Friday, April 24, 2026

अयोध्या के पौराणिक चंद्रहरि मन्दिर की महत्ता और उस पर आसन्न खतरा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

श्रीहरि विष्णु ने राक्षस संस्कृति के विनाश के लिए अयोध्या में राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। यह अवातर त्रेता युग में हुआ था। इसके पहले भी श्री हरि के अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा 84 कोस में लेने से जुड़े होने के संकेत मिलते हैं।अयोध्या में प्राचीन काल में हरि अर्थात भगवान विष्णु के 16 अति प्रसिद्ध मंदिर थे। कालांतर में अयोध्या में चक्रहरि चंद्रहरि धर्महरि विष्णुहरि ,गुप्तहरि, पुण्यहरि और बिल्लहरि आदि केवल सात हरि स्थान ही बचे हैं। इन स्थानों में कइयों की स्थिति वर्तमान में अत्यंत दयनीय हो चुकी है।


श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इन श्लोकों में श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं - 

सत्यायां सप्तहरयो वर्तन्ते पुण्यवर्धनाः । गुप्तहरिश्चक्रहरिस्तथा  विष्णुहरिः प्रिये ॥

धर्महरिर्बिल्वहरिस्तथा पुण्यहरिः शुभः ।  

एतेषां दर्शनाद् देवि पुण्यवृद्धिः प्रजायते।।

हे प्रिये! सत्या अर्थात् अयोध्या पुरी में सात 'हरि' हैं। इन सातों के दर्शन से पुण्य बढ़ता है। उनके नाम क्रमशः चन्द्रहरि, चक्रहरि, गुप्तहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि हैं। हे देवि! इनके दर्शनों से पुण्य की वृद्धि होती है ।

चन्द्र हरि की महत्ता भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी मां पार्वती से इस प्रकार कहते हैं - 

तस्माच्चन्द्रहरेः पूजा कर्तव्या च विचक्षणैः  

द्विजपूजा चन्द्रपूजा हरिपूजा विधानतः ॥ 

तीर्थ सेवी विद्वानों को चन्द्रहरि की पूजा करनी चाहिये, साथ ही ब्राह्मण, चन्द्रदेव तथा भगवान् श्रीहरि की भी विधान पूर्वक पूजा करनी चाहिये ।

वासुदेवप्रसादेन तत्स्थानं जातमद्भुतम् ।

तद्धि गुह्यतमं स्थानं वासुदेवस्य सुव्रते ॥ 

हे सुन्दर व्रत को धारण करनेवाली पार्वती! महाविष्णु के प्रसाद से वह चन्द्रहरि नामक तीर्थ अद्भुत महिमा वाला हो गया। महा विष्णु का वह तीर्थ अति गुप्त है ।

सर्वेषामेव  भूतानां  हेतु र्मोक्षस्य    सर्वदा ।

तस्मिन् सिद्धाः सदा विप्रा गोविन्दव्रतमास्थिताः ।

यह चन्द्रहरि नामक तीर्थ सम्पूर्ण जीवों को मोक्ष देनेवाला है। इस तीर्थ में निरन्तर विष्णु व्रत का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं ।

नानालिङ्गधरा नित्यं विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः । 

अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।

विष्णु लोक की प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले जीवन्मुक्त जन इन्द्रियों को जीतकर तथा अनेक प्रकार के शरीरादि धारण कर यहाँ परम योग का अभ्यास करते हैं ।

यथा धर्ममिहाप्नोति न तथान्यत्र कुत्रचित् । 

दानं व्रतं तथा होमः सर्वमक्षयतां व्रजेत् ॥ 

जितना धार्मिक अनुष्ठानों का फल इसतीर्थ में मिलता है,उतना अधिक फल अन्यकहीं, किसी भी तीर्थ में नहीं मिलता। यहाँ पर किया गया दान, व्रत एवं होमादि सत्कर्म- ये सब कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होते हैं।

सर्वकर्मफलावाप्तिर्जायते प्राणिनां सदा।

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं दानं च विविधं तु वै ॥ 

यहाँ सदा समस्त जीवों को उनके समस्त कर्मों के फल की प्राप्ति होती है। इसलिये सकाम तीर्थ सेवी को इस तीर्थ में अनेक प्रकार के दानों को अवश्य करना चाहिये।

अन्नदानं भूमिदानं गजदानं गवां तथा।

अश्वदानं रथानां च शिविकायास्तथैव च ॥ 

इस तीर्थ में अन्नदान, भूमिदान, गज दान, गोदान, अश्वदान, रथदान तथा पालकी दानादि यथाशक्ति करना चाहिये ।

दानादिकं विप्रपूजा दम्पत्योश्च विशेषतः । 

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पंचदश्यां विशेषतः । 

तस्य साम्वत्सरी यात्रा देवैश्चन्द्रहरेः स्मृता ॥ 

ये दानादि सत्कार्य ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि में सर्वोत्तम हैं और यहाँ पर सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करके दिया गया दान विशेष फलप्रद है। ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी को उन चन्द्रहरि जी की वार्षिकी तीर्थ यात्रा देवताओं के द्वारा समर्थित है ।

श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इसकी महत्ता इस प्रकार की गई है - 

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चन्द्रहरिं विभुम् 

वपनं तत्र कुर्वीत धर्मी तत्र विचक्षणः ॥ 

स्वर्गद्वार में तीर्थ व्रतधारी विद्वान् पुरुष स्नान करके और विभु चन्द्रहरि जी का दर्शन करके सर्वप्रथम वहीं मुण्डन कराये।

अयोध्यानिलयं विष्णुं ज्ञात्वाशीतांशुरुत्सुकः

आगच्छत् तीर्थमाहात्म्यंसाक्षात्कर्तुं सुधानिधिः ।

आगत्य चात्र चन्द्रोऽथ तीर्थयात्रां चकार सः।

अयोध्या में महाविष्णु श्रीरामचन्द्र जी सदैव निवास करते हैं, इस बात को जानकर चन्द्र देव दर्शन के लिये अति उत्कण्ठित हुए। उन सुधा निधि चन्द्र देव ने तीर्थ-महिमा जानने के अनन्तर उसका प्रत्यक्ष करनेके लिये इस अयोध्या में आकर तीर्थ यात्रा की।

क्रमेण विधिपूर्वेण नानाश्चर्यसमन्वितः । 

समाराध्य ततो विष्णुं तपसा दुश्चरेण वै ॥ 

चन्द्रमा ने अनेक प्रकार की आश्चर्यमयी घटनाओं को देखकर विधि पूर्वक क्रम से यात्रा करके अति कठिन तपश्चर्या के द्वारा महाविष्णु की आराधना की।

तत्प्रत्यक्षं समासाद्य स्वाभिधानपुरस्सरम् ।

हरिं संस्थापयामास तेन चन्द्रहरिः स्मृतः ॥ 

महाविष्णु के सामने उपस्थित होने पर चन्द्रमा ने यही वर माँगा कि आप यहाँ सदैव निवास करें तथा मेरे नाम से पीछे आपका नाम रहे, अर्थात् चन्द्र हरि नाम से आपकी प्रसिद्धि हो। इस प्रकार चन्द्र देवने अपने नाम को पूर्व में रखकर चन्द्र हरि जी की स्थापना की, अतः यह तीर्थ चन्द्र हरि नाम से विख्यात है ।

     यह माना जाता है कि ये सप्त हरि स्थानों का अस्तित्व और प्रमाण अयोध्या में लगभग 12वी शताब्दी से पूर्व से रहा है । इनमे चंद्र हरि मंदिर को 16 हरियों में चौथा स्थान प्राप्त है


चंद्रहरि मन्दिर की अवस्थिति:-

अयोध्या तीर्थ के स्वर्गद्वार की महानता को जानकर, चंद्रदेव ने वहाँ तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की सोची थी। चंद्रदेव ने भगवान विष्णु की एक प्रतिमा स्थापित कर उसकी पूजा की थी। यह प्रतिमा चंद्रहरि के नाम से प्रसिद्ध हुई। चंद्रहरि का प्राचीन मंदिर अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पैडी के पास स्थित सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर परिसर में भी कुल 5 मंदिर हैं। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में चंद्रहरि भगवान विराजमान हैं, जबकि उसके दाहिने ओर मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, बाईं ओर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर है।


द्वादश ज्योतिर्लिंग : शिव-विष्णु एकता: मंदिर के गर्भगृह में 12 शिवलिंग एक ही बड़ी 'योनि' पर स्थापित हैं, जो 'शिव मंडल' (शिव का विस्तारित परिवार) का प्रतीक हैं। ये द्वादश ज्योतिर्लिंग एक विशाल अर्घ्य के ऊपर है और वह भी मूर्ति में साक्षात ओमकार का दर्शन कराता है। चंद्र जी मंदिर का पावन वैभव अति विशिष्ट है। यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही मंदिर के परिसर में स्थित मुख्य गर्भगृह में विराजमान काले कसौटी के एक ही पत्थर में 11 मूर्तियां मौजूद हैं, जो अति महत्वपूर्ण मानी जाती हैं l माना जाता है इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और नित्य दर्शन से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस स्थान पर यह मंदिर भगवान चन्द्रमा द्वारा स्थापित किया गया था। सैकड़ों वर्षों पूर्व इस मंदिर को महाराज विक्रमादित्य द्वारा पुनः जीर्णोद्धार किया गया। तब से लेकर आज भी यह मंदिर स्थापित है।

