Thursday, February 5, 2026

साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक - अयोध्या के महाराजा मानसिंह आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृतआयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य कासृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :- 

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली 'सर' की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ "वीर" या "साहसी" होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी ।के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित 'द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया' का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड  खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब 'लंबे समय तक चलने वाली' या 'दृढ़ता से लड़ी जाने वाली' लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा 

द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :- 

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लक्षिराम जी ने निम्नलिखित छन्द पढ़ा था -

कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ ।       वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।      कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।

- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

         राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह - बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.राजा रघुबर दयाल सिंह - 

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे।वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह द्विजदेव  :- 

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे।उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों   ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।"

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

    इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

       इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा 

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

    इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

 x        x        x       x         x        x       

मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।

विरोधियों को मात दिया :- 

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा। 

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:- 

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। "मैं अब अकेला हूँ... पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए," मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :- 

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया 

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। "तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं," सेनापति ने डरते हुए कहा, "यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।"

       मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।" रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था।          राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

     जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, "महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।" मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, "वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

     इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:- 

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें "राजा-बहादुर" की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में "कायम - जंग" की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ "महाराजा " की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था। 

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :- 

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

    एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, "मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।"

     उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन :- 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार :- 

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, "युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।"

   महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :- 

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :- 

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

'द्विजदेव' साहित्यिक उपाधि :- 

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम 'द्विजदेव' है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययन परक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

1.'श्रृंगारबत्तीसी' 

2.श्रृंगारलतिका'

3. 'शृंगार चालीसी' 

4. 'अवमुक्त पंचदशी' 

5. 'मान मयंक' 

6. 'लतिका सौरभ' 

श्रृंगारलतिका :- 

'श्रृंगारलतिका' का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :- 

'श्रृंगारबत्तीसी' भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

'मान मयंक' :- 

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:- 

शृंगार चालीसी' में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है। 

लतिका सौरभ:- 

दोहा - 

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।

भाषा :- 

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था- 

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।


आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के 

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।

बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।

बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन।

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।

भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।

घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव, 

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ, 

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

  

 

Wednesday, February 4, 2026

अयोध्या के राजा दर्शन सिंह की शौर्य गाथा ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे ।लगभग दो-ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार अपना विशिष्ट स्थान बना लिए थे । इस वंश के ज्ञात राजा के पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके उत्तराधिकारी पुरन्दरराम पाठक से वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' ने कवियों के आश्रयदाता थे। द्विजदेव, जिनका वास्तविक नाम मानसिंह था, अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –

पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम

चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि

दर्शन सिंह के बारे में लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।बादसाह मनसब दियौ, देस अवध सब ठौर।श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।अरि-गन-गज पै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।तिनको लघु भूपालमनि, मानसिंह महाराज।जिन कीने लछिराम कौं,निजद्वारे कविराज।

अयोध्या के पलिया में हुआ था इनका पहला पड़ाव :- गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दरराम पाठक का विवाह अयोध्या जिले के पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था और पलिया में आकर बस गये थे। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते रहे हैं । पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम 1.ओरी उर्फ बख्तावर सिंह, 2.शिवदीन सिंह, 3 .दर्शन सिंह, 4.इच्छा सिंह  और 5.देवी प्रसाद सिंह है। इनमें से तीन ओरी सिंह दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार कर लिए थे। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी देवी करणों या अपने विस्तारवादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व संभाल ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए गायब हो गए होंगे।

 1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय ओरी पाठक प्रथम शासक :- 

अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में अपनी राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर लिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुआ। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1780-1846 ई के आसपास का रहा। उन्होंने लगभग 1795 के आसपास 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवामुक्त कराकर  नव्वाब साहब ने पहले ओरी को 8 सवारों का दफादार बनाकर अपनी अर्दली बनाया फिर नबाब की जान की सुरक्षा के परितोष में उन्हे पलिया की जागीर और सौ सवारों का अफसर बनाया। फिर अश्व सेनापति (रिसालेदार), फिर 1821 ई में राजा की उपाधि और बख्तावर सिंह टाइटिल दिया । उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया और अपने अन्य भाइयों को भी शासन- प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया।इनकी मृत्यु 1846 ई में हुई थी।

इच्छासिंह :- 

राजा दर्शनसिंह के भाई इच्छासिंह भी सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम= प्रबंधकर्ता ( सैन्य राज्यपाल)रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे।

मेहदौना की जागीर 

राजा बख्तावर सिंह को जागीर पाने का सम्मान 1837 से 1842 के बीच प्राप्त हुआ था। जब बादशाह नसीरउद्दीन हैदर का देहान्त जुलाई 1837 में हुआ और मेजर लो रेजिडेण्ट मुहम्मद अली शाह 1837 से 1842 को तख्त पर बैठाने के लिये अपने साथ दरे-दौलत पर लाये, उस समय बादशाह बेगम और मुन्नाजान एक हज़ार हथियारबन्द सिपाहियों को लेकर महल में घुस आये। मुन्नाजान ने कहा कि सलतनत हमारी है। तख्त पर बैठ कर यह हुक्म दिया कि मुहम्मद अली शाह उसका बेटा अजमदअली शाह और उसके पोते वाजिदअली का बध कर दिया जाय। राजा बख़तावर सिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से मुहम्मदअली शाह के परिवार को छिपाया था। इतने में मड़िआवँ की छावनी लखनऊ से सेना आ गई थी । मुन्नाजान और बादशाह बेगम पकड़ लिये गये और मुहम्मद अली शाह तख्त पर बैठाये गये। मुहम्मदअली शाह ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट की और नानकार, गाँव माफ़ी और जागीर देकर उन्हें मेहदौना के राजा की पदवी दी। इसी समय बख़तावर सिंह को वह तलवार दी गई जिसे कि ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली के बादशाह मुहम्मदअली शाह को उपहार में दिया था और मुहम्मदशाह से नव्वाब सफ़दरजंग ने पाया था।

दोनों भाइयों ने 1500 गांवों की जमींदारी खरीदी :- 

राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल कर लिए तब उनकी इच्छा हुई कि अब जमींदारी बढ़ानी चाहिए। दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बना लिया।उन्होंने इस दौरान अपने कुशल प्रबंधन से प्रजा को खुश रखा था। 

मेहदौना खास एक रियासत बनी :- 

यह अयोध्या जिले में एक गाँव रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से अवध के नवाबों और अयोध्या के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, जहाँ राजा बख्तावर सिंह और राजा दर्शनसिंह जैसे शासकों ने इलाका खरीदा और बाद में महाराजा मानसिंह जैसे प्रमुख हस्तियां इस क्षेत्र से जुड़ी रहीं, जो फैजाबाद के इतिहास और अयोध्या राजपरिवार के संदर्भ को दर्शाते हैं।

     यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्कीपुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है । वर्तमान समय में यह दो राजस्व गांव के रूप में जानी जाती है। 

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या  के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना मिल्कीपुर ब्लॉक के बारुन बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह क्षेत्र स्थानीय जन जीवन ,व्यापार, इतिहास और सांस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है। 

मेहदौना बारुन बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार या क्षेत्र है, यह बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या के निकट है।

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :- 

शाहगंज में बनवाई गई हवेली राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। समय के साथ यह खंडहर में बदल गई, पर लोगों के मन में राजा की धरोहर आज भी जीवित है। हवेली की दीवारों पर उकेरे गए नक्काशी और चित्र, राजा के गौरव और वीरता की गवाही देते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

     हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा की हवेली' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

दर्शन सिंह सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख बने :- 

ओरी पाठक के छोटे भाई दरसन सिंह समय लगभग (1800-1844 के दशक) में था ।अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें "बहादुर " के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए  और राजा (राजा) की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 में  वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

शिवदीन डाकू का दमन :- 

उन्हीं दिनों शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया गया और राजा को बहादुर का पद मिला। इसी तरह दोनों भाइयों की बादशाह नसीरुद्दीन के समय में उन्नति होती रही। उनकी वीरता, उनका दान, उनका न्याय और राज- विद्रोहियों (सर्कशों) का दमन संसार में प्रसिद्ध हुआ। इस अन्तिम काम के लिये उनको बादशाही से "सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर " की उपाधि मिली थी।

वैसवाड़े के नाज़िम :- 

राजा दर्शनसिंह की वीरता बखान में इतिहास का यह अंश बहुत बढ़ गया। वे 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । वैसवाड़े के तालुकदार क्या बड़े क्या छोटे सरकारी जमा देना जानते ही न थे। उनका बल बहुत बढ़ा हुआ था और उनकी गढ़ियों पर तोपें चढ़ी रहती थीं।दर्शन सिंह ने कुछ बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों के नाम परवाने जारी किये जिनमें यह लिखा था कि अपनी भलाई चाहते हो तो तुरन्त उपस्थित    होकर सरकारी जमा दाखिल करो।      

      ताल्लुकदारों ने परवाने पाकर युद्ध करने का निश्चय कर दिया। राजा दर्शनसिंह ने जब पहिले धावा मारकर मुरारमऊ की गढ़ी तोड़ी तो गढ़ी के रक्षक एक पगडण्डी के रास्ते निकल भागे। इस गढ़ी के टूटने से और ताल्लुकदारों के छक्के छूट गये। सब दर्शन सिंह के नियंत्रण में आ गया। पांच वर्षों तक वैसवाड़े के नाज़िम रहते हुए, राजा दर्शन सिंह ने अपने साहस और प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया। 

बलरामपूर को नियंत्रित किया:- 

वैसवाड़े की सफलता मिलने के बाद एक दिन राजा ने अपने सेनापतियों से कहा, "बलरामपुर की गढ़ियों पर हमला की योजना बनाओ। हमें यह साबित करना होगा कि अयोध्या की शक्ति केवल नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक है।" सेनापति ने डरते हुए उत्तर दिया, "साहब, वहां तीन हजार सिपाही हैं। यदि वे हमें घेर लें, तो...।"

    राजा ने गंभीरता से देखा और कहा, "डर और संदेह की कोई जगह नहीं है। वीरता और बुद्धिमत्ता से हर मुश्किल का समाधान है। हमारे पास धर्म और न्याय का आशीर्वाद है।"

      बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई के समय, राजा ने अपनी सेना को दिशा दी, एक-एक सिपाही की तरकीब और चालाकी से गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए।

    बलरामपुर के ताल्लुकेदार राजा दिग्विजय सिंह जी सरकारी जमा नहीं देते थे। राजा दर्शनसिंह ने सेना समेत बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी। वहां के राजा गोरखपूर को भाग गये । जो दूसरे साल नेपाल की तराई होकर अपने देश को लौटना चाहते थे कि राजा दर्शनसिंह ने समाचार पाकर एक लम्बी दौड़ लगाई और राजा के डेरे पर धावा मार दिया। राजा अपना प्राण बचा कर भागे। उस दिन आने जाने में 45 कोस की दौड़ हुई। नैपाल के हाकिम गोसाई जयकृष्ण पुरी ने सीमा पार करके नेपाल राज में प्रवेश करने के लिये दर्शनसिंह की शिकायत नैपाल- दरबार मे की। नैपाल के रेज़िडेण्ट ने लखनऊ के रेजीडेण्ट को दर्शन सिंह के इस कृत्य की शिकायत लिख भेजी। बादशाही दरबार से जवाब लिया गया और यह निर्णय हुआ कि लूट पाट में नेपाल की प्रजा की जो हानि हुई है वह राजा दर्शन सिंह से दिलवा दिया जाय। राजा साहब ने हानि का रुपया 1453/-तुरन्त अदा कर दिया और फिर अपने काम पर बहाल हो गये। बादशाह अमजद अली शाह के  अली शाह (शासन : 1842-1847) अवध के पांचवें नवाब थे, जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था।इस प्रकार 1842 में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। राजा साहब ने यहाँ तक इकरार नामा लिख दिया कि सरकारी जमा में जो कुछ बाक़ी रहेगा उसे हम दे देंगे।

अयोध्या-राज प्रासाद 1842 में :- 

इसी समय में उनको कचहरी करने के लिये अयोध्या धाम का लालबाग़ क्षेत्र दे दिया गया जहाँ अयोध्या-राज का प्रासाद लगभग 20 एकड़ बिस्तार में अब तक विद्यमान है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में हो गया।1846 में बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी।

दर्शन सिंह के कुछ प्रमुख कार्य:- 

उन्होंने हवेलियों, कुओं और सार्वजनिक बागानों घाटों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का  निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया था। 

दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:- 

धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। श्री दर्शनेश्वर नाथ महादेव राजसदन अयोध्या में शिवाला मन्दिर का निर्माण कराया। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि के प्रतीक बने।

दर्शन नगर बाजार और चार प्रवेश द्वार वाला प्राचीर का निर्माण:- 

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। राजा दर्शन सिंह के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा था।

दर्शननगर सूर्य कुंड व मंदिर का निर्माण:- 

दर्शननगर बाजार के पास राजा दर्शन सिंह का बनाया हुआ सूर्य भगवान का सुन्दर सरोवर और मंदिर दर्शनीय है। वर्तमान काल में अयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर  मेले की ब्यवस्था की देख भाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है।

जबकि सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

सरयू नदी के तट पर चारों ओर सीमेंट घाट और नागेश्वर नाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :- 

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का निर्माण कराया था। नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

