Friday, March 13, 2026

श्री घनश्याम दूबे, दुबौली दूबे के यजमानत्व में तुलादान एवं श्री सत्यनारायण व्रत कथा


श्री घन श्याम दूबे जी ग्राम दुबौली दूबे के पावन यजमानत्व औरआचार्य अर्जुन त्रिपाठी जी के पावन सानिध्य में धर्ममय वातावरण के बीच तुलादान एवं श्री सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन दिनांक 12 मार्च 2026 को सम्पन्न हुआ।
यह समस्त अनुष्ठान वैदिक विधि-विधान से आचार्य अर्जुन त्रिपाठी जी द्वारा संपन्न कराया गया। पूजन के पूर्व भगवान श्रीविष्णु, श्रीगणेश एवं नवग्रहों का आवाहन कर श्रद्धा-भक्ति के साथ सत्यनारायण भगवान की कथा का श्रवण कराया गया, जिससे उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और दान की महिमा का पावन संदेश प्राप्त हुआ।
      शास्त्रों में तुलादान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है—
“तुलादानं महादानं सर्वपापप्रणाशनम्।
आयुरारोग्यसम्पत्तिं ददाति हरितोषणम्॥”
अर्थात् तुलादान महान दान है, जो समस्त पापों का नाश करता है तथा आयु, आरोग्य और समृद्धि प्रदान करते हुए भगवान विष्णु को प्रसन्न करता है।
   आचार्य अर्जुन त्रिपाठी जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि दान, व्रत और कथा श्रवण से मनुष्य का जीवन पवित्र बनता है तथा भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है। इस पावन अवसर पर ग्रामवासी एवं श्रद्धालुजन उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करते हुए यजमान परिवार को मंगल कामनाएँ और आशीर्वाद प्रदान किए। 
इस लिंक से इस पूजन का विजुवल को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

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श्रेष्ठ दान तुला दान
यह 16 महादानों में से एक है, जो पापों के नाश, आरोग्य और सुख- समृद्धि के लिए किया जाता है। तुला दान एक ऐसी दान-प्रथा है जिसमें व्यक्ति अपने वजन के बराबर कोई वस्तु (जैसे सोना, चांदी, अनाज, या अन्य सामग्री) दान करता है. यह एक प्राचीन हिंदू अनुष्ठान है जो धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है. तुला दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
   तुला दान एक प्राचीन हिंदू महादान प्रथा है, जिसमें व्यक्ति अपने शरीर के वजन के बराबर अनाज, गुड़, घी, चीनी या अन्य पवित्र वस्तुओं को तराजू (तुला) में तौलकर जरूरतमंदों, ब्राह्मणों या गौशाला में दान करता है।यह अनुष्ठान आध्यात्मिक प्रगति और दरिद्रता के निवारण का अंतिम उपाय माना जाता है। 
यह शारीरिक स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ग्रह दोष निवारण और पापों के नाश के लिए शुक्ल पक्ष में रविवार को किया जाता है।
     कलिकाल में तुलादान के समान कोई दान नहीं है शास्त्रों में सोलह महादानों में पहला महादान तुलादान बताया है। पौराणिक काल में सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने तुलादान किया था। आधि-व्याधि, ग्रह-पीड़ा व दरिद्रता के निवारण के लिए तुलादान बहुत श्रेष्ठ माना जाता है।
     तुलादान सनातन परंपरा का अत्यंत पुण्यदायी दान माना गया है। इसमें यजमान अपने शरीर के भार के बराबर अन्न, फल, गुड़, वस्त्र या अन्य द्रव्यों का दान करता है। शास्त्रों में कहा गया है कि तुलादान करने से मनुष्य के पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है।
सामग्री:
तुला दान में व्यक्ति अपने शरीर के वजन के बराबर सामग्री का दान करता है।रत्न, चांदी, लोहा आदि धातु, घी, लवण (नमक), गुड़, चीनी, चंदन, कुमकुम, वस्त्र, सुगंधित द्रव्य, कपूर, फल व विभिन्न अन्नों से तुलादान किया जाता है। मुख्य रूप से अनाज (गेहूं, चावल, सात प्रकार के अन्न), गुड़, चावल, घी, तिल, चीनी, वस्त्र, फल, धातुएं (तांबा, लोहा या सोना-चांदी) शामिल हैं। 
समय व स्थान: 
पवित्र नदी के तट, मंदिर, या गौशाला परिसर में यह किया जाता है। माघ मास, पितृपक्ष या विशेष पर्वों पर यह अत्यंत फलदायी माना जाता है।
प्रक्रिया
सबसे पहले तुला (तराजू) का पूजन किया जाता है, फिर एक तरफ व्यक्ति और दूसरी तरफ वस्तुओं को रखकर तोला जाता है।
लाभ: मान्यताओं के अनुसार, इससे स्वास्थ्य में सुधार होता है, अकाल मृत्यु का खतरा टलता है, और नवग्रह दोष दूर होते हैं। 

किस किस का दान किया जाता है :- 

गोमाता के लिए - 
अपने वजन के बराबर सामग्री तोलकर गोमाता को दान करने से सबसे अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है, क्योंकि गो को दिया गया दान ही सर्वश्रेष्ठ है। दान लेने की सबसे बड़ी और प्रथम अधिकारी गोमाता है। इसलिए हमको वर्ष में कम से कम एक बार तुला दान अवश्य करना चाहिए।
गुड़ का दान- 
गुड़ का दान करने से पितरों को विशेष संतुष्टि प्राप्त होती है, इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है,साथ ही,घर में सुख शांति बनी रहती है, ऐसी मान्यता है कि गुड़ का दान करने से घर का क्लेश भी दूर हो जाता है।
नमक का दान- 
शिवपुराण के अनुसार नमक का दान करने से बुरा समय दूर होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
चोकर आटा, अन्न का दान- 
चोकर आटा, अन्न दान बहुत शुभ माना जाता है, इससे घर में सुख-समृद्धि होती है।
खली का दान- 
खली का दान करने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो सकता है। आपको बीमारी से छुटकारा मिल सकता है।
तेल का दान - 
तेल का दान करने से व्यक्ति के रुके हुए कार्य जल्द बनने लग जाते हैं।
घी का दान- 
घी का दान करते हैं, उनकी शारीरिक कमजोरियां दूर होती हैं और बीमारियों से मुक्ति मिलती है। दाता की उम्र बढ़ती है। इस लिंक से इस तुला दान का विजुवल को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
https://www.facebook.com/reel/1259574279457001/



“उपाध्याय इस्टेट” के चंद्रिका प्रसाद का युग ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


चन्द्रिका प्रसाद वंश के प्रतिष्ठित व्यक्ति

पोखरनी के लाल रूपेन्द्र नारायण के उत्तराधिकारी लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह थे। ये कुश्ती के बड़े शौकीन थे।  इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय जी थे। लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण और चंद्रिका प्रसाद दोनों पहलवान थे और प्रायः दोनों में कुश्तियां होती रहती है। 

    महराज राम की पहली पत्नी का निधन होने के बाद उन्होंने 1903 में दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा में किया था, जिनसे 1908 में चंद्रिका प्रसाद जी का जन्म हुआ था। चन्द्रिका प्रसाद इस वंश के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे जो एक अच्छे पहलवान थे लेकिन अपने भाइयों की इज्जत भरत और राम की तरह करते थे। बस्ती के हर नामी पहलवान चन्द्रिका प्रसाद को अवश्य जानते थे। जिले के सबसे तगड़े पहलवान बन्धू पांडे और टिकोरी पाडे से चन्द्रिका प्रसाद का खूब बैठती थी । पुलिस दरोगा से भी इनकी बैठती थी। ये पोखरनी राज घराने से काफी समादृत थे। राजा भूपेन्द्र नारायण इनके समकालीन थे। इसलिये राजा के यहाँ इनकी बैठक चलती रहती थी।     

    एक बार रमवापुर के अवधू पाठक पहलवान पंचमी के दिन राजा पोखरनी के यहां आये। गायन चल रहा था। अवधू पहलवान 6 फुट के तगडे जवान थे। उनकी बड़ी-बड़ी काली-काली मूछें पृथ्वीराज और राणाप्रताप की मूछों के समान थी। राजा साहब के अपने बैठके  में आल्हा सुन रहे थे। पास में पुददुन पहलवान, जो क्षेत्र के सबसे तगड़े पहलवान थे , बैठे हुए थे। अवधू पाठक ने कहा पहलवान आज पंचमी है। हम आप जरा दरबार में कुछ देर अपनी अपनी कुस्ती का कौशल दिखा दे। इस समय अवधू की अवस्था 30 वर्ष और पुदुन की अवस्था 50 थी । वे जवार के नये पहलवानो के उस्ताद थे।

    राजा भूपेन्द्र नारायण अवधू पहलवान की बात सुन रहे थे। वे पुदुन से बोले-  “क्या बात है पहलवान ?” पुदुन कुछ बोलने में देर किये तब तक चन्द्रिका प्रसाद जी कहा, “पाठक जी ! उस्ताद को जाने दें। आज हम आप कुछ दिखा दें।” राजा साहब बोल उठे, “उपाध्याय ठीक कह रहे हैं। जवान से जवान की कलाकारी अच्छी होगी।”

