Sunday, October 4, 2026

बस्ती की महान विभूति: आचार्य रामचंद्र शुक्ल( बस्ती के छंदकार श्रृंखला 33) ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी


भेड़ी गांव देवरिया पुस्तैनी गांव -
हिंदी के प्रथम आचार्य पंडित रामचंद्र शुक्ल की आज 142 वीं जयंती है. हिंदी साहित्य का इतिहास संसार के सामने लाने वाले आचार्य का पैतृक गांव देवरिया में राप्ती नदी के दोआब पर बसा एक छोटा सा गांव भेड़ी है. चारों तरह खेत-खलिहान और बीच से कल-कल बहती राप्ती की इसी मिट्टी से निकले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य को वैज्ञानिक आधार दिया.
देवरिया जिले का रुद्रपुर तहसील और इसी में छोटे से गांव भेड़ी के बुजुर्ग बताते हैं कि आचार्य के पूर्वज भेड़ी गांव के हीं मूल निवासी थे. उनके पिता चंद्रबलि शुक्ल का जन्म यहीं हुआ था.
सदर कानूनगो होने के कारण उनका तबादला बस्ती जिले में हुआ, जहां अगौना गांव में वह जाकर बसे. तब आचार्य जी की उम्र महज 4-5 साल थी. रोजी-रोटी के लिए एक बार यह गांव छूट गया तो फिर से नाता नहीं जुड़ नहीं पाया. लेकिन उनकी लेखनी में इस गांव की मिट्टी की महक हमेशा बनी रही.आचार्य जी अपने पिता की चौथी संतान थे. देवरिया के खेड़ी गांव से संबंध की वजह से आज भी उनके नाम पर रामचंद्र कॉलोनी है, जहां पार्क में उनकी प्रतिमा लगी है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल इंटर कॉलेज भी है, वहां भी प्रतिमा स्थापित है. दोनों प्रतिमाओं का अनावरण तत्कालीन डीएम सुबोध नाथ झा ने किया था.बाद में वह मिर्जापुर और बनारस में बसे. काशी में हीं पंडितजी ने अंतिम सांस ली थी.

बस्ती से रहा वास्ता- 
बस्ती के छन्दकार भाग 1 की कृति में डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस ने पृ. 179 पर लिखा है कि आचार्य शुक्लजी के पितामह पं. देवी दत्त शुक्ल थे। इन आचार्य शुक्लजी की मातामही (दादी ) राजा नगर हाल मुकाम पोखरनी के राजा विश्वनाथ प्रताप नारायण सिंह की कृपा पात्री थी। उन्हें अगोना में 40 बीघा जमीन गुजारे के लिए दिया गया था। जहां एक छोटा सा मकान बनाकर आचार्य जी ने 5 वर्षों तक निवास किया था। इसके बाद वे अपने पैतृक आवास मिर्जापुर अपने पिताजी के साथ चले गये थे।आचार्य शुक्ल जी ने कवियों के बारे में जो सटीक व वैज्ञानिक सम्मत टिप्पणी व विवेचना की है वह एक गद्यकार कभी नहीं कर सकता है। उनमें कवि हृदय था वे कविता भी करते थे और उसकी सारी बारीकियों से विज्ञ भी थे।
जीवन परिचय -
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4अक्टूबर, 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अगौना नामक गाँव में हुआ था। आरंभिक शिक्षा मिर्ज़ापुर में हुई, फिर कायस्थ पाठशाला प्रयाग से इंटर किया। आगे फिर उन्होंने स्वाध्याय से ज्ञान अर्जन किया और इस क्रम में उर्दू, अँग्रेज़ी, बांग्ला और हिंदी भाषा एवं साहित्य का गंभीर अध्ययन किया। मिर्ज़ापुर में ही वह भारतेंदु युग के महत्त्वपूर्ण रचनाकार चौधरी बदरीनारायण प्रेमघन के संपर्क में आए और ‘आनंद कादंबिनी’ पत्रिका के संपादन में उनका सहयोग किया। इस कार्य से उनमें साहित्य और संपादन की समझ तो विकसित हुई ही, वह भारतेंदु युग के साहित्य और समकालीन साहित्य-कर्म से भी परिचित हुए। इस दौरान उनका साहित्य लेखन भी आरंभ हो चुका था। वह ब्रज भाषा और खड़ी हिंदी में कविता-लेखन करते रहे थे। ‘कविता क्या है’ निबंध का प्रारंभिक रूप इसी अवधि में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ। 1903 में उनकी कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ भी प्रकाशित हो चुकी थी। सन् 1908 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल मिर्ज़ापुर से काशी आ गए जहाँ काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा तैयार किए जा रहे 'हिंदी शब्द सागर’ से सहायक संपादक के रूप में जुड़े। इस कोश के प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास थे। सन् 1927 में इस कोश का कार्य पूरा हुआ जिसकी लंबी भूमिका आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखी। यही भूमिका बाद में परिवर्तित रूप में ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के रूप में प्रकाशित हुई।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रध्यापक के रूप में -
सन् 1919 में रामचंद्र शुक्ल काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रध्यापक भी नियुक्त हो चुके थे। सन् 1937 में श्यामसुंदर दास के निधन के बाद वह हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने और इस भूमिका में रहते उन्होंनेपाठ्य सामग्री के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के प्रकाशन के साथ हिंदी साहित्य का एक ढाँचा बनकर तैयार हो गया था। उन्होंने सूरदास के ‘भ्रमरगीत’ संबंधी पदों का संग्रह किया और उसकी एक विस्तृत भूमिका लिखी। इसी तरह उन्होंने ‘जायसी ग्रंथावली’ का संपादन किया और उसकी भी एक लंबी भूमिका लिखी। इस बीच शुक्लजी ने काव्यशास्त्र और साहित्य सिद्धांतों का भी गंभीर अध्ययन किया जो बाद में उनकी पुस्तक ‘रस मीमांसा’ और ‘चिंतामणि’ में सुचिंतित रूप में व्यक्त हुई। हिंदी आलोचना को संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रभाव से मुक्त कराने तथा हिंदी का अपना व्यवस्थित शास्त्र निर्मित करने की दृष्टि से ‘रस मीमांसा’ एक महत्त्वपूर्ण कृति है। ‘चिंतामणि’ में उन्होंने मनोविकार संबंधी निबंधों के साथ-साथ साहित्य-सिद्धांतों का भी विश्लेषण-मूल्यांकन किया। 

