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Saturday, April 20, 2024

मोहन प्यारे द्विवेदी द्वारा संकलित प्रिय भजन आचार्य पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन "


             आचार्य पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी "मोहन "

            ये भजन प्रायः पण्डित मोहन प्यारे द्विवेदी अपने दैनिक जीवन में दुहराते रहते थे। इनमें कुछ तो उनके द्वारा स्वयं लिखे हुए हैं, कुछ उन्हें पसन्द आने पर संकलित किए हुए हैं। वे सूर कबीर तुलसी दास जी मीरा रैदास और नानक जी के प्रिय भजन भी गाते थे। उन्हें जिस किसी भी स्रोत से यह मिला, यह उन्हे पसन्द आए और वे इसे अपनी जीवन चर्या का अंग बना लिए थे। आइए इन पर एक नजर डालें।

1 . मन की तरंग मार लो बस हो गय भजन (कबीरदास)

मन की तरंग मार लो बस हो गय भजन ।
आदत बुरी सुधार लो बस हो गया भजन ॥

आऐ हो तुम कहाँ से जाओगे तुम कहाँ ।
इतना सा बस विचार लो बस हो गया भजन ॥

कोई तुमहे बुरा कहे तुम सुन करो क्षमा ।
वाणी का स्वर संभार लो बस हो गया भजन ॥

नेकी सबही के साथ में बन जाये तो करो ।
मत सिर बदी का भार लो बस हो गया भजन ॥

कहना है साफ साफ ये सदगुरु कबीर का ।
निज दोष को निहार लो बस हो गया भजन ॥

2. पितु मातु सहायक स्वामी सखा 

( परम्परागत , स्वर : स्व.मुकेश कुमार)

पितु मातु सहायक स्वामी सखा तुमही एक नाथ हमारे हो.
जिनके कछु और आधार नहीं तिन्ह के तुमही रखवारे हो.
सब भांति सदा सुखदायक हो दुःख दुर्गुण नाशनहारे हो.
प्रतिपाल करो सिगरे जग को अतिशय करुणा उरधारे हो.
भुलिहै हम ही तुमको तुम तो हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो.
उपकारन को कछु अंत नही छिन ही छिन जो विस्तारे हो.
महाराज! महा महिमा तुम्हरी समुझे बिरले बुधवारे हो.
शुभ शांति निकेतन प्रेम निधे मनमंदिर के उजियारे हो.
यह जीवन के तुम्ह जीवन हो इन प्राणन के तुम प्यारे हो.
तुम सों प्रभु पाइ प्रताप हरि केहि के अब और सहारे हो।।
 
3. तूने रात गँवायी सोय के (कबीरदास )
 
तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय रे।
सुमिरन लगन लगाय के मुख से कछु ना बोल रे।
बाहर का पट बंद कर ले अंतर का पट खोल रे।
माला फेरत जुग हुआ गया ना मन का फेर रे.।
 गया ना मन का फेर रे ।

मनका मनका छँड़ि दे मनका मनका फेर रे ।
दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय रे ।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय रे ।
सुख में सुमिरन ना किया दुख में करता याद रे।
दुख में करता याद रे ।
कहे कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद रे।।

4. हे गोविन्द राखो शरन ( सूरदास)

हे गोविन्द राखो शरन अब तो जीवन हारे।
नीर पिवन हेत गयो सिन्धु के किनारे।
सिन्धु बीच बसत ग्राह चरण धरि पछारे।
चार प्रहर युद्ध भयो ले गयो मझधारे।
नाक कान डूबन लागे कृष्ण को पुकारे।
 द्वारका मे सबद दयो शोर भयो द्वारे।
शन्ख चक्र गदा पद्म गरूड तजि सिधारे।
 सूर कहे श्याम सुनो शरण हम तिहारे।
अबकी बेर पार करो नन्द के दुलारे।।

5. मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में (कबीर दास)

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
जो सुख पाऊ राम भजन में 
सो सुख नाहिं अमीरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
भला बुरा सब का सुन लीजै, 
कर गुजरान गरीबी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
आखिर यह तन छार मिलेगा।
कहाँ फिरत मग़रूरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
प्रेम नगर में रहनी हमारी।
साहिब मिले सबूरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
कहत कबीर सुनो भयी साधो,
साहिब मिले सबूरी में।
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।।

6.भोली राधिका उठा तू गोद लेते थे।
(मोहन शतक से)

नंदजी को नंदित किए हो खेल बार-बार, 
अम्ब जसुदा को तू कन्हैया मोद देते थे।
कुंजन में कुंजते खगों के बीच प्यार भरे, 
हिय में दुलार ले उन्हें विनोद देते थे।
देते थे हुलास ब्रज वीथिन में घूम- घूम
मोहन अधर चूमि तू प्रमोद देते थे।
नाचते कभी थे ग्वाल ग्वालिनों के संग कभी, 
 भोली राधिका उठा तू गोद लेते थे।।

7 . स्वरचित कवित्त: -गाते रहो गुण ईश्वर के 
          ( ''नवसृजन'' अप्रैल-जून 1979 )

गाते रहो गुण ईश्वर के 
जगदीश को शीश झुकाते रहो।
छवि 'मोहन' की रक्खी नैनन में, 
नित प्रेम की अश्रु बहाते रहो।
नारायण स्वरूप धरो मन में, 
मन से मन को समझाते रहो।
करुणा करि के करुणानिधि को, 
करुणा के गीत सुनाते रहो।। 

8. स्वरचित कवित्त्त ; रही अंत समय मन में मनकी।

जग में जनमें जब बाल भये, 
तब एक रही सुधि भोजन की।
कुछ और बड़े जब हुए तभी 
तन तरूणी की रही कामना तन की।
जब वृद्ध भयो मन तृष्णा ना गई 
सब लोग कहते हैं सनकी सनकी।
सुख! 'मोहन' नहीं मिल्यो कबहूँ, 
रही अंत समय मन में मनकी।। 

9. स्वरचित भजन
प्रेम रस भीगे सने मुक्ति को पा जाते हैं। 

भागवत वेदान्त का सार कहा जाता है,
रसामृत पान से तृप्ति मिल जाती है।
सेवन,आस्वादन भागवत वाक्य कान में 
जीव को हरी का गोलोक मिल जाती हैं।
तेज जल स्थल जाग्रत और स्वप्न में 
सुषुप्ति सृष्टि मिथ्या सत्य हो जाती है।
स्वयं प्रकाश माया कार्य से मुक्त होते 
सत्य स्वरूप चित्त ध्यानस्थ हो जाती हैं।
उनकी प्रतिष्ठा से सुख गति मिलता है 
मित्र प्रेम भाव से अनन्यता मिल जाती है।
उनकी ही आस ले यह द्विज मोहन प्यारे 
प्रेम रस भीगे सने मुक्ति को पा जाती है।।


10 .स्वरचित भजन
हरि नाम जपो हरि नाम जपो 

हरि नाम बड़ा अलबेला है , 
लगता नहीं पैसा अधेला है 
यह जीते जी का मेला है  
हरि नाम जपो हरि नाम जपो ।

जो जन हरि को नहीं ध्यता है, 
वो लाखों कष्ट उठाता है।
 शिर धुनि कर पछताते है, 
हरि नाम जपो हरि नाम जपो ।

जो कल करना हो सो आज कर लो 
जो आज करना है सो अब कर लो ।
मत एक क्षण का विश्वास करो, 
हरि नाम जपो हरि नाम जपो ।

हरि का भजना सुख दाता है 
 हरि का रसना सुख दाता है 
हरि भक्त हरी को पाता है 
,हरि नाम जपो हरि नाम जपो ।।

11. स्वरचित भजन
 हरि नाम जपो नहीं कोई अपना.

हरि नाम जपो ,नहीं कोई अपना 
हरि नाम राम रटले रसना ।
हरि नाम जपो हरि नाम जपो
निस्सार जगत में और हैं कुछ ना।
यह सोच राम भज रेन दिना,
हरि नाम जपो नहीं कोई अपना ।

जो भव सागर चाहो तरना ,
एक राम नाम चित्त में धरना ।
अनमोल स्वास न कभी खोना ,
हरि नाम जपो नहीं कोई अपना ।

इन तन का मोह नहीं करना ,
यह एक दिन रज में मिलना ।
चित्त में हरि चरण ध्यान धरना ,
हरि नाम जपो नहीं कोई अपना।

बस चार दिन जग में रहना ,
फिर अपने निजी देश चलना ।
अब वाद - विवाद नहीं करना ।
हरि नाम जपो नहीं कोई अपना।

सब कर्म - अकर्म तो कुछ करना ,
सब अपने प्रभु को भेंट करना ।
फिर यम के त्रास से नहीं डरना ,
हरि नाम जपो कोई नहीं अपना।

सुखदायक हैं तो ये श्री चरना ,
फलदायक हैं तो ये श्री चरणा 
कर जोड़ के विनती करूँ कृष्णा ,
हरि नाम जपो नहीं कोई अपना .।।

12. नानक देव जी का प्रिय भजन :-

सुमिरन कर ले मेरे मना, तेरी बीती उमर हरिनाम बिना
कूप नीर बिनुं, धेनुं छीर बिनुं, धरती मेह बिना।
जैसे तरुवर फल बिन हीना, तैसे प्रानी हरिनाम बिना।
देह नैन बिन, रैन चंद बिना, मंदिर दीप बिना।
जैसे पंडित बेद बिहीना, तैसे प्रानी हरिनाम बिना।
काम क्रोध मद लोभ निहारो, छांड दे अब संतजना।
कहे नानकशा सुन भगवंता, या जगमें नहीं कोई अपना।।

13.मांगलिक श्लोकः- 

उन दिनों तीन दिनों की शादी बारात जाती थी। पहले दिन शादी दूसरे दिन बड़हार और शिष्टाचार होता था। इसमें विद्वत जन बर बधू और दोनो पक्ष को मंगल श्लोक तथा आशीर्वाद देते थे। ऐसे अवसर पर पंडितजी इस प्रकार की मांगलिक शब्दावली का प्रयोग करते थे-

अहि यतिरहि लोके, शारदा साऽपि दूरे।
बसति विबुध वन्द्यः, शक्र गेहे सर्वदा।
निवसति शिवपुर्यम्, षण्मुखोऽसौकुमारः।
तवगुण महिमानम्, को वदेदात्र श्रीमान्।।

अर्थ :- 
 बिना किसी रुकावट के सांप के लोक में जो शिव जी रहते हैं उनकी महिमा का गुणगान कौन कर सकता है क्योंकि सरस्वती जी भी उनसे दूर रहती हैं। जो इंद्र के घर सदा अपने बंधु बांधवों के साथ रहते हैं । जिनके पुत्र कार्तिकेय के छ: मुख हैं और जो शिव लोक में निवास करते हैं। श्री मान आपके गुणों की महिमा आज कौन कर सकता है। अर्थात आपके महान गुणों का बखान कोई नही कर सकता है।

अजब गजब/चित्र विचित्र अर्थ वाला मंगल श्लोक 

नन्वासस्यां समाजयां ये ये चन्द्राः पण्डिताः, वैकणाः, नैयायिकाः वेदान्तज्ञदयो वर्तन्ते, तं तं सर्वान् प्रति अस्य श्लोकस्यार्थस्य कथनार्थम् निवेदयामि। सोऽयं श्लोकः-

 इस समाज में उपस्थित जो जो पण्डित व्याकरण ज्ञाता न्याय शास्त्र के ज्ञाता वेदान्त के ज्ञाता उपस्थित हैं, उन उन सबसे निवेदन है कि इस श्लोक का अर्थ बतलाने की कृपा करें।

''ति गौ ति ग ति वा ति त्वं प री प न प नि प पं
मा प धा प र प द्या अंतु उ ति रा सु ति ति वि ते।''


 ( प्रस्तुति: आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी)


कवि परिचय :- 

(आशुकवि आचार्य पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी का जन्म 1 अप्रैल 1909 में बस्ती जिले दुबौली दूबे नामक गांव में हुआ था। उन्होंने समाज में शिक्षा के प्रति जागरुकता के लिए आजीवन प्राइमरी विद्यालय करचोलिया का प्रधानाचार्य पद निभाया था। सेवानिवृत्त लेने बाद लगभग दो दशक वे नौमिषारण्य में भगवत भजन में लीन रहे। उनकी मुख्य रचनाएँ : नौमिषारण्य का दृश्य, कवित्त, मांगलिक श्लोक, मोहन शतक आदि है। वे दिनांक 15 अप्रॅल 1989 को 80 वर्ष की अवस्था में अपने मातृभूमि में अंतिम सासें लेकर परमतत्व में समाहित हो गये l )