मान्यता है कि चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने चंद्रमा को आशीर्वाद दिया कि वे जहां विराजे, वहीं चंद्रहरि मंदिर होगा।मंदिर के गर्भगृह में एक काले कसौटी के पत्थर में ही भगवान राम गरुड़ पर विराजमान हैं. जिनके साथ किशोरीजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, नल, नील अंगद, जामवंत, हनुमान और गरुण विराजमान हैं। चंद्रमा द्वारा पूजित हरि अर्थात नारायण ही चंद्र जी महादेव हैं। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन एवं धार्मिक महत्व रखता है।

         मंदिर के ठीक सामने यहां वर्तमान में राम की पैड़ी बनी हुई है, वहां सरयू की धारा प्रवाहित होती थी और त्रेता युग में यहां चंदन वन हुआ करता था। चंद्रमा द्वारा उपासना के बाद इसी वन में नारायण जी ने चंद्रमा को दर्शन दिया था।  वैसे तो अयोध्या का कण-कण सिद्धि की खान है, लेकिन स्वर्गद्वार तीर्थ अत्यंत महत्व का है और उसमें भी चंद्रहरि में हरि और हर दोनों के दर्शन होते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन:-

इस मंदिर में भगवान चंद्र्हरेश्वर के साथ बारह ज्योतिर्लिंग स्थापित है। चंद्र्हरी का मतलब होता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु की परम शक्ति वहां पर उपस्थित है और द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना भी किया गया है। पृथ्वी पर विद्यमान बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए कई स्थानों पर जाते है और उस स्थान के पुण्य प्राप्ति के लिए वह सिर्फ अयोध्या के इस चन्द्र हरि में दर्शन करने से प्राप्त होता है । जो व्यक्ति जो कमाना लेकर आता है उसे उस प्रकार की फल की प्राप्ति होती है।

गोदांबा महोत्सव:-

इस मंदिर की परंपरानुसार प्रत्येक वर्ष के एक माह तक धनुर्मास महोत्सव का आयोजन होता है। जिसे श्री गोदाम्बा पर्व कहा जाता है। मंदिर का वार्षिकोत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसमें एक महीने तक प्रतिदिन खीर और खिचड़ी से भगवान की सेवा की जाती है। इसका प्रसाद सैकड़ों लोगों में वितरित किया जाता है। 14 जनवरी को समापन के दिन भव्य भंडारा और संत सेवा होती है। मंदिर की परंपरा और पूजन पद्धति आगम है। मंदिर परिसर में गोदांबा जी का मंदिर भी निर्माणाधीन है. गोदांबा जी साक्षात लक्ष्मी जी ही हैं, जो भगवान रंगनाथ की पटरानी हैं और भगवान रंगनाथ अयोध्या के कुलदेवता हैं। इस नाते गोदांबा जी अयोध्या की कुलदेवी हुईं। मंदिर पर निरंतर पूजन स्त्रोत का पाठ आदि चलता रहता है।

उद्धार की प्रतीक्षा में खंडहर हो चुके प्राचीन धर्मस्थल का असलियत :-

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इस स्थान का उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इन पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान , हनुमान और पराशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की भगवान जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

मंदिर के प्राचीन कूप को हमेशा हमेशा के लिए ढककर बना दी गई मीनार नुमा मस्जिद :-

इस मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक होते हैं। स्कंध पुराण में स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्ग द्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते है। तथा लिखा है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु की परम शक्ति व गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होती है। इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l इस स्थान पर मस्जिद के अवशेष बचे हैं, जिसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। अब यह खंडहर बन गया है। इसे आसपास के लोगों को कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और अयोध्या के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। इस मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l ये स्थल सैकड़ों साल से वीरान होकर अब खंडहर बन चुके हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं ।


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लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

मोबाइल नंबर +919412300183


Sunday, April 19, 2026

मंहगा विद्युत टैरिफ से जनता परेशान सार्वजनिक खपत पर सरकार लापरवाह✍️डॉ राधेश्याम द्विवेदी


दिन में सार्वजनिक स्ट्रीट लाइटों का जलना एक गंभीर समस्या है, जिससे बड़ी मात्रा में बिजली बर्बाद होती है और सरकारी धन की क्षति होती है। यह स्थिति अक्सर लापरवाही और खराब रखरखाव के कारण पैदा होती है। 

उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में ऐसी खबरें आम हैं, जहाँ दिन में बिजली बर्बाद होने से आम जनता का ही पैसा बर्बाद होता है। एक ओर स्मार्ट मीटर के महंगे टैरिफ से आम जनता तरह तरह की समस्याओं से जूझ रही है वहीं सरकारी लापरवाही से प्रकान्तर से जनता ही पिसी जा रही है। अधिकारियों में न प्रवेक्षण की कोई मार्गदर्शन है और ना ही विद्युत कर्मचारियों में स्वेक्ष्या आत्मदृष्टि।

शहर गांव और नगर पंचायतों के करीब सभी रास्तों व पार्कों में स्ट्रीट लाइट लगी होती हैं। ताकि लोगों को रात के समय सड़क या पार्क में आनेजाने पर अंधेरे से परेशानी ना हो। लेकिन प्रशासन की लापरवाही से रोड लाइटें रात के अलावा दिनभर भी जलती रहती है। जहां एक ओर जनता बिजली कटौती व ट्रिपिंग की समस्या से जूझ रही है। वहीं दूसरी ओर दिनभर रोड लाइट जलने से बिजली व्यर्थ खर्च हो रही है। ये बिजली बचे तो बिजली कटौती की समस्या से कुछ राहत मिल सकती है।

शहर के कई हिस्सों में दिन के समय भी नगर परिषद की स्ट्रीट लाइटें जलती रहती देखी जाती हैं, ना तो परिषद व ना ही जिला प्रशासन की इस ओर ध्यान दे पा रहा  है। खास बात तो यह है कि अधिकतर लाइटों के आन आफ करने के स्वीच तक नहीं है। इसके कारण आम आदमी चाह कर भी इन जलती हुई लाइटों को बंद नहीं कर पाता है। वहीं कई समाजसेवी संस्थाओं की ओर से अधिकारियों को इस बारे में सूचित भी किया जाता है, लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा रहता है।

नगर पालिका और नगर पंचायत प्रशासन ऊर्जा बचत को लेकर लापरवाह बना हुआ है। अधिकतर सार्वजनिक स्थानों के आसपास स्थापित स्ट्रीट लाइट दिन में भी जलता रहता है। जिम्मेदारों की इस लापरवाही से सरकारी धन की जहां एक तरफ क्षति हो रही है, वहीं पर दूसरी तरफ आम जन को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर स्ट्रीट लाइट हमेशा जलती रहती है, जबकि बिजली को दिन में बंद करने के लिए मेन स्विच लगाया गया है। इसके बावजूद नगर पंचायत और नगर पालिका क्षेत्र के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर स्ट्रीट लाइट दिन में भी जलती रहती है। नगर कौंसिल कर्मियों को इतना तो ध्यान देना ही चाहिए कि कब प्रकाश की जरूरत है और कब नहीं। दिन में स्ट्रीट लाइटों का बंद न होना नगर परिषद की लापरवाही को दर्शाता है।

Saturday, April 18, 2026

क्या ताजमहल उद्यान के शिलालेख को योजनाबद्ध तरीके से बटेश्वर का शिलालेख बना दिया गया ? ✍️आचार्य डा.राधेश्याम द्विवेदी


राजा परमार्दिदेव का परिचय :-

गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना 8वी शताब्दी में उज्जयिनी में हुई थी।उनके वंशज बाद में उज्जयिनी के साथ साथ गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र कान्यकुब्ज  (कन्नौज) पर भी शासन करते रहे। इसी वंश का शासक नागभट्ट द्वितीय के सामंत राजा चन्द्रवर्मन (नन्नुक) ने बुन्देलखण्ड वर्तमान उ. प्र. तथा म. प्र. का सीमान्त क्षेत्र में चंद्रात्रेय चन्डेल वंश की स्थापना किया था। इनकी राजधानी महोबा थी इनके अन्य प्रसिद्ध केन्द्र खजुराहो, कालंजर तथा अजयगढ़ रहे। 

कौन थे राजा परमार्दिदेव- राजा 

चण्डेल वंश में परमार्दिदेव का 1163- 1203 के मध्य शासन किया था। वह कालिंजर व महोबा के शासक थे। 1165 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे। उन्हें चंदेल वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक माना जाता है। चंदेलों का साम्राज्य यमुना-नर्मदा नदी के बीच फैला था, जिसमें वर्तमान बुंदेलखंड और दक्षिणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता था। परमार्दिदेव के सेनापति आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान से टक्कर ली। वह कन्नौज के राजा जयचंद्र के मित्र थे, इसलिए अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उनके प्रतिद्वंद्वी थे। इनकी सहायता से परमार्दिदेव ने अजमेर के चाहमान (चैहान) वंशी राजा पृथ्वीराज तृतीय पर आक्रमण किया था परन्तु ऊदल की मृत्यु के साथ परमार्दिदेव को पराजय का मुह देखना पड़ा था।

