इतिहास के अद्भुत रहस्य
Wednesday, June 17, 2026
श्यामा सदन आश्रम’ कारसेवक पुरम, अयोध्या की कुछ दुर्लभ जानकारी। ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
Friday, June 12, 2026
आक्रांताओं ने आधी-अधूरी सुगौली सन्धि कर भारत को बिखेरा:✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
नेपाल प्राचीन आर्यावर्त का अंग रहा:-
सांस्कृतिक और पौराणिक संदर्भों में नेपाल प्राचीन आर्यावर्त (या अखंड भारत) का अभिन्न अंग था।वैदिक काल में वेदों और पुराणों के अनुसार, हिमालय का यह क्षेत्र जंबूद्वीप और आर्यावर्त की सीमाओं के भीतर माना जाता था। सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में प्राचीन काल से ही नेपाल की संस्कृति, धर्म और भाषा उत्तर भारत की वैदिक और सनातनी परंपराओं से गहराई से जुड़ी रही है।
मौर्य साम्राज्य के अधीन रहा:-
250 ई. पू. तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थयात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602–664 ई.) अपनी यात्रा की वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनकमुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है, जो निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में 5वी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई। 8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया।
879 में नेपाल की नेवार जाति का उदय :-
नेपाल की नेवार जाति (जिन्हें 'नेवा:' भी कहा जाता है) काठमांडू घाटी के मूल निवासी हैं और अपनी समृद्ध कला, अद्वितीय संस्कृति, और व्यापार-कौशल के लिए जाने जाते है। यह समुदाय हिंदू और बौद्ध धर्म का एक अनूठा मिश्रण है, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान उन्हें नेपाल में सबसे विशिष्ट और उन्नत बनाती है। नेवार समुदाय के भीतर ही लगभग 30 से अधिक उप-जातियां और वर्ग हैं। इसमें पुजारी (राजोपाध्याय, देव), किसान (ज्यापू), व्यापारी (साहू), और शिल्पकार शामिल हैं। इनकी मुख्य मातृभाषा 'नेपाल भाषा' (नेवारी) है, जो तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार का हिस्सा है। सदियों से नेवार समुदाय कुशल वास्तुकार, शिल्पकार और व्यापारी रहा है। काठमांडू घाटी के प्रसिद्ध मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों का निर्माण इन्हीं के द्वारा किया गया है।
सन् 879 से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ, फिर भी इन लोगों का नियन्त्रण देशभर में कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। 11वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भूभाग में दिखा। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बुद्धधर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा। नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि, सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरात वंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं।
1757 से अंग्रेजों का अभ्युदय :-
23 जून 1757 में भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त के नदिया जिले के प्लासी मैदान के युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में पैर पसार चुके थे । इस दौरान उन्होंने व्यापारिक लाभ कमाने के लिए धीरे- धीरे भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू कर दिया था। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य दोनों ही क्षेत्रीय विस्तार में लगे हुए थे। अंग्रेजों ने कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे जैसे प्रमुख ठिकानों से भारत में अपना प्रभाव मजबूत कर लिया था ।
दूसरी ओर, नेपाल अपनी विस्तार नीतियों के तहत पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल तथा दक्षिण में अवध तक अपना विस्तार कर रहा था।
नेपाली गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया तो चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दिया था और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश कर दिया था।
18वीं शताब्दी में नेपाल का विस्तार:- 18वीं शताब्दी में नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह के शासनकाल में स्थापित नेपाल राज्य ने विजयों के माध्यम से तेजी से विस्तार किया था। पहाड़ी इलाकों के साथ साथ मैदानी क्षेत्रों में इनका अभियान बड़ी तेजी से चला था। 19वीं शताब्दी के आरंभ तक, नेपाल एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर चुका था। भारत में अपना प्रभाव मजबूत करने की चाहत रखने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के विस्तार को इस क्षेत्र में अपने हितों के लिए खतरा मान लिया था।
आंग्ल-नेपाल युद्ध :-
फलत: एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816) में हुआ था जिसे गोरखा युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था। उस समय अमर सिंह थापा की कमान में गोरखा सेना में 5,000 से 8,000 सैनिक थे। संख्या में कम होने के बावजूद, उन्हें परिचित भू भाग पर लड़ने का लाभ मिला, जिससे उन्हें रणनीतिक बढ़त प्राप्त हुई। ऊबड़- खाबड़ भू भाग ने पूर्वी भारतीय सेना की रसद व्यवस्था को बाधित किया, जिसमें तोपखाने के परिवहन और सैनिकों की आपूर्ति में कठिनाइयाँ शामिल थीं। गोरखाओं के किले, जो अक्सर पहाड़ियों की चोटियों पर स्थित थे, अत्यधिक रक्षात्मक थे, जिससे पूर्वी भारतीय सेना के हमलों में समस्याएँ उत्पन्न हुईं। दोनों देश के बीच यह युद्ध अंग्रेजों की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप 1816 में सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत पहले नेपाल के नियंत्रण में रहे विभिन्न क्षेत्रों को ब्रिटिश भारतीय गणराज्य को सौंप दिया गया। सुगौली वर्तमान समय में बिहार राज्य के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित है। नेपाल की ओर से कोई शाही परिवारी इस संधि में समलित ना होकर इस राज्य के राजगुरु गजराज मिश्र सन्धि की कार्यवाही में भाग लिए थे। उनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय भी थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक प्रमुख ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने हस्ताक्षर किये थे। ये भी कोई संवैधानिक पक्षकार नहीं थे अपितु ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक प्रतिनिधि ही थे। इस संधि के अनुसार नेपाल के कुछ हिस्सों को ब्रिटिश भारत में शामिल किया गया , काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति हुई और ब्रिटेन की सैन्य सेवा में गोरखाओं को भर्ती करने की अनुमति दी गयी थी। साथ ही इसके द्वारा नेपाल ने अपनी किसी भी सेवा में किसी अमेरिकी या यूरोपीय कर्मचारी को नियुक्त करने का अधिकार भी खो दिया। इस संधि पर 2 दिसम्बर 1815 को हस्ताक्ष्रर किये गये और 4 मार्च 1816 का इसका अनुमोदन किया गया।
एंगलो-नेपाल युद्ध में नेपाल ने नालापानी गढी तथा अलमोडा में विलायती सैनिकों की बड़ी क्षति पहुँचाया था लेकिन नेपाली सैनिक कमाण्डर के इच्छा विपरीत नेपाल नरेश ने सन्धि का प्रस्ताव किया था।
इस संधि ने एंग्लो-नेपाली युद्ध का अंत किया था।1816 में सुगौली संधि पर हस्ताक्षर के साथ एंग्लो-नेपाली युद्ध समाप्त हुआ, जिसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारी लाभ हुआ। परिणाम स्वरूप नेपाल को महत्वपूर्ण भूभाग गढ़वाल, कुमाऊं, मसूरी, देहरादून और दार्जिलिंग सहित कई बड़े क्षेत्र खोने पड़े और अंग्रेजों के साथ उसके राजनीतिक संबंधों में बदलाव आया। महाकाली नदी की सीमा वर्तमान भू-राजनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण बनी हुई है।नेपाल ने गढ़वाल और कुमाऊं जिलों को सौंप दिया और तराई क्षेत्र पर अपने दावों को त्याग दिया।नेपाल ने सिक्किम में अपने क्षेत्रीय दावों से भी हाथ खींच लिया। ब्रिटिश सेना से हार के बावजूद, नेपाल एक स्वतंत्र राज्य बना रहा।
सुगौली संधि की शर्तें:-
संधि की शर्तें निम्नलिखित थीं: -
1- ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच सदैव शांति और मित्रता रहेगी।
2- नेपाल के राजा उन सभी भूमि दावों का परित्याग कर देंगे जो युद्ध से पहले दोनो राष्ट्रों के मध्य विवाद का विषय थे और उन भूमियों की संप्रभुता पर कंपनी के अधिकार को स्वीकार करेंगे।
3- नेपाल के राजा शाश्वत रूप से निम्न उल्लिखित सभी प्रदेशों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देंगे:
(क) काली और राप्ती नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ख) बुटवाल को छोडकर राप्ती और गंडकी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ग) गंडकी और कोशी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अधिकार स्थापित किया गया है।
(घ) मेची और तीस्ता नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(च) मेची नदी के पूर्व के भीतर प्रदेशों का सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र। साथ ही पूर्वोक्त क्षेत्र गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिन के भीतर खाली किया जाएगा।
4- नेपाल के उन सरदारों और प्रमुखों, जिनके हित पूर्वगामी अनुच्छेद (क्रमांक 3) के अनुसार उक्त भूमि हस्तांतरण द्वारा प्रभावित होते हैं, की क्षतिपूर्ति के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी, 2 लाख रुपये की कुल राशि पेंशन प्रतिवर्ष के रूप में देने को तैयार है जिसका निर्णय नेपाल के राजा द्वारा लिया जा सकता है।
