Tuesday, February 3, 2026

अयोध्या के महाराजा दर्शन सिंह के लोककल्याणकारी कार्य ✍️आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

1798 ई.मे हुआ था अयोध्या के शाक वंशीय राजवंश का उदय :- 

अवध के नवाब सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। जब राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल किए तब दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बना लिया।

महादौना (शाहगंज ) और अयोध्या (राजसदन ) से संचालित किया प्रशासन

मातृ भूमि पलिया के पास शाहगंज में बनवाई गई हवेली प्रारम्भ में राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। राजा दर्शनसिंह और उनके वंशजों ने शाहगंज में 70 एकड़ में सुदृढ़ विशाल कोट, बाजार और महल बनवाये थे।

    यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। 

              राज सदन अयोध्या 

     बाद में 1842 ई में जनता की सुविधा देखते हुए अयोध्या धाम के मध्य तत्कालीन लालबाग में कचहरी और महल बनवाया जो राज सदन के रूप में लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्मनगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा  दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 ई. में और बख्तावर सिंह का भी इंतकाल 1846 ई.में हो गया था और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी। वर्तमान समय में अयोध्या राजघराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

सुल्तानपुर और बहराइच के राजा बने :

राजा दर्शन सिंह का समय लगभग 1800- 1844 के  मध्य था। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें "बहादुर " के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए  और राजा की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 ई. में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था। उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

प्रमुख शासकीय कार्य :- 

राजा दर्शन सिंह के समय शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया। उनको बादशाही से "सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर " की उपाधि मिली थी। राजा दर्शनसिंह 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । अवध के पांचवें नवाब बादशाह अमजद अली शाह के शासन काल 1842-1847 जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे तो सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था। 1842 ई में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। उन्होंने बलरामपुर की गढ़ियों पर तरकीब व चालाकी से कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए थे।

        रामपुरवा शाहगंज शिवालय

धार्मिक-लोककल्याणकारी कार्य:- 

अयोध्या की गलियाँ और मंदिर हमेशा राजा और प्रजा की साझा आस्था का केंद्र रही हैं। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे धर्म और संस्कृति के संरक्षक भी थे। वे अपने समय में हवेलियों, कुओं, सरायों और सार्वजनिक बागानों,नदी के घाटों ,सरोवरों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का  निर्माण और जीर्णोद्धार करवाये थे । यह उनकी धार्मिक दृष्टि और समाज सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण था। लोग आज भी इन स्थलों की ओर देखते हुए अपने पूर्वजों की भक्ति, शौर्य और दूरदर्शिता को याद करते हैं। उनके द्वारा निर्मित कुछ प्रमुख लोक कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख किया जा रहा है।

        दर्शनेश्वर नाथ महादेव राज सदन।              अयोध्या का शिवाला:- 

धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल (राजसदन) और लालबाग आज भी है। बाग के दक्षिण भाग में राजा दर्शनसिंह ने एक सुन्दर शिवालय बनवाया था। इसीलिये दर्शनेश्वर का मन्दिर कहलाता है। 

यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि समाज और धर्म का प्रतीक भी है। उन्होंने अयोध्या स्थित अपने महल राजसदन के शिवाला में  शिवलिंग स्थापित करवाई थी। शिवजी की इस प्रतिमा के स्थापित करने का कारण यह रहा कि राजकार्य के वजह से राजा को प्रत्येक दिन बाहर जाना संभव नही हो पाता था अतः शिव आराधना के लिए उन्होंने महल के प्रांगण में शिवालय की पूरे विधि विधान से स्थापना करवाई थी। इस शिवाला को आज लोग ‘श्री दर्श्नेश्वर नाथ महादेव’ के नाम से पूरे अवध में जानते हैं।

