Saturday, February 5, 2022

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (४) शौनक जी ( भागवत प्रसंग 15 )

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (४) शौनक जी           
( भागवत प्रसंग 15 )
डा. राधे श्याम द्विवेदी
              शौनक ऋषि भृगुवंशी शुनक ऋषि के पुत्र थे। ये प्रसिद्ध वैदिक आचार्य थे।'ऋष्यानुक्रमणी' के अनुसार, वह शनुहोत्र ऋषि का पुत्र था, एवं शनुक के इन्हें अपना पुत्र मानने के कारण, इन्हें 'शौनक' पैतृक नाम प्राप्त हुआ। यह पहले अंगिरस्गोत्रीय था, किन्तु बाद में भृगु-गोत्रीय बन गया। "शौनकजी” महाराज आयु में बड़े हैं वयोवृद्ध होकर भी श्रोता बनकर बैठे रहते थे और इनकी यह विशेषता है कि भगवान का कथामृत पान करने में बड़े कुशल है महान विद्वान, वयोवृद्ध होकर भी एकदम अनभिज्ञ बन जाते थे।जब श्रोता बनकर बैठते हैं जैसे कि उन्हें कुछ आता ही नहीं, यही उनकी कुशलता है । शतपथ ब्राह्मण के उल्लेखानुसार इनका पूरा नाम इंद्रोतदैवाय शौनक था जिन्होंने राजा जनमेजय का सर्प सत्र अश्वमेध यज्ञ कराया था। महाभारत इनके विषय में एक नूतन तथ्य का संकेत करता है, वह यह कि जनमेजय नामक एक राजा को ब्रह्महत्या लगी थी जिसके निवारण के लिए उसने अपने पुरोहित से प्रार्थना की। प्रार्थना को पुरोहित ने नहीं माना। तब राजा इस ऋषि की शरण आया। ऋषि ने राजा से अश्वमेध यज्ञ कराया तथा उसकी ब्रह्महत्या का पूर्णतया निवारण कर उसे स्वर्ग भेज दिया। नैमिषारण्य में इन्होंने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था, जो बारह वर्षों तक चलता रहा था। शौनक ऋषि के यज्ञ में उग्रश्रवा ने महाभारत की कथा सुनायी थी।हिन्दू पुराणों ने काल को मन्वंतरों में विभाजित कर प्रत्येक मन्वंतर में हुए ऋषियों के ज्ञान और उनके योगदान को परिभाषित किया है। प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से 7 प्रमुख ऋषि हुए हैं। इन्हीं ऋषियों में से एक थे ऋषि शौनक।
           जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण में इंद्रोत श्रुत के शिष्य बतलाए गए हैं। वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने का गौरव मिला था। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों की तुलना में भी कहीं ज्यादा थी।किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। अगर शौनक ऋषि ना होते तो पुराण और धर्म का लोप हो गया होता। वे ऋषियों मुनियों के बीच एक सकरात्मक माहौल बना कर रखते थे। प्राचीन धर्म और साहित्य गुरु शिष्य परम्परा से आज तक जीवित और वर्तमान देखा जा रहा है। 
         शौनकादिक ऋषियो के लिए कहा गया की - "कथामृत रसास्वाद कुशल"-- अर्थात् जो कथा के रस को आस्वादन करने मे कुशल हैं। श्रोता को कैसा होना चाहिये ये शौनकादिक ऋषियो से सीखना चाहिये।कथा को जो सुनकर जीवन मे उतार ले वही कुशल श्रोता है। परंतु जो लोग कथा को एक कान से सुनकर दुसरे कान से निकाल देते हैं वे कुशल श्रोता नही कहे जा सकते।कुशल श्रोता केवल वही है जो कथा को पीता है। स्कंदपुराण मे भी सुत जी महाराज कहते है --
" कृष्णार्थीति धनार्थीति श्रोता वक्ता द्विधा मत: । 
यथा वक्ता तथा श्रोता तत्र सौख्यं विवर्द्धते"। 
अर्थात् अगर श्रोता ओर वक्ता दोनो कृष्णार्थी हुए तो तब ही कथा
कहने ओर सुनने का उत्तम फल यानि प्रेमरस मिलेगा। कृष्णार्थी यानि जो केवल कृष्ण का बन जाता है।जिसके मन से भुक्ति ओर मुक्ति की कामना चली गयी है ओर जो केवल कृष्ण प्रेम प्राप्त करने के लिए कथा को पीता है वही कृष्णार्थी श्रोता वक्ता है। लेकिन अगर श्रोता धनार्थी हुआ तो तब श्रोता को प्रेमरस नही मिलेगा क्योकि श्रोता का मन धन मे लगा रहता है और
अगर वक्ता भी धनार्थी हुआ तो तब भी रस नही मिलेगा क्योकि अगर वक्ता धनार्थी हुआ तो वो कथा तो कम कहेगा बल्कि धन की महिमा ज्यादा कहेगा ईसलिए अगर भगवद् प्रेमारस चाहिये तो वक्ता और श्रोता दोनो को कृष्णार्थी बनकर कथा कहना और सुनना चाहिये। "ते श्रोता वक्ता सम शीला"-- अब प्रश्न उठता है की अगर कोई श्रोता कृष्णार्थी ना हो तो क्या उसे कथा सुनने का अधिकार नही है। इसका उत्तर यह है की भगवान के दरबार मे सबका स्वागत है।भगवान सकाम ओर निष्काम दोनो भक्तो पर कृपा करते है लेकिन निष्काम भक्त भगवान को बहुत प्रिय है। अगर श्रोता संसारिक कामना वाला है तो भागवत जी कहती है की तुम चिंता मत करो ,,तुम केवल एक बार मेरी शरण मे आ जाओ मै तुम्हे सकाम से निष्काम बना देंगे क्योकि जब तक मनुष्य को विवेक नही होगा की हमारा असली धन क्या है तब तक मनुष्य संसारिक धन की कामना करेगा लेकिन जब सत्संग के माध्यम से मनुष्य के जीवन मे विवेक जागृत होता है तो मनुष्य फिर संसारिक धन की कामना छोडकर निष्काम बन जाता है। " "होई विवेक मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा"। ईसलिए भागवत श्रवण करने का सबको अधिकार है। भागवत सकामियो को निष्काम बनाती है ओर निष्कामियो का प्रेमानंद बढाती है। ईसलिए कृष्णार्थी बनकर कथा कहने ओर सुनने से ही कथा का उत्तम प्रेमरस प्राप्त होगा। कृष्णार्थी श्रोता ही कुशल श्रोता है जो कथामृत के रसास्वाद को पान करता है। इसलिए ये श्लोक बहुत पयारा है--
नैमिषे सुतं आसीनं अभिवाद्य महामतिम्। 
कथामृत रसास्वाद कुशल शौनकोब्रवीत।।
           शौनक ऋषि द्वारा अनेक ग्रंथ रचित किये गए थे।इन्होंने ऋक्प्रातिशाख्‍य, ऋग्वेद छंदानुक्रमणी, ऋग्वेद ऋष्यानुक्रमणी, ऋग्वेद अनुवाकानुक्रमणी, ऋग्वेद सूक्तानुक्रमणी, ऋग्वेद कथानुक्रमणी, ऋग्वेद पादविधान, बृहदेवता, शौनक स्मृति, चरणव्यूह, ऋग्विधान आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। इसके अतिरिक्त शौनक गृह्सूत्र, शौनक गृह्यपरिशिष्ट, वास्तुशा्सत्र ग्रंथ की भी चर्चा की जाती है।

 

 

 
 









श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम वक्ता (३) रोमहर्षण सूत जी ( भागवत प्रसंग 14)

