दीवानी न्यायालय से रुष्ट मेरे अपने खास की दाल जब नही गली तो उसने फौजदारी का फंदा फेंका। उसने मेरे नाम की तीन जमीन जिसे मैंने बेचा था , पर 419/420 का केस तैयार करवाया। न्यायालय के अधिकारियों को प्रभावित करके मेरे ऊपर तीन पुलिस केस दर्ज करवाया। मुझे जेल की सीखचों में डालने और मेरे मरने के लिए दाढ़ी मूँछ भी बढा लिया था। वह यह जानता था कि हत्या करने से मैं ही पकड़ा जाऊँगा, इसलिए पुलिस को पैसा देकर मुझे फँसाने का हथकंडा अपनाया गया। मेरा मुकदमा सी. जे. एम. के यहाँ दर्ज कराकर कोतवाली में पुलिस केस बनवाकर आग में घी डालने का काम किया गया। दरोगा को जब तफ्तीश मिली तो वह उन्हें प्रभावित करके मुझे पकड़वाने पर पूर्णतया तुल गया। पुलिस पैसे की यार कैसे होती है? इसे मैंने देखा और समझा। पुलिस के कुछ दलाल मेरे पीछे पड़ गये और कहने लगे , "प्रिन्सपल साहब आप पर बहुत कड़ा मुकदमा दर्ज हो गया है। बिना जमानत आप को जेल जाना पड़ेगा। आप पैसा खर्च करें नहीं तो बड़ी बेइज्जती होगी।" उस समय मेरे पास छठे वेतन की वृद्धि से एक लाख से ऊपर रुपया था । मैंने देखा कि पुलिस पीछे पड़ गयी है। दरोगा कह रहे हैं कि आप जेल नहीं जायेंगे , यदि पैसा खर्च करेंगे। दलालों ने रात दिन एक कर दिया और मुझसे 67 हजार रुपये चौकी इंचार्ज और कुछ अधिकारियों ने मिलकर हड़प लिया।
मेरे कुलीन कुल में जन्में हमारे खास ने मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति प्राप्त करने हेतु मुझ पर 11 मुकदमे कर चुका है । फिर भी वह अपने अनैतिक कार्य में असफल रहा। उसने छल कपट के साथ-साथ आतंक का भी सहारा लिया। वह प्रचार करने लगा कि यदि मुझे नगर बाजार बस्ती का मकान ना लिखा गया तो मैं गोली मार कर ले लूँगा। जब उसके सारे प्रयत्न कामयाब नहीं हुए तब उसने पुलिस और फौजदारी के मजिस्ट्रेट का दामन पकड़ा। उसने निर्णय लिया कि मुझे कारागार में भेजकर विवश कर देगा।
मेरे उस खास को केवल एक चीज सामने थी कि कब मुझे जेल भेज दें। इसके लिए उसने कुछ राजनीतिक लोगों का शरण लिया और रूपये पेसे खर्च करने का दृढ़ निश्चय किया। उसने अपनें बालों को बढ़ाया और दाढ़ी मूँछ को रखा लिया कि जब हमारा बाप जेल चला जायेगा तभी हम दाढ़ी मूँछ बनवायेंगे। उसने फर्जी ऐसे मुकदमे बनवाये जिसमे मुझे 419/420 का मुलजिम बनना पड़ा। प्रथम मुकदमे का कुछ लोगों ने पुलिस में बीच-बचाव करके मुझसे 67 हजार रुपये दिलवा दिये। मैं दरोगा के कहने पर निश्चिन्त भी हो गया था कि मुझे जेल नहीं जाना पड़ेगा। क्योंकि 419/420 का मुकदमा लोवर कोर्ट से जमानत नहीं होती है । इसको जिला एवम् सत्र न्यायाधीश जमानत दे सकते हैं। मैं नहीं समझता था कि मेरा खास मुझे जेल निश्चित रूप से भिजवाने के लिए पूर्ण रूप से प्रयत्नशील है।
