Sunday, July 26, 2026

अयोध्या का बार बार बदलता रहा स्वरूप✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


 पुरातन अयोध्या :-

विराट पुरुष विष्णु के शरीर में सातों मोक्षदायिनी पुरियों की स्थिति बताई गई है। इनमें अयोध्या को श्री हरि का मस्तक कहा गया है -

विष्णोः पाद अवन्तिकां गुणवतीं मध्ये च कांचीपुरीं ,

नाभौ द्वारवतीं तथा च हृदये मायापुरीं पुण्यदाम् । 

ग्रीवामूलमुदाहरन्ति मथुरां नासाग्रे वाराणसी-

मेतद्वेदविदो वदन्ति मुनयोऽयोध्यापुरीं मस्तकम् ।।

विराट् पुरुष भगवान् विष्णु के चरणों में उज्जैन है, मध्य भाग में कांचीपुरी , नाभि में द्वारकाधाम है, हृदय में हरिद्वार है, ग्रीवा के मूल में मथुरा है। नासिकाग्र में काशीपुरी और मस्तक में अयोध्यापुरी का वास है जो अवध धाम कहलाता है। समस्त लोकों के द्वारा जो वन्दित है, ऐसी अयोध्यापुरी भगवन् आनन्द कन्द के समान चिन्मय अनादि है। यह आठ नामों - हिरण्या, चिन्मया, जया, अयोध्या, नन्दिनी, सत्या, राजिता और अपराजिता से पुकारी जाती है।

भगवान् की यह कल्याणमयी राजधानी साकेतपुरी आनन्द कन्द भगवान् श्रीकृष्ण के गोलोक का हृदय है। यहाँ पैदा होने वाले प्राणी अग्र जन्मा कहलाते हैं, जिनके चरित्रों से समस्त पृथ्वी के मनुष्य शिक्षा ग्रहण करते हैं। मानव सृष्टि सर्वप्रथम यहीं पर हुई थी।

यह अयोध्यापुरी सभी बैकुण्ठों (ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, विष्णुलोक, गोलोक आदि तथा सभी देवताओं के लोक बैकुण्ठ) का मूल आधार है तथा जो प्रकृति है (जिससे  दुनियां पैदा हुई है) उससे भी श्रेष्ठ है। सदरूप है, वह ब्रह्ममय है, सत, रज, तम इन तीनों गुणों में से रजोगुण से रहित है।अयोध्या पुरी दिव्य रत्न रूपी खजाने से भरी हुई है और सर्वदा नित्यमेव श्रीसीताराम जी का विहार स्थल है।

स्वयमागता स्वयमागता स्वयमागतेति साकेत साकेत संज्ञा सविता ।

अर्थात् स्वयं (आप से आप) आविर्भूत होने के कारण अयोध्या को साकेत कहते हैं।

अयोध्यापुरी देवताओं की नगरी है। यह आठ चक्र और नौ द्वारों से शोभित है। इसमें स्वर्ण के समान हिरण्यमय कोष है जो दिव्य ज्योति से पूरी तरह घिरा है। कलिकाल में मथुरा, द्वारका और अयोध्या इन तीनों पुरियों का विशेष महत्व कहा गया है-

मथुरा द्वारकाऽयोध्या कलिकाले पुरीत्रयम्। धर्मार्थकामदं भूप मोक्षदं हरिवल्लभम् ॥

मथुरा को विष्णु जी का जन्म स्थान और द्वारका को क्रीड़ा स्थान होने के कारण धन्य बताया है परन्तु सभी कामनाओं को देने वाली अयोध्या जी को धन्यों का भी  धन्य बताया है जहाँ स्वयं श्रीराम का पालन हुआ है।

धन्या सा मथुरा लोके यत्र जातो हरिः स्वयम् ।

द्वारका सफला लोके क्रीडितं यत्र विष्णुना।

धन्यानामपि सा पूज्या अयोध्या सर्वकामदा। 

या स्वयं रामदेवेन पालिता धर्मबुद्धिना ॥

प्रभास और कुरुक्षेत्र में सौ वर्षों से जो फल मिलता है, आधे पल भर अयोध्या में बसते हुए पुरुषों को वही फल मिलता है।

प्रभासे च कुरुक्षेत्रे यत्फलं वत्सरैः शतैः। वसतां निमिषार्द्धन ह्ययोध्यायां च तद्भवेत्। 

पद्मपुराण में अयोध्या का नामकरण अयुद्ध शब्द से बताया है। "नहियोद्धुम शक्या सा अयोध्या" जिसका अर्थ है जहां युद्ध न किया जा सके उसका नाम अयोध्या है। कुछ लोग इसका नामकरण इस प्रकार भी करते हैं कि "न कैश्चित् योधितुं शक्या इति अयोध्या", जिसको युद्ध में जीता न जा सके वह अयोध्या है।

स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के अनुसार- 

अकारो ब्रह्म च प्रोक्तं यकारो विष्णुरुच्यते धकारो रुद्ररूपश्च अयोध्यानाम राजते ।।

अयोध्या में ‘अ’कार ब्रह्मा ‘य’कार विष्णु और ‘ध’कार रुद्र तीनों का समन्वित स्वरूप है। अयोध्या का महात्म्य पार्वती जी से कहते हुए शिव जी कहते हैं - अयोध्या सब नदियों में श्रेष्ठ श्री सरयू जी के दाहिने किनारे पर बसी हुई है। इसके महात्म्य का वर्णन करने की क्षमता शेष और शारदा में भी नहीं है। 

अयोभिः विष्णुब्रह्मशिवैः ध्यायते

 नित्यं स्मर्यते या सा अयोध्या”।

ब्रह्मा जी बुद्धि से, विष्णु जी चक्र से और शिव जी त्रिशूल से सदा अयोध्या की रक्षा करते रहते हैं। समस्त उत्पातक इससे युद्ध नहीं कर सकते। इसलिए इसे अयोध्या कहते हैं, इसका मतलब इसे युद्ध में जीता नहीं जा सकता । 

सर्वोपपातकैर्युक्तैर्ब्रह्महत्यादिपातकैः।। नायोध्या शक्यते यस्मात्तामयोध्यां ततो विदुः ।

विष्णोराद्या पुरी येयं क्षितिं न स्पृशति द्विज विष्णोः सुदर्शने चक्रे स्थिता पुण्यकरी क्षितौ ।

केन वर्णयितुं शक्यो महिमाऽस्यास्तपोधन यत्र साक्षात्स्वयं देवो विष्णुर्वसति सादरः।। 

समस्त उपपातकों के साथ ब्रह्महत्या आदि महापातक इस पुरी से युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए इसे अयोध्या कहते हैं। यह भगवान् विष्णु की आदिपुरी है और विष्णु के सुदर्शन चक्र पर स्थित है। अतएव पृथ्वी पर अतिशय पुण्य दायिनी है। इस पुरी की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहां साक्षात विष्णु आदर पूर्वक निवास करते हैं।

अयोध्या परमं स्थानमयोध्या परमं महत् अयोध्यायाः समा काचित्पुरी नैव प्रदृश्यते।

पतितपावनी सरयू के बारे में कहा गया है : - 

दक्षिणाच्चरणांगुष्ठान्निः सृता जाह्नवी हरेः। वामांगुष्ठान्मुनिवराः सरयूर्निर्गता शुभा।

तस्मादिमे पुण्यतमे नद्यौ देवनमस्कृते। एतयोः स्नानमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति।।

भगवान विष्णु के दाहिने चरण के अँगूठे से गङ्गा जी और बायें चरण के अँगूठे से शुभकारिणी सरयू जी निकली हैं इसीलिए ये दोनों नदियाँ परम पवित्र तथा सभी देवताओं से वन्दित हैं। इनमें स्नान करने मात्र से मनुष्य ब्रह्म हत्या का नाश कर डालता है।

तुलसीदास जी ने अयोध्या के वैभव का वर्णन करते हुए कहा है श्रीनारद जी और सनकादि ऋषि-मुनि श्रीराम जी का दर्शन करने प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और नगर की भव्यता देख वैराग्य भूल जाते हैं।

नारदादि सनकादि मुनीसा। 

दरसन लागि कोसलाधीसा ।।

दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । 

देखि नगरू बिरागु बिसरावहिं ।।

जातरूप मनि रचित अटारीं। 

नाना रंग रुचिर गच ढारीं ।। 

पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। 

रचे कँगूरा रंग रंग बर ।।

एक जनश्रुति यह भी है -

गंगा बड़ी गोदावरी 

तीरथ राज प्रयाग, 

सबसे बड़ी अयोध्या नगरी, 

जहँ राम लियो अवतार।

अयोध्या भगवान राम के बाएं पैर के अंगूठे से निकली पावन सरिता ‘सरयू’ के दक्षिण तट पर बसा हुआ है।  इसकी स्थापना सूर्य पुत्र मनु ने स्वयं किया था । वाल्मीकि अपने रामायण के प्रारंभ में भी अयोध्या की महान नगरी का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं –

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता ! 

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् !!

(बालकाण्ड 5/6 )


भावार्थ:अयोध्या नगरी जो तीनों लोको में विख्यात थी और इसका निर्माण स्वयं मनु ने अपने हाथों से किया था। उन्होंने सर्व प्रथम अपनी राजधानी बनाया था। उस समय इसकी राजधानी 120 मील कोस और चौड़ाई 30 मील 48 कोस थी।यह एक अत्यंत समृद्ध और आधुनिक शहर था। इसमें विशाल राजसभाएँ थीं जो हमेशा पानी से तर रहती थीं और उन पर सुगंधित फूल बिखरे रहते थे। शहर द्वारों और मेहराबों से घिरा हुआ था। सभी घरों के अग्रभाग सुंदर थे। इमारतें कीमती रत्नों से जड़ी हुई थीं। कई इमारतें बहुमंजिला थीं, कुछ सात मंजिला तक थीं। पानी प्रचुर मात्रा में था और गन्ने के रस जैसा स्वाद वाला था। कई वैदिक विद्वान और ऋषि यहाँ निवास करते थे और वातावरण अत्यंत शांत और निर्मल था। यहाँ सभी प्रकार के कुशल शिल्पकार थे। यह आम, अनार और अंगूर के बागों और पेड़ों से घिरा हुआ था। यह एक विशाल दीवार से सुदृढ़ रूप से किलेबंद था जो शहर को घेरे हुए आभूषण की तरह सुंदर थी। इसके आगे एक चौड़ी खाई थी जो शत्रुओं को प्रवेश करने से रोकती थी। यह शहर मशीनरी, हथियारों और तोपों से सुसज्जित बुर्जों से सुरक्षित था। यहाँ घोड़े, ऊँट, गाय और गधे थे।

स्कन्द पुराण के अनुसार यह सुदर्शन चक्र पर बसी हुई है। भूतशुद्धितत्त्व के अनुसार यह श्री राम जी के धनुषाग्र पर बसी हुई है 

श्रीरामधनुषाग्रस्था अयोध्या सा महापुरी।’

इस अयोध्या पर ईक्ष्वाकु वंश के महाराजा दिलीप, रघु, नहुष , अरण्य , दशरथ और भगवान श्रीराम ने शासन किया था, जो महाराजा इक्ष्वाकु के 62 पीढ़ियों के बाद अवतरित हुए थे। भगवान राम के समय इस नगरी का घेरा 84 कोस में था। इसके चारों दिशाओं में 4पर्वत : पूर्व में श्रृंगारादि,   पश्चिम में नीलाद्रि , उत्तर में मुक्ताद्रि और दक्षिण में मणिकूट (मणि पर्वत) स्थित है। प्रत्येक के आश्रित तीन तीन कुल बारह वन थे।

अयोध्याधाम के बारह वनः-

१. श्रृङ्गारवन (आज का श्रृंगार हाट)

२. विहारवन

३. तमालवन

४. रासालवन

५. चम्पकवन

६. चन्दनवन

७. दिव्यपारिजातवन

८. अशोकवन

९. प्रमोदवन (आज भी अस्तित्व में है)

१०. कदम्बवन

११. अनन्तवन

१२. श्रीनागकेशरवन।

इन बारहों वनों में युगल सरकार विहार करते थे। होली आदि का उत्सव इन्हीं वनों में होता था। यह वर्णन जानकी चरितामृत नामक ग्रन्थ में वर्णित है।

कई बार बसी अयोध्या :-

अयोध्या को कई बार बसाया गया था। पहली बार स्वयं वैबस्वत मनु ने इसे बसाया था। श्रीरामचन्द्रजी जब अपनी प्रजा सहित अपने दिव्यधाम को चले गये तो अयोध्या उजाड़ हो गई। जिसकी चर्चा रामायण के उत्तरकाण्ड में उल्लिखित है कि महाराज ऋषभ ने भी इसे पुनः बसाया था । राम जी के पुत्र कुश द्वारा भी इसे बसाने का उल्लेख मिलता है। कालान्तर में यह पुनः उजड़ गई और किवदन्ती यह कहती है कि विक्रमादित्य ने भी इसे फिर से बसाया था।

राज्य की वैभवशीलता :-

वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की     वैभवशीलता का विस्तार से वर्णन है । जिस राज्य के राजा साक्षात सूर्य वंश से थे, जिसके राजाओं से स्वयं इंद्र भी सहायता मांगने आते थे, जिस राज्य के राजा नहुष को इंद्र का सिंहासन मिला हुआ था , जिस राज्य के महान राजा रघु के नाम पर रघुवंश पड़ा जिसमें साक्षात श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रुप में जन्म लिया। उसका नाम अयोध्या है। प्राचीन भारतीय संस्कृत भाषा के महाकाव्यों, जैसे रामायण और महाभारत में अयोध्या नामक एक पौराणिक शहर का उल्लेख है, जो राम सहित कोसल के प्रसिद्ध इक्ष्वाकु राजाओं की राजधानी थी। बाद में इसे साकेत भी कहा जाता था परंतु न तो इन ग्रंथों में, न ही वेदों जैसे पहले के संस्कृत ग्रंथों में साकेत नामक शहर का उल्लेख है।