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम वक्ता (३) रोमहर्षण सूत जी          ( भागवत प्रसंग 14)
डा. राधेश्याम द्विवेदी
रोमहर्षण सूत जी महर्षि वेदव्यास के परम प्रिय शिष्य थे। ये सूत जाति के थे। जिसकी मां ब्राह्मण और पिता क्षत्रिय हो वो  सूत  कहा जाता है ।महर्षि वेदव्यास बहुत ही उदार विचारों के थे। रोमहर्षण के स्तुति पाठ तथा शास्त्रों-पुराणों में उनकी रुचियों को देखकर व्यास जी ने रोमहर्षण को अपना शिष्य बनाया था। रोमहर्षण ने पुराण विद्या का ऐसा पारायण किया कि उनकी प्रतिभा चमत्कृत हो गयी। जाति से अन्त्यज होते हुए भी व्यास जी की कृपा से पुराणों-शास्त्रों का उन्होंने गहन अध्ययन किया और कई ग्रन्थों की रचना की।
पुराणों के अद्भुत प्रवक्ता:-
भगवान वेदव्यास ने रोमहर्षण को समस्‍त पुराणों को पढ़ाया और आशीर्वाद दिया कि ‘तुम समस्‍त पुराणों के वक्‍ता बनोगे।इसीलिये रोमहर्षण समस्‍त पुराणों के वक्‍ता माने जाते हैं। ये सदा ऋषियों के आश्रमों में घूमते रहते थे और सबको पुराणों की कथा सुनाया करते थे। नैमिषारण्‍य में अठासी हज़ार ऋषि निवास करते थे। सूत जी उनके यहां सदा कथा कहा करते थे। यद्यपि ये सूत जाति के थे, फिर भी पुराणों के वक्‍ता होने के कारण समस्‍त ऋषि इनका आदर करते थे और उच्‍चासन पर बिठाकर इनकी पूजा करते थे। इनकी कथा इतनी अद्भुत होती थी कि आसपास के ऋषिगण जब सुन लेते थे कि अमुक जगह सूत जी आये हैं, तब सभी दौड़-दौड़कर इनके पास आ जाते और विचित्र कथाएं सुनने के लिये इन्‍हें घेरकर चारों ओर बैठ जाते। पहले तो ये सब ऋषियों की पूजा करते, उनका कुशल-प्रश्‍न पूछते और कहते- "ऋषियों! आप कौन-सी कथा मुझसे सुनना चाहते हैं?" इनके प्रश्‍न को सुनकर शौनक या कोई वृद्ध ऋषि किसी तरह का प्रश्‍न देते और कह देते- "रोमहर्षण सूत जी! यदि हमारा यह प्रश्‍न पौराणिक हो और पुराणों में गाया हो, तो इसका उत्‍तर दीजिये।"
            ऐसी कौन-सी बात है, जो पुराणों में न हो। पहले तो सूत उनके प्रश्‍न का अभिनन्‍दन करते और फिर कहते- "आपका यह प्रश्‍न पौराणिक ही है। इसके सम्‍बन्‍ध में मैंने अपने गुरु भगवान वेदव्यास से जो कुछ सुना है, उसे आपके सामने कहता हूँ, सावधान होकर सुनिये।" इतना कहकर सूत जी कथा का आरम्‍भ करते और यथावत समस्‍त प्रश्‍नों का उत्‍तर देते हुए कथाएं सुनाते। इस प्रकार ये सदा भगवल्लीला कीर्तन में लगे रहते थे। इनसे बढ़कर भगवान का कीर्तनकार कौन होगा।
भ्रम और गलती से हुई थी मृत्यु :-
रोमहर्षण की मृत्‍यु भगवान बलदेव के द्वारा हुई। नैमिषारण्य में तीर्थयात्रा करते हुए बलदेव जी पहुंचे। ये उस समय व्‍यासासन पर बैठे थे। उन्‍हें देखकर उठे नहीं। इस पर बलराम जी को क्रोध आ गया और उन्‍होंने इनका सिर काट लिया। महर्षि शौनक ने बलराम जी से कहा- "रोमहर्षण का वध करके जहाँ आप ब्रह्महत्या के दोषी हुए, वहीं आपने हम ऋषियों का भी बहुत अहित किया। रोमहर्षण के वध से पुराण विद्या के लोप होने का भय हो गया है। बिना सोचे-विचारे किए गये कार्य का दुष्परिणाम स्वयं अपने के अलावा बहुतों का अहित करता है।"
        महर्षि शौनक की व्यथाभरी बात सुनकर बलदेव स्तब्ध रह गये, पर अब क्या कर सकते थे। खेद तथा दु:ख से सिर झुका कर कहा- "ऋषिवर! निश्चय ही मैं अपराधी हूँ। मुझे नहीं पता था कि आप लोगों ने स्वयं रोमहर्षण को यह सम्मान दिया था। मैं तो यही समझता था कि वह अभिमान से इस आसन पर बैठकर उद्दण्ड हो गया है। अपने अविवेक से मैंने जो कर्म किया है, इसका कर्मफल मैं भोगूँगा, पर पुराण गाथा आगे चले, इसके लिए क्या होगा?" शौनक ने कहा- "रोमहर्षण का पुत्र उग्रश्रवा भी अधिक विद्वान् है। हम उसे बुलाकर पुराण-गाथा श्रवण करने का प्रबन्ध करेंगे। इस विद्या का लोप नहीं होने देंगे। श्रुति के माध्यम से हम इसे ग्रहण कर इसकी परम्परा बढ़ाते रहेंगे।"
         बलदेव शौनक के चरणों पर गिरकर बोले- "मुनिवर! आप उग्रश्रवा को बुलाकर इस व्यास गद्दी पर बैठाइए। मैं उनके आसनासीन होने पर उनसे अपने अपराध की क्षमा-याचना करूँगा तथा ब्रह्मा-हत्या दोष के निवारण के लिए तीर्थों में घूम-घूमकर प्रायश्चित्त करूँगा।" 
           ऋषि शौनक ने उग्रश्रवा को बुलाकर सारी स्थिति बतायी तथा उसे व्यास गद्दी पर बैठाया। बलदेव ने अपने अपराध की क्षमा माँगी और प्रायश्चित्त के लिए चले गये। उग्रश्रवा ने पुराण सुनाना प्रारम्भ किया। आजकल जो पुराण उपलब्ध हैं, उसमें कई में रोमहर्षण का संवाद मिलता है, कई में उग्रश्रवा का मिलता है। रोमहर्षण के जीवनकाल में ही उग्रश्रवा को ऋषि तथा ब्राह्मण समाज में बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उग्रश्रवा ऋषियों की श्रेणी में थे।
          इससे विदित होता है कि प्राचीन काल में जाति से अधिक गुण का सम्मान होता था। प्राचीन काल में प्रतिष्ठा प्राप्त करने तथा विद्या अर्जित करने में जाति बाधक नहीं होती थी।


Friday, February 4, 2022

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (२) राजा परीक्षित जी ( भागवत प्रसंग 13 )

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (२) राजा परीक्षित जी ( भागवत प्रसंग 13 )
डा. राधेश्याम द्विवेदी
         श्रीमद्भागवत कथा के वक्ता श्री शुकदेव जी का वर्णन पिछले एक कड़ी में दे दिया गया है। आज के कड़ी में राजा परीक्षित जी का परिचय दिया जा रहा है। राजापरीक्षित अर्जुन के पौत्र अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा जनमेजय के पिता थे। जब ये गर्भ में थे तब अश्वत्थामा ने ब्रम्हशिर अस्त्र से परीक्षित को मारने का प्रयत्न किया था । ब्रम्हशिर अस्त्र का संबंध भी भगवान ब्रम्हा से है तथा ब्रम्हा के ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र के समान शक्तिशाली, अचूक और घातक कहा गया है। इस घटना के बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योगबल से उत्तरा के मृत पुत्र को जीवित किया था । महाभारत के अनुसार कुरुवंश के परिक्षीण होने पर जन्म होने से वे 'परीक्षित' कहलाए भागवत पुराण के अनुसार, महाराज परीक्षित जब अपनी माता उत्तरा के गर्भ में अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगे, तब उन्होंने अपने सामने परमेश्वर को देखा, वह अँगूठे भर ऊँचे हैं, वे सुन्दर श्याम वर्ण तथा बिजली जैसा चमकदार पीताम्बर धारण किये हैं। उनकी सुन्दर लम्बी चार भुजाएं थीं, आँखों में लालिमा तथा कानों में सुन्दर स्वर्ण कुण्डल हैं।  भगवान् हाथों में गदा लेकर उसे बार बार घुमाते जा रहे थे एवं शिशु परीक्षित के चारों तरफ घूमते जा रहे थे।
       भगवान् की गदा ने उस ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत कर दिया।  बालक परीक्षित सोचने लगा की यह पुरुष कौन हैं, इस प्रकार बालक के देखते देखते परमात्मा पुरुषोत्तम भगवान् अंतर्ध्यान हो गए। तत्पश्चात शुभ नक्षत्रों तथा राशि से युक्त समय में तेजस्वी बालक परीक्षित का जन्म हुआ। पौत्र के जन्म से युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने धौम्य, कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगल वाचन तथा जातकर्म संस्कार करवाया। महाराज युधिष्ठिर दान के योग्य समय को जानते थे अतः उन्होंने ब्राह्मणों को सुवर्ण, गौएँ, पृथ्वी, गॉवों, उत्तम जाति के हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न का दान दिया। ब्राह्मणों ने प्रसन्न हो कर युधिष्ठिर से कहा कि यह बालक विष्णुरात (भगवान द्वारा रक्षित) के नाम से विख्यात होगा तथा यह यशस्वी, भगवान् का परम भक्त एवं महापुरुष होगा।
परीक्षित द्वारा कलियुग का दमन:-
पांडवों के महाप्रयाण के पश्चात श्रेष्ठ ब्राह्मणों के आदेशानुसार महाराज परीक्षित पृथ्वी पर शासन करने लगे। एक बार राजा परीक्षित को पता चला की उनके राज्य की सीमा के भीतर कलियुग का प्रवेश हो रहा है।  उन्होंने दिग्विजय करते समय देखा की एक राजवेषधारी शूद्र, एक गाय तथा बैल को डंडे से पीट रहा है जैसे उनका कोई स्वामी न हो।  श्वेत कमल पुष्प जैसा बैल, शूद्र से अत्यधिक भयभीत था, गाय भी अत्यंत दीन हो रही थी। उसके पावों पर पर वह शूद्र प्रहार कर रहा था।
राजा परीक्षित ने गंभीर वाणी से बोले "तुम हो कौन, जो बलवान प्रतीत होते हुए भी मेरे राज्य में दुर्बल प्राणियों को बल पूर्वक मार रहे हो, वेष से राजा परन्तु कार्यों से क्षत्रियों के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हो, चूंकि तुम इस निर्दोष को एकांत स्थान में मार रहे हो अतः अपराधी हो तथा वध के योग्य हो। महाराज परीक्षित ने धर्म रुपी बैल तथा पृथ्वी रुपी गाय को सांत्वना दी तथा अधर्म के कारणरूप कलियुग को मारने के लिए तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत हो कर उनके चरणों मे अपना सिर रख दिया। परीक्षित ने कलियुग को शरणागत हुआ देख उसको मारा नहीं।  कलियुग ने परीक्षित से प्रार्थना करी कि वे उसके रहने का स्थान निश्चित कर दें।महाराज परीक्षित ने कलियुग के रहने के चार स्थान निश्चित कर दिए - जहाँ जुआ खेलना, शराब पीना, वैश्यावृत्ति, पशु वध होतें हैं। कलियुग ने और भी स्थान मांगे तो राजा ने उसे उस स्थान पर रहने की अनुमति प्रदान कर दी जहाँ स्वर्ण उपलब्ध होता है, इस प्रकार कलियुग के रहने के पांच स्थान हो गए - झूठ, मद, काम, वैर और रजोगुण।
दैहिक त्याग:-
एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार करते हुए, हिरणों का पीछा करते हुए अत्यंत थक गए। जलाशय की खोज करते हुए वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां आँखें बंद करके शांत भाव से एक मुनि बैठे हुए हैं। वे संसार से ऊपर उठ गए थे तथा निर्विकार ब्रह्मरूप तुरीय रूप में स्थित थे। राजा परीक्षितने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्यूंकि वे प्यास से व्याकुल थे। आसन, बैठने का स्थान, जल तथा मधुर वचनों के द्वारा स्वागत न किये जाने पर राजा क्रुद्ध हो गए। वे भूख-प्यास से व्याकुल थे अतः उन्हें ब्राह्मण के प्रति ईर्ष्या एवं क्रोध हो आया।  उनके जीवन में ऐसा अवसर पहली बार था। राजाने लौटते समय अपने धनुष से एक मृत सर्प उठाया और क्रोधवश उसे मुनि के कंधे पर रख दिया और अपने राजमहल लौट आये।
         उन शमीक मुनि के तेजस्वी पुत्र ने जब सुना कि राजाने मेरे पिताके साथ दुर्व्यवहार किया है, तब उस क्रोध से लाल आँखों वाले ऋषिपुत्र ने कौशिक नदी के जल का आचमन करके शब्दरूपी वज्र छोड़ा। उस ब्राह्मण पुत्र ने राजा को इस प्रकार श्राप दिया: आज से सातवें दिन महाराज परीक्षित को तक्षक सर्प डँस लेगा, क्यूंकि इसने मेरे पिता का अपमान करके मर्यादा का उल्लंघन किया है। शमीक मुनि ने अपने पुत्र द्वारा राजा परीक्षित को दिया श्राप जानकर पछताने लगे कि उनके पुत्र ने भगवत् स्वरूप राजा को श्राप दिया तथा तुच्छ अपराध के लिए इतना भारी दंड दिया। महात्मा स्वभाव मुनि ने राजा द्वारा किये गए अपमान पर ध्यान ही नहीं दिया।
          घर लौटकर राजा को अपने निंदनीय कर्म के लिए पश्चाताप हुआ, इस प्रकार चिंता करते हुए उन्हें मालूम हुआ - ऋषि कुमारके शापसे तक्षक द्वारा मेरी मृत्यु होगी। राजा ने इसे शुभ समाचार के तौर पर ग्रहण किया। वे सोचने लगे कि बहुत दिनों से मैं संसारमें आसक्त हो रहा हूँ, अब मुझे शीघ्र वैराग्य प्राप्त होने का अवसर मिला। वे भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलोंकी सेवाको सर्वोपरि मान कर उपवास करने गंगा तट पर बैठ गए।
इस श्राप के मिलने के बाद परीक्षित ने राजकाज त्याग कर बेटे जनमेजय को सौंप दिया और अगले सात दिन के लिए वेद व्यास के बेटे सुकदेव के शरण में चले गए जहां उनसे उन्होंने प्रवचन वाणी सुनी। इसी को बाद में तैयार करके भगवद पुराण बनाया गया।
        उस समय त्रिलोकीको पवित्र करनेवाले बड़े बड़े ऋषि मुनि वहां पधारे। वहां अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, परशुराम, भृगु, भारद्वाज, गौतम, नारद आदि कई श्रेष्ठ ऋषि आये। राजा ने सबका सत्कार किया तथा उनके चरणों पर सर रखकर वंदना की। राजाने उनके समक्ष आमरण अनशन करने का संकल्प बताया। राजाने ऋषियों से प्रश्न किया की थोड़े ही समयमें मरनेवाले पुरुषों के लिए अंतःकरण तथा शरीर द्वारा करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन सा है।
         उसी समय व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी का वहां आगमन हुआ तथा महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से श्रीमद भागवतम का सात दिन तक चलने वाले कथा का श्रवण किया। उनके मन की सारी संकायें और दुबिधा समाप्त हो गया तथा उन्होंने दिव्य अभय बैकुंठ का पद प्राप्त हुआ ।




