Wednesday, July 15, 2026

शिव के कालभैरव स्वरूप के विविध रूप ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


कालभैरव, भगवान शिव के उग्र और रुद्र अवतार हैं, जिन्हें 'समय के देवता' और ‘पापियों के दंडदाता’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें "काशी का कोतवाल" भी माना जाता है, उनकी कृपा से सभी भय व नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती है। वे आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनका वाहन काला कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को भोजन कराने से भी भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।



उत्पत्ति की कथा :-

पौराणिक मान्यताओं (शिव पुराण) के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा को अपनी श्रेष्ठता पर अहंकार हो गया था और उन्होंने भगवान शिव का अनादर कर दिया था । इस अहंकार को तोड़ने और ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए, शिव के क्रोध से 'काल भैरव' की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक अभिमानी पांचवें सिर को काट दिया था।


     

 भैरव का अर्थ ‘भय को हरने वाला’ होता है। उनका यह स्वरूप काल का स्वामी और सदैव रौद्र रूप में होता है। शिव पुराण के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसके साथ ही काल भैरव को ‘दंडपाणी’ भी कहा जाता है। क्योंकि वह पापियों को दंड देते हैं।

ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करना पड़ा :-

ब्रह्मा का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्म हत्या' का पाप लगा। इस पाप के निवारण के लिए उन्हें कई वर्षों तक एक भिक्षु के रूप में भटकना पड़ा। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव ने त्रिलोक में भ्रमण किया। अंततः, जब वे पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) पहुँचे, तो ब्रह्मा का कटा हुआ सिर (कपाल) उनके हाथ से नीचे गिर गया। तब जाकर वह पाप मुक्त हुए। तब से, काल भैरव को काशी का मुख्य कोतवाल और रक्षक माना जाने लगा है।


काल भैरव का भयानक स्वरूप :- 

काल भैरव का रूप अत्यंत भयानक है। उनका रंग काला है, वे हाथों में त्रिशूल, डमरू और ‘ब्रह्मा का कपाल’ धारण करते हैं, और उनका वाहनमृत्यु) और भय (डर) पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

पूजन का विशेष समय :- 

काल भैरव की पूजा के लिए रविवार और मंगलवार का दिन विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, हर माह के कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' (कालाष्टमी) का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसिक शांति और बाधा मुक्ति के लिए "ॐ कालभैरवाय विद्महे काशीवासाय धीमहि। तन्नो भैरवः प्रचोदयात्।" मंत्र का जाप किया जा सकता है।


निष्कर्ष :-

काल भैरव, शिव का सबसे शक्तिशाली रूप है। काल भैरव की कथा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने के लिए है। भैरव धर्म की पुनर्स्थापना करने, अहंकार का नाश करने और सत्य की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उनका उग्र रूप स्पष्टता का प्रतीक है। भ्रम को दूर करने और अनुशासन में दृढ़ता से खड़े रहने का साहस ही भैरव का स्वरूप है। भैरव अष्टमी पर काशी में भैरव की पूजा करें या घर पर एक साधारण प्रार्थना के माध्यम से, आध्यात्मिक संदेश एक ही रहता है- सत्य अहंकार से श्रेष्ठ है, अनुशासन भय से अधिक शक्तिशाली है, और भक्ति तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच्ची और निरंतर हो। काल भैरव अंधकार का प्रतीक नहीं हैं। वे अंधकार के अंत का प्रतीक हैं। इसीलिए भक्त उन्हें निर्भयता और आंतरिक स्थिरता जगाने वाली रक्षक शक्ति के रूप में याद करते हैं।

