Wednesday, May 6, 2026

पशुपतिनाथ है नेपाल का अद्भुत शिव मंदिर ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल के सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है जो काठमांडू शहर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व में सुंदर और पवित्र बागमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ पर रोज हजारों की संख्या में भक्त दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरा करते  हैं। 'पशुपति' के - पशु का मतलब 'जीवन'और 'पति' का मतलब ‘स्वामी’ या ‘मालिक’ होता है , यानी 'जीवन के मालिक' या 'जीवन के देवता' को पशुपति भगवान कहा गया है । यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है। मुख्य पगोडा शैली का मंदिर सुरक्षित आंगन में स्थित है जिसका संरक्षण नेपाल पुलिस द्वारा किया जाता है।  पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने का प्रयास किया गया है।

पौराणिक मान्यताएं :- 

1. इस मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।

2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।

3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद अपने ही बंधुओं की हत्या करने की वजह से पांडव बेहद दुखी थे। उन्होंने अपने भाइयों और सगे संबंधियों को मारा था। इसे गोत्र वध कहते हैं। उनको अपनी करनी का पछतावा था और वे खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। खुद को इस दोष से मुक्त कराने के लिए वे शिव की खोज में निकल हुए थे।

     शिव जी नहीं चाहते थे कि जो जघन्य कांड  पांडवों ने किया है, उससे उनको इतनी आसानी से मुक्ति दे दी जाए। इसलिए पांडवों को अपने पास देखकर उन्होंने एक बैल का रूप धारण कर लिया और वहां से भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन पांडवों को उनके भेद का पता चल गया और वे उनका पीछा करके उनको पकड़ने की कोशिश में लग गए। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। इसी भागा दौड़ी के दौरान शिव जमीन में लुप्त हो गए और जब वह पुन: अवतरित हुए, तो उनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर बिखर गए। 

     शिव जी ने नेपाल की पूरी भौगोलिक स्थिति को इस्तेमाल करते हुए एक तांत्रिक शरीर की रचना की, ताकि वहां रहने वाले सभी लोग और हरेक प्राणी एक बड़े मकसद के साथ जिए।


नेपाल के पशुपति नाथ में उनका मस्तक गिरा था और तभी इस मंदिर को तमाम मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। केदारनाथ में बैल का कूबड़ गिरा था। बैल के आगे की दो टांगें तुंगनाथ में गिरीं। यह जगह केदार के रास्ते में पड़ता है। बैल का नाभि वाला हिस्सा हिमालय के भारतीय इलाके में गिरा। इस जगह को मध्य-महेश्वर कहा जाता है। यह एक बहुत ही शक्तिशाली मणि पूरक लिंग है। बैल के सींग जहां गिरे, उस जगह को कल्पनाथ कहते हैं। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग जगहों पर मिले।

मन्दिर का विस्तार :- 

यह मंदिर आश्रमों के साथ एक बड़े हिस्से में फैला हुआ है जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को एक अलग परम शांति का अनुभव करवाता है। यह मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। मंदिर की द्वी स्तरीय छत का निर्माण तांबे से किया गया है जिनपर सोने की परत चढाई गई है। 

     मंदिर वर्गाकार के एक चबूतरे पर बना है जिसकी आधार से शिखर तक की ऊंचाई 23मी.7 सेमी.है। मंदिर का शिखर सोने का है जिसे गजुर कहते हैं। परिसर के भीतर दो गर्भगृह है एक भीतर और दुसरी बाहर। भीतरी गर्भगृह वह स्थान है जहां शिव की प्रतिमा को स्थापित किया गया है जबकि बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है। भीतरी आंगन में मौजूद मंदिर और प्रतिमाओं में वासुकि नाथ मंदिर, उन्मत्ता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मूर्ति, और 184 शिवलिंग मूर्तियां प्रमुख रूम से मौजूद है जबकि बाहरी परिसर में राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग और पंद्र शिवालय गुह्येश्वरी मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट स्थिति है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है। किसी समय  यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी।

    पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।

निर्माण का समय :- 

इस मंदिर का इतिहास 400 ईसा पूर्व का है, जिसका निर्माण नेपाल के पूर्ववर्तियों द्वारा समय-समय पर कराया गया है। सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में इस मंदिर का निर्माण कराया था। 605 ईस्वी में अमशु वर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुगृहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया था।

     यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला के कारण 1979 ईस्वी में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया है। यह मंदिर नेपाली पैगोडा शैली में पुनर्निर्मित है, जिसकी छत सोने की है और चारों द्वार चांदी से मढ़े हुए हैं।  अप्रैल 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में पशुपति नाथ मंदिर के कुछ बाहरी इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थी जबकि पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर और मंदिर की गर्भगृह को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई थी।

पंचमुखी शिवलिंग :- 

मंदिर में भगवान शिव की एक पांच मुंह वाली मूर्ति है। पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर देख रहा मुख वामवेद या अर्धनारीश्वर है, तो दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोर कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है।

सोने की छत और चांदी के दरवाजे और असीम सम्पत्ति :- 

इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। मंदिर में सोने और चांदी का बहुतायत से प्रयोग किया गया है, जो इसकी भव्यता और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। यह मुख्य मंदिर नेवारी वास्तुकला शैली में निर्मित है। इसकी दो मंजिला छतें तांबे की हैं जिन पर सोने की परत चढ़ी हुई है । मंदिर के द्वार चांदी की चादरों से ढके हुए हैं। हाल ही में, मंदिर के शिवलिंग के चारों ओर एक सोने की 'जलहरी' भी स्थापित की गई है, जो मंदिर की समृद्ध विरासत का हिस्सा है।

     नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के पास नौ किलो सोना, 316 किलो चांदी है. इसके अलावा मंदिर का 1.29 अरब रुपया (नेपाली मुद्रा) बैंकों में जमा है. इसका जिक्र एक मीडिया रिपोर्ट में किया गया है।मंदिर के शासी निकाय की ओर से प्रकाशित आंकड़ों के अनसार, मंदिर में पिछले 56 साल में चढ़ावे के रूप में 9.27 किलो सोना, 316 किलो चांदी चढ़ाए गए हैं। माना जाता है कि पशुपतिनाथ मंदिर शुमार नेपाल के सबसे ज्यादा पैसे वाला हिंदू मंदिरों में शुमार है. यहां रोज हजारों नेपाली और भारतीय नागरिक पैसे, सोना और चांदी का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इन आंकड़ों का जिक्र हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट में की गई है।

पीतल का विशाल नन्दी :- 

पश्चिमी द्वार की ठीक सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है जिसका निर्माण पीतल से किया गया है। इस परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है। 

