इतिहास के अद्भुत रहस्य
Sunday, June 7, 2026
एंग्लो-नेपाल युद्ध की पृष्ठभूमि और सुगौली संधि✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
सुगौली संधि से पूर्व नेपाल का क्रमिक इतिहास ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
प्रागैतिहासिक काल-
हिमालय क्षेत्र में मनुष्यों का आगमन लगभग 9,000 वर्ष पहले होने के तथ्य की पुष्टि काठमाण्डू घाटी में पाये गये नव पाषाण औजारौं से होती है। सम्भवतः तिब्बती-बर्मीज मूल के लोग नेपाल में 2,500 वर्ष पहले आ चुके थे।
नेपाल का इतिहास -
प्राचीन काल के नेपाल में छोटे राज्यों, मध्ययुगीन राजवंशों, गोरखा एकीकरण, राणा शासन के अत्याचार और अंततः एक आधुनिक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलने की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा मिलती है। नेपाल के इतिहास के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-
1. प्राचीनकाल प्रारंभिक निवासी-
नेपाल में सबसे पहले दक्षिण भारत से द्रविड़ लोग आए थे बाद में तिब्बती-बर्मी और इंडो-आर्यन लोग यहां आकर बसे। 1500 ईशा पूर्व के आसपास इन्डो-आर्यन जतियों ने काठमाण्डू घाटी में प्रवेश किया था। करीब 1,000 ईसा पूर्व में अनेक छोटे-छोटे राज्य और राज्य संगठन बनें। सिद्धार्थ गौतम (ईसा पूर्व 563- 483) शाक्य वंश के राजकुमार थे, जिन्होंने अपना राजकाज त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया था और वह बुद्ध बन गए थे।
2.गौरवपूर्ण प्राचीन काल-
नेपाल, जिसे एशिया के सबसे प्राचीन देशों में से एक माना जाता है, को यह सौभाग्य प्राप्त है कि अपने इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश या धार्मिक समूह द्वारा उपनिवेश नहीं बनाया गया। नेपाल विश्व शक्तियों (अमेरिका, चीन और भारत सहित) के लिए दो मुख्य कारणों से केंद्र बिंदु बना रहा है-
(क) हिमालयी नदियों के जल, खानों और जैविक संसाधनों जैसे नेपाल के संसाधनों का दोहन किया जाना।
(ख) अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए नेपाली भूमि का सैन्य उपयोग किया जाना।
नेपाल, एक अहिंसक और स्वतंत्र देश होने के बावजूद, लगभग 300 वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी शक्तियों (अर्थात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के साथ संघर्ष करने लगा था।
नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि वंशी और सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरात वंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं।
कला, शिक्षा, वैभव और राजनीति के दृष्टिकोण से लिच्छवि काल 'स्वर्णयुग' रहा है। जन साधारण संस्कृत भाषा में लिख पढ़ और बोल सकते थे। राजा स्वयं विद्वान् और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञ होते थे।
3.'पैगोडा' शैली की वास्तु कला की प्रधानता -
'पैगोडा' शैली की वास्तुकला नेपाल में बड़ी उन्नत दशा में थी और यह कला सुदूर महाचीन तक फैली हुई थी। मूर्तिकला भी समृद्ध अवस्था में थी। धार्मिक सहिष्णुता के कारण् हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म समान रूप से विकसित हो रहे थे। काफी वजनदार स्वर्णमुद्राएँ व्यवहार में प्रचलित थीं।विदेशों से व्यापार करने के लिए व्यापारियों का अपना संगठन भी था। वैदेशिक संबंध की सुदृढ़ता वैवाहिक संबंध के आधार पर कायम थी।
4.भारतीय साम्राज्यों का प्रभाव -
लिच्छवी राजवंश चौथी से आठवीं शताब्दी के मध्य था। इसे नेपाल का 'स्वर्णिम युग' माना जाता है। इसी काल में कला, व्यापार और बौद्ध व हिंदू धर्म का तेजी से विकास हुआ। स्वयंभूनाथ जैसे प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण इसी काल में हुआ।
250 ईशा पूर्व तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम का स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थ यात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602– 664 ई.) में अपनी यात्रा के वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनक मुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है। यह निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में पांचवी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई थी।
5.मध्यकाल में नेपाल -
8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया और सन् 879 ई से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ था। नेवार एक विशिष्ट भाषाई और सांस्कृतिक समूह हैं, जो मुख्य रूप से इंडो-आर्यन और तिब्बती-बर्मी जातीय समूह हैं, जिनकी एक सामान्य नेपाल भाषा है, और वे मुख्य रूप से नेवार हिंदू धर्म और नेवार बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। इन लोगों का नियन्त्रण देश भर में कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है।
मल्ल राजाओं ने काठमांडू घाटी में शासन किया और इसे नेवार संस्कृति का केंद्र बनाया। उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर और विभिन्न पैगोडा शैली के मंदिरों का निर्माण कराया था।
ई.सन् 880 में लिच्छवि राज्य की समाप्ति पर नुवाकोटे ठकुरी राजवंश का अभ्युदय हुआ। इस समय नेपाल राज्य की अवनति प्रारंभ हो गई थी। केंद्रीय शासन शिथिल पड़ गया था। फलत: नेपाल अनेक राजनीतिक इकाइयों में विभाजित हो गया। हिमालय के मध्य कछार में मल्लों का गणतंत्र राज्य कायम था। लिच्छवि शासन की समाप्ति पर मल्ल राजा सिर उठाने लगे थे।
11वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भू भाग में दिखा था। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बौद्ध धर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा।
13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में संस्कृत शब्द “मल्ल” कुल नाम वाले राजवंश का उदय होने लगा। 200 वर्ष में इन राजाओं ने शक्ति एकजुट की।
14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देश का बहुत ज्यादा भाग एकीकृत राज्य के अधीन में आ गया। लेकिन एकीकरण कम समय तक ही टिक सका था।
सन् 1350 ई. में बंगाल के शासक शमशुद्दीन इलियास ने नेपाल घाटी पर बड़ा जबरदस्त आक्रमण किया था। उस समय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो गयी।
6.तीस रियासतों में विभाजित -
सन् 1480 ई. में अंतिम वैश राजा अर्जुन देव (अर्जुन मल्ल देव ) को उनके मंत्रियों ने पदच्युत करके स्थितिमल्ल नामक राजपूत को राज सिंहासन पर बैठाया था। इस समय तक केंद्रीय राज्य पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न होकर काठमाडू, गोरखा, तनहुँ, लमजुङ, मकबानपुर आदि लगभग तीस रियासतों में विभाजित हो गया था।
1482 में ये राज्य तीन भाग में विभाजित हो गये थे - कान्तिपुर, ललितपुर और भक्तपुर – जिसके बीच मे शताव्दियौं तक मेल नहीं हो सका।
राजा स्थितिमल्ल अस्त व्यस्त आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में पूर्ण रूप से समर्थ हुए। राजा पक्षमल्ल ने केंद्रीय शासन को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया, किंतु उनके निधन पर पश्चात् उनके उत्तराधिकारियों ने राज्य को आपस में बाँटकर पुन: राजनीतिक इकाइयाँ खड़ी कीं।
7.साम्राज्य से पहले का नेपाल -
प्राचीन काल से ही नेपाल के अविभाजित भारत और चीन दोनों के साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं। विभिन्न शासकों के बीच सामाजिक संबंधों में दरार आने और 16वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती शक्ति के कारण भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में प्रभुत्व बढ़ने से 1400 ईस्वी के बाद चीन के साथ संबंध बिगड़ने लगे।
मध्य कालीन नेपाल साहित्य, संगीत और कला की दृष्टि से उन्नत होने पर भी राजनीतिक दृष्टि से अवनति की ओर ही बढ़ा। जनजीवन अशांत था। यूरोपीय साम्राज्य वादियों की कुदृष्टि भारत के पश्चात् नेपाल पर भी पड़ गई थी। नेपाल के विरुद्ध किनलोक का सैनिक अभियान और घाटी में ईसाई पादरियों की चहल पहल इस तथ्य के प्रमाण हैं।
8.आधुनिक गोरखा राज्य की स्थापना-
गोरखा राज्य इन दिनों काफी सबल हो चुका था। नेपाल की छोटी -छोटी राजनीतिक इकाइयों पर और नेपाली जनजीवन पर गोरखा राज्य का प्रभाव छा गया था। न्यायमूर्ति राजा राम शाह के न्याय की चर्चा नेपाल भर में फैल गयी थी। राजा पृथ्वी पति शाह के राज्यकाल में बंगाल के नवाब ने गुर्गिन खाँ के नेतृत्व में नेपाल पर आक्रमण करने के लिए पचास साठ हजार फौज भेजी थी। नवाब की सेना मकवान पुर के तराई क्षेत्र में पड़ाव डाले हुई थी। मकबानपुर ने गोरखा राज्य से सहायता की याचना की। गोरखा के कुछ जवानों ने नवाब की सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला। बचे हुए सैनिक अपनी जान बचाकर भाग निकले।
उपर्युक्त इन दो कारणो से गोरखा राज्य नेपाली जन जीवन के सुखद भविष्य का आशा केंद्र हो गया था। जन जीवन की इस आकांक्षा को नेपाल राष्ट्र के जनक महाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाह ने समझा और नेपाल के एकीकरण के लिए अभियान प्रारंभ किया।
मध्यकालीन नेपाल के अंतिम चरण में अर्थात् राष्ट्र के जनक पृथ्वीनारायण शाह के उदय होने से पूर्व विदेशी लोग नेपाल पर दाँत गड़ाने लगे थे। नेपाल घाटी में पादरी लोग ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे थे। मल्ल राजा आपसी फूट-वैमनस्य, झगड़ा, युद्ध आदि बातों में निरंतर व्यस्त थे।
