Friday, January 23, 2026

अयोध्या शाकद्वीपी राजाओं केपूर्वजों की जीवन यात्रा ✍️ आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी

वैसे अयोध्या के मुख्य राजवंश परिवार का इतिहास भगवान श्रीराम के पूर्वजों से जुड़ा माना जाता है। ऋषि कश्यप, सूर्य ,मनु, इच्छवाकु  ,रघु ,दशरथ और भगवान राम की वंश परम्परा को प्रायः हर कोई भारतवासी जनता है।

       अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं के पूर्वज मूल रूप से शाकद्वीप (ईरान/मध्य एशिया क्षेत्र) से आए थे, जो बाद में भारत के विभिन्न स्थानों में बस गए और अयोध्या में भी अपना राज्य स्थापित किए; इनके वंशज, जैसे कि राजा मान सिंह और राजा प्रताप नारायण सिंह ददुआ साहब गर्ग गोत्र के थे और उन्हें मुग़ल तथा ब्रिटिश शासकों से सम्मान व जागीरें मिलीं थीं, जिससे वे अयोध्या के महत्वपूर्ण शासक बने। और इनके पूर्वज राजा धृष्टकेतु से जुड़े बताए जाते हैं। 

      लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन की अनुमति से शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार भी यहां के राजा महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राजपरिवार का मूल स्रोत बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर - गोरखपुर, नन्दनगर - अमोढा -बस्ती, पलिया माफी - शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्याधाम से जुड़ा हुआ है। मुगलकाल , नवाबीकाल और ब्रिटिश शासन के दौरान यह राज परिवार अयोध्या के सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यों में हमेशा अग्रणी रहा। स्वतंत्रता के बाद जब रियासतें खत्म हुईं, तब भी यह परिवार सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए रखा है।

पूर्वज बिलासू गांव के निवासी :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण (मग ब्राह्मण) द्वापर युग में शाकद्वीप से भारत आए और उन्हें 18 'पुरों' (ग्रामों) में बसे थे। इनमें से एक बिनसैयापुर (बिलासू) था। यह गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील का क्षेत्र है। जो गाजीपुर शहर के करीब ही स्थित है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे चेदि वंश के राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में ब्राह्मणों को दिए हुए थे। राजा धृष्टकेतु महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाकद्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है। इसी कारण अयोध्या के शाक वंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।

सदासुख पाठक प्रथम चौधरी:- 

19 वीं शताब्दी की शुरुआत में एक श्री सदासुख पाठक को दिल्ली के बादशाह द्वारा मझवारी के चौधरी के रूप में नियुक्त किया गया था। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी प्रदान किये थे और उनको चौधरी की उपाधि देकर सम्मानित किया था।  दिल्ली सल्तनत' के द्वारा 'चौधरी' ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों , नवाबों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी" संस्कृत के 'चतुर्धारी' (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह उपाधि किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती रही है।

     शाकद्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

     मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक  गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालक को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे और यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।

नरहरपुर गोरखपुर भी पड़ाव :- 

महाराज मानसिंह के प्रपितामह संभवतः सदासुख पाठक अपना देश छोड़ कर गोरखपुर के जिले में बिडहल के पास नरहर गाँव में जाकर बस गए थे। यह ऐतिहासिक केंद्र,तहसील गोला गोरखपुर उ० प्र० के ग्राम पंचायत बरहज के राजस्व ग्राम नरहन मुस्तक़िल एवं चडीहार में  26°19' उत्तरी अक्षांश एवं 83°24' पूर्वी देशान्तर पर घाघरा नदी के बाएं तट पर स्थिति है। नरहर घाघरा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण  कालीन पुरातत्व स्थल है, जहाँ खुदाई में पांच स्तरीय संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल मुख्य रूप से कृषि-आधारित प्रारंभिक जीवन, विशिष्ट काले-लाल मिट्टी के बर्तनों और तांबे की वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है, जो दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में फला-फूला।उत्खनन से पाँच क्रमिक संस्कृतियों का पता चला है, जो लगभग 1300-1200 ईसा पूर्व (Period I) से लेकर 6ठी-7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक का प्रतिनिधित्व करती हैं । 1984-89 के बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग के प्रो० पुरुषोत्तम सिंह जी द्वारा नरहन में उत्खनन कराया गया था।उत्खनन में ताम्र पाषाणकाल 1300 ई० पु० से गुप्त काल तक की 5 संस्कृतिक कालो की जानकारी मिली है :-

