Monday, February 9, 2026

कविराज लछिराम की जीवन की प्रशस्तियां (बस्ती के छंदकार कड़ी 30)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

(कविराज लछिराम का सामान्य परिचय बस्ती के छंदकार की इसी श्रृंखला की कड़ी 4 में 14 अप्रैल 2017 को भी प्रकाशित हो चुका है । पाठक गण अवलोकन कर सकते हैं - संपादक)
            लछिराम की वंशावलि  
ललकराम हरि भक्त लछि के परदादा रहे मंगलराम दादा राजाओं से सम्मानित थे। पलटनराम रामभक्त पिता ब्रह्मभट्ट रहे लछिराम कविराज राजाओं के आश्रित थे।
जानकीशरण पुत्र रहे अकेले अपने वश में जगदीश, राज, श्याम,चंद्रभाल पौत्रदि थे।।
           – डॉ राधेश्याम द्विवेदी 'नवीन

जीवन परिचय :- 
हिंदी में लछिराम नाम के सात कवियों का उल्लेख मिलता है जिनमें सबसे अधिक प्रख्यात हैं 19वीं शती के अमोढ़ा या अयोध्या वाले लछिराम(1841-1904 ई.) हैं। इनका जन्म पौष शुक्ल दशमी, संवत् 1898 (तदनुसार 1841 ई ) में अमोढ़ा परगना के गांव शेखपुरा (जि. बस्ती) में हुआ था। पिता पलटन ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण थे। 
इसकी पुष्टि इस दोहे से होती है - 
वंदीजन लछिराम को नगर अमोढ़ा वास सूर्यवंश उपरोहिती शेखपुरा पुर खास ।।
     राजा अमोढ़ा इनके पूर्वजों को अयोध्या से अमोढ़ा लाए थे। ये कुछ दिन अयोध्या नरेश महाराज मानसिंह (प्रसिद्ध कवि द्विजदेव) के यहाँ राज दरबार में रहे। इस कुल में कवियों की परंपरा विद्यमान थी। जीवन के प्रारंभिक चरण में ही यह रीतिकालीन कवियों से अधिक प्रभावित हुए। ब्रह्मभट्ट कवि प्रायः आश्रय दाताओं की तलाश में अपने काव्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। सं.1904 वि./ 1847 ई. में लछिराम लामाचकनुनरा ग्रामवासी जिला सुल्तानपुर के साहित्य शास्त्री कवि "ईश" के पास अध्ययनार्थ चले गए थे । 5 वर्ष वहाँ अध्ययन करने के बाद अपने घर शेखपुरा चले आए। फिर 16 वर्ष की अवस्था में संवत 1914 वि./1857ई .में इनकी भेंट अयेध्याधिपति राजा मानसिंह "द्विजदेव" से हुई। उन्होंने अपनी पद्धति से लछिराम जी को शिक्षा देकर काव्य रचना में निगुण बनाया। यहीं पर इन्हें "कविराज" की उपाधि दी और अपना आश्रय भी प्रदान किया। मानसिंह के प्रति उन्होंने 'मानसिंह' जंगाष्टक' नामक ग्रन्थ लिख रखी थी। मानसिंह जब तक जीवित रहे तब तक लछिराम को अयोध्या दरबार से 1200 रूपया मासिक पेंशन मिलती रही। उस दरबार में लछिराम के अतिरिक्त जगन्नाथ अवस्थी, बलदेव तथा पं० प्रवीन आदि अन्य कवि भी राजाश्रम में पल रहे थे। 
- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )
     राजा मानसिंह द्विजदेव का निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि. तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं-कहीं उनको 1871ई .में मृत्यु दिखाकर त्रुटि दिखाई जाती है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लछिराम जी ने निम्न छन्द पढ़ा था -
कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ । 
वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।
 कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।
- (डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )
     "द्विजदेव" के माध्यम से लछिराम का संपर्क अनेक काव्य रसिक और गुणज्ञ राजाओं से हुआ । उनको आगरा और अवध प्रांत के लगभग सभी राजा और महाराजा जानने और पहचानने लगे थे। जब कभी वह महाराज जी के साथ राज्य कार्य के रूप में अंग्रेजी शान शौकत भरे अवध राज दरबार में जाते थे , जहां कई अपने मंद - मंद स्वरों से छंदों का अजश्र निर्झर प्रवाहित कर हजारों लोगों के अंतर्मन को रसानुभूति प्रदान करता था।
महाराजा मानसिंह के संरक्षण में रहने के कारण लछिरामजी कवि रूप में बहुचर्चित हुए और अपने समय के बड़े-बड़े समारोहों के अतिरिक्त साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में भी स्थान पाने लगे।मिश्र बंधुओ ने लछि- राम जी के प्रति अपनी साहित्यिक दृष्टि डाली । आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इन्हें अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में परवर्ती रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ और अंतिम छंदकार माना है। पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने इनका साहित्यिक मूल्यांकन किया है। पंडित नक्छेद तिवारी ने उनकी जीवनी लिखी है। उनके प्रिय शिष्य यक्षराज ने इनका साहित्यिक गौरव गान किया है। पंडित राम भरोसे ने लछिराम जी के बारे में पर्याप्त सामग्री जुटाई है। उनके शिष्य बृजेश कवि ने लछिराम को अपना गुरु बनाया है। बिहारी कवि ने लछिराम जी का शिष्यत्व ग्रहण किया है।
सम्बद्ध राजघराने :- 
लछिराम ने अनेक राज घरानों से जुड़े रहे।
उन्होंने प्रत्येक के नाम पर एक- एक रचना लिखी है। इन प्रमुख राजाओं का नाम इस प्रकार है - 
1. महाराज मानसिंह 'द्विजदेवसी अयोध्या
2. प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' अयोध्या
3. राजा शीतला बख्श सिंह 'महेश' बस्ती
4. लक्ष्मीश्वर सिंह
5. रावणेश्वर प्रसाद सिंह 
6. मुनेश्वर बख्श सिंह 
7. मटेश्वर बख्श सिंह 
8. महेन्द्र प्रताप सिंह 
9. कमला नन्द सिंह 'सरोज' 
घर और जमीन उपहार में मिला था :- 
राजा महेश शीतला बख्श सिंह बस्ती के राजा थे। लछिराम जी जिस समय उनके दरबार में पहुंचे उस समय उनके यहां पुत्र उत्सव का कार्य चल रहा था । लछिराम जी राजा साहब के दरबार में पहुंचकर जो छंद प्रस्तुत किया वह इस प्रकार है - 
मंगल मनोहर सकल अंग कोहर से, 
आनंद मगन पै छट्टान अधिकाती है। 
हेरानि हंसिनि कर पद की चलनि ,
सुर मांग ठूंनकनि पै पियूष सरसाती है। लछिराम शीतलाबख्श बाललाल जाके, भाल की ललई पै उकती अधिकाती है। 
मेष राशि प्रथम मुहूर्त प्रभात उड़यो,
कुज लै दिनेश उदयाचल कैराती है।।
      बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह ने उनके घर के शेखुपुरा के पास इन्हें 50 बीघे का "चरथी" गाँव (वर्तमान दुबौलिया ब्लॉक में स्थित) उपहार में दिया और निवासार्थ मकान भी बनवा दिया था। आज भी इनके वंशज यहाँ पर रहते हैं। अपने आश्रयदाता राजाओं से कवि को अधिकाधिक द्रव्य, वस्त्राभूषण तथा हाथी, घोड़े आदि पुरस्कार में प्राप्त होते रहे हैं। 
लछिराम और राजा प्रताप नारायण सिंह 'ददुवा साहब’ :- 
महाराज प्रताप नारायण सिंह उर्फ ददुआ साहब महाराज मानसिंह के दौहित्र थे। मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर जब राजा प्रताप सिंह 'वीरेश' ददुआ साहब अयोध्या नरेश बने तो कविराज लछिराम के आश्रय दाता भी बने। एक बार राजा साहब ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा तो उन्होनें निम्नलिखित छंद सुनाया था -
वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं। 
मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं।
 कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं। महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह, 
कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।
   अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा। इन्होंने प्रताप रत्नाकर' नामक ग्रन्थ की रचना किया।
अयोध्या धाम में वास रहा :- 
लछिराम जी अयोध्या में रहते थे। वहीं उन्होंने एक राम मंदिर बनवाया; कई कुएँ खुदवाए; और कई बाग़ भी लगवाए थे। अपनी जाति के बहुत से लड़कों के पढ़ने का उन्होंने प्रबंध कर रखा था । सुनते हैं, दो-एक पंडित भी उन्होंने पढ़ाने के लिए रखते थे, और एक पाठशाला भी खोल रखी थी। उनका पुत्र जानकी शरण आठ-नौ वर्ष का रहा है। जो और अपनी माँ और पिता के साथ अयोध्या में रह रहा था। लछीरामजी के शिष्य, यशराज कवि, ने अपने गुरु, कविवरजी की मृत्यु उपरान्त उनके शोक में एक लम्बी कविता लिखी , जिसके कुछ अंश आगे दिया जा रहा है। कविवर जी के विषय में हमने जो कुछ लिखा है, वह उसी कविता के आधार पर है। लछीराम जी के छायाचित्र से मालूम होता है कि वे पुराने ढंग के कवि थे, और पुराने ढंग की पगड़ी पहनते और लाठी बाँधते थे, तथापि पुरानी चाल के जूतों की जगह वे बूट पहनते थे। 
रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य:-
लछिराम रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य कवि हैं। उनकी कृतियों में रस, अलंकार, शब्दशक्ति, गुण और वृत्ति आदि रीतितत्वों का लक्षण, उदाहरण सहित, सांगोपांग निरूपण हुआ है। अपनी शास्त्रीय दृष्टि के लिए वह संस्कृत में "काव्यप्रकाश", भानुदत्त की "रसमंजरी", अप्पयदीक्षित के "कुवलयानंद" आदि और हिंदी में भिखारी दास तथा केशवदास आदि के ऋणी कहे जा सकते हैं। ढाँचा पुराना होने पर भी उनकी सहज काव्य प्रतिभा रमणीय भाव दृश्य का चित्रण करती है। बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह से, जो एक अच्छे कवि थे, से 50 बीघे भूमि पाई थी । दरभंगा, पुरनिया आदि अनेक राजधानियों में इनका सम्मान हुआ। प्रत्येक सम्मान करने वाले राजा के नाम पर इन्होंने कुछ न कुछ रचना की है, जैसे, मानसिंहाष्टक, प्रताप रत्नाकर, प्रेम रत्नाकर (राजा बस्ती के नाम पर), लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, (दरभंगा नरेश के नाम पर), रावणेश्वर कल्पतरु (गिध्दौर नरेश के नाम पर), कमलानंद कल्पतरु (पुरनिया के राजा के नाम पर जो हिन्दी के अच्छे कवि और लेखक थे ) इत्यादि। इन्होंने अनेक रसों पर कविता की है। समस्यापूर्तियाँ बहुत जल्दी करते थे। वर्तमान काल में ब्रजभाषा की पुरानी परिपाटी पर कविता करनेवालों में ये बहुत प्रसिद्ध हुए हैं। 
रचनाएँ :- 
लछिराम की प्रसादगुण युक्त ब्रजभाषा में रचनाएँ है। कुछ के नाम ये हैं - मुनीश्वर कल्पतरु, महेंद्र प्रतापरस भूषण, रघुबीर विलास,लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, प्रताप रत्नाकर, रामचंद्र भूषण, हनुमंत शतक, सरयू लहरी, कमलानंद कल्पतरु, मानसिंह जंगाष्टक, , सियाराम चरण चंद्रिका, श्रीकृष्ण भक्ति पर आधारित करुणाभरण नाटक सं०1761 वि., प्रेम रत्नाकर, राम रत्नाकर, लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, रावणेश्वर कल्पतरु ,महेश्वर विलास ,नायिका भेद, देवकाली शतक, राम कल्पतरु, गंगा लहरी और नखशिख परम्परा आदि उनकी उत्कृष्ट रचनायें है।  
लच्छीराम जी के प्रति भावनात्मक उद्‌गार :- 
लछिराम जी कारयित्री प्रतिभा के कवि थे। यह अपने साहित्यिक, आकर्षक, भावपूर्ण
आकृति से जहाँ भी जाते थे लोग उनको आदर-सत्कार देते थे। काव्यपाठ में इनकी वाणी इतनी बुलन्द रहती थी कि इनके छन्दों को सुनकर अन्य कवि दंग रह जाते थे। बड़े-बड़े राजाओं और महाराजाओं के यहाँ इन्हें सम्मान मिलता था। उनके सम्पर्क में रहकर दर्जनों कवि अच्छी ख्याति पायें। ब्रहृमभट्ट परिवार में उत्पन्न होने के कारण यह चारण परिवार के अवश्य थे किन्तु सम्मान को ही सब कुछ समझते थे। जिस राज दरबार में इन्हें कीमती दुशाला नहीं मिलता था, उस दरबार में पुनः नहीं जाते थे। यही कारण था कि आश्रयदाता राजा लोग इन्हें घोड़े हाथी की सवारी ही नहीं अपितु धन-धान्य देकर विदा करते थे। रीवा के ब्रजेश कवि और कविराज यशराज उनके योग्य शिष्यों में से थे। पंडित बलदेव अवस्थी, द्विजबल देव ,बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर,कविवर भगवंत आदि इनके अत्यंत सन्नीकट के कवि और छंदकार थे। महाराज मानसिंह 'द्विजदेव' का साहित्यिक प्यार इन्हें किशोर अवस्था से ही मिला हुआ था।

