Monday, October 19, 2026

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32) आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  प० राम लखन मिश्र जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय:-

ऐसे ही कवियों में पण्डित राम लखन मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि, राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो सं० 1960 वि० तदनुसार सन 1903 ई में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा , डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० यमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 283 - डुमरियागंज (उत्‍तर पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़कर जीता था। उनका बतौर विधायक कार्यकाल 1952 से 1957 तक रहा। विधायक बनने से पूर्व उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

     इतने महत्वपूर्ण राजनेता ,स्वतंत्रता सेनानी और कवि के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो रही है। आज के आत्म कुटुंब और स्वजातीय प्रशस्ति युग में ऐसा घटित होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इनके परिवारी जन शुभ चिन्तक और आम जन जिन्हें भी इन महानुभाव के बारे में किंचित जानकारी हो वह बस्ती मण्डल की गरिमा के लिए उसे आम जन में साझा करना चाहिए। हिन्दी भाषी विश्विद्यालय अपने शोध विषय में उक्त व्यक्तित्व को सम्मिलित करके महान योगदान कर सकते हैं।



Sunday, October 18, 2026

श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 31)आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डा. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 
जीवन परिचय -
ऐसे ही कवियों में श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि हैं, जिनका जन्म विक्रम संवत 1965 (लगभग 1908 ईस्वी) में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पास चननी ग्राम में हुआ था। बस्ती सदर तहसील और विकास खंड के अंतर्गत आने वाला एक छोटा गाँव है, जो बस्ती शहर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।जनगणना के अनुसार यहाँ लगभग 16 परिवार और 102 के आसपास की आबादी निवास करती है। चननी, दुधौरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है, जिसका नेतृत्व निर्वाचित ग्राम प्रधान करते हैं।
श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) की काव्य शैली और रचनाओं की दो सबसे प्रमुख विशेषताएँ हैं:
राष्ट्रीयता का स्वर: 
उनकी रचनाओं में देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति और समाज को जागरूक करने की गहरी भावना दिखाई देती है।
ब्रजभाषा का लालित्य: 
उन्होंने ब्रजभाषा का बहुत ही सुंदर, मधुर और कलात्मक (लालित्यपूर्ण) प्रयोग किया है, जो पाठकों को आकर्षित करता है।


Saturday, October 17, 2026

राप्ती की रेती के सन्त फागूदास जी की समाधि(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 30)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

भूमिका -

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी ने अपने शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” में  मध्योत्तर (तृतीय) ‘कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार’ नामक अध्याय का नाम दिया है। “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। जिसका नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों काऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी इसके पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  संत फागू दास जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय - 

सिद्धार्थनगर जिले में चौखड़ा गांव और बाजार डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में है। यह डुमरियागंज  तहसील मुख्यालय से लगभग 5 किमी. दूरी पर स्थित है।सन्त फागू दास जी का जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे। 

मन्दिर और समाधि -

मान्यता है कि संत फागू बाबा कहीं बाहर से आए और चौखड़ा में रह गए। यहां स्थित महाविद्यालय के पास उनकी समाधि है। यह भूमि पशुचर भूमि है। सन्त फागू दास जी के मृत्यु के बाद पेड़ के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। जहां उनकी समाधि रखी गयी, वहां पहले सूखा था। समाधि बनने के बाद वह क्षेत्र हरा-भरा हो गया। प्रत्येक गुरुवार को वहां मेला लगने लगा था । फागू बाबा के निधन को 100 वर्ष अधिक हो चुके हैं। उनके समाधि स्थल पर हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग आते हैं। 10 वर्ष पूर्व वहां विधायक निधि से कमरा बनवा दिया गया था जिसे कुछ लोगों ने मजार का स्वरूप देने का प्रयास किया था। इस  तथा कथित मजार के रूप में हुए अतिक्रमण को स्थानीय विधायक के अनुरोध पर प्रशासन ने हटवा दिया है। यह गांव उत्तर में 'बूढ़ी राप्ती नदी' और दक्षिण में 'राप्ती नदी' के बीच के मैदानी इलाके में स्थित है। यह मां बटवासनी मंदिर (गलापुर) जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।

