Saturday, March 29, 2025

डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" एक समर्पित कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21)

डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21 

डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 

आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 


जीवन परिचय:- 

डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' के शोध प्रबंध  "बस्ती के छंदकार" की पांडुलिपि के पृष्ठ 591पर मंजुल का  संदर्भ उपलब्ध है। डा. रामनरेश सिंह "मंजुल"का जन्म 15 दिसम्बर 1940 को बस्ती के गौर ब्लाक के ग्राम-सिद्धौर में हुआ था।उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। जिला मुख्यालय स्थित सक्सेरिया इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद गोरखपुर के सेंट एंड्यूज डिग्री कॉलेज से स्नातक किया। 

अध्यापन कार्य :- 

वर्ष 1961 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. उतीर्ण करने के बाद सहजनवां के कोलाराम मस्करा इंटर कॉलेज में प्रवक्ता बने। अध्यापन कार्य करते हुए ही हिन्दी से परास्नातक की शिक्षा पूरी की। एल.टी.करने के बाद पीएचडी की। अंग्रेजी प्रवक्ता के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया। सहजनवां में छह वर्ष अध्यापन के बाद वह गौर के कृषक इंटर कॉलेज में वर्ष 1967 में बतौर प्रवक्ता शिक्षण कार्य करने लगे थे । 1973 में नेशनल इंटर कालेज हर्रैया के प्रधानाचार्य बने। लगातार तीस वर्ष तक सेवा देने के बाद 30 जून 2003 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्य सृजन में उन्होंने पूर्णकालिक समय देना शुरू कर दिया। रुहेलखंड विश्व विद्यालय से पीएचडी करने के दौरान ही आधुनिक गीत सम्राट डॉ. शम्भूनाथ सिंह के सानिध्य में ही नवगीत लिखने की प्रेरणा मिली। 

       बहुमुखी प्रतिभा के धनी मंजुल की कृतियां हिंदी जगत में सराही जा रही है।  वे मंचों पर अपनी रचनाओं से श्रोताओं कमंत्र मुग्ध कर दिया करते थे। वे कहा करते हैं कि साहित्यकार एवं कवि ही समय-समय पर समाज को जगाने का कार्य करते हैं। मंजुल जी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन को अपना काव्यादर्श मानते थे।

संगठन में सक्रियता :- 

       प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश अध्यक्ष व संरक्षक के तौर पर हमेशा शिक्षकों के हित का मुद्दा उठाते रहे।  यह गीतो के साथ खड़ी बोली और व्रजभाषा में सवैया और धनाक्षरी छन्दों को लिखने और पढ़ने में बड़ी पटुता रखते हैं। रेडियो स्टेशन से इनकी कविताएँ प्राय: प्रसारित होती रहीं है। मंजरी मौलश्री अंक 10, मार्च 1979 में उनका एक गीत इस प्रकार प्रकाशित हुआ है - 

              याद तुम्हारी (गीत)

याद तुम्हारी ऐसी जैसे हिरन छलांग भरे, 

अथवा कोई रतन जौहरी कंचन काट धरे ।

याद तुम्हारी ऐसी जैसे सावन मेघ झरे, 

अथवा कोई राजहंसिनी मानस में विचरे ।।

बैठा कोई श्रान्त पथिक सा चंदन गाछ तरे, 

यक्ष सदृश आकुल अंतर से मेघ दूत उचरे।

साधों की वीना बज जाये तार-तार सिहरे,

वे मौसम की याद तुम्हारी पागल प्राणकरे।

प्रकाशित कृतियाँ :- 

'साहित्य का मर्म तथा धर्म' (निबंध संग्रह-2006),

'आदमी कितना अकेला' (काव्य संग्रह/गीत)।

सम्मान:- 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ की ओर से साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा गया है। आयोजित समारोह के दौरान मंजुल को ताम्र पत्र एवं दो लाख रुपये का चेक दिया गया। डा.रामनरेशन सिंह ‘मंजुल’ को 1997 में उत्तर प्रदेश राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।मंजुल को वर्ष 2006 में ललित निबंध व शोध निबन्धों की संग्रह की पुस्तक ‘साहित्य का मर्म व धर्म’ के लिए कई साहित्यिक मंचों पर सम्मानित किया गया था। गीत संग्रह ‘आदमी कितना अकेला’ पर 2014 में बलबीर सिंह पुरस्कार मिला। उन्हें राष्ट्रीय साहित्य साधना सम्मान, इन्दौर, म०प्र०, फरोग ए उर्दू सोसाइटी द्वारा 'रामचन्द्र शुक्ल सम्मान', कादम्बिनी साहित्य संस्था द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान' भी मिल चुका है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद में हिन्दी व अंग्रेजी के पेपर सेटर के  पर अपनी सेवाएं दी। अवध विश्वविद्यालय भी इनकी सेवाओं को लेता रहता है। पत्र पत्रिकाएं कादंबनी, सरस्वती सुमन, स्वतंत्र भारत, पायनियर, नवगीत आदि में इनकी कविताएं व लेख प्रकाशित होते रहे हैं।

सम्पर्क सूत्र:- 

राजघाट हरैया, जनपद-वस्ती, दूरभाष: 05546-233500, मोबाइल: 9415151858 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

( मोबाइल नंबर +91 8630778321; 

वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)


अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’। (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18)

अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’  (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18)   (उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संकलन के पूर्ण परिचय वाले अंतिम कवि )लेखन :डॉ. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस'  ,सम्पादन : आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

जीवन परिचय 

रामलखन मौर्य 'मयूर' जी का जन्म 19 - 7-1948 ई.को बस्ती जिले के सदर तहसील के बहादुर पुर ब्लाक के नगर खास गांव जो अब नगर बाजार और नगर पंचायत है, मे हुआ है। उनके पिता का नाम श्री नवीन मौर्य है। शिक्षा, हिन्दी और अर्थशास्त्र से एम०ए०, बीएड.,साहित्यरत्न और शास्त्री है। ये लिखने-पढ़ने के अधिक शौकीन रहे हैं। जनता इण्टर कालेज नगर बाजार में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।

प्रकाशित कृतियाँ :- 

1.उद्‌गार 

2. शृंगार शतक 

1.उद्‌गार काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :- 

उद्‌गार में अगभग 60 पृष्ठ हैं। यह विविध प्रसंगों पर लिखी गई कविताओं का संग्रह है। गिरिराज के प्रति लिखा गया उनका एक द्रष्टव्य है-

उत्तुंग  शिखर दुर्लघ्य सदा

तब विजय गीत को गाते है।

तेरे असीम अंचल में जन

सौन्दर्य निरखने जाते हैं।

निर्भर झर झर करते हैं कहीं

सरिता कल कल करती बहती।

है कहाँ मनोहर दृश्य विस्तृत

शुभ छटा जहां नर्तन करती 

है शुभ निसर्ग  शाश्वत स्वरूप

छवि धाम तुम्हें मेरा वन्दन ।।

 - ('उदगार' संग्रह का "गिरिराज" शीर्षक )

     अन्य कविताओ में मेरा गाँव, वीरो बढ़े चलो, बसंत, वर्षा की बूंद, सुमन, राष्ट्र शक्ति, बढ़े चलो , कदम-कदम, जलते द्वीप , बदलो समाज, सहकारिता, नव वर्ष, उया, सरिता, क्यों पीते हो, सीमा का प्रहरी, प्यारा हिन्दुस्तान, तरु आदि कविताएँ  मयूर जी ने बड़ी तन्मयता के साथ लिखा है।

       अधिकाँश कविताओं में  प्राकृतिक चित्रण अच्छा बन पढ़ा है। कविताएँ खड़ी बोली में की गई हैं। उनके भावो में प्रवाह और कथन में लालित्य कूट कूट कर भरा है।

2.शृंगार शतक काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :- 

मयूर जी का दूसरा काव्य-सग्रह "शृंगार  शतक सवैया और मनहरण छन्दों में किया गया है। कहीं-कहीं पर भोजपुरी क्रियाएँ मिल जाने से भावो में चारुता अधिक आ  गई है- 