     काल भैरव के शास्त्रीय स्वरूप :-

अष्ट भैरव-

अष्ट भैरवों को काल भैरव के अधीन बताया गया है, जिन्हें ब्रह्मांड में समय का सर्वोच्च शासक और भैरव का प्रमुख रूप माना जाता है। भैरव की पूजा केवल एक रूप में नहीं की जाती। हिंदू देवता भैरव के आठ रूप हैं । उन्हें आठ दिशाओं का रक्षक और नियंत्रक माना जाता है।भैरव बाबा के 8 प्रमुख रूप को अष्ट भैरव कहा जाता है।  माना जाता है कि प्रत्येक रूप रक्षा, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति के एक अलग पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएँ अष्ट भैरव नामों का वर्णन थोड़ा भिन्न ढंग से कर सकती हैं, फिर भी मूल अवधारणा एक ही रहती है। भैरव की उपस्थिति बहुआयामी है। इसका अर्थ यह है कि भैरव पूजा कोई एक निश्चित अभिव्यक्ति नहीं है। यह भक्त के आध्यात्मिक विकास और संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलती रहती है। आरंभिक साधकों के लिए सभी रूपों को याद करना आवश्यक नहीं है। इसका उद्देश्य जानकारी एकत्र करना नहीं है, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ भक्ति का निर्माण करना है। 



1.असितंगा भैरव :-

असितांग भैरव भगवान शिव के उग्र रूप, काल भैरव के आठ प्रमुख रूपों में से प्रथम हैं। मुख्य रूप से रचनात्मकता, ज्ञान की प्राप्ति, और वाक सिद्धि के लिए पूजे जाने वाले इस देवता का वर्ण अत्यंत काला है, जिसके कारण उन्हें 'असितांग' (असित + अंग) कहा जाता है। इनका रंग गहरा नीला या काला होता है। इनके तीन नेत्र हैं और ये गले में सफेद कपालों (खोपड़ियों) की माला धारण करते हैं। अन्य भैरवों का सामान्य वाहन कुत्ता (श्वान) होता है, लेकिन असितांग भैरव का वाहन 'हंस' है, जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। ये पूर्व दिशा के रक्षक माने जाते हैं। इनकी शक्ति 'ब्रह्माणी' हैं। भक्तों का मानना है कि इनकी उपासना सेरचनात्मक क्षमता बढ़ती है, शाप से मुक्ति मिलती है और गंभीर रोगों से राहत प्राप्त होती है।हालांकि इनकी पूजा भैरव मंदिरों में सामान्य रूप से होती है, लेकिन इनका एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर वाराणसी में वृद्ध कालेश्वर के निकट महामृत्युंजय मंदिर के पास कृतवासा पीठ के धार्मिक क्षेत्र में स्थित है।


2.रुरु भैरव :-

रुरु भैरव भगवान शिव (रुद्र) के सबसे प्रमुख आठ रूपों में से दूसरा स्वरूप हैं। इन्हें 'आनंद भैरव' या 'गुरु भैरव' भी कहा जाता है। ज्ञान, उदारता, और कला-संगीत के प्रतीक इस भैरव की पूजा मुख्य रूप से बुद्धि, शत्रुओं पर विजय, धन प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'रुरु' शब्द का अर्थ रुद्र का मुख माना जाता है। यह उग्र होने के साथ-साथ अत्यंत ज्ञानवान और सही मार्ग दिखाने वाले गुरु के समान हैं। इनका वाहन सफेद बैल है और उनकी पत्नी महेश्वरी मातृका हैं। लाभ: इनकी आराधना से विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, कलाकारों को रचनात्मकता, और साधकों को भय तथा तंत्र-बाधा से मुक्ति मिलती है। रुरु भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सरल बीज मंत्र है:”ॐ भ्रं रुरु भैरवाय नमः।” वाराणसी अष्ट भैरव यात्रा के अंतर्गत इनका मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हनुमान घाट (B. 4/16) के पास स्थित है। श्रद्धालु यहाँ रिक्शा या ऑटो से सोनारपुरा चौराहे तक पहुँच सकते हैं। स्थानीय लोग इन्हें आनंद भैरव के नाम से भी पुकारते हैं। “वे भगवान शिव के ही एक अंश हैं और ज्ञान, उदारता, प्रेम तथा सही मार्गदर्शन के प्रतीक हैं।