लछिराम की रचनाओं के कुछ नमूने :- 

1.सौंदर्यशृंगार का सवैया 

पेंजनी कंकन की झनकार सों,
नासिका मोरि मरोरति भौंहैं।
ठाढी रहै पग द्वैक चलै, 
सने स्वेद कपोल कछू उघरौहैं।
यों लछिराम सनेह के संगन, 
साँकरे मे पर प्यारी लजौहैं।
छाकी रह्यो रस-रंग अभी, 
मनमोहन ताकि रह्यो तिरछौहैं॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238) 

2.कृष्णअभिसार का सवैया- 

मौज में आई इतै लछिराम, 
लग्यौ मन साँवरो आनंद-कंद में।
सूनौ संकेत निहारत ही पर्यौ, 
साँवरौ आनन घूँघट बंद में।
बोलिबे कौ अभिलाख रचै पै न, 
बोल कछू दुख-रासि दुचंद में।
ह्वै रही रैन-सरोज-सी प्यारी, 
परी मनों लाज मनोज के फंद में॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)

3.शिव धनुष भंजन - 
 बान महाबली और 
अदेव और देवनहू दृग जोर्यो।
तीनहू लोकन के भट भूप 
उठाय थके सबको बल छोर्यो॥
घोर कठोर चितै सहजै 
लछिराम अमी जस दीपन घोर्यो।
राजकुमार सरोज-से हाथन
 सो गहि शंभु-सरासन तोर्यो॥
- कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)

    सोलह श्रृंगार परक कवित :- 
1.
सत सिंगार साजि, कीन्हौ अभिसार जाइ,
जोबन बहार रोम-रोम सरसत जात।
लछिराम तैसी झनकार पैजनी की कर,
कंकन खनक चूरी चारु परसत जात।
झरत प्रस्वेद, मुख चूनर सुरंग बीच,
विहँसत मन सारदा कौ तरसत जात।
दामिनी अमंद सौहें बस रस फंद चंद,
मानों लाल बादर में मोती बरसत जात॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238) 
2.
चटपटी चाह अंग उपटे अनंग के री,
रंग रावटी ते काम नट की कुमारी-सी।
कबि लछिराम राज-हंसनि सों मंद-मंद,
परम प्रकासमान चाँदनी सँवारी-सी॥
नागरि निकुंज में न हेर्यौ ब्रजचंद मुख,
रुख पै सहेली भई आँखे रतनारी-सी।
भौंहन मरोरति, बिथोरति मुकुत हार,
छोरति छरा के बद, रोष-मद ढारी-सी॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239) 
3.
सामुहै सुमन बरसाइ सुघराई संग,
लछिराम रंग सारदा हू कौ रितै रहै।
छाती में लगाइ सूम थाती-सौ कमल कर,
सुकुमारताई कों सराहि दुचितै रहै॥
अलक लंबाई, चारु चख चपलाई,
अधरान की ललाई पर हरष हितै रहै।
भाई! मनमोहन, गोराई मुख-मंडल पै,
राई नौन बारि घरी चारि लौ चितै रहै॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238) 
4.
सजल रहत आप औरन को देत ताप,
बदलत रूप और बसन बरेजे में।
ता पर मयूरन के झुंड मतबारे साले,
मदन मरोरै महा झरनि मरेजे में॥
कवि लछिराम रंग साँवरो सनेही पाय,
अरजि न मानै हिय हरषि हरेजे में।
गरजि-गरजि विरहीन के बिदारे उर,
दरद न आवै, धरै दामिनी करेजे में॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240) 
5.
वार लकवारहिं लपेटि गुण बंधन में,
मन्मथ चक्र लौं सवारि मगरूरी है।
मंजु मपि बलित बहार जा वसन भलो,
राहु रवि-संग मो विलास ब्रजरूरो है॥
लछिराम राधे अंग चंपक बरन पर,
सौहैं करै सौतिन गरब चक चूरो है।
समय सुमन स्याम सुंदर सरूरो फल्यौ,
जूरो सुभ सिखर सुहाग फल पूरो है॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 434) 
6.
मरम न खोलैं खरी भरम न बोलैं कछु,
अजब अतोलैं पीर हीयरै धरी रहै।
खान-पान सौरभ सिंगारहु सँवारे कौन,
स्वास में सहेलिन की मति भरमी रहै।
लछिराम कीरति कुमारी छाम तन-मन,
ज्वाला मुखी विरह लपट लहरी रहै।
सौंरि कर साँवरे विहार परमानंद को,
पौरि पर पोखराज माला सी परी रहै॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436)
7.
कसनिभुजानि की सुजानिकीकहीन जाति,
उमदानि अंगन अनंग की घनी रहै।
छूटि-छूटि जाते बार विथुरे सुकंधन पें,
लिपिगे सिंगारन बनावति जनी रहै॥
कवि लछिराम जाहि निशान पुरति के हू,
निसापूरि करिबे के ब्यौंत हि ठनी रहै।
रैनि सब जागी अनुरागी दिन हू में बाल,
लाल उर लागिबे की लालसा बनी रहै॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435) 
8. श्रीराम 
भानुवश भूषण महीप रामचंद्र वीर,
रावरो सुजस फैल्यो आगर उमंग में।
कवि लछिराम अभिराम दूनो शेषहू सो,
चौगुनो चमकदार हिमगिरि गंग में॥
जाको भट धेरे तासो अधिक परे है ओर,
पंचगुनो हीराहार चमक प्रसंग में।
चंद मिलि नौगुनो नछत्रन सो सौगुनो ह्वै,
सहस गुनो भो छीरसागर तरंग में॥
– कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)
9. शृंगार 
प्रीति रावरे सो करी, परम सुजानि जानि,
अब तौ अजान बनि मिलत सबेरे पै।
लछिराम ताहू पै सुरंग ओढनी लै सीस,
पीत-पट देत गुजरैटिन के खेरे पै।
सराबोर छलकै प्रस्वेद कन, लाल भाल,
मदन मसाल वारौ वदन उजेरे पै।
आपुने कलंक सों कलंकिनी बनी हौ लूटि,
और हू को घरत कलंक सिर मेरे पौ॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240) 
10. श्रीकृष्ण 
भीरते अहीरन की बिछलि पर्यो धों कहा,
जितै जलकेलि तू सदा बिहारियत है।
लछिराम औचक उलटि परी अंजन ते,
रुख तिरछोहैं यो पुरुष कारियत है॥
सुमन सिरीष सुकुमार मन मोहन पै,
कहर कटाछन वजर पारियत है।
अजब अधीर वीर वारो जमुना के वीर,
तीरथ के तीर काहू तीर मारियत है॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435) 
11. शृंगार 
मोतिन के चौक पुंज पाँवरे पसारि पौंरि,
पूजि पग नखन महावर थरति है।
भूखन वसन पीरे कंकन जंजीरे कर,
मौरी माल वंदन प्रभावर धरति है॥
लछिराम अरविंद स्याम अंजली से राखि,
नवल किसोरी भोरी भाँवरि भरति है।
थारन में छलकै रतन सुवरन भार,
भोर ही सों गौरी की निछावरि करति है॥
- साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436) 
12. भ्रांति 
उरज महेश उदै बदन सुधाकर कौं,
बेनी बंक लोचन त्रिबेनी रंग आला है।
बेंदी भाल बेसरि बुलाक विहँसनि सीरी,
मदन मरोरही के कतरै कसाला है॥
तीरथ अरत प्रतिबिंबित पराग-पग,
लछिराम खोलें तीनों तापन दिवाला है।
साला सी रतन रतनाकर विसाला ब्रज,
जालापापकाटिबे को बालाहै कि माला है॥
— साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435) 
13. शृंगार 
आए कहूँ अनंत विहार करि मंदिर में,
सामुहै झमकि छवि दामिनी की छौरै है।
आरस-बलित बागौ मगरजी ढीली पाग,
बदन चंद्र भाल भौहन के कोरै हैं॥
भरम खुल्यौ न अंग परसत मोहिनी कौ,
लछिराम सान सँग मोहन मरोरै हैं।
लोचन सुरंग हेरि बाल के सरोष मानी,
रंगसाज मदन मजीठ रंग-बोरै हैं॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239) 
14.श्री रामजी 
भरम गवावै झरबेरी संग नीचन ते,
कंटकित बेल केतकीन पै गिरत है।
परिहरि मालती सु माधवी सभासदनि,
अधम अरूसन के अंग अभिरत है॥
लछिराम सोभा सरवर में विलास हेरि,
मूरख मलिंद मन पल ना थिरत है।
रामचंद्र चारु चरनांबुज बिसारि देश,
बन-बन बेलिन बबूर में फिरत है॥
- कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)
15. श्रृंगार 
बदल्यो बसन सो जगत बदलोई करै,
आरस में होत ऐसो या में कहा छल है।
छापहै हरा की कै छपाए हौ हरा को छाती,
भीतर झगा के छाई छबि झलझल है।
लछिराम हौं हूँ धाय रचिहौ बनक ऐसो,
आँखिन खबाये पान जात क्यों अमल है।
परम सुजान मनरंजन हमारे कहा,
अँजन अधर में लगाए कौन फल है॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239) 
16.कृष्ण प्रेम
स्याम घन रंग तेज तरल त्रिभंग सौहै,
लोचन सनेही सीख मानि रहिबो करो।
लछिराम चौचंद चवायन परोसिनी तैं,
बंद करि कान सानमान सहिबो करो॥
त्रिभुवन वारि नट नागर मुकुट पर,
साखन दै गौरि मन कह गहिबो करो।
अभिलाख लाखन धरौंगी पौरि ताखन पै,
माख न करौंगी ब्रज लाख कहिबो करो॥
- साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435) 

यज्ञराज की 'शोकप्रकाश’में दी गई श्रद्धांजलि:- 
अब हम कविराज लछिराम के परम शिष्य यज्ञराज कवि की 'शोकप्रकाश' नामक कविता का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत करते हैं- 

श्रीकविवर लछिराम हाय! बैकुंठ सिधारे;
यज्ञराज तब शिष्य सुनत दुख लह्योअपारे।

बैठि गयो करि हाय, कहूँ कछु सूझतनाहीं;
किधों साँच कै झूठ,हायबूझौं क्यहि पाहीं? 

मुख ते कढ़े न बैन, नयनआँसू बह झरझर;
आवन लगी उसाँस, गातकाँपै सबथर-थर।

होय नहीं मन धीरु पीर उर असहन बाढ़ी;
भाँत-भाँति की उठै चित्त में चिंता गाढ़ी।

जीवनजानि अनिस्य लह्यो धीरज मन माहीं
लछीराम को मरन सोचिवे लायक नाहीं।

मरन सोचिबे जोग जाहि मारै भुजंग डसि;
पावकजरि,जलडूब,मरैविषखाय,मारिअसि

सुजस नाम विख्यात नहींजाको जग माहीं;
मानुष-तन जो पाय सुकृतकीन्हींकछुनाहीं।

यहि बिधि के सब जीव मरेपरजमपुरजाहीं;
इनसबकोसुनिमरनसाधुजनअतिपछिताहीं।

सरस सकल साहित्यईस-कविताहिपढ़ायो;
रचना रुचिर कबित्त माहिं बहु प्रेम बढ़ायो।

मानसिंहद्विजदेवजगत-बिख्यातअबधपति,
सुनि कबित्त है दानेरीझिसम्मानकियोअति।

श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;
कमलानन्द 'सरोज'सराहतसुकवि-समाजा।

बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;
करत बारतालापदुहुन को दोउसुख साजा।

भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;
अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।

एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;
दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।

गरजनि सिंह-समान सभा मैंश्रीकविबरकी;
सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी

रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;
जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।

मानसिंह द्विजदेवजगतबिख्यातअबधपति,
सुनिकबित्तहै दाने रीझिसम्मानकियो अति।

श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;
कमलानन्द 'सरोज'सराहतसुकवि समाजा।

बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;
करत बारतालाप दुहुनकोदोउ सुख साजा।

भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;
अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।

एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;
दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।

गरजनि सिंह-समानसभा मैंश्रीकविबर की;
सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी

रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;
जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।

अचल अवध के बीच राम मन्दिर बनवायो;
वन-प्रमोद जहँ सीय राम अतिसै सुपायो।

सदा औधपुर बास सुखद सरजू-जल-सेवा;
लषन-राम-सिय छोड़ि औरदूसर नहि देवा

भगवंत कवि की काव्यांजलि :- 
प्रतापगढ़ (अवध) के भगवंत कवि ने लछि रामजी की मृत्यु पर एक पद्य कहा है। उसे भी हम नीचे देते हैं- 
अंस निज सुत मैं प्रसंस जगती के तल
रचना-सकति राखे सिष्यनि के हृद मैं;
सूझ भगवन्त मैं सु बूझ कबि ज्ञानिन में
रीझ राखी नृपनि औ' खीझ बैरी सद मैं।
कवि लछिराम कीनी चातुरी चलत एती
बानी बरवानी ज्ञान राखे बेद-नद मैं;
घन राखे भौन मैं सुख सब सामुहे मैं
तन राखे चौखट औ' मन राम-पद मैं।
– महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली खंड-5 (पृष्ठ 175) 

बिहारी कवि की शोकांजलि :- 
लछिराम जी का निधन पर इनके योग्य शिष्य बिहारी कवि ने जो शोकांजलि प्रस्तुत की निम्नलिखित है।यह शोकांजलि आचार्य कवि लछिराम भट्ट प्रबन्ध में भी है।  
भूषन के रस के रसांग ध्वनि लक्षना के, काव्य सुधा सिन्धु के बिहारी वेसआशा के।

आन, बान, शान से बिताये दिन जीवन के, पूर्ण काम कीन्हे सवै निज अभिलाषा के ।

आदर महान सम्मान करते थे सभी, 
राजे महाराजे बिज्ञ सुघर अवासा के ।
पुनः 
संभवत्रिकाल में नअब है न हो सकेंगे ऐसे, लछिराम जैसे महाकवि ब्रजभाषा के। 
XXX 
 छन्दन में धारै शब्द रस अनुकूल वृत्ति, भाव भरते थे भव्य भूरि बरवानी के ।
X X X
उक्तिमुक्तिकल्पनाअनोखीचोखीबोलिबोलि, 
मन्त्र-मुग्ध करते रहे वे प्रान प्रानी के ।
 X। X। X
काव्य रत्नाकर को मथि के अमोल रत्न, विश्व में बिहारी बगराये सुखदानी के ।
      X। X X। X।   
काबिन में रवि महाकवि लछिराम भये, लाडले सपूत वर भारती भवानी के ।

मूल्यांकन:- 
लछिराम एक प्रसिद्ध तथा व्यापक प्रचार प्रसार वाले राज कवि थे। उस समय भारत के प्रत्येक कोनो में इनको अच्छी ख्याति मिल चुकी थी। आचार्य कवि लछिराम भट्ट नामक विषय पर डा. राम फेर त्रिपाठी ने शोध प्रवन्ध प्रस्तुत किया है। इसको , अन्य तत्कालीन साहित्य तथा परिवारी जनों से व्यक्तिगत सम्पर्क कर डा. सरसजी ने भी इनका बहुत उच्चकोटि का मूल्यांकन बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान भाग एक के पृष्ठ 57 पर किया है-“आचार्य कवि लछिराम भट्ट बस्ती जनपद के छन्द परम्परा के विकास के वर्चस्वी छन्दकार थे। पीताम्बर से लेकर लछिराम तक जो छन्द परम्परा का विकास बस्ती जनपद के काव्य भूमि पर सतत रुप से हुआ उसमें छन्द परम्परा के आदि चरण के स्थाई स्तम्भ के रुप में लछिरामजी ने परवर्ती छन्दकारों को मानक छन्द विधान प्रस्तुत किया और भविष्य के लिए एक एसी छन्द परम्परा का मार्ग दर्शन दिया है, जिसमें छन्दों के आचार्य रंगपाल जी, बलराम मिश्र द्विजेश, जनार्दन नाथ त्रिपाठी गोपाल, राम चरित पाण्डेय पावन आदि के मध्य चरण को सुविकसित और पल्लवित किया है। संक्षिप्त में जनपदीय छन्द परम्परा को विकसित, पुष्पित और पल्लवित करने में लछिरामजी का योगदान गौरवशाली और स्तुत्य रहा है।”

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Saturday, February 7, 2026

लछिराम के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रन्थ के आधार पर अयोध्या के महाराजा मानसिंह 'द्विजदेव' की जीवन गाथा ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


लछिराम (1841-1904) का परिचय - 
लछिराम का जन्म संवत् 1898 में पौष शुक्ल 10 तदनुसार 1841 ई. को अमोढ़ा शेखपुरा (जि. बस्ती) उत्तर प्रदेश में हुआ था। पिता पलटन ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण थे। राजा अमोढ़ा इनके पूर्वजों को अयोध्या से अमोढ़ा लाए थे। ये कुछ दिन अयोध्या नरेश महाराज मानसिंह (प्रसिद्ध कवि द्विजदेव) के यहाँ रहे। इस कुल में कवियों की परंपरा विद्यमान थी।
अयोध्या महाराजा प्रथम आश्रयदाता:- 
सर मानसिंह 'द्विजदेव' उपनाम लिखते थे जो उच्च कोटि के कवि थे , जहाँ लछिराम जी ने अपने 16 वर्ष की अवस्था में सं० 1914 तदनुसार 1857 ई में सर्वप्रथम पहुँचे थे। मानसिंह लछिराम को बहुत मानने लगे थे। उन्होनें अपनी पद्धति से लछिराम जी को शिक्षा देकर काव्य रचना में निपुण बनाया। वहीं पर इन्हें कविराज की उपाधि भी मिली । 
लच्छीराम का परम्परागत पहनावा :- 
वे पुराने ढंग के कवि थे, पुराने ढंग की पगड़ी पहनते और लाठी बाँधते थे, तथापि पुरानी चाल के जूतों की जगह आप बूट पहनते थे। अयोध्या में रहते हुए उन्होंने एक राम मंदिर बनवाया; कई कुएँ खुदवाए; और कई बाग़ भी लगवाए थे। उन्होंने अपनी जाति के बहुत-से लड़कों के पढ़ने का अच्छा खासा प्रबंध कर दिया था। सुनते हैं, दो-एक पंडित भी उन्होंने पढ़ाने के लिए रखते थे, और एक पाठशाला भी खोल रखी थी। वे अपने आठ-नौ वर्ष के पुत्र और उसकी माँ को अयोध्या में अपने साथ रखे हुए थे।
'मानसिंह’जंगाष्टक’:- 
मानसिंह के प्रति उन्होंने 'मानसिंह' जंगाष्टक' नामक ग्रन्थ लिख रखी थी। मानसिंह जब तक जीवित रहे तब तक लक्षिराम को अयोध्या दरबार से 1200 रूपया मासिक पेंशन मिलती रही। उस दरबार में लछिराम के अतिरिक्त जगन्नाथ अवस्थी, बलदेव तथा पं० प्रवीन आदि अन्य कवि भी राजाश्रम में पल रहे थे। 
- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

लच्छिराम की अयोध्या में मृत्यु :- 
लछिराम का भाद्रपद कृ.11सं.1961 (तदनुसार 1904 ई ) को अयोध्या के प्रमोद बन में शरीरांत हुआ था । वे रीतिबद्ध परंपरा के व्यापक प्रचार प्रसार वाले राज कवि थे। उस समय भारत के प्रत्येक कोनो में इनको अच्छी ख्याति मिल चुकी थी। आचार्य कवि लछिराम भट्ट नामक विषय पर डा. राम फेर त्रिपाठी ने शोध प्रवन्ध भी प्रस्तुत किया है। इसको , अन्य तत्कालीन साहित्य तथा परिवारी जनों से व्यक्तिगत सम्पर्क कर डा.मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने भी इनका बहुत उच्चकोटि का मूल्यांकन “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग एक के पृष्ठ 57 पर किया है-“आचार्य कवि लछिराम भट्ट बस्ती जनपद के छन्द परम्परा के विकास के वर्चस्वी छन्दकार थे। पीताम्बर से लेकर लछिराम तक जो छन्द परम्परा का विकास बस्ती जनपद के काव्य भूमि पर सतत रुप से हुआ उसमें छन्द परम्परा के आदि चरण के स्थाई स्तम्भ के रुप में लछिरामजी ने परवर्ती छन्दकारों को मानक छन्द विधान प्रस्तुत किया और भविष्य के लिए एक एसी छन्द परम्परा का मार्ग दर्शन दिया है, जिसमें छन्दों के आचार्य रंगपाल जी, बलराम मिश्र द्विजेश, जनार्दननाथ त्रिपाठी गोपाल, राम चरित पाण्डेय पावन आदि के मध्य चरण को सुविकसित और पल्लवित किया है। संक्षिप्त में जनपदीय छन्द परम्परा को विकसित, पुष्पित और पल्लवित करने में लछिरामजी का योगदान गौरवशाली और स्तुत्य रहा है।”

