इतिहास के अद्भुत रहस्य
Wednesday, October 21, 2026
आचार्य शुक्ल की पुत्री दुर्गावती और दामाद पं०चन्द्रबली त्रिपाठी( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 33 ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
Monday, October 19, 2026
विजय की नहीं मुक्ति के लिए रावण द्वारा मृत्यु का वरण✍️ आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
रामायण के अनुसार, रावण ने अपनी मुक्ति (मोक्ष) पाने के लिए भगवान श्री राम के हाथों मृत्यु का वरण किया था, न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए। रावण जानता था कि श्री राम साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार हैं और उनके हाथों मृत्यु प्राप्त करने से उसे परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।
पूर्व जन्म का श्राप : -
रावण और कुंभकर्ण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनत्कुमारों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक असुर योनि में जन्म लेना था, जहाँ भगवान विष्णु स्वयं उनका वध करके उन्हें पुनः वैकुंठ लाते।
भक्ति का अनोखा मार्ग (द्वेष भक्ति) :- रावण जानता था कि एक साधारण मनुष्य की तरह भक्ति करने से उसे मोक्ष मिलने में लंबा समय लगेगा। इसलिए उसने 'शत्रु भाव' (द्वेष भक्ति) का मार्ग चुना, ताकि भगवान हर क्षण उसके स्मरण में रहें और वह जल्दी मुक्त हो सके।
माता सीता का हरण :-
रावण ने सीता जी का हरण लंका विजय या वासना के लिए नहीं, बल्कि श्री राम को युद्ध के लिए आमंत्रित करने के लिए किया था, जिससे उसकी मृत्यु का मार्ग प्रशस्त हो सके।
नीलकंठ पक्षी दर्शन:-
विजयादशमी (दशहरा) के पर्व पर नीलकंठ पक्षी (इंडियन रोलर) के दर्शन को अत्यंत शुभ, सौभाग्यशाली और भगवान शिव का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है।
नीलकंठ दर्शन का विधान और नियम
दर्शन का समय : -
दशहरे के दिन सुबह से लेकर शाम तक किसी भी समय नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना शुभ माना जाता है, हालांकि प्रातःकाल (सूर्योदय के आसपास) का समय श्रेष्ठ माना गया है।
दर्शन न होने पर :-
यदि प्रत्यक्ष में नीलकंठ पक्षी दिखाई न दे, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है; मान्यता है कि आप मन में भगवान का ध्यान करके या किसी डिजिटल माध्यम/चित्र के जरिए भी उनके दर्शन कर सकते हैं।
देखने पर क्या करें :-
जब भी नीलकंठ के दर्शन हों, तो हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए।
विशेष मंत्र एवं प्रार्थना :-
दर्शन होने पर निम्नलिखित मंत्रों या परंपरागत वचनों का जाप करना चाहिए:-
पारंपरिक श्लोक / मंत्र:
'कृत्वा नीराजनं राजा बालवृद्धयं यता बलम्।
शोभनम खंजनं पश्येज्जलगोगोष्ठसंनिघौ।।
नीलग्रीव शुभग्रीव सर्वकामफलप्रद। पृथ्वियामवतीर्णोसि खञ्जरीट नमोस्तु तो।।'
पौराणिक लोक मान्यता का वचन :-
“नीलकंठ तुम नीले रहियो,
सारी बात राम से कहियो।”
शिव मंत्र :-
‘ॐ नीलकंठाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥'
ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें
पिंजरे में बंद पक्षी न खरीदें :-
पिंजरे में कैद नीलकंठ को खरीदना या देखना शुभ नहीं माना जाता; यह भगवान शिव का रूप है, इसलिए उसे स्वतंत्र रूप में ही देखना फलदायी होता है।
धार्मिक महत्व :-
पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले भगवान श्री राम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसी वजह से विजयदशमी पर इनके दर्शन से जीवन में विजय, यश, धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
प० राम लखन मिश्र राजनेता कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 32) आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से प० राम लखन मिश्र जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय:-
ऐसे ही कवियों में पण्डित राम लखन मिश्र (अग्र) भी आते हैं। वे हिंदी साहित्य के एक आदरणीय कवि, राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो सं० 1960 वि० तदनुसार सन 1903 ई में ग्राम गोविनापुर पो० इटवा , डुमरियागंज तहसील में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम पं० यमुना प्रसाद मिश्र था। ये साहित्यानुरागी तथा अच्छे छंदकार थे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के 283 - डुमरियागंज (उत्तर पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़कर जीता था। उनका बतौर विधायक कार्यकाल 1952 से 1957 तक रहा। विधायक बनने से पूर्व उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
इतने महत्वपूर्ण राजनेता ,स्वतंत्रता सेनानी और कवि के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हो रही है। आज के आत्म कुटुंब और स्वजातीय प्रशस्ति युग में ऐसा घटित होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इनके परिवारी जन शुभ चिन्तक और आम जन जिन्हें भी इन महानुभाव के बारे में किंचित जानकारी हो वह बस्ती मण्डल की गरिमा के लिए उसे आम जन में साझा करना चाहिए। हिन्दी भाषी विश्विद्यालय अपने शोध विषय में उक्त व्यक्तित्व को सम्मिलित करके महान योगदान कर सकते हैं।
Sunday, October 18, 2026
श्री भगवती प्रसाद मिश्र (अग्र) (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 31)आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
Saturday, October 17, 2026
राप्ती की रेती के सन्त फागूदास जी की समाधि(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 30)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
भूमिका -
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी ने अपने शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” में मध्योत्तर (तृतीय) ‘कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार’ नामक अध्याय का नाम दिया है। “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। जिसका नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों काऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी इसके पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से संत फागू दास जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय -
सिद्धार्थनगर जिले में चौखड़ा गांव और बाजार डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में है। यह डुमरियागंज तहसील मुख्यालय से लगभग 5 किमी. दूरी पर स्थित है।सन्त फागू दास जी का जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे।
मन्दिर और समाधि -
मान्यता है कि संत फागू बाबा कहीं बाहर से आए और चौखड़ा में रह गए। यहां स्थित महाविद्यालय के पास उनकी समाधि है। यह भूमि पशुचर भूमि है। सन्त फागू दास जी के मृत्यु के बाद पेड़ के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। जहां उनकी समाधि रखी गयी, वहां पहले सूखा था। समाधि बनने के बाद वह क्षेत्र हरा-भरा हो गया। प्रत्येक गुरुवार को वहां मेला लगने लगा था । फागू बाबा के निधन को 100 वर्ष अधिक हो चुके हैं। उनके समाधि स्थल पर हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग आते हैं। 10 वर्ष पूर्व वहां विधायक निधि से कमरा बनवा दिया गया था जिसे कुछ लोगों ने मजार का स्वरूप देने का प्रयास किया था। इस तथा कथित मजार के रूप में हुए अतिक्रमण को स्थानीय विधायक के अनुरोध पर प्रशासन ने हटवा दिया है। यह गांव उत्तर में 'बूढ़ी राप्ती नदी' और दक्षिण में 'राप्ती नदी' के बीच के मैदानी इलाके में स्थित है। यह मां बटवासनी मंदिर (गलापुर) जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।
धनाक्षरी और सवैया का उत्कृष्ट प्रयोग-
वे संतों और कवियों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में धनाक्षरी और सवैया छंद का बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। इन छंदों का प्रयोग वे अपनी भक्ति, दर्शन और नीतिपरक बातों को कहने के लिए करते थे।इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में “उपहार” पत्रिका में विशेष प्रशंसा की गयी है।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)