गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि थे। उन्हें महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है । उनके मन में उनके माता-पिता की कोई छवि नहीं उभरती रही है । उन्होंने उनको देखा ही नहीं था। उन्होंने सुना था कि उनके पिता पंडित आत्माराम दूबे, चित्रकूट के निकट राजापुर गाँव के रहने वाले थे। वे एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी थे। माता हुलसी तुलसी के जन्मते ही स्वर्ग सिधार गईं थी। पिता जी की ज्योतिषीय गणना के अनुसार तुलसीदास का जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र में हुआ था,जो माता-पिता के लिए प्राणघातक था। माता जन्मते ही मर गई थी। इससे भयभीत और दुखी पिता ने बालक का तुरंत त्याग कर संन्यास की राह पकड़ लिया।
ज्योतिष शास्त्र में अभुक्तमूल ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम चरण और मूल नक्षत्र के शुरुआती चरण के मिलने का एक अत्यंत संवेदनशील और अशुभ संधि-काल (गंडांत) है। इस विशेष समयावधि में जन्म लेने वाले जातक के लिए विशेषज्योतिषीय शांति और उपाय कराए जाते हैं। इस काल में जन्म लेने वाले जातक के बाल्यकाल में स्वास्थ्य, परिवार या माता-पिता के लिए कुछ कठिनाइयाँ या कष्टप्रद लाते हैं। इस दोष के शमन के लिए जन्म के 27वें दिन (जब दोबारा वही नक्षत्र आए) या योग्य विद्वान पंडित से गंडमूल शांति पूजा और हवन विधान करवाना अनिवार्य माना जाता है।
तुलसी दास का बचपन काफी अभावों और कठिनाइयों में बीता था। उनको ग्रह शांति का कोई अवसर ना बन पाया। माता जी की मृत्यु और पिता जी द्वारा गृह त्याग के बाद घर की दासी चुनिया के जिम्मे में वे पड़े। वह उन्हें उठा कर अपने मायके ले गई। चुनिया, को तुलसी माई कहता था, उसकी अति क्षीण छवि तुलसी के मन में उभरती है, क्योंकि पाँच साल की आयु होते-होते वह भी स्वर्ग सिधार गई।
चुनिया माई के यहाँ कभी-कभी अयोध्या की पार्वती अम्मा नाम की एक विधवा ब्राह्मणी आती थी, जिसे सब लोग माईजी कहते थे। कहते हैं माईजी ने ही उसबालक का नाम ‘रामबोला’ रखा था। चुनिया माई के मरने के बाद बालक पार्वती माईजी के संरक्षण में पहुँच गया। माईजी भीख मांग कर पेट पालती थी। माईजी के साथ बालक भी भीख मांगने जाने लगा। माईजी ने उसे यह भजन सिखाया –
“जय सियाराम जय जय सियाराम,
जय जय विघ्नहरन हनुमान”।
राम बोला और माईजी द्वार-द्वार पर यही भजन गाते थे। माईजी राम के नाम पर और अनाथ रामबोला का पेट पालने के नाम पर भीख मांगती थी। राम बोला अनाथ पर दया कर लोग थोड़ी ज्यादा भीख देते थे। यह सिलसिला लगभग दो साल चला जब तक माईजी स्वयं स्वर्ग न चली गईं।
माई जी के मर जाने से रामबोला मारा- मारा भटकने लगा। यद्यपि माईजी के ढर्रे पर वह भी भीख मांगने निकलता था, उसे भीख से ज्यादा भोजन की जरूरत थी। इसलिए वह लोगों से विनती करता था कि भीख के बजाय उसे भोजन दें। वह छोटे ही क्षेत्र में घूम-फिर कर भीख मांग पाता था। इसलिए ज्यादातर गृहणियाँ उसे पहचान गई थीं। उनमें कुछ तो बड़ी दयालु थीं, जो उसे पेट भर भोजन दे दिया करती थीं। लेकिन कुछ बड़ी कंटही थीं । वे उसे ‘मरभुक्खा’ कह कर भगाती थीं और कई बच्चे उसे ‘मरभुक्खा’ कह कर चिढ़ाते और दौड़ाते हुए ढेले मारते थे। ऐसी हालत में वह जोर-जोर से “जय सियाराम जय जय सियाराम जय जय विघ्नहरन हनुमान” चिल्लाता हुआ भागता था और बच्चे हँसते रहते थे।