श्रीराम के बाद की अयोध्या :-

श्रीराम के बाद की जानकारी कालिदास रचित महान ग्रंथ रघुवंशम् में दी गई है, जिसके अनुसार श्री राम के स्वर्गारोहण के पश्चात उनके सबसे बड़े पुत्र कुश ने कुशावती को, दूसरे पुत्र लव ने शरावती को, लक्ष्मण के पुत्रों ने करावती , भरत के पुत्र पुष्कल ने पुष्करावती (पेशावर) और शत्रुघ्न के पुत्रों ने मथुरा को अपनी राजधानियां बनाकर शासन करना प्रारंभ किया था । इस प्रकार अयोध्या पूरी तरह से रघुवंश की अधिष्ठात्री होते हुए भी रघुवंशी राजाओं से विहीन हो गई थी।

शिव जी द्वारा अयोध्या का परिचय :-

भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की यह नगरी सरयू नदी के दाहिने किनारे पर बसी है। यहां स्थित श्री हनुमान मन्दिर ‘हनुमान गढ़ी 'के नाम से विख्यात है। वह राजद्वार के सामने ऊँचे टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। श्री रुद्रयामलोक्त श्री अयोध्या माहात्म्य के श्लोक 30, पृष्ठ 87 पर श्रीशङ्कर जी पार्वती जी से श्री हनुमान जी का स्थान के बारे में इस प्रकार कहते हैं -

राजद्वारे हनूमान् वै वायुपुत्रस्तु तिष्ठति ।

तथा तिष्ठति सुग्रीवो दक्षिणे च हनूमतः ॥ 

श्रीशंकरजीने कहा - ( रामकोटके प्रधान) राजद्वार पर वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका स्थान है तथा श्रीहनुमान जी के दक्षिण भाग में सुग्रीव जी का स्थान है ।

पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भगवान राम का स्वर्गारोहण त्रेतायुग के अंत में हुआ था। वाल्मीकि रामायण में दिए गए ग्रहों की स्थिति के आधार पर आधुनिक शोध कर्ताओं (जैसे पुष्कर भटनागर और नीलेश ओक) का मानना है कि यह घटना लगभग 7000 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 9,000 वर्ष पहले) हुई थी। 

कुश ने भी बसाई थी अयोध्या :-

रघुवंशम के अनुसार एक बार कुश अपने महल में सोये हुए थे तो रात के अंधेरे में एक दिव्य स्त्री उनके सामने आई । कुश ने उनका परिचय पूछा तो उस स्त्री ने कहा,  वह अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्री राम के जाने के बाद अयोध्या पूरी तरह से स्वामी विहीन हो गई है और उसकी दुर्दशा हो गई है । अयोध्या की देवी ने कुश से अयोध्या वापस आने और उसे पुनः बसाने के लिए निवेदन किया था। कुश वापस आते हैं और फिर से अयोध्या को बसाते हैं। एक बार फिर अयोध्या अपने वैभव में लौट जाती है । 

कुश सरयू नदी के अंदर रहने वाले नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदनी से विवाह करते हैं और न्यायपूर्वक शासन चलाने लगते हैं । इंद्र के बुलावे पर कुश दुर्जय राक्षस को मारने के लिए इंद्र के साथ जाते हैं । इंद्र की सहायता मे कुश दुर्जय को मार डालते हैं लेकिन वो भी वीरगति को प्राप्त होते हैं। ऐसे में कुश के पुत्र अतिथि को अयोध्या का राजा बनाया जाता है। अतिथि भी न्यायपूर्वक शासन करते हैं। अतिथि के बाद कई अन्य राजा आते हैं जो अयोध्या वैसी ही वैभवशाली रहती है ।

राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के “साकेत” महाकाव्य के सर्ग 1 के पृष्ठ 2 पर अयोध्या का वैभव इस प्रकार व्यक्त किया है -

स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ

किंतु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?

वह मरों को मात्र पार उतारती;

यह यहीं से जीवितों को तारती।।

है अयोध्या अवनि की अमरावती,

इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती।

वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,

और नंदन वन बने आराम हैं।।

रघुवंश (सूर्यवंश) का अंतिम शासक का नाम सुमित्र था। पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उन्हें चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 362 ईसा पूर्व) में मगध के राजा महापद्मनंद ने पराजित किया था, जिसके बाद उन्हें अयोध्या छोड़नी पड़ी थी।

पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों से पता चलता है कि वर्तमान अयोध्या का स्थल ईसा पूर्व पाँचवीं या छठी शताब्दी तक एक शहरी बस्ती के रूप में विकसित हो गया था।  इस स्थल की पहचान प्राचीन साकेत शहर के स्थान के रूप में की गई है।

अयोध्या के सबसे व्यापक ऐतिहासिक विवरणों में से एक एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय के इतिहासकार हंस बैकर द्वारा लिखित है। बैकर ने अपने शोध को अपनी पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ अयोध्या : फ्रॉम द 7वीं सेंचुरी बी सी टू द मिडिल ऑफ द 18वीं सेंचुरी' (1986) में प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि अयोध्या भारत के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है, जो काशी जितना ही प्राचीन है। प्राचीन काल में इसे 'साकेत' के नाम से जाना जाता था। इसका उदय भारतीय इतिहास के 'द्वितीय शहरीकरण काल' के दौरान हुआ, जो 600 - 200 ईसा पूर्व  का  है। 

यह स्पष्ट नहीं है कि पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आस पास मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा कोसल पर विजय प्राप्त करने के बाद साकेत का क्या हुआ। अगली कुछ शताब्दियों तक शहर की स्थिति के बारे में ऐतिहासिक स्रोतों की कमी है। यह संभव है कि शहर माध्यमिक महत्व का एक वाणिज्यिक केंद्र बना रहा, लेकिन मगध के राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित नहीं हुआ, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र में स्थित थी। 

लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, राजा अजातशत्रु ने कोसल को मगध में मिला लिया था। समय के साथ, साकेत मौर्य साम्राज्य के अधीन एक छोटा व्यापारिक नगर बन गया। यहाँ मिले पुरातात्विक अवशेषों से पता चलता है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में यहाँ कई बौद्ध संरचनाएँ बनाई गई थीं। मौर्य काल में, साकेत एक द्वितीयक महत्व का व्यापारिक केंद्र था।

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान शहर में कई बौद्ध इमारतों का निर्माण किया गया होगा। ये इमारतें संभवतः अयोध्या में वर्तमान मानव निर्मित टीलों पर स्थित थीं।  अयोध्या में खुदाई के परिणाम स्वरूप एक बड़ी ईंट की दीवार की खोज हुई है, जिसे पुरातत्वविद् बी बी लाल ने एक किले की दीवार के रूप में पहचाना है। यह दीवार संभवतः तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की अंतिम तिमाही में बनाई गई थी। 

लगभग 170 ईसा पूर्व, मौर्य साम्राज्य के पतन के दौरान, साकेत पर आक्रमण हुआ। इस आक्रमण में इंडो-ग्रीक राजा डेमेट्रियस ने भाग लिया, जो पाटलिपुत्र को जीतने के उद्देश्य से निकला था। इस जानकारी का प्रमाण महान संस्कृत व्याकरणविद् ऋषि पतंजलि से मिलता है।

मौर्योत्तर काल में, साकेत एक छोटा स्थानीय राज्य था जो मगध के शुंगों को कर देता था। तीन पुराणों : युग पुराण, वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण - में साकेत के 'सात शक्ति शाली राजाओं' के शासनकाल का वर्णन है, जिन्होंने उत्तर भारत से यवनों के पीछे हटने के बाद इस क्षेत्र पर शासन किया था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, साकेत पुष्यमित्र शुंग के शासन के अधीन आ गया प्रतीत होता है। 

साकेत के इन सात राजाओं के ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में मिले देव राजाओं के सिक्कों से प्राप्त प्रमाणों से होती है। इन सिक्कों से कम से कम पांच राजाओं के नाम ज्ञात होते हैं, जो फुलदेव, वायुदेव, विशाखदेव, पथदेव और धनदेव थे। धनदेव के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने वहां एक राज्यपाल नियुक्त किया था।

दूसरी शताब्दी ईस्वी में, साकेत कुषाण साम्राज्य के अधीन आ गया था, जिसके शासक सम्राट कनिष्क थे। हाल तक, साकेत पर कुषाण शासन के प्रमाण यहाँ पाए गए बड़ी संख्या में सिक्कों के भंडार और कुषाण कालीन मूर्तियों के टुकड़ों पर आधारित थे। लेकिन 1993 में, अफगानिस्तान के रबातक गाँव में एक कुषाणकालीन शिलालेख मिला, जिसमें राजा कनिष्क ने गर्व से अपने शासन की घोषणा की थी।


विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या ढाई हजार वर्ष पूर्व पुनः बसाया गया था :- 

यह शहर तब तक वीरान रहा जब तक उज्जैन के राजा विक्रम इसकी खोज में नहीं आए और इसे फिर से स्थापित नहीं किये। विक्रमादित्य का समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग 57 ईसा पूर्व) माना जाता है। भारतीय परंपरा और 'विक्रम संवत' के अनुसार, उन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में 57 ईसा पूर्व में अपने शासन काल की शुरुआत की थी। उनका समय 57 ईसा पूर्व से 19 ईस्वी तक रहा। उन्होंने प्राचीन खंडहरों को ढकने वाले जंगलों को कटवा डाला था, वहां रामगढ़ किला और 360 मंदिर बनवाए थे। 

विक्रमादित्य कई गुप्त राजाओं की एक उपाधि थी, और जिस राजा ने राजधानी को अयोध्या में स्थानांतरित किया, उसे स्कंदगुप्त के रूप में पहचाना जाता है।  बेकर का सिद्धांत है कि अयोध्या की ओर कदम पाटलिपुत्र में गंगा नदी की बाढ़, पश्चिम से हूणों की प्रगति को रोकने की आवश्यकता और स्कंदगुप्त की खुद की तुलना राम से करने की इच्छा रही। जिनका इक्ष्वाकु वंश पौराणिक अयोध्या से संबंध जुड़ा हुआ था।

गुप्त काल:अयोध्या का पुनरुद्धार और 'विष्णु अवतार' :-

कुषाण शासन के बाद गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ, जिसमें साकेत ने अपनी भव्यता की नई ऊंचाइयों को छुआ।गुप्त साम्राज्य में, तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध से साकेत का स्वर्ण युग शुरू हुआ।गुप्तों के शासनकाल में, उपमहाद्वीप में हिंदू धर्म का भी व्यापक पुनरुद्धार हुआ। इसी दौरान भारत के सबसे पुराने पत्थर के मंदिरों का निर्माण हुआ। गुप्त शासकों ने 'दिव्य राजाओं' की अवधारणा को प्रोत्साहित किया, जैसा कि सम्राट समुद्रगुप्त के इलाहाबाद शिलालेख से स्पष्ट होता है, जिसमें उन्हें "पृथ्वी पर निवास करने वाले देवता" के रूप में वर्णित किया गया है, जो केवल मानव जाति के रीति-रिवाजों का पालन करने के लिए ही नश्वर रूप धारण करते हैं।

गुप्त साम्राज्य के दौरान, 'दिव्य राजाओं' की अवधारणा के साथ-साथ, पृथ्वी पर देवताओं के अवतारों का सिद्धांत भी लोकप्रियता हासिल करने लगा था।गुप्त सम्राटों के शासनकाल के दौरान, पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में, साकेत को 'अयोध्या' के नाम से जाना जाने लगा और इसे त्रेता युग के इक्ष्वाकु राजाओं की राजधानी के रूप में मान्यता मिली। साकेत को 'अयोध्या' के रूप में संदर्भित करने वाला सबसे पुराना ज्ञात संदर्भ शहर से लगभग 24 किमी दूर करमदंडा गाँव में मिले एक शिलालेख में मिलता है। 435 ईस्वी के इस शिलालेख में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ईस्वी) के मंत्री पृथ्वीसेना द्वारा 'अयोध्या के ब्राह्मणों' को दिए गए दान का उल्लेख है । इस प्रकार, गुप्त काल से पहले इस शहर को 'अयोध्या' के नाम से नहीं जाना जाता था।

सम्राट कुमारगुप्त प्रथम, वाकाटक वंश के राजा रुद्रसेन द्वितीय की पत्नी प्रभावतीगुप्त के सौतेले भाई थे। इतिहासकार हंस बैकर के अनुसार, प्रभावतीगुप्त विष्णु के राम अवतार के सबसे प्रारंभिक ज्ञात भक्तों में से एक थे। ऐसा माना जाता है कि सम्राट स्कंदगुप्त (लगभग 455-467 ईस्वी) ने पाटलिपुत्र में भीषण बाढ़ आने पर अपनी राजधानी अयोध्या स्थानांतरित कर दी थी। गुप्त सम्राटों ने साकेत नगर को 'भगवान राम की अयोध्या' के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहन दिया। उनका मानना था कि इस पवित्र भूमि से जुड़ाव उन्हें धार्मिक वैधता प्रदान करेगा।