1765 ई मे, गोरखा के शाह वंशी राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के छोटे छोटे बाइस व चोबिस राज्य के ऊपर चढाँइ करते हुए उन्हें एकिकृत किया, बहुत ज्यादा रक्तरंजित लडाँईयौं पश्वात उन्हौने तीन वर्ष बाद कान्तीपुर, पाटन व भादगाँउ के राजाओं को हराया और अपने राज्य का नाम गोरखा से नेपाल में परिवर्तित किया। कान्तिपुर विजय के लिये तीन बार युद्ध करना पडा, महान्पि सेनानायक कालू पाण्डे भी इस युद्ध में शहीद हो गए।पृथ्वीनारायण शाह ने कूटनीति अपनाकर नेपाल घाटी के बाहर के देशों से लडाई की और कीर्तिपुर में नाकाबन्दी कर दिया, पानी का मूल भी बन्द कर दिया अन्तिम या तीसरी बार में उन्हे कान्तिपुर विजय में कोई युद्ध नहीं करना पड़ा। वास्तव में, उस समय इन्द्रजात्रा पर्व में कान्तिपुर की सभी जनता फसल के देवता भगवान इन्द्र की पूजा और महोत्सव (जात्रा) मना रहे थे, जब पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी सेना लेकर धावा बोला और सिंहासन पर कब्जा कर लिया। इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म भी कहते है।
गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 25 सितंबर 1768 में काठमांडू घाटी को जीतकर आधुनिक नेपाल (शाह राजवंश) की नींव रखी और इसे देश की राजधानी बनाया। उन्होंने काठमांडू ,पाटन और भक्तपुर राज्यों को अपने शाह वंश के अंतर्गत एक राज्य में एकीकृत करने में सफलता प्राप्त की थी। अपने इतिहास के अधिकांश समय तक नेपाल राज्य विधिवत रूप से एक निरंकुश राजतंत्र था। 1768 तक नेपाल 54 छोटे राज्यों में विभाजित था। नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने इन राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया और नेपाल राज्य की स्थापना की। इस दौरान, नेपाल ने तत्कालीन ब्रिटिश भारत के साथ कई युद्ध लड़े।
नेपाल ने सैन्य रूप से मजबूत ब्रिटिश भारत को अधिकतर बार हराया और भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में अपना नियंत्रण बढ़ाया, जहाँ नेपाली संस्कृति और भाषाएँ काफी हद तक प्रचलित थीं।
नेपाल घाटी के बाहर के राज्य भी आपस में लड़-झगड़कर अपनी जन- धन-शक्ति को क्षीण कर रहे थे। राजाओं ने आपसी झगड़े, मल्ल राजाओं द्वारा देव- मंदिर की संपत्ति का व्यक्तिगत उपभोग, राजा भास्कर मल्ल द्वारा हिंदू भावना के विरुद्ध एक मुसलमान को प्रधान मंत्री बनाने का कार्य आदि मध्य कालीन राजनीतिक स्थिति को धूमिल बनाते हैं और साथ ही नेपाल की सार्वभौम स्वतंत्रता को अधर में डाल देते हैं। शमशुद्दीन इलियास के आक्रमण के पश्चात् राजा स्थितिमल्ल ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार साम्राज्यवादियों से नेपाल का बचाने वाले के रूप में पृथ्वीनारायण शाह ऐतिहासिक आवश्यकता स्वरूप दिखलाई पड़ते हैं।
नेपाली गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया किंतु यह आक्रमण नेपाल को महँगा पड़ा। चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दीं और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश किया। इसी वर्ष ग्रेट ब्रिटेन और नेपाल में द्वितीय वाणिज्य संधि संपन्न हुई और नेपाल में एक अंग्रेज कूटनीतिज्ञ की नियुक्ति की व्यवस्था हो गई थी ।
लेखक :
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Friday, June 5, 2026
हिमालय केंद्रित महत्वपूर्ण जानकारियां✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
हिमालय एशिया में स्थित एक सर्वाधिक प्राचीन पर्वत-शृंखला है। इसको 'पर्वतराज' हिमालय भी कहते हैं। कालिदास तो हिमालय को पृथ्वी का मानदंड मानते हैं। हिमालय की पर्वत श्रंखलाएँ शिवालिक कहलाती हैं। सदियों से हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में ऋषि-मुनियों का वास रहा है और वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते रहे हैं । हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र रहा है। हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है।
चार श्रेणियों में हिमालय की भू-आकृतियों का विभाजन-
हिमालय पर्वत तन्त्र को तीन मुख्य श्रेणियों के रूप में विभाजित किया जाता है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मोड़ से लेकर अरुणाचल के ब्रह्मपुत्र के मोड़ तक एक-दूसरे के समानान्तर पायी जाती हैं। चौथी गौड़ श्रेणी असतत है और पूरी लम्बाई तक नहीं पायी जाती है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से चार समानांतर श्रेणियों में विभक्त है
(क) परा-ट्रांस- हिमालय-
परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय या टेथीज हिमालय भी कहते हैं, यह हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है। यह कराकोरम, लद्दाख और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है।
(ख) महान हिमाद्रि हिमालय
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है, हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। यह श्रेणी मुख्य केन्द्रीय क्षेप द्वारा मध्य हिमालय से अलग है। यद्यपि पूर्वी नेपाल में हिमालय की तीनों श्रेणियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं।
(ग) मध्य लघु हिमालय
हिमालय पर्वत का वह भाग जो महान हिमालय के दक्षिण सामानान्तर तक फैला हुआ है, लघु हिमालय कहलाता है। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर है। यह 80 से 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 1628 मीटर से लेकर 3000 मीटर है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4500 मीटर है। यह हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है - पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार, उत्तराखंड में मस्सोरी या नागटिब्बा तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(घ) परा या ट्रांस हिमालय-
उपरिवर्णित तीन मुख्य श्रेणियों केआलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। यह शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है। बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। हिमालय पर्वत 7 देशों की सीमाओं में फैला हुआ हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार।
प्रादेशिक विभाजन
अनेक भू–वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय को पांच क्षैतिज प्रदेशों में बाँटा है। इनमें चार भारत के हिस्से में और एक नेपाल के हिस्से में फैला हुआ है।
1.कश्मीर हिमालय -
कश्मीर हिमालय गिल्गिट-बल्टिस्तान, कश्मीर घाटी से लेकर हिमाचल प्रदेश तक फैला हुआ है । यह सिंधु नदी से सतलुज नदी के बीच लगभग 560 किलोमीटर लंबाई तक फैला हुआ है। इसकी प्रमुख पर्वत मालाएं जंस्कार और पीर-पंजाल हैं। इसकी सबसे ऊंची चोटी नंगा पर्वत है।सिंधु नदी की पाँचो प्रमुख सहयोगी नदियों का उद्गम स्थल कश्मीर हिमालय से ही होता है। इसकी पाँच सहयोगी नदियां झेलम, रावी, ब्यास, सतलुज और चिनाब हैं।
2.कुमाऊँ हिमालय -
सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच के भाग को कुमाऊं कहा जाता है । यह उत्तरी भारत में स्थित हिमालय पर्वत श्रृंखला का एक प्रमुख प्रादेशिक भाग है। यह पश्चिम में सतलुज नदी से लेकर पूर्व में काली नदी तक लगभग 320 किलोमीटर की लंबाई में फैला हुआ है। मुख्य रूप से उत्तराखंड राज्य में स्थित यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, झीलों और ऊँची चोटियों के लिए प्रसिद्ध है।
3.नेपाल हिमालय-
सरयू नदी से कोसी नदी के बीच के भाग को कहा जाता है। यह हिमालय पर्वत श्रृंखला का सबसे ऊँचा और मध्य-पूर्वी भाग है, जो काली नदी से लेकर तीस्ता नदी तक लगभग 800 किलोमीटर (500 मील) तक फैला हुआ है। दुनिया की 14 सबसे ऊँची चोटियों में से 8 चोटियाँ इसी क्षेत्र में स्थित हैं, जिसमें सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट भी शामिल है।
4.बंगाल हिमालय -
कोसी नदी से मानस नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।यह पूर्वी हिमालय का एक प्रमुख उपभाग है जो पश्चिम में कोसी नदी से लेकर पूर्व में मानस नदी के बीच विस्तृत है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, चाय बागानों, समृद्ध जैव विविधता और साहसिक पर्यटन के लिए जाना जाता है।
5.असम हिमालय -
मानस नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक के भाग को कहा जाता है। यह हिमालय पर्वतमाला के उस हिस्से का पारंपरिक नाम है जो पश्चिम में भूटान की पूर्वी सीमा और पूर्व में त्सांगपो नदी के ग्रेट बेंड के बीच स्थित है। इस पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी नामचा बरवा है । अन्य ऊँची चोटियों में बरवा की सहोदर चोटी ग्याला पेरी , कांगटो और न्येगी कानसांग शामिल हैं । यह क्षेत्र अभी भी सामान्यतः कम ही सर्वेक्षण किया गया है और बाहरी लोगों द्वारा कम ही दौरा किया जाता है। यह पूर्वी भाग में स्थित है। "असम हिमालय" नाम भ्रामक है, क्योंकि इस पर्वतमाला के कुछ भाग दक्षिण-पूर्वी तिब्बत में हैं , जबकि अन्य भाग भूटान और भारत के उत्तरी असम , सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों में स्थित हैं ।
100 से ज्यादा सर्वोच्च शिखर
संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, शिवशंकर, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। कुछ प्रमुख शिखरों की ऊंचाई इस प्रकार है :-
माउंट एवरेस्ट : 8848.86 मीटर
के - 2 : 8611 मीटर
कंचनजंघा : 8,586
लहोस्ते : 8,516
मकालू : 8,463
15 हजार से ज्यादा हिमनद-
हिमनद मुख्य रूप से उन ठंडे क्षेत्रों में बनते हैं जहाँ सालों-साल बर्फ गिरती है, लेकिन गर्मियों में उसका पूरा हिस्सा पिघल नहीं पाता। नई बर्फ के जमने के भारी दबाव से पुरानी बर्फ एक कठोर और सघन दानेदार रूप फर्न में बदल जाती है। अंततः, यही संघनित बर्फ पिघलकर ठोस हिमनदीय बर्फ बन जाती है।
हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबा सियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है।
हिमालय की प्रमुख नदियां -
