Wednesday, October 21, 2026

आचार्य शुक्ल की पुत्री दुर्गावती और दामाद पं०चन्द्रबली त्रिपाठी( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 33 ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


भूमिका :-
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो वर्ष 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से एक श्री चन्द्रबली त्रिपाठी जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय :-
स्वर्गीय पंडित चन्द्र बली त्रिपाठी का जन्म 
जन्म 1893 ई में हुआ था। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, संस्कृत व दर्शनशास्त्र के प्रकांड विद्वान और लेखक थे। वे महामना मदन मोहन मालवीय जी के बेहद करीबी सहयोगी भी रहे थे। वे संस्कृत हिन्दी के विद्वान थे। ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली के छंदकार के रूप में बहुचर्चित हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का पं० चन्द्रबली त्रिपाठी दामाद और दुर्गावती त्रिपाठी पुत्री थी। दुर्गावती त्रिपाठी जन्म 13 अक्टूबर 1902 में मिर्ज़ापुर में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की पुत्री (बेटी) के रूप में हुआ था उन्होंने अपने ज़माने की सोच, समझ और व्यवहार से बहुत बहुत आगे रहीं।
       उनका विवाह पं० चन्द्रबली त्रिपाठी के साथ हुआ जो संस्कृत और हिंदी के उच्चकोटि के प्रख्यात विद्वान और छंदकार थे।      
       पं० चन्द्रबली त्रिपाठी और प्रकाशक दुर्गावती त्रिपाठी का मूल निवास उत्तर प्रदेश का प्राचीन बस्ती वर्तमान सिद्धार्थ नगर जिला रहा । जहां कोटिया नामक गांव शोहरतगढ़ तहसील में बढ़नी ब्लॉक में स्थित एक आबाद गाँव है। 2011 की जनगणना के अनुसार, यहाँ 70 परिवारों में 400 लोग रहते हैं और इसका क्षेत्रफल 33.39 हेक्टेयर है। स्थानीय संदर्भों में नखही ग्राम पंचायत, जोगिया खास सीडी ब्लॉक शामिल हैं । उनका निकटतम शहर सिद्धार्थ नगर है, जो वहां से लगभग 36 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रमुख कार्य -
पं० चन्द्रबली त्रिपाठी एक प्रतिष्ठित लेखक थे, जिन्होंने 'उपनिषद रहस्य' तथा 'धर्मराज युधिष्ठिर' जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। उनके परिवार का साहित्यिक जुड़ाव शुक्ल जी की विरासत से बहुत गहरा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने 1957 में प्रकाशित हुई पुस्तक 'महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (संस्मरण)' का संपादन भी किया था, जिसकी प्रकाशक उनकी धर्म पत्नी श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी थीं।
    पंडित चंद्रबली मणि त्रिपाठी बस्ती में अधिवक्ता थे। बस्ती जिला मुख्यालय के मालवीय रोड पर इनका अपना खुद का मकान है। यही से रहकर इन्होंने अपने पुत्र चंद्रचूड़ मणि को पढ़ाया था। जिसके बाद बेटा प्रोफेसर बना । कोटिया गांव में स्थित इनकी निजी भूमि पर परिवार के सदस्य खेती किसानी करते है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कोटिया ग्राम के मूल निवासी पण्डित चन्द्रबली त्रिपाठी से विवाह के उपरान्त मुख्यालय बस्ती में रह कर उन्होंने वो कर दिखाया जो किसी 'ब्राह्मण' कुलवधू के लिए आज भी संभव नहीं। घर के 'उठाऊ इज़्ज़तघर' की सफाई करने वाले गोकुल नामक भंगी के गंभीर रूप से रुग्ण