     फिर क्या था चार बजे का समय था। कुछ देर बाद आल्हा बन्द हो गया। अवधू पाठक बिगड़े भैंसे के समान लंगोट पहनकर आ गये और बोले, “चन्द्रिका बाबु आओ, आज खुलकर जोड़ हो जाय।” चन्द्रिका प्रसाद कम तगड़े नहीं थे जैसे के अखाडे में आये जवार के लोगों ने करतल बजाकर स्वागत किया। दोनों का हाथ मिलाना राजा जनक के धनुष के समान किसी ने देखा ही नहीं कि चन्द्रिका प्रसाद कब अवधू के सीने पर चित करके बैठ गये। राजा साहब ने चन्द्रिका प्रसाद को । कुर्ता और साफा भेंट किया ।

   महाराजराम की दूसरी पत्नी के इकलौते पुत्र चन्द्रिका प्रसाद का पालन पोषण एक राजपुत्र के समान हुआ था। यद्यपि केदार नाथ पहली माँ के चार पुत्रों के साथ महाराजराम के कम प्यारे नहीं थे किन्तु उनकी पत्नी अपने सभी पुत्रों का सम्मान करती थी। जिस समय चन्द्रिका प्रसाद का जन्म हुआ उस समय उनके भाई परमेश्वर नाथ के रामबरन व रामसुन्दर भी पैदा हो चुके थे । सासु की पुत्रवधूये उनका सम्मान करती थी। महाराजराम के आराम तलब होने के कारण परिवार के किसी की बच्चे की पढ़ाई उचित रूप से नहीं हो पाई थी। धीरे-धीरे एक बड़ा परिवार घर पर रहने लगा था, जिसके जीने का आधार खेती और जमीनदारी की वसूली ही थी।    

      केदारनाथ के समय में खेती का कार्य बहुत व्यवस्थित था। उपाध्याय वंश की तीनों पट्टी अपनी समृद्ध खेती से खुशहाल थी। केदारनाथ के नेतृत्व में चालीस परिवार के लोग सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में पल रहे थे। चन्द्रिका प्रसाद बाहरी कार्यों की देखरेख के अगुवा थे। वे प्रान्तीय रक्षा दल के मेम्बर भी थे। किसी पुलिस से कम नहीं थे। अपने समय में वे दस नये जवानों को अखाड़े में जोड़ कराते थे। उनके साथियों में रामरत्न पाण्डेय, रामबरन चौबे भरोश सिंह ,यमुना सिंह, पटेश्वरी सिंह, बंधू पाण्डेय, टिकोरी पाण्डेय, पं. श्याम सुन्दर प्रमुख थे। ये 1942 से कांग्रेस के मेम्बर थे और कृपाशंकर श्रीवास्तव, रामशंकर श्रीवास्तव, केशवदेव मालवीय के विधान सभा और लोक सभा के चुनावों में खूब भाग लेते थे।

फाग जुगीड़ा के दौरान साड़ को कब्जे में किया

सन् 1950 का वर्ष और फागुन का महीना था। फाग गाने वाले घूम-घूमकर गाँव के कोने-कोने में अपना आनन्द मना रहे थे। चन्द्रिका प्रसाद जी ढोल बजाने में बड़े प्रवीण थे। वे फाग जोगीड़ा और आल्हा की ढोल बहुत अच्छे ढंग से बजाते थे। एक बार राम मिलन उपाध्याय हथिया वाले जो ढोल के उस्ताद थे, सायंकाल आये हुए थे। उस दिन फाग और जोगीड़ा होना था। ढोल बजाने के लिये चन्द्रिकाप्रसाद तैयारी कर रहे थे। यह तय हुआ कि राम मिलन  जोगीड़ा और चन्द्रिका प्रसाद फाग की ढोल बजायेंगे। दोनों उस्तादों ने कार्यक्रम के संचालन का ठीका लिया। रामरत्न बाबा, भैया काका, ओरी खवास, देवकी नन्दन बाबा, बडडर बाबा, मगरु तेली की गोल फाग गाने आई हुई थी। चन्द्रिका प्रसाद ने तीन घण्टे तक फाग का गायन सम्पन्न किया। काका नम्बरदार, भगवती बाबा सिपाही आदि फाग गायन सुन रहे थे।  उस दिन बाबू जंगबहादुर उपाध्याय, बाबू राधेश्याम उपाध्याय, सत्यनारायण के खलिहान में सरसों कांट कर रक्खी थी। वे उसकी रखवाली कर रहे थे। गाँव का और खड़ौवा खुर्द के लगभग डेढ़ सौ लोगों का जमावड़ा था।

       एक बिगड़ा साँड़ अक्सर लोगों को पीछाकर मार देता था कई लोग उसकी चोट से घायल हो चुके थे। रामनरेश जी का उसने पीछा किया वे दौड़ते चिल्लाते गाँव में पहुँचे। साड़ का पीछा किये। फाग गाने वाले लोगों ने साड़ को घेर लिया था। साड़ जैसे गली में घुसा तैसे चन्द्रिका प्रसाद जी ने पीछे से दौड़ कर उसका दोनों पिछला पैर पकड़ लिया। साड़ बहुत तगड़ा था वह बार-बार छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। बाबू जगबहादुर जी ने कहा कि इसे आगे से सींघ में रस्सी लगाकर बाँध लिया जाय और इसे कब्जे में कर लिया जाय। दूर से तमाम लोग तौर तरीके बता रहे थे लेकिन साड़ के पास कोई नहीं जाना चाहता था। साड़ आगे बढ़ना चाहता था। चन्द्रिका प्रसाद ऐसा पकड़े थे कि उसके मुँह से फेन निकलने लगा। बाबू जंगबहादुर जी आगे से रस्सी लिये जैसे बाधना चाहे, साड़ उग्र रूप में हो गया। उन्होंने दोनों सींघ पकड़ा और गर्दन को ऐसा ऐठा कि वह जमीन पर गिर पड़ा। दोनों लोगों ने साड़ को काबू में कर लिया। किशोर अहिर और वंशू चौहान ने तुरन्त उसे सूजे से नाथ दिया और रामबरन और राम आसरे रमेश्वर कहांर की मदद से गर्दन और आगे से पाव में रस्सी लगा दिया। काबू में करके रातो-रात उसे मनवर नदी पार कराकर डारीडीह के सीवान में छोड़ दिया। सारे गाँव के लोग बहुत खुश हुये। चन्द्रिका प्रसाद जी इसी तरह से गाँव जवार के तमाम लोगों की मदद करते थे।

विकास और शान्ति के लिए प्रयासरत

पुलिस दरोगा से भी मिल कर गाँव के विकास और शान्ति व्यवस्था के प्रति जागरुक रहते थे। खेतों की कटाई, निराई, गुड़ाई के लिये मजदूरों आदि की व्यवस्था इन्हीं के ऊपर रहती थी। अपने भाइयों में सबसे छोटे थे। इसलिये केदारनाथ आदि इन्हें बहुत मानते थे।

-(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत “इतिवृत्त कथा” पृष्ठ 74,75 एवं 76)

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



Thursday, March 12, 2026

"उपाध्याय इस्टेट” नगर बाजार बस्ती का विकासशील केदारनाथ का समय ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

               प्रतीकात्मक चित्र

बस्ती जिले के नगर बाजार स्थित उपाध्याय इस्टेट के संपूर्ण विकास क्रम को तीन काल खण्डों में बांटा गया है- 


1.प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड 

2.प्राचीन विकासशील कालखण्ड 

3. वर्तमान विस्तारवादी काल खण्ड 

साधु और गृहस्थ के जीवन में अंतर ~

संसार में हर व्यक्ति को, चाहे वह गृहस्थ हो या त्यागी, उसे बाहर की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है ,संघर्ष करना पड़ता है और अपने आप को सम्भालकर चलना पड़ता है। यह हम लोगों की वास्तविक परिस्थिति हुई । चाहे गृहस्थ हो या साधु, दोनों के लिए परिस्थिति समान है। दोनों के जीवन में कौन सी चीज का अंतर है? 