हिमालयी जल निकासी प्रणाली के बारे में हिमालयी नदी प्रणाली में मुख्य रूप से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन शामिल हैं । इन नदियों में बर्फ पिघलने और वर्षा दोनों से पानी आता है । इस प्रणाली की नदियाँ बारहमासी होती हैं। ये मार्ग हिमालय के उत्थान के साथ- साथ होने वाली अपरदन गतिविधियों द्वारा निर्मित विशाल दर्रों से होकर गुजरते हैं।
हिमालय पर्वतमाला में 19 प्रमुख नदियाँ बहती हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
सिंधु और ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी नदियाँ हैं, जिनमें से प्रत्येक का जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ों में लगभग 100,000 वर्ग मील अथवा (260,000 वर्ग किमी) में फैला हुआ है। 19 नदियों में से पाँच नदियाँ, जिनका कुल जलग्रहण क्षेत्र लगभग 51,000 वर्ग मील (132,000 वर्ग किमी) है, सिंधु नदी प्रणाली से संबंधित हैं- झेलम , चिनाब , रावी , ब्यास और सतलुज हैं। ये सामूहिक रूप से भारत के पंजाब राज्य और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बीच विभाजित विशाल क्षेत्र को परिभाषित करती हैं । शेष नदियों में से नौ नदियाँ अन्य नदियों से संबंधित हैं।
गंगा प्रणाली -गंगा, यमुना , रामगंगा, काली (काली गंडक), करनाली, राप्ती, गंडक , बागमती और कोसी आदि नदियाँ पहाड़ों में लगभग 84,000 वर्ग मील (218,000 वर्ग किमी) क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
ब्रह्मपुत्र प्रणाली -
तीन नदियाँ ब्रह्मपुत्र प्रणाली से संबंधित हैं— तीस्ता , रायडक और मानस-जो हिमालय में 71,000 वर्ग मील/ 184,000 वर्ग किमी क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
पर्वत श्रृंखलाओं के उत्तर में उद्गम-
हिमालय की प्रमुख नदियाँ पर्वत श्रृंखलाओं के उत्तर में उद्गम करती हैं और गहरी घाटियों से होकर बहती हैं ,जो आम तौर पर किसी भूवैज्ञानिक संरचनात्मक नियंत्रण, जैसे कि भ्रंश रेखा, को दर्शाती हैं। सिंधु नदी प्रणाली की नदियाँ सामान्यतः उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हैं, जबकि गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र से बहते हुए आमतौर पर पूर्व दिशा में बहती हैं।
गहरी खाइयों के अलावा, ये नदियाँ अपने पर्वतीय मार्ग में यू-आकार और वी- आकार की घाटियाँ, तीव्र धाराएँ और झरने भी बनाती हैं। मैदानी इलाकों में, वे समतल घाटियों, घुमावदार जलमार्गों, धनुषाकार झीलों, बाढ़ के मैदानों, गुंथी हुई धाराओं और नदी के मुहाने के पास डेल्टा जैसी निक्षेपण संबंधी संरचनाएं बनाते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में, इन नदियों का मार्ग अत्यधिक घुमावदार होता है, लेकिन मैदानी इलाकों में, वे एक मजबूत घुमावदार प्रवृत्ति प्रदर्शित करती हैं और अक्सर अपना मार्ग बदलती रहती हैं।
कोसी नदी का प्रवाह अस्थिर है और इसमें काफी कटाव होता रहता है, जिसके कारण अंततः इसके प्रवाह में गाद की मात्रा बढ़ जाती है। इसी गाद की वृद्धि के कारण कोसी नदी अक्सर अपना मार्ग बदलती रहती है।कोसी नदी को 'बिहार का दुःख' भी कहा जाता है।
धार्मिक स्थल -
हिमालय की गोद में बसे धार्मिक स्थल अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यहाँ हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के कई प्रमुख तीर्थस्थल स्थित हैं।
1.उत्तराखंड के हिमालयी स्थल:
चार धाम: केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री हिमालय के सबसे पवित्र चार धाम माने जाते है। इनमें हरिद्वार, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश भी आते हैं।
2.कैलाश मानसरोवर (तिब्बत):
हिमालय क्षेत्र में स्थित यह स्थान भगवान शिव का सबसे बड़ा धाम माना जाता है और यह हिंदू, बौद्ध व जैन धर्मों के लिए पवित्र है।
3.हेमकुंड साहिब चमोली:
चमोली ज़िले में स्थित यह सिखों का सबसे ऊँचा और पवित्र गुरुद्वारा है।
4. हिमाचल प्रदेश के हिमालयी स्थल: ज्वाला देवी और कांगड़ा देवी मंदिर हैं जो हिमाचल की घाटियों में स्थित प्राचीन और आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
5.तवांग मठ (अरुणाचल प्रदेश):
हिमालय के पूर्वी छोर पर स्थित, यह भारत का सबसे बड़ा बौद्ध मठ है।
6. नेपाल के हिमालयी स्थल :
पशुपति नाथ मंदिर काठमांडू (नेपाल) में बागमती नदी के किनारे स्थित भगवान शिव का यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।
7.मुक्तिनाथ मंदिर:
हिमालय क्षेत्र में स्थित यह हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए एक अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है।
8. जम्मू और कश्मीर के स्थल:
अमर नाथ गुफा: हिमालय की बर्फीली वादियों में स्थित इस गुफा में प्राकृतिक रूप से 'बर्फानी बाबा' (शिवलिंग) बनते हैं।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Thursday, June 4, 2026
गंडक नदी का उद्गम: हिमालय से हिन्द महासागर तक का चित्र-विचित्र सफर✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
यह नदी तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों से निकलती है और नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा गढ़ी से नेपाल में प्रवेश करती है। गंडक नदी को काली गंडकी ,नारायणी और शालीग्रामी भी कहा जाता है। यूनानी के भूगोलवेत्ताओं की तथा महाकाव्यों में उल्लिखित सदानीरा भी यही है। यह मुख्य रूप से भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश राज्यों तथा नेपाल में बहने वाली एक बारहमासी हिमालयी नदी प्रणाली है,जो तिब्बत-नेपाल सीमा के पास धौलागिरी और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से गुजरती , लगभग 7,620 मीटर की ऊँचाई से निकलते हुए मुस्तांग क्षेत्र से नेपाल में प्रवेश करती है।
ऊपरी हिस्से में इसे विभिन्न धाराओं काली गंडक और त्रिशूलगंगा के रूप में जाना जाता है। 'काली गंडकी' आगे चलकर नारायणी व सप्त गंडकी के नाम से जानी जाती है । तिब्बत-नेपाल सीमा के पास के मुक्तिनाथ के मुस्तांग क्षेत्र से गुजरते हुए यह चितवन में, काली गंडकी नदी और त्रिशुली से मिलती है।
त्रिशूली नदी मध्य नेपाल में बहने वाली एक प्रमुख और तेज़ बहाव वाली नदी है जो प्रसिद्ध नारायणी (गंडक) नदी में मिल जाती है। त्रिशूली काठमांडू से ऊपर से मध्य नेपाल के मनोकामना से कुछ ऊपर से भी गुजरती है।
यह काठमांडू-पोखरा और पोखरा मुक्तिनाथ राजमार्ग के समानांतर बहती रहती है। इसमें जगह जगह पर अनेक पर्वतीय धाराएं और झरने मिलते रहते हैं।गंडकी की मुख्य सहायक नदियों में त्रिशूली, बूढ़ी गंडक, मास्यांगड़ी, पंचांग, सरहद और मायांगड़ी आदि शामिल हैं। बूढ़ी गंडक (सिकराना) इस नदी की प्राचीन धारा है जो मुंगेर के संमुख गंगा में मिलती है। इनके संगम स्थल से भारतीय सीमा तक नदी को नारायणी के नाम से जाना जाता है। इसका कुल बेसिन क्षेत्र लगभग 29,705 वर्ग किलोमीटर है।
नदी का पारिस्थितिक महत्व:-
नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान, भारत के वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य और उत्तरी बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों जैसे पारिस्थितिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों का निर्माण गंडक नदी के प्रवाह के कारण हुआ है।
तराई क्षेत्र में गंडक नदी और उसकी सहायक नदियों की उपस्थिति ने नेपाल और भारत में विशाल प्राकृतिक वन भंडारों का निर्माण किया है। ये वन बाघ, तेंदुए, गैंडे, गौर आदि कई वन्यजीवों और पक्षी प्रजातियों का घर हैं। यह नदी स्वयं भी एक पारिस्थितिक अभ्यारण्य है, क्योंकि यह गंगा डॉल्फिन, कछुए, घड़ियाल, मगर और महसीर जैसी कई लुप्तप्राय प्रजातियों का घर है। तराई क्षेत्र के अलावा, इस नदी ने उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की पारिस्थितिकविविधता को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उपजाऊ मैदान, मिट्टी की गुणवत्ता और पानी की प्रचुरता के कारण आम और केले के पेड़ों के बागों से भरे हुए थे । इनमें से अधिकांश बागों की जगह अब खेत ले चुके हैं, फिर भी इस नदी ने इन क्षेत्रों की कृषि क्षमता बढ़ाने में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।विभिन्न कहानियों से जुड़ाव :-
नारायणी नाम अमोनाइट जीवाश्मों की उपस्थिति के कारण पड़ा है। इन जीवाश्मों को हिंदू देवता विष्णु या नारायण के रूप में पूजा जाता है।
इसे शालिग्राम के नाम से भी जाना जाता है। यह विष्णु प्रिया बृंदा के भौतिक स्वरूपा तुलसी व जलस्वरूपा नारायणी शालिग्रामी नाम से भी अभि- विहित होती है।गज-ग्राह की पौराणिक कथाएँ :-
गज-ग्राह की कहानी यहीं से शुरू होती है। कहा जाता है कि त्रिवेणी धाम में वन और जल के देवताओं, अर्थात् गज और ग्राह, हाथी और मगरमच्छ के बीच युद्ध छिड़ गया था। इस कथा का उल्लेख श्रीमद् भगवद् गीता में मिलता है , जिसमें बताया गया है कि एक दिन एक विशाल हाथी अपने झुंड के साथ नदी में स्नान करने आया । यह वही स्थान था जहाँ जल के देवता, मगरमच्छ, निवास करते थे। हाथी को देखकर उन्होंने उसका पैर पकड़ लिया और उसे गहरे पानी में खींचने का प्रयास किया। यह संघर्ष हजारों वर्षों तक चलता रहा। अंत में हाथी ने भगवान विष्णु या हरि से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनी गई और हरि ने अन्य देवताओं की उपस्थिति में उन्हें मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त कराया था।
त्रिवेणी धाम :-
भारतीय उपमहाद्वीप में इसका प्रवेश द्वार त्रिवेणी धाम है। जहां नाम बदलकर गंडकी या गंडक रख दिया जाता है। यहीं पर पहाड़ों की संकरी घाटियों से बच निकल कर फैल जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानों में और आकर बड़ा हो जाता है। आगे सुमेस्वर की पहाड़ियों पंचनाद और सोनाहा होते हुए नदी आगे बढ़ती है।
वाल्मीकि नगर:-