भारतीय ,नेपाली ब्राह्मण पुजारी :-

पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। बाद में 'मल्ल राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को मंदिर का प्रधान पुरोहित नियुक्त कर दिया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे थे। बाद में में प्रचंड सरकार के काल में भारतीय ब्राह्मणों का एकाधिकार खत्म कर नेपाली लोगों को पूजा का प्रभाव सौंप दिया गया।

दर्शन का समय :-

ये मंदिर प्रत्येक दिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। केवल दोपहर के समय और साय पांच बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर में जाने का सबसे उत्तम समय सुबह सुबह जल्दी और देर शाम का होता है। पुरे मंदिर परिसर का भ्रमण करने के लिए 90 से 120 मिनट का समय लगता है।


लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183




पुरातत्व विज्ञान संस्थान पुरातात्विक स्थलों पर 6 नए संग्रहालयों का निर्माण करेगा। (प्रस्तुति: डा राधेश्याम द्विवेदी)


 'परियोजना की लागत लगभग 1,481 करोड़ रुपये है।' 1 फरवरी को अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने DESH योजना के तहत इन स्थलों को जीवंत, अनुभवात्मक सांस्कृतिक स्थलों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा केंद्रीय बजट में देश भर में 15 पुरातात्विक स्थलों को विकसित करने का प्रस्ताव रखे जाने के तीन महीने बाद , भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रस्तावित स्थलों पर कई नए संग्रहालयों के निर्माण को मंजूरी दे दी है ।

“लोथल, चित्तौड़गढ़, उदयगिरि, अधिचिनल्लूर, झांसी और धोलावीरा में नए संग्रहालय बनाए जाएंगे , जो इन स्थलों के विकास का हिस्सा है,” एएसआई के एक अधिकारी ने बताया। इन स्थलों में सिंधु घाटी सभ्यता (आईवीसी) के स्थल और बौद्ध स्थल शामिल हैं । 

वर्तमान में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अंतर्गत 52 स्थल संग्रहालय हैं। 

एएसआई के क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) वसंत स्वर्णकार ने कहा कि यह विकास केंद्र सरकार की देश (सांस्कृतिक-संपदा और विरासत का विकास और संवर्धन) योजना का हिस्सा है।

स्वर्णकार ने कहा, “हमने 15 स्थलों पर काम के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1,481 करोड़ रुपये है।” उन्होंने आगे कहा कि प्रत्येक स्थल की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पूरी होने के बाद काम शुरू हो जाएगा।

DESH योजना में तमिलनाडु में आदिचनल्लूर, उत्तर प्रदेश में सारनाथ, झाँसी और हस्तिनापुर, कर्नाटक में उदयगिरि और सन्नती, हरियाणा में अग्रोहा और राखीगढ़ी, राजस्थान में चित्तौड़गढ़ किला, मध्य प्रदेश में एरण, असम में सिबसागर, दिल्ली में पुराना किला, गुजरात में लोथल और धोलावीरा और लद्दाख में लेह पैलेस जैसे स्थल शामिल हैं।

स्वर्णकार ने कहा , “इन 15 स्थलों की विकास योजनाओं में एकरूपता नहीं होगी। सभी स्थलों का विकास उनकी आवश्यकताओं के अनुसार किया जाएगा।” उन्होंने आगे कहा कि लेह पैलेस में, जहां किले के अंदर काम करने की कोई गुंजाइश नहीं है, उन्होंने पार्किंग जैसी सुविधाओं के निर्माण का प्रस्ताव दिया है।

एएसआई के पास पुराना किला स्थल संग्रहालय के विस्तार की योजना है । स्वर्णकार, जिन्होंने पुराना किला की कई बार खुदाई की है, ने बताया कि अवशेष फिलहाल दफन हैं, लेकिन वे उन्हें प्रदर्शित करने की योजना बना रहे हैं।

उन्होंने कहा, "हम पुराना किला के उत्खनन स्थल पर तन्य छाया की व्यवस्था करेंगे ताकि लोग इसका भ्रमण कर सकें।" 

सारनाथ स्थल संग्रहालय का भी विस्तार किया जाएगा, जिसमें डिजिटल सामग्री उपलब्ध होगी, और राखीगढ़ी स्थल पर एक व्याख्या केंद्र स्थापित किया जाएगा, जो एक विशेष सुविधा होगी और आगंतुकों को स्थल के महत्व, इतिहास और संदर्भ को समझाने के लिए इंटरैक्टिव, मल्टीमीडिया और शैक्षणिक उपकरणों का उपयोग करेगी।

एएसआई लेह पैलेस पर लगभग 38 करोड़ रुपये खर्च करेगा , जो सभी स्थलों में सबसे कम है, और लोथल पर अधिकतम 240 करोड़ रुपये खर्च करेगा।

सांस्कृतिक स्थलों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव 

1 फरवरी को अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने DESH योजना के तहत इन स्थलों को जीवंत, अनुभवात्मक सांस्कृतिक स्थलों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा।

खुदाई स्थलों को जनता के लिए खोलना
1 फरवरी को अपने बजट भाषण में , सीतारमण ने इन स्थलों को जीवंत, अनुभवात्मक सांस्कृतिक स्थलों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा।
DESH योजना के तहत, राखीगढ़ी, पुराना किला और आदिचनलूर जैसे उत्खनित स्थलों को जनता के लिए खोला जाएगा ताकि उन्हें अतीत से जोड़ा जा सके।
सीतारामन ने कहा, "खुदाई से प्राप्त भू-भागों को सुनियोजित पैदल मार्गों के माध्यम से जनता के लिए खोला जाएगा।"
एएसआई के महानिदेशक वाईएस रावत ने इससे पहले द प्रिंट को बताया था कि खुदाई स्थलों को आम जनता के लिए खोलना पुरातत्व प्रेमियों के लिए एक नया अनुभव होगा। 
रावत ने कहा, "पहले खुदाई स्थलों की जानकारी केवल किताबों तक ही सीमित थी, लेकिन अब वे आम जनता के लिए सुलभ होंगे।"
सरकार ने इस परियोजना को पूरा करने के लिए पांच साल की समय सीमा निर्धारित की है।
स्वर्णकार ने कहा, "कार्यान्वयन के बाद, इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और स्थानीय रोजगार सृजित होगा।"
(सप्तक दत्ता द्वारा संपादित)

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Sunday, May 3, 2026

नेपाल का मुक्तिनाथ : हिंदुओं और बौद्धों का पवित्र एवं दुर्गम धाम✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


मुक्तिनाथ धाम नेपाल के मुस्तांग जिले में हिमालय की गोद में भगवान विष्णु का एक प्राचीन और अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल है। जो  हिमालयी क्षेत्र में, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में, 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर थोरोंग-ला पहाड़ियों के पास स्थित है, जो पोखरा से लगभग 197 किमी उत्तर- पश्चिम में है। यह स्थल हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए पवित्र है। 

