Thursday, May 28, 2026

भारत-नेपाल में सांस्कृतिक समानताएं, दोनों एक दूसरे के संपूरक हों✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी


अखण्ड भारत का तात्पर्य भारतीय उपमहाद्वीप के अविभाजित, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वरूप से है, जिसकी सीमाएं प्राचीन काल में ईरान (हिंदुकुश पर्वतमाला) से लेकर म्यांमार (बर्मा) तक और तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक विस्तृत थीं। यह केवल एक राजनीतिक सीमा नहीं, बल्कि एक साझा सभ्यता का प्रतीक थी। इस स्वरूप में भारत और नेपाल दोनों सनातनी देश जाने पहचाने जाते थे।

वैदिक और मौर्य काल में जम्बू द्वीप :- 

प्राचीन काल में इसे 'आर्यावर्त' और 'जंबूद्वीप' कहा जाता था। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और चक्रवर्ती सम्राट अशोक के शासनकाल में यह साम्राज्य अपने सबसे बड़े विस्तार पर था।अखंड भारत का निर्माण करने वाले पहले व्यक्ति चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य थे,उन्होंने अपने गुरु आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) की मदद से बिखरे हुए छोटे-छोटे राज्यों और गणराज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। यह वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप तक फैला हुआ था। आज अखण्ड भारत की संकल्पना को एक सांस्कृतिक और दार्शनिक विचार के रूप में याद किया जाता है, जो सदियों की साझा विरासत, धर्म और भूगोल को आपस में जोड़ता है। चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उनके पोते सम्राट अशोक ने इस साम्राज्य का और अधिक विस्तार किया और संपूर्ण अखंड भारत पर अपना चक्रवर्ती शासन स्थापित किया था। इस विशाल क्षेत्र में सदियों तक वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म, और हिंदू संस्कृति का प्रसार रहा, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया तक के देश सांस्कृतिक रूप से एकजुट हुए थे।

अखंड भारत से अलग होने वाले देश :-

सदियों के विदेशी आक्रमणों, विशेषकर मध्यकालीन और ब्रिटिश शासन के दौरान, इस भूभाग का विभाजन होता रहा।पिछले कुछ शताब्दियों में भारत से कई क्षेत्र अलग होते गए ,-:

अफगानिस्तान: 1747 में अहमद शाह अब्दाली द्वारा अलग किया गया।

नेपाल: 1816 में सुगौली की संधि के बाद अलग हुआ।

भूटान: 1910 में ब्रिटिश काल में अलग हुआ।

पाकिस्तान :1947 में स्वतंत्रता के समय 'माउंटबेटन योजना' के तहत गांधी और जिन्ना के जिद से भारत से अलग हुआ।

श्रीलंका और म्यांमार (बर्मा): क्रमशः 1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होकर अलग हुए

बांग्लादेश :1971 यह देश भारत की मुक्तिवाहिनी और पूर्वी पाकिस्तान के देश भक्तों के संयुक्त प्रयास से स्वतंत्र हुआ था।

नेपाल का संक्षिप्त परिचय :- 

नेपाल की जनसंख्या लगभग 3.04 करोड़ (अनुमानित) है। पूरे देश का क्षेत्रफल लगभग 1,47,181 वर्ग किमी है। पूरब से पश्चिम तक इसकी कुल लम्बाई करीब 800 किलोमीटर और चौड़ाई 200 किलोमीटर है। नेपाल को 7 प्रदेशों (प्रान्तों) में बांटा गया है। जिसमें कुल 77 जिले और 165 संघीय संसदीय निर्वाचन क्षेत्र हैं।

भारत का संक्षिप्त परिचय :- 

भारत की जनसंख्या नेपाल से लगभग 49 गुना  (148 करोड़) से अधिक है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल नेपाल से 22- 23 गुना लगभग 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है। भारत में नेपाल जैसे 28 राज्य हैं । नेपाल जैसे 10 गुना से अधिक कुल 800 जिले हैं।

सर्वाधिक क्षेत्रफल भारतीय राजस्थान का संक्षिप्त परिचय :- 

भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का क्षेत्रफल नेपाल के क्षेत्रफल से दो गुना से भी ज्यादा 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है जिसमें कुल 41 जिले हैं। यहां की जनसंख्या नेपाल से लगभग ढाई गुना से ज्यादा 8.39 करोड़ है।

सर्वाधिक जनसंख्या उत्तर प्रदेश का संक्षिप्त परिचय :- 

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नेपाल के जनसंख्या का सात गुना लगभग 20 करोड़ है। नेपाल के क्षेत्रफल से डेढ़ गुना से भी अधिक कुल क्षेत्रफल: 2,40,928 वर्ग किलोमीटर  क्षेत्र में कुल 75 जिले हैं।

भारत-नेपाल के बीच संबंध के प्रमुख  आयाम :- 

भारत और नेपाल के बीच की सांस्कृतिक एकरूपता सदियों पुरानी, गहरी और अटूट है। भारत और नेपाल के बीच पुरातन संबंध सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से "रोटी-बेटी के रिश्ते" (वैवाहिक और रोटी-रोजी) पर आधारित हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच के आत्मीय संबंधों को दर्शाता है। यह साझा विरासत धर्म, भाषा, त्योहार और खान-पान में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

साझा ऐतिहासिक और पौराणिक विरासत:- 

सदियों से साझा हिंदू-बौद्ध परंपराएं, खुली सीमाएं रामायण काल से चला आ रहा सीता-राम का संबंध दोनों देशों को अटूट रूप से जोड़ता है। लुम्बिनी (बुद्ध का जन्मस्थान) और पशुपतिनाथ (नेपाल) तीर्थयात्रा इस सांस्कृतिक कड़ी के प्रमुख स्तंभ हैं।  भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म में समान विश्वास रखते हैं। नेपाल के जनकपुर (माता सीता का जन्मस्थल) और भारत के अयोध्या के बीच पौराणिक संबंध हैं। वहीं, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोधगया में हुआ था।  उनके जीवन से जुड़े प्रमुख स्थान भारत में स्थित हैं। भारत के दो महाकाव्य रामायण और महाभारत रामायण के मुख्य पात्र मौ जानकी"- जगत जननी की जन्मभूमि जनकपुर नेपाल में ही स्थित है। भारत देश के राजा दशरथ के पुत्र राम से उनका बलिदान की समय नेपाल (मत्सयदेश) में बिताये तत्पश्चात् अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वैवाहिक संबंध मत्सय राजकुमारी से हुआ। 

निकटतम पडोसी :-

नेपाल की सीमा भारत के 5 राज्यों - उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और बिहार से लगती है। इसलिए यह सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। नेपाल हमारा निकटतम पडोसी देश है. दूसरी और कोई भी देश हमारे इतना निकट नहीं है जितना नेपाल, क्योंकि यह निकटतम महज भौगौलिक अवस्था की ही नहीं है युगों-युगों से चले आते एतिहासिक नाते की भी है। हमारे भारत वर्ष के सीमा से सटे लेकिन हमारी भावनाओं की अन्तर भार की ऐसी समानता है, इतनी निकटता जहाँ भाषा और धर्म एक ही हो जहाँ देवी-देवता भी एक हो।

भाषा और लिपि में एकरूपता :,- 

भारत और नेपाल दोनों ही देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश से सटे नेपाल के तराई क्षेत्रों में 'मैथिली' और 'भोजपुरी' भाषाएं बोली जाती हैं, जो दोनों ओर की संस्कृतियों को आपस में जोड़ती हैं。

देवमयी भूमि :-

नेपाल का मात्र स्वतंत्र हिन्दू राजा रहा है, यहाँ जितने लोग उत्तनी ही देवमुर्ति स्थापित है। नेपाल की सारी भूमि देवमयी है। यहां शक्तिपूजा की प्रधानता रही है। तो भारत भी देश को ही भारत माता कहा गया है। उसने तो पूरे विश्व को “बसुधौव कुटुंबकम्” से सम्मानित कर रखा है।

हिमालय पर्वत दोनों का प्रहरी :- 

अनन्त या अनादि काल से हिमालय हमारी और नेपाल की संस्कृति का अक्षय प्रेरणा, अनन्त, उत्स और अखण्ड प्रहरी रहा है। एक ही साथ वह सदा हमारा पोषक और रक्षक भी रहा है। नेपाल भारत की 'हिमालयी सीमाओं' के ठीक बीच में स्थित है और भूटान के साथ मिलकर यह उत्तरी 'सीमावर्ती' क्षेत्र के रूप में कार्य करता है और चीन से किसी भी संभावित आक्रमण के खिलाफ बफर राज्य के रूप में कार्य करता है।

नदियों द्वारा जुड़ाव :- 

नेपाल से निकलने वाली नदियाँ पारिस्थितिकी और जलविद्युत क्षमता के लिहाज से भारत की बारहमासी नदी प्रणालियों को पोषित करती हैं । नेपाल की नदियाँ जो भारत के भू-भाग पर ही बहती है, प्रत्येक वर्ष बाढ़ लाती है। बाढ़ के साथ-साथ हमारे भूमि को उपजाऊ भी बनाती है।मिथिलावासी जिने जीविकोपार्जन का साधन कृषि है इनके लिए नेपाल की नदी वरदान साबित हो रही है।

कनेक्टिविटी:-

नेपाल एक भू-बद्ध देश होने के कारण तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और एक तरफ तिब्बत की ओर खुला है जहां वाहनों की आवाजाही बहुत सीमित है। भारत-नेपाल ने लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कनेक्टिविटी कार्यक्रम शुरू किए हैं ।दोनों सरकारों के बीच काठमांडू को भारत के रक्सौल से जोड़ने वाली इलेक्ट्रिक रेल पटरी बिछाने के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं ।भारत व्यापार और पारगमन व्यवस्थाओं के ढांचे के भीतर माल ढुलाई के लिए अंतर्देशीय जलमार्गों को विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जिससे नेपाल को समुद्र तक अतिरिक्त पहुंच मिल सकेगी और इसे सागरमाथा (माउंट एवरेस्ट) को सागर (हिंद महासागर) से जोड़ने का नाम दिया जा रहा है।

व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध :- 

प्राचीनकाल में भारत अपने पड़ोसी राज्यों से सम्पर्क निरंतर। बनायें रहता था उन दिनों भारत का मुख्यतः व्यापारिक सम्बन्ध रहा किन्तु धीरे-धीरे से संबध सभ्यता एवं संस्कृति के स्तर पर भी स्थापित हुए। प्राचीनकाल में नेपाल से सम्बन्ध का कारण यह भी था कि चीन देश के साथ संबंध स्थापित करने के साथ ही साथ इससे जुड़े अन्य देशों से भी।

धार्मिक और आध्यात्मिक समानता:-

भारत और नेपाल दोनों ही हिंदू और बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्रों को साझा करते हैं। जहाँ एक ओर नेपाल में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर को भारतीय श्रद्धालु बहुत पवित्र मानते हैं, वहीं भारत में स्थित बनारस, अयोध्या और बोधगया नेपाली लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं।छठी शताब्दी ई० पू० गौतम बुद्ध का जन्मस्थान नेपाल में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में हुआ था। परन्तु इन्हें ज्ञान की प्राप्ति भारत के एक प्रांत बिहार में गया जिले में हुआ। बुद्ध के बोधिसत्य सब प्राप्ति के पश्चात ही जिला का नाम बोध गया पड़ा। आज भी यह बोध गया विश्वप्रसिद्ध है। इन्होंने पूरे  विश्व को शांति प्रेम और अहिंसा का संदेश दिए। नेपाल में जन्म लेने वाले सिद्धार्थ भारत में महान अवतारी पुरूष बन गए। इनके अनुयायी वनके भक्त विश्व के कई देशों से आज भी भारत में बोधगयाा भ्रमण के लिए आते हैं। 

त्योहार और खान-पान: -

दोनों देशों में मनाए जाने वाले त्योहार लगभग एक समान हैं। दीपावली, होली, दशहरा और छठ पूजा दोनों देशों में पूरी आस्था के साथ मनाए जाते है। इसके साथ ही दाल-भात, रोटी और मोमोज जैसे व्यंजन दोनों जगह बेहद लोकप्रिय हैं।

ऋषि मुनियों की साधना स्थली :- 

अपने वैचारिका तपस्या से भारतीय ज्ञान मंदाकिनी को सतत वेग और विस्तार देने वाले अनेक ऋषि मुनियों की जीवन-साधना का क्षेत्र यहीं प्रदेश रहा है। हिमाच्छादित हरे भरे पेड़, सदवावहिनी नदियों इन प्राकृति सौन्दर्यमय वातावरण में ही मनुष्य अपनी संस्कृति का विकास कर रही है। संस्कृति ऐसा पर्यावरण है जिसके अन्दर रहकर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढलता है और प्राकृतिक दशाओं के अनुकूल चलते हुए ही प्रगति की ओर अन्मुख होता रहता है। यह संस्कृति ही है जो विश्व स्तर पर मानव को मानव से समाज को समाज से पृथक करती और जोड़ती भी है। यह संस्कृति ही है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है।

रोटी-बेटी का संबंध: 

दोनों देशों के बीच लगभग 1,850 किमी लंबी खुली सीमा है। इस सीमा के आर- पार नेपाली और भारतीय नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं, जो इन संबंधों की अद्वितीयता को दर्शाता है। दोनों देशों के लोगों के बीच घनिष्ठ रिश्ते और नातेदारी है, जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है। 