1. नरहन संस्कृति (कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति) 

2. कृष्ण लोहित मृदभांड

3. उत्तरी काली चमकीली मृदभांड संस्कृति

4. शुंग-कुषाण कालीन संस्कृति

5. गुप्त कालीन संस्कृति

नरहन पुरातत्व में दो टीले थे जिसमें प्रथम टीले का दो तिहाई भाग घाघरा नदी ने बहा दिया था तथा एक तिहाई भाग में वर्तमान गांव है। इसका जमाव लगभग 1.6 मीटर है यह 1.6 मीटर जमाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अन्य कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति का औसत जमाव केवल 30-50 सेमी मोटा है। नरहर एक प्राकृतिक छटा वाला गांव है और यहां एक नदी की घाटी और पुराना किला भी है । यह हिंदू गांव है और इसके निवासी बहुत ईमानदार और शक्तिशाली होते रहे हैं। 2011 ई .में यहां की आबादी 1560 थी। यह 72.52 हेक्टेयर में फैला है।

नन्दनगर आमोढा बस्ती भी पड़ाव:- 

शाकद्वीपीय  राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। जब बंगाल के नवाब मीरकासिम अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर लाया तो उसने उक्त ब्राह्मण प्रमुख को उनके जमींदारी को हटा दिया गया । संभवतः यह सदासुख पाठक  रहा होगा। सदासुख पाठक अपने पुत्र गोपाल राम के साथ बस्ती जिले के आमोढा की नंदनगर पोस्ट बलरामपुर में बस गए। नन्दनगर चौरी बाजार मसकनवा रोड पर स्थित है। यह मखौड़ा धाम से पश्चिम छपिया गोंडा की सीमा पर का गांव है।वर्तमान समय में यह बस्ती जिले केपरशुराम पुर ब्लाक में बस्ती से 55 किमी तथा परशुराम पुर से 8 किमी की पश्चिम दूरी पर नन्द नगर गांव स्थित है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।

अयोध्या का पलिया गाँव मुख्य केंद्र :- 

सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे।

'ओरी' को ' बख्तावर सिंह' ‘राजा' की पदवी, और पलिया- मेंहदौना की जागीर :- 

अयोध्या राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के'शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के एक वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक  की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और सौ सवारों का अफसर बनाया था। वर्तमान में इसे राजा का पलिया भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलियामाफी है जो तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में है। पास ही में शाहगंज बाजार है और महादौना के राजाओं द्वारा यहां विशाल हवेली जीर्ण - शीर्ण अवस्था में आज भी देखा जा सकता है।

यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

      पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है. यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 - 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है।2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

शाहगंज राजवंश का कोट और महल 

अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में 'राजा का किला' या 'राजा की हवेली' स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। यह खासकर राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह हैरिंग्टनगंज   विकास खंड में पड़ता है।  जो खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

        यह कोई बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है , इस वंश की स्थापना राजा दर्शन पाठक जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज हवेली जोकि 70 बीघे में दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।

शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं :- 

अयोध्या जिले के ग्राम्य अंचल में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

मेहदौना खास एक रियासत थी:- 

यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्की पुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है ।

मेहदौना गांव:- 

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या  के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण केन्द्र है। यह जिला मुख्यालय से 32 किमी पश्चिम में अवस्थित है ।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Thursday, January 22, 2026

