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भारतेंदु हरिश्चंद्र की सरयू पार की यात्रा प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यात्रा-वृत्तान्त 'सरयू पार की यात्रा' (फरवरी 1879) हिन्दी साहित्य का एक प्रमुख और आरंभिक यात्रा-वृत्तान्त है। यह यात्रा उन्होंने रामनवमी के अवसर पर बनारस से अयोध्या के लिए की थी, जिसके दौरान वे बस्ती भी पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान भारतेन्दु जी को भीषण गर्मी, थका देने वाली यात्रा और भारी अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था।
उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी चुनाव प्रचार के सिलसिले में बस्ती में थे। बस्ती में जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो विपक्षी दलों पर निशाना साधना तो बनता था। योगी ने गिनाना शुरू किया- पहले यह नगर कूड़े का ढेर हुआ करता था। शोहदों का आतंक था। व्यापारी रंगदारी देने के लिए मजबूर रहता था। नगरों में कहीं जलजमाव की समस्या, कहीं पेयजल की समस्या रहती थी। पहले युवाओं के हाथों में तमंचे पकड़ाए जाते थे... आदि-आदि। यह सब कहते योगी को अचानक हिंदी के एक साहित्यकार का जुमला भी याद आ गया, जो उसने दशकों पहले बस्ती को लेकर कह दिया था। योगी जिस साहित्यकार के जिस जुमले की बात कर रहे थे, वो स्वतंत्र भारत से भी काफी पहले इस दुनिया से रुखसत कर गए थे। उन्हें सिर्फ 35 साल की उम्र मिली थी। यात्रा के शौकीन थे और सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि जिस हिंदी की राजनीति भाजपा करती है, उस भाषा के साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। उस साहित्यकार का नाम है- भारतेंदु हरिश्चंद। 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में जन्में भारतेंदु हरिश्चंद हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। सिर्फ 35 वर्ष की आयु में उन्होंने आधुनिक हिंदी को साहित्य में स्थापित करने के लिए बड़े-बड़े काम किए। हिंदी साहित्य का इतिहास में काल विभाजन के दौरान नामकरण में भारतेंदु के नाम से एक युग भी तय किया गया है। हिन्दी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उन्होंने काफी काम किया। 6 जनवरी 1885 को वाराणसी में उनका निधन हो गया था।
रचनाएं:-
उन्होंने ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाल विबोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक,निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।
काव्य विशेषता :-
भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
भाषा:-
भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।
रस अलंकार:-
भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।
प्रमुख कृतियाँ:-
मौलिकनाटक – वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(१८७३ई., प्रहसन) , सत्य हरिश्चन्द्र(१८७५) , श्रीचंद्रावली (१८७६, नाटिका), विषस्य विषमौषधम् (१८७६, भाण), भारत दुर्दशा(१८८०, ब्रज रत्नदास के अनुसार१८७६, नाट्यरासक),नीलदेवी (१८८१, प्रहसन), अंधेर नगरी(१८८१), प्रेम जोगनी (१८७५, प्रथम अंक में केवल चार अंकयागर्भांक, नाटिका), सतीप्रताप (१८८३, केवल चार अंक, गीति रूपक)
निबंधसंग्रह- भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसराखंड) में संकलितहै।,
“नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
प्रमुख निबन्ध- नाटक, कालचक्र, लेवी प्राण लेवी,भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है, कश्मीर कुसुम
काव्यकृतियां- भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका (१८७१), प्रेममाधुरी (१८७५), प्रेम-तरंग (१८७७),, उत्तरार्द्धभक्तमाल (१८७६-७७), प्रेम-प्रलाप (१८७७), होली (१८७९), मधुमुकुल (१८८१), राग-संग्रह (१८८०), वर्षा-विनोद (१८८०), विनयप्रेमपचासा (१८८१), फूलोंकागुच्छा (१८८२), प्रेमफुलवारी (१८८३) कृष्णचरित्र (१८८३) दानलीला, तन्मयलीला, नयेज़मानेकीमुकरी, सुमनांजलि, बन्दरसभा (हास्यव्यंग)
बकरीविलाप (हास्यव्यंग)
सरयू पार की यात्रा:-
भारतेंदु जी के बस्ती आगमन और वहाँ के अनुभवों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:
प्रथम पड़ाव:अयोध्या -
कल सांझ को चिराग जले रेल पर सवार हुए, यह गए, वह गए। राह में स्टेशनों पर बड़ी भीड़ न जाने क्यों? और मजा यह कि पानी कहीं नहीं मिलता था। यह कम्पनी यजीद के खानदान की मालूम होती है कि ईमानदारों को पानी तक नहीं देती। या सिप्रस का टापू सरकार के हाथ आने से और शाम में सरकार का बन्दोवस्त होने से यह भी शामत का मारा शामी तरीका अख़तियार किया गया है कि शाम तक किसी को पानी न मिलै। स्टेशन के नौकरों से फरियाद करो तो कहते हैं कि डांक पहुंचावें, रोशनी दिखलावें कि पानी दें।
खैर, ज्यों त्यों कर अयोध्या पहुंचे । इतना ही धन्य माना कि श्रीरामनवमी की रात अयोध्या में कटी। भीड़ बहुत ही है, मेला दरिद्र और मैले लोगों का। यहां के लोग बड़े ही कंगालटिरें हैं। इस वक्त दोपहर को अब उस पार जाते हैं। ऊंट गाड़ी यहां से पांच कोस पर मिलती है।
कैम्प हरेया बाजार-
अब तक तीन पहर का सफर हो चुका है और सफर भी कई तरह का और तकलीफ देने वाला। पहिले सर से गाड़ी पर चले । मेला देखते हुए रामघाट की सड़क पर गाड़ी से उतरे। वहां से पैदल धूप में गर्म रेती में सरजू किनारे गुदारा घाट पर पहुंचे। वहां से मुश्किल से नाव पर सवार होकर सरजू पार हुए। वहां से वेलवां, जहां कि डांक मिलती है और शायद जिसका शुद्ध नाम बिल्व ग्राम है, दो कोस है। सवारी कोई नहीं, न राह में छाया के पेड़, न कुआं, न सड़क । हवा खूब चलती थी इससे पगडंडी भी नहीं नजर पड़ती। बड़ी मुश्किल से चले और वड़ी ही तकलीफ हुई। खेर बेलवां तक रो रो कर पहुंचे। वहां से बैल की डांक पर नी बजे रात को यहां पहुंचे। यहां पहुंचते ही हरैया बाजार के नाम से यह गीत याद आया -
“हरैया लागल झबिआ के रे लैहें ना! ।
शायद किसी जमाने में यहां हरैया बहुत विकती होगी । इस के पास ही मनोरमा नदी है। मिठाई हरैया की तारीफ के लायक है। वालूसाही बिलकुल बालू साही, भीतर काठ के टुकड़े भरे हुए लड्डू भूरके । बरफी अहा हा हा! गुड़ से भी बुरी। खैर, लाचार होकर चने पर गुजर की। गुजर गई गुजरान- क्या झोपड़ी क्या मैदान, बाकी हाल कल के खत में।
बस्ती :-