त्रिवेणी के बाद, यह नदी वाल्मीकि नगर से होकर गुजरता है। भैंसलोटन गांव अपने बाघ अभ्यारण्य के लिए जाना जाता है। यह ऋषि वाल्मीकि की कहानियों से भी जुड़ा हुआ है। यह वाल्मीकि आश्रम का मूल स्थान माना जाता है। गांव के आस पास के जंगल में एक पुराने मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। आज का वाल्मीकि नगर सन् 1900 के दशक के आरंभ में अस्तित्व में आया, जब नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच गंडक परियोजना को मंजूरी दी गई थी। बांध और नहरों के निर्माण के साथ-साथ इस क्षेत्र में बंगलों और कर्मचारियों के क्वार्टरों का भी निर्माण हुआ। इनमें से अधिकांश आज भी बरकरार हैं, जबकि अन्य के अवशेष गांव में अभी भी देखे जा सकते हैं।
पहाड़ों से मैदान में प्रवेश:-
नेपाल के पहाड़ों के आखिरी नज़ारों को पीछे छोड़ते हुए मैदानों में बूढ़ी गंडक की एक झलक दिखाई देती है। नदी केकिनारों पर छोटे-छोटे कस्बे और कृषि भूमि स्थित हैं। एक समय ऐसा भी था जब नदीकिनारे आम के बागों से सजे हुए थे। बिहार के मैदानी इलाकों में इसे विकसित किया गया भूमि मार्ग भी इसी तरह का एक अद्भुत मार्ग है। इसी मार्ग के समानांतर एक मार्ग इस नदी के जल स्रोतों और घने वनों द्वारा सुगम बनाया गया है।एक मार्ग यह मार्ग वृज्जि गणराज्य और मगध की राजधानियों को जोड़ता था।
नेपाल का शाही राजमार्ग:-
नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र की ओर एक मार्ग है जिसे अशोक ने शाही राजमार्ग में बदल दिया था। यह मार्ग अशोक स्तंभों और बौद्ध स्तूपों से घिरा हुआ है। मुख्य रूप से बसाढ़, केसरिया, अरेराज, लौरिया नंदनगढ़ और रामपुरवा में मौजूद पेड़ों को अपना घर मिल गया है।
विकसित किए गए घाट:-
नदी व्यापार को सुगम बनाने के लिए घाट विकसित किए गए । जिन घाटों का नाम रीवा घाट और सत्तर घाट रखा गया था।अंततः यह नदी हाजीपुर और सोनपुर के जुड़वां शहरों में पहुँच गया। इस क्षेत्र को हरिहर-क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।
इसी क्षेत्र में गज-ग्राह की कहानी समाप्त होती है। यह क्षेत्र पटना के साथ व्यापार को सुगम बनाने के लिए विकसित किया गया था। फिर गंडकी की मुलाकात गंगा से होती है। उसकी यात्रा में उसका साथ देने के लिए बंगाल की खाड़ी की अथाह गहराई में जाकर समाप्त होती है।
सांस्कृतिक विरासत से संबंध :-
नेपाल की भूमि से गुजरने के बाद, यह त्रिवेणी धाम में भारत-नेपाल सीमा को पार करती है और बिहार के वाल्मीकि नगर पहुँचती है। वाल्मीकि नगर से, गंडक नदी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों से होकर बहती है । यह नदी काफी दूर तक उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों के बीच सीमा निर्धारित करती है। उत्तर प्रदेश में यह नदी महराजगंज और कुशीनगर जिलों से होकर बहती है। बिहार में यह चंपारन, सारन और मुजफ्फरपुर जिलों से होकर बहती हुई 192 मील के मार्ग के बाद पटना के संमुख गंगा में मिल जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग 1310 किलोमीटर है।
गंडक नदी, विश्व की अन्य नदियों और जल संसाधनों की तरह, पारिस्थितिक जीविका का आधार रही है। इसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है और इसके किनारों पर स्थित अनेक सांस्कृतिक धरोहर स्थलों को इसने प्रेरित किया है।
भारत नेपाल की संयुक्त विद्युत गंडक परियोजना :-
यह बिहार और उत्तर प्रदेश की संयुक्त नदी घाटी परियोजना है। 1959 के भारत- नेपाल समझौते के तहत इससे नेपाल को भी लाभ है। इस परियोजना के अन्तर्गत गंडक नदी पर त्रिबेनी नहर हेड रेगुलेटर के नीचे बिहार के बाल्मीकि नगर मे बैराज बनाया गया। इसी बैराज से चार नहरें निकलतीं हैं, जिसमें से दो नहरें भारत मे और दो नहर नेपाल में हैं। यहाँ15मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है और यहाँ से निकाली गयी नहरें चंपारण के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से की सिंचाई करतीं है।
वाल्मीकि नगर का बैराज 1969- 70 में बना। इसकी लम्बाई 747.37 मीटर और ऊँचाई 9.81 है। इस बैराज का आधा भाग नेपाल में है। 256.68 किमी पूर्वी नहर से बिहार के चम्पारन, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिलों के 6.68 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई होती है। इसी नहर से नेपाल के परसा, बाड़ा, राउतहाट जिलों के 42,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। मुख्य पश्चिमी नहर से बिहार के सारन जिले की 4.84 लाख भूमि तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर जिलों के 3.44 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। इस नहर से नेपाल के भैरवा जिले की 16,600 हेक्तर भूमि की सिंचाई होती है।
बिहार उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश :-
यहीं से गंडक नदी अंततः भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सुमेश्वर की संकरी घाटियों और बलुआ पत्थर की पर्वत श्रृंखला को छोड़कर बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में अपनी यात्रा शुरू करती है। यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारत की ओर बहती है और फिर उत्तर प्रदेश-बिहार राज्य सीमा के साथ व गंगा के मैदान में दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती है। यह 765 किलोमीटर लम्बे घुमावदार रास्ते से गुज़रकर पटना के सामने गंगा नदी में मिल जाती है।
हरि हर क्षेत्र :-
हरिहर-क्षेत्र मेले के नाम से भी जाना जाने वाला यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन शुरू होता है और एक महीने तक चलता है। माना जाता है कि प्राचीन काल में अरब और फारस के व्यापारी घोड़े और ऊँट जैसे जानवरों और कालीन और इत्र जैसी वस्तुओं का व्यापार करने के लिए मेले में आते थे । वाल्मीकि नगर से गंडक नदी दक्षिण की ओर बहती है और कई कस्बों और बस्तियों को पार करते हुए हरिहर-क्षेत्र पहुँचती है। आज हरिहर-क्षेत्र का नाम हाजीपुर और सोनपुर के जुड़वां कस्बों के नाम पर रखा गया है। ये कस्बे ऐतिहासिक पटना शहर के पार और गंडक नदी और गंगा के संगम पर स्थित हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, इस क्षेत्र को कई तरह से लाभ हुआ है, जैसे संतों और विद्वानों की यात्रा, व्यापार और यात्रा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि। हाजीपुर को प्राचीन काल के ऋषियों का निवास स्थान माना जाता है । राम और लक्ष्मण मिथिला जाते समय इस मार्ग से गुजरे थे, और भगवान बुद्ध भी वैशाली (वर्तमान में बसाढ़ गाँव) में रहने के दौरान यहाँ आते थे। हाजीपुर शहर की स्थापना 1345 ईस्वी से 1358 ईस्वी के बीच गंडक नदी के पूर्वी तट पर बंगाल के राजा हाजी इलियास या शमशुद्दीन इलियास द्वारा की गई थी। उन्होंने गंडक नदी के किनारे एक भव्य किला बनवाया था, जिसकी प्राचीरें कुछ साल पहले तक दिखाई देती थीं। हालांकि, किले की मस्जिद, या पत्थर मस्जिद, आज भी शान से खड़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में नदी के किनारे कई घाट और मंदिर बनाए गए थे, लेकिन उनमें से अधिकांश 1934 के भीषण भूकंप में नष्ट हो गए। उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं, जैसे नेपाली मंदिर, हाजुरी मठ और सिद्धि घाट आदि।
सोनपुर :-
हाजीपुर की तरह, सोनपुर शहर में भी नदी के किनारे मंदिर स्थित हैं और इनका निर्माण उसी कालखंड में हुआ था। ब्रिटिश भारत में, इन दोनों शहरों में कईसामाजिक और उपयोगी बुनियादी ढाँचे विकसित किए गए थे। गंडक नदी पर दोनों शहरों को जोड़ने वाले पुल बनाए गए थे, जिनमें एक रेलवे पुल भी शामिल था। हाजीपुर में, नदी के किनारे एक स्कूल, कई बंगले, एक घुड़दौड़ का मैदान और एक नृत्य क्लब का निर्माण किया गया था, लेकिन नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण, 1837 में स्कूल को छोड़कर बाकी सब कुछ नष्ट हो गया । अपनी गलती से सबक लेते हुए, ब्रिटिश अधिकारियों ने बंगलों, नृत्य क्लब और अन्य बुनियादी ढाँचे का अगला निर्माण सोनपुर में नदी से दूर करवाया।
धीरे-धीरे मेला भी सोनपुर में स्थानांतरित हो गया। यह एशिया के सबसे बड़े पशु व्यापार मेलों में से एक था और आज भी है।
पर्व त्योहार :-
इस क्षेत्र के प्रमुख त्योहारों में से छठ पूजा, गंडक नदी के किनारे मनाया जाता है, क्योंकि इस नदी का जल गंगा के जल के समान ही पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिंदू माह चैत् नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) और कार्तिक नवरात्रि (अक्टूबर-नवंबर) में वर्ष में दो बार मनाया जाता है।
छठ पूजा :-
सूर्य देव की पूजा करने और परिवार की समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है। यह उत्सव चार दिनों तक चलता है और पूजा के प्रति उत्साह सूर्य देव की प्रार्थना, उपवास और पवित्र जल में स्नान करने से प्रकट होता है। ऐसा माना जाता है कि पवित्र जल में स्नान करने से शरीर से विषाक्त पदार्थों का निष्कासन होता है, जिससे व्यक्ति शीत ऋतु के आगमन के लिए तैयार हो जाता है। यह भी माना जाता है कि स्नान के बाद सूर्य के संपर्क में आने से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है जिससे समग्र कार्य प्रणाली में सुधार होता है। इसलिए, जल इस अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण तत्व है।
अन्य पर्व :-
कई अन्य त्यौहार इस प्रकार हैं -
कार्तिक पूर्णिमा स्नान , जन्माष्टमी , संक्रांति , महाशिवरात्रि आदि। इन सभी त्यौहारों के लिए स्नान की रस्में उत्तरी बिहार क्षेत्र में गंडक नदी से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
माघ संक्रांति मेला :-
फरवरी में आयोजित होता है और यह गंडक नदी के बाएं और दाएं किनारों पर स्थित है। इसका अर्थ यह है कि मेले का आधा हिस्सा नेपाल प्रांत में और आधा भारत में है। प्राचीन काल में, इस मेले का उपयोग दोनों देशों के बीच व्यापार के लिए भी किया जाता था, लेकिन अब इसे मेले की परंपरा को जारी रखने और मनोरंजन के मंच के रूप में आयोजित किया जाता है।