पृथ्वीराज के अधीन महोबा भी आ गया। परन्तु वहां पर वह अधिक दिन शासन नहीं कर पाया और वह क्षेत्र पुनः परमार्दि देव को वापस मिल गया। परमार्दिदेव के शासनकाल में मोहम्मद गोरी ने दो बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था। तराइन के द्वितीय युद्ध में 1192 ई. में पृथ्वीराज मारा गया था। 1194 ई. में मोहम्मद गोरी ने कन्नौज के गहड़वाल नरेश जयचन्द को चन्दवार में पराजित कर मार डाला था। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1202 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया। कुछ दिन तक लडऩे के बाद परमार्दिदेव ने हार मान ली। जिसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में अजमेर में चैहान वंश, कन्नौज में गहड़वाल वंश के पतन के साथ साथ बुन्देलखण्ड में चण्डेलवंश का भी पतन हो गया और भारत में मुस्लिम शासन का आधार मजबूत हो गया। परमार्दिदेव के समय बुन्देलखण्ड का चण्डेल वंशी शासन उत्तर भारत में गंगा यमुना की अन्तर्वेदी तक फैला हुआ था। इसमें कन्नौज मथुरा आगरा आदि पूरा ब्रज मण्डल समाहित था।



बटेसर अभिलेख का प्राप्ति स्थल विवादित 

आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अंगिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे। बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में अनेक शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे। लेकिन अब कुछ सदियों से कैलाश , रावली, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राज राजेश्वर नामक केवल पांच ही शिव मंदिर शेष हैं। छठे शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह छठा शिव मंदिर आगरा के इष्ट देव नागराज अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजो महालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे। तेजो महालय को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था। 

इतिहासकार पी एन ओक की पुस्तक अनुसार ताजमहल के हिन्दू निर्माण का साक्ष्य देने वाला काले पत्थर पर उत्कीर्ण एक संस्कृत शिलालेख लखनऊ के  संग्रहालय के ऊपर तीसरी मंजिल में रखा हुआ है। यह सन् 1155 का है। उसमें राजा परमर्दिदेव के मंत्री संलक्षण द्वारा कहा गया है कि 'स्फटिक जैसा शुभ्र इन्दुमौलीश्‍वर (शंकर) का मंदिर बनाया गया। (वह इतना सुंदर था कि) उसमें निवास करने पर शिवजी को कैलाश लौटने की इच्छा ही नहीं रही। वह मंदिर आश्‍विन शुक्ल पंचमी, रविवार को बनकर तैयार हुआ था।

ताजमहल के काले पत्थरों को जान- बूझकर वटेश्वर शिलालेख बनाया गया

ताजमहल के उद्यान में काले पत्थरों का एक मंडप था, यह एक ऐतिहासिक उल्लेख है। उसी में वह संस्कृत शिलालेख लगा था। उस शिलालेख को कनिंघम ने जान-बूझकर वटेश्वर शिलालेख कहा है ताकि इतिहासकारों को भ्रम में डाला जा सके और ताजमहल के हिन्दू निर्माण का रहस्य गुप्त रखा जा सके। वास्तव में आगरे से 70 मिल दूर बटेश्वर में वह शिलालेख नहीं पाया गया है। अत: उसे बटेश्वर शिलालेख कहना अंग्रेजी षड्‍यंत्र का हिस्सा है।

राजा परमार्दिदेव से जुड़ा एक शिलालेख भी यही कहता है। यह शिलालेख बटेश्वर में एक टीले पर वर्ष 1888 में कराए गए उत्खनन में मिला था। यह राजा परमार्दिदेव के शासन विक्रमी संवत् 1252 (1195 ईस्वी) से जुड़ा है। शिलालेख पर दो फुट चौड़ाई और करीब एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में 24 श्लोक उत्कीर्ण हैं।

शाहजहाँ ने तेजोमहल में जो तोड़ फोड़ और हेराफेरी की, उसका एक सूत्र सन् 1874 में प्रकाशित भारतीय पुरातत्व विभाग (आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वार्षिक वृत्त के चौथे खंड में पृष्ठ 216 से 17 पर अंकित है। उसमें लिखा है कि हाल में आगरे के वास्तु संग्रहालय के आंगन में जो चौखुंटा काले बसस्ट का प्रस्तर स्तम्भ खड़ा है। वह स्तम्भ तथा उसी की जोड़ी का दूसरा स्तंभ उसके शिखर तथा चबूतरे सहित कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित थे। 

इससे स्पष्ट है कि लखनऊ के वास्तु संग्रहालय में जो शिलालेख है वह भी काले पत्थर का होने से ताजमहल के उद्यान मंडप में प्रदर्शित था।

परमार्दिदेव का विक्रम 1252- 1195 ई. का बटेश्वर अभिलेख एक प्राचीन टीले पर प्राप्त होना बताया जाता है। ताजमहल के पूर्वी गेट से यमुना किनारे मिला शिलालेख (जिसे बटेश्वर शिलालेख भी कहा जाता है) 1195 ईस्वी / विक्रमी संवत् 1252 का है, जो शाहजहाँ से लगभग 500 वर्ष पूर्व का है। यह शिलालेख 'तेजो महालय' यानी शिव मंदिर के अस्तित्व की ओर इशारा करता है। शिलालेख मूल रूप से ताज उद्यान क्षेत्र में स्थापित था, जिसे बाद में हटाया गया।

ए सी एल कार्लाइल 1871- 72 में इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन व सर्वेक्षण किया था । उस समय तक उसे यह अभिलेख नहीं प्राप्त हुआ था। मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1873-74 भाग 7 के पृ. 5 पर बटेश्वर आगरा से प्राप्त होना बताते हैं। पुनः मेजर जनरल ए. कनिंघम ने ए. एस. आई. रिर्पोट 1883-84 भाग 21 के पृ. 82 क्रम संख्या 52 पर इसे बगरारी के तालाब के तट पर दो टुकड़ों में प्राप्त होना बताते हैं। बगरारी को मथुरा के निकट सिंघनपुर के पास होना भी बताया जाता है। अधिकांश अभिलेखीय साक्ष्य इसे आगरा जिले में स्थित बटेश्वर का अभिलेख मानते हैं। 

1886 में हुलुतज ने Zeitechrift D Morg. Ges. के भाग  11 के पृ. 51-54 में प्रतिलिप्यान्तर कराया था। बाद में 1888 में प्रो. एफ. कीलहर्न ने इसका अध्ययन कर Epigraphia Indica के भाग 1 में पृ. 207-214 में प्रकाशित कराया था। इन दोनों संदर्भों में इस अभिलेख की प्रतिकृति नहीं प्रस्तुत की गयी है। प्रसिद्ध पुरालेख शास्त्री हरिहर विट्टल त्रिवेदी ने इस अभिलेख को उक्त संदर्भों के अतिरिक्त अन्य़ कहीं नहीं देखा था। उनके निवेदन पर लखनऊ राज्य संग्रहालय के निदेशक ने इस अभिलेख का स्याही के छाप की अनुमति दी थी। 

श्री त्रिवेदी इसे Corpus Inscriptions Indicarem के खण्ड 7 भाग 3 में क्रम सं. 139 पृ. 473-78 प्लेट 126 पर प्रकाशित कराया है। अभिलेख के विषय वस्तु के अनुसार यहां प्राचीन विष्णु एवं शिव मंदिरों के निर्माण कराने की बात कही गयी है। एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया। 

पूर्णिमा की रात को या फिर उन रातों को जब चंद्र अच्छी रौशनी देता है उसकी रौशनी शिवलिंग पर पड़ती थी तो सफ़ेद शिवलिंग रात को चमकता था। ये मंदिर कहां थे यह शोध का विषय है ?

शुभ्र शिव मंदिर तेजोमहालय (ताजमहल) :- 

राष्ट्रवादी विचारक विष्णु मंदिर को मथुरा का द्वारिकाधीश तथा शिव मंदिर को आगरा का तेजेश्वर महादेव मंदिर (ताज महल) के रुप में जोड़ते हैं। बटेश्वर शिला लेख में राजा परमार्दिदेव के मंत्री सलक्षणा द्वारा भव्य वैष्णव व शैव मंदिर बनवाने का जिक्र है। लखनऊ संग्रहालय में रखे वर्ष 1195 के इस शिलालेख में दो फुट चौड़ाई व एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा के 34 श्लोक हैं। शिलालेख मंदिरों की जगह के बारे में कुछ नहीं कहता। मगर, इतिहासकार प्रो. पी. एन. ओक ने इसमें उल्लिखित शिव मंदिर को ताजमहल बताया था। श्री पी. एन. ओक अपनी पुस्तक Tajmahal is a Hindu Temple Palace में 100 से भी अधिक प्रमाण एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। यह तेजा जी के नाम से बनाया गया था । इसके अनुक्रमांक 30 पर बटेश्वर शिलालेख का उल्लेख है। 

बटेश्वर एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है  शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया इस शिलालेख को ‘बटेश्वर शिलालेख’नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने बहुत बड़ी भूल की है, क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि यह बटेश्वर में पाया गया था। 

आज जहाँ पर ताजमहल है, वहां पर हज़ारों साल पहले अंगिरा ऋषि ने शिवमंदिर बनाया था उसका नाम तेजोमहालय रखा था, कुछ लोग इसे अग्रेश्वर महादेव के नाम से भी सम्बोधित करते रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस शिलालेख का नाम ‘तेजोमहालय शिलालेख’ होना चाहिये क्योंकि यह ताज के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर फेंक दिया गया था शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archaeological Survey of India Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है जिसमें लिखा है- 

Great square black balistic pillar which, with the base and capital of another pillar....now in the grounds of Agra,...it is well known, once stood in the garden of Tajmahal". 

इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, "एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।" यह अभिलेख प्रशंसात्मक रुप में प्रशस्ति गाथा है। 

इस अभिलेख के तीन प्रमुख भाग हैं- प्रथम भाग में 13 पद्य हैं जिसमें चण्डेल वंश की परम्परा का वर्णन किया गया है। द्वितीय भाग पद्य 14 से 24 तक है। इसमें राजा के मुख्यमंत्री के वंश परम्परा का वर्णन किया गया है। तृतीय खण्ड मुख्य है । इसमें पद्य 25 से 29 तक अभिलेख का उद्देश्य का वर्णन आता है। पद्य 30 से 34 तक लिखने वाले का परिचय दिया गया है। 

इस खण्ड का पद्य 25 व 26 दो विशाल मंदिरों के निर्माण का वर्णन करता है। इसका मूल पद्य ,अंग्रेजी व हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रासादो वैष्णवस्तेन निमर्मितोन्तव् र्वहन्हरिम्।                                            मू द् ध् र्ना स्पृसशति यो नित्यं पदमस्यैव मध्यमम्।।

He (King Parmadidev) erected a temple of Vishnu, containing a image of Hari which with its top always touches his own middle stride.

उन्होंने विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया था जिसमें हरि की एक मूर्ति स्थापित थी। इस मंन्दिर का शिखर इतना ऊंचा था कि मध्य आकाश को स्पर्श करता था।

अकारयच्च स्फटिकावदातमसाविदम्मन्दिरमिन्दुमौलेः।  न जातु यस्मिन्निवसन्स देवः कैलासवासाय चकार चेतः।।

And he also caused this crystal white habitation of the moon crested (Siva) to be built, residing in which the God has never turned his thoughts to dwelling on Kailas.

चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले शिव मंन्दिर का निर्माण स्फटिक के समान धवल रंग से प्रकाशित हो रहा था जिसमें निवास करने के कारण भगवान शिव ने कैलाश पर निवास करने का विचार छोड़ दिया।

लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी , पूर्व पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8,निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001मोबाइल नंबर +91 9412300183





Thursday, April 16, 2026

प्रीपेड स्मार्ट मीटर का दंश, सरकार द्वारा थोपा गया कानून, एजेंसियो को लाभ पहुंचाना ही सरकार की मानसिकता बनी✍️डा. राधेश्याम द्विवेदी


प्रीपेड स्मार्ट मीटर का दंश जनता के लिए शुरुआती दौर में "बिजली संकट" और आर्थिक बोझ के रूप में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिसमें अचानक बैलेंस खत्म होने पर लाइट कटना और पुराने मीटर्स की तुलना में तेज खपत की शिकायतें प्रमुख हैं। यद्यपि यह तकनीकी सुधार का हिस्सा है, लेकिन ग्रामीण और गरीब परिवारों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। 

प्रीपेड स्मार्ट मीटर का दंश शायद ही जनता झेल पाए। आपातकाल में संजय गांधी जी ने जबरन नशबंदी का अभियान चलाया था। आबादी तो नहीं घटी। सरकार चली गई। स्मार्ट मीटर योजना भी सरकार को ले डूबेगी। गर्मी के दिनों में आम जनता बिजली के दफ्तरों में लाइन में लगे हुए हैं। कोई समाधान नहीं हो पाता है। बस लॉलीपॉप दे दिया जाता है।

जबरन स्मार्ट मीटर लगना जारी है :- 

उत्तर प्रदेश में उपभोक्ताओं के घरों पर जबरन स्मार्ट मीटर लगाकर उन्हें प्रीपेड बदल दिया गया जो विद्युत नियमावली के अनुसार गलत है तथा केन्द्र सरकार द्वारा भी शासनादेश जारी कर दिया है। जबरन प्रीपेड किए गए स्मार्ट मीटरों को पोस्ट पेड में बदलने की दिशा में कार्रवाई करने का कष्ट करें।

तत्काल पोस्ट पेड में बदलें :- 

 यूपी का बिजली विभाग माननीय योगी जी आपको हटाने की दिशा में कार्य करना शुरू कर दिया है। इससे निजात पाने के लिए स्मार्ट मीटरों को तत्काल पोस्ट पेड़ में कन्वर्ट किया जाना चाहिए। माननीय मुख्य मंत्री जी के सारे अच्छे कार्यों पर बिजली विभाग की "प्री पेड़ स्मार्टमीटर योजना" ने पानी फेर दिया है ।आम जनता चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण सभी लोग इस योजना से त्रस्त हैं ।मुख्यतः मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग बहुत परेशान है । शीघ्र से शीघ्र बिजली विभाग पर प्रभावी नकेल डाला जाना चाहिए।

ऊर्जा मंत्री केवल घोषणा मंत्री :- 

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री भी प्रधान मंत्री जी की तरह केवल घोषणा कर अपना फर्ज अदायगी कर दिया हैं। जीनियस कंपनी इस सरकार को अपने कृत्यों से ले डूबेगी। अभी समय है हालत संभालिए वरना देश की बागडोर गलत लोगों के हाथों में चले जाएगी।

पब्लिक को विश्वास में नहीं लिया :- 

वर्तमान सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी और कमी यही रहती है कि ये लोग पब्लिक को विश्वास में नहीं लेते हैं और प्राइवेट कंपनियों के कहने से स्मार्ट मीटर गांव गांव लगवा दिया । इसे किसी को ना तो चलाना आता है ना देखने आता है । कैसे कैसे इसका संचालन किया जाएगा ?  कोई होमवर्क ना तो सरकार ने की और ना ही जनता को शिक्षित की गई।

भारत और प्रदेश दोनों सरकारो के अस्तित्व पर असर पड़ेगा :- 

यह मुद्दा भारत और प्रदेश दोनों सरकार दोनो सरकारों को ले डूबेगा । मानिए या ना मानिए। जनता बहुत परेशान है इस प्रीपेड मीटर से। आप मोबाइल का एग्जाम्पल देते है उसमे भी 300₹ का रिचार्ज कराने पर कम से कम महीना भर चलता है, आपके प्रीपेड मीटर में जितना भी रिचार्ज करवा लो बैलेंस माइनस में चला जाता  है और लाइट किसी भी समय रात हो या दिन हो अवकाश हो या कार्य दिवस हो काट दी जाती है। अभी भारत की जनता इतना प्रबुद्ध नहीं है कि तुरंत बैलेंस मेंटेन कर ले।कोई कम जानकार है तो कोई के जानकार परिवार अपनी रोजी रोटी के लिए बाहर रहते हैं। मिट्टी का तेल भी नहीं मिलता है। घरों में अधेरा पसर जाता है। लोगों की आदतें बिगड़ चुकी हैं। फ्रिज कूलर पंखे वॉशिंग मशीन घर घर में बेकार हो जाती है । बेहाल और लाचार उपभोक्ता के हितों के प्रति सरकारें संवेदनशील नहीं रह गई हैं ।

जमा बिल पर भी कनेक्सन चालू नहीं हो पाता :- 

स्मार्ट मीटर को लेकर जनता के बीच लगातार आक्रोश बढ़ रहा है, लेकिनउनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है। कई उपभोक्ताओं के बिल जमा करने के बाद भी बिजली कनेक्शन चालू नहीं हो रहा है,जिससे लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। इतना ही नहीं,बिना किसी पूर्व सूचना के ही बिजली काटे जाने के आरोप भी सामने आ रहे हैं।

        अगर स्मार्ट मीटर से जुड़ी समस्याएं जल्द नहीं सुलझीं,तो आने वाले चुनाव में योगी जी के नेतृत्व में चल रही लोकप्रिय भाजपा की  सरकार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। 

स्वैच्छिक मीटर चयन योजना फ्लॉप :- 

केंद्रीय सरकार द्वारा दिनांक एक अप्रैल 2026 को अधिसूचित होने बाद भी आज तक भारत सरकार के स्वैच्छिक मीटर चयन की अधिसूचना पर विभागियों द्वारा अमल न किए जाने के प्रमाण हैं। स्मार्ट मीटर पूर्णतया फ्लॉप होने के बहुत ही दुखद  है गरीब जनता बहुत ही नाराज है । क्षेत्र में लगातार मिल रही त्रुटियां स्मार्ट मीटर में अनाहुत बिजली का बिल आना एक तरीका से मध्यम वर्ग के जेब पर डाका डालना है। इसका खामियाजा बहुत ही बुरा होगा।