परसों पहिली एप्रिल थी इस से सफर कर के रेती में बेवकूफ बनने का और तकलीफ में सफर करने का हाल लिख चुके हैं। अब आज आठ बजे सुबह रें रें कर के बस्ती पहुंचे।
वाह रे बस्ती,
झख मारने को बस्ती है ।
अगर बस्ती इसी को कहते हैं
तो उजाड़ किस को कहेंगे।
सारी वस्ती में कोई भी पंडित बस्ती रामजी ऐसा पंडित नहीं। खैर !अब तो एक दिन यही बसती होगी। राह में मेला खूब था जगह जगह पर शहाबे का शहाबा। चूल्हे जल रहे हैं। सैकड़ों अहरे लगे हुए हैं। कोई गाता है, कोई बजाता है, कोई गप हांकता है। राम लीला के मेले में अवध प्रान्त के लोगों का स्वभाव रेल अयोध्या और इधर राह में मिलने से खूब मालूम हुआ।
बैसवारे के यूरुष अभिमानी रूखे और रसिकमन्य होते हैं, रसिकमन्य ही नहीं वीरमन्य भी । पुरुष सब पुरुष और सभी भीम, सभी अर्जुन, सभी सूत पौराणिक और सभी वाजिदअली शाह। मोटी मोटी बातों को बड़े आग्रह से कहते सुनते हैं।
नई सभ्यता अब तक इधर नहीं आई है। रूप कुछ ऐसा नहीं पर स्त्रियां नेत्र नचाने में बड़ी चतुर। यहां के पुरुषों की रसिकतर मोटी चाल सुरती और खड़ी मोंछ में छिपी है और स्त्रियों की रसिकता मैले वस्त्र और सूप ऐसी नथ में । अयोध्या में प्रायः सभी ग्रामीण स्त्रियों के गोल आते हुए मिले। उनका गाना भी मोटी रसिकता का। मुझे तो उनकी सब गीतों में “बोलो प्यारी सखियां सीताराम राम राम” यही अच्छा मालूम हुआ। राह में मेला जहां पड़ा मिलता था वहां बारात का आनन्द दिखलाई पड़ता था।
खैर ! मैं डांक पर बैठा बैठा सोचता था कि काशी में रहते तो बहुत दिन हुए परन्तु शिव आज ही हुए क्योंकि वृषभवाहन हुए। फिर अयोध्या याद आई कि हा! यह वही अयोध्या है जो भारतवर्ष में सब से पहले राजधानी बनाई गई। इसी में महात्मा इक्ष्वाकु, मान्धाता, हरिश्चन्द्र, दिलीप, अज, रघु, श्री रामचन्द्र हुए हैं और इसी के राजवंश के चरित्र में बड़े बड़े कवियों ने अपनी बुद्धिशक्त्रि की परिचालना की है। संसार में इसी अयोध्या का प्रताप किसी दिन व्याप्त था और सारे संसार के राजा लोग इसी अयोध्या की कृपाण से किसी दिन दबते थे वही अयोध्या अब देखी नहीं जाती। जहां देखिए मुसलमानों की कब्रें दिखाई पड़ती हैं। और कभी डांक पर बैठे रेल का दुःख याद आ जाता कि रेलवे कम्पनी ने क्यों ऐसा प्रबन्ध किया है कि पानी तक न मिले।
एक स्टेशन पर एक औरत पानी का होल लिए आई भी तो गुपला गुपला पुकारती रह गई, जब हम लोगों ने पानी मांगा तो लगी कहने कि “रह: हो पानियैं पानी पड़ल हो, फिर कुछ जियादा जिद में लोगों ने मांगा तो बोली “अब हम गारी देव” वाह! क्या इंतजाम था, मालूम होता था रेलवे कम्पनी स्वभाव (Nature) की बड़ी शत्रु है क्यौंकि जितनी बातें स्वभाव से सम्बन्ध रखती हैं अर्थात खाना, पीना, सोना, मल मूत्र त्याग करना इन्हीं का इस में कष्ट है। शायद इसी से अब हिन्दुस्तान में रोग बहुत हैं। कभी सराय की खाट के खटमल और भटियारियों का लड़ना याद आयाँ। यही सब याद करते कुछ सोते जागते हिलते हिलते आज बस्ती पहुंच गए। बाकी फिर।
कुआनो नदी:-
यहां एक नदी है उसका नाम कुआनो। डेढ़ रुपया पुल का गाड़ी का महसूल लगा। बस्ती के जिले की उत्तर सीमा नैपाल, पश्चिमोत्तर की गोंडा, पश्चिम दक्षिण अयोध्या और पूरब गोरखपुर है। नदियां बड़ी इस में सरयू और इरावती। सरयू के इस पार बस्ती उस पर फैजाबाद। छोटी नदियों में कुवानो मनोरमा, कठनईया , आमी, बानगंगा और जमबर है। बखिरा ताल और जिरजिरवा (चंदों) दो बड़ी झील भी हैं। बांसी, बस्ती और मग़हर तीन राजा भी हैं। बस्ती सिर्फ चार पांच हजार की बस्ती है पर जिला बड़ा है क्यौंकि जिले की आमदनी चौदह लाख है। साहब लोग यहां कुल दस बारह हैं, उतने ही बंगाली हैं।
पुरानी बस्ती
पुरानी बस्ती खांई के बीच में बसी है। राजा के महल बनारस के अर्दली बाजार के किसी मकान से उमदा नहीं। महल के सामने मैदान, पिछवाड़े जंगल और चारों ओर खांई है। पांच सौ खटिकों के घर महल के पास हैं जो आगे किसी जमाने में राजा के लूटमार के मुख्य सहायक थे। अब राजा के स्टेट के मैनेजर कूक साहब हैं। यहां के बाजार का हम बनारस के किसी भी बाजार से मुकाबिला नहीं कर सकते । महज बेहैसियत | महाजन एक यहां हैं वह टूटे खपड़े में बैठे थे। तारीफ यह सुना कि साल भर में दो बेर कैद होते हैं क्यौंकि महाजन पर जाल करना फर्ज है और उस को भी छिपाने का शऊर नहीं। यहां का मुख्य ठाकुर द्वारा दो तीन हाथ चौड़ा और उतना ही लम्बा और उतना ही ऊंचा बस। पत्थर का कहीं दर्शन भी नहीं। यह हाल बस्ती का है। कल डांक ही नहीं मिली कि जायं।
मेंहदावल की सड़क
मेंहदावल की कच्ची सड़क है इस से कोई सवारी नहीं मिलती आज कहार ठीक हुए हैं। भगवान ने चाहा तो शाम को रवाना होंगे। कल तो कुछ तबीअत भी गड़वड़ा गई थी इस से आज खिचड़ी खाई। पानी यहां का बड़ा बातुल है। अकसर लोगों का गला फूल जाता है, आदमी ही का नहीं कुत्ते और सुग्गे का भी। शायद गला फूल कबूतर यहीं से निकले हैं। बल अब कल मेंहदावल से खत लिखेंगे।
मेंहदावल :-
आज सुबह सात बजे मेंहदावल पहुंचे । सड़क कच्ची है, राह में एक नदी उतरनी पड़ती है उस का नाम आमी है। छह आना पुराना महसूल लगा। रात को ग्यारह बजे पालकी पर सवार हुए। बदन खूब हिला। अन्न भी नहीं पचा। इस वक्त यहां पड़े हैं। यहां मक्खी बहुत हैं और आबादी बहुत है। दो लड़कों के स्कूल हैं और एक लड़कियों का स्कूल है और एक डाक्टर खाना है। बस्ती शहर है मगर उस से यह मेंहदावल गांव बहुत आबाद है।
फैजाबाद में 5॥) (साढ़े पांच रुपये) बस्ती तक डांक का लगा और बस्ती से मेंहदावल तक 3॥) (तीन रुपये बारह आने) पालकी का। अभी एक गंवार भाट आया था। बेतरह बका। फूहर औरतों की तारीफ में एक बड़ा भारी पचड़ा पढ़ा | यहां गरमी बहुत है और मक्खियां लखनऊ से भी जियादा । दिन को बड़ी बेचैनी है। यहां की औरतों का नाम श्यामतोला, गमतोला, मनतोरा इत्यादि विचित्र होता है और नारंगी को भी यही श्यामतोला कहते हैं जो संगतरा का अपभ्रंश मालूम होता है क्योंकि यहीं के गंवार संतोला कहते हैं। यहां एक नाऊ बड़े पंडित थे। उन से किसी पंडित ने प्रश्न किया “कि दूध” (तुम कौन जात हो) तब नाई ने जवाब दिया
“चटपटाक चटपटाक” (नाई)।
तब ब्राह्मण ने कहा “तं दूर! (तुम दूर जाओ), तब नाई ने जवाब दिया “कि छौरं! (तब मूड़ कौन मूड़ैगा)।
एक का बाप डूब कर मर गया उस के बाप का पिंडा इस मन्त्र से कराया गया।
“आर गंगा पार गंगा बीच में पड़ गई रेत।
तहां मर गए नायका चले बुज बुजा देत।"
धर दे पिडवा |