श्रीमद्भागवत कथा : वक्ता व श्रोता(१) (भागवत प्रसंग 12)

श्रीमद्भागवत कथा : वक्ता व श्रोता(१) (भागवत प्रसंग 12) 
डा. राधे श्याम द्विवेदी
        संन्यासी जो ज्ञान की परम अवस्था को प्राप्त कर चुका हो परमहंस कहलाता है। श्रीमद् भागवत कथा का वक्ता परम हंस जैसा ज्ञान की परम अवस्था को प्राप्त हुआ होना चाहिए। उसमे सद्गुरु के लक्षण और योग्यता होनी चाहिए। सद्गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है वह अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाता है। वह संसार के प्रपंच से निकालकर भगवत प्राप्ति कराता है। गुरु-शिष्य का संबंध अन्योनाश्रय होता है। शिष्य कोई अपराध करे तो गुरु को भोगना पड़ता है और गुरु कोई अपराध करे तो उसका फल शिष्यों को भोगना पड़ता है। भागवत में 24 गुरुओं का वर्णन है। भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए। वे कहते थे कि जिस किसी से भी जितना सीखने को मिले, हमें अवश्य ही उन्हें सीखने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। उनके 24 गुरुओं में कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनाने वाला, मकडी़, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) हैं। शुकदेव जी कहते हैं कि हे राजन दतात्रेय महाराज ने 24 गुरु बनाए जिनमें पृथ्वी को गुरु बनाकर उससे सीखा की एक संत को पृथ्वी की तरह क्षमावान आचरण शील होना चाहिए। जल से सीखा कि संत को हर समय विचरण करते रहना चहिए। मधुमक्खी से सीखा कभी संग्रह नहीं करना चाहिए। 
           ये सब बताने के बाद शुकदेवजी ने राजा परीक्षित से पूछा कि राजन क्या आप मरोगे तो राजा परीक्षित कहते हे कि प्रभु जब मैंने जन्म ही नहीं लिया तो मृत्यु कैसी। ये तो शरीर का काम है।आत्मा तो अजर अमर है। भगवान के नाम के बिना जीव की गति मुक्ति नहीं हो सकती है। इसलिए ठाकुर जी का स्मरण करते रहे।
         आज का मनुष्य बाहर के शत्रुओं से कम, अपने भीतर के दुश्मनों से ज्यादा जूझ रहा है। हर मनुष्य के भीतर अनास्था का कंस और अविश्वास का दुर्योधन उठ खड़ा हुआ है। ' बिनाशाय च दुष्कृताम् के संदेश को कार्यान्वित करने के लिए 'संभवामि युगे-युगे' की प्रतीक्षा है। कृष्ण अपने पूरे अवतार में कहीं योगी दिखाई देते हैं, तो कहीं रसिक, कूटनीतिज्ञ या चमत्कारी। कहीं कृष्ण अपनी मर्यादा भूलकर भीष्म के सामने शस्त्र उठाते हैं, तो कहीं भक्त की पुकार पर द्रौपदी की चीर भी बचाते हैं। इस प्रकार मानव जीवन की हर घटना कृष्ण के जीवन से जुड़ी नजर आती है। श्रीकृष्ण ने साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना की।
         श्रीमद्भागवत कथा भागवत रस का सागर है इसके कर्ता, वक्ता, श्रोता आदि सभी अमलातमा परमहंस व भगवान के अवतार हैं। इसलिए इसमें कहीं भी सांसारिक वासना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। श्रीमद भागवत महापुराण के 12 खंड, शरीर के 12 अंगो के समान हैं। दशम स्कंध उसकी आत्मा व पांच अध्याय जिसमें दिव्य प्रेम के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन है। वह पांच प्राण के समान हैं। 
          जब शुकदेव जी कथा सुन रहे थे इसी समय भगवान अमृत लेकर आ गए और कहा कि अमृत पी लीजिए। शुकदेव जी ने कहा कि हम भगवान की कथा का अमृतपान कर रहे हैं इस समय भगवान के अलावा कुछ भी नही सुनेंगे। कथा जीव को दिव्यजीवी बनाता है। भगवान ने एक तरफ पलड़े पर भागवत कथा और दूसरे पलड़े पर सारी सुविधाएं रखी लेकिन भागवत का पलड़ा भारी हो गया।श्रीमद्भागवत उत्तम ग्रंथ है क्योंकि यह भगवान का वांगमय स्वरूप है।भागवत का श्रवण मोक्ष का द्वार प्रशस्त करता है। इस ग्रंथ में वक्ता व श्रोता भी उत्तम हैं। श्रीमद्भागवत कथा के वक्ता व श्रोता के कई युग्म हैं जो भिन्न भिन्न अवसरों पर एकल या सामूहिक रूप में श्रीमद्भागवत कथा का रसपान वक्ता के रूप में अपने प्रिय श्रोता को कराये हैं। 
१.
शुकदेव जी उत्तम वक्ता हैं और राजा परीक्षित उत्तम श्रोता हैं। श्रृंगी ने परीक्षित को सातवें दिन सांप काटने से मृत्यु का शाप दे दिया था । इसके बाद राजा परीक्षित व्यासपुत्र शुकदेव मुनि के पास पहुंचे और उन्हें भागवत कथा सुनाने के लिए कहा। शुकदेवजी ने परीक्षित को सात दिन भागवत-कथा सुनाई। कहा जाता है कि तभी से भागवत सप्ताह सुनने की परंपरा प्रारंभ हुई थी।
२.
एक बार ब्रह्मा जी ने श्रीमद्भागवत कथा नारद जी को सुनाया था। 
३.
बादमें सनक ऋषि ने भी नारद जी को यह कथा सुनाया था।
४.
श्रीमद्भागवत कथा शुकदेव जी ने सूत जी को कथा सुनाया था।
५.
नैमिषारण्य नामक वन में श्री सूत जी महाराज हमेशा श्री सौनकादि अट्ठासी हजार ऋषियों को पुराणों और की श्रीमद् भागवत की कथा सुनाते थे।।
 ६.
गोकर्ण जी ने श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया था जिसे सुनने के लिए धुंधकारी की प्रेत आत्मा भी एक बांस में बैठ गया था। सात दिन में बांस की सातों गांठ फट गई और उसमें से एक दिव्य पुरुष निकला ।
         श्रीमद्भागवत में श्रोता दो प्रकार के माने गये हैं—प्रवर (उत्तम) तथा अवर (अधम) । प्रवर श्रोताओं के ‘चातक’, हंस’, ‘शुक’ और ‘मीन’ आदि कई भेद हैं। अवर के भी ‘वृक’, ‘भूरुण्ड’, ‘वृष’ और ‘उष्ट्र’ आदि अनेकों भेद बतलाये गये हैं । ‘चातक’ कहते हैं पपीहे हो। वह जैसे बादल से बरसते हुए जल में ही स्पृहा रखता है, दूसरे जल को छूता ही नहीं—उसी प्रकार जो श्रोता सब कुछ छोड़कर केवल श्रीकृष्ण सम्बन्धी शास्त्रों के श्रवण का व्रत ले लेता है, वह ‘चातक’ कहा गया है । जैसे हंस दूध के साथ मिलकर एक हुए जल से निर्मल दूध ग्रहण कर लेता और पानी को छोड़ देता है, उसी प्रकार जो श्रोता अनेकों शास्त्रों का श्रवण करके भी उनमें से सार भाग अलग करके ग्रहण करता है, उसे ‘हंस’ कहते हैं । जिस प्रकार भलीभाँति पढ़ाया हुआ तोता अपनी मधुर वाणी से शिक्षक को तथा पास आने वाले दूसरे लोगों को भी प्रसन्न करता है, उसी प्रकार जो श्रोता कथा वाचक व्यास के मुँह से उपदेश सुनकर उसे सुन्दर और परिमित वाणी में पुनः सुना देता और व्यास एवं अन्याय श्रोताओं को अत्यन्त आनन्दित करता है, वह ‘शुक’ कहलाता है ।

