Thursday, April 23, 2026

अयोध्या के पौराणिक चंद्रहरि मन्दिर की महत्ता और उस पर आसन्न खतरा ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

श्रीहरि विष्णु ने राक्षस संस्कृति के विनाश के लिए अयोध्या में राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। यह अवातर त्रेता युग में हुआ था। इसके पहले भी श्री हरि के अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा 84 कोस में लेने से जुड़े होने के संकेत मिलते हैं।अयोध्या में प्राचीन काल में हरि अर्थात भगवान विष्णु के 16 अति प्रसिद्ध मंदिर थे। कालांतर में अयोध्या में चक्रहरि चंद्रहरि धर्महरि विष्णुहरि ,गुप्तहरि, पुण्यहरि और बिल्लहरि आदि केवल सात हरि स्थान ही बचे हैं। इन स्थानों में कइयों की स्थिति वर्तमान में अत्यंत दयनीय हो चुकी है।


श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इन श्लोकों में श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं - 

सत्यायां सप्तहरयो वर्तन्ते पुण्यवर्धनाः । गुप्तहरिश्चक्रहरिस्तथा  विष्णुहरिः प्रिये ॥

धर्महरिर्बिल्वहरिस्तथा पुण्यहरिः शुभः ।  

एतेषां दर्शनाद् देवि पुण्यवृद्धिः प्रजायते।।

हे प्रिये! सत्या अर्थात् अयोध्या पुरी में सात 'हरि' हैं। इन सातों के दर्शन से पुण्य बढ़ता है। उनके नाम क्रमशः चन्द्रहरि, चक्रहरि, गुप्तहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि हैं। हे देवि! इनके दर्शनों से पुण्य की वृद्धि होती है ।

चन्द्र हरि की महत्ता भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी मां पार्वती से इस प्रकार कहते हैं - 

तस्माच्चन्द्रहरेः पूजा कर्तव्या च विचक्षणैः  

द्विजपूजा चन्द्रपूजा हरिपूजा विधानतः ॥ 

तीर्थ सेवी विद्वानों को चन्द्रहरि की पूजा करनी चाहिये, साथ ही ब्राह्मण, चन्द्रदेव तथा भगवान् श्रीहरि की भी विधान पूर्वक पूजा करनी चाहिये ।

वासुदेवप्रसादेन तत्स्थानं जातमद्भुतम् ।

तद्धि गुह्यतमं स्थानं वासुदेवस्य सुव्रते ॥ 

हे सुन्दर व्रत को धारण करनेवाली पार्वती! महाविष्णु के प्रसाद से वह चन्द्रहरि नामक तीर्थ अद्भुत महिमा वाला हो गया। महा विष्णु का वह तीर्थ अति गुप्त है ।

सर्वेषामेव  भूतानां  हेतु र्मोक्षस्य    सर्वदा ।

तस्मिन् सिद्धाः सदा विप्रा गोविन्दव्रतमास्थिताः ।

यह चन्द्रहरि नामक तीर्थ सम्पूर्ण जीवों को मोक्ष देनेवाला है। इस तीर्थ में निरन्तर विष्णु व्रत का अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं ।

नानालिङ्गधरा नित्यं विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः । 

अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।

विष्णु लोक की प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले जीवन्मुक्त जन इन्द्रियों को जीतकर तथा अनेक प्रकार के शरीरादि धारण कर यहाँ परम योग का अभ्यास करते हैं ।

यथा धर्ममिहाप्नोति न तथान्यत्र कुत्रचित् । 

दानं व्रतं तथा होमः सर्वमक्षयतां व्रजेत् ॥ 

जितना धार्मिक अनुष्ठानों का फल इसतीर्थ में मिलता है,उतना अधिक फल अन्यकहीं, किसी भी तीर्थ में नहीं मिलता। यहाँ पर किया गया दान, व्रत एवं होमादि सत्कर्म- ये सब कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होते हैं।

सर्वकर्मफलावाप्तिर्जायते प्राणिनां सदा।

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं दानं च विविधं तु वै ॥ 

यहाँ सदा समस्त जीवों को उनके समस्त कर्मों के फल की प्राप्ति होती है। इसलिये सकाम तीर्थ सेवी को इस तीर्थ में अनेक प्रकार के दानों को अवश्य करना चाहिये।