3.चंदा भैरव :-

भगवान चंदा का भैरव का प्रकट होना बताया गया है। विनाश के देवता भगवान शिव, दुष्ट आत्माओं का नाश करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने और ब्रह्मांड में शुद्ध एवं सकारात्मक वातावरण स्थापित करने के लिए भगवान भैरव का रूप धारण करते हैं। भगवान भैरव कवचधारी, आक्रामक और भयभीत देवता हैं। आठ भैरवों में, भगवान चंदा भैरव अष्ट भैरव का तीसरा रूप हैं। वे नीले वस्त्रों में प्रसन्न और सौम्य हैं, विश्वास और विश्वसनीयता के प्रतीक हैं, शांति को बढ़ावा देते हैं और सभी कार्यों में सौम्यता का सम्मान करते हैं। वे अपने चार हाथों में अग्नि ज्वाला, गदा, भाला, धनुष और बाण धारण किए हुए, अपनी पत्नी देवी कुमारी (देवी पार्वती) के साथ अपने वाहन मोर पर बैठे हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर होते हैं। इस दिन होमम करने से जातकों को आनंदमय स्वभाव, शांति और सद्भाव, ऊर्जा और गतिशीलता, सकारात्मक रूप, जीवन में आत्मविश्वास, बाधाओं पर विजय, शत्रुता से मुक्ति और प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

चंदा भैरव भगवान की पूजा प्रतिस्पर्धा, शत्रुता और प्रतिद्वंद्वियों को दूर करते हैं और विकास, सफलता, विजय और व्यावसायिक उन्नति के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे शुभ ऊर्जा, धन, सर्वोच्चता, विकास की शक्ति, जीवन की वृद्धि, समृद्धि, उत्सव और समग्र खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। वे दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। उनका वाहन मोर है। भगवान चंदाभैरव मूल मंत्र है -

“ॐ ह्रीं सर्व शक्ति रूपाय नील वर्णाय

महा चंदा भैरवाय नमः।” पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपरोक्त मंत्र का 22 दिनों तक 1008 बार जाप करने से श्री चंदा भैरव का आशीर्वाद प्राप्त होगा, मंगल दोष और मंगल दशा के प्रभाव दूर होंगे और बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलेगी। जीवन में उन्नति और अद्भुत क्षणों का अनुभव होगा।

लाभ :-

आत्म-जागरूकता और प्रभावशाली रूप को आशीर्वाद दें, घृणा को दूर करें। अंतरात्मा को आशीर्वाद दें, बुरी धारणाओं और हानिकारक प्रभावों को दूर करें।स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद, अज्ञानता का निवारण करें। मंदी से मुक्ति, बाधाओं और परेशानियों को दूर करना होता है।वित्तीय ऋणमुक्ति का निवारण हो, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिले।अस्थिरता की परिस्थितियों को दूर करो, रोगमुक्त जीवन का आशीर्वाद दो।


4.क्रोध भैरव :-

क्रोध भैरव हिंदू धर्म में भगवान शिव के उग्र रूप और अष्ट भैरवों में से एक हैं।यह स्वरूप दुष्ट बाधाओं, शत्रुओं के विनाश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय माना जाता है।  क्रोध भैरव का स्वरूप उग्र और भयंकर होता है। इनका वर्ण लाल (रक्त) है, चार भुजाएँ हैं और ये खड्ग (तलवार), त्रिशूल, खप्पर (खोपड़ी का पात्र) तथा डमरू धारण करते हैं।अन्य भैरवों की तरह इनका वाहन भी काला कुत्ता (श्वान) है। यह स्वरूप तंत्र-मंत्र, तामसिक शक्ति और गुप्त साधनाओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इनकी पूजा मुख्य रूप से रात या श्मशान में की जाती है और इसे हमेशा किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 

लाभ: क्रोध भैरव की उपासना से साधक का आत्मबल बढ़ता है, तंत्र-मंत्र का प्रभाव नष्ट होता है और सभी प्रकार के कष्ट व शत्रु बाधा समाप्त होते हैं।

5.उन्मत्त भैरव :-

उन्मत्त भैरव, भगवान शिव के अष्ट भैरव स्वरूपों में से पांचवें स्वरूप हैं। उन्हें मुख्य रूप से माँ वाराही का भैरव माना जाता है। उन्मत्त भैरव का स्वरूप साधक के मन से नकारात्मक विचारों, कामुकता और दूषित आदतों को नष्ट कर सकारात्मक ऊर्जा और उत्कृष्ट वाणी प्रदान करने के लिए अत्यंत पूजनीय है।

लाभ - इस साधना से सभी प्रकार की तंत्र बाधाएं दूर होती हैं, शत्रुओं से रक्षा होती है, और निर्णय लेने की क्षमता व भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। मानसिक स्थिरता के लिए आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते हुए उनके मंत्रों का 21 दिनों तक धीमी आवाज़ में (उपांशु) जाप किया जाता है। उन्मत्त भैरव साधना के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

