पृथक निर्वाचिका के साथ चुनाव की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी विशेष समुदाय या वर्ग के मतदाता केवल अपने ही समुदाय के उम्मीदवार को वोट देते हैं। इसमें अन्य समुदाय के लोग वोट नहीं डाल सकते हैं। इसके तहत किसी खास धर्म, जाति या वर्ग के लिए एक अलग मतदाता सूची और निर्वाचन क्षेत्र बनता है। उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाला और उसे वोट देने वाला व्यक्ति भी उसी समुदाय से होता है।
ब्रिटिश सरकार ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत सबसे पहले1909 के मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की शुरुआत की थी। इसके बाद 1919 के सुधारों में इसे ईसाइयों और एंग्लो-इंडियन तक बढ़ाया गया।1932 के सांप्रदायिक पंचाट में दलितों (शोषित व वंचित वर्गों) के लिए भी इसकी घोषणा की गई।
जिन्ना ने 1916 में मुस्लिम मतदाताओं के लिए इसी तरीके की मांग शुरू की थी और अंततः एक अलग राज्य चाहा था और यहीं से दो राष्ट्र सिद्धांत यानी कि ट्यू नेशन थ्योरी की नींव पड़ी।
पूना समझौता -
पूना पैक्ट की उत्पत्ति अगस्त 1932 के सांप्रदायिक पुरस्कार से जुड़ी हुई है, जिसमें मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों और दलित वर्गों सहित विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों के लिए अलग-अलग निर्वाचक मंडल आवंटित करने की मांग की गई थी। इस परिणाम में, केंद्रीय विधायिका में 71 सीटें विशेष रूप से दलित वर्गों के लिए आरक्षित की गई थीं।
गांधीजी का अनशन -
गांधी ने यरवदा जेल में दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया था और आमरण अनशन शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा। जिसके बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 1932 में पूना पैक्ट हुआ था। इस समझौते के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका को समाप्त कर दिया गया और इसके बदले संयुक्त निर्वाचन में ही उनके लिए सीटें आरक्षित कर दी गईं।
सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीट पर सहमति -
24 सितंबर, 1932 को अंबेडकर ने जेल में गांधी से मुलाकात की और उन्होंने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए। अलग-अलग निर्वाचक मंडलों के बजाय, अछूतों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित की जातीं, जिससे प्रांतीय विधानसभाओं में सीटों की संख्या 78 से बढ़कर 148 हो जाती।
संविधान के अनुच्छेद 325 का उल्लंघन-
आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों ने इस मांग को संविधान के अनुच्छेद 325 के खिलाफ और देश के सामाजिक ताने- बाने को विभाजित करने वाला करार दिया है। कुछ ने इसकी तुलना ऐतिहासिक रूप से विभाजनकारी राजनीतिक कदमों से भी की है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि देश के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए धर्म, मूलवंश ,जाति या लिंग के आधार पर कोई अलग या विशेष मतदाता सूची नहीं होगी और न ही किसी व्यक्ति को केवल इन आधारों पर मतदाता सूची में शामिल होने से अयोग्य ठहराया जाएगा।
चन्द्र शेखर रावण ने पृथक निर्वाचिका की संसद में की मांग -
नगीना से सांसद और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चन्द्र शेखर आजाद 'रावण' ने संसद में दलितों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग 17 अप्रैल 2026 को उठाई है। उनका तर्क है कि मौजूदा आरक्षित सीटों पर सभी जातियों के मतदाता वोट करते हैं, जिससे कई बार चुनकर आने वाला प्रतिनिधि अपने समाज के प्रति स्वतंत्र न होकर अपनी पार्टी के प्रति वफादार होता है। उनका मानना है कि बिना स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आरक्षण केवल एक संख्या बनकर रह जाता है, जिससे वास्तविक सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण संभव नहीं है।
नेता पर अंकुश लगे -
दशकों बाद नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण उसी पुराने पन्ने को फिर से खोल रहे हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ सबका विकास और एक भारत श्रेष्ठ भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के कुछ ऐसे चेहरे समाज में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। चंद्रशेखर आजाद की सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग का मतलब है एक ऐसा भारत जहां हिंदू समाज को जातियों के आधार पर पूरी तरीके से बांट दिया जाए। मौजूदा समय में जिस तरीके से व्यवस्था है उनसे जो दलित होते हैं उनके लिए अलग-अलग क्षेत्र में सीटें आरक्षित होती है। लेकिन यहां पर चंद्रशेखर रावण का यह मांग है कि ना सिर्फ अलग सीटें चाहिए बल्कि जो वोट करने वाले लोग हो वो भी दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भी अलग हों। यानी कि उनका पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग किया जा रहा है।
उन्होंने बाबा अंबेडकर की अस्वीकार की गई मांग को दुबारा उठा दिया है। यह मांग ब्रिटिश काल के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा उठाई गई उस ऐतिहासिक मांग की पुनरावृत्ति मानी जा रही है, जिसे बाद में 1932 के पूना पैक्ट के तहत समाप्त कर दिया गया था।
जनता में जबरदस्त गुस्सा -
चन्द्र शेखर रावण की इस मांग को लेकर के सोशल मीडिया पर जनता काजबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा है। जो देश के एक बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है। यह मांग देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली है और बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए पूरे पैक्ट की भावना के भी खिलाफ है। वे इस मांग से जातियों में और भी ज्यादा खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जो कि आगे चलकर के एक अलग राष्ट्र बनाने की नींव भी डाल सकता है। भारत के पहले से दो टुकड़े बनकर देश के विरुद्ध अघोषित युद्ध जैसी हालत कर रखी हैं। अब और टुकड़े कर इसे और छूट नहीं दी जा सकती है। यही वजह है कि लोग जो है वह यह कह रहे हैं कि चंद्रशेखर आजाद रावण के खिलाफ एनएसए लगाया जाए।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
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