Saturday, September 5, 2026

श्रीकृष्ण के षडगर्भ भाइयों की अजूबा दास्तान ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


ब्रह्मा पुत्र मरीचि की संतानें :-

मरीचि ब्रह्मा के मानसपुत्र थे। इन्हें ब्रह्मा जी के मन या नेत्र से उत्पन्न हुआ माना जाता है। ये ब्रह्मा जी के दस मुख्य प्रजापतियों में गिने जाते हैं, जिन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा गया था। इनका विवाह कला या संभूति, पूर्णिमा और ऊर्णा से हुआ था। कला पत्नी से मरीचि के दो पुत्र कश्यप और पूर्णमवास हुए थे। कश्यप ऋषि से ही आगे चलकर देवता, असुर, और समस्त जीव-जंतुओं की उत्पत्ति हुई।

ऊर्णा मरीचि की दूसरी पत्नी थीं। ऊर्णा के छह पुत्र थे। उन्होंने ब्रह्मा को अपनी पुत्री के पीछे भागते देखकर हँसी उड़ाई। एक महान व्यक्तित्व का अपमान करने के इस अपराध के कारण, उन्हें राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा। ब्रह्मा के श्राप के कारण वे पहले हिरणाक्ष के पौत्र और कालनेमी के पुत्रों के रूप में और अगले जन्म में वासुदेव और देवकी के पुत्रों के रूप में पैदा हुए । ये छह बच्चे ही श्री कृष्ण के बड़े भाई ‘षडगर्भ’ कहलाए थे, जिन्हें कंस ने जन्म के तुरंत बाद मार डाला था।

जय और विजय हिरणाक्ष और हिरण्यकशिपु हुए थे -

हिरणाक्ष महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। उसका उद्धार वराह अवतार में बिष्णु जी ने किया था। वह हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई था जिसका वध बाद में भगवान विष्णु जी ने नृसिंह अवतार लेकर किया था। हिरणाक्ष की एक बहन भी थी जिसका नाम होलिका था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु असल में वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। चार कुमारों सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा था।

हिरण्याक्ष हिंदू पौराणिक कथाओं सनातन धर्म में एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य (राक्षस) था, जिसका वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार (सूअर के रूप) में किया था। भागवत पुराण) के अनुसार एक अन्य कालनेमि विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का पौत्र (तथा हिरण्यकशिपु का भतीजा था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही असुर कालनेमि बाद में द्वापरयुग में मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के रूप में पैदा हुआ था, जिसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। 

षडगर्भ भाइ कालनेमी के पुत्र रहे -

कालनेमी के छह पुत्र थे: हंस, सुविक्रम, क्रथा, दमना, रिपुरमर्दना और क्रोधहंत। इन्हे हिरण्यकशिपु का श्राप था। हरि-वंश (विष्णु-पर्व का द्वितीय अध्याय) में लिखा है कि हंस, सुविक्रम, क्रत, दमन, रिपु-मर्दन और क्रोध-हंता, जिन्हें षड-गर्भ (छह अजन्मे बच्चे) के रूप में जाना जाता है, राक्षस कालनेमि के पुत्र हैं। उन्होंने अपने दादा हिरण्यकशिपु को बिना बताए, सर्वपिता ब्रह्मा की उपासना के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्मा उनकी अत्यावश्यकता से प्रसन्न होकर, उनकी प्रार्थनाओं के अनुसार उन्हें मृत्यु से सुरक्षा का वरदान प्रदान किया। बाद में, जब हिरण्यकशिपु को इस घटना के बारे में पता चला, तो वह क्रोधित हो गया और बोला, “तुमने मुझे बिना बताए ब्रह्मा की पूजा की है, इसलिए मैं तुम जैसे धृष्ट लोगों से कोई स्नेह नहीं रखता। तुम्हारे पिता स्वयं तुम सबको मार डालेंगे। अगले जन्म में तुम छहों देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और तुम्हारे पिता कालनेमि कंस के रूप में जन्म लेंगे। वही कंस तुम्हारा हत्यारा होगा।” हिरण्यकशिपु के इस श्राप के कारण वे देवकी के गर्भ में जन्म लिए और कालनेमि के अवतार कंस द्वारा मारे गए।

श्री कृष्ण ने मां को षडगर्भ पुत्रों का दर्शन कराया था -

श्रीमद्-भागवत (10.85.47-57) में उल्लेख है कि माता देवकी की प्रार्थना के कारण श्री राम और श्री कृष्ण उनके छह मृत पुत्रों को श्री बलिराज की सुतल-पुरी से वापस लाए थे। सुतलपुरी जाने के बाद श्री कृष्ण ने दैत्यों के राजा बलि से कहा, “हे दैत्यों के स्वामी, स्वायंभुव के मन्वंतर में महर्षि मरीचि की पत्नी ऊर्णा देवी के गर्भ से छह देव जैसे पुत्र उत्पन्न हुए। ब्रह्मा को अपनी पुत्री (सरस्वती) के पीछे भागते देख उन्होंने उनका उपहास किया। इस पाप के फलस्वरूप – हिरण्यकशिपु के भाई के पुत्र कालनेमि के पुत्रों के रूप में राक्षसी योनि में जन्म लिया। फिर वहाँ से योगमाया के द्वारा उन्हें देवकी के गर्भ में जन्म लेने के लिए विवश किया गया और कंस द्वारा मार डाला गया। माता देवकी उनके लिए शोक मना रही है, उन्हें अपने पुत्रों के समान मानती है। वे इस समय आपके धाम में निवास कर रहे हैं। उनके मातृ शोक को कम करने के लिए मैं उन्हें इस स्थान से उनकी माता से मिलाने के लिए ले जाऊँगा। अंततः, वे अपने श्राप और शोक से मुक्त होकर देवताओं के लोकों में लौट जाएँगे। 

ब्रह्मा की तपस्या और श्राप दोनों मिला-

ब्रह्मा की तपस्या करने के कारण, उनके दादा हिरण्यकशिपु ने पहले उन्हें पाताल में लंबे समय तक सोने का श्राप दिया, और फिर उनके श्राप को बदलकर उन्हें देवकी के पहले छह पुत्रों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश दिया । पिता, कालनेमी, उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और उनके मामा होंगे, जो जन्म के तुरंत बाद उन सभी की हत्या कर देंगे। भागवत पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, देवकी के पहले छह पुत्रों को जन्म लेते ही अत्याचारी कंस ने मार दिया था। कारागार में जन्म होने और मृत्यु के भय के कारण इनका नामकरण संस्कार नहीं हो पाया था।श्रीकृष्ण के वे छह भाई, जिन्हें 'षद्गर्भ' कहा जाता है, कंस द्वारा अपने जन्म के तुरंत बाद मार दिए जाने के कारण अल्पायु रहे। इसके पीछे पौराणिक कथा यह है कि वे पूर्व जन्म में मरीचि ऋषि के पुत्र थे और उन्हें हिरण्यकशिपु का श्राप मिला था। हरिवंश पुराण के अनुसार, ये प्रत्यूष वसु के पुत्र थे। इन्हें देवर्षि और वेदों-उपनिषदों का मर्मज्ञ माना गया है।

