Sunday, July 12, 2026

भारत में पुरातत्व उत्खनन का इतिहास, विधियां और प्रमुख स्थलों से प्राप्त प्रमाण डॉ. राधेश्याम द्विवेदी



भारत का पुरातत्व भारतीय संस्कृति और इतिहास का सबसे प्रमुख स्रोत होता है । पुरातत्व विज्ञान में अतीत के लोगों से संबंधित वैज्ञानिक शोध परक अध्ययन होता है। इसका मुख्य उद्देश्य इतिहास को समझना और उन्हें संरक्षित करना होता है। इनमें इमारतों, स्मारकों और अन्य प्राकृतिक या भौतिक अवशेषों का अध्ययन शामिल होता है। इसमें उत्खनन और अन्वेषण की बहुत ही प्रमाणिक विधि होती है। अतीत की सभ्यताओं और मानवीय गतिविधियों को समझने के लिए जमीन की एक नियंत्रित और वैज्ञानिक खुदाई की प्रक्रिया है। उत्खनन का मुख्य उद्देश्य जमीन के भीतर छिपी अज्ञात प्राचीन सभ्यताओं, संस्कृतियों और ऐतिहासिक अवशेषों को वैज्ञानिक तरीके से बाहर निकालना, उनका परीक्षण करना तथा उसके आधार पर पहले से स्थापित मान्यताओं की पुष्टि या खण्डन करना होता है। हमारे गौरवशाली अतीत को समझने और ऐतिहासिक ज्ञान को पुख्ता करने के लिए यह सबसे प्रामाणिक प्रविधि  मानी गई है।पुरातत्व विभाग इतिहासकारों द्वारा महत्वपूर्ण पहचाने गए स्मारकों या अवशेषों का संरक्षण और संवर्धन भी करता है। स्मारकों के अलावा, पुराने धातु और मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां,मुहरें, सिक्के, अभिलेख और  कंकाल अवशेष सभी इसके विषयवस्तु बनते हैं , ये सब इतिहास का परीक्षण और पुनर्निर्माण भी करते हैं। 

भारत में पुरातात्विक उत्खनन के विभिन्न चरण :-

किसी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को वैज्ञानिक रूप से समझने की एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अपनाए जाने वाले पुरातात्विक उत्खनन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं-

1. अन्वेषण और सर्वेक्षण -

खुदाई शुरू करने से पहले, पुरातात्विक महत्व के स्थलों (जैसे- टीलों, पहाड़ियों और प्राचीन बस्तियों) की पहचान की जाती है। इसमें रिमोट सेंसिंग, हवाई फोटोग्राफी, और सतह पर बिखरी वस्तुओं का अध्ययन शामिल होता है। पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा द्वारा ’विलेज टू विलेज सर्वे’ कार्यक्रम द्वारा प्रारंभिक सर्वेक्षण किया जाता रहा है।

2. स्थल की योजना और ग्रिड बनाना -

उत्खनन के लिए चयनित स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक द्वारा अनुमति लाइसेस लेकर योजनाबद्ध तरीके से छोटे-छोटे वर्गों या आयतों में बाँटा जाता है, जिसे 'ग्रिड' कहते हैं। हर ग्रिड को नाम या नंबर दिया जाता है, ताकि वहां से मिलने वाली हर वस्तु की सटीक भौगोलिक स्थिति रिपोर्ट में दर्ज की जा सके।

3. लंबवत या क्षैतिज उत्खनन -

उत्खनन की तीन प्रमुख विधियां हैं - लंबवत खुदाई - 

इसके तहत समय-क्रम  का पता लगाने के लिए गहराई में खुदाई की जाती है। 

क्षैतिज खुदाई- 

इसमें किसी एक काल की पूरी बस्ती या संस्कृति का व्यापक स्तर पर विस्तार से पता लगाने के लिए बड़े क्षेत्र की खुदाई की जाती है।

क्वाड्रेंट (चतुर्थांश) विधि

टीलों और गोल स्मारकों (जैसे स्तूप)आदि के लिए साइट को चार हिस्सों में बाँट कर एक-एक का उत्खनन किया जाता है।

4. दस्तावेज़ीकरण और रिकॉर्डिंग -

यह उत्खनन का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। मिट्टी की हर परत को हटाने से पहले और बाद में तस्वीरें खींची जाती हैं, नक्शे बनाए जाते हैं और डायरी में विस्तृत विवरण दर्ज किया जाता है।

5. वस्तुओं को निकालना और संरक्षित  करना - 

खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों (जैसे- बर्तन, सिक्के, मनके, हड्डियाँ) को विशेष उपकरणों द्वारा सावधानी पूर्वक निकाला जाता है। उसे बिना क्षति पहुंचाए साफ सुथरा किया जाता है। इसके बाद रासायनिक उपचार द्वारा उन्हें संरक्षित किया जाता है।

6. रिपोर्ट लेखन और प्रकाशन -

उत्खनन पूरा होने के बाद, सभी आँकड़ों, कलाकृतियों के विश्लेषण और कार्बन-14 (C-14) डेटिंग के परिणामों को मिलाकर एक विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की जाती है और इसे प्रकाशित कराया जाता है। इसी के आधार पर उस क्षेत्र की पहचान और निष्कर्ष निकाला जाता है।

पुरातत्व उत्खनन के कालक्रम :-

पुरातत्व में कालक्रम मानव इतिहास की कहानी को समझने का मुख्य आधार है, जिसे मुख्य रूप से तीन युगों-पाषाण, कांस्य और लौह युग- में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन औजारों की तकनीक और सामग्री पर आधारित होता है। सांस्कृतिक एवं उत्खनन का कालक्रम में पुरातत्व में स्थलों की खुदाई से प्राप्त अवशेषों, मृदभांडों (Pottery), और औजारों के आधार पर भारतीय इतिहास को मुख्य रूप से इन कालों में विभाजित किया जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भारत में हज़ारों प्राचीन स्थलों की खोज और उत्खनन किया गया है। ये स्थल भारत की प्रागैतिहासिक संस्कृतियों, सिंधु घाटी सभ्यता, मौर्य साम्राज्य और मध्य युगीन इतिहास को दर्शाते हैं।

   प्रमुख स्थल और उनका विश्लेषण :- 

1.प्राचीन पाषाण काल :-

मानव का इतिहास का यह सबसेप्रारंभिक चरण होता है। इस काल में मानव क्वाटर्ज़ाइट पत्थरों के बड़े और भद्दे औजारों का उपयोग करता था। सोहन घाटी, नर्मदा घाटी और मद्रास इसके प्रमुख उत्खनन स्थल रहे हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे तीन उप भागों में बांटा जा सकता है -

पुरापाषाण (Palaeolithic), 

मध्यपाषाण (Mesolithic), 

नवपाषाण (Neolithic) और

ताम्र-पाषाण काल । 

इन्हीं कालक्रम के अनुरूप भारतीय उप महाद्वीप के कुछ प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण उत्खनित स्थलों को काल और क्षेत्र के अनुसार यहाँ सूचीबद्ध कर विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है -

1). पुरापाषाण काल :- 

(2,500,000 से 10,000 ईसा पूर्व) -यह सबसे लंबा काल था जब मानव पूर्णतः शिकारी और खाद्य-संग्रह कर्ता था। इस काल में हुए उत्खनन ने अनेक प्रारम्भिक वैज्ञानिक तकनीक और रहन सहन का रहस्योद्घाटन किया है।इस युग के प्रमुख स्थल हैं- 

भीमबेटका - 

मध्य प्रदेश का यह विश्व धरोहर स्थल  प्रसिद्ध है, यहाँ पुरापाषाण काल से लेकर मध्यपाषाण काल तक के शैलाश्रय और गुफा चित्र मिले हैं जो प्राचीन मानव की कला का प्रमाण रहे हैं। यह विश्व धरोहर स्थल  प्रागैतिहासिक मानव जीवन और गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यह भोपाल से लगभग 45 किमी दक्षिण-पूर्व में विंध्य पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है । इन गुफाओं में 1,00,000 साल पहले के मानव जीवन के प्रमाण और भारत की सबसे प्राचीन शैल चित्रकला (Rock Art) मौजूद है। इन प्राचीन गुफाओं और चित्रों की खोज वर्ष 1957 में प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। इस क्षेत्र में 10 किलोमीटर के दायरे में 750 से अधिक शैलाश्रय (Rock Shelters) मौजूद हैं, जिनमें से लगभग 400 से 500 गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल की चित्रकारी मिलती है।

अत्तिरामपक्कम - 

तमिलनाडु में स्थित यह भारत के सबसे प्राचीन पुरापाषाण कालीन स्थलों में से एक है , जहाँ से प्रारंभिक ऐशुलियन संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं। यह तमिलनाडु राज्य के तिरुवल्लूर जिले में चेन्नई से लगभग 60 किलोमीटर दूर कोरतल्यार नदी बेसिन में स्थित है। यहाँ पाए गए प्राचीन पत्थर के औजार अशूलियन संस्कृति के हस्तकुठार और क्लीवर हैं जो लगभग 15 लाख (1.5 मिलियन) वर्ष पुराने आंके गए हैं। यहाँ निम्न पुरापाषाण से लेकर मध्य पुरापाषाण काल तक के साक्ष्य क्रमिक रूप से मिलते हैं।

हथनौरा - 

मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी में स्थित इस स्थल से भारत में सबसे प्राचीन 'मानव खोपड़ी के जीवाश्म' प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राचीन पुरापाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं । भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित इस प्रागैतिहासिक और पाषाण काल का इतिहास लगभग 20 लाख वर्ष पुराना है।  

      यह काल वह समय था जब मनुष्य लिपि या लेखन कला से अनजान था और पत्थरों के औजारों (पाषाण) का उपयोग करता था। यह दक्षिण एशिया का सबसे पुराना 'अच्युलियन'  पाषाण युग स्थल है, जहाँ से लगभग 15 से 17 लाख वर्ष पुराने आदिमानवों के पत्थर के औज़ार खोजे गए है। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ कि यहाँ के औज़ार लगभग 15 लाख साल पुराने हैं, जो मानव प्रवास के 'अफ्रीका से पलायन' के पारंपरिक सिद्धांतों को नई दिशा देते हैं। यहाँ मुख्य रूप से क्वार्टजाइट (quartzite) पत्थरों से बनी हस्त- कुल्हाड़ियाँ (handaxes), क्लीवर (cleavers) और खुरचनी जैसे बेहतरीन और सममितीय औज़ार मिले हैं, जो होमिनिड्स (मानव पूर्वजों) की उच्च तकनीकी क्षमता को दर्शाते हैं। यह स्थल निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण संस्कृतियों का एक लंबा और निरंतर अनुक्रम प्रस्तुत करता है, जिससे प्रारंभिक मानव के पारिस्थितिक अनुकूलन को समझने में मदद मिलती है।

2). मध्यपाषाण काल -

मध्यपाषाण काल 10,000 से 4000 ईसा पूर्व काल को माना जाता है। इस काल में छोटे पत्थर के औजारों (Microliths) का प्रयोग शुरू हुआ है। बेलन घाटी,आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) और बागोर (राजस्थान) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस काल के औजार छोटे होते थे जिन्हें 'माइक्रोलिथ' (Microliths) कहा जाता था। मानव ने पशुपालन की शुरुआत इसी काल में की थी।

बागौर (राजस्थान) - 

कोठारी नदी के तट पर स्थित यह स्थल भारत के सबसे बड़े मध्यपाषाण स्थलों में से एक है, जहाँ पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। यह भारत का सबसे बड़ा और क्षैतिज उत्खनन (horizontally excavated) किया जाने वाला प्रागैतिहासिक स्थल है। यहाँ से भारत में पशुपालन के सबसे प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ के निवासी भेड़, बकरी और मवेशी पालते थे । यहाँ से बड़ी संख्या में सूक्ष्म पाषाण उपकरण (Microliths) मिले हैं, जो जैस्पर और चेल्सेडनी जैसे पत्थरों से बने थे । यहाँ से सुनियोजित तरीके से दफनाए गए 5 मानव कंकाल मिले हैं, जिन्हें उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाया गया था । पुरातात्विक उत्खनन में यहाँ मुख्य रूप से 3 सांस्कृतिक चरण देखे गए हैं -

चरण 1 (मध्य-पाषाण काल) - लगभग 5000-2500 ईसा पूर्व के मध्य यहां शिकार और पशुपालन हुआ करता था।

चरण 2 (ताम्र-पाषाण काल)- तांबे/कांसे के औजार और हाथ से बने मिट्टी के बर्तनों का उपयोग इस समय होता था।

चरण 3 (लौह काल) - लोहे के उपकरणों और चाक से बने बर्तनों का प्रचलन इस समय में होता था।

     यहाँ मिले साक्ष्य बताते हैं कि पाषाण काल के लोग धीरे-धीरे धातु की ओर विकसित हुए और कृषि-संस्कृति तथा हड़प्पा सभ्यता के समकालीन संपर्क में आए।

आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) - 

नर्मदा नदी के पास स्थित, यह स्थल पशुपालन के प्रारंभिक साक्ष्य और मध्यपाषाण उपकरणों के लिए जाना जाता है । आदमगढ़ की गुफाएं मध्य प्रदेश राज्य के नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले में विंध्याचल पर्वत श्रेणी में स्थित है। यह गुफाएं मध्य प्रदेश की प्रमुख गुफाएं समूह में से एक है। यहां पर कुल 80 गुफाएं (रॉक शेल्टर) हैं, जिनमें से 18 से 22 गुफाओं में शैलचित्र (रॉक पेंटिंग) बने हुए है। आदमगढ़ की गुफाओं की खोज वर्ष 1922 ईस्वी में मनोरंजन घोष ने की थी। आदमगढ़ मुख्य रूप से पहाड़ियों में स्थित प्रागैतिहासिक आदमगढ़ की गुफाएं शैलाश्रयों, रॉक शेल्टर, रॉक आश्रयों, आदमगढ़ रॉक पेंटिंग, रॉक आर्ट एवं आदमगढ़ शैलचित्रों के लिए प्रसिद्ध है।