कुछ फुटकर हाल भी यहां का सुन लीजिए। कल मजहब का हाल हमने नीचे लिखा था। उस का अच्छी तरह से हाल दरयाफ्त किया तो मालूम हुआ कि हमारे ही मजहब की शाखा है। इनके ग्रन्थों में हमने एक श्लोक श्रीमहाप्रभुजी की सुवोधिनी की कारिका का देखा, इसी से हम को सन्देह हुआ। फिर हम ने बहुत खोद खाद कर पूछा तो यह साफ मालूम हुआ कि इसी मत से यह मत निकला है क्योंकि एक बात वह और बोले कि हमारा मत श्री बललभाचारज की टीका में लिखा है। इन लोगों के उपास्य श्रीकृष्ण हैं और एकादशी,शालग्राम, मूर्त्तिपूजा, तीर्थ किसी को नहीं मानते। इन के पहिले आचार्य्य देवचन्द जी थे, जो जात के कायस्थ थे और दूसरे प्रणनाथजी, जो कच्छ के क्षत्री (भाटिया) थे। इमारे ही मत की शाखा सही पर विचित्र मत है। वैष्णव होकर मूर्त्तिपूजा का खंडन करने वाले यही लोग सुने। यहां बूढ़े को ख़बीस, व्रत को बेनी राम, भोजन को बुननी, जात को दूध, ऐसे ही अनेक विचित्र विचित्र बोली हैं। गांव गन्दा वड़ा है और लोग परले सिर के बेवकूफ । यहां से चार मील पर एक मोती झील वा बखरा ताल नामक झील है! दर हकीकत देखने के लायक है। कई कोस लम्बी झील है और जानवर तरह तरह के देखने मे आते हैं। पहाड़ से चिड़ियां हजारों ही तरह की आती हैं 3॥रुपए में मछली भी इफ़रात। पेड़ों पर बन्दर भी | मेंहदावल में कोई चीज भी देखने लायक नहीं। जहां देखो वहां गन्दगी। लोग बज्र मूर्ख, क्षत्री ब्राह्मण जियादा। एक यहां प्राननाथ का मजहब है और दस बीस लोग उस के मानने वाले हैं। ये लोग एकादशी तीर्थ वगैरह को नहीं मानते और सुने सुनाए दो तीन श्लोक जो याद कर लिए हैं बस उसी पर चूर हैं।
“मदीनास्यां शरदां शर्तं' और
“गोविंद गोकुलानन्द मक्केश्वरं”
यहश्लोक पढ़ के कहते हैं कि वेद में मक्का मदीने का वर्णन है। ऐसे ही बहुत वाहियात बात कहते हैं और कोई कितना भी कहै कुछ सुनते नहीं। कहते हैं कि गोलोक का नाश है और गोलोक ऊपर एक “अखंड मंडलाकारं” लोक है, उस में मेरे कृष्ण हैं। इन का मजडब एक प्राणनाथ नामक एक क्षत्री ने पन्ना में करीब तीन सौ बरस हुए चलाया था। यहां चैत सुदी भर रात को औरतें जमा, होकर माता का गीत गाती हैं और बड़ा शोर करती हैं। असभ्य बकती हैं। व्यभिचार यहां बेतकल्लुफ है।
विचित्र ब्राह्मण:-
सरयू पार के ब्राह्मण बड़े विचित्र हैं। मांस मछली सब खाते हैं। कुएं के जगत पर एक आदमी जो पानी भरता हो दूसरा आदमी चला आवे तो अपना घड़ा फोड़ डालें और उससै घड़े का दाम ले। घड़ा कोई कहै तो घड़ा छू जाय क्योंकि घड़ा मुसलमानी लफ़्ज है, दाल कहै तो छू जाय क्योंकि दाल मुसलमानी है। सूरज वंशी छत्री राजा बाबू को छाता नहीं लगता। क्यौंकि वे तो सूरज वंशी हैं, सूरज से क्या छाता लगावें। नेम बड़ा धर्म्म बिलकुल नहीं। एक ब्राह्मण ने कोहार से नई सनहकी मोल लेकर उस में पूरी बनाकर खाया, इस से वह जात से निकाल दिया गया क्योंकि जैसे बर्तन में मुसलमान खाना बनावैं उस आकार के बरतन में इसने हिन्दू होकर खाना बनाया। ह हा हा! और मजा यह कि ताजिए को सब मानते हैं। मेंहदावल में एक थाना है। थानेदार यहां के बादशाह हैं। एक डाक्टरखाना भी है। यह बड़ा सरकार का पुन्य है। बस हम को तो सरकार के पुन्य के कसर यही मालूम होती है कि पुलों पर महसूल लिया जाता है क्यौंकि भला नाव या ऐसे पुल पर महसूल लगै तो ठीक है जिसकी हर साल मरम्मत हो, पक्के पर भी महसूल ।
बस्ती में अगरवाला नहीं, एक हैं सो जूता उतार कर लायची खाते हैं। मेंहदावल में एक अगरवाले हैं। मुसलमान फर्श पर यहां नहीं बैठते हैं ।पिंडारे जिनको इस जिले में जमीन मिली हैं अव नवाब हो गए हैं और उन की मुस्तैठी आराम से बदल गई है। यहां कहीं कहीं धारू लोगों का रक्खा सोना खोदने से अब तक मिलता है। यहां के बाबू ऐसे हठी कि बंगला गिर पड़ा पर जूता उलटा था।खिदमतगार को पुकारा वह न आया, इस से आप वहां से न चले और दब कर मर गए।।
संदर्भ स्रोत : पुस्तक : 'भारतेंदु के निबंध',
संपादक : केसरीनारायण शुक्ल
रचनाकार : भारतेंदु हरिश्चंद्र
प्रकाशन : सरस्वती मंदिर जतनबर,बनारस।
प्रस्तुतकर्ता लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183
भोजशाला के ऐतिहासिक सत्य की जीत: सच आने में लगे हजारों साल ✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
परमार वंश के महानतम सम्राट राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) विद्या के एक महान संरक्षक होने के नाते, धार में एक सरस्वती महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में भोजशाला के नाम से जाना जाने लगा जहां दूर-दूर से छात्र अपनी बौद्धिक प्यास बुझाने और नए नए ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे।
कमाल मौलाना मस्जिद कब बना
मध्य प्रदेश के धार में स्थित कमाल मौला मस्जिद (भोजशाला परिसर) का निर्माण 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी द्वारा करवाया गया था। बाद में, 1514 ईस्वी के आसपास महमूद शाह खिलजी द्वितीय के शासनकाल में मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके इस ढांचे को मस्जिद का रूप दिया गया और सूफी संत कमाल मौला के नाम से जोड़ा गया।
कौन थे कमाल मौला-
कमालुद्दीन मालवी को कमाल मौला के नाम से जाना जाता था. 13वीं-14वीं सदी के दौरान वे चिश्ती संप्रदाय से जुड़े एक सूफी संत थे। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक वे प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य और समकालीन थे। माना जाता है कि कमालुद्दीन दिल्ली से मालवा क्षेत्र की यात्रा पर निकले और धार में बस गए थे । यहां उन्होंने लगभग चार दशकों तक इस्लामी शिक्षाओं और सूफी परंपराओं का प्रचार-प्रसार किया था।वक्त के साथ इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी भोजशाला परिसर के साथ गहराई से जुड़ गई थी।
भोजशाला का कमाल मौला से जुड़ाव
कमाल मौला कई सालों तक भोजशाला परिसर के पास ही रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद इस परिसर के पास ही एक मजार या फिर समाधि बनाई गई। धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों ने इस संत के साथ क्षेत्र के जुड़ाव की वजह से इस जगह को कमाल मौला मस्जिद कहना शुरू कर दिया था । बाद में यह दोहरी पहचान भारत के सबसे संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों में से एक का केंद्र बन गई थी।
विवाद की पृष्ठभूमि:
भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित 11वीं शताब्दी का एक स्मारक है। हिंदू समुदाय इसे देवी सरस्वती (बाग्देवी) का मंदिर मानता था, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे मस्जिद मानता था। 2003 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक व्यवस्था की जिसके तहत हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दी गई थी ,जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी । ऐसा कांग्रेस की नीति के तहत पुरातत्व विभाग के गजट नोटिफिकेशन के तहत हुआ था।
इस भोजशाला या सरस्वती मंदिर के अवशेष आज भी प्रसिद्ध कमाल मौलाना मस्जिद में अनेक स्थलों पर बहुतायत से देखे जा सकते हैं, जिसे धार के बाद के मुस्लिम शासकों ने मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था। मस्जिद में एक विशाल खुला प्रांगण है जिसके सामने बरामदा, किनारों पर स्तंभ और पश्चिम की ओर पीछे एक बड़ा प्रार्थना कक्ष है। मस्जिद के ऊपर लगे नक्काशीदार स्तंभ और प्रार्थना कक्ष की सूक्ष्म नक्काशीदार छतें भोज शाला से संबंधित प्रतीत होती हैं। मस्जिद की दीवारों पर लगी नक्काशीदार पत्थर की शिलाओं से बहुमूल्य कला कृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
विष्णु और कूर्म अवतार की स्तुति और अन्य श्लोक खुदे इन शिलाओं पर प्राकृत भाषा में विष्णु के कुर्मावतार अवतार की दो स्तुतियाँ लिखी हुई हैं। स्थल पर सर्पबंध स्तंभों पर दो शिलालेख भी हैं, जिनमें से एक में संस्कृत वर्णमाला और संज्ञा एवं क्रिया के मुख्य विभक्ति रूप अंकित हैं, और दूसरे में संस्कृत व्याकरण के दस कालों और भावों के व्यक्तिगत रूप अंकित हैं। ये शिलालेख 11वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी के अक्षरों में हैं। इसके ऊपर अनुष्टुप छंद में दो संस्कृत श्लोक खुदे हुए हैं। पहला श्लोक राजा भोज के तुरंत बाद गद्दी पर बैठने वाले परमार राजाओं उदयदित्य और नरवर्मन की स्तुति करता है। दूसरे श्लोक में कहा गया है कि स्तंभ शिलालेख उदयदित्य द्वारा स्थापित किया गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजा भोज का सरस्वती महाविद्यालय या मंदिर यहीं स्थित था और इसका विकास उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया गया था।
गहन खोज और निरीक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि मेहराब की अस्तर बनाने वाली दो विशाल काली पत्थर की शिलाओं के पीछे की ओर शिलालेख पाए गए हैं। ये शिलालेख शास्त्रीय संस्कृत में रचित एक नाट्य रचना है। यह अर्जुन वर्मा देव के शासनकाल (1299-10 से 1215- 18 ईस्वी) के दौरान उत्कीर्ण की गई थी। इस नाट्य रचना को राजगुरु मदन ने काव्य रूप में लिखा था, जो प्रसिद्ध जैन विद्वान आशाधरा के शिष्य थे। आशाधरा परमारों के दरबार की शोभा बढ़ाते थे और उन्होंने ही मदन को संस्कृत काव्यसिखाया था। इस नाट्य को कर्पूर मंजरी कहा जाता है और इसका मंचन वसंत उत्सव के दौरान धार में किया जाता था। यह अर्जुन वर्मा देव के सम्मान में रचा गया था, जिन्हें उन्होंने शिक्षा दी थी और जिनके दरबार की शोभा बढ़ाई थी। यह नाट्य परमारों और चालुक्यों के बीच हुए युद्धों को संदर्भित करता है, जिनका अंत वैवाहिक संधि द्वारा हुआ था।
“धार में उस समय व्याप्त सभ्यता और परिष्कार की उच्च अवस्था की झलक मिलती है, जिसे महलों का शहर और उसके चारों ओर पहाड़ियों पर फैले सुंदर उद्यानों वाला शहर बताया गया है। लोग भोज की महिमा पर गर्व करते थे, जिन्होंने धारा को मालवा की रानी बनाया था।” धार के संगीतकारों और विद्वानों की उत्कृष्टता का भी उल्लेख किया गया है। यह शाला, जिसकी स्थापना संभवतः भोज ने की थी और जिसे उनके योग्य उत्तराधिकारियों ने संरक्षण दिया था, 14वीं शताब्दी ईस्वी में एक मस्जिद में परिवर्तित हो गई थी।
यह मूल रूप से सरस्वती (ज्ञान की देवी) का मंदिर था, जिसका उल्लेख कवि मदन ने संभवतः अपने नाटक में किया है। कहा जाता है कि यह मंदिर धरणनगरी के 84 चौकों की शोभा था, जो महलों, मंदिरों, महाविद्यालयों, रंगमंचों और उद्यानों का शहर था। देवी सरस्वती की प्रतिमा अब लंदन संग्रहालय में है। धार के आसपास से सरस्वती की एक और प्रतिमा मिली है, जो देवी की पहली प्रतिमा से काफी मिलती-जुलती है।
उच्च न्यायालय के आदेश ने 500 वर्षों का अवैध कब्जे को खारिज किया मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने घोषणा की है कि भोजशाला में विवादित ऐतिहासिक स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है। एएसआई की रिपोर्ट में यहां 94 हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और परमार कालीन सिक्के मिलने की पुष्टि हुई थी।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए, न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा:
"हमने इस स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता देखी है, हालांकि समय के साथ इसमें नियमन हुआ है... हमें यह जानकारी मिली है कि इस स्थान का ऐतिहासिक साहित्य इसे राजा भोज से जुड़े संस्कृत शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित करता है... यह धार में देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर के अस्तित्व को इंगित करता है... इसलिए, इस क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप भोजशाला माना जाता है, जिसमें देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है।"
न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 2003 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें परिसर के भीतर पूजा करने के हिंदुओं के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया था और मुस्लिम समुदाय को वहां नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।हालांकि, मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए, न्यायालय ने उन्हें धार जिले के भीतर मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी। न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसा आवेदन किया जाता है, तो राज्य कानून के अनुसार उक्त आवेदन पर विचार कर सकता है।
मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने और पक्षों के बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए, यदि प्रतिवादी संख्या 8 (मौलाना कमालुद्दीन कल्याण समिति) धार जिले में मस्जिद या प्रार्थना स्थल के निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है, तो राज्य उक्त आवेदन पर कानून के अनुसार विचार कर धार जिले में मुस्लिम समुदाय को उपयुक्त और स्थायी भूमि का आवंटन कर सकता है, जिसका प्रतिनिधित्व प्रतिवादी संख्या 8, हस्तक्षेपकर्ताओं या विधिवत गठित वक्फ निकाय के माध्यम से मस्जिद और संबंधित धार्मिक सुविधाओं के निर्माण और प्रशासन के लिए किया जा सकता है। तदनुसार, याचिका संख्या 10497/2022 और याचिका संख्या 10484/2022 को स्वीकार कर लिया गया है और उनका निपटारा कर दिया गया है।
केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर और परिसर में स्थित संस्कृत शिक्षण के प्रशासन और प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। एएसआई के पास परिसर का समग्र प्रशासन बना रहेगा। न्यायालय ने कहा - "प्रत्येक सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह न केवल ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के मंदिरों सहित प्राचीन स्मारकों और उनकी संरचनाओं के संरक्षण और सुरक्षा को सुनिश्चित करे, बल्कि गर्भगृहों के साथ-साथ आध्यात्मिक महत्व के देवी- देवताओं की भी रक्षा करे।"
लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में वर्तमान में रखी मूर्ति को वापस लाने और पुनर्स्थापित करने की याचिका के संबंध में, अदालत ने फैसला सुनाया -
याचिकाकर्ताओं ने भारत सरकार को पहले ही कई अभ्यावेदन दिए हैं। भारत सरकार लंदन संग्रहालय से देवी सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने और उसे संग्रहालय परिसर में पुनः स्थापित करने के लिए उनके अभ्यावेदनों पर विचार कर सकती है।
15 मई को एक ऐतिहासिक फैसले में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने घोषणा की कि धार शहर में स्थित भोजशाला परिसर हिंदू ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है, न कि एक इस्लामी स्थल।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए, इस स्थल के ऐतिहासिक चरित्र को 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा के केंद्र के रूप में पुष्टि की।
अदालत ने हिंदू पूजा की निरंतरता का हवाला दिया, हालांकि नियमों और प्रतिबंधों के साथ, भोजशाला परिसर के ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और हाल ही में एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण का हवाला दिया जिसमें संरचना में शामिल मंदिर के अवशेष दिखाए गए थे। पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कोर्ट में 2100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। कोर्ट ने रिपोर्ट के तथ्यों को महत्वपूर्ण माना, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे गलत बताया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
98 दिनों तक चले सर्वे के बाद तैयार रिपोर्ट में कई अहम तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार खुदाई के दौरान मूर्तियां, सिक्के और कई ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। इसमें कहा गया कि परमारकालीन भवन की नींव के पत्थरों पर बाद में निर्माण किया गया, जबकि सर्वे में मिले स्तंभों और वास्तुकला से संकेत मिलता है कि ये पहले मंदिर का हिस्सा रहे होंगे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण में उपयोग किया गया।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि परिसर में चारों दिशाओं में 106 खड़े और 82 आड़े स्तंभ मिले, यानी कुल 188 स्तंभ पाए गए। इन स्तंभों की बनावट से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे मूल रूप से मंदिर स्थापत्य का हिस्सा थे। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया कि स्तंभों पर बनी देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में औजारों से क्षतिग्रस्त किया गया था।
दीवारों पर मिलीं देवी-देवताओं की आकृतियां
सर्वे के दौरान टीम को भोजशाला की दीवारों पर देवी-देवताओं की आकृतियां मिलीं। रिपोर्ट में उन मूर्तियों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें पहले परिसर से निकालकर मांडू संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था। बताया गया कि ये मूर्तियां भी भोजशाला परिसर से ही मिली थीं और संरक्षण के उद्देश्य से संग्रहालय में रखी गई थीं। खुदाई में मिली कलाकृतियां संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से तैयार की गई थीं। इनमें गणेश, नृसिंह, भैरव, देवी-देवताओं और पशुओं की आकृतियों के चिन्ह मिले हैं।
सर्वे में दो ऐसे स्तंभ भी मिले हैं, जिन पर “ॐ सरस्वत्यै नमः” लिखा हुआ है। सर्वे रिपोर्ट के पेज नंबर 148 में उल्लेख किया गया है कि भोजशाला में मौजूद स्तंभों की वास्तुकला यह दर्शाती है कि वे पहले मंदिर का हिस्सा थे और मस्जिद निर्माण के दौरान बेसाल्ट के ऊंचे चबूतरों पर उनका दोबारा उपयोग किया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक स्तंभ पर देवी-देवता की आकृति मौजूद है। पूर्वी हिस्से में स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राकृत भाषा की दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 छंद हैं। पश्चिम में स्थित मेहराब की दीवारें बेसाल्ट से बने चबूतरे से सटी हुई हैं, जिनके नीचे नक्काशी दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार चबूतरे और मेहराब की दीवारों की निर्माण शैली अलग-अलग है।
पहले भी हो चुका है भोजशाला का सर्वे-
रिपोर्ट में बताया गया कि अंग्रेज शासन काल में भी भोजशाला का सर्वे हुआ था। इसके अलावा वर्ष 1987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिंदू धर्म से जुड़ी 32 मूर्तियां मिली थीं। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान संरचना यानी कमाल मौला दरगाह के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया था।
खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा-पाठ के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया था और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि मुस्लिम समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए धार जिले में वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिसे राज्य सरकार को कानून के अनुसार करना चाहिए। संरक्षित स्मारक का समग्र प्रशासन एएसआई के पास रहेगा , और केंद्र सरकार तथा एएसआई को मंदिर और संस्कृत विरासत के उचित प्रबंधन और संरक्षण के लिए निर्देश दिए गए हैं।