5- नेपाल के राजा, उनके वारिस और उत्तराधिकारी काली नदी के पश्चिम में स्थित सभी देशों पर अपने दावों का परित्याग करेंगे और उन देशों या उनके निवासियों से संबंधित किसी मामले में स्वयं को सम्मिलित नहीं करेंगे।
6- नेपाल के राजा, सिक्किम के राजा को उनके द्वारा शासित प्रदेशों के कब्जे के संबंध में कभी परेशान करने या सताने की किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं होंगे। यदि नेपाल और सिक्किम के बीच कोई विवाद होता है तो उसे ईस्ट इंडिया कंपनी की मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।
7- एतद्द्वारा नेपाल के राजा, ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश, अमेरिकी या यूरोपीय नागरिक को अपनी किसी भी सेवा में ना तो नियुक्त करेंगे ना ही उसकी सेवाओं को बनाये रखेंगे।
8- एतद्द्वारा नेपाल और ब्रिटेन (ईस्ट इंडिया कंपनी) के बीच स्थापित शांति और सौहार्द के संबंधों की सुरक्षा और उनमें सुधार के उद्देश्य से, यह सहमति बनती है कि एक का मान्यता प्राप्त मंत्री, दूसरे की अदालत में रहेगा।
9- इस संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा इस तारीख से 15 दिनों के भीतर किया जाएगा और उसे लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रेडशॉ को सौंपा जाएगा, जो उसे अगले 20 दिनों में या उससे पहले (यदि साध्य हो), गवर्नर जनरल से अनुमोदित करा कर राजा को सुपुर्द करेंगे।
10.इसके बाद दिसम्बर 1816 में एक उत्तरगामी समझौते पर सहमति बनी जिसके अनुसार नेपाल को मेची नदी के पूर्व और महाकाली नदी के पश्चिम के बीच का तराई क्षेत्र वापस लौटा दिया गया। इस समझौते के फलस्वरूप दो लाख रुपए प्रतिवर्ष की क्षतिपूर्ति राशि के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। एक भूमि सर्वेक्षण के द्वारा दोनों राष्ट्रों के बीच की सीमा को तय करने का प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया था।
संधि की वैधता :-
1. संधि के अनुच्छेद 9 के अनुसार संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा होना अनिवार्य था, लेकिन राजा गीर्वान युद्ध बिक्रम शाह द्वारा अनुमोदित संधि का अभिलेख निर्णायक रूप से नहीं मिलता है।
2. दिसम्बर 1815 को इस संधि पर नेपाल सरकार की ओर से राज गुरु गजराज मिश्रा और उनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय थे और कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ द्वारा हस्ताक्षर किये गये। 4 मार्च 1816 को चंद्र शेखर उपाध्याय और जनरल डेविड ऑक्टरलोनी द्वारा मकवानपुर में संधि की हस्ताक्षरित प्रतियों का आदान प्रदान किया गया।
संधि के अनुसार कुमाऊं, गढ़वाल, दार्जिलिंग आदि के बदले लगभग आधा मिथिला नेपाल को दे दिया गया था। ये संधि दो विदेशियों के बीच हुआ था लेकिन इसके कारण हमारे अपने ही मैथिल हमारे लिए विदेशी हो गए। संधि ब्रिटिश सरकार भी नहीं बल्कि एक फॉरेन कम्पनी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी और तो और इसके क्लाउज 9 के अनुसार नेपाली राजा का सिग्नेचर जरूरी था लेकिन उसके बदले राजगुरु गजराज मिश्रा का सिग्नेचर से खानापूर्ति कर दी गई। दो विदेशियों के संधि का फ़ल मिथिला अपने घर के बंटवारे से भोगता रहा है। कानूनन इलीगल इस संधि के आज लगभग 200 वर्ष हो चुके हैं लेकिन किसी सरकार का ध्यान इस पर नहीं गया, आज भी वहाँ नेपाल में मैथिलों को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर मधेशी कहा जाता है और कई नागरिक सुविधाओं से वंचित रक्खा गया है।
3. कुछ लोगों कहना है कि चूंकि संधि, नेपाली राजशाही और अंग्रेजों के बीच हुई थी इसलिए इसे नेपाल गणराज्य और भारत गणराज्य के मध्य लागू नहीं किया जा सकता।
अंग्रेजों द्वारा नेपाल को विशेष दर्जा दिया गया :-
अंग्रेजों ने नेपाल का केवल कुछ भू-भाग अपने साम्राज्य में मिलाया, लेकिन वे नेपाल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने और सम्मान करने पर मजबूर हुए क्योंकि वे नेपाल को अपने उत्तर की ओर एक बफर स्टेट के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे। मार्च 1816 में नेपाल ने अपनी कुछ भूमि अंग्रेजों को दे दी और काठमांडू में अंग्रेजी रेजीडेंसी की स्थापना हो गई। 21 दिसंबर 1923 को ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई थी। औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को एक पूर्ण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाई।
गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत हुई :-
नेपाली सैनिकों की बहादुरी ने अंग्रेजों को काफी प्रभावित किया था जिसके परिणाम स्वरूप गोरखाओं की भर्ती ब्रिटिश सेना में होने लगी थी। अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत में भी यह परम्परा कायम है। गोरखा आज भी भारतीय सेना का एक अभिन्न और अत्यंत सम्मानित हिस्सा है।ब्रिटिश सेना के लिए यह एक बहुत ही शक्तिशाली और वफादार सैन्य टुकड़ी साबित हुई।
राणा शासन और अंग्रेजों की मित्रता:-
1846 से 1951 के बीच नेपाल में राणा शासन था राणा शासक अंग्रेजों के पक्के समर्थक बन गए और उन्होंने 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दबाने में अंग्रेजों की भारी मदद की थी बदले में अंग्रेजों ने नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति अपनाई। राणाओं ने 1951 तक ब्रिटिश भारत के समर्थन से 104 वर्षों तक नेपाल पर शासन किया, और शाह वंश के राजाओं को केवल नाममात्र का शासक बनाकर रखा। सत्ता में बने रहने के लिए, राणा प्रशासन ब्रिटिश कठपुतली शासन में तब्दील हो गया और नेपाल को अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय संबंधों से अलग-थलग रखा गया। राणाओं ने अपने अन्यायपूर्ण शासन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने के लिए 1923 में ब्रिटेन के साथ शाश्वत शांति और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। वे प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल थे और उन्होंने ब्रिटिश सेना को नेपाली भाड़े के सैनिक मुहैया कराए । यह प्रथा आज भी जारी है। नेपाल ने 4 सितंबर, 1939 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की, द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा मोर्चे पर लड़ा और अंग्रेजों को सामग्री और सैन्य सहायता प्रदान की।
1950 के दशक में लोकतांत्रिक आंदोलनों ने राणाओं को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और भारतीय शासकों के समर्थन से शाह वंश के एक राजा ने फिर से सत्ता संभाली। ऐतिहासिक रूप से राजा, राणाओं और लोकतांत्रिक दलों के बीच 1950 के दिल्ली समझौते के रूप में जाना जाता है। ब्रिटिश भारत के दबावों के अलावा, नेपाल ने 1950 तक किसी बड़े साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का सामना नहीं किया।
अमेरिका व चीन का बढ़ता प्रभाव:-
राणा वंश के पतन के बाद से नेपाल पर संयुक्त राज्य अमेरिका का व्यापक प्रभाव रहा है। हाल ही में नेपाल पर चीन का राजनीतिक प्रभाव भी दिखने लगा है। चूंकि चीन अब संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है, इसलिए अमेरिका चीन से लड़ने के लिए नेपाली धरती का उपयोग करने को उच्च प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिकी कदमों की प्रतिक्रिया स्वरूप, चीन भी हाल ही में नेपाल पर अधिक ध्यान दे रहा है।
सीपीएन की स्थापना:-
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन) की स्थापना 1949 में उन युवाओं द्वारा की गई थी, जिनमें से अधिकांश ने भारत में शिक्षा प्राप्त की थी या किसी न किसी रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। इसे कलकत्ता स्थित भारतीय कम्युनिस्टों का समर्थन प्राप्त था। सीपीएन का क्रांतिकारी स्वरूप इसके संस्थापक सदस्यों के रूसी, चीनी और भारतीय मुक्ति आंदोलनों से प्रभावित होने के कारण था।
भारतके 'सिपाही विद्रोह’ को दबाने के लिए नेपाल ने विशाल सेना भेजा था:-
1857 के भारतीय 'सिपाही विद्रोह' में नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री जंगबहादुर ने अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए 12,000 नेपाली सैनिक भेजे थे।जंग बहादुर द्वारा भेजी गई इस गोरखा सेना ने मुख्य रूप से अवध (लखनऊ) के विद्रोह को दबाने और वहां फंसे ब्रिटिश सैनिकों व अधिकारियों को सुरक्षित निकालने में अंग्रेजी सेना की भारी मदद की थी। इस सहायता के पीछे नेपाल का उद्देश्य अंग्रेजों के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध मजबूत करना और 1816 की सुगौली संधि के बाद नेपाल की संप्रभुता व सीमाओं को सुरक्षित रखना था।
नेपाल राष्ट्र का जन्म :-
धर्मविरोधी, जातिविरोधी तथा राष्ट्रविरोधी कार्यों ने सच्चे नेपाली के मन में सुदृढ़ नेपाल राष्ट्र खड़ा करने की भावना को जन्म दिया। नेपाल की छिन्न-भिन्न राजनीतिक इकाइयों को एक सूत्र में बाँधकर नेपाल राष्ट्र खड़ा करने के लिए वहाँ की राजनीतिक इकाइयों का एकीकरण हुआ।
आधुनिक नेपाल की नींव नेपाल राष्ट्र के एकीकरण से और साम्राज्यवाद के विरोध से निर्मित हुई है। पृथ्वी नारायण शाह के चौथे वैधानिक उत्तराधिकारी श्री राजेंद्र विक्रम शाह ने भारत के सिख, मराठे और मुगलों तथा वर्मा, चीन और अफगानिस्तान में अपने राजदूतों को गुप्त रूप से भेजकर यूरोपीय साम्राज्य वादियों के विरुद्ध एक होकर युद्ध करने के लिए आह्वान किया था।