      यह मंदिर केवल भगवान शिव का निवास स्थान नहीं है, बल्कि शहर के लोगों के लिए आश्रय और भक्ति का केन्द्र भी बन गया है ।अवध गजेटियर के अनुसार "अवध भर में इससे बढकर सुंदर शिवालय नही है।" यह मंदिर बढ़िया चुनार के पत्थर का बना हुआ है और बहुत सी नक्काशी का काम मिर्जापुर से बनकर यहाँ आया था। यहाँ का शिवलिंग नर्मदा नदी के पत्थर का बना हुआ है। इसका दाम उस समय 250 रुपया था। मंदिर में स्थापित संगमरमर की मूर्तियां जयपुर से लायी गयी थी। पहिले यह विचार था कि नेपाल से घंटा मंगवाकर यहाँ लटकाया जाय। परन्तु घंटा रास्ते में ही में टूट गया था। तब उसी नमूने का घंटा अयोध्या में बनवाया गया। वह भी स्थानीय कारीगर द्वारा बनाया हुआ अच्छा नमूना है। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि को बखानते हैं।यह शिवालय अत्यंत ही सिद्ध मन से पूजा जाता है यहाँ पर शिव पंचाक्षर मंत्र और शिव पंचाक्षर स्तोत्र के पाठ से बहुत लाभ होता है।

सरयू नदी का घाट और नागेश्वरनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :- 

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का पक्का निर्माण कराया था।

    उन्होंने नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

दर्शन नगर बाजार को बसाया:- 

दर्शन नगर अयोध्या ज़िले का एक कस्बा  अयोध्या से 5 किमी दक्षिण में और फैज़ाबाद से 4 किमी दूरी पर स्थित है। इसे अयोध्या के शाक द्वीपीय राजा दर्शन सिंह ने एक बाजार के रूप में बसाया था। उन्हीं के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा है। इसे राजा ने केवल व्यापारिक केंद्र के रूप में नहीं बनाया, बल्कि यह सामाजिक जीवन का हृदय भी बन गया है। बाजार में व्यापारियों के लिए शुद्ध और सुरक्षित स्थान, बच्चों के खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खुले मैदान और बुजुर्गों के बैठने के लिए छायादार जगहें बनाई गईं थीं। यह कार्य केवल शानो-शौकत दिखाने के लिए नहीं अपितु उनका उद्देश्य समाज और धर्म के कल्याण को बढ़ावा देना था।

चार प्रवेश द्वार वाले प्राचीर का निर्माण:- 

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। अयोध्या से अंबेडकरनगर जाने वाले वाहन इसी गेट से होकर गुजरते थे। वाहन की संख्या बढ़ने से प्रवेश द्वार संकरा हो गया था। इस गेट के चलते अक्सर यहां जाम लगा रहता था, जिससे यातायात बाधित होता था। चारों दिशाओं में बने गेट में से पश्चिमी गेट को पूर्व जिलाधिकारी किंजल सिंह ने यातायात की परेशानी को देखते हुए गिरवा दिया था।  पूर्वी गेट जर्जर अवस्था में ही रह गया था जिसे भी बाद में गिरवा दिया गया। अब राजा दर्शन सिंह द्वारा निर्मित एक भी द्वार नहीं बचा है।

     अयोध्या विकास प्राधिकरण द्वारा वर्तमान समय में इस नगर के लिए 4 नए प्रवेश द्वार, बाउंड्री वाल का निमार्ण,तीर्थ यात्रियों के लिए अनेक सुविधाएँ, कैटीन का निर्माण,सूर्य कुण्ड का सौन्दर्यीकरण, पार्क का निमार्ण, लाइट एण्ड साउण्ड शो का संचालन और बच्चो के खेलने की व्यवस्था की गई है।

      दर्शन नगर, अयोध्या में लगभग ₹21.9 करोड़ की लागत से रेलवे स्टेशन का विकास किया जा रहा है, जिसे राम मंदिर के मॉडल की तर्ज पर आधुनिक सुविधाओं के साथ भव्य रूप दिया जाएगा। 

      उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम द्वारा 104 करोड़ की लागत से 614 मीटर बना लम्बा ब्रिज बनकर चालू हो गया है। इससे पूर्वांचल के कई जिले के लोगों को इसका फायदा हो रहा है। शिवनगरी काशी से रामनगरी अयोध्या आने वाले पर्यटकों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है।