Wednesday, March 2, 2022

सृष्टि का प्रारम्भ डा. राधे श्याम द्विवेदी

सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से श्वास ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।' -ऋग्वेद
सृष्टि की उत्पत्ति पंच तत्व से:-
आप पांच तत्वों आकाश, वायु, अग्नि, जल और ग्रह (धरती या सूर्य)।को तो जानते ही हैं। अग्नि जल, प्राण और मन भी महत्व पूर्ण तत्व है । प्राण तो वायु है और मन तो आकाश है। शरीर तो जड़ जगत का हिस्सा है। अर्थात धरती का। जो भी दिखाई दे रहा है वह सब जड़ जगत है। नीचे गिरने का अर्थ है जड़ हो जाना और ऊपर उठने का अर्थ है ब्रह्माकाश हो जाना। अब इन पांच तत्वों से बड़कर भी कुछ है क्योंकि सृष्टि रचना में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान रहा है। आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्न‍ि, अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औ‍षधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात शरीर उत्पन्न होता है।
भगवान विष्णु के प्रयास से:-
सृष्टि सर्वव्यापी सर्वज्ञ ईश्वर की रचना है। हिंदू धर्म के अनुसार सृष्टि अनादि काल से आरंभ विलय का विषय रहा है। यह अनंतकाल तक ऐसा ही रहेगा।भगवान विष्णु के कान के मैल से निकले मधु और कैटभ राक्षस जिन्होंने ब्रह्मा जी को ही खाने के लिए दौड़ लगा दी ! ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की शरण में गए और उनकी आराधना करने लगे। भगवान विष्णु ने उन दोनों राक्षसों से एक लंबा युद्ध किया और बाद में उनके टुकड़े काट काट के फेंक दिए ! जहां उनके टुकड़े गिरे वही पृथ्वी बन गई।
सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्माजी से:-
ब्रह्मा जी ने आदि देव भगवान की खोज करने के लिए कमल की नाल के छिद्र में प्रवेश कर जल में अंत तक ढूंढा। परंतु भगवान उन्हें कहीं भी नहीं मिले। ब्रह्मा जी ने अपने अधिष्ठान भगवान को खोजने में सौ वर्ष व्यतीत कर दिये। अंत में ब्रह्मा जी ने समाधि ले ली। इस समाधि द्वारा उन्होंने अपने अधिष्ठान को अपने अंतःकरण में प्रकाशित होते देखा। शेष जी की शैय्या पर पुरुषोत्तम भगवान अकेले लेटे हुए दिखाई दिये। ब्रह्मा जी ने पुरुषोत्तम भगवान से सृष्टि रचना का आदेश प्राप्त किया और कमल के छिद्र से बाहर निकल कर कमल कोष पर विराजमान हो गये। ब्रह्मा जी ने उस कमल कोष के तीन विभाग भूः भुवः स्वः किये। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का दृढ़ संकल्प लिया और उनके मन से मरीचि, नेत्रों से अत्रि, मुख से अंगिरा, कान से, पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगूठे से दक्ष तथा गोद से नारद उत्पन्न हुये। इसी प्रकार उनके दायें स्तन से धर्म, पीठ से अधर्म, हृदय से काम, दोनों भौंहों से क्रोध, मुख से सरस्वती, नीचे के ओंठ से लोभ, लिंग से समुद्र तथा छाया से कर्दम ऋषि प्रकट हुये। इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मा जी के मन और शरीर से उत्पन्न हुये। ब्रह्मा जी को लगा कि मेरी सृष्टि में वृद्धि नहीं हो रही है तो उन्होंने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त कर दिया जिनका नाम 'का' और 'या' (काया) हुये। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था। मनु और शतरूपा ने मानव संसार की शुरुआत की। 
हिरण्यगर्भ में ब्रह्मा के प्रवेश से:-
मत्स्य पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना एक सुनहरे गर्भ में ब्रह्मा के प्रवेश कर जाने के फलस्वरूप हुई है। इसी गर्भ को हिरण्यगर्भ की संज्ञा दी गई है, जबकि सांख्य दर्शन सृष्टि की रचना की गुत्थी को पुरुष तथा प्रकृति नामक दो शाश्वत तत्वों के आधार पर सुलझाने का प्रयास करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष शुद्ध चेतन स्वरूप है तथा प्रकृति तमस, रजस तथा सत्व नामक त्रिगुणों से युक्त अचेतन तत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व प्रकृति के तीनों गुण एक संतुलन की स्थिति में शांत अवस्था में विद्यमान रहते हैं। किंतु अनादि काल में पुरुष की प्रकृति से निकटता के कारण ये तीन तत्व कम्पायमान अवस्था में आकर सृष्टि का निर्माण करने लगते हैं। इस दर्शन के अनुसार जब पुरुष अथवा शुद्ध चैतन्य, प्रकृति के इस नृत्य अथवा क्रीड़ा से स्वयं को तटस्थ कर स्वयं में लीन हो जाता है तब वह कैवल्य अथवा मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
जीव जंतु का निर्माण:-
ब्रह्मा जी के हिस्से पर आया पृथ्वी के निर्माण का काम अब जीव जंतु बनाने का आदेश मिला ! अब चार ऋषि सनक,सानंदन, सनातन और सनत कुमार की रचना की ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निर्माण के लिए परंतु उन्होंने ईश्वर आराधना को अपनाया जिससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें सदैव बालक रूप में ही रहने का शाप दे दिया जो कि अजर और अमर है कुमारों के मना करने के बाद ब्रह्मा जी ने अपने चारों सिरों से दो दो ऋषि बनाने का संकल्प लिया! आप के मन में यह प्रश्न आ सकता है ऋषि तो सात ही है आठवे ऋषि कौन है ! तो आपको बताना चाहेगे की वे जामवंत है! जो ऋषि पुलस्त्य के भाई है ! इसका प्रमाण आपको रामायण और कई पुराणों में मिल जायेगा !   
सृष्टि की रचना क्यों, कब और कैसे हुई? यह प्रश्न हमेशा से मानव जाति के लिए एक अनबूझ पहेली बना रहा है। इसके अतिरिक्त इस प्रश्न की विशेषता तथा महत्व इस बात से भी है कि विज्ञान तथा धर्म, विचार पद्धतियां समान रूप से इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उत्सुक तथा तत्पर दिखाई पड़ती हैं। बौद्ध दर्शन में ब्रह्मांड की उत्पत्ति, आत्मा और ईश्वर आदि की अवधारणा संबंधी प्रश्नों को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया है। जबकि सांख्य दर्शन ने इसे पुरुष और प्रकृति बताया है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति पुरुष और प्रकृति के क्रियाशीलता से भी होता है। 
सर्वव्यापी विस्फोट विकास के क्रम से:-
इससे इतर वैज्ञानिकों के अनुसार सृष्टि की रचना एक सर्वव्यापी विस्फोट के साथ हुई, जिसे वह बिग-बैंग की संज्ञा देते हैं। इसके कारण ब्रह्माण्ड अब भी विस्तार पा रहा है। दसवीं शताब्दी में भारतीय दार्शनिक उद्यन अपने ग्रंथ न्यायकुसुमांजलि में कहते हैं कि जिस प्रकार संसार की सभी वस्तुएं अपनी रचना तथा विकासक्रम के लिए किसी अन्य बुद्धिमान जीव पर निर्भर करती हैं, उसी प्रकार पृथ्वी भी एक वस्तु के समान है, जिसकी सृष्टि तथा विकासक्रम किसी सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान सत्ता पर निर्भर करता है तथा इस सत्ता का नाम ईश्वर है। 



Tuesday, March 1, 2022

निराकार परमब्रम्ह सदाशिव से सृष्टि का उद्भव

निराकार परमब्रम्ह सदाशिव से सृष्टि का उद्भव
डा. राधे श्याम द्विवेदी
शिव पुराण के अनुसार भगवान सदा शिव का जन्म नहीं हुआ था। शिव जी स्वयंभू हैं अर्थात सदा शिव प्रकट नहीं हुए थे, वह तो निराकार परमात्मा हैं जो तब भी थे जिस समय पूरी सृष्टि अंधकार में लीन थी। उस समय सृष्टि में न ही जल था, न अग्नि थी और न ही वायु था। तब केवल तत सत ब्रम्हा ही थे जिन्हें सनातन धर्म मे सत भी कहा गया है। तत सत ब्रम्हा ने कुछ समय बाद एक से दो होने को सोचा ,तब तट सत ब्रम्हा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना करके मूर्ति रहित परम ब्रम्ह बनाया। परम ब्रम्ह ही सदा शिव कहलाए।
त्रिदेव की उत्पत्ति:-
 ब्रम्ह रूपी सदा शिव ने शक्ति स्वरूपा जगत जननी माँ अम्बिका को प्रकट किया। इसी परम ब्रम्हा रूपी सदा शिव और अम्बिका से ब्रम्हा , विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई। ऐसा माना जाता है कि परम ब्रम्ह सदा शिव और माँ अम्बिका ने सबसे पहले भगवान शिव की उत्पत्ति की, जिन्हें सृष्टि का संघारक कहा जाता है। उसके कुछ समय बाद सृष्टि निर्माण के लिए सदा शिव ने अपने वाम अंग पर अमृत मला जिससे एक पुरुष प्रकट हुआ। सदा शिव ने उस पुरुष को व्यापक के कारण के लिए विष्णु नाम दिया। इसके बाद सदा शिव ने अपने दाहिने हाथ से एक दिव्य ज्योति उत्पन्न करके उसे विष्णु जी के नाभि कमल में डाल दिया, कुछ समय बाद विष्णु जी की नाभि कमल से, ब्रम्हा जी उत्पन्न हुए। इस प्रकार त्रिदेव ब्रम्हा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई। इससे यह साबित होता है कि त्रिदेव के माता पिता परम् ब्रम्हा सदा शिव और शक्ति स्वरूपा जगत जननी माँ अम्बिका जी हैं।
त्रिदेव का अस्तित्व और उनको प्रणाम :-
“रजोजुषे जन्मनि सतववरततै:
 स्थितौ प्रजानाम प्रलये तमः स्परशे ,
अजाय सर्ग स्थिति नाशहेतवे 
त्रयी मयाय त्रिगुणात्मने नमः ।।”
अर्थात रजोगुण को धारण करने वाले ब्रह्माजी, प्रजा को स्थिति रखने के लिए! सतोगुण को धारण करने वाले पालनहार विष्णु जी, प्रलय के समय तमो गुण को धारण करने वाले शिवजी इन तीनों ही स्थितियों को शक्तियों को बनाने और मिटाने वाले इन तीनों की एकीकृत शक्ति तीनों की आत्मा को खुद को तीन भागो में विभक्त करता है और फिर इन तीनों के द्वारा अपने आप को असंख्य रूप में प्रकट करता है! पालता है और फिर खुद निगल कर पुनः अपने ने समाहित कर लेता है ! ऐसे महान अजाय अर्थात अजन्मा परमब्रह्म परमात्मा को नमस्कार करता हूं।
त्रिदेव में श्रेष्ठ कौन :-
हिन्दू धर्म मे त्रिदेव ब्रम्हा, विष्णु और महेश को सभी देवताओं में सबसे श्रेष्ठ और पूजनीय माना जाता है। जिसमें ब्रम्हा देव को सृष्टि का रचनाकार, श्री हरि विष्णु को सृष्टि का पालनहार और शिव जी को सृष्टि का विनाशक माना गया है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा ही हिन्दू धर्म के अनुयायी के मन मे उठता है कि ब्रम्हा, शिव और विष्णु की उत्पत्ति कैसे हुई, और इन तीनों में सबसे श्रेष्ठ कौन है?
कहते हैं देवताओ में त्रिदेव का सबसे अलग स्थान प्राप्त है और इसमें ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता, भगवान् विष्णु को संरक्षक और भगवान् शिव को विनाशक कहा जाता है. ऐसे में कई लोग यह सोचते है की त्रिदेव की उत्त्पत्ति कैसे हुई अर्थात कैसे उन्होंने जन्म लिया इस संसार में. अगर आप भी इस बारे में सोचते हैं तो आज हम आपको एक प्रसंग बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर पढ़कर आप समझ जाएंगे कि कैसे त्रिदेव की उत्पति हुई थी। 
भगवान शिव ने एक बार सोचा – “अगर मै विनाशक हूँ तो क्या मै हर चीज का विनाश कर सकता हूँ ? क्या मै ब्रह्मा और विष्णु का विनाश भी कर सकता हूँ ? क्या उन पर मेरी शक्तियां कारगर होंगी?” जब भगवान् शिव के मन में यह विचार आया तो भगवान् ब्रह्मा और विष्णु समझ गए कि उनके मन में क्या चल रहा है. वे दोनों मुस्कुराने लगे. ब्रह्मा जी बोले – “महादेव. आप अपनी शक्तियां मुझ पर क्यों नहीं आजमाते ? मै भी यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपकी शक्तियां मुझ पर कारगर हैं या नहीं। 
”जब विष्णु भगवान् ने भी हठ किया तो भगवान् शिव ने सकुचाते हुए ब्रह्मा जी के ऊपर अपनी शक्तियों का प्रयोग कर दिया. देखते ही देखते ब्रह्मा जी जलकर भष्म हो गए. जैसे ही शिव जी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग किया ब्रह्मा जी जलकर गायब हो गए और उनकी जगह एक राख का छोटा सा ढेर लग गया. शिव जी चिंतित हो गए – “ये मैंने क्या किया ? अब इस विश्व का क्या होगा ?” भगवान् विष्णु मुस्कुरा रहे थे. उनकी मुस्कान और भी चौड़ी हो गई जब उन्होंने शिव जी को पछताते हुए घुटनों के बल बैठते देखा.शिव जी पछताते हुए उस राख को मुठ्टी में लेने ही वाले थे कि उस राख में से ब्रह्मा जी पुनः प्रकट हो गए.
वे बोले –“महादेव, मै कहीं नहीं गया हूँ. मै यही पर हूँ. देखो , आपके विनाश के कारण इस राख की रचना हुई. और जहाँ भी रचना होती है वहां मैं होता हूँ. इसलिए मै आपकी शक्तियों से भी समाप्त नहीं हुआ.” भगवान् विष्णु मुस्कुराये और बोले –“महादेव , मै संसार का रक्षक हूँ. मै भी देखना चाहता हूँ कि क्या मै आपकी शक्तियों से स्वयं कि रक्षा कर सकता हूँ ? कृपया मुझ पर अपनी शक्तियों का प्रयोग करें.” जब ब्रह्मा जी ने भी हठ किया तो शिव जी ने विष्णु जी को भी अपनी शक्तियों से भष्म कर दिया. विष्णु जी के स्थान पर अब वहां राख का ढेर था लेकिन उनकी आवाज़ राख के ढेर से अब भी आ रही थी. वह आवाज़ थी – “महादेव , मै अब भी यही हूँ. कृपया रुके नहीं। अपनी शक्तियों का प्रयोग इस राख पर भी कीजिये. तब तक मत रुकिए जब तक कि इस राख का आखिरी कण भी ख़त्म न हो जाये। ”
भगवान् शिव ने अपनी शक्तियों को और तेज कर दिया. राख कम होनी शुरू हो गयी. अंत में उस राख का सिर्फ एक कण बचा.भगवान् शिव ने सारी शक्तियां लगा दी लेकिन उस कण को समाप्त नहीं कर पाए. भगवान् विष्णु उस कण से पुनः प्रकट हो गए और यह सिद्ध कर दिया कि उन्हें भगवान् शिव भी समाप्त नहीं कर सकते.भगवान् शिव ने मन ही मन सोचा – “मुझे विश्वास हो गया कि मै ब्रह्मा और शिव को सीधे समाप्त नहीं कर सकता. लेकिन अगर मै स्वयं का विनाश कर लूँ तो वे भी समाप्त हो जायेंगे क्योंकि अगर मै नहीं रहूँगा तो विनाश संभव नहीं होगा और बिना विनाश के रचना कैसी? अतः ब्रह्मा जी समाप्त हो जायेंगे ? और अगर रचना ही नहीं रहेगी तो उसकी रक्षा कैसी? अतः विष्णु जी भी नहीं रहेंगे. “ ब्रह्मा और विष्णु समझ रहे थे कि शिव जी के मन में क्या चल रहा है. वे दोनों मुस्कुराये। 
भगवान् शिव ने स्वयं का विनाश कर लिया और जैसा वे सोच रहे थे वैसा ही हुआ. जैसे ही वे जलकर राख में तब्दील हुए , ब्रह्मा और विष्णु भी राख में बदल गए. कुछ समय के लिए सब कुछ अंधकारमय हो गया. वहां उन तीनो देवो की राख के सिवाय कुछ नहीं था. उसी राख के ढेर से एक आवाज़ आई – “मै ब्रह्मा हूँ. मै देख सकता हूँ कि यहाँ राख की रचना हुई है. जहाँ रचना होती है , वहां मै होता हूँ.” इस तरह उस राख से पहले ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए और उसके बाद विष्णु और शिव जी क्योंकि जहाँ रचना होती है वहां पहले सुरक्षा आती है और फिर विनाश. इस तरह शिव जी को बोध हुआ कि त्रिदेव का विनाश असंभव है. इस घटना की स्मृति के रूप में भगवान् शिव ने उस राख को अपने शरीर से लेप लिया जिसे शिव भस्म कहा जाता है। 



