Saturday, May 2, 2026

नेपाल की यात्रा आसान, भारत से उसका बनता बिगड़ता संबंध ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी



नेपाल हिमालय की गोद में बसा हुआ अद्भुत देश है ,यहां के लोगों का मिलनसार व्यवहार और ताज़गी भरा वातावरण हमेशा याद किया जाता है। यह देश अपने निर्माण से लेकर वर्तमान समय तक अपनी आध्यात्मिकता पुरातनता को लेकर पूर्ण रूपेण सजग है। केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर ध्यान ना देकर इसकी आध्यात्मिकता और मानव चेतना को समर्पित करते हुए देश को बनाने की कल्पना पूरे विश्व में अनूठी है। ऐसा करने वाले देश शायद तिब्बत और नेपाल ही हैं।

तिब्बत को चीन ने अपने प्रभाव में लेकर उसकी स्वतंत्रता छीन ली है जबकि नेपाल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत है।

अध्यात्म की भूमि:- 

नेपाल अध्यात्म की भूमि है और एक समय में यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी। दुर्भाग्य से इस देश को राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर बेहद उठा-पटक और पतन का दौर देखना पड़ा। यह देश भले ही छोटा हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह खासा महत्वपूर्ण है। अस्थिरता के कारण यह देश अपने आध्यात्मिक खजाने को संभाल नहीं पाया और अब इस पर आधुनिकता की परत चढ़ती जा रही है।

नेपाल को ‘दुनिया की छत’ के रूप में भी जाना जाता है। यह देश है यहाँ आने वाले पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता रहता है। खूबसूरत पहाड़ की चोटियों के साथ- साथ नेपाल बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक प्रमुख धार्मिक केंद्र भी है। इस देश में अपराध की दर काफी कम है जिसकी वजह से यह एक बहुत ही सुरक्षित पर्यटन देश बन जाता है।

यहां  साफ सफाई और यातायात के नियमों का पालन तथा ध्वनि नियंत्रण बहुत अजीब है। लंबी लम्बी लाइनें संयमित रूप से देखी जा सकती हैं।

नेपाल का इतिहास :- 

नेपाल में मूल रूप से शाह वंश का शासन था। उन्होंने सिक्किम (भारत) तक और सतलज नदी से परे अपने साम्राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का विस्तार किया। नेपाल साम्राज्य या राज्य को गोरखा साम्राज्य या गोरखा राज्य के नाम से भी जाना जाता है, जिसका गठन 1768 में हुआ था। ब्रिटिश काल 1814 में अंग्रेजों ने एक युद्ध की घोषणा की और 1816 में नेपाल पर विजय प्राप्त कर ली। अग्रेजों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे भारत और चीन के बीच एक बफर राज्य चाहते थे। सुबौलीसंधि में अंग्रेजों का साथ देने के कारण भारत का विशाल क्षेत्र नेपाल को मिल गया था जिसके निवासी मद्धेशिया कहलाते हैं। इनके घर और संपत्ति दोनों देशों में देखने को मिलती है और ये लोग दो दो देशों के नागरिक बन जाते हैं।

सात प्रांत 77 जिलो में विभक्त:-

नेपाल में सात प्रांत हैं- बागमती, गंडकी, करनाली, कोशी, लुम्बिनी, मधेस और सुदूरपश्चिम । इन 7 प्रदेशों में कुल 77 जिले हैं। नेपाल का संविधान 2015 में अपनाया गया था, जिसमें देश को इन प्रांतों में विभाजित किया गया था। इसको 2006 में धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया था, लेकिन यहाँ हिंदू धर्म के अनुयायियों की संख्या सबसे अधिक है। 2021 की जनगणना के अनुसार, नेपाल एक हिंदू-बहुल देश है, जहाँ 81.19% आबादी हिंदू है। अन्य प्रमुख धर्मों में बौद्ध धर्म (8.21%), मुस्लिम (4.39%), किरात (3.17%), और ईसाई (1.76%) शामिल हैं। हालांकि नेपाल धर्मनिरपेक्ष है, हिंदू धर्म यहाँ की संस्कृति और जीवनशैली में सबसे प्रमुख है।

नेपाल के प्रमुख शहर और उनकी विशेषताएं:- 

काठमांडू- (संस्कृति/राजनीति) नेपाल की राजधानी और सबसे बड़ा शहर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों, ऐतिहासिक दरबार स्क्वायर और जीवंत संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।

पोखरा - नेपाल की 'पर्यटन राजधानी' के रूप में प्रसिद्ध, जो फेवा झील और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला के शानदार दृश्यों के लिए जाना जाता है।

ललितपुर/पाटन - काठमांडू के पास स्थित, जो अपनी ललित कलाओं, वास्तुकला और प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता है।

भरतपुर -: चितवन नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध, जो नेपाल के सबसे प्रमुख व्यावसायिक और चिकित्सा केंद्रों में से एक है।

जनकपुर- मधेश प्रांत की राजधानी और एक पवित्र धार्मिक शहर, जो माता सीता के जन्मस्थान और जानकी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

बिराटनगर - देश के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक बड़ा औद्योगिक और आर्थिक केंद्र।

लुंबिनी - भगवान बुद्ध का जन्मस्थान, जो एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ स्थल है।

बीरगंज  - भारत-नेपाल सीमा पर एक प्रमुख व्यापारिक शहर।

धरान - कोशी प्रांत का एक प्रमुख शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्र।

बुटवल - लुंबिनी प्रांत में स्थित एक तेजी से विकसित होता हुआ व्यावसायिक शहर।

काठमांडू नेपाल की राजधानी :- 

राजधानी काठमाण्डू मे मनोरंजक दृश्य, लुभाने बाज़ार और रात को चमकीले कैसिनो ऐसा लगता था, मानो ये शहर कभी सोता ही नहीं। काठमांडू नेपाल की सांस्कृतिक राजधानी और यहां का बेहद आकर्षक शहर है। काठमांडू शब्द का अर्थ है "लकड़ी का घर" या "काष्ठ का मंदिर"। मूल अर्थ (शाब्दिक): काठ + मांडू = लकड़ी का मंदिर या मंडप।यह संस्कृत के शब्द 'काष्ठमण्डप' (काष्ठ = लकड़ी, मण्डप = मचान/घर) का अपभ्रंश है, जो दरबार स्क्वायर में स्थित एक ही पेड़ की लकड़ी से बने प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर का नाम है। इसका पुराना नाम कांतिपुर (शहर-ए- रोशनी) के नाम से जाना जाता था। इसे कांतिपुर (प्रकाश का शहर) भी कहा जाता था। यह शहर नेपाल का एक ऐसा स्थान है जो यहां आने वाले पर्यटकों को बेहद रोमांचित करता है। माना जाता है कि यह शहर 723 ईस्वी में राजा गुणकामदेव द्वारा बसाया गया था। यह शहर सदियों से नेवार संस्कृति का केंद्र रहा है और अपने ऐतिहासिक मंदिर (विशेषकर काष्ठमंडप) के कारण "काठमांडू" कहलाया। यह नाम स्वयं काष्ठमंडप से उत्पन्न हुआ है, जो गुरु गोरखनाथ द्वारा दान किए गए एक पवित्र साल के पेड़ से निर्मित एक मंडप है। यह राजाओं के लिए नहीं, बल्कि समुदाय के लिए बनाया गया था, एक ऐसा स्थान जहाँ लोग इकट्ठा हो सकें, आपस में मिल-जुल सकें और अपनापन महसूस कर सकें।

काठमांडू एक ऐसा शहर है जिसमे 1.5 मिलियन से अधिक लोगों का घर है। यह शहर 1400 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जो पूरे साल यहां आने वाले यात्रियों को आनंदमय वातावरण देता है। काठमांडू, अपने मठों, मंदिरों और आध्यात्मिकता के साथ एक शांति वाली जगह है। शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ यात्रियों को अन्य पर्यटन स्थलों से अलग अनुभव करवाता है। काठमांडू में बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म के साथ-साथ शहर के धार्मिक परिदृश्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है । दोनों धर्म वास्तव में काफी सामंजस्य पूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में हैं, और दैनिक जीवन के कई पहलुओं में उनकी प्रथाओं और प्रभावों का मिश्रण देखने को मिलता है।

पोखरा :- 

पोखरा शहर अपनी झीलों की वजह से बहुत प्रसिद्ध है इसलिए आप यहाँ पहुँच कर झील के किनारे होटल में कमरा ले लें।  अगर आप सुबह पहुँचे हैं तो कुछ देर आराम करने के बाद पैदल ही शहर की यात्रा करने निकल सकते हैं। फेवा झील यहाँ की सबसे मशहूर और लम्बी झील है। झील में घूमने के लिए आपको वहाँ ₹400 में नाव मिल जाएगी जो इस खूबसूरत झील की सुन्दरता और ठहराव दोनों का अनुभव करवाएगी। सारंग्कोट और शांति स्तूपा पोखरा के आस पास बहुत मशहूर हैं तो अगर आपके पास वक़्त हो तो आप 1-2 दिन वहाँ रुक कर बाकि जगह भी घूम सकते हैं।

