Tuesday, February 17, 2026

अयोध्या के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के आधार पर राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहिबा के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा रहे हैं।

     राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को राजा घोषित किया गया और 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू करने तक अयोध्या राज पर राज किया। राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह बाघों का शिकार किया करते थे। असंख्य कमरों वाले उनके राजमहल में दो कमरे उनकी ट्रॉफियों से भरे हुए हैं। अयोध्या में स्थित कामता प्रसाद सुंदर लाल महाविद्यालय के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में एक सभागार भी बना हुआ है ।

अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से खास लगाव 

अवधी रवायत बेगम अख़्तर का ज़िक्र बग़ैर यह कहानी अधूरी रहेगी।वह अवध की मशहूर तवायफ थीं। बेगम अख़्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी का समय 7अक्टूबर 1914 से 30अक्टूबर  1974 रहा। वह भारत की एक  प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी।उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्मश्री तथा सन 1975  में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया था। उन्हें "मल्लिका- ए-ग़ज़ल" के ख़िताब से नवाज़ा गया था।

बालिका अख़्तरी को बचपन से ही संगीत से कुछ ऐसा लगाव था कि जहाँ गाना होता, छुप छुप कर सुनती और नकल करती। घर वालों ने पहले तो इन्हें रोकना चाहा; पर समुद्र की उत्तुंग तरंगो को भला कौन रोक सकता था! यदि कोई चेष्टा भी करता, तो शायद लहरों का वह सशक्त ज्वारभाटा उसे ही ले डूबता। 2014 की फ़िल्म “डेढ़ इश्क़िया” में विशाल भारद्वाज ने बेगम अख़्तर की प्रसिद्ध ठुमरी “हमरी अटरिया पे” का आधुनिक रीमिक्स रेखा भारद्वाज की आवाज में प्रस्तुत किया है।उन्होंने दिल के टूटने को भी दिलकश बना दिया था।

  उसके ही जमाने में महाराज जगदम्बिका प्रताप सिंह अयोध्या के राजा थे। अख्तरी बाई फैजाबाद में बेगम अख़्तर नाम से जानी जाती थी। वह राजा साहब की रक्षिता थीं और अयोध्या राज दरबार की प्रतिष्ठित गायिका भी।जगदम्बिका प्रताप सिंह आज़ादी तक अयोध्या के राजा रहे। राजा साहब बेगम अख़्तर के एक दादरे पर ऐसे फ़िदा हुए कि पचास एकड़ का एक बाग उनके नाम कर दिया था।अख्तरी बाई उनके दरबार की लम्बे समय तक गायिका रही।

     अख्तरी बाई जब फैजाबाद छोड़ कर जाने लगीं तो वह बाग राजा साहब को लौटाने गयीं। राजा साहब ने मना किया तो वह अड़ गई और कही, “हुज़ूर आपने मेरी वजादारी की । इसके लिए ताउम्र मैं आपकी शुक्रगुज़ार रहूंगी। लेकिन अगर मैं इसे बेचकर जाती हूं, तो फैजाबाद के लोग मेरे बारे में क्या सोचेगें? तवारीख़ मुझे माफ नहीं करेगी कि एक गाने वाली बाई ने राजा के उपहार में दिए बाग का सौदा कर लिया। इसलिए आप इसे रख लें ताकि इतिहास में आपके साथ ही मेरा नाम भी सम्मान के साथ लिया जाय। राजा साहब के मना करने पर उन्होंने राजा साहब के दामाद डा. रमेन्द्र मोहन मिश्र को वह बाग लौटा दिया।

      आज भी दस्तावेज़ों में उस ज़मीन का कागज़ अख़्तरी बाई फैजाबादी बनाम डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र के तौर पर दर्ज है।रमेन्द्र जी, राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की इकलौती बेटी राजकुमारी विमला देवी जी के पति थे।पद्मभूषण छन्नूलाल लाल मिश्र ने यहीं शागिर्दी कर संगीत में अपनी पहचान बनाई।उनका पानी की तरह हारमोनियम पर चलता हाथ यहीं सधा।वे यहीं पहले बजाते थे बाद में गाने लगे। भारतीय संगीत की दुनिया के कई बड़े नाम चतुर्भुज स्थान में ही पले और बढ़े हुए हैं।

अख्तरी बाई की दुखद मौत

30 अक्टूबर 1974 को नीलम गमाडिया, उनकी मित्र, जिन्होंने उन्हें अहमदाबाद आमंत्रित किया था, की बाहों में उनका निधन हो गया , जो उनका अंतिम प्रदर्शन बन गया।  1974 में तिरुवनंतपुरम के पास बलरामपुरम में अपने आखिरी संगीत कार्यक्रम के दौरान , उन्होंने अपनी आवाज़ का स्वर ऊंचा कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनका गायन उतना अच्छा नहीं था जितना वे चाहती थीं और वे अस्वस्थ महसूस कर रही थीं। उन्होंने खुद पर जो तनाव डाला, उसके परिणाम स्वरूप वे बीमार पड़ गईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

'पसंद बाग’ ठाकुरगंज , लखनऊ में समाधि

अख्तरी बाई की समाधि लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में स्थित उनके घर 'पसंद बाग' के भीतर एक आम के बगीचे में बनाई गई है । उन्हें उनकी माता मुश्तरी साहिबा के साथ दफनाया गया था। हालांकि, वर्षों से बढ़ते शहर के कारण बगीचे का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया है और समाधि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। लाल ईंटों से घिरे संगमरमर के मकबरे को 2012 में पिएत्रा ड्यूरा शैली के संगमरमर जड़े के साथ पुनर्स्थापित किया गया था। लखनऊ के चाइना बाजार में 1936 में बने उनके घर को संग्रहालय में परिवर्तित करने के प्रयास जारी हैं। 


लेखक 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

अयोध्या के महाराजा प्रतापनारायण सिंह 'वीरेश'/'ददुवा साहब' ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर हो गया था । महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह/प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब ' भी शासक रहे। महाराजा मान सिंह दो-दो शादी करने के बावजूद एक कन्या के पिता बन सके थे। जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा था। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रताप नारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ था। ददुआ साहब महाराज मानसिंह के वौहित्र थे। जिन्हें महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले रखा  था। ददुवा साहब नाबालिक थे। अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता था और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही। 

     लाल प्रताप नारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।

इमारतें व सार्वजिक कार्यों का शौक 

महाराजा प्रतापनारायण सिंह, मानसिंह के बाद सिंहासन पर बैठे। उनका शासन लगभग बीस वर्षों तक चला। महाराजा जी का समय विद्याव्यसन में बीतता था। उनके राज्य में फैजाबाद, गोण्डा, नवाब गंज, बाराबंकी, लखनऊ और सुल्तान पुर के 609 गांव,124 पट्टियां थीं।

      दिसंबर 1895 में उन्होंने प्रताब - ए - धर्म उद्देश्य के लिए उत्तर भारत के अनेक क्षेत्र गांव घर में पर्याप्त मात्रा में अचल संपत्तियां का दान किया। इस दान का मूल उद्देश्य अयोध्या फैजाबाद वाराणसी वृन्दावन हरिद्वार इलाहाबाद और लखनऊ में स्थित मंदिर घाट धर्मशालाओं और भवनों के मरम्मत पूजा पाठ भोग तथा खर्चे को जुटाने के लिए किया गया।उन्हें इमारत बनवाने का बड़ा शौक़ था। उन्होंने अयोध्या में कई ऐतिहासिक इमारतें और सार्वजनिक कार्य करवाए। उन्होंने अयोध्या के प्राचीन शहर के नए पैलेस तथा बंगलों प्रवेशद्वारों और मंदिरों के निर्माण के लिए और कुछ भवनों के मरम्मत और पुनरुद्धार के लिए भी कार्य योजना बना रखा था।

      अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों के गौरव, वीरता और धर्म परायणता का स्मरण करते रहते हैं। सिंहासन की आभा, हवेलियों की भव्यता, मंदिरों की दिव्यता और तालाबों की शांति- सभी कुछ उनके इतिहास की जीवित यादें कभी भी देखी जा सकती हैं। अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों की वीरता, धर्मपरायणता और प्रशासनिक कुशलता का स्मरण करते हैं।