Friday, February 25, 2022

मत्स्य व श्रीरामअवतार की साक्षी सरयू नदी औरअयोध्या नगरी


मत्स्य व श्रीरामअवतार की साक्षी सरयू नदी औरअयोध्या नगरी
डा. राधे श्याम द्विवेदी
       अयोध्या हिंदुओं के प्राचीन व सात पवित्र तीर्थस्थलों (सप्तपुरियों) में एक है। अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है। इसकी सम्पन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है।अयोध्या को अथर्ववेद में ईशपुरी बताया गया है। इसके वैभव की तुलना स्वर्ग से की गई है। भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या त्रेतायुग की मानी जाती है। हालांकि, मौजूदा अयोध्या राजा विक्रमादित्य की बसाई हुई 2,000 साल पुरानी है। अयोध्या में दिवाली का वर्णन भी वेदों-पुराणों में है। प्रभु राम जब लंकाधिपति रावण का वध कर अयोध्या आए तो अयोध्या नगरी ने उनका स्वागत किया था। घर-घर दीप जलाए गए, पकवान बने और उल्लास छा गया था। 
अथर्ववेद में यौगिक प्रतीक के रूप में अयोध्या का उल्लेख है-
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः॥
        (अथर्ववेद -- 10.2.31)
          रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन  (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई और तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी।  कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। स्कन्दपुराण के अनुसार सरयू के तट पर दिव्य शोभा से युक्त दूसरी अमरावती के समान अयोध्या नगरी है। इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया गया है--
          " है अयोध्या अवनि की अमरावती।
          इन्द्र हैं दशरथ विदित वीरब्रती। 
          वह मृतकों को मात्र पार उतारती।            
           यह जीवितों को यहीं से तारती।। "
          --स्वर्गीय राम धारी सिंह "दिनकर "
       अयोध्या मूल रूप से हिंदू मंदिरो का शहर है। यहां आज भी हिंदू धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। क्रम से पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ जी, दूसरे तीर्थंकर  अजितनाथ  जी, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी, पांचवे तीर्थंकर  सुमतिनाथ जी और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ जी। इसके अलावा जैन और वैदिक दोनों मतो के अनुसार भगवान  रामचन्द्र जी का जन्म भी इसी भूमि पर हुआ। उक्त सभी तीर्थंकर और भगवान रामचंद्र जी सभी इक्ष्वाकु वंश से थे। इसका महत्त्व इसके प्राचीन इतिहास में निहित है क्योंकि भारत के प्रसिद्ध एवं प्रतापी क्षत्रियों (सूर्यवंशी) की राजधानी यही नगर रहा है। उक्त क्षत्रियों में दाशरथी रामचन्द्र अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। पहले यह कोसल जनपद की राजधानी था।अयोध्या नगरी की सीमा मौजूदा शहर के 3 से 4 किलोमीटर के दायरे तक सीमित नहीं है। अयोध्या 144 किलोमीटर तक पूर्व-पश्चिम में और उत्तर-दक्षिण में 36 किलोमीटर तक है।
         मत्स्य आकार वाली अयोध्या का निर्माण भगवान राम के जन्म से बहुत पहले हुआ था। अयोध्या में भगवान राम का जन्म हो इसके लिए देवताओं और ऋषि- मुनियों ने इसकी चौरासी कोस की परिधि में सालों तक कठोर तप किया, जिसके परिणामस्वरूप भगवान विष्णु ने अवतार लिया। वैवसत् मनु ने कोसल देश बसाया और अयोध्या को उसकी राजधानी बनाया । मत्स्यपुराण में लिखा है कि अपना राज अपने बेटे को सौंप कर मनु मलयपर्वत पर तपस्या करने चले गये। यहाँ हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर ब्रह्मा उनसे प्रसन्न होकर बोल "बर मांग" ।  राजा उनको प्रणाम करके बोले, "मुझं एक ही बर मांगना है। प्रलयकाल में मुझे जड़चेतन सब की रक्षा की शक्ति मिले" | इसपर 'एवमस्तु' कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और देवताओं ने फूल बरसाये। इसके अनन्तर मनु फिर अपनी राजधानी को लौट आये । एक दिन पितृ तर्पण करते हुये उनके हाथ से पानी के साथ एक नन्ही सी मछली गिर पड़ी। दयालु राजा ने उसे उठाकर घड़े में डाल दिया। परन्तु दिन में वह नन्ही सी मछली इतनी बड़ी हो गयी कि घड़े में न समायी। मनु ने उसे निकाल कर बड़े मटके में रख दिया परन्तु रात ही भर में प्रलय की कथा हिन्दू, मुसल्मान, ईसाई सब के धर्मग्रन्थों में है।
        जबमछली तीन हाथ की हो गयी और मनु से कहने लगी श्राप हम पर दया कीजिये और हमें बचाइये । तब मनु ने उसे मटके में से निकाल कर कुयें में डाल दिया । थोड़ी देर में कुआं भी छोटा पड़ गया तब वह मछली एक बड़े तलाव में पहुँचा दी गयी । यहाँ वह योजन भर लम्बी हो गई तब मनु ने उसे गंगा में डाला । वहाँ भी बढ़ी तो महासागर भेजी गयी, फिर भी उसकी बाढ़ न रुकी तब तो मनु बहुत घबराये और कहने लगे "क्या तुम असुरों के राजा हो ? या साक्षात् बासुदेव हो जो बढ़ते बढ़ते सौ याजन के हो गये । हम तुम्हें पहचान गये, तुम केशव हृषीकेश जगन्नाथ और जगद्धाम हो।" 
     भगवान् बोले "तुमने हमें पहचान लिया । थोड़े ही दिनों में प्रलय होने वाली है जिसमें बन और पहाड़ सब डूब जायेंगे । सृष्टि को बचाने के लिये देवताओं ने यह नाव बनायी है । इसी में स्वंदज, अण्डज, उद्भिज और जरायुज रक्खे जायेंगे । तुम इस नाव को ले लो और आनेवाली विपत्ति से सृष्टि को बचाओ। जब तुम देखना कि नाव बही जाती है तो इसे हमारे सोंग में बाँध देना । दुखियों को इस संकट से बचाकर तुम बड़ा उपकार करोगे । तुम कृतयुग में एक मन्वन्तर राज करोगे और देवता तुम्हारी पूजा करेंगे।" 
        मनु ने पूछा कि प्रलय कब होगी और आप के फिर कब दर्शन होंगे। मत्स्य भगवान् ने उत्तर दिया कि “ सौ वर्ष तक अनावृष्टि होगी, फिर काल पड़ेगा और सूर्य की किरणें ऐसी प्रचंड होंगी कि सारे जीव जन्तु भस्म हो जायेंगे फिर पानी बरसेगा और सब जलथल हो जायगा। उस समय हम सींगधारी मत्स्य के रूप में प्रकट होंगे। तुम इस नाव में सब को भर कर इस रस्सी से हमारे सींग में बाँध देना। 
         यह गंगा रामगंगा (सरयू ) है क्योंकि गंगा राजा भगीरथ की लाई हुई। और भगीरथ मनु से चौवालीसवीं पीढ़ी में थे। अयोध्या का इतिहास देना।" यह कह कर भगवान् तो अन्तर्धान हो गये और मनु योगाभ्यास करने लगे।
अयोध्यापुरी का वर्णन करते हुए कहा कि जिस प्रकार मत्स्य का आकार होता है। उसी प्रकार से अयोध्या का आकार है। अयोध्या 12 योजन लंबी और 3 योजन चौड़ी है। 
       ऐसा कहा जाता है कि अयोध्या में 10,000 मंदिर हैं , लेकिन सापेक्ष महत्व के लगभग 100 मंदिर हैं। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल 96 वर्ग मील था। यहाँ पर सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग आया था। उसके अनुसार यहाँ 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे।          
       तुसली कृत रामचरित मानस की इस चौपाई में भगवान राम का अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और पतित पावनी सरयू की महिमा का बखान है। 
            'अवधपुरी मम पुरी सुहावनि,
           दक्षिण दिश बह सरयू पावनि।’
          अयोध्या हिंदुओं के प्राचीन और सात पवित्र तीर्थ स्थलों में एक है। यहां 10 हजार मंदिर हैं और इसे मंदिरों का नगर कहा जाता है। श्रीरामजन्मभूमि सहित 84 कोस की अयोध्या में 200 ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जो ऐतिहासिक हैं। वैसे तो मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण सहित कई पुराणों में अयोध्या का उल्लेख है पर स्कंद पुराण में सरयू नदी, प्रमुख मंदिर, कुंड का उल्लेख मिलता है।अयोध्या के 10 हजार मंदिरों में से सबसे ज्यादा मंदिर श्रीराम और मां सीता के हैं।  सारे तीर्थ अयोध्या में आकर निवास करते हैं। अयोध्या के 100 से ज्यादा कुंडों का वर्णन भी पुराण में है। इसमें मनु से लेकर सूर्य, भरत, सीता, हनुमान, विभीषण समेत भगवान से जुड़े लोगों के नाम से भी कुंड हैं।
भगवान विष्णु के चक्र पर बसी है अयोध्या:-
अयोध्या विश्व की पहली नगरी है। मानवेंद्र मनु का जन्म अयोध्या में ही हुआ। यह अत्यन्त प्राचीन नगरी है जिसका वर्णन वेद, पुराण आदि में बखूबी मिलता है। अयोध्या के वर्तमान मंदिर 200 से 500 साल पुराने हैं, पर धर्मस्थल लाखों साल पहले के हैं। अयोध्या धनुषाकार है और यह भगवान विष्णु के चक्र पर बसी हुई है। इसके 9 द्वार का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है। अयोध्या नगरी की बसावट मत्स्याकार  और धनुषाकार है।
इस मत्स्य का मुख पूर्व की ओर तथा पुंछ दक्षिण पश्चिम की ओर आज भी देखा जा सकता है। 
अर्पण और समर्पण की नगरी है अयोध्या:-
अयोध्या शब्द सुनते ही स्वत: अर्थ बोध होने लगता है। जहां कोई युद्ध न हो। जहां के लोग युद्ध प्रिय न हों, जहां के लोग प्रेम प्रिय हों। जहां प्रेम का साम्राज्य हो। जो श्रीराम प्रेम से पगी हों, वो अयोध्या है। इसका एक नाम अपराजिता भी है। जिसे कोई पराजित न कर सके। जिसे कोई जीत न सके या जहां आकर जीतने की इच्छा खत्म हो जाए। जहां सिर्फ अर्पण हो समर्पण हो, वो अयोध्या है। भगवान के अवतार के बिना उनके विज्ञान को समझा नहीं जा सकता है । जहां आस्था है, वहीं रास्ता है। आस्था, आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत से हम अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं। अध्यात्म के बिना भौतिक उत्थान का कोई महत्व नहीं है। मन की पवित्रता के बिना तन की पवित्रता संभव नहीं है। हृदय के पवित्र भाव ही वाच् रूप में भक्ति, सरलता और आचरण के रूप में प्रकट होते हैं। इस आचरण के अभाव में सर्वत्र अराजकता दिखाई देती है। जीवन से सुख-शांति और सरलता मानो विदा हो चुकी है। ऐसे में परमात्मा का आधार ही सुख व आनंद प्राप्ति का कारण है।