नेपाल की यात्रा :- 

भारतीय नागरिक बिना वीजा के, वैध पहचान पत्र ( मतदाता पहचान पत्र या पासपोर्ट) के साथ सड़क या हवाई मार्ग से नेपाल की यात्रा कर सकते हैं। नेपाल की यात्रा करते समय निम्न बातों का पालन करना चाहिए- 

1.यात्रा और दूरी के हिसाब से नकदी रखे।  सिक्के तो होने ही चाहिए । सारे पैसे एक ही पॉकेट या पर्स में न रखे।

2. समान कम से कम रखे। जरूरत के अनुसार खरीद लें।

3.पानी हमेशा अपने पास रखे और शरीर में ग्लूकोज लेवल बनाए रखने वाले खाने जैसे कि चॉकलेट, मीठे बिस्कुट जरूर रखे।

4. मोबाइल को पूरी तरह से इंटरनेशन पैक के साथ चार्ज रखे। सिर्फ मोबाइल के भरोसे न रहे ।अपने पारिवरिक सदस्यों एवं कुछ मित्रो के नंबर याद रखे ।

5.साथ मे सेनेटाइजर एवं टिश्यू पेपर भी रखे ।

6.यात्रा में निकलने से पहले अपने बस/ट्रैन/ फ्लाइट की सूचना अपने किसी जानकार को अवश्य दे । यदि अकेले हो तो इसकी जानकारी किसी अनजान लोग या सहयात्री को न दे । 

7.यात्रा के समय बोरियत से बचने के लिए अपनी रुचि अनुसार किताब, फिल्मे या गेम अपने साथ रखे ।

डॉक्यूमेंट्स क्या क्या रखें :- 

नेपाल जाने से पहले निम्न लिखित डॉक्यूमेंट्स तैयार रखें- 

भारत से नेपाल यात्रा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि आपको वीज़ा की ज़रूरत नहीं है। आपको नेपाल घूमने के लिए अपना पासपोर्ट, कुछ पासपोर्ट साइज़ की फ़ोटो और अपना वोटर आई.डी. तैयार रखें। अगर आप विदेशी मुद्रा के बारे में सोच रहे हैं तो यहाँ भी आप फ़ायदे में हैं। नेपाल में भारतीय रुपया चलता है तो जहाँ तक हो सके ₹100 के भारतीय नोट लेकर जाएँ। अगर आपके पास एसबीआई का एटीएम कार्ड है तो आप नेपाल के एस बी आई बैंक से पैसे भी निकल सकतें हैं।

भारत से नेपाल तक कैसे पहुँचे- 

वैसे तो नेपाल तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। आप दिल्ली से काठमांडू की हवाई यात्रा कर सकते हैं पर ये आपके लिए महंगी होगी। अगर आप रोड यात्रा करना चाहते हैं तो आपको दिल्ली से नेपाल के लिए सीधे बस भी मिलेगी पर ये यात्रा 30 घंटे लम्बी होगी, इसलिए सबसे सस्ता और सरल रास्ता होगा कि आप उत्तर प्रदेश के गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे और वहाँ से भारत नेपाल बॉर्डर सोनौली के लिए ट्रेन की टिकट ले लें। अगर आप बड़े ग्रुप में कई साथियों के साथ घूमने गए हैं तो आप जीप या कैब से भी गोरखपुर से सोनौली तक पहुँच सकते हैं। गोरखपुर से भारत नेपाल बॉर्डर 248 कि.मी. की दूरी पर है जहाँ पहुँचने में आपको 6-7 घंटे का वक़्त लगेगा।

सोनौली पहुँचने के बाद आपके पास दो रास्ते होंगे। पहले सोनौली से काठमांडू तक का जो वहाँ से 285 कि.मी. की दूरी पर है और दूसरा सोनौली से पोखरा का जो वहाँ से 148 कि.मी. पर है। सुझाव है कि आप पोखरा की ओर जाएँ। पोखरा और काठमांडू कुल मिलाकर एक जैसे ही हैं बस पोखरा में यात्रियों की भीड़ कम होती है तो आपको बेहतर अनुभव मिलेगा। साथ ही पोखरा काठमांडू से हर मायने में किफायती है।

भारत और नेपाल के बीच संबंध :- 

भारत और नेपाल के बीच पुरातन संबंध सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से "रोटी-बेटी के रिश्ते" (वैवाहिक और रोटी-रोजी) पर आधारित हैं। सदियों से साझा हिंदू-बौद्ध परंपराएं, खुली सीमाएं (1950 की संधि) और रामायण काल से चला आ रहा सीता-राम का संबंध दोनों देशों को अटूट रूप से जोड़ता है। लुम्बिनी (बुद्ध का जन्मस्थान) और पशुपतिनाथ (नेपाल) तीर्थयात्रा इस सांस्कृतिक कड़ी के प्रमुख स्तंभ हैं।  भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म में समान विश्वास रखते हैं। नेपाल के जनकपुर (माता सीता का जन्मस्थल) और भारत के अयोध्या के बीच पौराणिक संबंध हैं। वहीं, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोधगया में हुआ था। 

दोनों देशों के बीच लगभग 1,850 किमी लंबी खुली सीमा है। इस सीमा के आर- पार नेपाली और भारतीय नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं, जो इन संबंधों की अद्वितीयता को दर्शाता है। दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ रिश्ते और नातेदारी है, जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है। प्राचीन समय (कीरात काल) से ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध रहे हैं।आधुनिक काल में, 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने इन ऐतिहासिक संबंधों को एक औपचारिक आधार प्रदान किया। यद्यपि, कुछ सीमा विवाद (जैसे कालापानी) समय-समय पर चर्चा का विषय बनते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच के गहरे सांस्कृतिक और आत्मीय संबंध हमेशा अटूट रहे हैं।

कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों में छूट:- 

भारत-नेपाल व्यापार संधि 1996 के अनुसार, दोनों देश प्राथमिक उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों से पारस्परिक छूट देते हैं, लेकिन औद्योगिक उत्पादों पर भारत नेपाल को विशेष छूट देता है जो गैर-पारस्परिक है। 

नेपाल के '100 NPR वाले नियम' को सख्ती से लागू करने पर भारत काउंटर- ड्यूटी या नए प्रतिबंध लगा सकता है, जैसा कि हालिया चाय निर्यात पर सख्त नियमों से संकेत मिला है।नेपाल सरकार द्वारा भारत से 100 नेपाली रुपये (लगभग 65 भारतीय रुपये) से अधिक मूल्य के सामान पर सख्त कस्टम ड्यूटी लगाने के '100 वाले नियम' के जवाब में भारत सरकार ने काउंटर कदम उठाने का संकेत दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि यह नियम सीमावर्ती व्यापार और 'रोटी-बेटी' के रिश्ते को नुकसान पहुंचा रहा है, जिसके जवाब में भारत नेपाल से आने वाले सामानों पर समान या कठोर टैरिफ लगा सकता है।

भारत के संभावित काउंटर नियम :- 

भारत नेपाल बॉर्डर पर आने वाले नेपाली व्यापारियों और यात्रियों के लिए 100 भारतीय रुपये से अधिक के हर सामान पर 10-50% कस्टम ड्यूटी लगा सकता है। इसके अलावा, नेपाली नंबर वाली गाड़ियों पर सालाना 30 दिनों से ज्यादा प्रवेश पर प्रतिदिन 2000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम नेपाल के भंसार महाशुल्क एक्ट का सीधा जवाब होगा, जो नेपाल के निर्यात जैसे चाय, जड़ी-बूटियां और हस्तशिल्प को प्रभावित करेगा। 

नेपाल को होने वाला आर्थिक नुकसान

इससे नेपाल को सालाना 11-13 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारी कमी आएगी, क्योंकि नेपाली लोग सस्ते भारतीय सामान जैसे किराना, दवाइयां और कपड़े खरीदना बंद कर देंगे। सीमावर्ती इलाकों में रोजगार प्रभावित होगा, छोटे व्यापारी और दैनिक मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। नेपाली अर्थव्यवस्था पहले से ही भारत पर निर्भर है, ऐसे में महंगाई बढ़ने और स्थानीय उत्पादों की कमी से आम जनता को 20-30% ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। 

बालेन शाह सरकार का यह नियम घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने का दावा करता है, लेकिन भारत के जवाबी कदम से नेपाल की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नुकसान हो सकता है। दोनों देशों के बीच बातचीत से विवाद सुलझने की उम्मीद है। 

नेपाल की राजनीति इस समय एक अहम मोड़ पर खड़ी है। बालेन शाह, जो हाल ही में छात्र आंदोलनों की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए, अब खुद उसी जनभावना के दबाव में नजर आ रहे हैं।