सूर्य /घोषार्क कुंड की कहानी :- 

पौराणिक कथाओं के अनुसार , सूर्यकुंड का निर्माण भगवान राम के भाई लक्ष्मण ने सीता को उनके वनवास के दौरान ठंडे पानी का स्रोत प्रदान करने के लिए किया था । सूर्यकुंड के चमचमाते जल में चमत्कारी उपचार गुण माने जाते हैं, जिसके कारण यह आध्यात्मिक शांति की तलाश करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक पवित्र स्थान बन गया है।

    इस कुंड के प्रसिद्ध होने और घोषार्क कुंड कहलाने की घटनाएँ काफी रोचक हैं। अयोध्या में भगवान राम के प्रकट होने के बाद, सूर्यदेव भगवान राम से मिलने गए। वे भगवान राम के बाल रूप के दर्शन करना चाहते थे।

     भगवान से मिलने के लिए उन्होंने कुछ देर प्रतीक्षा की, जिसके कारण सारा ब्रह्मांड थम सा गया। अतः भगवान राम को सूर्यदेव से शीघ्र ही मिलना पड़ा। सूर्यदेव ने अयोध्या में उसी स्थान को अपना निवास स्थान चुना जहाँ वे भगवान राम से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जिस स्थान पर वे खड़े होकर प्रतीक्षा कर रहे थे, उसे सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।

      कई वर्षों बाद, इक्ष्वाकु वंश के राजा घोष पृथ्वी और सागरों पर निर्विवाद रूप से शासन कर रहे थे। अपनी प्रतिभा के कारण वे तीनों लोकों में बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपनी बलिष्ठ भुजाओं से अनेक शत्रुओं का वध किया था। अपने शौर्य के कारण वे सूर्य के समान प्रतीत होते थे। यद्यपि राजा घोष सुंदर थे, परन्तु अपने पिछले जन्म के पाप कर्मों के कारण उनके हाथों में कृमि फैले हुए थे।

राजा घोष ने घोषार्क कुंड की खोज की:- 

एक बार राजा घोष जंगल में शिकार करने गए। वैदिक काल में राजा जंगल के कुछ हिस्सों में खूंखार जानवरों का शिकार करते थे ताकि जंगल में रहने वाले और तपस्या करने ऋषियों की रक्षा हो सके। शिकार के कारण राजा थक गए थे और उनका शरीर कमजोर हो गया था। ऊपर से वे बिल्कुल अकेले थे। अचानक उन्होंने एक छोटी झील देखी जिसमें ऋषि स्नान कर रहे थे और अपने धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे।

     अब राहत पाकर राजा ने आचमन किया और विधिपूर्वक झील में स्नान किया। स्नान समाप्त होते ही राजा का शरीर रोगों से मुक्त होकर दिव्य अवस्था में पहुँच गया। प्रसन्नता के कारण उनका मन अशुद्धियों से मुक्त हो गया।

वहां उपस्थित ऋषियों से यह जानने के बाद कि यह सूर्यदेव को समर्पित तीर्थ है, उन्होंने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना की।

     राजा घोष की विनम्र प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर सूर्यदेव उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान प्रदान किया। राजा ने इच्छा व्यक्त की कि वहाँ सूर्यदेव की एक प्रतिमा स्थापित की जाए, जिसका नाम राजा के नाम पर रखा जाए। सूर्यदेव ने वरदान देते हुए कहा, "हे मनुष्यों के स्वामी, ऐसा ही हो। आपकी इच्छा अत्यंत मनभावन है। जो मनुष्य आपके द्वारा रचित और पाठ की गई इस प्रार्थना को पढ़ेंगे, मैं उनसे प्रसन्न होऊंगा। हे राजा! मैं उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करूँगा। यह पवित्र स्थान आपके नाम से संसार में अत्यंत प्रसिद्ध होगा। जो यहाँ स्नान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। यहां स्नान करना सदा मेरे भक्त का कर्तव्य है। वह जो चाहेग प्राप्त होगा।"