प्राचीन शाहाबाद (आधुनिक बक्सर)का युद्ध और शाकद्वीपीय मझवारी रियासत ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


तत्कालीन परिस्थितियां :- 

तत्कालीन मुर्शिदाबाद के हाकिम नवाब क़ासिम अलीखाँ (1760- 64) ने मालगुज़ारी की वसूली के नियम अधिक कठोर बना दिए थे और राज्य की आय लगभग दूनी कर दी थी । उसने अपनी फ़ौज को का भी संगठन कियाऔर कलकत्ता के अनुचित हस्तक्षेप से अपने को दूर रखने के लिए राजधानी मुर्शिदाबाद से उठाकर मुंगेर ले गया। अंग्रेज़ी फ़ौज जब उसकी राजधानी मुंगेर के निकट पहुँची तो कासिम अली खां पटना भाग गया। वहाँ उसने समस्त अंग्रेज़ बन्दियों को मार डाला तथा जगत सेठ जैसे उसके जो भी पूर्व विरोधी हाथ पड़े, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। बाद में वह अवध भाग गया और वहाँ उसने नवाब शुजाउद्दौला तथा भगोड़े बादशाह शाहआलम द्वितीय (1760-1806 ) से कम्पनी के विरुद्ध गठबन्धन कर लिया। 

कथकौली मैदान पर भयंकर युद्ध :- 

बक्सर के कथकौली मैदान में 1764 में हुआ यह युद्ध बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि इस युद्ध ने भारतीय भूगोल को बदल दिया।इस हार के बाद भारतीय राजाओं को भी समझ आ गया था, कि एकता में कितनी शक्ति है। इसके बाद अवध के नवाब शुजा- उद- दौला, बंगाल के नवाब मीर कासिम तथा मुगल सम्राट शाहआलम ने अंग्रेजी हुकूमत को हराने के लिए हाथ मिला लिया था। मुगल तोपें, अवध की अश्व शक्ति और बंगाल सेना मिल गईं। तीनों राज्यों को मिलाकर 40 हजार सैनिक, 140 तोपें, 1600 हाथी और घोड़ों की शक्ति एकजुट हुई थी। दूसरी तरफ लार्ड क्लाइव का सबसे तेज तर्रार सेना नायक मेजर हेक्टर मुनरो इन भारतीय राजाओ को रोकने के लिए 7 हजार 720 सेना और 30 तोपों के साथ तेजी से बढ़ते हुए बिहार में बक्सर जिले के कथकौली मैदान पहुंच गये थे।      

      इधर तीनों राजाओ की सेना मुगल सेनापति मिर्जा नजीब खां बलूच के नेतृत्व में बक्सर पहुंच गईं और 22 अक्टूबर 1764 के दिन कथकौली के मैदान में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज़ों ने  तीनों को हरा दिया। अंग्रेजी हुकूमत का अब कोई विरोध करने वाला नहीं रहा। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बक्सर के कथकौली में मिली हार के बाद हिंदुस्तान ने गुलामी की तरफ कदम बढ़ा दिए थे। 

     भारतीय नवाब शुजाउद्दौला जान बचाकर रूहेलखण्ड भाग गया। बादशाह शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में आ गया और मीर क़ासिम दर-दर की ख़ाक़ छानता हुआ कई साल तक भारी मुफ़लिसी में 8 मई, 1777 ई. को दिल्ली में मर गया था। 

     नवाब क़ासिम अली खाँ ने शाहाबाद (आधुनिक बक्सर) के आस पास का क्षेत्र के ज़िले को अपने शासन में कर लिया था। 1760-1764 के दौरान दिल्ली पर मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का प्रतीक रूप में शासन था। 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद मराठों और अफगानों का प्रभाव बढ़ गया था। उधर ईस्ट इंडिया कंपनी भी अपनी शक्ति बढ़ा रही थी। 