  






 

Wednesday, February 2, 2022

शुकदेव जी के दैहित्र ब्रह्मदत्त और पारीख ब्राह्मण। (भागवत प्रसंग 11)

        
शुकदेव जी के दैहित्र ब्रह्मदत्त और पारीख ब्राह्मण
 (भागवत प्रसंग 11)
डा. राधे श्याम द्विवेदी
शुकदेव मुनि के पत्नी एवं बच्चे:-
गृहस्थ जीवन ना अपनाने के कारण व्यासजी ने उन्हें जनक जी के पास भेजा था। मिथिला से लौटकर उन्‍होंने पिता की आज्ञा से शुकदेवजी का स्‍वर्ग में वभ्राज नाम के सुकर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया वहिंषद जी की पुत्री पीवरी से विवाह किया था। विवाह के समय शुकदेव जी 25 वर्ष के थे। उन्होंने मनुष्य जन्म के चारो ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, और मनुष्य ऋण से मुक्ति प्राप्त की और अपने पिता वेदव्यास जी की आज्ञा प्राप्त कर सुमेरु पर्वत गए । हिमालय पर्वत की एक चोटी का नाम बन्दरपुंछ है। यह चोटी उत्तराखंड के उत्तर काशी जिले में स्थित है। इसे कछुए की पीठ भी कहा जाता है। इसे सुमेरु भी कहते हैं। वहाँ उन्होंने ईश्वर के चरणों में ध्यान लगाकर अपने भौतिक शरीर का त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया । पुराणों में शुकदेव के बारह पुत्रों और एक कन्या के जन्म का वर्णन मिलता है । सभी पुत्र धर्म के मार्ग पर चलने वाले सिद्ध साधक थे ।
        कहते हैं कि शुकदेवजी अजर अमर हैं और वे समय-समय पर श्रेष्ठ पुरुषों को दर्शन देकर उन्हें अपने दिव्य उपदेशों के द्वारा कृतार्थ करते हैं। आज भी शुकदेव जी निराकार रूप में इस जगत मे विद्यमान है ।उनके द्वारा वर्णित किया गया श्रीमद्भागवत महापुराण सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । लोग इस दिव्य ग्रंथ का पाठन और श्रवण कर अपना जीवन सार्थक करते है ।
           पीवरी से शुकदेव जी के 12 महान तपस्‍वी पुत्र हुए जिनके नाम भ‍ूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर, श्‍वेत कृष्‍ण, अरुण और श्‍याम, नील, धूम वादरि एवं उपमन्‍यु थे। जिनके गुरुकृत नाम क्रमश: भारद्वाज, पराशर(द्वितीय), कश्‍यप, कौशिक, गर्ग, गौतम, मुदगल, शाण्डिल्‍य, कौत्‍स, भार्गव, वत्‍स एवं धौम्‍य हुए और कीर्तिमती नामक एक योगिनी पतिधर्म पालन करने वाली कन्‍या। कीर्तिमती का विवाह भारद्वाज वंशज काम्पिल्‍य नगर के राजा अणुह से हुआ। महान योगी ब्रह्मदत्त जी को कीर्तिमती ने जन्‍म दिया। देवी भागवत में निम्‍न वृत्तांत दिया गया है-
“पितरों की एक सौभाग्‍यशाली कन्‍या थी। इस सुकन्‍या का नाम पीवरी था। योग पथ के पथिक होते हुए भी शुकदेव जी ने उसे अपनी पत्‍नी बनाया। उस कन्‍या से उन्‍हें चार पुत्र हुए कृष्‍णख्‍ गौर प्रभ, भूरि और देवश्रुत। कीर्ति नाम की एक कन्‍या हुई। परम तेजस्‍वी शुकदेव जी ने विभ्राज कुमार महामना अणुह के साथ इस कन्‍या का विवाह कर दिया। अणुह के पुत्र ही ब्रह्मदत्त हुए। शुकदेव जी के दोहित्र ब्रह्मदत्त बड़े प्रतापी राजा हुए। साथ ही ब्रह्म ज्ञानी भी थे। नारद जी ने उन्‍हें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया था।
         हरिवंश पुरण में शुकदेव जी की संतान के सम्‍बंध में जो वर्णन किया गया है उसके अनुसार-
स तस्‍यां पितृकन्‍यायां पीवयां जनयिष्‍यति।
कन्‍यां पुत्रांश्‍च चतुरो योगाचार्यान महाबलान।।
कृष्‍णं गौरं प्रभुं शम्‍भुं कृत्‍वीं कन्‍यां तथैव च।
ब्रह्मदत्तस्‍य जननीं महिर्षी त्‍वणुहस्‍य च।।
अर्थ: – वे ही शुकदेव पितरों की कन्‍या पीवरी में कृष्‍ण, गौर, प्रभु और शम्‍भु इन चार महाबली योगाचार्य पुत्रों तथा ब्रह्मदत्त की जननी और अणुह की पत्‍नी कृत्‍वी नामवाली कन्या को उत्‍पन्‍न करेंगे।”
           पुराणें में यह आख्‍यान भी आता है – वृहस्‍पति जी ने ब्रह्मा जी के पास जा शुकदेव जी का किसी योग्‍य कन्‍या से विवाह करने की प्रार्थना की। उन्‍होंने वर्हिषद की कन्‍या पीवरी को, इनके योग्‍य मान इसके साथ विवाह करने की आज्ञा दी। वर्हिषद “स्‍वर्ण” में वभ्राज नाम के सुंदर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, जिनकी पूजा सभी देवगण, राक्षस, यक्ष, गन्‍धर्व, नाग, सुपर्ण और सर्प भी करते हैं।” वर्हिषद को ऋषि पुलस्‍त्‍य के आशीर्वाद से एक पुत्री प्राप्‍त हुई थी। जिसका नाम पीवरी रखा गया। इस कन्‍या ने ब्रह्माजी की तपस्‍या की थी और ब्रह्माजी से उसने वेदों के ज्ञाता, ज्ञानी, योगी और अपने योग्‍य वर पाने का वरदान पाया था। ब्रह्माजी की आज्ञा से इसी पीवरी नामक कन्‍या के सा‍थ शुकदेवजी ने ब्राह्म विधि से विवाह किया। इस पीवरी को योग-माता और धृतवृता (पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली) शब्‍दों से भी पुकारा जाता है। विवाह के समय शुकदेव जी की आयु 25 वर्ष की थी। शुकदेव जी गृहस्‍थ आश्रम में रहकर तपस्‍या और योग मार्ग का अनुसरण करने लगे।
        कूर्म पुराण के अनुसार शुकदेव जी के पांच पुत्र और एक पुत्री थी।
शुकस्‍याsस्‍याभवन् पुत्रा: पञ्चात्‍यन्‍ततपस्विन:।
भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।
कन्‍या कीर्तिमतती चैव योगमाता धृतवृता।।
शुकदेव जी के महान तपस्‍वी पांच पुत्र थे। जिनके नाम भरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर थे और एक कन्‍या जिसका नाम कीर्तिमती था जो योगिनी और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली थी।
          सौर पुराण के अनुसार-
भूरिश्रवा: प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णो गौरश्‍च पण्‍चम:।
कन्‍या कीर्तिमती नाम वंशायैते प्रकीर्तिता:।।
भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण और गौर नाम के पांच पुत्र थे। तथा कीर्तिमती नामक एक कन्‍या थी। ये सब ही अपने वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले थे। कन्‍या कीर्तिमती भारद्वाज वंश काम्पिल्‍य नगर के नृप अणुह जी को ब्‍याही गई थी। महान योगी और सब जीवों को बोली समझने वाले ब्रह्मदत्त जी का जन्‍म इसी कीर्तिमती के उदर से हुआ था।
        ब्रह्माण्‍ड पुराण में शुकदेव जी के किस-किस नाम वाले कितने पुत्र-पुत्री हुए- उसका वर्ण निम्‍न प्रकार है-
काल्‍यां पराशराज्‍जज्ञे कृष्‍णद्वैपायन: प्रभु:।
द्वैपायनादरण्‍यां वै शुको जज्ञे गुणान्वित।। ।।92।।
भूरिश्रवा प्रभु: शम्‍भु: कृष्‍णौ गौरश्‍च पण्‍चम:।
कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।। ।।93।।
जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सात्‍वणुहस्‍य च।
श्‍वेता कृष्‍णाश्‍च गौराश्‍च श्‍यामा धूम्रास्‍तथारुणा।। ।।94।।
नीलो वादरिकश्‍चैव सर्वे चैते पराशरा:।
पाराशराणामष्‍टौ ते पक्षा: प्रोक्‍ता महात्‍मनाम्।। ।।95।।