       इतना कहकर सूर्यदेव अंतर्धान हो गए। तब से इस तीर्थ को घोषार्क कुंड के नाम से जाना जाने लगा। समय बीतने के साथ-साथ यह सूर्य कुंड के नाम से लोकप्रिय हो गया।

     एक छोटी झील होने के कारण, राजा ने इसकी खुदाई करवाई थी। खुदाई के दौरान, सूर्यदेव की एक छोटी मूर्ति मिली थी। इस मूर्ति को घोष कुंड के किनारे स्थापित किया गया और आज भी इसकी पूजा की जाती है।

घोषार्क /सूर्य कुंड व मंदिर :- 

अयोध्या का प्राचीन सूर्य कुंड व मंदिर को ‘घोषार्क तीर्थ’ है। इसका उल्लेख डच इतिहासकार हंस बेकर की पुस्तक 'अयोध्या', 'स्कन्द पुराण' और रुद्रयामल में मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार यह तीर्थ स्थल सभी पापों को नाश करने वाला है। सूर्य मंदिर तथा कुंड स्नान के लिए आदि काल से ही प्रसिद्ध रहा है।

घोषार्क कुंडा की महिमा :- 

स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य में कहा गया है कि घोषार्क कुंड में स्नान करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। राजा घोष द्वारा अर्पित प्रार्थनाओं का पाठ करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनो- कामनाएं पूर्ण होती हैं।

    यदि कोई बीमार व्यक्ति, दरिद्र व्यक्ति और दुख में जी रहा व्यक्ति निर्धारित विधि से कुंड में पवित्र स्नान करे तो उसकी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। घोषार्क कुंड में स्नान करने से भक्त को यश प्राप्त होता है और सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है। इसी प्रकार, सूर्यदेव की श्रद्धापूर्वक पूजा करना और अशुद्धियों से मुक्त होकर कुंड में स्नान करना भी निष्कलंक प्रतिष्ठा प्रदान करता है। इससे भी सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है।विशेष रूप से रविवार को किया जाने वाला पवित्र स्नान उत्तम फल प्रदान करता है। भाद्रपद या माघ माह के शुक्ल पक्ष के छठे दिन उचित विधि से किया गया पवित्र स्नान सूर्यलोक में निवास प्रदान करता है। 

     डच इतिहासकार हंस बेकर के अनुसार उस स्थान पर पौष महीने के मकर संक्रांति के दिन सूर्य कुंड मंदिर में पूजा स्नान करने की बड़ी महत्ता बताई गई है। उस दिन लोगों की वहाँ बहुत भीड़ उमड़ती है, तथा लोग वहाँ प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर में स्नान कर तथा सूर्य उपासना कर बड़े पुण्य के भागी बनते हैं।

       स्कन्द पुराण तथा रुद्रयामल की कथाओं के अनुसार सूर्य कुंड में स्नान करने से कुष्ठ और चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। सूर्यकुंड में स्नान, दर्शन और पूजन का विधान शायद इसी सोच से समाज में बलवती हुई है।

     वेदों में भगवान सूर्य को जड़-चेतन जगत की आत्मा कहा गया है. सूर्यवंशी राजा घोष का कुष्ठरोग इस कुंड में स्नान करने से ठीक हुआ था। मान्यता है कि इस सूर्य कुंड में स्नान और सूर्य मंदिर में दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण अपने अराध्य देव सूर्य की पूजा के लिए आदिकाल से जाने जाते रहे हैं। अयोध्या के शाकद्वीपीय ब्राह्मण राजा दर्शन  सिंह भी अपने अराध्य देव सूर्य की आराधना करने के लिए इस प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर का जीर्णोद्धार करवाए थे।

       अनुश्रुतियों में यह भी कहा गया है कि एक बार राजा दर्शन सिंह शिकार करने के लिए उस क्षेत्र में घूम रहे थे, तो उन्हें जोड़ो की प्यास लगी। उनके सेवक ने जब जल को ढूंढा तो उसे थोड़ी दूर पर एक कुंड मिला। उस कुंड का जल बड़ा निर्मल था। सेवक ने उसी कुंड का जल लाकर अपने राजा को प्यास बुझाने के लिए दिया।

