अयोध्या के स्वर्गद्वार के आस-पास में कई प्राचीन मंदिर और पुरातात्विक अवशेष रहे हैं, जिनका इतिहास 11वीं-12वीं शताब्दी या उससे भी पुराना माना जाता है। ब्रिटिश लेखक बाल्फोर के अनुसार ‘अयोध्या की तीन मस्जिदें तीन हिन्दू मन्दिरों पर बनीं। ये मंदिर हैं : जन्म स्थान, स्वर्गद्वार तथा त्रेता का ठाकुर’ ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया एण्ड ऑफ ईस्टर्न एण्ड सदर्न एशिया, पृष्ठ 56)।
जन्म स्थान के बाबरी मस्जिद पर राम जन्म भूमि मंदिर बन गया है। स्वर्गद्वार के चन्द्र हरि मंदिर के कूप पर नारंगी / स्वर्गद्वारी मस्जिद बना हुआ है । बाद में इस संरचना के बगल में चन्द्र हरि मंदिर को पुनः बनवाया गया है, जो अब भी बरकरार है । स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पौड़ी के तट पर स्थित 'त्रेता का ठाकुर' के पुराने मंदिर के अवशेषों पर औरंगजेब के शासनकाल में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया था। आज भी उस दौर के अवशेष और खंडहर मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से 'त्रेता का ठाकुर मस्जिद' या उससे जुड़े अवशेष के रूप में जाना जाता है। बाद में इस स्थान के समीप ही मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा दूसरा 'त्रेता के ठाकुर' मंदिर का जीर्णोद्धार -निर्माण कराया गया था, जहाँ भगवान राम और उनके दरबार के विग्रह स्थापित हैं।
समयानुसार सरयू नदी के बदलाव और ऐतिहासिक उठापटक के कारण यहाँ के कई प्राचीन स्थल और संरचनाएँ समय के साथ खंडहर में बदल गईं या लुप्त हो गईं। इनका उल्लेख इतिहासकार और ग्रंथों में मिलता है। स्वर्गद्वारी मस्जिद राम की पैड़ी पर अङ्गड़ा चौराहा के पास स्थित है। औरंगज़ेब ने सन 1680 में अयोध्या में आकर दो मंदिर स्वयं गिरवाए थे उनमें एक त्रेता के ठाकुर और दूसरा स्वर्गद्वार जिनके स्थान पर मस्जिद नुमा ढांचे बनवाए गए, उसी समय का है। यह ढांचा, जो मस्जिद नहीं बल्कि मस्जिदनुमा ढांचा है। समय के साथ उचित रखरखाव न मिलने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण इस इमारत का मुख्य हिस्सा गिर चुका है और अब केवल लखौरी ईंटों से बनी यह मीनार और मुख्य मेहराब का ढांचा ही बचा हुआ है।
पौराणिक महत्व -
प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इसका उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इस पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान,हनुमान और परशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या भगवान श्री कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।
प्राचीन कूप को ढककर मीनारनुमा मस्जिद बनी :-
औरंगजेब ने फारसी में मंदिर तोड़ने का आदेश 1669 ईस्वी में दिया था। उसने फरमान जारी कर मुल्तान,काशी अयोध्या और मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने का आदेश दिया था। यह फरमान फारसी भाषा में है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप को तोड़कर उस स्थान पर मीनार बना दी गई है । इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। पहले यह मंदिर परिसर का प्राचीन कुआं रहा करता था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक हो जाते थे।
स्कंध पुराण में इस स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्गद्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भगवान विष्णु की परम शक्ति का गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक की आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होता है। इसे बाद में नारंगी मस्जिद भी स्थानीय लोग कहते थे । कुछ लोग इसे स्वर्गद्वारी मस्जिद भी कहते हैं। इसे औरंगजेब ने 1669 में चंद्र हरि विष्णु जी के मंदिर को तोड़वा कर बनवाया था। इसके नीचे चंद्र हरि कूप है।
इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया था और कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई थी जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l इसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है। जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। इसे आसपास के लोगों द्वारा कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है।
औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश
मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर फिदाई खान द्वारा ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया।
फिदाई खान कोका का जन्म मुजफ्फर हुसैन के नाम से हुआ था, एक मुगल सरदार थे जो अवध और लाहौर का गवर्नर था। अवध के सूबेदार इरादत खान की मृत्यु के बाद, उसे अवध और गोरखपुर का फौजदार बना दिया गया। 1674 में सम्राट ने फिदाई खान को काबुल का राज्यपाल नियुक्त किया था, जहाँ उन्होंने स्थानीय कबीलों के विद्रोहों को दबा दिया था। जलालाबाद के पास उन्होंने विद्रोही कबीलों के गाँवों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया था। सम्राट ने उनके प्रयासों की सराहना की और उन्हें अज़ीम खान कोका की उपाधि दी। 1676 में उन्हें दरबार में वापस बुलाया गया और बंगाल का गवर्नर बनाया गया।
अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और बिहार पटना के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।
अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
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