उसके आतंक में करुणा नहीं आतंक का बोलबाला होता है। आतंकी परपीड़ा को देंखने का शौकीन होता है। यही स्थिति उसकी थी । उसने मेरे एक खेत का मामले में मुझे 419/420 का मुलजिम पुनःबनवा दिया । अपने सोर्स से उसने ए.सी.जे.एम. कोर्ट से मुकदमा दर्ज करने हेतु कोतवाली बस्ती को भेजवा दिया और प्रयत्न करने लगा कि शीघ्र मुझे जेल भेज दिया जाय। उसकी मदद करने के लिए उसको वहीं मनमाफिक दरोगा मिल गये जिन्होंने दलालों के माध्यम से मुझसे 27 हजार रुपया ले लिया था।
बस्ती न्यायालय में मेरा मुकदमा था मैंने अपने शुभ चिंतक अयोध्या के एक महंत जी से निवेदन किया कि वे हमारी जीप से बस्ती मेरे कार्य हेतु चलने का कष्ट करें। क्योंकि उनको जीप चलाने काअच्छा ज्ञान है। मैं जीप से जब बस्ती पहुँच गया तो वह अपनी जीप व सफारी गाड़ी से बस्ती पहुँचा और मुझे पकड़ने के लिए दरोगा से सम्पर्क किया। मेरे पीछे उसके आदमी पड़ गये। मैं जहाँ-जहाँ जाता वे मोबाइल से उसे सूचना देते रहते थे। अन्त में उसने उसी दरोगा को काफी पैसा देकर एक एम.एल.सी. से सोर्स लगाकर मेरे पीछे पड़ गया। मुझे कुछ भी मालूम नहीं था । हाँ! यह पता था कि मेरा अपना खास अपने दल-बल के साथ कचेहरी में घूम रहा है। मैं 05.03.2010 को अपराह्न 2:00 बजे अपनी जीप से महन्त जी के साथ जब अयोध्या के लिए चला तो उसकी जीप मेरे जीप का पीछा करने लगी थी। मैं निश्चिन्त था और महन्त जी से कुछ अध्यात्म की चर्चा कर रहा था । मेरी जीप जिस पर मैं और महन्त जी बैठे थे वह हरैया के पास पहुँची । उसी समय मेरे खास की जीप, जिस पर एक दरोगा सवार थे, ने मेरी जीप को रोकते हुए बोले, तुम्हारी जीप से कई लोग कुचल उठे हैं। सीधे इसे घटना स्थल पर ले चलो। मैंने कहा कोई ऐसी दुघर्टना इस जीप से नहीं हुई है । उसनें कहा कुछ नहीं। आप तुरन्त इसे वापस ले चलें। मैं मजबूर हो गया और जीप को लेकर वापस महाराजगंज पुलिस चौकी पर जब आया तो दरोगा जो मुझसे 27 हजार रुपये ले लिये थे, वे पहुँच गये थे ।
वे बोले, "प्रिन्सपल महोदय आपने मुझे खूब छकाया। तुम्हारे ऊपर 419/ 420 का वारण्ट है और तुम बस्ती में घूम रहे हो। चलो बस्ती चलना है।" मेरे साथ के महन्त जी अवाक् हो गये । वह कुछ बात करने के लिए आतुर थे कि दरोगा ने मुझे मेरे खास की जीप में बैठने का आदेश दिया और कड़ा रुख अपनाया। मैं अपनी जीप से उतरकर महन्त जी से कहा कि मैं बस्ती जा रहा हूँ। आप जीप लेकर अयोध्या जाकर बता दें। मेरा खास बस्ती में दरोगा से फोन पर फोन कर रहा था कि मैंने एम.एल.सी. के सोर्स से एस.पी. साहब से कहवा दिया है कि शीघ्र बन्द करके जेल भेज दो। कुछ नम्र रुख अपनाते हुए दरोगा ने कहा कि अब हर कीमत पर तुम्हें जेल जाना है।