गायत्री मंत्र: “ॐ महामंत्राय विद्महे । वाराहि मनोहराय धीमहि । तन्नौ उन्मत भैरव प्रचोदयात्।”


6.कपाल भैरव :-

कपाल भैरव, भगवान शिव के उग्र और तांत्रिक स्वरूप हैं।यह अष्ट भैरवों में से चौथे प्रमुख भैरव हैं। मुख्यतः वाराणसी (काशी) में इन्हें 'लाट भैरव' के रूप में पूजा जाता है, जहाँ ये नगर के रक्षक माने जाते हैं। इनकी साधना विशेषकर कानूनी विवादों, शत्रुओं और तंत्र बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, दंड और कपाल (मानव खोपड़ी) होता है। उनका वाहन काला कुत्ता है।इनका मूल मंत्र 'ॐ कपाल भैरवाय नमः' है।

लाभ- हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इनकी पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है, अटके हुए कार्य पूरे होते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है。वाराणसी के अलावा, पूरे भारत में अन्य शिव और भैरव मंदिरों में भी इनकी आराधना की जाती है। कपाल भैरव का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिर वाराणसी में अलापुर (सारनाथ मार्ग) में स्थित है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 4-5 किलोमीटर है। आशापुर चौराही (चौमुहानी) से सारनाथ जाने वाले मार्ग पर बाएँ न मुड़कर, दाहिने मुड़कर लगभग 2 किलोमीटर आगे जाने पर मंदिर पहुँचा जा सकता है।


7.भीषण भैरव :- 

भीषण भैरव को 'भूत भैरव' भी कहा जाता है। भगवान शिव के उग्र और शक्तिशाली अवतार, अष्ट भैरव में से सातवें भैरव हैं। वे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी आत्माओं और तंत्र-मंत्र के प्रभावों को नष्ट करने वाले रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह प्राचीन मंदिर क.63/28, भूतभैरव (ज्येष्ठेश्वर के निकट) में स्थित है। भीषण भैरव को क्रूरता, अज्ञानता और अहंकार के विनाशक के रूप में जाना जाता है, जो भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। वाराणसी की पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा द्वारा राक्षस दुर्गासुर का वध करने के बाद नगर की रक्षा के लिए आठ भैरवों को स्थापित किया गया था, जिनमें से भीषण भैरव एक हैं। 

लाभ - शक्तिशाली मंत्रभक्त नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से मुक्ति के लिए उनके बीज मंत्र का जाप करते हैं:॥ ॐ भ्रं भीषण भैरवाय फट् ॥बुरी नज़र और कष्टों के निवारण के लिए इस मूल मंत्र का भी उपयोग किया जाता है:॥ ॐ ह्रीं भीषण भैरवाय सर्व शाप निवारणाय मम वशं कुरु कुरु स्वाहा ॥


8. संहार भैरव:-

संहार भैरव भगवान शिव का सबसे उग्र और रौद्र स्वरूप हैं, जो ‘अष्ट भैरव’ में से एक हैं। 'संहार' का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि बुराइयों, नकारात्मक ऊर्जाओं और पापों का अंत कर धर्म की पुनर्स्थापना करना है। इनकी आराधना से भक्तों को निर्भयता और साहस की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, संहार भैरव एक कूप (कुएं) से स्वयं प्रकट हुए थे।स्वरूप: इन्हें दश-भुजी (दस भुजाओं) वाले देवता के रूप में दर्शाया गया है, जिनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, शंख, गदा, चक्र, तलवार और खप्पर आदि सुशोभित रहते हैं। इनका वर्ण बिजली जैसा पीला-नारंगी माना जाता है। संहार भैरव का मुख्य और प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर वाराणसी में पाटन दरवाजा, गाय घाट के पास स्थित है। 

लाभ - विशेष रूप से भय, अज्ञात चिंताओं और पुराने कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल का दीपक जलाना फलदायी होता है।काले तिल, उड़द और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है।इनके वाहन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यधिक शुभ माना जाता है। भक्त नकारात्मक शक्तियों और भय से मुक्ति के लिए इस बीज मंत्र और मूल मंत्र का जाप करते हैं:बीज मंत्र: ॐ भ्रां भैरवाय नमःमूल मंत्र: ॐ नमो भगवते संहार भैरवाय भूत प्रेता पिशाच ब्रह्मराक्षस उकताया उकताया संहारय संहारय सर्व भय छेदनं कुरु कुरु स्वाहा।