एंग्लो-नेपाल युद्ध के परिणाम:-
1816 की सुगौली संधि के बाद, नेपाल को कुमाऊं और गढ़वाल सहित कई क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इन हानियों के बावजूद, नेपाल को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को वार्षिक सब्सिडी नहीं देनी पड़ी, जो कई भारतीय रियासतों को प्राप्त विशेषाधिकार नहीं था। उस समय की कई अन्य संधियों के विपरीत, यह संधि लंबे समय तक प्रभावी रही। परिणाम स्वरूप, नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच आगे कोई संघर्ष नहीं हुआ। नेपाल ने अपने कई हिस्से (जैसे कुमाऊं, गढ़वाल और सिक्किम) खो दिए, लेकिन अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखी।
इसने नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच दीर्घकालिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। नेपाल ने अपने भूभाग का लगभग एक तिहाई हिस्सा खो दिया। इस संधि ने नेपाल के विस्तार को सीमित कर दिया लेकिन उसकी संप्रभुता को संरक्षित रखा।
इसने बाद में भारत-नेपाल सीमा संबंधी चर्चाओं को प्रभावित किया।जिसमे नेपाल को अपनी एक तिहाई भूभाग से हाथ धोना पड़ा लेकिन अपनी सार्व- भौमसत्ता और स्वतन्त्रता कायम रखा।
बाद में अंग्रेजो ने 1822 में मेची नदी (भारतीय नाम महानंदा)नदी व राप्ती नदी के बीच की कुछ तराई का हिस्सा नेपाल को वापस किया उसी तरह 1860 में राणा प्रधानमन्त्री जंगबहादुर से खुश होकर अंग्रेजो ने राप्तीनदी से महाकाली नदी के बीच का तराई का थोडा और हिस्सा नेपाल को लौटाया। लेकिन सुगौली सन्धि के बाद नेपाल ने जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा गँवा दिया । यह क्षेत्र अभी उत्तरांचल राज्य और हिमांचल प्रदेश और पंजाबी पहाडी राज्य मैं सम्मिलित है। पूर्व में दार्जीलिङ और उसके आसपास का नेपाली मूल के लोगों का भूमि (जो अब पश्चिम बंगाल में है) भी ब्रिटिस इन्डिया के अधीन में हो गया तथा नेपाल का सिक्किम के ऊपर का प्रभाव और शक्ति भी नेपाल को त्यागना पडा था।
भारत का विरोध भी जारी है :-
इसके बावजूद, कुछ आम लोग, कुछ राजनीतिक दल और कुछ नेपाली सरकारें भारतीय वर्चस्व का विरोध कर रही हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग सीमा अतिक्रमण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, यहां तक कि इस आंदोलन के लिए शहीद भी हो रहे हैं। हर व्यापार नाकाबंदी के दौरान, सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों का भारतीय पक्ष से रोजाना संघर्ष होता रहा है। कई बार, नेपाली व्यापारियों ने उन भारतीय ट्रकों पर पथराव किया है जिनमें कृषि उत्पाद लदे होते हैं और जिनकी कीमत नेपाली उत्पादों से अधिक होती है। नेपाल सरकार ने जान बूझकर वर्तमान भारत के पिथौरा गढ़ के कुछ सामरिक क्षेत्र में अतिक्रमित क्षेत्रों को शामिल करते हुए नेपाल का एक संशोधित नक्शा एक तरफा रूप से अपनी करेंसी में प्रकाशित कर इसे अपना कहने की मुहिम छोड़ रखा है ।
चीन ने दखलंदाजी बढाई :-
हाल ही में चीन ने नेपाल में अपने दूतावास और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं। नेपाल को प्रभावित करने के लिए चीन की प्रमुख गतिविधियों में सिल्क रोड व्यापार को पुनर्जीवित करने के लिए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) शामिल है।
सीमा विवाद समाप्त नहीं :-
भारत, नेपाल और चीन के त्रि-संगम पर स्थित लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद है। इस विवाद की मुख्य वजह काली नदी का उद्गम स्थान है। भारत के अनुसार नदी का स्रोत काला पानी है, जिससे कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा भारतीय क्षेत्र में आते हैं। इसके विपरीत, नेपाल नदी का स्रोत लिम्पियाधुरा मानता है, जिससे ये तीनों क्षेत्र नेपाल का हिस्सा बन जाते हैं। चीन ने विवादित लिपुलेख क्षेत्र को दोनों देशों के बीच व्यापारिक मार्ग के रूप में उपयोग करने के लिए भारत के साथ समझौता भी किया है। नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र नेपाल का है और ऐसे सौदों में नेपाल की भागीदारी भी आवश्यक है।
नेपाल सरकार ने 100 नेपाली रुपये (NPR) के नए नोट पर नया राजनीतिक नक्शा छापा है। इस नक्शे में भारत के तीन विवादित क्षेत्रों- लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी-को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है। भारत सरकार ने इस कदम को एकतरफा और अमान्य बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।फिर भी वह विक्टिम कार्ड खेलकर अपना दबदबा बनाना चाहता है।
नेपाल ने निम्न भारतीय क्षेत्रों को नेपाल में शामिल माना है। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश (कांगड़ा) और उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल (नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून सहित)। उत्तर प्रदेश और बिहार में तराई क्षेत्र से सटे भारतीय शहर—जैसे गोरखपुर, बहराइच, पीलीभीत, बलिया, हाजीपुर और जौनपुर। पूर्व में पूरा सिक्किम और पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी व तीस्ता नदी तक का क्षेत्र।
2023 में भारत के नए संसद भवन में लगे 'अखंड भारत' नक्शे के विरोध में काठमांडू के मेयर ने अपने कार्यालय में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगा दिया था, जिसने काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
भारतीय भूभाग से नेपाल कृतकृत्य :-
ब्रिटिश भारत ने तराई भूमि का कुछ हिस्सा 1816 में ही नेपाल को लौटा दिया गया। 1860 की नेपाल-ब्रिटेन संधि के तहत, अंग्रेजों ने भारत की निचली तराई भूमि का पश्चिमी तराई (मेची से महाकाली के बीच का भाग) नेपाल को वापस सौंप दिया था। इस भूभाग में मुख्य रूप से चार ज़िले आते हैं: कंचनपुर कैलाली बरदिया बांके नेपाली इतिहास में इस क्षेत्र को 'नया मुल्क' (अर्थात 'नया देश') भी कहा जाता है। यह भूमि नेपाल के तत्कालीन शासक जंग बहादुर राणा द्वारा 1857 के सिपाही विद्रोह को दबाने में ब्रिटिश सरकार की सहायता करने के एवज में पुरस्कार स्वरूप लौटाई गई थी।
सुगौली संधि और मिथिला :-
1816 में, ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल की गोरखा राजशाही ने सुगौली संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत, मिथिला क्षेत्र का एक हिस्सा भारत से अलग होकर नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया। इस भाग को नेपाल में, पूर्वी तराई या मिथिला कहा जाता है। भारत की एक अमूल्य विरासत हमेशा हमेशा के लिए नेपाल के अधिकार में आ गई।
सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा:-
इस संधि में राष्ट्रीय परिसीमन को स्पष्ट नहीं किया गया था, इसलिए इसके प्रभाव आज तक कायम है-
1. संधि यह बताने में विफल रही है कि कुछ स्थानों पर एक स्पष्ट वास्तविक सीमा रेखा कहां से गुजरेगी। कई स्थानों पर सीमा के निर्धारण और सीमा स्तंभों की स्थापना को लेकर विवाद है। अनुमान लगाया गया है ऐसे विवादित स्थानों का क्षेत्रफल लगभग 60,000 हेक्टेयर है। ऐसे कई क्षेत्रों में दोनो ओर से अब भी दावे, प्रतिदावे किये जा रहे हैं, जिन पर विचार- विमर्श, विवादों और तर्कों का दौर जारी है।
2. नतीजा यह है कि आज भी नेपाल- भारत की सीमा रेखा के 54 स्थानों पर अतिक्रमण और विवादों के आरोप हैं। प्रमुख क्षेत्रों में कालापानी-लिम्पियाधुरा, सुस्ता, मेची क्षेत्र, टनकपुर, सन्दकपुर, पशुपतिनगर हिले थोरी आदि स्थानों की पहचान की गई है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Sunday, June 7, 2026
एंग्लो-नेपाल युद्ध की पृष्ठभूमि और सुगौली संधि✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
सुगौली संधि से पूर्व नेपाल का क्रमिक इतिहास ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
प्रागैतिहासिक काल-
हिमालय क्षेत्र में मनुष्यों का आगमन लगभग 9,000 वर्ष पहले होने के तथ्य की पुष्टि काठमाण्डू घाटी में पाये गये नव पाषाण औजारौं से होती है। सम्भवतः तिब्बती-बर्मीज मूल के लोग नेपाल में 2,500 वर्ष पहले आ चुके थे।
नेपाल का इतिहास -
प्राचीन काल के नेपाल में छोटे राज्यों, मध्ययुगीन राजवंशों, गोरखा एकीकरण, राणा शासन के अत्याचार और अंततः एक आधुनिक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलने की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा मिलती है। नेपाल के इतिहास के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-
1. प्राचीनकाल प्रारंभिक निवासी-
नेपाल में सबसे पहले दक्षिण भारत से द्रविड़ लोग आए थे बाद में तिब्बती-बर्मी और इंडो-आर्यन लोग यहां आकर बसे। 1500 ईशा पूर्व के आसपास इन्डो-आर्यन जतियों ने काठमाण्डू घाटी में प्रवेश किया था। करीब 1,000 ईसा पूर्व में अनेक छोटे-छोटे राज्य और राज्य संगठन बनें। सिद्धार्थ गौतम (ईसा पूर्व 563- 483) शाक्य वंश के राजकुमार थे, जिन्होंने अपना राजकाज त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया था और वह बुद्ध बन गए थे।
2.गौरवपूर्ण प्राचीन काल-
नेपाल, जिसे एशिया के सबसे प्राचीन देशों में से एक माना जाता है, को यह सौभाग्य प्राप्त है कि अपने इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश या धार्मिक समूह द्वारा उपनिवेश नहीं बनाया गया। नेपाल विश्व शक्तियों (अमेरिका, चीन और भारत सहित) के लिए दो मुख्य कारणों से केंद्र बिंदु बना रहा है-