अर्थ- परशर मुनि से काली(सत्‍यवती) में कृष्‍ण- द्वैपायन उत्‍पन्‍न हुए। कृष्‍णद्वैपायन से आरणी में सर्वगुण सम्‍पन्‍न शुकदेव उत्‍पन्‍न हुए। शुकदेव से पीवरी से भूरिश्रवा, प्रभु, शम्‍भु, कृष्‍ण, गौर और कीर्तिमती कन्‍या जो अणुह ऋषि को ब्‍याही थी; जिसके ब्रह्मदत्त उत्‍पन्‍न हुआ (जो योग शास्‍त्र का प्रधान आचार्य था) और श्‍वेत, कृष्‍ण, गौरश्‍याम, धूम्र, अरुण, नील बादरि ये पुत्र और उत्‍पन्‍न हुए।
          हरिवंशोपपुराण के पर्व 1 अध्‍याय 18 में भी लिखा है-
ये तानुत्पाद्य धर्मात्‍मा ये योगाचार्यान्‍महाब्रतान्।
श्रुत्‍वा स्‍वजनकाद्धर्मान् व्‍यासादमितबुद्धिमान।। ।।54।।
महायोगी ततो गन्‍ता पुनर्नावर्तिनीं गतिम्।
यत्तत्‍पदमनुद्विग्‍नमव्‍ययं ब्रह्म शास्‍वतम्।। ।। 55।।
इस प्रकार महायोगी शुकदेव जी पूर्वोक्‍त 12 पुत्र और एक पुत्री को उत्‍पन्‍न करके अपने पिता वेदव्‍यास से मोक्ष धर्मों को सुनकर उस वैकुण्‍ठ लोक में जाएंगे, जिसमें जाकर कभी नहीं लौटते और जिसमें जाकर नित्‍य सुख के भागी होकर मुक्‍त हो जाते हैं।
ऊपर लिखे हुए प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र और 1 कन्‍या कीर्तिमती उत्‍पन्‍न हुई। कन्‍या का तो विभ्राज के पुत्र अणुह के स‍ाथ विवाह कर दिया और 12 पुत्रों को विद्या पढ़ाने के लिए 12 ऋषियों के पास भेज दिया। जिन ऋषियों के पास विद्या पढ़ने के लिए शुकदेव जी ने अपने 12 पुत्रों को भेजा था, उनके नाम आगे दिए गये हैं।
शुकस्‍याप्‍यभवान्‍पुत्रा द्वादशैव महातपा:।
पीवर्यां पितृकन्‍यायां द्वादशादित्‍यसन्निभा:।। ।।4।।
भ‍ूरिश्रवा प्रभु: शंभु: कृष्‍णो गौरश्‍च पंचम: ब्रह्माण्‍ड।
श्‍वेत: कृष्‍णश्‍च गौरश्‍च श्‍यामो धूम्रस्‍तथैवच।। ।।5।।
वादरिश्‍चोपन्‍युश्‍च सर्वे चैते पाराशरा:।
कन्‍या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता।। ।।6।।
शुकदेव जी के पितृ – कन्‍यापीवरी नाम की स्‍त्री से द्वादश पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (1) भूरिश्रवा (2) प्रभु (3) शंभु (4) कृष्‍ण (5) गौर (6) श्‍वेत (7) कृष्‍ण (8) गौर (9) श्‍याम (10) धूम्र (11) बादरि (12) उपमन्‍यु। ये सब पराशर के वंश में है।
जननी ब्रह्मदत्तस्‍य पत्‍नी सा त्‍वणुहस्‍य च।
नामान्‍तरणि चैतेषां कृतानि गुरुभिस्‍तदा।। ।।7।।
भारदाजस्‍तु प्रथमो द्वितीयस्‍तु पराशर:।
तृतीय: कश्‍यपो नाम्‍ना कौशिकस्‍तु चतुर्थक:।। ।।8।।
गर्गश्‍च पंचमो ज्ञेय उपमन्‍युस्‍तु षष्‍ठक:।
सप्‍तमों वत्‍स नामावै शाण्डिल्‍यश्‍चाष्‍टम: स्‍मृत:।। ।।9।।
भार्गवों नवमो नाम मुद्गलो दशम: स्‍मुत:।
एकादशों गौतमश्‍च द्वादश: कौत्‍सनामक:।। ।।10।।
अध्‍यापयञ्छि‍ष्‍यगणान् व्‍यास: पौत्रांश्‍च वीर्यवान्।
उवास हिमवस्‍पृष्‍ठे पारार्श्‍यो महामुनि:।। ।।11।।
कीर्तिमती नाम की कन्‍या योग विद्या की ज्ञाता और पतिव्रता धर्म को धारण करने वाली थी। इसका विवाह अणुह नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जिसके ब्रह्मदत्त नाम का योगविद्या का ज्ञाता पुत्र हुआ। पितृकन्‍या पीवरी से शुकदेव क पूर्वोक्‍त द्वादश पुत्र हुए। इनके गुरुओं ने इनके जो दूसरे नाम रखे वे इस प्रकार हैं-
(1) भरद्वाज (2) पराशर (3) कश्‍यप (4) कौशिक (5) गर्ग (6) उपमन्‍यू (7) वत्‍स (8) शाण्डिल्‍य (9) भार्गव (10) मुद्गल (11) गौतम (12) और कौत्‍स।
शुकदेव जी ने गुहस्‍थाश्रम में रहकर चारों ऋणों से मुक्ति प्राप्‍त की तथा पिताजी की आज्ञा से सुमेरू पर्वत पर गये जहां जप, ध्‍यान करते हुए मोक्ष को प्राप्‍त हुए। इस प्रकार उपरोक्‍त प्रमाणों से सिद्ध है कि शुकदेव जी के 12 पुत्र एवं कन्‍या हुई।कीर्तिमति को शुक वंश में प्रसिद्ध होने के कारण ब्रह्मदत्त जी भी पराशर के पक्ष में गये।
पारीक ब्राह्मण इनके वंशज :-
पारीक शब्‍द के बारे में कहा जाता है पार ऋषि का नाम पराशर जी है इसलिए उनके वंशज पारीक हैं। शुकदेव जी के 12 पुत्रों के नाम पर ही पारीक ब्राह्मणों के 12 गोत्र हैं। पारीक ब्राह्मणों के 9 अवंटक या नख हैं, गोत्र ये है ,- भारद्वाज, कश्‍यप, वत्‍स, उपमन्‍यु, कौशिक, गर्ग, शान्डिलय, गौतम, कौत्‍स, पराशर, भार्गव तथा मुद्गल। पारीकों की कुल माताएं 22 हैं ।
महातपस्‍वी ज्ञानी ब्रह्मदत्त :-
ब्रह्मदत्त पांचालदेशीय कांपिल्य नगर का एक राजा, जो भागवत के अनुसार नीप राजा का पुत्र था। विष्णु, मत्स्य एवं वायु में इसे अणुह राजा का पुत्र कहा गया है । इसकी माता का नाम कीर्तिमती अथवा कृत्वी था, जो शुकदेव की कन्या थी । देवल ऋषि की कन्या सन्नति इस की पत्नी थी । किन्तु भागवत में इसकी पत्नी का नाम गो दिया गया है । भागवत एवं विष्णु में इसके पुत्र का नाम विष्वक्सेन दिया गया है । किन्तु मत्स्य एवं वायु में इसके पुत्र का नाम क्रमशः युगदत्त, एवं युगसूनु दे कर, इसके पौत्र का नाम विष्वक्सेन बताया गया है । महाभारत में इसके पुत्र का नाम सर्वसेन बताया गया है । इसके भवन में निवास करनेवाली पूजनी नामक चिडिया के बच्चों को इसका पुत्र सर्वसेन ने मारा, अतएव पूजनी ने भी सर्वसेन की ऑखे फोड डाली । पश्चात् पूजनी ने इसका राजभवन छोडना चाहा । राजा ब्रह्मदत्त ने उसे रहने लिये काफी आग्रह किया । किन्तु अपने शत्रु के घर रहने से उसने इन्कार कर दिया । राजभवन छोडते ते समय पूजनी का एवं इसका तत्त्वज्ञान संबंधी संवाद हुआ था। इसने जैगीषव्य ऋषि से योगविद्या प्राप्त कर, योगतंत्र नामक ग्रंथ का निर्माण किया था । महाभारत के अनुसार, सुविख्यात वैदिक आचार्य कण्डरीक के वंश में इसका जन्म हुआ था, एवं उसीके वंश में उत्पन्न हुआ । कण्डरीक नामक अन्य एक पुरुष इसका मंत्री था । मस्त्य में बाभ्रव्य पांचाल सुबालक एवं कण्डरीक को क्रमशः इसका मंत्री एवं मंत्रीपुत्र कहा गया है । यह स्वयं वेदशास्त्रविद्‍ था, एवं इसने अथर्ववेद के एवं कण्डरीक ने सामवेद के क्रमपाठ की रचना की थी । अथर्ववेद संहिता का पदपाठ एवं शिक्षा की भी इसने रचना की थी । योगाचार्य गालव इसका मित्र था, एवं इसने सात जन्मों के जन्ममृत्यसंबंधी दुःखों का बारबार स्मरण कर के योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त किया था । इसने ब्राह्मणों को ‘शंखनिधि’ दे कर ब्रह्मलोक भी प्राप्त किया था । समस्त प्राणियों एवं पक्षियो की बोली इसे अवगत थी । भीष्म का पितामह प्रतीप राजा का यह समकालीन था ।
        ब्रह्मदत्त का दूसरा नाम पितृवर्ती था। श्राद्धकल्‍प में किए जाने वाले श्‍लोकों के पाठ से ब्रह्मदत्त जी का घनिष्‍ठ संबंध है। इन श्‍लोकों के पाठ से पितरों की तृप्‍ती मानी जाती है। ब्रह्मदत्त जी का विवाह देवल ऋषि की कन्‍या सन्‍नति से हुआ था। 
 ब्रह्मदत्त जी ने काशीराज की नौ कन्‍याओं से विवाह किये थे, जिससे 103 खांप पारीकों की उत्‍पति हुई। चार सौ वर्षों पूर्व इस वंश में 108 शाखाएं थी वर्तमान काल में अनुमान से 80 ही हैं। महातपस्‍वी और ज्ञानी ब्रह्मदत्त शुकदेव की इच्‍छानुसार पराशर के वंश में गये। उस पक्ष में जाने से ही (पुत्री का धर्मानुसार) ब्रह्मदत्त और उनकी सन्‍तान 'पाराक्‍य' कहलाए। इसी का अपभ्रंश 'पारीक' है। 


                                