धनाक्षरी और सवैया का उत्कृष्ट प्रयोग-

वे संतों और कवियों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में धनाक्षरी और सवैया छंद का बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। इन छंदों का प्रयोग वे अपनी भक्ति, दर्शन और नीतिपरक बातों को कहने के लिए करते थे।इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में “उपहार” पत्रिका में विशेष प्रशंसा की गयी है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

महात्मा गूंगदास राम तलहा कुटी पचपेडिया, बलरामपुर (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 28)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार
नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से महात्मा गूंगदास जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय -
महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के एक उच्चकोटि के संत और ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि थे। उनका जन्म राप्ती नदी के तट पर स्थित जिगिना (जिगना) ग्राम जिला बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में संवत 1960 विक्रमी के आस पास एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के बलरामपुर-गोंडा क्षेत्र के एक सिद्ध संत और महाकवि थे। जनपद बलरामपुर के अंतिम पूर्वी छोर पर बूढ़ी राप्ति नदी के तट पर स्थित "राम तलहा कुटी" (राम तला कुटी) उन्हीं की तपोभूमि के रूप में विख्यात है, जिसे 'बाबा गूंगदास रामतला कुटी' भी कहा जाता है। यह स्थल सिद्धार्थ नगर जिले के सीमान्तीय क्षेत्र बढ़नी रेलवे स्टेशन और पचपेड़वा स्टेशन के पास में स्थित है। कुटी राम ताल के नाम से राजस्व गांव भी है।
        इस स्थल पर पारंपरिक रूप से धार्मिक आयोजन और वार्षिक रामतलहा मेला भी आयोजित किया जाता है। एक अन्य संदर्भ नागरीप्रचारिणी पत्रिका, वर्ष 48 अंक 1, सं० 2010 पृष्ठ 112 पर उल्लिखित विवरण में गोण्डा जिले के पचपेड़वा में इनकी कुटी बताई गई है। वे इस कुटी के महंत थे। उक्त कुटी के वतमांन महंत श्री अज्ञारामदास जी ने इनकी और अपनी गुरु-परंपरा इस प्रकार दी है--- 
मुन्नादास – उद्धवदास – गूंगदास – फकीरदास – भगवानदास –– परशुराम दास – शत्रुघनदास – लक्ष्मण दास – तिलंगादास-- संगमदास- रामपुलदास- आज्ञारामदास ( वर्तमान महंत ) 2010 के समय तक के रहे हैं। 

लोकप्रिय निर्गुण भजन -
गूंग दास अपने सुंदर निर्गुण भजनों और स्थानीय सांस्कृतिक योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे एक सन्यासी और संत होने के साथ-साथ साहित्य प्रेमी थे, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को ब्रजभाषा के माध्यम से कविताओं में ढाला है –

फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी”
कोई जाने न भेदवा तुम्हार,
फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी।”

कवि महात्मा गूंगदास जी का प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोक-भजन "फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी" है। यह भजन मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के गोंडा, बलरामपुर और पूर्वांचल क्षेत्रों के संतों और गायकों (जैसे मुनीराम यादव साहेब) द्वारा बेहद श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इनके भजनों में निर्गुण और सगुण भक्ति का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है, जिसमें नैनों (दृष्टि) और अंतरात्मा के रहस्यों को बड़े ही सरल लोक-गीतों के माध्यम से समझाया गया है।
भाषा शैली -
भले ही उनका क्षेत्र (राप्ती तट) मुख्य रूप से अवधी भाषी रहा है, लेकिन उस दौर की साहित्यिक परंपरा और कृष्ण भक्ति के प्रभाव के कारण उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए शुद्ध ब्रज भाषा को चुना।मध्य और उत्तर भारत की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का अनुसरण करते हुए उन्होंने कृष्ण भक्ति, दर्शन और लोक संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से ब्रजभाषा को माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण की बाल- लीलाओं, प्रेम, और भक्ति रस का मार्मिक वर्णन मिलता है।


