Wednesday, February 11, 2026

अयोध्या के राजा मानसिंह के बीरोचित कार्य:- ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता जी बहराइच के तत्कालीन राजा रहे। हनुमत पाठक उर्फ मान सिंह का शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। उन्हीं के समय 1842 ई. से अयोध्या राज सदन कचहरी के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा था। पिता दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 ई में हो गया था।  1846 में इनके बड़े पिता बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और पूर्ण सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। 1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें अंग्रेजों द्वारा इनाम में बड़ी जागीरें मिली थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया है।

      बाद में देश के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने के कारण उनमें आत्म श्लाघा उत्पन्न हुआ होगा। दरबारी कवियों उनकी देश विरोधी छवि उन्हें बताई होगी।आम जन में उनकी छवि धूमिल हुई होगी और प्रायश्चित स्वरुप उनमें वैराग्य भाव आ गया होगा। सारा ऐश्वर्य त्याग कर वे वृंदावन चले गए और राधा माधव के प्रेम में निमग्न हो गए । उनकी कविता में राधा- माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था। 11 अक्टूबर सन् 1870 ई० को मान सिंह का स्वर्गवास हो गया था।

मानसिंह महाराज को, 

छायो प्रबल प्रताप।

सुहृद सुमन सीतल करन,

अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, 

चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, 

सागर सील स्सरूप

 x        x        x           

मानसिंह महाराज को, 

सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, 

के.सी.एस. कल इंद।।

     बड़े पिता बख्तावर सिंह और पिता दर्शन सिंह द्वारा अर्जित मेहदौना की जागीर को संभालने और अयोध्या क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। उनके कुछ प्रमुख बीरोचित कार्य निम्न लिखित हैं - 

1.तीन डाकुओं को बंदी बनाना

तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी।

 2.बखतावरसिंह को छुड़वाना 

उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध से ही यह संभव हुआ है।

3.सूरजपूर की गढ़ी फतह करना 

किला सूरजपुर रियासत - बहरेलिया क्षत्रिय (सिसोदिया की शाखा) का जिला बाराबंकी में स्थित है। यह महाराजा ब्रह्म सिंह सिसोदिया द्वारा स्थापित रियासत है। उस समय सूरजपूर का तालुक़द़ार बड़ा अत्याचारी था। बादशाह को यह समाचार मिला कि उसने अपनी गढ़ी में 400 बन्दी बन्द रखे हैं जिनको वह लकड़ी इकट्ठा करके जीते जी भस्म करना चाहता है। बादशाह ने राजा बख्तावर सिंह से कहा कि अपने भतीजे को इस दुष्ट को दण्ड देने के लिये आज्ञा दो। राजा साहब बड़ी चिन्ता में पड़ गये क्यों कि मानसिंह की उस समय उमर कम थी परन्तु बादशाह की आज्ञा कैसे टल सकती थी। महाराजा मानसिंह ने गुप्तचर भेजे तो विदित हुआ कि सूरजपूर के राजा की गढ़ी में 3 हाते हैं। तीन हजार सिपाही हथियारबन्द उपस्थित हैं और ग्यारह तोपें गढ़ी के बुर्ज़ों पर चढ़ी हैं। यह भी निश्चित रूप से विदित हुआ कि परसों सब बन्दी भस्म कर दिये जायँगे। महाराजा साहब ने सोचा कि सेना लेकर चलें तो गढ़ी घिर जायगी परन्तु बन्दी न बचेंगे। इस कारण तीन सौ वीर योद्धा लेकर कुछ रात रहे गढ़ी के पास पहुंचे और चर भेज कर यह जान लिया कि गढ़ी के एक कोने के पहरे वाले किसी काम से गये हुये हैं। महाराजा मानसिंह ने तुरन्त सीढ़ियाँ लगा कर बिना लड़े-भिड़े तीन सौ वीरों के साथ गढ़ी में प्रवेश किया और बन्दियों को और तोपों को अपने अधिकार में कर लिया। गढ़ी वाले चौंके तो चारों ओर से गोलियां चलाने लगे। महाराज मानसिंह ने उन्हीं की तोपें उन पर दागी और दो घण्टे में गढ़ी टूट गई, और अत्याचारी जीता पकड़ लिया गया। गढ़ी के अन्दर एक जगह लकड़ी का ढेर लगा हुआ था। उस दिन जय की दुन्दुभी न बजती तो सारे बन्दी भस्म कर दिये जाते। बन्दी छोड़ दिये गये । उस राजा की एक गढ़ी और थी जिसमें दो हजार सिपाही थे और बहुत सा गोला बारूद और खाने-पीने की सामग्री रक्खी हुई थी। वहाँ ईश्वर की लीला यह हुई कि गढ़ी के रक्षक डर के मारे गढ़ी छोड़ कर भाग गये। बादशाह ने मानसिंह की वीरता से प्रसन्न हो कर उनको राजा मानसिंह बहादुर की उपाधि दी। 