मझवारी की शाकद्वीपी रियासत भी खत्म हो चुकी थी :- 

क़ासिम अलीखाँ के अत्याचार से मझवारी (सिमरी बक्सर) बिहार की ज़िमीदारी नष्ट हो गई थी। मझवारी रियासत बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जमींदारी थी, जिसका इतिहास मुगल काल से शुरू होकर ब्रिटिश काल तक फैला था । यह शाकद्वीपीय भूमिहार ब्राह्मण परिवारों द्वारा शासित थी, जो क्षेत्र में सामंती प्रभुत्व रखते थे। यहां के शासक, मुख्य रूप से भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से थे। उन्होंने अपनी जागीर में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था बनाए रखी थी वे स्थानीय स्तर पर शक्ति के केंद्र बने हुए थे।

     वर्तमान समय में यह गांव बक्सर जिले के सिमरी ब्लॉक में आता है। 2011ई. में यहां कुल 643 परिवार रह रहे थे और इनकी जनसंख्या 3,880 थी। यहां वर्तमान समय में विशाल पशु मेला भी लगता है। इस क्षेत्र में औरंगाबाद का देवगांव या तरारी सूर्य मंदिर सूर्य भगवान का प्रसिद्ध मंदिर है जो चौदहवी शताब्दी या उससे पूर्व का बताया जाता है। इस सूर्य मंदिर से शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण परम्परा की पुष्टि होती है।

बिनसैया /बिलासी गाँव का पण्डित दिल्ली दरबार में पहुंचा :- 

बिनसैया (बिलासू गाँव) गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील के आस-पास के क्षेत्र हैं। यह गाजीपुर शहर के करीब हैं और तहसील जमनिया के अंतर्गत आता है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में मिला हुआ है । राजा धृष्टकेतु चेदि वंश के एक प्रमुख राजा थे, जो महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाक द्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला आता है। इसी कारण महाराजा साहेब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा है।

मधुसूदन /टिकमन पाठक को मझवारी  गाँव के साथ 99 गाँव की भी जमींदारी वापस मिली :- 

बिलासी गाँव के कोई बड़े प्रसिद्ध पण्डित दिल्ली दरबार पहुंचा था।  तत्कालीन भारत के बादशाह अकबर द्वितीय ने उनको मझवारी गाँव की जिमींदारी वापस सौंप दी थी । (कोई सन्दर्भ औरंगजेब का उल्लेख करता है जो सत्य प्रतीत नहीं होता है)। बादशाह ने यह गाँव  अकबर द्वितीय बादशाह के समय तक उनके पास रहा। अकबर के मरने पर मझवारी के पुराने जिमीदारों ने डाका डाल नर संहार कर मझवारी के सारे पाठकों को मार डाला था। 

दूलापूर में शरण :- 

मझवारी नर संहार में केवल एक ब्राह्मणी गर्भिणी स्त्री भाग कर एक चमार के घर में जा छिपी थी । एक नेक दिल चमार जाति का इंसान उसे दूलापूर के रियासत में ले गया। दोनों महिलाओं का मायका एक ही जगह होने के कारण उसने इस ब्राह्मणी की रक्षा की थी।

    दूलापुर गाजीपुर जिले का एक प्रसिद्ध कस्बा और रेलवे स्टेशन है,और यह जखनियां तहसील के अंतर्गत आता है।यह अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है; यह क्षेत्र कभी गाजीपुर रियासत का हिस्सा था, जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है और गंगा नदी के किनारे बसा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जिसे अपनी 'गुलाब जल' और ऐतिहासिक स्थलों (जैसे लॉर्ड कॉर्नवालिस का मकबरा) के लिए भी पहचान मिली है। 