Friday, October 16, 2026

अति विलक्षण प्रतिभा के पुंज प्रज्ञाचक्षु कवि श्री घनराज शास्त्री ( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 27)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भूमिका -
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से श्री घनराज शास्त्री जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय -
श्री शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद की खलीलाबाद तहसील के बेलहर कर्जा नामक ग्राम में सन् 1873 में हुआ था। आपके पिता का नाम नेपाल मिश्र था और आप जब केवल दो-ढाई वर्ष के ही थे तब चेचक के कारण आपकी दोनों आँखे जाती रही थी। आप वास्तव में प्रज्ञाचक्षु थे। आपकी विद्वत्ता की इतनी ख्याति थी कि भरतपुर, अलवर, छतरपुर, मझौली, मनकापुर तथा बाराबकी के राजाओ-महा राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में बुलाकर आपका सम्मान किया था। आपके विलक्षण बैदुष्य का इससे अधिक बडा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आपने इटावा की 'ज्ञानपीठ को वनस्पति चंद्रोदय' और उत्तर प्रदेश शासन को 'धनुर्वेद' नामक ग्रन्थों के निर्माण मे अपनी अपूर्व सहायता प्रदान की थी। आप जहाँ संस्कृत के 6 विषयों के आचार्य थे वहाँ फारसी के भी मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा में काव्य-रचना करने का उन्हे इतना अभ्यास था कि प्राय कथा-वाचन ब्रजभाषा-छन्दों में ही किया करते थे । आपका निधन सन् 1958 में लखनऊ में उस समय हुआ था जब आप उत्तर प्रदेश सरकार के निमन्त्रण पर वहाँ रहकर एक पुस्तक लिखा रहे थे।

विलक्षण प्रतिभा -
आपने अपनी अपूर्व मेंघा और धारणा- शक्ति के कारण भारतीय वाङ्मय के अनक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आप एक ही दिन से ढाई हजार श्लोक कण्ठाग्र कर लेते थे। बाल्यावस्था में ही आपने अनेक विद्वानों और सन्यासियों के सत्संग का लाभ उठाकर अनेक प्राचीन दुर्लभ ग्रन्थों की जानकारी प्राप्त कर ली थी । आपको कुल 83 लाख 40 हजार श्लोक कंठस्थ थे। कहा जाता है कि आपने डॉ० भगवानदास जेसे मनीषी को भी उनके 'प्रणववाद’ नामक ग्रन्थ की रचना में अपना सक्रिय सहयोग दिया था।’ ‘प्रणववाद' भारत रत्न से सम्मानित प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. भगवान दास द्वारा संपादित और प्रकाशित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनोखा ग्रंथ है। यह ग्रंथ 1910 से 1913 के बीच तीन भागों में प्रकाशित हुआ था। इसके मूल रचयिता डॉ. भगवान दास के अनुसार, यह ग्रंथ प्राचीन काल के महर्षि गार्ग्यायण द्वारा रचित एक अत्यंत दुर्लभ और अज्ञात ग्रंथ का सारांश है। डॉ. भगवान दास को यह ग्रंथ उनके थियोसोफिकल सोसायटी के मित्र पंडित धनराज ने अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति से मौखिक रूप से सुनाया था, जिसे भगवान दास ने लिपिबद्ध किया था। पंडित धनराज का इस पुस्तक के प्रकाशित होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। इस ग्रंथ में 'प्रणव' (ॐ) के आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व, वैदिक सिद्धांतों, महा - वाक्यों, और ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े गूढ़ रहस्यों की व्याख्या की गई है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Thursday, October 15, 2026

बस्ती के अल्प ख्यातित कवि :श्री बुध यदुनाथ जी (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 26)