(क) हिमालयी नदियों के जल, खानों और जैविक संसाधनों जैसे नेपाल के संसाधनों का दोहन किया जाना।
(ख) अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए नेपाली भूमि का सैन्य उपयोग किया जाना।
नेपाल, एक अहिंसक और स्वतंत्र देश होने के बावजूद, लगभग 300 वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी शक्तियों (अर्थात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के साथ संघर्ष करने लगा था।
नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि वंशी और सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरात वंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं।
कला, शिक्षा, वैभव और राजनीति के दृष्टिकोण से लिच्छवि काल 'स्वर्णयुग' रहा है। जन साधारण संस्कृत भाषा में लिख पढ़ और बोल सकते थे। राजा स्वयं विद्वान् और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञ होते थे।
3.'पैगोडा' शैली की वास्तु कला की प्रधानता -
'पैगोडा' शैली की वास्तुकला नेपाल में बड़ी उन्नत दशा में थी और यह कला सुदूर महाचीन तक फैली हुई थी। मूर्तिकला भी समृद्ध अवस्था में थी। धार्मिक सहिष्णुता के कारण् हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म समान रूप से विकसित हो रहे थे। काफी वजनदार स्वर्णमुद्राएँ व्यवहार में प्रचलित थीं।विदेशों से व्यापार करने के लिए व्यापारियों का अपना संगठन भी था। वैदेशिक संबंध की सुदृढ़ता वैवाहिक संबंध के आधार पर कायम थी।
4.भारतीय साम्राज्यों का प्रभाव -
लिच्छवी राजवंश चौथी से आठवीं शताब्दी के मध्य था। इसे नेपाल का 'स्वर्णिम युग' माना जाता है। इसी काल में कला, व्यापार और बौद्ध व हिंदू धर्म का तेजी से विकास हुआ। स्वयंभूनाथ जैसे प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण इसी काल में हुआ।
250 ईशा पूर्व तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम का स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थ यात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602– 664 ई.) में अपनी यात्रा के वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनक मुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है। यह निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में पांचवी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई थी।
5.मध्यकाल में नेपाल -
8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया और सन् 879 ई से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ था। नेवार एक विशिष्ट भाषाई और सांस्कृतिक समूह हैं, जो मुख्य रूप से इंडो-आर्यन और तिब्बती-बर्मी जातीय समूह हैं, जिनकी एक सामान्य नेपाल भाषा है, और वे मुख्य रूप से नेवार हिंदू धर्म और नेवार बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। इन लोगों का नियन्त्रण देश भर में कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है।
मल्ल राजाओं ने काठमांडू घाटी में शासन किया और इसे नेवार संस्कृति का केंद्र बनाया। उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर और विभिन्न पैगोडा शैली के मंदिरों का निर्माण कराया था।
ई.सन् 880 में लिच्छवि राज्य की समाप्ति पर नुवाकोटे ठकुरी राजवंश का अभ्युदय हुआ। इस समय नेपाल राज्य की अवनति प्रारंभ हो गई थी। केंद्रीय शासन शिथिल पड़ गया था। फलत: नेपाल अनेक राजनीतिक इकाइयों में विभाजित हो गया। हिमालय के मध्य कछार में मल्लों का गणतंत्र राज्य कायम था। लिच्छवि शासन की समाप्ति पर मल्ल राजा सिर उठाने लगे थे।
11वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भू भाग में दिखा था। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बौद्ध धर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा।
13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में संस्कृत शब्द “मल्ल” कुल नाम वाले राजवंश का उदय होने लगा। 200 वर्ष में इन राजाओं ने शक्ति एकजुट की।
14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देश का बहुत ज्यादा भाग एकीकृत राज्य के अधीन में आ गया। लेकिन एकीकरण कम समय तक ही टिक सका था।
सन् 1350 ई. में बंगाल के शासक शमशुद्दीन इलियास ने नेपाल घाटी पर बड़ा जबरदस्त आक्रमण किया था। उस समय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो गयी।
6.तीस रियासतों में विभाजित -
सन् 1480 ई. में अंतिम वैश राजा अर्जुन देव (अर्जुन मल्ल देव ) को उनके मंत्रियों ने पदच्युत करके स्थितिमल्ल नामक राजपूत को राज सिंहासन पर बैठाया था। इस समय तक केंद्रीय राज्य पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न होकर काठमाडू, गोरखा, तनहुँ, लमजुङ, मकबानपुर आदि लगभग तीस रियासतों में विभाजित हो गया था।
1482 में ये राज्य तीन भाग में विभाजित हो गये थे - कान्तिपुर, ललितपुर और भक्तपुर – जिसके बीच मे शताव्दियौं तक मेल नहीं हो सका।
राजा स्थितिमल्ल अस्त व्यस्त आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में पूर्ण रूप से समर्थ हुए। राजा पक्षमल्ल ने केंद्रीय शासन को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया, किंतु उनके निधन पर पश्चात् उनके उत्तराधिकारियों ने राज्य को आपस में बाँटकर पुन: राजनीतिक इकाइयाँ खड़ी कीं।
7.साम्राज्य से पहले का नेपाल -
प्राचीन काल से ही नेपाल के अविभाजित भारत और चीन दोनों के साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं। विभिन्न शासकों के बीच सामाजिक संबंधों में दरार आने और 16वीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती शक्ति के कारण भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में प्रभुत्व बढ़ने से 1400 ईस्वी के बाद चीन के साथ संबंध बिगड़ने लगे।
मध्य कालीन नेपाल साहित्य, संगीत और कला की दृष्टि से उन्नत होने पर भी राजनीतिक दृष्टि से अवनति की ओर ही बढ़ा। जनजीवन अशांत था। यूरोपीय साम्राज्य वादियों की कुदृष्टि भारत के पश्चात् नेपाल पर भी पड़ गई थी। नेपाल के विरुद्ध किनलोक का सैनिक अभियान और घाटी में ईसाई पादरियों की चहल पहल इस तथ्य के प्रमाण हैं।
8.आधुनिक गोरखा राज्य की स्थापना-
गोरखा राज्य इन दिनों काफी सबल हो चुका था। नेपाल की छोटी -छोटी राजनीतिक इकाइयों पर और नेपाली जनजीवन पर गोरखा राज्य का प्रभाव छा गया था। न्यायमूर्ति राजा राम शाह के न्याय की चर्चा नेपाल भर में फैल गयी थी। राजा पृथ्वी पति शाह के राज्यकाल में बंगाल के नवाब ने गुर्गिन खाँ के नेतृत्व में नेपाल पर आक्रमण करने के लिए पचास साठ हजार फौज भेजी थी। नवाब की सेना मकवान पुर के तराई क्षेत्र में पड़ाव डाले हुई थी। मकबानपुर ने गोरखा राज्य से सहायता की याचना की। गोरखा के कुछ जवानों ने नवाब की सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला। बचे हुए सैनिक अपनी जान बचाकर भाग निकले।
उपर्युक्त इन दो कारणो से गोरखा राज्य नेपाली जन जीवन के सुखद भविष्य का आशा केंद्र हो गया था। जन जीवन की इस आकांक्षा को नेपाल राष्ट्र के जनक महाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाह ने समझा और नेपाल के एकीकरण के लिए अभियान प्रारंभ किया।
मध्यकालीन नेपाल के अंतिम चरण में अर्थात् राष्ट्र के जनक पृथ्वीनारायण शाह के उदय होने से पूर्व विदेशी लोग नेपाल पर दाँत गड़ाने लगे थे। नेपाल घाटी में पादरी लोग ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे थे। मल्ल राजा आपसी फूट-वैमनस्य, झगड़ा, युद्ध आदि बातों में निरंतर व्यस्त थे।
1765 ई मे, गोरखा के शाह वंशी राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के छोटे छोटे बाइस व चोबिस राज्य के ऊपर चढाँइ करते हुए उन्हें एकिकृत किया, बहुत ज्यादा रक्तरंजित लडाँईयौं पश्वात उन्हौने तीन वर्ष बाद कान्तीपुर, पाटन व भादगाँउ के राजाओं को हराया और अपने राज्य का नाम गोरखा से नेपाल में परिवर्तित किया। कान्तिपुर विजय के लिये तीन बार युद्ध करना पडा, महान्पि सेनानायक कालू पाण्डे भी इस युद्ध में शहीद हो गए।पृथ्वीनारायण शाह ने कूटनीति अपनाकर नेपाल घाटी के बाहर के देशों से लडाई की और कीर्तिपुर में नाकाबन्दी कर दिया, पानी का मूल भी बन्द कर दिया अन्तिम या तीसरी बार में उन्हे कान्तिपुर विजय में कोई युद्ध नहीं करना पड़ा। वास्तव में, उस समय इन्द्रजात्रा पर्व में कान्तिपुर की सभी जनता फसल के देवता भगवान इन्द्र की पूजा और महोत्सव (जात्रा) मना रहे थे, जब पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी सेना लेकर धावा बोला और सिंहासन पर कब्जा कर लिया। इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म भी कहते है।
गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 25 सितंबर 1768 में काठमांडू घाटी को जीतकर आधुनिक नेपाल (शाह राजवंश) की नींव रखी और इसे देश की राजधानी बनाया। उन्होंने काठमांडू ,पाटन और भक्तपुर राज्यों को अपने शाह वंश के अंतर्गत एक राज्य में एकीकृत करने में सफलता प्राप्त की थी। अपने इतिहास के अधिकांश समय तक नेपाल राज्य विधिवत रूप से एक निरंकुश राजतंत्र था। 1768 तक नेपाल 54 छोटे राज्यों में विभाजित था। नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने इन राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया और नेपाल राज्य की स्थापना की। इस दौरान, नेपाल ने तत्कालीन ब्रिटिश भारत के साथ कई युद्ध लड़े।