दमदमा और सराय नाहर राय -

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित इन स्थलों से प्राचीनतम मानव कंकाल मिले हैं। दमदमा से एक ही कब्र में तीन मानव कंकाल , गर्त चूल्हे और हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। सराय नाहर राय उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ घंटा घर से 25 किलोमीटर दूर गोखुर झील के किनारे स्थित है। इस पुरास्थल की खोज के. सी. ओझा ने की थी। इसका विस्तार 1800 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सराय नाहर राय में कुल 11 मानव समाधियाँ तथा 8 गर्त चूल्हों का उत्खनन प्रयागराज विश्व विद्यालय की ओर से किया गया था। यहाँ की क़ब्रें (समाधियाँ) आवास क्षेत्र के अन्दर स्थित थीं। जिनकी गहराई बहुत अधिक नही थी। यहाँ संयुक्त रूप से 2 पुरुषों एवं 2 स्त्रियों को एक साथ दफ़नाये जाने के प्रमाण मिले हैं। सराय नाहर राय से जो 15 मानव कंकाल मिले हैं, वे ह्रष्ट-पुष्ट तथा सुगठित शरीर वाले मानव समुदाय के प्रतीत होते हैं। चूल्हों के अवशेष से हिरण, बारहसिंगा, जंगली सुअर आदि पशुओं की अधजली हड्डियाँ मिली हैं। यहाँ पर चूल्हों का उपयोग पशुओं के मांस को भूनने के लिए भी किया जाता था। जो भी मानव अस्थियाँ यहाँ से मिली उनकी औसत ऊंचाई 1.8 मीटर यानि लगभग 6 फुट पाई गई। प्रत्येक मानव कंकाल के साथ पत्थरों के जो भी उपकरण दफ़नाये गए थे वो सभी मध्य पाषाण काल के माने जाते हैं। जिसे 12,000 साल से लेकर 10,000 साल के बीच का कालखंड घोषित किया गया है। विचित्र बात ये है कि यहाँ से मिट्टी के बर्तनों का कोई भी अवशेष खुदाई से नहीं प्राप्त हुआ। यानि आज से 10,000 साल पहले का मनुष्य मिट्टी के बर्तन बनाना नहीं जानता था। पूरे विश्व में पाए गए उत्खनन अवशेषों में यहाँ से मिले मानव कंकालों को सबसे प्राचीन माना जाता है।

3). नवपाषाण काल -

प्रागैतिहासिक काल का वह अंतिम चरण है जब मानव ने शिकार करने व भोजन इकट्ठा करने के बजाय कृषि और पशुपालन शुरू किया। इस काल लगभग 7000 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व में मानव खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक बन गया। यहाँ से मानव ने कृषि और स्थायी बसावट शुरू की, साथ ही पहिए व पॉलिश वाले पत्थरों का आविष्कार किया। 

मेहरगढ़ -

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बोलन दर्रे के पास कच्ची के मैदान में स्थित एक प्रमुख नवपाषाणकालीन पुरातात्विक स्थल है। यह दक्षिण एशिया में प्राचीनतम कृषि और पशुपालन का सबसे पहला ज्ञात साक्ष्य प्रस्तुत करता है, जिसका समय लगभग 7000 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक माना जाता है। यहाँ के लोग मुख्य रूप से गेहूं और जौ की खेती करते थे तथा भेड़, बकरियों और मवेशियों को पालतू बनाते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि (गेहूं व जौ) और स्थायी बस्ती साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुए हैं।  मेहरगढ़ से दुनिया में कपास (कपास के धागे) का सबसे पुराना ज्ञात साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ के निवासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने (जिन्हें 'तोजाऊ' कहा जाता है), मनके बनाने और धातु-शिल्प में महारत हासिल थी। इसके अलावा शुरुआती दंत चिकित्सा और टेराकोटा की मूर्तियां भी यहाँ से मिली हैं।

बुर्जहोम श्रीनगर -

कश्मीर से लगभग 16 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित एक प्रमुख नवपाषाणकालीन (Neolithic) पुरातात्विक स्थल है। 3000 से 1000 ईसा पूर्व के बीच की इस प्राचीन मानव बस्ती की खोज 1930 के दशक में की गई थी। यहाँ भूमिगत गड्ढों वाले घर (Pit Dwellings) मिलते हैं। यहाँ के लोग अत्यधिक ठंड से बचने के लिए ज़मीन के भीतर गोलाकार या आयताकार गड्ढों में घर बनाते थे और उन्हें घास-फूस की छतों से ढँकते थे। कश्मीर के डल झील के निकट स्थित यह स्थल अपने 'गर्त आवास'  के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ मानव भूमि के अंदर गड्ढों में रहते थे। बुर्जहोम के लोग गेहूँ, जौ और मसूर की खेती करते थे। वे कुत्ते, भेड़, बकरी और सुअर जैसे जानवर पालते थे। इस स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ पालतू कुत्तों (या अन्य जानवरों) को उनके मालिकों के साथ दफनाए जाने के अद्वितीय साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से हड्डी की सुइयाँ, मछली पकड़ने के कांटे, पत्थर के कुल्हाड़ी और छिद्रित चाकू प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा, मृदभांड (बर्तन) और मनके भी मिले हैं।

चिरंद -

बिहार के सारण जिले में घाघरा नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। इस प्रागैतिहासिक स्थल से प्रचुर मात्रा में हड्डी और सींग से बने उपकरण मिले हैं। यह भारत में नवपाषाण काल (लगभग 2500 ईसा पूर्व) के सबसे प्रमुख स्थलों में से एक है। खुदाई में हड्डी के औजार, मनके और कृषि के प्राचीन साक्ष्य मिले हैं। चिरंद में बड़ी संख्या में नवपाषाणकालीन उपकरण और हथियार प्राप्त हुए हैं, जिन्हें देखकर प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद् एफ.आर. एल्चिन ने इसे "भारत की नवपाषाण संस्कृति का उगता सूरज" कहा था। पुरातात्विक उत्खनन से गेहूं, चावल (धान) और जौ की बालियां मिली हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि यहाँ के निवासी शिकार के अलावा खेती और पशुपालन करना सीख गए थे।

 यहाँ हुई खुदाई में लगातार तीन संस्कृतियों - नवपाषाण, ताम्रपाषाण (लगभग 2000 ईसा पूर्व) और लौह काल के अवशेष मिले हैं। यहाँ के लोग सरकंडे और बांस से बने गोलाकार घरों (मिट्टी के लेप वाले) में रहते थे और आग के चूल्हों का इस्तेमाल करते थे। यह काल पाषाण क्रांति के रूप में जाना जाता है जब मानव ने कृषि और स्थायी जीवन की शुरुआत की तथा पहिए व बर्तनों का आविष्कार किया।

अदिचनाल्लूर - 

तमिलनाडु में  स्थित यह दक्षिण भारत का एक प्रमुख महापाषाणकालीन  उत्खनन स्थल है, जहाँ से बड़ी संख्या में कलश (Urns) और लौह उपकरण मिले हैं। यह भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्त्वपूर्ण लौहयुगीन-महापाषाणिक कलश शवाधन स्थलों में से एक है, जो तमिलनाडु के थूथुकुडी ज़िले में थामिरबरानी नदी के किनारे स्थित है।

इस संस्कृति को एफ. जगोर द्वारा वर्ष 1876 में सर्वप्रथम खोजा गया और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किये गए उत्खनन के दौरान इस स्थल से मृद्भांड, लोहे के औजार, काँसे के पात्र, सोने के आभूषण/मुकुट, मनके और मानव कंकाल अवशेषों वाले शवाधन प्राप्त हुए हैं।

नागार्जुनकोंडा -

भारत के आंध्र प्रदेश के पालनाडु जिले में नागार्जुन सागर झील के बीच स्थित एक ऐतिहासिक द्वीप और प्रसिद्ध बौद्ध स्थल है। दूसरी शताब्दी में यहाँ महायान बौद्ध धर्म के महान आचार्य नागार्जुन रहते थे। यह कभी एक बड़ा बौद्ध विश्वविद्यालय हुआ करता था।आँध्र प्रदेश का यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है, जहाँ से प्राचीन स्तूप, विहार और मूर्तिकला के अवशेष उत्खनन में प्राप्त हुए हैं। सातवाहन और इक्ष्वाकु राजवंशों के समय यह एक प्रमुख सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र था। यहाँ श्रीलंका, चीन और बंगाल जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे। नागार्जुनसागर बांध के निर्माण के समय प्राचीन अवशेष जलमग्न हो गए थे। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए खुदाई कर ऊंचे टीले (द्वीप) पर स्थानांतरित किया गया, जहाँ एक बौद्ध विहार के आकार का नागार्जुनकोंडा संग्रहालय बनाया गया। इसमें बुद्ध के अवशेष, मूर्तियां और प्राचीन शिलालेख सुरक्षित हैं।

4.)ताम्र-पाषाण काल -

ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age), 3500 से 1500 ईसा पूर्व यह काल नवपाषाण युग और कांस्य युग के बीच की एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवधि है। यह लगभग 2000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व तक का काल था। इसमें मानव ने पत्थर के साथ-साथ तांबे (पहली खोजी गई धातु) के औजारों और बर्तनों का उपयोग करना शुरू किया था।

     भारत में प्रमुख ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ और स्थल निम्न हैं -

आहड़ संस्कृति (राजस्थान) - इसे 'बनास संस्कृति' भी कहा जाता है।आहड़ और गिलुंद यहाँ के प्रमुख स्थल हैं।

जोरवे संस्कृति (महाराष्ट्र) - यह बहुत विकसित थी।इसमें दैमाबाद, इनामगाँव, नेवासा और जोरवे शामिल हैं।दैमाबाद इस संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल है।

मालवा संस्कृति (मध्य प्रदेश) - मालवा के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) इस काल में सबसे उत्कृष्ट माने जाते हैं।

कायथा संस्कृति (मध्य प्रदेश) - यह क्षेत्र अपनी तांबे की कलाकृतियों और मनकों के लिए प्रसिद्ध थी।

दायमाबाद -

दायमाबाद महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले के श्रीरामपुर तालुका में गोदावरी नदी की सहायक नदी प्रवारा नदी के बाएं किनारे पर स्थित एक वीरान गांव और पुरातात्विक स्थल है । इस स्थल की खोज 1958 में बीपी बोपर्दिकर ने की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीमों द्वारा अब तक तीन बार इसका उत्खनन किया जा चुका है । पहला उत्खनन 1958-59 में एम.एन. देशपांडे के निर्देशन में किया गया था। दूसरा उत्खनन 1974-75 में एस.आर. राव के नेतृत्व में किया गया था । अंत में, 1975-76 और 1978-79 के बीच उत्खनन एस.ए. साली के निर्देशन में किया गया था। दैमाबाद में हुई खोजों से पता चलता है कि उत्तर हड़प्पा संस्कृति भारत के दक्कन पठार तक फैली हुई थी। दैमाबाद कई कांस्य वस्तुओं की बरामदगी के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति से प्रभावित थीं । 

इनामगांव -

महाराष्ट्र के पुणे जिले में घोड नदी के दाहिने किनारे पर स्थित एक प्रमुख ताम्रपाषाण (चालकोलिथिक) पुरातात्विक स्थल है। यह हड़प्पा-पश्चात कृषि प्रधान बस्ती लगभग 2500 साल पुरानी अपनी अनूठी दफन प्रथाओं, प्राचीन जीवनशैली और पुरातात्विक अवशेषों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह स्थल मुख्य रूप से ताम्रपाषाण कालीन जोरवे संस्कृति लगभग 1400 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ घर के फर्श के नीचे बच्चों को दोहरे कलश (Urn burials) में दफनाने के अद्वितीय साक्ष्य मिले हैं। इसके अलावा, आँगन वाले बड़े घरों में मुख्य (प्रमुख) लोगों के दफनाए जाने के भी अवशेष मिले हैं, जिन्हें डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।  उत्खनन में गोलाकार और आयताकार घरों के अवशेष, चूल्हे और अनाज रखने के गड्ढे मिले हैं। यहाँ के लोग जौ, चावल, मसूर जैसी फसलें उगाते थे और भेड़, बकरी, सुअर तथा हिरण जैसे जानवरों का मांस खाते थे।

2. प्राचीन बौद्ध एवं महापाषाण स्थल 

इसके पुनः दो उपभाग बनते हैं -

1.)कांस्य युग / सिंधु घाटी सभ्यता का युग

इसका समय 2700 से 1500 ईसा पूर्व माना जाता है। भारत में प्रथम नगरीकरण के प्रमाण यहीं से मिलना शुरू हो जाते हैं। इन स्थलों के उत्खनन में पकी ईंटों के मकान मिले हैं। यहां सुनियोजित जल निकासी के प्रमाण मिले हैं साथ ही साथ इन स्थलों पर पर्याप्त मात्रा में मोहरें भी मिलीं हैं। 

2.)लौहयुग /वैदिक व महापाषाण काल- 

इसका समय 1500 से 600 ईसा पूर्व माना जाता है।लोहे की खोज इसी काल में हुआ है साथ ही नगरीकरण के प्रमाण भी इसी काल से मिलना शुरू हुआ है। इस काल की जानकारी मुख्य रूप से चित्रित धूसर मृदभांड (PGW) और दक्षिण भारत के महापाषाण (Megaliths) स्थलों की खुदाई से प्राप्त होती है।

सिंधु घाटी / हड़प्पा संस्कृति :-

भारत के प्रमुख उत्खनित (खुदाई किए गए) पुरातात्विक स्थल देश के प्राचीन इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता, और विभिन्न प्राचीन संस्कृतियों की जानकारी देते हैं। सिंधु नदी की घाटी,हड़प्पा, मोहनजो-दारो, गुजरात में लोथल,राजस्थान में कालीबंगा, और राखीगढ़ी (हरियाणा) मुख्य उत्खनन स्थल सिंध और पंजाब में विभिन्न स्थलों पर किए गए विभिन्न उत्खनन सभ्यता की निरंतरता की पुष्टि करते हैं।  ये स्थल भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता के विकास का प्रमाण हैं। वर्ष 1921-22 में हड़प्पा में पुरातात्विक उत्खनन किया गया था। 

 सिंधु घाटी सभ्यता (उदा. हड़प्पा, मोहनजो-दारो) की खुदाई में मिले सुनियोजित शहर, उत्कृष्ट जल निकास प्रणाली (drainage system) और पक्की ईंटों के घर उस समय के उन्नत नागरिक और वास्तुशिल्प का प्रदर्शन करते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में भी समान आकार और योजना के एक अन्य प्राचीन शहर मोहनजो-दारो के खंडहरों की खुदाई की गई थी। भारत विभाजन के फलस्वरूप ये स्थल पाकिस्तान की शोभा बढ़ा रहे हैं। विभाजन के बाद भारत में प्रमुख उत्खनित स्थलों की सूची इस प्रकार है।

