इतिहास के अद्भुत रहस्य
Thursday, May 14, 2026
अवध के ऐतिहासिक स्मारक संरक्षण के बढ़ते संकट का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट संकलन डा. राधेश्याम द्विवेदी
Wednesday, May 13, 2026
पशुपतिनाथ है नेपाल का अद्भुत शिव मंदिर ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल के सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है जो काठमांडू शहर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व में सुंदर और पवित्र बागमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ पर रोज हजारों की संख्या में भक्त दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरा करते हैं। 'पशुपति' के - पशु का मतलब 'जीवन'और 'पति' का मतलब ‘स्वामी’ या ‘मालिक’ होता है , यानी 'जीवन के मालिक' या 'जीवन के देवता' को पशुपति भगवान कहा गया है । यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है। मुख्य पगोडा शैली का मंदिर सुरक्षित आंगन में स्थित है जिसका संरक्षण नेपाल पुलिस द्वारा किया जाता है। पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने का प्रयास किया गया है।
पौराणिक मान्यताएं :-
1. इस मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।
2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।
3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद अपने ही बंधुओं की हत्या करने की वजह से पांडव बेहद दुखी थे। उन्होंने अपने भाइयों और सगे संबंधियों को मारा था। इसे गोत्र वध कहते हैं। उनको अपनी करनी का पछतावा था और वे खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। खुद को इस दोष से मुक्त कराने के लिए वे शिव की खोज में निकल हुए थे।
शिव जी नहीं चाहते थे कि जो जघन्य कांड पांडवों ने किया है, उससे उनको इतनी आसानी से मुक्ति दे दी जाए। इसलिए पांडवों को अपने पास देखकर उन्होंने एक बैल का रूप धारण कर लिया और वहां से भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन पांडवों को उनके भेद का पता चल गया और वे उनका पीछा करके उनको पकड़ने की कोशिश में लग गए। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। इसी भागा दौड़ी के दौरान शिव जमीन में लुप्त हो गए और जब वह पुन: अवतरित हुए, तो उनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर बिखर गए।
शिव जी ने नेपाल की पूरी भौगोलिक स्थिति को इस्तेमाल करते हुए एक तांत्रिक शरीर की रचना की, ताकि वहां रहने वाले सभी लोग और हरेक प्राणी एक बड़े मकसद के साथ जिए।
नेपाल के पशुपति नाथ में उनका मस्तक गिरा था और तभी इस मंदिर को तमाम मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। केदारनाथ में बैल का कूबड़ गिरा था। बैल के आगे की दो टांगें तुंगनाथ में गिरीं। यह जगह केदार के रास्ते में पड़ता है। बैल का नाभि वाला हिस्सा हिमालय के भारतीय इलाके में गिरा। इस जगह को मध्य-महेश्वर कहा जाता है। यह एक बहुत ही शक्तिशाली मणि पूरक लिंग है। बैल के सींग जहां गिरे, उस जगह को कल्पनाथ कहते हैं। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग जगहों पर मिले।
मन्दिर का विस्तार :-
यह मंदिर आश्रमों के साथ एक बड़े हिस्से में फैला हुआ है जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को एक अलग परम शांति का अनुभव करवाता है। यह मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। मंदिर की द्वी स्तरीय छत का निर्माण तांबे से किया गया है जिनपर सोने की परत चढाई गई है।