नेपाल ने सैन्य रूप से मजबूत ब्रिटिश भारत को अधिकतर बार हराया और भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में अपना नियंत्रण बढ़ाया, जहाँ नेपाली संस्कृति और भाषाएँ काफी हद तक प्रचलित थीं।
नेपाल घाटी के बाहर के राज्य भी आपस में लड़-झगड़कर अपनी जन- धन-शक्ति को क्षीण कर रहे थे। राजाओं ने आपसी झगड़े, मल्ल राजाओं द्वारा देव- मंदिर की संपत्ति का व्यक्तिगत उपभोग, राजा भास्कर मल्ल द्वारा हिंदू भावना के विरुद्ध एक मुसलमान को प्रधान मंत्री बनाने का कार्य आदि मध्य कालीन राजनीतिक स्थिति को धूमिल बनाते हैं और साथ ही नेपाल की सार्वभौम स्वतंत्रता को अधर में डाल देते हैं। शमशुद्दीन इलियास के आक्रमण के पश्चात् राजा स्थितिमल्ल ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार साम्राज्यवादियों से नेपाल का बचाने वाले के रूप में पृथ्वीनारायण शाह ऐतिहासिक आवश्यकता स्वरूप दिखलाई पड़ते हैं।
नेपाली गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया किंतु यह आक्रमण नेपाल को महँगा पड़ा। चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दीं और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश किया। इसी वर्ष ग्रेट ब्रिटेन और नेपाल में द्वितीय वाणिज्य संधि संपन्न हुई और नेपाल में एक अंग्रेज कूटनीतिज्ञ की नियुक्ति की व्यवस्था हो गई थी ।
लेखक :
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Friday, June 5, 2026
हिमालय केंद्रित महत्वपूर्ण जानकारियां✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
हिमालय एशिया में स्थित एक सर्वाधिक प्राचीन पर्वत-शृंखला है। इसको 'पर्वतराज' हिमालय भी कहते हैं। कालिदास तो हिमालय को पृथ्वी का मानदंड मानते हैं। हिमालय की पर्वत श्रंखलाएँ शिवालिक कहलाती हैं। सदियों से हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में ऋषि-मुनियों का वास रहा है और वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते रहे हैं । हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र रहा है। हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है।
चार श्रेणियों में हिमालय की भू-आकृतियों का विभाजन-
हिमालय पर्वत तन्त्र को तीन मुख्य श्रेणियों के रूप में विभाजित किया जाता है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मोड़ से लेकर अरुणाचल के ब्रह्मपुत्र के मोड़ तक एक-दूसरे के समानान्तर पायी जाती हैं। चौथी गौड़ श्रेणी असतत है और पूरी लम्बाई तक नहीं पायी जाती है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से चार समानांतर श्रेणियों में विभक्त है
(क) परा-ट्रांस- हिमालय-
परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय या टेथीज हिमालय भी कहते हैं, यह हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है। यह कराकोरम, लद्दाख और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है।
(ख) महान हिमाद्रि हिमालय
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है, हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। यह श्रेणी मुख्य केन्द्रीय क्षेप द्वारा मध्य हिमालय से अलग है। यद्यपि पूर्वी नेपाल में हिमालय की तीनों श्रेणियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं।
(ग) मध्य लघु हिमालय
हिमालय पर्वत का वह भाग जो महान हिमालय के दक्षिण सामानान्तर तक फैला हुआ है, लघु हिमालय कहलाता है। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर है। यह 80 से 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 1628 मीटर से लेकर 3000 मीटर है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4500 मीटर है। यह हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है - पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार, उत्तराखंड में मस्सोरी या नागटिब्बा तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(घ) परा या ट्रांस हिमालय-
उपरिवर्णित तीन मुख्य श्रेणियों केआलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। यह शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है। बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। हिमालय पर्वत 7 देशों की सीमाओं में फैला हुआ हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार।
प्रादेशिक विभाजन
अनेक भू–वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय को पांच क्षैतिज प्रदेशों में बाँटा है। इनमें चार भारत के हिस्से में और एक नेपाल के हिस्से में फैला हुआ है।
1.कश्मीर हिमालय -
कश्मीर हिमालय गिल्गिट-बल्टिस्तान, कश्मीर घाटी से लेकर हिमाचल प्रदेश तक फैला हुआ है । यह सिंधु नदी से सतलुज नदी के बीच लगभग 560 किलोमीटर लंबाई तक फैला हुआ है। इसकी प्रमुख पर्वत मालाएं जंस्कार और पीर-पंजाल हैं। इसकी सबसे ऊंची चोटी नंगा पर्वत है।सिंधु नदी की पाँचो प्रमुख सहयोगी नदियों का उद्गम स्थल कश्मीर हिमालय से ही होता है। इसकी पाँच सहयोगी नदियां झेलम, रावी, ब्यास, सतलुज और चिनाब हैं।
2.कुमाऊँ हिमालय -
सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच के भाग को कुमाऊं कहा जाता है । यह उत्तरी भारत में स्थित हिमालय पर्वत श्रृंखला का एक प्रमुख प्रादेशिक भाग है। यह पश्चिम में सतलुज नदी से लेकर पूर्व में काली नदी तक लगभग 320 किलोमीटर की लंबाई में फैला हुआ है। मुख्य रूप से उत्तराखंड राज्य में स्थित यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, झीलों और ऊँची चोटियों के लिए प्रसिद्ध है।
3.नेपाल हिमालय-
सरयू नदी से कोसी नदी के बीच के भाग को कहा जाता है। यह हिमालय पर्वत श्रृंखला का सबसे ऊँचा और मध्य-पूर्वी भाग है, जो काली नदी से लेकर तीस्ता नदी तक लगभग 800 किलोमीटर (500 मील) तक फैला हुआ है। दुनिया की 14 सबसे ऊँची चोटियों में से 8 चोटियाँ इसी क्षेत्र में स्थित हैं, जिसमें सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट भी शामिल है।
4.बंगाल हिमालय -
कोसी नदी से मानस नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।यह पूर्वी हिमालय का एक प्रमुख उपभाग है जो पश्चिम में कोसी नदी से लेकर पूर्व में मानस नदी के बीच विस्तृत है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, चाय बागानों, समृद्ध जैव विविधता और साहसिक पर्यटन के लिए जाना जाता है।
5.असम हिमालय -
मानस नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक के भाग को कहा जाता है। यह हिमालय पर्वतमाला के उस हिस्से का पारंपरिक नाम है जो पश्चिम में भूटान की पूर्वी सीमा और पूर्व में त्सांगपो नदी के ग्रेट बेंड के बीच स्थित है। इस पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी नामचा बरवा है । अन्य ऊँची चोटियों में बरवा की सहोदर चोटी ग्याला पेरी , कांगटो और न्येगी कानसांग शामिल हैं । यह क्षेत्र अभी भी सामान्यतः कम ही सर्वेक्षण किया गया है और बाहरी लोगों द्वारा कम ही दौरा किया जाता है। यह पूर्वी भाग में स्थित है। "असम हिमालय" नाम भ्रामक है, क्योंकि इस पर्वतमाला के कुछ भाग दक्षिण-पूर्वी तिब्बत में हैं , जबकि अन्य भाग भूटान और भारत के उत्तरी असम , सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों में स्थित हैं ।
100 से ज्यादा सर्वोच्च शिखर
संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, शिवशंकर, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। कुछ प्रमुख शिखरों की ऊंचाई इस प्रकार है :-
माउंट एवरेस्ट : 8848.86 मीटर
के - 2 : 8611 मीटर
कंचनजंघा : 8,586
लहोस्ते : 8,516
मकालू : 8,463
15 हजार से ज्यादा हिमनद-
हिमनद मुख्य रूप से उन ठंडे क्षेत्रों में बनते हैं जहाँ सालों-साल बर्फ गिरती है, लेकिन गर्मियों में उसका पूरा हिस्सा पिघल नहीं पाता। नई बर्फ के जमने के भारी दबाव से पुरानी बर्फ एक कठोर और सघन दानेदार रूप फर्न में बदल जाती है। अंततः, यही संघनित बर्फ पिघलकर ठोस हिमनदीय बर्फ बन जाती है।
हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबा सियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है।
हिमालय की प्रमुख नदियां -
हिमालयी जल निकासी प्रणाली के बारे में हिमालयी नदी प्रणाली में मुख्य रूप से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन शामिल हैं । इन नदियों में बर्फ पिघलने और वर्षा दोनों से पानी आता है । इस प्रणाली की नदियाँ बारहमासी होती हैं। ये मार्ग हिमालय के उत्थान के साथ- साथ होने वाली अपरदन गतिविधियों द्वारा निर्मित विशाल दर्रों से होकर गुजरते हैं।
हिमालय पर्वतमाला में 19 प्रमुख नदियाँ बहती हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
सिंधु और ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी नदियाँ हैं, जिनमें से प्रत्येक का जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ों में लगभग 100,000 वर्ग मील अथवा (260,000 वर्ग किमी) में फैला हुआ है। 19 नदियों में से पाँच नदियाँ, जिनका कुल जलग्रहण क्षेत्र लगभग 51,000 वर्ग मील (132,000 वर्ग किमी) है, सिंधु नदी प्रणाली से संबंधित हैं- झेलम , चिनाब , रावी , ब्यास और सतलुज हैं। ये सामूहिक रूप से भारत के पंजाब राज्य और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बीच विभाजित विशाल क्षेत्र को परिभाषित करती हैं । शेष नदियों में से नौ नदियाँ अन्य नदियों से संबंधित हैं।