अंतिम यात्रा के कुछ दुर्लभ छाया चित्र 
दुर्लभ तस्वीरें 
बस्ती के लाल आचार्य रामचंद्र शुक्ल के महाप्रयाण की है ,इसे नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष माननीय व्योमेश शुक्ला ने अपनी फेसबुक वाल पर आचार्य शुक्ल की जयंती चार अक्टूबर पर साझा की है। वर्तमान पीढ़ी ने केवल आचार्य रामचंद्र शुक्ल को पढ़ा है,और उनकी केवल एक ही तस्वीर को देखा है जिसमें वे सूट और टाई में है। इन चित्रों पर नागरी प्रचारिणी सभा का स्वत्वाधिकार है। हम इसे आभार सहित हिंदी प्रेमियों के अवलोकन हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी का निधन 1 फ़रवरी 1941को हुआ था।अंतिम यात्रा के कुछ दुर्लभ छाया चित्र नीचे दिए जा रहे हैं -














पारिवारिक विवरण -
राम चंद्र शुक्ला की शादी सावित्री देवी से हुई थी और उनके दो बेटे केशव चंद्र और गोकुल चंद्र और तीन बेटियाँ दुर्गावती, विद्या और कमला थीं। वह एक चित्रकार भी थे और उन्होंने अपना खुद का घर डिज़ाइन किया था, जो 1941 में उनकी मृत्यु के समय अधूरा था।

आचार्य शुक्ल साहित्य शोध संस्थान -
आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान , उनके नाम पर 1972 ई.में स्थापित एक शोध संस्थान , साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र है। इसका निर्माण उनके पुत्र गोकुल चंद्र शुक्ल की इच्छा और वाराणसी के स्थानीय अधिकारी द्वाराप्रदान की गई भूमि पर किया गया था। बाद में इसे भवन और बुनियादी ढांचे के लिए उत्तर प्रदेश राज्य सरकार से वित्तीय मदद मिली। इसके प्रथम सचिव कुसुम चतुर्वेदी ने एक नियमित पत्रिका “नया मंडल” प्रकाशित किया, जिसने महिलाओं, उत्तर आधुनिकतावाद, दलित साहित्य आदि पर अपने विशेष अंकों के लिए प्रतिष्ठा स्थापित की। इसके लेख और शोध पत्र हिंदी और भारतीय भाषा साहित्य में प्रशंसित हैं। साहित्य के जानकार कुसुम चतुर्वेदी की मृत्यु के बाद ज्ञानदत्त चतुर्वेदी सचिव बने। उनकी मृत्यु के बाद, कुसुम चतुर्वेदी और ज्ञानदत्त चतुर्वेदी के पुत्र डॉ॰ मंजीतचतुर्वेदी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान के सचिव (मंत्री) का पदभार संभाला; इसकी अध्यक्ष (अध्यक्ष) हिंदी कहानियों की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. मुक्ता हैं। कुसुम चतुर्वेदी और मुक्ता ने दूरदर्शन के लिए आचार्य शुक्ल पर एक वृत्तचित्र बनाया है और उनकी प्रामाणिक जीवनी प्रकाशित की है।