सरकार बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि दो मंत्रियों—जिसमें गृह मंत्री भी शामिल हैं—को इस्तीफा देना पड़ा। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार के भीतर स्थिरता की कमी है और फैसलों को लेकर दबाव बढ़ रहा है। खासतौर पर छात्र संघ से जुड़े मुद्दों ने युवाओं में नाराज़गी पैदा कर दी है, जो कभी बालेन के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे।

भारत-नेपाल सीमा से लगे इलाकों में हो रहे विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि असंतोष सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी फैल रहा है। यही वो वर्ग है जिसने बदलाव की उम्मीद में बालेन शाह को सत्ता तक पहुंचाया था।

भारतीय सामान पर लगाया गया टैक्स नियम वापस हुआ :- 

नेपाल सरकार ने भारतीय सामान पर लगाया गया सख्त टैक्स नियम वापस ले लिया है। भारी घरेलू विरोध के बाद उसे यू-टर्न लेना पड़ा है। दरअसल अप्रैल 2026 में बालेन शाह के नेतृत्व में नियम सख्ती से लागू किए गए थे, जिनके तहत भारत से 100 नेपाली रुपये से ज्यादा का सामान लाने पर ड्यूटी लग रही थी, जो कुछ मामलों में 80% तक पहुंच रही थी। सीमा पर जांच इतनी कड़ी थी कि छोटे सामान जैसे - चिप्स के पैकेटभी जब्त किए जा रहे थे। विरोध बढ़ने पर सरकार ने अब फैसला वापस ले लिया।


लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, May 1, 2026

नेपाल का चितवन राष्ट्रीय उद्यान और थारू सांस्कृतिक केंद्र✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल का पहला राष्ट्रीय उद्यान है। जिसे पूर्व में रॉयल चितवन राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना जाता था । इस उद्यान का मुख्य द्वार निकटतम शहर भरतपुर से 10 किलोमीटर दूर स्थित है । यह राष्ट्रीय उद्यान बागमती प्रांत के चितवन, मकवानपुर, परसा और नवलपरासी क्षेत्रों में राप्ती, नारायणी और रियू जैसी बड़ी नदियों से घिरा हुआ है। यह नेपाल का पहला और सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है । इस उद्यान की यात्रा के लिए, भरतपुर से टांडी होते हुए सड़क मार्ग से प्रवेश किया जा सकता है।भरतपुर हवाई अड्डे पर प्रतिदिन उड़ानें उपलब्ध होती हैं ।
राष्ट्रीय उद्यान :- 
वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निर्धारित क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान नेपाल के मध्य तराई क्षेत्र में स्थित है , जो जैव विविधताओं से समृद्ध है । उद्यान का मुख्यालय कसारा में स्थित है, जहाँ से सभी प्रशासनिक कार्य संचालित होते हैं। इसकी ऊँचाई निचली नदी घाटी में 100 मीटर (330 फीट) से लेकर चुरे पहाड़ियों में 815 मीटर (2,674 फीट) तक है ।19वीं शताब्दी तक, यह उद्यान वनों का हृदय स्थल है।
विकास क्रम :- 
1950 के दशक तक, दक्षिणी नेपाल से काठमांडू की यात्रा इतनी कठिन थी कि वन मार्गों का उपयोग करने वाले यात्री बाघों, भालुओं, गैंडों और चीतों का शिकार करने के लिए महीनों तक वहीं डेरा डाले रहते थे। इस समय तक, चितवन के वन और घास के मैदान 2,600 वर्ग किमी (1,000 वर्ग मील) तक फैल चुके थे , जो लगभग 800 गैंडों का आवास प्रदान करते थे। 1951 तक, चितवन घाटी सर्दियों के दौरान नेपाल के शासक वर्ग का लोकप्रिय शिकारगाह था।
मध्य पहाड़ियों के गरीब किसान जब कृषि योग्य भूमि की तलाश में चितवन घाटी में आए, तो उन्होंने जंगलों को साफ करके बस्तियाँ बसा लीं, और वन्यजीवों का अवैध शिकार व्यापक हो गया। 1957 में, देश का पहला संरक्षण कानून गैंडों और उनके आवासों की रक्षा पर केंद्रित था। 1959 में, एडवर्ड प्रिचर्ड गी ने एक सर्वेक्षण किया जिसमें उन्होंने राप्ती नदी के उत्तर और दक्षिण में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए दस साल की परीक्षण अवधि की सिफारिश की। 
1960 के दशक के अंत तक, डीडीटी का उपयोग करके 70% जंगलों को साफ कर दिया गया था और हजारों लोग वहां बसने लगे थे, जिससे गैंडों की आबादी घटकर 95 रह गई थी। गैंडों की संख्या में इस भारी गिरावट और बढ़ते अवैध शिकार ने सरकार को चितवन के सभी हिस्सों में गश्त करने के लिए 130 सशस्त्र कर्मियों और सुरक्षा चौकियों के एक नेटवर्क से युक्त एक गैंडा गश्ती इकाई स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
चितवन के एक बाद के सर्वेक्षण के बाद, 1963 में उन्होंने सिफारिश की। वन्यजीव संरक्षण सोसायटी और प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ दोनों इस क्षेत्र को दक्षिण की ओर विस्तारित करें। गैंडों के अवैध शिकार को रोकने के लिए, चितवन राष्ट्रीय उद्यान को 1970 में नामित किया गया था और शुरू में 1973 में इसका क्षेत्रफल 544 वर्ग किमी ( 210 वर्ग मील) था। 
राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित :- 
बाद में 2030 बी.एस. 1973 ई में इसे राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित कर दिया गया। 
1977 में, पार्क का विस्तार करके इसे वर्तमान 932 वर्ग किमी (360 वर्ग मील) क्षेत्र में फैला दिया गया। 1997 में, नारायणी -राप्ती नदी प्रणाली के उत्तर और पश्चिम तथा पार्क की दक्षिण-पूर्वी सीमा तथा भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच 766.1 वर्ग किमी (295.8 वर्ग मील) का एक बफर जोन जोड़ा दिया गया। वर्तमान समय में इसका क्षेत्रफल 952.63 वर्ग किलोमीटर है। यह राष्ट्रीय उद्यान 1984 से विश्व धरोहर सूची में शामिल कर दिया गया है।
विविध जीव जन्तु:- 
हर साल हजारों पर्यटक इस राष्ट्रीय उद्यान में आते हैं। राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 70 प्रतिशत वन क्षेत्र में साल के जंगल हैं। यहां एक सींग वाला गैंडा पाया जाता है, जिसे विश्व में दुर्लभ माना जाता है। यहां 605 एक सींग वाले गैंडे हैं। यहां 96 अत्यंत दुर्लभ तेंदुए भी पाए जाते हैं। इसी प्रकार, यहां हाथी, गौरी गाय, जंगली भालू, तेंदुए, रतुवा, चीतल, लगुना, जरायो, चौसिंगे और बंदर सहित 60 से अधिक प्रकार के स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। इस पार्क में घड़ियाल, मगर मगरमच्छ और अजगर सहित सरीसृप और उभयचर भी पाए जाते हैं। यह पार्क प्रवासी और स्थानीय पक्षियों की 546 से अधिक प्रजातियों का भी घर है। यहां विभिन्न प्रकार के कीड़े और टिड्डे भी पाए जाते हैं।
 यहां स्थित बिसहजरी झील को 2003 में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। कीचड़ और पानी वाली जगह को आर्द्रभूमि कहते हैं। बिसहजरी झील में मोर सहित रंग-बिरंगे पक्षियों का झुंड भी देखा जा सकता है। इस पार्क में वाल्मीकि आश्रम और विक्रम बाबा जैसे धार्मिक स्थल संरक्षित हैं। 
घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र:- 
यहां घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र है। वहां आप छोटे मगरमच्छों को धूप और ठंडक में पलते-बढ़ते देख सकते हैं। आप पिंजरे में बंद एक तेंदुए को भी देख सकते हैं। आपको कई हाथी भी देखने को मिलेंगे। खोरसौर स्थित हाथी प्रजनन केंद्र में छोटे हाथियों को पलते-बढ़ते देखकर आनंद लिया जा सकता है।
पक्षी विहार:- 
राप्ती नदी के किनारे चखेवा पक्षियों के प्रवासी जोड़े देखे जा सकते हैं। पर्यटक अक्सर सूर्यास्त देखने के लिए सौराहा जाते हैं। यहाँ मोर नाचते हुए, पशु पानी पीते हुए, घड़ियाल नदी पार करते हुए और हाथी नहाते हुए देखे जा सकते हैं। पार्क से जुड़े राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण ट्रस्ट में आप चंचल गैंडों के बच्चों के साथ खेल सकते हैं। यहाँ आप हाथी, जीप या नाव की सवारी का आनंद ले सकते हैं। आप जंगल में घूमते हुए हिरणों और मृगों के झुंड देख सकते हैं और उनके साथ तस्वीरें ले सकते हैं। आप स्थानीय बोते, मांझी, मुसहर, चेपांग और थारू समुदायों द्वारा संरक्षित झीलों को भी देख सकते हैं।  
जलवायु:- 
चितवन में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है, जहाँ पूरे वर्ष भारी वर्षा होती है। यह क्षेत्र मध्य हिमालयी जलवायु में स्थित है, इसलिए मानसून का मौसम जून के मध्य में शुरू होता है और सितंबर के अंत में समाप्त होता है। इस 14-15 सप्ताह की अवधि के दौरान, इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 2500 मिमी से अधिक वर्षा होती है।पार्क के भीतर सबसे बड़ी झील, देवी झील, साथ ही तामर झील, मुंडी झील और पार्क के भीतर की बड़ी झीलें, लामिकताल, सूख रही हैं। 
पशु पक्षी:- 
यह पार्क विशेष रूप से अपने एक सींग वाले गैंडे और तेंदुए के लिए प्रसिद्ध है । इस पार्क में स्तनधारियों की 43 प्रजातियाँ, पक्षियों की 450 प्रजातियाँ, जलीय जीवों और सरीसृपों की 45 प्रजातियाँ और मछलियों की 100 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख स्तनधारियों में हिरण , चीतल , बंदर और लंगूर शामिल हैं ।
पर्यटन :- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। इसके दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं: पूर्व में सौराहा और पश्चिम में मेघाउली गाँव। यह पार्क सफारी, पैदल यात्रा और जीप सफारी के लिए भी लोकप्रिय है। 
सौराहा गांव:- 
सौराहा नेपाल के केंद्रीय विकास क्षेत्र के नारायणी जोन के चितवन जिले में स्थित एक गाँव है । यह आकर्षक पर्यटन स्थल भी है। चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। 
सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक केंद्र के कार्यक्रम:- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक परम्परा को जीवित रखने और प्रचार प्रसार करने के लिए विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक नाट्य बाद्य प्रोग्राम नियमित रूप से आयोजित होते रहते हैं। जिसके मुख्य विशेषता सांस्कृतिक नृत्य: थारू समुदाय का परम्परागत नृत्य यथा : लाठी नाच, झुमरा, और अन्य स्थानीय नाच का प्रदर्शन किया जाता है। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम: New Sauraha Tharu Cultural House के वातानुकूलित प्रेक्षागृह में प्रत्येक शाम को परम्परागत नृत्य और संगीतको कार्यक्रम होता है। इनका रहन सहन और पहनावा थारू भेषभुषा और परम्परागत रूप से होता है। खानपान और परंपरागत रूप से होता है। इसका उद्देश्य थारू जाति को पहिचान, भाषा, साहित्य, और मौलिक संस्कृति का संरक्षण और प्रवर्द्धन करना होता है।
लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
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Wednesday, April 29, 2026