सीमित रास्ते से प्रवेश :-
नदी के किनारे बसे अधिकांश ऐतिहासिक शहरों के विपरीत, गंडक नदी और उसके किनारों पर बसे शहरों का संबंध अलग तरह का है। नदी के किनारे लगातार बने घाटों और पूजा स्थलों के विपरीत, गंडक के किनारे बसे शहरों में नदी तक पहुँचने के सीमित रास्ते घाटों के रूप में थे, जबकि नदी का अधिकांश किनारा प्राकृतिक वनस्पतियों से आच्छादित था।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
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पर्वतराज हिमालय और भारत ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
हिमालय एशिया में स्थित एक सर्वाधिक प्राचीन पर्वत-शृंखला है। इसको 'पर्वतराज' हिमालय भी कहते हैं, जिसका अर्थ है - पर्वतों का राजा । कालिदास तो हिमालय को पृथ्वी का मानदंड मानते हैं। हिमालय की पर्वत श्रंखलाएँ शिवालिक कहलाती हैं। सदियों से हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में ऋषि-मुनियों का वास रहा है और वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते रहे हैं । हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र रहा है। हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है।
चार श्रेणियों में हिमालय की भू-आकृतियों का विभाजन
हिमालय पर्वत तन्त्र को तीन मुख्य श्रेणियों के रूप में विभाजित किया जाता है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मोड़ से लेकर अरुणाचल के ब्रह्मपुत्र के मोड़ तक एक-दूसरे के समानान्तर पायी जाती हैं। चौथी गौड़ श्रेणी असतत है और पूरी लम्बाई तक नहीं पायी जाती है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से चार समानांतर श्रेणियां ये चार श्रेणियाँ हैं-
(क) परा-ट्रांस- हिमालय
परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय या टेथीज हिमालय भी कहते हैं, यह हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है। यह कराकोरम श्रेणी, लद्दाख श्रेणी और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है। इसका निर्माण टेथीज सागर के अवसादों से हुआ है। इसकी औसत चौड़ाई लगभग 40 किमी है। यह श्रेणी इण्डस-सांपू-शटर-ज़ोन नामक भ्रंश द्वारा तिब्बत के पठार से अलग है।
(ख) महान हिमालय
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। इसके क्रोड में आग्नेय शैलें पायी जाती है जो ग्रेनाइट तथा गैब्रो नामक चट्टानों के रूप में हैं। पार्श्वों और शिखरों परअवसादी शैलों का विस्तार है। कश्मीर की जांस्कर श्रेणी भी इसी का हिस्सा मानी जाती है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। यह श्रेणी मुख्य केन्द्रीय क्षेप द्वारा मध्य हिमालय से अलग है। यद्यपि पूर्वी नेपाल में हिमालय की तीनों श्रेणियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं।
(ग) मध्य लघु या मध्य हिमालय
हिमालय पर्वत का वह भाग जो महान हिमालय के दक्षिण सामानान्तर तक फैला हुआ है, लघु हिमालय कहलाता है। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर है। यह अंचल मध्य हिमालय या हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में यह मध्य हिमालय ही है। लघु हिमालय 80 से 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 1628 मीटर से लेकर 3000 मीटर है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4500 मीटर है।
मध्य हिमालय हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है - पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार, उत्तराखंड में मस्सोरी या नागटिब्बा तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(घ) शिवालिक परा या ट्रांस हिमालय
उपरिवर्णित तीन मुख्य श्रेणियों केआलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। यह शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। शिवालिक श्रेणी को बाह्य हिमालय या उप हिमालय भी कहते हैं। यहाँ सबसे नयी और कम ऊँची चोटी है। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच दून घाटियाँ पायी जाती हैं।
हिमालय पर्वत 7 देशों की सीमाओं में फैला हुआ हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार।
प्रादेशिक विभाजन
अनेक भू–वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय को पांच क्षैतिज प्रदेशों में बाँटा है।
कश्मीर हिमालय - सिन्धु नदी से सतलुज नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
कुमाऊँ हिमालय - सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच के भाग को कहा जाता है।
नेपाल हिमालय - सरयू नदी से कोसी नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
बंगाल हिमालय - कोसी नदी से मानस नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
असम हिमालय - मानस नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक के भाग को कहा जाता है।
100 सर्वोच्च शिखर
संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय में 100 से ज्यादा पर्वत शिखर हैं
दुनिया में कम से कम 109 चोटियां ऐसी है जिनकी ऊंचाई समुद्र तल से ऊंचाई 7200 मीटर से ज्यादा है। इनमें से अधिकांश चोटियां हिमालय क्षेत्र में हैं। इनमें दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, शिवशंकर, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। कुछ प्रमुख शिखरों की ऊंचाई इस प्रकार है -
माउंट एवरेस्ट : 8848.86 मीटर
के - 2 : 8611 मीटर
कंचनजंघा : 8,586
लहोस्ते : 8,516
मकालू : 8,463
15 हजार हिमनद
हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबासियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है। हिमालय की कुछ प्रमुख नदियों में शामिल हैं - सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज।
सांस्कृतिक हिमालय
हिमालय भारतभूमि का अभिभावक है। वैदिक काल से ही हिमालय के पर्वतों की महिमा का उल्लेख होता आया है। यह भारत की पवित्र नदियों गंगा तथा यमुना का उद्गम स्थल भी है। मानसरोवर और कैलास में भारत के प्राण बसते हैं। दोनों भारत के अनादि इतिहास से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। मानसरोवर'मानस-सरोवर' का संक्षेपण है जो तिब्बत में स्थित एक झील है, और इसकी कुछ दूरी पर स्थित है – कैलास पर्वत। इसे कुबेर का वैभवपूर्ण निवास और शिव का स्वर्ग माना जाता है। कैलास हिमालय पर्वतमाला में स्थित है और मानसरोवर झील के उत्तर में सबसे ऊँची चोटियों में से एक माना जाता है। कैलास जैसे पावन पुष्करिणी समावृत अनन्त सौंदर्यप्रिय पर्वत का गुणगान संस्कृत साहित्य में प्रचुर हुआ है। यह शुभ्र पर्वत शिव और पार्वती का क्रीडा-स्थल है। इसे संस्कृत साहित्य में भगवान शिव का मुक्त अट्टहास कहा गया है।
अमरकोष में कैलास की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है –” के जले लासो लसनमस्य केलासः स्फटिकः तस्यायं कैलासः” = जो जल के मध्य स्फटिक के समान विद्यमान हो, वह कैलास है।
रत्नों का जन्मदाता
'हिमालय अनेक रत्नों का जन्मदाता है “अनन्तरत्न प्रभवस्य यस्य”, उसकी पर्वत-शृंखलाओं में जीवन औषधियाँ उत्पन्न होती हैं। “ भवन्ति यत्रौषधयो रजन्याय तैल पुरत सुरत प्रदीपः”, वह पृथ्वी में रहकर भी स्वर्ग है। “भूमिर्दिवभि वारूढं।”
धार्मिक स्थल
हिमालय में कुछ महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी हैं। इनमें हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश, कैलाश, मानसरोवर तथा अमरनाथ,शाकम्भरी प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथ गीता में भी इसका उल्लेख मिलता है।
राष्ट्रकवि श्री दिनकर की अभिव्यंजना
भारत के राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह "दिनकर” ने हिमालय की महत्ता इन शब्दों में व्यक्त किया है -
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,
युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,
निस्सीम व्योम में तान रहा
युग से किस महिमा का वितान?
कैसी अखंड यह चिर-समाधि?
यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?
तू महाशून्य में खोज रहा
किस जटिल समस्या का निदान?
उलझन का कैसा विषम जाल?
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
ओ, मौन, तपस्या-लीन यती!
पल भर को तो कर दृगुन्मेष!
रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल
है तड़प रहा पद पर स्वदेश।
सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,
गंगा, यमुना की अमिय-धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार,
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति! तू ने की पुकार,
'पद-दलित इसे करना पीछे
पहले ले मेरा सिर उतार।'
उस पुण्यभूमि पर आज तपी!
रे, आन पड़ा संकट कराल,
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।
वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?
ओ री उदास गण्डकी! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ?
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग?
अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी
यह सुलग रही है कौन आग?
प्राची के प्रांगण-बीच देख,
जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,
तू सिंहनाद कर जाग तपी!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
'हर-हर-बम' का फिर महोच्चार।
ले अंगडाई हिल उठे धरा
कर निज विराट स्वर में निनाद
तू शैलीराट हुँकार भरे
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद
रे तपी आज तप का न काल
नवयुग-शंखध्वनि जगा रही
तू जाग, जाग, मेरे विशाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!!