दोनों देश के लोग विवाह और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से भी उनके बीच घनिष्ठ संबंध हैं। भारत के बिहार-यूपी और नेपाल के बीच में सदियों से वैवाहिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं।

विकास सहायता:- 

भारत सरकार नेपाल को समय समय पर विकास सहायता प्रदान करती है, जिसका मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है। सहायता के क्षेत्रों में अवसंरचना, स्वास्थ्य, जल संसाधन, शिक्षा और ग्रामीण एवं सामुदायिक विकास शामिल हैं।

रक्षा सहयोग:-

द्विपक्षीय रक्षा सहयोग में उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान करके नेपाली सेना के आधुनिकीकरण में सहायता करना शामिल है । भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंटों में नेपाल के पहाड़ी जिलों से भी सैनिकों की भर्ती की जाती है। भारत 2011 से हर साल नेपाल के साथ सूर्य किरण के नाम से जाना जाने वाला एक संयुक्त सैन्य अभ्यास करता आ रहा है।

सनातन संस्कार से जुड़ा :- 

संस्कृति वह संस्कार माना जाता है जिसका तात्पर्य धार्मिक किया-कलापों से एक हिन्दू तबसे इन संस्कारों से गुजरना होता है। नेपाल पूर्व में हिन्दूराज्य रहा पर अब भारत जैसा धर्मनिरपेक्ष राज्य है।  इनमें अनेक समानताएँ है। इसी के आधार पर व्यक्ति का समाजीकरण होता है। व्यक्ति का निर्माण होता है । यानी एक प्रकिया मानी जाती है। संस्कृति हमारे जीवन शैली का पर्याय है। जो इतिहास के तरह अपने घटना के विचारों को समय-समय पर बतलाती है। इसके अन्तर्गत हमारे दृष्टिकोण, विचार हमारी संस्थाएँ राजनैतिक, वैज्ञानिक, धर्मिक, नैतिक विधान हमारे पुस्तक से हमारे जीवन दार्शनिक ये समस्त वस्तुओं है। हमारे अन्य भी वस्तुए इन सभी को हम अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ पाते है। संस्कृति एक प्राकृतिक मनोभाव है। जब एक देश सम्पर्क में आते तभी वे अपने आचार-व्यवहार से दूसरों से सिखते है और सिखाते भी है।

नेपाल का गोरखपुर पर अधिकार रहा :

संस्कृति सदैव बदलती रहती है। 18वीं सदी में नेपाल एक शक्तिशाली देश था। वह अपने राज्य विस्तार के प्रयत्नशील था। उत्तर में चीन और विस्तार सम्भव नहीं था इसलिए दक्षिण में विस्तार की नीति अपनाई। 1801 में नेपाल ने गोरखपुर पर अधिकार कर लिया जिसे ब्रिटिश भारत और नेपाल की सीमाये मिल गई। हिमालय के तराई वाले भाग, नेपाल और ब्रिटिश भारत की सीमाएँ निर्धारित नहीं हो पाई थी। अतः सीमा निर्धारण दोनों देश के अवश्यम्भावी हो गया। परन्तु इसके पूर्व भारतीय शासकों को इस देश से सौहार्दपूर्ण संबंध थे। अंग्रेज 1816 में सुगौली संधि के उपरांत नेपाल पर अधिकार कर लिया इससे अंग्रेजो को बहुत लाभ हुआ नेपाल अंग्रेज का मित्र राज्य बन गया। इसके बाद से अंग्रेजों का भारी मात्रा में गोरखा सैनिक प्राप्त होते रहे। इस संधि के बाद शिमला, मसूरी और नैनीताल जैसे ठण्डे स्थान भी अंग्रजों को प्राप्त होते है। इससे अंग्रेज मध्य एशिया के लिए सुगम मार्ग मिल गया।

1950 में हुई थी शांति और मैत्री संधि :- यह संधि दोनों देशों में भारतीय और नेपाली नागरिकों के साथ निवास, संपत्ति, व्यवसाय और आवागमन के संबंध में पारस्परिक व्यवहार की बात करती है। यह भारतीय और नेपाली दोनों व्यवसायों के लिए राष्ट्रीय व्यवहार भी स्थापित करता है (अर्थात, आयात होने के बाद, विदेशी वस्तुओं के साथ घरेलू वस्तुओं से अलग व्यवहार नहीं किया जाएगा)। इससे नेपाल को भारत से हथियार प्राप्त करने का भी अधिकार मिल जाता है।

मानवीय सहायता:-

नेपाल एक संवेदनशील पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र में स्थित है जो भूकंप और बाढ़ के प्रति संवेदनशील है , जिससे जान और माल दोनों का भारी नुकसान होता है, जिसके कारण यह भारत की मानवीय सहायता का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बना हुआ है। कोरोना के समय में उसने भारत से भरपूर सहायता पाई थी। चीन से सभी देश मुंह मोड़ चुके थे।

बहुपक्षीय साझेदारी:-

भारत और नेपाल कई बहुपक्षीय मंचों जैसे बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल), बिम्सटेक (बंगाल की खाड़ी बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल), गुटनिरपेक्ष आंदोलन और सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) आदि में भाग लेते हैं।

कम्युनिस्ट माओवादियों का बढ़ता वर्चस्व :-

नये विचार और नये व्यवहार नये खोजों संस्कृति में परिर्वतन होता रहता है। जिसमें कुछ स्वतंत्र तत्व रहते है कुछ विरोधी भी रह जाते हैं जैसे नेपाल में माओवाद का उदय होना कहने के लिए इसकी जड़-मूल नेपाल में है पर भारत इससे अछूता नहीं रहा है क्योकि राजतंत्र से लोकतंत्र का शासन हो यह राजा नहीं चाहते थे। फलस्वरूप 2006 एक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिसमें राजा के हाथ से सत्ता जनता द्वारा चुने गए हाथ सौंपना पड़ा।

नेपाल राजवंश से गोरखनाथ मंदिर का रहा पुराना संबंध :- 

गोरखपुर के गोरक्षपीठ के गोरखनाथ मंदिर और नेपाल का संबंध सदियों से हैं। नेपाल राजवंश का उद्भव भगवान गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। जिसके बाद शाह परिवार पर भगवान गोरखनाथ का हमेशा आशीर्वाद रहा है। इसी कारण नेपाल राजवंश ने गुरु गोरखनाथ की चरण पादुका को अपने मुकुट पर बना रखा था, इतना ही नहीं नेपाल के सिक्कों पर गुरु गोरखनाथ का नाम लिखा है। गुरु गोरक्षनाथ के गुरु मक्षयेन्द्रनाथ के नाम पर आज भी नेपाल में उत्सव मनाया जाता है। राजपरिवार अब भी गुरु गोरखनाथ को अपना राजगुरु मानता है। 

    मकर संक्राति के दिन भगवान गोरखनाथ को पहली खिचड़ी गोरक्ष पीठाधीश्वर चढ़ाते हैं तो दूसरी खिचड़ी आज भी नेपाल नरेश की तरफ से चढ़ाई जाती है। कई बार नेपाल नरेश खुद खिचड़ी चढ़ाने यहां आए, नहीं तो उनका कोई न कोई प्रतिनिधि यहां पर खिचड़ी चढ़ाने आता है। उसको यहां से नेपाल की सुख शांति के लिए महारोट का प्रसाद दिया जाता है।

    नेपाल में बड़ी संख्या में लोग गोरखनाथ भगवान की पूजा करते हैं। उनकी गोरखनाथ में विशेष आस्था है। नेपाल में कई जगह भगवान गोरखनाथ के मंदिर हैं। इतना ही नहीं पशुपतिनाथ मंदिर में भी गोरखनाथ भगवान का मंदिर है, वहां मुक्तिनाथ धाम नाथ संप्रदाय का ही है। नेपाल में बड़ी संख्या में लोग नाथपंथ से जुड़े हुए हैं।

भारत नेपाल दोनों एक दूसरे के पूरक और सहयोगी बनें :-

भारत और नेपाल सदियों से 'रोटी-बेटी के रिश्ते' और साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हुए हैं। एक-दूसरे के पूरक बनकर दोनों देश अपनी खुली सीमाओं का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं, जिससे व्यापार, पर्यटन, और ऊर्जा सुरक्षा में क्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हो सके।दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए सहयोग, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।दोनों देशों की भलाई इसी में है कि वे एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए आर्थिक विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक साझेदारी को बढ़ावा दें।


दोनों देश के बीच प्रमुख साझेदारी


1. आर्थिक एवं व्यापारिक साझेदारी

नेपाल का लगभग दो-तिहाई व्यापार भारत के माध्यम से होता है। दोनों देशों को अपनी पारगमन संधियों को और आधुनिक बनाना चाहिए। भारत, नेपाल को अपनी बंदरगाह सुविधाओं तक निर्बाध पहुँच देकर उसके निर्यात को बढ़ावा दे सकता है, जबकि नेपाल भारतीय उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण और सुलभ बाजार बन सकता है।

2. ऊर्जा और जल संसाधन (पनबिजली) के क्षेत्र में बढ़ावा :-

नेपाल में अपार जलविद्युत क्षमता है। दोनों देशों को मिलकर 'पनबिजली परि -योजनाओं' को विकसित करना चाहिए। नेपाल भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली का निर्यात कर सकता है। भारत तकनीकी और वित्तीय निवेश प्रदान कर सकता है।

3. धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा :- 

पर्यटन के क्षेत्र में दोनों देश एक-दूसरे के सबसे बड़े पूरक हैं। रामायण सर्किट और बुद्ध सर्किट में नेपाल के जनकपुर को भारत की अयोध्या से और लुंबिनी को भारत के बोधगया/सारनाथ से जोड़कर एक मजबूत धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है, जिससे दोनों देशों को भारी राजस्व और रोजगार मिलेगा।  पशुपतिनाथ और भारत के विभिन्न धामों के बीच सदियों से तीर्थ यात्रियों का आदान-प्रदान होता रहा है, जिसे और आसान बनाया जा सकता है।

4. सीमा पार कनेक्टिविटीरेल और सड़क मार्गों का विस्तार :-

दोनों देशों को आर्थिक रूप से और करीब ला रहा है। जयनगर-कुर्था और रक्सौल-काठमांडू जैसे रेलवे प्रोजेक्ट्स से व्यापार और आवागमन आसान हुआ है। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। भारत और नेपाल की यह पूरकता न केवल दोनों देशों की अर्थ - व्यवस्थाओं को मजबूत करेगी, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखेगी। 



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183



Tuesday, May 26, 2026

नेपाल की प्रमुख नदी प्रणालियां ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

नेपाल को 'नदियों का देश' कहा जाता है क्योंकि यहाँ लगभग 6,000 से अधिक नदियाँ और जलधाराएं हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ हिमालय से निकलकर भारत की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हैं। 

1. कोशी नदी प्रणाली (सप्तकोशी)

इसे नेपाल की सबसे बड़ी नदी माना जाता है। भारत और चीन के साथ साझा की जाने वाली कोसी नदी कुल 450 मील तक बहती है। नेपाल के दक्षिणी ढलानों पर घुमावदार रास्तों से बहने वाली कोसी नदी को इसकी सात मुख्य सहायक नदियों के कारण सप्तकोशी भी कहा जाता है। इनमें से प्रत्येक सहायक नदी में एक उत्कृष्ट नदी प्रणाली है जो विभिन्न साहसिकगतिविधियों और मनमोहक दृश्यों से भरपूर है।        दिलचस्प बात यह है कि भारत में प्रवेश करने के बाद कोसी नदी को बाढ़ की उच्च प्रवृत्ति के कारण 'बिहार का दुख' भी कहा जाता है। बाढ़ की आशंका के बावजूद, नेपाल के ऊंचे इलाकों में, हिमालय की निर्मल सुंदरता के बीच बहने वाली कोसी नदी रोमांच के लिए एक आकर्षक केंद्र है।

 यह सात प्रमुख नदियों (सुन कोशी, इंद्रावती, दूध कोशी, भोटे कोशी, तमूर, बरुण और अरुण) के मिलने से बनती है, इसलिए इसे सप्तकोशी भी कहते हैं। यह नदी बिहार (भारत) का शोक भी कहलाती है। लंबाई: लगभग 720 किलोमीटर (नेपाल में)

2.गंडकी नदी प्रणाली (नारायणी)

यह मध्य नेपाल से होकर बहने वाली एक प्रमुख नदी है। गंडकी नदी को नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है, और इसका नदी तंत्र पश्चिम में करनाली बेसिन और  पूर्व में कोसी नदी तंत्र के बीच स्थित है। इस नदी को सप्त-गंडकी भी कहा जाता है क्योंकि इसकी सात मुख्य सहायक नदियाँ मिलकर गंडकी बेसिन बनाती हैं। गंडकी की शाखाएँ नेपाल की प्रसिद्ध नदियाँ हैं जो आपस में मिलकर महत्वपूर्ण जलविद्युत उत्पादन के साथ- साथ कई मनमोहक प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करती हैं। इसकी एक सहायक नदी, कालीगंडकी, काली गंडकी घाटी या अंधा गलची नामक एक गहरी घाटी का निर्माण करती है। चितवन में, कालीगंडकी नदी गंडकी की एक अन्य महत्वपूर्ण सहायक नदी, त्रिशुली से मिलती है। 