नेपाल के पोखरा का गुप्तेश्वर महादेव का विलक्षण गुफा मंदिर ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


               (पोखरा नेपाल से )

नेपाल के पोखरा में गुप्तेश्वर गुफा प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है । यह एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमय स्थल है जो ज़मीन से लगभग 150 मीटर नीचे स्थित यह गुफा हरे-भरे चट्टान से गिरते झरने का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है । दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी गुफाओं में से एक , इस गुफा में मंदिर और एक विशाल खुला क्षेत्र भी है। “गुप्तेश्वर" का अर्थ ही है "छिपे हुए ईश्वर" महादेव के रूप में जाना जाता है। गुप्तेश्वर मंदिर पोखरा का एक धार्मिक और पर्यटक स्थल है । माना जाता है कि यह गुफा 16वीं शताब्दी में खोजी गई थी। 
स्थानीय लोगों को यहाँ घास काटते समय एक गुफा मिली, जिसके अंदर भगवान शिव का एक प्राकृतिक रूप से बना शिवलिंग मिला। मन्दिर के गेट के अंदर एक विशाल मार्किट भी बनी हुई है, जहां पूजा सामग्री, मूर्ति ,माला, शंख ,शालिग्राम और खाने - पीने, किताब आदि जनरल सामग्री महंगे मूल्य में मिलती है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में प्रवेश करने की जगह अनेक जगह साइनेज और बिजली की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। शिवजी को समर्पित ये मंदिर एयरपोर्ट से शांति स्तूप जाने वाले रास्ते पर स्थित है।
चित्ताकर्षक प्रवेश द्वार :- 
मंदिर में जाने के लिये रोड पर ही गेट बना हुआ है। सड़क पर ही दोनों तरफ दो मुख्य दृश्य बहुत ही आकर्षक है। सड़क से मुड़ते ही बाएं तरफ पीले रंग स्वर्ण जैसा नन्दी की सुन्दर प्रतिमा चित्त को आकर्षित करती है। नन्दी के सामने शिवलिंग भी सुशोभित है। सड़क से मुड़ते ही दाएं तरफ पीले रंग में एक ऊंचे आधार पर कमल, उस पर कच्छप उसके ऊपर एक आकर्षक रंगीन पीले स्वर्णिम स्तम्भ में सर्प ,ॐ ,डमरू, त्रिशूल और सर्प की आकृति भी बहुत मनोहारी ढंग से समुद्र मंथन का दृश्य अंकित है। मंदिर के सड़क के प्रवेश द्वार के स्तम्भ पर गंगा यमुना और कई अन्य मूर्तियां चित्त को आकर्षित करती है। उस पर नाम अंकित भी है और इलेक्ट्रानिक रूप में फ्लैस होता है। उस गेट पर ऊपर शंकर जी की प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती है।

मंदिर में प्रवेश के लिये महंगा शुल्क है। एक आदमी के लिये 100 नेपाली रूपये / 65 भारतीय रुपए का टिकट लगता है। मंदिर में जाने के लिये गोल- गोल घुमावदार सीढिया बनी थी और नीचे गुफा में एंट्री करने पर कई जगह सिर झुकाना पडता है कि कहीं पर गुफा की कम उंचाई की वजह से टकरा ना जाये । पत्थरों से रिस रिस कर अमरनाथ के गुफा जैसे अनेक शिवलिंग भी छोटे छोटे रूप में देखे जा सकते हैं।
विलक्षण गुफा और उसके भित्ति चित्र गुफा में अंदर जाने पर पहले कामधेनु गाय की प्रतिमा आती है । अंदर आगे जाने पर थोडी बडी जगह आती है जहां पर शिव लिंग स्थापित है ।सामने आकर्षक भव्य 
शिवलिंग है। और उसके पीछे आधार में पाषाण का विशाल शिव लिंग है जो वासुकीनाथ केअसंख्य फ़णों द्वारा आच्छादित है। इस पूरी गुफा में पानी टपकता रहता है और थोडी और आगे जाने पर गुफा संकरी होती जाती है और फिर सीढिया आती हैं । काफ़ी नीचे उतरने के बाद सीधी लंबाई में आगे बढ़ते जाने पर काफ़ी आगे जाने के बाद बहुत बड़ा झरना दिखाई देता है।इस गुफा में तेज और बहते पानी का शोर वातावरण को मनोहारी बना देता है ।
ये डेविस फाल ही है जो कि सडक के दूसरे किनारे की ओर से आ रहा है पर गुफा में इतने गहरे तक उतरकर उस फाल को गिरते देखना एक नया अनुभव होता है जो अब तक कहीं नही देखा और ना ही ये कैमरे में समा सकता है। बरसात के मौसम में ये विकराल रूप में जब इस जगह पर गिरता होगा तो और भी ज्यादा सुंदर लगता होगा । 

लेखक:
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
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Tuesday, April 28, 2026

नेपाल का मुक्तिनाथ : हिंदुओं और बौद्धों का पवित्र एवं दुर्गम धाम✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


मुक्तिनाथ धाम नेपाल के मुस्तांग जिले में हिमालय की गोद में भगवान विष्णु का एक प्राचीन और अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल है। जो  हिमालयी क्षेत्र में, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में, 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर थोरोंग-ला पहाड़ियों के पास स्थित है, जो पोखरा से लगभग 197 किमी उत्तर- पश्चिम में है। यह स्थल हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए पवित्र है। 