हम  गांव के लोग गरीब हई 

चली आवे महाजन द्वार हमारे ।

बड़ी भाग्य हमरो है जागलि बा 

कइली हम राउर के सत्कारे ।

संवरी सजि सारी दशा हमरी 

मुस्काई जो आप सनेह पधारे । 

हम  धन्य हुए हैं प्रमोद भरे

करुणा से भरे प्रभु आप निहारे ।।

-  ( श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 32)

      बसंत पर लिखा गया एक छन्द दर्शनीय है  - 

आयो बना दिगंत सज्यो  

चहु ओर छटा छटकी छविकारी ।

शीतल मन्द  समीर चल्यो 

मदमाती बनाती लगी मनुहारी। 

वन वीरच फुल्यो शीत पुरयो 

अरुणाई पुपल्लव है दुतिकारी

मदमाली नटी सगरी धरती 

मधुमास प्रमत्त हुए नर नारी।।

 -  (श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 15)

    मयूर जी जो आधुनिक चरण के सवैया और घनाक्षरी  के बड़े अच्छे छन्दकार है। उनके छन्दो में प्राकृतिक सौष्ठव के साथ मानवीय  सस्पर्शों का स्वर गूंजता दिखाई पड़ता है। जीवन की गहराई में कवि का अन्तर्मन डूब डूब कर छन्दो के गुलदस्तों को सजाने का सदैव प्रयास करता है। मयूर जी को मंचो पर अच्छा सम्मान मिलता है। आधुनिक युग के छन्द परम्परा के विकास में उनका योगदान भविष्य में बहुत अच्छा होगा, ऐसी सभावनाएँ है।



Friday, March 28, 2025

डा.रामकृष्ण लाल"जगमग" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 17)

         डा.रामकृष्ण लाल"जगमग"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 17)
    डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
    आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
जीवन परिचय :- 
रामकृष्ण लाल "जगमग" की जन्मतिथि 15 अक्टूबर 1953, है । वे बस्ती जिले के बहादुर पुर ब्लाक के ग्राम-कैथवलिया में पैदा हुए थे। जगमग जी बी०ए०,डी०टी० सी० करने के बाद जिला परिषद के प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन कार्य में लगे हुए थे । जगमग जी हास्य और व्यंग्य के अनूठे कवि है। जगमग जी ने दोहों को अपना करके हास्य और व्यंग्य का पुट दिया है। मंच की दृष्टि से जगमग जी का जितना समादर हो रहा है,वह गिने-चुने लोगों में है।
प्रकाशित कृतियाँ :- 
जगमग’ की अभी तक 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।
1.चाशनी' दुमदार दोहे (प्रथम संस्करण- 1978), (तृतीय संस्करण-2006),अब तक 6 संस्करण प्रकाशित हुए हैं।
2.किसी की दिवाली किसी का दिवाला' (1982)
'3.विलाप' खण्ड काव्य,(1990)
4.हम तो केवल आदमी हैं' (काव्य संकलन-1997)
5.'बाल चेतना' (बालोपयोगी रचनाएं- 2000)।
6.सच का दस्तावेज’ 
7.खुशियों की गौरैया, 
8.‘बाल सुमन’ 
9.'स्वामी विवेकानन्द' - इन दिनों वे स्वामी विवेकानन्द पर केन्द्रित महाकाव्य का सृजन कर रहे हैं। 
      इन कृतियों में वे कभी हास्य तो कभी गंभीर दर्शन के रूप में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त करते हुये उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।निश्चित रूप से उनका साहित्यिक संसार घोर तमस में समाज का पथ प्रदर्शन करेगा।
प्रथम दो संग्रहों 'चाशनी’ और 'किसी की दिवाली किसी का दिवाला' का विवेचन :- 
इस शोध प्रबंध के। लिखे जाने 1984 तक जगमग जी की यह दोनो कृतियां प्रकाशित हुई हैं जिसमें दोहे और गजलो का प्रयोग अधिक हुआ है। जगमग जी के काव्य में में युगबोध का स्वरअधिक है। यह समाजवादी प्रवृत्तियों के अधिक निकट है। सम्पादन के क्षेत्र में भी इनका स्थान अच्छा है। “मंजरी मौलश्री" नामक पत्रिका इनके सहयोग और सम्पादकत्व में पिछले तीन वर्षों से छप रही है। "मंजरी- मौलश्री” के द्वारा जगमग जी ने नवोदित छन्दकारों को अच्छा प्रश्रय दे रखा है। जगमग़ जी को कवि सम्मेलनों में सदैव आदर मिलता रहा है। वे स्वयं कवि सम्मेलन कराने के शौकीन हैं। पत्रिका के माध्यम से प्रान्तीय और राष्ट्रीय स्तर कवियों की कविताएं छापकर जिले के कवियों का मार्ग दर्शन कर रहे हैं। उनमें व्यवहार कुशलता कूट-कूट कर भरी है। राजनीतिक खेमा के लोगो के साथ-साथ अधिकारियो से भी साहित्यिक योगदान प्राप्त करने में सफल रहते हैं । जगमग जी की भाषा में हिन्दी के साथ उर्दू का सम्मिश्रण पाया जाता है। उनके मुक्तकों में तीखा प्रहार दर्शनीय रहता है। इनका सम्पूर्ण साहित्य मानतीय संवेदनाओं के सन्ननिकट है।
पुरस्कार और सम्मान : - 
अनेकानेक राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा समय समय पर जगमग जी को सम्मानित किया जाता रहा है। उनका दायरा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। उन्हें भारतीय सेना संस्थान, दिल्ली द्वारा काव्य भूषण सम्मान, विक्रमशिला विद्यापीठ भागलपुर द्वारा विदया वाचस्पति मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा साहित्य वृहस्पति सम्मान 20 05 2018 को ,भारत गौरव 20 जनवरी 2022 को, अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव भूटान में 03 मई 2024 को , साहित्य गौरव 20 01 2025 को तथा वैज्ञानिक योगदान के लिए 06032025 को 'साहित्य वाचस्पति' पुरस्कार से अलंकृत किया गया है। सम्भव है इस सूची में कुछ नाम छूट भी गए हो। हम उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की मंगल कामना करते हैं। उनका दुमदार दोहे बहुचर्चित रहे हैं- 

           कुछ दुमदार दोहे 

हतनी कुठा बढ़ गई, भूल गये हर फर्ज । कुछ नालायक कर रहे, पूज्य बाप से अर्ज ।।
आप अब चले जाइए ।

गांधी बाबा देश का, डूब रहा है नाम । पाँचो चेले आपके निकले नमक हराम ।।
गुरु कुछ करो दवाई ॥

पहले अपने बाप का, नाम करो उजियार । और अंधेरे में करो, जो जी चाहे यार ।।
न कोई कुछ बोलेगा ।।

बिद्यालय को क्या कहूं, लुप्त हुआ हर ज्ञान छात्रों से अब मांगते, शिक्षक जीवन-दान ।।
यही शिक्षा की इति है ।।

कहा उन्होंने चुप रहो, मत लो मेरा टोह । छोड़ नहीं सकता कभी, मैं सत्ता का मोह ॥
लाख तुम करो घिसाई ॥

कहा कृष्ण ने क्या कहूं, मित्र सुदामा आज। फटे हाल हूं आपकी, कैसे रक्खू लाज ।।
जेब देखो है खाली ॥

कुछ लोगों ने प्रेम से, गरमाया जब दूध । इतने में सब लड़ पड़, आपस में दूग मूंदे ।।
मलाई हम खायेंगे ॥

सुनिये मेरी बात को, सेठ जानकी दास । मरते दम कुछ रूपये, लेते जाना पास ।।
वहां भी बिजनेस करना ।।











बस्ती के एक और सशक्त लेखक वागीश जी शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)

बस्ती के सशक्त लेखक वागीश शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)

आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। वे वर्तमान समय में हिन्दी-साहित्य के सबसे गहरे और तीक्ष्ण ,सिद्धांसतार, आलोचक, निबंधकार एवं उपन्यासकार हैं। उनकी प्रतिभा आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जैसी ही दिखती हैं एक गणितज्ञ को साहित्य की ऐसी परख विरले देखने को मिलता है। उनके बारे में सर्च करने पर बहुत ही विलक्षण चरित्र देखने को मिलता है। गद्य साहित्य की प्रचुरता के कारण 'बस्ती के छंदकार' के लेखक स्मृति शेष डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने शायद उन्हे अपने अध्ययन में ना ले सकें। उन्हें उचित स्थान देने से बस्ती मण्डल खुद को गौरवान्वित महशूस कर सकता है। इसलिए उनके अप्रकाशित भाग 3 की श्रृंखला में इस कड़ी को पिरोया जा रहा है।

      स्वनाम धन्य श्री वागीश जी एक वैज्ञानिक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने गणित में स्नातकोत्तर किया है और आईआईटी दिल्ली में गणित के प्रोफ़ेसर भी रहे। उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, 1946 ई. को इस धरती पर अपने गाँव थरौली, तप्पा बड़गों पगार, परगना महुली पश्चिम, तहसील सदर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश में जन्म लिया । बस्ती में वे एक ठाकुरद्वारे में रहते थे जिसे बस्ती राज-परिवार की रानी दिगम्बर कुँवरि ने बनवाया था। ये 1857 के प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी बाबू कुँवर सिंह की बहिन थीं किन्तु ये स्वयं अंगरेज़ों के साथ थीं जिसके नाते बस्ती का राज्य विक्टोरिया शासनकाल में कुछ बढ़ेआकार के साथ बचा रहा। वे वर्षों दिल्ली के आई. आई. टी. संस्थान में गणित पढ़ाते रहे और फिर सेवानिवृत्त होकर बस्ती में भी रहे हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उन्होंने निराला की प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ की बहुत ही सुन्दर टीका लिखी है जो ‘छन्द छन्द पर कुमकुम’ नाम से प्रकाशित हुई है। उन्होंने देवकीनन्दन खत्री की उपन्यास श्रृंखला ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ पर भी किताब लिखी है। उन्होंने ‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर कई  निबंधों की श्रृंखला भी लिखी है। वागीश जी हिन्दी में ग़ालिब की शायरी के सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं और उन्होंने उस पर भी टीका लिख रखी है जो प्रकाशित होना बाक़ी है।

           परिवारिक पृष्ठभूमि:- 

1.पण्डित शूलपाणि पूर्वज पुरुष

वागीश शुक्ल जी के पूर्वज पण्डित शूलपाणि शुक्ल थे , जो बस्ती से थरौली के रास्ते में थरौली से तीन किलोमीटर पहले पड़ने वाले महसों में रहते थे, जहाँ के राजा द्वारा किये गये किसी अपमान से क्षुब्ध्  होकर वे अनशन पर बैठ गये थे और उनका प्राणान्त हो गया जिसके बाद उनके पुत्रों ने ब्रह्महत्यारे के राज्य में जल न ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करके महसों छोड़ दिया और किसी अन्य आश्रय की तलाश में निकल पड़े। उनमें से एक को थरौली के तत्कालीन निवासियों ने अपने गाँव में शरण दे दी और अन्य भाई आगे चले गये। थरौली महुली राज्य में पड़ता था। यह चंगेरवा और महादेवा के पास में है। इस समय थरौली ग्राम पंचायत बस्ती जिला परिषद के बनकटी पंचायत समिति भाग में एक ग्रामीण स्थानीय निकाय है । थरौली ग्राम पंचायत क्षेत्राधिकार के अंतर्गत कुल 4 गांव हैं। 

2.पण्डित शिवदीन वृद्ध प्रपितामह

पण्डित शिवदीन शुक्ल थरौली में बस गये पूर्वज के वंश में वागीश जी के वृद्ध प्रपितामह पण्डित शिवदीन शुक्ल हुए थे उनके दो पुत्र हुए। पण्डित रामप्रसाद शुक्ल और पण्डित रामअवतार शुक्ल।

3.रामप्रसाद शुक्ल प्रपितामह

पण्डित रामप्रसाद शुक्ल वागीश जी के सगे प्रपितामह रहे। उनके एक और प्रपितामह पण्डित रामअवतार शुक्ल रहे । इन दो भाइयों का परिवार एक ही रसोई में था किन्तु वागीश जी के होश सँभालने तक चूल्हे अलग हो चुके थे हालाँकि सभी लोग एक ही मकान में अलग-अलग बरामदे बाँट कर रहते थे।इस प्रकार पण्डित रामप्रसाद शुक्ल के दोनों पुत्रों- पण्डित शुभनारायण शुक्ल और उनके छोटे भाई पण्डित जयनारायण शुक्ल- के परिवार मिल कर वह परिवार बनाते थे जो उस समय‘संयुक्त परिवार रहा है।

4.पण्डित जयनारायण शुक्ल पितामह

यह मकान यों तो उनके पितामह पण्डित जयनारायण शुक्ल ने बनवाया था किन्तु बँटवारे में ज़ाहिर है कि उन लोगों के हिस्से में दो ही बरामदे और उनसे जुड़ी कोठरियाँ आनी थी।

5.शुभनारायण शुक्ल पिता

वागीश जी अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थे ।वे संस्कृत के आचार्य थे.और पण्डित जयनारायण शुक्ल के वंशजों से बने संयुक्त परिवार के हमारे अपने टुकड़े में इस समय उनकी पीढ़ी में वे तथा उनके पितृव्य पण्डित जयदेव शुक्ल के पुत्र देवेन्द्र शुक्ल मौजूद हैं।

6.वागीश शुक्ल का जीवन परिचय:- 

वागीश जी की माता श्रीमती विद्यावती देवी यद्यपि चैदह वर्ष की अवस्था से ही अपने पितृकुल में गुरुजनों की शुश्रुषा कर रही थीं, तथापि उनके घर में बारह वर्ष बीत जाने पर भी उनके कोई सन्तान न हुई और उन्होंने किसी बड़ी-बूढ़ी की सलाह पर ऋषि पंचमी का व्रत प्रारम्भ किया। परिणाम स्वरूप ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, सन 1946 ई को इस धरती पर वागीश जी ने जन्म लिया। [उनकी पत्नी इंदुमती का जन्म 1951और मृत्यु 2023 में हुई थी। दोनों की शादी 1965 और वैधुर्य 2023 ई में हुआ है।] नवीं में पढ़ते हुए ही वागीश जी ने अपनी पहली कविता लिखी जिसकी प्रथम पंक्ति थीः ‘पर्यंक-त्याग क्यों ओ बोले’।इसी समय से वे जेब में इलायची - लोंग रखने लगे थे। जिसकी बहुत दिनों बाद परिणति तम्बाकू का पान खाने में हुई। यह आदत एकाध बार छूटने के बावुजूद ताउम्र तक क़ायम रही है। बँसिया की लठिया’ से शुरू होने वाली कविता छपी थी।एक संस्कृत विद्यालय के वाचनालय में  देवकीनन्दन खत्री के सारे उपन्यास उन्होंने वहीं पढ़े। अंगरेज़ी अच्छी करने के चक्कर में आपके पिता जी ने ‘ब्लिट्ज़’ नामक साप्ताहिक उनके लिए मँगवाना शुरू किया था। इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान उनकी कोठरी में एक चटाई भर की जगह थी जिस पर सिर गड़ाये वे तब तक एक लालटेन के सहारे पढ़ते रहते थे जब तक सोने का समय न हो जाय और फिर वह चटाई बिस्तर का काम देती थी।

     वज़ीफ़े और गोल्ड मेडल के साथ ही उनका शुमार अब बी.ए. प्रथम वर्ष के पढ़ाकू छात्रों में था । लेक्चर’ के दौरान वे पिछली बेंच पर बैठते थे और प्रायः एक दूसरे की काॅपियों पर कुछ-न-कुछ - मसलन चिरकीन के शेर- लिखा करते थे। 

     हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अँग्रेज़ी वाङ्मय के गहरे और गम्भीर अध्येता, आलोचक और अनुवादक वागीश शुक्ल  भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली) 1970 से 2012 ) सेवा किए फिर सेवा निवृत्त होकर नौ वर्ष तक बस्ती में रहे । 2021 से पुनः दिल्ली में रह रहे हैं।

        वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उनके लिखने का ढंग निराला है। वे कोई भी अवधारणा सीधे सीधे व्यक्त करने के स्थान पर पाठक को वैचारिकता के उस स्थान तक ले जाते हैं जहाँ वह अवधारणा रूप ले रही होती है। 

रचनायें:- 

वागीश जी ने लगभग एक दर्जन रचनाएं लिखी हैं,जो देश के प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई है तथा अमेज़न आदि केंद्रों के माध्यम से विक्रय के लिए उपलब्ध हैं।

1.छन्द छन्द पर कुमकुम : राम की शक्ति पूजा' 

(इसकी यह टीका निराला की राम शक्ति पूजा पाठ, टीका आदि की अनेक नयी विधियाँ भारतीय प्रसंग में प्राकु-आधुनिक हूँ, भले इधर वे हिन्दी आलोचना के परिसर से बाहर ही रहती आयी हूँ । 'राम की शक्तिपूजा' की यह टीका निराला की कविता को उसकी पूरी अर्थाभा, आशयों और अन्तर्ध्वनियाँ में, समकालीन सन्दर्भों और पारम्परिक स्मृति के अत्यन्त सर्जनात्मक रसायन के रूप में पुनरायत्त करने का अवसर सुलभ कराती है।)

2. गालिब के लगभग पूरे साहित्य की विस्तृत टीका और व्याख्या, जो प्रकाशित होना बाक़ी है।

3. Sanskrit studied ,Samvat 2063 64 ,in 2 vols.

4.आहोपुरुषिका अनुवाद  (मेघदूतम्' को छोड़ दूँ तो पत्नी के वियोग में इतना झंझावाती विषाद, आहोपुरुषिका )

5.समालोचना "उसे निहारते हुए"

6.समालोचना "प्रचण्ड प्रवीर का कथा लेखन" 

7.प्रतिदर्शन (कुछ निबंध) 

(प्रतिदर्शन है वागीश शुक्ल के अब तक के लेखन के चुनिंदा अंशों का। वे न केवल विद्वान-आलोचक हैं, वे अपनी पीढ़ी और अपनी पहली पीढ़ी में भी आदर्श हैं। उनकी विद्याएँ संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी, व्याकरण, आधुनिक गणित और उत्तर आधुनिकता तक विस्तृत हैं।

8.शहंशाह के कपड़े कहां हैं ( निबन्ध)

9.उर्दू साहित्य का देव नागरी में लिपिकरण कुछ समस्याएं कुछ सुझाव

10.चंद्रकांता संतति का तिलस्म 

11.' चिकितुषी' त्रिपुरा रहस्य चर्या खण्ड का सम्पादन

12.‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर निबन्ध की श्रृंखला 

13.कई बरसों से एक सुदीर्घ उपन्यास पर काम जारी है।

वागीश जी का फोन नम्बर 08765934624,09868541851 

ईमेल : wagishs@yahoo.com


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

 मोबाइल नंबर +91 8630778321; 

वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)










   





Wednesday, March 26, 2025

पाम्बन रेलवे खुलने वाला पुल डा. राधे श्याम द्विवेदी

बहुत पहले धनुष्कोटि से मन्नार द्वीप तक पैदल चलकर भी लोग जाते थे। लेकिन १४८० ई में एक चक्रवाती तूफान ने इसे तोड़ दिया। बाद में आज से लगभग चार सौ वर्ष पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक राजा ने उस पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया। अंग्रेजो के आने के बाद उस पुल की जगह पर रेल का पुल बनाने का विचार हुआ। उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्कर से हिलकर टूट चुका था। एक जर्मन इंजीनियर की मदद से उस टूटे पुल का रेल का एक सुंदर पुल बनवाया गया। इस समय यही पुल रामेश्वरम् को भारत से रेल सेवा द्वारा जोड़ता है। यह पुल पहले बीच में से जहाजों के निकलने के लिए खुला करता था।  इस स्थान पर दक्षिण से उत्तर की और हिंद महासागर का पानी बहता दिखाई देता है। उथले सागर एवं संकरे जलडमरू मध्य के कारण समुद्र में लहरे बहुत कम होती है। शांत बहाव को देखकर यात्रियों को ऐसा लगता है, मानो वह किसी बड़ी नदी को पार कर रहे हों।
पाम्बन पुल (Pamban Bridge) भारत के तमिल नाडु राज्य में पाम्बन द्वीप को मुख्यभूमि में मण्डपम से जोड़ने वाला एक रेल सेतु है। इस पुल के निर्माण का प्रयास 1870 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब ब्रिटिश सरकार ने श्रीलंका तक व्यापार संपर्क बढ़ाने का निर्णय लिया था। यह अगस्त 1911 से बनना शुरु हुआ और इसका उदघाटन 24 फ़रवरी 1914 में हुआ था। तब यह भारत का एकमात्र समुद्री सेतु था। 
145 खंभों पर टिका पुल
यहां पहुंचने का सफर भी उतना ही रोमांचक है जितना कि इस मंदिर का महत्व। कंक्रीट के 145 खंभों पर टिका सौ साल पुराने पुल से ट्रेन के द्वारा इस मंदिर में जाया जाता है। अब सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। समुद्र के बीच से गुजरती ट्रेन का नजारा इतना खूबसूरत है कि इसे देखने का अनुभव जीवनभर याद रहता है। यह सन् 2010 में बान्द्रा-वर्ली समुद्रसेतु के खुलने तक भारत का सबसे लम्बा समुद्री सेतु रहा। सन् 1988 में रेल पुल से  समांतर एक सड़क पुल भी बनाया गया जो राष्ट्रीय राजमार्ग 87 का भाग है। 
पुराने ब्रिज के बन्द होने का कारण 
दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था । लगभग 2.2 किमी तक कुल और 143 खंभों वाले इस पुल को 1914 में आधिकारिक तौर पर चालू किया गया था। यह मुंबई का आउटलेट-वर्ली सी लिंक भारत का दूसरा सबसे लंबा समुद्री पुल है। पाम्बन रेलवे पुल भारतीय मुख्य भूमि और पाम्बन द्वीप के बीच 2.065 किलोमीटर लंबा फैला हुआ है। फ्लोरिडा के बाद यह दुनिया के सबसे संक्षारक वातावरण में स्थित है, जिससे इसका रखरखाव एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह स्थान एक चक्रवात-प्रवण उच्च वायु वेग क्षेत्र में भी आता है। पाम्बन रेल पुल शेज़र रोलिंग लिफ्ट तकनीक पर काम करता है, जिससे फ़ेरी की पेशकश होती है, जो 90 डिग्री के कोण पर ऊपर की ओर खुलती है। अरब सागर के नीले विस्तार के अद्भुत दृश्य पेश करने वाली रेल ड्रॉ के दौरान पंबन पुल हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करता रहता है।  
संरचना :- 
रेलवे पुल समुद्र तल से 12.5 मीटर (41 फीट) ऊपर स्थित है और 6,776 फीट (2,065 मीटर) लंबा है। पुल में 143 खम्भे लगे हुए हैं और इसमें दो-पतरों से बना एक बैस्क्यूल खंड बना हुआ है, जिसमें सेज़र रोलिंग टाइप लिफ्ट स्पैन होते हैं, जिन्हें जहाजों के आने-जाने के लिए उठाया जा सकता है। प्रत्येक पतरें का वजन 415 टन (457 टन) है।पुल के दोनों पतरे लीवर का उपयोग करके मैन्युअल रूप से खोले जाते हैं।
पंबन ब्रिज के बारे में खासियत :- 
नए पंबन ब्रिज में 18.3 मीटर के 100 स्पैन और 63 मीटर का एक नेविगेशनल स्पैन शामिल है. यह मौजूदा पुल की तुलना में 3 मीटर ऊंचा है और समुद्र तल से 22 मीटर की नौवहन वायु निकासी प्रदान करता है. इसके निर्माण में इलेक्ट्रो-मैकेनिकल नियंत्रित सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो इसे ट्रेन नियंत्रण प्रणालियों के साथ समन्वित करता है।
पुराने ब्रिज के बन्द होने का कारण 
दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 अप्रैल 2025 को राम नवमी के दिन तमिलनाडु के पंबन पुल का उद्घाटन कर सकते हैं। इससे रामेश्वरम के लिए रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी। यह पुल देश का पहला वर्टिकल सी ब्रिज है। सूत्रों का कहना है कि समुद्री पुल को व्यावसायिक रूप से खोलने की तैयारी पूरी ज़ोरों पर है। दक्षिणी रेलवे के शीर्ष रेलवे अधिकारी पिछले कुछ दिनों से पुल और रामेश्वरम रेलवे स्टेशन का निरीक्षण कर रहे हैं। सूत्रों ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री के श्रीलंका से दो दिन की यात्रा (4 और 5 अप्रैल) से लौटने के तुरंत बाद उद्घाटन होने की संभावना है।
फेसबुक के इस लिंक से इस पुल की घटना को और सुगमता से जाना जा सकता है।
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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