प्रताप रत्नाकर’के आधार पर महाराजा मानसिंह द्विजदेव के वंश का परिचय :- 
हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह 
'द्विजदेव' ऐसे कवि हैं, जिन्होंने किसी राजदरबार में आश्रय ग्रहण नहीं किया, वरन् वे स्वयं अनेक कवियों के आश्रय दाता थे। द्विजदेव का वास्तविक नाम मानसिंह था, वह अयोध्या के महाराजा थे। वे अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 (सन 1880 ई ) में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे अयोध्या के शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह,इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –
पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।
श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।
सो इत आये अवध कौं, मंडन करनसुबेस।
साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।
प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदरराम।
पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जसअरुनाम
चारु चारि फल से प्रगट,तिनके चंदनचारि।
श्री बख्तावरसिंह नृप,कीरति जात सँवारि।
      महाराज बख्तारवसिंह के अनंतर यह मनसब महाराजा दरसनसिंह को मिला। इन्हें अपने बाहुबल के कारण ‘सलतनत बहादुर’ की उपाधि तथा अवध का राज्य प्राप्त हुआ। दरसनसिंह के तीन पुत्र हुए-रामाधीन सिंह, रघुवर सिंह तथा मान सिंह 
दर्शन सिंह के बारे में लछिराम के भाव- 
दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।
बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।
श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।
अरि-गन-गज पै सिंह सौं दरसनसिंहनरेस।
तिनको लघु भूपालमनि,मानसिंहमहाराज।
जिनकीने लछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।  
     ‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि महाराजा मानसिंह का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 (10 दिसम्बर, 1820 ई.) में हुआ था। इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य- व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 ई में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया था । किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया था। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –
बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,
कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।
बिनु चारु चेटक चिलक चोखीचंद्रिका की,
कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।
जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,
कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।
मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,
कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’
      इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –
आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 
रीति यहै नित ही चलि आई।
लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 
कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।
ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 
रहौ किन आपने काज लजाई।
आपही दूरी बसे तो कहा 
कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।
    इस प्रकार वह युद्ध समाप्त हो गया था। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं.1913 (तदनुसार 1856 ई.) में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. (तदनुसार 1859 ई. ) में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं.1926 वि.(तदनुसार1869 ई.) में ‘के.सी.एस. आई.’ की उपाधियाँ मिलीं थीं।
मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।
सुहृदसुमनसीतलकरन,अरि घनवनतनताप
जाकौजसलखि भुअन में,चंदचंद अनुरूप।
कबिगनकौसुरतरुसुभग,सागरसीलस्सरूप
x  x।          x  x।            x।           x 
मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद
कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।
   कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. (तदनुसार 1870 ई.) को महाराजा मान सिंह का देहावसान हो गया था । इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महा राजा प्रताप नारायण सिंह ‘ददुआसाहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया था । यही मान सिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए थे।
द्विजदेव की रचनाएँ :–
1.शृंगार लतिका:- 
शृंगार लतिका का प्रथम संस्करण मुंशी नवलकिशोर के मुद्रणालय से सं. 1940 वि. में प्रकाशित हुआ था। इसके 52 वर्षों के अनंतर सं. 1992 में इंडियन प्रेस से इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। पहले इसका संपादन प्रयाग विश्वविद्यालय के हिन्दी आचार्य डाॅ. रामशंकर शुक्ल रसाल ने किया था और उसके कुछ फार्म इंडियन प्रेस में छप भी गये थे किंतु अवधेश्वरी महारानी जगदम्बिका ने मथुरा निवासी पं. जवाहरलाल चतुर्वेदी से शृंगार लतिका सौरभ नाम से इसका संपादन करवाया। इंडियन प्रेस से छपे फर्मों को नष्ट कर दिया गया।द्विजदेव ने शृंगार लतिका का आरम्भ किसी मंगलाचरण या देव स्तुति से नहीं किया है, वरन् पाठ का आरम्भ वसंत आगमन से किया गया है -
गुंजरन लागी भौंर-भीरें केलि-कुंजन में,
कैलिया के मुख ते कुहूकनि कढ़ै लगी,
द्विजदेव तैसे कछु गहब गुलाबन ते
चहक चहुँआ चटकाहट बढ़ै लगी।
लागे सरसराबन मनोज निज ओत, 
रति बिरह सतावन की बतियाँ गठै लगीं
होने लगी प्रीति-रीति बहुरि नई-सी, 
नव नेह उनई-सी मति मोह सौं मढ़ै लगी।।
     शृंगारतालिका के द्वितीय प्रकरण का आरम्भ सरस्वती वन्दना से किया गया है, तदन्तर शृंगार रस के प्रतीक राधा-माधव की वन्दना के पश्चात् उनके रूप-सौन्दर्य के अनेक चित्र उपस्थित किए गए हैं। मध्य कालीन रीति साहित्य में व्याप्त नायिका- भेद संबंधी उनके पदों की संख्या अल्यल्प है, तथापि उन्होंने जो लिखा है, उसका सौन्दर्य अनुपम है। द्विजदेव की मान्यता है कि मोहांधकार को नष्ट करने के लिए परम सौन्दर्य-सम्पन्ना वृषभानु-नंदिनी का ध्यान करना आवश्यक है –
भूषन सारे सँवारै जडाऊ, 
जिन्हें लखि तारे लगैं अति फीके,
त्यों द्विजदेव जु आनन की छवि 
अंग सबै सरमाय ससी के।
ताहू पै भानु-प्रभा निदरै, 
लसै चंचल कुंडल कानन नीके,
मोहमई तम क्यों न मिटै, 
इमि ध्यान धरे वृषभानु-लली के।।
     शृंगार लातिका के तृतीय प्रकरण में नायिका के नख-शिख वर्णन को स्थान दिया गया है। यहाँ द्विजदेव ने कहीं-कहीं रीति परंपरा का भी आश्रय लिया है। उन्होंने कान की उपमा सीपियों से; नासिका की तूणीर, बिछुवा तथा तिल के फूल से; नेत्रों की मीन, कंज की पंखुरी, अलि-पुंज, कुरग शावक और खंजन से; देह दीप्ति की बिजली से; कपोलों की आरसी से; कंठ की शंख से तथा भाल की बाल-मयंक से दी है। किन्तु उन्होंने बँधी- बँधाई परिपाटी से मुक्त रहकर मौलिक दृष्टि से अपने विचार भी प्रकट किए हैं। उदाहरणस्वरूप उनका एक पद देखा जा सकता है – राधिका के ललाट पर कृष्ण की वह दृष्टि लगी रहती है, जिसने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ऐसा आदरस्पद पद दे रखा है, जिसने सुरेश्वर को अमरावती का अधिकार और यक्षेश्वर को देवकोश का अधिकारी बनाया है। इसी ने सूर्य-चंद्र को भी प्रकाश दिया है, इसलिए इस दृष्टि का जहाँ निवास हो, वह बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान होगा-
एकै मौज कीन्हौं है त्रिदेवन त्रिदेव, 
दीन्हीं एकै मौज साहिबी सुरसैं देवतन की;
एकै कोर हरि के कुबैरहिं कुबेर कीन्हों,
दीन्हीं बहुत भाँति प्रभुताई घने धन की।
द्विजदेव एकै बार पलक उठाय, 
अति दीपति बढ़ाय दीन्ही सूरससि तन की, 
जाय किसी गाई येती सरमथताई, 
बालभाल के पटा पै बसै लालके दृगनकी।
     स्पष्ट है कि शृंगारलतिका के 228 छंद तीन सुमनों में विभाजित हैं। प्रथम में मन्मथ की प्रेरणा तथा वसंतागम एक साथ होते हैं। द्वितीय में राधा-कृष्ण की क्रीड़ाओं का मनोरम चित्रण है तथा तृतीय सुमन में नायिका के नख-शिख सौन्दर्य को स्थान दिया गया है। सम्पूर्ण ग्रंथ में ब्रजभाषा का अपूर्व सौन्दर्य विद्यमान है तथा भावों के अनुकूल सवैया, घनाक्षरी, छप्पय, रोला, सोरठा, भुजंगप्रयात,नाराच तथा मौतिक दाम आदि छंद स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हुए हैं।
2.शृंगार बत्तीसी :– 
इसमें 35 कवित्त हैं। एक छप्पय मंगला- चरण का है, दो दोहों में कवि ने अपना नाम और पिता का नाम बताया है। बाकी छंदों का वर्णय -विषय शृंगार ही है। वस्तुतः द्विजदेव की रचना का महत्व प्रकृति की शोभा, प्रकृति की छटा की बारीकी तथा सूक्ष्म तरंगों के भाव-विभोर वर्णन में ही निहित है। प्रकृति के सुकुमार क्रियाकलाप का विशद अंकन होने के कारण ही उन्हें प्रकृति की संवेदना का कवि कहा जाता है। प्रकृति से विशेष प्रेम होने के कारण इनका अधिकांश काव्य ऋतु वर्णन से भरा पड़ा है। डाॅ.मनोहरलाल गौड़ के अनुसार, ‘उन्होंने शृंगार के रीति-ग्रस्त वर्णनों के साथ-साथ हृदय की अनेक अंतर्दशाओं का मार्मिक उद्घाटन किया है, जिससे वे घनानंद की दिशा में बढ़ते प्रतीत होते हैं। रोष, क्षोभ, दैन्य, अधैर्य, धृति, स्मृति, उद्वेग जड़ता आदि कितने ही भावों की सफल व्यंजना उन्होंने की है। ऐसा वे वियोग के प्रसंग में ही कर पाये हैं। उनका प्रकृति प्रेम स्वच्छंद है।’ शृंगार बत्तीसी का एक छंद उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है –
धुंधरित धूरि धुरवान की सु छाई नभ
जलधर-धारैं धरा परसन लागीं री;
द्विजदेव हरी-भरी ललित कछारैं, 
त्यौं कदंब की डारैं रस बरसन लागीं री।
कालि ही तें देखि बन-बेलिन की बनक,
नबेलिन कीभाँतिअतिअसरन लागीं री। बेगि लिखु पाती या सँघाती मनमोहन को,
पावस अवाती ब्रज दरसन लागीं री।।’’
3.मान मयंक: – 
‘शृंगार लतिका’ तथा ‘शृंगार बत्तीसी’ के दो सौ सैंतालीस श्रेष्ठ मुक्तकों के एक संग्रह का संकलन श्री हरदयालु सिंह ने गंगा ग्रंथागार लखनऊ से सं.1997 में प्रकाशित करवाया था। जिसका नामकरण उन्होंने महाराजा मानसिंह के प्रथम अक्षर ‘मान’ के आधार पर ‘मान मयंक’ किया है। शृंगार के इन मुक्तक छंदों में द्विजदेव के जिन सरस तथा चित्ताकर्षक छंदों को स्थान दिया गया है, वे वास्तव में कवि के कलात्मक सौष्ठव के अद्भुत नमूने हैं। अन्य रीति मुक्त कवियों की भाँति द्विजदेव भी मूलतः प्रेम के कवि हैं। प्रेम निरूपण में उन्होंने नायिका के रूप सौन्दर्य तथा प्रकृति सौन्दर्य को विशिष्ट महत्व दिया है। मान मयंक के प्रतिपाद्य पर चर्चा करने से पूर्व हमें द्विजदेव की प्रेम विषयक दृष्टि को समझ लेना चाहिए।
     मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोल कर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।
द्विजदेव की प्रेम विषयक धारणा: – द्विजदेव का काव्य उनके निजी जीवन की किसी प्रेम संबंधी अनुभूति की प्रेरणा से प्रेरित नहीं है, किंतु यह भी सत्य है कि उन्हें एक सरस हृदय प्राप्त था। प्रेम संबधी कोई सिद्धांत वाक्य उनकी रचनाओं में नहीं मिलता पर फिर भी उनकी दृष्टि में प्रेम से बढ़कर कोई अनुभूति नहीं है। प्रेम में व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। उनकी गोपियाँ कृष्ण का थोड़ा-सा रूप लावण्य प्राप्त कर अपना हीरा जैसा हृदय समर्पित कर देती हैं 
लै लै कछु रूप मनमोहन सौं बीर।
वै अहीरिनै गँवारी देति हीरन बटाई मैं।।