होने पर स्वयं भोजन और पथ्य ले कर दो मील पैदल चल कर लगभग पंद्रह दिन उसकी सेवा-सुश्रूषा करना; पड़ोस के नन्दौर गाँव के मौलवी हसन अली के घर आने पर उन्हें घर के बर्तनों में भोजन कराने तथा उनके बीमार होने पर अपने हाथों उनकी हर तरह से उनकी तीमारदारी, साफ़ सफाई और देखरेख; बिहार में आये 1934 के भीषण भूकम्प और 1943 में बंगाल के दुर्भिक्ष में अन्न-वस्त्र-धन जुटा कर भेजना; औपचारिक शिक्षा के बिना बांग्ला, पाली, ब्राह्मी में प्रवीणता, बौद्ध धर्म में गहरी अभिरुचि; लुम्बिनी, श्रावस्ती, सारनाथ, महादेवा और सिसवनिया जैसे प्राचीन ढूहों, टीलों, पुरास्थलों का भ्रमण अवगाहन; स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी; उनके व्यक्तित्व के विलक्षण पहलुओं के द्योतक हैं। इतना ही नहीं, अपने संकलन में से लखनऊ संग्रहालय को पुरावेष भेंट किए और बस्ती में संग्रहालय की स्थापना करायी। कोपिया के प्राचीन टीले का निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला कि यहाँ शीशा गलाने के प्राचीन कालीन उद्योग रहे होंगे और सन 2004 के आस पास आलोक कुमार कानूनगो द्वारा कराए गए उत्खनन से उसकी पक्की तस्दीक हुई, समझती हैं। 
     'दुर्गावती दादी अम्माँ' की शख्शियत ऐसी अपनी रही कि जिसने 'वटवृक्ष के नीचे किसी और वृक्ष के न पनपने' और किसी स्त्री की पहचान उसके पिता, पति या पुत्र-पौत्रों की पहचान से जुडी होने' जैसी आम धारणाओं को अपने मामले में पूरी तरह झुठला दिया। वे केवल इसलिए नहीं जानी जाएंगी कि वे हिंदी के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य राम चंद्र शुक्ल जी ज्येष्ठा पुत्री और तब के पूर्वांचल के जाने माने पण्डित चंद्रबली त्रिपाठी की धर्मपत्नी रहीं; ना ही इसलिए कि उन्होंने जन्म दिया सुविख्यात चार-चार प्रतिभाशाली पुत्रों को डॉक्टर चंद्रचूड़ मणि - बौद्ध विद्वान, श्री चंद्रमौलि मणि - प्रखर मेधा के धनी और रेलवे के उच्चाधिकारी, श्री श्री चन्द्रभाल त्रिपाठी - पिछली शती के पांचवें दशक के जाने माने छात्र नेता, लखनऊ विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष, चिंतक और मानव शास्त्री तथा श्री चंद्रधर त्रिपाठी - भारतीय प्रशानिक सेवा (आई ए एस), और ना तो इस कारण कि उनके पौत्रों ने महा निदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय, आई आई टी दिल्ली में गणित के प्रोफेसर अथवा दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जैसे ऊंचे ऊंचे मुकाम हासिल किए। वे जानी जाती रहेंगी अपनी दुर्लभ प्रतिभा की बदौलत, माँ, अम्माँ, दादी अम्माँ के ममत्व भाव से कहीं ज्यादा करुणामूर्ति, विदुषी और क्रांतिकारी के रूप में। 
     बस्ती वालों को तो इस बात का गौरव भान रहेगा ही कि 'ऐसी निराली दादी अम्माँ रहीं हमरे कोटिया वाली, इससे आगे बढ़ कर वे पूरे पूर्वांचल, देश और मानवता के लिए वे सदैव एक अजस्र प्रेरणा-स्रोत बनी रहेंगी। समाज का ताना-बाना सुदृढ़ हो कर टिका रहता है ऐसी ही विभूतियों के योगदान से।
     दुर्गावती के पति पण्डित चन्द्र बली त्रिपाठी की प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय समाज में नारी आदर्शों का विकास' के हिंदी संस्करण का प्रकाशन "दुर्गावती त्रिपाठी प्रकाशन, बस्ती, उत्तर प्रदेश" द्वारा वर्ष 1991 में किया गया था। पण्डित जी की मृत्यु 1985 ई में हुई थी।