समादृत लेखक और आलोचक-
रामचंद्र शुक्ल हिंदी के अत्यंत समादृत लेखक और आलोचक हैं। डॉ. रामविलास शर्मा उन्हें आलोचना के क्षेत्र में उतने ही महत्त्व से रखते हैं, जो महत्त्व प्रेमचंद का उपन्यास में है और निराला का कविता में। उन्होंने हिंदी में व्यवस्थित साहित्य - सिद्धांतों की नींव रखी, जिनके आधार पर हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा और हिंदी साहित्य की व्यावहारिक आलोचना की। उन्होंने हिंदी-साहित्य के अध्ययन- अध्यापन के लिए व्यवस्थित रूप से पाठ्यक्रम का निर्माण किया। इसके साथ ही उन्होंने निबंध लेखन और अनुवाद का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके पत्र और अख़बारों को भेजी गई टिप्पणियाँ भी प्रकाशित हैं। उनका समस्त रचना-कर्म एक-दूसरे का पूरक बना रहा। ‘चिंतामणि’ पर उन्हें अत्यंत प्रतिष्ठित मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया।

कवि रूप में आचार्य शुक्ल जी- 
बस्ती के छन्दकार भाग 1 की कृति डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 180 पर लिखा है कि आचार्य शुक्लजी ब्रजभाषा और खड़ीबोली में फुटकर कविताएँ लिखीं तथा एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ‘बुद्ध चरित’ के नाम ब्रजभाषा में पद्यानुवाद आठ सर्ग 25 भागों में किया। शुक्ल जी ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि “रामकृष्ण की इसी लीला भूमि पर भगवान् बुद्धदेव भी हुए हैं जिनके प्रभाव से एशिया खंड का सारा पूर्वार्द्ध भारत को इस गिरी दशा में भी प्रेम और श्रद्धा की दृष्टि से देखता चला जा रहा है। रामकृष्ण के चरितगान का मधुर स्वर भारत की सारी भाषाओं में गूँज रहा है पर बौद्ध धर्म के साथ ही गौतम बुद्ध की स्मृति तक जनता के हृदय से दूर हो गई है। 'भरथरी' और 'गोपीचन्द' के जोगी होने के गीत गाकर आज भी कुछ रमते जोगी स्त्रियों को करुणार्द्र करके अपना पेट पालते चले जाते हैं पर कुमार सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण की सुधा दिलानेवाली वाणी कहीं भी नहीं सुनाई पड़ती है। जिन बातों से हमारा गौरव था उन्हें भूलते-भूलते आज हमारी यह दशा हुई। यह 'बुद्धचरित' अंग्रेजी के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का हिन्दी काव्य के रूप में अवतरण है। यद्यपि ढंग इसका ऐसा रखा गया है कि एक स्वतन्त्र हिन्दी काव्य के रूप में इसका ग्रहण हो पर साथ ही मूल पुस्तक के भावों को स्पष्ट करने का भी पूर्ण प्रयत्न किया गया है। दृश्य वर्णन जहाँ अयुक्त या अपर्याप्त प्रतीत हुए वहाँ बहुत कुछ फेरफार करना या बढ़ाना भी पड़ा है। यदि काव्य परंपरा के प्रेमियों का कुछ भी मनोरंजन होगा तो मैं अपना श्रम सफल समझूँगा। जिस वाणी में कई करोड़ हिन्दी भाषी रामकृष्ण के मधुर चरित का स्मरण करते आ रहे हैं उसी वाणी में भगवान् बुद्ध को स्मरण कराने का यह लघु प्रयत्न है। यद्यपि यह वाणी ब्रजभाषा के नाम से प्रसिद्ध है पर वास्तव में अपने संस्कृत रूप में यह सारे उत्तरपथ की काव्य भाषा रही है।“ - रामचन्द्र शुक्ल के अनुवाद का एक नमूना प्रस्तुत है-

कर्म को सिद्धांत है यह, लेहु याको जानि।
पाप के सब पुंज की ह्नै जाति है जब हानि,
जात जीवन जबै सारो लौ समान बुताय।
तबै ताके संग ही यह मृत्यु हू मरि जाय।।
 