शक्तिशाली भैरव रूपों का विवरण


1.काल भैरव :- इन्हें सबसे उग्र और सर्वोच्च माना जाता है। मान्यता है कि इन्होंने ही अहंकार में चूर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था।इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है और इनके बिना काशी में कोई भी कार्य या अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है।

2.स्वर्णाकर्षण भैरव :- यह भैरव का वह स्वरूप है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार के आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है और अपार धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।

3.बटुक भैरव :- यह भैरव का सौम्य और बाल रूप है। इन्हें बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है और इनकी पूजा विशेष रूप से त्वरित फल देने वाली और भय-बाधाओं को नष्ट करने वाली मानी गई है।


भारत में काल भैरव के प्रमुख मन्दिर :-

भारत में काल भैरव भगवान शिव के उग्र अवतार के कई प्रमुख और सिद्ध मंदिर हैं। उन्हें मुख्य रूप से बुराई के विनाशक और 'क्षेत्रपाल' (रक्षक) माना जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के कालभैरव स्वरुप की उत्पत्ति मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए उत्तम मानी जाती है और ऐसी मान्यता है इस दिन काल भैरव की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। काल भैरव की पूजा न सिर्फ भारत बल्कि नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत जैसे कई देशों में होती है।भारत में कई स्थानों पर प्रसिद्ध कालभैरव मंदिर है जिसका अपना अलग-अलग महत्व है। 


1.काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश):-

क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। उज्जैन मध्यप्रदेश के उज्जैन में भगवान शिव का प्राचीन और फेमस ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस जगह पर भगवान शिव काल भैरव स्वरूप भी विराजते हैं। भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्‍थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।बाबा कालभैरव भगवान सदाशिव के स्वरूप हैं। वे कलियुग की बाधाओं का शीघ्र निवारण करने वाले देवता माने जाते हैं। खासतौर से प्रेत व तांत्रिक बाधा के दोष उनके पूजन से दूर हो जाते हैं। संतान की दीर्घायु हो या गृहस्वामी का स्वास्थ्य, भगवान भैरव स्मरण और पूजन मात्र से उनके कष्टों को दूर कर देते हैं। भगवान भैरव के पूजन से राहु-केतु शांत हो जाते हैं। उनके पूजन में भैरव अष्टक और भैरव कवच का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे शीघ्र फल मिलता है। साथ ही तांत्रिक व प्रेत बाधा का संकट टल जाता है। 

       जहां उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर में सरकार द्वारा कॉरिडोर बनाकर दर्शन पूजन के सुलभ अवसर रुपया 250/- में उपलब्ध है, वही काल भैरव में रुपया 500/- देकर सुलभ दर्शन का विधान है,परंतु प्रत्यक्ष अनुभव से यह राशि भी बड़ी दिखती है तथा यहां सुलभ दर्शन का कोई विशेष सुविधा भी नहीं दी जाती यात्री है। ना तो सरकारी पुलिस और ना ही मंदिर के वॉलेंटियर जनता को वांछित सहयोग दे पाते हैं। 500 रूपये की भारी भरकम सुलभ शुल्क देने के बावजूद कई-कई घंटे लाइन में लगकर श्रद्धालु अपने आराध्य का दर्शन किसी प्रकार कर पाते हैं, जबकि महाकाल मन्दिर में कम समय में सुलभ और सुगम दर्शन व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो जाता है।


2.काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश): -

वाराणसी में स्थित काल भैरव मंदिर शहर के सबसे प्राचीन और पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है, जो भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। मान्यता है कि काल भैरव की अनुमति के बिना कोई भी काशी में प्रवेश नहीं कर सकता है।इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले भक्त काल भैरव के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं और काशी के कोतवाल से अनुमति लेते हैं। काशी के कोतवाल / संरक्षक के रूप में विख्यात काल भैरव को शहर का रक्षक माना जाता है। इन्हें 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद बाबा काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है, अन्यथा यात्रा अधूरी मानी जाती है। ये काशी विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 


