(कविराज लछिराम का सामान्य परिचय बस्ती के छंदकार की इसी श्रृंखला की कड़ी 4 में 14 अप्रैल 2017 को भी प्रकाशित हो चुका है । पाठक गण अवलोकन कर सकते हैं - संपादक)
लछिराम की वंशावलि
ललकराम हरि भक्त लछि के परदादा रहे मंगलराम दादा राजाओं से सम्मानित थे। पलटनराम रामभक्त पिता ब्रह्मभट्ट रहे लछिराम कविराज राजाओं के आश्रित थे।
जानकीशरण पुत्र रहे अकेले अपने वश में जगदीश, राज, श्याम,चंद्रभाल पौत्रदि थे।।
– डॉ राधेश्याम द्विवेदी 'नवीन
जीवन परिचय :-
हिंदी में लछिराम नाम के सात कवियों का उल्लेख मिलता है जिनमें सबसे अधिक प्रख्यात हैं 19वीं शती के अमोढ़ा या अयोध्या वाले लछिराम(1841-1904 ई.) हैं। इनका जन्म पौष शुक्ल दशमी, संवत् 1898 (तदनुसार 1841 ई ) में अमोढ़ा परगना के गांव शेखपुरा (जि. बस्ती) में हुआ था। पिता पलटन ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण थे।
इसकी पुष्टि इस दोहे से होती है -
वंदीजन लछिराम को नगर अमोढ़ा वास सूर्यवंश उपरोहिती शेखपुरा पुर खास ।।
राजा अमोढ़ा इनके पूर्वजों को अयोध्या से अमोढ़ा लाए थे। ये कुछ दिन अयोध्या नरेश महाराज मानसिंह (प्रसिद्ध कवि द्विजदेव) के यहाँ राज दरबार में रहे। इस कुल में कवियों की परंपरा विद्यमान थी। जीवन के प्रारंभिक चरण में ही यह रीतिकालीन कवियों से अधिक प्रभावित हुए। ब्रह्मभट्ट कवि प्रायः आश्रय दाताओं की तलाश में अपने काव्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। सं.1904 वि./ 1847 ई. में लछिराम लामाचकनुनरा ग्रामवासी जिला सुल्तानपुर के साहित्य शास्त्री कवि "ईश" के पास अध्ययनार्थ चले गए थे । 5 वर्ष वहाँ अध्ययन करने के बाद अपने घर शेखपुरा चले आए। फिर 16 वर्ष की अवस्था में संवत 1914 वि./1857ई .में इनकी भेंट अयेध्याधिपति राजा मानसिंह "द्विजदेव" से हुई। उन्होंने अपनी पद्धति से लछिराम जी को शिक्षा देकर काव्य रचना में निगुण बनाया। यहीं पर इन्हें "कविराज" की उपाधि दी और अपना आश्रय भी प्रदान किया। मानसिंह के प्रति उन्होंने 'मानसिंह' जंगाष्टक' नामक ग्रन्थ लिख रखी थी। मानसिंह जब तक जीवित रहे तब तक लछिराम को अयोध्या दरबार से 1200 रूपया मासिक पेंशन मिलती रही। उस दरबार में लछिराम के अतिरिक्त जगन्नाथ अवस्थी, बलदेव तथा पं० प्रवीन आदि अन्य कवि भी राजाश्रम में पल रहे थे।
- (डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )
राजा मानसिंह द्विजदेव का निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि. तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं-कहीं उनको 1871ई .में मृत्यु दिखाकर त्रुटि दिखाई जाती है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लछिराम जी ने निम्न छन्द पढ़ा था -
कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ ।
वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो ।
कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।
- (डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत - “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )
"द्विजदेव" के माध्यम से लछिराम का संपर्क अनेक काव्य रसिक और गुणज्ञ राजाओं से हुआ । उनको आगरा और अवध प्रांत के लगभग सभी राजा और महाराजा जानने और पहचानने लगे थे। जब कभी वह महाराज जी के साथ राज्य कार्य के रूप में अंग्रेजी शान शौकत भरे अवध राज दरबार में जाते थे , जहां कई अपने मंद - मंद स्वरों से छंदों का अजश्र निर्झर प्रवाहित कर हजारों लोगों के अंतर्मन को रसानुभूति प्रदान करता था।