     राज्य में स्थिरता के साथ-साथ समाज में शिक्षा, धर्म और कला का विकास भी हुआ। महाराजा प्रतापनारायण सिंह ने विद्वानों और ब्राह्मणों का संरक्षण किया। युवा राजकुमारों और राजकुमारियों को नीति, युद्ध और धर्म की शिक्षा दी गई।

महाराजा जी की प्रमुख उपाधियां

लाल प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया था। ब्रिटिश सरकार ने प्रताप नारायण सिंह को 1887 में महाराजा  की उपाधि से सम्मानित किया।1890 में, "महदोना राज"' का नाम बदलकर “अयोध्या राज” कर दिया गया। 1895 में, उन्हें नाइट कमांडर्स स्टार्स ऑफ़ इंडिया (KCSI) की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाद में 1896 में "महामहोपाध्याय" की उपाधि दी गई। वे दो साल के लिए उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे। उन्हें "अयोध्या-नरेश" की उपाधि भी मिली हुई थी। उन्हें "ददुआ महाराज" के नाम से भी जाना जाता था। महाराजा साहब की साहित्यिक रुचि भी थी। वे “वीरेश” उप नाम से साहित्य की सर्जना करते थे। उनका रचा हुआ “रस कुसुमाकर” ग्रन्थ उनके साहित्यिक प्रतिभा का सजीव प्रारूप है।

राज सदन का स्थापत्य कला

अयोध्या का राजसदन और उसके भीतर कोठी मुक्ताभास उनकी सुरुचि और कारीगरी का अच्छा नमूना कहा जा सकता है।महाराजा लाल प्रताप नारायण सिंह ने अयोध्या में राजसदन का निर्माण कराया था। जो अयोध्या की स्थापत्यकला की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का एक अद्भुत प्रमाण है। अयोध्या के मध्य में, पूजनीय हनुमानगढ़ी मंदिर के निकट स्थित यह महल न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि भक्ति और कलात्मकता का सार समेटे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भी है। अपनी सुंदरता के बावजूद, राज सदन रखरखाव संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है, जो इसके समग्र आकर्षण को कम कर देती हैं। वास्तुकला आश्चर्यजनक है, लेकिन उखड़ा हुआ पेंट और इसके इतिहास के बारे में जानकारी देने वाले बोर्डों की कमी इसे और भी आकर्षक बनाती है। फिर भी, यहाँ का वातावरण आध्यात्मिकता और विरासत की भावना से ओतप्रोत है, जो हिंदू धर्म की गहरी परंपराओं को जानने में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है।

राज सदन की रणनीतिक स्थिति इसे पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण बनाती है, जो लोकप्रिय वेब सीरीज़ की शूटिंग के लिए एक पृष्ठभूमि के रूप में और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करता है। राज सदन घूमने के लिए भी आमंत्रित करता है, जो ऐतिहासिक रहस्य और स्थापत्य कला की भव्यता का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है, जिससे यह अतीत से जुड़कर वर्तमान का आनंद लेने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए एक उल्लेखनीय गंतव्य बन जाता है। यह भव्य महल, जो मूल रूप से एक जर्जर इमारत थी, 'प्रकाश झा प्रोडक्शंस' की रचनात्मक दृष्टि से पुनर्जीवित हुआ है। इसे फिर से जीवंत करने में लगभग पाँच महीने लगे। प्राचीन महाराजा काल को प्रतिबिंबित करने वाली जटिल पारंपरिक वास्तुकला आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देती है और इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती है। 

लछिराम राजा प्रताप नारायण सिंह के राज कवि

महाराजा मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' 'दादुवा साहब' अयोध्या नरेश कवि के आश्रय दाता बने। एक बार राजा साहब ने ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा उन्होनें निम्नलिखित छन्द सुनाया-

वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं। 

मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं। 

कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं। महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह, 

कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।”

   अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा इन्होनें ' प्रताप रत्नाकर' नामक ग्रन्थ की रचना किया। -(सन्दर्भ: डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस’ “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 43)

लछिराम कृत:प्रताप रत्नाकर

मानसिंह जी के जमाने से ही राजकवि के रूप में महदौना राज दरबार के प्रतिष्ठित लछिराम ने प्रताप रत्नाकर अयोध्या नरेश राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' के प्रति लिखा गया ग्रन्थ है। इसके प्रथम तरंग में मंगलाचरण के अन्तर्गत गणेश, राम, राधा और कृष्ण की वन्दनायें हैं। दूसरे तरंग में राजवंश का वर्णन है। तीसरे तरंग में राधा रमण की परम् अनूप लीला का वर्णन प्रथम भाग के रूप में हैं। चौथे तरंग में द्वितीय याम, पाचवें तरंग में तृतीय याम, छठे तरंग में चतुर्थ याम, सातवें तरंग में पंचम याम, आठवें तरंग में षष्ठ याम, नवें तरंग में सप्तम् याम, दसवें तरंग में अष्टम् याम का वर्णन है। सम्पूर्ण ग्रंथ में श्रृंगाररस की प्रधानता है। राधा कृष्ण के श्रृंगारिक रूपों के परिप्रेक्ष्य में रचना अत्यन्त सरस हो उठी है। राधा के कुचाग्र, विपरित रति, सुरति, नितम्ब, त्रिवली आदि के वर्णन में अश्लीलत्य की प्रधानता दर्शनीय है। -(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत : “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 44)

प्रतापनारायण 'वीरेश' : 'रसकुसुमाकर' 

प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' का यह ग्रंथ संवत 1849 ई. में पूर्ण हुआ और संवत 1951/सन 1894 ई. में प्रयाग राज के 'इण्डियन प्रेस' से मुद्रित हुआ था। इसमें रस के अंगों की सुंदर विवेचना और उदाहरण मिलते हैं। यह 515 छन्दों का ग्रंथ है। यह उत्कृष्ट रीति का ग्रंथ माना जाता है। लक्षण ग्रंथों की परम्परा में इसका महत्त्व इसलिए भी स्वीकार किया जाता है कि जहाँ पूर्ववर्त्ती अन्य लक्षण ग्रंथों में विषय का प्रतिपादन पंचशैली में हुआ है, वहीं इसमें गद्य के माध्यम से लक्षणों का रोचक एवं सरस निरूपण हुआ है।

ग्रन्थ में पंद्रह कुसुम /अध्याय

‘रसकुसुमाकर’ में पंद्रह कुसुम हैं। प्रथम में ग्रंथ परिचय, उद्देश्य, और द्वितीय में स्थायी भावों के लक्षण और उदाहरण दिये गए हैं। तृतीय में संचारी भावों, चतुर्थ में अनुभाव और पंचम में हावों का वर्णन किया गया है। छठे कुसुम में सखा-सखी, दूती आदि तथा सातवें-आठवें विभाग के अंतर्गत ऋतु और उद्दीपन सामग्री का वर्णन है। नवें, दसवें, ग्यारहवें कुसुमों में स्वकीया, परकीया और सामान्या तथा दसविध नायिकाओं का वर्णन है। ग्यारहवें कुसुम में नायक भेद का विस्तार से निरूपण किया गया है। तेरहवें और चौदहवें कुसुमों में श्रृंगार के भेदों और वियोग दशाओं का चित्रण हुआ है। पंद्रहवाँ रस कुसुम है, जिसमें श्रृंगार को छोड़कर अन्य रसों का विवरण है। अन्त में काव्य प्रशंसा के साथ ग्रंथ की समाप्ति हुई है। इस ग्रंथ में यथा स्थलों पर भावों के अनुरूप कुछ विशिष्ट चित्र भी दिए गये हैं। इन चित्रों से ग्रंथ की महत्ता निश्चय ही बढ़ गई है।

  चौधरी बंधुओं की सत्प्रेरणा और साहचर्य से अयोध्या नरेश ने इस युग के प्रसिद्ध छंदशास्त्र और रसग्रंथ 'रसकुसुमाकर' की रचना की थी। इसकी  व्याख्या शैली, संकलन, भाव, भाषा, चित्र चित्रण में आज तक इस बेजोड़ ग्रंथ को चुनौती देने में कोई रचना समर्थ नहीं हो सकी है; यद्यपि यह ग्रंथ निजी व्यय पर निजी प्रसारण के लिए मुद्रित हुआ था।