                 प्रमुख स्थल :-

लोथल (गुजरात) - 

यह प्राचीन काल में एक प्रमुख बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था।गुजरात के भाल क्षेत्र में भोगवा नदी के तट पर स्थित लोथल एक प्रमुख सिंधु घाटी सभ्यता का स्थल है। यहाँ से प्राप्त सबसे प्रमुख अवशेष विश्व का प्राचीनतम गोदीबाड़ा (डॉक्यार्ड) है, जो यह साबित करता है कि यह एक प्रमुख व्यापारिक और बंदरगाह शहर था। यहां विदेशी व्यापार की पुष्टि करने वाली मेसोपोटामिया और फारस की मुद्राएं (मोहरें), बांट और माप  के उपकरण प्राप्त हुए हैं। हड़प्पाकालीन बंदरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभांड, उपकरण, मुहरें, बांट तथा माप एवं पाषाण उपकरण भी यहां प्राप्त हुए हैं । यहाँ के एक घर से सोने के दाने ,सेलखड़ी की चार मुहरें, सींप एवं तांबे की बनी चूड़ियों और मिट्टी का लेपित जार मिला है। शंख के कार्य करने वाले दस्तकारों व ताम्रकर्मियों के कारखाने भी यहां मिले हैं। यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिलते हैं। साथ ही, स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। 

राखीगढ़ी (हरियाणा) -

सिंधु घाटी सभ्यता का यह स्थल राखीगढ़ी हरियाणा में यह दुनिया का सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन स्थल है। यह सिंधु सभ्यता के सबसे बड़े और प्राचीन स्थलों में से एक है, जिसकी खुदाई में सुनियोजित शहर और व्यापारिक प्रमाण मिले हैं । यहाँ प्राचीन काल के पक्के मकान,जलनिकासी व्यवस्था और डीएनए विश्लेषण वाले मानव कंकाल मिले हैं। हाल ही मेंभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 8 नई कब्रों और 3 पूर्ण मानव कंकालों की खोज की गई है।यह महत्वपूर्ण अवशेष प्राचीन मानव डीएनए (DNA) विश्लेषण के लिए कोलकाता स्थित भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण को सौंपे गए हैं। इन कब्रों के साथ मिट्टी के बर्तन, शंख की चूड़ियाँ और आभूषण मिले हैं, जो उस समय के लोगों के मृत्यु उपरांत जीवन में विश्वास को दर्शाते हैं। यहां बड़े पैमाने पर मनके बनाने के केंद्र, तांबे और सोने के आभूषण, मुहरें, और सुनियोजित पक्के मकान और नालियों के साक्ष्य मिले हैं।

धोलावीरा (गुजरात) -

गुजरात के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता का पांचवा सबसे बड़ा और उत्कृष्ट नगर है। अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यह शहर अपनी उन्नत जल संरक्षण प्रणाली के लिए जाना जाता है। यहाँ बारिश का पानी सहेजने के लिए विशालकाय तालाब (जलाशय), स्टेपवेल और नालियों की बेहतरीन व्यवस्था थी।अन्य हड़प्पा स्थलों के विपरीत, धोलावीरा तीन भागों (दुर्ग, मध्य नगर और निचला नगर) में विभाजित था। इसे आयताकार रूप में बसाया गया था। कच्छ के रण में स्थित यह नगरअपनी उत्कृष्ट नगर- नियोजन और जल संरक्षण प्रणालियों के लिए जाना जाता है। 

कालीबंगा (राजस्थान) - 

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर (सरस्वती) नदी के तट पर स्थित कालीबंगा (काले रंग की चूड़ियाँ) एक प्रमुख प्राक्-हड़प्पा और हड़प्पाकालीन सभ्यता का स्थल है। इसकी खोज 1952 में अमलानंद घोष द्वारा की गई। यह विश्व के सबसे प्राचीन जुते हुए खेत और भूकंप के साक्ष्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह नगर ग्रिड-पद्धति (चेस-बोर्ड) पर बसा था, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मकान मुख्य रूप से कच्ची ईंटों से बनाए जाते थे। यहाँ के घरों में जलनिकास के लिए पक्की ईंटों के बजाय लकड़ी की नालियों का प्रयोग किया जाता था, जो इसे अन्य हड़प्पा स्थलों से अलग बनाता है।

     यहाँ से जुते हुए खेतों और अग्निकुंडों के साक्ष्य मिले हैं । यहाँ से जूते हुए खेत, अग्निकुंड और चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं । यहाँ के चबूतरों पर सात अग्नि वेदियाँ या हवन कुंड पाए गए हैं, जो धार्मिक कर्मकांड और यज्ञ प्रथा की उपस्थिति को दर्शाते हैं।

सिनौली (उत्तर प्रदेश)-

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित सिनौली (Sinauli) लगभग 4,000 वर्ष पुरानी (लगभग 2000-1800 ईसा पूर्व) एक प्राचीन और ऐतिहासिक ताम्रपाषाण कालीन सभ्यता का स्थल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा यहाँ की गई खुदाई में कांस्य युगीन शाही कब्रगाह, तांबे की ढाल, तलवारें, मुकुट और बिना स्पोक्स (पहियों की तीलियों) वाले प्राचीन रथों के साक्ष्य मिले हैं, जो भारत केप्राचीन इतिहास में योद्धा संस्कृति की पुष्टि करते हैं। प्राचीन ऐतिहासिक और कांस्य/ताम्र युगीन स्थल सिनौली दिल्ली के पास स्थित इस स्थल से महाभारत काल के समय के योद्धाओं के ताबूत, रथ, और तलवारें प्राप्त हुई हैं। सिनौली संस्कृति हड़प्पा सभ्यता के पतन और क्षेत्रीय संस्कृतियों (जैसे OCP संस्कृति) के उदय के समय की है। यहाँ की दफन परंपराएं, रथों के प्रमाण और योद्धाओं की पोशाकें प्राचीन वैदिक ग्रंथों (जैसे ऋग्वेद) से काफी मेल खाती हैं। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता और प्राचीन वैदिक संस्कृति के बीच के कालक्रम को जोड़ने में एक अहम कड़ी साबित हो रहा है।

आलमगीरपुर (मेरठ) -

आलमगीरपुर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले में हिंडन नदी के तट पर स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पूर्वी पुरास्थल है। यह हड़प्पा काल की अंतिम अवस्था को दर्शाता है। इसे स्थानीय रूप से 'परसराम का खेड़ा' या 'परशुराम का टीला' भी कहा जाता है। खुदाई के दौरान यहाँ से तांबे के टूटे हुए ब्लेड, मिट्टी की मुहरें, मनके, चूड़ियाँ, और कूबड़ वाले बैल व सांप की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इसके अलावा, यहाँ से कपड़े की छाप वाले मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं, जो उस काल के वस्त्र निर्माण को दर्शाते हैं।

हस्तिनापुर -

हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक पूरा स्थल है। यह महाभारत काल में कौरवों और पांडवों की राजधानी थी और जैन धर्म के लिए भी एक परम पवित्र तीर्थ स्थल है।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बीबी लाल की खोज में यहाँ 'चित्रित धूसर मृदभांड' (Painted Grey Ware) संस्कृति के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत के समय (लगभग 1000  ईसा पूर्व) की बस्तियों की पुष्टि करते हैं।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इन टीलों को संरक्षित घोषित किया जा चुका है और आज भी ऐतिहासिक रहस्यों को खंगालने का कार्य जारी है।

बैराट (राजस्थान) - 

इसे राजा विराट ने बसाया था। यहाँ मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप और प्राचीन अवशेष उत्खनित किए गए हैं।अभिलेखों के अनुसार सभ्यता 2700 ईसा पूर्व के दौरान अस्तित्व में थी।

     भारत के पुरातत्व ने दक्षिण भारतीय स्थलों जैसे आदिचना लूर, चंद्रवल्ली, ब्रह्मगिरी में खुदाई करके एक और प्रशंसनीय काम किया और प्रागैतिहासिक काल के बारे में बताया। इसके अलावा अजंता और एलोरा के रॉक कट मंदिर अपनी मूर्तियों और चित्रों के साथ उस काल की कलात्मक सुंदरता को व्यक्त करते हैं। वर्ष 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद धोलावीरा, लोथल, कालीबंगन, राखीगरी, बनवाली, कुणाल, सुरकोटडा, भगवानपुरा, नागेश्वर, कुंतसी, पादरी में सिंधु सभ्यता के लगभग 400 पुरातात्विक अवशेष पाए गए।

3.ऐतिहासिक एवं मौर्य-गुप्त कालीन स्थल :-

ऐतिहासिक काल (Historical Period - 600 ईसा पूर्व से आगे):यह काल मौर्य, गुप्त, और मध्यकालीन साम्राज्यों से जुड़ा है। तक्षशिला, सारनाथ, और पाटलिपुत्र की खुदाई से इस काल के भवन, सिक्के और अभिलेख प्राप्त हुए हैं।

नालंदा - 

इस प्राचीन महाविहार और अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के अवशेष  उत्खनन से ही प्रकाश में आए हैं।यह ऐतिहासिक स्थल लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी तक अस्तित्व में रहा। इसकी शुरुआत प्राचीन काल (गुप्त काल) में हुई थी ।इस महान आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं सदी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी। यह मध्यकाल तक (पांचवीं से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी) एक प्रमुख महाविहार और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में फला- फूला था।

कुम्हरार -

बिहार में पटना के पास स्थित यहाँ शहर के प्राचीन इतिहास और प्राचीनता को देखते हुए, कई अन्वेषण और उत्खनन कार्य किए गए, जिनकी शुरुआत एल.ए. वाडेल ने 1892 में की थी। वाडेल ने पटना में बुलंदी बाग, छोटी पहाड़ी, तुलसीमंडी, महाराजगंज, रामपुर, बहादुरपुर और कुम्हरार जैसे विभिन्न स्थलों पर उत्खनन किया। कुम्हरार में उन्हें अशोक का एक टूटा हुआ स्तंभ मिला। वाडेल के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के डी.बी. स्पूनर ने 1912 से 1916 तक उत्खनन किया, जिसमें कुम्हरार में गुप्त और उत्तर-गुप्त काल की ईंट की दीवारों के अवशेष मिले। इन दीवारों के नीचे 4.57 मीटर या 15 फीट के अंतराल पर पॉलिश किए हुए बलुआ पत्थर के स्तंभों के टुकड़े मिले। उन्होंने 8 पंक्तियों में 80 स्तंभ पाए और इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला कि कुम्हरार स्थल मौर्यकालीन स्तंभों वाले हॉल से संबंधित था, जो पर्सेपोलिस के अचमेनिद हॉल के समान था । इस प्रकार, कुम्हरार का स्थल मौर्य वंश के 80 स्तंभों वाले सभागृह के रूप में जाना जाने लगा।

सारनाथ -

काशी के पौराणिक शहर से लगभग 10 किमी दूर स्थित, प्राचीन काल से ऋषिपाटन और मृगदव नाम से भी प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र महात्मा बुद्ध और जैन तीर्थंकर श्रेयांस नाथ जैसे महान पौराणिक कथाओं के कार्यस्थल होने के लिए भी प्रसिद्ध है। समय के साथ, मौर्य वंश, गुप्त वंश आदि जैसे विभिन्न विकृत राजवंशों में प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक गतिविधियों जैसे स्तूप, विहार, अशोक स्तंभ आदि के विभिन्न रूप शामिल थे। भगवान बुद्ध द्वारा अपना पहला उपदेश देने वाले इस स्थल पर धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ और मूलगंध कुटीर विहार उत्खनित किए गए हैं। सम्राट अशोक ने 273-232 ईसा पूर्व यहां बौद्ध संघ के प्रतीक स्वरूप विशालकाय स्तंभ स्थापित किया था। इसके ऊपर स्थापित सिंह आज भारत देश का राष्ट्रीय प्रतीक है।

बलिराजगढ़ -

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित इस प्राचीन किलेबंद शहर की खुदाई में मौर्य, शुंग और पाल काल की कलाकृतियों और दीवारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई में प्राचीन ईंटों की दीवारें, सात परतों वाली ईंटों की संरचना, आंगन, रिंग-वेल (कुआं) और बेहतरीन जल निकासी व्यवस्था मिली है। इसके अलावा बर्तन, सिक्के, मुहरें, मिट्टी की मूर्तियां और पत्थर की गेंदें भी प्राप्त हुई हैं। यह स्थल मुख्य रूप से शुंग काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) का है, लेकिन यहाँ मौर्य, कुषाण, गुप्त और पाल काल (700 ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक) के भी साक्ष्य मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्राचीन विदेह साम्राज्य का एक प्रमुख शहरी और प्रशासनिक केंद्र रहा है।

पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन से भारतीय संस्कृति की समृद्धता :- 

पुरातात्विक स्थलों की खुदाई (उत्खनन) से मिली सामग्री भारतीय संस्कृति की प्राचीनता, निरंतरता और भव्यता को प्रमाणित करती है। यह हमें लिखित इतिहास से आगे ले जाकर भौतिक साक्ष्य देती है, जो हमारी गौरवशाली विरासत को प्रत्यक्ष रूप से दर्शाते हैं। खुदाई से प्राप्त अवशेष हमारी उच्च कोटि की जीवनशैली, वैज्ञानिक सोच, कला और समृद्ध व्यापारिक परंपराओं को उजागर करते हैं, जो आज भी भारतीय पहचान की नींव हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.





Tuesday, June 30, 2026

भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के अवसर पर चिकित्सा जगत के डॉक्टर्स को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं

अपने परिवार के चार चिकित्सक विशेषज्ञों की विशिष्ट सेवाओं से गौरवान्वित होते हुए प्रस्तुत यह आलेख

           1 जुलाई का अर्थ
भारत में हर साल 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है, ताकि उन डॉक्टरों के समर्पण, करुणा और विशेषज्ञता को सम्मानित किया जा सके जो रोगी देखभाल में सुधार के लिए अथक परिश्रम करते हैं। निवारक स्वास्थ्य देखभाल और सटीक निदान से लेकर उन्नत उपचार और निरंतर सहायता तक, डॉक्टर स्वास्थ्य परिणामों में सुधार और समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

            डा अभिषेक द्विवेदी 

डॉक्टर अपना जीवन दूसरों की देखभाल में समर्पित करते हैं, साथ ही वे कई तरह की जिम्मेदारियों, लंबे कार्य घंटों और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का भी सामना करते हैं। राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस न केवल उनके अमूल्य योगदान के लिए आभार व्यक्त करने का अवसर है, बल्कि यह हमें उन लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण का समर्थन करने के महत्व की याद दिलाता है जो हमारी देखभाल करते हैं। यह हमें डॉक्टरों की सफेद वर्दी से परे देखने और इस पेशे के पीछे छिपे उन लोगों को पहचानने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिनकी प्रतिबद्धता और दृढ़ता गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की नींव है।

   डॉ सौरभ द्विवेदी और डॉ तनु मिश्रा 


राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस क्या है ?