मुक्तिनाथ यात्रा हर प्राणी को प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के साथ-साथ मोक्ष की अनुभूति कराती है। इस  मंदिर का उल्लेख रामायण, वराह पुराण और स्कंद पुराण जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। नेपाल के पोखरा से जोमसोम तक हवाई मार्ग से या फिर जीप/मिनी बस के माध्यम से मुस्तांग पहुँचकर ट्रेकिंग द्वारा भी यहाँ पहुँचा जा सकता है। मुक्तिनाथ पहुंचकर मंदिर तक 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है । यदि कोई श्रद्धालु चलने में असमर्थ हों तो सवारी के लिए घोड़े और पालकी की सवारी की व्यवस्था भी हो जाती है। घोड़े की सवारी 400 भारतीय रुपए में केवल जाने के लिए है और वापसी पैदल ही आना पड़ता है।पालकी की सवारी 4000 भारतीय मुद्रा में दोनों तरफ आने जाने के लिए लिया जाता है। पैदल पथ आधी दूरी प्लेन ऊबड़ खाबड़ और आधी दूरी पक्के स्टेप और रेलिंग से युक्त है। ऊपर कोई छाजन नहीं है।

शालिग्राम शिला के रूप में विष्णु:- 

इसे मोक्ष का स्थान माना जाता है और यह हिंदू धर्म के 108 दिव्य देशों में से एक है। यहाँ मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु शालिग्राम शिला के रूप में ज्वाला देवी मंदिर में भी स्थापित हैं।मुक्तिनाथ हिमालय के अन्य किसी भी तीर्थ स्थल से अलग एक शांत और रहस्यमय वातावरण प्रदान करता है। 

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्‍णु का निवास होता है। इस संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इन्‍हीं कथाओं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी। जब तक असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी। इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्‍णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्‍यतीत करने का शाप दे डाला। फल स्‍वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्‍थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्‍य हैं।

भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति:- 

यह वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति मिली थी। इसलिए मुक्तिनाथ में उनकी पूजा मोक्ष के देवता के रूप में की जाती है।

यह स्थल हिंदुओं के लिए विष्णु और बौद्धों के लिए अवलोकितेश्वर का निवास स्थान है। इनकी मूर्ति मुक्त गगन में दूर से ही दिखाई देती है।

सती का गाल गिरने से शक्तिपीठ बना 

स्वस्थानी व्रत के अनुसार, भगवान शिव सती के मृत शरीर को अपने साथ लेकर अनेक स्थानों पर विचरण करते रहे। भ्रमण के दौरान सती के शरीर के अंग अनेक स्थानों पर गिरे और जहाँ-जहाँ गिरे, वही स्थान शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हो उठा। मुक्तिनाथ में सती का गाल गिरा था, जिससे यह शैव और शाक्त भक्तों के लिए पवित्र स्थान बन गया। परिसर में "मुक्तेश्वर महादेव" नामक एक छोटा मंदिर भी है, जहाँ शिव भक्त दर्शन करने आते हैं।

हिरण के टूटे सींग को शिव लिंग के रूप में की मान्यता:- 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, शिव और पार्वती ने बागमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित जंगल में हिरण का रूप धारण किया था। बाद में देवताओं ने उनका पीछा किया और उनके एक सींग को पकड़कर उन्हें अपना दिव्य रूप धारण करने के लिए विवश किया। टूटे हुए सींग को लिंग के रूप में पूजा जाता था, लेकिन समय के साथ वह दब गया और खो गया।

108 जलधाराएं और कुंड :

मंदिर परिसर में 108 गौमुख हैं, जिनसे जल धाराएं गिरती हैं, और दो पवित्र लक्ष्मी कुंड और सरस्वती कुंड भी यहां हैं, जिनमें स्नान को पाप मोचन माना जाता है। इसे पाप और मोक्ष कुंड भी कहा जाता है कि यहां स्थित 108 जलधाराओं के नीचे स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इन धाराओं में स्नान करने से जन्म- जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। विश्व भर से तीर्थयात्री मुक्तिनाथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए यहां आते हैं। पवित्र जल धाराओं के नीचे स्नान करने से आत्मा की शुद्धि होती है और आंतरिक शांति तथा अतीत के कुकर्मों से मुक्ति मिलती है । 108 मुक्ति धाराओं और 2 मुक्ति कुंडों के नीचे पवित्र स्नान करें। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, 12 राशियां और 9 ग्रह मिलकर 108 का आध्यात्मिक संयोजन बनाते हैं, जो ब्रह्मांडीय पूर्णता का प्रतीक है। तिब्बती बौद्ध इसे 'चुमिग ग्यात्सा' (सौ जल) कहते हैं, जहाँ गुरु रिनपोछे ने ध्यान किया था।

ज्वाला मां का मंदिर: - 

मुख्य मंदिर के परिसर में ही 'ज्वाला मां' का मंदिर है, जहाँ एक पवित्र ज्योति लगातार प्रज्वलित रहती है, जो पृथ्वी, जल और अग्नि का अद्भुत संगम है। जहाँ बिना किसी ईंधन के पानी के कुंड के ऊपर शाश्वत अग्नि (ज्वाला) जलती रहती है। यह ज्वाली भूमि के अंदर है और एक एक व्यक्ति गुफा नुमा खिड़की से झुक कर दर्शन कर सकता है। इसके ऊपर तीन देवियों के विशाल मूर्तियां एक दिव्य आभा छोड़ती हैं। परिसर की दी पर छोटे छोटे देवियों के स्वरूप उकेरे गए हैं। यह स्थान वैष्णव संप्रदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और यहाँ की नीली ज्वाला को देवी का रूप माना जाता है। 


लेखक:- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

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Friday, April 24, 2026

अयोध्या के पौराणिक चंद्रहरि मन्दिर की महत्ता और उस पर आसन्न खतरा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

श्रीहरि विष्णु ने राक्षस संस्कृति के विनाश के लिए अयोध्या में राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। यह अवातर त्रेता युग में हुआ था। इसके पहले भी श्री हरि के अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा 84 कोस में लेने से जुड़े होने के संकेत मिलते हैं।अयोध्या में प्राचीन काल में हरि अर्थात भगवान विष्णु के 16 अति प्रसिद्ध मंदिर थे। कालांतर में अयोध्या में चक्रहरि चंद्रहरि धर्महरि विष्णुहरि ,गुप्तहरि, पुण्यहरि और बिल्लहरि आदि केवल सात हरि स्थान ही बचे हैं। इन स्थानों में कइयों की स्थिति वर्तमान में अत्यंत दयनीय हो चुकी है।


श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इन श्लोकों में श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं - 

सत्यायां सप्तहरयो वर्तन्ते पुण्यवर्धनाः । गुप्तहरिश्चक्रहरिस्तथा  विष्णुहरिः प्रिये ॥

धर्महरिर्बिल्वहरिस्तथा पुण्यहरिः शुभः ।  

एतेषां दर्शनाद् देवि पुण्यवृद्धिः प्रजायते।।

हे प्रिये! सत्या अर्थात् अयोध्या पुरी में सात 'हरि' हैं। इन सातों के दर्शन से पुण्य बढ़ता है। उनके नाम क्रमशः चन्द्रहरि, चक्रहरि, गुप्तहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि हैं। हे देवि! इनके दर्शनों से पुण्य की वृद्धि होती है ।

चन्द्र हरि की महत्ता भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी मां पार्वती से इस प्रकार कहते हैं - 

तस्माच्चन्द्रहरेः पूजा कर्तव्या च विचक्षणैः  

द्विजपूजा चन्द्रपूजा हरिपूजा विधानतः ॥ 

तीर्थ सेवी विद्वानों को चन्द्रहरि की पूजा करनी चाहिये, साथ ही ब्राह्मण, चन्द्रदेव तथा भगवान् श्रीहरि की भी विधान पूर्वक पूजा करनी चाहिये ।

वासुदेवप्रसादेन तत्स्थानं जातमद्भुतम् ।

तद्धि गुह्यतमं स्थानं वासुदेवस्य सुव्रते ॥ 

हे सुन्दर व्रत को धारण करनेवाली पार्वती! महाविष्णु के प्रसाद से वह चन्द्रहरि नामक तीर्थ अद्भुत महिमा वाला हो गया। महा विष्णु का वह तीर्थ अति गुप्त है ।

सर्वेषामेव  भूतानां  हेतु र्मोक्षस्य    सर्वदा ।

तस्मिन् सिद्धाः सदा विप्रा गोविन्दव्रतमास्थिताः ।

यह चन्द्रहरि नामक तीर्थ सम्पूर्ण जीवों को मोक्ष देनेवाला है। इस तीर्थ में निरन्तर विष्णु व्रत का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं ।

नानालिङ्गधरा नित्यं विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः । 

अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।

विष्णु लोक की प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले जीवन्मुक्त जन इन्द्रियों को जीतकर तथा अनेक प्रकार के शरीरादि धारण कर यहाँ परम योग का अभ्यास करते हैं ।

यथा धर्ममिहाप्नोति न तथान्यत्र कुत्रचित् । 

दानं व्रतं तथा होमः सर्वमक्षयतां व्रजेत् ॥ 

जितना धार्मिक अनुष्ठानों का फल इसतीर्थ में मिलता है,उतना अधिक फल अन्यकहीं, किसी भी तीर्थ में नहीं मिलता। यहाँ पर किया गया दान, व्रत एवं होमादि सत्कर्म- ये सब कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होते हैं।