11 मार्च 2024 को उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को भोजशाला परिसर में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन करने का निर्देश दिया था । एएसआई ने 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय को 2,189 पृष्ठों की सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत की। सर्वेक्षण रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मौजूदा संरचना पूर्व में मौजूद मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई थी, जिसे संशोधित करके मस्जिद में परिवर्तित किया गया था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जांच के दौरान 12वीं से 20वीं शताब्दी तक के शिलालेख मिले हैं, जो संस्कृत, प्राकृत, नागरी लिपि में स्थानीय बोलियों, अरबी और फारसी सहित कई भाषाओं और लिपियों में लिखे गए हैं।
मध्य प्रदेश की हाईकोर्ट ने धार भोज शाला मामले में बड़ा फैसला आया है। हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह परिसर हिंदू मंदिर है। हाईकोर्ट ने धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिरऔर संस्कृत शिक्षा का केंद्र माना है।इसी के साथ हिंदुओं को पूजा का अनुमति भी मिल चुकी है। इतना ही नहीं कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिए धार जिले में अलग जमीन के लिए सरकार से संपर्क करने की छूट दी गई है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा धार की पवित्र भोजशाला को माँ वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष की आस्था एवं पूजा-अर्चना के अधिकार को मान्यता देना सनातन संस्कृति, सत्य और इतिहास की महत्वपूर्ण विजय है।
भोजशाला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का गौरवशाली प्रतीक है। वर्षों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विषय पर आया यह निर्णय न्यायपालिका के प्रति विश्वास को और सशक्त करता है।
वर्तमान कार्यवाही स्थल के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से संबंधित कई याचिकाओं के परिणामस्वरूप शुरू हुई है। पहली याचिकाओं में से एक में हिंदू समुदाय के लिए स्थल को पुनः प्राप्त करने की मांग की गई थी, जबकि मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने से रोकने की मांग की गई थी। इसके मद्देनजर, उच्च न्यायालय ने स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था , जिसे मुस्लिम समुदाय की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी रूप से रोक दिया था। बाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने , पक्षों को प्रतियां उपलब्ध कराने और अंतिम सुनवाई में उनकी आपत्तियों पर विचार करने के लिए एक समय बद्ध प्रक्रिया निर्धारित की ।
इस आदेश के अनुसरण में, वर्तमान कार्यवाही 6 अप्रैल को उच्च न्यायालय के समक्ष शुरू हुई । इसके बाद, उच्च न्यायालय ने एएसआई को सर्वेक्षण कार्यवाही के वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने और संबंधित पक्षों को इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
हिंदू समुदाय से संबंधित याचिका कर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील ने तर्क दिया कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के शासनकाल का एक मंदिर था, जो देवी सरस्वती को समर्पित था और वर्तमान संरचना में पुरातात्विक, ऐतिहासिक और शिलालेख-आधारित साक्ष्य मौजूद हैं जो एक पूर्व-अस्तित्व वाले हिंदू धार्मिक स्थल को दर्शाते हैं ।
मुस्लिम समुदाय से संबंधित पक्षों के वकीलों ने तर्क दिया कि खिलजी काल के ऐतिहासिक अभिलेखों और समकालीन लेखों में धार में स्थित किसी भी सरस्वती मंदिर के विध्वंस का उल्लेख नहीं है । वकीलों ने धार के तत्कालीन शासक द्वारा 1935 में जारी किए गए उस आदेश की वैधता का भी हवाला दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को मंदिर स्थल पर नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
जैन समुदाय से संबंधित पक्षों के वकीलों ने प्रार्थना करने के अधिकार की मांग करते हुए तर्क दिया कि ब्रिटिश संग्रहालय में मिली मूर्ति जैन देवी अंबिका की है। वकीलों ने दावा किया कि यह स्थल माउंट आबू के मंदिरों के समान स्थापत्य विशेषताओं को प्रदर्शित करता है।
सरकार के वकील ने तर्क दिया कि 1935 का ऐलन अमान्य था क्योंकि यह स्थल पहले से ही 1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित घोषित किया जा चुका था । इसके बाद, 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत, एएसआई ने इस स्थल के संरक्षक और अभिभावक के रूप में कार्य किया।
यह फैसला भारत की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, सनातन परंपरा के सम्मान और ऐतिहासिक सत्य की पुन: र्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,
Pin 272001,उत्तर प्रदेश, (INDIA)
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Friday, May 15, 2026
कस्सपा बुद्ध और उनकी विरासतें✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
कस्सप बुद्ध पालि परम्परा में परिगणित चौबीसवें बुद्ध थे। संस्कृत परम्परा में कस्सप बुद्ध को 'कश्यप बुद्ध' के नाम से जाना जाता है। जो इस विश्व व्यवस्था के 28 बुद्धों में से एक थे। कस्सप बुद्ध ठीक गौतम बुद्ध से पहले के बुद्ध थे।
जन्म सारनाथ के हिरण उद्यान में :-
इनका जन्म सारनाथ के इसिपताना स्थित हिरण उद्यान में हुआ था।जहाँ गौतम बुद्ध ने वर्षों बाद अपना पहला उपदेश दिया था। 'काश्यप' गोत्र में उत्पन्न कस्सप के पिता का नाम ब्रह्मदत्त और माता का नाम धनवती था। उनके जन्मकाल में वाराणसी में राजा किकी राज्य करते थे। कस्सपा ने अपने गृहस्थी में दो हजार वर्ष बिताए, तीन अलग-अलग महलों में। ये महल हैं हंस, यस और श्रीनंद। (बु.ए. 217 में) पहले दो महलों को हंसवा और यसवा कहा गया है।) उनकी प्रमुख पत्नी सुनंदा थीं और उनका एक पुत्र था जिसका नाम विजितसेन था।
सांसारिक जीवन का त्याग :-
