सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर हो गया था । महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह/प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब ' भी शासक रहे। महाराजा मान सिंह दो-दो शादी करने के बावजूद एक कन्या के पिता बन सके थे। जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा था। जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रताप नारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ था। ददुआ साहब महाराज मानसिंह के वौहित्र थे। जिन्हें महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले रखा था। ददुवा साहब नाबालिक थे। अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता था और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही।
लाल प्रताप नारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये।
इमारतें व सार्वजिक कार्यों का शौक
महाराजा प्रतापनारायण सिंह, मानसिंह के बाद सिंहासन पर बैठे। उनका शासन लगभग बीस वर्षों तक चला। महाराजा जी का समय विद्याव्यसन में बीतता था। उनके राज्य में फैजाबाद, गोण्डा, नवाब गंज, बाराबंकी, लखनऊ और सुल्तान पुर के 609 गांव,124 पट्टियां थीं।
दिसंबर 1895 में उन्होंने प्रताब - ए - धर्म उद्देश्य के लिए उत्तर भारत के अनेक क्षेत्र गांव घर में पर्याप्त मात्रा में अचल संपत्तियां का दान किया। इस दान का मूल उद्देश्य अयोध्या फैजाबाद वाराणसी वृन्दावन हरिद्वार इलाहाबाद और लखनऊ में स्थित मंदिर घाट धर्मशालाओं और भवनों के मरम्मत पूजा पाठ भोग तथा खर्चे को जुटाने के लिए किया गया।उन्हें इमारत बनवाने का बड़ा शौक़ था। उन्होंने अयोध्या में कई ऐतिहासिक इमारतें और सार्वजनिक कार्य करवाए। उन्होंने अयोध्या के प्राचीन शहर के नए पैलेस तथा बंगलों प्रवेशद्वारों और मंदिरों के निर्माण के लिए और कुछ भवनों के मरम्मत और पुनरुद्धार के लिए भी कार्य योजना बना रखा था।
अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों के गौरव, वीरता और धर्म परायणता का स्मरण करते रहते हैं। सिंहासन की आभा, हवेलियों की भव्यता, मंदिरों की दिव्यता और तालाबों की शांति- सभी कुछ उनके इतिहास की जीवित यादें कभी भी देखी जा सकती हैं। अयोध्या के लोग आज भी अपने पूर्वजों की वीरता, धर्मपरायणता और प्रशासनिक कुशलता का स्मरण करते हैं।
राज्य में स्थिरता के साथ-साथ समाज में शिक्षा, धर्म और कला का विकास भी हुआ। महाराजा प्रतापनारायण सिंह ने विद्वानों और ब्राह्मणों का संरक्षण किया। युवा राजकुमारों और राजकुमारियों को नीति, युद्ध और धर्म की शिक्षा दी गई।
महाराजा जी की प्रमुख उपाधियां
लाल प्रताप नारायण सिंह ने 1880 में महादौना का राज अयोध्या में मिला दिया था। ब्रिटिश सरकार ने प्रताप नारायण सिंह को 1887 में महाराजा की उपाधि से सम्मानित किया।1890 में, "महदोना राज"' का नाम बदलकर “अयोध्या राज” कर दिया गया। 1895 में, उन्हें नाइट कमांडर्स स्टार्स ऑफ़ इंडिया (KCSI) की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाद में 1896 में "महामहोपाध्याय" की उपाधि दी गई। वे दो साल के लिए उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे। उन्हें "अयोध्या-नरेश" की उपाधि भी मिली हुई थी। उन्हें "ददुआ महाराज" के नाम से भी जाना जाता था। महाराजा साहब की साहित्यिक रुचि भी थी। वे “वीरेश” उप नाम से साहित्य की सर्जना करते थे। उनका रचा हुआ “रस कुसुमाकर” ग्रन्थ उनके साहित्यिक प्रतिभा का सजीव प्रारूप है।
राज सदन का स्थापत्य कला