मैं अपने जीवन में कभी किसी फौजदारी के मुकदमे का मुलजिम नहीं था। सारा जीवन शान्तिमय था। मुझे कारागार शब्द पढ़ने को जरूर मिला था लेकिन मैने देखा नहीं था। आज मैं हार्ट का मरीज हूं। शरीर थरथर कांप रहा है। 70 वर्ष का बूढा हूँ। पेट के अल्सर का मरीज हूँ, शुगर मेरा बहुत ज्यादा है। रोज 100 रु. तक की दवा खा रहा हूँ। इस जर्जर अवस्था में जेल जाकर कैसे रहूँगा। मेरे जीवन के इस दुःखद क्षण में भगवान भी मेरे प्रति करुणा हीन हो गया है। यही सब मैं सोच रहा था। परमात्मा के प्रति जो गहरी निष्ठा थी, वह चूर- चूर हो रही थी। आस्थावादी होते हुए भी मैं अपने भाग्य को कोसने लगा और इस स्थिति में अपने को भूल सा गया।
दरोगा पुलिस चौकी पर ले जाकर बैठाया और बोला कि बूढ़े हो नहीं तो जमीन पर बैठाता बेंच पर बैठो। अभी मुझे वारंट तैयार करके तुम्हें जेल भेजना है। मेरे पास, वहाँ कोई नहीं था मैं अनाथ था। दरोगा जेल भेजने की तैयारी में लगा था क्योंकि वह मेरे खास से पूर्णतया प्रभावित था। उसकी जीप मेरे स्वागत में खड़ी थी, दरोगा का सम्पर्क उससे बना हुआ था। सायं होने वाली थी। चिड़िया अपने घोसलों में चहचहाती जा रही थी। पथिक अपने घरों की ओर थे। मैं पुलिस के चंगुल में था। मुझको जेल भिजवाने का संकल्पी मेरा खास अपने कुकृत्य से आह्लादित था। सायं सात बजे मेरा वारंट बना । मैं दरोगा द्वारा दबोचकर जेल के फाटक तक पहुँचा दिया गया और दरोगा एक पुलिस के सहयोग से जेल के सिपाहियों से यह कहकर चला गया देखियेगा।
जिस तरह से राजा उग्रसेन, जो कंस के पिता थे ,को कंस ने निर्दयता के साथ जेल में डाल दिया था। उस स्थिति में मेरे खास ने दरोगा के सहयोग से मुझे जेल में डाल दिया। 5 मार्च 2010 का सायं काल का समय था। जब मैं जीवन में प्रथम बार जेल के विशाल उदर में घुसाया गया। मेरे जेल के प्रथम कक्ष में पहुंचते ही जेल के सिपाहियों ने घेर लिया। मेरी तलाशी अंगप्रत्यंग की लेने लगे। यहाँ तक अण्डकोश तक को नहीं छोड़ा। कहने लगे कि बहुत से लोग चूतड़ के पास रुपये छिपाकर से आते हैं। वे तरह-तरह से प्रताड़ित करके वहीं ले गये। जहाँ वो गन्दे काले कम्बल और एक लोहे का कटोरा मिलता है। मेरे पास कुछ सामान नहीं था। एक बीस रुपये की नोट भी उसे एक सिपाही ने निकाल लिया। मैं कारागार के कई द्वारों को पार कर 5 नम्बर की बैरक में ले जाया गया।
सायं हो चुकी थी जिस बैरक में मुझे ले जाया गया। उसमें 125 से अधिक कैदी थे। रात्रि में जब मैं बैरक में पहुंचा तो नीचे जमीन पर लोगों का विस्तरा लगा था। मुझे भी किसी तरह से जमीन पर कम्बल बिछाने को मिला तभी संयोंग से चार-पाँच लोग जो उसी बैरक में थे ने मुझे देखा। वे मेरे पास आये बोले, साहब आप कैसे यहाँ आ गये। मैंने कहा बाबू विधि का विधान विचित्र होता ? हमारे खास ने फर्जी मुकदमा बनाकर मुझे 419/420 में जेल में भिजवा दिया है । सब लोग उसे धिक्कारते हुए संवेदना प्रकट करने लगे। ओमप्रकाश जी एक शिक्षक भी वहां थे वे बोले ,यह तो बड़ा विचित्र हुआ मैंने भूषण की कविता पढ़ी है-
सबन के ऊपर ठाढ़ रहिबे के योग
ताहिं खड़ा कियो छ हजारन के नियरे।