   ‘रसकुसुमाकर’ में लक्षण गद्य में दिये गए हैं और विषयों का सुंदर तथा व्यवस्थित विवेचन उपस्थित किया गया है। इस ग्रंथ में आये उदाहरण बड़े सुंदर हैं। उदाहरण के रूप में देव, पद्माकर, बेनी, द्विजदेव, लीलाधर, कमलापति, संभु आदि कवियों के सुंदर छन्द दिये गए हैं। उदाहरणों के चुनाव में ददुआ जी (महाराजा साहब) की सहृदयता और रसिकता प्रकट होती है। इस ग्रंथ के अंतर्गत अनेक भावों,संचारियों और अनुभावों के चित्र भी दिये गए हैं, जो बड़े सुंदर और अर्थ के द्योतक हैं।श्रृंगाररस का विवेचन विशेष रोचकता और पूर्णता के साथ हुआ है।

   महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के "रू" से राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहेब के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा हैं।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Sunday, February 15, 2026

जेल के दीवारों के पीछे की डरी-सहमी दुनिया ✍️प्रस्तुतकर्ता आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी


एक बुजुर्ग कैदी की आप बीती दास्तान
दीवानी न्यायालय से रुष्ट मेरे अपने खास की दाल जब नही गली तो उसने फौजदारी का फंदा फेंका। उसने मेरे नाम की तीन जमीन जिसे मैंने बेचा था , पर 419/420 का केस तैयार करवाया। न्यायालय के अधिकारियों को प्रभावित करके मेरे ऊपर तीन पुलिस केस दर्ज करवाया। मुझे जेल की सीखचों में डालने और मेरे मरने के लिए दाढ़ी मूँछ भी बढा लिया था। वह यह जानता था कि हत्या करने से मैं ही पकड़ा जाऊँगा, इसलिए पुलिस को पैसा देकर मुझे फँसाने का हथकंडा अपनाया गया। मेरा मुकदमा सी. जे. एम. के यहाँ दर्ज कराकर कोतवाली में पुलिस केस बनवाकर आग में घी डालने का काम किया गया। दरोगा को जब तफ्तीश मिली तो वह उन्हें प्रभावित करके मुझे पकड़वाने पर पूर्णतया तुल गया। पुलिस पैसे की यार कैसे होती है? इसे मैंने देखा और समझा। पुलिस के कुछ दलाल मेरे पीछे पड़ गये और कहने लगे , "प्रिन्सपल साहब आप पर बहुत कड़ा मुकदमा दर्ज हो गया है। बिना जमानत आप को जेल जाना पड़ेगा। आप पैसा खर्च करें नहीं तो बड़ी बेइज्जती होगी।" उस समय मेरे पास छठे वेतन की वृद्धि से एक लाख से ऊपर रुपया था । मैंने देखा कि पुलिस पीछे पड़ गयी है। दरोगा कह रहे हैं कि आप जेल नहीं जायेंगे , यदि पैसा खर्च करेंगे। दलालों ने रात दिन एक कर दिया और मुझसे 67 हजार रुपये चौकी इंचार्ज और कुछ अधिकारियों ने मिलकर हड़प लिया।
     मेरे कुलीन कुल में जन्में हमारे खास ने मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति प्राप्त करने हेतु मुझ पर 11 मुकदमे कर चुका है । फिर भी वह अपने अनैतिक कार्य में असफल रहा। उसने छल कपट के साथ-साथ आतंक का भी सहारा लिया। वह प्रचार करने लगा कि यदि मुझे नगर बाजार बस्ती का मकान ना लिखा गया तो मैं गोली मार कर ले लूँगा। जब उसके सारे प्रयत्न कामयाब नहीं हुए तब उसने पुलिस और फौजदारी के मजिस्ट्रेट का दामन पकड़ा। उसने निर्णय लिया कि मुझे कारागार में भेजकर विवश कर देगा।
      मेरे उस खास को केवल एक चीज सामने थी कि कब मुझे जेल भेज दें। इसके लिए उसने कुछ राजनीतिक लोगों का शरण लिया और रूपये पेसे खर्च करने का दृढ़ निश्चय किया। उसने अपनें बालों को बढ़ाया और दाढ़ी मूँछ को रखा लिया कि जब हमारा बाप जेल चला जायेगा तभी हम दाढ़ी मूँछ बनवायेंगे। उसने फर्जी ऐसे मुकदमे बनवाये जिसमे मुझे 419/420 का मुलजिम बनना पड़ा। प्रथम मुकदमे का कुछ लोगों ने पुलिस में बीच-बचाव करके मुझसे 67 हजार रुपये दिलवा दिये। मैं दरोगा के कहने पर निश्चिन्त भी हो गया था कि मुझे जेल नहीं जाना पड़ेगा। क्योंकि 419/420 का मुकदमा लोवर कोर्ट से जमानत नहीं होती है । इसको जिला एवम् सत्र न्यायाधीश जमानत दे सकते हैं। मैं नहीं समझता था कि मेरा खास मुझे जेल निश्चित रूप से भिजवाने के लिए पूर्ण रूप से प्रयत्नशील है।
       उसके आतंक में करुणा नहीं आतंक का बोलबाला होता है। आतंकी परपीड़ा को देंखने का शौकीन होता है। यही स्थिति उसकी थी । उसने मेरे एक खेत का मामले में मुझे 419/420 का मुलजिम पुनःबनवा दिया । अपने सोर्स से उसने ए.सी.जे.एम. कोर्ट से मुकदमा दर्ज करने हेतु कोतवाली बस्ती को भेजवा दिया और प्रयत्न करने लगा कि शीघ्र मुझे जेल भेज दिया जाय। उसकी मदद करने के लिए उसको वहीं मनमाफिक दरोगा मिल गये जिन्होंने दलालों के माध्यम से मुझसे 27 हजार रुपया ले लिया था।