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरणअथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से श्री बुध यदुनाथ जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
       श्री बुध यदुनाथ जी का जन्म बाँसी तहसील के जीवा नामक ग्राम में सं० 1960 विक्रमी के आसपास पैदा हुए थे। इनका जन्म भूमि ग्राम जीवा है ,जिसे जीवा या 'जुआ' भी कहा जाता है। यह उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिला के अंतर्गत बांसी तहसील बांसी कोतवाली और मिठवल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली एक ग्राम पंचायत है।यह क्षेत्र राप्ती नदी के मैदानी और तटीय प्रभाव वाले क्षेत्रों के निकट है, जिससे यहां बारिश या बाढ़ के मौसम में कभी-कभी जलभराव या स्थानीय रास्ते प्रभावित होने की खबरें आती रहती हैं।
     आपके बारे में 'उपहार' में लिखा है, आप सभी रसों के सिद्ध हस्त कवि थे। उन्होंने श्रृंगार, वीर, करुणा, हास्य और भक्ति जैसे सभी रसों में पारंपरिक छंदों (कवित्त, सवैया और दोहा) की अत्यंत उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं। इनकी रचनाओं में गंवई संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और शास्त्रीय छंद विधान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। क्षेत्र की साहित्यिक पत्रिकाओं और 'उपहार' पत्रिका में उनके जीवन और दुर्लभ छंदों को सहेज कर समय-समय पर प्रकाशित किया गया है। इनकी भाषा शैली बड़ी परिमार्जित एवं आकर्षक है। इनका काव्य संग्रह एक स्वतंत्र ग्रन्ध है।
प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 



Sunday, October 11, 2026

श्री सीताराम शुक्ल स्वतंत्रता सेनानी कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 29) ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के अध्याय 3 तृतीय चरण के फुटकर छंदकारों की सूची में पंडित सीताराम शुक्ल जी का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसे बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान , भाग 2, प्रकाशन वर्ष 2008 के पृष्ठ 233 पर अतिसंक्षेप में अधिसूचित किया गया है। श्री सीताराम शुक्ल जी का जन्म बस्ती-बांसी मुख्य मार्ग पर बस्ती से 13 किमी दूर वर्तमान में भानपुर तहसील के बस्ती - बांसी मार्ग पर सल्टौआ ब्लॉक में स्थित भादी खुर्द में गांव में श्री रंगनाथ शुक्ल व सूर्यकली के घर में 1897 ई.में हुआ था। इनका विवाह किशोरी शुक्ला से हुआ था। बस्ती में कांग्रेस की नींव रखने वाले सीताराम शुक्ल गुलामी के कारण प्राइमरी शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके थे, लेकिन स्वाध्याय से हिंदी, उर्दू, संस्कृत की जानकारी इनको हासिल थी। गुलामी की जंजीर इन्हें स्वीकार नहीं थी। पति-पत्नी दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन की राह पकड़ ली थी।वर्ष 1919 में नासिक में कांग्रेस अधिवेशन में शुक्ल जी ने व्याख्यान दिया था , जिसके बाद वे ब्रिटिश सरकार की निगाह में आ गए थे। आजादी की लड़ाई में उनकी गाथा आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। उन्होंने इस लड़ाई में अपना सब कुछ दान कर दिया था। 

कई बार जेल भी गये -
नासिक अधिवेशन से लौटने के बाद बस्ती में कांग्रेस के संस्थापकों में रहने वाले सीताराम शुक्ल ने सभी आंदोलनों को लीड किया था और पांच बार जेल गए थे।1922 के असहयोग आंदोलन में शुक्ल को एक वर्ष, 1930 में नमक सत्याग्रह में छह माह, 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में तीन माह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास हुआ था। कुल मिलाकर उन्होंने चार साल तीन माह की सजा काटी थी। 