Saturday, March 22, 2025

कृष्ण विहारी लाल “राही" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 15)

       कृष्ण विहारी लाल “राही"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 15)
     डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
      आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
कविवर कृष्ण विहारी लाल "राही" बस्ती जनपद के बहुचर्चित गीतकार और कवि हैं। "विकास मार्ग” पत्रिका के सम्पादन के कारण जनपद का कोना- कोना उन्हें जानता है। यह इण्टर परीक्षा के बाद हिंदी विषय से साहित्यरत्न तक शिक्षा अर्जित किये हैं।
प्रकाशित साहित्य  : 1. विकास गीत 
राही जी की प्रथम रचना “विकास गीत” गीतों के सग्रह के रूप में छप चुकी है। गीतों में ग्राम्य जीवन के साथ प्रकृति के मनोहारी रूपों को अधिक संजोया गया है। सरल, सुगम भाषा में लिखे गये राही जी के गीत संवेदनात्मक गहराइयों को छूने में समर्थ हैं। गीतों में लयात्मकता के साथ- साथ भावुकता और तन्मयता भरी पड़ी है। उदबोधन परक गीतों से राही जी ने सदैव अग्रसारित होने का संदेश दिया है। प्रेरणास्पद गीत राष्ट्रीयता का स्वर फूंकने में समर्थ हैं। भारतीय किसानों के समानान्तर पुष्पित और पल्लवित राही जी के गीतों में ग्रामीण जीवन का उद्‌घोष बढ़े ही सम्यक रूप से किया गया है। इन्होंने लगभग 200 गीत और कुछ मुक्तक लिखा है। कवि सम्मेलन के मंचों पर राही जी के गीत गूंजे और सराहे गये हैं। आकाशवाणी से राही जी के सैकड़ों गीतों का प्रसारण हो चुका है। टेलीविजन से राही जी को करोड़ों श्रोताओं ने देखा और सुना है। राही जी पिछये 30 वर्षों ने जनपद के काव्यधारा को सहयोग प्रदान करते हुए उसके विकास में नि:स्वार्थ योगदान देते रहे हैं। उनका सहज व्यक्तित्व अपने में मनोहारी और आदर्श है। गीतों की सर्जना के साथ राही जी छन्दबद्ध रचना के शौकीन हैं। ये छन्दकार और कवियों का बडा स्वागत करते है तथा नवोदित कवियों को सदैव प्रोत्साहित करते रहे हैं । 

किसानी भोजपुरी गीत 

धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।
अन्न धन , फल, फूलबा उपजावै 
हरियर फ़सिलि सुन्नर लहरावै। 
बनयों, बगिया मा छवि का बढ़ायें, 
मटिया से खेत घरवा के चमकावै ।

बाग-बग़चन, खेतवन मा जिनगी के रोशनी कइले 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

कहूं तऽ ई कोइला बनि जावै, 
रंगवा, भरत, तेरूबा दरकार्वे । 
दुनिया ई चनिया से चमकायें, 
सोनवा से ई घरवा के दमकावै।।

धरती पूत किसान जववन, लरिके देखि हरिसैईलै 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

खर-पतवार से मड़इया छवावै,
खदिया  हरिहर तऽ ई बनवावै । 
कबो ई बालू- कन बनि जावै , 
ठोस कहूँ पाथर वनि जावे ।

यकरे अगवा सरगो बुझाला छोट अउ फीक तऽ भइले 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

ई मटिया चन्नन बनि महके 
जेकरे लगवले मथवा दमकै। 
मटियइ से ई जिनिगियो चमकै, 
हियरा मनावतऽ रोज चहके ।

मील अकसवा ऊपरा से रखवार, जबर त ऽ भइलै
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

(नव सृजन त्रैमासिक जनवरी मार्च 1979 पृष्ठ 6 )


ठाकुर झूरी सिंह "बालसोम गौतम" (बस्ती के छन्दकार भाग 3 , कड़ी 12)

    ठाकुर झूरी सिंह "बालसोम गौतम" 
बस्ती के छन्दकार भाग 3 , (कड़ी 12)
लेखक डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी "नवीन"

"बाल सी चपलता सुलभता से भरपूर
सोम सी शीतलता से जो ओतप्रोत है।
गौ सेवा सुश्रुषा सा जनसेवा में संलग्न 
तम भू का मिटाते बालसोम गौतम है।।"
      - डा.राधे श्याम द्विवेदी नवीन