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Thursday, May 28, 2026
भारत-नेपाल में सांस्कृतिक समानताएं, दोनों एक दूसरे के संपूरक हों✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
अखण्ड भारत का तात्पर्य भारतीय उपमहाद्वीप के अविभाजित, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वरूप से है, जिसकी सीमाएं प्राचीन काल में ईरान (हिंदुकुश पर्वतमाला) से लेकर म्यांमार (बर्मा) तक और तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक विस्तृत थीं। यह केवल एक राजनीतिक सीमा नहीं, बल्कि एक साझा सभ्यता का प्रतीक थी। इस स्वरूप में भारत और नेपाल दोनों सनातनी देश जाने पहचाने जाते थे।
वैदिक और मौर्य काल में जम्बू द्वीप :-
प्राचीन काल में इसे 'आर्यावर्त' और 'जंबूद्वीप' कहा जाता था। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और चक्रवर्ती सम्राट अशोक के शासनकाल में यह साम्राज्य अपने सबसे बड़े विस्तार पर था।अखंड भारत का निर्माण करने वाले पहले व्यक्ति चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य थे,उन्होंने अपने गुरु आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) की मदद से बिखरे हुए छोटे-छोटे राज्यों और गणराज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। यह वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप तक फैला हुआ था। आज अखण्ड भारत की संकल्पना को एक सांस्कृतिक और दार्शनिक विचार के रूप में याद किया जाता है, जो सदियों की साझा विरासत, धर्म और भूगोल को आपस में जोड़ता है। चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उनके पोते सम्राट अशोक ने इस साम्राज्य का और अधिक विस्तार किया और संपूर्ण अखंड भारत पर अपना चक्रवर्ती शासन स्थापित किया था। इस विशाल क्षेत्र में सदियों तक वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म, और हिंदू संस्कृति का प्रसार रहा, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया तक के देश सांस्कृतिक रूप से एकजुट हुए थे।
अखंड भारत से अलग होने वाले देश :-
सदियों के विदेशी आक्रमणों, विशेषकर मध्यकालीन और ब्रिटिश शासन के दौरान, इस भूभाग का विभाजन होता रहा।पिछले कुछ शताब्दियों में भारत से कई क्षेत्र अलग होते गए ,-:
अफगानिस्तान: 1747 में अहमद शाह अब्दाली द्वारा अलग किया गया।
नेपाल: 1816 में सुगौली की संधि के बाद अलग हुआ।
भूटान: 1910 में ब्रिटिश काल में अलग हुआ।
पाकिस्तान :1947 में स्वतंत्रता के समय 'माउंटबेटन योजना' के तहत गांधी और जिन्ना के जिद से भारत से अलग हुआ।
श्रीलंका और म्यांमार (बर्मा): क्रमशः 1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होकर अलग हुए
बांग्लादेश :1971 यह देश भारत की मुक्तिवाहिनी और पूर्वी पाकिस्तान के देश भक्तों के संयुक्त प्रयास से स्वतंत्र हुआ था।
नेपाल का संक्षिप्त परिचय :-
नेपाल की जनसंख्या लगभग 3.04 करोड़ (अनुमानित) है। पूरे देश का क्षेत्रफल लगभग 1,47,181 वर्ग किमी है। पूरब से पश्चिम तक इसकी कुल लम्बाई करीब 800 किलोमीटर और चौड़ाई 200 किलोमीटर है। नेपाल को 7 प्रदेशों (प्रान्तों) में बांटा गया है। जिसमें कुल 77 जिले और 165 संघीय संसदीय निर्वाचन क्षेत्र हैं।
भारत का संक्षिप्त परिचय :-
भारत की जनसंख्या नेपाल से लगभग 49 गुना (148 करोड़) से अधिक है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल नेपाल से 22- 23 गुना लगभग 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है। भारत में नेपाल जैसे 28 राज्य हैं । नेपाल जैसे 10 गुना से अधिक कुल 800 जिले हैं।
सर्वाधिक क्षेत्रफल भारतीय राजस्थान का संक्षिप्त परिचय :-
भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का क्षेत्रफल नेपाल के क्षेत्रफल से दो गुना से भी ज्यादा 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है जिसमें कुल 41 जिले हैं। यहां की जनसंख्या नेपाल से लगभग ढाई गुना से ज्यादा 8.39 करोड़ है।
सर्वाधिक जनसंख्या उत्तर प्रदेश का संक्षिप्त परिचय :-
उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नेपाल के जनसंख्या का सात गुना लगभग 20 करोड़ है। नेपाल के क्षेत्रफल से डेढ़ गुना से भी अधिक कुल क्षेत्रफल: 2,40,928 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कुल 75 जिले हैं।
भारत-नेपाल के बीच संबंध के प्रमुख आयाम :-
भारत और नेपाल के बीच की सांस्कृतिक एकरूपता सदियों पुरानी, गहरी और अटूट है। भारत और नेपाल के बीच पुरातन संबंध सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से "रोटी-बेटी के रिश्ते" (वैवाहिक और रोटी-रोजी) पर आधारित हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच के आत्मीय संबंधों को दर्शाता है। यह साझा विरासत धर्म, भाषा, त्योहार और खान-पान में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
साझा ऐतिहासिक और पौराणिक विरासत:-
सदियों से साझा हिंदू-बौद्ध परंपराएं, खुली सीमाएं रामायण काल से चला आ रहा सीता-राम का संबंध दोनों देशों को अटूट रूप से जोड़ता है। लुम्बिनी (बुद्ध का जन्मस्थान) और पशुपतिनाथ (नेपाल) तीर्थयात्रा इस सांस्कृतिक कड़ी के प्रमुख स्तंभ हैं। भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म में समान विश्वास रखते हैं। नेपाल के जनकपुर (माता सीता का जन्मस्थल) और भारत के अयोध्या के बीच पौराणिक संबंध हैं। वहीं, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोधगया में हुआ था। उनके जीवन से जुड़े प्रमुख स्थान भारत में स्थित हैं। भारत के दो महाकाव्य रामायण और महाभारत रामायण के मुख्य पात्र मौ जानकी"- जगत जननी की जन्मभूमि जनकपुर नेपाल में ही स्थित है। भारत देश के राजा दशरथ के पुत्र राम से उनका बलिदान की समय नेपाल (मत्सयदेश) में बिताये तत्पश्चात् अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वैवाहिक संबंध मत्सय राजकुमारी से हुआ।
निकटतम पडोसी :-
नेपाल की सीमा भारत के 5 राज्यों - उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और बिहार से लगती है। इसलिए यह सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। नेपाल हमारा निकटतम पडोसी देश है. दूसरी और कोई भी देश हमारे इतना निकट नहीं है जितना नेपाल, क्योंकि यह निकटतम महज भौगौलिक अवस्था की ही नहीं है युगों-युगों से चले आते एतिहासिक नाते की भी है। हमारे भारत वर्ष के सीमा से सटे लेकिन हमारी भावनाओं की अन्तर भार की ऐसी समानता है, इतनी निकटता जहाँ भाषा और धर्म एक ही हो जहाँ देवी-देवता भी एक हो।
भाषा और लिपि में एकरूपता :,-
भारत और नेपाल दोनों ही देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश से सटे नेपाल के तराई क्षेत्रों में 'मैथिली' और 'भोजपुरी' भाषाएं बोली जाती हैं, जो दोनों ओर की संस्कृतियों को आपस में जोड़ती हैं。
देवमयी भूमि :-
नेपाल का मात्र स्वतंत्र हिन्दू राजा रहा है, यहाँ जितने लोग उत्तनी ही देवमुर्ति स्थापित है। नेपाल की सारी भूमि देवमयी है। यहां शक्तिपूजा की प्रधानता रही है। तो भारत भी देश को ही भारत माता कहा गया है। उसने तो पूरे विश्व को “बसुधौव कुटुंबकम्” से सम्मानित कर रखा है।
हिमालय पर्वत दोनों का प्रहरी :-
अनन्त या अनादि काल से हिमालय हमारी और नेपाल की संस्कृति का अक्षय प्रेरणा, अनन्त, उत्स और अखण्ड प्रहरी रहा है। एक ही साथ वह सदा हमारा पोषक और रक्षक भी रहा है। नेपाल भारत की 'हिमालयी सीमाओं' के ठीक बीच में स्थित है और भूटान के साथ मिलकर यह उत्तरी 'सीमावर्ती' क्षेत्र के रूप में कार्य करता है और चीन से किसी भी संभावित आक्रमण के खिलाफ बफर राज्य के रूप में कार्य करता है।
नदियों द्वारा जुड़ाव :-
नेपाल से निकलने वाली नदियाँ पारिस्थितिकी और जलविद्युत क्षमता के लिहाज से भारत की बारहमासी नदी प्रणालियों को पोषित करती हैं । नेपाल की नदियाँ जो भारत के भू-भाग पर ही बहती है, प्रत्येक वर्ष बाढ़ लाती है। बाढ़ के साथ-साथ हमारे भूमि को उपजाऊ भी बनाती है।मिथिलावासी जिने जीविकोपार्जन का साधन कृषि है इनके लिए नेपाल की नदी वरदान साबित हो रही है।
कनेक्टिविटी:-
नेपाल एक भू-बद्ध देश होने के कारण तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और एक तरफ तिब्बत की ओर खुला है जहां वाहनों की आवाजाही बहुत सीमित है। भारत-नेपाल ने लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कनेक्टिविटी कार्यक्रम शुरू किए हैं ।दोनों सरकारों के बीच काठमांडू को भारत के रक्सौल से जोड़ने वाली इलेक्ट्रिक रेल पटरी बिछाने के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं ।भारत व्यापार और पारगमन व्यवस्थाओं के ढांचे के भीतर माल ढुलाई के लिए अंतर्देशीय जलमार्गों को विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जिससे नेपाल को समुद्र तक अतिरिक्त पहुंच मिल सकेगी और इसे सागरमाथा (माउंट एवरेस्ट) को सागर (हिंद महासागर) से जोड़ने का नाम दिया जा रहा है।
व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध :-