सिसवनिया पच्चीसा जिला बस्ती में पुरातात्विक खोज :-
बस्ती जिले के सदर बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं उनके पुत्र चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:”बस्ती बसुधा”, पृष्ठ 84 )
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनन: 
बाद के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. बी.आर. मणी बचपन में अपने दादी मां श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं पिता डॉ चंद्र मणि त्रिपाठी के अनुभवों और स्मृतियों को चिर स्थाई करते हुए एक उत्खनन दल गठित करते हुए वर्ष 1995-96 और 1996-97 के दौरान यहाँ वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत उत्खनन कार्य कराया था। सिसवनिया में मुख्य उत्खनन के साथ-साथ डॉ. बी. आर. मणी की देखरेख में बस्ती और सिद्धार्थनगर जिलों में व्यापक सर्वेक्षण भी किया गया, जिसके तहत लगभग 126 नए पुरातात्विक स्थलों की खोज की गई थी। इसी दौरान देउरांव, पिपरी, ओरई, धर्मसिंहवा और मुंडियार जैसे निकटवर्ती क्षेत्रों में भी प्रारंभिक परीक्षण खुदाई की गई थी।

लेखक परिचय :-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Monday, October 19, 2026

विजय की नहीं मुक्ति के लिए रावण द्वारा मृत्यु का वरण✍️ आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

रामायण के अनुसार, रावण ने अपनी मुक्ति (मोक्ष) पाने के लिए भगवान श्री राम के हाथों मृत्यु का वरण किया था, न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए। रावण जानता था कि श्री राम साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार हैं और उनके हाथों मृत्यु प्राप्त करने से उसे परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।

पूर्व जन्म का श्राप : -

रावण और कुंभकर्ण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनत्कुमारों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक असुर योनि में जन्म लेना था, जहाँ भगवान विष्णु स्वयं उनका वध करके उन्हें पुनः वैकुंठ लाते।

भक्ति का अनोखा मार्ग (द्वेष भक्ति) :- रावण जानता था कि एक साधारण मनुष्य की तरह भक्ति करने से उसे मोक्ष मिलने में लंबा समय लगेगा। इसलिए उसने 'शत्रु भाव' (द्वेष भक्ति) का मार्ग चुना, ताकि भगवान हर क्षण उसके स्मरण में रहें और वह जल्दी मुक्त हो सके।

माता सीता का हरण :- 

रावण ने सीता जी का हरण लंका विजय या वासना के लिए नहीं, बल्कि श्री राम को युद्ध के लिए आमंत्रित करने के लिए किया था, जिससे उसकी मृत्यु का मार्ग प्रशस्त हो सके।


नीलकंठ पक्षी दर्शन:-

विजयादशमी (दशहरा) के पर्व पर नीलकंठ पक्षी (इंडियन रोलर) के दर्शन को अत्यंत शुभ, सौभाग्यशाली और भगवान शिव का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है।

नीलकंठ दर्शन का विधान और नियम

दर्शन का समय : -

दशहरे के दिन सुबह से लेकर शाम तक किसी भी समय नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना शुभ माना जाता है, हालांकि प्रातःकाल (सूर्योदय के आसपास) का समय श्रेष्ठ माना गया है।

दर्शन न होने पर :-

यदि प्रत्यक्ष में नीलकंठ पक्षी दिखाई न दे, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है; मान्यता है कि आप मन में भगवान का ध्यान करके या किसी डिजिटल माध्यम/चित्र के जरिए भी उनके दर्शन कर सकते हैं।

देखने पर क्या करें :-

जब भी नीलकंठ के दर्शन हों, तो हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए।

विशेष मंत्र एवं प्रार्थना :-

दर्शन होने पर निम्नलिखित मंत्रों या परंपरागत वचनों का जाप करना चाहिए:-

पारंपरिक श्लोक / मंत्र:


'कृत्वा नीराजनं राजा बालवृद्धयं यता बलम्। 

शोभनम खंजनं पश्येज्जलगोगोष्ठसंनिघौ।। 

नीलग्रीव शुभग्रीव सर्वकामफलप्रद। पृथ्वियामवतीर्णोसि खञ्जरीट नमोस्तु तो।।'

पौराणिक लोक मान्यता का वचन :-

“नीलकंठ तुम नीले रहियो, 

सारी बात राम से कहियो।”