3. बटुक भैरव मंदिर, नई दिल्ली:-

 विनय मार्ग (चाणक्यपुरी) पर स्थित यह मंदिर पांडवकालीन माना जाता है। इसे 'पांडव कालीन बटुक भैरव मंदिर' भी कहते हैं । बाबा बटुक भैरव की मूर्ति यहां पर विशेष प्रकार से एक कुएं के ऊपर विराजित है। यह प्रतिमा पांडव भीमसेन ने काशी से लाए थे। यहाँ विशेष रूप से तेल और मीठी रोटी चढ़ाई जाती है। 

4.बटुक भैरव मंदिर, पांडव किला  दिल्ली-

बटुक भैरव मंदिर पांडव किला  दिल्ली में बाबा भैरव बटुक का मंदिर प्रसिद्ध है। इस मंदिर की स्थापना पांडव भीमसेन के द्वारा की गई थी। वास्तव में पांडव भीमसेन द्वारा लाए गए भैरव दिल्ली से बाहर ही विराज गए तो पांडव बड़े चिंतित हुए। उनकी चिंता देखकर बटुक भैरव ने उन्हें अपनी दो जटाएं दे दीं और उसे नीचे रख कर दूसरी भैरव मूर्ति उस पर स्थापित करने का निर्देश दिया।


5. घोड़ाखाल बटुक भैरव मंदिर, नैनीताल (उत्तराखंड): -

यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ भैरव बाबा को 'गोलू देवता' के रूप में भी पूजा जाता है। यहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर चिट्ठी लिखकर चढ़ाते हैं।भवाली से महज पांच किमी की दूरी पर स्थित सैनिक स्कूल के पीछे चाेटी पर बने इस मंदिर में हजारों घंटियां हैं। यहां नैसर्गिक सौंदर्य हर किसी को मुग्ध कर देता है।गोलू देवता को स्थानीय संस्कृति में सबसे बड़े और त्वरित न्याय के देवता के तौर पर पूजा जाता है। इन्हें राजवंशी देवता के तौर पर पुकारा जाता है। गोलू देवता को उत्तराखंड में कई नामों से पुकारा जाता है। इनमें से एक नाम गौर भैरव भी है। गोलू देवता को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है।


6.आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार :- 

आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार में स्थित है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। धार्मिक मान्यता है कि आनंद भैरव मंदिर हरिद्वार के कोतवाल हैं। यहां श्रद्धालु अपनी परेशानियां बताते हैं और भगवान आनंद भैरव अपने भक्तों की सभीबाधाओं को दूर करते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर अनादि काल से हैं। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू का है। आनंद भैरव, भगवान शिव का सबसे आनंदमयी रूप है।


7.बाजनामठ भैरव मंदिर, जबलपुर :-

मध्यप्रदेश के जबलपुर में बाजना मठ मंदिर के पास महाकाल भैरव का मंदिर है। यहां पर होने वाले हवन की अग्नि में कई देवी-देवताओं की आकृति दिखती है। यह मंदिर तंत्र साधना के लिए भी जाना जाता है। बताया जाता है कि रानी दुर्गावती द्वारा गोंडवाना काल के दौरान मंदिर में प्रतिमा की स्थापना की गई थी। इस मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर परिसर में महाकाल भैरव के हवन के समय जिस भी देवता के नाम की यज्ञकुंड में आहुति दी जाती है, अग्नि में उस देवता की आकृति उबरती है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर 24 घंटे में महाकाल भैरव 52 बार रूप बदलते हैं।


8. राजा बटुक भैरव लखनऊ:-

लखनऊ के कैसरबाग में राजा बटुक भैरव मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और इनको सुरों का राजा भी कहा जाता है। बताया जाता है कि यहां पर मांगने वाली मन्नत भी संगीत, साधना और कला से जुड़ी होती है। बटुक बाबा भगवान शिव के 5वें अवतार माने जाते हैं और यह मंदिर कला साधना का वर्षों पुराना केंद्र है।


लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। पता: मकान नम्बर 2785 वार्ड नंबर 8,आनन्दनगर कटरा, बस्ती Pin–272001.वॉट्सप नं.+91 9412300183.)



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