    यह घाटी दुनिया की सबसे गहरी घाटियों में से एक है, जो 300 मीटर की ऊंचाई से गिरते हुए शानदार रूप से जलप्रपात का निर्माण करती है। काली गंडकी पर महाभारत पर्वतमाला के उत्तर में नेपाल की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना स्थित है। हिमालय से निकलने वाली इसकी मुख्य सहायक नदियाँ काली गंडकी, बूढ़ी गंडकी,  त्रिशूली और मर्स्यांगडी हैं। इसकी लंबाई लगभग 450 किलोमीटर है।

3. करनाली नदी प्रणाली (घाघरा)करनाली नेपाल की सबसे लंबी और पवित्र नदियों में से एक है। तिब्बत में कैलाश पर्वत के पास से निकलने वाली यह नदी आगे चलकर भारत में घाघरा नदी में मिल जाती है। करनाली नेपाल की सबसे लंबी और प्रमुख नदियों में से एक है, जिसका उद्गम मानसरोवर झील के पास तिब्बती पठार से होता है। इसे अक्सर ' वाइल्ड वेस्ट' कहा जाता है। 513 मील लंबी यह नदी पश्चिमी नेपाल के अधिकांश भाग से होकर बहती है। करनाली बेसिन में नेपाल के कुछ सबसे खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यान स्थित हैं। शेय फोक्सुंडो राष्ट्रीय उद्यान, रारा राष्ट्रीय उद्यान और बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान नदी के किनारे स्थित मुख्य संरक्षित क्षेत्र हैं।इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हुमला करनाली, मुगु करनाली, सेती और भेरी हैं। इसकी लंबाई लगभग 550 किलोमीटर है।

4. महाकाली नदी (शारदा)

यह नदी नेपाल और भारत (उत्तराखंड) की अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण करती है। नेपाल की हिमालयी सीमा के साथ बहने वाली खूबसूरत शारदा नदी को संस्कृत में महाकाली नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी दो बेहद खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यानों, शुक्लाफांटा राष्ट्रीय उद्यान और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरती है। नदी में वाटर राफ्टिंग एक लोकप्रिय गतिविधि है। इसे शारदा नदी के नाम से भी जाना जाता है। 

         अन्य महत्वपूर्ण नदियाँ

5.बागमती नदी: 

नेपाल की बागमती नदी काठमांडू को पाटन से अलग करती है और इसे पवित्र नदी भी माना जाता है। इसके किनारों पर कई हिंदू मंदिर स्थित हैं। यह नेपाल की सबसे पवित्र और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नदियों में से एक है, जिसके तट पर काठमांडू में प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर स्थित है।

6.कंकाई नदी: 

कंकाई नदी, जिसे माई खोला भी कहा जाता है, को पवित्र नदी माना जाता है और इसके मार्ग में डोमुखा, चूली, धनुष्कोटी और माईपोखरी जैसी कई पर्यटन स्थल हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र में हाल ही में कंकाई सिंचाई परियोजना भी विकसित की गई है। यह पूर्वी नेपाल की एक पवित्र नदी है।

7.राप्ती नदी

पश्चिम राप्ती नदी नेपाल के मध्य-पश्चिमी क्षेत्रों से बहती हुई भारत में प्रवेश करती है और घाघरा नदी में मिल जाती है। पूर्वी राप्ती नदी चितवन घाटी में बहती है और चितवन राष्ट्रीय उद्यान की उत्तरी सीमा बनाती है।

8.तामुर नदी

नेपाल की खूबसूरत तामुर नदी कंचनजंगा पर्वतमाला के आसपास से निकलती है और नेपाल के पूर्वी हिस्से में स्थित है। यह नदी रिवर राफ्टिंग जैसे जल क्रीड़ाओं के लिए प्रसिद्ध है। 

9.मार्श्यांगडी

नेपाल की यह नदी अन्नपूर्णा पर्वतमाला से निकलती है और अन्नपूर्णा सर्किट ट्रेक करने वालों के लिए एक लोकप्रिय प्राकृतिक आकर्षण है। 

द्वितीय और तृतीय श्रेणी की नदियाँ

नेपाल की अन्य द्वितीय श्रेणी की नदियों में मेची, तिनाऊ, बाबई, मोहना, त्रिजुगा आदि शामिल हैं । अंत में, नेपाल की 4तृतीय श्रेणी की नदियाँ चुरे पहाड़ियों से निकलती हैं और इनमें मनुस्मारा, जमुनी, हरदीनाथ, तिलाबे आदि शामिल हैं। ये नदियाँ गर्मियों में सूख जाती हैं और मानसून में भर जाती हैं। इनका उपयोग परिवहन या जलविद्युत के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि केवल सिंचाई के लिए किया जाता है। 



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183

Monday, May 25, 2026

भोजशाला फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सवाल भी अनुत्तरित रहे लेखिका ✍️रुचिका शर्मा


जैन यक्षिणी अंबिका को सरस्वती की मूर्ति के रूप में जानबूझकर गलत तरीके से प्रस्तुत करना ही एकमात्र ऐसा सबूत है जिससे यह आरोप लगाया जा सकता है कि परमार राजा भोज द्वारा निर्मित और 1034 ईस्वी में बना एक सरस्वती मंदिर यहाँ मौजूद था।

(मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर घोषित किए जाने के बाद लोग वहां प्रार्थना करने के लिए कतार में खड़े हैं। फोटो पीटीआई)