अयोध्या शाकद्वीपी राजा ओरी पाठक 'बख्तावर सिंह' के पलिया और शाह गंज की दास्तान ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे । आज से लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार यहां के दफ़ादार, चौधरी , चकलेदार , रिसलदार, राजा और महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राज परिवार का आदि स्थान बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर - गोरखपुर, नन्दनगर - अमोढा -बस्ती, पलिया माफी - शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्या धाम हुआ करता है।

बिलासू से जुड़ाव :- 

चेदि नरेश धृष्टकेतु ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है।अयोध्या के शाकवंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र - विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख मिलता है। उनके पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके अगले उत्तराधिकारी पुरन्दर राम पाठक वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

मझवारीऔर नरहर से जुड़ाव :- 

मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक  गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालकों को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे। यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।

नंद नगर बस्ती से जुड़ाव :- 

शाकद्वीपीय  राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।

अयोध्या के पलिया में हुआ था पड़ाव :-

सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते थे। पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं।

पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहबगंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण की ओर तथा मिल्कीपुर से 17 किमी. उत्तर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

     ओरी पाठक राजा बख़तावर सिंह

1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय :- 

मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के समय 1722 में सहादत अली खां प्रथम (1722 से 1739 ईस्वी ) को अवध का नवाब ए वजीर नियुक्त किया गया था। इसी समय से अवध एक स्वायत्त राज्य बन गया था। अवध के नवाब शुजाउद्दौला (5 अक्टूबर 1754 से 26 जनवरी 1775) ने फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाई थी । उस समय फैजाबाद व्यापार कला व संस्कृति का केंद्र बन गया था। उनके बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में यह राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर दिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुए। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था ।

गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा रहा:- 

इस राजवंश के  महाराजा ओरी पाठक राजा बख़तावर सिंह हुये। महाराजा साहब गर्ग गोत्र के थे और इनके पूर्व पुरुष गाजीपुर के बिलासू गाँव में रहते थे। यह गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है और राजा धृष्टकेतु से मिला था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला जाता है। इसी कारण महाराजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा है। 

पूरा परिवार शासन में:- 

पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी अपने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे। 

लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' अनेक कवियों के आश्रयदाता थे। वे अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –

पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम

चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि।

पूर्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पुलिस सुरक्षाधिकारी 

ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1798-1846 के आसपास का रहा। उन्होंने 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रिसाले (अश्व सेना)में नौकरी करने लगे थे और लार्ड कार्नवलिस के साथ कई लड़ाइयों में वीरता दिखाई थी। एक बार छुट्टी लेकर लखनऊ की सैर को आये हुए थे। जब वे बेलीगारद के सामने अपने एक मित्र से बात-चीत कर रहे थे कि उधर से अवध के नव्वाब सआदत अली खाँ (जन्म 1752, शासनकाल 21 जनवरी 1798 से 11 जुलाई 1814 ) की सवारी निकली हुई थी।ओरी बहुत अच्छे डील डौल के वीर पुरुष थे। नव्वाब साहब ने उनको बहुत पसन्द किया और चोबदार से बोले कि इस जवान से कहो कि हमारी सरकार में नौकरी करे। 

     ओरी ने उत्तर दिया कि हम आपकी सेवा करने में अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं परन्तु हम अंग्रेजी सरकार के नौकर हैं। नव्वाब साहब ने तुरन्त लखनऊ के रेजिडेण्ट डेली साहब को लिखा और ओरी को 8 सवारों का दफादार बना कर अपनी अर्दली में रक्खा। दफादार का अर्थ सेना या पुलिस में एक छोटा अधिकारी होता है, जो सिपाहियों के एक समूह का नेतृत्व करता है; यह जमादार या कॉर्पोरल/सार्जेंट के बराबर का पद है, जो "समूह का धारक" या "दफा (समूह/भाग) का प्रमुख" होता है, और यह पद भारतीय सेना में एक ऐतिहासिक रैंक को दर्शाता है।

पलिया जागीर और सौ अश्वारोहियों का अश्वपति :- 

एक दिन नव्वाब साहब हवादार पर बाहर निकले थे। रास्ते में उन पर किसी ने तलवार चलाई। वह हवादार को तान में लगी। दूसरा वार फिर करना चाहता था कि वीर ओरी ने झपट कर उसको एक ऐसा हाथ मारा कि वह वहीं मर गया। इस पर नव्वाब साहब बहुत प्रसन्न हुये और ख़िलअत देकर पलिया उनकी जागीर कर दी और जमादारी का ओहदा देकर उनका सौ सवारों का अफसर बनाया। 

घुड़सवार सेना का कमांडर :- 

इसके कुछ ही दिन पीछे रिसालदार बना दिये गये।रिसालदार भारतीय और पाकिस्तानी सेना की घुड़सवार और बख्तरबंद इकाइयों में एक मध्य-स्तरीय कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी (JCO) का पद है। यह फारसी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ "रिसाला" (घुड़सवार सेना के दल या रेजिमेंट) का कमांडर या नेता होता है।उनका नाम ओरी से बदल कर बख्तावर सिंह कर दिया गया। बख्तावर का अर्थ है सौभाग्य लाने वाला, सौभाग्यशाली होता है।

राजा की उपाधि:- 

नव्वाब सआदत अली खाँ के मरने पर जब ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह हुये तो उन्हें 1821 में बख्तावर सिंह को राजा की उपाधि मिली। उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया जो किसी दूसरे को प्राप्त न था। 

बख्तावर सिंह की उपाधि :- 

इसी उपाधि के बाद उन्हें राजा बख्तावर सिंह कहा जाने लगा। बख्तावर का मतलब सौभाग्य शाली होता है। इस प्रकार उनको अच्छे भविष्य की कामना पूर्ण नाम की सौगात शासन प्रशासन से मिली।बताया गया कि राजा बख्तावर सिंह कुशल सूझबूझ के एक अच्छे प्रबंधक और वीरता से परिपूर्ण सेना नायक थे।

पलिया के प्रथम शासक :- 

इस कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह राजा पद आसीन होने का उल्लेख मिलता है। अयोध्या के वर्तमान राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के 'शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक  की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और समय समय पर उनके कार्यों में उच्चता को देखते हुए उनके ओहदे बढ़ाते गए । वर्तमान में इस गांव को 'राजा का पलिया' भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलिया माफी भी है जो ब्लाक और तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में स्थित है। 

      पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी मिल्कीपुर ब्लॉक और तहसील में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास और शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है। यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी को व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :- 

हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा की हवेली' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