महाराजा मानसिंह के संरक्षण में रहने के कारण लछिरामजी कवि रूप में बहुचर्चित हुए और अपने समय के बड़े-बड़े समारोहों के अतिरिक्त साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में भी स्थान पाने लगे।मिश्र बंधुओ ने लछि- राम जी के प्रति अपनी साहित्यिक दृष्टि डाली । आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इन्हें अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में परवर्ती रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ और अंतिम छंदकार माना है। पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने इनका साहित्यिक मूल्यांकन किया है। पंडित नक्छेद तिवारी ने उनकी जीवनी लिखी है। उनके प्रिय शिष्य यक्षराज ने इनका साहित्यिक गौरव गान किया है। पंडित राम भरोसे ने लछिराम जी के बारे में पर्याप्त सामग्री जुटाई है। उनके शिष्य बृजेश कवि ने लछिराम को अपना गुरु बनाया है। बिहारी कवि ने लछिराम जी का शिष्यत्व ग्रहण किया है।
सम्बद्ध राजघराने :-
लछिराम ने अनेक राज घरानों से जुड़े रहे।
उन्होंने प्रत्येक के नाम पर एक- एक रचना लिखी है। इन प्रमुख राजाओं का नाम इस प्रकार है -
1. महाराज मानसिंह 'द्विजदेवसी अयोध्या
2. प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' अयोध्या
3. राजा शीतला बख्श सिंह 'महेश' बस्ती
4. लक्ष्मीश्वर सिंह
5. रावणेश्वर प्रसाद सिंह
6. मुनेश्वर बख्श सिंह
7. मटेश्वर बख्श सिंह
8. महेन्द्र प्रताप सिंह
9. कमला नन्द सिंह 'सरोज'
घर और जमीन उपहार में मिला था :-
राजा महेश शीतला बख्श सिंह बस्ती के राजा थे। लछिराम जी जिस समय उनके दरबार में पहुंचे उस समय उनके यहां पुत्र उत्सव का कार्य चल रहा था । लछिराम जी राजा साहब के दरबार में पहुंचकर जो छंद प्रस्तुत किया वह इस प्रकार है -
मंगल मनोहर सकल अंग कोहर से,
आनंद मगन पै छट्टान अधिकाती है।
हेरानि हंसिनि कर पद की चलनि ,
सुर मांग ठूंनकनि पै पियूष सरसाती है। लछिराम शीतलाबख्श बाललाल जाके, भाल की ललई पै उकती अधिकाती है।
मेष राशि प्रथम मुहूर्त प्रभात उड़यो,
कुज लै दिनेश उदयाचल कैराती है।।
बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह ने उनके घर के शेखुपुरा के पास इन्हें 50 बीघे का "चरथी" गाँव (वर्तमान दुबौलिया ब्लॉक में स्थित) उपहार में दिया और निवासार्थ मकान भी बनवा दिया था। आज भी इनके वंशज यहाँ पर रहते हैं। अपने आश्रयदाता राजाओं से कवि को अधिकाधिक द्रव्य, वस्त्राभूषण तथा हाथी, घोड़े आदि पुरस्कार में प्राप्त होते रहे हैं।
लछिराम और राजा प्रताप नारायण सिंह 'ददुवा साहब’ :-
महाराज प्रताप नारायण सिंह उर्फ ददुआ साहब महाराज मानसिंह के दौहित्र थे। मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर जब राजा प्रताप सिंह 'वीरेश' ददुआ साहब अयोध्या नरेश बने तो कविराज लछिराम के आश्रय दाता भी बने। एक बार राजा साहब ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा तो उन्होनें निम्नलिखित छंद सुनाया था -
वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं।
मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं।
कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं। महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह,
कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।
अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा। इन्होंने प्रताप रत्नाकर' नामक ग्रन्थ की रचना किया।
अयोध्या धाम में वास रहा :-
लछिराम जी अयोध्या में रहते थे। वहीं उन्होंने एक राम मंदिर बनवाया; कई कुएँ खुदवाए; और कई बाग़ भी लगवाए थे। अपनी जाति के बहुत से लड़कों के पढ़ने का उन्होंने प्रबंध कर रखा था । सुनते हैं, दो-एक पंडित भी उन्होंने पढ़ाने के लिए रखते थे, और एक पाठशाला भी खोल रखी थी। उनका पुत्र जानकी शरण आठ-नौ वर्ष का रहा है। जो और अपनी माँ और पिता के साथ अयोध्या में रह रहा था। लछीरामजी के शिष्य, यशराज कवि, ने अपने गुरु, कविवरजी की मृत्यु उपरान्त उनके शोक में एक लम्बी कविता लिखी , जिसके कुछ अंश आगे दिया जा रहा है। कविवर जी के विषय में हमने जो कुछ लिखा है, वह उसी कविता के आधार पर है। लछीराम जी के छायाचित्र से मालूम होता है कि वे पुराने ढंग के कवि थे, और पुराने ढंग की पगड़ी पहनते और लाठी बाँधते थे, तथापि पुरानी चाल के जूतों की जगह वे बूट पहनते थे।
रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य:-
लछिराम रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य कवि हैं। उनकी कृतियों में रस, अलंकार, शब्दशक्ति, गुण और वृत्ति आदि रीतितत्वों का लक्षण, उदाहरण सहित, सांगोपांग निरूपण हुआ है। अपनी शास्त्रीय दृष्टि के लिए वह संस्कृत में "काव्यप्रकाश", भानुदत्त की "रसमंजरी", अप्पयदीक्षित के "कुवलयानंद" आदि और हिंदी में भिखारी दास तथा केशवदास आदि के ऋणी कहे जा सकते हैं। ढाँचा पुराना होने पर भी उनकी सहज काव्य प्रतिभा रमणीय भाव दृश्य का चित्रण करती है। बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह से, जो एक अच्छे कवि थे, से 50 बीघे भूमि पाई थी । दरभंगा, पुरनिया आदि अनेक राजधानियों में इनका सम्मान हुआ। प्रत्येक सम्मान करने वाले राजा के नाम पर इन्होंने कुछ न कुछ रचना की है, जैसे, मानसिंहाष्टक, प्रताप रत्नाकर, प्रेम रत्नाकर (राजा बस्ती के नाम पर), लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, (दरभंगा नरेश के नाम पर), रावणेश्वर कल्पतरु (गिध्दौर नरेश के नाम पर), कमलानंद कल्पतरु (पुरनिया के राजा के नाम पर जो हिन्दी के अच्छे कवि और लेखक थे ) इत्यादि। इन्होंने अनेक रसों पर कविता की है। समस्यापूर्तियाँ बहुत जल्दी करते थे। वर्तमान काल में ब्रजभाषा की पुरानी परिपाटी पर कविता करनेवालों में ये बहुत प्रसिद्ध हुए हैं।
रचनाएँ :-
लछिराम की प्रसादगुण युक्त ब्रजभाषा में रचनाएँ है। कुछ के नाम ये हैं - मुनीश्वर कल्पतरु, महेंद्र प्रतापरस भूषण, रघुबीर विलास,लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, प्रताप रत्नाकर, रामचंद्र भूषण, हनुमंत शतक, सरयू लहरी, कमलानंद कल्पतरु, मानसिंह जंगाष्टक, , सियाराम चरण चंद्रिका, श्रीकृष्ण भक्ति पर आधारित करुणाभरण नाटक सं०1761 वि., प्रेम रत्नाकर, राम रत्नाकर, लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, रावणेश्वर कल्पतरु ,महेश्वर विलास ,नायिका भेद, देवकाली शतक, राम कल्पतरु, गंगा लहरी और नखशिख परम्परा आदि उनकी उत्कृष्ट रचनायें है।
लच्छीराम जी के प्रति भावनात्मक उद्गार :-
लछिराम जी कारयित्री प्रतिभा के कवि थे। यह अपने साहित्यिक, आकर्षक, भावपूर्ण