चौथी शताब्दी के आसपास, यह क्षेत्र गुप्तों के नियंत्रण में आ गया, जिन्होंने ब्राह्मणवाद को पुनर्जीवित किया।वायु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण प्रमाणित करते हैं कि प्रारंभिक गुप्त राजाओं ने साकेत पर शासन किया था। वर्तमान अयोध्या में गुप्तकालीन कोई पुरातात्विक परत नहीं खोजी गई है, हालाँकि यहाँ बड़ी संख्या में गुप्तकालीन सिक्के मिले हैं। यह संभव है कि गुप्त काल के दौरान, शहर में बस्तियाँ उन क्षेत्रों में स्थित थीं जिनकी अभी तक खुदाई नहीं हुई है। खोतानी-कुषाण आक्रमण के दौरान जिन बौद्ध स्थलों को विनाश का सामना करना पड़ा था, वे वीरान बने हुए प्रतीत होते हैं। 

पाँचवीं शताब्दी के चीनी यात्री फैक्सियन का कहना है कि उसके समय में "शा-ची" में बौद्ध इमारतों के खंडहर मौजूद थे। एक सिद्धांत शा-ची की पहचान साकेत से करता है, हालाँकि यह पहचान निर्विवाद नहीं है। यदि शा-ची वास्तव में साकेत है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि पांचवीं शताब्दी तक, शहर में अब कोई समृद्ध बौद्ध समुदाय या कोई महत्वपूर्ण बौद्ध भवन नहीं था जो अभी भी उपयोग में था। 

गुप्त काल के दौरान एक महत्वपूर्ण विकास साकेत को इक्ष्वाकु वंश की राजधानी, अयोध्या के प्रसिद्ध शहर के रूप में मान्यता देना था। कुमार गुप्त प्रथम के शासनकाल के दौरान जारी 436 ईस्वी के करमदंड (कर्मदंड) शिलालेख में, अयोध्या को कोसल प्रांत की राजधानी के रूप में नामित किया गया है, और कमांडर पृथ्वीसेन द्वारा अयोध्या के ब्राह्मणों को दान देने का रिकॉर्ड है। बाद में गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र से अयोध्या स्थानांतरित कर दी गई। 

छठी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के पतन और मिहिरकुल के नेतृत्व में हूणों के आक्रमणों के कारण अयोध्या का राजनीतिक और आर्थिक शक्ति केंद्र के रूप में पतन हो गया, और यह शक्ति केंद्र कन्नौज में स्थानांतरित हो गया, जो वर्तमान लखनऊ के निकट लगभग 250 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। लेकिन भगवान राम और रामायण से अयोध्या का गहरा संबंध इसे एक प्रमुख तीर्थ स्थल बना चुका था और इस प्रकार इसे श्रावस्ती, कौशांबी, राजगीर और वैशाली जैसे कई प्राचीन शहरों के पतन से बचा लिया।

विष्णु पूजा और राम भक्ति का उदय :-

पांचवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी तक, साकेत/अयोध्या भारत के सबसे महत्वपूर्ण वैष्णव धार्मिक केंद्रों में से एक था । ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से पहले, अयोध्या के अधिकांश मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित थे, जिनमें भगवान राम की मूर्तियाँ भी थीं। 

10वीं शताब्दी के मंदिर:-

कन्नौज के राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, उत्तरी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 10वीं शताब्दी  में अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र पर मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन था। जिसकी राजधानी कन्नौज थी और अयोध्या उनके साम्राज्य का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस अवधि के बाद, 11वीं शताब्दी के अंत  में इस क्षेत्र पर कन्नौज के गहडवाल वंश के राजा चंद्रदेव का आधिपत्य हो गया था। जिन्होंने सरयू नदी के किनारे चंद्रहरि या चंद्रदेव को समर्पित एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था। 

दिल्ली सल्तनत का काल :-

सन् 1193 ईस्वी में, कन्नौज के राजा जयचंद को मुहम्मद गोरी ने पराजित किया, जिसके बाद अयोध्या दिल्ली सल्तनत के अधीन आ गया। हैरानी की बात यह है कि उस समय अयोध्या में नष्ट हुआ एकमात्र ज्ञात मंदिर प्रसिद्ध आदिनाथ जैन मंदिर था।

दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ ही भारत में भक्ति आंदोलन का भी उदय हुआ। कर्मकांडों से दूर हट कर, भक्ति प्रचारकों ने व्यक्तिगत ईश्वर के प्रति भक्ति की अवधारणा का प्रचार किया। इसी दौरान विष्णु के राम और कृष्ण अवतार अत्यंत लोकप्रिय हुए, क्योंकि आम लोगों के लिए उनसे जुड़ना आसान था। छोटे-छोटे मंदिरों से आगे बढ़कर, पूरे भारत में विष्णु के राम अवतार को समर्पित मंदिर बनने लगे। ऐसा माना जाता है कि 12वीं शताब्दी ईस्वी तक अयोध्या में भगवान राम को समर्पित तीन मंदिर बनाए गए थे, हालांकि आज उनके कोई निशान नहीं मिलते।

अयोध्या में कई मंदिर मुगल शासन के दौरान नष्ट कर दिए गए थे। सन् 1528-29 ईस्वी में मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ने एक मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह 'बाबरी मस्जिद' का निर्माण करवाया। मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में भी यहां कई मंदिर ध्वस्त किए गए थे।

अवध के नवाबों के अधीन अयोध्या :-

मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में असहिष्णुता और विनाश का युग समाप्त हुआ और अवध के अधिक सहिष्णु नवाबों का शासन स्थापित हुआ। औरंगजेब की मृत्यु के बाद, कई प्रांतीय राज्यपाल अर्ध-स्वतंत्र हो गए। इनमें अवध के शिया नवाब भी शामिल थे। दिलचस्प बात यह है कि 'अवध' नाम ही 'अयोध्या' शब्द से लिया गया है।

नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्याबाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए। 

जब 1855 में स्थानीय सुन्नी नेता मौलवी अमीर अली अमेथावी के नेतृत्व में इस्लामी कट्टरपंथियों ने अयोध्या के मंदिरों पर कब्जा करने का प्रयास किया, तो अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने इसे दबाने के लिए अपनी सेना भी भेजी, और अमीर अली अमेथावी और उनके 300 समर्थक बाराबंकी जिले में हुई एक लड़ाई में मारे गए।

दुर्भाग्य से, इस घटना ने अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम कलह के बीज बो दिए, और इसी दौरान कुछ हिंदू साधुओं ने प्रतिशोध में अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर हमला कर दिया। 1883 में, हिंदू साधुओं के एक अन्य समूह ने बाबरी मस्जिद के पास चबूतरे पर एक मंदिर बनाने का प्रयास किया। मामला अदालतों में गया और 1886 में मुकदमा खारिज कर दिया गया।

1946 में, हिंदू महासभा की एक शाखा, अखिल भारतीय रामायण महासभा (एबीआरएम) ने बाबरी मस्जिद की भूमि पर अधिकार के लिए आंदोलन शुरू किया। 1949 में, गोरखनाथ मठ के संत दिग्विजय नाथ एबीआरएम में शामिल हो गए और उन्होंने नौ दिनों तक लगातार रामचरित मानस का पाठ आयोजित किया। पाठ के अंत में, हिंदू कार्यकर्ताओं ने मस्जिद में घुसकर राम और सीता की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि मूर्तियाँ 'चमत्कारिक रूप से' मस्जिद के अंदर प्रकट हुई हैं। 

1980 के दशक तक, भाजपा ने एल.के. आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में 'राम जन्मभूमि आंदोलन' को पुनर्जीवित किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप पूरे भारत में दंगे भड़क उठे। 1992 में, कम से कम 75,000 हिंदुओं की एक संगठित भीड़ ने अयोध्या की एक मस्जिद - बाबरी मस्जिद पर हमला किया और भारतीय अधिकारियों की तमाशा देखते हुए हथौड़ों, लाठियों और फावड़ों से उसे ध्वस्त कर दिया। इस हमले के बाद, कई भारतीय शहरों में अंतर धार्मिक दंगे भड़क उठे और हिंसा के अंत तक एक हजार से अधिक लोग मारे गए। अयोध्या और पूरे देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बदलाव आए। इस घटना के तुरंत बाद देश भर में दंगे भड़क उठे और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह की सरकार सहित चार अन्य प्रदेशों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया। विध्वंस के कुछ ही घंटों बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और प्रमुख नेताओं पर मुकदमे दर्ज कर लिए गए।

2002 में उस समय हिंसा फिर से भड़क उठी जब भाजपा ने राम मंदिर की नींव रखने के लिए अयोध्या तक हजारों हिंदू राष्ट्रवादियों का जुलूस निकाला था। इस घटना के बाद, अयोध्या से लौट रही हिंदुओं की एक ट्रेन पर बम से हमला किया गया; हमले का आरोप मुसलमानों पर लगाया गया, जिससे भाजपा-नियंत्रित गुजरात राज्य में और अधिक दंगे भड़क उठे। लगभग 2,000 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे। कई लोगों ने भाजपा पर हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। हालांकि, राम मंदिर निर्माण के भाजपा के वादे राजनीतिक रूप से कारगर साबित होते रहे। 2002 में गुजरात के भाजपा नेता नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री चुने गए। परिस्थितियां काफी बदली और अयोध्या के पुनरुद्धार के अनुकूल हुईं। 

2003 का पुरातात्विक सर्वेक्षण:-

पुरातत्वविदों ने अदालत के निर्देशानुसार एक सर्वेक्षण शुरू किया ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या उस स्थान पर कोई हिंदू मंदिर मौजूद था। सर्वेक्षण में मस्जिद के नीचे एक मंदिर के साक्ष्य मिले हैं, लेकिन कई पुरातत्वविद और मुसलमान इन निष्कर्षों पर विवाद कर रहे हैं।

जून 2009 लिबरहान आयोग की रिपोर्ट :-

मस्जिद विध्वंस के 17 साल बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में भाजपा और उसके वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कई नेताओं को मस्जिद विध्वंस के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। आडवाणी सहित कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं पर मुकदमा चला और कुछ को सजा भी मिली और कुछ मुख्य टाइटल शूट के बाद छोड़ भी दिए गए।

तीन बराबर भागों में देने का निर्णय :-

दशकों तक चले टाइटल शूट मुकदमे के बाद, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अयोध्या की भूमि को तीन बराबर भागों में विभाजित करने का अधिकार तीनों दावेदारों को है, हालांकि हिंदुओं को वह भाग मिला जहां मस्जिद स्थित थी और उन्हें मंदिर बनाने का अधिकार भी प्राप्त हुआ। 

सर्वोच्च न्यायालय ने पूरा हिंदुओं को दिया :-

हिंदू और मुस्लिम दोनों याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थल पूरी तरह से हिंदुओं को सौंप दिया ।अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया गया।भारत के अयोध्या में ध्वस्त बाबरी मस्जिद के स्थल पर भगवान राम को समर्पित एक हिंदू मंदिर, राम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।

2019 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने भूमि का स्वामित्व एक हिंदू ट्रस्ट को दे दिया था। 5 फरवरी, 2020 को मंदिर के निर्माण और प्रबंधन की देखरेख के लिए 15 सदस्यीय श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना की गई है।भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हिंदू देवता राम के भव्य मंदिर का उद्घाटन किया है। 5 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री ने आधारशिला रखी। मोदी ने मंदिर की आधारशिला रखी और इसकी पट्टिका का अनावरण किया।

22 जनवरी, 2024 को मंदिर का अभिषेक किया गया। कुछ भागों का निर्माण अभी बाकी होने के बावजूद, राम मंदिर का अभिषेक हो चुका है।अयोध्या में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया जिसमें प्रमुख हस्तियां, हिंदू आध्यात्मिक नेता और मोदी शामिल हुए।इस समारोह में मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है और राम की प्रतिमा को भवन के गर्भगृह में स्थापित किया जाता है। यह मंदिर मंगलवार से आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए खुल गए हैं। मंदिर का उद्घाटन धार्मिक विजय के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को हिंदू-प्रधान राष्ट्र में बदल रहा है। मुस्लिम पक्ष को अयोध्या से 18 किमी दूरी पर मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ दूसरी जगह जमीन दे दिया गया । जहाँ 'मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह मस्जिद' का निर्माणाधीन है और अस्पताल और शैक्षणिक केंद्र बनाने की भी योजना है।


लेखक :

आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

वॉट्सप नं.+91 9412300183.




Monday, July 20, 2026

अयोध्या की तरह कई बार बदली हनुमान गढ़ी की तस्वीर, हनुमत पीठ का रोचक दास्तान :✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

अमरावती के वैभव को मात देती अयोध्या :-

अयोध्या का मतलब जिसे युद्ध में जीता न जा सके। इसकी स्थापना स्वयं सूर्य पुत्र मनु ने की थी। वाल्मीकि अपने रामायण के प्रारंभ में भी अयोध्या की महान नगरी का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं –

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता ! 