       यहाँ पर कई पुराने हिन्दू मन्दिर तथा एक मस्जिद है। यहाँ स्थित महल तथा किला को अयोध्या के राजाओं ते सम्बन्धित किया जाता है। राजा दर्शन सिंह के कब्जे में आने के बाद इस स्थान का महत्त्व और बढ़ गया। 1857 ई० के विद्रोह के समय राजा मान सिंह ने यहाँ यूरोपियों का स्वागत किया था। उस समय पह जिला अजेय माना जाता था । और उसके चारों ओर मिट्टी की सुदृढ़ रक्षा प्राचीर थीं। उसके ऊपर 14 तोपों का निर्माण हुआ था। इस स्थल का पुरातात्विक सर्वेक्षण करते समय इस स्थल से मिट्टी के अनेक पात्र प्राप्त हुए हैं। एक मृदभांड पर पोस्ट फायरिंग स्क्रैच डिजाइन बना हुआ है। कुछ पत्ते फैब्रिक वाले धूसर पात्र- परम्परा के वर्तन हैं। इन्हें एन.बी.पी.डब्लू . (उत्तरी काले चमकीले पात्र) कहा जाता है। इस संस्कृति को प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल से जोड़ा जा सकता है। इस स्थान पर अन्य पात्र मध्य काल तक की आबादी के प्रमाण मिले हैं।(सन्दर्भ: फैजाबाद जनपद का पुरातत्व: विजय प्रकाश वर्मा; डी. फिल. शोध प्रबन्ध,1993 ; पृष्ठ 104-105)

      यह विशेष रूप से राजा बख्तियार सिंह और राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा स्थल है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने पलिया - मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं।यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण फैजाबाद रायबरेली रोड पर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित है। गांव के चारों तरफ हरे-भरे बाग बगीचे हैं और तालाब से घिरे हुए प्राकृतिक स्थल हैं।प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ग्राम सभा चारों तरफ से कि तालाब और बाग-बगीचे है।

प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ऐतिहासिक शिव मंदिर तथा  कि ग्रामसभा के प्रवेश द्वार मां विंध्यवासिनी का मंदिर अपने अद्भुत और  वैभवशाली झलक प्रस्तुत कर रहा है।

        यहां वर्तमान में एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र बचा हुआ है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है। इसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज की हवेली 70 बीघे में बनी हुई है जो दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी ।

उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।

भाई दर्शन सिंह को भी आगे बढ़ाया:- 

अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। दर्शनसिंह ने भी अपने कुशल सैन्य क्षमता व प्रबंधन के चलते अवध दरबार में बहादुर का पद हासिल कर लिया। नवाब नसीरउद्दीन हैदर के काल 1827 से 1837 में दोनों ही भाइयों की उन्नति होती रही।

       पलिया अयोध्या के राजा बख्तावर सिंह को अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह के शासनकाल के दौरान, लगभग 1837 से 1842 ईस्वी के बीच महदौना (मेहंदौना) की जागीर और 'राजा' की पदवी मिली थी। उन्होंने अपनी वीरता और प्रशासनिक क्षमता से इस रियासत को स्थापित किया और बाद में इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में राजा मान सिंह को सौंप दिया। 

        उस समय किसी कारण से राजा बख्तावर सिंह बादशाही में नजरबन्द हो गए थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर मान सिंह ने उन्हें भी छुड़ाया था और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये थे। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में राजा बख्तावर सिंह के जीवन काल में ही हो गया था। इधर राजा बख्तावर सिंह भी नि:संतान रहते हुए बूढ़े हो गये तो उन्होंने महाराजा मानसिंह को लखनऊ बुलाया और अपना पद, अपना राजा, उनके नाम लिख कर बादशाही सरकार में अर्ज़ी दे अपने भाई दर्शन सिंह के पुत्र राजा मान सिंह के हक में वसीयत नामा कर दिया था।उनकी अर्ज़ी मंजूर हो गई। वसीयत नामा के अनुसार उनकी मृत्यु के बाद मानसिंह को राजा के रूप में प्रतिष्ठित होना था। जब राजा बख्तावर सिंह की 1846 में मृत्यु हुई , तो मान सिंह अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन राज्य का प्रबन्ध संभाल लिए थे।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



अयोध्या शाकद्वीपी राजाओं केपूर्वजों की जीवन यात्रा ✍️ आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

वैसे अयोध्या के मुख्य राजवंश परिवार का इतिहास भगवान श्रीराम के पूर्वजों से जुड़ा माना जाता है। ऋषि कश्यप, सूर्य ,मनु, इच्छवाकु  ,रघु ,दशरथ और भगवान राम की वंश परम्परा को प्रायः हर कोई भारतवासी जनता है।

       अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं के पूर्वज मूल रूप से शाकद्वीप (ईरान/मध्य एशिया क्षेत्र) से आए थे, जो बाद में भारत के विभिन्न स्थानों में बस गए और अयोध्या में भी अपना राज्य स्थापित किए; इनके वंशज, जैसे कि राजा मान सिंह और राजा प्रताप नारायण सिंह ददुआ साहब गर्ग गोत्र के थे और उन्हें मुग़ल तथा ब्रिटिश शासकों से सम्मान व जागीरें मिलीं थीं, जिससे वे अयोध्या के महत्वपूर्ण शासक बने। और इनके पूर्वज राजा धृष्टकेतु से जुड़े बताए जाते हैं। 

      लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन की अनुमति से शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार भी यहां के राजा महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राजपरिवार का मूल स्रोत बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर - गोरखपुर, नन्दनगर - अमोढा -बस्ती, पलिया माफी - शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्याधाम से जुड़ा हुआ है। मुगलकाल , नवाबीकाल और ब्रिटिश शासन के दौरान यह राज परिवार अयोध्या के सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यों में हमेशा अग्रणी रहा। स्वतंत्रता के बाद जब रियासतें खत्म हुईं, तब भी यह परिवार सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए रखा है।

पूर्वज बिलासू गांव के निवासी :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण (मग ब्राह्मण) द्वापर युग में शाकद्वीप से भारत आए और उन्हें 18 'पुरों' (ग्रामों) में बसे थे। इनमें से एक बिनसैयापुर (बिलासू) था। यह गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील का क्षेत्र है। जो गाजीपुर शहर के करीब ही स्थित है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे चेदि वंश के राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में ब्राह्मणों को दिए हुए थे। राजा धृष्टकेतु महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाकद्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है। इसी कारण अयोध्या के शाक वंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।

सदासुख पाठक प्रथम चौधरी:- 

19 वीं शताब्दी की शुरुआत में एक श्री सदासुख पाठक को दिल्ली के बादशाह द्वारा मझवारी के चौधरी के रूप में नियुक्त किया गया था। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी प्रदान किये थे और उनको चौधरी की उपाधि देकर सम्मानित किया था।  दिल्ली सल्तनत' के द्वारा 'चौधरी' ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों , नवाबों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी" संस्कृत के 'चतुर्धारी' (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह उपाधि किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती रही है।