प्राचीनकाल में भारत अपने पड़ोसी राज्यों से सम्पर्क निरंतर। बनायें रहता था उन दिनों भारत का मुख्यतः व्यापारिक सम्बन्ध रहा किन्तु धीरे-धीरे से संबध सभ्यता एवं संस्कृति के स्तर पर भी स्थापित हुए। प्राचीनकाल में नेपाल से सम्बन्ध का कारण यह भी था कि चीन देश के साथ संबंध स्थापित करने के साथ ही साथ इससे जुड़े अन्य देशों से भी।
धार्मिक और आध्यात्मिक समानता:-
भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्रों को साझा करते हैं। जहाँ एक ओर नेपाल में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर को भारतीय श्रद्धालु बहुत पवित्र मानते हैं, वहीं भारत में स्थित बनारस, अयोध्या और बोधगया नेपाली लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं।छठी शताब्दी ई० पू० गौतम बुद्ध का जन्मस्थान नेपाल में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में हुआ था। परन्तु इन्हें ज्ञान की प्राप्ति भारत के एक प्रांत बिहार में गया जिले में हुआ। बुद्ध के बोधिसत्य सब प्राप्ति के पश्चात ही जिला का नाम बोध गया पड़ा। आज भी यह बोध गया विश्वप्रसिद्ध है। इन्होंने पूरे विश्व को शांति प्रेम और अहिंसा का संदेश दिए। नेपाल में जन्म लेने वाले सिद्धार्थ भारत में महान अवतारी पुरूष बन गए। इनके अनुयायी वनके भक्त विश्व के कई देशों से आज भी भारत में बोधगयाा भ्रमण के लिए आते हैं।
त्योहार और खान-पान: -
दोनों देशों में मनाए जाने वाले त्योहार लगभग एक समान हैं। दीपावली, होली, दशहरा और छठ पूजा दोनों देशों में पूरी आस्था के साथ मनाए जाते है। इसके साथ ही दाल-भात, रोटी और मोमोज जैसे व्यंजन दोनों जगह बेहद लोकप्रिय हैं।
ऋषि मुनियों की साधना स्थली :-
अपने वैचारिका तपस्या से भारतीय ज्ञान मंदाकिनी को सतत वेग और विस्तार देने वाले अनेक ऋषि मुनियों की जीवन-साधना का क्षेत्र यहीं प्रदेश रहा है। हिमाच्छादित हरे भरे पेड़, सदवावहिनी नदियों इन प्राकृति सौन्दर्यमय वातावरण में ही मनुष्य अपनी संस्कृति का विकास कर रही है। संस्कृति ऐसा पर्यावरण है जिसके अन्दर रहकर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढलता है और प्राकृतिक दशाओं के अनुकूल चलते हुए ही प्रगति की ओर अन्मुख होता रहता है। यह संस्कृति ही है जो विश्व स्तर पर मानव को मानव से समाज को समाज से पृथक करती और जोड़ती भी है। यह संस्कृति ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है।
रोटी-बेटी का संबंध:
दोनों देशों के बीच लगभग 1,850 किमी लंबी खुली सीमा है। इस सीमा के आर- पार नेपाली और भारतीय नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं, जो इन संबंधों की अद्वितीयता को दर्शाता है। दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ रिश्ते और नातेदारी है, जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है।
दोनों देश के लोग विवाह और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से भी उनके बीच घनिष्ठ संबंध हैं। भारत के बिहार-यूपी और नेपाल के बीच में सदियों से वैवाहिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं।
विकास सहायता:-
भारत सरकार नेपाल को समय समय पर विकास सहायता प्रदान करती है, जिसका मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है। सहायता के क्षेत्रों में अवसंरचना, स्वास्थ्य, जल संसाधन, शिक्षा और ग्रामीण एवं सामुदायिक विकास शामिल हैं।
रक्षा सहयोग:-
द्विपक्षीय रक्षा सहयोग में उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान करके नेपाली सेना के आधुनिकीकरण में सहायता करना शामिल है । भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंटों में नेपाल के पहाड़ी जिलों से भी सैनिकों की भर्ती की जाती है। भारत 2011 से हर साल नेपाल के साथ सूर्य किरण के नाम से जाना जाने वाला एक संयुक्त सैन्य अभ्यास करता आ रहा है।
सनातन संस्कार से जुड़ा :-
संस्कृति वह संस्कार माना जाता है जिसका तात्पर्य धार्मिक किया-कलापों से एक हिन्दू तबसे इन संस्कारों से गुजरना होता है। नेपाल पूर्व में हिन्दूराज्य रहा पर अब भारत जैसा धर्मनिरपेक्ष राज्य है। इनमें अनेक समानताएँ है। इसी के आधार पर व्यक्ति का समाजीकरण होता है। व्यक्ति का निर्माण होता है । यानी एक प्रकिया मानी जाती है। संस्कृति हमारे जीवन शैली का पर्याय है। जो इतिहास के तरह अपने घटना के विचारों को समय-समय पर बतलाती है। इसके अन्तर्गत हमारे दृष्टिकोण, विचार हमारी संस्थाएँ राजनैतिक, वैज्ञानिक, धर्मिक, नैतिक विधान हमारे पुस्तक से हमारे जीवन दार्शनिक ये समस्त वस्तुओं है। हमारे अन्य भी वस्तुए इन सभी को हम अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ पाते है। संस्कृति एक प्राकृतिक मनोभाव है। जब एक देश सम्पर्क में आते तभी वे अपने आचार-व्यवहार से दूसरों से सिखते है और सिखाते भी है।
नेपाल का गोरखपुर पर अधिकार रहा :
संस्कृति सदैव बदलती रहती है। 18वीं सदी में नेपाल एक शक्तिशाली देश था। वह अपने राज्य विस्तार के प्रयत्नशील था। उत्तर में चीन और विस्तार सम्भव नहीं था इसलिए दक्षिण में विस्तार की नीति अपनाई। 1801 में नेपाल ने गोरखपुर पर अधिकार कर लिया जिसे ब्रिटिश भारत और नेपाल की सीमाये मिल गई। हिमालय के तराई वाले भाग, नेपाल और ब्रिटिश भारत की सीमाएँ निर्धारित नहीं हो पाई थी। अतः सीमा निर्धारण दोनों देश के अवश्यम्भावी हो गया। परन्तु इसके पूर्व भारतीय शासकों को इस देश से सौहार्दपूर्ण संबंध थे। अंग्रेज 1816 में सुगौली संधि के उपरांत नेपाल पर अधिकार कर लिया इससे अंग्रेजो को बहुत लाभ हुआ नेपाल अंग्रेज का मित्र राज्य बन गया। इसके बाद से अंग्रेजों का भारी मात्रा में गोरखा सैनिक प्राप्त होते रहे। इस संधि के बाद शिमला, मसूरी और नैनीताल जैसे ठण्डे स्थान भी अंग्रजों को प्राप्त होते है। इससे अंग्रेज मध्य एशिया के लिए सुगम मार्ग मिल गया।
1950 में हुई थी शांति और मैत्री संधि :- यह संधि दोनों देशों में भारतीय और नेपाली नागरिकों के साथ निवास, संपत्ति, व्यवसाय और आवागमन के संबंध में पारस्परिक व्यवहार की बात करती है। यह भारतीय और नेपाली दोनों व्यवसायों के लिए राष्ट्रीय व्यवहार भी स्थापित करता है (अर्थात, आयात होने के बाद, विदेशी वस्तुओं के साथ घरेलू वस्तुओं से अलग व्यवहार नहीं किया जाएगा)। इससे नेपाल को भारत से हथियार प्राप्त करने का भी अधिकार मिल जाता है।
मानवीय सहायता:-
नेपाल एक संवेदनशील पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र में स्थित है जो भूकंप और बाढ़ के प्रति संवेदनशील है , जिससे जान और माल दोनों का भारी नुकसान होता है, जिसके कारण यह भारत की मानवीय सहायता का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बना हुआ है। कोरोना के समय में उसने भारत से भरपूर सहायता पाई थी। चीन से सभी देश मुंह मोड़ चुके थे।
बहुपक्षीय साझेदारी:-
भारत और नेपाल कई बहुपक्षीय मंचों जैसे बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल), बिम्सटेक (बंगाल की खाड़ी बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल), गुटनिरपेक्ष आंदोलन और सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) आदि में भाग लेते हैं।
कम्युनिस्ट माओवादियों का बढ़ता वर्चस्व :-
नये विचार और नये व्यवहार नये खोजों संस्कृति में परिर्वतन होता रहता है। जिसमें कुछ स्वतंत्र तत्व रहते है कुछ विरोधी भी रह जाते हैं जैसे नेपाल में माओवाद का उदय होना कहने के लिए इसकी जड़-मूल नेपाल में है पर भारत इससे अछूता नहीं रहा है क्योकि राजतंत्र से लोकतंत्र का शासन हो यह राजा नहीं चाहते थे। फलस्वरूप 2006 एक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिसमें राजा के हाथ से सत्ता जनता द्वारा चुने गए हाथ सौंपना पड़ा।
नेपाल राजवंश से गोरखनाथ मंदिर का रहा पुराना संबंध :-
गोरखपुर के गोरक्षपीठ के गोरखनाथ मंदिर और नेपाल का संबंध सदियों से हैं। नेपाल राजवंश का उद्भव भगवान गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। जिसके बाद शाह परिवार पर भगवान गोरखनाथ का हमेशा आशीर्वाद रहा है। इसी कारण नेपाल राजवंश ने गुरु गोरखनाथ की चरण पादुका को अपने मुकुट पर बना रखा था, इतना ही नहीं नेपाल के सिक्कों पर गुरु गोरखनाथ का नाम लिखा है। गुरु गोरक्षनाथ के गुरु मक्षयेन्द्रनाथ के नाम पर आज भी नेपाल में उत्सव मनाया जाता है। राजपरिवार अब भी गुरु गोरखनाथ को अपना राजगुरु मानता है।
मकर संक्राति के दिन भगवान गोरखनाथ को पहली खिचड़ी गोरक्ष पीठाधीश्वर चढ़ाते हैं तो दूसरी खिचड़ी आज भी नेपाल नरेश की तरफ से चढ़ाई जाती है। कई बार नेपाल नरेश खुद खिचड़ी चढ़ाने यहां आए, नहीं तो उनका कोई न कोई प्रतिनिधि यहां पर खिचड़ी चढ़ाने आता है। उसको यहां से नेपाल की सुख शांति के लिए महारोट का प्रसाद दिया जाता है।
नेपाल में बड़ी संख्या में लोग गोरखनाथ भगवान की पूजा करते हैं। उनकी गोरखनाथ में विशेष आस्था है। नेपाल में कई जगह भगवान गोरखनाथ के मंदिर हैं। इतना ही नहीं पशुपतिनाथ मंदिर में भी गोरखनाथ भगवान का मंदिर है, वहां मुक्तिनाथ धाम नाथ संप्रदाय का ही है। नेपाल में बड़ी संख्या में लोग नाथपंथ से जुड़े हुए हैं।