      द्विजदेव के अनुसार प्रेम में प्रेमी को सर्वस्व समर्पण करना पड़ता है, भोग की सारी आकांक्षाएँ समाप्त कर देनी पड़ती हैं, सर्वात्मभाव से आत्मदान के लिए उसे सतत् तैयार रहना पड़ता है। सच्चा प्रेमी वही है जो विरहजन्य उद्विग्नता और क्षोभ की चरम मनोदशा में पहुँचकर भी प्रेम की निष्ठा में कोई अंतर नहीं आने देता। प्रेम प्रेमी की असाधारण मनःस्थिति में पहुँचा देता है। संयोग और वियोग दोनों स्थितियों में विरह की दुर्दशाएँ नाना प्रकार से प्रेमी के हृदय को आघात पहुँचाती हैं, लेकिन यही प्रेम प्रेमी के चित्त में अद्भुत साहस का संचार भी कर देता है, उसके मनोरथ, उसकी आशाएँ, उसकी उमंगें, उसका प्रेमोन्माद उसे अतुल शक्ति से भर देता है।
रूप-सौन्दर्य वर्णन :– 
द्विजदेव रूप-सौन्दर्य के वर्णन की ओर विशिष्ट रूप से प्रवृत्त नहीं हुए हैं फिर भी उन्होंने कृष्ण, नायिका या राधा के रूप- वर्णन से संबंधित कुछ छंदों की रचना अवश्य की है। कवि ने कृष्ण के रूप सौन्दर्य का वर्णन परंपरागत ढंग से एकाध छन्द में ही किया है। जिसमें उन्हें पीताम्बर ओढ़े, मोरपंख लगाए, काछनी बाँधे हुए चित्रित किया है। इस वेश में कृष्ण को वन-वीथियों में घूमते हुए मनोभव-भूप का सखा बतलाया गया है। राधा का रूप वर्णन करते हुए भी कवि ने बार-बार उनकी अंग कांति पर ही विशेष बल दिया है। राधा की छवि के सामने चन्द्रमा शरमा जाता है, तारे फीके लगने लगे हैं, उनके शरीर की कांति सारी पृथ्वी का संताप दूर करने वाली है। राधा के अंग की कांति ऐसी है जो हजारों सुन्दर गोपियों के बीच भी छिपाए नहीं छिपती। उसकी शोभा अपूर्व है –
कातिक के द्यौस कहुँ आई न्हाइबै कौं वह,
गोपिन के संग जऊ नैंसुक लुकी रही।
द्विजदेव दीह-दार ही तैं घाट बाट लगी,
खसी चंद्रिका सी तज फैली बिधु की रही।
घेरी बार-पार लौं तमासे-हित ताही समैं,
भारी भीर लोगन की ऐसिऐ झुकी रही।
आली उतआज वृषभानुजा बिलोकिबै कौं,
भानु तनयाऊ घरी द्वैक लौं रुकी रही।।2।।
     कवि ने कुछ छन्दों में राधा और कृष्ण के स्वरूप का एक साथ भी वर्णन किया है, जिनमें कभी तो कवि उनके रूप पर न्यौछावर होता है और कभी उनकी पारस्परिक प्रीति का उल्लेख करता है –
ज्यौं घनस्याम से स्याम बने, 
त्यौं प्रिया तड़िता सी हिये मैं परैं तकि।
आनन चन्द्र की दीपति देखि 
दुहूँन के नैन चकोर रहे छकि।
ऐसी विनोद कला निरखै, 
द्विजदेव न कौन की डीठि रहै चकि।
ज्यों बिकसी अरबिंद सी प्यारी, 
मलिंद-सौ तैसोई प्यारौ रह्यो जकि।।3।।
नायिका के रूप सौन्दर्य :- 
नायिका के रूप सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि की दृष्टि उनकी अंग कांति अथवा संपूर्ण रूप-छटा पर विशेष रूप से रुकी है। किसी-किसी छन्द में तो केवल उसकी तनद्युति का ही वर्णन पूरे उन्मेष के साथ किया गया है। कवि कहता है कि नायिका के अंगों की कांति के सम्मुख कमल, कुंकुम, रसाल सुवर्ण, विद्युत ज्वाल, चंपक, केतकी, चन्द्रमा, मशाल अदि में कोई चमक नहीं रहती, ये सब तो उसके सामने फीके पड़ जाते हैं-
हे रजनी-रज मैं रुचि केती, 
कहा रुचि रोचन रंक रसाल मैं।
त्यौं करहाट मैं, केसर मैं, 
द्विजदेव न है दुतिदामिनी-जाल मैं।
चंपक मैं रुचि रंचकऊ नहि, 
केतकि है रुचि केतकी-माल मैं।
ती-तन कौं तन कौ लखिऐ, 
तौ कहा दुनि कुंदन, चंद मसला मैं।
द्विजदेव ने नायिका की मृदु मुस्कान,   
कंजी आँखों, केश राशि, वेणी, माँग, भाल, नासिका, अधर, कपोल, ओष्ठ, ठीढ़ी, दंतावली, मुखमण्डल, ग्रीवा, बाहु, अंगुली, मेहंदी युक्त हाथ, कुच, नाभि, उदर, जंघा, पद, चाल आदि का सूक्ष्म वर्णन किया है। इस वर्णन में कवि की मौलिकता इस दृष्टि से है कि उन्होंने नायिका के प्रत्येक अंग को इतना अधिक सौन्दर्य सम्पन्न दिखाया है कि उसके समक्ष समस्त उपमान फीके पड़ जाते हैं। कवि के अनुसार नायिका की वेणी की तुलना जो कवि त्रिवेणी से करते हैं, वे वास्तव में कवि कहलाने केअधिकारी हो ही नहीं सकते क्योंकि इस वेणी में मज्जन करने से जो मोक्षफल प्राप्त होता है वह त्रिवेणी संगम में तन, मन, धन, के समर्पण से भी असंभव है और इस त्रिवेणी-संगम के स्वामी माधव अर्थात् कृष्ण हैं अतः वे ही वेणी की छवि के दर्शन के सदा अभिलाषी रहते हैं-
मन अवगाहे तैं जो होति गति यामैं 
तन-मन-धनहूँ गति वामैं अनहौंनी सौं।
वाके ईस माधव बखानैं सब वेद ते तौं, छवि-अभिलाषी सदाँ याही छबि सैंनी सौं।
द्विजदेव की सौं तिल एकौ ना तुलन बहु-
भाँतिन विचारि देख्यौ अति मति पैंनी सौं।
तेऊ कबि, कबि कहवाई हैं दुनि मैं जे वे समता करत वाकी बैंनी औ त्रिबैंनी सौं।
नायिका की गति :- 
नायिका की गति का चित्रण करते हुए कवि कहता है कि जो लोग उसे गज गामिनी कहते हैं उनकी समझ कितनी ओछी है और जो कवि अपनी प्रतिभा का विकास मराल में उपमा देकर दिखलाते हैं उनकी समझ को क्या हो गया है। उनके कुतर्क लोगों की मति को भ्रमित करने वाले हैं-
  चित-चांहि अबूझ कहै कितने,
  छबि-छीनी गर्यदन की टटकी।
  कवि केते कहैं निज बुद्धि उद्वै,
  यहि सीखी मरालन की मटकी।
  द्विजदेव जू ऐसे कुतरकन मैं,
  सबकी मति यौंही फिरै भटकी।
  वह मन्द चलै कित भोरी भटू,
  पग लाखन की अँखियाँ अटकी।’’
नायिका की नासिका :- 
नायिका की नासिका के संबंध में कवि का मत है कि नासिका के तीन प्रसिद्ध उपमान हैं – तूणीर, जिसमें बाण रखें जाते हैं,दूसरा वारि-तरंग, बिछुवा, अर्थात् पादांगुलीय भूषण तथा तीसरा तिल पुष्प। विदित है कि नासिका शरीर के अग्र भाग में सर्वोन्नत ही विराजित है तथा तूणीर सदैव पृष्ठभाग में बाँध जाता है तो अग्रगामी की समता अनुगामी से कैसे हो सकती है वारि तरंग बिछुवा के उपमान में भी आता है तो जो चरणसेवी का उपमान है वो सर्वोपरि अवयव नासिका की समानता को कैसे प्राप्त होगा। अब रहा गंधहीन तिल पुष्प, तो उसकी समता ऐसी नासिका से अर्थात् निमित्त कितना श्रम करके कर्ता ने सब सौरभ की सृष्टि की, कैसे होगी ?
    अँगुली का सूक्ष्म वर्णन करते हुए कवि लिखता है – ‘‘भला देखो तो कुंद-पुष्प की पँखुड़ी कहीं उन रसीली अँगुलियों की समता तिलमात्र भी पा सकती है एवं चंपक-कलिका की उपमा क्या बिंदुमात्र भी तुल सकती है? क्योंकि ये दोनों जड़ हैं और वे चैतन्य हैं, ये ऐसे रुक्ष हैं कि छूते ही इन पुष्पों की पँखुड़ी झड़ सकती है और वे अत्यंत कोमल एवं लोचदार हैं। ऐसी अँगुलियों की छवि के सामने कामदेव की लेखनी क्या सामना करे? मतिमंद,मतिहीन की लेखनी ही क्या? मतिहीन शब्द के प्रयोग के दो कारण हैं, प्रथम तो यह कि काम का नाम अनंग हैं, जो अंगरहित होगा उसके विचार का स्थान मस्तिष्क व हृदय कहाँ होगा? इस प्रकार वह बुद्धि से भी रहित हुआ, दूसरे काम के उद्वेग से सदा बुद्धि मारी जाती है, वह विवेक शून्य है। पाँचों अंगुलियाँ एक दूसरे के स्वयं बराबर नहीं और यह कि गिनती में वे विषम हैं, यानी पाँच हैं, और तीसरे समता रहित अर्थात् अनुपम है, तो उनके उपमान कहाँ से मिलेंगे –
कुंदन की पाँखुरी तुलैगीं तिल एकऊ न, 
बुंद ना तुलैगी छबि चंपक-कलीन की।
तिन छबि-सामुहैं उदोत कौंन भाँति पैहैं, लाख-लाख लेखनी मनोज मति हीन की।
द्विजदेव की सौंकित काके ढिंग जाई अहो, 
रीति यह सीखी कहो कौन धैं प्रबीन की।
ढूँढ़ि-ढूँढ़ि अमित अनौंखे उपमान जो पैं, समता बिचारत असम-अँगुरीन की।।
     द्विजदेव के काव्य में एक स्थल पर नायक कहता है कि हे प्राण प्यारी! तेरे कपालों की गोलाई ने पूर्ण चंद्र-मंडल की गोलाई की शोभा और तेरे मृदु हास ने चंद्रिका की छवि को हँसते-हँसते ले लिया है। अब उसके मन को प्रसन्न करने वाले नेत्रों के काजल ने बची-खुची शोभा के लेने की यदि इच्छा की तो व्यर्थ है क्योंकि जब किसी की सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति छीन ली जाए तो शेष हठात् लेने में सिवा कलंक के और क्या प्राप्त होगा? ऐसी नैराश्यावस्था में सिवाय शरीर-त्याग के और कुछ नहीं बन पड़ता-
बानिक-तानि के मंडल की, 
उन गोल कपोलन आप लहा है
त्यौं द्विजदेव जू जौन्ह छटान, 
हँसी-ही-हँसी मुख चंद गहा है।
ऐ मन-रंजन-अंजन रावरे! 
नाहक लाह की चाह महा है।
छाँड़ि कलंक कहौ अब या 
द्विजदेव निलाज सौं लाभ कहा है।
हाव-भाव वर्णन: – 
शरीर के अकृत्रिम अंग विकार को सात्विक अनुभाव कहते हैं। ये आठ प्रकार के होते हैं – स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्व भंग, कम्प, वैवर्ण्य,अश्रु और प्रलय। द्विजदेव ने अश्रु आदि एकाध भाव का ऊहात्मक वर्णन किया है। एक उदाहरण दृष्टव्य है –
भेद मुकुता के जेते स्वाँति ही मैं होत तेते, रतनन हूँ कौ कहूँ भूलि हूँ न होत भ्रम।
मौंती सौं न रतन, हूँ न मोती होत, 
एक के भए मैं कहूँ होत, दूसरे को क्रम।
द्विजदेव की सौं ऐसी बनक-निकाई देखि, रम के दुहाई मन होत है निहाल मम।
कंज के उदर प्रगट्यौ है मुकुताहल सो, बाहर के आवत भयौ है इंद्रनील-सम।।
     (अर्थात् एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! स्वाति नक्षत्र की जल-बिंदु के उत्पन्न हुए मुक्ताओं के जितने भेद होते हैं वे ऐसे नहीं है कि उनमें दूसरे किन्हीं रत्नों की भ्राँति हो सके और मुक्ताओं के उत्पन्न होने के स्थान द्वारा उनके भेद भी नियत हैं सिवाय इनके मुक्ता सा न कोई दूसरा रत्न बन सकता है और न किसी दूसरे रत्न से मुक्ता ही बनाया जाता है, किन्तु मैंने एक अद्भुत दूश्य देखा कि कमल पुष्प के उदर में मुक्ता उत्पन्न हुआ तथा बाहर आते-आते वह प्रगाढ़ नीलमणी-सा हो गया अर्थात् पति के मनाने पर न मानकर उसके चले जाने से पश्चाताप के कारण कंज रूपी नेत्रों से मुक्ता सदृश्य आँसू भरे और बाहर आते-आते कज्जल मिश्रित हो जाने से इंद्र-नीलमणि के सदृश हो गये।)
भाव वर्णन :- 
संयोग समय में स्त्रियों की स्वाभाविक चेष्टा-विशेष को हाव कहते हैं। वे ग्यारह प्रकार के होते हैं- लीला, विलास, विच्छिति, विभ्रम, किलकिंचित, मोट्टायित, विव्वोक, विहृत, कुट्टमित, ललित और हेला। द्विजदेव के काव्य में विभ्रम तथा विहृत की सुंदर योजनाएँ देखने को मिलती है। विभ्रव भाव का एक उदाहरण इस प्रकार है –
‘‘ओढ़नी तौ वो बिछावै कहूँ, 
कहूँ और हीं ठौंर पैं बैठैं कन्हाई।
पाँई के धोखैं पसारैं भुजा, 
लकुटी वह धोवति सीस नवाई।
आगत स्वागत के बदलैं, 
द्विजदेव दुहूँ दिसि होत ठगाई।
देखत ही अलि! आज बनैं, 
नए पाहुँन और नई पहुँँनाई।।’’4।।
     यहाँ भगवान का वृषभानु-गृह में      
आतिथ्य देख एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि देखो वृषभानु कुमारी वृन्दावन-विहारी को देख आसन के बदले ओढ़नी बिछाती है और वे उसे न देख भूमि ही को सुखद आस्तरण समझ बैठ जाते हैं। जब वह चरण धोने को हाथ बढ़ाती है तो ये भुजा उठा मिलने को उद्यत हो जाते हैं। प्यारी वृषभानुजा उसे भी न देख प्रेममग्न होकर सिर झुकाए लकुटी को चरण के बदले धो चलती है, शिष्टाचार के बदले दोनों ओर से ठगहारी हो रही है। हे सखी! आज की यह लीला देखते ही बनती है। जैसे वे नवीन अतिथि आए हैं वैसा ही विचित्र आतिथ्य भी हो रहा है।
      इसी भाँति विहृत हाव का एक चित्र इस प्रकार है। नायिका कहती है कि कोकिल तथा मयूर बोल-बोलकर मुझको संयोग की ओर प्रेरित करते रहे तथा मेरी सभी सखियाँ नवीन युक्तियाँ सिखा-सिखा कर हार गईं परन्तु इस लज्जा रूपी वैरिणी ने मेरे साथ अनीति की; क्योंकि इसके कारण ही नायक के आगमन के समय मेरे नेत्र नीचे हो गए जिससे मैं नायक के दर्शन न कर सकी तथा नायक के गमन के समय भी मेरी चंचल पलकों ने नेत्रों को मूँदकर मेरे साथ छल किया –
बोली हारे कोकिल, बुलाई हारे केकी ‘गन’ सिखैं हारीं सखी सब जुगति नई-नई।
द्विजदेव की सौं लाल-बैरिज कुसंग इन-अंगन हीं, आपने अनीति इतनी ठई।
हाइ! इन कुंजन तै पलटि पधारे स्याम, देखन न पाई वह मूरति सुधामाई।