जीवन परिचय :- 
ठाकुर झूरी सिंह "बालसोम गौतम " जी का जन्म बस्ती जिले के खुटहन नामक ग्राम में (उपहार पृष्ठ 47 के विवरण के आधार पर) सं० 1992 वि० में हुआ था। एक अन्य विवरण से उनका जन्म श्रावण शुक्ला द्वितीया संवत 1985 विक्रमी / 18 जुलाई 1928 ई. को माना जाता है। वे मथुरा सिंह इकलौते पुत्र थे।  उन्होंने 1947 ई में मिडिल तक शिक्षा ग्रहण किया था। उन्होने गन्ना विभाग में सुपरवाइजर पद की नौकरी कर बस्ती बहराइच तथा गोण्डा जनपद में काफी भ्रमण तथा सामाजिक कार्य किये हैं । वे गोंडा जनपद के विशेषरगंज क्षेत्र से दीर्घ काल तक जुड़े रहे। गन्ना पर्यवेक्षक की नौकरी के साथ साथ वे साहित्य सृजन में भी संलग्न रहे। उनकी ससुराल बस्ती के टिनिच स्टेशन के पास शिवपुर में है और वे वहां भी रहते रहे थे। जीवन के अन्तिम दिनों में टिनिच रेलवे स्टेशन के पास एक हरा भरा उद्यान में सरस्वती सदन बनवाकर उसमें अपना निवास स्थान बनाकर साहित्य की साधना से जुड़े रहे। वे बहुत ही स्पष्टवादी और प्रकृति प्रेमी इन्सान थे।
        बालसोम जी ने अपने विषय में लिखा  है -- 
"है ज्ञान के विज्ञान के अथवा कला के क्षेत्र में, 
हूँ नही कुछ खास अपने विषय में क्या कहूं । 
हूँ नही  लिक्खाड़ कोई या पढ़ाकू बीर ही, 
स्वल्प शिक्षा प्राप्त लघुमति व्यक्ति अति सामान्य हूँ ।।"
      बालसोम जी की वर्ष1973 में प्रकाशित काव्य संकलन "स्वगत" में श्री हरिशंकर मिश्र, प्रवक्ता-खैर इंटर कालेज, बस्ती ने "बालसोम कौन?" शीर्षक से लिखा है -- 
"उनिद्र मस्तिक का जागृति बोध छिपाये, 
मन की तलहटी में निरन्तर गुनगुनाता, 
भीड़ में घुस कर भी अकेला आत्मलीन; 
जरा -सा छेड़ने पर निहायत ही वाचाल।
अद्यतन कबीर का नन्हा-सा आपरिचित बेलाग संस्करण; ऊपर से शालीनता की सीमा तक दब्बू दिखाई देने वाला, निर्भीकता के बिंदु तक दबंग; 
कभी छुई-मुई-सा- संवेदनशील, 
कभी चट्टान -सा निर्मम ।
प्रचीन कालदण्ड पर नवीन के तार बाँधकर 
जो स्वगत बोल रहा है
वह है कवि बालसोम ।।
जो शास्त्र थहाने वाला पंडित नहीं, 
पंडितो द्वारा चर्चित कवि पुंगव नही, 
एक़ साधारण-सा असाधारण व्यक्ति है;
जिसका वाणी भवानी का वरदान है।
जिसका काम है 
शब्दों की जिह्वा पर नये अर्थ धरना, 
पुरानी दिप-शिखा को 
नये आलोक से मंडित करना ।
दूर अनाकांक्षी होते हुए 
कवि कीर्ति का अधिकारी, 
अपनी परायी सबकी पीड़ा का गायक 
पपीहा-सा यह व्यक्ति 
बस्ती के जीवन-वन में 
पिछले बीस वर्षों से 
देखा सुना जा रहा है ।।"
       युवा कवियों को सुझाव देत हुये सोम जी ने निम्न गजल की रचना की थी -- 
"सीधा सदा सच्चा लिख ।
थोडा लिख पर अच्छा लिख ।। 
जो भी कुछ लिख पक्का लिख ।
चिठ्ठा एक न कच्चा लिख ।।
लिख जो भए जन जन को । 
गाये बच्चा-बच्चा लिख ।। 
नाव डूबने वाली है ।
करें राम ही रक्षा लिख।। 
बात न माने शायर की । 
क्यों न खाए गच्चा लिख ।।
मत लिख इसके उसके जैसा ।
केवल अपने जैसा लिख ।।"
“मौलश्री” नामक पत्रिका का नाम भी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रहा है। उनका "सरस्वती सदन" नामक टिनिच का आवास एक सुन्दर उपवन में बना हुआ है। 88 वर्ष की उम्र में वे 20 नवम्बर 2016 को अंतिम सांस / जिला चिकित्सालय बस्ती/गौर क्षेत्र के साड़ी कल्प गांव में ली। बाल सोम गौतम अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार कुआनो नदी के वाराह क्षेत्र घाट पर सम्पन्न हुआ था । मुखाग्नि उनके बडे बेटे सिद्धार्थ कुमार गौतम ने दिया था। उनकी पत्नी जिला परिषद के प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका थी। बस्ती शहर के आवास विकास कालोनी में भी उनका शहरी  निवास होता था। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों व भ्रष्टाचार से आजिज होकर समय पूर्व अवकाश लेकर साहित्य साधना में लीन हो गये थे। वह 31मार्च 1984 को स्वेच्छा से सेवामुक्त हुए थे। वे अपने किसी शुभ चिन्तक को कभी भी निराश नहीं करते थे। सरल तपस्यवियों की तरह साधारण सा उनकी जीवन यापन की शैली थी। बाल सोम जी बहुत ही सुलझे हुए इन्सान थे।
साहित्य साधना और सम्मान-पुरस्कार 
(संपादकीय टिप्पणी:- 
बस्ती जिले के ठाकुर झूरी सिंह के पिता को स्व मथुरा सिंह जी शायद ठाकुर झूरी सिंह जी के बारे में ना जानते रहे हो किन्तु उनका पुत्र अपने विशाल सामाजिक और साहित्यिक आयोजनों से जुड़नेऔर विद्वानों के सानिध्य के कारण सब कुछ जान गया था और सरकारी सेवा से इतर सामाजिक और साहित्यिक दुनिया में अपना नाम बाल सोम गौतम घोषित कर लिया। हमें नहीं मालूम कि कोई विशेष ने नाम या उप नाम की प्रेरणा दी थी या स्वयं ही चयन किया।
भदोई जिले में एक महान क्रांतिकारी थे ठाकुर झूरी सिंह :- 
((उत्तर प्रदेश के भदोही में सुरियावां क्षेत्र के परऊपुर गांव में 21 अक्टूबर 1816 में एक शूरवीर बच्चे का जन्म हुआ जिसे आज महान क्रांतिवीर शहीद झूरी सिंह के नाम से जाना और पहचाना जाता है. झूरी सिंह जैसे सपूत लाखों में एक होते हैं और कुछ ऐसा कर जाते हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है.1857 में उन्होंने भदोही से क्रांति का ऐसा बिगुल फूंका था कि अंग्रेज उनके नाम से डर से जाते थे।एक समय था की झूरी ने कई क्रांतिकारियों की सेना को शरण भी दी थी। भदोही में अंग्रेज किसानों से जबरन नील की खेती करवाते थे। जिसका विरोध झूरी सिंह ने किया था। उन्होंने चार अंग्रेज अफसरों के सिर कलम कर दिए थे। जिसके बाद से अंग्रेज भी उनके नाम से खौफ खाते थे। झूरी सिंह ने नाना साहब की सेना को उस समय शरण दी। जब उनको अंग्रेजों ने घेर लिया था। जब यह सूचना अंग्रेजों को मिली तो उन्होंने झूरी सिंह के एक सहयोगी को मार डाला। उस समय रिचर्ड म्योर किसानों से जबरन नील की खेती करवाता था। जिसका मुख्यालय ज्ञानपुर स्तिथ पाली गांव था।
झूरी सिंह ने नील की खेती का विरोध किया। झूरी सिंह के बड़े भाई ने क्रूर अंग्रेज अफसर रिचर्ड म्योर को मारने का जिम्मा लिया। अंग्रेजों को जब यह पता चला तो उन्होंने झूरी सिंह के बड़े भाई को फांसी दे दी और झूरी सिंह पर एक हजार रूपये का इनाम रख दिया।रिचर्ड म्योर को मारने के लिए झूरी सिंह और उनके सहयोगियों के साथ मिलकर घेरा बंदी कर रिचर्ड म्योर सहित चार अंग्रेज अफसरों का सर कलम कर दिया था। जिसके बाद पूरा अंग्रेजों का शासन हिल गया था। यूरोपीय इतिहास कार जेक्सन ने लिखा है की 10 जून 1857 को भदोही में क्रांति ने बहुत ही व्यापक रूप लिया। क्रांति इतनी तेज हुई की अंग्रेज सिपाही मिर्जापुर पहाड़ी की तरफ भाग गए थे। जिसके बाद झूरी सिंह को पकड़ने के लिए मेजर वार नेट, मेजर साइमन,पी वाकर,मिस्टर टकर और हेग की एक टीम बनाई गयी थी।धोखे से झूरी सिंह को पकड़ कर अंग्रेजो ने फांसी पर लटका दिया। झूरी सिंह को फांसी देने के बाद यह ऐलान किया गया की कोई उनके शव को पेड़ से नहीं उतारेगा। यह उन्होंने इस लिए किया की कोई और झूरी सिंह जैसा कदम न उठाये। झूरी सिंह के गांव के कई साथियों को काला पानी की सजा भी दी गयी थी। परउपुर गांव में झूरी सिंह की याद में एक स्मारक बना है। जिसका उद्घाटन पूर्व मुख्यमंत्री वीपी ने किया था।
( प्रसंग बस स्पष्टीकरण : डा राधे श्याम द्विवेदी ))
      बस्ती निवासी ठाकुर झूरी सिंह
        बस्ती निवासी ठाकुर झूरी सिंह बालसोम गौतम ने 'मौलिक' और              'श्रीकबीर' , पत्रिका सम्पादन, "सौगात", "तरूमंगल" काव्य. साहित्य का लेखन किया। बाल सोम गौतम खड़ी बोली के गीतकार के रूप में जिस समय बस्ती के छन्दकारों के बीच में आये उस समय द्विजेश और पावन युग समाप्त हो रहा था।  इन्होने साहित्य-सृजन में प्रवेश के निमित्त विद्वानों का साथ बड़े ही सहृदयता के साथ ग्रहण किया। आपके गीतों में मधुरता के साथ भावात्मक प्रवाह है। प्रारंभ में आपने "झरोखा" नामक एक पत्र का संपादन किया। पुन: श्री केशरी धर द्विवेदी के साथ "अद्यतन' साप्ताहिक पत्र कुछ दिनो तक निकालते रहे। इसके बाद 1960-61 में "कबीर" नामक तथा 1965-66 में "अपना घर" नामक साप्ताहिक पत्र निकालते रहे। इधर कुछ दिनों पहले "मौलश्री" नामक  साहित्यिक पत्रिका भी कई अंकों तक प्रकाशित करते रहे। बालसोम जी गोष्ठियों के मुस्कराते हुए कवि हैं। "एकान्त के क्षण" नामक काव्य-संग्रह का प्रकाशन चिनगारी प्रेस, बनारस से हुआ। 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सम्मानित किया था। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश सरकार के सिचाई मंत्री धनराज यादव, 2004 में साहित्य एकादमी, 2006 कादम्बरी कल्प द्वारा, 2010 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा, 2014 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व 2015 में पुन;साहित्य एकादमी द्वारा सम्मानित किया गया। उन्होने ’’मौलश्री’’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन भी किया है। वे उच्च कोटि के गीतकार थे तथा देश के अनेक ख्यातित कवियों के सानिध्य में रह चुके हैं। नवोदितों को प्रायः मार्ग दर्शन करते रहते थे।
       बालसोम जी बस्ती के छंदकार नामक शोध प्रबंध में काल क्रमिक विभाजन के चतुर्थ चरण के  सहृदय कवि और उत्कृष्ट छन्दकार होने के साथ-साथ गीतकार भी रहे है। तरुण कवियों के प्रेरणा स्रोत और कवि सम्मेलनों के आयोजक है। इनसे जनपद को  बड़ी-बड़ी आशाएं हैं।उन्होंने वैसे तो गीतों की बहुत बड़ी सीरीज लिख छोड़ी है। वह अनगिनत कविताओं के सुप्रसिद्ध रचनाकार रहे हैं।गीत सहृदय साधको के लिए बड़े मनोहारी है। इन्होंने अपने  युवा काल में घनाक्षरी और सवैया छन्द भी लिखा है जिनकी संख्या शताधिक थी। ये छन्द असावधानी के कारण कहीं गायब हो गये।
       प्रकाशित पुस्तके -
1.एकान्त के क्षण,
2. स्वगत
3.तरुमंगल
4.बाल सोम जी के फुटकर गीत
फुटकर गीतों की कुछ पंक्तियां:- 
हम उनके पावन स्मृति को सादर नमन करते हैं । उनके अति प्रचलित कुछ की पक्तियां नमूना स्वरुप यहां प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं –
1.एक चहकती रात यहां तक लाने वालों स्वागत है
जनवरी 31, 2020 (तारकेश्वर टाइम्स से साभार)
इस नगरी में धूमधाम से आने वालों स्वागत है ।
एक चहकती रात यहां तक लाने वालों स्वागत है ।।
घाट-घाट का पानी पीने और पिलाने वालों हे ।
गजल गौनई नई-नई कौव्वाली गाने वालों हे।
आओ हे उस्तादों के उस्ताद तुम्हारा अभिनन्दन ।
जीभ तेज कैंची से ज्यादा तेज चलाने वालों हे ।।
हाव भाव के साथ भीड़ को भाने वालों स्वागत है ।
दिल दिमाग श्रोताओं का सहलाने वालों स्वागत है ।।
स्वांग प्रेमियों के मन-भावन कलाकार अभिवादन लो ।
हे हे गप्पों के व्यापारी बार-बार अभिवादन लो ।।
चंद चुटकुले बहुत दिनों से जिसे सुनाते आये हो ।
फिर-फिर वही सुनाने वालो धुआँधार अभिवादन लो ।।
पिंगल और व्याकरण को धकियाने वालों स्वागत है ।
बिना पढ़े कुछ सब कुछ हमें पढ़ाने वालों स्वागत है ।।
खोलो अपना ज्ञान-पिटारा आओ हे विद्वान जनों ।
हम गुण हीन जनों को गुणी बनाओ हे विद्वान जनों ।।
सुनें हमारी भैंसे बीन बजाओ हे विद्वान जनों ।
अथवा इनके संग बैठ पगुराओ हे विद्वान जनों ।।
हे कलयुग के असली कवि कहलाने वालों स्वागत है ।
मंच विजेता अपने को जतलाने वालों स्वागत है ।।
धन्यबाद उन सबको जो इस उत्सव के आयोजक हैं ।
आप सरीखे महामहिम दुर्लभ तत्वों के खोजक हैं ।।
धन्यबाद के पात्र सभी अधिकारी वे व्यापारी वे ।
इसके आगे पीछे हैं, जो इसके रक्षक पोषक हैं ।।
काव्य कला को मरघट तक पहुंचाने वालों स्वागत है ।
क्रिया-कर्म कर अक्षय कीर्ति कमाने वालों स्वागत है ।।
इस नगरी में धूमधाम से आने वालों स्वागत है।।
          2.फिर आएँगे दिन कंचन के
यह शाम और यह फूलों का 
मुरझाना देख उदासी क्यों
जब तय है होगी सुबह 
खिलेंगे फूल नये-नये ।
मत पानी लाओ आँखों में 
रोने से रोना आता है ,
प्रिय रोने से खो जीवन का 
संगीत सलोना जाता है ,
शोकातुर जीवन से तो साथी 
गायक की वह कब्र भली ,    
गायक की वह कब्र की जिसका 
कोना-कोना गाता है ,
यों उड़े उड़े से रहो न तुम  
उड़ रही धूल तो उड़ने दो ,
तुम अपने पथ से मुड़ो नहीं
दुनिया मुड़ जाए मुड़ने दो ,
दश बीस कदम कुश काँटे हैं 
मत झिझको गाते चले चलो
बस इसके आगे होंगे पथ-
अनकूल हजारों नये-नये ।
क्या बात अगर दो रात न आया
इंदु अंक में अम्बर के
क्या बात अगर दो प्रात न गूंजे-
गीत विपिन में मधुकर के,
पद चाप श्रवण कर पतझड़ का
मत करो बावरे वदन मलिन
झर जाने दो झर जाने वाले
पात पुराने तरुवर के ,
फिर होंगी राते चाँदी की
फिर आयेंगे दिन कंचन के
वापस बहार घर आयेगी
फिर लौटेंगे दिन मधुवन के
हर शाख़ और हर टहनी को
फिर रूप मिलेगा दुल्हन का
दिल खोल दिशाएँ देंगी दिव्य-
दुकूल हजारों नये- नये ।
कट रही जिन्दगी किसी तरह
यह कभी भूलकर कहो न तुम
मझधार चीरते हुए तैर कर
निकल चलो यों बहो न तुम
दो खोल खिड़कियाँ निकल जाय
दम घोंटू धुंआं निराशा का ,
खो गये सपन खो जाने दो
यों खोये खोये रहो न तुम
वह किश्ती बहुत पुरानी थी
मस्तूल बहुत ही निर्वल था
उससे तो यात्रा करने में
खतरा ही खतरा प्रतिपल था
तुम अपने इन दो हुनरमंद
हाथों से माँगो देंगे ये-
किश्तियाँ हजारों नयी-नयी
मस्तूल हजारों नये- नये ।
रचना दिनांक 09 03 1956
(श्री सुरेश कुमार सिंह संपादक:
"क्षत्रिय मेल न्यू" दिनांक 30 जनवरी 2020 के अंक से साभार)