ब्रह्मा जी ने षड गर्भ को शाप दिया था 

एक बार उन छहों ऋषिकुमारों ने किसी बात पर ब्रह्मा जी का उपहास (मजाक) उड़ा दिया था।इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया था। वे असुरराज कालनेमि के पुत्र बने, जो बाद में हिरण्यकशिपु के वंश से जुड़े और 'षड-गर्भ' कहलाए। 

हिरण्यकशिपु ने भी श्राप दिया था :- 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये छहों राजकुमार हंस, सुविक्रम, क्रथ, दमन, रिपुमर्दन और क्रोधहंता पूर्व जन्म में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पोते थे। उन्होंने अपने पिता या कुल के विपरीत जाकर ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था। इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपने ही पिता के हाथों अगले जन्म में मारे जाएंगे।

कालनेमि का कंस के रूप में संहारक:- 

वही कालनेमी नामक असुर पुनर्जन्म लेकर मथुरा का क्रूर राजा कंस बना, जो इन छहों भाइयों का पूर्व जन्म में पिता था।श्राप के प्रभाव और अपनी करनी के कारण वे छहों आत्माएं देवकी और वसुदेव के यहाँ 'षद्गर्भ' के रूप में जन्मीं। कंस को भविष्यवाणी से भय था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा, इसलिए उसने देवकी के जन्म लेते ही इन छहों संतानों को एक-एक करके मार डाला।देवकीजी के छ: पुत्रों को जन्म होते ही क्रूर कंस ने एक एक करके मार दिया। 

सातवें भाई बलराम (संकर्षण) बच निकले :-

जब देवकी के छह पुत्रों का नाश हो जाता है, तब यह जानना चाहिए कि सातवाँ पुत्र अनंतदेव के रूप में प्रकट होता है, जो परमेश्वर के निवास, विश्राम स्थल और पलंग, छत्र आदि के रूप में प्रकट होते हैं।देवकी के गर्भ से सातवें बालक के रूप में भगवान बलराम का जन्म हुआ। योगमाया की प्रेरणा से इनका गर्भ देवकी के गर्भ से स्थानांतरित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया था। इन्हें 'संकर्षण' और 'बलभद्र' भी कहा जाता है। 

श्री कृष्ण आठवीं संतान थे -

जिस प्रकार प्रेम-भक्ति के प्रकट होने के बाद स्वयं परमेश्वर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्री भगवान देवकी के आठवें पुत्र के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। यही देवकी के गर्भ में परमेश्वर के प्रकट होने का सार है।आठवीं संतान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। स्वयं भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस का उद्धार किया था। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने पाताल लोक से उनकी आत्माओं को लाकर अपनी माता देवकी को उनके दर्शन भी कराए थे।



लेखक -

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा,बस्ती,Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA 

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Thursday, September 3, 2026

श्रीकृष्ण का अंश (वहन) योगमाया का अवतरण भी जन्माष्टमी को हुआ था ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


योगमाया किसे कहते हैं :-

भगवान की अचिन्त्य शक्ति का नाम ‘योगमाया’ या ‘महामाया’ है।‘अचिन्त्य’ का अर्थ होता है अचिंतनीय । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं। जब भी हम भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को पढ़ते हैं तो अक्सर योगमाया का नाम आता है ।  

भगवान की ऐश्वर्य-शक्ति है योगमाया:-

योगमाया भगवान की अत्यन्त प्रभावशाली वैष्णवी ऐश्वर्य-शक्ति है जिसके वश में सम्पूर्ण जगत रहता है । उसी योगमाया को अपने वश में करके भगवान लीला के लिए दिव्य गुणों के साथ मनुष्य जन्म धारण करते हैं और साधारण मनुष्य से ही प्रतीत होते हैं । इसी मायाशक्ति का नाम योगमाया है ।

असली रूप छिपाकर लीला करते हैं लीलाधारी :-

भगवान जब मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं तब जैसे बहुरूपिया किसी दूसरे स्वांग में लोगों के सामने आता है, उस समय अपना असली रूप छिपा लेता है; वैसे ही भगवान अपनी योगमाया को चारों ओर फैलाकर स्वयं उसमें छिपे रहते हैं । साधारण मनुष्यों की दृष्टि उस माया के परदे से पार नहीं जा सकती; इसलिए अधिकांश लोग उन्हें अपने जैसा ही साधारण मनुष्य मानते हैं । गीता (७।२५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘मैं सबके सामने प्रकाशित क्यों नहीं होता, लोग मुझे पहचानते क्यों नहीं ? क्योंकि मैं योगमाया से अपने को ढका रखता हूँ ।’

भगवत लीला का आयोजन योगमाया द्वारा ही होता है :- 

भगवान की लीला का आयोजन योगमाया ही करती है । भगवान की लीला के लिए पहले से ही मंच, पात्र आदि तैयार कर देना, संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया ही करती हैं । यह योगमाया शक्ति वही है, जिसे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में स्वयं अवतरित होने से पूर्व ही अपनी लीला के सम्पादन के लिए भूतल पर भेज दिया था । गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया था -

गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम् ।’ 

‘हे देवि ! आप ग्वालों और गौओं से सुशोभित व्रज में जाओ और मेरा कार्य-संपादन करो।’ 

-(श्रीमद्भागवत १०।२।७) ।

तब योगमाया ने पूछा था-‘भगवन् ! यह व्रज कहां है और वहां क्या करना है ?’

भगवान ने कहा था- ‘देवि ! व्रज-भूमि मेरी अपनी निज भूमि है । मैं अजन्मा होते हुए भी व्रज में जन्म लेता हूँ । नित्य तृप्त होते हुए भी व्रजांगनाओं की छछिया भर छाछ पीने के लिए उनके इशारों पर नाचता हूँ । व्रजवासियों की रूखी-सूखी, ‘अरे’, ‘ओरे’ की बोली (भाषा) मुझे वेद की स्तुति से भी अधिक प्रिय है । मैं परमेश्वर, सर्वेश्वर हूँ; परन्तु वात्सल्यमयी मां यशोदा मुझे प्रेम की डोरी से लपेट कर बांध देती हैं । उसी व्रज के व्रजराज श्रीनन्दबाबा के घर में उनकी धर्मपत्नी यशोदा के गर्भ से तुम्हें कन्या के रूप में प्रकट होना हैं और मैं अपने समस्त ज्ञान, बल, आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूंगा ।’

विविध नामों से पूज्य जाने का बरदान-

भगवान की आज्ञा पाते ही भगवती योगमाया जब व्रजमण्डल में पधारीं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया - ‘सभी लोग तुम्हें देवी मानकर तुम्हारे नाम और स्थान पर मन्दिर बनाएंगे । व्रज में दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा, अम्बिका आदि नामों से तुम विख्यात होगी । तुम लोगों को मुंहमांगे वरदान देने में समर्थ होगी । तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर भक्त घनघोर शब्द करने वाले घण्टों, लम्बी- लम्बी- लाल- पीली- केसरिया ध्वजाओं से एवं गन्ध, अक्षत, फल, फूल, धूप-दीप, मिष्ठान्न, श्रीफल नारियल, भेंट आदि विभिन्न सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे क्योंकि आप ही सर्वकाम वरप्रदायिनी हैं।’ इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के सृजन और विस्तार के लिए योगमाया को रंगमंच तैयार कराने का आदेश दिया था।

   -(श्रीमद्भागवत १०।२।१०-१२)