डॉक्टर दिवस हर साल डॉक्टरों को श्रद्धांजलि देने और समाज में उनके अमूल्य योगदान को मान्यता देने का एक अवसर है। यह रोगियों की देखभाल में सुधार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सम्मान करता है, उनके द्वारा प्रतिदिन निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों को स्वीकार करता है और स्वास्थ्य सेवा और चिकित्सा उत्कृष्टता के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाता है। 

डॉक्टर दिवस विश्व भर में विभिन्न तिथियों पर मनाया जाता है, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल के विशिष्ट क्षेत्रों से संबंधित विषय होते हैं। भारत में, राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस प्रतिवर्ष 1 जुलाई को देश के सबसे सम्मानित चिकित्सकों में से एक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में मनाया जाता है। यह तिथि उनकी जन्म वर्षगांठ (1882) और उनकी पुण्यतिथि (1962) दोनों की स्मृति में मनाई जाती है, जो चिकित्सा और सार्वजनिक सेवा में उनके योगदान के स्थायी प्रभाव को पहचानने का एक उपयुक्त अवसर है। 

 डा दीपिका चौबे ,डा अभिषेक द्विवेदी 

राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस क्यों महत्वपूर्ण है?

राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस केवल प्रशंसा का दिन नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा में डॉक्टरों द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देता है, साथ ही साथ उन जिम्मेदारियों और चुनौतियों को भी उजागर करता है जिनका वे प्रतिदिन सामना करते हैं।

संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, भारत में 13.8 लाख से अधिक पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टर हैं, और डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात लगभग 1:811 है। 

 हालांकि यह महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है, कई ग्रामीण और वंचित समुदायों को विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुंच का सामना करना पड़ता है, जो देश भर में डॉक्टरों के महत्व को रेखांकित करता है। 

राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

यह पुरस्कार रोगी देखभाल में सुधार लाने में डॉक्टरों के समर्पण, विशेषज्ञता और प्रतिबद्धता को मान्यता देता है।

गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करने में स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनके बारे में जागरूकता बढ़ाता है।

स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने और चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में निरंतर निवेश को प्रोत्साहित करता है। 

यह भावी पीढ़ियों को चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित करता है।

यह मरीजों, डॉक्टरों और व्यापक स्वास्थ्य सेवा समुदाय के बीच विश्वास और साझेदारी को मजबूत करता है। 

यह अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा संगठनों को चिकित्सा पेशेवरों के योगदान को पहचानने और उसका जश्न मनाने का अवसर प्रदान करता है।

समाज में डॉक्टरों की भूमिका

डॉक्टर सिर्फ बीमारियों का इलाज करने से कहीं बढ़कर काम करते हैं। वे शिक्षक, शोधकर्ता, हिमायती होते हैं और कभी-कभी किसी के सबसे कठिन समय में आशा का एकमात्र स्रोत भी होते हैं।

आज उनकी भूमिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बीमारी को विकसित होने से पहले ही रोकना है। नियमित जांच, टीकाकरण, जीवनशैली संबंधी परामर्श और प्रारंभिक स्क्रीनिंग के माध्यम से डॉक्टर मरीजों को गंभीर बीमारियों से पूरी तरह बचाने में मदद करते हैं। भारत में पोलियो उन्मूलन की सफलता निरंतर चिकित्सा और जन स्वास्थ्य प्रयासों के प्रभाव का एक सशक्त उदाहरण है।

रोकथाम संबंधी भूमिकाओं के अलावा, डॉक्टर सड़क दुर्घटनाओं से लेकर हृदयघात तक, जानलेवा स्थितियों में भी सहायता प्रदान करते हैं। वे वर्षों के कठोर प्रशिक्षण और अनुभव के माध्यम से निपुणता प्राप्त करते हुए, कुछ ही सेकंड में जीवन-मरण के निर्णय लेते हैं। वे अवसाद और चिंता जैसी स्थितियों की पहचान और प्रबंधन करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिससे देश के कई हिस्सों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति मौजूद कलंक को दूर करने में मदद मिलती है।

डॉक्टर चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार और अनुसंधान में भी योगदान देते हैं, शल्य चिकित्सा तकनीकों को आगे बढ़ाते हैं, उपचार विधियों में सुधार करते हैं और संक्रामक और उष्णकटिबंधीय रोगों पर अनुसंधान का समर्थन करते हैं।

ये सभी स्वास्थ्य सेवा केंद्र मिलकर एक परस्पर जुड़ी हुई प्रणाली का निर्माण करते हैं, जहां डॉक्टर पूरे भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, निरंतरता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

इस दिन डॉक्टरों के प्रति आभार और धन्यवाद कैसे व्यक्त करें:- 

कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भव्य आयोजन की आवश्यकता नहीं है। राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर और उसके बाद भी, सरल और भावपूर्ण कार्य डॉक्टरों के समर्पण को पहचानने में बहुत सहायक हो सकते हैं।

व्यक्तियों और रोगियों के लिए

किसी ऐसे डॉक्टर को दिल से धन्यवाद पत्र लिखें जिसने आपके जीवन या आपके किसी प्रियजन के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला हो।

उपचार के दौरान प्राप्त समर्थन और मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त करने हेतु अपने अनुभव और ठीक होने की कहानी साझा करें ।

स्वास्थ्यकर्मियों के साथ सम्मानजनक और सकारात्मक संवाद बनाए रखें, और रोगी की देखभाल में उनके प्रयासों को सराहें।
अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा संगठनों के लिए डॉक्टरों को पुरस्कार या सम्मान कार्यक्रमों के माध्यम से सम्मानित करें।

डॉक्टरों के पेशेवर विकास में सहयोग देने वाले स्वास्थ्य जांच शिविर या सीएमई (निरंतर चिकित्सा शिक्षा) सत्रों का आयोजन करें।

स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की सुरक्षा, कल्याण और कार्य वातावरण में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई पहलों का समर्थन करें।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस उन सभी व्यक्तियों को याद करने का अवसर है जो हमारी भलाई का ख्याल रखते हैं और चिकित्सा जांच और बीमारी के दौरान हमारा सहारा बनते हैं। डॉ. बिधान चंद्र रॉय की अग्रणी विरासत से लेकर आज शहरी अस्पतालों और दूरदराज के गांवों में अथक परिश्रम कर रहे लाखों डॉक्टरों तक, उनका योगदान भारत में स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों और रोगी देखभाल की मजबूती को आकार देना जारी रखता है। 

हर साल 1 जुलाई को मनाए जाने वाले इस दिन से हमें डॉक्टरों द्वारा अपने दैनिक कार्य में निभाई जाने वाली प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी को स्वीकार करने के महत्व की याद आती है। स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों का समर्थन और सम्मान करना विश्वास, समर्पण और निरंतर देखभाल पर आधारित एक प्रणाली को मजबूत बनाने में सहायक होता है।






Saturday, June 27, 2026

आत्मा की यात्रा : मृत्यु के बाद के घटना क्रम ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


गरुड़ पुराण की कथा:-

गरुण पुराण हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है। इसमें ऐसा उल्लेख है कि, इसके पाठ से आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य के कर्मो का फल मनुष्य को जीवन में और मृत्यु के बाद भी मिलता है। इसलिए कर्मो के ज्ञान मृत्यु के बाद मृतक को गरुड़ पुराण का श्रवण कराने से मृतक को जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सत्य का ज्ञान जान सकता है।

गरुण पुराण का परिचय:-

गरुड़ पुराण  में 19,000 श्लोक है। परन्तु वर्तमान समय में पाण्डुलिपियों में कुल 8,000 श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस पुराण को पूर्वखण्ड और उत्तरखण्ड दो भागो में विभाजित किया गया है। पूर्वखण्ड में 229 अध्याय हैं। उत्तरखण्ड में अध्यायों की संख्या 34 से लेकर 49 तक मिलती है। पूर्वखण्ड को आचार खण्ड भी कहते हैं। उत्तरखण्ड को प्रेतखण्ड’ या ‘प्रेतकल्प’ भी कहा जाता है।

अधिकांश सामग्री पुराण के पूर्वखण्ड में-

गरुड़ पुराण की 90 प्रतिशत सामग्री पूर्वखण्ड में है, और 10 प्रतिशत सामग्री उत्तरखण्ड में है। गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड में विविध विषयों का समावेश किया गया है। इसमें जीव और जीवन से सम्बन्धित कथाऐं हैं। प्रेतखण्ड में मुख्य मनुष्य के मृत्यु बाद जीव की गति और उससे जुड़े हुए कर्मो से सम्बन्धित कथाऐं है। गरुड़ पुराण वैसा नहीं हे, जैसा पुराण के लिए भारतीय साहित्य में कहा गया है। इस पुराण में वर्णित कथाऐ भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ को सुनाई थी। फिर गरुड़ जी ने महर्षि कश्यप को सुनाई थी।

    गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड में भगवान विष्णु की भक्ति और उपासना की विधियों का वर्णन है। प्रेतखण्ड में प्रेत कल्प का विस्तार से वर्णन के साथ-साथ विभिन्न नरकों में जीव के जाने का वर्णन मिलता है। इसमें मृत्यु के बाद आत्मा की क्या गति होती है, आत्मा किस प्रकार की योनियों में जन्म लेता उसका वर्णन, प्रेत योनि से मुक्ति किस प्रकार पाई जाती उसका वर्णन, और नरकों के दारूण दुख से कैसे मोक्ष प्राप्त करने का वर्णन आदि का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।

भगवान श्री हरी विष्णु का वाहन पक्षीराज गरुड़ को कहा जाता है। एक बार भगवान विष्णु से पक्षीराज गरुड़ ने प्रश्न पूछा की मृत्यु के बाद प्राणियों की स्थिति, जीव की यमलोक-यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से संबंधित अनेक गूढ़ एवं रहस्य युक्त है। हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में तीन जन्म से पूर्व, चार जीवन कालमें तथा एक संस्कार मृत्यु के उपरान्त किया जाने वाला अन्तिम अर्थात् अन्त्येष्टि कर्म है, जिस का सम्बन्ध दाह संस्कार व अन्य अनुष्ठानों से है।

       ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार मृत्यु से बारह दिनों तक मृतक की आत्मा अपने आवास व सगे-सम्बन्धियों के आस-पास ही रहती है। मृतक की आत्मा अन्त्येष्टि कर्म का संचालन कर रहे पुरोहित के शरीर में भी देवरूप में प्रवेश करती है। शास्त्रों के अनुसार मृतक की आत्मा गरुड़पुराण की कथा को सुनती है जिससे  उसे मुक्ति मिल सके। ‘पितृमेधसूत्र‘ के अनुसार जिस प्रकार मनुष्य को जीवन में संस्कार के निर्वहन से जय मिलती है, उसी प्रकार मरणोपरान्त किए जाने वाले अन्त्येष्टि संस्कार के निर्वहन से मृतक को स्वर्ग प्राप्त होता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए दो संस्कार ऋणस्वरूप हैं जिन्हें करना अनिवार्य है, पहला- जन्म से सम्बन्धित जातकर्म और दूसरा – अन्त्येष्टिकर्म ।

भगवान विष्णु द्वारा पक्षीराज गरुड़ को दिया गया ज्ञान -

गरुड़जी की जिज्ञासा शान्त करने लिए भगवान विष्णु ने उन्हें जो ज्ञानमय उपदेश दिया था, इसे ही गरुड़ पुराण कहते है। गरुड़जी के प्रश्न पूछने पर ही स्वयं भगवान विष्णु के मुख से मृत्यु के उपरान्त के गूढ़रहस्य और परम कल्याणकारी वचन प्रकट हुए थे। भगवान श्रीहरी विष्णु का निर्धारित प्रमुख पुराण वैष्णव पुराण है। गरुड़ पुराण का ज्ञान ब्रह्माजी ने महर्षि वेदव्यास को सुनाया था। तत्पश्चात् महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्य महर्षि सूतजी को तथा महर्षि सूतजी ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषि-मुनियों को प्रदान किया था। बाद में  यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ा और महर्षि वेदव्यास ने इसे लिपिबद्ध कर(संकलित) कर दिया।

गरुण पुराण श्रेष्ठ पुराण :-

हिंदू धर्म में कुल 18 महापुराणों का उल्लेख मिलता है. सभी पुराणों का अपना-अपना विशेष महत्व है. लेकिन सभी पुराणों में गरुड़ पुराण को श्रेष्ठ माना गया है। गरुड़ पुराण अन्य 18 पुराणों में 17वां पुराण है. इसमें अन्य सभी पुराणों का सार वर्णित है. यही कारण है कि, इसे अन्य 17 पुराणों की अपेक्षा अधिक महत्व और श्रेष्ठ माना गया है।

13 दिनों तक होता है पाठ -

गरुड़ पुराण में जन्म के साथ ही मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्थिति के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है. इसके अनुसार, जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो मृतक की आत्मा पूरे 13 दिनों तक घर के आस पास ही रहती है. इसलिए 13 दिनों तक गरुड़ पुराण का पाठ घर पर रखा जाता है, जिससे कि मृतक की आत्मा को शांति व मोक्ष प्राप्त हो. इसे लोग अक्सर सिर्फ तेरहवीं तक सुनते हैं। इसमें कहानी नहीं, हिसाब है। 

     भगवान विष्णु गरुड़ जी के पूछने पर बताते हैं कि शरीर छूटने के बाद जीव के साथ क्या होता है। कोई कल्पना नहीं, कोई डरावनी फिल्म नहीं, बल्कि कर्म के भौतिकी का नक्शा ही दिखाया जाता है।

मृत्यु अंत नहीं,स्थानांतरण है -

पुराण कहता है, मृत्यु कोई अंत नहीं होता है यह केवल आत्मा का स्थानांतरण है। जैसे पुराने कपड़े उतार कर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा स्थूल शरीर छोड़ कर सूक्ष्म शरीर पहनती है। पर इस पहनावे में कोई जेब नहीं होती, सिर्फ कर्म फल का हिसाब होता है।

1. यमदूतों का आगमन और अंगूठे बराबर शरीर -

प्राण निकलते समय सबसे पहले दृष्टि बदलती है। घर वाले रो रहे होते हैं, डॉक्टर नब्ज देख रहा होता है, पर मरने वाला देखता है दो आकृतियों को। गरुड़ पुराण उन्हें यमदूत कहता है। रूप भयानक, आँखें लाल, हाथ में पाश। वे किसी को मारने नहीं आते, वे लेने आते हैं।