Tuesday, February 1, 2022

भागवत प्रवक्ता भगवान शुकदेव के दो जन्मों की कहानी डा. राधे श्याम द्विवेदी (भागवत प्रसंग 10)

राधा रानी के शुक के रूप में भगवान शुकदेव :-
शुकदेव जी पूर्व यानी पहले जन्म में राधा रानी जी के निकुंज के शुक (तोता) थे| निकुंज में गोपिओं के साथ प्रभु क्रीडा करते और शुकदेव जी सारा दिन राधा-राधा कहते कहते बीतता था। यह देख एक दिन राधा जी ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया | तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता था।
वह उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेती और तोता फिर श्री राधे राधे बोलने लगता था | तब राधा जी ने कहा, “अब तू राधा राधा नहीं, कृष्ण कृष्ण बोला कर ” |
शुकदेव जी ऐसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोता भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे। राधा की सखी सहेलियों पर भी कृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था।
आगे चलकर एक बार राधा जी कृष्ण से मिलती है और राधा जी ने उनसे कहीं कि यह तोता कितना मधुर बोलता है ? वह उसे प्रभु के हाथ में दे दिया | इस प्रकार राधा जी ने ब्रह्म के साथ उस तोते का प्रत्यक्ष दर्शन और मिलन कराया | 
गुरु और पति का नाम लेना वर्जित :-
पूर्व जन्म में शुकदेव जी के सद्गुरु श्री राधा जी हैं । सद्गुरु होने के कारण शुकदेव जी भागवत में राधा जी अर्थात अपने सदगुरु का नाम नहीं लिया | जिस प्रकार यदि पत्नी अपने पति का नाम ले, तो उसकी आयु घटती है, उसी प्रकार सद्गुरु को मन में स्मरण कर ‘सद्गुरु कि जय” कहना चाहिए, नाम लेकर मर्यादा भंग नहीं करनी चाहिए | ऐसा शास्त्रों में वर्णन आता है | आज के जमाने में पत्नियां इस रहस्य से अनजान हैं। उन्हें इस प्रकार की सीख अपने बुजुर्गों से लेनी चाहिए।
           एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी नारद जी बीच में आ गए। कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है?
         कृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है। कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा की आंखें भर आईं। महल लौटकर राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा-राधा ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का। यानी राधा कृष्ण के संयुक्त नाम लेने की परम्परा पड़ी।
श्रीमद्भागवत में राधा नाम नहीं है:-
अगर भागवत कथा में शुकदेव जी राधा नाम लेते तो कथा पूरी नही हो पाती।राधा रानी शुकदेव जी की सतगुरु है । अगर वह अपने गुरुदेव का नाम लेते थे तो समाधि में चले जाते। परीक्षित के जीवन के केवल 7 ही दिन बचे हुए थे। इसलिए भागवत में उन्होंने राधा नाम को गुप्त रूप से लिया है। आज हम और आप कहीं भी जाकर देख लें।वृन्दावन, बरसाने में सभी राधे राधे ही रटते है। यही कारण है की हमारे कृष्ण जी को श्री राधा रानी का नाम अत्यंत प्रिय है।
            एक बार तुलसीदास जी जब वृन्दावन गए थे तो हैरान रह गए थे की यहाँ सभी लोग राधे-राधे जपते है। इसलिए कलयुग में श्री राधा जी का नाम सर्वोपरि है। राधा कृष्ण की तरह सीता का नाम भी राम से पहले लिया जाता है।असल में राम और कृष्ण दोनों ही एक हैं और राधा एवं सीता भी एक हैं। यह हमेशा नित्य और शाश्वत हैं।
          यही लक्ष्मी और नारायण रूप से संसार का पालन करते हैं। नारायण लक्ष्मी से अगाध प्रेम करते हैं। यह हमेशा अपने हृदय में बसने वाली राधा का नाम सुनना चाहते हैं। इसलिए ही कृष्ण नाम से पहले राधा नाम लिया जाता है।
भगवान शुकदेव की दूसरे जन्म की पृष्ठभूमि:-
समस्त संसार में आर्यवर्त एक पवित्र धरा है । स्वर्ग लोक के देवता भी इस धरा पर जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं । समय-समय पर अनेक दिव्य विभूतियों ने इस धरा पर जन्म लिया और पवित्र किया है । इसी भारत भूमि पर द्वापर और कलियुग के संधि के समय में एक दिव्य विभूति महात्मा शुकदेव जी ने जन्म लिया था और अपनी दिव्य वाणी के द्वारा पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण को प्रकट किया था । 
         भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त भगवान शुकदेव जी की जन्म की कथा अत्यंत दिव्य है, इस कथा का श्रवण और पाठन मात्र से व्यक्ति के समस्त कष्टों का नाश होता है और प्रभु के प्रति भक्ति का भाव जागृत होता है ।
          ईश्वर इच्छा से एक बार माता पार्वती के गुरु वामदेव जी कैलाश पधारे । उन्होंने भोलेनाथ के दर्शन किए और उनकी चरण वंदना की । देवी पार्वती ने उनका अत्यंत आदर सत्कार किया । कैलाश से प्रस्थान करते हुए उन्होंने देवी पार्वती को कंहा कि आप भोलेनाथ के अवश्य पूछे कि वह नरमुंडो की माला क्यों धारण करते हैं ? 
         उनके जाने के उपरांत देवी पार्वती ने महादेव से वह प्रश्न किया । उस समय महादेव ने देवी पार्वती के प्रश्न को टाल दिया परंतु उनके अनेक बार आग्रह करने पर महादेव बोले, हे पार्वती, यह आप ही के नरमुंडो की माला है जिसे मैं धारण करता हू । हे पार्वती, समय के प्रभाव से आप बार - बार जन्म लेती हो और मृत्यु को प्राप्त करती हो और फिर मैं आपके ही मुंड की माला बना कर उसे धारण करता हू । 
          तब देवी पार्वती ने महादेव से हंसकर प्रश्न किया कि हे प्रभु आपने ऐसा कौन सा कार्य किया हुआ है जिससे आप मृत्यु को प्राप्त नहीं होते ? 
        महादेव बोले, मैंने परम दिव्य अमृतमयी अमर कथा का रसपान किया हुआ है और इसी के प्रभाव से मैं अमर हूं ।
          देवी पार्वती बोली हे प्रभु, मैं आपके मुखारविंद से उस परम दिव्य अमृत कथा को सुनने की इच्छा रखती हूं ।
           महादेव बोले हे देवी, जिस कथा को सुनने मात्र से ही प्राणी अमर हो जाता है उसे सुनाने के लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता है अतः मैं शीघ्र ही आपके समक्ष उस दिव्य कथा का वर्णन करूंगा।
अमर कथा का वर्णन:-
देवी पार्वती को दिव्य कथा का वर्णन करने के लिए महादेव ने पर्वतों से गिरी हुई एक प्राकृतिक गुफा को निश्चित किया । जिसकी ओर प्रस्थान करते हुए महादेव ने नंदी, चंद्रमा, गंगा जी, और वासुकी को विभिन्न स्थानों पर छोड़ दिया और देवी पार्वती के साथ गुफा मे पहुंचे ।
         महादेव बोले हैं देवी, इस दिव्य कथा का वर्णन करते हुए मैं समाधि की अवस्था में चला जाऊंगा अतः आप बीच - बीच में हुंकार भरती रहना और यह भी सुनिश्चित कर लेना कि आपके और मेरे अतिरिक्त इस स्थान पर कोई अन्य प्राणी ना हो । 
         देवी पार्वती ने सभी पशु - पक्षियों और जीव-जंतुओं को वहां से भगा दिया परंतु उन्होंने उस गुफा में उपस्थित एक तोते के विकृत अंडे पर कोई ध्यान नहीं दिया । इसके अतिरिक्त वहां कबूतरों का एक जोड़ा भी था जिसका देवी पार्वती को आभास नहीं हुआ ।
           महादेव दिव्य कथा का वर्णन कर रहे थे और देवी पार्वती बीच- बीच में हुंकार भरकर कथा का श्रवण कर रही थी । अमर कथा के प्रभाव से तोते के उस विकृत अंडे में प्राण शक्ति का संचार होने लगा था । 
अमर कथा के प्रभाव से द्वितीय जन्म के शुक का जन्म :-
ईश्वर इच्छा से कथा सुनते हुए देवी पार्वती को नींद आ गई और उनके स्थान पर वहां उपस्थित नवजात शुक हुंकार भरने लगा । जब कथा समाप्त करने के उपरांत महादेव अपनी समाधि से उठे तो उन्होंने देखा कि देवी पार्वती के स्थान पर एक शुक हुंकारे भर रहा है तो वह अत्यंत क्रोधित हो गए । उस शुक का वध करने के लिए महादेव उसके पीछे दौड़े ।  
         नियति के अनुसार महादेव के भय से वह शुक उड़ता हुआ महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचा । व्यास की पत्नी पिंजल किंजल या पिंगला है . वह ऋषि जाबालि की बेटी थी . उनका दो और नाम अरणी व देवी वीटिका भी मिलता है। उस समय महर्षि वेदव्यास अपनी पत्नी को उनके द्वारा रचित की गई दिव्य पुस्तक श्रीमद्भागवत महापुराण का वर्णन कर रहे थे । उस दिव्य कथा को सुनकर देवी वीटिका अत्यंत विस्मित हो रही थी उसी समय महादेव से बचते हुए वह शुक सूक्ष्म रूप धारण कर देवी के मुंह में चला गया ।
            जब महादेवजी, उस शुक के पीछे - पीछे महर्षि के आश्रम में पहुंचे तो वेदव्यास जी ने महादेव को दंडवत प्रणाम किया और उन्हें आश्रम में हिंसा ना करने की प्रार्थना की । वेदव्यास की प्रार्थना से भगवान शिव प्रसन्न हो गए उन्होंने उस शुक के वध करने का विचार त्याग दिया और उन्हें वरदान मांगने को कहां ।
शुकदेव जी का जन्म का वरदान