मंदिर वर्गाकार के एक चबूतरे पर बना है जिसकी आधार से शिखर तक की ऊंचाई 23मी.7 सेमी.है। मंदिर का शिखर सोने का है जिसे गजुर कहते हैं। परिसर के भीतर दो गर्भगृह है एक भीतर और दुसरी बाहर। भीतरी गर्भगृह वह स्थान है जहां शिव की प्रतिमा को स्थापित किया गया है जबकि बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है। भीतरी आंगन में मौजूद मंदिर और प्रतिमाओं में वासुकि नाथ मंदिर, उन्मत्ता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मूर्ति, और 184 शिवलिंग मूर्तियां प्रमुख रूम से मौजूद है जबकि बाहरी परिसर में राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग और पंद्र शिवालय गुह्येश्वरी मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट स्थिति है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है। किसी समय यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी।
पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।
निर्माण का समय :-
इस मंदिर का इतिहास 400 ईसा पूर्व का है, जिसका निर्माण नेपाल के पूर्ववर्तियों द्वारा समय-समय पर कराया गया है। सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में इस मंदिर का निर्माण कराया था। 605 ईस्वी में अमशु वर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुगृहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया था।
यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला के कारण 1979 ईस्वी में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया है। यह मंदिर नेपाली पैगोडा शैली में पुनर्निर्मित है, जिसकी छत सोने की है और चारों द्वार चांदी से मढ़े हुए हैं। अप्रैल 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में पशुपति नाथ मंदिर के कुछ बाहरी इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थी जबकि पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर और मंदिर की गर्भगृह को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई थी।
पंचमुखी शिवलिंग :-
मंदिर में भगवान शिव की एक पांच मुंह वाली मूर्ति है। पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर देख रहा मुख वामवेद या अर्धनारीश्वर है, तो दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोर कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है।
सोने की छत और चांदी के दरवाजे और असीम सम्पत्ति :-
इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। मंदिर में सोने और चांदी का बहुतायत से प्रयोग किया गया है, जो इसकी भव्यता और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। यह मुख्य मंदिर नेवारी वास्तुकला शैली में निर्मित है। इसकी दो मंजिला छतें तांबे की हैं जिन पर सोने की परत चढ़ी हुई है । मंदिर के द्वार चांदी की चादरों से ढके हुए हैं। हाल ही में, मंदिर के शिवलिंग के चारों ओर एक सोने की 'जलहरी' भी स्थापित की गई है, जो मंदिर की समृद्ध विरासत का हिस्सा है।
नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के पास नौ किलो सोना, 316 किलो चांदी है. इसके अलावा मंदिर का 1.29 अरब रुपया (नेपाली मुद्रा) बैंकों में जमा है. इसका जिक्र एक मीडिया रिपोर्ट में किया गया है।मंदिर के शासी निकाय की ओर से प्रकाशित आंकड़ों के अनसार, मंदिर में पिछले 56 साल में चढ़ावे के रूप में 9.27 किलो सोना, 316 किलो चांदी चढ़ाए गए हैं। माना जाता है कि पशुपतिनाथ मंदिर शुमार नेपाल के सबसे ज्यादा पैसे वाला हिंदू मंदिरों में शुमार है. यहां रोज हजारों नेपाली और भारतीय नागरिक पैसे, सोना और चांदी का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इन आंकड़ों का जिक्र हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट में की गई है।
पीतल का विशाल नन्दी :-
पश्चिमी द्वार की ठीक सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है जिसका निर्माण पीतल से किया गया है। इस परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है।
भारतीय ,नेपाली ब्राह्मण पुजारी :-
पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। बाद में 'मल्ल राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को मंदिर का प्रधान पुरोहित नियुक्त कर दिया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे थे। बाद में में प्रचंड सरकार के काल में भारतीय ब्राह्मणों का एकाधिकार खत्म कर नेपाली लोगों को पूजा का प्रभाव सौंप दिया गया।