आपने कई विषयों से एम.ए. किया है। पी-एच.डी. हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हैं। 42 वर्ष तक प्रधानाचार्य रहे हैं। यह कैसे आप का समय बदल गया। आप 420 हैं? यह किस अधिकारी और दरोगा ने लिखकर आपको जेल भेज दिया। आप घबराये नहीं । यह आपके धैर्य की परीक्षा हो रही है। हाँ ! यहाँ पर राक्षसों जैसा कैदियों का व्यवहार होता है । यहाँ का भोजन पशु आहार सा होता है। यहाँ मुर्दे से भी कफन लिया जाता है। आपका मामला पेंचीदा है। आपकी जमानत होने में कई महीने भी लग सकते हैं। आपको हम लोग अधिक से अधिक प्रसन्न रखने का प्रयास करेंगे। सम्पत्ति हड़पने के लिए आप का अपना खास इतना बड़ा दुष्कर्म कर रहा है।
संसार बड़ा विचित्र है। आपको समझाना क्या? समय बड़ा बलवान होता है। मैंने देखा था कि आपके दफ्तर में बड़े-बड़े लोग आया जाया करते थे। एक हजार के ऊपर छात्र और 50 से ऊपर कर्मचारियों के आप संरक्षक थे। आज आप इस जेल में कैदी हैं। मुझे अपार दुख है।
सायंकाल जो लोग जेल जाते हैं उनको भोजन आदि नहीं मिलता है क्योंकि जेल के कैदी शाम 06 बजे तक खाकर अपने बैरिकों में बन्द हो जाते हैं। इन कैदियों की देखरेख जेल की पुलिस करती है और इसी में पुराने कैदियों को सरदार बन दिया जाता है ,जो सदैव गालियों से ही बोलते हैं। यहाँ बैरिकों में सदैव ये कैदी सरदार लोगों से कठोर काम लेते हैं। यहाँ तक पाखाने की नाली तक साफ कराते हैं। कारागार में जो कार्य करना नहीं चाहते वहाँ बैठकी देनी पड़ती है। यह बैठकी छह से सात सौ रुपए तक की है। मैंने भी बैठकी देने का वचन दिया। उस समय मेरे पास एक रुपया भी नहीं था। मैं विकल था। शनिवार के दिन मिलाई नहीं होती है। मैं शुक्रवार को सायं जेल गया। लोगों ने कहा कल रविवार को मिलाई होगी, आप किसी से कुछ हजार रुपये मंगा कर दे दें। नहीं तो , ये सिपाही परेशान करेंगे। मैंने कहा ठीक है , कल की स्थिति देखकर बताऊँगा। वे बोले, रुपया देकर बैठकी करा लें नहीं तो काम करना पड़ेगा। इन कैदियों के मुँह पर हमेशा गाली सवार रहती है।
जेल में सर्वत्र गाली-गलौझ देखने को मिलती है। यह मानव की अज्ञानता और असभ्यता का प्रतीक है। देश आजाद हुए 60 वर्ष हो गया। लेकिन इस समय जेल की स्थिति नारकीय स्थिति के समकक्ष है। मैं दूसरे दिन जेल के विस्तृत परिसर को देख रहा था। दस से पन्द्रह फुट ऊँची बाउण्ड्री दीवाल कारागार की कवच है। कैदियों को पशुवत बैरिकों में रखा जाता है। जहाँ उसकी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। यदि कोई बैरक के सरदार की बात नहीं मानता है तो पाँच-छः कैदी मिलकर वहीं बेरहमी से उसकी पिटाई करते हैं। सर्वत्र आतंक व उत्पीड़न का स्वर निनादित होता है। सौ से अधिक कैदियों पर एक शौचालय, ऊँट के मुँह में जीरा का कार्य करता है। रात्रि में सभी कैदी पशुओं के समान बैरिकों में बन्द कर दिये जाते हैं।