 विपक्ष का प्रभाव भी दिखता है :- 

प्रतीत होता है कि कुछ लोग बिजली विभाग में सपा के अधिकारी बैठे हुए जो माहौल को बहुत खराब करने में लगे हुए हैं। सरकार यदि नहीं चेती  तो बाद में कुछ नहीं हो पाएगा ।जनता बहुत परेशान होकर त्रस्त हो चुकी है ।पावर हाउस का चक्कर लगाते लगाते जनता ऊब चुकी है।  इसका गुस्सा लोग चुनाव में नुकसान बहुत ज्यादा कर सकते हैं। सरकार चाहे तो अभी भी सुधार कर सकती है। अभी टाइम है आगे बिल्कुल समय नहीं मिलेगा

निष्कर्ष:

वर्तमान स्थिति में, प्रीपेड मीटर के 'दंश' को झेलना जनता के लिए बेहद कठिन हो रहा है, विशेषकर जब तक बिजली कंपनियां और विभाग इसके संचालन में पारदर्शिता नहीं लाते और उपभोक्ताओं की सहमति का सम्मान नहीं करते। हालांकि, तकनीकी रूप से ये मीटर चोरी रोकने और ऊर्जा खपत को प्रबंधित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। पर उचित निर्देशन के अभाव में  भार स्वरूप लग रहे हैं 


Wednesday, April 15, 2026

अयोध्या को पर्यटन ना बनाओ तीर्थनगरी ही रहने दो ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


श्री राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान पवित्र तीर्थ स्थान तक सीमित थी। इसकी अर्थव्यवस्था में विगत वर्षों से ऐतिहासिक उछाल तब आया है जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यहां पर्यटन, निवेश, रोजगार और राजस्व में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। पहले मेले और पर्वों के समय ही अयोध्या चहकती और दमकती थी। साकेत पोस्ट ग्रेजुएट कालेज से शिक्षा के क्षेत्र में यहां कुछ बदलाव और भीड़ भाड़ होता रहा है। यहां के संस्कृत विद्यालय निर्धन छात्रों के शरणगाह रहे हैं। इसी के बहाने अनेक मन्दिरों में पूजा आरती और भगवान जी विग्रह का भोग आरती और पूजा अर्चना संस्कृत पढ़ने वाले बटुक जन कर दिया करते थे। यह सिलसिला काफी दिनों से चलता रहा है। सत्ता बदली नए-नए जिम्मेदार आए, पर अयोध्या के हालत में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया। 

मोटे तौर पर पर्यटन स्थल वह जगह होती हैं, जहां लोग घूमने फिरने आते हैं, अपने अंदाज में वहां के सौंदर्य और सुविधाओं का मौज मस्ती करते हुए आनंद लेते हैं। तीर्थ स्थल हमेशा उन जगहों से जुड़े हैं, जो दैवीय आस्था और भरोसे का केंद्र होते हैं।जहां श्रृद्धालु आमतौर पर श्रृद्धाभाव के साथ दूर दूर से भगवान की पूजा अर्चना के लिए आते रहते हैं। हर तीर्थ स्थल का ऐतिहासिक रूप में अपना एक विशेष महत्व रखता है। तीर्थ स्थल पर जाते हुए हम कोशिश करते हैं कि हमारा तन-मन और आचरण को शुद्ध रहे। इसीलिए बहुत से धार्मिक स्थलों पर जाने के लिए कुछ नियमों और शर्तों का भी पालन करना होता है। बहुत से धार्मिक स्थलों पर जाने पर हमको पोशाक की मर्यादा का ध्यान रखना होता है। कई धार्मिक स्थलों पर बकायदा ड्रेस कोड से लेकर आचरण संबंधी आचार संहिता भी लागू होती है।

एक तीर्थ स्थल को पर्यटन क्षेत्र घोषित नहीं किया जाना चाहिए। यह हमारी आस्था का क्षेत्र है, यदि इसे पर्यटन क्षेत्र घोषित किया जाएगा तो लोग यहां आएंगे, घूमा फिरी करेंगे। यहां, खाना-पीना, शराब आदि वर्जित चीजों का उपयोग करने लगेगें।जिससे इस तीर्थ स्थल की पवित्रता भंग हो जाएगी।

श्रीराम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद के समाधान के बाद अयोध्या की परिस्थितियां बदलनी शुरू हो गई। श्रीराम लला मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से यहां की आर्थिक गतिविधियों में अभूतपूर्व उछाल आया है। पर्यटन पर आधारित गतिविधियों से कर राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। आतिथ्य क्षेत्र, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है। सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाएं योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वित करके पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश को गति देकर बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार बन सकती हैं। अयोध्या में आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है, जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में अग्रिम पंक्ति पर लाकर खड़ा कर दिया है।

1.'राम की अयोध्या' व्यवसाय नहीं :- 

अयोध्या प्रभु राम की स्मृति से परिभाषित होती है, न कि केवल कंक्रीट ईंट पत्थर और व्यावसायिक भौतिकता से। अयोध्या सबकी है, लेकिन यह “राम की अयोध्या” होनी चाहिए, न कि केवल मंदिर-व्यवसाय की। भीड़भाड़, अंधाधुंध परियोजनाएँ और परंपरा का हनन होता रहा। अयोध्या अजेय है, उसे कोई जीत नहीं सका है। वो अपने साथ किए हर अन्याय को ब्याज समेत लौटाती है।  

2.अयोध्या के साथ धोखा हुआ :- 

राम नगरी केवल पत्थरों और ईंटों का ढेर नहीं है ,बल्कि राम की स्मृति, आध्यात्म की ज्योति और सनातन की अस्मिता भी है । मोदी और योगी जैसे दो धुरंधरों के रहते इस नगरी के अंधाधुंध “विकास” के नाम पर कई रूपों में अत्याचार,लूट और सांस्कृतिक हत्या हुई है जिसे लोग देखते रह गए । यह अयोध्या के साथ धोखा हुआ है। विकास के नाम पर इसकीआध्यात्मिक अस्मिता को कुचला जा रहा है। घाट, जो राम-सीता की स्मृतियों के साक्षी हैं, आज वेडिंग शूट के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। सरयू के किनारे आस्था विश्वास की प्रेम की कहानियाँ लिखी जानी चाहिएं न कि दिखावटी फोटो सेशन की।

3.वीआईपी मूवमेंट और पर्वों के समय अयोध्या का रूट डाइवर्जन होता रहा:- 

राम की नगरी, जहाँ सदियों से भक्ति की सरयू बहती रही, जहाँ हर कण में प्रभु के चरणों की ध्वनि गूँजती रही, वह अयोध्या अब लंबे अरसे बाद एक नई आशा की किरण में नहा रही है। मंदिर निर्माण के बाद से कड़ी सुरक्षा की जंजीरें, विकास के नाम पर विध्वंस की आँधी और वी वी आई पी व्यवस्था की बंदिशों ने उसे जकड़ रखा है। प्रदेश के विभिन्न भागों से आने वाले भारी वाहन अयोध्या शहर में प्रवेश के पहले ही दूसरे घुमावदार रास्ते पर भेज दिए जाते हैं। इस तरह पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के लोगों और व्यापारियों को समय और धन दोनों का नुकसान उठाना पड़ता है।

4.पुरातन सरयू जी की महिमा बच नहीं रही :- 

 समय के साथ साथ अयोध्या नित नए कलेवर को धारण करती रही है। एक सरयू जी ही राम के समय से पूर्व से होते हुए आज भी कायम है। भले यह अयोध्या को छोड़ बस्ती और गोण्डा जिले में अपना आशियाना बना रखा हो। आज कम से कम राम की पौड़ी, अयोध्या के घाट को तो छोड़ दिया जाना चाहिए । वे वेडिंग शूट और रीलबाजों के लिए नहीं बने हैं। आज के समय में भला आदमी इन उन्मुक्त वातावरण में ज्यादा समय ठहर नहीं सकता है।

5.विकास मॉडल से नुकसान :- 

विकास के नाम पर असल पहचान को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। अब लोग हनीमून मनाने के लिए गोवा की जगह अयोध्या आने लगे हैं। सरयू नदी में क्रूज चलाकर यहां सदियों से उन्मुक्त वातावरण में रहने वाले जलचर अब यह क्षेत्र छोड़ चुके हैं। उन्हें अपने कर्म और प्रारब्ध से मिला सरयू और अवध के वास को जबरन छीना जा रहा है। यह उनके साथ घोर अन्याय हो रहा है। 

6.पाबंदियों वाली प्रशासनिक व्यवस्था:- 

सरकारी एजेंसियां पर्याप्त सावधानी और होमवर्क करने के बजाय अयोध्या के विचरण करने और आने - जाने पर केवल पाबंदी लगाती है। यहां अगर निवासियों का प्रशासन से तालमेल न हो तो आम आदमी का जीना मुश्किल हो जाता है। अयोध्या में रहते हुए अगर अयोध्या के प्रशासन से हमारा व्यवहार ठीक नहीं हैं, तो हमारा जीना दूभर हो जाएगा । हम , हमारे बच्चे,रिश्तेदार और मित्र  हमारे सुख-दुख के भागी नहीं बन सकते हैं। उन्हें शहर में वाहन के साथ प्रवेश नहीं मिल सकता है।इस पाबंदियों को पुलिस व्यवस्था द्वारा लागू किया जाता है।