       बस्ती न्यायालय में मेरा मुकदमा था मैंने अपने शुभ चिंतक अयोध्या के एक महंत जी से निवेदन किया कि वे हमारी जीप से बस्ती मेरे कार्य हेतु चलने का कष्ट करें। क्योंकि उनको जीप चलाने काअच्छा ज्ञान है। मैं जीप से जब बस्ती पहुँच गया तो वह अपनी जीप व सफारी गाड़ी से बस्ती पहुँचा और मुझे पकड़ने के लिए दरोगा से सम्पर्क किया। मेरे पीछे उसके आदमी पड़ गये। मैं जहाँ-जहाँ जाता वे मोबाइल से उसे सूचना देते रहते थे। अन्त में उसने उसी दरोगा को काफी पैसा देकर एक एम.एल.सी. से सोर्स लगाकर मेरे पीछे पड़ गया। मुझे कुछ भी मालूम नहीं था । हाँ! यह पता था कि मेरा अपना खास अपने दल-बल के साथ कचेहरी में घूम रहा है। मैं 05.03.2010 को अपराह्न 2:00 बजे अपनी जीप से महन्त जी के साथ जब अयोध्या के लिए चला तो उसकी जीप मेरे जीप का पीछा करने लगी थी। मैं निश्चिन्त था और महन्त जी से कुछ अध्यात्म की चर्चा कर रहा था । मेरी जीप जिस पर मैं और महन्त जी बैठे थे वह हरैया के पास पहुँची । उसी समय मेरे खास की जीप, जिस पर एक दरोगा सवार थे, ने मेरी जीप को रोकते हुए बोले, तुम्हारी जीप से कई लोग कुचल उठे हैं। सीधे इसे घटना स्थल पर ले चलो। मैंने कहा कोई ऐसी दुघर्टना इस जीप से नहीं हुई है । उसनें कहा कुछ नहीं। आप तुरन्त इसे वापस ले चलें। मैं मजबूर हो गया और जीप को लेकर वापस महाराजगंज पुलिस चौकी पर जब आया तो दरोगा जो मुझसे 27 हजार रुपये ले लिये थे, वे पहुँच गये थे ।
       वे बोले, "प्रिन्सपल महोदय आपने मुझे खूब छकाया। तुम्हारे ऊपर 419/ 420 का वारण्ट है और तुम बस्ती में घूम रहे हो। चलो बस्ती चलना है।" मेरे साथ के महन्त जी अवाक् हो गये । वह कुछ बात करने के लिए आतुर थे कि दरोगा ने मुझे मेरे खास की जीप में बैठने का आदेश दिया और कड़ा रुख अपनाया। मैं अपनी जीप से उतरकर महन्त जी से कहा कि मैं बस्ती जा रहा हूँ। आप जीप लेकर अयोध्या जाकर बता दें। मेरा खास बस्ती में दरोगा से फोन पर फोन कर रहा था कि मैंने एम.एल.सी. के सोर्स से एस.पी. साहब से कहवा दिया है कि शीघ्र बन्द करके जेल भेज दो। कुछ नम्र रुख अपनाते हुए दरोगा ने कहा कि अब हर कीमत पर तुम्हें जेल जाना है।
         मैं अपने जीवन में कभी किसी फौजदारी के मुकदमे का मुलजिम नहीं था। सारा जीवन शान्तिमय था। मुझे कारागार शब्द पढ़ने को जरूर मिला था लेकिन मैने देखा नहीं था। आज मैं हार्ट का मरीज हूं। शरीर थरथर कांप रहा है। 70 वर्ष का बूढा हूँ। पेट के अल्सर का मरीज हूँ, शुगर मेरा बहुत ज्यादा है। रोज 100 रु. तक की दवा खा रहा हूँ। इस जर्जर अवस्था में जेल जाकर कैसे रहूँगा। मेरे जीवन के इस दुःखद क्षण में भगवान भी मेरे प्रति करुणा हीन हो गया है। यही सब मैं सोच रहा था। परमात्मा के प्रति जो गहरी निष्ठा थी, वह चूर- चूर हो रही थी। आस्थावादी होते हुए भी मैं अपने भाग्य को कोसने लगा और इस स्थिति में अपने को भूल सा गया।
        दरोगा पुलिस चौकी पर ले जाकर बैठाया और बोला कि बूढ़े हो नहीं तो जमीन पर बैठाता बेंच पर बैठो। अभी मुझे वारंट तैयार करके तुम्हें जेल भेजना है। मेरे पास, वहाँ कोई नहीं था मैं अनाथ था। दरोगा जेल भेजने की तैयारी में लगा था क्योंकि वह मेरे खास से पूर्णतया प्रभावित था। उसकी जीप मेरे स्वागत में खड़ी थी, दरोगा का सम्पर्क उससे बना हुआ था। सायं होने वाली थी। चिड़िया अपने घोसलों में चहचहाती जा रही थी। पथिक अपने घरों की ओर थे। मैं पुलिस के चंगुल में था। मुझको जेल भिजवाने का संकल्पी मेरा खास अपने कुकृत्य से आह्लादित था। सायं सात बजे मेरा वारंट बना । मैं दरोगा द्वारा दबोचकर जेल के फाटक तक पहुँचा दिया गया और दरोगा एक पुलिस के सहयोग से जेल के सिपाहियों से यह कहकर चला गया देखियेगा।
        जिस तरह से राजा उग्रसेन, जो कंस के पिता थे ,को कंस ने निर्दयता के साथ जेल में डाल दिया था। उस स्थिति में मेरे खास ने दरोगा के सहयोग से मुझे जेल में डाल दिया। 5 मार्च 2010 का सायं काल का समय था। जब मैं जीवन में प्रथम बार जेल के विशाल उदर में घुसाया गया। मेरे जेल के प्रथम कक्ष में पहुंचते ही जेल के सिपाहियों ने घेर लिया। मेरी तलाशी अंगप्रत्यंग की लेने लगे। यहाँ तक अण्डकोश तक को नहीं छोड़ा। कहने लगे कि बहुत से लोग चूतड़ के पास रुपये छिपाकर से आते हैं। वे तरह-तरह से प्रताड़ित करके वहीं ले गये। जहाँ वो गन्दे काले कम्बल और एक लोहे का कटोरा मिलता है। मेरे पास कुछ सामान नहीं था। एक बीस रुपये की नोट भी उसे एक सिपाही ने निकाल लिया। मैं कारागार के कई द्वारों को पार कर 5 नम्बर की बैरक में ले जाया गया।
      सायं हो चुकी थी जिस बैरक में मुझे ले जाया गया। उसमें 125 से अधिक कैदी थे। रात्रि में जब मैं बैरक में पहुंचा तो नीचे जमीन पर लोगों का विस्तरा लगा था। मुझे भी किसी तरह से जमीन पर कम्बल बिछाने को मिला तभी संयोंग से चार-पाँच लोग जो उसी बैरक में थे ने मुझे देखा। वे मेरे पास आये बोले, साहब आप कैसे यहाँ आ गये। मैंने कहा बाबू विधि का विधान विचित्र होता ? हमारे खास ने फर्जी मुकदमा बनाकर मुझे 419/420 में जेल में भिजवा दिया है । सब लोग उसे धिक्कारते हुए संवेदना प्रकट करने लगे। ओमप्रकाश जी एक शिक्षक भी वहां थे वे बोले ,यह तो बड़ा विचित्र हुआ मैंने भूषण की कविता पढ़ी है-