अन्नदानं भूमिदानं गजदानं गवां तथा।

अश्वदानं रथानां च शिविकायास्तथैव च ॥ 

इस तीर्थ में अन्नदान, भूमिदान, गज दान, गोदान, अश्वदान, रथदान तथा पालकी दानादि यथाशक्ति करना चाहिये ।

दानादिकं विप्रपूजा दम्पत्योश्च विशेषतः । 

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पंचदश्यां विशेषतः । 

तस्य साम्वत्सरी यात्रा देवैश्चन्द्रहरेः स्मृता ॥ 

ये दानादि सत्कार्य ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि में सर्वोत्तम हैं और यहाँ पर सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करके दिया गया दान विशेष फलप्रद है। ज्येष्ठ मास की पूर्णमासी को उन चन्द्रहरि जी की वार्षिकी तीर्थ यात्रा देवताओं के द्वारा समर्थित है ।

श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्यामाहात्म्य के चतुर्थ अध्याय के इसकी महत्ता इस प्रकार की गई है - 

स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चन्द्रहरिं विभुम् 

वपनं तत्र कुर्वीत धर्मी तत्र विचक्षणः ॥ 

स्वर्गद्वार में तीर्थ व्रतधारी विद्वान् पुरुष स्नान करके और विभु चन्द्रहरि जी का दर्शन करके सर्वप्रथम वहीं मुण्डन कराये।

अयोध्यानिलयं विष्णुं ज्ञात्वाशीतांशुरुत्सुकः

आगच्छत् तीर्थमाहात्म्यंसाक्षात्कर्तुं सुधानिधिः ।

आगत्य चात्र चन्द्रोऽथ तीर्थयात्रां चकार सः।

अयोध्या में महाविष्णु श्रीरामचन्द्र जी सदैव निवास करते हैं, इस बात को जानकर चन्द्र देव दर्शन के लिये अति उत्कण्ठित हुए। उन सुधा निधि चन्द्र देव ने तीर्थ-महिमा जानने के अनन्तर उसका प्रत्यक्ष करनेके लिये इस अयोध्या में आकर तीर्थ यात्रा की।

क्रमेण विधिपूर्वेण नानाश्चर्यसमन्वितः । 

समाराध्य ततो विष्णुं तपसा दुश्चरेण वै ॥ 

चन्द्रमा ने अनेक प्रकार की आश्चर्यमयी घटनाओं को देखकर विधि पूर्वक क्रम से यात्रा करके अति कठिन तपश्चर्या के द्वारा महाविष्णु की आराधना की।

तत्प्रत्यक्षं समासाद्य स्वाभिधानपुरस्सरम् ।

हरिं संस्थापयामास तेन चन्द्रहरिः स्मृतः ॥ 

महाविष्णु के सामने उपस्थित होने पर चन्द्रमा ने यही वर माँगा कि आप यहाँ सदैव निवास करें तथा मेरे नाम से पीछे आपका नाम रहे, अर्थात् चन्द्र हरि नाम से आपकी प्रसिद्धि हो। इस प्रकार चन्द्र देवने अपने नाम को पूर्व में रखकर चन्द्र हरि जी की स्थापना की, अतः यह तीर्थ चन्द्र हरि नाम से विख्यात है ।

     यह माना जाता है कि ये सप्त हरि स्थानों का अस्तित्व और प्रमाण अयोध्या में लगभग 12वी शताब्दी से पूर्व से रहा है । इनमे चंद्र हरि मंदिर को 16 हरियों में चौथा स्थान प्राप्त है


चंद्रहरि मन्दिर की अवस्थिति:-

अयोध्या तीर्थ के स्वर्गद्वार की महानता को जानकर, चंद्रदेव ने वहाँ तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की सोची थी। चंद्रदेव ने भगवान विष्णु की एक प्रतिमा स्थापित कर उसकी पूजा की थी। यह प्रतिमा चंद्रहरि के नाम से प्रसिद्ध हुई। चंद्रहरि का प्राचीन मंदिर अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ले में राम की पैडी के पास स्थित सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर परिसर में भी कुल 5 मंदिर हैं। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में चंद्रहरि भगवान विराजमान हैं, जबकि उसके दाहिने ओर मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, बाईं ओर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर है।