'हम रहे,' 'हम हैं', 'होयँगे हम' कहौ जनियहबात,
समझौ न पथिकन सरिस पल के घरन में बहु,भ्रात!
तुम एक छाँड़त गहत दूजो करत आवत बास,
सुधि राखि अथवा भूलि जो कछु होत दु:ख सुपास।।
 
रहि जात है कछु नाहिं प्राणी मरत है जा काल,
चैतन्य अथवा आतमा नसि जात है ज्यों ज्वाल।
रहि जात केवल कर्म ही है शेष विविध प्रकार,
बहु खंड तिनसों लहत उद्भव जन्म जोरनहार।।
 
जग माहिं तिनको योग प्रगटत जीव एक नवीन,
सो आप अपने हेतु घर रचि होत वामें लीन।
ज्यों पाटवारो कीट आपहि सूत कातत जाय,
पुनि आप वामें बसत है जो लेत कोश बनाय।।
 
सो गहत भौतिक सत्व औ गुण आपही रचि जाल- 
ज्यों फूटि विषधर अंड केंचुर दंष्ट्र गहत कराल,
ज्यों पक्षधार शरबीज घूमत उड़त नाना ठौर,
लहि वारितट कहुँ बढ़त, फेंकत पात, धारत मौर।।
 
या नए जीवन की प्रगति शुभ अशुभ दिशि लै जाय।
जब हनत काल कराल पुनि निज क्रूर करहि उठाय।
रहि जात तब वा जीव को जो शेष शुद्धि विहीन,
सो फेरि झंझावात झेलत सहत ताप नवीन।।
 
पै मरत है जब जीव कोऊ पुण्यवानसुधीर,
बढ़ि जाति जग की संपदा कछु, बहत सुखद समीर।
मरु भूमि की ज्यों धार बालू बीच जाति बिलाय।
ह्नै शुद्ध निर्मल फेरि चमकति कढ़ति है कहुँ जाय।।
 
या भाँति अर्जित पुण्य अर्जित करत है शुभकाल,
यदि पाप ताको देत बाधा रुकति ताकी चाल।।

प्रमुख कृतियाँ
        काव्य में रहस्यवाद, विचार वीथि (मनोविकार संबंधी लेखों का पहला संग्रह), चिंतामणि-1 (विचार वीथि का परिवर्द्धित और परिष्कृत रूप), चिंतामणि-2 (काव्य में प्राकृतिक दृश्य, रहस्यवाद, अभिव्यंजना- वाद संबंधी लेखों का संग्रह। सं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र), चिंतामणि-3 (कुछ अप्रकाशित लेखों का संग्रह। सं. नामवर सिंह), त्रिवेणी (सुर, तुलसी, जायसी पर तीन निबंधों का संग्रह), हिंदी साहिय का इतिहास, रस मीमांसा, मालिक मुहम्मद जायसी, गोवास्मी तुलसीदास, साहित्य शास्त्र: सिद्धांत और व्यवहार पक्ष, भाषा, साहित्य और समाज विमर्श। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली (सं. ओमप्रकाश सिंह) के आठ खंडों में उनकी रचनाओं को संग्रहीत किया गया है।

आचार्य शुक्ल पुस्तकालय अग़ौना दयनीय हालत में:- 
बस्ती शहर से 25 किमी दूर रामजानकी मार्ग पर समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्म स्थली अगौना स्थित है। हिंदी साहित्य का इतिहास समेत कई कालजयी रचनाएं देने वाले आचार्य शुक्ल के गांव में कहने को उनके नाम से एक पुस्तकालय स्थापित है।आचार्य शुक्ल के पौत्र रामेंद्र त्रिपाठी (आइएएस) के प्रयास से यहां धर्मशाला और पुस्तकालय की स्थापना हुई है । उनके जाने के बाद से यहां की दशा देखने वाला कोई नहीं है। गांव में न कोई साहित्य प्रेमी पहुंचता है और न ही शासन - प्रशासन की तरफ से कोई आयोजन होता है। हिंदी साहित्य को जन - जन तक पहुंचाने वाले आचार्य अपने ही क्षेत्र में गुम हो कर रह गए हैं। पास के एक शिक्षा विद डा. के. पी. मिश्रा साल में एक बार आचार्य जी की जयंती जरूर मना लेते हैं। ये ही आचार्य राम चन्द्र शुक्ल बालिका विद्यालय के प्रबंधक भी है। इनकी पत्नी इस कालेज की प्रधानाचार्य भी रह चुकी हैं। 