4.सीहीपूर के राजा का दमन 

सीहीपूर परगना पश्चिम राठ तहसील बीकापुर जिला अयोध्या में स्थित है। वीरता का काम जो बादशाह की आज्ञा से किया गया सीहीपूर के राजा का दमन था। इसपर महाराजा मानसिंह को क़ायमजंग का पद मिला और एक विलायती तलवार जो ईरान के बादशाह ने बादशाह नसीरउद्दीन हैदर को उपहार में भेजी थी उनको दी गई। उनके पीछे कर्नल स्लीमन साहब के कहने से उन्होंने भूरे खाँ डाकू को पकड़ा जो काले पानी भेजा गया। इसके उपहार में बादशाह ने महाराजा मानसिंह को ग्यारह फैर तोप की सलामी दी। यह पद किसी को प्राप्त न था।नाज़िमों की सलामी हुआ करती थी परन्तु महाराजा मानसिंह को इस अधिकार के बिना विचारे सलामी मिली। 

5.अजब सिंह डाकू को मारना 

अजब सिंह डाकू के मारने पर झालरदार शमला ताज आकार की टोपी मिली। इसके बाद जब वाजिदअली शाह बादशाह हुये तो अजब सिंह डाकू के मारने पर महाराजा मानसिंह को झालरदार शमला और ताज के आकार की टोपी मिली। 

6.जगन्नाथ चपरासी डाकू को पकड़ना 

जगन्नाथ चपरासी भी बड़ा प्रबल डाकू था। उसके साथ छः सात सौ डाकू रहा करते थे। गाँवों को लूट लेता था और इस पर भी सन्तोष न करके सैकड़ों स्त्री पुरुषों को पकड़ ले जाता और बन्दूक के गज़ लाल करा के उनको दगवाता और उनके इष्ट बन्धुओं से बहुत सा धन लेकर उन्हें छोड़ता था। इसी अवसर पर महाराजा साहेब को एक हवादार भी मिला। तब से हवादार पर सवार हो कर बादशाही ड्योढ़ी तक जाते थे। इस डाकू के पकड़ने में महाराज मानसिंह ने बड़ी वीरता दिखाई थी। अकेले उसको पकड़ने के लिये पहुँचे। उसने कड़ाबीन सर की। वीर महाराज ने लपक कर उसका हाथ उठा दिया। गोलियाँ उनके ऊपर से निकल गई और डाकू पकड़ लिया गया।

7.शाहगंज के विद्रोहियों का दमन 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। इसी समय बागियों ने शाहगंज की गढ़ी घेर ली और महाराजा साहब के लाखों रुपये के मकान खोद डाले और जला दिये और बहुत सा धन लूट ले गये। परन्तु डेढ़ महीने के घेरे पर बड़ी वीरता से महाराजा साहब ने विद्रोहियों को मार भगाया । इसी अवसर पर राजा रघुवीर सिंह के घर का बहुत सा सामान जो अयोध्या में लाला ठाकुर प्रसाद के घर पर धनवावाँ से भेज दिया गया था विद्रोहो लूट ले गये। इसके कुछ दिन पीछे नानपारे के मैदान में पन्दरह हज़ार बागी इकट्ठा हुये। महाराजा साहब बरगदिया के मैदान में बड़ी वीरता से उनसे भिड़ गये। उस समय गोरों की पल्टन भी आ गई थी परन्तु वह हट गई। केवल तीन तोपखाने महाराजा मानसिंह के साथ रहे। एक ही घण्टे के युद्ध में बागी भाग गये। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।



8.हनुमान गढ़ी विवाद का निपटारा 

इसके लिए उन्हें राजे-राजगान का पद मिला हुआ था। कई वर्ष पीछे जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।

     अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। "गुलाम हुसेन नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनूमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर, मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गाड़ दिया जिसे गंजशहीदाँ कहते हैं। 

     इसके पीछे मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा।

हम इश्क़ के बन्दे हैं 

मज़हब से नहीं वाक़िफ़।

गर काबा हुआ तो क्या,

बुतखाना हुआ तो क्या ?

    बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारक- बादी दी।

      परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट न हुये और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।

    इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदतअली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं । 

    उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पार् साहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। इस कारगुजारी के बदले बादशाह ने राजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद दिया। इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।

9.तीस अंग्रेजों मेमों बच्चों को शाहगंज के किले में सुरक्षित रखा

गदर हो जाने पर फैजाबाद में दो पल्टनें, एक रिसाला और दो तोप- खाने बागियों के हाथ में रहे और सुल्तानपूर की पल्टन भी उनसे मिलने पा रही थी। महाराजा मानसिंह के पास कोई सामान न था तो भी उन्होंने अपना धन और अपना प्राण अंग्रेजों को निछावर करके फैजाबाद के तीस अंग्रेजों मेमों और बच्चों समेत अपने शाहगंज के किले में सुरक्षित रक्खा और आप विद्रोहियों का सामना करने के के लिये डटे रहे । फिर उनको अपने सिपाहियों की रक्षा में गोला गोपालपूर पहुंचा दिया। इसी अवसर में चार मेमें और आठ अंग्रेजी बच्चे घाघरे के मांझा में बिना अन्न-जल मारे-मारे फिरते थे। महाराजा साहब ने सवारियाँ भेज कर उन्हें बुला लिया और पन्द्रह दिन तक अपने घर में रक्खा और फिर उनके कहने पर सौ कहार और 36 पालकी कर के उनको प्रासबर्न साहब के पास बस्ती भेज दिया। इस पर लारेन्स साहब बहादुर ने उनको दो लाख रुपया और जागीर देकर महाराजा का पद दिया और यह भी कहा कि महाराज के वकील को अवध में जमीदारी दी जायगी।

10.खैरख्वाही की प्रशंसा 

महाराजा मानसिंह को अंग्रेज़ी सरकार की खैरख्वाही करने पर भी अपने देश की भलाई का विचार रहा जिसका प्रमाण एक परवाना हमारे पास है जो उन्होंने लाला ठाकुरप्रसाद को लिखा था। उसका सारांश यह है:—

"मित्रवर लाला ठाकुरप्रसाद जी,

प्रकट है कि आज-कल लखनऊ खास में सरकारी अमलदारी हो गई है और विद्रोह के कारण हज़ारों आदमी मारे जा रहे हैं। लखनऊ का झगड़ा हमको विदित है इस लिये तुमको लिखा जाता है कि पत्र के पाते हज़ार काम छोड़ कर इस काम को प्रधान मानकर हाकिमों के पास जाकर विनती करके हमको सूचना दो .⁠.⁠. सफलता होने पर तुम्हारी सन्तान का पालन पीढ़ी दर पीढ़ी होगा।"

11'अवध की संधि’ में महत्वपूर्ण भूमिका

इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 7 फरवरी 1856 को, लॉर्ड डलहौजी ने कथित आंतरिक कुशासन के आधार पर वाजिद अली शाह को पदच्युत करने का आदेश दिया। यह डलहौजी के व्यपगत सिद्धांत के अनुरूप था , जिसके अनुसार यदि किसी राज्य में कुशासन होता तो अंग्रेज उस पर कब्जा कर लेते थे। अवध राज्य को फरवरी 1856 में मिला लिया गया था।

          1858 में अवध ने दूसरों भारतीय रियासतें से मिलकर ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ विद्रोह में हिस्सा लिया, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आख़िरी सैनिक अभियान में। इस विद्रोह को बंबई के ब्रिटिश सेना ने हरा दिया शीघ्र अभियान में। 1859 तक विद्रोहियों छापेमार लड़ाई लड़ते रहे। इस बग़ावत को "अवध अभियान" भी कहलाया जाता है।व्यपगत का सिद्धान्त के ज़रिए अवध के राज्य-हरण करने के बाद ब्रिटिश ने अवध क्षेत्र को उत्तर-पश्चिमी प्रान्त का हिस्सा बना दिया। अवध का उत्तर- पश्चिमी प्रांतों में विलय 1859 में हुआ था। जिससे सन् 1869 में राजा मानसिंह को ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।

12.विशम्भरपूर उपहार में मिला 

महाराजा मानसिंह को इन खैरख्वाहियों के बदले गोंडा ज़िले का तालुक़ा विशम्भरपूर उपहार में दिया गया और सात हजार रुपये की खिलत मिली और महाराजा की पदवी दी गई। उस सनद की प्रतिलिपि हमारे पास अब तक रक्खी है।

         महाराजा मानसिंह का 11 अक्टूबर सन् 1870 ई० को स्वर्गवास हो गया। महाराजा साहब वीर होने के अतिरिक्त बड़े राजनीतिज्ञ और बड़े विद्वान और गुण ग्राहक थे। उनके दरबार में पंडित प्रवीन आदि अनेक अच्छे कवि थे और आप द्विजदेव उपनाम से कविता करते थे। उनकी रची शृङ्गारलतिका नायिकाभेद का उत्तम ग्रन्थ है। 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)



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