मधुसूदन और टिकमन पाठक का ननिहाल में जन्म :- 

दूलापूर के जमींदार की स्त्री का मायका उसी गाँव में था जहाँ की वह मझवारी की ब्राह्मणी का मायका था । इस कारण जमींदार की पत्नी संकट की घड़ी में अपने  मायके दूलापुर के जमीदारनी के सहयोग से पहुँचा दी गई थी। मायके में ब्राह्मणी के जोड़िया लड़के पैदा हुये। एक का नाम मधुसूदन पाठक और दूसरे का टिकमन पाठक रखा गया था। जब दोनों भाई सयाने हुये तो अपनी पुरानी जमींदारी लेने की उनको चिन्ता हुई और दूलापूर आये। दूलापूर के जमींदार ने उनसे सारा ब्यौरा कहा और रात को उन्हें मझवारी ले जाकर उनका पुराना सारा गाँव दिखाया। यहाँ उनको वह चमार भी मिला जिसके घर में उनकी माता ने शरण ली थी। तब दोनों भाई दिल्ली पहुंचे और बादशाह से अपनी फरयाद की। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी दिये और उनको चौधरी की उपाधि देकर उनके देश को लौटा दिया। दिल्ली सल्तनत' के द्वारा 'चौधरी' ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी" संस्कृत के 'चतुर्धारी' (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती थी।

       शाक द्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Monday, January 19, 2026