सर्वकर्मफलावाप्तिर्जायते प्राणिनां सदा।

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं दानं च विविधं तु वै ॥ 

यहाँ सदा समस्त जीवों को उनके समस्त कर्मों के फल की प्राप्ति होती है। इसलिये सकाम तीर्थ सेवी को इस तीर्थ में अनेक प्रकार के दानों को अवश्य करना चाहिये।

अन्नदानं भूमिदानं गजदानं गवां तथा।

अश्वदानं रथानां च शिविकायास्तथैव च ॥ 

इस तीर्थ में अन्नदान, भूमिदान, गज दान, गोदान, अश्वदान, रथदान तथा पालकी दानादि यथाशक्ति करना चाहिये ।

दानादिकं विप्रपूजा दम्पत्योश्च विशेषतः । 

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पंचदश्यां विशेषतः । 

तस्य साम्वत्सरी यात्रा देवैश्चन्द्रहरेः स्मृता ॥ 

ये दानादि सत्कार्य ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि में सर्वोत्तम हैं और यहाँ पर सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करके दिया गया दान विशेष फलप्रद है। ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी को उन चन्द्रहरि जी की वार्षिकी तीर्थ यात्रा देवताओं के द्वारा समर्थित है ।

श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इसकी महत्ता इस प्रकार की गई है - 

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चन्द्रहरिं विभुम् 

वपनं तत्र कुर्वीत धर्मी तत्र विचक्षणः ॥ 

स्वर्गद्वार में तीर्थ व्रतधारी विद्वान् पुरुष स्नान करके और विभु चन्द्रहरि जी का दर्शन करके सर्वप्रथम वहीं मुण्डन कराये।

अयोध्यानिलयं विष्णुं ज्ञात्वाशीतांशुरुत्सुकः

आगच्छत् तीर्थमाहात्म्यंसाक्षात्कर्तुं सुधानिधिः ।

आगत्य चात्र चन्द्रोऽथ तीर्थयात्रां चकार सः।

अयोध्या में महाविष्णु श्रीरामचन्द्र जी सदैव निवास करते हैं, इस बात को जानकर चन्द्र देव दर्शन के लिये अति उत्कण्ठित हुए। उन सुधा निधि चन्द्र देव ने तीर्थ-महिमा जानने के अनन्तर उसका प्रत्यक्ष करनेके लिये इस अयोध्या में आकर तीर्थ यात्रा की।

क्रमेण विधिपूर्वेण नानाश्चर्यसमन्वितः । 

समाराध्य ततो विष्णुं तपसा दुश्चरेण वै ॥ 

चन्द्रमा ने अनेक प्रकार की आश्चर्यमयी घटनाओं को देखकर विधि पूर्वक क्रम से यात्रा करके अति कठिन तपश्चर्या के द्वारा महाविष्णु की आराधना की।

तत्प्रत्यक्षं समासाद्य स्वाभिधानपुरस्सरम् ।

हरिं संस्थापयामास तेन चन्द्रहरिः स्मृतः ॥ 

महाविष्णु के सामने उपस्थित होने पर चन्द्रमा ने यही वर माँगा कि आप यहाँ सदैव निवास करें तथा मेरे नाम से पीछे आपका नाम रहे, अर्थात् चन्द्र हरि नाम से आपकी प्रसिद्धि हो। इस प्रकार चन्द्र देवने अपने नाम को पूर्व में रखकर चन्द्र हरि जी की स्थापना की, अतः यह तीर्थ चन्द्र हरि नाम से विख्यात है ।

     यह माना जाता है कि ये सप्त हरि स्थानों का अस्तित्व और प्रमाण अयोध्या में लगभग 12वी शताब्दी से पूर्व से रहा है । इनमे चंद्र हरि मंदिर को 16 हरियों में चौथा स्थान प्राप्त है


चंद्रहरि मन्दिर की अवस्थिति:-

अयोध्या तीर्थ के स्वर्गद्वार की महानता को जानकर, चंद्रदेव ने वहाँ तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की सोची थी। चंद्रदेव ने भगवान विष्णु की एक प्रतिमा स्थापित कर उसकी पूजा की थी। यह प्रतिमा चंद्रहरि के नाम से प्रसिद्ध हुई। चंद्रहरि का प्राचीन मंदिर अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पैडी के पास स्थित सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर परिसर में भी कुल 5 मंदिर हैं। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में चंद्रहरि भगवान विराजमान हैं, जबकि उसके दाहिने ओर मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, बाईं ओर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर है।


द्वादश ज्योतिर्लिंग : शिव-विष्णु एकता: मंदिर के गर्भगृह में 12 शिवलिंग एक ही बड़ी 'योनि' पर स्थापित हैं, जो 'शिव मंडल' (शिव का विस्तारित परिवार) का प्रतीक हैं। ये द्वादश ज्योतिर्लिंग एक विशाल अर्घ्य के ऊपर है और वह भी मूर्ति में साक्षात ओमकार का दर्शन कराता है। चंद्र जी मंदिर का पावन वैभव अति विशिष्ट है। यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही मंदिर के परिसर में स्थित मुख्य गर्भगृह में विराजमान काले कसौटी के एक ही पत्थर में 11 मूर्तियां मौजूद हैं, जो अति महत्वपूर्ण मानी जाती हैं l माना जाता है इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और नित्य दर्शन से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस स्थान पर यह मंदिर भगवान चन्द्रमा द्वारा स्थापित किया गया था। सैकड़ों वर्षों पूर्व इस मंदिर को महाराज विक्रमादित्य द्वारा पुनः जीर्णोद्धार किया गया। तब से लेकर आज भी यह मंदिर स्थापित है।

मान्यता है कि चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने चंद्रमा को आशीर्वाद दिया कि वे जहां विराजे, वहीं चंद्रहरि मंदिर होगा।मंदिर के गर्भगृह में एक काले कसौटी के पत्थर में ही भगवान राम गरुड़ पर विराजमान हैं. जिनके साथ किशोरीजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, नल, नील अंगद, जामवंत, हनुमान और गरुण विराजमान हैं। चंद्रमा द्वारा पूजित हरि अर्थात नारायण ही चंद्र जी महादेव हैं। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन एवं धार्मिक महत्व रखता है।

         मंदिर के ठीक सामने यहां वर्तमान में राम की पैड़ी बनी हुई है, वहां सरयू की धारा प्रवाहित होती थी और त्रेता युग में यहां चंदन वन हुआ करता था। चंद्रमा द्वारा उपासना के बाद इसी वन में नारायण जी ने चंद्रमा को दर्शन दिया था।  वैसे तो अयोध्या का कण-कण सिद्धि की खान है, लेकिन स्वर्गद्वार तीर्थ अत्यंत महत्व का है और उसमें भी चंद्रहरि में हरि और हर दोनों के दर्शन होते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन:-

इस मंदिर में भगवान चंद्र्हरेश्वर के साथ बारह ज्योतिर्लिंग स्थापित है। चंद्र्हरी का मतलब होता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु की परम शक्ति वहां पर उपस्थित है और द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना भी किया गया है। पृथ्वी पर विद्यमान बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए कई स्थानों पर जाते है और उस स्थान के पुण्य प्राप्ति के लिए वह सिर्फ अयोध्या के इस चन्द्र हरि में दर्शन करने से प्राप्त होता है । जो व्यक्ति जो कमाना लेकर आता है उसे उस प्रकार की फल की प्राप्ति होती है।

गोदांबा महोत्सव:-

इस मंदिर की परंपरानुसार प्रत्येक वर्ष के एक माह तक धनुर्मास महोत्सव का आयोजन होता है। जिसे श्री गोदाम्बा पर्व कहा जाता है। मंदिर का वार्षिकोत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसमें एक महीने तक प्रतिदिन खीर और खिचड़ी से भगवान की सेवा की जाती है। इसका प्रसाद सैकड़ों लोगों में वितरित किया जाता है। 14 जनवरी को समापन के दिन भव्य भंडारा और संत सेवा होती है। मंदिर की परंपरा और पूजन पद्धति आगम है। मंदिर परिसर में गोदांबा जी का मंदिर भी निर्माणाधीन है. गोदांबा जी साक्षात लक्ष्मी जी ही हैं, जो भगवान रंगनाथ की पटरानी हैं और भगवान रंगनाथ अयोध्या के कुलदेवता हैं। इस नाते गोदांबा जी अयोध्या की कुलदेवी हुईं। मंदिर पर निरंतर पूजन स्त्रोत का पाठ आदि चलता रहता है।

उद्धार की प्रतीक्षा में खंडहर हो चुके प्राचीन धर्मस्थल का असलियत :-

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इस स्थान का उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इन पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान , हनुमान और पराशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की भगवान जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