     शाकद्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

     मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक  गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालक को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे और यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।

नरहरपुर गोरखपुर भी पड़ाव :- 

महाराज मानसिंह के प्रपितामह संभवतः सदासुख पाठक अपना देश छोड़ कर गोरखपुर के जिले में बिडहल के पास नरहर गाँव में जाकर बस गए थे। यह ऐतिहासिक केंद्र,तहसील गोला गोरखपुर उ० प्र० के ग्राम पंचायत बरहज के राजस्व ग्राम नरहन मुस्तक़िल एवं चडीहार में  26°19' उत्तरी अक्षांश एवं 83°24' पूर्वी देशान्तर पर घाघरा नदी के बाएं तट पर स्थिति है। नरहर घाघरा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण  कालीन पुरातत्व स्थल है, जहाँ खुदाई में पांच स्तरीय संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल मुख्य रूप से कृषि-आधारित प्रारंभिक जीवन, विशिष्ट काले-लाल मिट्टी के बर्तनों और तांबे की वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है, जो दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में फला-फूला।उत्खनन से पाँच क्रमिक संस्कृतियों का पता चला है, जो लगभग 1300-1200 ईसा पूर्व (Period I) से लेकर 6ठी-7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक का प्रतिनिधित्व करती हैं । 1984-89 के बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग के प्रो० पुरुषोत्तम सिंह जी द्वारा नरहन में उत्खनन कराया गया था।उत्खनन में ताम्र पाषाणकाल 1300 ई० पु० से गुप्त काल तक की 5 संस्कृतिक कालो की जानकारी मिली है :-

1. नरहन संस्कृति (कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति) 

2. कृष्ण लोहित मृदभांड

3. उत्तरी काली चमकीली मृदभांड संस्कृति

4. शुंग-कुषाण कालीन संस्कृति

5. गुप्त कालीन संस्कृति

नरहन पुरातत्व में दो टीले थे जिसमें प्रथम टीले का दो तिहाई भाग घाघरा नदी ने बहा दिया था तथा एक तिहाई भाग में वर्तमान गांव है। इसका जमाव लगभग 1.6 मीटर है यह 1.6 मीटर जमाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अन्य कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति का औसत जमाव केवल 30-50 सेमी मोटा है। नरहर एक प्राकृतिक छटा वाला गांव है और यहां एक नदी की घाटी और पुराना किला भी है । यह हिंदू गांव है और इसके निवासी बहुत ईमानदार और शक्तिशाली होते रहे हैं। 2011 ई .में यहां की आबादी 1560 थी। यह 72.52 हेक्टेयर में फैला है।

नन्दनगर आमोढा बस्ती भी पड़ाव:- 

शाकद्वीपीय  राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। जब बंगाल के नवाब मीरकासिम अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर लाया तो उसने उक्त ब्राह्मण प्रमुख को उनके जमींदारी को हटा दिया गया । संभवतः यह सदासुख पाठक  रहा होगा। सदासुख पाठक अपने पुत्र गोपाल राम के साथ बस्ती जिले के आमोढा की नंदनगर पोस्ट बलरामपुर में बस गए। नन्दनगर चौरी बाजार मसकनवा रोड पर स्थित है। यह मखौड़ा धाम से पश्चिम छपिया गोंडा की सीमा पर का गांव है।वर्तमान समय में यह बस्ती जिले केपरशुराम पुर ब्लाक में बस्ती से 55 किमी तथा परशुराम पुर से 8 किमी की पश्चिम दूरी पर नन्द नगर गांव स्थित है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।

लछिराम के संवत् 1937 के ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ के आधार पर वंश परिचय

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में मान सिंह ' द्विजदेव' ऐसे कवि हैं, जिन्होंने किसी राजदरबार में आश्रय ग्रहण नहीं किया, वरन् वे स्वयं अनेक कवियों के आश्रयदाता थे। द्विजदेव, जिनका वास्तविक नाम मानसिंह था, अयोध्या के महाराजा थे। महाराजा मानसिंह अपने दरबार के विविध कवियों के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करते थे। वास्तव में वे एक विशाल कवि समाज के संरक्षक थे। इन्हीं के दरबार के एक प्रसिद्ध कवि लछिराम ने संवत् 1937 में ‘प्रताप रत्नाकर’ ग्रंथ की रचना करके महाराजा मानसिंह के पूर्वजों का विस्तार से परिचय दिया था। इस ग्रंथ के अनुसार द्विजदेव शाकद्वीपी ब्राह्मण थे। इनके प्रपितामह श्री गोपाल भोजपुर के निवासी थे किन्तु कालान्तर में वे शाहगंज में आकर रहने लगे थे। श्री गोपाल के पुत्र का नाम पुंरदरराम था। पुरंदरराम के चार पुत्र हुए – बख्तार सिंह, दरसन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद। बख्तार सिंह के व्यक्तित्व से लखनऊ के नवाब सआदत अली अत्यधिक प्रभावित हुए और इन्हें रेजिडेंट से पत्र-व्यवहार के कार्य के लिए अपनी सेवा में ले लिया। ये स्वभाव से अत्यंत दानी एवं धार्मिक थे। एक समय इन्होंने नवाब की प्राण रक्षा की थी। जिसके फलस्वरूप इन्हें पलिया की जागीर और सौ सवारों की अफसरी प्राप्त हुई। नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की। कुछ समय पश्चात् ये बहराइच के प्रांताध्यक्ष नियुक्त हुए तथा राजा की उपाधि से विभूषित हुए –

पाठक बिलसैया नगर, भुजपुर बासमहान।श्री गोपाल गुपाम सम, दीनै अनियम दान।सो इत आये अवध कौं, मंडन करन सुबेस।साहगंज पलियार ए, परम प्रकास प्रबेस।।प्रगट भए तिनके सुअन, सुभग पुरंदर राम।पुहुमि पुरंदर ह्वै रह्यौ, जिनकौ जस अरुनाम

चारु चारि फल से प्रगट, तिनके चंदन चारि।श्री बख्तावरसिंह नृप, कीरति जात सँवारि।

अयोध्या का पलिया गाँव मुख्य केंद्र :- 

सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे।

'ओरी' को ' बख्तावर सिंह' ‘राजा' की पदवी, और पलिया- मेंहदौना की जागीर :- 

अयोध्या राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के'शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के एक वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक  की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और सौ सवारों का अफसर बनाया था। वर्तमान में इसे राजा का पलिया भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलियामाफी है जो तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में है। पास ही में शाहगंज बाजार है और महादौना के राजाओं द्वारा यहां विशाल हवेली जीर्ण - शीर्ण अवस्था में आज भी देखा जा सकता है।

यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

      पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है. यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है।2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

शाहगंज राजवंश का कोट और महल 

अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा का किला' या 'राजा की हवेली' स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। यह खासकर राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह हैरिंग्टनगंज   विकास खंड में पड़ता है।  जो खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