दर्शन का समय :-
ये मंदिर प्रत्येक दिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। केवल दोपहर के समय और साय पांच बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर में जाने का सबसे उत्तम समय सुबह सुबह जल्दी और देर शाम का होता है। पुरे मंदिर परिसर का भ्रमण करने के लिए 90 से 120 मिनट का समय लगता है।
मन्दिर का विजुअल लिंक -
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लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183
Tuesday, May 12, 2026
बौद्धकाल का महाआश्रम महसों और सेतव्या का स्तूप✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले में कुवानों नदी (जिसका पुराना नाम सुन्दरीका रहा) के तटपर स्थित महसों एक एतिहासिक गाँव है। इस गांव का तप्पा कपरी महसों विकास क्षेत्र व तहसील भी बस्ती ही है। बौद्ध काल में इसे ब्राह्मण का आश्रम, जिसे पहले महाआश्रम कहा जाता था। बाद में इसे महातीर्थ भी कहा जाने लगा था। सुन्दरी भारद्वाजसूत्त में कहा गया है कि भगवान बुद्ध ने सुन्दरिका नदी (कुवानों नदी) के तट पर ब्राह्मण सुन्दरिका भारद्वाज से धर्म से सम्बंधित शास्त्रार्थ किया था। यह स्थान सुन्दरिका भारद्वाज आश्रम के रुप में भी पहचाना गया तथा स्तूप का अवशेष भी मिला है।
संदर्भ: (-पुरातत्व संख्या:21, पृ. 45 एवं प्रागधारा संख्या: 8, पृ.113 )
यहां कपिल नामक ब्राह्मण की भार्या से पिप्पली नामक संभवतः महाकश्यप पुत्र उत्पन्न हुआ था।
(-संदर्भ:बुद्धचर्या पृ. 38 )
बौद्ध परंपरा और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पिप्पली और महाकाश्यप एक ही व्यक्ति के दो नाम या चरण हैं। महा काश्यप का जन्म का नाम 'पिप्पली' (या पिप्पली मानव) था। जब वे भगवान बुद्ध के शिष्य बने, तो बुद्ध ने उन्हें महाकाश्यप (महान ऋषि) नाम उपाधि स्वरूप प्रदान किया था।
महाकाश्यप बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे और वे अपनी तपस्या और तपस्वी प्रथाओं (धुतांग) के लिए जाने जाते थे। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, उन्होंने प्रथम बौद्ध संगीति का नेतृत्व किया था।
सुन्दरिका भारद्वाज प्रसिद्ध बौद्ध ब्राह्मण :-
सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध परंपरा के एक प्रसिद्ध ब्राह्मण हैं, जिनका उल्लेख मज्झिम निकाय सप्तम वत्थसुत्त में मिलता है। वे सुन्दरिका नदी के तट पर अग्निपूजा और अग्निहोत्र का पालन करते थे। सुन्दरिका कोसल में एक नदी, जो पापों को धोने में कारगर मानी जाती है।
(-संदर्भ:मज़्झिम निकाय 39)।
वहाँ सुंदरिका भारद्वाज ने अग्नि के सम्मान में यज्ञ किए और ऐसे ही एक यज्ञ के दौरान बुद्ध से मुलाकात की।
(-संदर्भ:संयुक्त निकाय,आई.167,
संयुक्त निकाय, पी.पी.79)
भगवान बुद्ध से भेंट: सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न देखा। शुरुआत में वे बुद्ध को मुंडक (सिर मुंडवाया हुआ) समझकर उनसे पीछे हटने लगे, लेकिन फिर उनके पास जाकर धर्म-चर्चा की।
एक समय बुद्ध सुंदरिका नदी के किनारे कोसल प्रांत में रह रहे थे। उस समय ब्राह्मण जाति के सुंदरिका भारद्वाज सुंदरिका नदी के किनारे अग्नि यज्ञ कर रहे थे। फिर उसने चारों दिशाओं में देखा और सोचने लगा, “अब मैं इस भेंट का भोजन किसे दूं?
महज क्षुद्र राजनीति के लिए गौतम, मौर्य, बैस ,सेंगर जैसे प्राचीन क्षत्रिय वंशों से पृथक राजपूत उत्पत्ति की मनगढ़ंत थ्योरी गढ़ने वाले मूर्ख वामियों के लिए ये पृष्ठ 3rd- 1c Bce,मतलब 2000 वर्ष पहले , पाली भाषा की सुत्तपिटक के खुद्दक निकाय से है जिसमें "राजपुत्तो" शब्द क्षत्रिय पर्याय के रूप में आया है, जिसमें स्वयं बुद्ध सुन्दरिका भारद्वाज नामक ब्राह्मण से कह रहे हैं....