7.शांत जीवन में अशांत घुस आया :- 

अब वहां के मूलनिवासी और साधू-संतों का शांत जीवन एकदम अशांत हो गया है। आम आदमी की अगर प्रशासन में पकड़ नहीं है तो प्रशासन द्वारा घर आना-जाना नर्क बना दिया गया है। बच्चों का स्कूल आना- जाना, पठन - पाठन अब बहुत कठिन हो गया है। अस्पताल में आना- जाना भी मुश्किल हो गया है। यह सब सुरक्षा के नाम पर प्रशासन की निर्दयता की वजह से हो रहा है।

8.छोटे-छोटे प्रवेश मार्गों पर पुलिस के बैरियर :- 

मुख्य मार्ग पर प्रवेश वर्जित होने के साथ छोटी छोटी गलियों में भी बैरियर और प्रवेश निषेध के बोर्ड लगे मिलते हैं। वहां पुलिस होमगार्ड के जवान मुस्तैदी से लोगों को रोकते देखे जा सकते हैं। स्थानीय छोटे - छोटे वाहन रिक्शे और टैम्पो रोजी-रोटी के तहत इस प्रकार के प्वाइंट पर अपने वाहन लगाकर आम श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के दैनिक क्रिया-कलापों को प्रभावित करते रहते हैं।

9.तीर्थ यात्री पैदल चलने के लिए मजबूर हुए :- 

वैसे कहने को मुख्य मार्गों पर प्रदूषण मुक्त वाहन सरकार उतार रखे हैं पर ये पूरी अयोध्या के प्रमुख मन्दिरों और स्थलों तक पहुंच नहीं सकते हैं। दो-चार किमी चलकर आगे पुलिस द्वारा सवारियां उतरने और पैदल चलने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। इसके लिए अच्छी खासी पुलिसिंग व्यवस्था भी की गई होती है। आम तीर्थ यात्री और आम नागरिक को अनायास ये पाबंदियां झेलनी पड़ती है।

10.स्थानीय प्रवेश प्रतिबंधित रहता है:-

यह देखा गया है कि अधिकांश समयों में यहां के मुख्य धर्म क्षेत्र में यहां के निवासियों और आगंतुकों के वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित रहता है। स्थानीय रिक्शे वाले लंबी दूरी तय करके ही यात्रियों को गंतव्य तक नहीं छोड़ पाते हैं। कभी-कभी वीवीआईपी के निकल जाने के बाद भी यह प्रतिबंधित प्रवेश चालू नहीं हो पाता है और ये समन्वय का बड़ा फेलियर बन जाता है।

11.अस्पताल जा पाना सम्भव नहीं:- 

अयोध्या में रहते हुए अगर अयोध्या के प्रशासन से हमारा व्यवहार मधुर नहीं हैं, तो हमारा जीना दूभर हो जाता है।आपात स्थिति में भी पुलिस द्वारा बैरियर नहीं हटाए जाते हैं।आदमी मर जाए पर प्रशासन बैरियर न उठवाता है। यह अयोध्या का उद्धार कदापि नहीं हो सकता है। इसे हर जिम्मेदार उच्चस्थ लोग जानते हुए भी सुधार कर पाने में असमर्थ रहते हैं।

12.नए-नए मोहल्ला क्लिनिक खुलें :- 

अयोध्या के लोगों को मौलिक चिकित्सा सुविधा मिलना असंभव हो गया है। यातायात प्रतिबंध के कारण हुए लोग अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते हैं। इसलिए जगह-जगह मोहल्ला क्लीनिक और एंबुलेंस की व्यवस्था होनी चाहिए ,जिससे यहां के निवासियों ,आगंतुकों और तीर्थ यात्रियों को समय से चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर उनका जान बचाया जा सके।

13.अयोध्या ‘अयोध्य’ है :- 

अयोध्या ‘अयोध्य’ है, उसे कोई जीत नहीं सका है। अयोध्या को शास्त्रों में “अयोध्य” कहा गया है, यानि जिसे शत्रु जीत न सके। वह अपने साथ हुए हर अन्याय का जवाब समय आने पर देती है। भगवान राम और भक्त भरत के त्याग से कुछ सीख ग्रहण करें यहां के लोग। तभी इसका सम्यक विकास हो सकेगा।

 14.आध्यात्मिक भावना का मजाक:- 

अयोध्या की पवित्र नगरी  के आध्यात्मिक  भा्वना का मजाक बनाकर इसे मनोरंजन और व्यवसायिक स्थल बना दिया गया है। आध्यात्मिक क्षेत्र को मनोरंजन का स्थान न बनने दिया जाय। भक्ति, और श्रद्धा बढे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। भगवान श्रीराम सभी को सद्बुद्धि ओर सदवृति दें, हम यही प्रार्थना करते हैं।

15.विनम्र सहयोग पूर्ण रवैया हो :- 

माननीय मुख्यमंत्री जी से विनम्र निवेदन है कि प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश हो कि यहां के आम नागरिकों, व्यापारियों,पर्यटकों और छात्रो के साथ प्रशासन अत्यंत विनम्र सहयोगपूर्ण रवैया अपनाए। इसकी अच्छी तरह से मानीटरी किया जाए तथा स्थानीय लोगों को लेकर पर्यवेक्षण कमेटियां इसकी निगरानी करे।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

(पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी, भारत सरकार) मकान नम्बर 2785 ,निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001,मोबाइल नंबर +91 9412300183)


Tuesday, April 14, 2026

रामनिहाल दास की तपोभूमि उमरिया (बस्ती)और प्रतापपुर इमलिया (अंबेडकरनगर)✍️आचार्य डॉ.राधे श्याम द्विवेदी

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की धरती वशिष्ठनगर बस्ती जनपद में राम जानकी मार्ग चिलमा बाजार के दक्षिण उमरिया गांव में देवरहा बाबा के रूप में एक महान सन्त का जन्म हुआ था। जो अयोध्या से जनकपुर जाने वाले ऐतिहासिक राम जानकी मार्ग के दक्षिण पूण्य सलिला सरयू नदी के तट पर स्थित है। इसके अलावा यह उर्वरक भूमि सिद्ध सन्त बाबा निहाल दास और श्यामा सदन अयोध्या के महन्त गोपाल दास और हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास जी जैसे मूर्धन्य विद्वान को भी जना है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक सैकड़ों वर्ष पूर्व बस्ती के उमरिया गांव में रामनिहाल दास नाम के एक पुजारी रहते थे, जिन्हें सिद्ध पुरुष माना जाता था। मान्यता है कि बाबा गंभीर से गंभीर रोग सिर्फ छूकर ठीक कर देते थे। बाबा ने यहां जीवित समाधि ली थी। बाबा के हाथ से स्थापित मंदिर सरयू नदी तट पर मौजूद है। नदी की बाढ़ से कभी भी मंदिर को नुकसान नहीं हुआ है। एक बार बाढ़ आ भी गई थी पर वह मंदिर को स्पर्श कर वापस चली गई थी। कहा जाता है कि बाबा जी के गुरु किसी बात पर नाराज हो गए थे और 12 वर्ष तक निहाल बाबा को मंदिर और आश्रम की साफ सफाई करने का आदेश दे गए थे। यह अवधि पूरा करने के बाद बाबा जी में और सिद्धियां आ गई थीं। यहां बाबा जी की समाधि और मूर्ति दोनों बनी हुई है। जहां प्रत्येक साल के दीपावली के बाद यम द्वितीया और साप्ताहिक मंगलवार को श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

यम द्वितिया पर लगे विशाल मेले में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है। भोर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर मनोकामना पूरा होने की कामना करते हैं। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु अपनी इच्छा से मंदिर में मनौती मानता है, उसे इसके पुण्य का अवश्य मिलता है। 

      महंत सुखराम दास के अनुसार बाबा निहाल दास यहीं पर बैठकर तपस्या किया करते थे। यहां इस मौके पर विशाल मेला भी लगता है। श्रद्धालु यहां सरयू नदी में स्नान करने के बाद बाबा निहाल दास को प्रसाद चढ़ाकर और बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर अपने मन की कामना पूरा  करते हैं। बाबा की कुटी पर भोर से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो शाम तक जारी रहता है । मेले में बस्ती के अलावा अंबेडकरनगर के लोग भी भारी संख्या में आते हैं। मेले के दिन भंडारा का आयोजन भी होते रहते हैं। 

      बाबा राम निहाल दास की कुटी के परिसर में विभिन्न प्रकार की दुकानों की सजावट और भीड़ देखते ही बनती है। कई जिलो के दूर-दराज से आए व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें लगाते हैं। मेले में आए लोग  मिट्टी के बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी के सामान खरीदते हैं।महिलाएं सूप,मचिया की खरीददारी करती हैं। बच्चों खिलौने व सिघाड़े का आनंद लेते हैं। क्षेत्र के लोग मुख्य रूप से खेती किसानी से जुड़े लोहे के सामान जैसे कुदाल, फावड़ा, हंसियां और खुरपा आदि खरीदते नजर आते हैं। बच्चों के लिए झूले और खिलौनों की दुकानों पर भी खासा जमावड़ा रहता है। 