मुक्तिनाथ यात्रा हर प्राणी को प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के साथ-साथ मोक्ष की अनुभूति कराती है। इस  मंदिर का उल्लेख रामायण, वराह पुराण और स्कंद पुराण जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। नेपाल के पोखरा से जोमसोम तक हवाई मार्ग से या फिर जीप/मिनी बस के माध्यम से मुस्तांग पहुँचकर ट्रेकिंग द्वारा भी यहाँ पहुँचा जा सकता है। मुक्तिनाथ पहुंचकर मंदिर तक 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है । यदि कोई श्रद्धालु चलने में असमर्थ हों तो सवारी के लिए घोड़े और पालकी की सवारी की व्यवस्था भी हो जाती है। घोड़े की सवारी 400 भारतीय रुपए में केवल जाने के लिए है और वापसी पैदल ही आना पड़ता है।पालकी की सवारी 4000 भारतीय मुद्रा में दोनों तरफ आने जाने के लिए लिया जाता है। पैदल पथ आधी दूरी प्लेन ऊबड़ खाबड़ और आधी दूरी पक्के स्टेप और रेलिंग से युक्त है। ऊपर कोई छाजन नहीं है।

शालिग्राम शिला के रूप में विष्णु:- 

इसे मोक्ष का स्थान माना जाता है और यह हिंदू धर्म के 108 दिव्य देशों में से एक है। यहाँ मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु शालिग्राम शिला के रूप में ज्वाला देवी मंदिर में भी स्थापित हैं।मुक्तिनाथ हिमालय के अन्य किसी भी तीर्थ स्थल से अलग एक शांत और रहस्यमय वातावरण प्रदान करता है। 

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्‍णु का निवास होता है। इस संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इन्‍हीं कथाओं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी। जब तक असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी। इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्‍णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्‍यतीत करने का शाप दे डाला। फल स्‍वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्‍थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्‍य हैं।

भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति:- 

यह वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति मिली थी। इसलिए मुक्तिनाथ में उनकी पूजा मोक्ष के देवता के रूप में की जाती है।

यह स्थल हिंदुओं के लिए विष्णु और बौद्धों के लिए अवलोकितेश्वर का निवास स्थान है। इनकी मूर्ति मुक्त गगन में दूर से ही दिखाई देती है।

सती का गाल गिरने से शक्तिपीठ बना 

स्वस्थानी व्रत के अनुसार, भगवान शिव सती के मृत शरीर को अपने साथ लेकर अनेक स्थानों पर विचरण करते रहे। भ्रमण के दौरान सती के शरीर के अंग अनेक स्थानों पर गिरे और जहाँ-जहाँ गिरे, वही स्थान शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हो उठा। मुक्तिनाथ में सती का गाल गिरा था, जिससे यह शैव और शाक्त भक्तों के लिए पवित्र स्थान बन गया। परिसर में "मुक्तेश्वर महादेव" नामक एक छोटा मंदिर भी है, जहाँ शिव भक्त दर्शन करने आते हैं।

हिरण के टूटे सींग को शिव लिंग के रूप में की मान्यता:- 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, शिव और पार्वती ने बागमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित जंगल में हिरण का रूप धारण किया था। बाद में देवताओं ने उनका पीछा किया और उनके एक सींग को पकड़कर उन्हें अपना दिव्य रूप धारण करने के लिए विवश किया। टूटे हुए सींग को लिंग के रूप में पूजा जाता था, लेकिन समय के साथ वह दब गया और खो गया।

108 जलधाराएं और कुंड :

मंदिर परिसर में 108 गौमुख हैं, जिनसे जल धाराएं गिरती हैं, और दो पवित्र लक्ष्मी कुंड और सरस्वती कुंड भी यहां हैं, जिनमें स्नान को पाप मोचन माना जाता है। इसे पाप और मोक्ष कुंड भी कहा जाता है कि यहां स्थित 108 जलधाराओं के नीचे स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इन धाराओं में स्नान करने से जन्म- जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। विश्व भर से तीर्थयात्री मुक्तिनाथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए यहां आते हैं। पवित्र जल धाराओं के नीचे स्नान करने से आत्मा की शुद्धि होती है और आंतरिक शांति तथा अतीत के कुकर्मों से मुक्ति मिलती है । 108 मुक्ति धाराओं और 2 मुक्ति कुंडों के नीचे पवित्र स्नान करें। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, 12 राशियां और 9 ग्रह मिलकर 108 का आध्यात्मिक संयोजन बनाते हैं, जो ब्रह्मांडीय पूर्णता का प्रतीक है। तिब्बती बौद्ध इसे 'चुमिग ग्यात्सा' (सौ जल) कहते हैं, जहाँ गुरु रिनपोछे ने ध्यान किया था।

ज्वाला मां का मंदिर: - 

मुख्य मंदिर के परिसर में ही 'ज्वाला मां' का मंदिर है, जहाँ एक पवित्र ज्योति लगातार प्रज्वलित रहती है, जो पृथ्वी, जल और अग्नि का अद्भुत संगम है। जहाँ बिना किसी ईंधन के पानी के कुंड के ऊपर शाश्वत अग्नि (ज्वाला) जलती रहती है। यह ज्वाली भूमि के अंदर है और एक एक व्यक्ति गुफा नुमा खिड़की से झुक कर दर्शन कर सकता है। इसके ऊपर तीन देवियों के विशाल मूर्तियां एक दिव्य आभा छोड़ती हैं। परिसर की दी पर छोटे छोटे देवियों के स्वरूप उकेरे गए हैं। यह स्थान वैष्णव संप्रदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और यहाँ की नीली ज्वाला को देवी का रूप माना जाता है। 

इस स्थान से संबंधित एक विजुअल लिंक भी देखा जा सकता है -

https://www.facebook.com/share/r/1CuJctrhYw/



लेखक:- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183


Saturday, May 2, 2026

नेपाल की यात्रा आसान, भारत से उसका बनता बिगड़ता संबंध ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी



नेपाल हिमालय की गोद में बसा हुआ अद्भुत देश है ,यहां के लोगों का मिलनसार व्यवहार और ताज़गी भरा वातावरण हमेशा याद किया जाता है। यह देश अपने निर्माण से लेकर वर्तमान समय तक अपनी आध्यात्मिकता पुरातनता को लेकर पूर्ण रूपेण सजग है। केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर ध्यान ना देकर इसकी आध्यात्मिकता और मानव चेतना को समर्पित करते हुए देश को बनाने की कल्पना पूरे विश्व में अनूठी है। ऐसा करने वाले देश शायद तिब्बत और नेपाल ही हैं।

तिब्बत को चीन ने अपने प्रभाव में लेकर उसकी स्वतंत्रता छीन ली है जबकि नेपाल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत है।