न ब्राह्मणो नोम्हि न राजपुत्तो,
न वेस्सायनो उद कोचि नोम्हि।
गोत्तं परिञ्ञाय पुथुज्जनानं,
अकिञ्चनो मन्त चरामि लोके ।।
सुन्दरिका भारद्वाज ने देखा कि बुद्ध एक वृक्ष की जड़ में ध्यान कर रहे थे और उन्होंने अपना वस्त्र सिर और चेहरे पर ओढ़ रखा था। अपने बाएं हाथ में भोजन और दाएं हाथ में घड़ा लेकर वह बुद्ध के पास पहुंचा। जब बुद्ध ने सुंदरिका के कदमों की आहट सुनी, तो उन्होंने अपना सिर और चेहरा खोल दिया।सुंदरिका ने सोचा, "यह तो गंजा आदमी है, इसका सिर मुंडा हुआ है!"और वह वापस मुड़ना चाहता था।
लेकिन सुंदरिका के मन में एक दूसरा विचार आया, “ ब्राह्मण जाति के कुछ पुजारी भी गंजे होते हैं। क्यों न मैं उनके पास जाकर उनकी जाति के बारे में पूछ लूँ?”
तब सुंदरिका बुद्ध के पास गई और पूछा, “हे प्रभु, आप किस जाति में पैदा हुए थे?”
बुद्ध:
किसी के जन्म के बारे में मत पूछो।इसके बजाय, मुझसे पूछो कि मैं अपना जीवन कैसे जीता हूँ।
कोई भी लकड़ी आग पैदा कर सकती है। “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति निम्न जाति का है या उच्च जाति के परिवार से। यदि वह व्यक्ति ऊर्जावान, बुद्धिमान है और गलत काम करने के अपराध बोध से प्रेरित होकर बुराई से दूर रहता है, तो वह लोगों में एक उत्कृष्ट व्यक्ति है।”
“कुछ ऐसे श्रेष्ठ पुरुष हैं जो जीवन के सत्य को जानकर शांत हो गए हैं। वे ज्ञान के उच्चतम स्तर तक पहुँच चुके हैं। उन्होंने आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण कर ली है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को ही उपहार दिए जाने चाहिए जो भेंट के योग्य हों।”
सुंदरिका:
“मेरा यज्ञ सफल रहा होगा, तभी तो आज मुझे ऐसे महान व्यक्ति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! क्योंकि मैंने पहले कभी आप जैसा कोई नहीं देखा था, इसीलिए पहले साधारण लोग मेरे अर्पण का भोजन ग्रहण करते थे।भोज कीजिए, गुरु गौतम, आप सचमुच एक ब्राह्मण हैं। ”
बुद्ध:
“मेरे श्लोकों को सुनने के बाद मुझे दिया गया भोजन मेरे खाने योग्य नहीं है। सुंदरिका, सत्य को जानने वालों का यह मार्ग नहीं है।बुद्ध श्लोकों के उच्चारण के बाद अर्जित उपहारों को अस्वीकार करते हैं।
सुंदरिका, यही बुद्धों का शुद्ध आचरण है, यही उनका जीवन जीने का तरीका है। अन्य प्रबुद्ध भिक्षु भी हैं जो दोष और संदेह से मुक्त हैं। उन्हें अपना भोजन और पेय अर्पित करो। वे पुण्य साधकों के लिए उपजाऊ भूमि हैं। ”
सुंदरिका ने पूछा, “तो फिर, हे गौतम स्वामी, मुझे इस प्रसाद का भोजन किसे देना चाहिए?”