सीताराम शुक्ल के घर रुके नेहरू जी -
19 सितंबर 1921 पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक जनसभा गोरखपुर में होनी थी। अंग्रेजों ने सभा निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दिया। 20 सितम्बर को नेहरू जी सीताराम शुक्ल के घर पहुंचे। यहीं पर गोरखपुर जनपद (जिसमें बस्ती जिला भी शामिल था) की कमेटी का गठन किया। रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को जिला अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्यसमाजी देवव्रत को महामंत्री तथा सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया गया था। 1921 में गांधीनगर (पक्का-बजार) बस्ती में सीताराम शुक्ल के संयोजन में नेहरू जी की एक विशाल जनसभा कराई गई थी। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई थी। नौ अक्टूबर 1929 को बस्ती के गांधीनगर में होने वाली जनसभा में भाग लेने आए नेहरू जी इनके घर पर रुके थे। हालांकि, धारा 144 लागू होने के चलते यह जनसभा निरस्त हो गई थी। नाराज सीताराम शुक्ल ने इसी दिन हथियागढ़ में जनसभा कराई थी, जिसको महात्मा गांधी व पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संबोधित किया था।
हर्रैया से दो बार विधायक रहे -
आप उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 292 - हर्रैया (दक्षिण- पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया। उनका कार्यकाल 1952-57 तक था।1973 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंडित सीताराम शुक्ल एवं उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को दिल्ली बुलाकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमाण-पत्र व ताम्र-पत्र देकर सम्मानित किया था। 

राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार -
2 फरवरी 1977 को लखनऊ के सिविल अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार कराया था।

चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति -
शुक्लजी चौमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे वक्ता, गायक, वादक, घुड़सवार भी रहे । वे एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक प्रखर कवि और लेखक भी थे। उन्होंने 14 पुस्तको का लेखन भी किया जिसमें अधिकांश कृतियां उचित संरक्षण के अभाव में समय के साथ लुप्त (गायब) हो गईं। वर्तमान में उपलब्ध उनके साहित्य में सबसे प्रमुख और प्रामाणिक कृति स्वराज्य का रास्ता है।
स्वराज्य का रास्ता : उनकी एकमात्र उपलब्ध कृति - 
गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ द्वारा हिंदी में 1939 में 129 पृष्ठों वाला यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था। पंडित सीताराम शुक्ल द्वारा लिखित और 1939 में गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ द्वारा प्रकाशित 'स्वराज्य का रास्ता' एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और राजनीतिक कृति है। यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में स्वराज्य की अवधारणा, आर्थिक स्वावलंबन, स्वदेशी अपनाने और सामाजिक एकता पर जोर देती है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए नागरिकों को मानसिक व सामाजिक दासता से मुक्त होने का संदेश देती है।

विद्वान वक्ता -
वे कुशल नेतृत्व कर्ता के साथ साथ विद्वान् वक्ता भी थे । उनका हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, था अंग्रेजी पर समान अधिकार था। वह एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी और वीर रस, राष्ट्रभक्ति व सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचनाएं करने वाले छंदकार थे। साहित्य और काव्य कला के क्षेत्र में, विशेषकर परंपरागत शास्त्रीय छंदों (दोहा, मनहरण कवित्त, और सवैया) की रचना में उनका गहरा अनुराग रहा है। उनके छंद पारंपरिक विधाओं जैसे कवित्त और सवैया में रचे गए थे, जो क्रांतिकारियों में जोश भरते थे। वे फुटकर कविता भी लिखते रहे हैं। उनके द्वारा रचित छंदों और इन तीनों पारंपरिक काव्य विधाओं का विवरण इस प्रकार है-

1. दोहा छंद-
दोहा एक मात्रिक अर्धसम छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। अंत में गुरु और लघु (।) का होना आवश्यक माना जाता है। इसके लक्षण: 13 + 11 = 24 मात्राएँ प्रति पंक्ति होती है।

2. मनहरण (कवित्त) छंद -
मनहरण को 'कवित्त छंद' भी कहा जाता है। यह एक प्रमुख वर्णिक मुक्तक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। इसमें 16 और 15 वर्णों पर यति (विराम) होती है और प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु (काव्य रूप से दीर्घ) होता है। इसके लक्षण: 16 + 15 = 31 वर्ण होते हैं।

3. सवैया छंद -
सवैया एक वर्णिक सम वृत्त छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण तक होते हैं। इसके अंतर्गत कई भेद आते हैं जैसे मत्तगयन्द सवैया, दुर्मिल सवैया, किरीट सवैया आदि, जो गणों (मगण, भगण आदि) के क्रम के आधार पर तय होते हैं। इनके लक्षण: 22 से 26 वर्णों का सुंदर संगीतात्मक प्रवाह होता है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)