सकामता और निष्कामता - 

 दोनों के जीवन में केवल एक ही वस्तु का अंतर रहता है - सकामता और निष्कामता। स्वार्थ की भावना और निःस्वार्थ कीभावना। गृहस्थ संग्रहकर्ता होता है जबकि त्यागी दानकर्ता। गृहस्थ को बटोरना अच्छा लगता है, क्योंकि बटोरने से संपन्नता का आभास होता है, भले ही वह मिथ्या आभास हो। साधु संग्रहवृत्ति का त्याग कर चुका है। उसका देने का स्वभाव होता है। अगर बटोरता भी है, तो देने के लिए ही बटोरता है। उपाध्याय इस्टेट के केदार नाथ में यही भाव था। वे परिवार समाज के बंधन में होकर बटोरते तो थे, परन्तु अपना सब कुछ दूसरों पर न्योछावर भी कर देते थे।

गृहस्थ में ही योगवृत्ति - 

दोनों की परिस्थितियां एक जैसी हैं, केवल मानसिकता और दृष्टिकोण अलग हो जाता है। एक की मानसिकता भोग वृत्ति द्वारा प्रभावित और निर्देशित होती है, दूसरे की योग वृत्ति द्वारा। जब गृहस्थ में भोगवृत्ति प्रबल होती है, तब वह संसारी कहलाता है।जब गृहस्थ में ही योगवृत्ति प्रबल होती है, तब वह सद्गृहस्थ या साधु पुरुष कहलाता है। जिस साधु में भोग की वृत्ति प्रबल हो गई, वह ढोंगी कहलाता है। जिस साधु में योग की वृत्ति प्रबल हो गई वह संत कहलाता है। 

ईश्वराभिमुख मानव - 

आध्यात्मिकता के आने से मनुष्य ईश्वराभिमुख होता है और अपने जीवन में ईश्वर के अस्तित्व को "सत्यम्-शिवम्- सुंदरम्" के रूप में जानने लगता है। आध्यात्मिक वृत्ति का प्रयोजन जीवन में शांति और शक्ति प्रदान करना है, अपने आराध्य के साथ एक अटूट संबंध को स्थापित करना है। गृहस्थ के लिए भी शांति,शक्ति और संबंध उतने ही आवश्यक हैं, जितने एक साधु के लिए। हम सब शांति, शक्ति और संबंध को स्थापित करने के लिए काम करते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके घर में शांति, सुख, आराम और सुविधा रहे। हर व्यक्ति चाहता है कि उसमें अपने सभी दायित्वों का निर्वाह करने और अपने आप को समाज में प्रतिष्ठित करने का सामर्थ्य, शक्ति, प्रतिभा और कार्यक्षमता हो। हर व्यक्ति एक संबंध को स्थापित करना चाहता है, जिसके द्वारा उसकी पहचान बढ़े। लेकिन साधु का दृष्टिकोण इन तीन चीजों को संसार से जोड़ने के बजाए ईश्वर से जोड़ने का होता है। वह ईश्वर से संबंध जोड़ता है, ईश्वर से शक्ति प्राप्त करता है और शांति उसे ईश्वर के समीप ले जाती है। 

             प्रतीकात्मक चित्र

उपाध्याय इस्टेट के केदारनाथ परिवार के मालिक हुए- 

आज हम द्वितीय प्राचीन विकासशील कालखण्ड पर विचार करेंगे। महाराज राम 1870 ई. में पैदा हुए थे। उनकी शादी माधवपुर में हुई थी जिनसे  परमेश्वर नाथ 1894 ई. में, ईश्वरनाथ 1896 ई. में, केदारनाथ 1898 ई. में, तामेश्वर नाथ 1900 ई. में पहली पत्नी से पैदा हुए थे। पहली पत्नी का निधन होने के बाद 1903 ई. में उन्होंने दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा तहसील हरैया जिला बस्ती में किया जिनसे 1908 ई. में चंद्रिका प्रसाद का जन्म हुआ था।

     बड़े भाई परमेश्वरनाथ की राय से केदारनाथ जी को घर का मालिक बनाया गया एवं तमेश्वरनाथ गल्ले व खेती के व्यवस्थापक हुए। रामबरन, रामसुन्दर ने घरेलू समस्त कार्यों की देख-रेख अपने हाथ में सम्हाला हुआ था। पूरा परिवार संगठित होकर काम करने लगा था। चन्द्रिका प्रसाद के दो लड़के कपिलदेव व सर्वदेव तथा तमेश्वरनाथ के एकलौते लड़के वंशमणि अब स्कूल जाने लगे थे। इन सभी को पढ़ने-पढ़ाने का काम चन्द्रिकाप्रसाद को सौंपा गया था। दूध देने वाले जानवरों की अधिकता से घर में गोरस का बाहुल्य हो गया था। अपने खान पान के लिए अब केदारनाथ जी का उपाध्याय वंश क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया था।

उच्चकोटि के गृहस्थ सन्त हुए - 

'साधु' केदारनाथ एक उच्चकोटि के गृहस्थ सन्त थे, जिनको क्षेत्र के हजारों लोग गौरव से देखते थे। इनका जीवन अनुकरणीय था। ये घर के आदर्श मालिक थे जो लखपती होते हुये भी सदैव खाली हाथ रहते थे। मरते समय इनके पास कफन का पैसा भी नहीं था। धर्मशास्त्र में पुराण का अच्छा ज्ञान था। गृह कार्य में दक्ष होते हुये अनाशक्ति भाव से परिवार की सेवा करते परिवार के 40 से 50 सदस्य इन्हें सब बराबर थे । कोई अपना पराया नहीं था। इनका जीवन सामाजिक था। सैकड़ों लोगों से सम्पर्क था। पढ़े कम थे किन्तु कुशाग्र बुद्धि के थे। एक बार जो सुनते थे उसे तुरन्त स्मरण करके दूसरों तक पहुँचा देते थे। सत्संग में कथा कहने के ये शौकीन थे। ईश्वर के प्रति इनकी आस्था गहरी थी। ये गुरु परम्परा की पूजा में विश्वास करते थे । रामायण और सुखसागर के आधार पर राम और कृष्ण अवतार की सारी कथायें इन्हें स्मरण थी। ये कबीरपंथी साधुओं से काफी जमकर सत्संग करते थे। मूर्ति पूजा के समर्थक तथा वृक्षों से लेकर पशु पक्षियों के प्रति श्रृद्धा रखते थे। मानवों के प्रति इनकी ईश्वरीय निष्ठा थी। कीर्तन भजन में पूर्ण विश्वास के साथ साधु-संतों और कलाकारों का सहयोग करते थे।

    उपाध्याय वंश के छोटे लोग इन्हें “साधू दादा” और बड़े लोग इन्हें “साधू बाबू” कहकर सम्मान देते थे। ये राम और कृष्ण को अपना भगवान मानते हुये गोचारण भी करते थे तथा बांसुरी खूब अच्छी तरह से बजाते थे। शंकर जी की पूजा में त्रिशूल के साथ डमरू भी रखते थे। सुबह-शाम जब इनका डमरू बजता था तो गाँव के लड़के इकट्ठा हो जाते थे और कभी गुड़ कभी बताशा कभी लड्डू का प्रसाद यह मुक्त हस्त से प्रदान करते थे। त्यौहारों के दिन 25 किलो तक चने के बेसन के लड्डू बनते थे। 

केदार आश्रम कुटी सीतारामपुर- 

वे एक छप्पर की कुटी बनाकर रहते थे और साधु सन्यासियो की सेवा करते थे। कोई न कोई साधु उनके पास जरूर रहता था। उनके भाई तमेश्वरनाथ उनके लिए दूध-दही, घी, आदि का खूब प्रबन्ध किये रहते थे। क्योंकि वे एक ही बार दिन में भोजन करते थे। केदारनाथ की भागवत भक्ति से उनके माता-पिता बहुत प्रसन्न रहते थे। - ( संदर्भ वही पृष्ठ 40)

     परिवार के साथ-साथ गाँव के लोग की बिना भेदभाव के परिवार से जुड़े रहते थे। इनके सत्संग में दूर-दूर के संत केदार आश्रम में आते थे। इनका निवास कुटी मे था, जब कि इनके पास तीन किता का मकान था।  ये बच्चों के प्रति अनाशक्त रहते थे। लेकिन इनके छोटे भाई तमेश्वर नाथ अन्य लोगों को अपने लड़के से भी अधिक मानते थे। परमेश्वरनाथ जी के पुत्र रामबरन सबके प्रति अगाध निष्ठा रखते थे। 1955 ई. में जब मुनिलाल जी जू. हा. नगर से कक्षा 8 उत्तीर्ण किया तो रामबरन ने ही उनका नाम बस्ती जिले के खैर इण्टर कालेज में लिखवाया था और आकर कभी - कभी देख - रेख भी किया करते थे।

    रामबरन जी अपने भैवादी में सबसे बड़े थे। चन्द्रिका प्रसाद इनसे दो वर्ष छोटे थे। दोनों लोग सन् 1930 ई.से ही घर का कार्यभार सम्हालने लगे थे । किसी भी जिम्मेदारी के कार्य में परमेश्वरनाथ और  केदारनाथ इन्हीं लोगो को आगे किये रहते थे। दस बैलों की खेती 10 भैंस व 25 गायों की देखरेख चरवाहे और घर के इन्हीं व्यक्तियों की देखरेख में होती थी। सन् 1945 ई.के पश्चात् सर्वदेव पहलवान गाय भैंसों की देखरेख करते थे। जवार के लोग इस पट्टी को काफी सम्मान देते थे। दो चार पट्टीदार के लोग दोपहर का भोजन घर के लोगों के साथ करते थे। दिन में कम से कम बाहरी लोग 50 से 100 तक के लोग इस  घर पर जलपान करते थे। पट्टीदारी के सत्यनारायण उपाध्याय, रिस्तेदारी के रामलगन तिवारी, शिवमूर्ति उपाध्याय आदि हप्ते में तीन चार दिन आया - जाया करते थे। गाँव के असामी खेती आदि कार्य में सहयोग देते थे। तमेश्वरनाथ की अगुवाई में 10-10 वर्ष का जड़हन केदारनाथ के ही परिवार में मिलता था । उस समय लाल मधुकर जड़हन यहाँ खूब होता था,जो वायु विकार वाले अक्सर लोग खाते थे। रोगियों को केदारनाथ उपाध्याय द्वारा मुक्त दान में दिया जाता था। इनके द्वारा अपने साधुओं को अंचला, ब्राह्मणों को अन्न-वस्त्र और लड़कियों की शादी में अन्न आदि का सहयोग मुफ्त व रुपये पैसे का योगदान, कुछ मुफ्त कुछ बिना सूद के दिया जाता था। 