आवन समैं मैं दुख दाइनि भई री लाज, चलत समै मैं पलन दगा दई।।
    कवि की संचारी भाव योजना भी उत्कृष्ट कोटि की है। द्विजदेव के काव्य में विद्यमान कुछ संचारी भावों के उदाहरण देखे जा सकते हैं –
ग्लानि :- 
‘‘घहरि घहरि घन! सघन चहूँआँ घेर, 
छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।
द्विजदेव की सौं अब चूकि मत दाँव अरे, पातकी,पपीहा! तू पिया की धुनि गावै ना।
फेरि ऐसौ औसर न ऐहै तेरे हाथ अरे, मटकि मटकि मोर! सोर तू मचावै ना।
हौं तो बिन प्रान प्रान चाँहति तज्योई अब, कत नभचंद अकास चढ़ि धावै ना।।
असूया :- 
मैन सौं ज्यौं ज्यौं भरै हियरा जिय 
त्यौं त्यौं नितै नित भींजति आवै।
बात सुधासी सयानिन की हिय माँहि हलाहल को गुन छावै।
भेव सो याकौं कोऊ द्विजदेव दया करि बूझति हू न बतावै।
कौन दे दोष दई निरदै ब्रज ही में नई यह रीति चलावै।।5।।
स्वप्न:- 
सोवत आज सखी! सपने, 
द्विजदेव जु आइ मिले वनमाली।
जौं लौं उठी मिलिवे कहँ धाइ, 
सुहाइ भुजान भुजान पैं घाली।
बोलि उठे ऐ पपीगन तौ लगि, 
पीउ कहाँ? कहि कूर कुचाली।
संपत्ति-सी सपने की भई, 
मिलिवौ ब्रजराज कौ आज कौ आली।6।।
चपलता :- 
ढोल-बजावति गावती गीत, 
मचावती धूँ धदि धूरि के धारन।
फैंटि फते की कसैं द्विजदेव जू, चंचलता-बस अंचल-तारन।
औचक ही बिजुरी-सी जुरी, 
दृग देखत मूंदि लिए दिखवारन।
दामिनी-सी घनस्यामहिं भैंटि, 
गई गहि गोरी गुपाल के हारन।।7।।
प्रकृति वर्णन :– 
मान मयंक का अन्य प्रमुख वर्ण्य विषय प्रकृति वर्णन है। द्विजदेव ने प्रकृति वर्णन में वसंत की शोभा का, भ्रमरावली के गुंजार का, ऋतुराज के स्वागतार्थ वन मेंसुसज्जित होने का, वन-शोभा का, वसंत के आगमन पर नायिकाओं की मनोदशा का चित्रात्मक वर्णन किया है। द्विजदेव के काव्य में यह प्रकृति-वर्णन बाह्य-दृश्य-चित्रण, आलम्बन रूप में, आलंकारिक शैली में, प्रभाव अभिव्यंजक शैली में, उद्दीपन रूप में, परम्परागत शैली में तथा पृष्ठभूमि के रूप में मिलता है। वसंत ऋतु का वर्णन तो द्विजदेव ने बड़े ही समारोह के साथ किया है, इतने विशद रूप में वसन्तागम का वर्णन कदाचित ही किसी मध्यकालीन कवि ने किया हो। वसन्त के आगमन पर कवि का उल्लास फूटा पड़ रहा है। जैसे राजाओं के आगमन पर उनके सत्कारार्थ सड़कें साफ हो जाती हैं, उसी प्रकार महाराज ऋतुराज के आगमन पर वसंत- वायु के झकारों से वन की पगडंडियाँ स्वच्छ की जाती हैं, पुष्पों के सुगंधित मकरन्द से सिंचित की जाती है। मधुपान में उन्मत्त भ्रमर समूह विजय-करषा बोलते बढ़ते जाते हैं, पक्षी समूह और वन देवता गण अपनी चह चहाहट के मिष मंगलपाठ कर रहे हैं। वृक्षों पर जो जीवन पत्रावलियाँ हैं, सो मानो बंदनवार हैं और जो पुष्पों की श्रेणियाँ हैं वो मानों उन पर पुष्प मालाएँ बाँधी गई हैं सब वृक्ष पृष्पों की वर्षा करते हैं। ऋतुराज के आगमन पर वन के वृक्ष इस भाँति सज-धज के अमरावती को भी लज्जित कर रहे हैं। स्वर्ग के सुख समूह में एक मेनका नामक अप्सरा है और यहाँ प्रतिवृक्ष पर अनेक मेनका (मैना) गान करती हैं, जो अमरावती को अपने सुषमा-समूह पर लज्जित होना ही पड़ेगा- 
बंदनवार बँधे सब कैं, 
सब फूल की मालन छाजि रहे हैं।
मैनका गाइ रहीं सब कैं, 
सुर संकुल ह्वै सब राजि रहे हैं।
फूल सबै बरसैं द्विजदेव,
सबै सुखसराज कौं साजि रहे हैं।
यौं ऋतुराज के आगम मैं, 
अमरावती कौं तरु लाजि रहे हैं।।8।।
     हिन्दी साहित्य में अधिकांश कवियों ने प्रकृति का चित्रण उद्दीपन विभाव के रूप में किया है। शृंगार रस को वण्र्य-विषय बनाकर काव्य रचना करने वाले कवियों में प्रकृति का यह विशिष्ट पहलू सर्वदा आदरणीय रहा है। द्विजदेव की नायिका भी इसी परम्परा का अनुसरण करते हुए कहती है –
भूले भूले भौंर बन भाँवरैं भरैंगे चहूँ,
फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जाइहै।
द्विजदेव की सौं वह कूँजनि बिसारी कूर,
कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताइहै।
आवत वसंत के न एैहैं जौं पैं स्याम तो पैं,
बाबरी! बलाइ सौं हमारै हूँ, उपाइ है।
पी हैं पहिलेई तै हलाहल मँगाइ या,
कलानिधि की एकौ कलाचलन न पाई है।।
नायिका भेद :– 
नायिकाओं के भेद प्रकृति, वय, धर्म एवं अवस्था के आधार पर किए गए है। द्विजदेव ने अपने काव्य में नायिकाओं के प्रायः जितने भेद किए हैं उन सभी में कुछ-न-कुछ वैशिष्ट्य विद्यमान हैं, जो उन्हें अन्य रीतिकालीन कवियों ने पृथक् एवं महत्वपूर्ण स्थान पर स्थापित कर देता है। जैसे द्विजदेव की उत्तमा नायिका पूर्णतः निस्थ्वार्थ है। अन्य कवियों की नायिका के समान वह न तो अनुराग लता को जीवित रखने की याचना करती है और न ही वह प्रिय के चरणों की दासी बनी रहना चाहती है। वह एकमात्र प्रिय के प्रसन्न रहने की आकांक्षा रखती है। प्रिय उनसे प्रेम रखे या नहीं, इसकी उसे चिन्ता नहीं है। इसका एक अन्य प्रमाण यह है कि द्विजदेव ने मध्यमा और उत्तमा नायिकाओं के चित्र अंकित नहीं किए हैं। वे एकमात्र उत्तमा प्रकृति वाली नायिका के ही पक्षधर थे। उनकी उत्तमा नायिकाएँ अपेक्षाकृत अधिक त्यागपरायण, सहिष्णु एवं उदार हैं। कृष्ण कुबजा से प्रेम करने लगे और गोपिकाओं को भूल गए। उनकी उदासीनता यहाँ तक बढ़ गई कि उन्होंने गोपिकाओं को वैराण्य का उपदेश देने के लिए अपने सखा उद्धव को ब्रज भेजा। उद्धव ने बेचारी गोपिकाओं को कृष्ण प्रेम परित्याग करने की शिक्षा दी। इस पर भी गोपिकाएँ कृष्ण से रुष्ट नहीं हुई। वे उद्धव से कहती हैं –
लावौं हमैं भोग के सिखावौकछुजोगकला, 
लीन्हैं अंगराग के परागन घने रहौ।
बिनती इतीक पै हमारी प्रिय-पीतम सौं, कहिबे कौं ऊधौं! उर आपने बने रहौ।।
अब उत-अंतर इतीऐ अभिलाष रही, 
बसहु जहाँ-ई-तहाँ आनँद-सने रहो।
याही तैं हमारे सुख पगन लगैगौ तुम, 
लगन लगैहूँ पिय मगन बने रहौ।।
     द्विजदेव की मुग्धा नायिका भी इस भाँति अन्य रीतिकालीन शृंगारी कवियों की अपेक्षा अधिक सक्रिय है। उसके अंग नागर नरों को लूटने की मंत्रणा करते हैं। उसके नेत्र कानों तक बढ़ रहे हैं। वे मानों कानों से यह पूछते हैं कि हम किस पथिक के प्राण लें? उसके उरोज इस प्रकार होड़ा होड़ी से बढ़ रहे हैं मानो वे ही समर से जूझने के लिए तैयार हो रहे हैं। उसके सुदीर्घ केश एड़ियों से उलझकर मानो अपनी उलझने वाली प्रकृति का परिचय दे रहे हैं। वयःसंधि का यह वर्णन शैशव तथा यौवन रूपी दो शासकों के एक साथ शासन करने के कारण फैलने वाले अंगों रूपी प्रजाजनों की अराजकता का चित्र उपस्थित कर रहा है-
कौन को प्रान हरैं हम यौं दृग कानन लागि मतौ चहैं बूझन।
त्यौं कछु आपुस ही मैं उरोज कसाकसी कै कै चहैं बढ़ि जूझन।
ऐसे दुराज दुहूँ वय के सब ही कौं लग्यो अब चैचंद सूझन।
लूटन लागी प्रभा कढ़ि कैं बढ़ि केस छवान सों लागे अरूझन।।10।।
     द्विजदेव की ‘परकीया प्रोषितपतिका’ नायिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अन्य रीतिकालीन शृंगारी कवियों की नायिकाएँ तो अपने प्रिय के चरणों की धूल मात्र चाहती हैं जिसको नेत्रों में लगाकर वह विरह व्यथा को शान्त करने का निश्चय प्रकट करती हैं किन्तु द्विजदेव की नायिका के विरह में निराशा का भाव अधिक प्रबल है। वह न कृष्ण के प्रेमसंदेशों पर ही विश्वास करती है और न उनके प्रेमपत्रों पर ही। वह पूर्वजों द्वारा स्थापित प्रेम को भी तोड़ देना उचित समझती हैं तथा मरने के लिए उद्यत रहती हैं। वह चाहती हैं कि उसके मृत शरीर को कृष्ण के द्वार पर डाल दिया जाए –
अब मति दै री कान कान्ह की बसीठिन पैं, झूठे झूठे प्रेम के पतौवन को फेरि दैं।
उरझि रही तो जौ अनेक पुकरता तैं सोऊ, नाते ही गिरह मूँदि नैननि निवेरि दै।
मरन चहत काहू छैल पै छबीली कोऊ, हाथन ऊँचाई ब्रजबीथिन में टेरि दै।
नैह री कहाँ कौ अरि रवेह री भई तौ मेरी, देह री उठाइ वाकी देहरी पैं गेरि दैं।।
   द्विजदेव ने कलहांतरिता नायिका का अत्यन्त विशद् वर्णन किया है। यदि यह कहा जाए कि द्विजदेव के समान कलहांतरिता नायिका का वर्णन समस्त हिन्दी साहित्य में दुर्लभ है तो अति उक्ति न होगी। कलहांतरिता नायिका वह नायिका है जो स्वयं पति का अपमान करके पश्चाताप करती है। यह नायिका नायक से इसलिए नहीं मिल सकी कि उसके शरीर के अंगों ने ही लज्जा रूपी वैरिणी का साथ दिया। कोकिला का आवाहन, केकी गणों की चेतावनी तथा सखियाँ की शिक्षाओं और युक्तियों का उस पर कोई प्रभाव ही न पड़ सका। अंत में यह हुआ कि कृष्ण उन कुुजों में पधार कर वहाँ से वापिस लौट गए परन्तु वह उनकी सुधामयी मूर्ति देख न सकी क्योंकि उनके आने के समय उसकी लज्जा ही उसके लिए दुःखदायिनी हो गई और उसके कारण नैन, उनका दर्शन करने के लिए ऊपर न उठ सके तथा जाने के समय भी उसकी चंचल पलकों ने उसके साथ विश्वासघात किया। अतः वह जाते समय भी उन्हें देख न सकी –
बौलि हारे कोकिल बुलाई हारे केकी गन, सिखैं हारीं सखी सब जुगति नई-नई।
हाइ! इन कुंजन तैं पलटि पधारे स्याम, देखन न पाई वह मूरति सुघामई।
आवन समैं मैं दुरवदाइनि भई री लाज, चलन समैं में चलपलन दगा दई।।
  जिस नायिका का नायक सदा उसके वशीभूत रहता है वह ‘स्वाधीनपतिका’ कहलाती है। आलोच्य कवि द्विजदेव ने एक छन्द में स्वाधीनपतिका नायिका का मनोरम वर्णन करते हुए लिखा है – 
राधिका के गुलाल सरीखे पगों पर झवाँ ऐसी कठोर वस्तु के घिसने से कदाचित् दुःख होता हो, नायक ऐसा अनुभव करके नाक चटाए, भौं मरोड़ बारम्बार सहानुभूति की दृष्टि से देखते हैं और उधर नायिका भी उनको पूर्वोक्ति कारणों से दुःखित देख प्रेमाधिक्य से अपने को धन्य मानती है –
ज्यौं-ज्यौं उतै कछु लाड़की के, 
उन पंकज-पाँइन जात झँवा छ्वै।
नाक-मरोरि, सकोरि कैं भौंह सुल्यौं त्यौं रहे हरि आँखिन सौं ज्वै।
सो तकि बाल निहाल सी होति, 
बिथा तब अंग की कौंन गनैं स्वै।
राधिका के सुख-काज सु तौ सखि, 
पाँई की पीर उपाइ गई ह्वै।।11।।
रूप वर्णन :- 
रूप में कहा जा सकता है कि द्विजदेव ने अपने विषय को सुबोध तथा विवेचन को पूर्ण बनाने का सफल प्रयास किया है। रीतिकालीन शृंगार समन्वित नायिका-भेद की परम्परा में द्विजदेव के छंदों का नायिका भेद वर्णन अपना विशिष्ट स्थान रखता है। कवि ने इस परम्परा का अन्धानुकरण नहीं किया है वरन् प्राचीन परिपाटी को मनोवैज्ञानिक ढंग से नवीनता प्रदान करने का सराहनीय कार्य किया है। नारियों की विभिन्न मनोदशाओं का अत्यन्त विद्ग्धतापूर्ण वर्णन करके उन्होंने नायिका भेद को सामाजिक दृष्टि से उपेक्षणीय होने से भी बचा लिया है। विविध रंगमयी चित्रों का साफ-सुथरा विन्यास उनकी विलक्षण प्रतिभा के उदाहरण है।
निष्कर्ष :- 
निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि द्विजदेव का रचना संसार अपने भावगत एवं कलागत समस्त आयामों के कारण साहित्य क्षेत्र में अपना पृथक् वैशिष्ट्य स्थापित किए हुए है। प्रकृति के विविध उपादानों के प्रति अनुरागमय दृष्टि रखने वाले इस कवि ने प्रकृति सौन्दर्य को तो सराहा ही है, साथ ही शृंगार रस का भी प्रभावशाली अंकन करने में भी ये पीछे नहीं रहे हैं। भाषा पर तो इनकी पकड़ थी ही, अलंकारों के प्रयोग में भी इनका कलागत सौष्ठव देखा जा सकता है। उनका भाव प्रकाशन नितांत मौलिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध को लड़ते और साम्राज्य विस्तार को नश्वर और अस्थाई भाव समझ कर कवि हृदय द्विजदेव की मानसिकता अध्यात्म भक्ति और साहित्य की तरफ उन्मुक्त हुई थी। सुकवि लच्छीराम जी ने अपने आश्रयदाता के बारे में अमूल्य सामग्री संचित कर साहित्य को समृद्ध किया है।
(“सहचर” त्रयमासिक ई पत्रिका संपादक : डॉ. आलोक रंजन पाण्डेय के 5 जुलाई 2018 के अंक में प्रकाशित डा. ममता सिंगला के आलेख “कवि द्विजदेव” का आभार सहित उपयोग करते हुए उक्त विवरण प्रस्तुत किया जा सका है।)