सबन के ऊपर ठाढ़ रहिबे के योग
ताहिं खड़ा कियो छ हजारन के नियरे।

        आपने कई विषयों से एम.ए. किया है। पी-एच.डी. हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हैं। 42 वर्ष तक प्रधानाचार्य रहे हैं। यह कैसे आप का समय बदल गया। आप 420 हैं? यह किस अधिकारी और दरोगा ने लिखकर आपको जेल भेज दिया। आप घबराये नहीं । यह आपके धैर्य की परीक्षा हो रही है। हाँ ! यहाँ पर राक्षसों जैसा कैदियों का व्यवहार होता है । यहाँ का भोजन पशु आहार सा होता है। यहाँ मुर्दे से भी कफन लिया जाता है। आपका मामला पेंचीदा है। आपकी जमानत होने में कई महीने भी लग सकते हैं। आपको हम लोग अधिक से अधिक प्रसन्न रखने का प्रयास करेंगे। सम्पत्ति हड़पने के लिए आप का अपना खास इतना बड़ा दुष्कर्म कर रहा है।
        संसार बड़ा विचित्र है। आपको समझाना क्या? समय बड़ा बलवान होता है।  मैंने देखा था कि आपके दफ्तर में बड़े-बड़े लोग आया जाया करते थे। एक हजार के ऊपर छात्र और 50 से ऊपर कर्मचारियों के आप संरक्षक थे। आज आप इस जेल में कैदी हैं। मुझे अपार दुख है।
       सायंकाल जो लोग जेल जाते हैं उनको भोजन आदि नहीं मिलता है क्योंकि जेल के कैदी शाम 06 बजे तक खाकर अपने बैरिकों में बन्द हो जाते हैं। इन कैदियों की देखरेख जेल की पुलिस करती है और इसी में पुराने कैदियों को सरदार बन दिया जाता है ,जो सदैव गालियों से ही बोलते हैं। यहाँ बैरिकों में सदैव ये कैदी सरदार लोगों से कठोर काम लेते हैं। यहाँ तक पाखाने की नाली तक साफ कराते हैं। कारागार में जो कार्य करना नहीं चाहते वहाँ बैठकी देनी पड़ती है। यह बैठकी छह से सात सौ रुपए तक की है। मैंने भी बैठकी देने का वचन दिया। उस समय मेरे पास एक रुपया भी नहीं था। मैं विकल था। शनिवार के दिन मिलाई नहीं होती है। मैं शुक्रवार को सायं जेल गया। लोगों ने कहा कल रविवार को मिलाई होगी, आप किसी से कुछ हजार रुपये मंगा कर दे दें। नहीं तो , ये सिपाही परेशान करेंगे। मैंने कहा ठीक है , कल की स्थिति देखकर बताऊँगा। वे बोले, रुपया देकर बैठकी करा लें नहीं तो काम करना पड़ेगा। इन कैदियों के मुँह पर हमेशा गाली सवार रहती है। 
       जेल में सर्वत्र गाली-गलौझ देखने को मिलती है। यह मानव की अज्ञानता और असभ्यता का प्रतीक है। देश आजाद हुए 60 वर्ष हो गया। लेकिन इस समय जेल की स्थिति नारकीय स्थिति के समकक्ष है। मैं दूसरे दिन जेल के विस्तृत परिसर को देख रहा था। दस से पन्द्रह फुट ऊँची बाउण्ड्री दीवाल कारागार की कवच है। कैदियों को पशुवत बैरिकों में रखा जाता है। जहाँ उसकी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। यदि कोई बैरक के सरदार की बात नहीं मानता है तो पाँच-छः कैदी मिलकर वहीं बेरहमी से उसकी पिटाई करते हैं। सर्वत्र आतंक व उत्पीड़न का स्वर निनादित होता है। सौ से अधिक कैदियों पर एक शौचालय, ऊँट के मुँह में जीरा का कार्य करता है। रात्रि में सभी कैदी पशुओं के समान बैरिकों में बन्द कर दिये जाते हैं।
       कारागार का एक दिन बीत रहा था । दिन में एक दर्जन और अधिक लोग मेरे परिचित निकले। सभी लोग मेरी मदद करते रहे। दूसरे दिन 10 बजे श्री कृष्ण चन्द्र सिंह पूर्व ब्लाक प्रमुख बस्ती ने जेलर के पास बैठकर मुझे बैरक से बुलवाया। मैं जेलर साहब के पास गया । वहाँ मेरा अच्छा सम्मान हुआ। उसे देखकर जेल पुलिस के लोग विशेष प्रभावित हुए। जेल के अन्दर मिलने वाले भी आये। इन मिलने वालों से मुझे आत्मबल मिला। मैं जेल में था । मेरा स्वास्थ्य खराब था। हार्ट का पेसेन्ट था। जेल में लोगों ने कहा कि जो लोग विशेष क्रिमिनल हैं । उन्हें पूर्ण सुविधा मिलती है। शेष का शोषण किया जाता है।
        मैं जेल में था जो कभी सोचा नहीं था कि मेरा खास मेरी सम्पत्ति लेने के लिए इसे अपना अन्तिम प्रयास समझता था। वह यह जानता था कि यह जेल की यातना से घबरा जायेंगे और चिल्लाकर अपनी सम्पत्ति मुझे दे देंगे। जेल में लोग मुझसे यही कहते थे कि जो जेल एक बार आ जाता है उसे तीन बार जेल में आना पड़ता है। इसलिए जो जेल में आ गये हैं उन्हें इस उक्ति का ध्यान रखना चाहिए- "जेल में आओ, पेल के खाओ।" जेल से डरना नहीं चाहिए। यहाँ विधि के विधान यही है। अच्छे और बुरे दोनों लोग यहां आते हैं। लेकिन सबके लिए एक ही बैरिक है। जो मानवता की छाया ग्राहिणी है। यहाँ सर्वत्र घृणा और ईर्ष्या का बोलबाला है। मनुष्यता नहीं है। विद्रोही जेल के कैदियों का सुधार किया जाना चाहिए। इससे देश का कल्याण सुनिश्चित होगा।
         कारागार में सर्वत्र चौकसी और धन वसूली का कार्य चरम सीमा पर रहा है। कैदियों की चार बार गिनती होती है। जहाँ कुछ कैदी गाली से लेकर मार भी खाते हैं। सर्वत्र शोषण और उत्पीड़न शक्तिशाली है। जो कैदी सप्ताह में दो बार से अधिक अपने परिजनों से मिलता है । उसे 20 रु. रोज शुल्क देना पड़ता है। रोज जो कैदी मिलने के लिए जाता है जब वह लौटता है तो उसकी तलाशी लेते समय बीस से 30 रुपये कैदी से वसूल किया जाता है। ऐसा कार्य दो से तीन स्थानों पर होता है जो कैदी रोज मिलता है उसे 10 से लेकर 30 रु. प्रतिदिन देना पड़ता है। इस शोषण और उत्पीड़न यज्ञ से मैं अलग नहीं रहा। प्रतिदिन मिलने वाले से पैसा माँगकर मैं बाँटता था और अपनी बैठकी का समय काटता था। जेल को सुधार गृह की संज्ञा दी जानी चाहिए । इसलिए कैदियों को सुविधा देकर उन्हें अच्छा बनाने का प्रयास किया जाय। सामान्य कोटि के कैदियों को अपराधिक प्रवृत्ति के कैदियों से दूर रखा जाय। ऐसे कैदी जो किसी कारण से जेल तक पहुँचा दिये गये हैं । उनकी सुनवाई के लिए एक जेल मजिस्ट्रेट की व्यवस्था की जानी चाहिए। सामान्य मामले में फँसे कैदियों की व्यावहारिक समीक्षा करके उन्हें जेल से शीघ्र जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
         जब मैं जेल चला गया तो मेरे खास ने उसी दिन अपने बालों और मूँछ को मुण्डा कराया। यह मुण्डन रात्रि 10 बजे बस्ती में हुआ। नाई को 100 रु. दिया गया। और यह प्रचार किया गया कि हमारे पिता का देहान्त हो गया। मेरा खास कल बल छल से उत्पीड़न करता रहा। वह प्रयास में था कि मेरी जमानत न हो और मैं जेल में महीनों रहूँ। मेरे सहयोगी बाहर निकालने के प्रयास में लगे हुए थे।
         दिनांक 12.03.2010 को रात्रि के समय मैं सोया हुआ था। सबेरा हो रहा था जेल के वृक्षों की सघनता मनोहारी थी। फागुन के महीने में पवन सुहावना हो जाता है। जेल के क्यारियों में पुष्प लगाये गये थे। आम्रवृक्षों पर कोयल और पपीहे बोल रहे थे। प्रातः का सुहाना समय बैरकों में सोये कैदियों की स्मृतियों को सजग कर देता है। उसी बीच एक नवयुवक कैदी अकस्मात् रोने लगा। पूछने पर मालूम हुआ कि वह स्वप्न देख रहा था कि उसकी पत्नी कह रही थी कि मुझे अकेली छोड़कर तुम वहाँ चले गये। विधाता बड़ा निठुर है । जो मेरे रंग में भंग कर दिया। कुछ नवजवान अपने घरों की याद करने लगे और पछताने लगे। यहाँ यदि उन्हें व्यावहारिक रूप से देखा जाता तो उनमें सुधार की भावना जाग्रत हो जाती। 
    मानव एक चिन्तनशील प्राणी है उसमें सुधार लाकर उसे मनुष्य बनाया जाना चाहिए। लेकिन ये जेल मानव से पशुवत व्यवहार करके उसे जघन्य अपराधी बना देती हैं।
       बस्ती का कारागार पुराना कारागार है। इसी कारागार में मुझे मिलते जुलते समय गिनते ग्यारह दिन बीत गये। मेरी जमानत ग्यारहवें दिन हो गयी। मेरे खास ने लोक लाज से बचने के लिए चिल्लाने लगा, मैंने जमानत करवाया है। अपराधी भी अपने कुकृत्यों पर प्रश्चाताप करता है, किन्तु वह अपने अपराध को स्वीकार करके उसके प्रति निषेधात्मक रूप बना ले तो उसमें अच्छे संस्कारों का उदय हो सकता है। बार-बार अपराध करने वाला जघन्य अपराधी बन जाता है। इस कंसावतार में मेरा खास अपने अपराधों की चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने मुकदमों की संख्या बढ़ा दिया और गलत ढंग से मेरे सरस साहित्य कुटीर नगर बाजार बस्ती पर अपना कब्जा कर लिया। उसके आतंक से क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति सहयोग देने से कतराता है।
       मैं दिनांक 15.03.2010 को 11.00 बजे रात्रि बस्ती कारागार का अतिथि रहकर वापस अयोध्या आया। जो 11 मुकदमे मेरे ऊपर मेरे खास के चल रहे हैं। सब निराधार हैं किन्तु परेशानी के हेतु हैं। वह नाजायज पैसे से अधिकारियों को खरीदने में सक्षम है क्योंकि आज का अधिकारी मुकदमों को टालता है। फैसले के लिए कुछ लेन देन का तराजू रखता है, जो तौल में उतर जाता है उसका कल्याण हो जाता है।
(सन्दर्भ: “वंशावली में कनखजूरों का आतंक” मूल लेखक और प्रकाशक डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' , प्रकाशन वर्ष 2011, पृष्ठ 113 से 119 )


प्रस्तुतकर्ता का परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


लाल अंबिका प्रताप सिंह शाहगंज अयोध्या के वर्तमान राजा ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