     जो भी बीमार होता था लक्खू बैद को महराजराम अपने खर्चे से बुलाते थे। सन 1950 ई. तक बंसमणि कपिलदेव सर्वदेव  रामबरन व रामसुन्दर के सहयोग में कृषि कार्य में लग गये थे। रामबरन जी बैलगाडी चलवाते थे। सन 1950 ई. तक वंशमणि कपिलदेव सर्वदेव आदि युवक रामबरन चलवाते थे, जिससे गन्ना बोने का कार्य होता था। गन्ना भी आय का साधन था।  इस खानदान के दस बैल पूरे क्षेत्र में मशहूर थे। राजा पोखरनी की देखा-देखी यहाँ भी एक बाल्टी गुड की चाय भैंस के दूध में बनती थी। जिसे पटटीदार समेत लगभग 100 लोग प्रातःकाल पीते थे। ओरी खवास के सहयोग से  केदारनाथ एक लोटा चाय पीते थे।

वैवाहिक एवं परिवारिक स्थिति - 

केदारनाथ जी महराजराम के योग्य पुत्र में बड़े ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी प्रथम ससुराल रेंगी तिवारी, दूसरी ससुराल भरथापुर कप्तानगंज और तीसरी ससुराल लहूरादेवा तिवारी खानदान में थी। केदारनाथ की दो पत्नियाँ मर चुकी थीं। कोई सन्तान नहीं थी। महराजराम और उनकी पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने 42 वर्ष की अवस्था में तीसरी शादी किया था। केदारनाथ जी को अपना योग्य पुत्र समझकर उनके पिता महराजराम बहुत खुश थे। मां भी केदारनाथ को अपना प्यारा पुत्र मानकर काफी सम्मान देती थीं। केदारनाथ को विवाह उपरान्त उनके पुत्र के रुप में मुनिलाल उपाध्याय सन् 1940 ई. में आश्विन मास की एकादशी को उत्पन्न हुए और उसके बाद एक उनकी बहन शोभावती तथा सन् 1950 ई. में वशिष्ठ प्रसाद नामक छोटा पुत्र  उत्पन्न हुआ था। केदारनाथ जी ईश्वर की तरफ ध्यान अधिक देते थे। इसलिए केदारनाथ की मां मुनिलाल और उनकी माँ को बहुत अधिक मानती थीं। वह कहती थीं कि यह लड़का ऊसर का बीज है। इसकी रक्षा मैं करूँगी।

वैराग्यमय जीवन - 

ईश्वरनाथ की असामयिक मृत्यु को देखकर केदारनाथ के मन में विराग हो गया था। वे पढ़े-लिखे अधिक तो नहीं थे। किन्तु अध्ययनशील और सत्संगी थे। बड़े-बड़े साधु-सन्तों का आदर वे जीखोलकर करते थे। माता-पिता की सेवा में अधिक समय देते थे। उनका सादा जीवन उच्च विचार देखकर उनकी मां बहुत खुश रहती थी। वे भी माता पिता को ईश्वर के समान मानते थे।

सामूहिक गुरुमुख दीक्षा

महसों का शुक्ल उनके घराने के कुलगुरु थे। उन्हें गंगाजली बाबा भी कहा जाता था। वे गांव में जब आए हुए थे तो उनके सम्मुख जैसे केदारनाथ जी आये उन्होंने कहा, “तुम तो सन्त स्वभाव के लग रहे हो।” विनम्रता की मुद्रा में केदारनाथ जी ने कहा, “महराज जी ! भगवान ही सब कुछ करता है। आज आप आ गये मानो भगवान आ गये । मेरा मन ईश्वरनाथ बाबू के मरने से बेचैन है। आप मुझे गुरुमुख करा दीजिए।” उनके साथ गांव के 10 अन्य लोगों  भी गुरुमुख दीक्षा ली थी । गुरुमुख होने के पश्चात् केदारनाथ उपाध्याय अध्यात्म की तरफ आकर्षित हो गए थे। वे प्रतिदिन प्रातःकाल का दो घण्टे का समय पूजा पाठ में लगाने लगे। - ( संदर्भ वही पृष्ठ 33,34)

     रामचरितमानस व श्रीम‌द्भागवत पुराण की कथाओं का अध्ययन करके वे सत्संग में रुचि लेने लगे। उनके भाई तमेश्वरनाथ ने सारा कार्यभार अपने ऊपर ले लिया। केदारनाथ जी घर की अगुवाई के साथ-साथ ईश्वर आराधना से सुखी रहने लगे। उन्होंने सर्वप्रथम ऐसे सन्त, जो पास-पड़ोस में थे, से सत्संग करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने योगी सुन्दरदास कुदरहा, समबाबा गोरयानाला मन्दिर भरवलिया तथा पं. गोमती पुजारीभर, कामता प्रसाद पाण्डेय अठदमा व शरणदास महाराज कपरफोर से चर्चा चलने लगा था। पटटीदारी के सत्यनारायण जी जो इनके समवयस्कर इनके साथ सत्संग में लगे रहते थे।

अचला और लंगोटी धारण किया - 

केदारनाथ जी भगवान के प्रति इतने भावुक हो गये कि उन्होंने वस्त्र छोडकर अचला और लंगोटी पहनावा ग्रहण किया। एक बार भोजन करके अधिक समय में सन्त सेवा में लगाने लगे। सन्तों का आगमन खूब होने लगा। सारा समाज इन्हें “साधू बाबू” कहने लगा। चार बजे ये दो घण्टे जोर-जोर की आवाज में “राम-राम” रटते थे, जो पड़ोस तक सुनाई देता था ।

      गृहस्थआश्रम में रहते हुए भी केदार नाथ उपाध्याय इस्टेट के चर्चित व्यक्तियों में गिने जाने लगे। इनकी कर्मठता से लछिमन दत्त का कुल साहबराम ,महराज राम को लेकर केदारनाथ तक एक सदकुलीन स्वर्णाभूषित मुक्ताहार हो गया था। केदारनाथ ने तमेश्वरनाथ को घर का अधिकांशतः कार्यभार सौंप दिया और उनके साथ चंद्रिका प्रसाद व रामबरन व रामसुन्दर  को लगा दिए थे। संतों के आगमन से गांव और ज़वार के वरिष्ठ नागरिकों का जमावड़ा होने लगा था। रामचरितमानस की कथा हफ्तों चलने लगी थी। कृष्ण भक्त सन्तों ने श्रीमद् भागवत पुराण और सुखसागर को आधार बनाया हुआ था। - (वही पृष्ठ 40, 41)

तीर्थ यात्रा पर - 

सीतारामपुर के पड़ोस के गांव मदारपुर के भवानी भीख मौर्य इलाहाबाद में रहते थे। जिन्होंने इस गांव के दर्जनों परिवार के लोगों को प्रयाग राज का संगम स्नान, अक्षय वट का दर्शन, प्रयाग किला , लेटे हनुमान मंदिर का दर्शन तथा अन्य छोटे - मोटे मंदिरों का दर्शन कराया था। यहां से भारद्वाज आश्रम के पावन स्थलों का दर्शन कराया गया। फिर विंध्याचल के लिए प्रस्थान कर गंगा स्नान, मां विंध्यवासिनी जी का दर्शन तथा विंध्याचल पहाड़ी का भ्रमण कर प्राकृतिक छटाओं का सम्यक अवलोकन किया। तीसरे दिन अयोध्या सरयू स्नान हनुमान गढ़ी, कनक भवन, राजा ददुवा के राजमहल और अन्य प्रमुख मन्दिरों का दर्शन कर सीतारामपुर अपने-अपने घर वापस आ गए।  

असमय मृत्यु- 

सन् 1956 ई.में परमेश्वर नाथ जी दिवंगत हो गये उनके दिवंगत होने से केदारनाथ बेचैन हो गये जहाँ जाय रोते हुये यही कहते बाबू चले गये। एक वर्ष के अन्दर बेचैन रहने वाले केदारनाथ 12 अक्टूबर 1957 ई. को इस आसार संसार से सदा सदा के लिए विदा हो गए।



लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

Wednesday, March 11, 2026

उपाध्याय इस्टेट” के प्राचीन संस्थापक वर्ग✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

उपाध्याय इस्टेट के संपूर्ण विकास क्रम को तीन काल खण्डों में बांटा जा सकता है- 

1.प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड 

2.प्राचीन विकासशील कालखण्ड 

3. वर्तमान विस्तारवादी काल खण्ड 

अति प्राचीन संस्थापक वर्ग के काल खण्ड में पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय’, पण्डित सीताराम उपाध्याय,लक्ष्मनदत्त,हरिप्रसाद, धर्मराज, महराजराम,परमेश्वरनाथ और ईश्वरनाथ उपाध्याय के अप्रतिम योगदान पर प्रकाश डाला गया है। इसी प्रकार अगले प्राचीन विकासशील कालखण्ड और वर्तमान विस्तार वादी कालखण्ड में इसके बिकास और विस्तार का चर्चा किया जाएगा।