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया फैसले में 700 साल पुरानी मस्जिद को हिंदू देवी सरस्वती का मंदिर घोषित किया गया है। 14वीं शताब्दी की उपास्थि शैली में बनी कमल मौला मस्जिद, जो धार की पहली जामा मस्जिद भी थी, को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा न्यायालय के आदेश पर किए गए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वेक्षण में एक पूर्व-महल के स्थान पर निर्मित बताया गया था। 
      इस मस्जिद से जुड़े विवाद का इतिहास, जिसे आधुनिक समय में भोजशाला (11वीं शताब्दी के परमार राजा भोज का हॉल) के नाम से जाना जाता है, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक स्रोतों, स्थापत्य कला के पुन: उपयोग की घटना और धर्मों के ऐतिहासिक विकास की समझ में समस्या ग्रस्त हैं।
      यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें कमाल मौला मस्जिद को 11वीं शताब्दी का मंदिर घोषित किया गया है। अदालत के आदेश में दर्ज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संक्षिप्त निष्कर्षों से पता चलता है कि मस्जिद के नीचे एक पूर्व-मौजूद संरचना थी जो "शायद सार्वजनिक उपयोग के लिए विशाल" थी (पृष्ठ 186)। इसमें आगे कहा गया है कि पूर्व-मौजूद संरचना "पुन: उपयोग के लिए क्षतिग्रस्त और संशोधित" थी (वही)। बाद में, पृष्ठ 189 पर, एएसआई अपने ही कथन का खंडन करता है जब वह कहता है कि "स्तंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से पता चलता है कि वे मूल रूप से मंदिरों का हिस्सा थे।" 
       दिलचस्प बात यह है कि अवशेष किसी एक संरचना से नहीं बल्कि कई मंदिरों से प्राप्त हुए हैं (पृष्ठ 189)। नीचे स्थित संरचना को मंदिर के रूप में पहचानना पूरी तरह से मस्जिद में पुन: उपयोग की गई सामग्री के आधार पर किया गया है। एएसआई के अनुसार, पुन: उपयोग किए गए स्तंभों पर चार भुजाओं वाले देवताओं के साथ-साथ गणेश जैसे अन्य पौराणिक देवताओं की आकृतियाँ भी पाई जा सकती हैं, हालांकि इस्लामी मूर्तिपूजा के कारण वे विकृत हो गई हैं। एएसआई ने अपने सर्वेक्षण में इस संभावना को खारिज कर दिया है कि नीचे स्थित संरचना एक महल हो सकती है और मस्जिद के निर्माण में पुन: उपयोग की गई सामग्री भी किसी महल से ली गई हो सकती है। देवताओं की नक्काशीदार आकृतियाँ महल के स्तंभों, कंगनियों और दरवाजों की एक सामान्य विशेषता थीं। 
समरंगनासूत्रधार में आवासीय वास्तुकला पर अपने अध्ययन (2010) में फेलिक्स ओटर ने तर्क दिया है कि महलों सहित आवासीय स्थानों को सजाने के लिए पवित्र और अपवित्र दोनों प्रकार की मूर्तियों का उपयोग किया गया था। संस्कृत ग्रंथ समरंगनासूत्रधार को गलती से 11वीं शताब्दी के परमार राजा भोज से जोड़ा जाता है, जबकि ओटर द्वारा किए गए लेखन विश्लेषण से पता चलता है कि कई लेखकों ने मिलकर इस ग्रंथ की रचना की थी। 
       एएसआई ने अपने ही इस निष्कर्ष को भी नजरअंदाज कर दिया है कि मस्जिद में पुन: उपयोग की गई सामग्री कई स्रोतों से आई है, न कि केवल एक संरचना से (पृष्ठ 189)। इसके अलावा, सर्वेक्षण में इस दावे का कोई सबूत नहीं मिलता कि पहले से मौजूद संरचना ही क्षतिग्रस्त हुई थी और मस्जिद में पुन: उपयोग की गई थी। 
     2019 के अयोध्या फैसले (पृष्ठ 906- 907) में यह साबित हो चुका है कि अवैध रूप से ध्वस्त बाबरी मस्जिद के नीचे की गई पूरी खुदाई से भी यह साबित नहीं हुआ कि नीचे की संरचना नष्ट हो गई थी। तो फिर एएसआई केवल जीपीआर सर्वेक्षण के आधार पर नीचे की संरचना के विनाश को कैसे साबित कर सकता है? 
      यह तथ्य कि पूर्व-मौजूद संरचना संभवतः एक महल थी, "वाग्देवी" प्रतिमा की "खोज" से और भी पुष्ट होता है। इसका उल्लेख सबसे पहले पृष्ठ 12 पर किया गया है और यह दावा किया गया है कि यह प्रतिमा "देवी वाग्देवी (मां सरस्वती) की मूर्ति है जिसे मुस्लिम शासकों ने वहां दफना दिया था"। इसके बाद एक वेबसाइट लिंक दिया गया है, जिसमें ब्रिटिश संग्रहालय की वर्तनी गलत है और इसलिए यह लिंक काम नहीं करता। इस प्रतिमा पर पृष्ठ 44 पर फिर से चर्चा की गई है और यहां भी वेबसाइट लिंक कहीं नहीं ले जाता क्योंकि इसमें फिर से ब्रिटिश संग्रहालय की वर्तनी गलत है। सही वेबसाइट लिंक एक विचित्र चित्र प्रस्तुत करता है। प्रदर्शनी को "खुरदुरे सफेद संगमरमर में तराशी गई जैन यक्षिणी अंबिका की खड़ी प्रतिमा" के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रिटिश संग्रहालय की वेबसाइट पर कहीं भी इस प्रतिमा को देवी सरस्वती की प्रतिमा के रूप में नहीं दर्शाया गया है। 
      इस प्रतिमा की पहचान जैन यक्षिणी अंबिका के रूप में प्रतिमा पर खुदे शिलालेख से होती है, जो इसे 1034 ईस्वी का बताता है और कहता है कि वरारुचि ने वाग्देवी और तीन जिनाओं की मूर्ति बनाने के बाद अंबा की यह प्रतिमा बनाई। वास्तव में, वरारुचि ने शिलालेख में स्वयं को जैन धर्म की शाखाओं चंद्रनगरी और विद्याधारी के धर्म का अनुयायी बताया है। इस प्रकार, यह प्रतिमा न केवल जैन यक्षिणी की है, बल्कि एक जैन द्वारा भी बनाई गई है। पृष्ठ 12 पर इस जानकारी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है और वाग्देवी और अंबा दोनों को देवी सरस्वती के रूप में बताया गया है, जबकि इस हास्यास्पद दावे का समर्थन करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया है! फैसले से पूरी तरह से गायब एक तथ्य यह भी है कि जैन यक्षिणी की प्रतिमा 1875 में औपनिवेशिक सर्वेक्षक विलियम किंकेड द्वारा धार के एक शहर महल के खंडहरों में पाई गई थी। यह जानकारी ब्रिटिश संग्रहालय की वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध है, लेकिन अदालत के आदेश में इसका कोई उल्लेख नहीं है। 
      जैन यक्षिणी अंबिका को सरस्वती की मूर्ति के रूप में जानबूझ कर गलत तरीके से प्रस्तुत करना ही एकमात्र सबूत है जिससे यह आरोप लगाया जा सकता है कि परमार राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर यहाँ मौजूद था और इसका निर्माण 1034 ईस्वी में हुआ था। इस पूरे मामले में मूर्ति के गलत चित्रण का महत्व देखते हुए, यह सवाल उठता है कि क्या ब्रिटिश संग्रहालय की वेबसाइट का लिंक, जिसमें मूर्ति को मंदिर नहीं बल्कि महल में मिली और जैन मूल की बताया गया है, आदेश में जानबूझ कर एक बार नहीं बल्कि दो बार गलत लिखा गया था। 
       किन्कैड द्वारा 1875 में प्राप्त की गई मूर्ति महल के खंडहरों में मिली थी और वह एक जैन यक्षिणी थी, यह बात न केवल किन्कैड ने 1875 में बल्कि माइकल विलिस ने भोजशाला पर अपने अध्ययन (2012) में भी दर्ज की थी। एएसआई के न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण में मस्जिद परिसर में एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति का मिलना इस संभावना को और पुष्ट करता है कि पूर्व-मौजूदा संरचना जैन मूल की थी। 
     पृष्ठ 234 पर दिए गए फैसले में यह कहकर इसका स्पष्टीकरण दिया गया है कि "भारत में जैन धर्म और हिंदू धर्म अलग-अलग संस्थाएं नहीं हैं। हालांकि इन दोनों धर्मों में पूजा-पाठ के तरीके भिन्न हो सकते हैं, लेकिन दोनों धर्म प्राचीन काल से साथ-साथ विकसित हुए हैं और एक ही सर्वोच्च सत्ता की पूजा करते हैं।" 
          यह दावा ऐतिहासिक दृष्टि से निराधार है। जैन इतिहास के अध्ययनों (पीटर फ्लुगेल, 2006, जूलिया हेगेवाल्ड, 2013 और 2025 तथा चंपाक लक्ष्मी, 1996) से पता चलता है कि जैन धर्म की उत्पत्ति वेदों के अधिकार को अस्वीकार करने और वैदिक धर्म में ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का विरोध करने में निहित थी। के.आर. श्रीनिवासन ने तमिलनाडु के शिलाखंड मंदिरों पर अपने अध्ययन (1975) में दर्शाया है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में कई जैन शिलाखंड मंदिरों को शैव या वैष्णव मंदिरों में परिवर्तित कर दिया गया था। मध्यकालीन कर्नाटक में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई, जहाँ वीरशैव धर्म के आगमन से 12वीं-13वीं शताब्दी के दौरान जैन मंदिरों को वीरशैव मंदिरों में परिवर्तित करने की होड़ मच गई (हेगेवाल्ड, 2013)। 
        अलवार और नयनार संप्रदायों के भक्ति ग्रंथों में बौद्ध धर्म और जैन धर्म को उनके अपने धर्मों से अलग माना गया है और अलवार-नयनार और बौद्ध-जैनों के बीच शत्रुता (कुछ मामलों में हिंसक शत्रुता) का उल्लेख मिलता है। इसी कारण 8वीं-9वीं शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का विलुप्त होना और जैन धर्म का पतन हुआ (चंपाकलक्ष्मी, 1996)। 
       जैन धर्म और हिंदू धर्म को अलग-अलग संस्थाओं के रूप में न मानना, हिंदू धर्म की औपनिवेशिक परिभाषा को ही दोहराता है, जिसके अनुसार हिंदू धर्म "न मुसलमान, न ईसाई" है। हिंदू धर्म की इस गलत समझ का अनुसरण औपनिवेशिक सर्वेक्षकों, विशेष रूप से जेम्स फर्ग्यूसन ने भी किया, जिन्होंने 1876 में भारतीय वास्तुकला पर अपने कार्य में जैन बसदियों और बौद्ध स्तूपों को हिंदू वास्तुकला के अंतर्गत वर्गीकृत किया। 
        यदि पूर्व-मौजूदा संरचना के जैन मूल का होने के जानबूझकर किए गए खंडन को ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, तो आदेश में कई ऐतिहासिक स्रोतों का गलत उद्धरण भी दिया गया है। पृष्ठ 194 पर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निष्कर्षों की रिपोर्टिंग करते समय, 14वीं शताब्दी के जैन ग्रंथ प्रबंध चिंतामणि (मेरुतंग द्वारा रचित) का हवाला देते हुए कहा गया है कि "परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज ने मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला मंदिर का निर्माण करवाया था"। हालांकि, जैन ग्रंथ में ऐसा कोई उद्धरण नहीं है, संस्कृत ग्रंथ में भोजशाला शब्द का उल्लेख नहीं है। वास्तव में, यह शब्द किसी भी संस्कृत ग्रंथ में नहीं मिलता क्योंकि यह एक आधुनिक शब्द है, जिसे सर्वप्रथम 1903 में धार राज्य में एएसआई से जुड़े के.के. लेले ने गढ़ा था। लेले ने इस शब्द का अर्थ भोज का विद्यालय बताया था। हालांकि, माइकल विलिस (2012) ने दिखाया है कि यह शब्द निरर्थक है, क्योंकि संस्कृत में 'शाला' का अर्थ केवल एक स्थान होता है, जबकि विद्यालय के लिए संस्कृत में विद्यालय या ज्ञानपीठ शब्द का प्रयोग होता है। 
       यह आदेश न केवल हिंदू धर्म की ब्रिटिश परिभाषा पर, बल्कि मस्जिद के अंदर मिले संस्कृत शिलालेखों को समझने के लिए औपनिवेशिक स्रोतों पर भी निर्भर करता है। ऐसा कोई संस्कृत स्रोत नहीं दिया गया है जो मस्जिद के आसपास मंदिर की उपस्थिति को दर्ज करता हो। 
      संस्कृत शिलालेखों की बात करें तो, उनमें से कई में संस्कृत ग्रंथ 'पारिजात मंजरी' है, जो जैन विद्वान के शिष्य मदन द्वारा रचित 13वीं शताब्दी का नाटक है। ग्रंथ की प्रस्तावना में कहा गया है कि यह नाटक 13वीं शताब्दी के परमार राजा अर्जुनवर्मन की उपस्थिति में सरस्वती मंदिर में प्रदर्शित किया गया था। चूंकि ग्रंथ को पत्थर की शिलाओं पर उकेरा गया है और मस्जिद में उनका पुनः उपयोग किया गया है, इसलिए प्रस्तावना भी उसी प्रकार उकेरी गई है। हालांकि, इसे फिर से मस्जिद के नीचे सरस्वती मंदिर होने के प्रमाण के रूप में लिया जा रहा है,जबकि कोईपुरातात्विक प्रमाण इसकी पुष्टि नहीं करता है। 
     जिस प्रकार एक महल से जुड़ी जैन यक्षिणी अंबिका की मूर्ति को मंदिर से संबंधित सरस्वती की मूर्ति के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, उसी प्रकार विवादित स्थल से लगभग तीन किलोमीटर दूर सूफी संत अब्दुल्ला शाह चांगल की कब्र में मिले एक शिलालेख को पूर्व-मौजूदा संरचना के विनाश के प्रमाण के रूप में लिया जाता है। पृष्ठ 193 पर, मालवा सल्तनत के 15वीं शताब्दी के शासक महमूद खिलजी द्वारा जारी एक शिलालेख का हवाला दिया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि चांगल ने "मूर्तियों को नष्ट कर दिया और इस मंदिर को हिंसक रूप से मस्जिद में बदल दिया"। 
     हालांकि, चांगल की मृत्यु के 300 वर्ष बाद लिखे गए शिलालेख में एक प्रसिद्ध किंवदंती का उल्लेख है जो उन्हीं से जुड़ी हुई है। यह लेख अलंकारिक है, तथ्यात्मक नहीं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शिलालेख कमाल मौला मस्जिद परिसर में नहीं, बल्कि उससे कुछ किलोमीटर दूर स्थित है। एएसआई किस प्रकार कमाल मौला मस्जिद स्थल पर कथित रूप से ध्वस्त मंदिर और चांगल की समाधि पर मिले शिलालेख के बीच संबंध स्थापित कर रहा है, इसका स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। 
      अंतर्निहित संरचना को मंदिर मान लेने, पुन: उपयोग की गई सामग्री को पूर्व-मौलिक मंदिर के विध्वंस से प्राप्त सामग्री समझने, जैन प्रतिमा को सरस्वती की मूर्ति मानने और हिंदू धर्म तथा जैन धर्म को पूरी तरह से अलग धर्म न मानने के अलावा, इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया है कि यह संरचना पिछले 700 वर्षों से मस्जिद रही है। स्थल पर प्राप्त एक शिलालेख (जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में भी सूचीबद्ध है) में 1392-93 में मालवा के गवर्नर दिलावर खान घोरी द्वारा धार की मस्जिदों की मरम्मत कराने का उल्लेख है। इससे पुष्टि होती है कि कमाल मौला मस्जिद का निर्माण 13वीं शताब्दी के आरंभ में हुआ था, संभवतः दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के गवर्नर उलुघ खान द्वारा। 
    मस्जिद में कुरान की आयतों (सूरह अध-धारियात की आयतें) से अंकित एक मेहराब, एक मंच (उपदेश देने का स्थान) और मेज़ानाइन तल पर एक ज़नाना है। इस फैसले से न केवल इस स्थल और क्षेत्र से जुड़ा जैन इतिहास मिट जाता है, बल्कि चिश्ती सूफी संत कमाल मलावी की कब्र से जुड़ी इस संरचना के मस्जिद होने का लंबा इतिहास भी मिट जाता है। 

(रुचिका शर्मा दिल्ली स्थित इतिहासकार और प्रोफेसर हैं। वह भारतीय इतिहास पर आधारित एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाती हैं जिसका नाम है डॉ. रुचिका शर्मा ऑफिशियल । )


Sunday, May 24, 2026

संस्कृति से आविर्भूत कुवानो नदी की रहस्यमयी दास्तान ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

कुवानो नदी अपने आप में एक ऐसी रहस्यमयी प्रकृतिक संरचना है ,जिसके तह तक पहुंचने में अभी तक कोई भी सफल नहीं हो सका है। ऐतिहासिक दृष्टि से कुवानों नदी उत्तर कोशल के भूभाग में बहती है। यह घाघरा की एक सहायक नदी है। प्रवाहित नदियों में यह घाघरा के बाद दूसरी प्रमुख नदी है। पूर्वकालीन बहराइच एवं वर्तमान श्रावस्ती जिले के पूर्वी निचले भाग के चिलवरिया नामक स्थल से एक ताल के सोते के रुप में प्रारम्भ होकर बसऊपुर में लगभग 13 किमी तक एक नाले के रुप में बहने वाला यह जल स्रोत बलरामपुर में पहुंचते- पहुंचते नदी का रुप ले लेता है। पश्चिम से पूरब की ओर जैसे-जेसे यह नदी आगे बढ़ती है। इसका फैलाव बढ़ने के साथ ही इसकी गहराई भी बढ़ती जाती है। नदी का प्राचीन नाम सुन्दरिका, कर्दमी, उद्दालिकी और सुवर्णा भी कहा जाता है। स्कन्द पुराण वैष्णव खंड के भूमि वाराह खण्ड में इस नदी को सुवर्ण भूखरी (स्वर्णा) के नाम से जानते हैं। कुंवे से निकलने के कारण इसे कूप वाहिनी भी कहते हैं। 

कुंवे और नाले से उदसृत नदी

इसका उद्गम कोई पहाड़ ना होकर एक सामान्य सा प्राकृतिक नाला है जो नदी के तलहटी के कुओं से जल को ग्रहण कर अपना अस्तित्व बनाये रखती है। तराई के अवशेष के रुप में अब यही एक नदी है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक कड़ी है। यह उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के बसऊपुर गांव के पास से एक जल स्रोत से निकलती है। जो कुंआ के स्रोत जैसा होने के कारण इसे कुंआ से निकलने की बात आम जनमानस में व्याप्त है। अतः इसी कारण इसका नाम कुंआनों पड़ा है । यह पश्चिम से पूरब की तरफ बहती हुई जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे इसकी चौड़ाई और गहराई भी बढ़ती जाती है। इस नदी की विचित्रता जमीन के अन्दर से निकलने वाले वे हजारों छोटे-छोटे जलस्रोत हैं, जो नदी  के रुप में बहने के लिए इसे जल उपलब्ध कराते हैं। यही कारण है कि चाहे जितना सूखा पडे कुआनो नदी में पानी कभी कम नहीं होता। सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने इंग्लैंड से पंप मंगाकर जंगल में लगाया था। जिससे आठ किलोमीटर के दायरे में सिचाई की जाती थी। आज यह पंप जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं। 

      बलरामपुर में पहुंचते-पहुंचते यह नदी का रुप ले लेता है। इसकी लंबाई 195 किमी. है। बलरामपुर से निकल कर पूर्व दिशा में जब यह बस्ती जिले में पहुंचती है तो वहां की यह मुख्य नदी हो जाती है। यह संत कबीर नगर में बूढ़ी राप्ती से मिलकर आगे बढ़ती हुई गोरखपुर जिले के दक्षिण ग्रामीण अंचल से होकर शाहपुर के पास मलौली नामक ग्राम के नजदीक घाघरा नदी में समा जाती है। 

स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी जल :- 

नदी का पानी कभी बहुत निर्मल और पारदर्शी हुआ करता था। इसके गहरे अंतःकरण में जलीय वनस्पति और जीव जन्तुओ को भी देखा जा सकता है। इसकी स्वच्छता के बारे में लोगों का कहना है कि अगर ऊपर से एक सुई भी गिरा दी जाए तो उसके इसके तल में वह ऊपर से आसानी से देखी जा सकती है। नदी का पानी जितना निर्मल है उतना ही पारदर्शी भी।गहरे तल में स्थित वनस्पतियों को भी ऊपर से ही देखा जा सकता है। यही कारण है कि वन्य जीव भी यहां पाए जाते हैं जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं।