अध्यात्म की भूमि:- 

नेपाल अध्यात्म की भूमि है और एक समय में यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी। दुर्भाग्य से इस देश को राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर बेहद उठा-पटक और पतन का दौर देखना पड़ा। यह देश भले ही छोटा हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह खासा महत्वपूर्ण है। अस्थिरता के कारण यह देश अपने आध्यात्मिक खजाने को संभाल नहीं पाया और अब इस पर आधुनिकता की परत चढ़ती जा रही है।

नेपाल को ‘दुनिया की छत’ के रूप में भी जाना जाता है। यह देश है यहाँ आने वाले पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता रहता है। खूबसूरत पहाड़ की चोटियों के साथ- साथ नेपाल बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक प्रमुख धार्मिक केंद्र भी है। इस देश में अपराध की दर काफी कम है जिसकी वजह से यह एक बहुत ही सुरक्षित पर्यटन देश बन जाता है।

यहां  साफ सफाई और यातायात के नियमों का पालन तथा ध्वनि नियंत्रण बहुत अजीब है। लंबी लम्बी लाइनें संयमित रूप से देखी जा सकती हैं।

नेपाल का इतिहास :- 

नेपाल में मूल रूप से शाह वंश का शासन था। उन्होंने सिक्किम (भारत) तक और सतलज नदी से परे अपने साम्राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का विस्तार किया। नेपाल साम्राज्य या राज्य को गोरखा साम्राज्य या गोरखा राज्य के नाम से भी जाना जाता है, जिसका गठन 1768 में हुआ था। ब्रिटिश काल 1814 में अंग्रेजों ने एक युद्ध की घोषणा की और 1816 में नेपाल पर विजय प्राप्त कर ली। अग्रेजों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे भारत और चीन के बीच एक बफर राज्य चाहते थे। सुबौलीसंधि में अंग्रेजों का साथ देने के कारण भारत का विशाल क्षेत्र नेपाल को मिल गया था जिसके निवासी मद्धेशिया कहलाते हैं। इनके घर और संपत्ति दोनों देशों में देखने को मिलती है और ये लोग दो दो देशों के नागरिक बन जाते हैं।

सात प्रांत 77 जिलो में विभक्त:-

नेपाल में सात प्रांत हैं- बागमती, गंडकी, करनाली, कोशी, लुम्बिनी, मधेस और सुदूरपश्चिम । इन 7 प्रदेशों में कुल 77 जिले हैं। नेपाल का संविधान 2015 में अपनाया गया था, जिसमें देश को इन प्रांतों में विभाजित किया गया था। इसको 2006 में धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया था, लेकिन यहाँ हिंदू धर्म के अनुयायियों की संख्या सबसे अधिक है। 2021 की जनगणना के अनुसार, नेपाल एक हिंदू-बहुल देश है, जहाँ 81.19% आबादी हिंदू है। अन्य प्रमुख धर्मों में बौद्ध धर्म (8.21%), मुस्लिम (4.39%), किरात (3.17%), और ईसाई (1.76%) शामिल हैं। हालांकि नेपाल धर्मनिरपेक्ष है, हिंदू धर्म यहाँ की संस्कृति और जीवनशैली में सबसे प्रमुख है।

नेपाल के प्रमुख शहर और उनकी विशेषताएं:- 

काठमांडू- (संस्कृति/राजनीति) नेपाल की राजधानी और सबसे बड़ा शहर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों, ऐतिहासिक दरबार स्क्वायर और जीवंत संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।

पोखरा - नेपाल की 'पर्यटन राजधानी' के रूप में प्रसिद्ध, जो फेवा झील और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला के शानदार दृश्यों के लिए जाना जाता है।

ललितपुर/पाटन - काठमांडू के पास स्थित, जो अपनी ललित कलाओं, वास्तुकला और प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता है।

भरतपुर -: चितवन नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध, जो नेपाल के सबसे प्रमुख व्यावसायिक और चिकित्सा केंद्रों में से एक है।

जनकपुर- मधेश प्रांत की राजधानी और एक पवित्र धार्मिक शहर, जो माता सीता के जन्मस्थान और जानकी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

बिराटनगर - देश के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक बड़ा औद्योगिक और आर्थिक केंद्र।

लुंबिनी - भगवान बुद्ध का जन्मस्थान, जो एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ स्थल है।

बीरगंज  - भारत-नेपाल सीमा पर एक प्रमुख व्यापारिक शहर।

धरान - कोशी प्रांत का एक प्रमुख शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्र।

बुटवल - लुंबिनी प्रांत में स्थित एक तेजी से विकसित होता हुआ व्यावसायिक शहर।

काठमांडू नेपाल की राजधानी :- 

राजधानी काठमाण्डू मे मनोरंजक दृश्य, लुभाने बाज़ार और रात को चमकीले कैसिनो ऐसा लगता था, मानो ये शहर कभी सोता ही नहीं। काठमांडू नेपाल की सांस्कृतिक राजधानी और यहां का बेहद आकर्षक शहर है। काठमांडू शब्द का अर्थ है "लकड़ी का घर" या "काष्ठ का मंदिर"। मूल अर्थ (शाब्दिक): काठ + मांडू = लकड़ी का मंदिर या मंडप।यह संस्कृत के शब्द 'काष्ठमण्डप' (काष्ठ = लकड़ी, मण्डप = मचान/घर) का अपभ्रंश है, जो दरबार स्क्वायर में स्थित एक ही पेड़ की लकड़ी से बने प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर का नाम है। इसका पुराना नाम कांतिपुर (शहर-ए- रोशनी) के नाम से जाना जाता था। इसे कांतिपुर (प्रकाश का शहर) भी कहा जाता था। यह शहर नेपाल का एक ऐसा स्थान है जो यहां आने वाले पर्यटकों को बेहद रोमांचित करता है। माना जाता है कि यह शहर 723 ईस्वी में राजा गुणकामदेव द्वारा बसाया गया था। यह शहर सदियों से नेवार संस्कृति का केंद्र रहा है और अपने ऐतिहासिक मंदिर (विशेषकर काष्ठमंडप) के कारण "काठमांडू" कहलाया। यह नाम स्वयं काष्ठमंडप से उत्पन्न हुआ है, जो गुरु गोरखनाथ द्वारा दान किए गए एक पवित्र साल के पेड़ से निर्मित एक मंडप है। यह राजाओं के लिए नहीं, बल्कि समुदाय के लिए बनाया गया था, एक ऐसा स्थान जहाँ लोग इकट्ठा हो सकें, आपस में मिल-जुल सकें और अपनापन महसूस कर सकें।