प्राचीन संस्थापक वर्ग का कालखण्ड- 

विकास का यह पर प्रारंभिक चरण होने के कारण इसके सटीक समय बिंदु दृश्यमान नहीं होते हैं, अपितु यह बदलती या कही- सुनी कहानी के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को चलती हुई देखी जा सकती है। यद्यपि इस समय के संस्थापको ने किसी प्रत्याशा में कुल के संस्थापन का काम नहीं किया था, फिर भी इतिहास बोध के कारण इसे महत्वपूर्ण दर्जा दिया जा सकता है।

पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय’ “उपाध्याय इस्टेट” के वंशपुरुष थे - 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित था। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। चौदहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल अवध के बस्ती क्षेत्र में के घाघरा  नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बस कर यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया। उनके साथ कुछ ब्राह्मण परिवार भी इस भूभाग पर आए थे। वे अपना निवास स्थान यहां बनाकर राजा साहब के छत्रछाया में रहने लगे थे। ये राजवंश के पुरोहित और सलाहकार के रूप में भारद्वाज गोत्रिय उपाध्याय वंशीय विद्वान ब्राह्मण थे। इस वंश के पंडित सीताराम जी कुल के ग्यारहवें वंशावतंश के रूप में अत्यधिक प्रतिष्ठित हुए थे। उनके पिता जी का नाम पंडित गंगाराम उपाध्याय था।

    उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के राजा नगर और उनके दरबारी गण नगर राजमहल के पास स्थित खड़ैवा खुर्द निवासी, उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और ज्योतिष शास्त्र के आचार्य पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय' से प्रतिदिन संस्कृत पुराण, अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्होंने अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द नामक एक छोटे गांव में मकान भी बनवा लिए थे। इस मकान के पास यहां एक बड़ा कुंवा आज भी मौजूद है। आज से लगभग 15 साल पहले यहां श्री रामबरन चौबे रहते थे जो उपाध्याय वंश के श्री नागेश्वर उपाध्याय के दत्तक पुत्र थे।

पण्डित सीताराम “उपाध्याय इस्टेट” के संस्थापक- 

गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र रहे थे। जब 1765 में उतरौला के राजा सुलेमान खां ने 5,000 सैनिकों को लेकर नगर राज्य पर आक्रमण किया तो नगर राजा की तरफ से पंडित सीताराम उपाध्याय जी ने सुलेमान खां को समझा - बुझाकर लड़ाई होने से बचा लिया था। इससे खुश होकर उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी के तट तक फैला हुआ था और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीतारामजी को दान कर दिया था । 

     15 वर्ष की अथक प्रयास से इस भूमि को साफ सुथरा करके कृषि योग्य बनाकर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने “सीताराम पुर” नामक एक नया गांव बसा लिया था। ये नगर राज्य दरबार के चर्चित विद्वान और सलाहकार थे। ये 1795 ई. तक जीवित रहे । इस गांव को 1950 ई. तक खड़ैवा खुर्द के निवासी 'पुरवा' कह कर बुलाते थे। राजस्व रिकॉर्ड में अलग नाम पाकर भी यह गांव खड़ैवा गांव का एक मजरा या पुरवा तक ही सीमित था।

असाधारण प्रतिभा सम्पन्न लक्ष्मनदत्त- 

पंडित सीता राम जी के तीन पुत्र - लक्ष्मन दत्त मनोजदत्त और इंद्रदत्त थे। लक्ष्मनदत्त (1820-1890ई.)अजानुबाहु थे। अजानु बाहु  एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "जिसकी भुजाएं घुटनों तक लंबी हों"। यह शब्द आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जो शारीरिक रूप से मजबूत, शक्तिशाली और वीर होता है। भारतीय संस्कृति में, अजानुबाहु को अक्सर देवताओं, राक्षसों, योद्धाओं और राजाओं से जोड़ा जाता है। यह माना जाता था कि इन व्यक्तियों में असाधारण शक्ति और शारीरिक क्षमता होती थी, जो उनकी लंबी भुजाओं द्वारा दर्शायी जाती थी। भगवान राम को लम्बी भुजाओं के कारण इस नाम से पुकारा जाता था। महाभारत में भीम और वर्तमान समय में महात्मा गांधी को अजानुबाहु के रूप में वर्णित किया गया है। 

    इसके अलावा अजानबाहू का एक और अर्थ होता है - अजं का अर्थ होता है हाथी, बाहु यानी हाथ। हाथी जैसे ताकत वाले को भी कहा जा सकता है। उदाहरण के तोर पर जैसे छत्रपति शिवाजी,अर्जुन, जैसे लोकों के लिये भी इसका प्रयोग हुआ है। संक्षेप में कहना हो तो ज्ञान, कर्म और भक्ति यह तीन गुण जिसमें हो तो उसे अजानबाहु कह सकते हैं।

लक्ष्मनदत्त की अलग थी कद-काठी- 1857 की स्वाधीनता के दौरान लक्ष्मन दत्त की आयु कोई 35 वर्ष की थी। वे सबसे अलग दिखते थे। उनकी भर्ती गोरखपुर में हुई थी। 200 लोगों में वे अपनी अलग पहचान बनाए रखे थे। इनकी ऊंचाई और स्वास्थ्य का कोई जवाब नहीं था । इनकी ऊंचाई 7 फिट सीना सवा गज और वजन लगभग दो मन था। ये लगभग 10 सेर दूध, एक सेर घी और एक सेर छुहारा, सवा सेर घी की पूड़ी खाते थे। एक पाव चना,एक पाव किसमिस रोज सबेरे खाते थे। भर्ती में आए  किसी भी जवान से लड़ने के लिए तैयार थे। वे रस्साकसी में दस जवान को अकेले पिछाड़ देते थे। वे एक बीर सैनिक थे। वह भारतीय सैनिकों में सदैव चर्चित रहे।

– (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4, 5)

ब्रिटिश सेना में सूबेदार रहे लक्ष्मनदत्त- 

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह (1812- 1857) बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 1890 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। ये पूर्व वर्णित गंगाराम के पौत्र और सीताराम उपाध्याय के पुत्र थे। जिनको उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था। 

हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” के प्रथम जमींदार- 

लक्ष्मणदत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” की जमींदारी संभालते थे। इनका समय 1840 से 1910 के मध्य था। आज्ञाराम जी अपने चाचा लछिमन दत्त के सहयोग से ब्रिटिश हुकूमत में थानेदार के पद पर लगभग 40 वर्षों तक कार्य किये। लखनऊ इनका क्षेत्र था। ये एक तेज तर्रार दरोगा थे इन्हें हाकिम हुक्काम से लेकर उस समय के ताल्लुकेदार लोग खूब जानते व सम्मान देते थे। ये अरबी और फारसी के जानकार थे। अपने पिता के अत्यधिक प्यार को पाकर ये घर की जमीनदारी तक सीमित रह गये। इन्हें डाक्टर मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने सन् 1946 के आस-पास देखा था। -(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत पृष्ठ 55)

    आज्ञाराम से धर्मराज, साहबराम से महराजराम तथा हरिप्रसाद से गजराजराम, दौलतराम और छागुरराम पुत्र उत्पन्न हुए। इन सभी  की उत्पत्ति 1875 ई. से 1900 ई. के मध्य हुई थी। लछमन दत्त के कोई सन्तान नहीं थी। इनके भाई मनोगदत्त और इन्द्रदत्त के सन्तानें थीं। यहीं से उपाध्याय वंश का हिस्सा दो फलकों में आधा-आधा हो गया। इन्द्रदत्त के पौत्र महाराजराम का पूरी सम्पत्ति में 1/2 भाग और मनोगदत्त के पौत्र और आज्ञाराम के पुत्र धर्मराज तथा हरिप्रसाद के पुत्र गजराज राम, दौलतराम, छांगुरराम 1/4, के हिस्सेदार हुए। 

     दोनों थानाध्यक्षों का कार्यकाल 1890 में रहा, उस समय इनका परिवार चरम विकास पर था। उसी समय इस वंश में अलग होने का भेद उत्पन्न हो गया और महराजराम, धर्मराजराम और गजराज राम आदि का परिवार तीन खण्डों में विभक्त हो गया। इस उपाध्याय वंश का चरमोत्कर्ष काल 1885 में यह क्षेत्र चर्चित था। दोनों दरोगा अक्सर अपने घोड़ों से गाँव पर एक साथ आते थे। हरि प्रसाद जी इस उपाध्याय इस्टेट के पारिवारिक मुखिया थे। -- (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10) 

लक्ष्मनदत्त ने पोखरनी का राजमहल तैयार करवाया था - 

राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की थी। उपाध्याय इस्टेट के रिटायर्ड सूबेदार लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा बने हुए थे। 1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राजकोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजनकर उन्हें राजा के पद पर अभिषेक कराया।

लाल रूपेंद्र नारायण सिंह के समय में उपाध्याय इस्टेट ने राजा पद वापस दिलवाया - 

1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया था। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।  जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए उपाध्याय इस्टेट के उनके उपरोहित ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हुए थे। कचूरे इस्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबरसलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए थे। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्णमुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए। -(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)

      इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर लिया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया। - (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)