शिव मंत्र :-

‘ॐ नीलकंठाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥'

ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

पिंजरे में बंद पक्षी न खरीदें  :-

पिंजरे में कैद नीलकंठ को खरीदना या देखना शुभ नहीं माना जाता; यह भगवान शिव का रूप है, इसलिए उसे स्वतंत्र रूप में ही देखना फलदायी होता है।

धार्मिक महत्व :-

पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले भगवान श्री राम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसी वजह से विजयदशमी पर इनके दर्शन से जीवन में विजय, यश, धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 




                

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32) आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  प० राम लखन मिश्र जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय:-

ऐसे ही कवियों में पण्डित राम लखन मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि, राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो सं० 1960 वि० तदनुसार सन 1903 ई में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा , डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० यमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्‍ती जिले के 283 - डुमरियागंज (उत्‍तर पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़कर जीता था। उनका बतौर विधायक कार्यकाल 1952 से 1957 तक रहा। विधायक बनने से पूर्व उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

     इतने महत्वपूर्ण राजनेता ,स्वतंत्रता सेनानी और कवि के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो रही है। आज के आत्म कुटुंब और स्वजातीय प्रशस्ति युग में ऐसा घटित होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इनके परिवारी जन शुभ चिन्तक और आम जन जिन्हें भी इन महानुभाव के बारे में किंचित जानकारी हो वह बस्ती मण्डल की गरिमा के लिए उसे आम जन में साझा करना चाहिए। हिन्दी भाषी विश्विद्यालय अपने शोध विषय में उक्त व्यक्तित्व को सम्मिलित करके महान योगदान कर सकते हैं।



Sunday, October 18, 2026

श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 31)आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डा. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 
जीवन परिचय -
ऐसे ही कवियों में श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि हैं, जिनका जन्म विक्रम संवत 1965 (लगभग 1908 ईस्वी) में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पास चननी ग्राम में हुआ था। बस्ती सदर तहसील और विकास खंड के अंतर्गत आने वाला एक छोटा गाँव है, जो बस्ती शहर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।जनगणना के अनुसार यहाँ लगभग 16 परिवार और 102 के आसपास की आबादी निवास करती है। चननी, दुधौरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है, जिसका नेतृत्व निर्वाचित ग्राम प्रधान करते हैं।
श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) की काव्य शैली और रचनाओं की दो सबसे प्रमुख विशेषताएँ हैं:
राष्ट्रीयता का स्वर: 
उनकी रचनाओं में देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति और समाज को जागरूक करने की गहरी भावना दिखाई देती है।
ब्रजभाषा का लालित्य: 
उन्होंने ब्रजभाषा का बहुत ही सुंदर, मधुर और कलात्मक (लालित्यपूर्ण) प्रयोग किया है, जो पाठकों को आकर्षित करता है।


Saturday, October 17, 2026

राप्ती की रेती के सन्त फागूदास जी की समाधि(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 30)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

भूमिका -

डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी ने अपने शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” में  मध्योत्तर (तृतीय) ‘कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार’ नामक अध्याय का नाम दिया है। “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। जिसका नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों काऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी इसके पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से  संत फागू दास जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय - 

सिद्धार्थनगर जिले में चौखड़ा गांव और बाजार डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में है। यह डुमरियागंज  तहसील मुख्यालय से लगभग 5 किमी. दूरी पर स्थित है।सन्त फागू दास जी का जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे। 