गंगा प्रणाली -गंगा, यमुना , रामगंगा, काली (काली गंडक), करनाली, राप्ती, गंडक , बागमती और कोसी आदि नदियाँ पहाड़ों में लगभग 84,000 वर्ग मील (218,000 वर्ग किमी) क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
ब्रह्मपुत्र प्रणाली -
तीन नदियाँ ब्रह्मपुत्र प्रणाली से संबंधित हैं— तीस्ता , रायडक और मानस-जो हिमालय में 71,000 वर्ग मील/ 184,000 वर्ग किमी क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
पर्वत श्रृंखलाओं के उत्तर में उद्गम-
हिमालय की प्रमुख नदियाँ पर्वत श्रृंखलाओं के उत्तर में उद्गम करती हैं और गहरी घाटियों से होकर बहती हैं ,जो आम तौर पर किसी भूवैज्ञानिक संरचनात्मक नियंत्रण, जैसे कि भ्रंश रेखा, को दर्शाती हैं। सिंधु नदी प्रणाली की नदियाँ सामान्यतः उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हैं, जबकि गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र से बहते हुए आमतौर पर पूर्व दिशा में बहती हैं।
गहरी खाइयों के अलावा, ये नदियाँ अपने पर्वतीय मार्ग में यू-आकार और वी- आकार की घाटियाँ, तीव्र धाराएँ और झरने भी बनाती हैं। मैदानी इलाकों में, वे समतल घाटियों, घुमावदार जलमार्गों, धनुषाकार झीलों, बाढ़ के मैदानों, गुंथी हुई धाराओं और नदी के मुहाने के पास डेल्टा जैसी निक्षेपण संबंधी संरचनाएं बनाते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में, इन नदियों का मार्ग अत्यधिक घुमावदार होता है, लेकिन मैदानी इलाकों में, वे एक मजबूत घुमावदार प्रवृत्ति प्रदर्शित करती हैं और अक्सर अपना मार्ग बदलती रहती हैं।
कोसी नदी का प्रवाह अस्थिर है और इसमें काफी कटाव होता रहता है, जिसके कारण अंततः इसके प्रवाह में गाद की मात्रा बढ़ जाती है। इसी गाद की वृद्धि के कारण कोसी नदी अक्सर अपना मार्ग बदलती रहती है।कोसी नदी को 'बिहार का दुःख' भी कहा जाता है।
धार्मिक स्थल -
हिमालय की गोद में बसे धार्मिक स्थल अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यहाँ हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के कई प्रमुख तीर्थस्थल स्थित हैं।
1.उत्तराखंड के हिमालयी स्थल:
चार धाम: केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री हिमालय के सबसे पवित्र चार धाम माने जाते है। इनमें हरिद्वार, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश भी आते हैं।
2.कैलाश मानसरोवर (तिब्बत):
हिमालय क्षेत्र में स्थित यह स्थान भगवान शिव का सबसे बड़ा धाम माना जाता है और यह हिंदू, बौद्ध व जैन धर्मों के लिए पवित्र है।
3.हेमकुंड साहिब चमोली:
चमोली ज़िले में स्थित यह सिखों का सबसे ऊँचा और पवित्र गुरुद्वारा है।
4. हिमाचल प्रदेश के हिमालयी स्थल: ज्वाला देवी और कांगड़ा देवी मंदिर हैं जो हिमाचल की घाटियों में स्थित प्राचीन और आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
5.तवांग मठ (अरुणाचल प्रदेश):
हिमालय के पूर्वी छोर पर स्थित, यह भारत का सबसे बड़ा बौद्ध मठ है।
6. नेपाल के हिमालयी स्थल :
पशुपति नाथ मंदिर काठमांडू (नेपाल) में बागमती नदी के किनारे स्थित भगवान शिव का यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।
7.मुक्तिनाथ मंदिर:
हिमालय क्षेत्र में स्थित यह हिंदुओं और बौद्धों दोनों के लिए एक अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है।
8. जम्मू और कश्मीर के स्थल:
अमर नाथ गुफा: हिमालय की बर्फीली वादियों में स्थित इस गुफा में प्राकृतिक रूप से 'बर्फानी बाबा' (शिवलिंग) बनते हैं।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
Thursday, June 4, 2026
गंडक नदी का उद्गम: हिमालय से हिन्द महासागर तक का चित्र-विचित्र सफर✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
यह नदी तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों से निकलती है और नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा गढ़ी से नेपाल में प्रवेश करती है। गंडक नदी को काली गंडकी ,नारायणी और शालीग्रामी भी कहा जाता है। यूनानी के भूगोलवेत्ताओं की तथा महाकाव्यों में उल्लिखित सदानीरा भी यही है। यह मुख्य रूप से भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश राज्यों तथा नेपाल में बहने वाली एक बारहमासी हिमालयी नदी प्रणाली है,जो तिब्बत-नेपाल सीमा के पास धौलागिरी और अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से गुजरती , लगभग 7,620 मीटर की ऊँचाई से निकलते हुए मुस्तांग क्षेत्र से नेपाल में प्रवेश करती है।
ऊपरी हिस्से में इसे विभिन्न धाराओं काली गंडक और त्रिशूलगंगा के रूप में जाना जाता है। 'काली गंडकी' आगे चलकर नारायणी व सप्त गंडकी के नाम से जानी जाती है । तिब्बत-नेपाल सीमा के पास के मुक्तिनाथ के मुस्तांग क्षेत्र से गुजरते हुए यह चितवन में, काली गंडकी नदी और त्रिशुली से मिलती है।
त्रिशूली नदी मध्य नेपाल में बहने वाली एक प्रमुख और तेज़ बहाव वाली नदी है जो प्रसिद्ध नारायणी (गंडक) नदी में मिल जाती है। त्रिशूली काठमांडू से ऊपर से मध्य नेपाल के मनोकामना से कुछ ऊपर से भी गुजरती है।
यह काठमांडू-पोखरा और पोखरा मुक्तिनाथ राजमार्ग के समानांतर बहती रहती है। इसमें जगह जगह पर अनेक पर्वतीय धाराएं और झरने मिलते रहते हैं।गंडकी की मुख्य सहायक नदियों में त्रिशूली, बूढ़ी गंडक, मास्यांगड़ी, पंचांग, सरहद और मायांगड़ी आदि शामिल हैं। बूढ़ी गंडक (सिकराना) इस नदी की प्राचीन धारा है जो मुंगेर के संमुख गंगा में मिलती है। इनके संगम स्थल से भारतीय सीमा तक नदी को नारायणी के नाम से जाना जाता है। इसका कुल बेसिन क्षेत्र लगभग 29,705 वर्ग किलोमीटर है।
नदी का पारिस्थितिक महत्व:-
नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान, भारत के वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य और उत्तरी बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों जैसे पारिस्थितिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों का निर्माण गंडक नदी के प्रवाह के कारण हुआ है।
तराई क्षेत्र में गंडक नदी और उसकी सहायक नदियों की उपस्थिति ने नेपाल और भारत में विशाल प्राकृतिक वन भंडारों का निर्माण किया है। ये वन बाघ, तेंदुए, गैंडे, गौर आदि कई वन्यजीवों और पक्षी प्रजातियों का घर हैं। यह नदी स्वयं भी एक पारिस्थितिक अभ्यारण्य है, क्योंकि यह गंगा डॉल्फिन, कछुए, घड़ियाल, मगर और महसीर जैसी कई लुप्तप्राय प्रजातियों का घर है। तराई क्षेत्र के अलावा, इस नदी ने उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की पारिस्थितिकविविधता को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उपजाऊ मैदान, मिट्टी की गुणवत्ता और पानी की प्रचुरता के कारण आम और केले के पेड़ों के बागों से भरे हुए थे । इनमें से अधिकांश बागों की जगह अब खेत ले चुके हैं, फिर भी इस नदी ने इन क्षेत्रों की कृषि क्षमता बढ़ाने में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।विभिन्न कहानियों से जुड़ाव :-
नारायणी नाम अमोनाइट जीवाश्मों की उपस्थिति के कारण पड़ा है। इन जीवाश्मों को हिंदू देवता विष्णु या नारायण के रूप में पूजा जाता है।
इसे शालिग्राम के नाम से भी जाना जाता है। यह विष्णु प्रिया बृंदा के भौतिक स्वरूपा तुलसी व जलस्वरूपा नारायणी शालिग्रामी नाम से भी अभि- विहित होती है।गज-ग्राह की पौराणिक कथाएँ :-
गज-ग्राह की कहानी यहीं से शुरू होती है। कहा जाता है कि त्रिवेणी धाम में वन और जल के देवताओं, अर्थात् गज और ग्राह, हाथी और मगरमच्छ के बीच युद्ध छिड़ गया था। इस कथा का उल्लेख श्रीमद् भगवद् गीता में मिलता है , जिसमें बताया गया है कि एक दिन एक विशाल हाथी अपने झुंड के साथ नदी में स्नान करने आया । यह वही स्थान था जहाँ जल के देवता, मगरमच्छ, निवास करते थे। हाथी को देखकर उन्होंने उसका पैर पकड़ लिया और उसे गहरे पानी में खींचने का प्रयास किया। यह संघर्ष हजारों वर्षों तक चलता रहा। अंत में हाथी ने भगवान विष्णु या हरि से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनी गई और हरि ने अन्य देवताओं की उपस्थिति में उन्हें मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त कराया था।
त्रिवेणी धाम :-
भारतीय उपमहाद्वीप में इसका प्रवेश द्वार त्रिवेणी धाम है। जहां नाम बदलकर गंडकी या गंडक रख दिया जाता है। यहीं पर पहाड़ों की संकरी घाटियों से बच निकल कर फैल जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानों में और आकर बड़ा हो जाता है। आगे सुमेस्वर की पहाड़ियों पंचनाद और सोनाहा होते हुए नदी आगे बढ़ती है।
वाल्मीकि नगर:-
त्रिवेणी के बाद, यह नदी वाल्मीकि नगर से होकर गुजरता है। भैंसलोटन गांव अपने बाघ अभ्यारण्य के लिए जाना जाता है। यह ऋषि वाल्मीकि की कहानियों से भी जुड़ा हुआ है। यह वाल्मीकि आश्रम का मूल स्थान माना जाता है। गांव के आस पास के जंगल में एक पुराने मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। आज का वाल्मीकि नगर सन् 1900 के दशक के आरंभ में अस्तित्व में आया, जब नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच गंडक परियोजना को मंजूरी दी गई थी। बांध और नहरों के निर्माण के साथ-साथ इस क्षेत्र में बंगलों और कर्मचारियों के क्वार्टरों का भी निर्माण हुआ। इनमें से अधिकांश आज भी बरकरार हैं, जबकि अन्य के अवशेष गांव में अभी भी देखे जा सकते हैं।
पहाड़ों से मैदान में प्रवेश:-