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् !! (१-५-६ )

भावार्थ:अयोध्या नगरी जो तीनों लोको में विख्यात थी और इसका निर्माण स्वयं मनु ने अपने हाथों से किया था। ऐसे अयोध्या पर ईक्ष्वाकु वंश के महाराजा दिलीप, रघु, नहुष , अरण्य , दशरथ और भगवान श्री राम ने शासन किया । वाल्मीकि रामायण में अयोध्या की वैभव शीलता का विस्तार से वर्णन है । जिस राज्य के राजा साक्षात सूर्य वंश से थे । जिसके राजाओं से स्वयं इंद्र भी सहायता मांगने आते थे । जिस राज्य के राजा नहुष को इंद्र का सिंहासन मिला था । जिस राज्य के महान राजा रघु के नाम पर रघुवंश पड़ा जिसमें साक्षात श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रुप में जन्म लिया। 

राम के बाद की अयोध्या :-

श्री राम के बाद की जानकारी कालिदास रचित महान ग्रंथ रघुवंशम् में दी गई है, जिसके अनुसार श्री राम के स्वर्गारोहण के पश्चात उनके सबसे बड़े पुत्र कुश ने कुशावती को, दूसरे पुत्र लव ने शरावती को, लक्ष्मण के पुत्रों ने करावती को, भरत के पुत्र पुष्कल ने पुष्करावती (पेशावर) को और शत्रुघ्न के पुत्रों ने मथुरा को अपनी राजधानियां बना शासन करना प्रारंभ किया था । इस प्रकार अयोध्या पूरी तरह से रघुवंश से विहीन हो गई थी।

रामकोट ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण:-

अयोध्‍या का रामकोट मोहल्ला धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यह वही स्थल है जहां भगवान श्रीराम अपने परिवार और परिकर सहित निवास करते थे। इसीलिए इस स्थान को “राम का किला” या “रामकोट” भी कहा जाता था। उन्होंने यहां एक विशाल किला बनवाया था जिसके मध्य भाग में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की स्थापना हुई है । 

अपनी ऊँची स्थलाकृति और एक तरफ सरयू नदी से घिरे रामकोट को अयोध्या के निवासियों द्वारा भगवान राम का किला माना जाता है। यह क्षेत्र अयोध्या के तीन सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों को समेटे हुए हैं - राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी और भव्य कनक भवन, सबका संबंध रामायण काल से है। अयोध्या धाम का वर्तमान रेलवे स्टेशन भी रामकोट में स्थित है।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस स्थान की रचना अत्यंत वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण से की गई थी, ताकि यह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहे।रामकोट आज भी लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। अयोध्या के पुराने लोग इस क्षेत्र की नित्य परिक्रमा करते थे। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान श्रीराम के पारिवारिक जीवन और उनके आदर्श शासन की झलक पाते हैं। प्रभु श्रीराम यहीं अपनी कचहरी लगाया करते थे और अयोध्या सहित पूरे अवध प्रदेश की प्रजा की समस्याओं का समाधान करते थे।

शिव जी द्वारा संकेत :-

भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की यह नगरी सरयू नदी के दाहिने किनारे पर बसी है। यहाँ का सबसे प्रमुख श्री हनुमान मन्दिर ‘हनुमान गढ़ी 'के नाम से विख्यात है। वह राजद्वार के सामने ऊँचे टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। श्री रुद्रयामलोक्त श्री अयोध्या माहात्म्य के श्लोक 30, पृष्ठ 87 पर श्रीशङ्कर जी पार्वती जी से श्री हनुमान जी का स्थान के बारे में इस प्रकार कहते हैं 

राजद्वारे हनूमान् वै वायुपुत्रस्तु तिष्ठति ।

तथा तिष्ठति सुग्रीवो दक्षिणे च हनूमतः ॥ 

श्रीशंकरजीने कहा - ( रामकोटके प्रधान) राजद्वार पर वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका स्थान है तथा श्रीहनुमान जी के दक्षिण भाग में सुग्रीव जी का स्थान है ।



हनुमान गढ़ी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

हनुमान गढ़ी (अयोध्या) एक बहुत ही प्राचीन और ऊँचे टीले पर स्थित मंदिर है। यह स्थान प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण के वध के बाद भगवान रामचंद्र सीता देवी और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए थे। हनुमानजी अपने परम प्रिय भगवान की सेवा करने के लिए अयोध्या में ही रुक गए। उन्हें हनुमान गढ़ी में निवास दिया गया।हनुमान भगवान राम से एक पल भी दूर नहीं रह सकते थे। 

पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, भगवान राम का स्वर्गारोहण त्रेतायुग के अंत में हुआ था। वाल्मीकि रामायण में दिए गए ग्रहों की स्थिति के आधार पर आधुनिक शोध कर्ताओं (जैसे पुष्कर भटनागर और नीलेश ओक) का मानना है कि यह घटना लगभग 7000 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 9,000 वर्ष पहले) हुई थी। भगवान राम जब स्वर्गारोहण किया तो राम जी के निर्देश से हनुमान जी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमान गढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमान जी रामकोट की रक्षा करते थे।

हनुमान गुफा से होती थी अयोध्या की रखवाली :- 

वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के अनुसार, अजर-अमर हनुमान जी यहाँ एक गुफा में निवास करते थे। इन्हें 'रामकोट' का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीराम के दिव्य शासन की झलक मिलती है। 

शास्त्रों के अनुसार, जब प्रभु रामचंद्र साकेत धाम जा रहे थे, तब उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या में रहने और सूर्य और चंद्रमा के अस्तित्व के दौरान तथा भगवान राम की महिमा का गुणगान होने तक वहां शासन करने का निर्देश दिया था। उन्होंने हनुमान जी को भक्तों को पूर्णता की ओर मार्गदर्शन करने का भी निर्देश दिया था।

कुश ने फिर से बसाई थी अयोध्या :-

रघुवंशम के अनुसार एक बार कुश अपने महल में सोये हुए थे तो रात के अंधेरे में एक दिव्य स्त्री उनके सामने आई । कुश ने उनका परिचय पूछा तो उस स्त्री ने कहा,  वह अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्री राम के जाने के बाद अयोध्या पूरी तरह से स्वामी विहीन हो गई है और उसकी दुर्दशा हो गई है । अयोध्या की देवी ने कुश से अयोध्या वापस आने और उसे पुनः बसाने के लिए निवेदन किया था। कुश वापस आते हैं और फिर से अयोध्या को बसाते हैं। एक बार फिर अयोध्या अपने वैभव में लौट जाती है । 

कुश सरयू नदी के अंदर रहने वाले नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदनी से विवाह करते हैं और न्यायपूर्वक शासन चलाने लगते हैं । इंद्र के बुलावे पर कुश दुर्जय राक्षस को मारने के लिए इंद्र के साथ जाते हैं । इंद्र की सहायता मे कुश दुर्जय को मार डालते हैं लेकिन वो भी वीरगति को प्राप्त होते हैं। ऐसे में कुश के पुत्र अतिथि को अयोध्या का राजा बनाया जाता है। अतिथि भी न्यायपूर्वक शासन करते हैं। अतिथि के बाद कई अन्य राजा आते हैं जो अयोध्या वैसी ही वैभवशाली रहती है ।

राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के “साकेत” महाकाव्य के सर्ग 1 के पृष्ठ 2 पर अयोध्या का वैभव इस प्रकार व्यक्त किया है -

स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहाँ

किंतु सुरसरिता कहाँ, सरयू कहाँ?

वह मरों को मात्र पार उतारती;

यह यहीं से जीवितों को तारती।।

है अयोध्या अवनि की अमरावती,

इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती।

वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,

और नंदन वन बने आराम हैं।।

रघुवंश (सूर्यवंश) का अंतिम शासक का नाम सुमित्र था। पुराणों और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उन्हें चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 362 ईसा पूर्व) में मगध के राजा महापद्मनंद ने पराजित किया था, जिसके बाद उन्हें अयोध्या छोड़नी पड़ी थी।

विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या ढाई हजार वर्ष पूर्व पुनः बसाया गया था :- 

यह शहर तब तक वीरान रहा जब तक उज्जैन के राजा विक्रम इसकी खोज में नहीं आए और इसे फिर से स्थापित नहीं किये। विक्रमादित्य का समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग 57 ईसा पूर्व) माना जाता है। भारतीय परंपरा और 'विक्रम संवत' के अनुसार, उन्होंने शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में 57 ईसा पूर्व में अपने शासन काल की शुरुआत की थी। उनका समय 57 ईसा पूर्व से 19 ईस्वी तक रहा। उन्होंने प्राचीन खंडहरों को ढकने वाले जंगलों को कटवा डाला था, वहां रामगढ़ किला और 360 मंदिर बनवाए थे। 

स्कंद पुराण के अनुसार, करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने स्वप्नादेश प्राप्त होने के बाद अयोध्या धाम का जीर्णोद्धार कराया था। प्रयागराज से प्राप्त संकेतों के आधार पर राम जन्म भूमि सहित अन्य प्राचीन तीर्थस्थलों की पहचान की थी। राजा विक्रमादित्य ने 360 अन्य मंदिरों के साथ हनुमानगढ़ी का निर्माण करवाया था। 

10वीं शताब्दी का हनुमान मंदिर:-

कन्नौज के राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद, उत्तरी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 10वीं शताब्दी  में अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र पर मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन था। जिसकी राजधानी कन्नौज थी और अयोध्या उनके साम्राज्य का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण हिस्सा था। हनुमान गढ़ी का पुनः निर्माण इस समय भी उल्लिखित मिलता है। इस अवधि के बाद, 11वीं शताब्दी के अंत  में इस क्षेत्र पर कन्नौज के गहडवाल वंश के राजा चंद्रदेव का आधिपत्य हो गया था। जिन्होंने सरयू नदी के किनारे चंद्रहरि या चंद्रदेव को समर्पित एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था। 

इसी समय अयोध्या स्थित 'हनुमान गढ़ी' भगवान हनुमान को समर्पित एक किले के आकार में निर्मित 10 वीं शताब्दी का प्राचीन तीर्थ मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है जहाँ 76 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचा जा सकता है। इसके प्रत्येक कोने में गोलाकार किलेबंदी है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान हनुमान ने एक गुफा में निवास किया था और पूरे शहर की रक्षा की थी।

मुगल शासक औरंगजेब ने राम जन्म भूमि की भांति कहा जाता है कि हनुमानगढ़ी को तोड़वाकर वहां एक मस्जिद बनवा दिया था। उर्दू उपन्यासकार मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की पुस्तक 'फसाना -ए-इब्रत, जिसका स्रोत 'साहिफा-ए- बहादुरशाही’ है और जिसे उन्होंने 1816 ईस्वी में प्रतिरूपित किया था, में उल्लेख है कि औरंगज़ेब ने हनुमानगढ़ी मंदिर को ध्वस्त कर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। बाद में, बक्सर में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद, बैरागियों ने 1855 ईस्वी में उस भूमि पर कब्जा कर लिया, मस्जिद को हटवा दिया और भक्त हनुमान के लिए एक नया मंदिर बनवाया। कुछ मुसलमानों का मानना था कि हनुमानगढ़ी एक मस्जिद पर बनी है। इसलिए उन्होंने कई बार मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

भक्त हनुमान जी के दोनों ओर भक्तों द्वारा भेंट की गई चांदी या सोने की गदाएं रखी हुई हैं। श्री राम के नाम से अंकित चांदी की तुलसी की माला हमेशा मूर्ति को सुशोभित रखती है। भक्त हनुमान जी के पीछे सीता, राम और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं। भक्त हनुमान जी की यह मूर्ति अत्यंत शक्तिशाली है और पूरे भार हनुमान जी की एकमात्र जीवित मूर्ति मानी जाती है। मंदिर के गर्भगृह में माता अंजना देवी की गोद में विराजमानभगवान हनुमान की छह इंच की भव्य प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमा को हमेशा अनेक पुष्पमालाओं और सिंदूर से पूर्णतः सजाया जाता है। इसलिए, अधिकांश समय केवल भगवान हनुमान का नारंगी रंग का कमल नुमा चेहरा ही दिखाई देता है।

मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठते हैं। उसमें 76  सीढ़ी चढ़ने पर श्रीहनुमानजी का मन्दिर श्रीमारुति की एक और मूर्ति यहाँ है, वह केवल छः इंच ऊँची है । माना जाता है कि हर एक सीढ़ी किसी न किसी आध्यात्मिक पहलू को दर्शाती है। कुछ लोगों का कहना है कि ये 76 सीढ़ियाँ ईश्वर की ओर यात्रा में भक्ति के विभिन्न चरणों को प्रतिबिंबित करती हैं। मन्दिर बड़ा है और उसमें श्रीहनुमानजी की स्थानक मूर्ति है सदा पुष्पाच्छादित रहती है। 

स्थानीय मान्यता के अनुसार, हनुमान जी वास्तव में यहीं एक गुफा में निवास करते थे और अयोध्या तथा राम जन्मभूमि की रक्षा करते थे। कहा जाता है कि वह गुफा मुख्य मंदिर भवन के नीचे स्थित है। भक्त वास्तव में मानते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या के हनुमानगढ़ी स्थित अपने स्थान से शहर की रक्षा करते हैं ।


श्री हनुमान जी के भक्तों के लिये यह स्थान विशेष श्रद्धास्पद है। मन्दिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, उनमें साधु सन्त रहते हैं। लंका विजय के बादअयोध्या राज महल का जो स्वर्ण स्तम्भ रावण उठा ले गया था उसे भी हनुमान जी यहां लाकर स्थापित किया है। 

हनुमानगढ़ी क्षेत्र में उत्खनन भी हुआ :- 

1981-1982 ई. में अयोध्या के सीमित क्षेत्र में उत्खनन किया गया। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमान गढ़ी और लक्ष्मण घाट क्षेत्रों में हुआ था। हनुमान गढ़ी क्षेत्र से भी उत्तरी काली चमकीली मृण्भांड संस्कृति 