कारागार का एक दिन बीत रहा था । दिन में एक दर्जन और अधिक लोग मेरे परिचित निकले। सभी लोग मेरी मदद करते रहे। दूसरे दिन 10 बजे श्री कृष्ण चन्द्र सिंह पूर्व ब्लाक प्रमुख बस्ती ने जेलर के पास बैठकर मुझे बैरक से बुलवाया। मैं जेलर साहब के पास गया । वहाँ मेरा अच्छा सम्मान हुआ। उसे देखकर जेल पुलिस के लोग विशेष प्रभावित हुए। जेल के अन्दर मिलने वाले भी आये। इन मिलने वालों से मुझे आत्मबल मिला। मैं जेल में था । मेरा स्वास्थ्य खराब था। हार्ट का पेसेन्ट था। जेल में लोगों ने कहा कि जो लोग विशेष क्रिमिनल हैं । उन्हें पूर्ण सुविधा मिलती है। शेष का शोषण किया जाता है।
मैं जेल में था जो कभी सोचा नहीं था कि मेरा खास मेरी सम्पत्ति लेने के लिए इसे अपना अन्तिम प्रयास समझता था। वह यह जानता था कि यह जेल की यातना से घबरा जायेंगे और चिल्लाकर अपनी सम्पत्ति मुझे दे देंगे। जेल में लोग मुझसे यही कहते थे कि जो जेल एक बार आ जाता है उसे तीन बार जेल में आना पड़ता है। इसलिए जो जेल में आ गये हैं उन्हें इस उक्ति का ध्यान रखना चाहिए- "जेल में आओ, पेल के खाओ।" जेल से डरना नहीं चाहिए। यहाँ विधि के विधान यही है। अच्छे और बुरे दोनों लोग यहां आते हैं। लेकिन सबके लिए एक ही बैरिक है। जो मानवता की छाया ग्राहिणी है। यहाँ सर्वत्र घृणा और ईर्ष्या का बोलबाला है। मनुष्यता नहीं है। विद्रोही जेल के कैदियों का सुधार किया जाना चाहिए। इससे देश का कल्याण सुनिश्चित होगा।
कारागार में सर्वत्र चौकसी और धन वसूली का कार्य चरम सीमा पर रहा है। कैदियों की चार बार गिनती होती है। जहाँ कुछ कैदी गाली से लेकर मार भी खाते हैं। सर्वत्र शोषण और उत्पीड़न शक्तिशाली है। जो कैदी सप्ताह में दो बार से अधिक अपने परिजनों से मिलता है । उसे 20 रु. रोज शुल्क देना पड़ता है। रोज जो कैदी मिलने के लिए जाता है जब वह लौटता है तो उसकी तलाशी लेते समय बीस से 30 रुपये कैदी से वसूल किया जाता है। ऐसा कार्य दो से तीन स्थानों पर होता है जो कैदी रोज मिलता है उसे 10 से लेकर 30 रु. प्रतिदिन देना पड़ता है। इस शोषण और उत्पीड़न यज्ञ से मैं अलग नहीं रहा। प्रतिदिन मिलने वाले से पैसा माँगकर मैं बाँटता था और अपनी बैठकी का समय काटता था। जेल को सुधार गृह की संज्ञा दी जानी चाहिए । इसलिए कैदियों को सुविधा देकर उन्हें अच्छा बनाने का प्रयास किया जाय। सामान्य कोटि के कैदियों को अपराधिक प्रवृत्ति के कैदियों से दूर रखा जाय। ऐसे कैदी जो किसी कारण से जेल तक पहुँचा दिये गये हैं । उनकी सुनवाई के लिए एक जेल मजिस्ट्रेट की व्यवस्था की जानी चाहिए। सामान्य मामले में फँसे कैदियों की व्यावहारिक समीक्षा करके उन्हें जेल से शीघ्र जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