कस्सपा ने सांसारिक जीवन त्याग दिया और अपने महल (पासादा) में यात्रा की। उन्होंने केवल सात दिनों तक तपस्या की। ज्ञान प्राप्ति से ठीक पहले उन्होंने अपनी पत्नी से दूध-चावल का भोजन ग्रहण किया और 'सोम' नामक एक व्यक्ति ने आसन के लिए घास दिये थे। कस्सपा का शरीर बीस हाथ ऊँचा था। बोधि वृक्ष जिस वृक्ष के नीचे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया वह एक बरगद का वृक्ष था। उन्होंने इसिपताना में अपने साथ संसार त्याग चुके भिक्षुओं की सभा को अपना पहला उपदेश दिया। सुंदरनगर के बाहर एक आसन वृक्ष की तलहटी में कस्सपा ने दो चमत्कार किए। उन्होंने अपने शिष्यों की केवल एक ही सभा आयोजित की; उनके सबसे प्रसिद्ध धर्मांतरणों में एक यक्ष, नारदेव का धर्मांतरण शामिल था। उनके प्रमुख शिष्यों में भिक्षुओं में तिस्सा और भारद्वाज, और भिक्षुणियों में अनुला और उरुवेला थे। उनके निरंतर सेवक सब्बामित्त थे। उनके संरक्षकों में सुमंगला और घट्टीकार, विजितसेना और भद्दा सबसे प्रख्यात थे। कस्सप के काल में बोधिसत्त का जन्म एक ब्राह्मण के रुप में हुआ था, जिनका नाम ज्योतिपाल था।
प्राचीन सेतव्या नगर के कई समीकरण
कस्सपा का निधन चालीस हजार वर्ष की आयु में हुआ था। सेतव्या नगर के कई समीकरण मिलते हैं। कोसला (डी.ii.316) में एक नगर , जिसके पास उक्कत्था था । अंगुत्तरा निकाय (अ.ii.37) में बुद्ध और ब्राह्मण दोनो के बीच हुई बातचीत का वर्णन है , जिनसे बुद्ध की मुलाकात उक्कत्था से सेतव्या जाने वाले मार्ग पर हुई थी। यह नगर बावरी के शिष्यों (एस.एन.श्लोक 1012) द्वारा सावत्थी /श्रावस्ती से राजगृह जाने वाले मार्ग पर स्थित था और सावत्थी के बाहर पहला पड़ाव था। इसके आगे कपिलवस्तु , कुसिनारा , पावा आदि नगर थे।
सेतव्या के उत्तर में सिम्सपावन था , जहाँ कुमार कस्सपा रहते थे, और जहाँ उन्होंने ब्राह्मण पायसी को पायसी (दो या दो से अधिक ऐसे तरल पदार्थों का मिश्रण होता है जो सामान्यतः आपस में घुलते या मिश्रित नहीं होते हैं) से संबंधित सूत्र का उपदेश दिया, जो वहाँ एक शाही जागीर रखते थे (डी.ii.316)।
अंगुत्तरा टीका (ए.ए.ii.504) कहती है कि कस्सपा बुद्ध का जन्म सेतव्या में हुआ था, लेकिन बुद्धवंश और उसकी टीका दोनों कहती हैं कि उनका जन्म बनारस में हुआ था (बु.xxv.33; बु.ए.217)। बुद्धवंश टीका (बु.ए.223) आगे बताती है कि कस्सपा की मृत्यु सेतव्या के सेताराम में हुई थी, लेकिन यह भी बताती है कि सेतव्या काशी का एक शहर था ।
स्तूप निर्माण की योजना
बुद्ध कश्यप के निधन स्थल के सम्मान में और उनके अवशेषों को रखने के लिए एक योजन ऊँचा विशाल स्वर्ण स्तूप बनाया गया था। जिसकी प्रत्येक ईंट एक करोड़ रुपये की थी।
प्रारंभ में, स्तूप के आकार और निर्माण सामग्री को लेकर मतभेद थे। इन मुद्दों के सुलझने के बाद स्तूप का निर्माण शुरू हुआ। लेकिन फिर नागरिकों को पता चला कि उनके पास स्तूप को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है ।
सोरता नामक एक अनागामी भक्त ने जंबूद्वीप के मानव जगत में यात्रा की और स्तूप के निर्माण के लिए लोगों से धन का अनुरोध किया। जैसे-जैसे उन्हें धन प्राप्त होता गया, वे उसे भेजते गए, और जब उन्हें पता चला कि काम पूरा हो गया है, तो वे स्तूप की पूजा करने के लिए निकल पड़े। कहा जाता है कि संभवतः लुटेरों ने उन्हें जंगल में पकड़ लिया और उनकी हत्या कर दी, जिसे बाद में अंधवन के नाम से जाना है।
1.काशी का राजघाट
काशी के सेतव्य उद्यान में उनका परि निर्वाण हुआ। यहाँ प्रसिद्ध 'सिंशपावन' या शीशम के वृक्षों का वन था, जहाँ बुद्ध के रुकने और उपदेश देने के साक्ष्य मिलते हैं। काशी के सेतव्या स्थित सेतव्य आश्रम संभवतः राजघाट में हुआ था। सेतव्य उद्यान को श्वेत द्वीप या आदि केशव क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। वाराणसी में वरुणा और गंगा नदी के संगम पर आदि केशव घाट पर राजघाट के पास, मालवीय पुल के उत्तर-पूर्व में यह स्थित हो सकता है। यह काशी के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक प्राचीन और पवित्र स्थान है, जहाँ पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने काशी में सबसे पहले कदम रखा था। यह विष्णु पादोदक तीर्थ के नाम से भी प्रसिद्ध है।
2.श्रावस्ती के पास अंधवन टंडवा की खोज
पारंपरिक रूप से, यह स्थान भारत में श्रावस्ती या उसके आसपास के घने वनों (अंधवन = अंधेरा जंगल) से जोड़ा जाता है। चूंकि कश्यप के अस्तित्व का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है, इसलिए उन्हें पौराणिक चरित्र की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन थेरवाद बौद्धों और अधिकांश अन्य बौद्धों के लिए , कश्यप एक वास्तविक व्यक्ति थे जो बुद्ध बने ।
कस्सप बुद्ध का गाँव टंडवा था :-
सेतव्य के अवशेष उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती एक प्रमुख बौद्ध स्थल है, के आसपास के क्षेत्र में माने जाते हैं, जो बुद्ध की शिक्षाओं से जुड़ी समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं। यह प्राचीन श्रावस्ती और कपिलवस्तु के मार्ग पर स्थित था।
कस्सप बुद्ध के गाँव में प्राप्त साक्ष्य के अनुसार सबसे पहले सम्राट अशोक गए थे। वहाँ उन्होंने उनकी स्मृति में दो स्तूप बनवाए थे। ये बात ह्वेनसांग ने बताई है। फिर पाँचवी सदी में कस्सप बुद्ध के जन्म - स्थल पर फाहियान पहुँचे। उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव का नाम " टू - वेई " बताया है। फिर सातवीं सदी में कस्सप बुद्ध के गाँव ह्वेनसांग पहुँचे। उन्होंने उनका गाँव श्रावस्ती से 16 ली की दूरी पर उत्तर - पश्चिम में बताया है। आधुनिक काल में कस्सप बुद्ध के गाँव की खोज में कनिंघम पहुँचे। उन्होंने 1863 एवं 1876 में दो बार उस गाँव की यात्रा की।
टंडवा गांव का स्तूप
कश्यप बुद्ध का स्तूप भारत में उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के पास तांडवा गाँव में स्थित माना जाता है। कनिंघम ने फाहियान द्वारा कस्सप बुद्ध के बताए गए गाँव " टू - वेई " की पहचान टंडवा गाँव के रूप में की। यह टंडवा गाँव श्रावस्ती से पश्चिम 14 किमी. की दूरी पर है, जो काफी हद तक चीनी यात्रियों के बताए गए स्थान से मेल खाता है।