बन-बिलाव की बाहुल्यता :- 

कुआनो नदी के इस जंगल के सबसे प्रसिद्ध वन्यजीव फिसिंग कैट(बन बिलाव) है, जो यहां बहुतायत में पाए जाते हैं।  फिशिंग कैट का फर भूरे-धूसर रंग का होता है, जिस पर काले धब्बे और धारियाँ होती हैं। माथे से गर्दन तक छह से आठ काली रेखाएँ होती हैं, जो कंधों पर छोटी- छोटी पट्टियों और धब्बों में बँट जाती हैं। गालों पर सफेद निशान और काले धब्बे होते हैं और आँखों के चारों ओर सफेद फर होता है। कान छोटे और गोल होते हैं, और कानों के पीछे का भाग काला होता है। सामने से देखने पर, इनके बीच में एक विशिष्ट सफेद धब्बा दिखाई देता है। 

अनेक छोटी छोटी नदियां द्वारा मिलता है जल :-

श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है। यह अपना पाट कभी नहीं बदलती। इसने अपने प्रवाह से भूमि रक्षिका का स्वरूप बनाए रखा है। इसी में विसुही नदी भी आकर समाहित हो जाती है। यह खुरगूपुर गांव से उत्तर गोंडा जनपद की सीमा में प्रवेश से 4 किमी. इसका आकार नदी का हो जाता है। 

     यह गोण्डा के बीचोबीच होकर भानपुर तहसील की दक्षिण सीमा पर गुलरिहा रसूलपुर से बस्ती मण्डल को प्रवेश करती है। पूरब की दिशा में बढ़ते हुए कुआनो नदी बस्ती जिले की लगभग 130 किमी. की एक प्रमुख नदी बन जाती है।

       कुंवानों नदी का सफर नामा 

कुआनो नदी बस्ती जिले के सल्टौवा, बस्ती सदर और बनकटी विकास खण्डों से होकर महुली होते हुए संत कबीर नगर में जाती है। यह बस्ती पूर्व, बस्ती पश्चिम, नगर पश्चिम, नगर पूर्व, महुली पूर्व तथा महुली पश्चिम परगनों को पृथक भी करती है। । नदी अपने मार्ग में बस्ती, संत कबीर नग़र और गोरखपुर जिले से होकर बहती है। जो मुखलिसपुर कस्बे के पास बूढी राप्ती में मिलकर घाघरा नदी में समा जाती है। 

     पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के मूल निवासी कवि, पत्रकार तथा दिनमान पत्रिका के भूतपूर्व संपादक स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपने गांव के निकट बहने वाली ’’कुआनो नदी का दर्द’’ विषय पर कविताओं का एक सिरीज लिखकर उसे जीवंत बना दिया है। नदी के दोनों किनारों पर जामुन, बेंत व महुआ के जंगल पाए जाते हैं। इसका जल जमुना की भांति नीला है व सर्पाकार रूप में यह बहती है।

    जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं। कंटीले बेंत के जंगलो से गुजरती हुई यह नदी अद्भुत दृश्य पैदा करती है। यह नदी अपने आप में एक रहस्य है, जिसे खुद प्रकृति ने बनाया है और जिस रहस्य तक पहुंचने में कोई अभी तक कामयाब नहीं हुआ है। इसके तट पर साल,सागौन के अतरिक्त दुर्लभ सिरस वृक्ष की प्रजाति भी पाई जाती है। नदी के दोनो ओर झाडियों की लम्बी श्रंखला है जो दुर्लभ भी है। कुआनो नदी के कारण जैवविविधता की दृष्टि से यह इलाका काफी समृद्ध है। वनस्पतियों की एक लम्बी प्रजाति यहां पाई जाती है. कुछ दुर्लभ वस्पतियां भी नदी के तल में मौजूद हैं। जल का प्रवाह धीमा होने के कारण तमाम फ्लोटिंग प्लान्ट्स भी इस नदी में पाए जाते हैं।

आवागमन के जलमार्ग के रूप में प्रयुक्त 

प्राचीन समय यहां तक कि मुगल काल तक घाघरा व कुवानों आदि नदियां ही आवागमन का प्रमुख साधन हुआ करती थीं। कुवानों नदी से दूर दराज के इलाकों में नाव द्वारा सामान की ढ़ुलाई भी पहले होती थी। रवई, मनवर तथा कठनइया आदि इसकी अनेक सहायक नदियां हैं। 

पुराने समय में सरयू के किनारे बसे लालगंज सहित अन्य क्षेत्रों के लोग इसी नदी के माध्यम से नाव में बैठकर गांव से शहर व शहर से गांव पहुंचते थे। इस नदी में जब प्रवाह था तो यह व्यापार का साधन भी रही। पांच दशक से पहले इसकी चैड़ाई 48 मीटर से अधिक थी और गहराई 80 मीटर से भी ज्यादा। वर्तमान में इसमें काफी कमी आई है। चैड़ाई अब पन्द्रह से बीस मीटर रह गयी है वहीं गहराई दस से बारह मीटर बची है। 

   कभी यह जलमार्ग के रूप में भी व्यवसायियों के आवागमन का मार्ग थी, मछुआरों की आजीविका का साधन थी , नदी में छोटी-छोटी नाम के साथ दिन-रात मछलियां पकड़ने का काम करते थे, लेकिन प्रदुषण के चलते अब इसमें मछलियां भी नहीं रही।नदी नाले का रूप धारण कर लिया है। अतः अब यहां मछुआरों को रोजी-रोटी जो आराम से चला करती थी , वह बंद हो गई है और वह पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।


      कुंवानों नदी के विविध घाट 


श्रावस्ती जिले में घघरिया घाट

श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है। 

चोरघटा घाट बलरामपुर:- 

चोरघटा घाट उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख स्थान है। इस पर 13 साल के लंबे इंतजार के बाद वर्तमान पुल बनकर तैयार हो गया है। जिससे  बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो गया है।

अइला घाट, बस्ती :- 

हर्रैया तहसील को भानपुर से जोड़ने वाला कुआनों नदी पर स्थित अइला घाट है । अइला घाट और पुल गौर ब्लाक के उत्तरी छोर पर स्थित अइला कला गांव के निकट कुआनो नदी के तट पर स्थित है।

  पनिभरवा घाट बस्ती:- 

बस्ती और गोंडा जिलों की सीमा के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और स्थानीय घाट है। लोगों द्वारा पानी भरने का एकमात्र स्रोत होने के कारण इसे पनिभरवा घाट नाम मिला।

भैंसहवा घाट, बस्ती :- 

इस घाट पर भैंसों को नहलाने और पानी पिलाने के कारण इस घाट का नाम भैंसहवा घाट पड़ा है। भैंसहवा घाट कुआनो नदी के तट पर स्थित एक शांत और ग्रामीण परिवेश वाला क्षेत्र है। 

देईपार-भैंसहवा घाट, बस्ती :- 

भैंसहवा घाट उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।सल्टउआ के पास स्थित देईपार से भैंसहवा को जाने वाले मार्ग को प्रमुख घाट के रूप में जाना जाता है। यह घाट जिला बस्ती के अंतर्गत बलुआ चौबे क्षेत्र  के पास कुआनो नदी के प्राकृतिक तट पर स्थित है।

शिवा घाट, बस्ती :-

सोनहा-शिवाघाट , पैकोलिया शिवा घाट मार्ग से जुड़ा यह एक महत्वपूर्ण घाट है वर्तमान समय में इस पर पुल बन गया है।

चौरा घाट, बस्ती:- 

बस्ती जिले के सलतौवा गोपालपुर ब्लाक सलतौवा से 7 किमी दूर कुआनो नदी पर स्थित चौरा घाट एक प्रमुख स्थान है। पास ही में अजगैबा का सुंदर जंगल है जहां नदी तट पर विष्णु भगवान का सुन्दर मन्दिर है।

महादेवा घाट, बस्ती:-

अजगैवा जंगल से तीजू गंज को जोड़ने वाली इस सड़क के कुआनो नदी पर पर बने महादेवा पुल से होकर आमा न्याय पंचायत के गांवों के लोगों का आना-जाना रहता है।

        नील कोठी के अवशेष 

बक्सई घाट, बस्ती:- 

बक्सई घाट, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में वाल्टर गंज कस्बे के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।आजादी के पहले अंग्रेज अफसर कुआनो नदी के किनारे बक्सई घाट पर बड़े पैमाने पर नील की खेती कराते थे। नील कोठी और नील उत्पादन के लिए बनाए गए नील हौज, अंग्रेज अफसर के बैठका का अवशेष आज भी बक्सई गांव में मौजूद हैं। नील के हौज तक पहुंचने के लिए पश्चिम की तरफ सीढ़ी बनाई गई थी। नाली, कुंआ, नील हौज और सीढ़ी अभी भी मौजूद है। 

बाराह छतर घाट बस्ती :-

यह घाट जिला मुख्यालय से पश्चिम कुवानों नदी के तट पर लगभग 15 किमी दूर पर स्थित है। यह जगह बाराह मंदिर के लिए मुख्य रूप से प्रसिद्ध है। पौराणिक किताबों में इसे वियाग्रापुरी के रूप में जाना जाता है। नदी के किनारे संसारपुर नामक एक गांव है, जो भगवान शिव के पौराणिक स्थान के लिए प्रसिद्ध है। यह टिनिच रेल स्टेशन से दो मील पूर्व और कुआनो नदी के दक्षिण तट पर, रेल के पुल से आधे मील पर एक ग्राम है, जो जनश्रुति के अनुसार 'वराह अवतार' की स्थली है। भगवान विष्णु ने अपने वाराह अवतार के रूप में यहां एक कुंड की खुदाई की थी। परिणाम स्वरूप जमीन से पानी की धारा निकली थी। यह मेला स्थानीय संस्कृति और आस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जिसका आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है। कनिंघम और कार्लाइल ने इसे बौद्ध साहित्य का 'कोलिया' नामक स्थान पहचाना है, जो 'सिद्धार्थ' (बाद में महात्मा बुद्ध) की माता मायादेवी के पिता कोलिय वंशीय सुप्रबुद्ध की राजधानी थी।

सियरापार घाट, बस्ती :- 

सियरापार घाट उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में वाल्टरगंज क्षेत्र के अंतर्गत कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। सियारों और जंगली जानवरों की बहुलता के कारण यह नाम मिला है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ग्रामीण संस्कृति के लिए जाना जाता है। यह स्थान बस्ती जिले के सदर तहसील के अंतर्गत कुआनो नदी के तट पर बसा हुआ है।

रघुनाथपुर घाट बस्ती :- 

बस्ती जिले के वाल्टरगंज थाना क्षेत्र में स्थित रघुनाथपुर का कुआनो घाट एक प्रमुख स्थानीय तट है। रघुनाथपुर और आस-पास के निवासियों द्वारा 'छठ पूजा' जैसे बड़े त्योहार मनाए जाते हैं।

खीरीघाट , बस्ती:-

खीरीघाट खास पंचायत बस्ती सदर ब्लॉक में स्थित है। जो जिला मुख्यालय से 2 किमी दूरी पर कुंवानों नदी के तट पर बसा है ।

चकचई घाट, बस्ती :- 

गौर पैकोलिया मार्ग पर हर्रेया तहसील में  यह गांव कुंवानों नदी के तट पर स्थित है।

कछुआड़ घाट, बस्ती:-

बस्ती जिले की कुवानों नदी का कछुआड़ घाट है जिसपर पुल व अप्रोच निर्माण के लिए राज्य सेतु निगम की तरफ से प्रस्तावित है।

राजा घाट , बस्ती:-

बस्ती और गोण्डा जिले की सीमा पर कुआनो नदी के तट पर स्थित 'राजा घाट' एक प्रसिद्ध स्थान है。यह क्षेत्र बस्ती जिले के अंतर्गत आता है और अपने शांत परिवेश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजा घाट पुल  के लिए जाना जाता है।

गोनारे घाट , बस्ती :- 

गोनारे घाट बस्ती जिले की महादेवा विधानसभा क्षेत्र में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। यह स्थान स्थानीय ग्रामीणों और क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग (घाट) और स्थानीय धार्मिक आस्था का केंद्र है। यह घाट बस्ती मुख्यालय से दक्षिण-पूर्व में लालगंज क्षेत्र के पास स्थित है।

चांदमारी घाट, बस्ती :- 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। यह स्थान कुआनो नदी के किनारे बसा है, जो जिले की सबसे महत्वपूर्ण पवित्र नदियों में से एक है। कुआनो नदी आस्था का प्रमुख केंद्र है।     


मोहटा (भदेश्वर नाथ ) घाट, बस्ती :-

भादेश्वर नाथ बस्ती शहर से लगभग 5-6 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां भगवान शिव का एक प्रसिद्ध मंदिर है । 

यह माना जाता हैं, कि यह मंदिर रावण द्वारा स्थापित किया गया था। शिवरात्रि और श्रावण माह के अवसर पर यहां विशाल मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों के कई लोग भाग लेते हैं। शिव लिंग एवं भद्रेश्वर का नाम शिव पुराण में भी लिखा मिलता है।  भद्रेश्वर नाथ गांव अधिकतर ब्राह्मण गोस्वामी आबादी वाला गांव है।