    उसी क्षण आत्मा अंगूठे के आकार का एक यातना शरीर धारण कर लेती है। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इसमें हड्डी मांस नहीं, सिर्फ वेदना सहने की क्षमता होती है। ताकि जो सुख दुख स्थूल शरीर से भोगे थे, उनका फल अब बिना शरीर के भी भोगा जा सके।

    यमदूत पाश डाल कर खींचते हैं। पुराण कहता है, आत्मा पीछे मुड़ कर देखती है। अपना घर, अपना नाम, अपनी देह। पर अब कोई सुनता नहीं। यही पहला कष्ट है, मोह का टूटना।

2. छियासी हजार योजन का रास्ता -

यमलोक की दूरी गरुड़ पुराण में 86,000 योजन बताई गई है। एक योजन लगभग आठ से नौ मील। यानी ऐसा रास्ता जिसे पैदल चलना पड़े तो महीनों लगें।

      यह रास्ता किसी हाईवे जैसा नहीं। न छाया, न पानी, न अन्न। कहीं तपती रेत, कहीं बर्फ जैसी ठंड, कहीं अंधेरा इतना कि अपना हाथ न दिखे। रास्ते में कांटे, जलते अंगारे, और हिंसक पशु।

     सबसे बड़ी यातना बाहर नहीं, भीतर है। आत्मा इस पूरे रास्ते अपने ही जीवन की फिल्म देखती है। कौन सा झूठ बोला, किसका हक मारा, किस भूखे को लौटाया। यमदूत कुछ नहीं कहते, सिर्फ चलाते हैं। पछतावा ही सबसे भारी बोझ बनता है। पुराण यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सत्य कहता है। मृत्यु के बाद दंड कोई बाहर से नहीं देता, हमारे कर्म ही रास्ता बन जाते हैं।

3. वैतरणी नदी सबसे प्रसिद्ध पड़ाव -

इस यात्रा का सबसे प्रसिद्ध पड़ाव है वैतरणी। सौ योजन चौड़ी, रक्त, मवाद, हड्डियों से भरी। जल खौलता हुआ, उसमें मगर, घड़ियाल जैसे जीव रहते हैं। गरुड़ पुराण में इसका उपाय भी बताया है, गोदान। जिसने जीवन में गाय का दान किया हो, श्रद्धा से, दिखावे से नहीं, उसे नदी पार कराते समय एक गाय आती है। आत्मा उसकी पूंछ पकड़ लेती है और बिना डूबे पार हो जाती है।

    यहाँ गाय सिर्फ पशु नहीं, प्रतीक है। गाय देने का अर्थ है पोषण देना, किसी का जीवन आसान करना होता है। जिसने जीते जी दूसरों को पार लगाया, उसे मरने पर पार लगाने वाला मिल जाता है। जिसने सिर्फ लिया, वह वैतरणी में डूबता उतरता है।

4. मृत्यु के बाद आत्मा की 16 नगरों की यात्रा -

वैतरणी के बाद आत्मा सीधे यमराज के दरबार नहीं आता। आत्मा को सोलह नगरों से गुजरना पड़ता है। हिंदू धर्म में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गरुड़ पुराण में इस यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें आत्मा को 16 विभिन्न नगरों (शहरों) से गुजरना पड़ता है। यह नगर आत्मा के कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करते हैं और इसे मोक्ष या पुनर्जन्म की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। 

1. सौम्यपुर -

गरुड़ पुराण के अनुसार, सौम्यपुर मृत्यु के बाद यमपुरी (यमलोक) की यात्रा का पहला मुख्य पड़ाव या नगर है,जहां आत्मा को यमराज के दूतों द्वारा ले जाया जाता है। यहां आत्मा को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का स्मरण कराया जाता है।

2. सौरिपुर -

गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प, दूसरा अध्याय) के अनुसार सौरिपुर वह दूसरा प्रमुख पड़ाव (नगर) है, जहाँ मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा पहुँचती है। इस नगर में काल (मृत्यु) का रूप धारण करने वाले जंगम नामक राजा का वास होता है। सौरिपुर पहुँचने पर जीव अत्यंत भयभीत हो जाता है और वहीं विश्राम करने की इच्छा करने लगता है ।इस पुरी में प्रवेश करने के बाद, मृत जीव अपने परिजनों द्वारा किए गए श्राद्ध (मासिक/त्रैपाक्षिक पिण्डदान) को खाकर और जल ग्रहण करके ही इस नगर को पार कर पाता है। इस नगर में उन आत्माओं को दंड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन काल में अधर्म का आचरण किया होता है।

3. नागेन्द्र भवन -

यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अन्य लोगों को अत्यधिक कष्ट दिया हो, उन्हें यहां दंड भोगना पड़ता है। गरुड़ पुराण के अनुसार “नागेन्द्र भवन नगर” आत्मा की यात्रा का एक भयावह स्थान बताया गया है। ये वर्णन अत्यंत रहस्यमयी माना जाता है।  कहा जाता है कि यहां का वातावरण भय, अंधकारऔर कष्ट से भरा होता है।विशाल सर्पों और भयानक दृश्य देखकर आत्मा भय महसूस करती है। पाप कर्म करने वाली आत्मा के लिए यह मार्ग अत्यंत कठिन बताया गया है। इसलिए धर्म और पुण्य को आत्मा की सबसे बड़ी रक्षा कहा गया है।

4. गन्धर्व नगर -

गंधर्व नगर इस यात्रा का तीसरा मुख्य पड़ाव है। इस नगर में वे आत्माएँ जाती हैं जिन्होंने अपने जीवन में पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाया हो।मृतक के परिजन द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए तीसरे महीने जो श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है, आत्मा उसका उपभोग इसी नगर में करती है। इस पड़ाव पर पहुँचने तक आत्मा पूरी तरह से प्रेत योनि में आ चुकी होती है। 

   गंधर्व' देवताओं के गायक और संगीतकार माने जाते हैं। पुराणों में 'गंधर्व नगर' माया, भ्रम या मृगतृष्णा (Mirage) को भी कहा जाता है, जो पल भर के लिए दिखाई देता है और फिर गायब हो जाता है। तीसरे महीने के पिंडदान से उसे यहाँ तृप्ति मिलती है, जिसके बाद वह अगले यानी चौथे महीने की यात्रा के लिए आगे बढ़ती है।

5. क्रूरपुर -

क्रूरपुर (क्रूरनगर) पांचवा नगर है, जिसे सबसे भयंकर और क्रूर माना गया है।   यह नगर उन आत्माओं के लिए है जो लोभ, कपट और अन्य दुष्कर्मों में लिप्त रहे हैं। उन्हें यहाँ तीव्र यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। पापी जीवों की आत्मा जब यमदूतों के साथ यात्रा करती है, तब वे पांचवें महीने में 'क्रोंचपुर' होते हुए क्रूरपुर नगर में पहुंचते है। इस नगर का वातावरण और यहां रहने वाले प्राणी अत्यंत क्रूर और भयानक होते हैं। यहाँ उन आत्माओं को कठोर दण्ड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन में लोभ, मोह, और ईर्ष्या के वशीभूत होकर पाप किए हों। यहाँ यमदूत आत्मा को निर्दयता से घसीटते हैं और यातना देते हैं। इन पांच महीनों और 15 दिनों की यात्रा में पहली बार जीव इस नगर में थोड़ा अन्न-जल ग्रहण करता है और विश्राम के बाद आगे की यात्रा पर बढ़ता है।

6. चित्रभवन -

क्रूरपुर के बाद आत्मा चित्रभवन नामक नगर में पहुंचती है, यह यमलोक का छठा पड़ाव है, जहाँ चित्रगुप्त और यमराज का भाई विचित्र शासन करता है। साढ़े छह महीने की यात्रा के बाद यमदूतों द्वारा प्रताड़ित की जाती हुई आत्मा 'चित्र भवन' (चित्रपुर) नगर में प्रवेश करती है। यह यमदूतों द्वारा आत्मा को प्रताड़ित किए जाने का स्थान भी माना जाता है।अत्यंत विशालकाय और भयानक रूप वाले राजा विचित्र को देखकर प्रेत रूप में भटक रही आत्मा बुरी तरह भयभीत हो जाती है और कांपने लगती है। यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्म किए हैं। उन्हें यहाँ मिश्रित अनुभव होते हैं।

7. वह्निपुर -

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के अनुसार, वह्निपुर यमपुरी का वह मुख्य द्वार है जहाँ पापी आत्माओं को यमदूत ले जाते हैं। वह्नि' का अर्थ अग्नि होता है। इस भवन में पहुँचते ही पापी जीवों को जलती हुई रेत, कँटीले जंगलों और आग की लपटों से गुजरना पड़ता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि यमपुरी के चार द्वार हैं, और पापी जीवों को दक्षिण दिशा के द्वार से ले जाया जाता है। इस मार्ग पर पापी जीवों को भयानक यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।

इस स्थान पर पहुँचते ही पापी जीवों को अग्नि की भयंकर गर्मी, भूख-प्यास और यातनाओं का सामना करना पड़ता है।इस स्थान में आत्माओं को अग्नि के दंड से गुजरना पड़ता है। यह नगर मुख्य रूप से उन लोगों के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अनैतिक कार्य किए हैं।

8. सन्निहितालय -

गरुड़ पुराण में 'सन्निहितालय' का अर्थ यमलोक (आत्मा के परलोक गमन) के मार्ग में आने वाले आठवें नगर या पड़ाव से है। इस स्थान पर पहुँचकर आत्मा को उसके पिछले जीवन की सभी अच्छी-बुरी घटनाओं का विस्तार से अनुभव कराया जाता है, जिससे वह अपने कर्मों की सच्चाई भली-भांति समझ सके। यहाँ आत्मा को उसके पूरे जीवन की सभी घटनाओं का अनुभव कराया जाता है, ताकि उसे अपने कर्मों की वास्तविकता का ज्ञान हो सके।

9. रौद्रपुर-

पौराणिक कथाओं में 'रुद्रपुर' का संबंध भगवान शिव से जुड़ा हुआ माना जाता है। सनातन धर्म में ऐसे कई ऐतिहासिक और प्राचीन शिव मंदिर हैं जिन्हें रुद्रपुर नाम दिया गया है, जहाँ गरुड़ पुराण के गूढ़ रहस्यों, आत्मकल्याण और मोक्ष मार्ग पर चर्चाएं होती हैं। इस नगर में वे लोग आते हैं जो क्रोधी स्वभाव के थे और जिन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक क्रूरता दिखाई हो।

10. प्रेतपुर -

गरुड़ पुराण के अनुसार 'प्रेतपुर' (या यमपुर) यमलोक के मार्ग में स्थित वह पहला/दसवां पड़ाव या नगर है जहाँ पापी आत्माओं को पहुँचाया जाता है। यह नगर अत्यंत भयंकर और कष्टदायक है, जिसकी दूरी 25 योजन मानी गई है। यहीं से आत्मा की कर्मों के अनुसार भयानक सजाओं की प्रक्रिया शुरू होती है।जो लोग अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों का पालन नहीं करते, वे इस नगर में प्रेत योनि में रहते हैं।

11. पिशाचपुर -

पिशाचपुर 16 पड़ावों में से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। जो आत्माएं जीवन में बुरे कर्म, चोरी, हिंसा या पर-स्त्री गमन करती हैं, उन्हें यमराज के दूत यातनाएं देते हुए पिशाचपुर की ओर ले जाते है ।इस पड़ाव पर आत्मा को भूख, प्यास, और विभिन्न प्रकार के राक्षसी जीवों (पिशाचों) द्वारा भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है। यह पड़ाव आत्मा को उसके पापों का बोध कराता है। जो व्यक्ति लोभी, छल-कपट में लिप्त रहते हैं, वे इस नगर में पिशाच रूप में रहते हैं।

12. शैलग्राम -

शालिग्राम (शैलग्राम) गरुड़ पुराण के अनुसार मोक्ष का एक अत्यंत पवित्र पड़ाव है। जब कोई प्राणी शरीर त्यागने लगता है, तब शालिग्राम शिला और तुलसी के सानिध्य में प्राण त्यागने से उसकी मुक्ति सुनिश्चित होती है।मृत्यु के समय मरणासन्न व्यक्ति के निकट शालिग्राम शिला और तुलसी का होना उसे वैकुंठ धाम तक का मार्ग प्रशस्त करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, आतुर काल (मृत्यु के निकट समय) में शालिग्राम की पूजा और विष्णु मंत्रों का जाप प्राण त्याग रहे व्यक्ति की सद्गति के लिए ज़रूरी बताया गया है। शालिग्राम शिला की उपस्थिति में किए गए श्राद्ध, एकादशाह कर्म (मृत्यु के ग्यारहवें दिन) और वृषोत्सर्ग से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने परोपकार किए हैं और जिनका पुण्य कर्म अधिक होता है।

13. नगर नरक-

यमराज के दरबार में कर्मों का फैसला होने के बाद, पापी आत्माओं को गरुड़ पुराण में वर्णित 28 प्रमुख नरक कुंडों में भेजा जाता है । पाप के आधार पर सजा तय होती है, जैसे:कुंभीपाक नरक: प्राणियों की हत्या करने वालों के लिए खौलते तेल की सजा। तमिश्र नरक: दूसरों की संपत्ति या धन लूटने वालों के लिए। यह स्थान पूर्णतः नरक के समान है, जहाँ आत्माओं को उनके पापों का कठोर दंड दिया जाता है।

14. विष्टिपुर -

यह उन पापी आत्माओं के लिए निर्धारित स्थान है जो जीवन भर दूसरों को धोखा देते हैं, झूठ बोलते हैं और छल-कपट का सहारा लेते हैं। इस नगर में इन पापियों को भयंकर यातनाएं भुगतनी पड़ती हैं।

15. ललाटपुर -

इस पड़ाव में पापी जीवों के ललाट (माथे) पर उनके कर्मों के अनुसार यमदूत गरम लोहे की सलाखों से दागकर भीषण आकृतियां (जैसे बिच्छू या सर्प) बनाते हैं। पापी आत्माओं को यहाँ भयंकर भूख और प्यास से तड़पाया जाता है ।यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने पूर्व जन्म में साधना की थी लेकिन मोह-माया में फंस गए थे।