श्रीकृष्ण की वहन हैं योगमाया :-

द्वापरयुग से जुड़ी यह घटना है। भगवान विष्णु की माया कन्या अष्टभुजी रूप में अपने इष्टदेव के कार्य सिद्धि के लिए अवतरित होती है। अष्टभुजी मां भगवान कृष्ण की बहन के रूप में भी जानी जाती है। पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को पति सहित कारागार में कैद कर लिया था। अपने विनाश के भय से वह देवकी की कोख से जन्म लेने वाले हर बच्चे को वध करता गया। कंस का कारागार, भाद्रप्रद कृष्ण अष्टमी की अर्धनिशा में जब श्रीकृष्णचन्द्र का प्राकट्य हुआ, तब वह चतुर्भुज रूप माता देवकी की प्रार्थना करने पर देखते- ही- देखते शिशु बन गया, बंदीगृह की बेड़ियां ताले स्वत: खुल गए । इसी बीच भगवान श्री कृष्ण की प्रेरणा से ही उनके पालक मां यशोदा के कोख से ज्ञान की देवी अष्टभुजी अवतरित होती है। वसुदेवजी अपने उस हृदयघन को गोकुल में जाकर नन्दभवन में रख आए और यशोदाजी को जन्मी योगमाया को ले आए ।जब कंस उस कन्या का वध करने के लिए शिला पर पटक रहा था, तब वे योगमाया कंस के हाथ से छूट कर गगन में अष्टभुजा हो गईं । उनके हाथ में धनुष, त्रिशूल,बाण,  ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा- ये आठ आयुध थे । 

उस समय योगमाया ने कंस से कहा-‘तेरे पूर्वजन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए किसी स्थान पर पैदा हो चुका है ।’ योगमाया कंस के हाथों से छूट कर विंध्याचल पहाड़ी पर विराजमान होती है और तब से मां विंध्य वासिनी अपने भक्तों को अभय प्रदान कर रही हैं। 

शक्ति-सिद्ध - मणिपीठ है विंध्याचल

मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश- विंध्याचल धाम में सती का कोई अंग नहीं गिरा था। यह मंदिर एक शक्तिपीठ है। पुराणों में विन्ध्याचल को शक्तिपीठ, सिद्धपीठ व मणिपीठ कहा गया है। यह एक पूर्ण पीठ माना जाता है, जहां माता स्वयं विराजमान हैं। योगमाया को विंध्यवासिनी, महामाया और एकानंशा के नाम से भी जाना जाता है, यह एक हिंदू देवी हैं। वैष्णव परंपरा में, उन्हें नारायणी की संज्ञा दी गई है, और वह विष्णु की माया की शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं। भागवत पुराण में देवी को देवी दुर्गा का परोपकारी पहलू माना गया है। शाक्त उन्हें आदि शक्ति का रूप मानते हैं। हिंदू साहित्य में उनका जन्म यादव परिवार में नंद और माता यशोदा की बेटी के रूप में हुआ है। मान्यता है कि यहां देवी दुर्गा ने खुद को स्थापित किया था।विन्ध्य पर्वत माला की आंचलों में स्थित यह विंध्याचल शक्तिपीठ अनादिकाल से ही शक्ति की लीला भूमि रही है। शास़्त्रों के अनुसार देवी सती  के पृष्ठभाग का विपार्थ हुआ था। कहा जाता है कि मां देवी पार्वती ने यहीं पर तप कर अर्पणा नाम पाया व भगवान शिव को प्राप्त किया। इस क्षेत्र को साधना व तपस्या हेतु जागृत प्रदेश माना जाता है। 

नारायण को सुदर्शन चक्र यहीं पर प्राप्त हुआ था:-

विन्ध्य क्षेत्र में ही नारायण ने महादेव की आराधना कर चक्र सुदर्शन प्राप्त किया था। इसके पीछे कथा यह है कि भगवान विष्णु की आराधना से जब महादेव प्रसंन हुए तो बदले में उनका नेत्र मांगा और जैसे ही विष्णु ने चाकू से अपनी आंख निकालने की कोशिश की, महादेव नेे रोक लिया और विश्व कल्याण व सुरक्षा के लिए सुदर्शन चक्र भेंट किया। इसके बाद यहीं पर मां लक्ष्मी ने शिवशंकर की तपस्या की तथा महादेव से स्त्री यौवन व सदैव युवती रहने का वरदान प्राप्त किया। कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के वक्त जब दानव देवों पर भारी पड़ने लगे तब स्वयं देवों के देव महादेव, ब्रह्मा एवं विष्णु ने मां विन्ध्य वासिनी के गर्भगृह में बने कुंड में हजारों साल तक तपस्या कर मां के आर्शीवाद से दानवों को परास्त कर सके थे।

विंध्यवासिनी जागृत शक्तिपीठ है :- 

मां विंध्यवासिनी ऐसी जागृत शक्तिपीठ है, जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर जो तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। शायद यही वजह है जब देवासुर संग्राम के वक्त देवों पर दानव भारी पड़ने लगे तो देवों के देव महादेव, ब्रह्मा व विष्णु ने भी इस धाम में तप की और मां के आर्शीवाद से विजय हासिल की। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं। वे वहां से अन्तर्ध्यान हो गईं हैं। वे ही परमात्मा श्रीकृष्ण की पराशक्ति योगमाया पवित्र भारतभूमि के चारों ओर अनेक नाम व रूपों से निवास कर रहीं हैं । जैसे -

उत्तर में - जम्मू-कश्मीर में वैष्णवी 

पूर्व में -असम में कामाख्यादेवी

दक्षिण में - तमिलनाडु में कन्यका कुमारी

पश्चिम में- गुजरात में अम्बिका माता। 

ये प्रसिद्ध सिद्धपीठ आज भी भारतवर्ष की चारों दिशाओं में विद्यमान हैं । श्रीमद

भागवत के दशम् स्कन्ध में ‘श्रीरास- पंचाध्यायी’ के आरम्भ में ही भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया शक्ति की उपासना की है-

भगवानपि ता रात्री:शरदोत्फुल्लमल्लिका:।

वीक्ष्य रन्तुं मनश्चके योगमायामुपाश्रित: ।

वैसे तो भगवान सर्वसमर्थ हैं, परन्तु जब श्रीकृष्ण ने शरद् पूर्णिमा की धवल रात्रि में व्रजगोपियों के संग रास लीला की, तब वे रासेश्वरी श्रीराधारानी रूप योगमाया के पास गए; क्योंकि बिना योगमाया के रास नही हो सकता था । रस के समूह को ‘रास’ कहते हैं । ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं; किन्तु रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है । योगमाया ने इस रात्रि को छ: माह के बराबर कर दिया था; इसीलिए यह रासलीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी।जीव और ईश्वर का मिलन ही रास लीला है । 

योगमाया के अनेक अर्थ और रूप :-

विद्वानों ने योगमाया के अनेक अर्थ किए हैं । जैसे-भगवान से बिछड़े हुए संसारी जीवों का भगवान के साथ योग कराने, मिलाने के लिए भगवान के हृदय में जो कृपा है, वह योगमाया है । योगमाया ही मुरली नाद है । योगमाया श्रीराधारानी हैं ।