अवस्थिति

अयोध्या जिले के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा का किला' या 'राजा की हवेली' स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है । इस वंश की स्थापना राजा दर्शन सिंह जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है। यहां राजा दर्शनसिंह ने सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये थे। जहां वह, उनके परिवार और उनके वंशज रहते हैं। यह बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      1857 के गदर हो जाने पर महाराजा मानसिंह अंग्रेजों से मिल गए थे। उनके पास कोई सामान न था तो भी उन्होंने अपना धन और अपना प्राण अंग्रेजों को निछावर करके फैजाबाद के तीस अंग्रेजों मेमों और बच्चों समेत अपने शाहगंज के किले में सुरक्षित रक्खा था और विद्रोहियों का सामना करने के के लिये डटे रहे। फिर उनको अपने सिपाहियों की रक्षा में गोला गोपालपूर पहुंचा दिया। इसी अवसर में चार मेमें और आठ अंग्रेजी बच्चे घाघरे के मांझा में बिना अन्न-जल मारे-मारे फिरते थे। महाराजा साहब ने सवारियाँ भेज कर उन्हें बुला लिया और पन्द्रह दिन तक अपने घर में रक्खा और फिर उनके कहने पर सौ कहार और 36 पालकी कर के उनको प्रासबर्न साहब के पास बस्ती भेज दिया। 

    इसी समय बागियों ने शाहगंज की गढ़ी घेर ली और महाराजा साहब के लाखों रुपये के मकान खोद डाले और जला दिये गए और बहुत सा धन लूट ले गये। डेढ़ महीने के घेरे पर बड़ी वीरता से महाराजा साहब ने विद्रोहियों को मार भगाया । इसी अवसर पर राजा रघुवीर सिंह के घर का बहुत सा सामान जो अयोध्या में लाला ठाकुर प्रसाद के घर पर धनवावाँ से भेज दिया गया था विद्रोहो लूट ले गये।

       राजा मान सिंह के बाद शाहगंज की गद्दी उनके बड़े भाई राजा रामअधीन सिंह के हाथ में आई।वह पक्के शिव भक्त थे , उनके शाप के कारण हमेशा वंशहीन होने की शापित हो गई है। जो भी मुख्य राजा होता है उसे पुत्र प्राप्ति नहीं होती है । आज शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह जी है उन्हें भी केवल पुत्री है पुत्र नहीं । 

    शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई. में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। बाद मे ब्रज बिलास कुंवर ने राजा त्रिलोकी नाथ को दत्तक पुत्र बना राजा बनाया। मान सिंह की बेटी जगदम्बा देवी थी। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था।  फिर कोर्ट में त्रिलोकी नाथ सिंह और लाल प्रताप नारायण सिंह के मध्य बहुत दिनों तक मामला चलता रहा। लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली वारिस हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया । 

    अयोध्या स्थित राज सदन बाद में सत्ता के केंद्र में आया, परन्तु धर्म नगरी के कारण यहां सत्ता की चमक दमक शाहगंज और मेहदौना से ज्यादा रही। दिवंगत राज्य के प्रतिनिधि श्री विमलेंद्र मोहन मिश्र जी द्वारा राजा लिखे जाने पर शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप पाठक सिंह जी मुकदमा भी दायर किया हुआ है इसीलिए विमलेंद्र जी द्वारा कभी खुद को राजा नहीं लिखा गया वो हमेशा राजसदन के मुखिया के तौर पर जाने जाते थे।

    महाराज दर्शन सिंह जी शाहगंज मेहदौना के प्रारंभिक राजा थे ।अयोध्या इन्ही के अंतर्गत आता था वर्तमान में शाहगंज हवेली जो कि 70 बीघे में दर्शन  सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका सिंह जी और अन्य  परिवारो का हाल ठीक नहीं है जबकि अयोध्या महल में रह रहे इनके वंशज ( इनकी बाद की वंशावली के पुत्रियों के पुत्र) विमलेंद्र मोहन मिश्रा जो की अयोध्या के मुखिया है वे लोग शान शौकत से रह रहे हैं।


शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं 

अयोध्या जिले में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। क्षेत्र के आम जनमानस व दूरदराज से राजा की हवेली देखने आने वाले लोग कीचड़ में फिसल कर गिर जाते हैं जिससे उनको काफी चोटें भी आ जाती है, वाहन भी फस जाते हैं जिनको बाहर निकालने के लिए ट्रैक्टर की व्यवस्था करानी पड़ती है। शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह का कहना है कि कई बार उन्होंने मुख्य मार्ग को ठीक करवाने के लिए शासन प्रशासन से कहा, लेकिन  हवेली को आने वाले मुख्य मार्ग को ठीक नहीं कराया जा सका है। जिससे मुझसे मिलने वाले व पास पड़ोस के जिलों से हवेली देखने आने वाले लोग इस कीचड़ युक्त गड्ढे में गिर कर चोट खा जाते हैं।

         लोग इस हवेली को इस नाते देखने के लिए आते हैं कि धर्म नगरी अयोध्या से पुराना और गहरे रूप में जुड़ा है। अयोध्या के महाराजा ददुआ के वंशज आज भी शाहगंज हवेली में रह रहे हैं। 


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Saturday, February 14, 2026

विघ्नेश्वर शिवधाम,रामपुरवा,अयोध्या विशेष शिवाराधना कार्यक्रम जारी✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