सिद्ध पीठ बाबा राम निहाल दास की कुटी और भक्तों की सुरक्षा के लिए यहां पुलिस चौकी भी स्थापित है।मेले की सुरक्षा में बस्ती जिले के दुबौलिया पुलिस केअलावा कप्तानगंज, कलवारी, लालगंज, नगर की पुलिस के साथ यातायात पुलिस उपस्थित रहती है। 

प्रतापपुर इमलिया अम्बेडकरनगर में बाबा  एक और प्रसिद्ध तपस्थली :- 

अम्बेडकरनगर के कटेहरी क्षेत्र प्रतापपुर इमलिया में स्थित श्री बाबा निहाल दास जी की एक और प्रसिद्ध दिव्य अलौकिक कुटिया है। यहां एक विशाल जलाशय के समीप जंगल में शिवजी ,पार्वतीजी,नंदीजी और हनुमानजी की दिव्य प्रतिमाएं और यज्ञ शाला भी स्थापित हैं। बाबा जी को उनके गुरु जी ने 12 साल मंदिर की साफ सफाई करने का आदेश दिया था जिसे पूर्ण कर बाबा जी और दिव्यता के साथ चमक उठी थी। यहां प्रत्येक मंगलवार को मेला लगता है, यहाँ प्रतिदिन स्थानीय व दूरदराज के लोग अपनी अपनी मन्नतों को लेकर आया करते है और उनके आस्था विश्वास समर्पण भक्तिभाव के अनुरूप बाबा जी की कृपा आशीर्वाद से अवश्य पूर्ण होता है, ऐसी अद्भुत मान्यताओं को लेकर यह तपस्थली काफी प्रचलित है। यहां भक्तजन अपने धार्मिक भावनाओं के आधार पर तरह-तरह के चढ़ावा करते है।  

यह चारों तरफ जंगलो से घिरा हुआ एक ऐसा अलौकिक शक्ति से परिपूर्णप्राकृतिक सौंदर्य से युक्त देव स्थल है, जहाँ पहुँचने मात्र से कुछ पल व्यतीत करने से तनावों से मुक्त आत्मशान्ति अलौकिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है। भौतिकतावाद के झंझावात से ग्रसित नाना प्रकार के दैहिक, दैविक और भौतिक समस्याओं से यदि उलझे हुए हो और आपको कोई मार्ग न दिखाई दे रहा हो, चारों ओर अंधकार ही अंधकार नजर आ रहा हो तो धार्मिक भक्तिभावना से एक बार इस अलौकिक तपोस्थली पर आए दर्शन प्राप्त करे।निश्चित रूप से समस्त समस्याओं से आपको निजात मिल जाएगी। मनुष्य जीवन में आने वाले समस्त संघर्षों व विघ्न बाधाओं से डटकर सामना करने की सामर्थ्य प्राप्त होगी। 

धर्म अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों से भरपूर महान संत बाबा निहाल दास जी के तपसाधना से ऊर्जावान्वित साधना भक्ति से परिपूर्ण अलौकिक ऊर्जा शक्ति का केन्द्र श्री बाबा जी की कुटिया के परम्परागत गद्दी पर आसीन परम पूज्यनीय महंत बाबा पराग दास जी है, जिनके द्वारा नित्य प्रति आने वाले भक्तजनों के दुःख, संकटों का निवारण उनके द्वारा किए गए यज्ञशाला के हवनकुण्ड की भभूति प्रसाद प्रदान कर किया जाता है।

बाबा की साहित्यिक और धार्मिक रुचि 

गोकुल भवन अयोध्या जी के महंत श्री परमहंस राम मंगल दास जी के संकलन में बाबा निहाल दास जी के लोक साहित्य में गारी और दोहा चौपाई संकलित कर रखा है, जो इस प्रकार है - 

भक्ति की गारीः- 

चारि पदारथ देन हार यह नर तन सुर मुनि गाई जी। 

बिन सत्संग जात है बिरथा पुनि पुनि गोता खाई जी। 

काम क्रोध मद लोभ मोह यह असुर बड़े दुखदाई जी। 

पांचों संस्कार ये जानो तन में रहत सदाई जी। 

दम्भ पखण्ड कपट औ निद्रा आलस संघ जम्हुआई जी।। 1।।


माया द्वैत बासना नाना संग मन नाचे जाई जी। 

चिंता तन में चिता लगावै दुख चढ़ि बैठे आई जी। 

यह समाज आसुरी बंश की थकै न नेको भाई जी। 

महा जाल में फांसि लेत औ नर्क को देय पठाई जी। 

शान्ति शील संतोष दीनता प्रेम के हाल सुनाई जी।।2।।


क्षिमा दया सरधा औ हिम्मति सत्य समाधि लगाई जी। 

ज्ञान बिराग संग विश्वासौ लय में पहुँचौ धाई जी। 

परस्वारथ परमारथ दोनो कैसे कोउ करि पाई जी। 

देवासुर संग्राम जीतिये घट ही में चमकाई जी। 

हरि सुमिरन बिन जीति न पैहौ सुनिये सब मम भाई जी।।3।।


सतगुरु करि सुमिरन बिधि जानौ तब मन वश स्वै जाई जी। 

नाम खुलै हरि दर्शन लागैं खल सब चलैं पराई जी। 

ध्यान समाधि में पहुँचि जाव जब करम भरम मिटि जाई जी। 

सबै देव मुनि संग बतलावैं हर्ष न हृदय समाई जी। 

दास निहाल सुरति औ शब्द क मारग अति सुखदाई जी।।4।।


दोहाः-

चिता के ऊपर बैठि कै, 

राम राम कहि जान। 

निहाल दास कहैं जारि तन, 

छोड़ि दीन हम प्रान।।


बास मिल्यो बैकुण्ठ में, 

आवा गमन मुकाम। 

या की गणना जगत में, 

बात मानिये आम।।


चौपाई:- 

नाम रूप लीला औ धामा। 

शून्य समाधि जानि निज जामा।

मरै बासना निर्भय होवै। 

सो साकेत जाय सुख सोवै।।


दोहाः

जो जियतै में तय करै, 

सोई चतुर सुजान। 

नाहिं तो जनमै मरै, 

मानों बचन प्रमान।।


चौपाई:- 

बाबन बेर ठगावै जोई। 

बावन बीर कहावै सोई। 

धोका खाये बिन नहिं ज्ञाना। 

हम तो यह अपने मन माना।।

पानी दूध वहां बिलगाना। 

सुनतै खुलि गे आँखी काना।। 

बचन हमार मानि यह लेना। 

सत्य नाम की सिक्षा देना।।

रेफ बिन्दु जो सब में ब्यापक। 

सब का जानो यह अध्यापक।।

या को जानि लेय जो कोई। 

ता को आवागमन न होई।।


दोहाः

नाम कि धुनि खुलि जाय जब, 

सुर मुनि दर्शन दैय। 

मुद मंगल ह्वै जाय तब, 

हरि निज पास में लेंय।। 


(सन्दर्भ : “श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' श्री परमहंस राममंगलदास जी द्वारा रचित प्रथम दिव्य ग्रन्थ। ग्रन्थ - 1, भाग - २ दिसम्बर २००१)


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,PIN - 272001

मोबाइल नंबर +91 9412300183


आस्था व विश्वास का केन्द्र है बाबा राम निहालदास की तपोभूमि (कुटी) उमरिया ✍️आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी


बस्ती जिले के दुबौलिया थाना क्षेत्र के सिद्ध पीठ बाबा राम निहाल दास की कुटी उमरिया में है। जहां प्रत्येक साल के दीपावली बाद यम द्वितीया पर विशेष पूजा का आयोजन होता है। नदी की बाढ़ से कभी भी मंदिर को नुकसान नहीं हुआ। एक बार बाढ़ आ गई थी पर वह मंदिर को स्पर्श कर वापस चली गई थी। कहा जाता है कि बाबा जी के गुरु किसी बात पर नाराज हो गए थे और 12 वर्ष तक निहाल बाबा को मंदिर और आश्रम की साफ सफाई करने का शाप दे गए थे। यह अवधि पूरा करने के बाद बाबा जी में और सिद्धियां आ गई थीं। यहां बाबा जी की समाधि और मूर्ति दोनों बनी हुई है।
यम द्वितिया पर लगे विशाल मेले में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है। भोर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर मनोकामना पूरा होने की कामना करते हैं।
       महंत सुखराम दास के अनुसार बाबा निहाल दास यहीं पर बैठकर तपस्या किया करते थे। यहां इस मौके पर विशाल मेला भी लगता है। श्रद्धालु यहां सरयू नदी में स्नान करने के बाद बाबा निहाल दास को प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।

सरयू तट पर स्थित बाबा राम निहाल दास कुटी उमरिया में यम द्वितिया पर लगे विशाल मेले में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है । भोर से श्रद्धालुओं के आने जाने का तांता लगा रहता है।
       
बाबा राम निहाल दास की कुटी के परिसर में विभिन्न प्रकार की दुकानों की सजावट और भीड़ देखते ही बन रही थी। क्षेत्र के लोग मुख्य रूप से खेती-किसानी से जुड़े लोहे के सामान जैसे कुदाल, फावड़ा, हंसियां, सिंघाड़ा आदि खरीदते नजर आए। बच्चों के लिए झूले और खिलौनों की दुकानों पर भी खासा जमावड़ा रहा। मंदिर की मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु अपनी इच्छा से मंदिर में मनौती मानता है, उसे पुण्य अवश्य मिलता है। इसी विश्वास और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष यम द्वितीया पर यह मेला आयोजित होता है।

