गईं या लुप्त हो गईं। इनका उल्लेख इतिहासकार और ग्रंथों में मिलता है। 

मुगल शासन के तहत , अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था। यह शहर अवध प्रांत की राजधानी था (जिसे अंग्रेजों द्वारा "ओउध" उच्चारित किया जाता था), जिसे "अयोध्या" नाम का एक रूप भी माना जाता है। 

सन् 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, केंद्रीय मुस्लिम शासन कमजोर हो गया और अवध वस्तुतः स्वतंत्र हो गया, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। हालाँकि, शासक स्थानीय हिंदू सरदारों पर तेजी से निर्भर होते चले गए और मंदिरों और तीर्थ केंद्रों पर नियंत्रण शिथिल हो गया।

स्वर्गद्वारी मस्जिद राम की पैड़ी पर अङ्गड़ा चौराहा के पास स्थित है।  औरंगज़ेब ने सन 1680 में अयोध्या में आकर दो मंदिर स्वयं गिरवाए थे उनमें एक त्रेता के ठाकुर और दूसरा स्वर्गद्वार जिनके स्थान पर मस्जिद नुमा ढांचे बनवाए गए, उसी समय का है। यह ढांचा, जो मस्जिद नहीं बल्कि मस्जिदनुमा ढांचा है। समय के साथ उचित रखरखाव न मिलने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण इस इमारत का मुख्य हिस्सा गिर चुका है और अब केवल लखौरी ईंटों से बनी यह मीनार और मुख्य मेहराब का ढांचा ही बचा हुआ है।

पौराणिक महत्व -

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इसका उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इस पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान,हनुमान और परशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या भगवान श्री कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

प्राचीन कूप को ढककर  मीनारनुमा मस्जिद बनी :-

औरंगजेब ने फारसी में मंदिर तोड़ने का आदेश 1669 ईस्वी में दिया था। उसने फरमान जारी कर मुल्तान,काशी अयोध्या और मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने का आदेश दिया था। यह फरमान फारसी भाषा में है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप को तोड़कर उस स्थान पर मीनार बना दी गई है । इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। पहले यह मंदिर परिसर का प्राचीन कुआं रहा करता था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक हो जाते थे। 

स्कंध पुराण में इस स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्गद्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भगवान विष्णु की परम शक्ति का गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक की आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होता है। इसे बाद में नारंगी मस्जिद भी स्थानीय लोग कहते थे । कुछ लोग इसे स्वर्गद्वारी मस्जिद भी कहते हैं।  इसे औरंगजेब ने 1669 में चंद्र हरि विष्णु जी के मंदिर को तोड़वा कर बनवाया था। इसके नीचे चंद्र हरि कूप है।

इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया था और कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई थी जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l  इसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। इसे आसपास के लोगों द्वारा कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर फिदाई खान द्वारा ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। 

फिदाई खान कोका का जन्म मुजफ्फर हुसैन के नाम से हुआ था, एक मुगल सरदार थे जो अवध और लाहौर का गवर्नर था। अवध के सूबेदार इरादत खान की मृत्यु के बाद, उसे अवध और गोरखपुर का फौजदार बना दिया गया। 1674 में सम्राट ने फिदाई खान को काबुल का राज्यपाल नियुक्त किया था, जहाँ उन्होंने स्थानीय कबीलों के विद्रोहों को दबा दिया था। जलालाबाद के पास उन्होंने विद्रोही कबीलों के गाँवों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया था। सम्राट ने उनके प्रयासों की सराहना की और उन्हें अज़ीम खान कोका की उपाधि दी। 1676 में उन्हें दरबार में वापस बुलाया गया और बंगाल का गवर्नर  बनाया गया। 

अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और बिहार पटना  के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)