जनता इण्टर कॉलेज नगर बाजार बस्ती के पूर्व प्राचार्य डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' अपने कार्यकाल और जीवन पर्यन्त इस स्थल के उत्तरोत्तर विकास के लिए प्रयासरत रहे। अभी भी शुक्ल जी की जयंती के अवसर पर अग़ौना में विविध सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं।

आचार्य शुक्ल’ विषयक विशेष परिचर्चा वाराणसी में आयोजित -
बीएचयू के मुक्ताकाशी मंच ‘पुलिया प्रसंग’ की ओर से हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल की 142वीं जयंती पर रविवार को ‘हिंदी आलोचना में आचार्य शुक्ल’ विषयक विशेष परिचर्चा हुई। अध्यक्षता कर रहे प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को रीढ़ दी। उन्होंने आलोचना के देशज स्वरूप की खोज की। वे पश्चिम से टकराते हुए हिंदी आलोचना को स्वाधीनता प्रदान करते हैं। मुख्य वक्ता प्रो.कमलेश वर्मा ने शुक्लजी की आलोचना को ‘साधनावस्था की आलोचना’ कहा। उनका स्पष्ट मत था कि साहित्य में जब किसी ‘वाद’ की प्रधानता हो जाती है, तो वह नष्ट हो जाता है। उन्होंने भावों के उन्नयन और साधारणीकरण पर विशेष बल दिया। डॉ.महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि शुक्लजी स्वप्नदृष्टा आलोचक थे। उन्होंने आलोचना में गुण-दोष विवेचन से उठकर समग्र मूल्यांकन को महत्व दिया। डॉ.विंध्याचल यादव ने कहा शुक्लजी की आलोचना स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना से अनुप्राणित थी जिसमें लोकमंगल की अवधारणा प्रमुख थी। डॉ.उपेंद्र सत्यार्थी, डॉ.शैलेंद्र कुमार सिंह, डॉ.आर्यपुत्र दीपक, डॉ.उदय पाल, अमित कुमार, पंकज यादव ने भी विचार रखे। संचालन शिवम यादव और धन्यवाद ज्ञापन राकेश गुप्ता ने किया।

देश भर में श्रद्धांजलि का तांता 
आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार, समीक्षक और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर देशभर के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल दिनेश शर्मा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा, "आधुनिक हिंदी के महान साहित्यकार, समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।"

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी आचार्य शुक्ल को याद किया। उन्होंने लिखा, "हिन्दी साहित्य के महान आलोचक एवं साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन! उन्होंने अपनी गहन साहित्यिक दृष्टि, आलोचनात्मक चिंतन और प्रभावशाली लेखनी से हिन्दी साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उनका अमूल्य योगदान हिंदी जगत में सदैव स्मरणीय रहेगा।"

बिहार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने अपने संदेश में कहा, "महान समीक्षक, लेखक एवं प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। हिंदी साहित्य के विकास में उनके अतुलनीय योगदान और उनकी समृद्ध साहित्यिक विरासत को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।"

मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने लिखा, "हिन्दी साहित्य के समृद्ध विकास में अतुलनीय योगदान देने वाले महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर उन्हें सादर नमन करता हूं। साहित्य के प्रति उनका गहन चिंतन एवं उनकी कालजयी कृतियां आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेंगी।"

भाजपा नेता बजरंग बहादुर सिंह ने आचार्य शुक्ल को युगद्रष्टा बताते हुए लिखा, "हिन्दी साहित्य के युगद्रष्टा आलोचक एवं महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन ! अपनी अद्वितीय साहित्यिक दृष्टि, गहन चिंतन और सशक्त लेखनी के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध करते हुए उसे नई दिशा प्रदान की।"

वहीं भाजपा नेता आशुतोष त्रिपाठी ने कहा, "हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार एवं मूर्धन्य समीक्षक, आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में उनके अतुलनीय योगदान को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनकी साहित्यिक दृष्टि और विचारधारा आज भी साहित्य जगत को मार्गदर्शन प्रदान करती है।"

बस्ती शहर के बड़ेबन चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी है। जिलाधिकारी आवास के तिराहे पर भी उनकी एक आदम कद प्रतिमा लगी हुई है। बस्ती की जनता उनके नाम से विश्व विद्यालय की मांग भी करती आ रही है। टाउन हाल बस्ती पुस्तकालय तथा बस्ती रेलवे पुस्तकालय भी आचार्य शुक्ल जी समर्पित है। हम आज उनके जन्म दिवस के अवसर पर उन्हें सादर नमन करते हैं।




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