सरयू नदी से सम्बन्धित कुछ रोचक बातें:-
राम नगरी के चरण पखारने वाली सरयू नदी वर्णन ना हो तो अयोध्या की गाथा अधूरी रह जाएगी क्योंकि श्रीराम के जन्म से वनगमन और बैकुंठ गमन की यह साक्षी रही है। 
ऋग्वेद में सरयू नदी का उल्लेख:-
अयोध्या तक यह नदी सरयू के नाम से जानी जाती है, लेकिन उसके बाद यह नदी घाघरा के नाम से जानी जाती है। सरयू की कुल लंबाई करीब 160 किमी है। भगवान श्री राम के जन्मस्थान अयोध्या से होकर बहने से हिंदू धर्म में इस नदी का विशेष महत्व है। सरयू नदी का वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है।
पुराणों में सरयू नदी का वर्णन:-
वामन पुराण के 13वें अध्याय, ब्रह्म पुराण के 19वें अध्याय और वायुपुराण के 45वें अध्याय में गंगा, यमुना, गोमती, सरयू और शारदा आदि नदियों का हिमालय से प्रवाहित होना बताया गया है। सरयू का प्रवाह कैलास मानसरोवर से कब बंद हुआ, इसका विवरण तो नहीं मिलता, लेकिन सरस्वती व गोमती की तरह इस नदी में भी प्रवाह भौगोलिक कारणों से बंद होना माना जा रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सरयू व शारदा नदी का संगम तो हुआ ही है, सरयू व गंगा का संगम श्रीराम के पूर्वज भगीरथ ने करवाया था।
विष्णु के नेत्रों से प्रगट हुई सरयू नदी:-
पुराणों में वर्णित है कि सरयू भगवान विष्णु के नेत्रों से प्रगट हुई हैं। आनंद रामायण के यात्रा कांड में उल्लेख है कि प्राचीन काल में शंखासुर दैत्य ने वेदों को चुराकर समुद्र में डाल दिया और स्वयं भी वहां छिप गया था। तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर दैत्य का वध किया और ब्रह्माजी को वेद सौंपकर अपना वास्तविक स्वरूप धारण किया। उस समय हर्ष के कारण भगवान विष्णु की आंखों से प्रेमाश्रु टपक पड़े। ब्रह्माजी ने उस प्रेमाश्रु को मानसरोवर में डालकर उसे सुरक्षित कर लिया। इस जल को महापराक्रमी वैवस्वत महाराज ने बाण के प्रहार से मानसरोवर से बाहर निकाला। यही जलधारा सरयू नदी कहलाई।
स्वर्ग के समान अयोध्या नगरी बाद में भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाए और उन्होंने ही गंगा व सरयू का संगम करवाया।
 "अवधपुरी मम पुरी सुहावनि, दक्षिण दिश बह सरयू पावनि।"
तुलसी कृत मानस की इस चौपाई में सरयू नदी को अयोध्या की पहचान का प्रमुख प्रतीक बताया गया है। राम की जन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर स्थित है।
कैलाश से भी निकली है सरयू नदी:-
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण व लीला परमधाम-गमन की साक्षी रही सरयू नदी का उदगम स्थल यूं तो कैलास मानसरोवर माना जाता है, परंतु अब यह नदी उत्तर प्रदेश के लखीमपुरी खीरी जिले के खैरीगढ़ रियासत की राजधानी रही सिंगाही के जंगल की झील से श्रीराम नगरी अयोध्या तक ही बहती है। मत्स्यपुराण के अध्याय 121 और वाल्मीकि रामायण के 24वें सर्ग में इस नदी का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि हिमालय पर कैलाश पर्वत है, जिससे लोकपावन सरयू निकली है, यह अयोध्यापुरी से सट कर बहती है।
शिव जी का शाप:-
 रामायण के अनुसार, भगवान राम ने इसी नदी में प्रवेश करके जल समाधि ली थी। उत्तर रामायण में उल्लेख मिलता है कि भगवान राम के सरयू में जल समाधि लेने पर शिवजी बहुत नाराज हुए। क्रोधित होकर शिवजी ने सरयू को शाप दे दिया कि तुम्हारे जल में आचमन करने पर भी लोगों को पाप लगेगा। तुम्हारे जल में कोई स्नान भी नहीं करेगा। सरयू इस शाप से आहत होकर शिव की शरण में पहुंची और बोली कि मेरे जल में भगवान के जल समाधि लेने में मेरा क्या अपराध है, यह तो पहले से ही विधि का विधान बना हुआ था। शिवजी सरयू के तर्क से शांत हुए और कहा कि मेरा शाप व्यर्थ नहीं जाएगा, तुम्हारे जल में स्नान करने से पाप नहीं लगेगा, लेकिन तुम्हारे जल का प्रयोग पूजा में नहीं होगा। इस नदी के साथ एक शाप है जिसकी वजह से पूजा कर्म में इसके जल का प्रयोग नहीं होता है। 
बहराइच के मैदान से नदी का उद्गम:-
सरयू नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से हुआ है। बहराइच से निकलकर यह नदी गोंडा से होती हुई अयोध्या तक जाती है। पहले यह नदी गोंडा के परसपुर तहसील में पसका नामक तीर्थ स्थान पर घाघरा नदी से मिलती थी। अब यहां बांध बन जाने से यह नदी पसका से करीब आठ किमी आगे चंदापुर नामक स्थान पर मिलती है।
अयोध्या में 360 से अधिक घाट:-
सरयू नदी को इसके ऊपरी हिस्से में काली नदी के नाम से जाना जाता है, जब यह उत्तराखंड में बहती है। मैदान में उतरने के पश्चात् इसमें करनाली या घाघरा नदी आकर मिलती है और इसका नाम सरयू हो जाता है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों में इसे शारदा भी कहा जाता है।ज्यादातर ब्रिटिश मानचित्रकार इसे पूरे मार्ग पर्यंत घाघरा या गोगरा के नाम से प्रदर्शित करते रहे हैं किन्तु परम्परा में और स्थानीय लोगों द्वारा इसे सरयू (या सरजू) कहा जाता है। इसके अन्य नाम देविका, रामप्रिया इत्यादि हैं। यह नदी बिहार के आरा और छपरा के पास गंगा में मिल जाती है। हमने एक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया है कि अप और डाउन सब मिलाकर अयोध्या में 360 से अधिक घाट हैं। नदी के किनारे मात्र अयोध्या नगर में 14 प्रमुख घाट हैं। इनमें गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट या सहस्रधारा घाट, ऋणमोचन घाट, शिवाला घाट, जटाई घाट, अहिल्याबाई घाट, धौरहरा घाट, नया घाट और जानकी घाट आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। इनका वर्णन स्कंद पुराण के 22वें अध्याय में किया गया है।





Sunday, February 6, 2022

श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञानयज्ञ में विषय प्रवेश (भागवत प्रसंग 22,)

श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञानयज्ञ में विषय प्रवेश
(भागवत प्रसंग 22,) 
आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी

॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
हरी अनंत हरी कथा अनंता।
कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता॥

सत्येन हीनाः पितृमातृदूषका-स्तृष्णाकुलाश्चाश्रमधर्मवर्जिताः।  ये दाम्भिकाः मत्सरिणोऽपि हिंसकाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनन्ति ते॥

जो असत्य भाषण करने वाला हो,माता-पिता का आदर न करता हो,कुल के अनुसार आचरण करने वाला न हो,धर्म से विमुख हो,दंभी हो,मास-मदिरा का सेवन करने वाला ही क्यों न हो ‘भागवत सप्ताह यज्ञ’ से कुल सहित उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कस्तूरी तिलकं ललाट पटले,वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकं कर तले,वेणु करे कंकणम॥
सर्वांग हरिचंदनम सुललितम कंठे च मुक्तावलीम। 
गोपस्त्री  परिवेश्तिथौ  विजयते गोपाल चूड़ामणि॥१॥

सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः॥२॥
यदुनंदनन्दन देवकी वासुदेव नंदन वंदनम।
मृदु चपल  नयनम चंचलम मनमोहन अभिनंदनम॥३॥

हे दीनबंधु दिनेश सर्वेश्वर नमोस्तुते।
गोपेश गोपी का कांत राधाकांत नमोस्तुते॥४॥
धन्य वृंदावन धाम है धन्य वृंदावन नाम।
धन्य वंदावन रसीक जो सुमरे श्यामा श्याम॥५॥

प्रेम मयी श्री राधिका,प्रेम सिंधु गोपाल।
प्रेम भूमि वृंदाविपिन,प्रेम रुफ बब्रज बाल॥६॥
सहज रसीली नागरी सहज रसीलो लाल।
सहज प्रेमी की बेलि मनो लपटी प्रेम तमाल॥७॥

माता मेरी श्री राधिका पिता मेरे घनश्याम।
इन दोनों के चरणों में प्रणवौ बारंबार॥८॥
राधा राधा रटत ही भव व्याधा मिट जाए।
कोटी जन्म की आपदा राधा नाम लियो सो जाए॥९॥

राधा मेरी स्वामिनी मैं राधे को दास।
जन्म-जन्म मोहे दीजियो वृंदावन के बास॥१०॥
श्री राधे बृषभानुजा भक्तनि प्राणाधार।
वृंदावन विपिन विहारिणी  प्रणवौ बारंबारम॥११॥

जय जय श्री राधा रमण जय जय नवल किशोर।
जय जय गोपी चितचोर प्रभु जय जय माखन चोर॥१२॥
श्री राधे हाथ मेंहन्दी लगी,नथमे उलझे केश।
नंदनंदन सुलझावते,धरी ललिता का वेश॥१३॥
जसोदा जी को लाडलो संतन को प्रतिपाल।
गहे शरण प्रभु राखियो,सब अपराध बिसार॥१४।। 

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥

इस पुराण में कहा गया है कि भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व फल है।शुकदेव रूपी शुक के मुख का संयोग होने से अमृत रस से परिपूर्ण है।यह रस ही रस है।इसमें न छिलका है,न गुठली।यह इसी लोक में सुलभ है।
[श्रीमद्भागवत महापुराण:६:८०]

शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥

मानव जन्म पाकर मनुष्य अमृत पी ले और उसके व्यवहार में कोई बदलाव न हो तो उस अमृत पीने का कोई लाभ नहीं।राहु ने भी अमृत पिया और अमर हो गए,लेकिन उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होने के कारण उसे कोई लाभ नहीं मिला।वहीं धुंधकारी जैसे पापी भी कथामृत श्रवण करने मात्र से मोक्ष को प्राप्त किए।भागवत कथा अमृत सामान है तभी मोक्ष प्राप्ति के लिए राजा परीक्षित अपने जीवन के अंतिम सात दिन कथामृत श्रवण कर बिताया और पुण्य के भागी बने और उन्हें भी मोक्ष मिला।

श्रीमद्भागवत महापुराण भक्ति तथा मुक्ति दोनों प्रदान करने वाली है।जिस परिवार के नाम से श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ होता है उस परिवार में भक्ति का प्रादुर्भाव स्वतः ही हो जाता है।माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।शत्रु स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं।व्यक्ति को मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।उस परिवार में दरिद्रता कभी नहीं आती।

सच्चिदानन्द रूपाय विश्व उत्पत्यादिहेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः॥
जन्माद्यस्य यतोsन्वयादितरत: चार्थेषुभिज्ञे स्वराट्,
तेने ब्रह्म हृदाय आदि कवये मुह्यन्ति यत् सूरय।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमय यत्र त्रिसर्गो मृषा,
धाम्ना स्वेदन सदा निरस्तकुहकं सत्यम परम धीमहि॥

मंगल आचरण को मंगलाचारण कहतें हैं यह भागवत जी का प्रथम श्लोक मंगलाचरण है।जिस ब्रह्म को जाननें में बड़े ज्ञानी ध्यानी व्यामोहित हो जाते हैं।तेजी वारी यानी सूर्य की किरणें जब वसुंधरा पर पडते हैं।तो जल की भ्रांति होती है ठीक उसी तरह ‘संसार मेरा है।’-यह हमारी भ्रांति है।
यह श्लोक यही कहता है।मित्रों!सत्कर्मों में अनेक विघ्न आते हैं।उन सभी के निवारण के लिए मङ्गलाचरण की आवश्यकता है अतः कथा में बैठने से पहले भी मङ्गलाचरण करना चाहिए।

शास्त्र कहते हैं कि देवगण भी सत्कर्म में विक्षेप करते हैं।देवताओं को ईर्ष्या होती है कि नारायण का ध्यान यह करेगा तो यह भी अपने समान ही हो जाएगा।अतः देवताओं से भी प्रार्थना करनी आवश्यक है।-हे देवो! हमारे सत्कार्य में विक्षेप न करना।सूर्यदेव हमारा कल्याण करें,वरुणदेव हम पर कृपा करें।

यदा यदेहि धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्श्रच पारमनः।
तदा तु भगवानीश आत्मनं सृजते हरिः॥
सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे,
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:॥

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥

जिससे इस जगत् की सृष्टि,स्थिति और प्रलय होते हैं-क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थों में अनुगत हैं और असत् पदार्थों से पृथक् है;जड़ नहीं,चेतन है;परतन्त्र नही,स्वयंप्रकाश है,जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं प्रत्युत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेदज्ञान का दान किया है,जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं।जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियों में जल का,जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है,वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयीजाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान-सत्ता से सत्यवत् प्रतीत हो रही है,उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविड़म त्वमेव,त्वमेव सर्वम् मम् देव देव॥

वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम॥

सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा।
यस्या: श्रवणमात्रेण हरिश्चित्तं समाश्रयेत्॥
श्रीमद्भागवतजी का सदा-सर्वदा सेवन,आस्वादन करना चाहिए।इसके श्रवणमात्र से श्रीहरि हृदय में आ विराजते हैं॥

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने॥
प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥

जयति पराशरस्सु: सत्यवती हृदयनन्दनो व्यास:। यस्यऽऽस्यकमलगलितं वाङ्गमयममृंत जगत्पिवति॥

सत्यवती के हृदय नंदन पराशर के पुत्र श्री व्यास जी की जय हो,जिनके मुख कमल से निकले अमृत का पान सारा संसार करता है। 

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्ज्वालितो ज्ञानमयप्रदीपः॥

जिन्होंने महाभारत रूपी ज्ञान के दीप को प्रज्वलित किया ऐसे विशाल बुद्धि वाले महर्षि वेदव्यास को मेरा नमस्कार है।

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नम:॥

व्यास विष्णु के रूप है तथा विष्णु ही व्यास है । 
ऐसे वसिष्ठ-मुनि के वंशज का मैं नमन करता हूँ।

॥जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन। 
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन।
श्री गोविंदा,गोपीनाथ,मदन-मोहन॥
श्याम-कुंड,राधा-कुंड,गिरि-गोवर्धन।
कालिंदी जमुना जय,जय महावन ॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
केशी-घाट,बंसीवट,द्वादश-कानन।
जहां सब लीला कोइलो श्री-नंद-नंदनी॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
श्री-नंद-यशोदा जय,जय गोप-गण।
श्रीदामादि जय,जय धेनु-वत्स-गण॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय वृषभानु,जय कीर्तिदा सुंदरी।
जय पूरणमासी,जय अभिरा नगरी॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय जय गोपिश्वर वृंदावन-माझ।
जय जय कृष्ण-सखा बटु द्विज-राज॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय राम-घाट,जया रोहिणी-नंदन।
जय जय वृंदावन,बासी-जत-जन॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय द्विज-पत्नी जय,नाग-कन्या-गण।
भक्ति जहर पाईलो,गोविंद चरण॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
श्री-रास-मंगल जय,जय राधा-श्याम।
जय जय रास-लीला,सर्व-मनोरम॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय जय उज्ज्वल-रस,सर्व-रस-सार।
पारकिया-भावे जाह,ब्रजते प्रचार॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
श्री जाह्नवा पाद पद्म कोरिया स्मरण।
दीन कृष्ण दास कोहे नाम संकीर्तन॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन॥
जय राधे,जय कृष्ण,जय वृंदावन।
श्री गोविंदा,गोपीनाथ,मदन-मोहन॥

नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये॥
रासमण्डल में निवास करने वाली हे परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है। श्रीकृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हे रासेश्वरि ! आपको नमस्कार है॥

पद्मपुराणानुसार श्रीकृष्ण के तत्व दर्शन को रुक्मिणी को देह और राधा को आत्मा माना गया है।श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से ‘दैहिक’ और राधा से ‘आत्मिक’ संबंध माना गया है।
सच्चिदानन्द रूपाय विश्व उत्पत्यादिहेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः॥

आदरणीय मित्रों ! यह श्रीमद्भागवत का पहला श्लोक है जिसका अर्थ इस प्रकार है:-
जो सत्य,चित्त और आनंद के स्वरूप हैं, जो संपूर्ण विश्व की उत्पत्ति और प्रलय के कारण हैं।जो तीनों प्रकार के तापों (दैहिक,दैविक और भौतिक) का विनाश करने वाले हैं,उन परम पिता भगवान श्री कृष्ण जी महाराज को हम सब प्रणाम करते हैं। मित्रों इस प्रथम श्लोक का संदेश यही कहा जा सकता है कि हमें अपने सर्वस्व भौतिक सुखों और दुखों को सत्य,चित्त और आनँद के स्वरूप भगवान श्री कृष्ण के पावन एवं पुनीत चरणों में समर्पित करके अपने हृदय में उन्हें स्थान देनाचाहिए।जिससे हमारा कल्याण होगा।

सत:-नित्य एवं शास्वत होता है। 

प्रश्न:- सत एवं असत में क्या अंतर है?
 उत्तर:- सत वो है जिसमे परिवर्तन नहीं होता है। वेदांत दर्शन में सत्य की व्याख्या यही है की जो तत्त्व परिवर्तनशील है वोह नाशवंत है अपितु सत्य नहीं,परन्तु जो प्राकृतिक बंधनों से पर है एवं परिवर्तनशील नहीं है,वो ही सत्य हो सकता है।श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्री कृष्ण कहते है की ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’, जो असत है उसका अस्तित्व नहीं है एवं जो सत है उसका नाश नहीं होता,क्यूंकि वो नित्य है।