मगध के शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था
भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर
राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था।
      बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया। 
राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का भी इलाज :- 
उन ब्राह्मणों को द्वारका में ज्यादा समय व्यतीत करना अच्छा न लगा और गरुड़ पर सवार हो कर शाकद्वीप की ओर जा रहे थे। जब वे मगध-देश के ऊपर पहुंचे तो वहाँ रोना-पीटना सुनाई पड़ा। ब्राह्मण लोग बड़े व्यग्र थे। उनके पूछने पर गरुड़ ने कहा कि मगध-देश के राजा धृष्टकेतु को कोढ़ हो गया है इसी कारण उसने मरने की ठान ली है और चिता के लिये लकड़ियों का ढेर लगा है। राजा बड़ा धर्मात्मा है और उसके राज में सब सुखी हैं। इसी से उसकी सब प्रजा उसके लिये रो रही है। ब्राह्मणों को दया आई और उन्होंने गरुड़ से कहा कि 'क्या इस देश में ऐसा तपस्वी नहीं है जो राजा को इस रोग से मुक्त करे? गरुड़ ने उत्तर दिया यहाँ ऐसा कोई होता तो शाम्ब आप लोगों को क्यों बुलाते। ब्राह्मणों ने गरुड़ से कहा कि पृथ्वी पर उतरो। राजा उनके दर्शनों से कृतकृत्य हो गया। मिहरांशु ने उसे अपना चरणोदक पिलाया और राजा का कोढ़ अच्छा हो गया। 
राजा धृष्टकेतु ने मगध में शाक द्वीपियों को बसाया
जब ब्राह्मणों ने राजा धृतकेतु को निरोग करने के बाद गरुड़ से कहा कि हमें शाकद्वीप पहुँचा दो। तब गरुड़ ने कहा कि आप से प्रतिज्ञा करा चुका हूँ अब आप यहीं रहिये। कृतज्ञ राजा ने ब्राह्मणों को अपने देश में आदर से रक्खा और गङ्गा-तट पर कई गाँव दिये। ब्राह्मणों से चार अर्थात् श्रुतिकीर्ति, श्रुतायु, सुधर्म्मा, और सुमति ने सन्यास ले लिया और तपस्या करने को बदरिकाश्रम चले गये। शेष 14 मगध में रहे और वसु ने अपनी बेटियाँ उनको विवाह दी। उन्हीं की सन्तान आज-कल मगध देश में बसी है। मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय चिकित्सको के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया। 
त्रेता युग में राजा प्रतर्दन द्वारा शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार :- 
काशी के राजा प्रतर्दन त्रेतायुग में हुए थे। वे काशी के प्रसिद्ध राजा दिवोदास के पुत्र थे। इनके अन्य नाम 'द्युमान', 'शत्रुजित', 'वत्स', 'ऋतध्वज' और 'कुवलयाश्व' भी मिलते हैं।
उनके पिता दिवोदास ने काशी में शासन किया था और वे त्रेतायुग के अंतिम चरण या द्वापर युग के शुरुआती दौर से पूर्व का समय मानते हैं, क्योंकि वे राम के पूर्वज के समकालीन संदर्भों में एक शक्तिशाली क्षत्रिय शासक के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यंत तपस्वी और दूरदर्शी थे। उनके कठिन तप को देखकर सूर्य भगवान् स्वयं प्रसन्न हुए और उन्होंने सात ब्राह्मणों को आशीर्वाद दिया। उन ब्राह्मणों की संतानों ने पृथ्वी पर धर्म और न्याय का प्रचार किया।"
      समय के साथ शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार हुआ। मिहरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति और अन्य ब्राह्मणों की संतानों ने विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएँ बनाई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में धर्म और ज्ञान का प्रचार किया।
गोत्र और शाखाएं 
मिहरांशु, भारद्वाज, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग की सन्तान बढ़ी और प्रसिद्ध हुई। इसी कारण शाकद्वीपियों के छः घर बन गये और प्रत्येक घर के मूल-पुरुष का नाम गोत्र कहलाया। आज-कल शाकद्वीपियों के 72 घर गिने जाते हैं, अर्थात् उर के 24 आदित्य के 12, मण्डल के 12 और अर्क 7 घर या पुर अस्तित्व में आए। शेष इन्हीं की शाखायें हैं।
मिहरांशु की प्रतिष्ठित शाखा रही:- 
मिहरांशु की सन्तान ने बड़े - बड़े काम किये थे इसलिये उनकी शाखा अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। जो शाखा जिस गाँव में बसी उसी गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुई। 
मगध चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :- 
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं। शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था।
चेदि के राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का इलाज
चेदि राज्य का राजा और शिशुपाल का सबसे बड़ा पुत्र धृष्टकेतु है। धृष्ट का अर्थ है "साहसी," "प्रवंचित," या "साहसी" और केतु का अर्थ - "झंडा," "पट्टिका," या "प्रतीक" होता है । धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र हैं , जो अपनी मातृ पक्ष से यदु के वंशज दशार्ह वंश से संबंधित हैं। धृष्टकेतु यह नाम धृष्टद्युम्न के पुत्र सहित कई अन्य व्यक्तियों के साथ साझा करते हैं । वह एक महान धनुर्धर और महारथ थे । धृष्टकेतु को युधिष्ठिर की सेना के सात सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था। युद्ध के दौरान, धृष्टकेतु ने कई दुर्जेय योद्धाओं से युद्ध किया था। वह पांडवों का वफादारसहयोगी है और कुरुक्षेत्र युद्ध में एक प्रमुख भूमिका निभाता है , जहाँ उसने उनकी सेना के सात सेनापतियों में से एक के रूप में कार्य किया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किया और वृहदवाहन का वध किया। उस सहित उसके तीनों भाइयों - पुरूजीत, धृष्टकेतु और वृहद्क्षत्र का वध चौदहवें दिन के युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथों हुआ था। धृष्टकेतु ने अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग में 'विश्वदेव' का दर्जा प्राप्त किया था। 