मन्दिर और समाधि -

मान्यता है कि संत फागू बाबा कहीं बाहर से आए और चौखड़ा में रह गए। यहां स्थित महाविद्यालय के पास उनकी समाधि है। यह भूमि पशुचर भूमि है। सन्त फागू दास जी के मृत्यु के बाद पेड़ के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। जहां उनकी समाधि रखी गयी, वहां पहले सूखा था। समाधि बनने के बाद वह क्षेत्र हरा-भरा हो गया। प्रत्येक गुरुवार को वहां मेला लगने लगा था । फागू बाबा के निधन को 100 वर्ष अधिक हो चुके हैं। उनके समाधि स्थल पर हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग आते हैं। 10 वर्ष पूर्व वहां विधायक निधि से कमरा बनवा दिया गया था जिसे कुछ लोगों ने मजार का स्वरूप देने का प्रयास किया था। इस  तथा कथित मजार के रूप में हुए अतिक्रमण को स्थानीय विधायक के अनुरोध पर प्रशासन ने हटवा दिया है। यह गांव उत्तर में 'बूढ़ी राप्ती नदी' और दक्षिण में 'राप्ती नदी' के बीच के मैदानी इलाके में स्थित है। यह मां बटवासनी मंदिर (गलापुर) जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।

धनाक्षरी और सवैया का उत्कृष्ट प्रयोग-

वे संतों और कवियों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में धनाक्षरी और सवैया छंद का बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। इन छंदों का प्रयोग वे अपनी भक्ति, दर्शन और नीतिपरक बातों को कहने के लिए करते थे।इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में “उपहार” पत्रिका में विशेष प्रशंसा की गयी है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

महात्मा गूंगदास राम तलहा कुटी पचपेडिया, बलरामपुर (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 28)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार
नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से महात्मा गूंगदास जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।

जीवन परिचय -
महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के एक उच्चकोटि के संत और ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि थे। उनका जन्म राप्ती नदी के तट पर स्थित जिगिना (जिगना) ग्राम जिला बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में संवत 1960 विक्रमी के आस पास एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के बलरामपुर-गोंडा क्षेत्र के एक सिद्ध संत और महाकवि थे। जनपद बलरामपुर के अंतिम पूर्वी छोर पर बूढ़ी राप्ति नदी के तट पर स्थित "राम तलहा कुटी" (राम तला कुटी) उन्हीं की तपोभूमि के रूप में विख्यात है, जिसे 'बाबा गूंगदास रामतला कुटी' भी कहा जाता है। यह स्थल सिद्धार्थ नगर जिले के सीमान्तीय क्षेत्र बढ़नी रेलवे स्टेशन और पचपेड़वा स्टेशन के पास में स्थित है। कुटी राम ताल के नाम से राजस्व गांव भी है।
        इस स्थल पर पारंपरिक रूप से धार्मिक आयोजन और वार्षिक रामतलहा मेला भी आयोजित किया जाता है। एक अन्य संदर्भ नागरीप्रचारिणी पत्रिका, वर्ष 48 अंक 1, सं० 2010 पृष्ठ 112 पर उल्लिखित विवरण में गोण्डा जिले के पचपेड़वा में इनकी कुटी बताई गई है। वे इस कुटी के महंत थे। उक्त कुटी के वतमांन महंत श्री अज्ञारामदास जी ने इनकी और अपनी गुरु-परंपरा इस प्रकार दी है--- 
मुन्नादास – उद्धवदास – गूंगदास – फकीरदास – भगवानदास –– परशुराम दास – शत्रुघनदास – लक्ष्मण दास – तिलंगादास-- संगमदास- रामपुलदास- आज्ञारामदास ( वर्तमान महंत ) 2010 के समय तक के रहे हैं। 

लोकप्रिय निर्गुण भजन -
गूंग दास अपने सुंदर निर्गुण भजनों और स्थानीय सांस्कृतिक योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे एक सन्यासी और संत होने के साथ-साथ साहित्य प्रेमी थे, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को ब्रजभाषा के माध्यम से कविताओं में ढाला है –

फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी”
कोई जाने न भेदवा तुम्हार,
फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी।”

कवि महात्मा गूंगदास जी का प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोक-भजन "फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी" है। यह भजन मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के गोंडा, बलरामपुर और पूर्वांचल क्षेत्रों के संतों और गायकों (जैसे मुनीराम यादव साहेब) द्वारा बेहद श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इनके भजनों में निर्गुण और सगुण भक्ति का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है, जिसमें नैनों (दृष्टि) और अंतरात्मा के रहस्यों को बड़े ही सरल लोक-गीतों के माध्यम से समझाया गया है।
भाषा शैली -
भले ही उनका क्षेत्र (राप्ती तट) मुख्य रूप से अवधी भाषी रहा है, लेकिन उस दौर की साहित्यिक परंपरा और कृष्ण भक्ति के प्रभाव के कारण उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए शुद्ध ब्रज भाषा को चुना।मध्य और उत्तर भारत की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का अनुसरण करते हुए उन्होंने कृष्ण भक्ति, दर्शन और लोक संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से ब्रजभाषा को माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण की बाल- लीलाओं, प्रेम, और भक्ति रस का मार्मिक वर्णन मिलता है।