“सुंदरिका, इस संसार में, जहाँ देवता, मार, ब्रह्मा और मनुष्य विद्यमान हैं, बुद्ध या उनके शिष्य के सिवा कोई ऐसा नहीं है जो इस दूध-चावल को खाकर ठीक से पचा सके। इसलिए, सुंदरिका, इस दूध-चावल को किसी घासविहीन स्थान पर या ऐसे जल में फेंक दो जहाँ कोई जीव-जंतु न हों।”
तो सुंदरिका ने दूध-चावल को निर्जीव जल में डाल दिया। पानी में डालते ही दूध-चावल से सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। जैसे दिन भर गर्म की गई लोहे की गेंद को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आती है, धुआँ निकलता है और भाप निकलती है, ठीक वैसे ही दूध-चावल को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। तब सुंदरिका घबराकर, रोंगटे खड़े होते हुए, भगवान बुद्ध के पास गए और उनके निकट खड़े हो गए। भगवान बुद्ध ने सुंदरिका से श्लोकों में कहा:
“सुंदरिका, यह मत सोचो कि लकड़ी जलाने से तुम्हारा जीवन शुद्ध हो जाएगा। यह तो केवल बाहरी जलन है। कुशल और श्रेष्ठ जन इस प्रकार की शुद्धि को स्वीकार नहीं करते।“मैंने लकड़ी जलाना छोड़ दिया है। सुंदरिका, मैं अपने भीतर प्रकाश प्रज्वलित करता हूँ।
यह ज्ञान का निरंतर प्रकाश है। मेरा मन सदा एकाग्र रहता है। मैं मुक्त मन से अपना प्रबुद्ध जीवन जीता हूँ।”
“सुंदरिका, तुम अपने तपस्वी आधिपत्य के अहंकार से बोझिल हो। तुम्हारा जीवन क्रोध में जल रहा है और झूठ की राख छोड़ रहा है। तुम्हारी जीभ यज्ञ में इस्तेमाल होने वाले चम्मच के समान है। परन्तु, तुम्हारे हृदय में प्रकाश प्रज्वलित होना चाहिए। एक प्रशिक्षित मन उज्ज्वल होता है।”
“सुंदरिका, बुद्ध का धम्म, सद्गुणों से घिरे किनारों वाला एक सरोवर है । शांत मन से जीना सदा श्रेष्ठ लोगों द्वारा प्रशंसित है। धम्म के कुशल अभ्यासी उस सरोवर में स्नान करते हैं और बिना भीगे दूसरे किनारे तक पहुँच जाते हैं ।”
“सुंदरिका , सत्य, श्रेष्ठ धम्म, संयमपूर्ण जीवन और ब्रह्मचर्य जैसे अच्छे गुणों का अभ्यास करने से व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है ।
इसलिए, आपको सद्गुणों से युक्त श्रेष्ठ व्यक्तियों की पूजा करनी चाहिए । मैं ऐसे व्यक्ति को 'धम्म का अनुसरण करने वाला' कहता हूँ।”
जब बुद्ध ने इस धम्म का उपदेश दिया, तब सुंदरिका ने बुद्ध से कहा:
“उत्कृष्ट, गुरु गौतम! उत्कृष्ट! जैसे कोई उलटी चीज़ को सीधा कर दे, छिपी हुई चीज़ को प्रकट कर दे, भटके हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में दीपक जला दे ताकि अच्छी नज़र वाले लोग देख सकें, उसी प्रकार गुरु गौतम ने मुझे धम्म का उपदेश दिया, जो अनेक रूपों में स्पष्ट है। मैं गुरु गौतम, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ। भंते, क्या मैं आपके अधीन भिक्षु बन सकता हूँ?”
और वे बुद्ध के शिष्य बन गए। दीक्षा लेने के कुछ ही समय बाद, भंते सुंदरिका भारद्वाज, जो एकांत में रहते हुए, एकांत प्रिय, लगनशील, भावुक और दृढ़ थे, ने इसी जीवन में आध्यात्मिक मार्ग के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर लिया । उन्होंने अपनी बुद्धि से उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जिसके लिए एक पुत्र गृहस्थ जीवन छोड़कर भिक्षु बनता है।
उन्होंने यह अहसास किया: “पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो गया है। आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हो गई है। दुखों को समाप्त करने के लिए जो करना था, वह हो चुका है। अब पुनर्जन्म नहीं होगा।” अतः भंते सुंदरिका भारद्वाज प्रबुद्ध भिक्षुओं में से एक बन गए।
(-संदर्भ:संयुक्त निकाय 7.9 सुंदरिका सुत्त: सुंदरिका)
सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान् को कहा था “आश्चर्य! हे गौतम!! आश्चर्य! हे गौतम! यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम के पास मैं प्रब्रज्या (= संन्यास) पाऊँ, उपसम्पदा पाऊँ।”