वेदव्यास जी बोले प्रभु, "मैं आपकी कृपा से श्रीमद्भागवत महापुराण के लेखक का कार्य पूर्ण कर चुका हूं परंतु उस दिव्य कथा का वर्णन करने के लिए मुझे एक योग्य वक्ता की आवश्यकता है ।"
           महादेव बोले, "देवी वीटिका के गर्भ मे पल रहा यह शुक ही तुम्हारे पुत्र के रूप मे जन्म लेगा और संसार मे भागवत का प्रचार करेगा ।" 
          वह शुक, देवी वीटिका के गर्भ मे पलने लगा । वह अमर कथा का श्रवण कर अमर हो चुका था और बाहर आकर सांसारिक मोह - माया के बंधन मे बंधना नहीं चाहता था इसलिए नौ महीने की अवधि समाप्त होने के उपरांत भी वह गर्भ से बाहर नहीं आया । उस दिव्य शुक के गर्भ मे होने के उपरांत भी उसकी माता को शारीरिक कष्ट नहीं होता था । वह सूक्ष्म रूप मे ही उस गर्भ मे बारह वर्ष तक रहा । 
          बारह वर्षों के उपरांत भी जब वेदव्यास जी ने उसे बाहर आने की प्रार्थना की तो उसने कहा कि अगर श्री कृष्ण उसे गर्भ मे दर्शन दे और यह वरदान दे की संसार की मोह - माया का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी वह गर्भ से बाहर आएगा । वेदव्यास जी के आग्रह पर श्री कृष्ण ने उस बालक को गर्भ में दर्शन दिए और सांसारिक मोह - माया से मुक्त रहने का आशिर्वाद दिया । 
          बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले ।गर्भ से बाहर आते ही वह बारह वर्ष के किशोर बालक मे परिवर्तित हो गया ।वेदव्यास जी ने उस बालक का नाम शुकदेव रखा । शुकदेव जी ने गर्भ मे ही वेदव्यास जी से शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था।
        जन्म लेते ही शुकदेवजी अपने माता पिता और श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वन में तपस्या के लिए चले गए। ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी। परंतु वात्सल्य भाव से रोते हुए श्री व्यास जी भी उनके पीछे भागे। 
       मार्ग में एक जलाशय में कुछ कन्याएं स्नान कर रही थीं, उन्होंने जब शुकदेव जी महाराज को देखा तो अपनी अवस्था का ध्यान न रख कर शुकदेव जी का आशीर्वाद लिया। लेकिन जब शुकदेव के पीछे मोह में पड़े श्री व्यास वहां पहुंचे तो सारी कन्याएं छुप गयीं। ऐसी सांसारिक विरक्ति से शुकदेव जी महाराज ने तप प्रारम्भ किया।
         महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र को बुलाने के अनेक प्रयास किए परंतु वह सब प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुए । फिर महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों को बुलाया और उन्हें भगवान श्री कृष्ण के साकार रूप से संबंधित आधा श्लोक रटाकर शुकदेव के पास भेजा । 
           वन में वेदव्यास जी के शिष्यों के मुख से भगवान श्री कृष्ण के साकार रूप का वर्णन सुनकर शुकदेव जी अत्यंत प्रभावित हुए । उन्होंने उन शिष्यों से उस श्लोक की अगली पंक्ति सुनाने का आग्रह किया परंतु उन्हें श्लोक की अगली पंक्ति का ज्ञान नहीं था । वह बोले, अगर आपको श्लोक की अगली पंक्ति के बारे में जानना है तो आप हमारे गुरु वेदव्यास जी के पास जाकर पूछिए ।
          शुकदेव जी ने तत्काल ही तपस्या करना छोड़ दिया और अपने पिता वेदव्यास जी के पास पहुंचे ।भगवान वेदव्‍यास 
के सम्‍मुख अध्‍यापन की समस्‍या थी। उन्‍होंने अपने ध्‍यान बल से देखा तो उन्‍हें ज्ञात हुआ कि श्री शुकदेव के अन्‍त: स्‍थल में पहिले से ही श्रीमद्भागवत के संस्‍कार विद्यमान हैं। क्‍योंकि पूर्व जन्‍म में जब वो तोते के गले हुए अंडे के रूप में कैलाश पर्वत पर पड़े हुए थे तब भगवान शंकर के मुख से श्रीमद्भागवत की कथा सुनकर ये जीवित हो गए थे और पार्वती के सो जाने पर भी ऊं ऊं का उच्‍चारण करते हुए स्‍वीकृति वचन देते रहे थे।
              भगवान वेदव्यास जी ने उन्हें श्रीं कृष्ण के साकार रूप से संबंधित अनेक श्लोकों का ज्ञान दिया । परमात्मा के साकार रूप का वर्णन सुनकर शुकदेव का मन अति प्रफुल्लित हो गया उन्होंने अपने पिता से और श्लोक सुनाने का आग्रह किया । वेदव्यास जी ने उनके समक्ष श्रीमद्भागवत महापुराण के सभी 18000 श्लोकों का वर्णन किया । शुकदेव जी ने भागवत पढ़ना अपनी दिनचर्या बना लिया और उसे कंठस्थ कर लिया ।
श्रीमद्भागवत महापुराण का प्राकट्य :-
        नियति ने अपना कार्य कर दिया था । महाराज परीक्षित अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर गंगा नदी के तट पर आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठ चुके थे । महर्षि शुकदेव का जन्म श्रीमद्भागवत को संसार के समक्ष प्रकट करने के लिए हुआ था । जब शुकदेव जी को ज्ञात हुआ की परीक्षित एक ऋषि के श्राप के कारण आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठ गए है तो वे भी उनके दर्शन के लिए पहुंचे ।
      महाराज परीक्षित और शुकदेव जी भगवान कृष्ण के परम भक्त थे । श्रीं कृष्ण ने इन दोनों को गर्भ में ही अपने चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन दिए थे अतः ये दोनों ही माया से परे थे । संसार के कल्याण के लिए महाराज परीक्षित ने शुकदेव से प्रश्न किया की किस प्रकार एक पापी मनुष्य भी सात दिनों के भीतर सांसारिक भव - बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है?
          श्री शुकदेव ने उन्हें भगवान विष्णु और विशेषकर श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं का ज्ञान दिया । उनके द्वारा वर्णित की गई भगवान विष्णु की दिव्य लीलाओं और कथाओं का संग्रह श्रीमद्भागवत महापुराण के रूप मे संसार के समक्ष प्रकट हुआ ।
श्री शुकदेव के मुख से संसार के पालक श्री हरि की लीलाओ और कथाओं का वर्णन सुनकर महाराज परीक्षित के जन्म - जन्मांतर के पाप नष्ट हो गए, उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और ज्ञान की प्राप्ति हुई । श्रीमद्भागवत की दिव्य कथा का वर्णन कर शुकदेव वहां से चले गए ।
देवताओं को श्रीमद्भागवत का ज्ञान देना :-
वेदव्यास ने उन्हें विद्याध्ययन के लिए देव गुरु वृहस्पति जी के पास भेजा । शुकदेव जी एक विलक्षण शिष्य थे उन्होंने शीघ्र ही विद्याध्ययन का कार्य संपूर्ण कर लिया । उन्होंने देवताओं को श्रीमद्भागवत और महाभारत की कथा का ज्ञान दिया । इसके उपरांत वह पुनः आश्रम में आ गए ।
शुकदेव जी का विवाह :-
शुकदेव जी की आयु विवाह योग्य थी परंतु वह विवाह के बंधन मे नहीं बंधना चाहते थे । उनके पिता ने उन्हें विवाह के लिए सहमत कराने के कई प्रयास किए परंतु वह ब्रह्मचर्य को ग्रहस्थ आश्रम से श्रेष्ठ समझते थे । शुकदेव जी गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश लेना नहीं चाहते थे। व्‍यास जी ने उन्‍हें बहुत समझाया अंत में विदेहराज जनक जी के यहां धर्म की निष्‍ठा एवं मोक्ष का परम आशय पूछने के लिए मिथिला भेजा। राजा जनक ने अनेक प्रकार से परीक्षा लिया।उनकी कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होकर उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया। उनमें पात्रता देखकर उन्‍हें गृहस्‍थाश्रम का महत्‍व बतलाते हुए विवाह करने का उपदेश दिया । महाराज जनक के प्रवंचनो और उदाहरणों से उन्हें ग्रहस्थ आश्रम की श्रेष्ठता का आभास हुआ ।
       शुकदेव जी का विवाह देवी पीवरी से संपन्न हुआ । देवी पीवरी के पिता का नाम वहिषद था, वह स्वर्ग के सुकर लोक मे रहने वाले पितरों के राजा थे । पुराणों में शुकदेव के बारह पुत्रों और एक कन्या के जन्म का वर्णन मिलता है । उनके सभी पुत्र धर्म के मार्ग पर चलने वाले सिद्ध साधक थे ।
         यद्यपि अमर कथा का पान करने से शुकदेव जी अमर थे परंतु वह मानव देह के बंधनों मे बंधना नहीं चाहते थे और उन्हें मानव देह की नश्वरता का पूर्ण ज्ञान था । उन्होंने मनुष्य जन्म के चारो ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, और मनुष्य ऋण से मुक्ति प्राप्त की और अपने पिता वेदव्यास जी की आज्ञा प्राप्त कर सुमेरु पर्वत गए । वहाँ उन्होंने ईश्वर के चरणों में ध्यान लगाकर अपने भौतिक शरीर का त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया । कहते हैं कि शुकदेवजी अजर अमर हैं और वे समय-समय पर श्रेष्ठ पुरुषों को दर्शन देकर उन्हें अपने दिव्य उपदेशों के द्वारा कृतार्थ करते हैं। आज भी शुकदेव जी निराकार रूप में इस जगत मे विद्यमान है । उनके द्वारा वर्णित किया गया श्रीमद्भागवत महापुराण सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । लोग इस दिव्य ग्रंथ का पाठन और श्रवण कर अपना जीवन सार्थक करते है ।जिस जगह शुकदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुए थे वर्तमान समय में वह जगह हरियाणा में कैथल के गाॅंव सजूमा में है।