नेपाल के पहाड़ों के आखिरी नज़ारों को पीछे छोड़ते हुए मैदानों में बूढ़ी गंडक की एक झलक दिखाई देती है। नदी केकिनारों पर छोटे-छोटे कस्बे और कृषि भूमि स्थित हैं। एक समय ऐसा भी था जब नदीकिनारे आम के बागों से सजे हुए थे। बिहार के मैदानी इलाकों में इसे विकसित किया गया भूमि मार्ग भी इसी तरह का एक अद्भुत मार्ग है। इसी मार्ग के समानांतर एक मार्ग इस नदी के जल स्रोतों और घने वनों द्वारा सुगम बनाया गया है।एक मार्ग यह मार्ग वृज्जि गणराज्य और मगध की राजधानियों को जोड़ता था।
नेपाल का शाही राजमार्ग:-
नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र की ओर एक मार्ग है जिसे अशोक ने शाही राजमार्ग में बदल दिया था। यह मार्ग अशोक स्तंभों और बौद्ध स्तूपों से घिरा हुआ है। मुख्य रूप से बसाढ़, केसरिया, अरेराज, लौरिया नंदनगढ़ और रामपुरवा में मौजूद पेड़ों को अपना घर मिल गया है।
विकसित किए गए घाट:-
नदी व्यापार को सुगम बनाने के लिए घाट विकसित किए गए । जिन घाटों का नाम रीवा घाट और सत्तर घाट रखा गया था।अंततः यह नदी हाजीपुर और सोनपुर के जुड़वां शहरों में पहुँच गया। इस क्षेत्र को हरिहर-क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।
इसी क्षेत्र में गज-ग्राह की कहानी समाप्त होती है। यह क्षेत्र पटना के साथ व्यापार को सुगम बनाने के लिए विकसित किया गया था। फिर गंडकी की मुलाकात गंगा से होती है। उसकी यात्रा में उसका साथ देने के लिए बंगाल की खाड़ी की अथाह गहराई में जाकर समाप्त होती है।
सांस्कृतिक विरासत से संबंध :-
नेपाल की भूमि से गुजरने के बाद, यह त्रिवेणी धाम में भारत-नेपाल सीमा को पार करती है और बिहार के वाल्मीकि नगर पहुँचती है। वाल्मीकि नगर से, गंडक नदी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों से होकर बहती है । यह नदी काफी दूर तक उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों के बीच सीमा निर्धारित करती है। उत्तर प्रदेश में यह नदी महराजगंज और कुशीनगर जिलों से होकर बहती है। बिहार में यह चंपारन, सारन और मुजफ्फरपुर जिलों से होकर बहती हुई 192 मील के मार्ग के बाद पटना के संमुख गंगा में मिल जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग 1310 किलोमीटर है।
गंडक नदी, विश्व की अन्य नदियों और जल संसाधनों की तरह, पारिस्थितिक जीविका का आधार रही है। इसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है और इसके किनारों पर स्थित अनेक सांस्कृतिक धरोहर स्थलों को इसने प्रेरित किया है।
भारत नेपाल की संयुक्त विद्युत गंडक परियोजना :-
यह बिहार और उत्तर प्रदेश की संयुक्त नदी घाटी परियोजना है। 1959 के भारत- नेपाल समझौते के तहत इससे नेपाल को भी लाभ है। इस परियोजना के अन्तर्गत गंडक नदी पर त्रिबेनी नहर हेड रेगुलेटर के नीचे बिहार के बाल्मीकि नगर मे बैराज बनाया गया। इसी बैराज से चार नहरें निकलतीं हैं, जिसमें से दो नहरें भारत मे और दो नहर नेपाल में हैं। यहाँ15मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है और यहाँ से निकाली गयी नहरें चंपारण के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से की सिंचाई करतीं है।
वाल्मीकि नगर का बैराज 1969- 70 में बना। इसकी लम्बाई 747.37 मीटर और ऊँचाई 9.81 है। इस बैराज का आधा भाग नेपाल में है। 256.68 किमी पूर्वी नहर से बिहार के चम्पारन, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिलों के 6.68 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई होती है। इसी नहर से नेपाल के परसा, बाड़ा, राउतहाट जिलों के 42,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। मुख्य पश्चिमी नहर से बिहार के सारन जिले की 4.84 लाख भूमि तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर जिलों के 3.44 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। इस नहर से नेपाल के भैरवा जिले की 16,600 हेक्तर भूमि की सिंचाई होती है।
बिहार उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश :-
यहीं से गंडक नदी अंततः भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सुमेश्वर की संकरी घाटियों और बलुआ पत्थर की पर्वत श्रृंखला को छोड़कर बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में अपनी यात्रा शुरू करती है। यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारत की ओर बहती है और फिर उत्तर प्रदेश-बिहार राज्य सीमा के साथ व गंगा के मैदान में दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती है। यह 765 किलोमीटर लम्बे घुमावदार रास्ते से गुज़रकर पटना के सामने गंगा नदी में मिल जाती है।
हरि हर क्षेत्र :-
हरिहर-क्षेत्र मेले के नाम से भी जाना जाने वाला यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के दिन शुरू होता है और एक महीने तक चलता है। माना जाता है कि प्राचीन काल में अरब और फारस के व्यापारी घोड़े और ऊँट जैसे जानवरों और कालीन और इत्र जैसी वस्तुओं का व्यापार करने के लिए मेले में आते थे । वाल्मीकि नगर से गंडक नदी दक्षिण की ओर बहती है और कई कस्बों और बस्तियों को पार करते हुए हरिहर-क्षेत्र पहुँचती है। आज हरिहर-क्षेत्र का नाम हाजीपुर और सोनपुर के जुड़वां कस्बों के नाम पर रखा गया है। ये कस्बे ऐतिहासिक पटना शहर के पार और गंडक नदी और गंगा के संगम पर स्थित हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, इस क्षेत्र को कई तरह से लाभ हुआ है, जैसे संतों और विद्वानों की यात्रा, व्यापार और यात्रा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि। हाजीपुर को प्राचीन काल के ऋषियों का निवास स्थान माना जाता है । राम और लक्ष्मण मिथिला जाते समय इस मार्ग से गुजरे थे, और भगवान बुद्ध भी वैशाली (वर्तमान में बसाढ़ गाँव) में रहने के दौरान यहाँ आते थे। हाजीपुर शहर की स्थापना 1345 ईस्वी से 1358 ईस्वी के बीच गंडक नदी के पूर्वी तट पर बंगाल के राजा हाजी इलियास या शमशुद्दीन इलियास द्वारा की गई थी। उन्होंने गंडक नदी के किनारे एक भव्य किला बनवाया था, जिसकी प्राचीरें कुछ साल पहले तक दिखाई देती थीं। हालांकि, किले की मस्जिद, या पत्थर मस्जिद, आज भी शान से खड़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में नदी के किनारे कई घाट और मंदिर बनाए गए थे, लेकिन उनमें से अधिकांश 1934 के भीषण भूकंप में नष्ट हो गए। उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं, जैसे नेपाली मंदिर, हाजुरी मठ और सिद्धि घाट आदि।
सोनपुर :-
हाजीपुर की तरह, सोनपुर शहर में भी नदी के किनारे मंदिर स्थित हैं और इनका निर्माण उसी कालखंड में हुआ था। ब्रिटिश भारत में, इन दोनों शहरों में कईसामाजिक और उपयोगी बुनियादी ढाँचे विकसित किए गए थे। गंडक नदी पर दोनों शहरों को जोड़ने वाले पुल बनाए गए थे, जिनमें एक रेलवे पुल भी शामिल था। हाजीपुर में, नदी के किनारे एक स्कूल, कई बंगले, एक घुड़दौड़ का मैदान और एक नृत्य क्लब का निर्माण किया गया था, लेकिन नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण, 1837 में स्कूल को छोड़कर बाकी सब कुछ नष्ट हो गया । अपनी गलती से सबक लेते हुए, ब्रिटिश अधिकारियों ने बंगलों, नृत्य क्लब और अन्य बुनियादी ढाँचे का अगला निर्माण सोनपुर में नदी से दूर करवाया।
धीरे-धीरे मेला भी सोनपुर में स्थानांतरित हो गया। यह एशिया के सबसे बड़े पशु व्यापार मेलों में से एक था और आज भी है।
पर्व त्योहार :-
इस क्षेत्र के प्रमुख त्योहारों में से छठ पूजा, गंडक नदी के किनारे मनाया जाता है, क्योंकि इस नदी का जल गंगा के जल के समान ही पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिंदू माह चैत् नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) और कार्तिक नवरात्रि (अक्टूबर-नवंबर) में वर्ष में दो बार मनाया जाता है।
छठ पूजा :-
सूर्य देव की पूजा करने और परिवार की समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है। यह उत्सव चार दिनों तक चलता है और पूजा के प्रति उत्साह सूर्य देव की प्रार्थना, उपवास और पवित्र जल में स्नान करने से प्रकट होता है। ऐसा माना जाता है कि पवित्र जल में स्नान करने से शरीर से विषाक्त पदार्थों का निष्कासन होता है, जिससे व्यक्ति शीत ऋतु के आगमन के लिए तैयार हो जाता है। यह भी माना जाता है कि स्नान के बाद सूर्य के संपर्क में आने से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है जिससे समग्र कार्य प्रणाली में सुधार होता है। इसलिए, जल इस अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण तत्व है।
अन्य पर्व :-
कई अन्य त्यौहार इस प्रकार हैं -
कार्तिक पूर्णिमा स्नान , जन्माष्टमी , संक्रांति , महाशिवरात्रि आदि। इन सभी त्यौहारों के लिए स्नान की रस्में उत्तरी बिहार क्षेत्र में गंडक नदी से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
माघ संक्रांति मेला :-
फरवरी में आयोजित होता है और यह गंडक नदी के बाएं और दाएं किनारों पर स्थित है। इसका अर्थ यह है कि मेले का आधा हिस्सा नेपाल प्रांत में और आधा भारत में है। प्राचीन काल में, इस मेले का उपयोग दोनों देशों के बीच व्यापार के लिए भी किया जाता था, लेकिन अब इसे मेले की परंपरा को जारी रखने और मनोरंजन के मंच के रूप में आयोजित किया जाता है।
सीमित रास्ते से प्रवेश :-