यह मंदिर रामनगरी अयोध्या के राम मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर मिल्कीपुर तहसील क्षेत्र के शाहगंज बाजार के रमपुरवा में स्थित है। भगवान शंकर के इस मंदिर का नाम विघ्नेश्वर धाम है। इस विघ्नेश्वरनाथ महादेव धाम शिवाला मंदिर लोगों की अटूट आस्था का केंद्र है। मंदिर की परंपरा सबसे अलग तरह का है। यह स्थान अयोध्या के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थलों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत और आध्यात्मिक है। इसे विघ्नेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। यहां सर्व धर्म सम भाव का पालन किया जाता है। जात-पात का कोई भेदभाव नहीं किया जाता है और यहां का माहौल बहुत शांत और धार्मिक है। विघ्नेश्वरनाथ धाम शिवाला मंदिर का निर्माण लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व 1800 ई.के आसपास राजा दर्शन सिंह द्वारा कराया गया।
      विघ्नेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य मंदिर में काले पत्थर का एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। जो भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर के ऊपर बना 21 फीट ऊंचा गुंबद, उसकी अनूठी स्थापत्य शैली, समीप स्थित सरोवर और सरोवर से सुरंग के रास्ते मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियाँ इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं।
कुंड स्नान से विकारों से मुक्ति
मंदिर परिसर के आसपास स्थित सरोवर (कुंड) और उससे जुड़ी मान्यताएं इसे और भी प्राचीन और खास बनाती हैं। कुंड में 128 तीर्थो का जल समाहित है। मान्यता है कि मंदिर के कुंड में स्नान करने से भक्तों को सभी विकारों और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
तंत्र आधारित शिव मंदिर
यह नागर शैली से निर्मित अष्ट मंडपम व चौसठ योगिनियों वाला तंत्र आधारित शिव मंदिर है। आस पास व दूरदराज के लोग यहां मंत्र सिद्धि करने आते है। इसके भीतर 300 फुट लंबी सुरंग व दस फुट लंबा व दस फीट चौड़ा ध्यान कक्ष भी स्थापित है, अयोध्या का यह पहला शिव मंदिर है जो इतना विशालकाय है। यहां स्थापित शिवलिंग का आकार लगभग 4.5× 4 फीट का है। मंदिर का गर्भगृह करीब 25 फीट भीतर है। नागर शैली में बने इस मंदिर में भगवान शंकर विराज मान हैं. भगवान शिव का जलाभिषेक करने से भक्तों कीमनोकामना पूर्ण होती है।मंदिर के नीचे एक गुफा है जिसमें भगवान शंकर का शिवलिंग स्थापित किया गया है. इस मंदिर का कायाकल्प राजा दर्शन ने कराया था.राजा मान सिंह के बड़े भाई राजा राम अधीन पाठक इस मंदिर में शिव जी की सेवा बहुत ही तन्मयता से करते थे। जब घरेलू विवाद में आने के कारण उन्हें शाहगंज की गद्दी छोड़नी पड़ी तो यहां की पूजा अर्चना करने की व्यवस्था ही बदल गई।
सुबह शाम सूर्य किरण से शिवाराधना
 जहां सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण भगवान शिव पर पड़ती है तथा सूर्य की अंतिम किरण भगवान शिव पर पड़ने के साथ ही सूर्यास्त होता है। यहां स्थापित शिवलिंग में इस समय स्वयमेव त्रिपुंड का आकार व जटा विकसित हो रही है,जो किसी चमत्कार से कम नही है।
सूर्यदेव करते हैं भोलेनाथ का अभिषेक
बिना किसी वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी के, भगवान सूर्य सुबह के समय भगवान शंकर का अभिषेक करते हैं और शाम के समय जब अस्त होते हैं तब भी भगवान सूर्य भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं.
दो किलोमीटर लंबी सुरंग
पुजारी अमित जोगी ने बताया कि मन्दिर के दक्षिण करीब दो किलोमीटर दूर राजा दर्शन सिंह ने शाहगंज स्टेट का निर्माण कराया और वहां पर अपने पुत्र मानसिंह की ताजपोसी की थी ।स्टेट से मंदिर तक जाने के लिए दो किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी कराया था जो अब मात्र 300 फीट ही बची है।जिससे होकर मंदिर के गर्भगृह में जाया जा सकता है।
मंदिर में पुजारी रोज बदलते रहते हैं. 
यहां पर साल के 365 दिनों के हिसाब से 365 पुजारी नियुक्त किए गए हैं. ये पुजारी हिंदू धर्म के सभी जातियों के हैं, चाहे वह SC हो या पासी, अहीर हो या बनिया, ब्राह्मण हो या क्षत्रिय. सभी जातियों के पुजारी एक-एक दिन भगवान शंकर की पूजा आराधना करते हैं.पुजारी अपने घर से भगवान शंकर के लिए प्रसाद बनाकर लाता है और शंकर भगवान को भोग लगाने के बाद वही प्रसाद सभी में वितरित किया जाता है, जिसे सभी जातियों के लोग सहर्ष स्वीकार करते हैं. यहां जात पात का कोई भेदभाव नहीं है. 
सी .एम. योगी से मिला 2 करोड़ से सुविधाएं बढ़ी 
यह मंदिर पहले जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था.आसपास के गांव के लोग ही चंदा लगाकर मंदिर की देखभाल करते थे. लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद इस मंदिर को भी 2 करोड़ रुपए की सौगात मिली है. अब यहां पर श्रद्धालुओं के लिए एक खूबसूरत विश्रामालय, एक सुंदर प्रवेश द्वार, पेयजल की व्यवस्था, आधुनिक शौचालय, सुंदर सड़क, विद्युत लाइटिंग, पार्किंग, और एक खूबसूरत कुंड जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं से सुसज्जित किया जा रहा है.
शिवाराधना के विशेष कार्यक्रम होते हैं 
हर वर्ष शिवरात्रि से पूर्व शिव बारात व विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। सावन के महीने में लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं और भगवान शंकर का दर्शन पूजन कर भाव विभोर होते हैं.
15 वर्षों से कलश यात्रा जारी
यह कलश यात्रा पिछले 15 वर्षों से लगातार महाशिवरात्रि से पूर्व आयोजित की जा रही है। इस वर्ष भी आयोजन का संयोजन आनंद सोनी द्वारा किया गया। स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि इस परंपरा ने क्षेत्र में धार्मिक एकता और उत्साह को नई पहचान दी है।
भव्य कलश यात्रा निकली
अयोध्या में महाशिवरात्रि से पूर्व आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम उस समय देखने को मिला जब दिनांक 14 फरवरी 2026 को शाहगंज क्षेत्र स्थित विघ्नेश्वर नाथ मंदिर से भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में लगभग 2000शिवभक्तों और श्रद्धालुओं नेउत्साहपूर्वक भागलिया।
       यह यात्रा करीब 4 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए रामपुरवा शिवाला मंदिर पहुंची, जहां विधिवत समापन किया गया। यात्रा के दौरान पूरा वातावरण ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयकारों से गुंजायमान रहा। गाजे-बाजे और भक्ति मय संगीत के साथ निकली इस शोभा यात्रा में नन्हे-मुन्ने बच्चों द्वारा आकर्षक झाँकियाँ भी प्रस्तुत की गईं, जिसने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने वाले हर भक्त की मनोकामना भगवान भोलेनाथ अवश्य पूर्ण करते हैं। महाशिवरात्रि से पहले निकली इस भव्य कलश यात्रा ने एक बार फिर अयोध्या में शिवभक्ति की अलख जगा ।
    महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर गाजे- बाजे के साथ भव्य बारात शोभायात्रा निकाली गई। श्रद्धा से सराबोर इस शोभा यात्रा में बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु शामिल हुए। डी जे की धुन पर भक्त झूमते नजर आए, वहीं महिलाएं सिर पर कलश धारण कर मंगलगीत गाते हुए हर-हर महादेव के जयकारे लगाती रहीं। शिव बारात की शुरुआत क्षेत्र के विघ्नेश्वर नाथ धाम से हुई, जो काली माता मंदिर, हनुमानगढ़ी, केवट नगर, ब्रह्म बाबा स्थान, दुर्गा मंदिर व शिव मंदिर होते हुए शाहगंज बाजार स्थित सिद्धेश्वरनाथ धाम पहुंची। यहां श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। इसके बाद बारात सिद्धेश्वर नाथ मंदिर से रमपुरवा स्थित विघ्नेश्वरनाथ धाम शिवाला मंदिर के लिए रवाना हुई। पूरे मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर बारात का भव्य स्वागत किया। भक्तों ने भगवान भोलेनाथ की झांकी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।शिव बारात पुनः सिद्धेश्वर नाथ धाम पहुंचकर संपन्न हुई।
शिव बारात विघ्नेश्वर नाथ धाम के मुख्य पुजारी अमित जोगी के साथ आनंद सोनी, अरविंद यादव ,शिवकुमार, आकाश, सचिन, विपिन, अंकित ,संगीता मिश्रा, गायत्री ,अनूप ,पूनम ,काजल सहित बड़ी संख्या में शिव भक्त शामिल हुए हैं।
हवन-पूजन का सिलसिला प्रारंभ
यात्रा के समापन के पश्चात रामपुरवा शिवाला मंदिर में विधि-विधान से हवन- पूजन का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है। श्रद्धालुओं ने भगवान भोलेनाथ से सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए पुलिस बल के जवान तैनात रहे, ताकि किसी प्रकार की अप्रिय घटना न हो और श्रद्धालु शांतिपूर्वक कार्यक्रम में भाग ले सकें।
   


राजा मानसिंह पर मनमानी का आरोप और विरासत की अस्थिरता का दौर✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

यह कहानी शाहगंज अयोध्या के वर्तमान राजा लाल अम्बिका प्रताप सिंह के सोशल साइट पर डाले गए एक विवरण के आधार पर आधारित  है।

महाराजा दर्शन सिंह की संताने:

अयोध्या के राजा दर्शनसिंह के तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह

2.राजा रघुबर दयाल सिंह और

3. राजा मान सिंह 

राजा रामाधीन सिंह से मत भिन्नता

राजा रामाधीन सिंह सबसे बड़े होने के नाते राजा बने। उनकी राजकाज में इच्छा कम थी। वे शिव जी परम के भक्त थे । शाहगंज के पास रमपुरवा में में जो पारिवारिक शिव मंदिर है उसी में दोनों समय पूजा पाठ और संध्या आरती किया करते थे । मझले भाई मानसिंह को फौज की जिम्मेदारी मिली हुई थी वह लड़ाई लड़कर जो धन को इकट्ठा करते थे। इससे उनके मन में यह इर्ष्या जग गई कि मेहनत मैं करूं और इसका भोग राजा रामादीन सिंह करें । बड़े होने के कारण राजा रामांधीन सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। मान सिंह इनसे खुश नहीं थे क्योंकि युद्ध जीतकर खजाने को वे भरते और बड़े होने के कारण वह रामाधीन के नियंत्रण में चला जाता था।

भाई की हत्या की साजिश 

मान सिंह अपने भाई रामाधीन सिंह से खुश नहीं रहते थे । वह उनकी हत्या कराना चाहते थे । उन्होंने किले के मुख्य गेट के सामने तोप लगवा दिया था। अपने नौकरों को आदेश दिया था कि जब राजा साहब मंदिर से निकले तो उन पर तोप की बौछार कर दी जाए। 