मधुपुरी लालगंज , बस्ती :- 

कुंवानों नदी के तट पर कर्दम प्रजापति, महर्षि उद्धालक, ऋषि धौम्य और आरुणि जैसे महान तपस्वियों के आश्रम थे। प्राचीन कुवानों और मनोरमा का संगम मधुपुरी नामक तीर्थ थे जो  महुली क्षेत्र के लालगंज कस्बे से 5 किमी दक्षिण स्थित है। (वामन पुराण अध्याय 55 श्लोक 9, चन्द्रबली “बस्ती बसुधा” पृष्ठ 34 पर उद्धृत)। जहाँ महर्षि उद्दालक मुनि की तपोभूमि  मौजूद है। महर्षि उद्दालक मुनि की तपोभूमि तट पर भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ चैत्र पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद पूजन अर्चन किया था। उसके बाद लिट्टी चोखा बनाकर सभी लोगों ने खाया था। यहां पर लगभग 5 दिनों तक मेले का आयोजन होता है। भगवान श्रीराम के जन्म त्रेता युग के पहले का यह मंदिर है। यह तीन नदियों का संगम है। उस समय पृथ्वी स्वर्ग के समान हो गयी थी।आकाश में उजाले थे और जब तक भगवान वहां मौजूद थे तब तक चारों तरफ भक्ति का माहौल था। वैदिक काल में इन नदियों का नाम उदालती गंगा और मनसा देवी था। इस पवित्र संगम में स्नान करने से मनुष्य के सभी दैहिक, दैविक और भौतिक पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता के साथ जब लंका से रावण का वध कर लौटे थे तो बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र स्थित मनोरमा कुआनो संगम तट पर भगवान श्रीराम और माता सीता सहित अन्य देवताओं ने लिट्टी-चोखा खाया था। तब से यहां पर भारी संख्या मे मेले का आयोजन होता है।

कछुवाड़घाट ,बस्ती :-

महादेवा विधान सभा के कुदरहा क्षेत्र में लालगंज के पास स्थित यह घाट है जिस पर सेतु निगम द्वारा पुल बन गया है।

चन्दोखा घाट, वाल्टरगंज :- 

यह बस्ती का ऐतिहासिक घाट है।चन्दोखा  उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की बस्ती सदर तहसील और ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली एक प्रमुख ग्राम पंचायत है। यह क्षेत्र वाल्टरगंज के समीप स्थित है।

बस्ती का मूड घाट :-

मूर घाट  उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बस्ती सदर ब्लॉक में स्थित एक गाँव और प्रसिद्ध चौराहा है । यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण और शहरी क्षेत्र को जोड़ने वाला स्थल भी है। मूड का अर्थ सर होता है यह बस्ती जिले का शिर  है यानी सर है और यहां से आगे जिले का शरीर है बाजार है हृदय भाग है हाथ पैर हैं। अमरकोश के अनुसार - शरीर में गर्दन से आगे या ऊपर का वह गोलाकार भाग जिसमें आँख, कान, नाक, मुँह, आदि अंग होते हैं, और जिसके अंदर मस्तिष्क रहता है। 1857 के आजादी के आंदोलन से भी यह स्थान जुड़ा हुआ है।1857 की लड़ाई में जब नगर के गौतम राजा ने अंग्रेजों से लोहा लिया तो लगभग 150 सेनानी बंदी बना लिए गए उनके सर कलम कर दिए गए और यहां स्थित पुराने पेड़ के शाखाओ पर  लटका दिए गए तभी से इस घाट को मूड घाट के नाम से जाना जाने लगा। मूड़घाट पर बस्ती शहर आस पास के लोगों का अंतिम संस्कार भी होता है ।

दबीला घाट, बस्ती:-

यह घाट बस्ती जिले के लालगंज और नगर थाना क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। जो बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है।


गौरा घाट, बस्ती:- 

बस्ती जिले के साउघाट ब्लॉक के अंतर्गत गौरा चौराहा एक प्रमुख और व्यस्त स्थानीय क्षेत्र है। यहाँ कई आवश्यक सामुदायिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियाँ होती हैं। बस्ती-बांसी मार्ग पर स्थित होने के कारण यह क्षेत्र आवागमन और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

मंसूरनगर का घाट, सन्त कबीर नगर:- 

संत कबीर नगर का पुरैना मंसूर क्षेत्र कुवानो नदी के निकटवर्ती इलाकों से जुड़ा हुआ है। स्थानीय विकास योजनाओं के अंतर्गत नदी और घाटों तक पहुंचने के लिए संपर्क मार्गों के निर्माण का कार्य भी हुआ है।

पिण्डिया घाट, सन्त कबीर नगर:- 

पिण्डिया क्षेत्र संत कबीर नगर के धनघटा तहसील के अंतर्गत आता है।

  बनकटा घाट,संतकबीर नगर :- 

संतकबीर नगर के बनकटा घाट पक्का पुल की मांग होती रही है। 

गोरया घाट ,संतकबीर नगर :- 

नाथ नगर संतकबीर नगर में है। इसके अलावा अनेक दर्जन छोटे बड़े घाट व पुल इस नदी की शोभा में चार चांद लगाते है।


सभ्यता - संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण :-


सभ्यता और संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण शान्त तथा स्थिर स्वभाव के कारण इस नदी के तटों पर सभ्यता और संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण आज भी देखे जाते हैं। प्राचीन टीले तथा प्राचीन संस्कृतियों के प्रमाण पर्याप्त मात्रा में यहां मिलते है। 1874-76 में कनिघम के नेतृत्व में कार्लाइल ने यहां का सर्व प्रथम सर्वेक्षण किया था उसके बाद 1890 में ए.फयूहरर ने तथा बाद में बनारस लखनऊ गोरखपुर विश्वविद्यालयों के पुराविदों, भारतीय पुराततव सर्वेक्षण तथा उत्तर प्रदेश पुरातत्व संगठन  लखनऊ के विद्वानों ने समय समय पर इस क्षेत्र के धरोहरों को खोजा और संजोया है। कुछ छोटे मोटे परीक्षण के तौर पर उत्खनन भी हुए हैं। लखनऊ विश्व विद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के डा. डी. के श्रीवास्तव तथा एस के चौधरी ने कुवानें के तटीय 33 साइटों का परीक्षण किया है जिनमें सात अति प्राचीन का विषद विश्लेषण प्रस्तुत किया है। ये स्थल हैं बड़ागांव, बराण्डा बांदा, चमरहुआ घाट,  सिसवनिया देवरांव , गहिरवारे , कोडरा तथा शकरौला आदि है। यदि इनका विषद उत्खनन कराया जाय तो संतकबीर नगर के लहुरादेवा तथा गोरखपुर के धुरियापार व इमिलिया खुर्द जैसी महत्वपूर्ण जानकारिया व प्रमाण यहां मिल सकते हैं। हर्रैया तहसील का खिरनीपुर घनघटा संत कबीर नगर का मुण्डियारी बस्ती तहसील का ओरई , सुसीपार उत्तर व दक्षिण, ठोकवा, ताड़ी पचीसा,सिद्धोनी घाट,सिलहरा, गेरार या गेदार आदि भी पुरातात्विक स्थल कुवानें की शान्त व स्थिर चरित के कारण ही बच पाये हैं।

        सांस्कृतिक परंपराएं

खिरनीपुर:-

बस्ती जिले के हर्रैया तहसील का खिरनीपुर कुवानों के तट पर स्थित है जहां स्तुप का अवशेष होना बताया गया है।

चमरहुआ घाट:-

बस्ती तहसील का चमरहुआ घाट कुवानों के तट पर स्थित है जहां पूर्ववर्ती उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां ईंट के रोड़े भी पाये गये है। 

सिद्धोनी घाट:-

बस्ती/भानपुर तहसील का सिद्धोनी घाट कुवानों के तट पर स्थित है। यहां प्राचीन स्तूप पुराना नगर तथा प्राचीन ईंटे पायी गयी हैं । इसे गौतम बुद्ध के जीवन यात्रा से सम्बन्धित भी बताया जाता है। 


         प्रमुख पर्यटन स्थल 



1.राष्ट्रीय वन चेतना केंद्र, बस्ती :-

वन विहार जिला मुख्यालय से लगभग 1 किमी दूर गणेशपुर गांव के मार्ग पर कुवानों नदी के किनारे पर स्थित है। बच्चों के लिए एक आकर्षक पार्क और झील सरकार द्वारा एक पिकनिक स्थल के रूप में स्थापित की गई है। नौकायन भी इस जगह पर झील में और साथ ही कुवानों नदी में भी उपलब्ध है। आम तौर पर छुट्टियों और रविवार के दौरान सप्ताह के दूसरे दिनों की तुलना में अधिक लोग पिकनिक मानाने जाते हैं।


2.अमहट घाट ,बस्ती :- 

बस्ती शहर के दो प्रमुख घाट हैं,जो शहर के संस्कार और संस्कृति के इकलौते स्थल है। वहीं अमहट घाट पर सावन व छठ का मेला लगता है। अमहट पुल कुवानो नदी के ऊपर है।

यह शहर के बाहरी इलाके में है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इस पुल का निर्माण किया गया था।यह बस्ती को अयोध्या (58 किमी), फैजाबाद (62 किमी), लखनऊ (1 9 0 किमी) स्थित था। पुल के पास ही कुवानो नदी पर शिव मंदिर है। यह शहर के राफेल टाफ़ेल से दूर एक अच्छी जगह है। बहुत से लोग पूजा के लिए यहां आते हैं, सुबह लोग सैर के लिए आते है, व्यायाम करते हैं और विश्राम करते हैं। नगर पालिका बस्ती द्वारा नव निर्मित सरदार पटेल उद्यान इस स्थल की शोभा बढ़ा रहे हैं।

3.चंगेरवा पार्क :-

बस्ती जिले (महसो क्षेत्र) में स्थित एक स्थानीय पार्क और पर्यटन स्थल है। यह क्षेत्र के निवासियों और परिवारों के लिए एक बेहतरीन पिकनिक और घूमने की जगह है। यह सुंदर फूलों और लॉन के साथ घूमने और घूमने के लिए एक अच्छी जगह है और कुवानो नदी के किनारे स्थित है। यहां जाने से पहले हर किसी को एक बार सोचना पड़ता है। ये पार्क बस्ती शहर से लगभग 15 किमी दूर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है जहां जाना काफी दुर्लभ है। इस पार्क में पहुंचने के लिए आपको अपने निजी संसाधन का ही सहारा लेना पड़ेगा। यहां किसी भी प्रकार की कोई भी टैक्सी, ऑटो, रिक्शा या बस नहीं जाती है।

      इस पार्क की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही अर्थात धीरे-धीरे समय के साथ इस पार्क की भव्यता और सुंदरता में ह्रास हो रहा है।शांतिपूर्ण दौरे के लिए सबसे अच्छी जगह ने मन को सुकून देने वाला माहौल दिया सुंदर वास्तुकार मछलियां तालाबों में शानदार हैं। यह जगह बिल्कुल स्वर्ग उद्यान की तरह है । यह खूबसूरत जगह बस्ती और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक रत्न है। छोटे फोटो शूट और पिकनिक आउटिंग के लिए बहुत हरे और विशाल अच्छे स्थान हालांकि बाहर कोई स्टॉल नहीं हैं। 

सिसवनिया पच्चीसा :-

बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था।। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:बस्ती बसुधा पृष्ठ 84 )

बौद्धनगर सेतव्या आज का कुटियवा :- 

यह  बौद्ध स्थल बस्ती ज़िला मुख्यालय से 9 किमी पूरब निकट सोनूपार से आगे दसकोलवा पैट्रोल पंप से दक्षिण दिशा में ताड़ीपचीसा गाँव के दक्षिण पश्चिम दिशा में एक टीले के रुप में है इसे स्थानीय लोग कुटिया कहते हैं। थे स्थल कुआनों नदी दे बाएँ स्थित है। सुत्त निपात और दीघनिकाय में यह स्थल सेतव्या के नाम से उल्लिखित है जिसे प्रोफ़ेसर अंगनेलाल जी ने उत्तरप्रदेश के  बौद्ध केंद्र में वर्णित किया है। यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है। 

देवरांव स्थल:- 

इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है। साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देची गयी है।

ओरई:-

बस्ती तहसील का ओरई नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है,जो कुषाणकालीन गुप्तकालीन संरचानायें प्राप्त हुई हैं। मुख्यतः लाल पात्र परम्पराओ वाले पात्र के साथ यहां मिट्टी की गुप्तकालीन मुहरें व पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। 

बड़ागांव:-

बस्ती तहसील का बड़ागांव कुवानो तट पर स्थित है जहां लघुअश्मक कोर स्फटिक बिल्लोर क्रिस्टल मनके चकमक चर्ट आदि पुरावशेषों के साथ उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। 

बराण्डा या बांदा:-

बस्ती तहसील का बराण्डा या बांदा नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है जहां उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां मनके मुणमूर्तियां ईंट के रोड़े तथा शुंग व कुषाण से लेकर मध्यकाल तक की संरचनायें भी पायी गयी हैं। 

गहिरवारे:-

बस्ती तहसील का गहिरवारे नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है जहां उत्तरी काले चमकीले पात्र से लेकर पूर्व मध्यकालीन संरचानायें प्राप्त हुई हैं। 

कोडरा :- 

बस्ती तहसील का कोडरा गांव कुवानों के तट पर स्थित है कुवानों के तट पर स्थित है। यहां ताम्र पाषाणकालीन पूर्व उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां कारलेनियन व मनके भी प्राप्त हुए है। 

शकरौला :- 

बस्ती तहसील का शकरौला कुवानों के तट पर स्थित है । यहां प्रधानरुप से उत्तरी काले चमकीले पात्र भूरे पात्र काले व लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। 