3. मत अभिमान करो 

ओ मन्दिर के नभचुम्बी शिखरासीन कलश,
तुम बन्धु नींव की ईटो का सम्मान करो।

मन्दिर की रचना में सबसे ज्यादा है वलिदान इन्हीं का ।

प्यारे इस मन्दिर पर सबसे ज्यादा है एहसान इन्हीं का।

इनमें से कोई एक अगर खिसके तो 

मंदिर ढह जाये।

मन्दिर यह ऊंचा सा मन्दिर खण्डहर बन कर रह जाये। 

बस इसीलिए कह रहा भूलकर सपने में,

हे भाई ऊंचेपन का मत अभिमान करो।

(नव सृजन त्रैमासिक जनवरी मार्च 1979 पृष्ठ 2)

4.किसान का गीत

तेरे महलों की चहल पहल तेरे वैभव की चमक दमक; 
मेरे खेतों में रोज सुबह भिखमंगिन बनकर आती है ।

जब मिट्टी के मृदु तारों को हल मेरा मुखरित करता है।
तब माया मोहन ज्योतिर्मय जीवन संगीत उभरता है।
जीवन वह जिसके सम्मुख नतशिर शतशत मणिमय राजमुकुट- 
जीवन वह जिसके चरण चूमती रहती नित्य अमरता है।
उस जीवन ही के एक विन्दु के लिए तुम्हारी सत्ता भी।
श्रद्धा से मेरे मेंड़ों का प्रातः दर्शन कर जाती है ।