व्रज में योगमाया ‘मां कात्यायनी’ के नाम से जानी जाती हैं । व्रज में श्रीधामवृन्दावन में श्रीराधा बाग स्थित केशवाश्रम में विराजमान मां कात्यायनी श्रीकृष्ण की कृपाशक्ति का ही नाम है । मनुष्य को यदि सौभाग्य, शोभा, सम्पत्ति की कामना हो तो उसे महामाया मां कात्यायनी का दर्शन, सेवा, पूजन, प्रणाम और भजन करना चाहिए । योगमाया मां कात्यायनी ने सभी के मनोरथ पूर्ण किए हैं । व्रज गोपियों ने मां कात्यायनी से अपना अभीष्ट वर मांगा-

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।

नन्दगोपसुतं देवी पतिं मे कुरु ते नम: ।। 

-(श्रीमद्भागवत, १०-२२-४)

हे कात्यायनि ! हे महामाये ! हे महायोगिनि ! हे अधीश्वरि ! हे देवि ! नन्दगोपकुमार श्रीकृष्णचन्द्र को हमारा पति बना दीजिए हम श्रद्धापूर्वक आपको प्रणाम करती हैं। 

महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी ने अपनी ‘सुबोधिनी’ टीका में लिखा है—‘मां कात्यायनी ! आप बड़े भाग वाली हैं, तभी तो भगवान ने आपको व्रज में यशोदाजी के गर्भ में प्रकट होने की आज्ञा दी है । आपको भगवान ने अपनी बहिन बना लिया और वह भी बड़ी बहिन; इसलिए आप महाभागा हैं । आप ही सुयोग बनाने वाली हैं । देवकी के सप्तम गर्भ का आकर्षण करके रोहिणी जी के गर्भ से संकर्षण रूप से प्रकट करने वाली योगिनी आप ही हैं । आप भगवान की अंतरंगा शक्ति है, भगवान पर अधिकार करके आप ही रखती हैं, क्योंकि आप अधीश्वरी हैं ।अत: नंदगोपकुमार श्रीकृष्ण को हमारा पति बना दीजिए। कृष्णरूप फल प्रदान करने वाली देवी, हम आपको प्रणाम करती हैं ।’दु:ख संतप्त मनुष्य का श्रीकृष्ण से अटूट सम्बन्ध कराने में जिनकी कृपा-शक्ति परम आवश्यक है, उन्हीं मां कात्यायनी का आश्रय लेकर मनुष्य परमात्मा श्रीकृष्ण की अविचल भक्ति प्राप्त कर सकता है और जन्म- जन्मान्तरों के कर्म-बंधनों को काटकर भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकता है ।

योगमाया ने दी थी कंस को चेतावनी :-

माँ अष्टभुजी महामाया ने कंस को चेतावनी दी थी- “तुम्हारे जैसा दुष्ट मेरा क्या बिगाड़ लेगा?” तुम्हें मारने वाला पहले ही पैदा हो चुका है।” ऐसा कहकर देवी आकाश की ओर उड़ गईं और विंध्य पर्वत पर उतर गईं, जिसका वर्णन मार्कंडेय ऋषि ने दुर्गा सप्तशती में इस प्रकार किया है ।

"नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ संभव, ततस्तो नष्टयिष्यामि विंध्याचल निवासिनी।

विन्ध्य क्षेत्रे परम् दिव्यम् नास्ति ब्रह्मांड गोलके ।”

अर्थात विन्ध्याचल जैसा स्थान, जहां मां भगवती के तीनों रुप मां लक्ष्मी, मां काली मां सरस्वती एक ऐसे त्रिकोण पर विराजमान है, जो पूरे ब्रहमांड में कहीं नहीं है।

विंध्य वासनी मां के मंदिर की अवस्थिति :-

प्राकृतिक गोद में बसा हुआ मां विंध्य वासनी मंदिर बड़ा दिव्य और रमणीक है। यह स्थान अपने शांत और सुंदर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है। तभी से मां विंध्य वासिनी विंध्य पर्वत पर निवास कर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती आ रही हैं। नवरात्रि के दौरान विंध्यधाम में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। अष्टभुजा देवी मंदिर में अष्टभुजा देवी की पूजा और दर्शन के बिना त्रिकोण परिक्रमा अधूरी है। विंध्य क्षेत्र के एक तरफ आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी हैं, जबकि दूसरी तरफ महाकाली और महासरस्वती (अष्टभुजा देवी) हैं, जो इस क्षेत्र को एक पवित्र तीर्थ स्थल बनाती हैं।

पूरे देश में श्रीकृष्णजन्माष्टमी की धूम:-

देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई जाती है। देश के विभिन्न मंदिरों में खास तैयारियां की जाती हैं और सुबह से ही श्रद्धालुजन मंदिर में कान्हा के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं। भगवान कृष्ण के जन्मस्थली मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी के भव्य तैयारियां होती हैं और भक्तों के लिए खास व्यवस्था की जाती है। लोग अपने घरों को सजाते हैं, दही-हांडी प्रतियोगिता आयोजित करते हैं और भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा करते हैं। यह त्योहार प्रेम, करुणा और सच्चाई के प्रतीक भगवान कृष्ण की याद मेंमनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण को छप्पन भोग लगाया जाता है। साथ ही विशेष पोशाकपहनाकर उनका श्रृंगार भी किया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन व्रत रखने, दान करने और भगवान कृष्ण के मंदिरों में जाने का विशेष महत्व होता है।

भगवान कृष्ण की सहचरी योगमाया देवी के जन्मोत्सव की उपेक्षा क्यों ?

श्री कृष्णा की सहचरी और उनके लक्ष्य की सहायिका के जन्म के क्षण को देश वह सम्मान नहीं दे रहा है जो मिलना चाहिए। "यस्य नार्यस्तु पुजंते रमंते तत्र देवता" 

वाले देश में इस देवी का जन्मोत्सव भी श्री कृष्ण जन्मोत्सव के समान ही मनाया जाना चाहिए। इसमें तनिक भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए। हर श्रीकृष्णा के पंडाल में प्रमुखता के साथ मां जगदंबिका का जन्मोत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया जाना चाहिए।

विंध्यवासिनी के तीन मुख्य स्वरूप :-

विंध्यवासिनी एक मात्र ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। यहां देवी के 3 रूपों का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है. शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदि शक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )

पता मकान नम्बर 8/ 2785, आनंद नगर, कटरा बस्ती। Pin- 2720901 उत्तर प्रदेश।  INDIA 


Saturday, August 29, 2026

दारुक वन गुजरात का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

गुजरात के द्वारका के पास स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे प्राचीन काल में 'दारुक वन' कहा जाता था। यह गुजरात के सौराष्ट्र तट पर द्वारका शहर और भेंट द्वारका द्वीप के बीच में बसा है । नागेश्वर को दारुक वन के नाम से भी जाना जाता था, जो भारत के एक वन का प्राचीन नाम है। भगवान शिव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर, जो भूमिगत गर्भगृह में दुनिया के 12 स्वयंभू ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है।

गुजरात के द्वारकापुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर भगवान शिव का दसवां ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर महादेव स्थित है जिसके दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह इस ज्योतिर्लिंग का अभिषेक साधारण जल से नहीं किया जा सकता। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक केवल गंगाजल से किया जाता है जो कि मंदिर प्रशासन की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। इस मंदिर के बाह्य भाग पर महादेव की एक विशाल प्रतिमा है जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। ये इतनी विशाल है कि मंदिर की ओर जाते हुए ये कई किलोमीटर पहले से ही दिख जाती है।