आकृति से जहाँ भी जाते थे लोग उनको आदर-सत्कार देते थे। काव्यपाठ में इनकी वाणी इतनी बुलन्द रहती थी कि इनके छन्दों को सुनकर अन्य कवि दंग रह जाते थे। बड़े-बड़े राजाओं और महाराजाओं के यहाँ इन्हें सम्मान मिलता था। उनके सम्पर्क में रहकर दर्जनों कवि अच्छी ख्याति पायें। ब्रहृमभट्ट परिवार में उत्पन्न होने के कारण यह चारण परिवार के अवश्य थे किन्तु सम्मान को ही सब कुछ समझते थे। जिस राज दरबार में इन्हें कीमती दुशाला नहीं मिलता था, उस दरबार में पुनः नहीं जाते थे। यही कारण था कि आश्रयदाता राजा लोग इन्हें घोड़े हाथी की सवारी ही नहीं अपितु धन-धान्य देकर विदा करते थे। रीवा के ब्रजेश कवि और कविराज यशराज उनके योग्य शिष्यों में से थे। पंडित बलदेव अवस्थी, द्विजबल देव ,बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर,कविवर भगवंत आदि इनके अत्यंत सन्नीकट के कवि और छंदकार थे। महाराज मानसिंह 'द्विजदेव' का साहित्यिक प्यार इन्हें किशोर अवस्था से ही मिला हुआ था।
लछिराम की रचनाओं के कुछ नमूने :-
1.सौंदर्यशृंगार का सवैया
पेंजनी कंकन की झनकार सों,
नासिका मोरि मरोरति भौंहैं।
ठाढी रहै पग द्वैक चलै,
सने स्वेद कपोल कछू उघरौहैं।
यों लछिराम सनेह के संगन,
साँकरे मे पर प्यारी लजौहैं।
छाकी रह्यो रस-रंग अभी,
मनमोहन ताकि रह्यो तिरछौहैं॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)
2.कृष्णअभिसार का सवैया-
मौज में आई इतै लछिराम,
लग्यौ मन साँवरो आनंद-कंद में।
सूनौ संकेत निहारत ही पर्यौ,
साँवरौ आनन घूँघट बंद में।
बोलिबे कौ अभिलाख रचै पै न,
बोल कछू दुख-रासि दुचंद में।
ह्वै रही रैन-सरोज-सी प्यारी,
परी मनों लाज मनोज के फंद में॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)
3.शिव धनुष भंजन -
बान महाबली और
अदेव और देवनहू दृग जोर्यो।
तीनहू लोकन के भट भूप
उठाय थके सबको बल छोर्यो॥
घोर कठोर चितै सहजै
लछिराम अमी जस दीपन घोर्यो।
राजकुमार सरोज-से हाथन
सो गहि शंभु-सरासन तोर्यो॥
- कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)
सोलह श्रृंगार परक कवित :-
1.
सत सिंगार साजि, कीन्हौ अभिसार जाइ,
जोबन बहार रोम-रोम सरसत जात।
लछिराम तैसी झनकार पैजनी की कर,
कंकन खनक चूरी चारु परसत जात।
झरत प्रस्वेद, मुख चूनर सुरंग बीच,
विहँसत मन सारदा कौ तरसत जात।
दामिनी अमंद सौहें बस रस फंद चंद,
मानों लाल बादर में मोती बरसत जात॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)
2.
चटपटी चाह अंग उपटे अनंग के री,
रंग रावटी ते काम नट की कुमारी-सी।
कबि लछिराम राज-हंसनि सों मंद-मंद,
परम प्रकासमान चाँदनी सँवारी-सी॥
नागरि निकुंज में न हेर्यौ ब्रजचंद मुख,
रुख पै सहेली भई आँखे रतनारी-सी।
भौंहन मरोरति, बिथोरति मुकुत हार,
छोरति छरा के बद, रोष-मद ढारी-सी॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)
3.
सामुहै सुमन बरसाइ सुघराई संग,
लछिराम रंग सारदा हू कौ रितै रहै।
छाती में लगाइ सूम थाती-सौ कमल कर,
सुकुमारताई कों सराहि दुचितै रहै॥
अलक लंबाई, चारु चख चपलाई,
अधरान की ललाई पर हरष हितै रहै।
भाई! मनमोहन, गोराई मुख-मंडल पै,
राई नौन बारि घरी चारि लौ चितै रहै॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)
4.
सजल रहत आप औरन को देत ताप,
बदलत रूप और बसन बरेजे में।
ता पर मयूरन के झुंड मतबारे साले,
मदन मरोरै महा झरनि मरेजे में॥
कवि लछिराम रंग साँवरो सनेही पाय,
अरजि न मानै हिय हरषि हरेजे में।
गरजि-गरजि विरहीन के बिदारे उर,
दरद न आवै, धरै दामिनी करेजे में॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240)
5.