सुसीपार उत्तर व दक्षिण :-

बस्ती तहसील का सुसीपार उत्तर व दक्षिण महुली महसो राजमार्ग के कुवानों के तट पर स्थित है। उत्तरी सूसीपार में कुषाण कालीन संरचना देखी गयी है। जबकि दक्षिण सूसीपार में उत्तरी काले चमकीले पात्र नव पाषाणकाल ताम्रपाषाणकाल तथा लघुअश्मक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। 

ठोकवा :- 

बस्ती तहसील का ठोकवा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां मुख्य रुप से लाल पात्र परम्परायें कुषाण कालीन संरचनायें मृणमुर्तियां कंगन के टुकड़े आदि प्राप्त हुए हैं। 

ताड़ी पचीसा :- 

बस्ती तहसील का ताड़ी पचीसा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां उत्तरी काले चमकीले पात्र भूरे पात्र काले व लाल पात्र परम्परायें तथा सिक्के हड्डियों के नोक आदि प्राप्त हुए हैं। 

सिलहरा :-

बस्ती तहसील का सिलहरा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां लाल पात्र चित्रित भूरे पात्र शीशा कंगन, शुंग कुषाण से मध्यकालीन संरचनायें प्राप्त हुई हैं। 

गेरार या गेदार :-

बस्ती तहसील का गेरार या गेदार कुवानों के तट पर स्थित है। यहां उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। छठी शताब्दी ई पू. से लेकर गुप्कालीन संरचनायें प्राप्त हुई है। शीशे के कंगन भी यहां प्राप्त हुए हैं। 

मुण्डियारी :-

संतकबीर नगर के घनघटा तहसील का मुण्डियारी गांव कुवानों के तट पर स्थित है जहां काले लेपित पात्र, भूरे पात्र तथा लाल पात्र परम्पराओं  के पुरावशेष व कलाकृतियां पायी गयी है। 

     धनी संस्कृतियों का यह भूक्षेत्र कुवानों नदी के शान्त चित्त स्वभाव के कारण संभव हो सका है। पानी के प्राकृति श्रोत इस नदी के गर्भ में होने के कारण संभवतः पानी की कमी इस नदी में नहीं आएगी। इसका प्राकृतिक दोहन तथा प्रदूषण रोकना अति आवश्यक है। इसमें फैक्ट्रियों के कचरे तथा गन्देपानी को तत्काल रोका जाना चाहिए। जलकुम्भी व अनावश्यक जंगली बनस्पतियों से इसे मुक्त किया जाना चाहिए।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001 उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183


Thursday, May 21, 2026

बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाए हो तो उच्च अपमान के लिए भी तैयार रहिए✍️ आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

यदि आप अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवा रहे हो तो आपको अपने आचरण में भी आमूल परिवर्तन करना पड़ सकता है। आपको हर हाल में सबसे ज्यादा सहनशील बनना होगा। संयुक्त परिवार में अपने दादा दादी माता पिता भइया भाभी बुवा मौसी आदि को जिस तरह आपने अपनाया है वैसा नई जनरेशन करना नहीं चाहेगी। आज की हमारी नई पीढ़ी हम जैसे सब कुछ आत्मसात करने वाली नहीं निकल रही है। कुछ शिक्षा में संस्कार की कमी,कुछ माता पिता द्वारा जरूरत से ज्यादा छूट और कुछ पिक्चर - सीरियल के प्रभाव ने इसे पुरानी पीढ़ी से बिल्कुल अलग ही बना कर रख दिया है। पुरानी और समझदार पीढ़ी को संयोग से अनुकूल परिवार मिल गया तो ठीक है अन्यथा उसे उच्च अपमान स्वीकारने के लिए भी तैयार रहना चाहिए़।
     सास, ससुर, बहू और बेटे का रिश्ता आपसी समझ, सम्मान और विश्वास की मजबूत नींव पर टिका होता है। यदि आपने अपने सीमित संसाधन में अपने बच्चों की परवरिश की है। उन्हें उच्च शिक्षा दिलवाकर स्वावलंबी बनवाकर कहीं दूर उनकी जीविका चलवा रहे हैं या नौकरी करा रहे हैं तो आप उनसे उच्च अपमान भोगने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उच्च शिक्षित महिलाओं और उनके सास-ससुर के बीच विचारों में भिन्नता, जीवनशैली में अंतर या अपेक्षाओं के टकराव के कारण भावनात्मक लगाव की कमी देखी जा रही है।
    आपके बच्चे आपके ना होकर आपकी बहू और उसके पति के रूप में ज्यादा परफेक्ट हैं । वे अपनी मां या मायके वालों के संपर्क में ज्यादा रहना पसंद करते हैं और उन्हीं के संस्कार और क्रिया कलापों का ज्यादा अनुकरण करते रहते हैं। उनके लिए पति के माता-पिता का कोई खास वजूद नहीं रहता है। उनकी जीविका अच्छी तरह से चल रही है और उन्हें केवल अपने पति के संपत्ति में हिस्से की जरूरत रहेगी । इसके अलावा उन्हें अपने सास-ससुर के स्वास्थ्य, सेवा अथवा देखरेख में कोई खास रुचि नहीं रहती है। सास-ससुर एक तरह से पैतृक संपत्ति की चौकीदारी करते हैं और करते रहेंगे।
     यह प्रसंग मै एक सत्य घटना पर आधारित होकर लिख रहा हूं ,जो मेरे पड़ोस में घटी है। उसी के आधार पर यह विचार व्यक्त करने का साहस मैं कर पा रहा हूं । एक दंपत्ति कभी मेरे किराएदार रहा करते थे , जो बाद में खुद का मकान भी बनवा लिए। जो मेरे किसी हैसियत से कम में नहीं है। उनके दो बेटे हैं, दोनों पढ़े-लिखे हैं और बाहर रहने लगे । उनकी शादियां हुई , उनके बाल बच्चे भी हुए। वे घर मकान भी बाहर ही बना लिए । लेकिन वे अपने मां-बाप को कोई महत्व नहीं देते। हां, जब मां - बाप ज्यादा बीमार होते या उनके पास ही चले जाते, तब अपनी फर्ज अदायगी कर देते हैं। पिता जी एयरफोर्स के अधिकारी थे । उनका एक बेटा एयरफोर्स में लगा हुआ है और दूसरा फार्मेसी का उच्च कोर्स किया हुआ है और प्रोफेसर बन गया है। उनकी बहूये भी पढ़ी-लिखी है और कहीं जॉब में है। वे अपने घर की निजी गृहस्थी को ठीक से संभाल रहे परंतु अपने माता-पिता को मान - सम्मान अथवा देखरेख करने के लिए इच्छुक नहीं है । 
     जब उनके सास-ससुर इन लोगों के पास जाते हैं तो यह तरह-तरह के फरमाइश डिमांड देते रहते हैं। आज की स्थितियां यह है कि सास मां गोरखपुर में एडमिट है और पिता लखनऊ में,जहां से पिता अपने बेटे के पास चंडीगढ़ जाने के लिए इच्छुक हैं ।
    उनके बेटों ने पूर्व में एक घरेलू नौकर भी दे दिया था पर यह बूढ़े दंपति पैसा बचाने के चक्कर में उस नौकर को अपने साथ ज्यादा समय तक नहीं रख सके और थोड़े दिन रखकर उसे मुक्त कर दिये। अब जब कोई स्वास्थ्य की समस्या आती है उनके किराएदार और पास पड़ोसी जितना हो सकता है संभालते हैं । उनकी बेटे बहूओ को अपने सास-ससुर के स्वास्थ्य से कुछ लेना-देना नहीं है। यह भी पता चला है की बहूये मनमानी करती है और सास ससुर का सम्मान नहीं करती थी इसलिए माता-पिता इनसे दूरी बनाकर अलग ही रह रहे थे।
     इस पोस्ट को लिखने का मेरा आशय यह है की यदि हमने उच्च महत्वाकांक्षा में अपने बेटे और बहू को अच्छे मुकाम पर पहुंचाये हैं तो हमें उनसे कोई आपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि उनकी प्राथमिकता में हम पहले पायदान में नहीं आते हैं । पहले पायदान में बहू के मायके और दूसरे में बहू के पति व बच्चे आते हैं । तीसरी नंबर पर रहने के कारण सास- ससुर को यह अभ्यास कर लेना चाहिए कि हम उनसे कोई आपेक्षा और उनसे कोई उम्मीद ना रखें । सास-ससुर को यह स्वीकार करना चाहिए कि समय के साथ चीजें बदलती रहती हैं। उनसे अपमान मिलने पर भी खुश रहें और कहीं से व्यक्त भी न करें। यदि ऐसा हम कर लेते हैं तो हम अपने आखिरी वक्त में थोड़ी सुकून की जिंदगी जीकर अंत में मृत्यु का वरण भी ठीक- ठाक रूप में कर सकेंगे।

लेखक :
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
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Tuesday, May 19, 2026

के.एम. मुंशी की जीवनी, साहित्यिक रचनाएँ और योगदान: ✍️डा. राधेश्याम द्विवेदी


के.एम. मुंशी भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्माता और भारतीय विद्या भवन के संस्थापक थे, जो समाज भर में साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक सुधारों के लिए जाने जाते थे।
       उन्हें के.एम. मुंशी के नाम से जाना जाता है , वह एक स्वतंत्रता सेनानी, वकील, संविधान निर्माता, शिक्षाविद, पर्यावरणविद और प्रसिद्ध गुजराती लेखक थे। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे संविधान सभा के सदस्य, केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे हैं। उन्होंने 1938 में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की थी और "घनश्याम व्यास" उपनाम से गुजराती, अंग्रेजी और हिंदी में व्यापक रूप से लेखन किया करते थे। मुंशी जी का योगदान राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, संवैधानिक वाद, साहित्य और शैक्षिक सुधार को समाहित करता है, जिससे वे आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में से एक बन गए।

     के.एम. मुंशी की जीवनी

के.एम. मुंशी का जीवन बौद्धिक प्रतिभा, राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता, साहित्यिक रचनात्मकता और संस्था निर्माण का प्रतीक था, जिसने आधुनिक भारत को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया।

प्रारंभिक जीवन और जन्म : 
कन्हैयालाल मानेकलाल मुंशी का जन्म 30 दिसंबर 1887 को ब्रिटिश शासन काल के दौरान वर्तमान गुजरात के भरूच जिले में हुआ था और वे एक पारंपरिक गुजराती परिवार से थे जो शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ था।
शिक्षा
मुंशी ने 1902 में बड़ौदा कॉलेज में दाखिला लिया और विशिष्टता के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की, उन्हें "अंबालाल सकारलाल परितोषिक" पुरस्कार मिला और बाद में 1907 में अंग्रेजी में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के लिए "एलीट पुरस्कार" से सम्मानित किया गया।
कानूनी करियर : 
1910 में मुंबई से कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद, मुंशी ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में पंजीकरण कराया और जल्द ही एक सक्षम वकील और सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पहचान हासिल की।
प्रभाव
श्री अरबिंदो, महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय, महात्मा गांधी , सरदार वल्लभभाई पटेल और भुलाभाई देसाई ने मुंशी जी के राष्ट्रवादी विचारों, संवैधानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक दर्शन को उनके पूरे सार्वजनिक जीवन में गहराई से प्रभावित किया था।
व्यक्तित्व
मुंशी जी ने एक ही समय में राजनीतिज्ञ, उपन्यासकार, पत्रकार, पर्यावरणविद्, संवैधानिक विशेषज्ञ और शिक्षाविद के रूप में काम किया, जिससे बीसवीं सदी के भारत में साहित्यिक विद्वत्ता और व्यावहारिक राजनीतिक नेतृत्व का एक दुर्लभ संयोजन तैयार हुआ।
देहावसान  :
साहित्य, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में दशकों की सेवा के बाद, के.एम. मुंशी जी का 8 फरवरी 1971 को बंबई में 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।

         संविधान निर्माण में 
     के.एम. मुंशी की भूमिका

के.एम. मुंशी ने अधिकारों, नागरिकता, सांस्कृतिक संरक्षण और लोकतांत्रिक शासन पर होने वाली बहसों को आकार देकर एक सक्रिय संवैधानिक भूमिका निभाई।

संविधान सभा की सदस्यता :
मुंशी बंबई से कांग्रेस के टिकट पर संविधान सभा के लिए चुने गए और लगभग 16 समितियों और उप-समितियों में भाग लेकर सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक बन गए।
मसौदा समिति में भूमिका :
उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता वाली मसौदा समिति में कार्य किया और लोकतांत्रिक संरचना, नागरिक स्वतंत्रता और संस्थागत सुरक्षा उपायों से संबंधित संवैधानिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मौलिक अधिकारों में योगदान :
मुंशी जी ने प्रगतिशील मौलिक अधिकारों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की और संवैधानिक प्रावधानों के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण से संबंधित गारंटियों का समर्थन किया।अल्पसंख्यक और नागरिकता पर बहस ,नागरिकता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर बहस के दौरान, मुंशी ने राष्ट्रीय एकता के लिए तर्क दिया, साथ ही संवैधानिक सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित किया जो सांस्कृतिक विविधता को स्वतंत्र भारत के व्यापक हितों के साथ संतुलित करते थे।
सांस्कृतिक और विरासत संबंधी दृष्टिकोण
के एम मुंशी ने भारत की सभ्यतागत विरासत, ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए संवैधानिक संरक्षण पर जोर दिया, जो इस बात को दर्शाता है कि उनका मानना था कि लोकतंत्र भारतीय सांस्कृतिक पहचान में निहित रहना चाहिए।