शिव पुराण के अनुसार, इस वन में दारुक नामक राक्षस और उसकी पत्नी दारुका राज करते थे। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक भयानक राक्षस था जिसका नाम दारुक था। उसकी पत्नी दारुका ने कठिन तपस्या कर देवी पार्वती को प्रसन्न कर लिया और उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि जिस जंगल में वे रहते हैं वहाँ कोई उनसे जीत ना सके एवं वे अपनी इच्छानुसार इस जंगल को अपने साथ ले जा सकें। इस प्रकार के वर को प्राप्त कर उन्होंने पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा दी। वे जहाँ चाहते उस जंगल के साथ पहुँच जाते और अत्याचार करते किन्तु देवी पार्वती के आशीर्वाद के कारण कोई उनका कुछ अहित ना कर पाता। 

जब उनका आतंक हद से अधिक हो गया तो अन्य ऋषि-मुनि महर्षि और्व के पास पहुँचे और उनसे सहायता माँगी। जब ऋषि और्व ने उनका दुःख सुना तो उन्होंने क्रोधित हो दारुक और दारुका को श्राप दे दिया कि अगर वे किसी भी तप में लीन व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।

तब इस श्राप के भय से दारुक और दारुका ने अपने उस जंगल को समुद्र के बीचों बीच स्थित कर दिया और वहाँ से आने वाले व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया।

वहाँ से कुछ दूर नगर में सुप्रिय नाम का एक परम शिवभक्त वैश्य रहता था। एक बार वो अपनी पत्नी सहित व्यापार का सामान लेकर उसी समुद्र से गुजर रहा था कि उस वन में दारुक ने उसे पत्नी सहित बंदी बना लिया। उसपर अनेक अत्याचार किये गए और उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में भी सुप्रिय लगातार भगवान शिव की आराधना करते रहे। 

वैश्य सुप्रिय वहाँ भी अपनी पत्नी सहित भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन हो गया। एक बार दारुक ने उसे शिव पूजा में लीन देखा और क्रोधित हो उसे मारने हेतु उस कारगर में पहुँचा। शस्त्र सहित उस महाभयंकर असुर को देख कर भी सुप्रिय भयभीत नहीं हुआ और अपनी पूजा करता रहा। उसे विश्वास था कि भगवान शिव के रहते उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। 

जब दारुक ने देखा कि सुप्रिय पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने उसे मारने के लिए अपना खड्ग उठाया। तभी उसी जगह सूर्य के तेज को लज्जित करने वाले महारुद्र एक स्वर्ण सिँहासन पर प्रकट हुए। तब दारुक ने भयभीत होते हुए महादेव से कहा - "हे प्रभु! मुझ जैसे साधारण राक्षस को मारने के लिए आप स्वयं यहाँ आये हैं जो सर्वथा उचित नहीं है। आपके और मेरे बल का क्या मेल अतः अगर आप मुझ निर्बल पर प्रहार करेंगे तो ये अन्याय हो जाएगा। अगर ये सुप्रिय आपका इतना बड़ा भक्त है तो इसी को मेरा सामना करने दें।"

तब महादेव ने हँसते हुए सुप्रिय को अपना प्रलयंकारी पाशुपतास्त्र प्रदान किया जिसके प्रहार से सुप्रिय ने क्षण भर में ही दारुक का उसके सभी बंधू-बांधवों सहित नाश कर दिया। तब सुप्रिय ने भगवान शिव से उसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर महादेव वहाँ नागेश्वर नाम से स्थित हो गए। दारुक का विनाश करने के कारण उनका एक नाम दारुक नागेश्वर भी पड़ा। भक्ति भाव से लिप्त सुप्रिय अपनी पत्नी सहित शिवलोक को चला गया। जो कोई भी इस पवित्र तीर्थ का दर्शन करता है उसके समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है और वो निश्चय ही शिवलोक को प्राप्त करता है।

भक्त की अडिग भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध किया। तभी से यह स्थान नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक, बौने ऋषियों के समूह 'बालखिल्य' ने दारुक वन में काफी समय तक भगवान शिव की पूजा की। उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव उनके सामने नग्न अवस्था में प्रकट हुए, जिनके शरीर पर सिर्फ नाग (सांप) थे।

ऋषियों की पत्नियां उस संत से काफी आकर्षित हुईं और अपने पतियों को छोड़कर उनके पीछे चल पड़ीं। इससे ऋषि व्याकुल होने के साथ काफी क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया और तपस्वी को श्राप दिया कि उनका लिंग गिर जाए।

शिवलिंग पृथ्वी पर गिर गया और पूरी दुनिया कांप उठी। भगवान ब्रह्मा और विष्णु उनके पास आए और उनसे पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए अपना लिंग वापस लेने का अनुरोध किया। शिव ने उन्हें सांत्वना दी और अपना लिंग वापस ले लिया।

इस कथा का वर्णन वामन पुराण के 6ठें और 45वें अध्याय में देखने को मिलता है। इसके बाद भगवान शिव ने सदा-सदा के लिए दारुक वन में ज्योतिर्लिंग के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति का वचन दिया।


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की लगभग 125 फीट (25 मीटर) ऊंची भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसके दर्शन दूर से ही हो जाते हैं।

जटिल वास्तुकला और मनमोहक मूर्तियों के साथ मंदिर अपने आप में आध्यात्मिक सुकून का एहसास कराता है। शिव पुराण के मुताबिक, यहाँ दर्शन और आराधना करने से भक्तों को सभी प्रकार के विष, भय और सांप के काटने या कालसर्प दोष आदि से मुक्ति मिलती है और सांसारिक प्रलोभनों से रक्षा होती है।

वैसे तो ये मंदिर और शिवलिंग बहुत प्राचीन है किन्तु वर्तमान के मंदिर का निर्माण टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने 1996 ई में शुरू करवाया किन्तु बीच में उनकी हत्या हो जाने के बाद इसे उनके परिवार ने पूर्ण किया। इसके निर्माण में करीब एक करोड़ पच्चीस लाख का खर्च आया था जिसे गुलशन कुमार चैरिटबल ट्रस्ट ने अदा किया था। टी सीरीज द्वारा बनाये गए कई धार्मिक विडिओ में भी आपको इस मंदिर के दर्शन हो जाएंगे। मूल शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थित है जो काफी बड़े आकर का है। इसके ऊपरी हिस्से पर चाँदी का आवरण चढ़ाया गया और साथ ही साथ शिवलिंग के ऊपर चाँदी द्वारा निर्मित नाग की प्रतिमा है जो इसके नाम को सार्थक करती है। इस शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गयी है।

गर्भगृह में सभी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ केवल वही प्रवेश कर सकते हैं जिन्हे अभिषेक करवाना हो और पुरुष यहाँ केवल धोती धारण करके ही प्रवेश कर सकते हैं। 

इस शिवलिंग के अतिरिक्त भारत में तीन अन्य शिवलिंगों को नागेश्वर कहा जाता है। इसमें से एक हैदराबाद के निकटऔढ़ाग्राम में स्थित है और दूसरा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित शिवलिंग है जिसे नागेश्वर के साथ जागेश्वर महादेव भी कहा जाता है। हालाँकि इन दोनों जगह के स्थानीय निवासी इन्हे ही ज्योतिर्लिंग मानते हैं। अयोध्या में राम जी पुत्र कुश द्वारा स्थापित नागेश्वर नाथ मंदिर का भी इस क्षेत्र में बहुत महत्व है। शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की नगरी द्वारकापुरी के निकट नागेश्वर शिवलिंग को ही वास्तविक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)