तुलसी को बचपन के दुखदायी गरीबी के वे पुराने दिन नहीं भूलते हैं – कथरी ओढ़े हुए, हाथ में मिट्टी का लोटा लिए हुए, वह माईजी के पीछे-पीछे घर-घर घूमता था। दांत निपोर कर, पेट ठोंक-ठोंक कर, लोगों के पैरों पड़कर, राम के नाम पर भीख माँगता था। माई जी के गुजर जाने के बाद तो लोग बड़ी हिकारत से उसे रामबोलवा कह कर बुलाते थे।
माईजी ने उसे सिखा रखा था कि सबके पेट रामजी और उनके सेवक हनुमानजी पालते हैं । अकेले में वह रामजी को गोहराता था, खासकर तब जब उसे भूख लगती थी और बच्चों के डर से भीख मांगने की हिम्मत न जुटा पाता था। वह हनुमान जी से बच्चों की शिकायत करता था कि ‘हे हनुमान स्वामी, उसे खदेड़ने वाले बच्चों को मार-मार के भगाओ।’
इस तरह रामबोला अनाथ हो गया था,जब भीख में दिक्कत आती तो वह अपने मामा के घर आ गया। मामा ने उसका पालन पोषण किया। जब-जब भी वह मामा से अपने माता-पिता के बारे में प्रश्न करता था, तब उत्तर में मामा बालक से कहते थे कि ‘राम जी ही उसके माता-पिता हैं।’
थोड़ा बड़ा होने पर उन्हें यह समझ में आया कि, छोटे बच्चों के माँ-बाप सदा उनके पास रहते हैं, उनसे वे दूर नहीं जाते हैं।उन्हें आश्चर्य हुआ कि उसके माता-पिता रूपी रामजी उसे अकेला छोड़ उस मन्दिर के वैभव कैसे रहते हैं? सदा लोगों की भीड़ के बीच कैसे रहते हैं?
बालक तुलसीदास अत्यंत निर्मल मन के थे। अतः उन्हें मामा के शब्दों पर पूर्ण विश्वास था। एक दिन रात्रि के समय वे मन्दिर में गए और श्री राम की मूर्ति के समीप पहुँचे।उन्हें बडी जोर की भूख व प्यास लगी हुई थी, इसी कारण वे रोने लगे तथा मूर्ति के पास ही उन्होंने कुछ खाने को माँगा। उनकी निष्पाप प्रवृत्ति को देखकर स्वयं प्रभु श्रीराम जी भी विचलित हो गये और उन्होंने थोड़ा प्रसाद उन्हें खाने के लिए दिया।
इस कारण तुलसीदास के मन में इस बात का जरा भी संदेह नहीं रहा कि रामजी ही उनके सच्चे माता-पिता थे। फिर तुलसी दास ने श्रीराम से पूछा कि वे अकेले ही क्यों हैं और अपने बच्चों की चिंता क्यों नहीं करते? किंतु मूर्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। हमें अपने माता-पिता के पास ही रहना चाहिए, ऐसा सोचकर तुलसीदास ने उस मूर्ति को घर ले चलने का विचार किया। मूर्ति ले जाते समय हुई थोड़ी आवाज के कारण मंदिर के पुजारी की नींद खुल गई।
उन्होंने तुलसीदास को रूकने के लिए कहा। तुलसीदास ने कहा कि वे अपने माता-पिता को घर ले जा रहे हैं और उन्हें मंदिर में रखने का पुजारी को कोई अधिकार नहीं। पुजारी तुलसीदास के पीछे पीछे चलने लगे। तुलसीदास यथा सम्भव तेजी से दौड़े। दौड़ते - दौड़ते वे तुलसीजी के वन में पहुँचे और वहाँ पहुँचकर बेहोश हो गये।
(एक अन्य कथा में कहा गया है कि बचपन में भीख मांगते हुए कुछ बच्चे तुलसीदास को दौड़ा रहे थे और वे “जय सियाराम जय जय सियाराम, जय जय विघ्नहरन हनुमान” भजन भूल कर “हे राम जी मुझे बचाओ, हे हनुमान जी बचाओ,” चिल्लाता हुआ भाग रहा था कि सामने से आकर एक व्यक्ति ने उनकी बांह पकड़ ली और शरारती बच्चों को डांटकर भगाया और बालक तुलसी को बचाया था।)