     राजा ने उस जल का पान किया तथा उसके कुष्ठ भाग को अपने शरीर पर हुए चर्म रोग पर रगडा। थोड़े ही देर में उनके शरीर पर हुवे चर्म रोग जैसे ठीक हो गया। राजा को लगा उस स्थान पर मानो कोई दैविक शक्ति है। अतः उन्होंने सात दिनों तक वहाँ तपस्या की। सातवें दिन राजा को एक आकाशवाणी सुनाई पड़ी जिसके आज्ञा के अनुसार उन्होंने वहाँ उस स्थान पर खुदाई भी करवाई।

     खुदाई में राजा को सात घोड़ों पर सवार एक सूर्यदेव की मूर्ति, शिवलिंग तथा ढेरो खजाना प्राप्त हुआ था। राजा ने उस खजाने से वहाँ एक विशाल सूर्यकुंड तथा सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया।

     महाराजा द्वारा पुनः निर्मित सूर्यकुंड ना केवल जल प्रबंधन के लिए था, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों को और सुनियोजित ढंग से आकर्षित करने का माध्यम भी बन गया। लोगों ने इसे "जीवनदायिनी धारा" कहकर सम्मान दिया। यह जल संरक्षण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए निर्मित किया गया है। 

       प्राचीन काल से निभाई जा रही यह परंपरा उतनी ही आस्था और निष्ठा के साथ अयोध्या के राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार किये गए तथा निर्मित सूर्यकुंड में भी उस काल में मनाई जाती रही। उसका निर्वहन आज भी ठीक वैसा ही किया जाता है।

वार्षिक मेला:- 

इस स्थान पर हर वर्ष मेले का आयोजन भी किया जाता है। जिसका प्रबंधन राजा दर्शन सिंह के वंशज आज भी करते हैं। सूर्य मंदिर का रखरखाव अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी प्रबंधन द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में सूर्य देव की प्रतिमा के अतिरिक्त उनके चरणों में दोनों ओर सूर्य पुत्र और पुत्री शनि देव और यमुना देवी की अष्टधातु की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। सूर्य कुंड की खोदाई से प्राप्त एक और सूर्य की प्रतिमा को भी वहीं स्थापित किया गया है। गर्भगृह में राम-जानकी,शिव-पार्वती, गणेश- कार्तिकेय, हनुमान जी तथा शालिग्राम के विग्रह भी स्थापित किए गए हैं।

    वर्तमान काल मेंअयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर  मेले की ब्यवस्था की देखभाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है। सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

लाइट एंड साउंड शो का आयोजन

प्रतिदिन शाम के समय इस कुंड में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन भी किया जाता है. जिसमें सूर्यवंश की महिमा और सूर्य मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है। आधे आधे घंटे के दो शो आयोजित होते हैं ।प्रतिदिन शाम 7:30 बजे और 8:30 बजे ये शो शुरू होते हैं। जिसका प्रवेश टिकट: रु. 30 प्रति व्यक्ति है। उम्मीद की जा रही है कि जो राम भक्त अयोध्या श्री राम के दर्शनों के लिए आएंगे, वह इस पौराणिक सूर्यकुंड के दर्शन भी करने आएंगे। सरकार चाहती है कि अयोध्या में धार्मिक पर्यटन बढ़े और यहां आने वाले श्रद्धालु कम से कम दो-तीन दिन रुक कर पौराणिक स्थलों के दर्शन भी करें। इससे क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी. जिससे क्षेत्र के विकास को भी गति मिलेगी। यह भी कहा जाता है कि जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था, तब सभी सभी देवी-देवता अयोध्या आए थे। इनमें सूर्य देव भी शामिल थे. वह इसी स्थान पर रुके थे, जिसे आज सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।यह सुबह आठ बजे से रात 10 बजे तक यह स्थान दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


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