जब मैं जेल चला गया तो मेरे खास ने उसी दिन अपने बालों और मूँछ को मुण्डा कराया। यह मुण्डन रात्रि 10 बजे बस्ती में हुआ। नाई को 100 रु. दिया गया। और यह प्रचार किया गया कि हमारे पिता का देहान्त हो गया। मेरा खास कल बल छल से उत्पीड़न करता रहा। वह प्रयास में था कि मेरी जमानत न हो और मैं जेल में महीनों रहूँ। मेरे सहयोगी बाहर निकालने के प्रयास में लगे हुए थे।
दिनांक 12.03.2010 को रात्रि के समय मैं सोया हुआ था। सबेरा हो रहा था जेल के वृक्षों की सघनता मनोहारी थी। फागुन के महीने में पवन सुहावना हो जाता है। जेल के क्यारियों में पुष्प लगाये गये थे। आम्रवृक्षों पर कोयल और पपीहे बोल रहे थे। प्रातः का सुहाना समय बैरकों में सोये कैदियों की स्मृतियों को सजग कर देता है। उसी बीच एक नवयुवक कैदी अकस्मात् रोने लगा। पूछने पर मालूम हुआ कि वह स्वप्न देख रहा था कि उसकी पत्नी कह रही थी कि मुझे अकेली छोड़कर तुम वहाँ चले गये। विधाता बड़ा निठुर है । जो मेरे रंग में भंग कर दिया। कुछ नवजवान अपने घरों की याद करने लगे और पछताने लगे। यहाँ यदि उन्हें व्यावहारिक रूप से देखा जाता तो उनमें सुधार की भावना जाग्रत हो जाती।
मानव एक चिन्तनशील प्राणी है उसमें सुधार लाकर उसे मनुष्य बनाया जाना चाहिए। लेकिन ये जेल मानव से पशुवत व्यवहार करके उसे जघन्य अपराधी बना देती हैं।
बस्ती का कारागार पुराना कारागार है। इसी कारागार में मुझे मिलते जुलते समय गिनते ग्यारह दिन बीत गये। मेरी जमानत ग्यारहवें दिन हो गयी। मेरे खास ने लोक लाज से बचने के लिए चिल्लाने लगा, मैंने जमानत करवाया है। अपराधी भी अपने कुकृत्यों पर प्रश्चाताप करता है, किन्तु वह अपने अपराध को स्वीकार करके उसके प्रति निषेधात्मक रूप बना ले तो उसमें अच्छे संस्कारों का उदय हो सकता है। बार-बार अपराध करने वाला जघन्य अपराधी बन जाता है। इस कंसावतार में मेरा खास अपने अपराधों की चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने मुकदमों की संख्या बढ़ा दिया और गलत ढंग से मेरे सरस साहित्य कुटीर नगर बाजार बस्ती पर अपना कब्जा कर लिया। उसके आतंक से क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति सहयोग देने से कतराता है।
मैं दिनांक 15.03.2010 को 11.00 बजे रात्रि बस्ती कारागार का अतिथि रहकर वापस अयोध्या आया। जो 11 मुकदमे मेरे ऊपर मेरे खास के चल रहे हैं। सब निराधार हैं किन्तु परेशानी के हेतु हैं। वह नाजायज पैसे से अधिकारियों को खरीदने में सक्षम है क्योंकि आज का अधिकारी मुकदमों को टालता है। फैसले के लिए कुछ लेन देन का तराजू रखता है, जो तौल में उतर जाता है उसका कल्याण हो जाता है।
(सन्दर्भ: “वंशावली में कनखजूरों का आतंक” मूल लेखक और प्रकाशक डॉ. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' , प्रकाशन वर्ष 2011, पृष्ठ 113 से 119 )
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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