1.बेहद संवेदनशील मुद्दा -
'आरक्षण हटाओ आंदोलन' भारतीय जनता पार्टी या अन्य किसी सत्तासीन पार्टी के राजनीतिक समीकरणों और चुनावी खेल को गंभीर रूप से बिगाड़ सकता है। भारत की राजनीति में आरक्षण एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में जाति- आधारित आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे योग्यता (मेरिट) प्रभावित होती है और सामाजिक समानता के लिए इसका हटना जरूरी है। इस तरह के आंदोलन से बीजेपी के सामने 'कमंडल' (हिंदू एकता) और 'मंडल' (पिछड़ा वर्ग राजनीति) के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी दुविधा खड़ी हो जाती है। यह आंदोलन सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर तेजी से बढ़ा है, जिससे पार्टी के सामने पारंपरिक सवर्ण समर्थकों और वंचित (SC/ST/OBC) समुदायों के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
2.सामाजिक और चुनावी संतुलन बिगड़ने का खतरा -
'आरक्षण हटाओ आंदोलन’ निम्नलिखित कारणों से बीजेपी या किसी भी सत्तासीन दल के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है -
1.) कोर वोटर बेस में असंतोष और बिखराव -
बीजेपी का पारंपरिक वोटर बेस सवर्ण समाज (General Category) रहा है, जो मुख्य रूप से आरक्षण का विरोध या आर्थिक आधार पर इसकी मांग करता है।आरक्षण हटाओ आंदोलन का मुख्य नेतृत्व और समर्थक सामान्य वर्ग (General Category) के युवा और कुछ संगठन (जैसे करणी सेना) कर रहे हैं। इनमें से कुछ धड़े बीजेपी द्वारा आरक्षण नीति में बदलाव न करने से नाराज होकर वोट न देने की चेतावनी दे रहे हैं। सामान्य वर्ग पारंपरिक रूप से बीजेपी का मजबूत कोर वोटर माना जाता है। बीजेपी ने पिछले एक दशक में गैर-यादव ओबीसी (OBC) और गैर-जाटव दलित (SC/ST) वर्गों का एक बड़ा 'लॉयल्टी बैंक' तैयार किया है। 'आरक्षण हटाओ' की मांग तेज होने से इन दोनों वर्गों में टकराव बढ़ेगा, जिससे पार्टी का सामाजिक गठबंधन टूट सकता है।
2.) विपक्ष का बड़ा राजनीतिक हथियार-
विपक्षी दल (जैसे कांग्रेस, आरजेडी और सपा) लगातार बीजेपी पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह आरक्षण को खत्म करना चाहती है या संविधान को कमजोर कर रही है। यदि सड़कों या सोशलमीडिया पर आरक्षण विरोधी आंदोलन (जैसे : 'Reservation Hatao Andolan' या हालिया युवा डिजिटल अभियान) तेज होता है, तो विपक्ष को पिछड़े और दलित वर्गों को बीजेपी के खिलाफ लामबंद करने का सीधा मौका मिल जाता है।
बीजेपी का मौजूदा रुख और रणनीति
1.आरक्षण का खुला समर्थन-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसी शीर्ष लीडरशिप ने स्पष्ट किया है कि बीजेपी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित रखेगी और इसे हटाया नहीं जाएगा। पार्टी खुद को वंचित सामाजिक वर्गों के अधिकारों के रक्षक के तौर पर पेश करती है।
2.आर्थिक आधार (EWS) का दांव- सामान्य वर्ग की नाराजगी को कम करने के लिए बीजेपी पहले ही 10% EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण लागू कर चुकी है। आंदोलनकारियों की मांग है कि पूरे आरक्षण को ही आर्थिक आधार पर बदला जाए, जिस पर पूरी तरह अमल करना किसी भी दल के लिए संवैधानिक रूप से जटिल है।
3.विभाजनकारी शक्तियों से सतर्कता-
बीजेपी प्रवक्ताओं के अनुसार, यदि आंदोलन की मंशा केवल योग्यता (Merit) और सुधार पर चर्चा की है तो ठीक है, लेकिन समाज को बांटने वाली ताकतों का विरोध किया जाएगा।
अतीत के सबक और
राजनीतिक नुकसान :-
बीजेपी इस आंदोलन के प्रभाव को कम करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाती है-
1.2015 बिहार चुनाव का उदाहरण-
साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के 'आरक्षण की समीक्षा' वाले एक बयान को विपक्ष ने चुनावी मुद्दा बना दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को उस चुनाव में भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था।
2.2024 के लोकसभा चुनाव की गूंज-
हालिया आम चुनावों में भी 'संविधान और आरक्षण खतरे में है' के नैरेटिव ने उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी की सीटों को काफी कम करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। विपक्ष अपनी कूट नीति से बीजेपी को नुकसान पहुंचाने में सफल रहा।
3.बीजेपी का बचाव और रणनीति
इस खतरे को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के शीर्ष नेता हमेशा सार्वजनिक मंचों से यह स्पष्ट रूप से दोहराते आए हैं कि "जब तक बीजेपी है, आरक्षण को कोई छू भी नहीं सकता"। यद्यपि उसका एक बड़ा वर्ग इस घोषणा से स्वयं को असहज महसूस करता है और उसकी सक्रियता भी कम हो जाती है।
4.जातिगत राजनीति का काट-
पार्टी आरक्षण विरोधी आंदोलनों से खुद को पूरी तरह दूर रखती है ताकि दलित और ओबीसी मतदाताओं में गलत संदेश न जाए। वह इस तरह के आयोजन से परहेज करती है। उसके सामान्य जाति के टॉप लीडर खुद को मन मसोस कर रह जाते हैं।
निष्कर्ष :-
आरक्षण हटाओ आंदोलन सीधे तौर पर बीजेपी के खेल को पूरी तरह बिगाड़ तो नहीं सकता, क्योंकि पार्टी का ओबीसी और वंचित वर्ग में भी बड़ा आधार है। लेकिन, यह आंदोलन बीजेपी को एक बेहद संवेदनशील स्थिति में जरूर ला देता है। पार्टी के लिए चुनौती यह है कि वह आंदोलनकारी सामान्य वर्ग के युवाओं को समझाए और साथ ही दलित-पिछड़ा वर्ग के अपने बड़े वोट बैंक को यह भरोसा दिलाए रखे कि उनका आरक्षण पूरी तरह सुरक्षित है। यदि आंदोलन' देश में हिंसक या बड़ा रूप लेता है, तो बीजेपी के लिए अपने सवर्ण और ओबीसी-दलित मतदाताओं को एक साथ जोड़े रखना लगभग असंभव हो जाएगा, जिसका सीधा चुनावी नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
लेखक:
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 2720901,उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
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