श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की कुछ दुर्लभ जानकारी। ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


अयोध्या का श्यामा सदन (जिसे 'श्यामा सदन आश्रम' भी कहा जाता है) रामघाट क्षेत्र के कारसेवक पुरम में एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक विरक्त परंपरा का आश्रम/ मंदिर है । यह स्थान अपनी गहन साधना, संत परंपरा और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। त्याग तपस्या वैराग्य की नगरी अयोध्या में युग युगांतर से भजनानंदी संतो का बास रहा है और अपने त्याग तपस्या, भजन और सेवा के बल पर बड़े ही सरलता और माधुर्य स्वभाव से बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी परास्त कर दिया।
महंत रामदास जी संस्थापक रहे
संत गोपाल दास जी महाराज के गुरु का नाम परम हंस शिरोमणि परम हंशाचार्य 
महंत संत रामदास जी थे। उन्होंने 
Q6W7+RR4 पर 'श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की स्थापना किया था। तब से वहां संत सेवा गौ सेवा और समाज सेवा का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। 
तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज उमरिया बस्ती के मूल निवासी रहे 
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की धरती वशिष्ठनगर बस्ती जनपद में राम जानकी मार्ग चिलमा बाजार के दक्षिण उमरिया गांव में देवरहा बाबा के रूप में एक महान सन्त का जन्म हुआ था। जो अयोध्या से जनकपुर जाने वाले ऐतिहासिक राम जानकी मार्ग के दक्षिण पूण्य सलिला सरयू नदी के तट पर स्थित है। 

इसके अलावा यह उर्वरक भूमि सिद्ध सन्त बाबा निहाल दास और श्यामा सदन अयोध्या के महन्त गोपाल दास और हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास जी जैसे मूर्धन्य विद्वान को भी जना है।महंत राजू दास का जन्म उमरिया गांव के यादव परिवार में हुआ जब वे 4.5 वर्ष के थे तब उनके माता-पिता अयोध्या के हनुमानगढी में छोड़ गए थे। राजू दास का लालन पालन महंत रामदास जी ने किया गुरु के आशीर्वाद और कृपा से उन्होंने मंदिर में रहकर ही शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, उन्होंने साकेत महाविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) और एलएलबी (LLB) की डिग्री हासिल की है। और वह हनुमानगढ़ी के उज्जैनिया पट्टी के महंत संत रामदास के शिष्य बन गए।
      इन्हीं संतों की मणि माला में से श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज थे। उनका साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 को हुआ था। बाबा गोपाल दास ने गौ दान किए थे और प्रभु श्री राम की जन्मस्थली में अपने नश्वर शरीर का परित्याग किया था। उन्होंने अयोध्या धाम न छोड़ने के अपने व्रत का पालन भी किया था। संत गोपाल दास योग के भी अच्छे ज्ञानी रहे। उन्होंने मंदिर का विकास कराया। सभी भक्तों शिष्यों का कल्याण किया। सभी को सही मार्ग प्रदान किया। वे अच्छे निर्मल छवि के रहे। मंदिर के विकास के साथ- साथ संत सेवा गौ सेवा मैं हमेशा लीन रहते थे। मंदिर में निरंतर अष्टयाम सेवा चलती रहती थी।
     श्यामा सदन की विरक्त परंपरा के अनुसार संत गोपाल दास जी आजीवन मंदिर परिसर में ही रहकर साधना करते थे। संत गोपाल दास जी महाराज परमसंत थे। वे धार्मिक विद्वान रहे। कहीं कहीं उनके गुरु लाल जी महराज को कहा गया है।

महंत श्रीधर दास वर्तमान उत्तराधिकारी
श्यामा सदन मंदिर में एक तृतीय महंत गोपाल दास जी महाराज के साकेत गमन 23 अप्रैल 2022 के बाद उनके दो शिष्य
महन्थ गोरखानन्द दास और मंहत श्रीधर दास के मध्य मन्दिर के महंती का विवाद सहायक अभिलेख अधिकारी अयोध्या के न्यायालय और तदोपरांत अयोध्या के जिलाधिकारी न्यायालय में चला था।जिसमें वसीयत के आधार पर महंत श्रीधर दास सम्पत्ति के उत्तराधिकारी घोषित किए गए थे। उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर वर्तमान महंत श्रीधर दास जी महाराज भी आश्रम में निरंतर सत्संग, कथा आयोजन, संत सेवा और गौ सेवा कर रहे है। वे भागवत कथा 
और राम कथा भी करते हैं।उनका यू ट्यूब चैनल भी चलता है।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,PIN - 272001
मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, August 28, 2026

चंद्रहरि मंदिर के कूप पर स्वर्गद्वारी मस्जिद ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

1785 में अयोध्या, जैसा कि घाघरा नदी से देखा गया; विलियम हॉजेस द्वारा चित्रित । इसमें स्वर्गद्वार घाट को दर्शाया गया है। उपरोक्त चित्र के पृष्ठभूमि में औरंगजेब काल की एक मस्जिद दिखाई गई है जो स्वर्गद्वारी मस्जिद प्रतीत होती है।

कुणाल, किशोर के "अयोध्या रिविजिटेड" 2016 , पृ. 439-440 : "यह उल्लेखनीय है कि विलियम हॉजेस, आर.ए., जिन्होंने 1783 में फैजाबाद और अयोध्या का दौरा किया था, ने स्वर्गद्वारी मस्जिद के साथ तटबंध का प्रसिद्ध चित्र बनाया था।

अयोध्या के स्वर्गद्वार के आस-पास में कई प्राचीन मंदिर और पुरातात्विक अवशेष रहे हैं, जिनका इतिहास 11वीं-12वीं शताब्दी या उससे भी पुराना माना जाता है। ब्रिटिश लेखक बाल्फोर के अनुसार ‘अयोध्या की तीन मस्जिदें तीन हिन्दू मन्दिरों पर बनीं। ये मंदिर हैं : जन्म स्थान, स्वर्गद्वार तथा त्रेता का ठाकुर’ ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया एण्ड ऑफ ईस्टर्न एण्ड सदर्न एशिया, पृष्ठ 56)। 


जन्म स्थान के बाबरी मस्जिद पर राम जन्म भूमि मंदिर बन गया है। स्वर्गद्वार के चन्द्र हरि मंदिर के कूप पर नारंगी / स्वर्गद्वारी मस्जिद बना हुआ है । बाद में इस संरचना के बगल में चन्द्र हरि मंदिर को पुनः बनवाया गया है, जो अब भी बरकरार है । स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पौड़ी के तट पर स्थित 'त्रेता का ठाकुर' के पुराने मंदिर के अवशेषों पर औरंगजेब के शासनकाल में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया था। आज भी उस दौर के अवशेष और खंडहर मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से 'त्रेता का ठाकुर मस्जिद' या उससे जुड़े अवशेष के रूप में जाना जाता है। बाद में इस स्थान के समीप ही मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा दूसरा 'त्रेता के ठाकुर' मंदिर का जीर्णोद्धार -निर्माण कराया गया था, जहाँ भगवान राम और उनके दरबार के विग्रह स्थापित हैं।