16. यमपुरी -

गरुड़ पुराण में 'यमपुरी' (यमलोक) को आत्मा की अंतिम यात्रा का मुख्य पड़ाव माना गया है, जहाँ मृत्यु के देवता यमराज का निवास है। यह अंतिम नगर है, जहाँ यमराज आत्मा के कर्मों के अनुसार उसे पुनर्जन्म देने या मोक्ष प्रदान करने का निर्णय लेते हैं। कर्मों के आधार पर आत्मा को यमपुरी के चार विभिन्न द्वारों से प्रवेश मिलता है, जहाँ उसका न्याय और अंतिम गंतव्य तय होता है। यमपुरी और उसके चार द्वार गरुड़पुराण के अनुसार, पापी और पुण्यात्मा दोनों के लिए यमपुरी के मार्ग और द्वार अलग-अलग होते हैं। यमपुरी में प्रवेश के लिए चार दिशाओं में चार द्वार बनाए गए हैं -

पूर्वद्वार: यह द्वार महान संतों, तपस्वियों और सिद्ध योगियों के लिए खुलता है। यहाँ गंधर्व और अप्सराएं आत्मा का स्वागत करती हैं।

पश्चिमद्वार: धर्म-कर्म करने वाले, निस्वार्थ भाव से सेवा करने वालों और तीर्थयात्री जीवात्माओं के लिए यह द्वार होता है।

उत्तरद्वार: सत्य बोलने वालों और माता-पिता की सेवा करने वालों के लिए यह द्वार आरक्षित है।

दक्षिणद्वार: पापी, अधर्मी और क्रूर कर्म करने वालों के लिए यह द्वार खुलता है। इस द्वार से प्रवेश करने के बाद आत्मा को यमराज के भयानक दूतों द्वारा भयंकर नरक और कष्ट भोगने पड़ते हैं।

निष्कर्ष : सत्कर्म ही मोक्ष की कुंजी है- 

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को इन 16 नगरों से गुजरना पड़ता है। यह यात्रा आत्मा के कर्मों के अनुसार सुखद या कष्टदायक हो सकती है। अतः जीवन में सत्कर्म करना और धर्म का पालन करना आवश्यक है ताकि आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर किया जा सके।

     ये सोलह पड़ाव तेरह दिन के पिंडदान से जुड़े हैं। पुराण कहता है, पहले दस दिन में पिंड से सूक्ष्म शरीर के अंग बनते हैं। सिर, आँख, कान, हाथ, पैर। ग्यारहवें बारहवें दिन शक्ति मिलती है। तेरहवें दिन आत्मा यात्रा के योग्य होती है। इसलिए घर में गरुड़ पुराण सुनते हैं, ताकि आत्मा भटके नहीं, रास्ता याद रखे।

5.चित्रगुप्त का बहीखाता और यमराज का न्याय -

अंत में यमपुरी। बीच में सिंहासन पर यमराज, धर्मराज। पास में चित्रगुप्त। उनके पास कोई कंप्यूटर नहीं, पर बही खाता ऐसा कि एक सांस भी छूटती नहीं।

चित्रगुप्त का अर्थ है, गुप्त चित्र। हमारे मन में जो चित्र बनते हैं, वही रिकॉर्ड होते हैं। यमराज फैसला सुनाते हैं, पर सजा तय नहीं करते, कर्म तय करते हैं।


आगे के तीन रास्ते खुलते हैं-

1. पुण्यात्मा

जिसने दान, सेवा, सत्य को जिया, वह पितृलोक, स्वर्ग या उच्च लोकों में जाता है। वहाँ भी स्थायी घर नहीं, पुण्य खत्म होते ही लौटना पड़ता है।

2. पापी- 

हिंसा, छल, परस्त्री, गुरु अपमान, ऐसे घोर कर्मों वाले को अट्ठाईस नरकों में भेजा जाता है। रौरव जहाँ चीख सुनाई दे, कुंभीपाक जहाँ तेल में उबाला जाए, ये सब प्रतीक हैं उस मानसिक जलन के जो जीवित रहते हुए दूसरों को दी थी।

3. मिश्रित कर्म-

ज्यादातर लोग इसी श्रेणी में आते हैं। थोड़ा अच्छा, थोड़ा बुरा। इन्हें फिर जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों का चक्र। मनुष्य योनि बीच में एक स्टेशन है जहाँ टिकट बदला जा सकता है।

6. तेरह दिन का शोक प्रबंधन विज्ञान -

गरुड़ पुराण को लोग डर की किताब समझते हैं, पर वह शोक प्रबंधन की किताब है। जब घर में मृत्यु होती है, तो दस दिन तक पिंडदान करवाया जाता है। हर पिंड के साथ मंत्र पढ़ा जाता है, यह अंग बन रहा है। यह मनोवैज्ञानिक रूप से परिवार को धीरे धीरे स्वीकार कराता है कि शरीर जा चुका है।

     तेरह दिन तक गरुड़ पुराण सुनने का कारण भी यही है। आत्मा को रास्ता बताया जाता है, और जीवित लोगों को याद दिलाया जाता है कि जीवन अस्थायी है। इसलिए तेरहवीं के बाद कहा जाता है, अब आगे बढ़ो।

     पुराण यह भी कहता है कि हर आत्मा तुरंत जन्म नहीं लेती। कोई मोह के कारण भटकती है, कोई अकाल मृत्यु के कारण प्रतीक्षा करती है। किसी को साल भर लगता है, किसी को क्षण भर। समय वहाँ वैसा नहीं जैसा यहाँ पर है।

नरक का आईना -

गरुड़ पुराण नरक का नक्शा नहीं, आईना है। यमदूत बाहर से नहीं आते, वे हमारे ही डर, लोभ, क्रोध के रूप हैं। वैतरणी कोई नदी नहीं, वह स्वार्थ का समुद्र है। गोदान का अर्थ गाय खरीदना नहीं, जीवन में किसी को सहारा देना है। जब विष्णु गरुड़ को यह कथा सुनाते हैं, तो अंत में कहते हैं, जो इसे सुन कर भी नहीं बदलता, उसके लिए यमलोक दूर नहीं। जो सुन कर जाग जाता है, उसके लिए यमलोक मित्र बन जाता है।

      मृत्यु के बाद की यात्रा कष्टकारी इसलिए नहीं कि कोई देवता क्रूर है, बल्कि इसलिए कि हम जीते जी अपने कंधों पर बोझ बांध लेते हैं। गरुड़ पुराण डराने नहीं, हल्का करने आया है। ताकि छियासी हजार योजन का रास्ता हमें चलना न पड़े, हम यहीं, इसी जीवन में, अपने कर्मों से वैतरणी पार कर लें।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin2720901उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183



Saturday, June 20, 2026

सत्ता का अहंकार : बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला

 प्राचीन इतिहास में मगध के राजा घनानंद के द्वारा चाणक्य का अपमान किया था आज के लोकतंत्र में बिहार के मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी ने भरत तिवारी को तो मरवा ही दिया है।

बिहार के आरा में भरत तिवारी की कथित पुलिस एनकाउंटर में मौत और प्राचीन मगध साम्राज्य में धनानंद  द्वारा चाणक्य के अपमान का इतिहास, दोनों ही सत्ता के अहंकार और उसके गंभीर परिणामों से जुड़ी घटनाएं हैं।

चाणक्य का अपमान ऐतिहासिक घटना: 

प्राचीन इतिहास और बौद्ध/जैन ग्रंथों के अनुसार, मगध के नंद वंश के राजा धनानंद को उनके असीम अहंकार और क्रूरता के लिए जाना जाता है।जब आचार्य चाणक्य पाटलिपुत्र पहुंचे, तो राजा धनानंद ने उनके साधारण रूप और लोरंग-रूप का मजाक उड़ाया था। एक जन-कल्याण सभा में धनानंद ने चाणक्य का अपमान करके उन्हें दरबार से बाहर निकाल दिया था। 

      परिणामत: इस घोर अपमान से क्रोधित होकर चाणक्य ने अपनी शिखा(चोटी) खोल दी थी और यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वह संपूर्ण नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक इसे नहीं बांधेंगे। बाद में उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता से मगध साम्राज्य को उखाड़ फेंका।

भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण

बिहार के भोजपुर (आरा) में भरत तिवारी  की पुलिस एनकाउंटर में मौत को लेकर राज्य में भारी राजनीतिक बवाल मचा हुआ है।पुलिस का दावा है कि यह मुठभेड़ में मारा गया, लेकिन वायरल वीडियो और परिजनों के आरोपों के अनुसार उसने हथियार डाल दिए थे और आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद यह कार्रवाई की  गई। 

    इस एनकाउंटर को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और कुछ स्थानीय नेताओं ने इसे सीधे तौर पर सरकार की कानून-व्यवस्था की नीति से जोड़ते हुए आलोचना की है। इस घटना के बाद बिहार में एनकाउंटर और पुलिसिया कार्यप्रणाली को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।

   17 जून की सुबह. भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में एक 30 वर्षीय युवक हाथ में लोडेड पिस्टल लिए अपने घर की छत पर वीडियो बना रहा है. नीचे खड़े बिहार पुलिस और बिहार स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के जवान उसे सरेंडर करने के लिए कह रहे हैं।

    कुछ देर बाद ‘सिस्टम से नाराज’ और अपनी मांगें मनवाने पर अड़े भरत भूषण तिवारी नाम के उस शख्स का एनकाउंटर हो गया. भोजपुर प्रशासन का कहना है कि उसने पुलिसकर्मियों पर करीब 8 राउंड फायरिंग किए जिसके जवाब में जवानों को गोली चलानी पड़ी.

    पुलिस घायल अवस्था में भरत को पटना के PMCH लेकर रवाना हुई जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इसके बाद से ही बिहार पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं. कई BJP नेताओं ने भी सम्राट चौधरी से इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने की मांग की है.इतना ही नहीं इस घटना के बाद एनकाउंटरव्यवस्था को लेकर भी नए सिरे से बहस छिड़ गई है. ऐसे में इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं.

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

भरत तिवारी के एनकाउंटर की घटना से ठीक एक दिन पहले सोशल मीडिया पर एक कथित वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह पुलिस पर पिस्टल ताने नजर आया था. इस वीडियो के संबंध में भोजपुर पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया था कि भरत मानसिक रूप से अस्वस्थ था.

बिहार पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर सबसे पहला सवाल यही उठ रहा है कि एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति का एनकाउंटर कितना उचित है? क्या ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लेने में पूरी व्यवस्था विफल रही? कुछ लोगों का कहना है कि अगर पुलिस को पहले से पता था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो उसे किसी तरह हिरासत में लेकर इलाज के लिए मानसिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाना चाहिए था.

वहीं वीडियो के आधार पर कुछ लोगों का दावा है कि भरत ने पिस्टल फेंक दी थी और पुलिस के एक जवान ने उसे उठा लिया था.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इसके बाद एनकाउंटर करने की क्या जरूरत थी? भरत की मां का आरोप है कि आत्मसमर्पण करने के बाद भी पुलिस ने उनके बेटे का एनकाउंटर कर दिया.

BJP नेता अश्विनी चौबे ने तो अपनी फेसबुक पोस्ट में गुस्सा जाहिर करते हुए कुछ इस तरह लिखा, "अत्यंत दुखद. लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली इस घटना से मैं व्यथित हूं. कल भोजपुर के बिलौटी, शाहपुर निवासी नवयुवक भरत भूषण तिवारी की पुलिस प्रशासन द्वारा आत्मसमर्पण के बाद गोली मारकर नृशंस हत्या कर दी गई, जो हृदयविदारक है. लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है."

उन्होंने आगे लिखा, "मैं देश के गृह मंत्री अमित शाह से आग्रह करता हूं कि भरत तिवारी की निर्मम हत्या का संज्ञान लेते हुए दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर उच्चस्तरीय जांच का आदेश दें, ताकि समाज में गलत संदेश न जाए. साथ ही मैं बिहार के मुख्यमंत्री से आग्रह करता हूं कि दोषियों को 48 घंटे के भीतर जेल भेजकर बिहार में सुशासन का परिचय दें."

कानून में एनकाउंटर जस्टिफाई और लीगलाइज नहीं है: वकील विराग गुप्ता

एनकाउंटर पर उठ रहे सवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि भारत के किसी भी कानून में एनकाउंटर को जस्टिफाई या लीगलाइज नहीं किया गया है. अनुच्छेद 21 में जीवन जीने के अधिकार को एक फंडामेंटल राइट माना गया है.

कानून में साफ है कि सरकार किसी इंसान से उसके जीवन जीने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ कानूनी तौर पर छीन सकती है. एनकाउंटर एक निगेटिव पहलू है. संविधान में कानून के शासन की बात कही गई है. इसका मतलब है कि किसी आरोपी को कोर्ट के फैसले के बाद ही दोषी माना जाएगा. उसे कोर्ट से ही मौत की सजा सुनाई जा सकती है. जब तक कोर्ट में कोई दोषी साबित न हो जाए उसे निर्दोष माने जाने की बात कही गई है.

विराग का कहना है कि जब कानूनी प्रक्रिया में देरी की वजह से फायदा उठाकर कोई अपराधी या माफिया बच निकलते हैं तो इससे दो गलत बातें होती हैं. मॉब लिंचिंग जैसी घटना को बढ़ावा मिलता है. साथ ही सरकारें एनकाउंटर का शॉर्टकट इस्तेमाल करने लगती हैं.

     ये दोनों ही तरीके कानूनी तौर पर सही नहीं है और लॉन्ग टर्म में इसका परिणाम गलत हो सकता है. इसलिए समाज में क्राइम को रोकने का सही इलाज जल्द से जल्द न्याय और कानूनी प्रक्रिया में सुधार है.

 1997 में मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वेंकटचलैया ने एनकाउंटर को लेकर कहा था कि हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे. साथ ही वेंकटचलैया ने कहा था कि अगर यह साबित नहीं हो पाता कि पुलिस ने कानून के तहत एनकाउंटर किया है तब वह हत्या माना जाएगा.

   वेंकटचलैया ने यह भी कहा था कि अगर पुलिस की आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए या CrPC की धारा 46 पुलिस के तहत पुलिस एनकाउंटर करती है तो जायज है. बाकी हर तरह से गैरकानूनी है.

अगर भरत तिवारी मानसिक तौर पर अस्वस्थ तो एनकाउंटर कितना जायज है?

विराग कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ होने की स्थिति में कोई आपराधिक कृत्य करता है तो उसे अदालत के सामने एक कानूनी लाभ मिल सकता है. वह अदालत से कहता है कि अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और उसका ऐसी घटना को अंजाम देने का इरादा नहीं था तो इस आधार पर उसे राहत मिल सकती है.

हालांकि अगर पुलिस किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के साथ मुठभेड़ कर रही है तो वह उसके साथ एक सामान्य व्यक्ति की तरह भी व्यवहार कर सकती है. पुलिस यह तर्क दे सकती है कि उस व्यक्ति का खुद पर नियंत्रण नहीं था और वह दूसरों के लिए खतरा बन गया था, इसलिए यह कार्रवाई की गई.