        यह कोई बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है , इस वंश की स्थापना राजा दर्शन पाठक जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज हवेली जोकि 70 बीघे में दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।

शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं :- 

अयोध्या जिले के ग्राम्य अंचल में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

मेहदौना खास एक रियासत थी:- 

यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्की पुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है ।

मेहदौना गांव:- 

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या  के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण केन्द्र है। यह जिला मुख्यालय से 32 किमी पश्चिम में अवस्थित है ।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Tuesday, February 3, 2026

अयोध्या के महाराजा दर्शन सिंह के लोककल्याणकारी कार्य ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

1798 ई.मे हुआ था अयोध्या के शाक वंशीय राजवंश का उदय :- 

अवध के नवाब सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। जब राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल किए तब दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बना लिया।

महादौना (शाहगंज ) और अयोध्या (राजसदन ) से संचालित किया प्रशासन

मातृ भूमि पलिया के पास शाहगंज में बनवाई गई हवेली प्रारम्भ में राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। राजा दर्शनसिंह और उनके वंशजों ने शाहगंज में 70 एकड़ में सुदृढ़ विशाल कोट, बाजार और महल बनवाये थे।

    यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। 

              राज सदन अयोध्या 

     बाद में 1842 ई में जनता की सुविधा देखते हुए अयोध्या धाम के मध्य तत्कालीन लालबाग में कचहरी और महल बनवाया जो राज सदन के रूप में लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्मनगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा  दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 ई. में और बख्तावर सिंह का भी इंतकाल 1846 ई.में हो गया था और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी। वर्तमान समय में अयोध्या राजघराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

सुल्तानपुर और बहराइच के राजा बने :

राजा दर्शन सिंह का समय लगभग 1800- 1844 के  मध्य था। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें "बहादुर " के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए  और राजा की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 ई. में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था। उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

प्रमुख शासकीय कार्य :- 

राजा दर्शन सिंह के समय शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया। उनको बादशाही से "सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर " की उपाधि मिली थी। राजा दर्शनसिंह 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । अवध के पांचवें नवाब बादशाह अमजद अली शाह के शासन काल 1842-1847 जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे तो सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था। 1842 ई में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। उन्होंने बलरामपुर की गढ़ियों पर तरकीब व चालाकी से कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए थे।

        रामपुरवा शाहगंज शिवालय

धार्मिक-लोककल्याणकारी कार्य:- 

अयोध्या की गलियाँ और मंदिर हमेशा राजा और प्रजा की साझा आस्था का केंद्र रही हैं। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे धर्म और संस्कृति के संरक्षक भी थे। वे अपने समय में हवेलियों, कुओं, सरायों और सार्वजनिक बागानों,नदी के घाटों ,सरोवरों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का  निर्माण और जीर्णोद्धार करवाये थे । यह उनकी धार्मिक दृष्टि और समाज सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण था। लोग आज भी इन स्थलों की ओर देखते हुए अपने पूर्वजों की भक्ति, शौर्य और दूरदर्शिता को याद करते हैं। उनके द्वारा निर्मित कुछ प्रमुख लोक कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख किया जा रहा है।

        दर्शनेश्वर नाथ महादेव राज सदन।              अयोध्या का शिवाला:- 

धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल (राजसदन) और लालबाग आज भी है। बाग के दक्षिण भाग में राजा दर्शनसिंह ने एक सुन्दर शिवालय बनवाया था। इसीलिये दर्शनेश्वर का मन्दिर कहलाता है। 

यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि समाज और धर्म का प्रतीक भी है। उन्होंने अयोध्या स्थित अपने महल राजसदन के शिवाला में  शिवलिंग स्थापित करवाई थी। शिवजी की इस प्रतिमा के स्थापित करने का कारण यह रहा कि राजकार्य के वजह से राजा को प्रत्येक दिन बाहर जाना संभव नही हो पाता था अतः शिव आराधना के लिए उन्होंने महल के प्रांगण में शिवालय की पूरे विधि विधान से स्थापना करवाई थी। इस शिवाला को आज लोग ‘श्री दर्श्नेश्वर नाथ महादेव’ के नाम से पूरे अवध में जानते हैं।

      यह मंदिर केवल भगवान शिव का निवास स्थान नहीं है, बल्कि शहर के लोगों के लिए आश्रय और भक्ति का केन्द्र भी बन गया है ।अवध गजेटियर के अनुसार "अवध भर में इससे बढकर सुंदर शिवालय नही है।" यह मंदिर बढ़िया चुनार के पत्थर का बना हुआ है और बहुत सी नक्काशी का काम मिर्जापुर से बनकर यहाँ आया था। यहाँ का शिवलिंग नर्मदा नदी के पत्थर का बना हुआ है। इसका दाम उस समय 250 रुपया था। मंदिर में स्थापित संगमरमर की मूर्तियां जयपुर से लायी गयी थी। पहिले यह विचार था कि नेपाल से घंटा मंगवाकर यहाँ लटकाया जाय। परन्तु घंटा रास्ते में ही में टूट गया था। तब उसी नमूने का घंटा अयोध्या में बनवाया गया। वह भी स्थानीय कारीगर द्वारा बनाया हुआ अच्छा नमूना है। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि को बखानते हैं।यह शिवालय अत्यंत ही सिद्ध मन से पूजा जाता है यहाँ पर शिव पंचाक्षर मंत्र और शिव पंचाक्षर स्तोत्र के पाठ से बहुत लाभ होता है।

सरयू नदी का घाट और नागेश्वरनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :- 

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का पक्का निर्माण कराया था।

    उन्होंने नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

दर्शन नगर बाजार को बसाया:- 

दर्शन नगर अयोध्या ज़िले का एक कस्बा  अयोध्या से 5 किमी दक्षिण में और फैज़ाबाद से 4 किमी दूरी पर स्थित है। इसे अयोध्या के शाक द्वीपीय राजा दर्शन सिंह ने एक बाजार के रूप में बसाया था। उन्हीं के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा है। इसे राजा ने केवल व्यापारिक केंद्र के रूप में नहीं बनाया, बल्कि यह सामाजिक जीवन का हृदय भी बन गया है। बाजार में व्यापारियों के लिए शुद्ध और सुरक्षित स्थान, बच्चों के खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खुले मैदान और बुजुर्गों के बैठने के लिए छायादार जगहें बनाई गईं थीं। यह कार्य केवल शानो-शौकत दिखाने के लिए नहीं अपितु उनका उद्देश्य समाज और धर्म के कल्याण को बढ़ावा देना था।

