Saturday, February 14, 2026

राजा मानसिंह पर मनमानी का आरोप और विरासत की अस्थिरता का दौर✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

यह कहानी शाहगंज अयोध्या के वर्तमान राजा लाल अम्बिका प्रताप सिंह के सोशल साइट पर डाले गए एक विवरण के आधार पर आधारित  है।

महाराजा दर्शन सिंह की संताने:

अयोध्या के राजा दर्शनसिंह के तीन बेटे थे - 

1.राजा रामाधीन सिंह

2.राजा रघुबर दयाल सिंह और

3. राजा मान सिंह 

राजा रामाधीन सिंह से मत भिन्नता

राजा रामाधीन सिंह सबसे बड़े होने के नाते राजा बने। उनकी राजकाज में इच्छा कम थी। वे शिव जी परम के भक्त थे । शाहगंज के पास रमपुरवा में में जो पारिवारिक शिव मंदिर है उसी में दोनों समय पूजा पाठ और संध्या आरती किया करते थे । मझले भाई मानसिंह को फौज की जिम्मेदारी मिली हुई थी वह लड़ाई लड़कर जो धन को इकट्ठा करते थे। इससे उनके मन में यह इर्ष्या जग गई कि मेहनत मैं करूं और इसका भोग राजा रामादीन सिंह करें । बड़े होने के कारण राजा रामांधीन सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। मान सिंह इनसे खुश नहीं थे क्योंकि युद्ध जीतकर खजाने को वे भरते और बड़े होने के कारण वह रामाधीन के नियंत्रण में चला जाता था।

भाई की हत्या की साजिश 

मान सिंह अपने भाई रामाधीन सिंह से खुश नहीं रहते थे । वह उनकी हत्या कराना चाहते थे । उन्होंने किले के मुख्य गेट के सामने तोप लगवा दिया था। अपने नौकरों को आदेश दिया था कि जब राजा साहब मंदिर से निकले तो उन पर तोप की बौछार कर दी जाए। 

     जब तत्कालीन रानी साहिबा को इस बात का पता चला तो रानी साहिबा ने राजा साहब से कहा कि आप पीछे के रास्ते से घर जाइए । आपकी हत्या करने का खड्यंत्र रचा जा रहा है। पर राजा साहब नहीं माने और मुख्य गेट से प्रवेश करते हुए तोप के आगे आकर खड़े हो गए। उनमें बड़ा तेज था। वह किसी से डरते नहीं थे। उन्होंने नौकरों से कहा कि तोप में  आग लगाओ । सारे नौकर डर के मारे भाग गए। फिर वहीं से उन्होंने मानसिंह को बुलवाया और कहा, राजा मैं हूं, मैं तुम्हें आदेश देता हूं की तुम तोप में आग लगाओ । मानसिंह थरथर कांपने लगे। वे उन्हें औलाद न होने का शाप भी दिए। घर का माहौल बिगड़ चुका था और एक छत के नीचे रहना मुश्किल हो गया था। इससे बचने के लिए राजा रामाधीन सिंह अयोध्या जिले में स्थित शाहगंज की हवेली छोड़कर महारानी और अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ वाराणसी चले गए। उन्होंने कहा था कि गद्दी सदा निर्माण से चलेगी। यह एक तरह का शाप था।    

रूठे भाई को मानने वाराणसी गए 

वाराणसी में रामाधीन सिंह शिव भक्ति में खूब रम गए और शिव आराधना में खूब प्रसन्न भी रहने लगे थे। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। उन्होंने ज्योतिषी की सलाह लिया तो पता चला कि बड़े राजा साहब रामाधीन सिंह का उन्हें शाप लगा हुआ है। जब तक वे वापस हवेली नहीं आएंगे वंश नहीं चलेगा। मान सिंह अपने कुछ और परिजनों के साथ वाराणसी गए । राजा साहब को वापस लेने के लिए उनसे बहुत बिनती की। राजा साहब वापस लौटने से मना कर दिया। तब मान सिंह ने कहा हम आपको वापस लिए बिना नहीं लौटेंगे और ना ही अन्न जल ग्रहण करेंगे। इसी तरह कई दिन बीत गए। 