राष्ट्रीय ध्वज समिति :
अगस्त 1947 में, मुंशी ने तदर्थ ध्वज समिति में अपनी सेवाएं दीं, जिसने स्वतंत्रता और संविधान निर्माण के महत्वपूर्ण चरण के दौरान भारत के राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन को अंतिम रूप दिया।

         स्वतंत्रता-पूर्व युग में 
       के.एम. मुंशी की भूमिका
के.एम. मुंशी ने क्रांतिकारी सक्रियता, कांग्रेस की राजनीति, सत्याग्रह अभियानों और विधायी नेतृत्व के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ : 
कॉलेज के दिनों में श्री अरबिंदो से प्रभावित होकर, मुंशी शुरू में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की ओर झुके और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बम बनाने से संबंधित गतिविधियों से भी जुड़ गए।

होम रूल आंदोलन में भागीदारी
बंबई में स्थानांतरित होने के बाद, मुंशी भारतीय होम रूल आंदोलन में शामिल हो गए और 1915 में इसके सचिव बन गए, उन्होंने संवैधानिक सुधारों और अधिक भारतीय राजनीतिक स्वायत्तता का समर्थन किया।

बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन :
 1917 में, वे बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन के सचिव बने, जिससे राष्ट्रवादी राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ा और पश्चिमी भारत में कांग्रेस के नेतृत्व वाले राजनीतिक लामबंदी को मजबूती मिली।

कांग्रेस अधिवेशन और बारडोली सत्याग्रह
मुंशी ने 1920 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, जहां सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और बाद में गांधी की सलाह पर बारडोली सत्याग्रह के बाद बॉम्बे विधान सभा से इस्तीफा दे दिया।

सविनय अवज्ञा और कारावास :
 के एम मुंशी ने 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया और छह महीने के लिए जेल गए, जबकि दूसरे चरण में उनकी भागीदारी के कारण 1932 में उन्हें दो साल के लिए फिर से जेल जाना पड़ा।

कांग्रेस संसदीय नेतृत्व : 
वे 1934 में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सचिव बने और विधायी रणनीति और प्रांतों में राष्ट्रवादी राजनीतिक समन्वय में शामिल एक प्रमुख कांग्रेस आयोजक के रूप में उभरे।

बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री
1937 में पुनः निर्वाचित होने के बाद, मुंशी बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री बने और प्रशासनिक उपायों और सख्त कानून प्रवर्तन के माध्यम से बॉम्बे में सांप्रदायिक दंगों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह और अखंड हिंदुस्तान : 
1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान फिर से गिरफ्तार किए जाने के बाद, मुंशी ने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता पर आधारित "अखंड हिंदुस्तान" के विचार की पुरजोर वकालत की।

के.एम. मुंशी की साहित्यिक कृतियाँ

के.एम. मुंशी ने भारतीय सभ्यता और विरासत पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यासों, निबंधों, पत्रकारिता और सांस्कृतिक लेखन के माध्यम से गुजराती साहित्य को समृद्ध किया।

साहित्यिक पहचान : 
मुंशी ने "घनश्याम व्यास" उपनाम से लिखा और बीसवीं शताब्दी के दौरान गुजराती साहित्य में सबसे सम्मानित साहित्यिक हस्तियों में से एक बन गए।

ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा : 
नकी प्रसिद्ध पाटन त्रयी, जिसमें "पाटन-नी-प्रभूता", "गुजरात-नो-नाथ" और "राजधिराज" शामिल हैं, ने वीरता, देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव के विषयों के माध्यम से मध्यकालीन गुजरात में रुचि को पुनर्जीवित किया।

प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियाँ : 
मुंशी ने "पृथ्वीवल्लभ", "जय सोमनाथ", "तपस्विनी", "भगवान परशुराम" और आठ खंडों वाली "कृष्णावतार" जैसी प्रमुख कृतियों की रचना की, जिनमें पौराणिक कथाओं, इतिहास और दार्शनिक विषयों को प्रभावी ढंग से संयोजित किया गया है।
बहुभाषी लेखन : उन्होंने गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में व्यापक रूप से लिखा और "इंपीरियल गुजरात", "भगवद गीता और आधुनिक जीवन" और "क्रिएटिव आर्ट ऑफ लाइफ" जैसी प्रभावशाली पुस्तकें लिखीं।

पत्रकारिता और संपादकीय कार्य : 
मुंशी ने गुजराती पत्रिका "भार्गव" की स्थापना की, "यंग इंडिया" का सह-संपादन किया और 1954 में "भवन जर्नल" की स्थापना की, जिसका प्रकाशन आज भी भारतीय विद्या भवन के माध्यम से जारी है।

साहित्यिक संगठनों में नेतृत्व : 
उन्होंने गुजराती साहित्य परिषद और हिंदी साहित्य सम्मेलन दोनों के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, और पूरे भारत में क्षेत्रीय भाषाओं, साहित्यिक विकास और सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा दिया।... 

     के.एम. मुंशी का योगदान 
        और सामाजिक सुधार

राजनीति और साहित्य के अलावा, के.एम. मुंशी ने भारत में शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक पुनरुद्धार और संस्थागत विकास में भी अमूल्य योगदान दिया।

भारतीय विद्या भवन फाउंडेशन : 
मुंशी ने आधुनिक शिक्षा को भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जोड़ने के लिए 7 नवंबर 1938 को लीलावती मुंशी और हर्षिदभाई दिवातिया के साथ बॉम्बे में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की।.

शैक्षणिक संस्थान निर्माण : 
उन्होंने मूल्य आधारित और पारंपरिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भवन कॉलेज, राजहंस विद्यालय, राजहंस बालवाटिका, पंचगनी हिंदू स्कूल और मुंबादेवी संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना में मदद की।

संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं का संवर्धन : 
बॉम्बे विश्वविद्यालय के फेलो के रूप में, मुंशी ने भारतीय भाषाओं के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए काम किया और वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा दिया।

हैदराबाद और जूनागढ़ का एकीकरण :
 स्वतंत्रता के बाद, मुंशी ने 1948 में हैदराबाद के विलय तक वहां एजेंट जनरल के रूप में कार्य किया और सरदार पटेल और एन.वी. गाडगिल को जूनागढ़ को स्थिर करने में भी सहायता की।

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण : 
स्वतंत्रता के बाद मुंशी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रमुख समर्थक बन गए और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा परियोजना के बारे में आपत्ति व्यक्त करने के बावजूद उन्होंने पुनर्निर्माण के प्रयास जारी रखे।

वन महोत्सव पहल : 
1950-52 के दौरान केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री के रूप में, मुंशी ने भारत के वन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए हर जुलाई में आयोजित होने वाले राष्ट्रव्यापी वृक्षारोपण उत्सव "वन महोत्सव" की शुरुआत की।
राज्यपाल और प्रशासनिक भूमिकाएँ : 
मुंशी ने 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और उन्होंने भारतीय विधि संस्थान और आनंद स्थित कृषि संस्थान जैसे संस्थानों की अध्यक्षता भी की।

स्वतंत्र पार्टी और राजनीतिक विचारधारा : 
1959 में, मुंशी ने चक्रवर्तीराजगोपालाचारी के साथ मिलकर स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की, जिसने मुक्त बाजारों, निजी संपत्ति के अधिकारों, सीमित राज्य नियंत्रण और मजबूत लोकतांत्रिक विपक्ष का समर्थन किया।

विश्व हिंदू परिषद का गठन : 
मुंशी ने अगस्त 1964 में संदीपिनी आश्रम की बैठक की अध्यक्षता की, जिसके परिणामस्वरूप विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदू सभ्यतागत एकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA 
मोबाइल नंबर +91 9412300183



Monday, May 18, 2026

न्यायालय द्वारा दोषी पक्ष को अलटरनेट लैंड देने का औचित्य : ✍️डा. राधेश्याम द्विवेदी

मध्य प्रदेश के धार में विवादित भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष के लिए कोर्ट ने कहा है कि अगर वो चाहे तो सरकार को रिप्रेजेंटेशन दे सकते हैं और अलटरनेट लैंड देने के लिए प्रत्यावेदन दे सकते हैं। सरकार चाहे तो इस पर विचार कर सकती है। अलटरनेट लैंड के लिए वह चाहे खुद या वक्फ बोर्ड की तरफ से, चाहे मौलाना कमालुद्दीन की तरफ से अपना प्रत्यावेदन दे सकते हैं और फिर उसको सरकार चाहे तो कंसिडर कर सकता है। 

अयोध्या फैसले में मस्जिद के लिए क्या कहा गया था?

दरअसल, अयोध्‍या के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि रामललाविराजमान को देने का फैसला सुनाया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को दिया गया था।कोर्ट ने कहा था कि यह जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए ताकि वहां मस्जिद निर्माण हो सके।

अब भोजशाला मामले में भी कोर्ट की टिप्पणी को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, यहां हाईकोर्ट ने सीधे जमीन देने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि कहा है कि यदि मुस्लिम पक्ष आवेदन करता है तो सरकार उस पर विचार कर सकती है।

न्याय का संतुलन :- 
किसी अपराधी द्वारा जबरन कब्जा की गई सरकारी या निजी संपत्ति (अतिक्रमण) के मामले में न्यायालय आमतौर पर वैकल्पिक भूमि देने के बजाय दंडात्मक कार्रवाई और बेदखली को प्राथमिकता देता है। वैकल्पिक भूमि का लाभ ज्यादातर उन्हीं को मिलता है जिनके पास मूल भूमि का वैध स्वामित्व होता है। 
    राम जन्मभूमि और भोजशाला नामक दोनों मामलों में माननीय न्यायालय ने दोषी अतिक्रमण किए हुए पक्ष को वैकल्पिक भूमि देने के लिए सरकार को निर्देश दिया है। सामान्यतः ऐसा होता नहीं है। 
    इस सुविधा का लाभ पाकर ऐसे तत्व और भी अधिक मनमानी हरकत करेंगे और जबरन धार्मिक स्थलों को विखंडन और उसे पर अपना अस्तित्व जमाने का प्रयास करते रहेंगे। अमूमन चाहिए तो यह की इन्हें किसी भी प्रकार की अनुकंपा ना दिया जाए और इन्हें अपने करतूत को भुगतने के लिए दंडित किया जाए। इन पर फाइन लगाया जाए और ऐसा ना करें इसकी चेतावनी दिया जाए। इसका परिणाम आगे चलकर सामान्य कानून व्यवस्था को लागू करवाने में सहायक हो सकता है। काशी और मथुरा में भी इस प्रकार के जबरन हस्तगत किए हुए पक्ष यह सुखाधिकार मांग सकते हैं।

    यदि बिना न्यायालय के हस्तक्षेप से और आपसी समझौते से कोई विवाद हल हो तो वहां दोनों पक्ष को संतुष्ट करने के लिए अल्टरनेट लैंड एलाट करने का औचित्य समझ में आता है, लेकिन एक-एक बिंदु को बार-बार न्यायालय में घसीटना,उन पर बाधा पहुंचाना और विवाद को समाप्त ना करना,उसको दीर्घ समय तक लटकाए रखना, यह अल्टरनेट लैंड एलॉटमेंट की सुविधा के योग्य कभी नहीं हो सकते हैं । इन्हें यह सुविधा नहीं दी जानी चाहिए।
एक बार मिल चुकी कृपा पर दुबारा अनुकंपा क्यों दी जाये ?
भोजशाला के संबंध में हिंदुओं के पक्ष में फैसला आ चुका है, लेकिन इस मामले में "मुस्लिम मानसिकता" को समझना भी आवश्यक है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1937 और 1942 के बीच, जब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।धार रियासत के तत्कालीन राजा ने मुसलमानों के नमाज अदा करने के लिए घोड़े चौपाटी क्षेत्र के बख्तावर रोड पर एक मस्जिद के लिए जगह आवंटित की, जहां आज भी रहमत मस्जिद मौजूद है। राजा की इस कृपा के कारण ही इसका नाम रहमत मस्जिद रखा गया। यह मस्जिद धार रियासत के दौरान स्थापित की गई थी। इसके निर्माण के पीछे का मुख्य उद्देश्य शहर में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच उपजे विवाद के समाधान के रूप में तत्कालीन धार नरेश द्वारा मुस्लिम समुदाय को नमाज के लिए स्थान प्रदान करना था।
       जब भोजशाला के बदले मुसलमानों को पहले ही एक मस्जिद दी जा चुकी थी, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने भोजशाला पर फिर से दावा किया.और हिंदुओं को अपने मंदिर को वापस पाने के लिए अदालत में पैरवी करने पर मजबूर कर दिया। यह एक तरफा रहमत कब तक दी जाती रहेगी?
      यह तो ठीक उसी प्रकार है जैसे महात्मा गांधी ने भारत का विभाजन कर मुसलमान को पाकिस्तान देकर और कुछ परिवार को भारत में रोक कर मुसलमान को डबल फायदा दिया और भारत को दूंना नुकसान पहुंचाया । इतना ही नहीं भारत के दोनों छोर पर दो पाकिस्तान देकर भारत का अमन चैन छीन कर कांग्रेस और महात्मा गांधी दोनों ने यह कुत्सित प्रयास किया था जो 1971 की लड़ाई में थोड़ा सुधार हो पाया लेकिन उसकी जड़े अभी भी पश्चिम बंगाल में परेशानी का सबब बनी हुई है।

लेखक:
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी , एडवोकेट,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001