काठमांडू एक ऐसा शहर है जिसमे 1.5 मिलियन से अधिक लोगों का घर है। यह शहर 1400 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जो पूरे साल यहां आने वाले यात्रियों को आनंदमय वातावरण देता है। काठमांडू, अपने मठों, मंदिरों और आध्यात्मिकता के साथ एक शांति वाली जगह है। शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ यात्रियों को अन्य पर्यटन स्थलों से अलग अनुभव करवाता है। काठमांडू में बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म के साथ-साथ शहर के धार्मिक परिदृश्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है । दोनों धर्म वास्तव में काफी सामंजस्य पूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में हैं, और दैनिक जीवन के कई पहलुओं में उनकी प्रथाओं और प्रभावों का मिश्रण देखने को मिलता है।

पोखरा :- 

पोखरा शहर अपनी झीलों की वजह से बहुत प्रसिद्ध है इसलिए आप यहाँ पहुँच कर झील के किनारे होटल में कमरा ले लें।  अगर आप सुबह पहुँचे हैं तो कुछ देर आराम करने के बाद पैदल ही शहर की यात्रा करने निकल सकते हैं। फेवा झील यहाँ की सबसे मशहूर और लम्बी झील है। झील में घूमने के लिए आपको वहाँ ₹400 में नाव मिल जाएगी जो इस खूबसूरत झील की सुन्दरता और ठहराव दोनों का अनुभव करवाएगी। सारंग्कोट और शांति स्तूपा पोखरा के आस पास बहुत मशहूर हैं तो अगर आपके पास वक़्त हो तो आप 1-2 दिन वहाँ रुक कर बाकि जगह भी घूम सकते हैं।

नेपाल की यात्रा :- 

भारतीय नागरिक बिना वीजा के, वैध पहचान पत्र ( मतदाता पहचान पत्र या पासपोर्ट) के साथ सड़क या हवाई मार्ग से नेपाल की यात्रा कर सकते हैं। नेपाल की यात्रा करते समय निम्न बातों का पालन करना चाहिए- 

1.यात्रा और दूरी के हिसाब से नकदी रखे।  सिक्के तो होने ही चाहिए । सारे पैसे एक ही पॉकेट या पर्स में न रखे।

2. समान कम से कम रखे। जरूरत के अनुसार खरीद लें।

3.पानी हमेशा अपने पास रखे और शरीर में ग्लूकोज लेवल बनाए रखने वाले खाने जैसे कि चॉकलेट, मीठे बिस्कुट जरूर रखे।

4. मोबाइल को पूरी तरह से इंटरनेशन पैक के साथ चार्ज रखे। सिर्फ मोबाइल के भरोसे न रहे ।अपने पारिवरिक सदस्यों एवं कुछ मित्रो के नंबर याद रखे ।

5.साथ मे सेनेटाइजर एवं टिश्यू पेपर भी रखे ।

6.यात्रा में निकलने से पहले अपने बस/ट्रैन/ फ्लाइट की सूचना अपने किसी जानकार को अवश्य दे । यदि अकेले हो तो इसकी जानकारी किसी अनजान लोग या सहयात्री को न दे । 

7.यात्रा के समय बोरियत से बचने के लिए अपनी रुचि अनुसार किताब, फिल्मे या गेम अपने साथ रखे ।

डॉक्यूमेंट्स क्या क्या रखें :- 

नेपाल जाने से पहले निम्न लिखित डॉक्यूमेंट्स तैयार रखें- 

भारत से नेपाल यात्रा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि आपको वीज़ा की ज़रूरत नहीं है। आपको नेपाल घूमने के लिए अपना पासपोर्ट, कुछ पासपोर्ट साइज़ की फ़ोटो और अपना वोटर आई.डी. तैयार रखें। अगर आप विदेशी मुद्रा के बारे में सोच रहे हैं तो यहाँ भी आप फ़ायदे में हैं। नेपाल में भारतीय रुपया चलता है तो जहाँ तक हो सके ₹100 के भारतीय नोट लेकर जाएँ। अगर आपके पास एसबीआई का एटीएम कार्ड है तो आप नेपाल के एस बी आई बैंक से पैसे भी निकल सकतें हैं।

भारत से नेपाल तक कैसे पहुँचे- 

वैसे तो नेपाल तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। आप दिल्ली से काठमांडू की हवाई यात्रा कर सकते हैं पर ये आपके लिए महंगी होगी। अगर आप रोड यात्रा करना चाहते हैं तो आपको दिल्ली से नेपाल के लिए सीधे बस भी मिलेगी पर ये यात्रा 30 घंटे लम्बी होगी, इसलिए सबसे सस्ता और सरल रास्ता होगा कि आप उत्तर प्रदेश के गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे और वहाँ से भारत नेपाल बॉर्डर सोनौली के लिए ट्रेन की टिकट ले लें। अगर आप बड़े ग्रुप में कई साथियों के साथ घूमने गए हैं तो आप जीप या कैब से भी गोरखपुर से सोनौली तक पहुँच सकते हैं। गोरखपुर से भारत नेपाल बॉर्डर 248 कि.मी. की दूरी पर है जहाँ पहुँचने में आपको 6-7 घंटे का वक़्त लगेगा।

सोनौली पहुँचने के बाद आपके पास दो रास्ते होंगे। पहले सोनौली से काठमांडू तक का जो वहाँ से 285 कि.मी. की दूरी पर है और दूसरा सोनौली से पोखरा का जो वहाँ से 148 कि.मी. पर है। सुझाव है कि आप पोखरा की ओर जाएँ। पोखरा और काठमांडू कुल मिलाकर एक जैसे ही हैं बस पोखरा में यात्रियों की भीड़ कम होती है तो आपको बेहतर अनुभव मिलेगा। साथ ही पोखरा काठमांडू से हर मायने में किफायती है।

भारत और नेपाल के बीच संबंध :- 

भारत और नेपाल के बीच पुरातन संबंध सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से "रोटी-बेटी के रिश्ते" (वैवाहिक और रोटी-रोजी) पर आधारित हैं। सदियों से साझा हिंदू-बौद्ध परंपराएं, खुली सीमाएं (1950 की संधि) और रामायण काल से चला आ रहा सीता-राम का संबंध दोनों देशों को अटूट रूप से जोड़ता है। लुम्बिनी (बुद्ध का जन्मस्थान) और पशुपतिनाथ (नेपाल) तीर्थयात्रा इस सांस्कृतिक कड़ी के प्रमुख स्तंभ हैं।  भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म में समान विश्वास रखते हैं। नेपाल के जनकपुर (माता सीता का जन्मस्थल) और भारत के अयोध्या के बीच पौराणिक संबंध हैं। वहीं, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोधगया में हुआ था। 