सुन्दरिका भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् के पास प्रब्रज्या, उपसम्पदा पाई। उपसम्पदा पाने के बाद, आयुष्मान् भारद्वाज एकान्त में प्रमादरहित, उद्योग युक्त, आत्मनिग्रही हो विहरते, थोड़े ही समय मे जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य के अन्त में (निर्वाण) को, इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्त कर विहरने लगे। ‘जन्म क्षीण हो गया नहीं है’ जान लिया। सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने के बाद आयुष्मान भारद्वाज के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आयुष्मान् भारद्वाज अर्हतों में से एक हुये।
सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव:-
बाद में यह स्थान सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव बन गया। और महाश्रम से बिगड़ कर महसों नाम कहा जाने लगा। ।जैसे सरनत राजपूतों के उद्गम की सटीक जानकारी नहीं है उसी प्रकार इस वंश की भी सटीक जानकारी नहीं मिलती है।
अनुश्रूतियों के अनुसार कत्यूर साम्राज्य आधुनिक उत्तराखण्ड के कुमायूं मण्डल के राजा ब्रह्मदेव थे। ब्रह्मदेव के पौत्र अभय पाल देव ने पिथैरागढ़ के असकोट में अपनी राजधानी बनायी थी। उनके शासन के बाद उनके पुत्र अभयपाल के समय यह साम्राज्य विघटित हो गया। अभयपाल देव के दो छोटे पुत्र अलखदेव और तिलकदेव थे। महाराजा अलख देव और तिलकदेव असकोट को छोड़कर एक बड़ी सेना लेकर 1305 में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गोरखपुर व गोण्डा में आ गये। यह क्षेत्र भयंकर दलदल तथा बनों से आच्छादित था। यहां पर राजभर आदि वासियों का आधिपत्य था। इस क्षेत्र के दक्षिण में घाघरा तथा पूर्व में राप्ती बहती है जिनसे क्षेत्र की रक्षा होता थी। इन दो राजाओं ने महुली को अपनी राजधानी बना कर पाल वंश का नया प्रशासन प्रारम्भ किया। इसी प्रकार ये फैजाबाद जिले के पूरा बाजार में भी बस गये थे। कहा यह भी जाता है कि ये बाराबंकी के राजा हर्ष से जुड़े थे। पूरा बाजार के परिवार में आदिपुरुष लालजी शाह थे। जबकि बस्ती के महुली के आदि पुरुष अलख देव और तिलकदेव दो भाइयों के वंशज हैं। संभव है ये दोनो एक दूसरे से जुड़े रहे हों। अनुश्रूतियों के अनुसार दोनों भाइयों ने राजभरों के मुखिया कौलविल से महुली की सम्पत्ति अधिग्रहीत की थी। समय बीतते बीतते उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया था। ये अनेक परिवारों में विभक्त हो गये थे। इन घरों के प्रमुखो ने पाल उपनाम धारण किया था ।
(संदर्भ : “बस्ती : एक गजेटियर आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के जिला गजेटियर का वॉल्यूम 23, एचआर नेविल ,आईसीएस, इलाहाबाद द्वारा एफ लुकर, अधीक्षक सरकारी प्रेस, संयुक्त प्रांत द्वारा मुद्रित, 1907 है।)
सिसवानिया सेतव्या सिंसपावन नगर-
बस्ती तहसील का सिसवनिया पच्चीसा गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। यह आकार में बड़ा है, इसे नगर साइट कहा जा सकता है। कुंवानो सुन्दरीका नदी की धारा इस भूस्थल को दो तीन भागों में विभक्त कर रखा है।
पचीसा नाम पच्चीस विशिष्ट लोगों या पच्चीस विशिष्ट गांवों के सम्मिलित स्वरूप की तरफ भी इंगित करता है। यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। यह देखा गया है कि इस प्राचीन स्थल की औसत ऊंचाई 20 मीटर से अधिक रही है। देवराव और सिसवनिया पच्चीसा नदी के तट पर स्थित एकल सांस्कृतिक परिसर के टीले रहे हैं। ये टीले धीरे धीरे समाप्त प्राय होते जा रहे हैं। इनकाअधिग्रहण संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
पचीसा ग्राम पंचायत में - मुख्य गांव : पचीसा, छरुआछा उर्फ शोखापुरवा और निपानिया आदि हैं। 2021 में पचीसा की जनसंख्या 594 थी। सिसवनिया में उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है।
देवरांव बौद्ध विहार:-
इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है। साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देखी गयी है। यह आकार में छोटा है। इसे मठ विहार का स्थल कहा जा सकता है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183