चित:-शुद्ध चैतन्य होता है। 

आनंद:-परम विलास पूर्ण होता है। 

प्रश्न:-सुख एवं आनंद में भेद है? 
उत्तर:- जी है,सुख इस संसार जगत के साथ द्वंद बंधनों से पर नहीं है,क्यूंकि सुख,दुःख के साथ बंधा हुआ है, जेसे हर्ष और शोक,ठंड और गर्मी,ऐसा ही इस संसार माया में द्वंद है परन्तु जो वेदिक शास्त्र जब आनंद की व्याख्या देते हे वोह इस संसार की अनुभूतियो के पर है जिसमे द्वन्द कदापि नहीं है।

रूपाय:-जिसका स्वरूप होता है। 

विश्व:-इस सकल संसार जिसमे सभी जल,पृथ्वी,वायु,तेज,अग्नि से बनाया गया है और सर्व सांख्य दर्शन के तत्त्वों जिसका उल्लेख श्रीमद भागवत महापुराण में विस्तारपूर्वक रचना हुई है। महाऋषि कपिल और माता देवहुति के संवाद में।

उत्पति:– प्रारम्भा,निर्माणाधीन होता है। 

प्रश्न:-कृष्ण के पहले और कुछ था? 
उत्तर:- नहीं,शश्रीमद्भागवतमें भगवान कहते है की ‘अहमेवा समेवाग्रे नान्यद यत सदसत परम’-‘मेरे सिवा और कुछ नहीं था,नहीं इस सृष्टि के तत्त्व थे नहीं इस सृष्टि’,यह प्रमाण हे के भगवान कृष्ण के अलावा कुछ नहीं था।वो ही इस इस सकल संसार के रचेता है।

आदि:-वगेरे,का पोषण एवं संहार,इस शब्द जब हम श्लोक के स्थूल रूप में लिया तो शब्दार्थ होता है ‘वगेरे’, परन्तु जब हम उसके भावार्थ को समजे तो लिखा हुआ है ‘पोषण एवं संहार’।क्यूंकि उत्पति की पहले व्याख्याकी है तो सरल है की पोषण एवं संहार ही होना चाहिए।

प्रश्न:- पोषण एवं संहार कौन करता है? 
उत्तर:- मूल तत्त्व केवल भगवान कृष्ण है परन्तु इस सकल संसार के लिया अन्य देवी देवता भगवान की आज्ञा से सृष्टि सेवा में व्यस्त है।

हेतवे:-जिसका हेतु,निर्माता,बिज, करता,

ताप त्राय:- तीनों दुःख का विभाजन: अध्यात्मिक,अधिदैविक एवं अधिभौतिक।

विनाशाय:-संपूर्ण नष्ट करता है।

श्री:-श्री राधा रानी के लिए प्रयुक्त हुआ है

प्रश्न:- यह राधा का नाम क्युं?
 उत्तर:- वेदिक धर्मं अनुसार,जब हम प्रभु के नाम लहते है,उसके पहले हम उसके देविशक्ति का आवाहन एवं स्मरण करते है।श्री राधा,श्रीकृष्ण की अविछिन ह्लादिनी शक्ति है।श्री राधाजिकी कृपा से ही जीव श्री कृष्ण प्रेम को अनुभव कर सकते है।
कृष्णाय:- उस कृष्णको जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान है।

वयम:-हम सब जीव।

नुमः :-नमन करते है।

हम जब इस श्लोक की विभाजन करते है तो श्री कृष्ण के तीन लक्षणों के दर्शन होते है,वो है स्वरूप,कार्य और स्वभाव।सत,चित और आनंद,श्री कृष्णकी स्वरूप दर्शन है।श्री कृष्ण का कार्य दर्शन है इस सकल संसारकी उत्पत्ति,पालन एवं अंत में संहार,एवं तीसरा दर्शन है भगवान का स्वभाव,जो संतो,भक्तो एवं साधको के तीनों दुःख को मूल से विनाश कर देते है। 

सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोत्रं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषधहरं विटुः॥
पतितः स्खलितो भग्नः संदष्टस्तप्त आहतः।
हरिरित्यवशेनाह पुमान्नार्हति यातनाम्॥

श्रीमदभागवत में वर्णित उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ यह है कि “भगवान का नाम चाहे जैसे लिया जाय-किसी बात का संकेत करने के लिए,हँसी करने के लिए अथवा तिरस्कार पूर्वक ही क्यों न हो,वह संपूर्ण पापों का नाश करनेवाला होता है।पतन होने पर,गिरने पर,कुछ टूट जाने पर,डँसे जाने पर,बाह्य या आन्तर ताप होने पर और घायल होने पर जो पुरुष विवशता से भी ‘हरि’ ये नाम का उच्चारण करता है,वह यम-यातना के योग्य नहीं।”-श्रीमदभागवत महापुराण:६:२:१४-१५)          
   
वृंदा वन की महिमा:-
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे॥
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
झूल रही होंगी राधा प्यारी,श्याम झूला झुलते मिलेंगे।
झूला झूल रही होंगी राधा प्यारी,श्याम झूला झुलते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
साथमें उनके ग्वाल-बाल होंगे,श्याम माखन चुराते मिलेंगे।
साथ मई उनके ग्वाल-बाल होंगे,श्याम माखन चुराते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
करमें उनके लकुतिया होंगी,श्याम गौवे चरते मिलेंगी।
कर मई उनके लकुतिया होंगी,श्याम गौवे चरते मिलेंगी।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
कही यमुना के तीर,गोपीणयों के संग श्याम रास-रचते मिलेंगे।
कही यमुना के तीर,गोपीणयों के सँग श्याम रास-रचते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
कही रूठ गई होंगी राधा रानी,श्याम उनको मानते मिलेंगे।
कही रूठ गई होंगी राधा रानी,श्याम उनको मानते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा चलके वृंदावन देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे।
ज़रा हटके ज़माने से देखो,श्याम बंसी बजाते मिलेंगे

स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुण्ठे नास्त्ययं रसः।
अतः पिबन्तु सद्भाग्या मा मा मुंचत कर्हिचित्॥

शुकदेव जी कहते हैं- अरे! यह भागवत रस तो स्वर्गादिलोको में भी प्राप्त नहीं होता। ‘निगमकल्पतरोर्गलितं’ वेदरूपी कल्पवृक्ष का यह एकदम पका हुआ फल है।शुकमुखादमृतद्रव संयुतं’ यह अमृत है।तोते का चखा हुआ फल एकदम रसीला होता है।‘शुक’ का अर्थ तोता भी होता है।और शुकदेव जी भी।
ये तो वैरागी परमहंस हैं फिर भी इन्होंने इसका रसास्वादन किया है। और प्रायः फल को तो,खाया जाता है लेकिन यह कहाँ इस फल को पी लो। यह रसरूपी फल है। इसमें कुछ भी त्याज्य है ही नहीं,रस ही रस है।श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदों का सार है।जो इस रस-सुधा का पान करके छक चुका है,वह किसी और पुराण-शास्त्र में रम नहीं सकता।जैसे नदियों में गंगा, देवताओं में विष्णु और वैष्णवों में श्रीशंकर जी सर्वश्रेष्ठ हैं,वैस ही पुराणों में श्रीमद्भागवत है।  श्रीकृष्ण के प्रति समस्त कर्मों को समर्पित कर देना ही संसार के तीनों तापों की एकमात्र औषधि है।सांसारिक,सामाजिक,भौतिक और मानसिक चिन्ताएँ मिटानी हों तो एक महौषधि है-“शरणागति।”

॥स्वागतम कृष्णा,सुस्वागतं कृष्णा॥
स्वागतम् कृष्ण शरणागतम् कृष्ण।
सु स्वागतम्,सु स्वागतम्,शरणागतम् कृष्णा।
कृष्णा,कृष्णा,कृष्णा,कृष्णा॥
अभी आता ही होगा सलोना मेरा,
हम राह उसी की तका करते हैं।
कविता सविता नहीं जानते है,
मन में जो आया सो बका करते हैं।
पड़ते उनके पद पंकज में,
चलते चलते जो थका करते हैं।
उनका रस रूप पिया करते हैं,
उनकी छवि छाप छका करते हैं।
अपने प्रभु को हम ढूँढ लियो,
जैसे लाल अमोलक लाखन में।
प्रभु के अंग में जितनी नरमी,
उतनी नरमी नहीं माखन में।। 

स्वागतम् कृष्णा,शरणागतम् कृष्णा॥
॥द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्रा धर्मश्चतुर्विधः॥ 

कलयुग का वास चार जगहों में होता है। पहला जहाँ मद्यपान होता है,दूसरा जहां पर स्त्री गमन या वेश्यावृत्ति हो,तीसरा जहाँ जुआ खेला जाता है,चौथा जहाँ हिंसा होती हो॥ 


महर्षि वेदव्यास नारद संभाषण से भागवत लिखने की प्रेरणा डा. राधे श्याम द्विवेदी (भागवत प्रसंग 21)