दोनों देशों के बीच लगभग 1,850 किमी लंबी खुली सीमा है। इस सीमा के आर- पार नेपाली और भारतीय नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं, जो इन संबंधों की अद्वितीयता को दर्शाता है। दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ रिश्ते और नातेदारी है, जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है। प्राचीन समय (कीरात काल) से ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध रहे हैं।आधुनिक काल में, 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने इन ऐतिहासिक संबंधों को एक औपचारिक आधार प्रदान किया। यद्यपि, कुछ सीमा विवाद (जैसे कालापानी) समय-समय पर चर्चा का विषय बनते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच के गहरे सांस्कृतिक और आत्मीय संबंध हमेशा अटूट रहे हैं।

कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों में छूट:- 

भारत-नेपाल व्यापार संधि 1996 के अनुसार, दोनों देश प्राथमिक उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंधों से पारस्परिक छूट देते हैं, लेकिन औद्योगिक उत्पादों पर भारत नेपाल को विशेष छूट देता है जो गैर-पारस्परिक है। 

नेपाल के '100 NPR वाले नियम' को सख्ती से लागू करने पर भारत काउंटर- ड्यूटी या नए प्रतिबंध लगा सकता है, जैसा कि हालिया चाय निर्यात पर सख्त नियमों से संकेत मिला है।नेपाल सरकार द्वारा भारत से 100 नेपाली रुपये (लगभग 65 भारतीय रुपये) से अधिक मूल्य के सामान पर सख्त कस्टम ड्यूटी लगाने के '100 वाले नियम' के जवाब में भारत सरकार ने काउंटर कदम उठाने का संकेत दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि यह नियम सीमावर्ती व्यापार और 'रोटी-बेटी' के रिश्ते को नुकसान पहुंचा रहा है, जिसके जवाब में भारत नेपाल से आने वाले सामानों पर समान या कठोर टैरिफ लगा सकता है।

भारत के संभावित काउंटर नियम :- 

भारत नेपाल बॉर्डर पर आने वाले नेपाली व्यापारियों और यात्रियों के लिए 100 भारतीय रुपये से अधिक के हर सामान पर 10-50% कस्टम ड्यूटी लगा सकता है। इसके अलावा, नेपाली नंबर वाली गाड़ियों पर सालाना 30 दिनों से ज्यादा प्रवेश पर प्रतिदिन 2000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम नेपाल के भंसार महाशुल्क एक्ट का सीधा जवाब होगा, जो नेपाल के निर्यात जैसे चाय, जड़ी-बूटियां और हस्तशिल्प को प्रभावित करेगा। 

नेपाल को होने वाला आर्थिक नुकसान

इससे नेपाल को सालाना 11-13 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारी कमी आएगी, क्योंकि नेपाली लोग सस्ते भारतीय सामान जैसे किराना, दवाइयां और कपड़े खरीदना बंद कर देंगे। सीमावर्ती इलाकों में रोजगार प्रभावित होगा, छोटे व्यापारी और दैनिक मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। नेपाली अर्थव्यवस्था पहले से ही भारत पर निर्भर है, ऐसे में महंगाई बढ़ने और स्थानीय उत्पादों की कमी से आम जनता को 20-30% ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। 

बालेन शाह सरकार का यह नियम घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने का दावा करता है, लेकिन भारत के जवाबी कदम से नेपाल की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नुकसान हो सकता है। दोनों देशों के बीच बातचीत से विवाद सुलझने की उम्मीद है। 

नेपाल की राजनीति इस समय एक अहम मोड़ पर खड़ी है। बालेन शाह, जो हाल ही में छात्र आंदोलनों की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए, अब खुद उसी जनभावना के दबाव में नजर आ रहे हैं।

सरकार बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि दो मंत्रियों—जिसमें गृह मंत्री भी शामिल हैं—को इस्तीफा देना पड़ा। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार के भीतर स्थिरता की कमी है और फैसलों को लेकर दबाव बढ़ रहा है। खासतौर पर छात्र संघ से जुड़े मुद्दों ने युवाओं में नाराज़गी पैदा कर दी है, जो कभी बालेन के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे।

भारत-नेपाल सीमा से लगे इलाकों में हो रहे विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि असंतोष सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी फैल रहा है। यही वो वर्ग है जिसने बदलाव की उम्मीद में बालेन शाह को सत्ता तक पहुंचाया था।

भारतीय सामान पर लगाया गया टैक्स नियम वापस हुआ :- 

नेपाल सरकार ने भारतीय सामान पर लगाया गया सख्त टैक्स नियम वापस ले लिया है। भारी घरेलू विरोध के बाद उसे यू-टर्न लेना पड़ा है। दरअसल अप्रैल 2026 में बालेन शाह के नेतृत्व में नियम सख्ती से लागू किए गए थे, जिनके तहत भारत से 100 नेपाली रुपये से ज्यादा का सामान लाने पर ड्यूटी लग रही थी, जो कुछ मामलों में 80% तक पहुंच रही थी। सीमा पर जांच इतनी कड़ी थी कि छोटे सामान जैसे - चिप्स के पैकेटभी जब्त किए जा रहे थे। विरोध बढ़ने पर सरकार ने अब फैसला वापस ले लिया।


लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183


Friday, May 1, 2026

नेपाल का चितवन राष्ट्रीय उद्यान और थारू सांस्कृतिक केंद्र✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल का पहला राष्ट्रीय उद्यान है। जिसे पूर्व में रॉयल चितवन राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना जाता था । इस उद्यान का मुख्य द्वार निकटतम शहर भरतपुर से 10 किलोमीटर दूर स्थित है । यह राष्ट्रीय उद्यान बागमती प्रांत के चितवन, मकवानपुर, परसा और नवलपरासी क्षेत्रों में राप्ती, नारायणी और रियू जैसी बड़ी नदियों से घिरा हुआ है। यह नेपाल का पहला और सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है । इस उद्यान की यात्रा के लिए, भरतपुर से टांडी होते हुए सड़क मार्ग से प्रवेश किया जा सकता है।भरतपुर हवाई अड्डे पर प्रतिदिन उड़ानें उपलब्ध होती हैं ।
राष्ट्रीय उद्यान :- 
वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निर्धारित क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान नेपाल के मध्य तराई क्षेत्र में स्थित है , जो जैव विविधताओं से समृद्ध है । उद्यान का मुख्यालय कसारा में स्थित है, जहाँ से सभी प्रशासनिक कार्य संचालित होते हैं। इसकी ऊँचाई निचली नदी घाटी में 100 मीटर (330 फीट) से लेकर चुरे पहाड़ियों में 815 मीटर (2,674 फीट) तक है ।19वीं शताब्दी तक, यह उद्यान वनों का हृदय स्थल है।
विकास क्रम :- 
1950 के दशक तक, दक्षिणी नेपाल से काठमांडू की यात्रा इतनी कठिन थी कि वन मार्गों का उपयोग करने वाले यात्री बाघों, भालुओं, गैंडों और चीतों का शिकार करने के लिए महीनों तक वहीं डेरा डाले रहते थे। इस समय तक, चितवन के वन और घास के मैदान 2,600 वर्ग किमी (1,000 वर्ग मील) तक फैल चुके थे , जो लगभग 800 गैंडों का आवास प्रदान करते थे। 1951 तक, चितवन घाटी सर्दियों के दौरान नेपाल के शासक वर्ग का लोकप्रिय शिकारगाह था।
मध्य पहाड़ियों के गरीब किसान जब कृषि योग्य भूमि की तलाश में चितवन घाटी में आए, तो उन्होंने जंगलों को साफ करके बस्तियाँ बसा लीं, और वन्यजीवों का अवैध शिकार व्यापक हो गया। 1957 में, देश का पहला संरक्षण कानून गैंडों और उनके आवासों की रक्षा पर केंद्रित था। 1959 में, एडवर्ड प्रिचर्ड गी ने एक सर्वेक्षण किया जिसमें उन्होंने राप्ती नदी के उत्तर और दक्षिण में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए दस साल की परीक्षण अवधि की सिफारिश की। 
1960 के दशक के अंत तक, डीडीटी का उपयोग करके 70% जंगलों को साफ कर दिया गया था और हजारों लोग वहां बसने लगे थे, जिससे गैंडों की आबादी घटकर 95 रह गई थी। गैंडों की संख्या में इस भारी गिरावट और बढ़ते अवैध शिकार ने सरकार को चितवन के सभी हिस्सों में गश्त करने के लिए 130 सशस्त्र कर्मियों और सुरक्षा चौकियों के एक नेटवर्क से युक्त एक गैंडा गश्ती इकाई स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
चितवन के एक बाद के सर्वेक्षण के बाद, 1963 में उन्होंने सिफारिश की। वन्यजीव संरक्षण सोसायटी और प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ दोनों इस क्षेत्र को दक्षिण की ओर विस्तारित करें। गैंडों के अवैध शिकार को रोकने के लिए, चितवन राष्ट्रीय उद्यान को 1970 में नामित किया गया था और शुरू में 1973 में इसका क्षेत्रफल 544 वर्ग किमी ( 210 वर्ग मील) था। 
राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित :- 
बाद में 2030 बी.एस. 1973 ई में इसे राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित कर दिया गया। 
1977 में, पार्क का विस्तार करके इसे वर्तमान 932 वर्ग किमी (360 वर्ग मील) क्षेत्र में फैला दिया गया। 1997 में, नारायणी -राप्ती नदी प्रणाली के उत्तर और पश्चिम तथा पार्क की दक्षिण-पूर्वी सीमा तथा भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच 766.1 वर्ग किमी (295.8 वर्ग मील) का एक बफर जोन जोड़ा दिया गया। वर्तमान समय में इसका क्षेत्रफल 952.63 वर्ग किलोमीटर है। यह राष्ट्रीय उद्यान 1984 से विश्व धरोहर सूची में शामिल कर दिया गया है।
विविध जीव जन्तु:- 
हर साल हजारों पर्यटक इस राष्ट्रीय उद्यान में आते हैं। राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 70 प्रतिशत वन क्षेत्र में साल के जंगल हैं। यहां एक सींग वाला गैंडा पाया जाता है, जिसे विश्व में दुर्लभ माना जाता है। यहां 605 एक सींग वाले गैंडे हैं। यहां 96 अत्यंत दुर्लभ तेंदुए भी पाए जाते हैं। इसी प्रकार, यहां हाथी, गौरी गाय, जंगली भालू, तेंदुए, रतुवा, चीतल, लगुना, जरायो, चौसिंगे और बंदर सहित 60 से अधिक प्रकार के स्तनधारी जीव पाए जाते हैं। इस पार्क में घड़ियाल, मगर मगरमच्छ और अजगर सहित सरीसृप और उभयचर भी पाए जाते हैं। यह पार्क प्रवासी और स्थानीय पक्षियों की 546 से अधिक प्रजातियों का भी घर है। यहां विभिन्न प्रकार के कीड़े और टिड्डे भी पाए जाते हैं।
 यहां स्थित बिसहजरी झील को 2003 में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। कीचड़ और पानी वाली जगह को आर्द्रभूमि कहते हैं। बिसहजरी झील में मोर सहित रंग-बिरंगे पक्षियों का झुंड भी देखा जा सकता है। इस पार्क में वाल्मीकि आश्रम और विक्रम बाबा जैसे धार्मिक स्थल संरक्षित हैं। 
घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र:- 
यहां घड़ियाल मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र है। वहां आप छोटे मगरमच्छों को धूप और ठंडक में पलते-बढ़ते देख सकते हैं। आप पिंजरे में बंद एक तेंदुए को भी देख सकते हैं। आपको कई हाथी भी देखने को मिलेंगे। खोरसौर स्थित हाथी प्रजनन केंद्र में छोटे हाथियों को पलते-बढ़ते देखकर आनंद लिया जा सकता है।
पक्षी विहार:- 
राप्ती नदी के किनारे चखेवा पक्षियों के प्रवासी जोड़े देखे जा सकते हैं। पर्यटक अक्सर सूर्यास्त देखने के लिए सौराहा जाते हैं। यहाँ मोर नाचते हुए, पशु पानी पीते हुए, घड़ियाल नदी पार करते हुए और हाथी नहाते हुए देखे जा सकते हैं। पार्क से जुड़े राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण ट्रस्ट में आप चंचल गैंडों के बच्चों के साथ खेल सकते हैं। यहाँ आप हाथी, जीप या नाव की सवारी का आनंद ले सकते हैं। आप जंगल में घूमते हुए हिरणों और मृगों के झुंड देख सकते हैं और उनके साथ तस्वीरें ले सकते हैं। आप स्थानीय बोते, मांझी, मुसहर, चेपांग और थारू समुदायों द्वारा संरक्षित झीलों को भी देख सकते हैं।  
जलवायु:- 
चितवन में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है, जहाँ पूरे वर्ष भारी वर्षा होती है। यह क्षेत्र मध्य हिमालयी जलवायु में स्थित है, इसलिए मानसून का मौसम जून के मध्य में शुरू होता है और सितंबर के अंत में समाप्त होता है। इस 14-15 सप्ताह की अवधि के दौरान, इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 2500 मिमी से अधिक वर्षा होती है।पार्क के भीतर सबसे बड़ी झील, देवी झील, साथ ही तामर झील, मुंडी झील और पार्क के भीतर की बड़ी झीलें, लामिकताल, सूख रही हैं। 
पशु पक्षी:- 
यह पार्क विशेष रूप से अपने एक सींग वाले गैंडे और तेंदुए के लिए प्रसिद्ध है । इस पार्क में स्तनधारियों की 43 प्रजातियाँ, पक्षियों की 450 प्रजातियाँ, जलीय जीवों और सरीसृपों की 45 प्रजातियाँ और मछलियों की 100 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख स्तनधारियों में हिरण , चीतल , बंदर और लंगूर शामिल हैं ।
पर्यटन :- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। इसके दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं: पूर्व में सौराहा और पश्चिम में मेघाउली गाँव। यह पार्क सफारी, पैदल यात्रा और जीप सफारी के लिए भी लोकप्रिय है। 
सौराहा गांव:- 
सौराहा नेपाल के केंद्रीय विकास क्षेत्र के नारायणी जोन के चितवन जिले में स्थित एक गाँव है । यह आकर्षक पर्यटन स्थल भी है। चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। 
सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक केंद्र के कार्यक्रम:- 
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित इस क्षेत्र में कई होटल, लॉज, रिसॉर्ट और रेस्तरां हैं। यह पार्क और सामुदायिक वनों में हाथी और जीप सफारी के लिए भी प्रसिद्ध है। सौराहा में थारू जनजाति सांस्कृतिक परम्परा को जीवित रखने और प्रचार प्रसार करने के लिए विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक नाट्य बाद्य प्रोग्राम नियमित रूप से आयोजित होते रहते हैं। जिसके मुख्य विशेषता सांस्कृतिक नृत्य: थारू समुदाय का परम्परागत नृत्य यथा : लाठी नाच, झुमरा, और अन्य स्थानीय नाच का प्रदर्शन किया जाता है। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम: New Sauraha Tharu Cultural House के वातानुकूलित प्रेक्षागृह में प्रत्येक शाम को परम्परागत नृत्य और संगीतको कार्यक्रम होता है। इनका रहन सहन और पहनावा थारू भेषभुषा और परम्परागत रूप से होता है। खानपान और परंपरागत रूप से होता है। इसका उद्देश्य थारू जाति को पहिचान, भाषा, साहित्य, और मौलिक संस्कृति का संरक्षण और प्रवर्द्धन करना होता है।
लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
मोबाइल नंबर +91 9412300183