लोग बाबा के प्रतिमा का दर्शन कर मनोकामना पूरा होने की कामना करते हैं।बाबा की कुटी पर भोर से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो शाम तक जारी रहता है । जिले के दूर दराज से आए व्यापारियों ने अपनी-अपनी दुकानें को लगाते हैं। मेले में आए लोग जमकर खरीदारी करते रहते हैं। मंदिर परिसर में पहुंचे श्रद्धालु बाबा राम निहाल दास की प्रतिमा का दर्शन भी करते हैं। मेले के दिन भंडारा का आयोजन भी होते रहते हैं। 
       मान्यता है कि जो लोग इस मंदिर पर पहुंचकर सच्चे मन से मनौती व मन्नत मांगते हैं उनकी मुराद अवश्य पूरी होती है। यहां पर प्रत्येक मंगलवार को मेला भी लगता है।मेले में आए श्रृद्धालुओं ने जमकर खरीदारी की। मिट्टी के बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी के सामानों की दुकानें लोगों को आकर्षित करती रहीं। महिलाओं ने सूप,मचिया की खरीददारी की। बच्चों ने खिलौने व सिघाड़े का आनंद लिया। दुबौलिया के प्रभारी निरिक्षक पंकज कुमार सिंह अपने दल बल के साथ सुरक्षा में लगे रहे। स्थानीय लोगों के मुताबिक सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां रामनिहाल दास नाम के एक पुजारी रहते थे। जिन्हें सिद्ध पुरुष माना जाता था। मान्यता है कि बाबा गंभीर से गंभीर रोग सिर्फ छू कर ठीक कर देते थे। बाबा ने यहां जीवित समाधि ली थी। बाबा के हाथ से स्थापित मंदिर नदी तट पर मौजूद है। लोग मंदिर की परिक्रमा कर मनौती मांगते हैं। प्रत्येक मेले में बस्ती के अलावा अंबेडकरनगर के लोग भी भारी संख्या में आते हैं।
    
 सिद्ध पीठ बाबा राम निहाल दास की कुटी और भक्तों की सुरक्षा के लिए यहां पुलिस चौकी भी स्थापित है।मेले की सुरक्षा में दुबौलिया पुलिस के अलावा कप्तानगंज, कलवारी, लालगंज, नगर की पुलिस के साथ यातायात पुलिस उपस्थित रहती है। 

प्रतापपुर इमलिया अम्बेडकरनगर में बाबा निहाल दास जी की एक और प्रसिद्ध तपस्थली 

अम्बेडकरनगर के कटेहरी क्षेत्र प्रतापपुर इमलिया में स्थित श्री बाबा निहाल दास जी की एक प्रसिद्ध तपस्थली दिव्य अलौकिक कुटिया है। यहां एक विशाल जलाशय के समीप जंगल में शिव जी पार्वती जी नंदी जी और हनुमान जी की दिव्य प्रतिमाएं और यज्ञ शाला भी स्थापित हैं। बाबा जी को उनके गुरु जी ने 12 साल मंदिर की साफ सफाई करने का शाप दिया था जिसे पूर्ण कर बाबा जी और दिव्यता के साथ चमक उठे थे।
 यहां प्रत्येक मंगलवार को मेला लगता है, यहाँ प्रतिदिन स्थानीय व दूरदराज के लोग अपनी अपनी मन्नतों को लेकर आया करते है और उनके आस्था विश्वास समर्पण भक्तिभाव के अनुरूप बाबा जी की कृपा आशीर्वाद से अवश्य पूर्ण होता है ऐसी अद्भुत मान्यताओं को लेकर यह तपस्थली काफी प्रचलित है। यहां भक्तजन अपने धार्मिक भावनाओं के आधार पर तरह-तरह के चढ़ावा करते है यह चारों तरफ जंगलो से घिरा हुआ एक ऐसा अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त देव स्थल है जहाँ पहुँचने मात्र से कुछ पल व्यतीत करने से तनावों से मुक्त आत्मशान्ति अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है। भौतिकतावाद के झंझावात से ग्रसित नाना प्रकार के दैहिक दैविक भौतिक समस्याओं से यदि उलझे हुए हो और आपको कोई मार्ग न दिखाई दे रहा हो चारों ओर अंधकार ही अंधकार नजर आ रहा हो तो धार्मिक भक्तिभावना से एक बार इस अलौकिक तपोस्थली पर आए दर्शन प्राप्त करे निश्चित रूप से समस्त समस्याओं से आपको निजात मिल जाएगी मनुष्य जीवन में आने वाले समस्त संघर्षों व विघ्न बाधाओं से डटकर सामना करने की सामर्थ्य प्राप्त होगी। धर्म अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों से भरपूर महान संत बाबा निहाल दास जी के तपसाधना से ऊर्जावान्वित साधना भक्ति से परिपूर्ण अलौकिक ऊर्जा शक्ति का केन्द्र श्री बाबा जी की कुटिया के परम्परागत गद्दी पर आसीन परम पूज्यनीय महंत बाबा पराग दास जी है जिनके द्वारा नित्य प्रति आने वाले भक्तजनों के दुःख, संकटों का निवारण उनके द्वारा किए गए यज्ञशाला के हवनकुण्ड की भभूति प्रसाद प्रदान कर किया जाता है।

साहित्यिक और धार्मिक रुचि :- 

गारीः- 
चारि पदारथ देन हार यह नर तन सुर मुनि गाई जी। 
बिन सत्संग जात है बिरथा पुनि पुनि गोता खाई जी। 
काम क्रोध मद लोभ मोह यह असुर बड़े दुखदाई जी। 
पांचों संस्कार ये जानो तन में रहत सदाई जी। 
दम्भ पखण्ड कपट औ निद्रा आलस संघ जम्हुआई जी।५। 

माया द्वैत बासना नाना संग मन नाचे जाई जी। 
चिंता तन में चिता लगावै दुख चढ़ि बैठे आई जी। 
यह समाज आसुरी बंश की थकै न नेको भाई जी। 
महा जाल में फांसि लेत औ नर्क को देय पठाई जी। 
शान्ति शील संतोष दीनता प्रेम के हाल सुनाई जी।१०। 

क्षिमा दया सरधा औ हिम्मति सत्य समाधि लगाई जी। 
ज्ञान बिराग संग विश्वासौ लय में पहुँचौ धाई जी। 
परस्वारथ परमारथ दोनो कैसे कोउ करि पाई जी। 
देवासुर संग्राम जीतिये घट ही में चमकाई जी। 
हरि सुमिरन बिन जीति न पैहौ सुनिये सब मम भाई जी।१५। 

सतगुरु करि सुमिरन बिधि जानौ तब मन वश स्वै जाई जी। 
नाम खुलै हरि दर्शन लागैं खल सब चलैं पराई जी। 
ध्यान समाधि में पहुँचि जाव जब कर्म भर्म मिटि जाई जी। 
सबै देव मुनि संग बतलावैं हर्ष न हृदय समाई जी। 
दास निहाल सुरति औ शब्द क मारग अति सुखदाई जी।२०। 

दोहाः-

चिता के ऊपर बैठि कै, 
राम राम कहि जान। 
निहाल दास कहैं जारि तन, 
छोड़ि दीन हम प्रान।१। 
बास मिल्यो बैकुण्ठ में, 
आवा गमन मुकाम। 
या की गणना जगत में, 
बात मानिये आम।२। 

चौपाई:- 
नाम रूप लीला औ धामा। 
शून्य समाधि जानि निज जामा।१। 
मरै बासना निर्भय होवै। 
सो साकेत जाय सुख सोवै।२। 

दोहाः- 
जो जियतै में तय करै, 
सोई चतुर सुजान। 
नाहिं तो जनमै मरै, 
मानों बचन प्रमान।१। 

चौपाई:- 
बाबन बेर ठगावै जोई। 
बावन बीर कहावै सोई। 
धोका खाये बिन नहिं ज्ञाना। 
हम तो यह अपने मन माना। 
पानी दूध वहां बिलगाना। 
सुनतै खुलि गे आँखी काना। 
बचन हमार मानि यह लेना। 
सत्य नाम की सिक्षा देना। 
रेफ बिन्दु जो सब में ब्यापक। 
सब का जानो यह अध्यापक! 
या को जानि लेय जो कोई। ता को आवागमन न होई।६। 

दोहाः- 
नाम कि धुनि खुलि जाय जब, सुर मुनि दर्शन दैय। 
मुद मंगल ह्वै जाय तब, हरि निज पास में लेंय।। 
(सन्दर्भ :श्री राम-कृष्ण लीला भक्तामृत चरितावली' श्री परमहंस राममंगलदास जी द्वारा रचित प्रथम दिव्य ग्रन्थ।
(भगवान, देवी-देवता, ऋषि, मुनि, हर धर्म के पैगम्बर, सिद्ध, सन्त, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा प्रकट होकर लिखवाये आध्यात्मिक पदों का दिव्य संग्रह ); ग्रन्थ - 1, भाग - २ दिसम्बर २००१।)