द्वादश ज्योतिर्लिंग :- 

द्वादश ज्योतिर्लिंग एक विशाल अर्घ्य के ऊपर है और वह भी मूर्ति में साक्षात ओमकार का दर्शन कराता है। चंद्र जी मंदिर का पावन वैभव अति विशिष्ट है। यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही मंदिर के परिसर में स्थित मुख्य गर्भगृह में विराजमान काले कसौटी के एक ही पत्थर में 11 मूर्तियां मौजूद हैं, जो अति महत्वपूर्ण मानी जाती हैं l माना जाता है इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और नित्य दर्शन से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस स्थान पर यह मंदिर भगवान चन्द्रमा द्वारा स्थापित किया गया था। सैकड़ों वर्षों पूर्व इस मंदिर को महाराज विक्रमादित्य द्वारा पुनः जीर्णोद्धार किया गया। तब से लेकर आज भी यह मंदिर स्थापित है।

मान्यता है कि चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने चंद्रमा को आशीर्वाद दिया कि वे जहां विराजे, वहीं चंद्रहरि मंदिर होगा।मंदिर के गर्भगृह में एक काले कसौटी के पत्थर में ही भगवान राम गरुड़ पर विराजमान हैं. जिनके साथ किशोरीजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, नल, नील अंगद, जामवंत, हनुमान और गरुण विराजमान हैं। चंद्रमा द्वारा पूजित हरि अर्थात नारायण ही चंद्र जी महादेव हैं। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन एवं धार्मिक महत्व रखता है।

         मंदिर के ठीक सामने यहां वर्तमान में राम की पैड़ी बनी हुई है, वहां सरयू की धारा प्रवाहित होती थी और त्रेता युग में यहां चंदन वन हुआ करता था। चंद्रमा द्वारा उपासना के बाद इसी वन में नारायण जी ने चंद्रमा को दर्शन दिया था।  वैसे तो अयोध्या का कण-कण सिद्धि की खान है, लेकिन स्वर्गद्वार तीर्थ अत्यंत महत्व का है और उसमें भी चंद्रहरि में हरि और हर दोनों के दर्शन होते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन:-

इस मंदिर में भगवान चंद्र्हरेश्वर के साथ बारह ज्योतिर्लिंग स्थापित है। चंद्र्हरी का मतलब होता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु की परम शक्ति वहां पर उपस्थित है और द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना भी किया गया है। पृथ्वी पर विद्यमान बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए कई स्थानों पर जाते है और उस स्थान के पुण्य प्राप्ति के लिए वह सिर्फ अयोध्या के इस चन्द्र हरि में दर्शन करने से प्राप्त होता है । जो व्यक्ति जो कमाना लेकर आता है उसे उस प्रकार की फल की प्राप्ति होती है।

गोदांबा महोत्सव:-

इस मंदिर की परंपरानुसार प्रत्येक वर्ष के एक माह तक धनुर्मास महोत्सव का आयोजन होता है। जिसे श्री गोदाम्बा पर्व कहा जाता है। मंदिर का वार्षिकोत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसमें एक महीने तक प्रतिदिन खीर और खिचड़ी से भगवान की सेवा की जाती है। इसका प्रसाद सैकड़ों लोगों में वितरित किया जाता है। 14 जनवरी को समापन के दिन भव्य भंडारा और संत सेवा होती है। मंदिर की परंपरा और पूजन पद्धति आगम है। मंदिर परिसर में गोदांबा जी का मंदिर भी निर्माणाधीन है. गोदांबा जी साक्षात लक्ष्मी जी ही हैं, जो भगवान रंगनाथ की पटरानी हैं और भगवान रंगनाथ अयोध्या के कुलदेवता हैं। इस नाते गोदांबा जी अयोध्या की कुलदेवी हुईं। मंदिर पर निरंतर पूजन स्त्रोत का पाठ आदि चलता रहता है।