विराग गुप्ता के मुताबिक जहां तक भरत तिवारी के मामले का सवाल है, यह जांच का विषय है कि पुलिस ने अनुपातिक बल का इस्तेमाल किया या नहीं. क्या पुलिस ने कमर के नीचे गोली चलाई थी या नहीं. क्या पुलिस की कार्रवाई कानून के दायरे में थी या नहीं. इन सवालों के जवाब बेहद अहम हैं.

उनके अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस का काम अपराधी को रोकना है, न कि उसे दंड देना. दंड देने का अधिकार केवल अदालत को है. पुलिस ही दंड देने लगेगी, तो संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों के विभाजन का उल्लंघन होगा.

मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के एनकाउंटर को लेकर अमेरिकी गैर-लाभकारी संस्था ट्रीटमेंट एडवोकेसी सेंटर के एक शोध में कहा गया है कि गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के पुलिस मुठभेड़ों में मारे जाने की संभावना सामान्य आबादी की तुलना में 16 गुना अधिक होती है. संस्था ने इसके लिए पुलिस व्यवस्था की कमियों और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव को प्रमुख कारण बताया है.

एनकाउंटर को लेकर सम्राट सरकार पर क्यों उठ रहे सवाल?

भरत तिवारी की मौत के बाद सम्राट सरकार की एनकाउंटर नीति पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं. दरअसल, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक बिहार में कुल 14 एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें तीन लोगों की मौत हुई है. इनमें सबसे ज्यादा पांच एनकाउंटर पटना में हुए हैं. इसके अलावा सीवान में तीन, जबकि समस्तीपुर, भागलपुर, खगड़िया, जहानाबाद और भोजपुर में एक-एक एनकाउंटर हुआ है.

29 अप्रैल को सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में घुसकर एक अधिकारी की हत्या के मामले में पुलिस ने रामधनी यादव को एनकाउंटर में मार गिराया था. इसके अलावा 3 मई को सीवान में BJP नेता के भांजे हर्ष की हत्या के मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी सोनू यादव को भी एनकाउंटर में ढेर किया था. बिहार पुलिस के एनकाउंटर में मारे जाने वाला तीसरा व्यक्ति भरत तिवारी है.

दरअसल मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ दिन बाद सम्राट चौधरी ने पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की थी. इस दौरान उन्होंने कहा था, "बिहार में कानून से कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता. जो कोई भी पुलिस को चुनौती देगा, उसे 48 घंटे के भीतर जवाब मिलेगा." माना जा रहा है कि कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए उन्होंने पुलिस को सख्त कार्रवाई की छूट दी है. हालांकि अब इसी नीति पर सवाल उठने लगे हैं.


      रिपोर्टिंग :-- 

डॉ.राधेश्यामद्विवेदी,एडवोकेट ,बस्ती।


Friday, June 19, 2026

क्या अयोध्या मंदिर के चंदे का विवाद 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों को प्रभावित करेगा ?

क्या अयोध्या मंदिर के चंदे का विवाद 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों को प्रभावित करेगा ?

( Courtesy: ‘The New Indian Express' 18 June 2026)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही, अयोध्या राम मंदिर में कथित दान अनियमितताओं की जांच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है और चुनावी चर्चाओं को प्रभावित कर सकती है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है , ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अयोध्या राम मंदिर में श्रद्धालुओं के दान के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं की जांच का परिणाम राजनीतिक परिदृश्य को आकार दे सकता है और चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।

जो मामला प्रारंभिक जांच के रूप में शुरू हुआ था, वह अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदल गया है , जिसके चलते एसआईटी जांच शुरू की गई है, एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है, विपक्षी दलों द्वारा आलोचना की गई है और मामले की न्यायिक निगरानी की मांग की गई है।

जांचकर्ता न केवल इस दावे की जांच कर रहे हैं कि 5 करोड़ से 7 करोड़ रुपये के बीच की राशि का गबन किया गया हो सकता है, बल्कि उन आरोपों की भी जांच कर रहे हैं कि भारत और विदेश के भक्तों द्वारा दान की गई सोने, चांदी और हीरे जड़ी लगभग 1,250 बहुमूल्य श्री राम शिलाएं गायब हो गई हैं।

यह सब राम मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों से शुरू हुआ, जिन्होंने दावा किया कि राम मंदिर में प्राप्त दान के प्रबंधन में अनियमितताएं थीं। सिंह ने आरोप लगाया कि आंतरिक स्तर पर चिंताएं उठाई गईं, लेकिन उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इन आरोपों को आगे बढ़ाते हुए, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को उठाया और आरोप लगाया कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए करोड़ों रुपये गायब हो गए हैं।

       अयोध्या में स्थित राम मंदिर इस वक्त चर्चाओं में है। मंदिर परिसर के दानपात्रों से 'गबन' का आरोप इस चर्चा की वजह है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है।

कब से कब तक हुआ राम मंदिर में दान राशि का गबन?

आरोप है कि राम मंदिर के दान की राशि में गबन का यह सिलसिला करीब सवा साल तक बेरोकटोक चल रहा था। दान की रकम पार करने वाले संदिग्ध नियमित रूप से दानपात्रों से इकट्ठा रकम इधर से उधर कर रहे थे। कुछ मौकों पर ये हेरफेर अपने चरम पर रही।

महाकुंभ और माघ मेले के दौरान: पिछले साल हुए महाकुंभ और इस साल माघ मेले के समय जब प्रयागराज से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु अयोध्या दर्शन के लिए भी पहुंचे, तो चढ़ावे की राशि में बेशुमार बढ़ोतरी हुई। कथित गबन करने वालों के लिए यह समय बहुत सुनहरा साबित हुआ और गिनती करने वाले लोगों ने इसका फायदा उठाते हुए एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक चंदे की राशि से पार किए।

आखिरी के महीनों में ज्यादा गबन: 

यह बात भी सामने आई कि पकड़े जाने से ठीक पहले, यानी आखिरी के कुछ महीनों में इन कर्मचारियों द्वारा बहुत बड़ी-बड़ी रकम पार की गई थी। इस तरह महाकुंभ से शुरू हुई यह चंदा चोरी लगातार सवा साल तक चलती रही और अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद किसी को इसकी भनक तक नहीं लग पाई। सोशल मीडिया पर गबन की गई राशि 200 करोड़ से लेकर 1400 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है।  

कैसे हुआ राम मंदिर से इतना बड़ा गबन?

राम मंदिर से दान राशि का इतना बड़ा गबन किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था, बल्कि यह नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, सुरक्षा में भारी चूक और गिनती की प्रक्रिया में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर किया गया एक सुनियोजित खेल था।

1. नियुक्तियों में खेल और 'टिन्नू' का नेटवर्क

मंदिर को हर दिन मिलने वाले चढ़ावे की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को मिली थी। हालांकि, बैंक ने चंदा गिनने वाले कर्मचारियों को एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से रखा था। इसमें खेल यह किया गया कि कंपनी में वही लोग चंदा गिनने के लिए रखे गए, जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। ये लोग ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों के रिश्तेदार या परिचित थे। इसमें 'टिन्नू' नाम के व्यक्ति की मुख्य भूमिका सामने आई है, जिसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए करीब 35 से 40 अपने ही लोगों को नौकरी पर रखवा लिया था।

2. गिनती के दौरान ही पार होती थी रकम

चोरी का तरीका बेहद शातिराना था। गिनती शुरू करने से पहले सभी दानपात्रों को खोलकर पूरी रकम एक जगह इकट्ठा कर ली जाती थी, जिससे पहले से यह पता नहीं रहता था कि कुल कितनी रकम है। इसी का फायदा उठाकर कर्मचारी गिनती के दौरान ही रकम पार कर देते थे। अंत में जोड़-घटाकर जो रकम बचती, उसी का विवरण दर्ज कर दिया जाता था, जिससे चोरी पकड़ में नहीं आती थी।

3. बिना तलाशी के कर्मियों की आवाजाही 

मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से रखे गए ये कर्मचारी गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के कोने-कोने तक बेखौफ आते-जाते थे। सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो कोई तलाशी ली जाती थी और न ही इनका सत्यापन किया गया था। आरोप है कि महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब चढ़ावा कई गुना बढ़ गया था, तो इसका फायदा उठाकर इन चोरों ने लंबी गिनती का फायदा उठाया और एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार कर दिए।

4. कम वेतन की आड़ में बड़ा खेल

पकड़े गए कर्मचारी मात्र 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम कर रहे थे। इतने कम वेतन के बावजूद वे दिन-रात मंदिर में लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उन्हें वेतन से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वे चढ़ावे की करोड़ों की रकम पार कर रहे थे। चूंकि ये कर्मचारी ट्रस्ट की सिफारिश पर रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों ने भी इनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए। इस पूरे मामले में बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

5. सीसीटीवी और निगरानी तंत्र की विफलता 

भले ही परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन निगरानी व्यवस्था और ऑडिट पूरी तरह से अप्रभावी रहे। वास्तव में सीसीटीवी कैमरों ने घटनाओं को रिकॉर्ड किया था, लेकिन रियल-टाइम मॉनिटरिंग न होने के कारण चोरी का तुरंत पता नहीं चला। अब एसआईटी की जांच शुरू होने के बाद इन सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में कब्जे में लिया गया है, जिनसे मामले में कई अहम खुलासे होने के अनुमान हैं। हालांकि, ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि आठ महीने के सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिए गए थे।

राम मंदिर में गबन के मामले का खुलासा कैसे हुआ?

राम मंदिर में चल रहे गबन के इस बड़े मामले का खुलासा मुख्य रूप से दो चरणों में हुआ। बताया जाता है कि चढ़ावे की राशि में हेरफेर की भनक लगी, तो व्यवस्था की निगरानी की गई और तब जाकर इस पूरे खेल का उजागर हुआ। हालांकि, प्रकरण के सामने आने के बाद शुरुआत में ट्रस्ट ने इस मामले को बेहद गोपनीयता के साथ दबाए रखा था।

अखिलेश यादव के आरोप

इस विवाद ने सार्वजनिक रूप से तब तूल पकड़ा जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दान के करोड़ों रुपये गायब होने का खुला आरोप लगाया। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट करते हुए कहा था कि चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पाई गई है, जो बेहद शर्मनाक है। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग भी की।

अखिलेश यादव के आरोपों के बाद यह मामला धीरे-धीरे उजागर होना शुरू हुआ। इसके बाद अयोध्या से लेकर पूरे देश में राम मंदिर में सवा साल तक चले इस गबन को लेकर हड़कंप मच गया। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने शुरुआत में चुप्पी साध ली। मामले के बाहर आने पर ट्रस्ट ने खुद ही गोपनीय स्तर पर संदिग्ध कर्मचारियों को पकड़ा और उनसे पूछताछ की। विवाद बढ़ने लगा तो ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की। इसके बाद राज्य सरकार की तरफ से विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया, जो अब मंदिर पहुंचकर इस पूरे घोटाले की गहन तफ्तीश कर रही है।

किस-किस पर इस घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे हैं? 

राम मंदिर के दान घोटाले में अब तक कई स्तर पर लोगों के शामिल होने के आरोप और संदेह सामने आए हैं। 

चंदा गिनने वाले पांच मुख्य कर्मचारी: 

इस गबन को सीधे तौर पर अंजाम देने में मुख्य रूप से पांच कर्मचारियों- लवकुश मिश्रा, अवनीश, अनुकल्प, करुण (या करुणे) और रमाशंकर के नाम सामने आए हैं। इन्होंने चोरी कुबूल की है और इन्हीं की निशानदेही पर अब तक करोड़ों रुपये की रिकवरी की जा चुकी है। लवकुश के घर से करीब 10-12 लाख रुपये और अवनीश के बैंक खाते से 5 लाख रुपये बरामद किए गए हैं।

'टिन्नू' और उसकी तिकड़ी:

 इस पूरे खेल के मुख्य सूत्रधार के रूप में टिन्नू, उसके बेटे और भतीजे की तिकड़ी की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। टिन्नू ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी का बेहद करीबी है और उसने अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल करके करीब 35-40 अपने परिचितों को चंदा गिनने के काम पर रखवाया था। पकड़े गए पांच कर्मचारियों में शामिल रमाशंकर भी टिन्नू का ही रिश्तेदार है। टिन्नू का भतीजा तो मामले के पहले ही दिन पकड़ लिया गया था। 

       जांच में पता चला है कि टिन्नू के पास अयोध्या और लखनऊ में करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्तियां हैं। वह कभी ऑटो रिक्शा चलाता था। अयोध्या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास उसका एक 70 कमरों वाला छात्र छात्रावास भी है। एसआईटी जल्द ही इस छात्रावास की भी जांच कर सकती है।

पदाधिकारियों के रिश्तेदार और मध्यस्थ: 

जांच में यह भी सामने आया है कि हेरफेर में ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी के भतीजे की भी शुरुआती भूमिका थी, जिसकी शह पर अन्य लोग चोरी को अंजाम दे रहे थे, हालांकि बाद में टिन्नू ने उसे किनारे करवा दिया था। इसके अलावा रवि मिश्रा का नाम भी सामने आया है, जो आरोपी लवकुश का रिश्तेदार (समधी) है और उसी ने लवकुश को मंदिर में काम पर लगवाया था।

        सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर सोमेश आनंद भी आया है। वह मंदिर निर्माण के मुख्य प्रभारी गोपाल राव का कथित भतीजा बताया जा रहा है। सोमेश ने एक साल में देश के विभिन्न राज्यों की 50 से अधिक संदिग्ध यात्राएं की हैं। वह अयोध्या रेलवे स्टेशन से बोरों में भारी सामान भरकर ट्रेन से दक्षिण भारत जाता था। वापसी में वह हवाई जहाज से खाली हाथ अयोध्या लौटता था। फिलहाल सोमेश के बैंक खातों और हवाई टिकटों की बारीकी से जांच की जा रही है।

      इस मामले में केडी तिवारी का नाम भी सामने आया है। उनके पास रामलला के आभूषणों को संभालने की मुख्य प्रशासनिक जिम्मेदारी थी। सुरक्षा अधिकारियों ने उनके आवास पर भी छापेमारी की थी। केडी तिवारी द्वारा हाल ही में खरीदी गई डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन का सौदा जांच के दायरे में है। उन्होंने मीडिया से कहा, "मेरी ड्यूटी महज श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए आभूषणों को तौलकर उन्हें रसीद देने तक सीमित थी, उसके बाद मैं उसे ट्रस्ट के वरिष्ठों को सौंप देता था; आगे गहनों के साथ क्या खेल होता था, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है।

       वीट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी: सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कई बड़े पदाधिकारी भी शक और जांच के घेरे में हैं। मंदिर की व्यवस्थाओं और चढ़ावे की गिनती के लिए मुख्य रूप से चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे पदाधिकारी जिम्मेदार हैं। इसके बावजूद चढ़ावे की रकम का गबन होना कई सवाल खड़े कर रहा है। ये सभी जिम्मेदार घटना के उजागर होने के बाद से खामोश हैं। एक भी पदाधिकारी की तरफ से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया।। एसआईटी यह जांच कर रही है कि क्या इस गबन में शीर्ष स्तर से कोई संरक्षण या मिलीभगत तो नहीं थी।

बैंक अधिकारी और कर्मचारी: 

इस पूरी हेराफेरी में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। बैंक ने जिस आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए कर्मचारियों को रखा, उसमें वही लोग भर्ती किए गए जिन्हें ट्रस्ट ने तय किया था। बैंक अधिकारियों ने इन सिफारिशी कर्मचारियों के काम और ऑडिट पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया, जिससे उनकी मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता।

कितनी राशि के गबन की हो रही बात?