चार प्रवेश द्वार वाले प्राचीर का निर्माण:- 

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। अयोध्या से अंबेडकरनगर जाने वाले वाहन इसी गेट से होकर गुजरते थे। वाहन की संख्या बढ़ने से प्रवेश द्वार संकरा हो गया था। इस गेट के चलते अक्सर यहां जाम लगा रहता था, जिससे यातायात बाधित होता था। चारों दिशाओं में बने गेट में से पश्चिमी गेट को पूर्व जिलाधिकारी किंजल सिंह ने यातायात की परेशानी को देखते हुए गिरवा दिया था।  पूर्वी गेट जर्जर अवस्था में ही रह गया था जिसे भी बाद में गिरवा दिया गया। अब राजा दर्शन सिंह द्वारा निर्मित एक भी द्वार नहीं बचा है।

     अयोध्या विकास प्राधिकरण द्वारा वर्तमान समय में इस नगर के लिए 4 नए प्रवेश द्वार, बाउंड्री वाल का निमार्ण,तीर्थ यात्रियों के लिए अनेक सुविधाएँ, कैटीन का निर्माण,सूर्य कुण्ड का सौन्दर्यीकरण, पार्क का निमार्ण, लाइट एण्ड साउण्ड शो का संचालन और बच्चो के खेलने की व्यवस्था की गई है।

      दर्शन नगर, अयोध्या में लगभग ₹21.9 करोड़ की लागत से रेलवे स्टेशन का विकास किया जा रहा है, जिसे राम मंदिर के मॉडल की तर्ज पर आधुनिक सुविधाओं के साथ भव्य रूप दिया जाएगा। 

      उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम द्वारा 104 करोड़ की लागत से 614 मीटर बना लम्बा ब्रिज बनकर चालू हो गया है। इससे पूर्वांचल के कई जिले के लोगों को इसका फायदा हो रहा है। शिवनगरी काशी से रामनगरी अयोध्या आने वाले पर्यटकों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है।

सूर्य /घोषार्क कुंड की कहानी :- 

पौराणिक कथाओं के अनुसार , सूर्यकुंड का निर्माण भगवान राम के भाई लक्ष्मण ने सीता को उनके वनवास के दौरान ठंडे पानी का स्रोत प्रदान करने के लिए किया था । सूर्यकुंड के चमचमाते जल में चमत्कारी उपचार गुण माने जाते हैं, जिसके कारण यह आध्यात्मिक शांति की तलाश करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक पवित्र स्थान बन गया है।

    इस कुंड के प्रसिद्ध होने और घोषार्क कुंड कहलाने की घटनाएँ काफी रोचक हैं। अयोध्या में भगवान राम के प्रकट होने के बाद, सूर्यदेव भगवान राम से मिलने गए। वे भगवान राम के बाल रूप के दर्शन करना चाहते थे।

     भगवान से मिलने के लिए उन्होंने कुछ देर प्रतीक्षा की, जिसके कारण सारा ब्रह्मांड थम सा गया। अतः भगवान राम को सूर्यदेव से शीघ्र ही मिलना पड़ा। सूर्यदेव ने अयोध्या में उसी स्थान को अपना निवास स्थान चुना जहाँ वे भगवान राम से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जिस स्थान पर वे खड़े होकर प्रतीक्षा कर रहे थे, उसे सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।

      कई वर्षों बाद, इक्ष्वाकु वंश के राजा घोष पृथ्वी और सागरों पर निर्विवाद रूप से शासन कर रहे थे। अपनी प्रतिभा के कारण वे तीनों लोकों में बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपनी बलिष्ठ भुजाओं से अनेक शत्रुओं का वध किया था। अपने शौर्य के कारण वे सूर्य के समान प्रतीत होते थे। यद्यपि राजा घोष सुंदर थे, परन्तु अपने पिछले जन्म के पाप कर्मों के कारण उनके हाथों में कृमि फैले हुए थे।

राजा घोष ने घोषार्क कुंड की खोज की:- 

एक बार राजा घोष जंगल में शिकार करने गए। वैदिक काल में राजा जंगल के कुछ हिस्सों में खूंखार जानवरों का शिकार करते थे ताकि जंगल में रहने वाले और तपस्या करने ऋषियों की रक्षा हो सके। शिकार के कारण राजा थक गए थे और उनका शरीर कमजोर हो गया था। ऊपर से वे बिल्कुल अकेले थे। अचानक उन्होंने एक छोटी झील देखी जिसमें ऋषि स्नान कर रहे थे और अपने धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे।

     अब राहत पाकर राजा ने आचमन किया और विधिपूर्वक झील में स्नान किया। स्नान समाप्त होते ही राजा का शरीर रोगों से मुक्त होकर दिव्य अवस्था में पहुँच गया। प्रसन्नता के कारण उनका मन अशुद्धियों से मुक्त हो गया।

वहां उपस्थित ऋषियों से यह जानने के बाद कि यह सूर्यदेव को समर्पित तीर्थ है, उन्होंने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना की।

     राजा घोष की विनम्र प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर सूर्यदेव उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान प्रदान किया। राजा ने इच्छा व्यक्त की कि वहाँ सूर्यदेव की एक प्रतिमा स्थापित की जाए, जिसका नाम राजा के नाम पर रखा जाए। सूर्यदेव ने वरदान देते हुए कहा, "हे मनुष्यों के स्वामी, ऐसा ही हो। आपकी इच्छा अत्यंत मनभावन है। जो मनुष्य आपके द्वारा रचित और पाठ की गई इस प्रार्थना को पढ़ेंगे, मैं उनसे प्रसन्न होऊंगा। हे राजा! मैं उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करूँगा। यह पवित्र स्थान आपके नाम से संसार में अत्यंत प्रसिद्ध होगा। जो यहाँ स्नान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। यहां स्नान करना सदा मेरे भक्त का कर्तव्य है। वह जो चाहेग प्राप्त होगा।"

       इतना कहकर सूर्यदेव अंतर्धान हो गए। तब से इस तीर्थ को घोषार्क कुंड के नाम से जाना जाने लगा। समय बीतने के साथ-साथ यह सूर्य कुंड के नाम से लोकप्रिय हो गया।

     एक छोटी झील होने के कारण, राजा ने इसकी खुदाई करवाई थी। खुदाई के दौरान, सूर्यदेव की एक छोटी मूर्ति मिली थी। इस मूर्ति को घोष कुंड के किनारे स्थापित किया गया और आज भी इसकी पूजा की जाती है।

घोषार्क /सूर्य कुंड व मंदिर :- 

अयोध्या का प्राचीन सूर्य कुंड व मंदिर को ‘घोषार्क तीर्थ’ है। इसका उल्लेख डच इतिहासकार हंस बेकर की पुस्तक 'अयोध्या', 'स्कन्द पुराण' और रुद्रयामल में मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार यह तीर्थ स्थल सभी पापों को नाश करने वाला है। सूर्य मंदिर तथा कुंड स्नान के लिए आदि काल से ही प्रसिद्ध रहा है।