अयोध्या का राजसदन और उसके भीतर कोठी मुक्ताभास उनकी सुरुचि और कारीगरी का अच्छा नमूना कहा जा सकता है।महाराजा लाल प्रताप नारायण सिंह ने अयोध्या में राजसदन का निर्माण कराया था। जो अयोध्या की स्थापत्यकला की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का एक अद्भुत प्रमाण है। अयोध्या के मध्य में, पूजनीय हनुमानगढ़ी मंदिर के निकट स्थित यह महल न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि भक्ति और कलात्मकता का सार समेटे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भी है। अपनी सुंदरता के बावजूद, राज सदन रखरखाव संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है, जो इसके समग्र आकर्षण को कम कर देती हैं। वास्तुकला आश्चर्यजनक है, लेकिन उखड़ा हुआ पेंट और इसके इतिहास के बारे में जानकारी देने वाले बोर्डों की कमी इसे और भी आकर्षक बनाती है। फिर भी, यहाँ का वातावरण आध्यात्मिकता और विरासत की भावना से ओतप्रोत है, जो हिंदू धर्म की गहरी परंपराओं को जानने में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है।
राज सदन की रणनीतिक स्थिति इसे पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण बनाती है, जो लोकप्रिय वेब सीरीज़ की शूटिंग के लिए एक पृष्ठभूमि के रूप में और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करता है। राज सदन घूमने के लिए भी आमंत्रित करता है, जो ऐतिहासिक रहस्य और स्थापत्य कला की भव्यता का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है, जिससे यह अतीत से जुड़कर वर्तमान का आनंद लेने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए एक उल्लेखनीय गंतव्य बन जाता है। यह भव्य महल, जो मूल रूप से एक जर्जर इमारत थी, 'प्रकाश झा प्रोडक्शंस' की रचनात्मक दृष्टि से पुनर्जीवित हुआ है। इसे फिर से जीवंत करने में लगभग पाँच महीने लगे। प्राचीन महाराजा काल को प्रतिबिंबित करने वाली जटिल पारंपरिक वास्तुकला आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देती है और इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती है।लछिराम राजा प्रताप नारायण सिंह के राज कवि
महाराजा मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' 'दादुवा साहब' अयोध्या नरेश कवि के आश्रय दाता बने। एक बार राजा साहब ने ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा उन्होनें निम्नलिखित छन्द सुनाया-
“वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं।
मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं।
कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं। महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह,
कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।”
अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा इन्होनें ' प्रताप रत्नाकर' नामक ग्रन्थ की रचना किया। -(सन्दर्भ: डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस’ “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 43)
लछिराम कृत:प्रताप रत्नाकर
मानसिंह जी के जमाने से ही राजकवि के रूप में महदौना राज दरबार के प्रतिष्ठित लछिराम ने प्रताप रत्नाकर अयोध्या नरेश राजा प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' के प्रति लिखा गया ग्रन्थ है। इसके प्रथम तरंग में मंगलाचरण के अन्तर्गत गणेश, राम, राधा और कृष्ण की वन्दनायें हैं। दूसरे तरंग में राजवंश का वर्णन है। तीसरे तरंग में राधा रमण की परम् अनूप लीला का वर्णन प्रथम भाग के रूप में हैं। चौथे तरंग में द्वितीय याम, पाचवें तरंग में तृतीय याम, छठे तरंग में चतुर्थ याम, सातवें तरंग में पंचम याम, आठवें तरंग में षष्ठ याम, नवें तरंग में सप्तम् याम, दसवें तरंग में अष्टम् याम का वर्णन है। सम्पूर्ण ग्रंथ में श्रृंगाररस की प्रधानता है। राधा कृष्ण के श्रृंगारिक रूपों के परिप्रेक्ष्य में रचना अत्यन्त सरस हो उठी है। राधा के कुचाग्र, विपरित रति, सुरति, नितम्ब, त्रिवली आदि के वर्णन में अश्लीलत्य की प्रधानता दर्शनीय है। -(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत : “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1,पृष्ठ 44)
प्रतापनारायण 'वीरेश' : 'रसकुसुमाकर'
प्रताप नारायण सिंह 'वीरेश' का यह ग्रंथ संवत 1849 ई. में पूर्ण हुआ और संवत 1951/सन 1894 ई. में प्रयाग राज के 'इण्डियन प्रेस' से मुद्रित हुआ था। इसमें रस के अंगों की सुंदर विवेचना और उदाहरण मिलते हैं। यह 515 छन्दों का ग्रंथ है। यह उत्कृष्ट रीति का ग्रंथ माना जाता है। लक्षण ग्रंथों की परम्परा में इसका महत्त्व इसलिए भी स्वीकार किया जाता है कि जहाँ पूर्ववर्त्ती अन्य लक्षण ग्रंथों में विषय का प्रतिपादन पंचशैली में हुआ है, वहीं इसमें गद्य के माध्यम से लक्षणों का रोचक एवं सरस निरूपण हुआ है।
ग्रन्थ में पंद्रह कुसुम /अध्याय
‘रसकुसुमाकर’ में पंद्रह कुसुम हैं। प्रथम में ग्रंथ परिचय, उद्देश्य, और द्वितीय में स्थायी भावों के लक्षण और उदाहरण दिये गए हैं। तृतीय में संचारी भावों, चतुर्थ में अनुभाव और पंचम में हावों का वर्णन किया गया है। छठे कुसुम में सखा-सखी, दूती आदि तथा सातवें-आठवें विभाग के अंतर्गत ऋतु और उद्दीपन सामग्री का वर्णन है। नवें, दसवें, ग्यारहवें कुसुमों में स्वकीया, परकीया और सामान्या तथा दसविध नायिकाओं का वर्णन है। ग्यारहवें कुसुम में नायक भेद का विस्तार से निरूपण किया गया है। तेरहवें और चौदहवें कुसुमों में श्रृंगार के भेदों और वियोग दशाओं का चित्रण हुआ है। पंद्रहवाँ रस कुसुम है, जिसमें श्रृंगार को छोड़कर अन्य रसों का विवरण है। अन्त में काव्य प्रशंसा के साथ ग्रंथ की समाप्ति हुई है। इस ग्रंथ में यथा स्थलों पर भावों के अनुरूप कुछ विशिष्ट चित्र भी दिए गये हैं। इन चित्रों से ग्रंथ की महत्ता निश्चय ही बढ़ गई है।
चौधरी बंधुओं की सत्प्रेरणा और साहचर्य से अयोध्या नरेश ने इस युग के प्रसिद्ध छंदशास्त्र और रसग्रंथ 'रसकुसुमाकर' की रचना की थी। इसकी व्याख्या शैली, संकलन, भाव, भाषा, चित्र चित्रण में आज तक इस बेजोड़ ग्रंथ को चुनौती देने में कोई रचना समर्थ नहीं हो सकी है; यद्यपि यह ग्रंथ निजी व्यय पर निजी प्रसारण के लिए मुद्रित हुआ था।
‘रसकुसुमाकर’ में लक्षण गद्य में दिये गए हैं और विषयों का सुंदर तथा व्यवस्थित विवेचन उपस्थित किया गया है। इस ग्रंथ में आये उदाहरण बड़े सुंदर हैं। उदाहरण के रूप में देव, पद्माकर, बेनी, द्विजदेव, लीलाधर, कमलापति, संभु आदि कवियों के सुंदर छन्द दिये गए हैं। उदाहरणों के चुनाव में ददुआ जी (महाराजा साहब) की सहृदयता और रसिकता प्रकट होती है। इस ग्रंथ के अंतर्गत अनेक भावों,संचारियों और अनुभावों के चित्र भी दिये गए हैं, जो बड़े सुंदर और अर्थ के द्योतक हैं।श्रृंगाररस का विवेचन विशेष रोचकता और पूर्णता के साथ हुआ है।
महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के॰ सी॰ आई॰ ई॰ के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के "रू" से राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहेब के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा हैं।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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