नदी के किनारे बसे अधिकांश ऐतिहासिक शहरों के विपरीत, गंडक नदी और उसके किनारों पर बसे शहरों का संबंध अलग तरह का है। नदी के किनारे लगातार बने घाटों और पूजा स्थलों के विपरीत, गंडक के किनारे बसे शहरों में नदी तक पहुँचने के सीमित रास्ते घाटों के रूप में थे, जबकि नदी का अधिकांश किनारा प्राकृतिक वनस्पतियों से आच्छादित था।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
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पर्वतराज हिमालय और भारत ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
हिमालय एशिया में स्थित एक सर्वाधिक प्राचीन पर्वत-शृंखला है। इसको 'पर्वतराज' हिमालय भी कहते हैं, जिसका अर्थ है - पर्वतों का राजा । कालिदास तो हिमालय को पृथ्वी का मानदंड मानते हैं। हिमालय की पर्वत श्रंखलाएँ शिवालिक कहलाती हैं। सदियों से हिमालय की कन्दराओं (गुफाओं) में ऋषि-मुनियों का वास रहा है और वे यहाँ समाधिस्थ होकर तपस्या करते रहे हैं । हिमालय आध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र रहा है। हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है।
चार श्रेणियों में हिमालय की भू-आकृतियों का विभाजन
हिमालय पर्वत तन्त्र को तीन मुख्य श्रेणियों के रूप में विभाजित किया जाता है जो पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मोड़ से लेकर अरुणाचल के ब्रह्मपुत्र के मोड़ तक एक-दूसरे के समानान्तर पायी जाती हैं। चौथी गौड़ श्रेणी असतत है और पूरी लम्बाई तक नहीं पायी जाती है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से चार समानांतर श्रेणियां ये चार श्रेणियाँ हैं-
(क) परा-ट्रांस- हिमालय
परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय या टेथीज हिमालय भी कहते हैं, यह हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है। यह कराकोरम श्रेणी, लद्दाख श्रेणी और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है। इसका निर्माण टेथीज सागर के अवसादों से हुआ है। इसकी औसत चौड़ाई लगभग 40 किमी है। यह श्रेणी इण्डस-सांपू-शटर-ज़ोन नामक भ्रंश द्वारा तिब्बत के पठार से अलग है।
(ख) महान हिमालय
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। इसके क्रोड में आग्नेय शैलें पायी जाती है जो ग्रेनाइट तथा गैब्रो नामक चट्टानों के रूप में हैं। पार्श्वों और शिखरों परअवसादी शैलों का विस्तार है। कश्मीर की जांस्कर श्रेणी भी इसी का हिस्सा मानी जाती है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं। यह श्रेणी मुख्य केन्द्रीय क्षेप द्वारा मध्य हिमालय से अलग है। यद्यपि पूर्वी नेपाल में हिमालय की तीनों श्रेणियाँ एक दूसरे से सटी हुई हैं।
(ग) मध्य लघु या मध्य हिमालय
हिमालय पर्वत का वह भाग जो महान हिमालय के दक्षिण सामानान्तर तक फैला हुआ है, लघु हिमालय कहलाता है। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर है। यह अंचल मध्य हिमालय या हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में यह मध्य हिमालय ही है। लघु हिमालय 80 से 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 1628 मीटर से लेकर 3000 मीटर है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 4500 मीटर है।
मध्य हिमालय हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है - पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार, उत्तराखंड में मस्सोरी या नागटिब्बा तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।
(घ) शिवालिक परा या ट्रांस हिमालय
उपरिवर्णित तीन मुख्य श्रेणियों केआलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। यह शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। शिवालिक श्रेणी को बाह्य हिमालय या उप हिमालय भी कहते हैं। यहाँ सबसे नयी और कम ऊँची चोटी है। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच दून घाटियाँ पायी जाती हैं।
हिमालय पर्वत 7 देशों की सीमाओं में फैला हुआ हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार।
प्रादेशिक विभाजन
अनेक भू–वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय को पांच क्षैतिज प्रदेशों में बाँटा है।
कश्मीर हिमालय - सिन्धु नदी से सतलुज नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
कुमाऊँ हिमालय - सतलुज से काली नदी (सरयू) के बीच के भाग को कहा जाता है।
नेपाल हिमालय - सरयू नदी से कोसी नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
बंगाल हिमालय - कोसी नदी से मानस नदी के बीच के भाग को कहा जाता है।
असम हिमालय - मानस नदी से ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक के भाग को कहा जाता है।
100 सर्वोच्च शिखर
संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय में 100 से ज्यादा पर्वत शिखर हैं
दुनिया में कम से कम 109 चोटियां ऐसी है जिनकी ऊंचाई समुद्र तल से ऊंचाई 7200 मीटर से ज्यादा है। इनमें से अधिकांश चोटियां हिमालय क्षेत्र में हैं। इनमें दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमालय, अन्नपूर्णा, शिवशंकर, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। कुछ प्रमुख शिखरों की ऊंचाई इस प्रकार है -
माउंट एवरेस्ट : 8848.86 मीटर
के - 2 : 8611 मीटर
कंचनजंघा : 8,586
लहोस्ते : 8,516
मकालू : 8,463
15 हजार हिमनद
हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबासियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है। हिमालय की कुछ प्रमुख नदियों में शामिल हैं - सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज।
सांस्कृतिक हिमालय
हिमालय भारतभूमि का अभिभावक है। वैदिक काल से ही हिमालय के पर्वतों की महिमा का उल्लेख होता आया है। यह भारत की पवित्र नदियों गंगा तथा यमुना का उद्गम स्थल भी है। मानसरोवर और कैलास में भारत के प्राण बसते हैं। दोनों भारत के अनादि इतिहास से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। मानसरोवर'मानस-सरोवर' का संक्षेपण है जो तिब्बत में स्थित एक झील है, और इसकी कुछ दूरी पर स्थित है – कैलास पर्वत। इसे कुबेर का वैभवपूर्ण निवास और शिव का स्वर्ग माना जाता है। कैलास हिमालय पर्वतमाला में स्थित है और मानसरोवर झील के उत्तर में सबसे ऊँची चोटियों में से एक माना जाता है। कैलास जैसे पावन पुष्करिणी समावृत अनन्त सौंदर्यप्रिय पर्वत का गुणगान संस्कृत साहित्य में प्रचुर हुआ है। यह शुभ्र पर्वत शिव और पार्वती का क्रीडा-स्थल है। इसे संस्कृत साहित्य में भगवान शिव का मुक्त अट्टहास कहा गया है।
अमरकोष में कैलास की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है –” के जले लासो लसनमस्य केलासः स्फटिकः तस्यायं कैलासः” = जो जल के मध्य स्फटिक के समान विद्यमान हो, वह कैलास है।
रत्नों का जन्मदाता
'हिमालय अनेक रत्नों का जन्मदाता है “अनन्तरत्न प्रभवस्य यस्य”, उसकी पर्वत-शृंखलाओं में जीवन औषधियाँ उत्पन्न होती हैं। “ भवन्ति यत्रौषधयो रजन्याय तैल पुरत सुरत प्रदीपः”, वह पृथ्वी में रहकर भी स्वर्ग है। “भूमिर्दिवभि वारूढं।”
धार्मिक स्थल
हिमालय में कुछ महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी हैं। इनमें हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश, कैलाश, मानसरोवर तथा अमरनाथ,शाकम्भरी प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथ गीता में भी इसका उल्लेख मिलता है।
राष्ट्रकवि श्री दिनकर की अभिव्यंजना
भारत के राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह "दिनकर” ने हिमालय की महत्ता इन शब्दों में व्यक्त किया है -
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,
युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,
निस्सीम व्योम में तान रहा
युग से किस महिमा का वितान?
कैसी अखंड यह चिर-समाधि?
यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?
तू महाशून्य में खोज रहा
किस जटिल समस्या का निदान?
उलझन का कैसा विषम जाल?
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
ओ, मौन, तपस्या-लीन यती!
पल भर को तो कर दृगुन्मेष!
रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल
है तड़प रहा पद पर स्वदेश।
सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,
गंगा, यमुना की अमिय-धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार,
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति! तू ने की पुकार,
'पद-दलित इसे करना पीछे
पहले ले मेरा सिर उतार।'
उस पुण्यभूमि पर आज तपी!
रे, आन पड़ा संकट कराल,
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।
वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?
ओ री उदास गण्डकी! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ?
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग?
अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी
यह सुलग रही है कौन आग?
प्राची के प्रांगण-बीच देख,
जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल,
तू सिंहनाद कर जाग तपी!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
'हर-हर-बम' का फिर महोच्चार।
ले अंगडाई हिल उठे धरा
कर निज विराट स्वर में निनाद
तू शैलीराट हुँकार भरे
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद
रे तपी आज तप का न काल
नवयुग-शंखध्वनि जगा रही
तू जाग, जाग, मेरे विशाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!!
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
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