वार लकवारहिं लपेटि गुण बंधन में,
मन्मथ चक्र लौं सवारि मगरूरी है।
मंजु मपि बलित बहार जा वसन भलो,
राहु रवि-संग मो विलास ब्रजरूरो है॥
लछिराम राधे अंग चंपक बरन पर,
सौहैं करै सौतिन गरब चक चूरो है।
समय सुमन स्याम सुंदर सरूरो फल्यौ,
जूरो सुभ सिखर सुहाग फल पूरो है॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 434)
6.
मरम न खोलैं खरी भरम न बोलैं कछु,
अजब अतोलैं पीर हीयरै धरी रहै।
खान-पान सौरभ सिंगारहु सँवारे कौन,
स्वास में सहेलिन की मति भरमी रहै।
लछिराम कीरति कुमारी छाम तन-मन,
ज्वाला मुखी विरह लपट लहरी रहै।
सौंरि कर साँवरे विहार परमानंद को,
पौरि पर पोखराज माला सी परी रहै॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436)
7.
कसनिभुजानि की सुजानिकीकहीन जाति,
उमदानि अंगन अनंग की घनी रहै।
छूटि-छूटि जाते बार विथुरे सुकंधन पें,
लिपिगे सिंगारन बनावति जनी रहै॥
कवि लछिराम जाहि निशान पुरति के हू,
निसापूरि करिबे के ब्यौंत हि ठनी रहै।
रैनि सब जागी अनुरागी दिन हू में बाल,
लाल उर लागिबे की लालसा बनी रहै॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)
8. श्रीराम
भानुवश भूषण महीप रामचंद्र वीर,
रावरो सुजस फैल्यो आगर उमंग में।
कवि लछिराम अभिराम दूनो शेषहू सो,
चौगुनो चमकदार हिमगिरि गंग में॥
जाको भट धेरे तासो अधिक परे है ओर,
पंचगुनो हीराहार चमक प्रसंग में।
चंद मिलि नौगुनो नछत्रन सो सौगुनो ह्वै,
सहस गुनो भो छीरसागर तरंग में॥
– कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)
9. शृंगार
प्रीति रावरे सो करी, परम सुजानि जानि,
अब तौ अजान बनि मिलत सबेरे पै।
लछिराम ताहू पै सुरंग ओढनी लै सीस,
पीत-पट देत गुजरैटिन के खेरे पै।
सराबोर छलकै प्रस्वेद कन, लाल भाल,
मदन मसाल वारौ वदन उजेरे पै।
आपुने कलंक सों कलंकिनी बनी हौ लूटि,
और हू को घरत कलंक सिर मेरे पौ॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240)
10. श्रीकृष्ण
भीरते अहीरन की बिछलि पर्यो धों कहा,
जितै जलकेलि तू सदा बिहारियत है।
लछिराम औचक उलटि परी अंजन ते,
रुख तिरछोहैं यो पुरुष कारियत है॥
सुमन सिरीष सुकुमार मन मोहन पै,
कहर कटाछन वजर पारियत है।
अजब अधीर वीर वारो जमुना के वीर,
तीरथ के तीर काहू तीर मारियत है॥
– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)
11. शृंगार
मोतिन के चौक पुंज पाँवरे पसारि पौंरि,
पूजि पग नखन महावर थरति है।
भूखन वसन पीरे कंकन जंजीरे कर,
मौरी माल वंदन प्रभावर धरति है॥
लछिराम अरविंद स्याम अंजली से राखि,
नवल किसोरी भोरी भाँवरि भरति है।
थारन में छलकै रतन सुवरन भार,
भोर ही सों गौरी की निछावरि करति है॥
- साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436)
12. भ्रांति
उरज महेश उदै बदन सुधाकर कौं,
बेनी बंक लोचन त्रिबेनी रंग आला है।
बेंदी भाल बेसरि बुलाक विहँसनि सीरी,
मदन मरोरही के कतरै कसाला है॥
तीरथ अरत प्रतिबिंबित पराग-पग,
लछिराम खोलें तीनों तापन दिवाला है।
साला सी रतन रतनाकर विसाला ब्रज,
जालापापकाटिबे को बालाहै कि माला है॥
— साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)
13. शृंगार
आए कहूँ अनंत विहार करि मंदिर में,
सामुहै झमकि छवि दामिनी की छौरै है।
आरस-बलित बागौ मगरजी ढीली पाग,
बदन चंद्र भाल भौहन के कोरै हैं॥
भरम खुल्यौ न अंग परसत मोहिनी कौ,
लछिराम सान सँग मोहन मरोरै हैं।
लोचन सुरंग हेरि बाल के सरोष मानी,
रंगसाज मदन मजीठ रंग-बोरै हैं॥
– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)
14.श्री रामजी
भरम गवावै झरबेरी संग नीचन ते,
कंटकित बेल केतकीन पै गिरत है।
परिहरि मालती सु माधवी सभासदनि,
अधम अरूसन के अंग अभिरत है॥
लछिराम सोभा सरवर में विलास हेरि,
मूरख मलिंद मन पल ना थिरत है।
रामचंद्र चारु चरनांबुज बिसारि देश,
बन-बन बेलिन बबूर में फिरत है॥
- कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)
15. श्रृंगार
बदल्यो बसन सो जगत बदलोई करै,
आरस में होत ऐसो या में कहा छल है।
छापहै हरा की कै छपाए हौ हरा को छाती,
भीतर झगा के छाई छबि झलझल है।
लछिराम हौं हूँ धाय रचिहौ बनक ऐसो,
आँखिन खबाये पान जात क्यों अमल है।
परम सुजान मनरंजन हमारे कहा,
अँजन अधर में लगाए कौन फल है॥
- रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)
16.कृष्ण प्रेम
स्याम घन रंग तेज तरल त्रिभंग सौहै,
लोचन सनेही सीख मानि रहिबो करो।
लछिराम चौचंद चवायन परोसिनी तैं,
बंद करि कान सानमान सहिबो करो॥
त्रिभुवन वारि नट नागर मुकुट पर,
साखन दै गौरि मन कह गहिबो करो।
अभिलाख लाखन धरौंगी पौरि ताखन पै,
माख न करौंगी ब्रज लाख कहिबो करो॥
- साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)
यज्ञराज की 'शोकप्रकाश’में दी गई श्रद्धांजलि:-
अब हम कविराज लछिराम के परम शिष्य यज्ञराज कवि की 'शोकप्रकाश' नामक कविता का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत करते हैं-
श्रीकविवर लछिराम हाय! बैकुंठ सिधारे;
यज्ञराज तब शिष्य सुनत दुख लह्योअपारे।
बैठि गयो करि हाय, कहूँ कछु सूझतनाहीं;
किधों साँच कै झूठ,हायबूझौं क्यहि पाहीं?
मुख ते कढ़े न बैन, नयनआँसू बह झरझर;
आवन लगी उसाँस, गातकाँपै सबथर-थर।
होय नहीं मन धीरु पीर उर असहन बाढ़ी;
भाँत-भाँति की उठै चित्त में चिंता गाढ़ी।
जीवनजानि अनिस्य लह्यो धीरज मन माहीं
लछीराम को मरन सोचिवे लायक नाहीं।
मरन सोचिबे जोग जाहि मारै भुजंग डसि;
पावकजरि,जलडूब,मरैविषखाय,मारिअसि
सुजस नाम विख्यात नहींजाको जग माहीं;
मानुष-तन जो पाय सुकृतकीन्हींकछुनाहीं।
यहि बिधि के सब जीव मरेपरजमपुरजाहीं;
इनसबकोसुनिमरनसाधुजनअतिपछिताहीं।
सरस सकल साहित्यईस-कविताहिपढ़ायो;
रचना रुचिर कबित्त माहिं बहु प्रेम बढ़ायो।
मानसिंहद्विजदेवजगत-बिख्यातअबधपति,
सुनि कबित्त है दानेरीझिसम्मानकियोअति।
श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;
कमलानन्द 'सरोज'सराहतसुकवि-समाजा।
बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;
करत बारतालापदुहुन को दोउसुख साजा।
भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;
अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।
एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;
दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।
गरजनि सिंह-समान सभा मैंश्रीकविबरकी;
सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी
रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;
जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।
मानसिंह द्विजदेवजगतबिख्यातअबधपति,
सुनिकबित्तहै दाने रीझिसम्मानकियो अति।
श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;
कमलानन्द 'सरोज'सराहतसुकवि समाजा।
बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;
करत बारतालाप दुहुनकोदोउ सुख साजा।
भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;
अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।
एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;
दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।
गरजनि सिंह-समानसभा मैंश्रीकविबर की;
सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी
रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;
जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।
अचल अवध के बीच राम मन्दिर बनवायो;
वन-प्रमोद जहँ सीय राम अतिसै सुपायो।
सदा औधपुर बास सुखद सरजू-जल-सेवा;
लषन-राम-सिय छोड़ि औरदूसर नहि देवा।
भगवंत कवि की काव्यांजलि :-
प्रतापगढ़ (अवध) के भगवंत कवि ने लछि रामजी की मृत्यु पर एक पद्य कहा है। उसे भी हम नीचे देते हैं-
अंस निज सुत मैं प्रसंस जगती के तल
रचना-सकति राखे सिष्यनि के हृद मैं;
सूझ भगवन्त मैं सु बूझ कबि ज्ञानिन में
रीझ राखी नृपनि औ' खीझ बैरी सद मैं।
कवि लछिराम कीनी चातुरी चलत एती
बानी बरवानी ज्ञान राखे बेद-नद मैं;
घन राखे भौन मैं सुख सब सामुहे मैं
तन राखे चौखट औ' मन राम-पद मैं।
– महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली खंड-5 (पृष्ठ 175)
बिहारी कवि की शोकांजलि :-
लछिराम जी का निधन पर इनके योग्य शिष्य बिहारी कवि ने जो शोकांजलि प्रस्तुत की निम्नलिखित है।यह शोकांजलि आचार्य कवि लछिराम भट्ट प्रबन्ध में भी है।
भूषन के रस के रसांग ध्वनि लक्षना के, काव्य सुधा सिन्धु के बिहारी वेसआशा के।
आन, बान, शान से बिताये दिन जीवन के, पूर्ण काम कीन्हे सवै निज अभिलाषा के ।
आदर महान सम्मान करते थे सभी,
राजे महाराजे बिज्ञ सुघर अवासा के ।
पुनः
संभवत्रिकाल में नअब है न हो सकेंगे ऐसे, लछिराम जैसे महाकवि ब्रजभाषा के।
XXX
छन्दन में धारै शब्द रस अनुकूल वृत्ति, भाव भरते थे भव्य भूरि बरवानी के ।
X X X
उक्तिमुक्तिकल्पनाअनोखीचोखीबोलिबोलि,
मन्त्र-मुग्ध करते रहे वे प्रान प्रानी के ।
X। X। X
काव्य रत्नाकर को मथि के अमोल रत्न, विश्व में बिहारी बगराये सुखदानी के ।
X। X X। X।
काबिन में रवि महाकवि लछिराम भये, लाडले सपूत वर भारती भवानी के ।
मूल्यांकन:-
लछिराम एक प्रसिद्ध तथा व्यापक प्रचार प्रसार वाले राज कवि थे। उस समय भारत के प्रत्येक कोनो में इनको अच्छी ख्याति मिल चुकी थी। आचार्य कवि लछिराम भट्ट नामक विषय पर डा. राम फेर त्रिपाठी ने शोध प्रवन्ध प्रस्तुत किया है। इसको , अन्य तत्कालीन साहित्य तथा परिवारी जनों से व्यक्तिगत सम्पर्क कर डा. सरसजी ने भी इनका बहुत उच्चकोटि का मूल्यांकन बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान भाग एक के पृष्ठ 57 पर किया है-“आचार्य कवि लछिराम भट्ट बस्ती जनपद के छन्द परम्परा के विकास के वर्चस्वी छन्दकार थे। पीताम्बर से लेकर लछिराम तक जो छन्द परम्परा का विकास बस्ती जनपद के काव्य भूमि पर सतत रुप से हुआ उसमें छन्द परम्परा के आदि चरण के स्थाई स्तम्भ के रुप में लछिरामजी ने परवर्ती छन्दकारों को मानक छन्द विधान प्रस्तुत किया और भविष्य के लिए एक एसी छन्द परम्परा का मार्ग दर्शन दिया है, जिसमें छन्दों के आचार्य रंगपाल जी, बलराम मिश्र द्विजेश, जनार्दन नाथ त्रिपाठी गोपाल, राम चरित पाण्डेय पावन आदि के मध्य चरण को सुविकसित और पल्लवित किया है। संक्षिप्त में जनपदीय छन्द परम्परा को विकसित, पुष्पित और पल्लवित करने में लछिरामजी का योगदान गौरवशाली और स्तुत्य रहा है।”
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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