मंदिर के प्राचीन कूप को हमेशा हमेशा के लिए ढककर बना दी गई मीनार नुमा मस्जिद :-

इस मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक होते हैं। स्कंध पुराण में स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्ग द्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते है। तथा लिखा है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु की परम शक्ति व गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होती है। इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l इस स्थान पर मस्जिद के अवशेष बचे हैं, जिसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। अब यह खंडहर बन गया है। इसे आसपास के लोगों को कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और अयोध्या के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। इस मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l ये स्थल सैकड़ों साल से वीरान होकर अब खंडहर बन चुके हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं ।


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लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

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Sunday, April 19, 2026

मंहगा विद्युत टैरिफ से जनता परेशान सार्वजनिक खपत पर सरकार लापरवाह✍️डॉ राधेश्याम द्विवेदी


दिन में सार्वजनिक स्ट्रीट लाइटों का जलना एक गंभीर समस्या है, जिससे बड़ी मात्रा में बिजली बर्बाद होती है और सरकारी धन की क्षति होती है। यह स्थिति अक्सर लापरवाही और खराब रखरखाव के कारण पैदा होती है। 

उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में ऐसी खबरें आम हैं, जहाँ दिन में बिजली बर्बाद होने से आम जनता का ही पैसा बर्बाद होता है। एक ओर स्मार्ट मीटर के महंगे टैरिफ से आम जनता तरह तरह की समस्याओं से जूझ रही है वहीं सरकारी लापरवाही से प्रकान्तर से जनता ही पिसी जा रही है। अधिकारियों में न प्रवेक्षण की कोई मार्गदर्शन है और ना ही विद्युत कर्मचारियों में स्वेक्ष्या आत्मदृष्टि।

शहर गांव और नगर पंचायतों के करीब सभी रास्तों व पार्कों में स्ट्रीट लाइट लगी होती हैं। ताकि लोगों को रात के समय सड़क या पार्क में आनेजाने पर अंधेरे से परेशानी ना हो। लेकिन प्रशासन की लापरवाही से रोड लाइटें रात के अलावा दिनभर भी जलती रहती है। जहां एक ओर जनता बिजली कटौती व ट्रिपिंग की समस्या से जूझ रही है। वहीं दूसरी ओर दिनभर रोड लाइट जलने से बिजली व्यर्थ खर्च हो रही है। ये बिजली बचे तो बिजली कटौती की समस्या से कुछ राहत मिल सकती है।

शहर के कई हिस्सों में दिन के समय भी नगर परिषद की स्ट्रीट लाइटें जलती रहती देखी जाती हैं, ना तो परिषद व ना ही जिला प्रशासन की इस ओर ध्यान दे पा रहा  है। खास बात तो यह है कि अधिकतर लाइटों के आन आफ करने के स्वीच तक नहीं है। इसके कारण आम आदमी चाह कर भी इन जलती हुई लाइटों को बंद नहीं कर पाता है। वहीं कई समाजसेवी संस्थाओं की ओर से अधिकारियों को इस बारे में सूचित भी किया जाता है, लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा रहता है।

नगर पालिका और नगर पंचायत प्रशासन ऊर्जा बचत को लेकर लापरवाह बना हुआ है। अधिकतर सार्वजनिक स्थानों के आसपास स्थापित स्ट्रीट लाइट दिन में भी जलता रहता है। जिम्मेदारों की इस लापरवाही से सरकारी धन की जहां एक तरफ क्षति हो रही है, वहीं पर दूसरी तरफ आम जन को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर स्ट्रीट लाइट हमेशा जलती रहती है, जबकि बिजली को दिन में बंद करने के लिए मेन स्विच लगाया गया है। इसके बावजूद नगर पंचायत और नगर पालिका क्षेत्र के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर स्ट्रीट लाइट दिन में भी जलती रहती है। नगर कौंसिल कर्मियों को इतना तो ध्यान देना ही चाहिए कि कब प्रकाश की जरूरत है और कब नहीं। दिन में स्ट्रीट लाइटों का बंद न होना नगर परिषद की लापरवाही को दर्शाता है।

Saturday, April 18, 2026

क्या ताजमहल उद्यान के शिलालेख को योजनाबद्ध तरीके से बटेश्वर का शिलालेख बना दिया गया ? ✍️आचार्य डा.राधेश्याम द्विवेदी


राजा परमार्दिदेव का परिचय :-

गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना 8वी शताब्दी में उज्जयिनी में हुई थी।उनके वंशज बाद में उज्जयिनी के साथ साथ गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र कान्यकुब्ज  (कन्नौज) पर भी शासन करते रहे। इसी वंश का शासक नागभट्ट द्वितीय के सामंत राजा चन्द्रवर्मन (नन्नुक) ने बुन्देलखण्ड वर्तमान उ. प्र. तथा म. प्र. का सीमान्त क्षेत्र में चंद्रात्रेय चन्डेल वंश की स्थापना किया था। इनकी राजधानी महोबा थी इनके अन्य प्रसिद्ध केन्द्र खजुराहो, कालंजर तथा अजयगढ़ रहे। 

कौन थे राजा परमार्दिदेव- राजा 

चण्डेल वंश में परमार्दिदेव का 1163- 1203 के मध्य शासन किया था। वह कालिंजर व महोबा के शासक थे। 1165 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे। उन्हें चंदेल वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक माना जाता है। चंदेलों का साम्राज्य यमुना-नर्मदा नदी के बीच फैला था, जिसमें वर्तमान बुंदेलखंड और दक्षिणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता था। परमार्दिदेव के सेनापति आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान से टक्कर ली। वह कन्नौज के राजा जयचंद्र के मित्र थे, इसलिए अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उनके प्रतिद्वंद्वी थे। इनकी सहायता से परमार्दिदेव ने अजमेर के चाहमान (चैहान) वंशी राजा पृथ्वीराज तृतीय पर आक्रमण किया था परन्तु ऊदल की मृत्यु के साथ परमार्दिदेव को पराजय का मुह देखना पड़ा था।

पृथ्वीराज के अधीन महोबा भी आ गया। परन्तु वहां पर वह अधिक दिन शासन नहीं कर पाया और वह क्षेत्र पुनः परमार्दि देव को वापस मिल गया। परमार्दिदेव के शासनकाल में मोहम्मद गोरी ने दो बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था। तराइन के द्वितीय युद्ध में 1192 ई. में पृथ्वीराज मारा गया था। 1194 ई. में मोहम्मद गोरी ने कन्नौज के गहड़वाल नरेश जयचन्द को चन्दवार में पराजित कर मार डाला था। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1202 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया। कुछ दिन तक लडऩे के बाद परमार्दिदेव ने हार मान ली। जिसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में अजमेर में चैहान वंश, कन्नौज में गहड़वाल वंश के पतन के साथ साथ बुन्देलखण्ड में चण्डेलवंश का भी पतन हो गया और भारत में मुस्लिम शासन का आधार मजबूत हो गया। परमार्दिदेव के समय बुन्देलखण्ड का चण्डेल वंशी शासन उत्तर भारत में गंगा यमुना की अन्तर्वेदी तक फैला हुआ था। इसमें कन्नौज मथुरा आगरा आदि पूरा ब्रज मण्डल समाहित था।



बटेसर अभिलेख का प्राप्ति स्थल विवादित 

आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अंगिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे। बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में अनेक शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे। लेकिन अब कुछ सदियों से कैलाश , रावली, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राज राजेश्वर नामक केवल पांच ही शिव मंदिर शेष हैं। छठे शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह छठा शिव मंदिर आगरा के इष्ट देव नागराज अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजो महालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे। तेजो महालय को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था। 

इतिहासकार पी एन ओक की पुस्तक अनुसार ताजमहल के हिन्दू निर्माण का साक्ष्य देने वाला काले पत्थर पर उत्कीर्ण एक संस्कृत शिलालेख लखनऊ के  संग्रहालय के ऊपर तीसरी मंजिल में रखा हुआ है। यह सन् 1155 का है। उसमें राजा परमर्दिदेव के मंत्री संलक्षण द्वारा कहा गया है कि 'स्फटिक जैसा शुभ्र इन्दुमौलीश्‍वर (शंकर) का मंदिर बनाया गया। (वह इतना सुंदर था कि) उसमें निवास करने पर शिवजी को कैलाश लौटने की इच्छा ही नहीं रही। वह मंदिर आश्‍विन शुक्ल पंचमी, रविवार को बनकर तैयार हुआ था।

