Tuesday, February 17, 2026

अयोध्या के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के आधार पर राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहिबा के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा रहे हैं।

     राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को राजा घोषित किया गया और 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू करने तक अयोध्या राज पर राज किया। राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह बाघों का शिकार किया करते थे। असंख्य कमरों वाले उनके राजमहल में दो कमरे उनकी ट्रॉफियों से भरे हुए हैं। अयोध्या में स्थित कामता प्रसाद सुंदर लाल महाविद्यालय के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में एक सभागार भी बना हुआ है ।

अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से खास लगाव 

अवधी रवायत बेगम अख़्तर का ज़िक्र बग़ैर यह कहानी अधूरी रहेगी।वह अवध की मशहूर तवायफ थीं। बेगम अख़्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी का समय 7अक्टूबर 1914 से 30अक्टूबर  1974 रहा। वह भारत की एक  प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी।उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्मश्री तथा सन 1975  में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया था। उन्हें "मल्लिका- ए-ग़ज़ल" के ख़िताब से नवाज़ा गया था।

बालिका अख़्तरी को बचपन से ही संगीत से कुछ ऐसा लगाव था कि जहाँ गाना होता, छुप छुप कर सुनती और नकल करती। घर वालों ने पहले तो इन्हें रोकना चाहा; पर समुद्र की उत्तुंग तरंगो को भला कौन रोक सकता था! यदि कोई चेष्टा भी करता, तो शायद लहरों का वह सशक्त ज्वारभाटा उसे ही ले डूबता। 2014 की फ़िल्म “डेढ़ इश्क़िया” में विशाल भारद्वाज ने बेगम अख़्तर की प्रसिद्ध ठुमरी “हमरी अटरिया पे” का आधुनिक रीमिक्स रेखा भारद्वाज की आवाज में प्रस्तुत किया है।उन्होंने दिल के टूटने को भी दिलकश बना दिया था।

  उसके ही जमाने में महाराज जगदम्बिका प्रताप सिंह अयोध्या के राजा थे। अख्तरी बाई फैजाबाद में बेगम अख़्तर नाम से जानी जाती थी। वह राजा साहब की रक्षिता थीं और अयोध्या राज दरबार की प्रतिष्ठित गायिका भी।जगदम्बिका प्रताप सिंह आज़ादी तक अयोध्या के राजा रहे। राजा साहब बेगम अख़्तर के एक दादरे पर ऐसे फ़िदा हुए कि पचास एकड़ का एक बाग उनके नाम कर दिया था।अख्तरी बाई उनके दरबार की लम्बे समय तक गायिका रही।

     अख्तरी बाई जब फैजाबाद छोड़ कर जाने लगीं तो वह बाग राजा साहब को लौटाने गयीं। राजा साहब ने मना किया तो वह अड़ गई और कही, “हुज़ूर आपने मेरी वजादारी की । इसके लिए ताउम्र मैं आपकी शुक्रगुज़ार रहूंगी। लेकिन अगर मैं इसे बेचकर जाती हूं, तो फैजाबाद के लोग मेरे बारे में क्या सोचेगें? तवारीख़ मुझे माफ नहीं करेगी कि एक गाने वाली बाई ने राजा के उपहार में दिए बाग का सौदा कर लिया। इसलिए आप इसे रख लें ताकि इतिहास में आपके साथ ही मेरा नाम भी सम्मान के साथ लिया जाय। राजा साहब के मना करने पर उन्होंने राजा साहब के दामाद डा. रमेन्द्र मोहन मिश्र को वह बाग लौटा दिया।

      आज भी दस्तावेज़ों में उस ज़मीन का कागज़ अख़्तरी बाई फैजाबादी बनाम डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र के तौर पर दर्ज है।रमेन्द्र जी, राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की इकलौती बेटी राजकुमारी विमला देवी जी के पति थे।पद्मभूषण छन्नूलाल लाल मिश्र ने यहीं शागिर्दी कर संगीत में अपनी पहचान बनाई।उनका पानी की तरह हारमोनियम पर चलता हाथ यहीं सधा।वे यहीं पहले बजाते थे बाद में गाने लगे। भारतीय संगीत की दुनिया के कई बड़े नाम चतुर्भुज स्थान में ही पले और बढ़े हुए हैं।

अख्तरी बाई की दुखद मौत

30 अक्टूबर 1974 को नीलम गमाडिया, उनकी मित्र, जिन्होंने उन्हें अहमदाबाद आमंत्रित किया था, की बाहों में उनका निधन हो गया , जो उनका अंतिम प्रदर्शन बन गया।  1974 में तिरुवनंतपुरम के पास बलरामपुरम में अपने आखिरी संगीत कार्यक्रम के दौरान , उन्होंने अपनी आवाज़ का स्वर ऊंचा कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनका गायन उतना अच्छा नहीं था जितना वे चाहती थीं और वे अस्वस्थ महसूस कर रही थीं। उन्होंने खुद पर जो तनाव डाला, उसके परिणाम स्वरूप वे बीमार पड़ गईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

'पसंद बाग’ ठाकुरगंज , लखनऊ में समाधि

अख्तरी बाई की समाधि लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में स्थित उनके घर 'पसंद बाग' के भीतर एक आम के बगीचे में बनाई गई है । उन्हें उनकी माता मुश्तरी साहिबा के साथ दफनाया गया था। हालांकि, वर्षों से बढ़ते शहर के कारण बगीचे का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया है और समाधि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। लाल ईंटों से घिरे संगमरमर के मकबरे को 2012 में पिएत्रा ड्यूरा शैली के संगमरमर जड़े के साथ पुनर्स्थापित किया गया था। लखनऊ के चाइना बाजार में 1936 में बने उनके घर को संग्रहालय में परिवर्तित करने के प्रयास जारी हैं। 


लेखक 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

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