भारत नेपाल दोनों एक दूसरे के पूरक और सहयोगी बनें :-
भारत और नेपाल सदियों से 'रोटी-बेटी के रिश्ते' और साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हुए हैं। एक-दूसरे के पूरक बनकर दोनों देश अपनी खुली सीमाओं का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं, जिससे व्यापार, पर्यटन, और ऊर्जा सुरक्षा में क्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हो सके।दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए सहयोग, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।दोनों देशों की भलाई इसी में है कि वे एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए आर्थिक विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक साझेदारी को बढ़ावा दें।
दोनों देश के बीच प्रमुख साझेदारी
1. आर्थिक एवं व्यापारिक साझेदारी
नेपाल का लगभग दो-तिहाई व्यापार भारत के माध्यम से होता है। दोनों देशों को अपनी पारगमन संधियों को और आधुनिक बनाना चाहिए। भारत, नेपाल को अपनी बंदरगाह सुविधाओं तक निर्बाध पहुँच देकर उसके निर्यात को बढ़ावा दे सकता है, जबकि नेपाल भारतीय उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण और सुलभ बाजार बन सकता है।
2. ऊर्जा और जल संसाधन (पनबिजली) के क्षेत्र में बढ़ावा :-
नेपाल में अपार जलविद्युत क्षमता है। दोनों देशों को मिलकर 'पनबिजली परि -योजनाओं' को विकसित करना चाहिए। नेपाल भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली का निर्यात कर सकता है। भारत तकनीकी और वित्तीय निवेश प्रदान कर सकता है।
3. धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा :-
पर्यटन के क्षेत्र में दोनों देश एक-दूसरे के सबसे बड़े पूरक हैं। रामायण सर्किट और बुद्ध सर्किट में नेपाल के जनकपुर को भारत की अयोध्या से और लुंबिनी को भारत के बोधगया/सारनाथ से जोड़कर एक मजबूत धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है, जिससे दोनों देशों को भारी राजस्व और रोजगार मिलेगा। पशुपतिनाथ और भारत के विभिन्न धामों के बीच सदियों से तीर्थ यात्रियों का आदान-प्रदान होता रहा है, जिसे और आसान बनाया जा सकता है।
4. सीमा पार कनेक्टिविटीरेल और सड़क मार्गों का विस्तार :-
दोनों देशों को आर्थिक रूप से और करीब ला रहा है। जयनगर-कुर्था और रक्सौल-काठमांडू जैसे रेलवे प्रोजेक्ट्स से व्यापार और आवागमन आसान हुआ है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। भारत और नेपाल की यह पूरकता न केवल दोनों देशों की अर्थ - व्यवस्थाओं को मजबूत करेगी, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखेगी।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Tuesday, May 26, 2026
नेपाल की प्रमुख नदी प्रणालियां ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
नेपाल को 'नदियों का देश' कहा जाता है क्योंकि यहाँ लगभग 6,000 से अधिक नदियाँ और जलधाराएं हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ हिमालय से निकलकर भारत की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हैं।
1. कोशी नदी प्रणाली (सप्तकोशी)
इसे नेपाल की सबसे बड़ी नदी माना जाता है। भारत और चीन के साथ साझा की जाने वाली कोसी नदी कुल 450 मील तक बहती है। नेपाल के दक्षिणी ढलानों पर घुमावदार रास्तों से बहने वाली कोसी नदी को इसकी सात मुख्य सहायक नदियों के कारण सप्तकोशी भी कहा जाता है। इनमें से प्रत्येक सहायक नदी में एक उत्कृष्ट नदी प्रणाली है जो विभिन्न साहसिकगतिविधियों और मनमोहक दृश्यों से भरपूर है। दिलचस्प बात यह है कि भारत में प्रवेश करने के बाद कोसी नदी को बाढ़ की उच्च प्रवृत्ति के कारण 'बिहार का दुख' भी कहा जाता है। बाढ़ की आशंका के बावजूद, नेपाल के ऊंचे इलाकों में, हिमालय की निर्मल सुंदरता के बीच बहने वाली कोसी नदी रोमांच के लिए एक आकर्षक केंद्र है।
यह सात प्रमुख नदियों (सुन कोशी, इंद्रावती, दूध कोशी, भोटे कोशी, तमूर, बरुण और अरुण) के मिलने से बनती है, इसलिए इसे सप्तकोशी भी कहते हैं। यह नदी बिहार (भारत) का शोक भी कहलाती है। लंबाई: लगभग 720 किलोमीटर (नेपाल में)
2.गंडकी नदी प्रणाली (नारायणी)
यह मध्य नेपाल से होकर बहने वाली एक प्रमुख नदी है। गंडकी नदी को नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है, और इसका नदी तंत्र पश्चिम में करनाली बेसिन और पूर्व में कोसी नदी तंत्र के बीच स्थित है। इस नदी को सप्त-गंडकी भी कहा जाता है क्योंकि इसकी सात मुख्य सहायक नदियाँ मिलकर गंडकी बेसिन बनाती हैं। गंडकी की शाखाएँ नेपाल की प्रसिद्ध नदियाँ हैं जो आपस में मिलकर महत्वपूर्ण जलविद्युत उत्पादन के साथ- साथ कई मनमोहक प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करती हैं। इसकी एक सहायक नदी, कालीगंडकी, काली गंडकी घाटी या अंधा गलची नामक एक गहरी घाटी का निर्माण करती है। चितवन में, कालीगंडकी नदी गंडकी की एक अन्य महत्वपूर्ण सहायक नदी, त्रिशुली से मिलती है।
यह घाटी दुनिया की सबसे गहरी घाटियों में से एक है, जो 300 मीटर की ऊंचाई से गिरते हुए शानदार रूप से जलप्रपात का निर्माण करती है। काली गंडकी पर महाभारत पर्वतमाला के उत्तर में नेपाल की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना स्थित है। हिमालय से निकलने वाली इसकी मुख्य सहायक नदियाँ काली गंडकी, बूढ़ी गंडकी, त्रिशूली और मर्स्यांगडी हैं। इसकी लंबाई लगभग 450 किलोमीटर है।
3. करनाली नदी प्रणाली (घाघरा)करनाली नेपाल की सबसे लंबी और पवित्र नदियों में से एक है। तिब्बत में कैलाश पर्वत के पास से निकलने वाली यह नदी आगे चलकर भारत में घाघरा नदी में मिल जाती है। करनाली नेपाल की सबसे लंबी और प्रमुख नदियों में से एक है, जिसका उद्गम मानसरोवर झील के पास तिब्बती पठार से होता है। इसे अक्सर ' वाइल्ड वेस्ट' कहा जाता है। 513 मील लंबी यह नदी पश्चिमी नेपाल के अधिकांश भाग से होकर बहती है। करनाली बेसिन में नेपाल के कुछ सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यान स्थित हैं। शेय फोक्सुंडो राष्ट्रीय उद्यान, रारा राष्ट्रीय उद्यान और बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान नदी के किनारे स्थित मुख्य संरक्षित क्षेत्र हैं।इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हुमला करनाली, मुगु करनाली, सेती और भेरी हैं। इसकी लंबाई लगभग 550 किलोमीटर है।
4. महाकाली नदी (शारदा)
यह नदी नेपाल और भारत (उत्तराखंड) की अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण करती है। नेपाल की हिमालयी सीमा के साथ बहने वाली खूबसूरत शारदा नदी को संस्कृत में महाकाली नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी दो बेहद खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों, शुक्लाफांटा राष्ट्रीय उद्यान और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरती है। नदी में वाटर राफ्टिंग एक लोकप्रिय गतिविधि है। इसे शारदा नदी के नाम से भी जाना जाता है।
अन्य महत्वपूर्ण नदियाँ
5.बागमती नदी:
नेपाल की बागमती नदी काठमांडू को पाटन से अलग करती है और इसे पवित्र नदी भी माना जाता है। इसके किनारों पर कई हिंदू मंदिर स्थित हैं। यह नेपाल की सबसे पवित्र और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नदियों में से एक है, जिसके तट पर काठमांडू में प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर स्थित है।
6.कंकाई नदी:
कंकाई नदी, जिसे माई खोला भी कहा जाता है, को पवित्र नदी माना जाता है और इसके मार्ग में डोमुखा, चूली, धनुष्कोटी और माईपोखरी जैसी कई पर्यटन स्थल हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र में हाल ही में कंकाई सिंचाई परियोजना भी विकसित की गई है। यह पूर्वी नेपाल की एक पवित्र नदी है।
7.राप्ती नदी
पश्चिम राप्ती नदी नेपाल के मध्य-पश्चिमी क्षेत्रों से बहती हुई भारत में प्रवेश करती है और घाघरा नदी में मिल जाती है। पूर्वी राप्ती नदी चितवन घाटी में बहती है और चितवन राष्ट्रीय उद्यान की उत्तरी सीमा बनाती है।
8.तामुर नदी
नेपाल की खूबसूरत तामुर नदी कंचनजंगा पर्वतमाला के आसपास से निकलती है और नेपाल के पूर्वी हिस्से में स्थित है। यह नदी रिवर राफ्टिंग जैसे जल क्रीड़ाओं के लिए प्रसिद्ध है।
9.मार्श्यांगडी
नेपाल की यह नदी अन्नपूर्णा पर्वतमाला से निकलती है और अन्नपूर्णा सर्किट ट्रेक करने वालों के लिए एक लोकप्रिय प्राकृतिक आकर्षण है।
द्वितीय और तृतीय श्रेणी की नदियाँ
नेपाल की अन्य द्वितीय श्रेणी की नदियों में मेची, तिनाऊ, बाबई, मोहना, त्रिजुगा आदि शामिल हैं । अंत में, नेपाल की 4तृतीय श्रेणी की नदियाँ चुरे पहाड़ियों से निकलती हैं और इनमें मनुस्मारा, जमुनी, हरदीनाथ, तिलाबे आदि शामिल हैं। ये नदियाँ गर्मियों में सूख जाती हैं और मानसून में भर जाती हैं। इनका उपयोग परिवहन या जलविद्युत के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि केवल सिंचाई के लिए किया जाता है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
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