        वेदव्यास जी महाराज “भूत” “भविष्य” “वर्तमान” को प्रत्यक्ष अपनी दिव्य दृष्टि से देखने वाले “अमोघ दृष्टा” हैं। “व्यास जी महाराज” ने भविष्य पर दृष्टिपात करके देखा तो घोर कलिकाल के कलुषित प्राणियों को देख कर के चित अशांत हो गया।
       जीवो का कैसे कल्याण होगा कलिकाल में? लोगों की बुद्धि मंद, भाग्य भी अति मंद। कोई बुद्धिहीन व्यक्ति हो तो बात कुछ और ही होता,पर यदि भाग्यशाली हो तो काम चल जाएगा,भाग्यहीन व्यक्ति हो पर बुद्धिमान हो तो बुद्धि के बल पर अपना निर्वाह कर लेगा। पर बुद्धि और भाग्य दोनों ही समाप्त हो गए हो, दोनों ही मंद पड़ गए हो तो ऐसे जीवो का कैसे कल्याण होगा इसलिए “व्यास जी महाराज” ने उन सब का ध्यान रखते हुए एक “वेद” के चार विभाग कर दिए “ऋग्वेद”, “यजुर्वेद”, “सामवेद” और “अथर्व”आदि।
         उनके चित् को फिर भी शांति नहीं मिली क्योंकि “वेदों” में ज्ञान का तो भंडार तो बहुत बड़ा है,पर वेद के गूढ़ ज्ञान को समझने वाला नहीं है । टेड़ी भाषा है तो उसको और सरल करने के लिए “पंचम वेद महाभारत” की रचना की गई।, जिन की गति “वैदिक ज्ञान” में ना हो वह “महाभारत का स्वाध्याय” करके वैदिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए महाभारत की रचना की गई, परंतु फिर भी मन को संतोष नहीं हुआ। 
         व्यास जी ने पुराणों की रचना प्रारंभ की। एक–एक करके “सत्रह पुराण” लिख डाले, पर व्यास जी महाराज का मन अभी भी संतुष्ट नहीं है। सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए सत्रह पुराण तक लिख डाले। सोच ही रहे थे कि अचानक उनके कान में ध्वनि सुनाई पड़ी “श्रीमन नारायण नारायण” । 
“देवर्षि नारद” गोविंद के गुणानुवाद गाते हुए अपनी वीणा लिए प्रगट हो गए व्यास जी के सामने, “देवर्षि नारद” का दर्शन करते ही “वेदव्यास जी” खड़े हुए और विधिवत पूजन किया |
         अतिथि पूजन करने के पश्चात जब आदर पूर्वक आसन देकर बैठाए तो नारद जी मुस्कुराए हे “पराशर नंदन” (पराशर ऋषि की संतति में जो हुए वह सब पराशर, तो व्यास जी को पाराशर कहकर संबोधन कर रहे हैं) हे “पराशर नंदन”- “वेदव्यास जी” आपका मुंह थोड़ा मलिन सा क्यों दिख रहा है, आपके धर्म-कर्म सब व्यवस्थित तो चल रहे हैं, आपकी दिनचर्या में, भगवत सेवा में पूजा में कोई विघ्न बाधा तो नहीं आ रही है
      व्यास जी कहते हैं नारद जी आपने जो कुछ भी पूछा वह सब ठीक चल रहा है। मेरे पूजा पाठ में कहीं कोई बाधा नहीं है,
पर यह सब करने के बाद मैंने जीवो के कल्याणार्थ मैंने बड़े-बड़े ग्रंथों की रचना की। फिर भी न जाने क्यों चित् को चैन नहीं पड़ रहा। अभी भी मेरा मन संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। अभी भी मेरे हृदय में एक “अह्लाद” जो होना चाहिए कि मैंने समाज के लिए कुछ किया, वह पूर्ण संतुष्टि मेरे मन में नहीं है । वह क्यों नहीं है यह कारण मैं स्वयं भी नहीं जानता।
        नारद जी बोले कि हम बताएं | महाराज बड़ी कृपा होगी बताइए , व्यास जी ने कहा।"श्री नारद जी” बोलते दिखाई पड़ रहे हैं, परंतु प्रेरणा देने वाले तो “परमात्मा” है। नारद जी के भीतर से परमात्मा बोल रहे हैं, व्यास जी का मार्गदर्शन करने के लिए। इसलिए,“श्री” लग गई क्योंकि अब “नारद जी भागवत” का उपदेश दे रहे हैं। 
       व्यास जी को भगवान के माध्यम से “भागवत” मतलब “भागवता उप्रोक्तम” भगवान ने जो कहा अरे भगवान ने तो “ब्रह्मा जी” को कहा था,पर ब्रह्माजी ने नारदजी को कहा तो वह क्या था? 
       भगवान ने ही “ब्रह्मा जी” के भीतर से से नारद जी को कहा। फिर भगवान ने ही नारद जी के भीतर बैठ कर के व्यास जी को कहा । फिर व्यास जी के भीतर बैठकर भगवान ने बैठकर ही “सुखदेव जी” को को कहा। फिर “सुखदेव जी” के भीतर बैठकर भगवान ने ही “परीक्षित जी” को कहा। इसलिए बोलता हुआ कोई भी दिखाई पड़े। पर वक्ता के भीतर से बोलने वाले तो परमात्मा ही होते हैं । इसलिए वक्ता “भगवत स्वरूप” ही होता है । इसलिए श्री नारद यह कहते हुए संकेत दे रहे हैं “सूत जी” अब केवल नारद नहीं बोल रहे नारद जी के भीतर से भगवान बोल रहे हैं। 
         नारद जी कहते हैं व्यास जी तुमने बहुत कुछ लिखा और अपनी लेखनी में बहुत चमत्कार दिखाएं । कहीं-कहीं पर तो आपने ऐसे भी “ब्याम्स्ति” वाक्य बोल दिए कि लोगों की बुधि चक्कर खा गई समझने में। अर्थ लगाने में और कई जगह तो आपके वाक्य ने अर्थ का अनर्थ भी कर दिया। जैसे हिंसा पर रोक लगाने के लिए कहीं-कहीं पर आपने हिंसा को ही कोई नियम बना दिया। अमुक यज्ञ करते समय अमुकपशु का बलिदान कर दो।एक तरफ तो लिख रहे हो “अहिंसा परमो धर्मः” और दूसरी तरफ लिख रहे हो “पशु आलभे तम्ह:”। लोगों ने तो आपके वचन को प्रमाणपत्र बना करके पशुओं का बलिदान करना चालू कर दिया। समाज में तो एक हिंसा का अधिकार लोगों को मिल गया।  जबकि आपका उद्देश्य तो यह नहीं था। आपका उद्देश्य तो “निवृत्ति परख” था। जो जब चाहे तब मारते रहते हैं पशुओं को उनको एक प्रतिबंध लगा रोकना चाहिए, कैसे–कि अमुक यज्ञ करते समय अमुक पशु की बलि चढ़ा दो,कम से कम जब कोई यज्ञ होगा तभी तो कोई पशु का बलिदान होगा जो रोज रोज काट रहे हैं वह तो बच गए, तो नित्य की हिंसा को रोकने के लिए, हिंसा को एक नियम में आपने बाधा ताकि कम हिंसा हो पर लोगों ने तो आप के वचन को प्रमाण पत्र बना कर के जो नहीं करने वाले थे उन्होंने भी हिंसा करना प्रारंभ कर दिया |
      तुम कितना बढ़िया बोल रहे हो,कितना व्याकरण–सम्मत बोल रहे हो, यह भगवान नहीं देखते हैं पर क्या बोल रहे हो, कहां से बोल रहे हो |
        वाणी का वैभव भगवान नहीं देखते,प्रतिपाद्य विषय क्या है क्या है तुम्हारा, बोल किसके बारे में रहे हो, बहुत उच्च कोटि का विद्वान साहित्यिक भाषा में यदि किसी राजा के गुणानुवाद गावे तो उसका कोई महत्व नहीं, अगर कोई देहाती भाषा में गोविंद के गुणानुवाद गावे तो बड़े-बड़े संत सुनकर के “मुग्ध” हो जाते हैं प्रभु की उस महिमा को, तुम्हारा प्रतिपाद्य विषय क्या है “व्यास जी” तुमने भाषा का “वेशिष्ठ” तो दिखाया पर, गोविंद के गुण–नुवाद नहीं गए तो सब बेकार है अरे “नेस कर्म” की भी बहुत अच्छा कर्म है “निष्काम भाव” से किया जाए परंतु भगवान से विमुख हो,भगवान की प्रीति ना हो उसने इस कर्म की भी कोई शोभा नहीं,उस ज्ञान की कोई शोभा नहीं जो गोविंद से जुड़ा हुआ ना हो | इसलिए व्यास जी महाराज आपने अपनी योग्यता का बहुत अद्भुत परिचय दिया है ग्रंथों में, परंतु अभी तक गोविंद के गुणा-नुवाद किसी ग्रंथ में नहीं गए, जब तक भगवान की “प्रीति कौमुदी” का विस्तार नहीं करोगे, गायन नहीं करोगे तब तक ना तो आपको ही चैन मिलेगा ना उस वाणी के द्वारा भक्तों को इतना आनंद मिलेगा |
      व्यास जी इसलिए आपसे भी निवेदन है कि आप भी गोविंद के गुणा-नुवाद गावो, फिर देखो आपको कितना आनंद मिलता है और आपकी वाणी से भक्तों को को कितना परम सुख प्राप्त होता है संकेत भर कर दिया है अब गोविंद के गुणा-नुवाद तुम विस्तार से सुनाओ ऐसा कहकर कि नारद जी तो अंतर्धान हो गए
        व्यास जी महाराज ने तुरंत अपनी कमी का अनुभव कर लिया कि अभी तक मैं वक्ता बनकर सोच रहा था कि मैं मैं बोल रहा हूं, मैं लिख रहा हूं पर अब मैं वही लिखूंगा तो “ठाकुर जी” लिखाएंगे,जो उनकी प्रेरणा होगी |
         सरस्वती नदी में स्नान किया और स्नान करके जैसे ही व्यास जी महाराज ध्यान मग्न हो कर बैठे अपने “शम्य्प्राश आश्रम” में,हृदय में भागवत की भागीरथी प्रगट होने लगी, गदगद गोविंद के गुणा-नुवाद गाने लगे, व्यास जी गाते गए और “गणेश जी” महाराज लिखते गए |
          भागवत संहिता तैयार हुई और श्री वेदव्यास जी महाराज ने इस पावन परमहंसों की संहिता प्रगट कर दी। अठारह हज़ार श्लोकों की यह दिव्य संहिता तैयार तो हो गई। परम मंगलमय भगवत स्वरूप श्रीमद्भागवत महापुराण के अंतर्गत आपने श्रवण किया,देवर्षि नारद से प्रेरित हुए श्री वेदव्यास जी महाराज ने अपने सम्य्प्राश आश्रम में माता सरस्वती का ज्ञान प्राप्त करके जैसे ही प्रभु का सुमिरन और ध्यान किया हृदय प्रदेश में भगवती गंगा प्रभावित हो गई। 
पुराणों के क्रम में “भागवत” पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। 
         वैष्णव जन 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को “महापुराण” मानते हैं। स्कंध या खंड का अर्थ है ढेर, समुच्चय, संग्रह, समूह, पेड़ का तना, पेड़ की मोटी शाख या डाल होता है। किसी बड़े विभाग की मुख्य शाखाएँ भी स्कंध कही जाती है। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है।


Saturday, February 5, 2022

भागवत प्रसंग (1) सामान्य परिचय

भागवत प्रसंग (1) सामान्य परिचय
डा. राधे श्याम द्विवेदी
श्रीमद्भागवत पुराण हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय पुराण है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे 'भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश' कहना अधिक समीचीन होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा है। 
भागवत पुराण हिंदुओं के 18 पुराण में से एक है। इसका मुख्य विषय भक्ति योग है। इस पुराण में भगवान श्रीकृष्ण को सभी देवों का देव या स्वयं भगवान के रूप में वर्णित किया गया है।
इसका मुख्य वर्ण्य विषय भक्ति योग है, जिसमें कृष्ण को सभी देवों का देव या स्वयं भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में रस भाव की भक्ति का निरुपण भी किया गया है। परंपरागत तौर पर इस पुराण के रचयिता वेद व्यास को माना जाता है। श्रीमद्भागवत या इस पुराण को “भागवतम” भी कहते हैं।
भगवान की विभिन्न कथाओं का सार श्रीमद्भागवत महापुराण मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसके श्रवण से राजा परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई, और कलयुग में आज भी हम सबको इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिलता है। श्रीमद्भागवत कथा सुनने से प्राणी की मुक्ति हो जाती है, और वह इस जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। 
श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है।श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आधिदैहिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह महान ग्रन्थ है।
इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।भागवत पुराण के इस ग्रंथ में 335 अध्याय तथा 18 हजार श्लोक हैं। 
इसके 10वें अध्याय में श्रीकृष्ण का जीवन सार कुछ इस प्रकार वर्णित है क यह समस्त प्राणियों के लिए सांसारिक जीवन जीते हुए ज्ञान तथा मुक्ति का मार्ग दिखाता है। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप वर्णित है। इस पुराण में भक्ति, ज्ञान, तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। भगवान श्री हरि विष्णु और भगवान श्री कृष्ण के कथाओं के साथ साथ महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथाएं भी भागवत पुराण में संकलित की गई है।
इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात भगवान श्री कृष्ण का देह त्याग, द्वारिका नगरी का जलमग्न होना और यदुवंशियों का नाश किस प्रकार हुआ था? इन सभी विषयों का विस्तारित विवरण किया गया है। 
इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला।
'श्रीमद्भागवत पुराण' में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है (दूसरे अध्याय में इन दस लक्षणों का विवेचन किया जा चुका है)। यहाँ श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं।
पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को 'महापुराण' मानते हैं। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है।



 

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता वक्ता (५) विष्णु के प्रथम अवतार सनकादि ऋषि(भागवत प्रसंग 16)

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता वक्ता (५)
विष्णु के प्रथम अवतार सनकादि ऋषि(भागवत प्रसंग 16)
डा. राधे श्याम द्विवेदी
ब्रह्मा की संताने:-
सनकादि ऋषि (सनकादि = सनक + आदि)से तात्पर्य ब्रह्मा के चार पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन व सनत्कुमार से है। पुराणों में उनकी विशेष महत्ता वर्णित है। ये ब्रह्मा की अयोनिज संताने हैं और भगवान विष्णु के प्रथम अवतार हैं | जो १० सृष्टियों में से ही गिने जाते हैं। ये प्राकृतिक तथा वैकृतिक दोनों सर्गों से हैं।
        भगवान विष्णु का प्रथम अवतार सनकादि ४ मुनि हैं। वे परमात्मा जो साकार हैं उन्होंने लीलार्थ २४ तत्वों के अण्ड का निर्माण किया। उस अण्ड से ही वे परमात्मा साकार रूप में बाहर निकले। उन्होंने जल की रचना की तथा हजारों दिव्य वर्षों तक उसी जल में शयन किया अतः उनका नाम नारायण हुआ।
आपो नरा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ता पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥
       उन्हें जब  प्रकट होने की इच्छा हुई तब वे उठे तथा अण्ड के अधिभूत, अध्यात्म तथा अधिदैव ये तीन खण्ड किये। उन परमात्मा के आंतरिक आकाश से इन्द्रिय, मनः तथा देह शक्ति उत्पन्न हुई। साथ ही सूत्र, महान् तथा असु नामक तीन प्राण भी उत्पन्न हुए। उनके खाने की इच्छा के कारण अण्ड से मुख निकला जिसके अधिदैव वरुण तथा विषय रसास्वादन हुआ। इसी प्रकार बोलने की इच्छा के कारण वाक् इन्द्रिय हुई जिसके देव अग्नि तथा भाषण विषय हुआ। उसी तरह नासिका, नेत्र, कर्ण, चर्म, कर, पाद आदि निकला। यह परमात्मा का साकार स्थूल रूप है जिनका नमन वेद पुरुष सूक्त से किये हैं।

           प्रलय काल में भगवान शेष पर शयन कर रहे थे । वे आदि मध्य अन्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने हैं । अतः शेष जो सबके बाद भी रहते हैं वही उनकी शैया हैं। सृष्टि की इच्छा से जब उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि सम्पूर्ण लोक उनमें लीन है। तभी रजोगुण से प्रेरित परमात्मा की नाभि से कमल अंकुरित हो गया जिससे सम्पूर्ण जल प्रकाशमय हो गया। नाभिपद्म से उत्पन्न ब्रह्मा पंकज कर्णिका पर आसीन थे। ब्रह्मा जी ने सोंचा कि मैं कौन, क्यों हूँ तथा मेरे जनक कौन हैं? वे कमलनाल के सहारे जल में प्रविष्ट हुए तथा सौं वर्ष तक निरंतर खोज करने पर भी कोई प्राप्त नहीं हुआ। अंत में वे पुनः यथा्थान बैठ गए। वहाँ हजारों वर्षों तक समाधिस्थ रहे। तभी उन्हें पुरुषोत्तम परमात्मा के दर्शन हुए। शेषनाग में शयन कर रहे प्रभु का नीलमणि के समान देह अनेक आभूषणों से आच्छादित था तथा वन माला और कौस्तुभ मणि स्वयं को भाग्यवान मान रहे थे। उनके अंदर ब्रह्मा जी ने अथाह सागर तथा कमल पर आसीन स्वयं को भी देखा। ब्रह्मा जी भगवान की स्तुति करते हैं -

ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां
न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्।
नान्यत्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासी ॥
               (भागवत)
          "चिरकाल से मैं आपसे अन्जान था, आज आपके दर्शन हो गए। मैने आपको जानने का प्रयास नहीं किया, यही हम सब का सबसे बड़ा दोष है क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में आप ही जानने योग्य हैं। अपने समीपस्थ जीवों के कल्याणार्थ आपने सगुण रूप धारण किया जिससे मेरी उत्पत्ति हुई। निर्गुण भी इससे भिन्न नहीं।"
        श्री भगवान ने कहा "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जाओ सृष्टि करो। प्रलय से जो प्रजा मुझमें लीन हो गई उसकी पुनः उत्पत्ति करो।" और भगवान अंतर्धान हो गए।
         ब्रह्मा जी ने सौ वर्षों तक तपस्या की। उस समय प्रलय कालीन वायु के द्वारा जल तथा कमल दोनो आंदोलित हो उठे। ब्रह्मा जी ने तप की शक्ति से उस वायु को जल सहित पी लिया। तब आकाशव्यापी कमल से ही चौदह लोकों की रचना हुई। ईश्वर काल के द्वारा ही सृष्टि किया करते हैं अतः काल की सृष्टि दस प्रकार की होती है ।इन सृष्टियों से ब्रह्मा जी को संतुष्टि न मिली तब उन्होंने मन में नारायण का ध्यान कर मन से दशम सृष्टि सनकादि मुनियों की थी जो साक्षात् भगवान ही थे। ये सनकादि चार सनत, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार नामक महर्षि हैं तथा इनकी आयु सदैव पाँच वर्ष की रहती है। ब्रह्मा जी नें उन बालकों से कहा कि पुत्र जाओ सृष्टि करो।
शेष भगवान से श्रवण कर नारद जी भागवत सुनाया:-
सनकादि मुनियों नें ब्रह्मा जी से कहा "पिताश्री! क्षमा करें। हमारे हेतु यह माया तो अप्रत्यक्ष है, हम भगवान की उपासना से बड़ा किसी वस्तु को नहीं मानते अतः हम भी जाकर उन्हीं की भक्ति करेंगे।" और सनकादि मुनि वहाँ से चल पड़े। वे वहीं जाया करते हैं जहाँ परमात्मा का भजन होता है।
       जब नारद जी बेचैन हो कर भक्ति के ताप को नाश करने के लिए बद्री पर्वत पर सनक आदि मुनियों से मिले थे तो उन्हें  सनक आदि ने भागवत कथा सुनने की सलाह दिये थे। ये स्वयं भगवान शेष से भागवत श्रवण किये थे और नारद जी को उन्होंने भागवत सुनाया था। ये जितने छोटे दिखते हैं उतनी ही विद्याकंज हैं। ये चारो वेदों के ही रूप कहे जा सकते हैं।
जय विजय को  तीन जन्मों तक राक्षस बनने का श्राप:-
एक समय चारों सनकादि कुमार भगवान विष्णु के दर्शनार्थ वैकुण्ठ जा पहुंचे। वे वहाँ के सौंदर्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ स्फटिक मणि के स्तंभ थे, भूमि पर भी अनेकों मणियाँ जड़ित थीं। भगवान के सभी पार्षद नन्द, सुनंद सहित वैकुण्ठ के पति का सदैव गुणगान किया करते हैं। चारों मुनि छः ड्योढ़ियाँ लाँघकर जैसे ही सातवीं ड्योढ़ी पर चढ़े उनका दृष्टिपात दो महाबलशाली द्वारपाल जय तथा विजय पर हुआ। कुमार जैसे ही आगे बढ़े दोनों द्वारपालों ने मुनियों को धृष्टतापूर्वक रोक दिया। यद्यपि वे रोकने योग्य न थे । इसपर सदा शांत रहने वाले सनकादि मुनियों को भगवत् इच्छा से क्रोध आ गया। वे द्वारपालों से बोले "अरे! बड़ा आश्चर्य है। वैकुण्ठ के निवासी होकर भी तुम्हारा विषम स्वभाव नहीं समाप्त हुआ? तुम लोग तो सर्पों के समान हो। तुम यहाँ रहने योग्य नहीं अतः तुम नीचे लोक में जाओ। तुम्हारा पतन हो जाये।" इसपर दोनो द्वारपाल मुनियों के चरणों पर गिर पड़े। तभी भगवान का आगमन हुआ। मुनियों नें भगवान को प्रणाम किया। श्री भगवान कहते हैं "हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण सदैव मेरे आराध्य हैं। मैं आपसे मेरे द्वारपालों द्वारा अनुचित व्यवहार हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ।" उन्होंने द्वारपालों से कहा "यद्यपि मैं इस श्राप को समाप्त कर सकता हूँ परंतु मैं ऐसा नहीं करुंगा क्योंकि तुम लोगों को ये श्राप मेरी इच्छा से ही प्राप्त हुआ है। तुम लोग इसके ताप से तपकर ही चमकोगे, यह परीक्षा है इसे ग्रहण करो। एक बात और... तुम मेरे बड़े प्रिय हो।" द्वारपालों ने श्राप को ग्रहण किया। मुनियों ने कहा "प्रभु! आप तो हमारे भी स्वामी हैं और सब ब्राह्मणों का आदर करते हुए सभी लोग मुक्ति को प्राप्त करें यह सोचकर हमें आदर प्रदान करते हैं। प्रभु आप धन्य हैं। सदैव हमारे हृदय में वास करें। और द्वारपालों की मुक्ति आपके करकमलों से ही होगी" भगवान ने द्वारपालों को कहा "द्वारपालों तुम तीन जन्म तक दैत्य योनि में जाओगे तथा मैं तुम्हारा उद्धार करुंगा।" इसी श्राप के कारण ये दोनों द्वारपाल तीन जन्मों तक दैत्य बने। प्रथम जन्म में ये दोनों ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु बनें, द्वितीय जनम में  रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में ये ही शिशुपाल  तथा दन्तवक्र बने। भगवान विष्णु ने अवतार लेकर इनका उद्धार किया था। 

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम वक्ता (३) रोमहर्षण सूत जी ( भागवत प्रसंग 14)

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम वक्ता (३) रोमहर्षण सूत जी          ( भागवत प्रसंग 14)
डा. राधेश्याम द्विवेदी
रोमहर्षण सूत जी महर्षि वेदव्यास के परम प्रिय शिष्य थे। ये सूत जाति के थे। जिसकी मां ब्राह्मण और पिता क्षत्रिय हो वो  सूत  कहा जाता है ।महर्षि वेदव्यास बहुत ही उदार विचारों के थे। रोमहर्षण के स्तुति पाठ तथा शास्त्रों-पुराणों में उनकी रुचियों को देखकर व्यास जी ने रोमहर्षण को अपना शिष्य बनाया था। रोमहर्षण ने पुराण विद्या का ऐसा पारायण किया कि उनकी प्रतिभा चमत्कृत हो गयी। जाति से अन्त्यज होते हुए भी व्यास जी की कृपा से पुराणों-शास्त्रों का उन्होंने गहन अध्ययन किया और कई ग्रन्थों की रचना की।
पुराणों के अद्भुत प्रवक्ता:-
भगवान वेदव्यास ने रोमहर्षण को समस्‍त पुराणों को पढ़ाया और आशीर्वाद दिया कि ‘तुम समस्‍त पुराणों के वक्‍ता बनोगे।इसीलिये रोमहर्षण समस्‍त पुराणों के वक्‍ता माने जाते हैं। ये सदा ऋषियों के आश्रमों में घूमते रहते थे और सबको पुराणों की कथा सुनाया करते थे। नैमिषारण्‍य में अठासी हज़ार ऋषि निवास करते थे। सूत जी उनके यहां सदा कथा कहा करते थे। यद्यपि ये सूत जाति के थे, फिर भी पुराणों के वक्‍ता होने के कारण समस्‍त ऋषि इनका आदर करते थे और उच्‍चासन पर बिठाकर इनकी पूजा करते थे। इनकी कथा इतनी अद्भुत होती थी कि आसपास के ऋषिगण जब सुन लेते थे कि अमुक जगह सूत जी आये हैं, तब सभी दौड़-दौड़कर इनके पास आ जाते और विचित्र कथाएं सुनने के लिये इन्‍हें घेरकर चारों ओर बैठ जाते। पहले तो ये सब ऋषियों की पूजा करते, उनका कुशल-प्रश्‍न पूछते और कहते- "ऋषियों! आप कौन-सी कथा मुझसे सुनना चाहते हैं?" इनके प्रश्‍न को सुनकर शौनक या कोई वृद्ध ऋषि किसी तरह का प्रश्‍न देते और कह देते- "रोमहर्षण सूत जी! यदि हमारा यह प्रश्‍न पौराणिक हो और पुराणों में गाया हो, तो इसका उत्‍तर दीजिये।"
            ऐसी कौन-सी बात है, जो पुराणों में न हो। पहले तो सूत उनके प्रश्‍न का अभिनन्‍दन करते और फिर कहते- "आपका यह प्रश्‍न पौराणिक ही है। इसके सम्‍बन्‍ध में मैंने अपने गुरु भगवान वेदव्यास से जो कुछ सुना है, उसे आपके सामने कहता हूँ, सावधान होकर सुनिये।" इतना कहकर सूत जी कथा का आरम्‍भ करते और यथावत समस्‍त प्रश्‍नों का उत्‍तर देते हुए कथाएं सुनाते। इस प्रकार ये सदा भगवल्लीला कीर्तन में लगे रहते थे। इनसे बढ़कर भगवान का कीर्तनकार कौन होगा।
भ्रम और गलती से हुई थी मृत्यु :-
रोमहर्षण की मृत्‍यु भगवान बलदेव के द्वारा हुई। नैमिषारण्य में तीर्थयात्रा करते हुए बलदेव जी पहुंचे। ये उस समय व्‍यासासन पर बैठे थे। उन्‍हें देखकर उठे नहीं। इस पर बलराम जी को क्रोध आ गया और उन्‍होंने इनका सिर काट लिया। महर्षि शौनक ने बलराम जी से कहा- "रोमहर्षण का वध करके जहाँ आप ब्रह्महत्या के दोषी हुए, वहीं आपने हम ऋषियों का भी बहुत अहित किया। रोमहर्षण के वध से पुराण विद्या के लोप होने का भय हो गया है। बिना सोचे-विचारे किए गये कार्य का दुष्परिणाम स्वयं अपने के अलावा बहुतों का अहित करता है।"
        महर्षि शौनक की व्यथाभरी बात सुनकर बलदेव स्तब्ध रह गये, पर अब क्या कर सकते थे। खेद तथा दु:ख से सिर झुका कर कहा- "ऋषिवर! निश्चय ही मैं अपराधी हूँ। मुझे नहीं पता था कि आप लोगों ने स्वयं रोमहर्षण को यह सम्मान दिया था। मैं तो यही समझता था कि वह अभिमान से इस आसन पर बैठकर उद्दण्ड हो गया है। अपने अविवेक से मैंने जो कर्म किया है, इसका कर्मफल मैं भोगूँगा, पर पुराण गाथा आगे चले, इसके लिए क्या होगा?" शौनक ने कहा- "रोमहर्षण का पुत्र उग्रश्रवा भी अधिक विद्वान् है। हम उसे बुलाकर पुराण-गाथा श्रवण करने का प्रबन्ध करेंगे। इस विद्या का लोप नहीं होने देंगे। श्रुति के माध्यम से हम इसे ग्रहण कर इसकी परम्परा बढ़ाते रहेंगे।"
         बलदेव शौनक के चरणों पर गिरकर बोले- "मुनिवर! आप उग्रश्रवा को बुलाकर इस व्यास गद्दी पर बैठाइए। मैं उनके आसनासीन होने पर उनसे अपने अपराध की क्षमा-याचना करूँगा तथा ब्रह्मा-हत्या दोष के निवारण के लिए तीर्थों में घूम-घूमकर प्रायश्चित्त करूँगा।" 
           ऋषि शौनक ने उग्रश्रवा को बुलाकर सारी स्थिति बतायी तथा उसे व्यास गद्दी पर बैठाया। बलदेव ने अपने अपराध की क्षमा माँगी और प्रायश्चित्त के लिए चले गये। उग्रश्रवा ने पुराण सुनाना प्रारम्भ किया। आजकल जो पुराण उपलब्ध हैं, उसमें कई में रोमहर्षण का संवाद मिलता है, कई में उग्रश्रवा का मिलता है। रोमहर्षण के जीवनकाल में ही उग्रश्रवा को ऋषि तथा ब्राह्मण समाज में बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उग्रश्रवा ऋषियों की श्रेणी में थे।
          इससे विदित होता है कि प्राचीन काल में जाति से अधिक गुण का सम्मान होता था। प्राचीन काल में प्रतिष्ठा प्राप्त करने तथा विद्या अर्जित करने में जाति बाधक नहीं होती थी।


Friday, February 4, 2022

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (२) राजा परीक्षित जी ( भागवत प्रसंग 13 )