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
  
 


             

Thursday, February 5, 2026

साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक - अयोध्या के महाराजा मानसिंह आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृतआयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य कासृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :- 

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली 'सर' की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ "वीर" या "साहसी" होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी ।के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित 'द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड  खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब 'लंबे समय तक चलने वाली' या 'दृढ़ता से लड़ी जाने वाली' लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा 

द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :- 

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लक्षिराम जी ने निम्नलिखित छन्द पढ़ा था -

कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ ।       वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।      कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।

- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

         राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह - बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.राजा रघुबर दयाल सिंह - 

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे।वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह द्विजदेव  :- 

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे।उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों   ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।"

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

    इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

       इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा 

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

    इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

 x        x        x       x         x        x       

मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।

विरोधियों को मात दिया :- 

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा। 

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:- 

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। "मैं अब अकेला हूँ... पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए," मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :- 

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया 

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। "तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं," सेनापति ने डरते हुए कहा, "यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।"

       मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।" रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था।          राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

     जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, "महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।" मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, "वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

     इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:- 

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें "राजा-बहादुर" की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में "कायम - जंग" की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ "महाराजा " की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था। 

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :- 

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

    एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, "मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।"

     उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन :- 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार :- 

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, "युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।"

   महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :- 

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :- 

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

'द्विजदेव' साहित्यिक उपाधि :- 

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम 'द्विजदेव' है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययन परक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

1.'श्रृंगारबत्तीसी' 

2.श्रृंगारलतिका'

3. 'शृंगार चालीसी' 

4. 'अवमुक्त पंचदशी' 

5. 'मान मयंक' 

6. 'लतिका सौरभ' 