उद्धार की प्रतीक्षा में खंडहर हो चुके प्राचीन धर्मस्थल का असलियत :-

प्राचीन काल से अयोध्या के चंद्रहरि मंदिर का बहुत महत्व रहा है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म्य में इस स्थान का उल्लेख किया गया है। आक्रांताओं की बलि चढ़ गए इन पौराणिक धरोहरों को उसके उद्धारकर्ता के रूप में भागीरथ जैसे राजा, राम जैसे उद्धारक भगवान , हनुमान और पराशुराम जैसे न्यायप्रिय शक्तिशाली धर्म धुरंधर शक्ति या कृष्ण जैसे कूटनीतिक भगवान या कल्की भगवान जैसे भविष्य के किसी परित्रानाय भगवान की प्रतीक्षा है।

मंदिर के प्राचीन कूप को हमेशा हमेशा के लिए ढककर बना दी गई मीनार नुमा मस्जिद :-

इस मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं था। इसके जल के स्नान से चर्म रोग ठीक होते हैं। स्कंध पुराण में स्थान के महत्व बताया है कि स्वर्ग द्वार में इस मंदिर में प्रवेश करने मात्र से जन्म जन्मान्तरो के पाप नष्ट हो जाते है। तथा लिखा है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु की परम शक्ति व गूढ़ स्थान है। मनुष्य भगवान विष्णु का व्रत धारण कर विष्णु लोक आकांक्षा रख कर जिस प्रकार का धर्म फल पाता है वैसा अन्य किसी स्थान पर नहीं प्राप्त होती है। इस मंदिर में स्थापित कुएं के जल से स्नान कर वस्त्र व आनाज दान करने से बड़ा फल मिलता है। मुगल काल में इस मंदिर की प्रतिष्ठा और महिमा के कारण लगने वाले मेले और जुटने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए इसके ऊपर लोहे का मोटा चद्दर रखकर उसे बंद किया गया है। इसी के तहत अयोध्या की चंद्रहरि कूप पर मीनार बना दी गई। इस मीनार के नीचे आज भी सीढ़ी मौजूद हैं। इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई जो आज खंडहर होकर समाप्त होने के कगार पर है l इस स्थान पर मस्जिद के अवशेष बचे हैं, जिसके नीचे प्राचीन चंद्रहरि कूप होने का दावा किया जा रहा है।  जिसका सरिया हिलाने पर कूप पर लगी लोहे के चद्दर से आवाज आती थी। अब यह खंडहर बन गया है। इसे आसपास के लोगों को कुछ साल पहले तक देखा गया और वर्तमान में मलबा गिरने से वह स्थान पट गया है। 

औरंगजेब का मंदिर तोड़ने का आदेश 

मुगल काल के 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने फरमान जारी कर मुल्तान, काशी अयोध्या, मथुरा के हिंदू मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का आदेश दिया था। यह फारसी भाषा में है। अयोध्या के इस महत्वपूर्ण स्थान को औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया। अयोध्या के इतिहास पर प्रामाणिक शोध करने वाले लेखक और अयोध्या के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल ने अपनी उसी पुस्तक “अयोध्या रिविजिटेड” के अध्याय आठ पृष्ठ संख्या 239 में इसकी पुष्टि की है।

अवध विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉक्टर देशराज उपाध्याय के अनुसार, अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम और ए. फ्यूरर, हालैंड के इतिहासकार हंस बेकर ने अपनी पुस्तकों में इसका जिक्र किया है। हंस बेकर सात साल तक आयोध्या आते जाते रहे और इस दौरान उन्होंने अयोध्या में रिसर्च कर इस स्थान का जिक्र अपनी किताब में किया है। इस मस्जिद के खंडहर में छिपे अवशेष इतिहास के पन्नों के साथ दबे पड़े हैं l ये स्थल सैकड़ों साल से वीरान होकर अब खंडहर बन चुके हैं l लंबे समय से पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए भी इस स्थल के अवशेष कौतूहल का विषय बने हुए हैं ।


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लेखक :- 

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

मोबाइल नंबर +919412300183


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