अठारह संख्या का पौराणिक विवेचन डा. राधे श्याम द्विवेदी

          हिंदू शास्त्रों में अठारह का विशेष महत्व है। पुराण और महत्वपूर्ण उप-पुराण संख्या में 18 हैं। 18 धर्मशास्त्र भी हैं। महाकाव्य महाभारत में 18 पर्व (अध्याय) हैं, इसलिए भगवद गीता आदि ग्रंथ स्वर्गीय हैं।
       पुराण हिंदुओं के लिए पवित्र मिथक, किंवदंती और वंशावली के कई लोकप्रिय विश्वकोश संग्रह का गठन करते हैं। पुराण लगभग पूरी तरह से कथा दोहों में महाकाव्य कविताओं के रूप में आसान, बहने वाली शैली में लिखे गए हैं। पुराणों में कई प्राचीन धारणाएं और परंपराएं संरक्षित हैं, लेकिन वे सांप्रदायिक विचारों के साथ बहुत अधिक मिश्रित हैं, जिसका उद्देश्य विशेष प्रकार की पूजा या आस्था के लेखों की लोकप्रियता का पक्ष लेना है। 18 प्रमुख पुराणों को अक्सर इस आधार पर समूहीकृत किया जाता है कि वे विष्णु, शिव या ब्रह्मा का गुणगान करते हैं या नहीं। 
           पुराण शब्द ‘पुरा’ एवं ‘अण’ शब्दों की संधि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ -‘पुराना’ अथवा ‘प्राचीन’ होता है । ‘पुरा’ शब्दका अर्थ है - अनागत एवं अतीत । ‘अण’ शब्द का अर्थ है "कहना" या "बताना" | अर्थात "जो अतीत के तथ्यों, सिद्धांतो, शिक्षाओं, नीतियों, नियमो और घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करे, वह पुराण है। वेदव्यास जी ने पुराणों की रचना की | कहा जाता है, ‘‘पूर्णात पुराण ’’... जिसका अर्थ है, "जो वेदों का पूरक हो" अर्थात् पुराण ( जो वेदों की टीका हैं ) | वेदों की जटिल भाषा में कही गई बातों को पुराणों में सरल भाषा में समझाया गया है | 
         पुराणों की संख्या अठारह होने के कई कारण हैं। हमारे संस्कृति में इस पूर्णाक को कई तरह से समर्थित किया गया है।अठारह पुराणों और उनके श्लोको की संख्या इस प्रकार है।
 1) विष्णु पुराण(२३,०००)
 2) ब्रह्म पुराण (१०,०००)
 3) शिव पुराण(२४,०००)
 4)भागवत पुराण(१८,०००)
 5) ब्रह्माण्ड पुराण (१२,०००)
 6) लिङ्ग पुराण(११,०००) 
7) नारद पुराण(२५,०००) 
8)ब्रह्म वैवर्त पुराण(१८,०००)
 9)स्कन्द पुराण(८१,१००) 
10) गरुड़ पुराण(१९,०००) 
11)मार्कण्डेय पुराण(९,०००)
 12)अग्नि पुराण(१५,०००)
 13) पद्म पुराण(५५,०००) 
14) भविष्य पुराण(१४,५००) 
15)मत्स्य पुराण(१४,०००) 
16) वराह पुराण(२४,०००)
 17) वामन पुराण(१०,०००)
 18) कूर्म पुराण(१७,०००)
अट्ठारह सिद्धियाँ :-
अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, सिद्धि, ईशित्व या वाशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञत्व, दूरश्रवण, सृष्टि, पराकायप्रवेश, वाकसिद्धि, कल्पवृक्षत्व, संहारकरणसामर्थ्य, भावना, अमरता, सर्वन्याय - ये अट्ठारह सिद्धियाँ मानी जाती हैं ।
अठारह तत्व:-
सांख्य दर्शन में पुरुष, प्रकृति, मन, पाँच महाभूत ( पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश ), पाँच ज्ञानेद्री ( कान, त्वचा, चक्षु, नासिका और जिह्वा ) और पाँच कर्मेंद्री (वाक, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ ) ये अठारह तत्व वर्णित हैं । 
अठारह विद्याएँ:-
छः वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्यायशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद और गंधर्व वेद ये अठारह प्रकार की विद्याएँ मानी जाती हैं 
काल के अठारह भेद:-
एक संवत्सर, पाँच ऋतुएँ और बारह महीने - ये सब मिलकर काल के अठारह भेदों को बताये गए हैं ।
श्रीमद् भागवत गीता के अध्यायों की संख्या भी अठारह है । श्रीमद् भागवत में कुल श्लोकों की संख्या अठारह हज़ार है ।
शक्ति के 18 स्वरूप :-
 श्रीराधा, कात्यायनी, काली, तारा, कूष्मांडा, लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, पार्वती, सिद्धिदात्री, भगवती और जगदम्बा, ये शक्ति के ये अठारह स्वरूप माने जाते हैं | 
दुर्गा की अठारह भुजाये :-
श्रीविष्णु, शिव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के अंश से प्रकट हुई भगवती दुर्गा अठारह भुजाओं से सुशोभित हैं | 
18 उप पुराण: -
महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों के अतिरिक्त कुछ उप पुराणों की भी रचना की है। उपपुराणों को पुराणों का ही साररूप कहा जा सकता है । 18 उप-पुराण के लेखक अन्य प्रमुख ऋषि हैं। हालांकि इनमे से कई अब लुप्त हो चुके हैं और उनकी लिखित प्रति उपलब्ध नही है। ये हैं:
१.आदि या आदित्य पुराण
२.नृसिंह पुराण
३.नंद पुराण
४.शिवधर्म पुराण
५.आश्चर्य पुराण
६.नारदीय पुराण
७.कपिल पुराण
८.मानव या मनु पुराण
९.उष्णासा पुराण
१०.ब्रह्मांडीय पुराण
११.वरुण पुराण
१२.कालिका पुराण
१३.महेश्वर पुराण
१४.साम्ब पुराण
१५.सुर या सौर पुराण
१६.पराशर पुराण
१७.मरीचि पुराण
१८.भार्गव पुराण
 ऊपर दिए गए 18 ग्रंथों को ही वास्तविक उपपुराण की मान्यता प्राप्त है। कहीं कहीं कुछ इतर नाम भी मिलते हैं।
1) सनत्कुमार पुराण 
2) दुर्वासा पुराण
3) वसिष्ठ पुराण
महाभारत में 18 का महत्त्व:-
कौरवों (11 अक्षौहिणी) और पांडवों (7 अक्षौहिणी) की सेना भी कुल 18 अक्षौहिणी थी। ... महाभारत के युद्ध के पश्चात् कौरवों की तरफ से तीन और पांडवों की तरफ से 15 यानि कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे। महाभारत को पुराणों के जितना सम्मान दिया जाता है और पुराणों की संख्या भी 18 है।
महाभारतके 18 पर्व :-
आदिपर्व, सभापर्व, वनपर्व, विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, आश्वमेधिकपर्व, महाप्रास्थानिकपर्व, सौप्तिकपर्व, स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, मौसलपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, स्वर्गारोहणपर्व और आश्रमवासिकपर्व।
राम की सेना में अठारह पदुम जूथपती बंदरो का वर्णन:-
शुभ दृष्टि वृष्टि मोपर करौ जे सहचर रघुवीर के॥
दिनकरसुत हरिराज बालिबछ केसरि औरस।
दधिमुख द्विबिद मयंद रीछपति सम को पौरस॥
उल्कासुभट सुषेन दरीमुख कुमुद नील नल।
शरभर गवय गवाच्छ पनस गँधमादन अतिबल॥
पद्म अठारह यूथपति रामकाज भट भीर के।
शुभ दृष्टि वृष्टि मोपर करौ जे सहचर रघुवीर के॥
मूलार्थ – अठारह पद्म यूथोंके अधिपति प्रभु श्रीरामके नित्य सहचर हैं एवं युद्धके अवसरपर भगवान् श्रीरामका काज करनेवाले हैं, अर्थात् ये यूथपति युद्धके अवसरपर भगवान् श्रीरामके राक्षसवध रूप कार्यमें नित्य सहायक हैं। ऐसे सीतापति श्रीराघवकी संहार­लीलाके नित्य परिकर भट मुझपर शुभ दृष्टिकी वृष्टि करते रहें, अर्थात् मुझे अपनी कल्याणमयी चितवनसे निहारकर मुझ अकिञ्चनमें श्रीराम­प्रेमको भरते रहें। इनमें प्रमुख हैं – (१) सूर्यपुत्र वानरोंके राजा सुग्रीव (२) वालिपुत्र युवराज अङ्गद (३) केसरीजीके औरसपुत्र अञ्जनानन्दवर्धन श्रीहनुमान्‌जी महाराज (४) दधिमुख (५) द्विविद (६) मयन्द (७) जिनके समान और किसीका पौरुष नहीं है अर्थात् अतुल बलशाली ऋक्षराज जाम्बवान् (८) उल्कासुभट अर्थात् अन्धकारके समय दीपक जलाकर सेवा करनेवाले उल्का­सुभट नामक विशेष यूथपति (९) सुषेण (१०) दरीमुख (११) कुमुद (१२) नील (१३) नल (१४) शरभ (१५) गवय (१६) गवाक्ष (१७) पनस और (१८) अत्यन्त बलशाली गन्धमादन। इस प्रकार अठारह पद्म यूथ वानरोंके पूर्व­वर्णित अठारह यूथपति अर्थात् सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, दधिमुख, द्विविद, मयन्द, जाम्बवान्, उल्का­सुभट, सुषेण, दरीमुख, कुमुद, नील, नल, शरभ, गवय, गवाक्ष, पनस और गन्धमादन – जो युद्धके समय श्रीराम­कार्यके संपादनमें परमवीरता करते हैं वे मुझपर कल्याणमयी दृष्टिका वर्षण करते रहें। इसी आशयको रामचरितमानसके सुन्दरकाण्डमें शुकने भी रावणसे स्पष्ट किया है –
अस मैं सुना श्रवन दशकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
          इस प्रकार हम देखते हैं कि अठारह की संख्या सनातन धर्म और संस्कृति में बहुत श्रद्धा और आस्था के साथ प्रयुक्त हुआ है। यह पूर्णांक नौ का युग्म या जोड़ा भी है। इसकी महत्ता कदाचित अन्य संख्या से ज्यादा है।