Friday, October 16, 2026

अति विलक्षण प्रतिभा के पुंज प्रज्ञाचक्षु कवि श्री घनराज शास्त्री ( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 27)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भूमिका -
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों पर ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से श्री घनराज शास्त्री जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय -
श्री शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद की खलीलाबाद तहसील के बेलहर कर्जा नामक ग्राम में सन् 1873 में हुआ था। आपके पिता का नाम नेपाल मिश्र था और आप जब केवल दो-ढाई वर्ष के ही थे तब चेचक के कारण आपकी दोनों आँखे जाती रही थी। आप वास्तव में प्रज्ञाचक्षु थे। आपकी विद्वत्ता की इतनी ख्याति थी कि भरतपुर, अलवर, छतरपुर, मझौली, मनकापुर तथा बाराबकी के राजाओ-महा राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में बुलाकर आपका सम्मान किया था। आपके विलक्षण बैदुष्य का इससे अधिक बडा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आपने इटावा की 'ज्ञानपीठ को वनस्पति चंद्रोदय' और उत्तर प्रदेश शासन को 'धनुर्वेद' नामक ग्रन्थों के निर्माण मे अपनी अपूर्व सहायता प्रदान की थी। आप जहाँ संस्कृत के 6 विषयों के आचार्य थे वहाँ फारसी के भी मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा में काव्य-रचना करने का उन्हे इतना अभ्यास था कि प्राय कथा-वाचन ब्रजभाषा-छन्दों में ही किया करते थे । आपका निधन सन् 1958 में लखनऊ में उस समय हुआ था जब आप उत्तर प्रदेश सरकार के निमन्त्रण पर वहाँ रहकर एक पुस्तक लिखा रहे थे।

विलक्षण प्रतिभा -
आपने अपनी अपूर्व मेंघा और धारणा- शक्ति के कारण भारतीय वाङ्मय के अनक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आप एक ही दिन से ढाई हजार श्लोक कण्ठाग्र कर लेते थे। बाल्यावस्था में ही आपने अनेक विद्वानों और सन्यासियों के सत्संग का लाभ उठाकर अनेक प्राचीन दुर्लभ ग्रन्थों की जानकारी प्राप्त कर ली थी । आपको कुल 83 लाख 40 हजार श्लोक कंठस्थ थे। कहा जाता है कि आपने डॉ० भगवानदास जेसे मनीषी को भी उनके 'प्रणववाद’ नामक ग्रन्थ की रचना में अपना सक्रिय सहयोग दिया था।’ ‘प्रणववाद' भारत रत्न से सम्मानित प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. भगवान दास द्वारा संपादित और प्रकाशित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनोखा ग्रंथ है। यह ग्रंथ 1910 से 1913 के बीच तीन भागों में प्रकाशित हुआ था। इसके मूल रचयिता डॉ. भगवान दास के अनुसार, यह ग्रंथ प्राचीन काल के महर्षि गार्ग्यायण द्वारा रचित एक अत्यंत दुर्लभ और अज्ञात ग्रंथ का सारांश है। डॉ. भगवान दास को यह ग्रंथ उनके थियोसोफिकल सोसायटी के मित्र पंडित धनराज ने अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति से मौखिक रूप से सुनाया था, जिसे भगवान दास ने लिपिबद्ध किया था। पंडित धनराज का इस पुस्तक के प्रकाशित होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। इस ग्रंथ में 'प्रणव' (ॐ) के आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व, वैदिक सिद्धांतों, महा - वाक्यों, और ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े गूढ़ रहस्यों की व्याख्या की गई है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)