श्रृंगारलतिका :- 

'श्रृंगारलतिका' का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :- 

'श्रृंगारबत्तीसी' भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

'मान मयंक' :- 

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:- 

शृंगार चालीसी' में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है। 

लतिका सौरभ:- 

दोहा - 

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।

भाषा :- 

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था- 

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।


आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के 

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।

बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।

बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन।

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।

भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।

घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव, 

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ, 

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

  

 

Wednesday, February 4, 2026

अयोध्या के राजा दर्शन सिंह की शौर्य गाथा ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे ।लगभग दो-ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार अपना विशिष्ट स्थान बना लिए थे । इस वंश के ज्ञात राजा के पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके उत्तराधिकारी पुरन्दरराम पाठक से वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' ने कवियों के आश्रयदाता थे। द्विजदेव, जिनका वास्तविक नाम मानसिंह था, अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –

पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम

चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि

दर्शन सिंह के बारे में लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ, देस अवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गज पै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघु भूपालमनि, मानसिंह महाराज।जिन कीने लछिराम कौं,निजद्वारे कविराज।

अयोध्या के पलिया में हुआ था इनका पहला पड़ाव :- गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दरराम पाठक का विवाह अयोध्या जिले के पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था और पलिया में आकर बस गये थे। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते रहे हैं । पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम 1.ओरी उर्फ बख्तावर सिंह, 2.शिवदीन सिंह, 3 .दर्शन सिंह, 4.इच्छा सिंह  और 5.देवी प्रसाद सिंह है। इनमें से तीन ओरी सिंह दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार कर लिए थे। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी देवी करणों या अपने विस्तारवादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व संभाल ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए गायब हो गए होंगे।

 1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय ओरी पाठक प्रथम शासक :- 

अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में अपनी राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर लिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुआ। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1780-1846 ई के आसपास का रहा। उन्होंने लगभग 1795 के आसपास 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवामुक्त कराकर  नव्वाब साहब ने पहले ओरी को 8 सवारों का दफादार बनाकर अपनी अर्दली बनाया फिर नबाब की जान की सुरक्षा के परितोष में उन्हे पलिया की जागीर और सौ सवारों का अफसर बनाया। फिर अश्व सेनापति (रिसालेदार), फिर 1821 ई में राजा की उपाधि और बख्तावर सिंह टाइटिल दिया । उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया और अपने अन्य भाइयों को भी शासन- प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया।इनकी मृत्यु 1846 ई में हुई थी।

इच्छासिंह :- 

राजा दर्शनसिंह के भाई इच्छासिंह भी सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम= प्रबंधकर्ता ( सैन्य राज्यपाल)रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे।

मेहदौना की जागीर 

राजा बख्तावर सिंह को जागीर पाने का सम्मान 1837 से 1842 के बीच प्राप्त हुआ था। जब बादशाह नसीरउद्दीन हैदर का देहान्त जुलाई 1837 में हुआ और मेजर लो रेजिडेण्ट मुहम्मद अली शाह 1837 से 1842 को तख्त पर बैठाने के लिये अपने साथ दरे-दौलत पर लाये, उस समय बादशाह बेगम और मुन्नाजान एक हज़ार हथियारबन्द सिपाहियों को लेकर महल में घुस आये। मुन्नाजान ने कहा कि सलतनत हमारी है। तख्त पर बैठ कर यह हुक्म दिया कि मुहम्मद अली शाह उसका बेटा अजमदअली शाह और उसके पोते वाजिदअली का बध कर दिया जाय। राजा बख़तावर सिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से मुहम्मदअली शाह के परिवार को छिपाया था। इतने में मड़िआवँ की छावनी लखनऊ से सेना आ गई थी । मुन्नाजान और बादशाह बेगम पकड़ लिये गये और मुहम्मद अली शाह तख्त पर बैठाये गये। मुहम्मदअली शाह ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट की और नानकार, गाँव माफ़ी और जागीर देकर उन्हें मेहदौना के राजा की पदवी दी। इसी समय बख़तावर सिंह को वह तलवार दी गई जिसे कि ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली के बादशाह मुहम्मदअली शाह को उपहार में दिया था और मुहम्मदशाह से नव्वाब सफ़दरजंग ने पाया था।

दोनों भाइयों ने 1500 गांवों की जमींदारी खरीदी :- 

राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल कर लिए तब उनकी इच्छा हुई कि अब जमींदारी बढ़ानी चाहिए। दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बना लिया।उन्होंने इस दौरान अपने कुशल प्रबंधन से प्रजा को खुश रखा था। 

मेहदौना खास एक रियासत बनी :- 

यह अयोध्या जिले में एक गाँव रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से अवध के नवाबों और अयोध्या के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, जहाँ राजा बख्तावर सिंह और राजा दर्शनसिंह जैसे शासकों ने इलाका खरीदा और बाद में महाराजा मानसिंह जैसे प्रमुख हस्तियां इस क्षेत्र से जुड़ी रहीं, जो फैजाबाद के इतिहास और अयोध्या राजपरिवार के संदर्भ को दर्शाते हैं।

     यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्कीपुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है । वर्तमान समय में यह दो राजस्व गांव के रूप में जानी जाती है। 

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या  के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना मिल्कीपुर ब्लॉक के बारुन बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह क्षेत्र स्थानीय जन जीवन ,व्यापार, इतिहास और सांस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है। 

मेहदौना बारुन बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार या क्षेत्र है, यह बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या के निकट है।

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :- 

शाहगंज में बनवाई गई हवेली राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। समय के साथ यह खंडहर में बदल गई, पर लोगों के मन में राजा की धरोहर आज भी जीवित है। हवेली की दीवारों पर उकेरे गए नक्काशी और चित्र, राजा के गौरव और वीरता की गवाही देते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

     हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा की हवेली' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

दर्शन सिंह सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख बने :- 

ओरी पाठक के छोटे भाई दरसन सिंह समय लगभग (1800-1844 के दशक) में था ।अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें "बहादुर " के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए  और राजा (राजा) की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 में  वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

शिवदीन डाकू का दमन :- 

उन्हीं दिनों शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया गया और राजा को बहादुर का पद मिला। इसी तरह दोनों भाइयों की बादशाह नसीरुद्दीन के समय में उन्नति होती रही। उनकी वीरता, उनका दान, उनका न्याय और राज- विद्रोहियों (सर्कशों) का दमन संसार में प्रसिद्ध हुआ। इस अन्तिम काम के लिये उनको बादशाही से "सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर " की उपाधि मिली थी।

वैसवाड़े के नाज़िम :- 

राजा दर्शनसिंह की वीरता बखान में इतिहास का यह अंश बहुत बढ़ गया। वे 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । वैसवाड़े के तालुकदार क्या बड़े क्या छोटे सरकारी जमा देना जानते ही न थे। उनका बल बहुत बढ़ा हुआ था और उनकी गढ़ियों पर तोपें चढ़ी रहती थीं।दर्शन सिंह ने कुछ बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों के नाम परवाने जारी किये जिनमें यह लिखा था कि अपनी भलाई चाहते हो तो तुरन्त उपस्थित    होकर सरकारी जमा दाखिल करो।      

      ताल्लुकदारों ने परवाने पाकर युद्ध करने का निश्चय कर दिया। राजा दर्शनसिंह ने जब पहिले धावा मारकर मुरारमऊ की गढ़ी तोड़ी तो गढ़ी के रक्षक एक पगडण्डी के रास्ते निकल भागे। इस गढ़ी के टूटने से और ताल्लुकदारों के छक्के छूट गये। सब दर्शन सिंह के नियंत्रण में आ गया। पांच वर्षों तक वैसवाड़े के नाज़िम रहते हुए, राजा दर्शन सिंह ने अपने साहस और प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया। 

बलरामपूर को नियंत्रित किया:- 

वैसवाड़े की सफलता मिलने के बाद एक दिन राजा ने अपने सेनापतियों से कहा, "बलरामपुर की गढ़ियों पर हमला की योजना बनाओ। हमें यह साबित करना होगा कि अयोध्या की शक्ति केवल नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक है।" सेनापति ने डरते हुए उत्तर दिया, "साहब, वहां तीन हजार सिपाही हैं। यदि वे हमें घेर लें, तो...।"

    राजा ने गंभीरता से देखा और कहा, "डर और संदेह की कोई जगह नहीं है। वीरता और बुद्धिमत्ता से हर मुश्किल का समाधान है। हमारे पास धर्म और न्याय का आशीर्वाद है।"

      बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई के समय, राजा ने अपनी सेना को दिशा दी, एक-एक सिपाही की तरकीब और चालाकी से गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए।

    बलरामपुर के ताल्लुकेदार राजा दिग्विजय सिंह जी सरकारी जमा नहीं देते थे। राजा दर्शनसिंह ने सेना समेत बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी। वहां के राजा गोरखपूर को भाग गये । जो दूसरे साल नेपाल की तराई होकर अपने देश को लौटना चाहते थे कि राजा दर्शनसिंह ने समाचार पाकर एक लम्बी दौड़ लगाई और राजा के डेरे पर धावा मार दिया। राजा अपना प्राण बचा कर भागे। उस दिन आने जाने में 45 कोस की दौड़ हुई। नैपाल के हाकिम गोसाई जयकृष्ण पुरी ने सीमा पार करके नेपाल राज में प्रवेश करने के लिये दर्शनसिंह की शिकायत नैपाल- दरबार मे की। नैपाल के रेज़िडेण्ट ने लखनऊ के रेजीडेण्ट को दर्शन सिंह के इस कृत्य की शिकायत लिख भेजी। बादशाही दरबार से जवाब लिया गया और यह निर्णय हुआ कि लूट पाट में नेपाल की प्रजा की जो हानि हुई है वह राजा दर्शन सिंह से दिलवा दिया जाय। राजा साहब ने हानि का रुपया 1453/-तुरन्त अदा कर दिया और फिर अपने काम पर बहाल हो गये। बादशाह अमजद अली शाह के  अली शाह (शासन : 1842-1847) अवध के पांचवें नवाब थे, जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था।इस प्रकार 1842 में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। राजा साहब ने यहाँ तक इकरार नामा लिख दिया कि सरकारी जमा में जो कुछ बाक़ी रहेगा उसे हम दे देंगे।

अयोध्या-राज प्रासाद 1842 में :- 

इसी समय में उनको कचहरी करने के लिये अयोध्या धाम का लालबाग़ क्षेत्र दे दिया गया जहाँ अयोध्या-राज का प्रासाद लगभग 20 एकड़ बिस्तार में अब तक विद्यमान है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में हो गया।1846 में बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी।

दर्शन सिंह के कुछ प्रमुख कार्य:- 

उन्होंने हवेलियों, कुओं और सार्वजनिक बागानों घाटों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का  निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया था। 

दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:- 

धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। श्री दर्शनेश्वर नाथ महादेव राजसदन अयोध्या में शिवाला मन्दिर का निर्माण कराया। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि के प्रतीक बने।

दर्शन नगर बाजार और चार प्रवेश द्वार वाला प्राचीर का निर्माण:- 

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। राजा दर्शन सिंह के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा था।

दर्शननगर सूर्य कुंड व मंदिर का निर्माण:- 

दर्शननगर बाजार के पास राजा दर्शन सिंह का बनाया हुआ सूर्य भगवान का सुन्दर सरोवर और मंदिर दर्शनीय है। वर्तमान काल में अयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर  मेले की ब्यवस्था की देख भाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है।

जबकि सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

सरयू नदी के तट पर चारों ओर सीमेंट घाट और नागेश्वर नाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :- 

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का निर्माण कराया था। नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)