(लगभग 700 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच ) के अवशेष प्रकाश में आए हैं। साथ ही यहाँ अनेक प्रकार के मृतिका वलय कूप तथा एक कुएँ में प्रयुक्त कुछ शंक्वाकार ईंटें भी मिली हैं। उत्खनन से बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं, जिनमें मुख्यत: आधा दर्जन मुहरें, 70 सिक्के, एक सौ से अधिक लघु मृण्मूर्तियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कुषाण शासक वासुदेव की एक मिट्टी की मुहर (दूसरी शती ई.), इसी काल का मूलदेव का एक सिक्का तथा एक भूरे रंग की केश-विहीन जैन मृण्मूर्ति है। हनुमानगढ़ी से प्राप्त अन्य मृण्मूर्तियाँ पहली-दूसरी शताब्दी ई. पू. की हैं। ये मृण्मूर्तियाँ अहिच्छत्र, कौशांबी, पिपरहवा और वैशाली आदि क्षेत्रों से प्राप्त मृण्मूर्तियों के समान ही हैं। इस प्रकार की मृण्मूर्तियों को वासुदेवशरण अग्रवाल ने विजातीय प्रकार से अभिहित किया है।


तीन सौ वर्ष पूर्व की वर्तमान संरचना:-

हनुमान गढ़ी की स्थापना लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्रीअभयारामदास जी ने की थी। कहते हैं प्राचीन काल में यहाँ हनुमानजी का एक विशाल मन्दिर था, जिसके कालान्तरमें भग्न होने से यह स्थान एक टीले में बदल गया, जिसे हनुमान् टीला कहा जाता था; उसी स्थान पर स्वामी अभयारामदास जी द्वारा स्थापित वर्तमान मन्दिर है। आप एक सिद्ध महात्मा थे तथा हनुमानजी ने आप को साक्षात् दर्शन भी दिया था। आप ने समाज की श्रद्धा-भावना के संरक्षणार्थ पहले यहाँ श्री निर्वाणी अखाड़ा की स्थापना की और फिर यहीं श्रीहनुमानजी की विधिवत् पूजा-आराधना एवं भोग-राग की व्यवस्था मर्यादित रूप से की। 

नवाबों ने अयोध्या से महज 6 किलोमीटर दूर फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। उनके शासनकाल में, भारत के विभिन्न हिस्सों के शासकों जैसे अहिल्या बाई होलकर, जयपुर के राजा, नागपुर के भोसले आदि ने यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर और मठ बनवाए। 

अवध के नवाबों की उदारता की बड़ी बड़ी बातें मुस्लिम और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा की जाती है। 20 एकड़ या 52 बीघे भूमि का तथाकथित दान देने की बात आती है पर ऐसा हुआ है नहीं था । नवाब शुजा- उद- दौला या मंसूर अली द्वारा मालगुजारी (कर) में छूट की बात ही प्रमाणित होती है।

यह भी कहा गया है कि एक बार लखनऊ तथा फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली का पुत्र किसी भयंकर रोग से अत्यन्त पीडित हो गया। सुयोग्य वैद्यों और हकीमों के उपचारों से भी जब उसकी व्याधि नहीं मिटी, तब वह हनुमानगढ़ी के श्रीहनुमान जी की शरण में आया और अविलम्ब उसे उस भीषण रोग से मुक्ति मिल गयी। इसके प्रतिफल स्वरूप नवाब के मन में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा अंकुरित हो गयी। उसने कुछ सहयोग भी किया था। साधुओं की सुविधाके लिये विशाल इमली का बाग लगवा दिया और उसी समय श्री अभयाराम दास जी से प्रार्थना करके हनुमानजी का एक विशाल, भव्य एवं सुदृढ़ मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी हनुमान गढ़ी के नाम से विख्यात है। 

अयोध्या तथा आस-पास के कुछ जिलों के कई परिवार अपने कुल परम्परानुसार अपने बच्चों का मुण्डन और यज्ञोपवीत यहीं करवाते हैं। अयोध्या के बहुत से नेमी श्रद्धालु स्नान करके नित्य यहाँ आते हैं। हिन्दू भक्तों एवं दर्शनार्थियों के कारण यहाँ नित्य ही मेला-सा लगा रहता है। मंगलवार तथा शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि अयोध्या में युगल-सरकार की कृपा प्राप्ति के लिये हनुमान गढ़ी के श्री हनुमानजी की जितनी पूजा होती है, उतनी युगल-सरकार की भी नहीं होती।

दियारा के राजा का सहयोग :-

सुल्तानपुर की दियारा रियासत के राजा (और अन्य स्थानीय जमींदारों) ने संतों और अखाड़ों के माध्यम से मंदिर की रक्षा और इसके विस्तार (जिसे 'गढ़ी' या किले का रूप दिया गया) में आर्थिक और सैन्य सहयोग प्रदान किया था।

महाराजा मानसिंह द्वारा निपटारा :- महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई, में हुआ था। उनका शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। राज्य की सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। इनके समय में हनुमान गढ़ी विवाद हुआ था जिसका निपटारा करने पर महाराजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद मिला हुआ था। 

जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।

अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। "गुलाम हुसेन” नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनुमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर. मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गड़वा दिया जिसे “गंजशहीदाँ” कहते हैं। यह स्थल राम जन्मभूमि अधिगृहीत परिसर में स्थित था।

1855 में जब हिंदुओं ने हनुमानगढ़ी पर अधिकार कर लिया था, तब एक भीषण संघर्ष हुआ था। आज भी अयोध्या में मुस्लिम समुदाय का मानना है कि आगामी राम जन्मभूमि मंदिर से सटे पांच एकड़ का एक स्थान 'गंज-ए-शहीदान' है - हनुमान गढ़ी के बैरागियों द्वारा मारे गए मुसलमानों के सामूहिक दफन का स्थल है। जिसे 'गंज शहीदा' (शहीदों की समाधि) कहा जाता है।

मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा -


हम इश्क़ के बन्दे हैं 

मज़हब से नहीं वाक़िफ़।

गर काबा हुआ तो क्या,

बुतखाना हुआ तो क्या ?

बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारकबाद दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।

इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदत अली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पारसाहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। इस कारगुजारी के बदले बादशाह ने राजा मानसिंह को राजे- राजगान का पद दिया। राजा मानसिंह ने इसका पर्दाफाश करते हुए कूटनीति से विवाद को सुलझाया था।

इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।


वर्तमान समय की परम्परा :- 

अयोध्या के सिद्ध पीठ हनुमानगढ़ी में एक ऐसी परंपरा है, जहां के प्रमुख गद्दीनशीन किसी भी परिस्थितियों में परिसर के बाहर नहीं निकलते हैं। किसी महंत को 60 वर्ष की आयु के बाद ही गद्दीनशीन चुना जाता है। जहां प्रधानमंत्री (चार पट्टी के महंत) से लेकर राष्ट्रपति (गद्दीनशीन) का अपना कानून होता है। हनुमानगढ़ी में चार पट्टी हैं, जिसके चार महंत होते हैं और एक गद्दीनशीन यानी प्रमुख होता हैं। रामानंदी संप्रदाय के निर्माणी अखाड़े के अंतर्गत वैष्णो साधु होते हैं जो चार पट्टी में विभक्त हैं- उज्जैनिया, सागरिया, बसंती और हरिद्वारी। यह 4 महंत हनुमानगढ़ी के प्रधानमंत्री होते हैं। इनके ऊपर एक राष्ट्रपति हैं,जिसे गद्दीनशीन कहा जाता है।  हनुमानगढ़ी के प्रथम गद्दीनशीन अभयरामदास महाराज थे । हनुमानगढ़ी में वर्तमान गद्दीनशीन प्रेमदास हैं, जो 51वें गद्दीनशीन पर आसीन हैं। वर्तमान समय में सगरिया पट्टी के गद्दीनशीन बनाए गए हैं।

गद्दीनशीन का चयन प्रक्रिया:-

चार पट्टी के 3-3 लोगों का नाम अखाड़े में भेजा जाता है। अखाड़े के लोग चुनाव करते हैं कि वह व्यक्ति गद्दीनशीन बनने योग्य है या नहीं। चुनाव होने के बाद अखाड़ा पास करता है। उसके बाद बैठक होती है। बैठक में वरिष्ठ संत अखाड़े के लोग यह तय करते हैं कि कौन बनेगा गद्दीनशीन। फिर उसके बाद चुनाव होता है। तब सर्वसम्मति से गद्दीनशीन अपने आसन पर विराजमान होते हैं। गद्दीनशीन 60 वर्षों के बाद बनाए जाते हैं। जब उम्र का पड़ाव अंतिम छोर पर होता है। मोह माया तमाम चीजों से व्यक्ति दूर हो जाता है।उस समय उस व्यक्ति को गद्दीनशीन पर बैठाया जाता है ।

हनुमान जी का स्वरूप होते हैं गद्दीनशीन :-

हनुमानगढ़ी पंचायती अखाड़ा का मठ है। यहां महंत गद्दीनशीन की नियुक्ति गुरु-चेला की परंपरा पर आधारित नहीं होती है। इसका निर्णय पंचांयत अखाड़ा लेता है। उसी प्रकार चारों पट्टिओं के महंत की नियुक्ति भी पंचांयत अखाडे ही करते हैं। यहां पर सब को एक समान का अधिकार होता है। परंपरा के अनुसार गद्दीनशीन का पद संभालने के बाद हनुमानगढ़ी के अपने नियम और संविधान के अनुसार गद्दीनशीन महंत अपने अंतिम पड़ाव तक हनुमानगढ़ी के परिसर में ही रहता है। 52 एकड़ में फैले हनुमानगढ़ी का परिसर के बाहर गद्दीनशीन नहीं निकलता है। मृत्यु के बाद ही उनका शरीर परिसर के बाहर जा सकता है।गद्दीनशीन हनुमान जी की गद्दी मानी जाती है। ऐसे में उस पर आसीन होने वाले महंत को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।उस गद्दी पर आसीन होने वाले व्यक्ति का सिर्फ एक ही काम है। वह भगवान का भजन करें और आए हुए भक्तों को आशीर्वाद दे। गद्दीनशीन प्रसिद्ध सिद्ध गद्दी है। अगर गद्दीनशीन का किसी परिस्थितियों में तबीयत या कोई आरोप-प्रत्यारोप लगता है तो डॉक्टर से लेकर कोर्ट का प्रतिनिधि मंडल भी गद्दीनशीन यानी हनुमानगढ़ी परिसर में ही आएगा।गद्दीनशीन बाहर नहीं जाएगा। गद्दीनशीन पर आसीन होने के बाद महंत कि जब तक मृत्यु नहीं होती है तब तक वह गद्दी पर आसीन रहता है।



लेखक :

आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,

आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.

वॉट्सप नं.+91 9412300183.

Friday, July 17, 2026

अयोध्या के ‘हनुमानगढ़ी’ और ‘सरयूकुंज’ पर रोजा इफ्तार और नमाज पढ़ने का प्रयास हुआ था ✍️डॉ.राधे श्याम द्विवेदी


भाईचारे में धर्म विरुद्ध आचरण होते होते बचा :-

जिस मंदिर में रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया था, उसके महंत युगल किशोर शरण शास्त्री (सरजू मंदिर के महंत) हैं। उन्होंने 1976 से 1985 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में कार्य किया। इस मामले में सपा सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। योगी जी अनावश्यक रूप से सपा को कोसकर इस विवाद में घसीट रहे हैं और प्रसाद चोरी के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं! तथ्य: आज योगी जी ने अपने संबोधन में अयोध्या के हनुमानगढ़ी में पिछली सरकार के दौरान नमाज अदा करने के बारे में एक बयान दिया। इससे तीव्र राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, लेकिन हम तथ्यों पर ही टिके रहेंगे। 

उस समय 2003 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार बनी हुई थी। तत्कालीन राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बीच हिंदू-मुस्लिम संवाद और भाईचारा बढ़ाने के लिए हनुमानगढ़ी के तत्कालीन महंत ज्ञानदास ने अपने निवास पर एक रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। इसमें बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी और सहित कई मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हुए थे। 

इस अवसर पर अयोध्या में हनुमानगढ़ी मंदिर की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ने का प्रयास हुआ था। जनमानस के भारी विरोध के चलते और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से नमाज सनातन धर्म के अग्रणी धर्म स्थल पर नमाज पढ़वाने का मामला टालना पड़ा था । उस समय हनुमानगढ़ी में महंत ज्ञानदास ने इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। 
ऐतिहासिक घटना का नया उल्लेख :-
उत्तर प्रदेश के वर्तमान माननीय मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगभग 23 वर्ष बाद इस मामले का उल्लेख क्या कर दिया कि सपा में खलबली मच गई। योगी आदित्यनाथ ने विगत 10 जुलाई 2026 को अयोध्या के सोहावल में सम्पन्न हुए एक कार्यक्रम में इसका उल्लेख करते हुए सपा और कांग्रेस पर निशाना साधा है। सपा नेता श्री पवन पाण्डेय और अन्य अनेक नेता इसके प्रमाण मांगते फिर रहे हैं। इसे लेकर सियासत तेज हो गई है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट से स्टे हुआ था -
मामला अदालत में भी गया था और वहां से इसके आयोजन पर रोक (स्टे) लगा दी गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंदिर परिसर में रोजा इफ्तार के आयोजनों पर रोक (स्टे) लगा दी गई थी। इसके बाद बढ़ते तनाव व विवाद के बाद महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार नहीं कराया जाएगा।
समाजवादी पार्टी के करीबी थे आयोजक -
महंत ज्ञानदास अयोध्या स्थित प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी के पीठाधीश्वर और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे समाजवादी पार्टी (विशेषकर मुलायम सिंह यादव) के करीबी माने जाते हैं और अक्सर विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। वे अपने बयानों और सांप्रदायिक सौहार्द की पहलों के लिए जाने जाते हैं, जिसमें 2003 में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर इफ्तार पार्टी का आयोजन करना भी शामिल था। 2003 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल के दौरान उनके आवास पर एक 'रोजा इफ्तार' का आयोजन किया गया था, जिसमें हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ने का प्रयास भी हुआ था, जो काफी विवादों में रहा था।

सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का हुआ था प्रयास :-
इफ्तार के समय नमाज अदा करने के लिए हनुमानगढ़ी मंदिर की सीढ़ियों और मुख्य मार्ग पर चटाइयां (सफ) बिछाने की कोशिश की गई थी । चूंकि हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों से ही महंत के घर का रास्ता जाता था, इसलिए भारी भीड़ होने के कारण सीढ़ियों का उपयोग करने का प्रयास हुआ था।

सुरक्षा बलों और संतों का विरोध :- 
तत्कालीन आईजी (लॉ एंड ऑर्डर) बृजलाल और पुलिस प्रशासन ने मंदिर की सीढ़ियों और मुख्य परिसर के भीतर नमाज पढ़ने का कड़ा विरोध किया था। पुलिस और स्थानीय संतों के विरोध के बाद सीढ़ियों से चटाइयां हटाई गईं और नमाज को महंत ज्ञान दास के निजी निवास/कक्ष के अंदर ही संपन्न कराया गया।

महंत धर्मदास की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई थी सुनवाई 
मंदिर परिसर के भीतर इस तरह के गैर-हिंदू धार्मिक आयोजनों और नमाज के प्रयासों का अयोध्या के संत समाज ने तीखा विरोध किया। इसके खिलाफ हनुमानगढ़ी के ही महंत धर्मदास ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक याचिका दायर की। याचिका में दलील दी गई कि सनातन परंपरा के इस पवित्र सिद्धपीठ की मर्यादा और पवित्रता के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट की रोक:-
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार या किसी भी प्रकार के अन्य धार्मिक आयोजनों पर पूरी तरह से रोक (Stay) लगा दी।भविष्य के आयोजनों पर विराम: इस कानूनी विवाद और अदालती आदेश के बाद वर्ष 2005 के आसपास महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में ऐसा कोई भी आयोजन नहीं किया जाएगा, क्योंकि उनकी सौहार्द बढ़ाने की पहल विवादों में घिर गई थी।
महंत ज्ञानदास का परिचय -
अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के पूर्व मुख्य पुजारी महंत ज्ञानदास अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं।राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी (मुलायम सिंह यादव) के करीबी माने जाने वाले ज्ञानदास उस समय चर्चा में आए थे, जब कथित तौर पर समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान उनके हनुमानगढ़ी स्थित निजी आवास (मंदिर के समीप) में नमाज का आयोजन करने का प्रयास किया गया था, जिसका पुलिस और हिंदू संगठनों ने विरोध किया था। जिसे लेकर बाद में राजनीतिक विवाद गहरा गया था। महंत ज्ञानदास हनुमानगढ़ी के प्रमुख संतों में से रहे हैं और उन्हें मुलायम सिंह यादव का करीबी और प्रशंसक माना जाता था। इस घटना को लेकर वर्तमान में भी राजनीतिक बयानबाजी होती रही है।
हनुमानगढ़ी के पूर्व महंत ज्ञानदास अभी भी जीवित हैं। वर्ष 2019 में उन्हें ब्रेन हैमरेज (मस्तिष्क आघात) हुआ था, जिसके बाद से उनका स्वास्थ्य काफी कमजोर हो गया है। जिसके बाद शिष्य उन्हें तत्काल लखनऊ लेकर पहुंच गए, पीजीआई में भर्ती कराया गया। महंत श्रीज्ञानदास को पूर्व में ब्लाकेज की समस्या पैदा हुई थी। इसके बाद पीजीआइ में उनकी एंजियोप्लास्टी हो चुकी है। वह अब पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन से दूर और एकांत में रहते हैं तथा आम लोगों या मीडिया से बातचीत नहीं करते हैं लेकिन समय समय पर अखिलेश यादव और बाकी समाजवादी एंजेट से मिलते रहते हैं।

सरयू कुंज मंदिर में 4 जून 2018 को हुआ था रोजा इफ्तार और नमाज :-
उक्त घटना के बावजूद विगत 4 जून 2018 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र के सरयू कुंज मंदिर में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था। इस अनूठी पहल में शामिल होने वाले मुस्लिम रोजेदारों को वही सात्विक पकवान (जैसे हलवा, फल और पकौड़ी) परोसे गए थे, जो भगवान को भोग लगाए जाते हैं।यह आयोजन मूल रूप से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच प्रेम और शांति का संदेश देने के लिए किया गया था। खास बात यह थी कि इसमें किसी भी राजनीतिक व्यक्ति या वीआईपी को आमंत्रित नहीं किया गया था, बल्कि सिर्फ स्थानीय आम लोग शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम में तीन दर्जन से अधिक मुस्लिम रोजेदारों ने शिरकत की थी। इस रोजा इफ्तार का आयोजन मंदिर के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री द्वारा किया गया था। 

मंदिर के अंदर पढ़ी गई नमाज :-
मंदिर के अंदर राम, सीता और ब्रह्मा की मूर्तियां हैं। इफ्तार के दौरान साधु अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी से आए हुए लड्डू बांट रहे थे। इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज भी मंदिर परिसर में ही की गई। इससे पहले सांप्रदायिकता के खिलाफ एक सेमिनार का आयोजन भी मंदिर में किया गया। सेमिनार में कॉलेज के छात्रों, शिक्षकों आदि ने हिस्सा लिया और सांप्रदायिक तनाव को कम करने की प्रतिज्ञा ली। इफ्तार में हिस्सा लेने वाले उर्दू के शायर मुजम्मिल ने कहा, 'अयोध्या में अल्पसंख्यक होकर भी हमें कभी डर नहीं लगा। हमारे हिंदू भाइयों को धन्यवाद, जिन्होंने कभी किसी खतरे से परेशान नहीं होने दिया।’

20 मई 2019 को अयोध्या में हुआ था रोजा इफ्तार :-
20 मई 2019 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र के सरयू कुंज मंदिर में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था। महंत युगल किशोर दास ने कहा कि रोजा इफ्तार का उद्देश्य था कि हिंदू और मुस्लिम भाई सब मिल-जुल कर रहें। उन्होंने कहा कि अयोध्या किसी एक समुदाय की नगरी नहीं है।यह सब के लिए पुण्य नगर है।
सूफी संत श्री किशोर शरण ने कहा, भेदभाव खत्म करने का संदेश अगर मिल सकता है तो अयोध्या से मिल सकता है।
युगल किशोर ने कहा कि अगर 6 दिसंबर 1992 के पहले इस तरीके की पहल की गई होती तो यह 6 दिसंबर की घटना न होती, वहीं इफ्तार में शामिल मुस्लिमों ने कहा कि हम देश के अमन-चैन की बात करते हैं और इस तरीके की पहल भाईचारे और अमन चैन के लिए की गई है। मुस्लिमों ने कहा कि हम हिंदुओं के त्यौहार पर भी शामिल हों और पूरे देश में अयोध्या से ही अमन चैन का संदेश दें।

इस कार्यक्रम में शामिल हुए एक रोजेदार मोहम्मद तुफैल का कहना था कि विवादित स्थल के बगल में ही है रामजानकी मंदिर है, जहां पर विवाद है और पूरी दुनिया में झगड़े की वजह है। वहीं इस मंदिर में रोजा इफ्तार कराके यह एकता और मानवता का संदेश भी दिया जा रहा है कि सभी धर्मों के लोगों को आपस में मिलकर रहना चाहिए।

एक अन्य रोजेदार जीशान ने कहा था कि जिस तरह हमलोग मंदिर में नमाज पढ़ सकते हैं, इससे यह मैसेज दिया जाता है कि आप हमारे घर आ सकते हैं। हम आपके घर आ सकते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब हम लोगों को यहां से सिखाई जाती है।मैं टीचर भी हूं तो अपने बच्चों को भी यह चीज सिखाता हूं जो समाज मे गंदगी फैल रही है, मानसिकता डैमेज हो रही है उसे सुधारा जाए।

इसी कार्यक्रम में शामिल एक अन्य रोजेदार मुजम्मिल फिजा ने कहा था कि हमारे यहां निर्गुण है, यहां मूर्ति की पूजा नहीं हो सकती लेकिन अगर आप आध्यात्मिक रूप से या बैठकर चिंतन मनन करेंगे तो जा सकते हैं।

महंत युगल किशोर शरण शास्त्री का परिचय -
युगल किशोर शरण शास्त्री का जन्म 1958 में बिहार के ज़िला सीतामढ़ी में हुआ। लगभग 45 साल से वह अयोध्या के सरयूकुंज रामजानकी मंदिर के महंत हैं। 1976 से 1985 तक वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, जहां उन्होंने जन एकता के लिए सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद को जाना। तब से ही सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। महंत युगल किशोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्व प्रचारक भी रहे हैं। यह आयोजन अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द (गंगा-जमुनी तहजीब) की एक अनूठी मिसाल के रूप में चर्चा में आया था। साम्प्रदायिक सद्भाव व मानव एकता के लिये वे लगभग तीन दशकों से समाजिक कार्य करते आ रहे हैं। पूरे भारत में दो दर्जन से अधिक शान्ति व सद्भाव यात्रा निकाल चुके हैं। हर सच्चाई को वे सामाजिक जीवन में मज़बूती से रखते आ रहे हैं। आठ पुस्तकों के लेखक हैं और आठ दर्जन से ज़्यादा लेख भी प्रकाशित हो चुके हैं। सामाजिक कार्यों के लिए आधा दर्जन से अधिक बार जेल भी जा चुके हैं।

संघी आतंकवाद:
युगल किशोर शरण शास्त्री 

हमारा देश भारत अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति एवं साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध रहा है, परन्तु कुछ असामाजिक तत्त्व इसकी इस विशेषता को समाप्त कर यहां के वातावरण में नफ़रत और साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने का प्रयास भारत-विभाजन के पहले ही से करते रहे हैं और आज उनकी ये कोशिशें अपने चरम पर हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘संघी आतंकवाद’ के लेखक युगल किशोर शरण शास्त्री चूँकि स्वयं भी एक लम्बे समय तक संघ-प्रचारक रह चुके हैं, इसलिए उन्होंने संघ की इस वैमनस्यपूर्ण तथा विघटनकारी मानसिकता को बहुत क़रीब से जाना और पूरी निर्भीकता के साथ, मुखर रूप से अपनी इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही उन्होंने इन असामाजिक तत्त्वों द्वारा इस्लाम के बारे में फैलायी जा रही ग़लतफ़हमियों को भी दूर करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक संघी आतंकवाद की मानसिकता को समझने तथा उसके बारे में लेखक के मुखर एवं स्पष्टवादी विचारों को जानने के लिए अवश्य पढ़ी जा सकती है।

अंग्रेज़ों ने फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत ऐसे विकृत इतिहास को परोसा, जिससे यहाँ के लोग मिल-जुल कर न रहने पायें। वे यहाँ से अपना आसन लेकर चले गये, परन्तु अपने गुर्गों को यहीं छोड़ गये। उनके गुर्गे आज भी अपने उस्ताद की नीतियों का अनुसरण करते हुए नया विकृत इतिहास रच रहे हैं, जिसका तथ्यों से कोई ताल्‍लुक़ नहीं है। यह विकृत एवं मनगढ़ंत इतिहास लोगों को भ्रम की स्थिति में छोड़ने में कामयाब रहा है। यह इतिहास यदि रचा नहीं गया होता तो शायद महात्मा गाँधी की हत्या नहीं होती, बाबरी मस्जिद नहीं तोड़ी जाती, गोधरा काण्ड के पश्‍चात गुजरात में मुस्लिम-संहार नहीं होता। इसके अलावा भी भारत में तमाम दंगे हुए जिसमें मानवता को भारी क्षति पहुँची है, उससे बचा जा सकता था। हिन्दू धर्म को ख़तरा हिन्दू, मुस्लिम, क्रिश्‍चियन, बौद्ध या अन्य किसी धर्म, मज़हब से नहीं है। इसे ख़तरा सिर्फ़ हिन्दू धर्म के साम्प्रदायिक गिरोहों से है। ये गिरोह धर्मान्ध हैं। धर्मान्धता अपने ही धर्म की अच्‍छाइयों को समझने नहीं देती। जो आस्था दूसरे मज़हबों के प्रति नफ़रत पैदा करे, जिससे देश की एकता और अखण्डता को ख़तरा हो, जो इन्सानियत पर कुठाराघात करे, वह आस्था न होकर आतंकवाद है, उत्पीड़न है, हैवानियत है। साम्प्रदायिक ताक़तें आस्था के नाम पर लोगों को हैवानियत की ओर ढकेलने को उतावली हैं। इस पुस्तिका का उद्‌देश्य है इतिहास के सही तथ्यों को समाज के समक्ष रखकर साम्प्रदायिक ताक़तों के कारनामों का पर्दाफ़ाश करना, जिससे देश में प्रेम, मुहब्बत, भाईचारा, समता, ममता, बन्धुता और एकता को बढ़ावा मिल सके।