धर्मराज व महराजराम को उपाध्याय इस्टेट का साफा पहनाया गया था - महाराज राम 1870 में पैदा हुए थे।उनकी शादी माधवपुर में हुई थी जिनसे  परमेश्वर नाथ 18 94 में पैदा हुए थे। ईश्वर नाथ 1896में, केदारनाथ 1898 में, तामेश्वर नाथ 1900 में पहली पत्नी से पैदा हुए थे। पहली पत्नी का निधन होने के बाद 1903 में दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा में हुआ जिनसे 1908 में चंद्रिका प्रसाद का जन्म हुआ।महाराज राम लगभग 1948 ई तक जीवित रहे।

       गोरखपुर और अवध क्षेत्र में अंग्रेजों ने 1801 में देशी राजाओं से सत्ता छीनी थी। इस समय बांसी में राजा सर्वजीत सिंह 1777-1808 ई.तक शासन किए थे। इसके बाद उनकी रानी रणजीत कुँवरि 1808-1813 ई. तक रियासत के शासन प्रशासन का संचालन किया था। संतान न होने के कारण राजा श्रीप्रकाश सिंह 1813-1840 ई. में दत्तक पुत्र के रूप में उनवल से यहां लाए गए थे। इसके बाद राजा महिपति सिंह तृतीय 1840-1863 ई. तक अंग्रेजों की कृपा से सत्ता का संचालन किया था। इसके बाद बांसी के राजा महेन्द्र सिंह को 1863 में उत्तराधिकार मिला था। उन्हें आगरा के दरबार में चैम्पियन आफ द स्टार आफ इण्डिया की उपाधि प्रदान की गई थी। उनकी मृत्यु 1668 में हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र राजा रामसिंह द्वितीय को 1863- 1913 को उत्ताधिकार मिला था। 1886 में दुराचरण के कारण महेंद्र सिंह को मिली उपाधि वापस ले ली गयी थी। परन्तु दस वर्ष बाद पुनः उपाधि लौटा दी गयी थी। राजा सार्वजनिक जीवन से अलग हट गये थे। उनकी सम्पत्ति उनके पुत्र लाल रत्नसेन सिंह द्वितीय 1913-18 को उत्तराधिकार में मिला था। यह राज्य इस समय अपनी उन्नति की अवस्था में था। इसने बस्ती और मगहर और गोरखपुर के बड़ी संख्या के गांवों को अपने अधीन कर लिया था। राजा की ननकार की भूमि राजस्व मुक्ति थी और यह लगभग 86 गांवों में थी। इनमें 25 गांवों में स्वयं राजा के कब्जे थे। शेष उनके करिन्दों व सहायकों के कब्जे थे। उन्हें इस सम्पत्ति के उप भू स्वामियों से कर प्राप्त होता था।

    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह द्वितीय 1913-1918 थे। जिनके कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे। वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमस आने वाले थे जो क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा करने वाले थे। उन लोगों का चन्दो ताल के आसपास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय इस्टेट सीतारामपुर के दोनों दरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर इस्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय इस्टेट के धर्मराज और महराजराम को इस्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय इस्टेट की मान्यता दी गई थी। -(डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)

महराजराम उपाध्याय इस्टेट प्रमुख के साथ आनरेरी मजिस्ट्रेट भी बने - 

महराजराम आनरेरी मजिस्ट्रेट की शक्ति का उपयोग करते थे। महाराज राम के पिता साहबराम दरोगा थे। उनके इकलौते पुत्र महाराज राम उपाध्याय आधे के हिस्सेदार थे। इनके पाँच पुत्र परमेश्वरनाथ, ईश्वरनाथ,केदारनाथ, तमेश्वरनाथ और चन्द्रिका प्रसाद हुए। महराजराम का शुरू का जीवन बड़ा सुखमय था। इनकी दो शादियां हुई थीं। पहली से परमेश्वर नाथ, ईश्वर नाथ, केदार नाथ और तमेश्वर नाथ नामक चार पुत्र और दूसरी पत्नी से चंद्रिका प्रसाद अकेले पुत्र थे। इस प्रकार यह एक बड़े परिवार के मुखिया थे। उनके प्रयास से पांच-पांच बहुएं सहित 44 पारिवारिक सदस्य एक साथ रहते थे। ये लगभग 1948 ई तक जीवित रहे। ये चार पांच दिन के उपरांत पोखरनी इस्टेट जाया करते थे, जहां इनका काफी सम्मान था। वे अपने पांचों पुत्रों के साथ मिलकर उपाध्याय इस्टेट को अच्छी तरह से संभाल लिए थे।

     परमेश्वर नाथ के दो पुत्र रामबरन व राम सुन्दर घर के विशिष्ट जिम्मेदार व्यक्ति थे। ईश्वरनाथ के कोई पुत्र नहीं था उनकी पत्नी का नाम श्रीमती श्यामराजी था जो 1980 में दिवंगत हुई। वे इस परिवार की वफादार गृहणी थी । यद्यपि इनको जायदात का पाँचवाँ भाग मिला हुआ था, किन्तु इन्होंने परिवार के चारों भाई के लोगों को अपना सम्पूर्ण हिस्सा दे दिया था। केदारनाथ के दो पुत्र डॉ. मुनिलाल और वशिष्ट प्रसाद हुये। केदारनाथ के समय में खानदान का ऐसा गौरव बढ़ा कि क्षेत्र के बड़े-बड़े जमीनदार घरानों की समता में कुल का स्थान स्थापित हो गया था।

परमेश्वरनाथ पहले पुलिस फिर कांग्रेस में शामिल- 

1920 से 1950 तक इनके पुत्रों का समय विकासोन्मुख रहा। परमेश्वर नाथ पुलिस की सेवा में थे । बाद में नौकरी छोड़ घर आकर अपने पिता जी के निर्देशन में अपने भाइयों के साथ खेती कराने लगे थे। 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर परमेश्वर नाथ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिए थे । कांग्रेस की मदद करने पर इन्हें खोजने प्रायः पुलिस आया करती थी। ये खुद और अपने पुत्र राम बरन को “सिसवारी रघुबीर सिंह” नामक गांव में आवास बनाकर सीरवारी करते थे। यह गांव बहादुरपुर ब्लाक मुख्यालय से 1 किमी की दूरी पर स्थित है। परमेश्वर नाथ ने इस्टेट का मुकदमा व जमीनदारी की वसूली तहमीन अपने हाथ में लिया था। पूरा परिवार विकास की कड़ी को मजबूत करने में एक दूसरे का सहयोग करने में लगा हुआ था।

   ईश्वरनाथ  चौड़ी छाती, बड़ी मूछ वाले, बलवान और पहलवान थे। इनकी कोई संतान जीवित ना बच सकी थी। केदार नाथ और तमेश्वर नाथ का झुकाव कृषि के तरफ था। इसी समय पोखरनी में भूपेंद्र प्रताप नारायण का समय था। इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद जी थे। ये पहलवान और खूब ताकतवर थे। ये उपाध्याय इस्टेट की शान थे। इस प्रकार महराज राम के पांचों पुत्रों ने उपाध्याय स्टेट की जिम्मेदारी बखूबी निभानी शुरू कर दी थी।

ईश्वरनाथ अल्पायु लेकर आए थे - 

ईश्वरनाथ 42 साल में ही अपना भौतिक शरीर छोड़ साकेत वासी हो गए थे। नगर के राजा रूपेन्द्र नारायण भी सांत्वना देने के लिए पिता महराजराम के पास आए थे। उनकी विधवा पत्नी ने अपना अलग हिस्सा लेने से मना कर दिया था और उसे अपने संयुक्त परिवार में ही बांट दिया था। ईश्वनाथ की मृत्यु से उपाध्याय परिवार काफी दुःखी था। सभी भाई जब भी कोई मामला आता उनको यादकर रोने लगते। विशेषकर केदारनाथ जो भावुक व्यक्ति थे। ऐसा दुखी हुए कि उनकी चेतना भगवत भक्ति की तरफ उन्मुख हो गयी। महराजराम और उनकी पत्नी ऐसे शोक सागर में डूबी कि उनकी मानसिक स्थिरता कमजोर हो गयी। 

नोट:- 

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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


नगर रियासत बस्ती द्वारा “उपाध्याय इस्टेट” को मान्यता धर्मराज-महराजराम का युग(भाग 3)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