कनिंघम ने देखा कि टंडवा गाँव ईंट के खंडहरों के बीच बसा है। गाँव के उत्तर - पश्चिम में उन्होंने 800 फीट लंबा और 300 फीट चौड़ा ईंट के खंडहरों का टीला देखा। ह्वेनसांग ने नगर के उत्तर दिशा में कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप का आँखों देखा वर्णन किया है। कनिंघम को विश्वास हो गया कि वो यही स्तूप है, जिसे सम्राट अशोक ने कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर बनवाए थे।
स्तूप का विशाल आकार :-
स्तूप का व्यास 74 फीट था, जिसका रेखांकन कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में किया है। तब वह स्तूप खेतों से 18 फीट ऊँचा था। कनिंघम ने आसपास की सफाई करवाई। स्तूप का तोरण - द्वार और रेलिंग के अवशेष मिले। एक शिलालेख भी मिला, जिस पर " स्थाहनवा आराम " लिखा था। कनिंघम ने हनुमान गढ़ी टीले को दूसरे स्तूप के रूप में शिनाख्त की।फिर उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव की रूपरेखा का रेखांकन तैयार किया।
कनिंघम स्तूप के बीचों - बीच खुदाई कराना चाहते थे। लेकिन वे इसकी खुदाई नहीं करा पाए। कारण कि विशाल स्तूप के ऊपर शिवलिंग और सीता माई का मंदिर स्थापित था।
यदि कनिंघम स्तूप के बीचों बीच खुदाई कराने में सफल हो गए होते तो कस्सप बुद्ध के अस्थि - अवशेष और कुछेक सबूत इतिहास के लिए मिल गए होते। लेकिन स्तूप के ऊपर सीता माई के मंदिर और शिवलिंग स्थापित होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।
3.सिसवनिया देवरांव
आधुनिक संदर्भ में इसे उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुंवानो नदी तट स्थित सिसवनिया देवरांव नामक पुरातात्विक स्थल से की है। यह महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है । बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। यह आकार में बड़ा है, इसे नगर साइट कहा जा सकता है। कुंवानो सुन्दरीका नदी की धारा इस भूस्थल को दो तीन भागों में विभक्त कर रखा है।
यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। यह देखा गया है कि इस प्राचीन स्थल की औसत ऊंचाई 20 मीटर से अधिक रही है। देवराव और सिसवनिया पच्चीसा नदी के तट पर स्थित एकल सांस्कृतिक परिसर के टीले रहे हैं। ये टीले धीरे धीरे समाप्त प्राय होते जा रहे हैं। इनका अधिग्रहण संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
सिसवनिया में उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है।
देवरांव बौद्ध विहार:-
इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है। साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देखी गयी है। यह आकार में छोटा है। इसे मठ विहार का स्थल कहा जा सकता है।
4.काठमांडू में बौद्धनाथ स्तूप :-
नेपाल के काठमांडू में बौद्धनाथ नामक विशाल स्तूप कस्सप बुद्ध की स्मृति में बना हुआ है। चीनी यात्री फ़ाह्यान और ह्वेनसांग ने भी कस्सप बुद्ध के तीर्थ स्थलों की चर्चा की है।यह बुद्ध समुदाय के लोगों का धार्मिक चैत्य है। यहा साक्यमुखी बुद्ध की प्रतिमा है। शाक्यमुखी" शब्द का सीधा संदर्भ शाक्यमुनि से है, जो गौतम बुद्ध का एक प्रमुख नाम है। यह एक पर्वत की चोटी पर स्थित है, यहा नेपाल की धार्मिक भावनाओं का संगम देखने को मिलता है।
काठमांडू शहर के पूर्वी भाग में स्थित बौद्धनाथ स्तूप दुनिया के सबसे बड़े गोलाकार बौद्ध स्तूपों में से एक है । जिसके भीतर मुख्य रूप से कश्यप बुद्ध का पवित्र अवशेष (अस्थियां) रखा गया है।
महान जरुंग काशोर स्तूप , जो वर्तमान में बोधनाथ , काठमांडू , नेपाल में निर्मित है , एक प्रसिद्ध स्तूप है जिसका निर्माण छोटी पूर्णा और संवरी के नाम से जानी जाने वाली एक माता और उनके चार पुत्रों ने बुद्धों के धर्मकाया मन के समर्थन के रूप में किया था। इसके मूल अभिषेक में बुद्ध कश्यप के अवशेष स्थापित किए गए थे। इसे पूरा होने में सात वर्ष लगे। अभिषेक के समय, पुत्रों ने तिब्बत में पुनर्जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की ताकि वे बुद्ध की शिक्षाओं को उत्तरी क्षेत्रों में ला सकें और उनका प्रचार कर सकें। पुत्रों का पुनर्जन्म राजा त्रिसोंग देत्सेन , खेनपो शांतारक्षित , गुरु पद्म संभव और राजा के मंत्री नानम दोरजे दुदजोम के रूप में हुआ ।
यह एक प्रमुख यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह 14वीं शताब्दी का लगभग 36 मीटर ऊँचा और 100 मीटर व्यास वाला एक पवित्र आध्यात्मिक केंद्र है, जिसे तिब्बती बौद्ध धर्म के लिए अत्यंत महत्व पूर्ण माना जाता है। यह नेपाल का सबसे बड़ा वृत्ताकार स्तूप है ।
इस स्तूप का इतिहास विशेष रूप से प्राचीन तिब्बती बौद्ध संप्रदाय, या न्यिंगमा संप्रदाय से संबंधित है और इसका वर्णन न्यिंगमा संप्रदाय के धार्मिक इतिहास और लेखन और ग्रंथों में मिलता है।
14वीं शताब्दी में पुनर्निर्माण
दक्षिण से मुगल आक्रमण के बाद 14वीं शताब्दी में बोधनाथ का निर्माण हुआ था। प्राचीन स्तूप लगभग 1400-1500 साल पुराना माना जाता है, जिसे 5वीं शताब्दी में लिच्छवी राजा मानदेव ने बनवाया था और बाद में पुनर्निर्मित किया गया था।
यह विशाल गुंबद, ऊपर की ओर जाती सीढ़ियां और बुद्ध की आंखें (जो ज्ञान का प्रतीक हैं) इसके प्रमुख आकर्षण हैं।
2072 बी.एस. के भूकंप के बाद बोधनाथ का पुनर्निर्माण
1979 में संयुक्त राष्ट्र की विश्व धरोहर सूची में शामिल बोधनाथ, 2072 ईसा पूर्व के विनाशकारी भूकंप से क्षतिग्रस्त हो गया था। भूकंप के कारण ढह गए बोधनाथ स्तूप का पुनर्निर्माण कार्तिक 2073 ईसा पूर्व में बोधनाथ क्षेत्र विकास समिति के समन्वय, पुरातत्व विभाग की तकनीकी सहायता और विभिन्न संगठनों और निकायों की वित्तीय सहायता से पूरा हुआ। 2072 ईसा पूर्व में मंगसिर में शुरू हुआ पुनर्निर्माण कार्य कार्तिक 2073 ईसा पूर्व में पूरा हुआ। पुनर्निर्मित बोधनाथ चैत्य का उद्घाटन प्रधानमंत्री प्रचंड ने किया। तीन दिनों की वैदिक पूजा के बाद आयोजित उद्घाटन समारोह में बौद्ध रिनपोचे, विभिन्न धार्मिक नेता, राजनयिक निकायों के प्रतिनिधि और उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी उपस्थित थे। बोधनाथ क्षेत्र विकास समिति ने कहा है कि पुनर्निर्माण कार्य सरकार के किसी भी वित्तीय निवेश के बिना पूरा किया गया, जिसमें स्थानीय समुदाय और विभिन्न बौद्ध धर्मों के नेताओं के दान शामिल थे।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
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