ताजमहल के काले पत्थरों को जान- बूझकर वटेश्वर शिलालेख बनाया गया

ताजमहल के उद्यान में काले पत्थरों का एक मंडप था, यह एक ऐतिहासिक उल्लेख है। उसी में वह संस्कृत शिलालेख लगा था। उस शिलालेख को कनिंघम ने जान-बूझकर वटेश्वर शिलालेख कहा है ताकि इतिहासकारों को भ्रम में डाला जा सके और ताजमहल के हिन्दू निर्माण का रहस्य गुप्त रखा जा सके। वास्तव में आगरे से 70 मिल दूर बटेश्वर में वह शिलालेख नहीं पाया गया है। अत: उसे बटेश्वर शिलालेख कहना अंग्रेजी षड्‍यंत्र का हिस्सा है।

राजा परमार्दिदेव से जुड़ा एक शिलालेख भी यही कहता है। यह शिलालेख बटेश्वर में एक टीले पर वर्ष 1888 में कराए गए उत्खनन में मिला था। यह राजा परमार्दिदेव के शासन विक्रमी संवत् 1252 (1195 ईस्वी) से जुड़ा है। शिलालेख पर दो फुट चौड़ाई और करीब एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में 24 श्लोक उत्कीर्ण हैं।

शाहजहाँ ने तेजोमहल में जो तोड़ फोड़ और हेराफेरी की, उसका एक सूत्र सन् 1874 में प्रकाशित भारतीय पुरातत्व विभाग (आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वार्षिक वृत्त के चौथे खंड में पृष्ठ 216 से 17 पर अंकित है। उसमें लिखा है कि हाल में आगरे के वास्तु संग्रहालय के आंगन में जो चौखुंटा काले बसस्ट का प्रस्तर स्तम्भ खड़ा है। वह स्तम्भ तथा उसी की जोड़ी का दूसरा स्तंभ उसके शिखर तथा चबूतरे सहित कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित थे। 

इससे स्पष्ट है कि लखनऊ के वास्तु संग्रहालय में जो शिलालेख है वह भी काले पत्थर का होने से ताजमहल के उद्यान मंडप में प्रदर्शित था।

परमार्दिदेव का विक्रम 1252- 1195 ई. का बटेश्वर अभिलेख एक प्राचीन टीले पर प्राप्त होना बताया जाता है। ताजमहल के पूर्वी गेट से यमुना किनारे मिला शिलालेख (जिसे बटेश्वर शिलालेख भी कहा जाता है) 1195 ईस्वी / विक्रमी संवत् 1252 का है, जो शाहजहाँ से लगभग 500 वर्ष पूर्व का है। यह शिलालेख 'तेजो महालय' यानी शिव मंदिर के अस्तित्व की ओर इशारा करता है। शिलालेख मूल रूप से ताज उद्यान क्षेत्र में स्थापित था, जिसे बाद में हटाया गया।

ए सी एल कार्लाइल 1871- 72 में इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन व सर्वेक्षण किया था । उस समय तक उसे यह अभिलेख नहीं प्राप्त हुआ था। मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1873-74 भाग 7 के पृ. 5 पर बटेश्वर आगरा से प्राप्त होना बताते हैं। पुनः मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1883-84 भाग 21 के पृ. 82 क्रम संख्या 52 पर इसे बगरारी के तालाब के तट पर दो टुकड़ों में प्राप्त होना बताते हैं। बगरारी को मथुरा के निकट सिंघनपुर के पास होना भी बताया जाता है। अधिकांश अभिलेखीय साक्ष्य इसे आगरा जिले में स्थित बटेश्वर का अभिलेख मानते हैं। 

1886 में हुलुतज ने Zeitechrift D Morg. Ges. के भाग  11 के पृ. 51-54 में प्रतिलिप्यान्तर कराया था। बाद में 1888 में प्रो. एफ. कीलहर्न ने इसका अध्ययन कर Epigraphia Indica के भाग 1 में पृ. 207-214 में प्रकाशित कराया था। इन दोनों संदर्भों में इस अभिलेख की प्रतिकृति नहीं प्रस्तुत की गयी है। प्रसिद्ध पुरालेख शास्त्री हरिहर विट्टल त्रिवेदी ने इस अभिलेख को उक्त संदर्भों के अतिरिक्त अन्य़ कहीं नहीं देखा था। उनके निवेदन पर लखनऊ राज्य संग्रहालय के निदेशक ने इस अभिलेख का स्याही के छाप की अनुमति दी थी। 

श्री त्रिवेदी इसे Corpus Inscriptions Indicarem के खण्ड 7 भाग 3 में क्रम सं. 139 पृ. 473-78 प्लेट 126 पर प्रकाशित कराया है। अभिलेख के विषय वस्तु के अनुसार यहां प्राचीन विष्णु एवं शिव मंदिरों के निर्माण कराने की बात कही गयी है। एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया। 

पूर्णिमा की रात को या फिर उन रातों को जब चंद्र अच्छी रौशनी देता है उसकी रौशनी शिवलिंग पर पड़ती थी तो सफ़ेद शिवलिंग रात को चमकता था। ये मंदिर कहां थे यह शोध का विषय है ?

शुभ्र शिव मंदिर तेजोमहालय (ताजमहल) :- 

राष्ट्रवादी विचारक विष्णु मंदिर को मथुरा का द्वारिकाधीश तथा शिव मंदिर को आगरा का तेजेश्वर महादेव मंदिर (ताज महल) के रुप में जोड़ते हैं। बटेश्वर शिला लेख में राजा परमार्दिदेव के मंत्री सलक्षणा द्वारा भव्य वैष्णव व शैव मंदिर बनवाने का जिक्र है। लखनऊ संग्रहालय में रखे वर्ष 1195 के इस शिलालेख में दो फुट चौड़ाई व एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा के 34 श्लोक हैं। शिलालेख मंदिरों की जगह के बारे में कुछ नहीं कहता। मगर, इतिहासकार प्रो. पी. एन. ओक ने इसमें उल्लिखित शिव मंदिर को ताजमहल बताया था। श्री पी. एन. ओक अपनी पुस्तक Tajmahal is a Hindu Temple Palace में 100 से भी अधिक प्रमाण एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। यह तेजा जी के नाम से बनाया गया था । इसके अनुक्रमांक 30 पर बटेश्वर शिलालेख का उल्लेख है। 

बटेश्वर एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है  शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया इस शिलालेख को ‘बटेश्वर शिलालेख’नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने बहुत बड़ी भूल की है, क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि यह बटेश्वर में पाया गया था। 

आज जहाँ पर ताजमहल है, वहां पर हज़ारों साल पहले अंगिरा ऋषि ने शिवमंदिर बनाया था उसका नाम तेजोमहालय रखा था, कुछ लोग इसे अग्रेश्वर महादेव के नाम से भी सम्बोधित करते रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस शिलालेख का नाम ‘तेजोमहालय शिलालेख’ होना चाहिये क्योंकि यह ताज के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर फेंक दिया गया था शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archaeological Survey of India Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है जिसमें लिखा है- 

Great square black balistic pillar which, with the base and capital of another pillar....now in the grounds of Agra,...it is well known, once stood in the garden of Tajmahal". 

इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, "एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।" यह अभिलेख प्रशंसात्मक रुप में प्रशस्ति गाथा है। 

इस अभिलेख के तीन प्रमुख भाग हैं- प्रथम भाग में 13 पद्य हैं जिसमें चण्डेल वंश की परम्परा का वर्णन किया गया है। द्वितीय भाग पद्य 14 से 24 तक है। इसमें राजा के मुख्यमंत्री के वंश परम्परा का वर्णन किया गया है। तृतीय खण्ड मुख्य है । इसमें पद्य 25 से 29 तक अभिलेख का उद्देश्य का वर्णन आता है। पद्य 30 से 34 तक लिखने वाले का परिचय दिया गया है। 

इस खण्ड का पद्य 25 व 26 दो विशाल मंदिरों के निर्माण का वर्णन करता है। इसका मूल पद्य ,अंग्रेजी व हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रासादो वैष्णवस्तेन निमर्मितोन्तव् र्वहन्हरिम्।                                            मू द् ध् र्ना स्पृसशति यो नित्यं पदमस्यैव मध्यमम्।।

He (King Parmadidev) erected a temple of Vishnu, containing a image of Hari which with its top always touches his own middle stride.

उन्होंने विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया था जिसमें हरि की एक मूर्ति स्थापित थी। इस मंन्दिर का शिखर इतना ऊंचा था कि मध्य आकाश को स्पर्श करता था।

अकारयच्च स्फटिकावदातमसाविदम्मन्दिरमिन्दुमौलेः।  न जातु यस्मिन्निवसन्स देवः कैलासवासाय चकार चेतः।।

And he also caused this crystal white habitation of the moon crested (Siva) to be built, residing in which the God has never turned his thoughts to dwelling on Kailas.

चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले शिव मंन्दिर का निर्माण स्फटिक के समान धवल रंग से प्रकाशित हो रहा था जिसमें निवास करने के कारण भगवान शिव ने कैलाश पर निवास करने का विचार छोड़ दिया।

लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी , पूर्व पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001मोबाइल नंबर +91 9412300183