     जब तत्कालीन रानी साहिबा को इस बात का पता चला तो रानी साहिबा ने राजा साहब से कहा कि आप पीछे के रास्ते से घर जाइए । आपकी हत्या करने का खड्यंत्र रचा जा रहा है। पर राजा साहब नहीं माने और मुख्य गेट से प्रवेश करते हुए तोप के आगे आकर खड़े हो गए। उनमें बड़ा तेज था। वह किसी से डरते नहीं थे। उन्होंने नौकरों से कहा कि तोप में  आग लगाओ । सारे नौकर डर के मारे भाग गए। फिर वहीं से उन्होंने मानसिंह को बुलवाया और कहा, राजा मैं हूं, मैं तुम्हें आदेश देता हूं की तुम तोप में आग लगाओ । मानसिंह थरथर कांपने लगे। वे उन्हें औलाद न होने का शाप भी दिए। घर का माहौल बिगड़ चुका था और एक छत के नीचे रहना मुश्किल हो गया था। इससे बचने के लिए राजा रामाधीन सिंह अयोध्या जिले में स्थित शाहगंज की हवेली छोड़कर महारानी और अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ वाराणसी चले गए। उन्होंने कहा था कि गद्दी सदा निर्माण से चलेगी। यह एक तरह का शाप था।    

रूठे भाई को मानने वाराणसी गए 

वाराणसी में रामाधीन सिंह शिव भक्ति में खूब रम गए और शिव आराधना में खूब प्रसन्न भी रहने लगे थे। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। उन्होंने ज्योतिषी की सलाह लिया तो पता चला कि बड़े राजा साहब रामाधीन सिंह का उन्हें शाप लगा हुआ है। जब तक वे वापस हवेली नहीं आएंगे वंश नहीं चलेगा। मान सिंह अपने कुछ और परिजनों के साथ वाराणसी गए । राजा साहब को वापस लेने के लिए उनसे बहुत बिनती की। राजा साहब वापस लौटने से मना कर दिया। तब मान सिंह ने कहा हम आपको वापस लिए बिना नहीं लौटेंगे और ना ही अन्न जल ग्रहण करेंगे। इसी तरह कई दिन बीत गए। 

        रानी साहिबा ने कहा आप अपना फर्ज और भाई परिवार की बात को अपने न्याय के तराजू में तौलिए और जो पलड़ा भारी लगे वैसा निर्णय कीजिए। तीन दिन बाद राजा साहब शाहगंज लौटने को राजी हो गए पर वह यहां का अन्न जल ग्रहण ना करने की प्रतिज्ञा कर लिए थे। उनके साथ ऊंट से प्रयाग जी से पानी आ जाता और वे अपने साथ लाए अन्न को ही ग्रहण किए। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। 

भाई के वंशज शाहगंज में 

राजा रामादीन सिंह के पुत्र का नाम विश्वनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और शंकर नाथ सिंह रहा। विश्व नाथ सिंह ने जहर देकर छोटे भाई शंकर नाथ की हत्या करा दी थी । तो शंकर नाथ ने विश्वनाथ को बेअवलाद होने का शाप दे दिया था। जो खुद बरम बाबा बनकर हवेली में अभी भी रहते हैं। काशी नाथ के वंशज लाल धर्मेंद्र नाथ सिंह थे और उनके पुत्र लाल अम्बिका प्रताप सिंह वर्तमान में राजा हैं।जो शाहगंज अयोध्या के महल के एक हिस्से में में रहते हैं। 

भाई राजा रघुबर दयाल सिंह गोंडा और बहराइच के नाज़िम

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था । राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी।वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि) की उपाधि पाए थे। वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843 ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली थी। 

मानसिंह ने की थी दो शादियां, एक बेटी हुई 

उनके इस कृत्य से बाद में मान सिंह को कन्या रत्न प्राप्त हुई जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा।जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था। 

अनिश्चितता भरा रहा 17 साल

सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर रहा जो 1987 को लाल प्रताप नारायण सिंह को राजा के रूप में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिलने पर स्थिर हो सका था। इस बीच महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह भी शासक रहे।

मानसिंह ने अपनी विधवा को वसीयत लिखा 

संवत 1927 वि /11 अक्टूबर 1870 ई में मृत्यु हो जाने के पूर्व ही स्वर्गवासी महाराज मान सिंह ने एक वसियतनामा लिखकर एक सन्दूक़चे में बन्द कर दिया था। वह सन्दूक़चा फैज़ाबाद के हाकिमों ने खोला तो उसमें लिखा था कि हमारे मरने पर हमारी विधवा महारानी सुभाव कुँवरि उत्तराधिकारिणी होगी।

महारानी ने त्रिलोकीनाथ सिंह को दत्तक पुत्र बनाया

राजा मानसिंह की महारानी सुभाव कुँवरि सहिबा ने उसी वसियतनामे के अधिकार से राजा रघुवीर सिंह के कनिष्ठ पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह को गोद ले लिया था। जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि सत्ता उत्तराधिकार और गोद लेने की प्रक्रिया से आगे बढ़े। गोद लेने की इसी कानूनी और पारंपरिक प्रक्रिया के तहत,लाल त्रिलोकीनाथ सिंह को गोद लिया और उन्हें मेहदौना (अयोध्या) का उत्तराधिकारी बनाया था। यह निर्णय फैजाबाद के अधिकारियों द्वारा वसीयतनामा खोलने के बाद लिया गया था,जिसमें वे उत्तराधिकारी बनीं थीं। राजा त्रिलोकी नाथ सिंह नाम मात्र के राजा बन सके थे।

बेटी का विवाह और नाबालिक दौहित्र का गोदनामा

महाराजा मानसिंह के केवल एक बेटी श्रीमती ब्रजविलास कुँवरि उर्फ बच्ची साहिबा थीं। उसमें अपने पिता की वीरता और बुद्धिमत्ता की झलक लिए हुई थी। वह बाल्यकाल से ही युद्ध और प्रशासन में रुचि रखती थी। अक्सर वह अपने पिता के साथ दरबार में बैठकर मामलों को सुनती और सुझाव देती।उनका विवाह आरा के रईस बाबू नरसिंह नारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं के पुत्र लाल प्रताप नारायण सिंह हुये जो ददुआ साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। ददुवा साहब नाबालिक थे । अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही।

प्रिवी कॉन्सिल ने दौहित्र को राजा माना 

लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये। अभी तक इनकी राजधानी शाहगंज ही रहा।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Friday, February 13, 2026

साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक - अयोध्या के महाराजा मानसिंह आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृतआयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य कासृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :- 

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली 'सर' की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ "वीर" या "साहसी" होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी ।के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित 'द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड  खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब 'लंबे समय तक चलने वाली' या 'दृढ़ता से लड़ी जाने वाली' लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा 

द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :- 

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लक्षिराम जी ने निम्नलिखित छन्द पढ़ा था -

कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ ।       वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।      कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।

- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

         राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह - बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.राजा रघुबर दयाल सिंह - 

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे।वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह द्विजदेव  :- 

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे।उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों   ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।"

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

    इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

       इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा 

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

    इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

 x        x        x       x         x             

मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।

विरोधियों को मात दिया :- 

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा। 

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:- 

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। "मैं अब अकेला हूँ... पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए," मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :- 

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया 

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। "तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं," सेनापति ने डरते हुए कहा, "यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।"

       मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।" रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था।          राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

     जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, "महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।" मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, "वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

     इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:- 

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें "राजा-बहादुर" की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में "कायम - जंग" की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ "महाराजा " की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था। 

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :- 

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

    एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, "मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।"

     उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन :- 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार :- 

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, "युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।"

   महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :- 

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :- 

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

'द्विजदेव' साहित्यिक उपाधि :- 

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम 'द्विजदेव' है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययन परक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

1.'श्रृंगारबत्तीसी' 

2.श्रृंगारलतिका'

3. 'शृंगार चालीसी' 

4. 'अवमुक्त पंचदशी' 

5. 'मान मयंक' 

6. 'लतिका सौरभ' 

श्रृंगारलतिका :- 

'श्रृंगारलतिका' का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :- 

'श्रृंगारबत्तीसी' भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

'मान मयंक' :- 

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:- 

शृंगार चालीसी' में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है। 

लतिका सौरभ:- 

दोहा - 

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।

भाषा :- 

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था-

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।

आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के 

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।


बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।।


बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन।

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।


भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।


घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव, 

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ, 

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)