     मगध चेदि नरेश जरासंघ के इस पूर्वज धृष्टकेतु को कुष्ठ हो गया था। जिनके उपचार के लिए शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में लाया तथा कुष्ठ से त्राण पाकर उपहार स्वरूप उन्हें अठारह पुर (ग्राम) दिये तथा प्रत्येक के चार चार पुत्र उत्पन्न हुआ और वे सब पृथक पृथक 72 पुरों (ग्रामों) में निवास करने लगे । 
मगध- चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया गया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उपशाखाएँ हैं- भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक= सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है। 
      पुराणों में उल्लेखित विवरण के पहले छठी पांचवी शताब्दी ई. पू. में शाकद्वीप से भारत आये उपयुक्त सभी साक्ष्यों से सवर्धा समर्थित हैं सूर्योपासक पुरोहितों को मग एवं भोजक इन दोनों श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पुराणों के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मग और भोजक एक थे अन्तर मात्र इतना था कि -
(1) सूर्य का जो ध्यान करे उसे मग कहा जाता है । मग म अक्षर की पूजा करते थे म= मंत्र ग = गुरू मंत्रों के गुरू मग मे सूर्य गायन्तीति मगा:
(2) भोजक- धूप, दीप, माला से पूजन एवं विभिन्न उपहारों से सूर्य को भोग लगाते हैं उन्हे भोजक कहा जाता है ।
धूपमाल्यैर्मतश्चापि उपहारैस्तथैव च ।
भोजयन्ति सहस्रांशुं तेन ते भोजका: स्मृता: 
      यह भी सम्भव है कि भोजक भारतीय परम्परा के पुरोहित रहे हों। दोनों ही सूर्य के सकल एवं निष्कल रूप से उपासक थे । 
शाकद्वीपीय पुर और गोत्र सारिणी 
कालान्तर में भारत के कई प्रान्तों के रजवाड़ों द्वारा पूजा पाठ , रोग निवारण के लिए अपने अपने राज्यों में ले गये, जिनमें 72 पुरों में से 16 पुर के लोग पश्चिम में गये जो वहां गोत्र (खाप) से जाने गये।जिसका विवरण निम् प्रकार से है।
पुर/ उपाधि/ गोत्र/ मूलस्थान- मण्डल
वेद/ उपवेद/ देवता
इस सूची में राजस्थान के अतिरिक्त भारत के शेष राज्यों में शाक द्वीपीय ब्राह्मण को उपरोक्त शीर्षक क्रम से प्रस्तुत किया गया है - 
1. उरवार मिश्र/पाठक भारद्वाज टेकारी/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
2 .मखापवार मिश्र/पाठक भारद्वाज मखपा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
3 .देवकुलियार मिश्र/पाठक भारद्वाज देवकुली/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
4 .पडरीयार मिश्र/पाठक भारद्वाज पड़री/विक्रम(पटना) यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
5 .अदइयार मिश्र/पाठक भारद्वाज कोंच/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
6 .पवइयार मिश्र/पाठक भारद्वाज पवई/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
7 .क्षत्रवार मिश्र/पाठक भारद्वाज बेलागंज/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
8. जम्मुवार मिश्र/पाठक भारद्वाज जमुआर/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
9 .भड़रियार मिश्र /भरद्वाज भड़रिया/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
10. खंटवार मिश्र/पाठक कौन्डिल्य बेलागंज/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
11 .केरियार मिश्र/पाठक कौन्डिल्य कुतेया/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
12. छेरियार मिश्र/पाठक कश्यप मखदुमपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
13 .कुरईचियार मिश्र /कश्यप कुराईच/रोहतास सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
14 .भलुनियार पण्डित/पाण्डेय कश्यप भलुनी/रोहतास सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
15. डुमरियार मिश्र/पाठक भृगु दुर्गावती/रोहतास ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
16. बाड़वार मिश्र/पाठक भृगु परैया/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
17. सरइयार मिश्र/पाठक पाराशर आमस/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
18 .योतियार मिश्र/पाठक पाराशर पवई/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
19. शिकरौरियार मिश्र/पाठक कौशिक सिकरौर/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
20 .मोलियार मिश्र कौशिक मलमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
21. ऐआर मिश्र/पाठक रहदोरी रखार/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
22. रहदौलीयार मिश्र/पाठक रहदोरी रहवार/भोजपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
23 .अवधियार पाठक/पाण्डेय कौशल्य अयोध्या/ जगुआर /गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
24. पुतियार मिश्र/पाठक वत्स ओडो/नवादा सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
25. उल्लार्क मिश्र/ भृगु उल्ला/परैया/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