समयानुसार सरयू नदी के बदलाव और ऐतिहासिक उठापटक के कारण यहाँ के कई प्राचीन स्थल और संरचनाएँ समय के साथ खंडहर में बदल गईं या लुप्त हो गईं। इनका उल्लेख इतिहासकार और ग्रंथों में मिलता है। 

मुगल शासन के तहत , अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था। यह शहर अवध प्रांत की राजधानी था (जिसे अंग्रेजों द्वारा "ओउध" उच्चारित किया जाता था), जिसे "अयोध्या" नाम का एक रूप भी माना जाता है। 

सन् 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, केंद्रीय मुस्लिम शासन कमजोर हो गया और अवध वस्तुतः स्वतंत्र हो गया, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। हालाँकि, शासक स्थानीय हिंदू सरदारों पर तेजी से निर्भर होते चले गए और मंदिरों और तीर्थ केंद्रों पर नियंत्रण शिथिल हो गया।

स्वर्गद्वारी मस्जिद राम की पैड़ी पर अङ्गड़ा चौराहा के पास स्थित है।  औरंगज़ेब ने सन 1680 में अयोध्या में आकर दो मंदिर स्वयं गिरवाए थे उनमें एक त्रेता के ठाकुर और दूसरा स्वर्गद्वार जिनके स्थान पर मस्जिद नुमा ढांचे बनवाए गए, उसी समय का है। यह ढांचा, जो मस्जिद नहीं बल्कि मस्जिदनुमा ढांचा है। समय के साथ उचित रखरखाव न मिलने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण इस इमारत का मुख्य हिस्सा गिर चुका है और अब केवल लखौरी ईंटों से बनी यह मीनार और मुख्य मेहराब का ढांचा ही बचा हुआ है।

पौराणिक महत्व -

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इसका उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इस पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान,हनुमान और परशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या भगवान श्री कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

प्राचीन कूप को ढककर  मीनारनुमा मस्जिद बनी :-

औरंगजेब ने फारसी में मंदिर तोड़ने का आदेश 1669 ईस्वी में दिया था। उसने फरमान जारी कर मुल्तान,काशी अयोध्या और मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने का आदेश दिया था। यह फरमान फारसी भाषा में है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप को तोड़कर उस स्थान पर मीनार बना दी गई है । इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। पहले यह मंदिर परिसर का प्राचीन कुआं रहा करता था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक हो जाते थे। 

स्कंध पुराण में इस स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्गद्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भगवान विष्णु की परम शक्ति का गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक की आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होता है। इसे बाद में नारंगी मस्जिद भी स्थानीय लोग कहते थे । कुछ लोग इसे स्वर्गद्वारी मस्जिद भी कहते हैं।  इसे औरंगजेब ने 1669 में चंद्र हरि विष्णु जी के मंदिर को तोड़वा कर बनवाया था। इसके नीचे चंद्र हरि कूप है।

इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया था और कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई थी जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l  इसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। इसे आसपास के लोगों द्वारा कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर फिदाई खान द्वारा ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। 

फिदाई खान कोका का जन्म मुजफ्फर हुसैन के नाम से हुआ था, एक मुगल सरदार थे जो अवध और लाहौर का गवर्नर था। अवध के सूबेदार इरादत खान की मृत्यु के बाद, उसे अवध और गोरखपुर का फौजदार बना दिया गया। 1674 में सम्राट ने फिदाई खान को काबुल का राज्यपाल नियुक्त किया था, जहाँ उन्होंने स्थानीय कबीलों के विद्रोहों को दबा दिया था। जलालाबाद के पास उन्होंने विद्रोही कबीलों के गाँवों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया था। सम्राट ने उनके प्रयासों की सराहना की और उन्हें अज़ीम खान कोका की उपाधि दी। 1676 में उन्हें दरबार में वापस बुलाया गया और बंगाल का गवर्नर  बनाया गया। 

अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और बिहार पटना  के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)






Thursday, August 27, 2026

पृथक निर्वाचिका की मांग असंवैधानिक, देश को बांटने का षड्यंत्र ✍️ डा राधेश्याम द्विवेदी

पृथक निर्वाचिका के साथ चुनाव की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी विशेष समुदाय या वर्ग के मतदाता केवल अपने ही समुदाय के उम्मीदवार को वोट देते हैं। इसमें अन्य समुदाय के लोग वोट नहीं डाल सकते हैं। इसके तहत किसी खास धर्म, जाति या वर्ग के लिए एक अलग मतदाता सूची और निर्वाचन क्षेत्र बनता है। उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाला और उसे वोट देने वाला व्यक्ति भी उसी समुदाय से होता है।

ब्रिटिश सरकार ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत सबसे पहले1909 के मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की शुरुआत की थी। इसके बाद 1919 के सुधारों में इसे ईसाइयों और एंग्लो-इंडियन तक बढ़ाया गया।1932 के सांप्रदायिक पंचाट में दलितों (शोषित व वंचित वर्गों) के लिए भी इसकी घोषणा की गई।

जिन्ना ने 1916 में मुस्लिम मतदाताओं के लिए इसी तरीके की मांग शुरू की थी और अंततः एक अलग राज्य चाहा था और यहीं से दो राष्ट्र सिद्धांत यानी कि ट्यू नेशन थ्योरी की नींव पड़ी।


पूना समझौता -

पूना पैक्ट की उत्पत्ति अगस्त 1932 के सांप्रदायिक पुरस्कार से जुड़ी हुई है, जिसमें मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों और दलित वर्गों सहित विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों के लिए अलग-अलग निर्वाचक मंडल आवंटित करने की मांग की गई थी। इस परिणाम में, केंद्रीय विधायिका में 71 सीटें विशेष रूप से दलित वर्गों के लिए आरक्षित की गई थीं। 

गांधीजी का अनशन -

गांधी ने यरवदा जेल में दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया था और आमरण अनशन शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा। जिसके बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 1932 में पूना पैक्ट हुआ था। इस समझौते के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका को समाप्त कर दिया गया और इसके बदले संयुक्त निर्वाचन में ही उनके लिए सीटें आरक्षित कर दी गईं।

सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीट पर सहमति -

24 सितंबर, 1932 को अंबेडकर ने जेल में गांधी से मुलाकात की और उन्होंने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए। अलग-अलग निर्वाचक मंडलों के बजाय, अछूतों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित की जातीं, जिससे प्रांतीय विधानसभाओं में सीटों की संख्या 78 से बढ़कर 148 हो जाती।

संविधान के अनुच्छेद 325 का उल्लंघन-

आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों ने इस मांग को संविधान के अनुच्छेद 325 के खिलाफ और देश के सामाजिक ताने- बाने को विभाजित करने वाला करार दिया है। कुछ ने इसकी तुलना ऐतिहासिक रूप से विभाजनकारी राजनीतिक कदमों से भी की है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि देश के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए धर्म, मूलवंश ,जाति या लिंग के आधार पर कोई अलग या विशेष मतदाता सूची नहीं होगी और न ही किसी व्यक्ति को केवल इन आधारों पर मतदाता सूची में शामिल होने से अयोग्य ठहराया जाएगा।