दरअसल, 2003 में जब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सपा सरकार थी, तब महंत ज्ञान दास ने हनुमानगढ़ी में एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। उस इफ्तार में हाशिम अंसारी (बाबरी मस्जिद मामले के याचिकाकर्ता) और मुस्लिम नेता सादिक अली (बाबू दर्जी) सहित कई मुस्लिम प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। हालांकि, कुछ संतों ने आपत्ति जताते हुए कहा: क्या मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है? मामला अदालत तक पहुंचा और ऐसे आयोजनों पर रोक लगा दी गई। बढ़ते तनाव और विवाद के बीच, महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में कोई रोज़ा-इफ्तार आयोजित नहीं किया जाएगा। इसके बाद, 21 मई 2019 को अयोध्या के वशिष्ठ कुंड क्षेत्र में स्थित सरयू कुंज मंदिर में रोज़ा-इफ्तार का आयोजन किया गया। और इस देश में, गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रचार स्वयं आरएसएस द्वारा किया गया। 

राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद: मिथक और तथ्य
इफ्तार आयोजित करने वाले उस महंत ने *राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद: मिथक और तथ्य* नामक पुस्तक लिखी। आपको इसे अवश्य पढ़ना चाहिए—इसमें उन्होंने मुसलमानों को अधिकार देने की बात कही है। आरएसएस के नेतृत्व में ही 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को घेरकर उसकी रक्षा की गई थी। अगर अयोध्या में आरएसएस से जुड़ा कोई राजनीतिक संत बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्यों के लिए इफ्तार का आयोजन करता है, तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दोषी ठहराए जाते हैं, लेकिन अगर उसी मंदिर में प्रसाद चोरी हो जाता है, तो न योगी और न ही मोदी दोषी। क्या यह सरासर पाखंड नहीं है! क्या राज्य के मुख्यमंत्री ने जनता को पूरी तरह मूर्ख समझ लिया है? इफ्तार पार्टी आयोजित करने वाले महंत शास्त्री जी का जन्म 1958 में बिहार के सीतामढ़ी में हुआ था; 1976 से 1985 तक वे आरएसएस प्रचारक रहे। आरएसएस के कहने पर ही उन्होंने गंगा-जमुनी तहज़ीब पर आधारित इफ्तार नमाज़ का आयोजन किया था। मुख्यमंत्री और भाजपा के संत श्री योगी जी को राजनीतिक इतिहास का अध्ययन करना चाहिए!  


लेखक :
डा. राधेश्याम द्विवेदी ,एडवोकेट
पता : मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,
आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.
वॉट्सप नं.+91 9412300183.



Wednesday, July 15, 2026

शिव के कालभैरव स्वरूप के विविध रूप ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


कालभैरव, भगवान शिव के उग्र और रुद्र अवतार हैं, जिन्हें 'समय के देवता' और ‘पापियों के दंडदाता’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें "काशी का कोतवाल" भी माना जाता है, उनकी कृपा से सभी भय व नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती है। वे आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनका वाहन काला कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को भोजन कराने से भी भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।



उत्पत्ति की कथा :-

पौराणिक मान्यताओं (शिव पुराण) के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा को अपनी श्रेष्ठता पर अहंकार हो गया था और उन्होंने भगवान शिव का अनादर कर दिया था । इस अहंकार को तोड़ने और ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए, शिव के क्रोध से 'काल भैरव' की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक अभिमानी पांचवें सिर को काट दिया था।


     

 भैरव का अर्थ ‘भय को हरने वाला’ होता है। उनका यह स्वरूप काल का स्वामी और सदैव रौद्र रूप में होता है। शिव पुराण के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसके साथ ही काल भैरव को ‘दंडपाणी’ भी कहा जाता है। क्योंकि वह पापियों को दंड देते हैं।

ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करना पड़ा :-

ब्रह्मा का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्म हत्या' का पाप लगा। इस पाप के निवारण के लिए उन्हें कई वर्षों तक एक भिक्षु के रूप में भटकना पड़ा। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव ने त्रिलोक में भ्रमण किया। अंततः, जब वे पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) पहुँचे, तो ब्रह्मा का कटा हुआ सिर (कपाल) उनके हाथ से नीचे गिर गया। तब जाकर वह पाप मुक्त हुए। तब से, काल भैरव को काशी का मुख्य कोतवाल और रक्षक माना जाने लगा है।


काल भैरव का भयानक स्वरूप :- 

काल भैरव का रूप अत्यंत भयानक है। उनका रंग काला है, वे हाथों में त्रिशूल, डमरू और ‘ब्रह्मा का कपाल’ धारण करते हैं, और उनका वाहनमृत्यु) और भय (डर) पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

पूजन का विशेष समय :- 

काल भैरव की पूजा के लिए रविवार और मंगलवार का दिन विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, हर माह के कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' (कालाष्टमी) का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसिक शांति और बाधा मुक्ति के लिए "ॐ कालभैरवाय विद्महे काशीवासाय धीमहि। तन्नो भैरवः प्रचोदयात्।" मंत्र का जाप किया जा सकता है।


निष्कर्ष :-

काल भैरव, शिव का सबसे शक्तिशाली रूप है। काल भैरव की कथा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने के लिए है। भैरव धर्म की पुनर्स्थापना करने, अहंकार का नाश करने और सत्य की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उनका उग्र रूप स्पष्टता का प्रतीक है। भ्रम को दूर करने और अनुशासन में दृढ़ता से खड़े रहने का साहस ही भैरव का स्वरूप है। भैरव अष्टमी पर काशी में भैरव की पूजा करें या घर पर एक साधारण प्रार्थना के माध्यम से, आध्यात्मिक संदेश एक ही रहता है- सत्य अहंकार से श्रेष्ठ है, अनुशासन भय से अधिक शक्तिशाली है, और भक्ति तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच्ची और निरंतर हो। काल भैरव अंधकार का प्रतीक नहीं हैं। वे अंधकार के अंत का प्रतीक हैं। इसीलिए भक्त उन्हें निर्भयता और आंतरिक स्थिरता जगाने वाली रक्षक शक्ति के रूप में याद करते हैं।

     काल भैरव के शास्त्रीय स्वरूप :-

अष्ट भैरव-

अष्ट भैरवों को काल भैरव के अधीन बताया गया है, जिन्हें ब्रह्मांड में समय का सर्वोच्च शासक और भैरव का प्रमुख रूप माना जाता है। भैरव की पूजा केवल एक रूप में नहीं की जाती। हिंदू देवता भैरव के आठ रूप हैं । उन्हें आठ दिशाओं का रक्षक और नियंत्रक माना जाता है।भैरव बाबा के 8 प्रमुख रूप को अष्ट भैरव कहा जाता है।  माना जाता है कि प्रत्येक रूप रक्षा, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति के एक अलग पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएँ अष्ट भैरव नामों का वर्णन थोड़ा भिन्न ढंग से कर सकती हैं, फिर भी मूल अवधारणा एक ही रहती है। भैरव की उपस्थिति बहुआयामी है। इसका अर्थ यह है कि भैरव पूजा कोई एक निश्चित अभिव्यक्ति नहीं है। यह भक्त के आध्यात्मिक विकास और संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलती रहती है। आरंभिक साधकों के लिए सभी रूपों को याद करना आवश्यक नहीं है। इसका उद्देश्य जानकारी एकत्र करना नहीं है, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ भक्ति का निर्माण करना है। 



1.असितंगा भैरव :-

असितांग भैरव भगवान शिव के उग्र रूप, काल भैरव के आठ प्रमुख रूपों में से प्रथम हैं। मुख्य रूप से रचनात्मकता, ज्ञान की प्राप्ति, और वाक सिद्धि के लिए पूजे जाने वाले इस देवता का वर्ण अत्यंत काला है, जिसके कारण उन्हें 'असितांग' (असित + अंग) कहा जाता है। इनका रंग गहरा नीला या काला होता है। इनके तीन नेत्र हैं और ये गले में सफेद कपालों (खोपड़ियों) की माला धारण करते हैं। अन्य भैरवों का सामान्य वाहन कुत्ता (श्वान) होता है, लेकिन असितांग भैरव का वाहन 'हंस' है, जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। ये पूर्व दिशा के रक्षक माने जाते हैं। इनकी शक्ति 'ब्रह्माणी' हैं। भक्तों का मानना है कि इनकी उपासना सेरचनात्मक क्षमता बढ़ती है, शाप से मुक्ति मिलती है और गंभीर रोगों से राहत प्राप्त होती है।हालांकि इनकी पूजा भैरव मंदिरों में सामान्य रूप से होती है, लेकिन इनका एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर वाराणसी में वृद्ध कालेश्वर के निकट महामृत्युंजय मंदिर के पास कृतवासा पीठ के धार्मिक क्षेत्र में स्थित है।


2.रुरु भैरव :-

रुरु भैरव भगवान शिव (रुद्र) के सबसे प्रमुख आठ रूपों में से दूसरा स्वरूप हैं। इन्हें 'आनंद भैरव' या 'गुरु भैरव' भी कहा जाता है। ज्ञान, उदारता, और कला-संगीत के प्रतीक इस भैरव की पूजा मुख्य रूप से बुद्धि, शत्रुओं पर विजय, धन प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'रुरु' शब्द का अर्थ रुद्र का मुख माना जाता है। यह उग्र होने के साथ-साथ अत्यंत ज्ञानवान और सही मार्ग दिखाने वाले गुरु के समान हैं। इनका वाहन सफेद बैल है और उनकी पत्नी महेश्वरी मातृका हैं। लाभ: इनकी आराधना से विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, कलाकारों को रचनात्मकता, और साधकों को भय तथा तंत्र-बाधा से मुक्ति मिलती है। रुरु भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सरल बीज मंत्र है:”ॐ भ्रं रुरु भैरवाय नमः।” वाराणसी अष्ट भैरव यात्रा के अंतर्गत इनका मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हनुमान घाट (B. 4/16) के पास स्थित है। श्रद्धालु यहाँ रिक्शा या ऑटो से सोनारपुरा चौराहे तक पहुँच सकते हैं। स्थानीय लोग इन्हें आनंद भैरव के नाम से भी पुकारते हैं। “वे भगवान शिव के ही एक अंश हैं और ज्ञान, उदारता, प्रेम तथा सही मार्गदर्शन के प्रतीक हैं।


3.चंदा भैरव :-

भगवान चंदा का भैरव का प्रकट होना बताया गया है। विनाश के देवता भगवान शिव, दुष्ट आत्माओं का नाश करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने और ब्रह्मांड में शुद्ध एवं सकारात्मक वातावरण स्थापित करने के लिए भगवान भैरव का रूप धारण करते हैं। भगवान भैरव कवचधारी, आक्रामक और भयभीत देवता हैं। आठ भैरवों में, भगवान चंदा भैरव अष्ट भैरव का तीसरा रूप हैं। वे नीले वस्त्रों में प्रसन्न और सौम्य हैं, विश्वास और विश्वसनीयता के प्रतीक हैं, शांति को बढ़ावा देते हैं और सभी कार्यों में सौम्यता का सम्मान करते हैं। वे अपने चार हाथों में अग्नि ज्वाला, गदा, भाला, धनुष और बाण धारण किए हुए, अपनी पत्नी देवी कुमारी (देवी पार्वती) के साथ अपने वाहन मोर पर बैठे हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर होते हैं। इस दिन होमम करने से जातकों को आनंदमय स्वभाव, शांति और सद्भाव, ऊर्जा और गतिशीलता, सकारात्मक रूप, जीवन में आत्मविश्वास, बाधाओं पर विजय, शत्रुता से मुक्ति और प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

चंदा भैरव भगवान की पूजा प्रतिस्पर्धा, शत्रुता और प्रतिद्वंद्वियों को दूर करते हैं और विकास, सफलता, विजय और व्यावसायिक उन्नति के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे शुभ ऊर्जा, धन, सर्वोच्चता, विकास की शक्ति, जीवन की वृद्धि, समृद्धि, उत्सव और समग्र खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। वे दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। उनका वाहन मोर है। भगवान चंदाभैरव मूल मंत्र है -

“ॐ ह्रीं सर्व शक्ति रूपाय नील वर्णाय

महा चंदा भैरवाय नमः।” पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपरोक्त मंत्र का 22 दिनों तक 1008 बार जाप करने से श्री चंदा भैरव का आशीर्वाद प्राप्त होगा, मंगल दोष और मंगल दशा के प्रभाव दूर होंगे और बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलेगी। जीवन में उन्नति और अद्भुत क्षणों का अनुभव होगा।

लाभ :-

आत्म-जागरूकता और प्रभावशाली रूप को आशीर्वाद दें, घृणा को दूर करें। अंतरात्मा को आशीर्वाद दें, बुरी धारणाओं और हानिकारक प्रभावों को दूर करें।स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद, अज्ञानता का निवारण करें। मंदी से मुक्ति, बाधाओं और परेशानियों को दूर करना होता है।वित्तीय ऋणमुक्ति का निवारण हो, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिले।अस्थिरता की परिस्थितियों को दूर करो, रोगमुक्त जीवन का आशीर्वाद दो।