घोषार्क कुंडा की महिमा :- 

स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य में कहा गया है कि घोषार्क कुंड में स्नान करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। राजा घोष द्वारा अर्पित प्रार्थनाओं का पाठ करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनो- कामनाएं पूर्ण होती हैं।

    यदि कोई बीमार व्यक्ति, दरिद्र व्यक्ति और दुख में जी रहा व्यक्ति निर्धारित विधि से कुंड में पवित्र स्नान करे तो उसकी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। घोषार्क कुंड में स्नान करने से भक्त को यश प्राप्त होता है और सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है। इसी प्रकार, सूर्यदेव की श्रद्धापूर्वक पूजा करना और अशुद्धियों से मुक्त होकर कुंड में स्नान करना भी निष्कलंक प्रतिष्ठा प्रदान करता है। इससे भी सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है।विशेष रूप से रविवार को किया जाने वाला पवित्र स्नान उत्तम फल प्रदान करता है। भाद्रपद या माघ माह के शुक्ल पक्ष के छठे दिन उचित विधि से किया गया पवित्र स्नान सूर्यलोक में निवास प्रदान करता है। 

     डच इतिहासकार हंस बेकर के अनुसार उस स्थान पर पौष महीने के मकर संक्रांति के दिन सूर्य कुंड मंदिर में पूजा स्नान करने की बड़ी महत्ता बताई गई है। उस दिन लोगों की वहाँ बहुत भीड़ उमड़ती है, तथा लोग वहाँ प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर में स्नान कर तथा सूर्य उपासना कर बड़े पुण्य के भागी बनते हैं।

       स्कन्द पुराण तथा रुद्रयामल की कथाओं के अनुसार सूर्य कुंड में स्नान करने से कुष्ठ और चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। सूर्यकुंड में स्नान, दर्शन और पूजन का विधान शायद इसी सोच से समाज में बलवती हुई है।

     वेदों में भगवान सूर्य को जड़-चेतन जगत की आत्मा कहा गया है. सूर्यवंशी राजा घोष का कुष्ठरोग इस कुंड में स्नान करने से ठीक हुआ था। मान्यता है कि इस सूर्य कुंड में स्नान और सूर्य मंदिर में दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण अपने अराध्य देव सूर्य की पूजा के लिए आदिकाल से जाने जाते रहे हैं। अयोध्या के शाकद्वीपीय ब्राह्मण राजा दर्शन  सिंह भी अपने अराध्य देव सूर्य की आराधना करने के लिए इस प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर का जीर्णोद्धार करवाए थे।

       अनुश्रुतियों में यह भी कहा गया है कि एक बार राजा दर्शन सिंह शिकार करने के लिए उस क्षेत्र में घूम रहे थे, तो उन्हें जोड़ो की प्यास लगी। उनके सेवक ने जब जल को ढूंढा तो उसे थोड़ी दूर पर एक कुंड मिला। उस कुंड का जल बड़ा निर्मल था। सेवक ने उसी कुंड का जल लाकर अपने राजा को प्यास बुझाने के लिए दिया।

     राजा ने उस जल का पान किया तथा उसके कुष्ठ भाग को अपने शरीर पर हुए चर्म रोग पर रगडा। थोड़े ही देर में उनके शरीर पर हुवे चर्म रोग जैसे ठीक हो गया। राजा को लगा उस स्थान पर मानो कोई दैविक शक्ति है। अतः उन्होंने सात दिनों तक वहाँ तपस्या की। सातवें दिन राजा को एक आकाशवाणी सुनाई पड़ी जिसके आज्ञा के अनुसार उन्होंने वहाँ उस स्थान पर खुदाई भी करवाई।

     खुदाई में राजा को सात घोड़ों पर सवार एक सूर्यदेव की मूर्ति, शिवलिंग तथा ढेरो खजाना प्राप्त हुआ था। राजा ने उस खजाने से वहाँ एक विशाल सूर्यकुंड तथा सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया।

     महाराजा द्वारा पुनः निर्मित सूर्यकुंड ना केवल जल प्रबंधन के लिए था, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों को और सुनियोजित ढंग से आकर्षित करने का माध्यम भी बन गया। लोगों ने इसे "जीवनदायिनी धारा" कहकर सम्मान दिया। यह जल संरक्षण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए निर्मित किया गया है। 

       प्राचीन काल से निभाई जा रही यह परंपरा उतनी ही आस्था और निष्ठा के साथ अयोध्या के राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार किये गए तथा निर्मित सूर्यकुंड में भी उस काल में मनाई जाती रही। उसका निर्वहन आज भी ठीक वैसा ही किया जाता है।

वार्षिक मेला:- 

इस स्थान पर हर वर्ष मेले का आयोजन भी किया जाता है। जिसका प्रबंधन राजा दर्शन सिंह के वंशज आज भी करते हैं। सूर्य मंदिर का रखरखाव अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी प्रबंधन द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में सूर्य देव की प्रतिमा के अतिरिक्त उनके चरणों में दोनों ओर सूर्य पुत्र और पुत्री शनि देव और यमुना देवी की अष्टधातु की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। सूर्य कुंड की खोदाई से प्राप्त एक और सूर्य की प्रतिमा को भी वहीं स्थापित किया गया है। गर्भगृह में राम-जानकी,शिव-पार्वती, गणेश- कार्तिकेय, हनुमान जी तथा शालिग्राम के विग्रह भी स्थापित किए गए हैं।

    वर्तमान काल मेंअयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर  मेले की ब्यवस्था की देखभाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है। सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

लाइट एंड साउंड शो का आयोजन

प्रतिदिन शाम के समय इस कुंड में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन भी किया जाता है. जिसमें सूर्यवंश की महिमा और सूर्य मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है। आधे आधे घंटे के दो शो आयोजित होते हैं ।प्रतिदिन शाम 7:30 बजे और 8:30 बजे ये शो शुरू होते हैं। जिसका प्रवेश टिकट: रु. 30 प्रति व्यक्ति है। उम्मीद की जा रही है कि जो राम भक्त अयोध्या श्री राम के दर्शनों के लिए आएंगे, वह इस पौराणिक सूर्यकुंड के दर्शन भी करने आएंगे। सरकार चाहती है कि अयोध्या में धार्मिक पर्यटन बढ़े और यहां आने वाले श्रद्धालु कम से कम दो-तीन दिन रुक कर पौराणिक स्थलों के दर्शन भी करें। इससे क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी. जिससे क्षेत्र के विकास को भी गति मिलेगी। यह भी कहा जाता है कि जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था, तब सभी सभी देवी-देवता अयोध्या आए थे। इनमें सूर्य देव भी शामिल थे. वह इसी स्थान पर रुके थे, जिसे आज सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।यह सुबह आठ बजे से रात 10 बजे तक यह स्थान दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)