धर्मराज व महराजराम को उपाध्याय इस्टेट का साफा पहनाया गया था 
गोरखपुर और अवध क्षेत्र में अंग्रेजों ने 1801 में देशी राजाओं से सत्ता छीनी थी।इस समय बांसी में राजा सर्वजीत सिंह 1777-1808 ई.तक शासन किए थे। इसके बाद उनकी रानी रणजीत कुँवरि 1808-1813 ई. तक रियासत के शासन प्रशासन का संचालन किया था। संतान न होने के कारण राजा श्रीप्रकाश सिंह 1813-1840 ई. में दत्तक पुत्र के रूप में उनवल से यहां लाए गए थे। इसके बाद 
राजा महिपति सिंह तृतीय 1840-1863 ई. तक अंग्रेजों की कृपा से सत्ता का संचालन किया था।इसके बाद बांसी के राजा महेन्द्र सिंह को 1863 मेंउत्तराधिकार मिला था। उन्हें आगरा के दरबार में चैम्पियन आफ द स्टार आफ इण्डिया की उपाधि प्रदान की गई थी। उनकी मृत्यु 1668 में हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र राजा रामसिंह द्वितीय को 1863- 1913 को उत्ताधिकार मिला था। 1886 में दुराचरण के कारण महेंद्र सिंह को मिली उपाधि वापस ले ली गयी थी। परन्तु दस वर्ष बाद पुनः उपाधि लौटा दी गयी थी। राजा सार्वजनिक जीवन से अलग हट गये थे।उनकी सम्पत्ति उनके पुत्र लाल रत्नसेन सिंह द्वितीय 1913-18 को उत्तराधिकार में मिला था। यह राज्य इस समय अपनी उन्नति की अवस्था में था। 1907 में संपूर्ण संपत्ति बांसी में 76,338 एकड़ , रसूलपुर में 16,435 एकड़ , बस्ती में 12,110 थी। इसमें बस्ती और मगहर और गोरखपुर के बड़ी संख्या के गांवों को अपने अधीन कर लिया था। राजा की ननकार की भूमि राजस्व मुक्ति थी और यह लगभग 86 गांवों में थी। इनमें 25 गांवों में स्वयं राजा के कब्जे थे।शेष उनके करिन्दों व सहायकों के कब्जे थे। उन्हें इस सम्पत्ति के उप भू स्वामियों से कर प्राप्त होता था।
    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह द्वितीय 1913-1918 थे। जिनके कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे। वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमसन आने वाले थे जो क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा करने वाले थे। उन लोगों का चन्दो ताल के आस पास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय इस्टेट सीतारामपुर के दोनोंदरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर इस्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय इस्टेट के धर्मराज और महराजराम को इस्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय इस्टेट की मान्यता दी गई थी। -(डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)
महराजराम उपाध्याय इस्टेट प्रमुख के साथ आनरेरी मजिस्ट्रेट भी बने 
महाराज राम 1870 में पैदा हुए थे।उनकी शादी माधवपुर में हुई थी जिनसे  परमेश्वर नाथ 18 94 में पैदा हुए थे। ईश्वर नाथ 1896में, केदारनाथ 1898 में, तामेश्वर नाथ 1900 में पहली पत्नी से पैदा हुए थे। पहली पत्नी का निधन होने के बाद 1903 में दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा में हुआ जिनसे 1908 में चंद्रिका प्रसाद का जन्म हुआ।महाराज राम लगभग 1948 ई तक जीवित रहे।
      महराजराम आनरेरी मजिस्ट्रेट की शक्ति का उपयोग करते थे। महाराज राम के पिता साहबराम दरोगा थे। उनके इकलौते पुत्र महाराज राम उपाध्याय आधे के हिस्सेदार थे। इनके पाँच पुत्र परमेश्वरनाथ ईश्वरनाथ केदारनाथ, तमेश्वरनाथ और चन्द्रिका प्रसाद हुए। महराजराम का शुरू का जीवन बड़ा सुखमय था। इनकी दो शादियां हुई थीं। पहली से परमेश्वर नाथ, ईश्वर नाथ, केदार नाथ और तमेश्वर नाथ नामक चार पुत्र और दूसरी पत्नी से चंद्रिका प्रसाद अकेले पुत्र थे। इस प्रकार यह एक बड़े परिवार के मुखिया थे। उनके प्रयास से पांच-पांच बहुएं सहित 44 पारिवारिक सदस्य एक साथ रहते थे। ये चार पांच दिन के उपरांत पोखरनी इस्टेट जाया करते थे, जहां इनका काफी सम्मान था। वे अपने पांचों पुत्रों के साथ मिलकर उपाध्याय इस्टेट को अच्छी तरह से संभाल लिए थे।
      परमेश्वर नाथ के दो पुत्र रामबरन व राम सुन्दर घर के विशिष्ट जिम्मेदार व्यक्ति थे। ईश्वरनाथ के कोई पुत्र नहीं था उनकी पत्नी का नाम श्रीमती श्यामराजी था जो 1980 में दिवंगत हुई। वे इस परिवार की वफादार गृहणी थी । यद्यपि इनको जायदात का पाँचवाँ भाग मिला हुआ था, किन्तु इन्होंने परिवार के चारों भाई के लोगों को अपना सम्पूर्ण हिस्सा दे दिया था। केदारनाथ के दो पुत्र डॉ. मुनिलाल और वशिष्ट प्रसाद हुये। केदारनाथ के समय में खानदान का ऐसा गौरव बढ़ा कि क्षेत्र के बड़े-बड़े जमीनदार घरानों की समता में कुल का स्थान स्थापित हो गया था।
परमेश्वरनाथ पहले पुलिस फिर कांग्रेस में शामिल 
1920 से 1950 तक इनके पुत्रों का समय विकासोन्मुख रहा। परमेश्वर नाथ पुलिस की सेवा में थे । बाद में नौकरी छोड़ घर आकर अपने पिता जी के निर्देशन में अपने भाइयों के साथ खेती कराने लगे थे। 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर परमेश्वर नाथ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिए थे । कांग्रेस की मदद करने पर इन्हें खोजने प्रायः पुलिस आया करती थी। ये खुद और अपने पुत्र राम बरन को “सिसवारी रघुबीर सिंह” नामक गांव में आवास बनाकर सीरवारी करते थे। यह गांव बहादुरपुर ब्लाक मुख्यालय से एक किमी. की दूरी पर स्थित है। परमेश्वर नाथ ने इस्टेट का मुकदमा व जमीनदारी की वसूली तहमीन अपने हाथ में लिया था। पूरा परिवार विकास की कड़ी को मजबूत करने में एक दूसरे का सहयोग करने में लगा हुआ था।
   ईश्वरनाथ चौड़ी छाती, बड़ी मूछ वाले, बलवान और पहलवान थे। इनकी कोई संतान जीवित ना बच सकी थी। केदार नाथ और तमेश्वर नाथ का झुकाव कृषि के तरफ था। इसी समय पोखरनी में भूपेंद्र प्रताप नारायण का समय था। इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद जी थे। ये पहलवान और खूब ताकतवर थे। ये उपाध्याय इस्टेट की शान थे। इस प्रकार महराज राम के पांचों पुत्रों ने उपाध्याय स्टेट की जिम्मेदारी बखूबी निभानी शुरू कर दी थी।
ईश्वरनाथ अल्पायु लेकर आए थे 
ईश्वरनाथ 42 साल में ही अपना भौतिक शरीर छोड़ साकेत वासी हो गए थे। नगर के राजा रूपेन्द्र नारायण भी सांत्वना देने के लिए पिता महराजराम के पास आए थे। उनकी विधवा पत्नी ने अपना अलग हिस्सा लेने से मना कर दिया था और उसे अपने संयुक्त परिवार में ही बांट दिया था। ईश्वनाथ की मृत्यु से उपाध्याय परिवार काफी दुःखी था। सभी भाई जब भी कोई मामला आता उनको यादकर रोने लगते। विशेषकर केदारनाथ जो भावुक व्यक्ति थे। ऐसा दुखी हुए कि उनकी चेतना भगवत भक्ति की तरफ उन्मुख हो गयी।महराजराम और उनकी पत्नी ऐसे शोक सागर में डूबी कि उनकी मानसिक स्थिरता कमजोर हो गयी। 



Tuesday, March 10, 2026

उपाध्याय एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता विद्वान✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

उपाध्याय का अर्थ 

उपाध्याय विश्व की प्राचीनतम भाषा देववाणी संस्कृत का एक लोकप्रचलित उपाधि नाम है जो गुरुकुल के उन आचार्यों के लिए इस्तेमाल में लिया जाता है, जो भारतवर्ष में अनादिकाल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक गुरु-शिष्य परम्परा के तहत गुरुकुल में अपने विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे। स्नातक, परास्नातक और उच्च शोध शिक्षा प्रणाली को इजाद करने वाले भारत के उपाध्यायों की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विश्वभर में सबसे ज्यादा चर्चित रही हैं। भारत के गुरुकुल और उसके उपाध्यायों का इतिहास बेहद ही प्राचीनतम और ब्यापक है, जिसे महज किसी भी लेख और ऐतिहासिक ग्रँथ में समेटना पूरी तरह असंभव है। भारत का सम्पूर्ण इतिहास,समयचक्र के हिसाब से प्रचलित प्रत्येक कालखंड (सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलयुग) चारों वेद,छह शास्त्र, अठारह पुराण, उपनिषद समेत सभी महान ग्रन्थों में गुरुकुल और उनके उपाध्यायों का विशेष और विस्तृत वर्णन है। 

   "उपाध्याय" Upadhyay- (संस्कृत - उप + अधि + इण घं‌) इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- 'उपेत्य अधीयते अस्मात्‌' जिसके पास जाकर अध्ययन किया जाए,वह उपाध्याय कहलाता है।

   वैदिक काल से ही गुरुकुल के शिक्षकों को उपाध्याय कहा जाता था। सरल शब्दों में यदि कहा जाय तो गुरुकुलों में विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला गुरु जिसे वर्तमान में शिक्षक,आचार्य या अध्यापक कहा जाता है। इस प्रकार वर्तमान समय तक आते आते गुरु और ब्राह्मणों की एक उपजाति की उपाधि भी बन गई है।