4.क्रोध भैरव :-

क्रोध भैरव हिंदू धर्म में भगवान शिव के उग्र रूप और अष्ट भैरवों में से एक हैं।यह स्वरूप दुष्ट बाधाओं, शत्रुओं के विनाश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय माना जाता है।  क्रोध भैरव का स्वरूप उग्र और भयंकर होता है। इनका वर्ण लाल (रक्त) है, चार भुजाएँ हैं और ये खड्ग (तलवार), त्रिशूल, खप्पर (खोपड़ी का पात्र) तथा डमरू धारण करते हैं।अन्य भैरवों की तरह इनका वाहन भी काला कुत्ता (श्वान) है। यह स्वरूप तंत्र-मंत्र, तामसिक शक्ति और गुप्त साधनाओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इनकी पूजा मुख्य रूप से रात या श्मशान में की जाती है और इसे हमेशा किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 

लाभ: क्रोध भैरव की उपासना से साधक का आत्मबल बढ़ता है, तंत्र-मंत्र का प्रभाव नष्ट होता है और सभी प्रकार के कष्ट व शत्रु बाधा समाप्त होते हैं।

5.उन्मत्त भैरव :-

उन्मत्त भैरव, भगवान शिव के अष्ट भैरव स्वरूपों में से पांचवें स्वरूप हैं। उन्हें मुख्य रूप से माँ वाराही का भैरव माना जाता है। उन्मत्त भैरव का स्वरूप साधक के मन से नकारात्मक विचारों, कामुकता और दूषित आदतों को नष्ट कर सकारात्मक ऊर्जा और उत्कृष्ट वाणी प्रदान करने के लिए अत्यंत पूजनीय है।

लाभ - इस साधना से सभी प्रकार की तंत्र बाधाएं दूर होती हैं, शत्रुओं से रक्षा होती है, और निर्णय लेने की क्षमता व भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। मानसिक स्थिरता के लिए आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते हुए उनके मंत्रों का 21 दिनों तक धीमी आवाज़ में (उपांशु) जाप किया जाता है। उन्मत्त भैरव साधना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

गायत्री मंत्र: “ॐ महामंत्राय विद्महे । वाराहि मनोहराय धीमहि । तन्नौ उन्मत भैरव प्रचोदयात्।”


6.कपाल भैरव :-

कपाल भैरव, भगवान शिव के उग्र और तांत्रिक स्वरूप हैं।यह अष्ट भैरवों में से चौथे प्रमुख भैरव हैं। मुख्यतः वाराणसी (काशी) में इन्हें 'लाट भैरव' के रूप में पूजा जाता है, जहाँ ये नगर के रक्षक माने जाते हैं। इनकी साधना विशेषकर कानूनी विवादों, शत्रुओं और तंत्र बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, दंड और कपाल (मानव खोपड़ी) होता है। उनका वाहन काला कुत्ता है।इनका मूल मंत्र 'ॐ कपाल भैरवाय नमः' है।

लाभ- हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इनकी पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है, अटके हुए कार्य पूरे होते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है。वाराणसी के अलावा, पूरे भारत में अन्य शिव और भैरव मंदिरों में भी इनकी आराधना की जाती है। कपाल भैरव का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिर वाराणसी में अलापुर (सारनाथ मार्ग) में स्थित है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 4-5 किलोमीटर है। आशापुर चौराही (चौमुहानी) से सारनाथ जाने वाले मार्ग पर बाएँ न मुड़कर, दाहिने मुड़कर लगभग 2 किलोमीटर आगे जाने पर मंदिर पहुँचा जा सकता है।


7.भीषण भैरव :- 

भीषण भैरव को 'भूत भैरव' भी कहा जाता है। भगवान शिव के उग्र और शक्तिशाली अवतार, अष्ट भैरव में से सातवें भैरव हैं। वे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी आत्माओं और तंत्र-मंत्र के प्रभावों को नष्ट करने वाले रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह प्राचीन मंदिर क.63/28, भूतभैरव (ज्येष्ठेश्वर के निकट) में स्थित है। भीषण भैरव को क्रूरता, अज्ञानता और अहंकार के विनाशक के रूप में जाना जाता है, जो भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। वाराणसी की पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा द्वारा राक्षस दुर्गासुर का वध करने के बाद नगर की रक्षा के लिए आठ भैरवों को स्थापित किया गया था, जिनमें से भीषण भैरव एक हैं। 

लाभ - शक्तिशाली मंत्रभक्त नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से मुक्ति के लिए उनके बीज मंत्र का जाप करते हैं:॥ ॐ भ्रं भीषण भैरवाय फट् ॥बुरी नज़र और कष्टों के निवारण के लिए इस मूल मंत्र का भी उपयोग किया जाता है:॥ ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय सर्व शाप निवारणाय मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ॥


8. संहार भैरव:-

संहार भैरव भगवान शिव का सबसे उग्र और रौद्र स्वरूप हैं, जो ‘अष्ट भैरव’ में से एक हैं। 'संहार' का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि बुराइयों, नकारात्मक ऊर्जाओं और पापों का अंत कर धर्म की पुनर्स्थापना करना है। इनकी आराधना से भक्तों को निर्भयता और साहस की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, संहार भैरव एक कूप (कुएं) से स्वयं प्रकट हुए थे।स्वरूप: इन्हें दश-भुजी (दस भुजाओं) वाले देवता के रूप में दर्शाया गया है, जिनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, शंख, गदा, चक्र, तलवार और खप्पर आदि सुशोभित रहते हैं। इनका वर्ण बिजली जैसा पीला-नारंगी माना जाता है। संहार भैरव का मुख्य और प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर वाराणसी में पाटन दरवाजा, गाय घाट के पास स्थित है। 

लाभ - विशेष रूप से भय, अज्ञात चिंताओं और पुराने कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल का दीपक जलाना फलदायी होता है।काले तिल, उड़द और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है।इनके वाहन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यधिक शुभ माना जाता है। भक्त नकारात्मक शक्तियों और भय से मुक्ति के लिए इस बीज मंत्र और मूल मंत्र का जाप करते हैं:बीज मंत्र: ॐ भ्रां भैरवाय नमःमूल मंत्र: ॐ नमो भगवते संहार भैरवाय भूत प्रेता पिशाच ब्रह्मराक्षस उकताया उकताया संहारय संहारय सर्व भय छेदनं कुरु कुरु स्वाहा।


शक्तिशाली भैरव रूपों का विवरण


1.काल भैरव :- इन्हें सबसे उग्र और सर्वोच्च माना जाता है। मान्यता है कि इन्होंने ही अहंकार में चूर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था।इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है और इनके बिना काशी में कोई भी कार्य या अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है।

2.स्वर्णाकर्षण भैरव :- यह भैरव का वह स्वरूप है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार के आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है और अपार धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।

3.बटुक भैरव :- यह भैरव का सौम्य और बाल रूप है। इन्हें बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है और इनकी पूजा विशेष रूप से त्वरित फल देने वाली और भय-बाधाओं को नष्ट करने वाली मानी गई है।


भारत में काल भैरव के प्रमुख मन्दिर :-

भारत में काल भैरव भगवान शिव के उग्र अवतार के कई प्रमुख और सिद्ध मंदिर हैं। उन्हें मुख्य रूप से बुराई के विनाशक और 'क्षेत्रपाल' (रक्षक) माना जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के कालभैरव स्वरुप की उत्पत्ति मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए उत्तम मानी जाती है और ऐसी मान्यता है इस दिन काल भैरव की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। काल भैरव की पूजा न सिर्फ भारत बल्कि नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत जैसे कई देशों में होती है।भारत में कई स्थानों पर प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर है जिसका अपना अलग-अलग महत्व है। 


1.काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश):-

क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। उज्जैन मध्यप्रदेश के उज्जैन में भगवान शिव का प्राचीन और फेमस ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस जगह पर भगवान शिव काल भैरव स्वरूप भी विराजते हैं। भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्‍थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।बाबा कालभैरव भगवान सदाशिव के स्वरूप हैं। वे कलियुग की बाधाओं का शीघ्र निवारण करने वाले देवता माने जाते हैं। खासतौर से प्रेत व तांत्रिक बाधा के दोष उनके पूजन से दूर हो जाते हैं। संतान की दीर्घायु हो या गृहस्वामी का स्वास्थ्य, भगवान भैरव स्मरण और पूजन मात्र से उनके कष्टों को दूर कर देते हैं। भगवान भैरव के पूजन से राहु-केतु शांत हो जाते हैं। उनके पूजन में भैरव अष्टक और भैरव कवच का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे शीघ्र फल मिलता है। साथ ही तांत्रिक व प्रेत बाधा का संकट टल जाता है। 

       जहां उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सरकार द्वारा कॉरिडोर बनाकर दर्शन पूजन के सुलभ अवसर रुपया 250/- में उपलब्ध है, वही काल भैरव में रुपया 500/- देकर सुलभ दर्शन का विधान है,परंतु प्रत्यक्ष अनुभव से यह राशि भी बड़ी दिखती है तथा यहां सुलभ दर्शन का कोई विशेष सुविधा भी नहीं दी जाती यात्री है। ना तो सरकारी पुलिस और ना ही मंदिर के वॉलेंटियर जनता को वांछित सहयोग दे पाते हैं। 500 रूपये की भारी भरकम सुलभ शुल्क देने के बावजूद कई-कई घंटे लाइन में लगकर श्रद्धालु अपने आराध्य का दर्शन किसी प्रकार कर पाते हैं, जबकि महाकाल मन्दिर में कम समय में सुलभ और सुगम दर्शन व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो जाता है।


2.काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश): -

वाराणसी में स्थित काल भैरव मंदिर शहर के सबसे प्राचीन और पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है, जो भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। मान्यता है कि काल भैरव की अनुमति के बिना कोई भी काशी में प्रवेश नहीं कर सकता है।इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले भक्त काल भैरव के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं और काशी के कोतवाल से अनुमति लेते हैं। काशी के कोतवाल / संरक्षक के रूप में विख्यात काल भैरव को शहर का रक्षक माना जाता है। इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद बाबा काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है, अन्यथा यात्रा अधूरी मानी जाती है। ये काशी विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 


3. बटुक भैरव मंदिर, नई दिल्ली:-

 विनय मार्ग (चाणक्यपुरी) पर स्थित यह मंदिर पांडवकालीन माना जाता है। इसे 'पांडव कालीन बटुक भैरव मंदिर' भी कहते हैं । बाबा बटुक भैरव की मूर्ति यहां पर विशेष प्रकार से एक कुएं के ऊपर विराजित है। यह प्रतिमा पांडव भीमसेन ने काशी से लाए थे। यहाँ विशेष रूप से तेल और मीठी रोटी चढ़ाई जाती है। 

4.बटुक भैरव मंदिर, पांडव किला  दिल्ली-

बटुक भैरव मंदिर पांडव किला  दिल्ली में बाबा भैरव बटुक का मंदिर प्रसिद्ध है। इस मंदिर की स्थापना पांडव भीमसेन के द्वारा की गई थी। वास्तव में पांडव भीमसेन द्वारा लाए गए भैरव दिल्ली से बाहर ही विराज गए तो पांडव बड़े चिंतित हुए। उनकी चिंता देखकर बटुक भैरव ने उन्हें अपनी दो जटाएं दे दीं और उसे नीचे रख कर दूसरी भैरव मूर्ति उस पर स्थापित करने का निर्देश दिया।


5. घोड़ाखाल बटुक भैरव मंदिर, नैनीताल (उत्तराखंड): -

यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ भैरव बाबा को 'गोलू देवता' के रूप में भी पूजा जाता है। यहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर चिट्ठी लिखकर चढ़ाते हैं।भवाली से महज पांच किमी की दूरी पर स्थित सैनिक स्कूल के पीछे चाेटी पर बने इस मंदिर में हजारों घंटियां हैं। यहां नैसर्गिक सौंदर्य हर किसी को मुग्ध कर देता है।गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है। इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर पुकारा जाता है। गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है। इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है। गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है।


6.आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार :- 

आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार में स्थित है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। धार्मिक मान्यता है कि आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार के कोतवाल हैं। यहां श्रद्धालु अपनी परेशानियां बताते हैं और भगवान आनंद भैरव अपने भक्तों की सभीबाधाओं को दूर करते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर अनादि काल से हैं। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू का है। आनंद भैरव, भगवान शिव का सबसे आनंदमयी रूप है।


7.बाजनामठ भैरव मंदिर, जबलपुर :-

मध्यप्रदेश के जबलपुर में बाजना मठ मंदिर के पास महाकाल भैरव का मंदिर है। यहां पर होने वाले हवन की अग्नि में कई देवी-देवताओं की आकृति दिखती है। यह मंदिर तंत्र साधना के लिए भी जाना जाता है। बताया जाता है कि रानी दुर्गावती द्वारा गोंडवाना काल के दौरान मंदिर में प्रतिमा की स्थापना की गई थी। इस मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर परिसर में महाकाल भैरव के हवन के समय जिस भी देवता के नाम की यज्ञकुंड में आहुति दी जाती है, अग्नि में उस देवता की आकृति उबरती है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर 24 घंटे में महाकाल भैरव 52 बार रूप बदलते हैं।


8. राजा बटुक भैरव लखनऊ:-

लखनऊ के कैसरबाग में राजा बटुक भैरव मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और इनको सुरों का राजा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि यहां पर मांगने वाली मन्नत भी संगीत, साधना और कला से जुड़ी होती है। बटुक बाबा भगवान शिव के 5वें अवतार माने जाते हैं और यह मंदिर कला साधना का वर्षों पुराना केंद्र है।


लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.)