        रानी साहिबा ने कहा आप अपना फर्ज और भाई परिवार की बात को अपने न्याय के तराजू में तौलिए और जो पलड़ा भारी लगे वैसा निर्णय कीजिए। तीन दिन बाद राजा साहब शाहगंज लौटने को राजी हो गए पर वह यहां का अन्न जल ग्रहण ना करने की प्रतिज्ञा कर लिए थे। उनके साथ ऊंट से प्रयाग जी से पानी आ जाता और वे अपने साथ लाए अन्न को ही ग्रहण किए। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। 

भाई के वंशज शाहगंज में 

राजा रामादीन सिंह के पुत्र का नाम विश्वनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और शंकर नाथ सिंह रहा। विश्व नाथ सिंह ने जहर देकर छोटे भाई शंकर नाथ की हत्या करा दी थी । तो शंकर नाथ ने विश्वनाथ को बेअवलाद होने का शाप दे दिया था। जो खुद बरम बाबा बनकर हवेली में अभी भी रहते हैं। काशी नाथ के वंशज लाल धर्मेंद्र नाथ सिंह थे और उनके पुत्र लाल अम्बिका प्रताप सिंह वर्तमान में राजा हैं।जो शाहगंज अयोध्या के महल के एक हिस्से में में रहते हैं। 

भाई राजा रघुबर दयाल सिंह गोंडा और बहराइच के नाज़िम

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था । राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी।वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि) की उपाधि पाए थे। वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843 ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली थी। 

मानसिंह ने की थी दो शादियां, एक बेटी हुई 

उनके इस कृत्य से बाद में मान सिंह को कन्या रत्न प्राप्त हुई जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा।जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था। 

अनिश्चितता भरा रहा 17 साल

सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर रहा जो 1987 को लाल प्रताप नारायण सिंह को राजा के रूप में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिलने पर स्थिर हो सका था। इस बीच महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह भी शासक रहे।

मानसिंह ने अपनी विधवा को वसीयत लिखा 

संवत 1927 वि /11 अक्टूबर 1870 ई में मृत्यु हो जाने के पूर्व ही स्वर्गवासी महाराज मान सिंह ने एक वसियतनामा लिखकर एक सन्दूक़चे में बन्द कर दिया था। वह सन्दूक़चा फैज़ाबाद के हाकिमों ने खोला तो उसमें लिखा था कि हमारे मरने पर हमारी विधवा महारानी सुभाव कुँवरि उत्तराधिकारिणी होगी।

महारानी ने त्रिलोकीनाथ सिंह को दत्तक पुत्र बनाया

राजा मानसिंह की महारानी सुभाव कुँवरि सहिबा ने उसी वसियतनामे के अधिकार से राजा रघुवीर सिंह के कनिष्ठ पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह को गोद ले लिया था। जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि सत्ता उत्तराधिकार और गोद लेने की प्रक्रिया से आगे बढ़े। गोद लेने की इसी कानूनी और पारंपरिक प्रक्रिया के तहत,लाल त्रिलोकीनाथ सिंह को गोद लिया और उन्हें मेहदौना (अयोध्या) का उत्तराधिकारी बनाया था। यह निर्णय फैजाबाद के अधिकारियों द्वारा वसीयतनामा खोलने के बाद लिया गया था,जिसमें वे उत्तराधिकारी बनीं थीं। राजा त्रिलोकी नाथ सिंह नाम मात्र के राजा बन सके थे।

बेटी का विवाह और नाबालिक दौहित्र का गोदनामा

महाराजा मानसिंह के केवल एक बेटी श्रीमती ब्रजविलास कुँवरि उर्फ बच्ची साहिबा थीं। उसमें अपने पिता की वीरता और बुद्धिमत्ता की झलक लिए हुई थी। वह बाल्यकाल से ही युद्ध और प्रशासन में रुचि रखती थी। अक्सर वह अपने पिता के साथ दरबार में बैठकर मामलों को सुनती और सुझाव देती।उनका विवाह आरा के रईस बाबू नरसिंह नारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं के पुत्र लाल प्रताप नारायण सिंह हुये जो ददुआ साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। ददुवा साहब नाबालिक थे । अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही।

प्रिवी कॉन्सिल ने दौहित्र को राजा माना 

लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये। अभी तक इनकी राजधानी शाहगंज ही रहा।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


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