कृपालु भगवान बालक के प्रेम व सत्य से अत्यंत प्रभावित हुए। उसी समय सरयू नदी के तट पर स्थित गोण्डा जिले के सुकरखेत के रामानन्द संप्रदाय के नरहरि दास नामक संत वहाँ पहुँचे, उन्होंने उस बालक को उठाया और उसे सांत्वना दी। तुलसीवन में मिलने के कारण स्वयं नरहरि दास ने ही बालक का नाम तुलसीदास रखा। संत नरहरि दास ने तुलसी को बताया कि रामजी ने उन्हें उसके माता-पिता के रूप में भेजा है। उस सत्पुरुष द्वारा दी गई प्रेम की वर्षा से बालक तुलसीदास अत्यंत संतुष्ट व आनन्दित हुए।
गुरु ने ही उन्हें राम-कथा सुनाई, जिससे उनके मन में श्री राम के प्रति अटूट भक्ति जागी। तब से वे तुलसीदास के रूप में पहचाने जाने लगे। संत नरहरि दास ने उन्हें केवल आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उनके लिए उपयुक्त शिक्षा देकर उनके मन व हृदय में भक्ति की नींव भी डाली। वह व्यक्ति एक संत थे, जो तुलसी की स्थिति देख कर बहुत द्रवित हुए थे। वे उस अनाथ को अपने आश्रम में ले गए। उस समय बालक की उम्र कोई सात साल की रही होगी। वहाँ अन्य साधुओं के विरोध के बावजूद उन्होंने उसे आश्रम में रखा; उनका ब्राह्मणोचित संस्कार कराया; उनका नाम रामबोला से बदल कर तुलसीदास रखा और विद्यारंभ कराया। ये संत थे रामानंदी वैरागी साधू नरहरिदास थे जिन्हें बालक बाबा कहने लगा था। अगले आठ सालों तक बाबा ही उसके गुरु, शिक्षक और संरक्षक रहे।
विवाह -
तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नाम की विदुषी कन्या से हुआ था। वे अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार पत्नी के उलाहने (कि जितना प्रेम इस देह से करते हो, उतना श्री राम से करते तो बेड़ा पार हो जाता) ने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और सन्यास धारण कर लिया।
प्रमुख रचनाएँ -
तुलसीदास जी ने संस्कृत और अवधी दोनों भाषाओं में दर्जनों रचनाएँ कीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'रामचरित मानस' है। उनकी कुछ अन्य प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
रामललानहछू
वैराग्य संदीपनी
बरवै रामायण
पार्वती-मंगल
जानकी-मंगल
रामाज्ञाप्रश्न
दोहावली
कवितावली
गीतावली
श्रीकृष्ण-गीतावली
विनयपत्रिका
सतसई
छन्दावली रामायण
कुण्डलिया रामायण
राम शलाका
संकट मोचन
करखा रामायण
रोला रामायण
झूलना
छप्पय रामायण
कवित्त रामायण
कलिधर्माधर्म निरूपण
हनुमान चालीसा
रामचरितमानस की रचना -
तुलसीदास जी ने अयोध्या में रामचरित मानस की रचना शुरू की और इसे काशी (वाराणसी) में पूर्ण किया। यह ग्रंथ आज हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथों में से एक है, जिसने श्री राम की कथा को घर-घर तक पहुँचाया।
मृत्यु (निर्वाण) –
तुलसीदास जी ने अपना अंतिम समय काशी के असीघाट पर व्यतीत किया। 1623 ईस्वी (संवत् 1680) में उन्होंने अपनी देह त्यागी। उनकी मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध है-
संवत् सोरह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्योशरीर।
निष्कर्ष -
तुलसीदास जी ने लोक-भाषा (अवधी) में रामायण लिखकर भक्ति को जन-साधारण के लिए सुलभ बना दिया। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को नैतिकता, धैर्य और भक्ति की प्रेरणा देती हैं।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8, आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.(वॉट्सप नं.+919412300183)
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