राम मंदिर से गबन की गई राशि का कोई एक सटीक और आधिकारिक आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है, क्योंकि चंदा चोरों ने बहुत ही शातिराना तरीके से गिनती होने से पहले ही रकम पार कर दी थी। गिनती के बाद जो रकम बचती थी, केवल उसी का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता था, इसलिए कुल कितने रुपये चोरी हुए, इसका सटीक अंदाजा लगाना जांच एजेंसियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। 

      शुरुआती जांच और पकड़े गए संदिग्धों से पूछताछ के आधार पर आठ करोड़ रुपये से अधिक के हेरफेर के सीधे संकेत मिले हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ (लगभग 200 करोड़ रुपये) तक पहुंचने की बात कही जा रही है। हालांकि, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

      चौंकाने वाली बात यह है कि चोरी केवल नकदी तक सीमित नहीं थी। दान में आए करोड़ों रुपये के सोने-चांदी के जेवरात भी गायब किए जाने के आरोप लगे हैं। चर्चा तो यह भी है कि असली सोने के आभूषणों को हटाकर उनकी जगह नकली जेवरात रख दिए गए और यहां तक कि दान में मिली दो किलो की सोने की गदा भी गायब बताई जा रही है। 

अब कैसे चल रही इस कथित गबन की जांच?

मामले में अब उच्च स्तरीय जांच की जा रही है। इसके लिए एसआईटी का गठन हुआ। इस दल में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज लखनऊ किरन एस और विशेष वित्त सचिव नील रतन शामिल हैं। सरकार ने एसआईटी को सात दिन के भीतर अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और 15 दिन में अंतिम (फाइनल) रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश दिया है।

अभी कहां तक पहुंची एसआईटी की जांच

टीम ने मंदिर परिसर स्थित ट्रस्ट के कार्यालय पहुंचकर दान राशि से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड, दस्तावेज और वित्तीय अभिलेख अपने कब्जे में ले लिए हैं।एसआईटी ने घटना से जुड़े अहम सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के तौर पर कब्जे में लिया है। टीम ने इस बात की भी बारीकी से जांच की है कि दानपात्र कहां रखे जाते हैं, गिनती से पहले उन्हें किस कमरे में ले जाया जाता है और वहां निगरानी की क्या व्यवस्था है।

एसआईटी ने पकड़े गए संदिग्ध कर्मचारियों से पूछताछ करने के साथ-साथ बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी तलब किया है।बैंक कर्मियों से विशेष रूप से यह पूछा जा रहा है कि गिनती करने वाले कर्मचारियों की भर्ती किस तरह और किसकी सिफारिश पर की गई थी।

यह जांच केवल वित्तीय हेरफेर तक सीमित नहीं है। एसआईटी यह भी गहराई से खंगाल रही है कि क्या इस गबन के पीछे किसी बड़े पदाधिकारी, ट्रस्टी याशक्तिशाली व्यक्ति का संरक्षण, मिलीभगत या लापरवाही थी। बताया गया है कि किसी ट्रस्टी की संलिप्तता या गंभीर प्रशासनिक चूक पाई जाती है, तो उनके अधिकार सीमित किए जा सकते हैं। 

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, इस जांच के दो मुख्य पहलू हैं- पहला इस आपराधिक कृत्य की तह तक जाना और दूसरा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तंत्र स्थापित करना।

अखिलेश यादव ने जांच की मांग की:-

"भक्तों की आस्था सर्वोपरि है। भगवान राम के नाम पर चढ़ाया गया हर रुपया भक्तों का है। सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए," अखिलेश यादव ने हाल ही में इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए यह बात कही ।

उनके आरोपों ने एक तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी, जिसमें विपक्षी दलों ने मंदिर प्रशासन पर दान के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया। मंदिर के कर्मचारियों द्वारा कथित तौर पर अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने की खबरें सामने आने के बाद यह मुद्दा राजनीति से परे जाकर तेजी से फैल गया, जिसके चलते उत्तर प्रदेश सरकार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करना पड़ा।

एसआईटी की चल रही जांच:- 

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, ध्यान लेखा अभिलेखों से हटकर मंदिर की दान प्रबंधन प्रणाली की कार्यप्रणाली पर केंद्रित हो गया। एसआईटी ने चढ़ावे की गिनती के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों से पूछताछ की, सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा की और भक्तों द्वारा जमा की गई नकदी, आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुओं की सुरक्षा प्रक्रिया की जांच की। सूत्रों ने बताया कि जांचकर्ताओं ने विशेष रूप से यह जानने की कोशिश की कि क्या दान की गिनती में शामिल कर्मचारियों की संग्रह केंद्रों से निकलते समय तलाशी ली जाती है, मूल्यवान वस्तुओं की आवाजाही की निगरानी कौन करता है और क्या सीसीटीवी निगरानी प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर रही है।

एक अहम मोड़ तब आया जबजांचकर्ताओं ने मंदिर के कर्मचारी तिन्नू सिंह के घर से नकदी बरामद की। तिन्नू सिंह मंदिर के कामकाज से जुड़ने से पहले ऑटो-रिक्शा चालक का काम करते थे। इस बरामदगी से दान-संग्रह से जुड़े कर्मचारियों की जांच तेज हो गई और निगरानी तंत्र पर नए सवाल खड़े हो गए। जांचकर्ता दान-संग्रह से जुड़े अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं और खबरों के अनुसार वे वित्तीय लेनदेन, संपत्ति अधिग्रहण और आवागमन के रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि राम शिलाओं के लापता होने के आरोपों के सामने आने के बाद विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया। सोने और चांदी की ये ईंटें या 'शिलाएं' राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में एक विशेष स्थान रखती हैं।

1980 के दशक के उत्तरार्ध में, भारत और विदेशों से भक्तों ने आंदोलन में भागीदारी के प्रतीक के रूप में भगवान राम के नाम से खुदी हुई विशेष रूप से निर्मित ईंटें भेजीं। इनमें से अधिकांश प्रतीकात्मक थीं, जबकि कुछ कीमती धातुओं से बनी थीं या रत्नों से जड़ी थीं।

कीमती शिलाओं का अब पता नहीं लगाया जा सकता :- 

आरोपों के अनुसार, ऐसी 1000 से अधिक बहुमूल्य शिलाएँ अब लापता हैं। इनमें मॉरीशस से भेजी गई सोने की परत चढ़ी राम शिला और मुंबई के एक व्यवसायी द्वारा दान की गई हीरे जड़ी शिला भी शामिल हैं। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो इन शिलाओं का गायब होना न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि जनभागीदारी और आस्था पर आधारित इस आंदोलन के लिए एक प्रतीकात्मक झटका भी होगा।

जैसे-जैसे आरोप बढ़ते गए, इस मुद्दे ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग ले लिया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंदिर के दान के प्रबंधन पर बार-बार सवाल उठाए और पूरी पारदर्शिता की मांग की। आरोपों का जिक्र करते हुए यादव ने कहा कि भगवान राम का पैसा लेने वालों को उसे लौटा देना चाहिए और जोर देकर कहा कि भक्तों के चढ़ावे से जुड़ी कोई भी अनियमितता "सनातन धर्म का अपमान" है।

समाजवादी पार्टी ने इस विवाद को जवाबदेही की परीक्षा के रूप में पेश करने की कोशिश की है और तर्क दिया है कि लाखों श्रद्धालुओं से दान प्राप्त करने वाली संस्था जांच से परे नहीं रह सकती। पार्टी नेताओं ने मांग की है कि एसआईटी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं और यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए।

कांग्रेस भी इस बहस में शामिल हो गई और उसने उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में समयबद्ध न्यायिक जांच की मांग की। पार्टी नेताओं ने तर्क दिया कि मंदिर को प्राप्त होने वाले दान की विशाल मात्रा को देखते हुए स्वतंत्र निगरानी आवश्यक है और यदि भक्तों के चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर प्रश्न बने रहते हैं तो केवल न्यायिक जांच ही जनता का विश्वास बहाल कर सकती है।

इस बीच, भाजपा ने एसआईटी जांच का समर्थन करते हुए इस मुद्दे का राजनीति करण करने के प्रयासों को खारिज कर दिया है। वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने जांच समिति गठित करके त्वरित कार्रवाई की है और जोर देकर कहा है कि अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। पार्टी ने विपक्ष पर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है।

इस विवाद में एक और मोड़ जोड़ते हुए, भाजपा के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह ने हाल ही में दावा किया कि उन्हें मामले से संबंधित घटनाक्रमों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से विवरण प्रकट करने से परहेज किया। उन्होंने कहा, "अगर मैं सच बताऊँगा, तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊँगा," उनके इस बयान ने जांच को लेकर अटकलों को और हवा दी।

ट्रस्ट का कहना है कि जांच पूरी होने तक इंतजार करें :-

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट लगातार यही कहता रहा है कि जांच पूरी होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि ट्रस्ट जांचकर्ताओं के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और उनका मानना है कि अटकलों के बजाय एसआईटी जांच के माध्यम से ही तथ्य सामने आने चाहिए। ट्रस्ट के अधिकारियों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि पारदर्शिता सभी के हित में है और जांच से सच्चाई सामने आएगी।

राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े कई लोगों के लिए यह विवाद विशेष रूप से पीड़ादायक है क्योंकि मंदिर का निर्माण दशकों के जन आंदोलन और बलिदान के फलस्वरूप हुआ था। मंदिर आंदोलन से जुड़े एक अनुभवी कारसेवक संतोष दुबे ने कहा कि भक्तों ने न केवल धन दान किया बल्कि रामशिला जैसी भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण भेंट भी चढ़ाईं। उन्होंने कहा, "भक्तों की आस्था सर्वोपरि है। सच्चाई जो भी हो, एक पारदर्शी जांच के माध्यम से सामने आनी चाहिए।"

क्या इस विवाद का असर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा ?

इस विवाद ने आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चर्चा छेड़ दी है। हालांकि आरोपों की अभी जांच चल रही है और किसी भी प्रकार की त्रुटि साबित नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े प्रश्न लगातार चर्चा में बने रहते हैं तो यह मुद्दा सार्वजनिक बहस का विषय बन सकता है।

लखनऊ स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख और राजनीतिक विश्लेषक शशिकांत पांडे ने कहा कि यह विवाद आस्था, शासन और जवाबदेही के संवेदनशील मुद्दों को छूता है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर से जुड़े मुद्दों का उत्तर प्रदेश में भावनात्मक और राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है और चुनाव प्रचार के दौरान अगर ये मुद्दे सुर्खियों में बने रहते हैं तो मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकते हैं।

भाजपा के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीक:- 

उन्होंने कहा, “राम मंदिर भाजपा के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीकों में से एक है। यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो इस मुद्दे से शायद लंबे समय तक राजनीतिक नुकसान न हो। हालांकि, यदि जांच में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ावे से संबंधित अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो विपक्ष इसे केवल भ्रष्टाचार के बजाय विश्वास के प्रश्न के रूप में पेश करने का प्रयास करेगा।”

पांडे ने आगे कहा कि सरकारी विभागों से जुड़े भ्रष्टाचार के पारंपरिक आरोपों के विपरीत, मौजूदा विवाद भगवान राम के नाम पर लाखों भक्तों द्वारा किए गए दान से संबंधित है। उन्होंने कहा, "इसका राजनीतिक प्रभाव जांच के नतीजे पर निर्भर करेगा। मतदाता व्यक्तियों द्वारा कथित कदाचार और व्यापक धार्मिक आंदोलन के बीच अंतर कर सकते हैं। साथ ही, विपक्ष इस मुद्दे को जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस में बदलने का प्रयास करेगा।"

विपक्षी दलों ने पहले ही इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी ने मंदिर के दान के प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता की मांग की है, जबकि कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग करते हुए तर्क दिया है कि भक्तों के चढ़ावे के प्रबंधन में जनता का विश्वास सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

वहीं, भाजपा इस जांच को इस बात के सबूत के तौर पर पेश कर सकती है कि अधिकारी आरोपों की जांच करने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर कोई भी गलत काम साबित होता है तो सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और उन्होंने विरोधियों पर धार्मिक आस्था से जुड़े मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है।

फिलहाल, यह विवाद एक सिद्ध घोटाले के बजाय जांच के दायरे में है। हालांकि, उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर के केंद्रीय महत्व को देखते हुए, 2027 के विधानसभा चुनावों पर इसका संभावित प्रभाव काफी हद तक जांच के निष्कर्षों और आने वाले महीनों में मतदाताओं द्वारा इस मुद्दे को किस तरह से देखा जाता है, इस पर निर्भर करेगा।

जनवरी 2024 में राम लल्ला की प्रतिमा की स्थापना के बाद से मंदिर को सैकड़ों करोड़ रुपये के दान के साथ-साथ भारी मात्रा में सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। एसआईटी अब नकद दान, कर्मचारियों के आचरण, सुरक्षा प्रक्रियाओं और लापता सोने, चांदी और हीरे जड़े राम शिलाओं से संबंधित आरोपों की जांच कर रही है, जिससे जांच एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर गई है, जिसमें प्रारंभिक निष्कर्षों के आधार पर कई एफआईआर दर्ज की जा सकती हैं। 


(हिंदी में प्रस्तुति: डॉ. राधेश्याम द्विवेदी)