बैलों की जोड़ी चली कि सजधजकर किन्नरियाँ उत्तर पड़ीं, 
टून टून टून घंटी बजी कि छम छम करके परियाँ उतर पड़ीं,
 हल सँभला मेरे कंधे पर सुरपत्ति सिहासन छोड़ चला- 
सजवाकर डोले लाल क्षितिज पर सुर-सुन्दरियाँ उतर पड़ीं।
 चल पड़ा मलय गल चली निशा नक्षत्र ओस में बदल चले।
 हर एक इशारे पर मेरे कुदरत सौ सौ बल खाती है।

जब गिरती बूंद पसीने की सौ सौ मीनार खड़ी होती, 
हर रोज नये प्रासादों की ऊंची दीवार खड़ी होतो, 
मिट्टी में आती नयी कल्पना आकृति पाने लगती है, 
हर गली मोड़ चौराहे पर करके श्रृंगार खड़ी होती 
मेरे श्रम शंकर की विभूति फैली है विविध विधानों में, 
वह मैं हूँ जिसकी बाँहों में सम्पदा झूलती गाती है।।

("मंजरी मौलश्री""  दिसंबर 78 पृष्ठ 14)

5 .
"दो ईंटों पर खड़ी हुई है वह ऊँची मीनार हमारी ।"

6.
"नीड़ बनाने में मजबूरी तुम मुझको मजदूर करो न । " 

7
‘ओ मन्दिर के नभचुम्बी शिखरासीन कलश,
तुम बन्धु नींव के ईटों का सम्मान करो।।’’

8.
“अब ना पपीहे का स्वर अच्छा लगता है।
अब न भीड़ भौरे की अच्छी लगती है।
पकड़ लिया बाजार की जबसे गीतों ने।
गाने से सौ कोस तबीयत भगती है।।’’

9.
"हर पल गीत प्रेम के गाया, 
नहीं किसी का दिल दुखाया।"
हर पल गीत प्रेम के गाया, 
नहीं किसी का हृदय दुःखाया,
कौन करे अब लेखा जोखा,
जिंदगी में क्या खोया क्या पाया' 

           तरुमंगल लघु काव्य 

बाल सोम गौतम का “तरुमंगल” एक लघु काव्य, जो अभी विगत दिनों प्रकाशित हुआ है, इसमें 14 गीत प्रकाशित हुए हैं, इसमें पर्यावरण से सम्बन्धित अनेक सरल गीतों का संकलन किया गया है-- 

हम चाहे रहें न रहें ये रहें, नित ही द्रुम द्वारे हरे हरे ये।
रहें द्वारे हमारे हमेशा बने, द्रुम देव दुलारे हरे हरे ये।
तने यों ही रहें सर ऊॅचां किये,सदियों तरु सारे हरे हरे ये।
सदा शीतल छांह गहाये रहें, तरु प्यारे हमारे हरे हरे ये।।

ये भले महरुम जबान से हैं, पर पूरित आंख से कान से हैं।
अनजान से ये दिखते हैं भले, नहीं वंचित किन्तु ये ज्ञान से हैं।
कम पूज्य न वेद कुरान से ये, घट के न किसी भगवान से हैं।
वरदान से हैं मिले प्राणियों को, तरु ये हमको प्रिय प्रान से हैं।।

जहां वृक्ष लता न सुखी सरिता, न ही शीतल मंद बयार जहां।
खगवृन्द करें न कलोल जहां, न ही गुंजित मेघ मल्हार जहां ।
न तो नाचते मोर न श्याम घटा, छटा सावन की न फुहार जहां ।
कहो कैसे भला वहां कोई टिके, न हो वृक्ष घना छतनार जहां।।

घर चाहे बने न बने अपना, कर लेंगे गुजारा इन्हीं के तले।
सच बोलते हैं हम लेंगे बिता, यह जीवन सारा इन्हीं के तले।
रह लेगा सुखी से मजे में यहीं,परिवार हमारा इन्हीं के तलें।
जो मरें तो इन्हीं विटपों के तले, जनमें जो दुबारा इन्हीं के तले।।

बसने को वहां मन क्यों न कहे,सुमनों का जहां सुनिवास रहे।
चरने को सदा हिरनों के लिए,चहु ओर हरी हरी घास रहे।
कभी धूप खुली कभी छांव घनी, नदी-ताल भी आस ही पास रहे।
मन क्यों न रमें उस ठौर जहां,तरु संग विहंग विलास रहे।।

ले टिकोरे खड़ी अमराई जहां, वहां न पिकी का निवास रहे।
कहो कूके न क्यों वहां प्यारी पिकी, जहां हाजिर हर्ष- हुलास  रहे।
सुमनों से सजी हो दिशाए जहां,पसरा चहु ओर सुबास रहे।
मधुपों की जमात जमीं हो जहां, वहा क्यों न जमा मधुमास रहे।।

यदि चाहते वंशी रहे बजती, सुख चैन की रात उजाली रहे।
न हो खाली खजाना खुशी का कभी,नित खेलती होंठ पे लाली रहे।
मन की अमराई न सूनी रहे,सदा कूंकती कोयल काली रहे।
घरती को ढ़को तरु पललवों से, चहुं ओर सजी हरियाली रहे।।

चलो भागो कटेरों अभी यहां से, कभी लौट दुबारा न आना यहां।
तरुओं को तरेरता जो भी उसे, पड़ता दृग दोऊ गवाना यहां।
इस ओर न झांकना भूल के भी, मत सूरत स्याह दिखाना यहां।
कभी आना ही आना पड़े यदि तो,यह काला कुठारा न लाना यहां।।

पृथ्वी पर तत्व महत्व के ये, यह सत्य कदाचिद् जाना नहीं।
यह वृक्ष तुम्हारे भी तो हैं हितू, लगता है इन्हें पहचाना नहीं।
पर सेवा व्रती इन पादपों को, दुख दे अपकीर्ति कमाना नहीं।
कहलाना कृतघ्न नहीं निजको, इन्हें कष्ट कभी पहुंचाना नहीं।।

हित हेतु सभी तनधारियों के, अवतार लिये अवनी पर ये।
विहगों को न केवल मात्र विहार,आहार भी देते विरादर ये।
बट पीपर गूलर पाकर ये, बनें यों ही रहे निशिवासर ये।
कटने नहीं देंगे कदापि इन्हें, कट जायें भले अपना सर ये।।

चिर मौनव्रती सब योगी यती, तपधारी सभी तरु न्यारे हैं ये।
ऋषियों मुनियों को रहे प्रिय ये,नहीं केवल देव-दुलारे हैं ये।
प्रिय हैं इनके उनके सबके, नहीं मात्र हमारे तुम्हारे हैं ये।
धरती को सजाए संवारे हुए,बड़े भोले हैं ये बड़े प्यारे हैं ये।।

सुख देते समान सदा सबको, महिपाल स्वरुप महीं पर ये।
प्रतिपालक कीट पतंग के भी, नभ चूम रहे बट-पीपर ये।
सदा देते ही देते रहे हैं हमें, हमसे कुछ लेते नहीं पर ये।
सुरलोक में भी प्रिय पूजित हैं, नहीं केवल पूज्य यहीं पर ये।।

विश्राम के हेतु घड़ी दो घड़ी, सकुचाना नहीं चले आना यहां।
चले आना यहां बड़े शौक से तू,भरपूर छंहाना-जुड़ाना यहां।
पर घ्यान रहे इस बात का भी,मत ढ़ेला से हाथ छुआना यहां।
फल बीन के खाना मना नहीं है पर झोर के एक न खाना यहां।।

सुनना चुपचाप पखेरुओं का , कलगायन शोर मचाना नहीं।
खुश होकर नाच भी लेना भले, पर ताली थपोड़ी बजाना नहीं।
हृदयंगम ये भी रहे कि यहां, कभी आकर जाल विछाना नहीं।
करना ना भयंकर भूल कभी, इन्हें गुल्ता-गुलेल दिखाना नहीं।।