26. लोलार्क मिश्र/पाठक भृगु देवकुली/ काशी ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
27 .बालार्क मिश्र/पाठक शाण्डिल्य देवकुली/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
28 .कोणार्क मिश्र/पाठक शांडिल्य मदनपुर/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
29 .पुण्डार्क उपाध्याय पुण्डार्क पुण्डारक/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
30 .चारणार्क मिश्र/पाठक पुण्डार्क पुण्डारक/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
31 .मार्कंडेय मिश्र/पाठक गर्ग देवकुली/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
32. देवडीहा मिश्र /भारद्वाज डीहा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
33. गुन्सइयाँ मिश्र /भरद्वाज गगाही/औरंगाबाद यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
34. महुरसिया मिश्र ,/कश्यप मोहारसदेव/आजमगढ़ सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
35. डूमरौरी मिश्र /कश्यप हसनपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
36. सपहा पाठक /कश्यप सपहा/आजमगढ़ सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
37. गुलसैया मिश्र /कौशिक छपरा/सिवान सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
38 .मल्लौर्क मिश्र /कौशिक मलमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
39. हरहसिया मिश्र /कौशिक हरिहौस/सारण सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
40. देवलसिया पाण्डेय /कौशिक देव/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
41. वरुणार्क मिश्र/पाठक कौन्डिल्य पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
42 .कुण्डार्क मिश्र /कौंडिल्य गोह/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
43 .विलसैया मिश्र/पाठक गर्ग वाजपेई/बिलासू गाजीपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
44 .श्वेतभद्र मिश्र /भारद्वाज श्वेतरामपुर/गाजीपुर यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
45 .पंचकंठी मिश्र /भरद्वाज इमामगंज/पंचमा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
46 .डूडरियार मिश्र /भरद्वाज खुडराही/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
47 .पठकौलियार पाठक /कश्यप पठखौली/गाजीपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
48 .पंचहाय मिश्र /कश्यप पंचाननपुर/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
49 .सियरी मिश्र/ कश्यप सियारी/गोरखपुर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
50 .कुकरौंधा मिश्र/ कश्यप कुकरौंधा/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
51 .मोरियार मिश्र /कश्यप गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
52. मिहिर/मिहीमगौरियार पाठक /मिहिर फुलवरिया/सारण सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
53 .वेरियार मिश्र /कौन्डिल्य बारा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
54 .मेहोशवार उपाध्याय /कौशिक मेहोंश/मुंगेर सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
55 .सौरियार मिश्र /कौशिक सोरंगपुर/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
56 .पुनरखिया मिश्र /सार्ववल्य पुनरख/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
57. देवहाय मिश्र/ अत्रि देव/औरंगाबाद सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
58 .शुंडार्क मिश्र/ भृगु ककरही/औरंगाबाद ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
59 .यत्थय मिश्र/ जमदग्नि कोच/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
60. ठकुर मेराँव मिश्र /अंगिरा पचना ठकुरी/भोजपुर ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
61 .डिहिक भट्ट /भारद्वाज डीहा/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
62 .भड़रियार मिश्र /भरद्वाज भड़रिया/गया यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र
63 .चंडरोह मिश्र /कश्यप चंदनपुर/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
64 .खजुरहा मिश्र /कश्यप खजुरी/गोह/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
65 .पट्टिश मिश्र /शाण्डिल्य पिसनरी/पटना सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
66 .काझ मिश्र /वैतायन खजनिकाम/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
67 .कपिश्य मिश्र /गर्ग कधुमा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
68 .परसन मिश्र /पराशर परसन/भोजपुर यजुर्वेद धनुर्वेद रुद्र/विष्णु
69 .खंडसूपक मिश्र /कौन्डिल्य खनेता/टेकारी/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
70 .बालिबाघ मिश्र /भृगु बधवा/गया ऋग्वेद गंधर्ववेद विष्णु
71 .पिपरोहा मिश्र /जमदग्नि पिपराहा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
72 .बड़सापी मिश्र /वशिष्ठ बरसा/गया सामवेद गंधर्ववेद विष्णु
     उक्त पुर सारिणी राजस्थान के इतर बिहार और अन्य राज्यों में प्रचलित हैl


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)