अवस्थिति
अयोध्या जिले के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा का किला' या 'राजा की हवेली' स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है । इस वंश की स्थापना राजा दर्शन सिंह जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है। यहां राजा दर्शनसिंह ने सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये थे। जहां वह, उनके परिवार और उनके वंशज रहते हैं। यह बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है।
1857 के गदर हो जाने पर महाराजा मानसिंह अंग्रेजों से मिल गए थे। उनके पास कोई सामान न था तो भी उन्होंने अपना धन और अपना प्राण अंग्रेजों को निछावर करके फैजाबाद के तीस अंग्रेजों मेमों और बच्चों समेत अपने शाहगंज के किले में सुरक्षित रक्खा था और विद्रोहियों का सामना करने के के लिये डटे रहे। फिर उनको अपने सिपाहियों की रक्षा में गोला गोपालपूर पहुंचा दिया। इसी अवसर में चार मेमें और आठ अंग्रेजी बच्चे घाघरे के मांझा में बिना अन्न-जल मारे-मारे फिरते थे। महाराजा साहब ने सवारियाँ भेज कर उन्हें बुला लिया और पन्द्रह दिन तक अपने घर में रक्खा और फिर उनके कहने पर सौ कहार और 36 पालकी कर के उनको प्रासबर्न साहब के पास बस्ती भेज दिया।
इसी समय बागियों ने शाहगंज की गढ़ी घेर ली और महाराजा साहब के लाखों रुपये के मकान खोद डाले और जला दिये गए और बहुत सा धन लूट ले गये। डेढ़ महीने के घेरे पर बड़ी वीरता से महाराजा साहब ने विद्रोहियों को मार भगाया । इसी अवसर पर राजा रघुवीर सिंह के घर का बहुत सा सामान जो अयोध्या में लाला ठाकुर प्रसाद के घर पर धनवावाँ से भेज दिया गया था विद्रोहो लूट ले गये।
राजा मान सिंह के बाद शाहगंज की गद्दी उनके बड़े भाई राजा रामअधीन सिंह के हाथ में आई।वह पक्के शिव भक्त थे , उनके शाप के कारण हमेशा वंशहीन होने की शापित हो गई है। जो भी मुख्य राजा होता है उसे पुत्र प्राप्ति नहीं होती है । आज शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह जी है उन्हें भी केवल पुत्री है पुत्र नहीं ।
शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई. में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। बाद मे ब्रज बिलास कुंवर ने राजा त्रिलोकी नाथ को दत्तक पुत्र बना राजा बनाया। मान सिंह की बेटी जगदम्बा देवी थी। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था। फिर कोर्ट में त्रिलोकी नाथ सिंह और लाल प्रताप नारायण सिंह के मध्य बहुत दिनों तक मामला चलता रहा। लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली वारिस हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया ।
अयोध्या स्थित राज सदन बाद में सत्ता के केंद्र में आया, परन्तु धर्म नगरी के कारण यहां सत्ता की चमक दमक शाहगंज और मेहदौना से ज्यादा रही। दिवंगत राज्य के प्रतिनिधि श्री विमलेंद्र मोहन मिश्र जी द्वारा राजा लिखे जाने पर शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप पाठक सिंह जी मुकदमा भी दायर किया हुआ है इसीलिए विमलेंद्र जी द्वारा कभी खुद को राजा नहीं लिखा गया वो हमेशा राजसदन के मुखिया के तौर पर जाने जाते थे।
महाराज दर्शन सिंह जी शाहगंज मेहदौना के प्रारंभिक राजा थे ।अयोध्या इन्ही के अंतर्गत आता था वर्तमान में शाहगंज हवेली जो कि 70 बीघे में दर्शन सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका सिंह जी और अन्य परिवारो का हाल ठीक नहीं है जबकि अयोध्या महल में रह रहे इनके वंशज ( इनकी बाद की वंशावली के पुत्रियों के पुत्र) विमलेंद्र मोहन मिश्रा जो की अयोध्या के मुखिया है वे लोग शान शौकत से रह रहे हैं।
शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं
अयोध्या जिले में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। क्षेत्र के आम जनमानस व दूरदराज से राजा की हवेली देखने आने वाले लोग कीचड़ में फिसल कर गिर जाते हैं जिससे उनको काफी चोटें भी आ जाती है, वाहन भी फस जाते हैं जिनको बाहर निकालने के लिए ट्रैक्टर की व्यवस्था करानी पड़ती है। शाहगंज के राजा लाल अंबिका प्रताप सिंह का कहना है कि कई बार उन्होंने मुख्य मार्ग को ठीक करवाने के लिए शासन प्रशासन से कहा, लेकिन हवेली को आने वाले मुख्य मार्ग को ठीक नहीं कराया जा सका है। जिससे मुझसे मिलने वाले व पास पड़ोस के जिलों से हवेली देखने आने वाले लोग इस कीचड़ युक्त गड्ढे में गिर कर चोट खा जाते हैं।
लोग इस हवेली को इस नाते देखने के लिए आते हैं कि धर्म नगरी अयोध्या से पुराना और गहरे रूप में जुड़ा है। अयोध्या के महाराजा ददुआ के वंशज आज भी शाहगंज हवेली में रह रहे हैं।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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