ज्ञान-विज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड का ज्ञाता 

रामायण और महाभारत में स्पष्ट उल्लेख किया है कि ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं, उप शाखाओं, वेद-ग्रँथ, शास्त्र के साथ शस्त्र अर्थात युद्ध विद्या समेत सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड की ज्ञात और अदृश्य विद्याओं को गुरुकुल में विद्यार्थियों को सहज पढ़ाने की योग्यता रखने वाले गुरु या शिक्षक को उपाध्याय,कुलपति या आचार्य की संज्ञा दी गई।

    यदि भारत देश का प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक का इतिहास उठाकर देखा जाये तो भारतवर्ष में जब भी विदेशी आक्रांताओं ने हमला किया और देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा,तब-तब उसकी सबसे बड़ी कीमत भारत के गुरुकुलों और उनके उपाध्यायों को चुकानी पड़ी। चूंकि सनातन सभ्यता को जीवंत रखने वाले गुरुकुल के उपाध्यायों के द्वारा देश के युवाओं को श्रेष्ठतम स्तर की शिक्षा- दिक्षा और उन्नत परवरिश देकर आदर्श नागरिकों का निर्माण किया जाता था।

कालखंड-युगों में उपाध्याय शब्द प्रचलित

कालखंड के हिसाब से सभी युगों में गुरुकुल के अध्यापकों के लिये देवभाषा सँस्कृत में उपाध्याय शब्द का इस्तेमाल किया गया है। विश्व के सबसे प्राचीनतम महाग्रन्थ वेदों में इसका विस्तार से वर्णन है। त्रेता युग में त्रिकालदर्शी आदिकवि महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित महाग्रंथ रामायण के बालकाण्ड में सीता स्वयंवर के समय जब भगवान राम ने शिवजी का धनुष भंग कर स्वयंवर जीता, तब राजा जनक के राजकुल पुरोहित,आचार्य सदानन्द अपने राजा जनक और मुनि विश्वामित्र से प्रार्थना करते हैं कि अयोध्या के राजा दशरथ एवं उनके गुरुकुल उपाध्याय को स्वयंवर का सन्देश पत्र प्रेक्षित किया जाना चाहिए। तब राजा जनक अपनी ओर से लिखे पत्र में राजा दशरथ को अपने गुरुकुल उपाध्याय महर्षि वशिष्ठ समेत सभी आचार्यों को अपने साथ लेकर राम सीता विवाह का निमंत्रण भेजते हैं। द्वापर युग में भी भगवान कृष्ण के बेहद अल्प समय में गुरूकुल उपाध्याय मुनि संदीपनी से शिक्षा गृहण करने का वर्णन है। कुलमिलाकर वैदिककालीन इतिहास,वेद-पुराण, शास्त्र, उपनिषद, रामायण, महाभारत, मध्यकालीन भारत का इतिहास,आधुनिक भारत का इतिहास सभी जगह गुरुकुल के आचार्यों, अध्यापकों के लिए देववाणी संस्कृत में उपाध्याय शब्द का प्रयोग किया गया है।

   उपाध्याय ब्राह्मण परंपरागत रूप से पुरोहिती, अध्यापन (शिक्षण), और विद्या के प्रति समर्पित रहे हैं, जिन्हें प्राचीन समाज में विद्या और वेदों के ज्ञानी के रूप में सम्मान प्राप्त था। 

    ब्रिटिशकाल तक भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली गुरुकुलों के उपाध्यायों के नेतृत्व में चलती रही। लेकिन लार्ड मैकॉले (Thomas Babington Macaulay) की सिफारिश पर गवर्नर जरनल "लार्ड विलियम बैंटिक"काEnglishEducation Act 1835 तत्पश्चात ब्रिटिश संसद ने स्थाई कानून Indian Education Act बनाकर भारत के सभी गुरुकुलों और उनमें पढ़ाने वाले सभी अध्यापकों की मान्यताएँ रद्द कर उन्हें बंद करने के आदेश जारी कर दिये और भारत मे गुरुकुलों के स्थान पर नये कान्वेंट और पब्लिक स्कूल खोले गए।

     सरकार के संरक्षण में कुछ ब्राह्मण विद्वान उपाध्याय और ऐसे ही कुछ अन्य उपनाम वाले ब्राह्मणों को निम्न दर्शना शुरू कर दिए और समाज में एक भ्रांति लाकर इनका अवमूल्यन करने लगे।

     हम यह भी जानते हैं की लोकाचार में "यादव"," सरदार जी"  और भिक्षा मांगने वाले ब्राह्मण को लोग उपहास और निम्न दृष्टि से देखने लगे हैं और इनसे संबंधित तमाम अनुश्रुतिया प्रचलित कर रखे हैं । इसलिए लोकाचार को तभी सही माना जाए जब वह शास्त्र सम्मत हो,अन्यथा उनका तिरस्कार करना ही श्रेयकर है। भारत में अंग्रेजी शिक्षा ब्यवस्था लागू होने के बाद "उपाध्याय" शब्द केवल सरनेम बनकर रह गया। वह अपनी प्राचीन गौरव से दूर कर दिया गया।

उपाध्याय जिझौतिया ब्राह्मणों का उपनाम 

उपाध्याय जिझौतिया ब्राह्मणों का एक उपनाम है। जिझौतिया ब्राह्मणों में उपाध्याय उपनाम अंतर्गत चार  गोत्र – शांडिल्य, सांकृत, भरद्वाज एवं वत्स हैं।  उपाध्याय उपनाम एवं भरद्वाज गोत्र का आदिग्राम महजौली (माजौली) है जो बुन्देलखण्ड क्षेत्र में उत्तर प्रदेश राज्य के हमीरपुर जिला में राठ तहसील अंतर्गत गोहाण्ड के निकट स्थित है। महजौली में “कालीमाई” का मंदिर है जो “महामाई” के नाम से प्रसिद्द है। भरद्वाज गोत्र में तीन प्रवर – भरद्वाज,अंगिरा और वार्हस्पत्य हैं। जिझौतिया ब्राह्मण अंतर्गत उपाध्याय उपनाम व भरद्वाज गोत्र के वेद – यजुर्वेद , उपवेद – धनुर्वेद , शाखा – माध्यन्दिन , सूत्र – कात्यायन, छन्द – अनुष्टुप , शिखा – दक्षिण , पाद – दक्षिण , देवता – शिव एवं कुलदेवता – गुसाईं बाबू हैं। इनमें कुल पूजा का समय भाद्रशुक्ल दोज है।  

उल्लेखनीय चर्चित लोग

अमर उपाध्याय, भारतीय मॉडल, फिल्म और टेलीविजन अभिनेता का नाम था।आमोद प्रसाद उपाध्याय (जन्म 1936), नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं।अयोध्या प्रसाद उपाध्याय 'हरिऔध' हिंदी साहित्य के लेखक रहे हैं।ब्रह्मबंधव उपाध्याय बंगाली ब्राह्मण, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी कालीचरण बनर्जी के भतीजे रहे।छबीलाल उपाध्याय  नेपाली ब्राह्मण (बहुन), असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष (चयनित)।चिंतन उपाध्याय भारतीय समकालीन कलाकार, दोहरे हत्याकांड के सिलसिले में गिरफ्तार हुए थे। चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय, भारतीय राजनीतिज्ञ रहे। दीनदयाल उपाध्याय - आरएसएस के विचारक और राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक रहे। दर्शन उपाध्याय, पेशेवर ईस्पोर्ट्स खिलाड़ी रहे। हरिलाल उपाध्याय गुजराती लेखक रहे। हेमा उपाध्याय भारतीय कलाकार जो 1998 से मुंबई में रहते और काम करते थे। केदार नाथ उपाध्याय, नेपाल के मुख्य न्यायाधीश रहे। किशोर उपाध्याय,भारतीय राजनीतिज्ञ; कृष्णकांत उपाध्याय  उत्तर प्रदेश के क्रिकेटर; ललित उपाध्याय, भारतीय फील्ड हॉकी खिलाड़ी।मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, भारतीय राजनेता, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेता रहे।राम किंकर उपाध्याय, भारतीय शास्त्रों के विख्यात विद्वान और भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण के प्राप्तकर्ता।सम्राट उपाध्याय, नेपाली लेखक जो अंग्रेजी में लिखते हैं।सतीश उपाध्याय (जन्म 1962), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष रहे। राम बीर उपाध्याय बसपा के नेता और मायावती सरकार के मंत्री रहे। सीमा उपाध्याय (जन्म 1965), भारतीय राजनीतिज्ञ, बहुजन समाज पार्टी से संबंधित रहीं। शैलेंद्र कुमार उपाध्याय, नेपाली राजनयिक और राजनीतिज्ञ हैं।श्रीकृष्ण उपाध्याय नेपाली अर्थशास्त्री।उमेश उपाध्याय, अनुभवी भारतीय टेली विजन पत्रकार और मीडिया कार्यकारी, प्रेसिडेंट न्यूज नेटवर्क18 से सम्बद्ध हैं तथा विकास उपाध्याय, अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव रहे।डा. मुनि लाल उपाध्याय “सरस”- 40 साल तक जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नगरबाजार बस्ती केप्रधानाचार्य, विद्वान, कवि,राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान से सम्मानित, दर्जनों प्रकाशित पुस्तकों के रचयिता ।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)