चन्द्र शेखर रावण ने पृथक निर्वाचिका की संसद में की मांग -

नगीना से सांसद और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चन्द्र शेखर आजाद 'रावण' ने संसद में दलितों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग 17 अप्रैल 2026 को उठाई है। उनका तर्क है कि मौजूदा आरक्षित सीटों पर सभी जातियों के मतदाता वोट करते हैं, जिससे कई बार चुनकर आने वाला प्रतिनिधि अपने समाज के प्रति स्वतंत्र न होकर अपनी पार्टी के प्रति वफादार होता है। उनका मानना है कि बिना स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आरक्षण केवल एक संख्या बनकर रह जाता है, जिससे वास्तविक सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण संभव नहीं है।

नेता पर अंकुश लगे - 

दशकों बाद नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण उसी पुराने पन्ने को फिर से खोल रहे हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ सबका विकास और एक भारत श्रेष्ठ भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के कुछ ऐसे चेहरे समाज में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। चंद्रशेखर आजाद की सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग का मतलब है एक ऐसा भारत जहां हिंदू समाज को जातियों के आधार पर पूरी तरीके से बांट दिया जाए। मौजूदा समय में जिस तरीके से व्यवस्था है उनसे जो दलित होते हैं उनके लिए अलग-अलग क्षेत्र में सीटें आरक्षित होती है। लेकिन यहां पर चंद्रशेखर रावण का यह मांग है कि ना सिर्फ अलग सीटें चाहिए बल्कि जो वोट करने वाले लोग हो वो भी दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भी अलग हों। यानी कि उनका पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग किया जा रहा है। 

उन्होंने बाबा अंबेडकर की अस्वीकार की गई मांग को दुबारा उठा दिया है। यह मांग ब्रिटिश काल के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा उठाई गई उस ऐतिहासिक मांग की पुनरावृत्ति मानी जा रही है, जिसे बाद में 1932 के पूना पैक्ट  के तहत समाप्त कर दिया गया था।

 जनता में जबरदस्त गुस्सा -

चन्द्र शेखर रावण की इस मांग को लेकर के सोशल मीडिया पर जनता काजबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा है। जो देश के एक बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है। यह मांग देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली है और बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए पूरे पैक्ट की भावना के भी खिलाफ है। वे इस मांग से जातियों में और भी ज्यादा खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जो कि आगे चलकर के एक अलग राष्ट्र बनाने की नींव भी डाल सकता है। भारत के पहले से दो टुकड़े बनकर देश के विरुद्ध अघोषित युद्ध जैसी हालत कर रखी हैं। अब और टुकड़े कर इसे और छूट नहीं दी जा सकती है। यही वजह है कि लोग जो है वह यह कह रहे हैं कि चंद्रशेखर आजाद रावण के खिलाफ एनएसए लगाया जाए।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

(वॉट्सप नं.+919412300183)






 





Tuesday, August 25, 2026

संसद में नेता नहीं कुर्सी के व्यापारी हैं (कविता)✍️डा राधेश्याम द्विवेदी ‘नवीन’


संसद में नेता नहीं कुर्सी के व्यापारी हैं।

पक्ष हो या विपक्ष सबकी यही यारी है।

सिलेक्टेड इशू पर इन सबकी तैयारी है।

देश नहीं अगली चुनाव की जो पारी है।।


वे जानते जब लोग साथसाथ खड़े होंगे ।

तरह- तरह उनसे सवाल जब पूछेंगे ।

हर गली में एक दीवार खड़ी करते हैं।

दिल में बीज एक शक का बो देते हैं ।।


जाति दलित अगड़ी पिछड़ी का नाम ले ।

धर्म मजहब संख्या भागीदारी अंजाम ले।

भाषा या बोली उत्तर दक्षिण का नाम ले ।

दरार बनाकर एक रिश्ते का नाम ले ।।


हर पहचान को हथियार बना देते हैं।

हर इंसान को वे शैतान बना देते हैं।

ऊंचा पद लेकर शोषित बने रहते हैं ।

अचूक कमाई कर दलित बने रहते हैं।।


स्कूलों से ज्यादा कोरे नारों की चिंता है।

 अस्पतालों से ज्यादा सभाओं की चिंता है।

रोजगार से ज्यादा राजनीति की चिंता है।

काम से ज्यादा ‘मनकी बात’ की चिंता है।।


एक एक कर वे अपना ईमान बेचते हैं  ।

सुधार के नाम पर  संस्था को बेचते हैं ।

लोगों के विश्वास औ भरोसे को बेचते हैं।

देश का पूरा का पूरा भविष्य बेच देते हैं ।।


त्रासदी नहीं ऐसा नेता पैदा हो जाता है। 

उसकी लड़ाई  को अपना समझ लेता है।

मीडिया अखबार की सुर्खी बन जाता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है।।


सीमा बॉर्डर पर खड़ा सैनिक नहीं पूछता। 

साथी जवान किस जाति से वहां आता ।

किस धर्म और भाषा को वह अपनाता ।

उसकी हर सांस में भारत का नाम आता।। 


जबाव ना सुन केवल सवाल पूछते हैं ।

भीड़ को भड़काकर नारे लगवाते हैं  । 

देश के टुकड़े तोड़ने की बातें करते हैं ।

सामने वाले को बेवकूफ ही समझते हैं।।


साजिशन दुश्मन सीमा को घेर लेता है।

छिप छिपकर आतंकी हमला कर देता है।

हारता है मानता नहीं देशकी गद्दी के लिए

अपने ही घर में वह आग लगा देता है।।


चाहे दिल्ली का ग्राउंड रामलीला हो ।

जंतर मंतर या विशाल छू मंतर हो ।

संसद भवन मकर द्वार की नौटंकी  हो ।

पीएम सीएम के आवास का घेराव हो।।


देश के किसी कोने में कोई भी जमाव हो ।

तरह-तरह नारों की अचूक भरमार हो ।

सनातन धर्म के मूल्यों का तिरस्कार हो।

टुकड़े गैंग  शिरफिरों का चित्कार हो।।


देश नहीं टूटता बाहरी संकट जब आता।

सैनिकों को छुपछुप कर शहीद कर जाता।

सरकारी संसाधन और सुरक्षा की आड़ में 

हमारा नेता प्रजातंत्र को चुनौती दे जाता।।


आरक्षण छेड़ने पर ईट से ईंट बजा देंगे।

जरूरत पड़ गई तो सरकार को गिरा देंगे।

अपने लोगों से सबको  नीचा दिखा देंगे।

मीडिया संसाधन मशीनरी को लगा देंगे।।


पुलिस अपनो पर लाठियां भांजवाता है।

आंसू गैस पानी की बौछार चलवाता है।

बसों ट्रकों में खींच खींचकर ठूसवाता है।

लेजाकर ना जाने कहां पर छुपवाता है।।


देश में नफरत की खेती पनपाया जाता।

विदेशों में देश की छवि को गिराया जाता।

विश्व में भारत की कमियां गिनाया जाता।

कुर्सी के लिए देशका गौरव गिराया जाता।


भारत के नेता यदि नफरत को छोड़ देंगे।

विकास की राजनीति को जबसे चुन लेंगे।

 सबसे बड़ी हार इंसानियत की तब होगी।

पक्ष विपक्ष की नहीं भ्रष्ट राजनीति होगी।।




कवि :

डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,Pin 2720901,उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183