Wednesday, April 29, 2026

नेपाल के पोखरा का गुप्तेश्वर महादेव का विलक्षण गुफा मंदिर ✍️आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


               (पोखरा नेपाल से )

नेपाल के पोखरा में गुप्तेश्वर गुफा प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है । यह एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमय स्थल है जो ज़मीन से लगभग 150 मीटर नीचे स्थित यह गुफा हरे-भरे चट्टान से गिरते झरने का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है । दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी गुफाओं में से एक , इस गुफा में मंदिर और एक विशाल खुला क्षेत्र भी है। “गुप्तेश्वर" का अर्थ ही है "छिपे हुए ईश्वर" महादेव के रूप में जाना जाता है। गुप्तेश्वर मंदिर पोखरा का एक धार्मिक और पर्यटक स्थल है । माना जाता है कि यह गुफा 16वीं शताब्दी में खोजी गई थी। 
स्थानीय लोगों को यहाँ घास काटते समय एक गुफा मिली, जिसके अंदर भगवान शिव का एक प्राकृतिक रूप से बना शिवलिंग मिला। मन्दिर के गेट के अंदर एक विशाल मार्किट भी बनी हुई है, जहां पूजा सामग्री, मूर्ति ,माला, शंख ,शालिग्राम और खाने - पीने, किताब आदि जनरल सामग्री महंगे मूल्य में मिलती है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में प्रवेश करने की जगह अनेक जगह साइनेज और बिजली की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। शिवजी को समर्पित ये मंदिर एयरपोर्ट से शांति स्तूप जाने वाले रास्ते पर स्थित है।
चित्ताकर्षक प्रवेश द्वार :- 
मंदिर में जाने के लिये रोड पर ही गेट बना हुआ है। सड़क पर ही दोनों तरफ दो मुख्य दृश्य बहुत ही आकर्षक है। सड़क से मुड़ते ही बाएं तरफ पीले रंग स्वर्ण जैसा नन्दी की सुन्दर प्रतिमा चित्त को आकर्षित करती है। नन्दी के सामने शिवलिंग भी सुशोभित है। सड़क से मुड़ते ही दाएं तरफ पीले रंग में एक ऊंचे आधार पर कमल, उस पर कच्छप उसके ऊपर एक आकर्षक रंगीन पीले स्वर्णिम स्तम्भ में सर्प ,ॐ ,डमरू, त्रिशूल और सर्प की आकृति भी बहुत मनोहारी ढंग से समुद्र मंथन का दृश्य अंकित है। मंदिर के सड़क के प्रवेश द्वार के स्तम्भ पर गंगा यमुना और कई अन्य मूर्तियां चित्त को आकर्षित करती है। उस पर नाम अंकित भी है और इलेक्ट्रानिक रूप में फ्लैस होता है। उस गेट पर ऊपर शंकर जी की प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती है।

मंदिर में प्रवेश के लिये महंगा शुल्क है। एक आदमी के लिये 100 नेपाली रूपये / 65 भारतीय रुपए का टिकट लगता है। मंदिर में जाने के लिये गोल- गोल घुमावदार सीढिया बनी थी और नीचे गुफा में एंट्री करने पर कई जगह सिर झुकाना पडता है कि कहीं पर गुफा की कम उंचाई की वजह से टकरा ना जाये । पत्थरों से रिस रिस कर अमरनाथ के गुफा जैसे अनेक शिवलिंग भी छोटे छोटे रूप में देखे जा सकते हैं।
विलक्षण गुफा और उसके भित्ति चित्र गुफा में अंदर जाने पर पहले कामधेनु गाय की प्रतिमा आती है । अंदर आगे जाने पर थोडी बडी जगह आती है जहां पर शिव लिंग स्थापित है ।सामने आकर्षक भव्य 
शिवलिंग है। और उसके पीछे आधार में पाषाण का विशाल शिव लिंग है जो वासुकीनाथ केअसंख्य फ़णों द्वारा आच्छादित है। इस पूरी गुफा में पानी टपकता रहता है और थोडी और आगे जाने पर गुफा संकरी होती जाती है और फिर सीढिया आती हैं । काफ़ी नीचे उतरने के बाद सीधी लंबाई में आगे बढ़ते जाने पर काफ़ी आगे जाने के बाद बहुत बड़ा झरना दिखाई देता है।इस गुफा में तेज और बहते पानी का शोर वातावरण को मनोहारी बना देता है ।
ये डेविस फाल ही है जो कि सडक के दूसरे किनारे की ओर से आ रहा है पर गुफा में इतने गहरे तक उतरकर उस फाल को गिरते देखना एक नया अनुभव होता है जो अब तक कहीं नही देखा और ना ही ये कैमरे में समा सकता है। बरसात के मौसम में ये विकराल रूप में जब इस जगह पर गिरता होगा तो और भी ज्यादा सुंदर लगता होगा । 

लेखक:
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
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