श्रीमद्भागवत कथा के उत्तम श्रोता (२) राजा परीक्षित जी ( भागवत प्रसंग 13 )
डा. राधेश्याम द्विवेदी
         श्रीमद्भागवत कथा के वक्ता श्री शुकदेव जी का वर्णन पिछले एक कड़ी में दे दिया गया है। आज के कड़ी में राजा परीक्षित जी का परिचय दिया जा रहा है। राजापरीक्षित अर्जुन के पौत्र अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा जनमेजय के पिता थे। जब ये गर्भ में थे तब अश्वत्थामा ने ब्रम्हशिर अस्त्र से परीक्षित को मारने का प्रयत्न किया था । ब्रम्हशिर अस्त्र का संबंध भी भगवान ब्रम्हा से है तथा ब्रम्हा के ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र के समान शक्तिशाली, अचूक और घातक कहा गया है। इस घटना के बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योगबल से उत्तरा के मृत पुत्र को जीवित किया था । महाभारत के अनुसार कुरुवंश के परिक्षीण होने पर जन्म होने से वे 'परीक्षित' कहलाए भागवत पुराण के अनुसार, महाराज परीक्षित जब अपनी माता उत्तरा के गर्भ में अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगे, तब उन्होंने अपने सामने परमेश्वर को देखा, वह अँगूठे भर ऊँचे हैं, वे सुन्दर श्याम वर्ण तथा बिजली जैसा चमकदार पीताम्बर धारण किये हैं। उनकी सुन्दर लम्बी चार भुजाएं थीं, आँखों में लालिमा तथा कानों में सुन्दर स्वर्ण कुण्डल हैं।  भगवान् हाथों में गदा लेकर उसे बार बार घुमाते जा रहे थे एवं शिशु परीक्षित के चारों तरफ घूमते जा रहे थे।
       भगवान् की गदा ने उस ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत कर दिया।  बालक परीक्षित सोचने लगा की यह पुरुष कौन हैं, इस प्रकार बालक के देखते देखते परमात्मा पुरुषोत्तम भगवान् अंतर्ध्यान हो गए। तत्पश्चात शुभ नक्षत्रों तथा राशि से युक्त समय में तेजस्वी बालक परीक्षित का जन्म हुआ। पौत्र के जन्म से युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने धौम्य, कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगल वाचन तथा जातकर्म संस्कार करवाया। महाराज युधिष्ठिर दान के योग्य समय को जानते थे अतः उन्होंने ब्राह्मणों को सुवर्ण, गौएँ, पृथ्वी, गॉवों, उत्तम जाति के हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न का दान दिया। ब्राह्मणों ने प्रसन्न हो कर युधिष्ठिर से कहा कि यह बालक विष्णुरात (भगवान द्वारा रक्षित) के नाम से विख्यात होगा तथा यह यशस्वी, भगवान् का परम भक्त एवं महापुरुष होगा।
परीक्षित द्वारा कलियुग का दमन:-
पांडवों के महाप्रयाण के पश्चात श्रेष्ठ ब्राह्मणों के आदेशानुसार महाराज परीक्षित पृथ्वी पर शासन करने लगे। एक बार राजा परीक्षित को पता चला की उनके राज्य की सीमा के भीतर कलियुग का प्रवेश हो रहा है।  उन्होंने दिग्विजय करते समय देखा की एक राजवेषधारी शूद्र, एक गाय तथा बैल को डंडे से पीट रहा है जैसे उनका कोई स्वामी न हो।  श्वेत कमल पुष्प जैसा बैल, शूद्र से अत्यधिक भयभीत था, गाय भी अत्यंत दीन हो रही थी। उसके पावों पर पर वह शूद्र प्रहार कर रहा था।
राजा परीक्षित ने गंभीर वाणी से बोले "तुम हो कौन, जो बलवान प्रतीत होते हुए भी मेरे राज्य में दुर्बल प्राणियों को बल पूर्वक मार रहे हो, वेष से राजा परन्तु कार्यों से क्षत्रियों के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हो, चूंकि तुम इस निर्दोष को एकांत स्थान में मार रहे हो अतः अपराधी हो तथा वध के योग्य हो। महाराज परीक्षित ने धर्म रुपी बैल तथा पृथ्वी रुपी गाय को सांत्वना दी तथा अधर्म के कारणरूप कलियुग को मारने के लिए तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत हो कर उनके चरणों मे अपना सिर रख दिया। परीक्षित ने कलियुग को शरणागत हुआ देख उसको मारा नहीं।  कलियुग ने परीक्षित से प्रार्थना करी कि वे उसके रहने का स्थान निश्चित कर दें।महाराज परीक्षित ने कलियुग के रहने के चार स्थान निश्चित कर दिए - जहाँ जुआ खेलना, शराब पीना, वैश्यावृत्ति, पशु वध होतें हैं। कलियुग ने और भी स्थान मांगे तो राजा ने उसे उस स्थान पर रहने की अनुमति प्रदान कर दी जहाँ स्वर्ण उपलब्ध होता है, इस प्रकार कलियुग के रहने के पांच स्थान हो गए - झूठ, मद, काम, वैर और रजोगुण।
दैहिक त्याग:-
एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार करते हुए, हिरणों का पीछा करते हुए अत्यंत थक गए। जलाशय की खोज करते हुए वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां आँखें बंद करके शांत भाव से एक मुनि बैठे हुए हैं। वे संसार से ऊपर उठ गए थे तथा निर्विकार ब्रह्मरूप तुरीय रूप में स्थित थे। राजा परीक्षितने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्यूंकि वे प्यास से व्याकुल थे। आसन, बैठने का स्थान, जल तथा मधुर वचनों के द्वारा स्वागत न किये जाने पर राजा क्रुद्ध हो गए। वे भूख-प्यास से व्याकुल थे अतः उन्हें ब्राह्मण के प्रति ईर्ष्या एवं क्रोध हो आया।  उनके जीवन में ऐसा अवसर पहली बार था। राजाने लौटते समय अपने धनुष से एक मृत सर्प उठाया और क्रोधवश उसे मुनि के कंधे पर रख दिया और अपने राजमहल लौट आये।
         उन शमीक मुनि के तेजस्वी पुत्र ने जब सुना कि राजाने मेरे पिताके साथ दुर्व्यवहार किया है, तब उस क्रोध से लाल आँखों वाले ऋषिपुत्र ने कौशिक नदी के जल का आचमन करके शब्दरूपी वज्र छोड़ा। उस ब्राह्मण पुत्र ने राजा को इस प्रकार श्राप दिया: आज से सातवें दिन महाराज परीक्षित को तक्षक सर्प डँस लेगा, क्यूंकि इसने मेरे पिता का अपमान करके मर्यादा का उल्लंघन किया है। शमीक मुनि ने अपने पुत्र द्वारा राजा परीक्षित को दिया श्राप जानकर पछताने लगे कि उनके पुत्र ने भगवत् स्वरूप राजा को श्राप दिया तथा तुच्छ अपराध के लिए इतना भारी दंड दिया। महात्मा स्वभाव मुनि ने राजा द्वारा किये गए अपमान पर ध्यान ही नहीं दिया।
          घर लौटकर राजा को अपने निंदनीय कर्म के लिए पश्चाताप हुआ, इस प्रकार चिंता करते हुए उन्हें मालूम हुआ - ऋषि कुमारके शापसे तक्षक द्वारा मेरी मृत्यु होगी। राजा ने इसे शुभ समाचार के तौर पर ग्रहण किया। वे सोचने लगे कि बहुत दिनों से मैं संसारमें आसक्त हो रहा हूँ, अब मुझे शीघ्र वैराग्य प्राप्त होने का अवसर मिला। वे भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलोंकी सेवाको सर्वोपरि मान कर उपवास करने गंगा तट पर बैठ गए।
इस श्राप के मिलने के बाद परीक्षित ने राजकाज त्याग कर बेटे जनमेजय को सौंप दिया और अगले सात दिन के लिए वेद व्यास के बेटे सुकदेव के शरण में चले गए जहां उनसे उन्होंने प्रवचन वाणी सुनी। इसी को बाद में तैयार करके भगवद पुराण बनाया गया।
        उस समय त्रिलोकीको पवित्र करनेवाले बड़े बड़े ऋषि मुनि वहां पधारे। वहां अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, परशुराम, भृगु, भारद्वाज, गौतम, नारद आदि कई श्रेष्ठ ऋषि आये। राजा ने सबका सत्कार किया तथा उनके चरणों पर सर रखकर वंदना की। राजाने उनके समक्ष आमरण अनशन करने का संकल्प बताया। राजाने ऋषियों से प्रश्न किया की थोड़े ही समयमें मरनेवाले पुरुषों के लिए अंतःकरण तथा शरीर द्वारा करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन सा है।
         उसी समय व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी का वहां आगमन हुआ तथा महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से श्रीमद भागवतम का सात दिन तक चलने वाले कथा का श्रवण किया। उनके मन की सारी संकायें और दुबिधा समाप्त हो गया तथा उन्होंने दिव्य अभय बैकुंठ का पद प्राप्त हुआ ।




Tuesday, February 1, 2022

भागवत प्रवक्ता भगवान शुकदेव के दो जन्मों की कहानी डा. राधे श्याम द्विवेदी (भागवत प्रसंग 10)

राधा रानी के शुक के रूप में भगवान शुकदेव :-
शुकदेव जी पूर्व यानी पहले जन्म में राधा रानी जी के निकुंज के शुक (तोता) थे| निकुंज में गोपिओं के साथ प्रभु क्रीडा करते और शुकदेव जी सारा दिन राधा-राधा कहते कहते बीतता था। यह देख एक दिन राधा जी ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया | तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता था।
वह उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेती और तोता फिर श्री राधे राधे बोलने लगता था | तब राधा जी ने कहा, “अब तू राधा राधा नहीं, कृष्ण कृष्ण बोला कर ” |
शुकदेव जी ऐसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोता भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे। राधा की सखी सहेलियों पर भी कृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था।
आगे चलकर एक बार राधा जी कृष्ण से मिलती है और राधा जी ने उनसे कहीं कि यह तोता कितना मधुर बोलता है ? वह उसे प्रभु के हाथ में दे दिया | इस प्रकार राधा जी ने ब्रह्म के साथ उस तोते का प्रत्यक्ष दर्शन और मिलन कराया | 
गुरु और पति का नाम लेना वर्जित :-
पूर्व जन्म में शुकदेव जी के सद्गुरु श्री राधा जी हैं । सद्गुरु होने के कारण शुकदेव जी भागवत में राधा जी अर्थात अपने सदगुरु का नाम नहीं लिया | जिस प्रकार यदि पत्नी अपने पति का नाम ले, तो उसकी आयु घटती है, उसी प्रकार सद्गुरु को मन में स्मरण कर ‘सद्गुरु कि जय” कहना चाहिए, नाम लेकर मर्यादा भंग नहीं करनी चाहिए | ऐसा शास्त्रों में वर्णन आता है | आज के जमाने में पत्नियां इस रहस्य से अनजान हैं। उन्हें इस प्रकार की सीख अपने बुजुर्गों से लेनी चाहिए।
           एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी नारद जी बीच में आ गए। कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है?
         कृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है। कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा की आंखें भर आईं। महल लौटकर राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा-राधा ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का। यानी राधा कृष्ण के संयुक्त नाम लेने की परम्परा पड़ी।
श्रीमद्भागवत में राधा नाम नहीं है:-
अगर भागवत कथा में शुकदेव जी राधा नाम लेते तो कथा पूरी नही हो पाती।राधा रानी शुकदेव जी की सतगुरु है । अगर वह अपने गुरुदेव का नाम लेते थे तो समाधि में चले जाते। परीक्षित के जीवन के केवल 7 ही दिन बचे हुए थे। इसलिए भागवत में उन्होंने राधा नाम को गुप्त रूप से लिया है। आज हम और आप कहीं भी जाकर देख लें।वृन्दावन, बरसाने में सभी राधे राधे ही रटते है। यही कारण है की हमारे कृष्ण जी को श्री राधा रानी का नाम अत्यंत प्रिय है।
            एक बार तुलसीदास जी जब वृन्दावन गए थे तो हैरान रह गए थे की यहाँ सभी लोग राधे-राधे जपते है। इसलिए कलयुग में श्री राधा जी का नाम सर्वोपरि है। राधा कृष्ण की तरह सीता का नाम भी राम से पहले लिया जाता है।असल में राम और कृष्ण दोनों ही एक हैं और राधा एवं सीता भी एक हैं। यह हमेशा नित्य और शाश्वत हैं।
          यही लक्ष्मी और नारायण रूप से संसार का पालन करते हैं। नारायण लक्ष्मी से अगाध प्रेम करते हैं। यह हमेशा अपने हृदय में बसने वाली राधा का नाम सुनना चाहते हैं। इसलिए ही कृष्ण नाम से पहले राधा नाम लिया जाता है।
भगवान शुकदेव की दूसरे जन्म की पृष्ठभूमि:-
समस्त संसार में आर्यवर्त एक पवित्र धरा है । स्वर्ग लोक के देवता भी इस धरा पर जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं । समय-समय पर अनेक दिव्य विभूतियों ने इस धरा पर जन्म लिया और पवित्र किया है । इसी भारत भूमि पर द्वापर और कलियुग के संधि के समय में एक दिव्य विभूति महात्मा शुकदेव जी ने जन्म लिया था और अपनी दिव्य वाणी के द्वारा पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण को प्रकट किया था । 
         भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त भगवान शुकदेव जी की जन्म की कथा अत्यंत दिव्य है, इस कथा का श्रवण और पाठन मात्र से व्यक्ति के समस्त कष्टों का नाश होता है और प्रभु के प्रति भक्ति का भाव जागृत होता है ।
          ईश्वर इच्छा से एक बार माता पार्वती के गुरु वामदेव जी कैलाश पधारे । उन्होंने भोलेनाथ के दर्शन किए और उनकी चरण वंदना की । देवी पार्वती ने उनका अत्यंत आदर सत्कार किया । कैलाश से प्रस्थान करते हुए उन्होंने देवी पार्वती को कंहा कि आप भोलेनाथ के अवश्य पूछे कि वह नरमुंडो की माला क्यों धारण करते हैं ? 
         उनके जाने के उपरांत देवी पार्वती ने महादेव से वह प्रश्न किया । उस समय महादेव ने देवी पार्वती के प्रश्न को टाल दिया परंतु उनके अनेक बार आग्रह करने पर महादेव बोले, हे पार्वती, यह आप ही के नरमुंडो की माला है जिसे मैं धारण करता हू । हे पार्वती, समय के प्रभाव से आप बार - बार जन्म लेती हो और मृत्यु को प्राप्त करती हो और फिर मैं आपके ही मुंड की माला बना कर उसे धारण करता हू । 
          तब देवी पार्वती ने महादेव से हंसकर प्रश्न किया कि हे प्रभु आपने ऐसा कौन सा कार्य किया हुआ है जिससे आप मृत्यु को प्राप्त नहीं होते ? 
        महादेव बोले, मैंने परम दिव्य अमृतमयी अमर कथा का रसपान किया हुआ है और इसी के प्रभाव से मैं अमर हूं ।
          देवी पार्वती बोली हे प्रभु, मैं आपके मुखारविंद से उस परम दिव्य अमृत कथा को सुनने की इच्छा रखती हूं ।
           महादेव बोले हे देवी, जिस कथा को सुनने मात्र से ही प्राणी अमर हो जाता है उसे सुनाने के लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता है अतः मैं शीघ्र ही आपके समक्ष उस दिव्य कथा का वर्णन करूंगा।
अमर कथा का वर्णन:-
देवी पार्वती को दिव्य कथा का वर्णन करने के लिए महादेव ने पर्वतों से गिरी हुई एक प्राकृतिक गुफा को निश्चित किया । जिसकी ओर प्रस्थान करते हुए महादेव ने नंदी, चंद्रमा, गंगा जी, और वासुकी को विभिन्न स्थानों पर छोड़ दिया और देवी पार्वती के साथ गुफा मे पहुंचे ।
         महादेव बोले हैं देवी, इस दिव्य कथा का वर्णन करते हुए मैं समाधि की अवस्था में चला जाऊंगा अतः आप बीच - बीच में हुंकार भरती रहना और यह भी सुनिश्चित कर लेना कि आपके और मेरे अतिरिक्त इस स्थान पर कोई अन्य प्राणी ना हो । 
         देवी पार्वती ने सभी पशु - पक्षियों और जीव-जंतुओं को वहां से भगा दिया परंतु उन्होंने उस गुफा में उपस्थित एक तोते के विकृत अंडे पर कोई ध्यान नहीं दिया । इसके अतिरिक्त वहां कबूतरों का एक जोड़ा भी था जिसका देवी पार्वती को आभास नहीं हुआ ।
           महादेव दिव्य कथा का वर्णन कर रहे थे और देवी पार्वती बीच- बीच में हुंकार भरकर कथा का श्रवण कर रही थी । अमर कथा के प्रभाव से तोते के उस विकृत अंडे में प्राण शक्ति का संचार होने लगा था । 
अमर कथा के प्रभाव से द्वितीय जन्म के शुक का जन्म :-
ईश्वर इच्छा से कथा सुनते हुए देवी पार्वती को नींद आ गई और उनके स्थान पर वहां उपस्थित नवजात शुक हुंकार भरने लगा । जब कथा समाप्त करने के उपरांत महादेव अपनी समाधि से उठे तो उन्होंने देखा कि देवी पार्वती के स्थान पर एक शुक हुंकारे भर रहा है तो वह अत्यंत क्रोधित हो गए । उस शुक का वध करने के लिए महादेव उसके पीछे दौड़े ।  
         नियति के अनुसार महादेव के भय से वह शुक उड़ता हुआ महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचा । व्यास की पत्नी पिंजल किंजल या पिंगला है . वह ऋषि जाबालि की बेटी थी . उनका दो और नाम अरणी व देवी वीटिका भी मिलता है। उस समय महर्षि वेदव्यास अपनी पत्नी को उनके द्वारा रचित की गई दिव्य पुस्तक श्रीमद्भागवत महापुराण का वर्णन कर रहे थे । उस दिव्य कथा को सुनकर देवी वीटिका अत्यंत विस्मित हो रही थी उसी समय महादेव से बचते हुए वह शुक सूक्ष्म रूप धारण कर देवी के मुंह में चला गया ।
            जब महादेवजी, उस शुक के पीछे - पीछे महर्षि के आश्रम में पहुंचे तो वेदव्यास जी ने महादेव को दंडवत प्रणाम किया और उन्हें आश्रम में हिंसा ना करने की प्रार्थना की । वेदव्यास की प्रार्थना से भगवान शिव प्रसन्न हो गए उन्होंने उस शुक के वध करने का विचार त्याग दिया और उन्हें वरदान मांगने को कहां ।
शुकदेव जी का जन्म का वरदान
वेदव्यास जी बोले प्रभु, "मैं आपकी कृपा से श्रीमद्भागवत महापुराण के लेखक का कार्य पूर्ण कर चुका हूं परंतु उस दिव्य कथा का वर्णन करने के लिए मुझे एक योग्य वक्ता की आवश्यकता है ।"
           महादेव बोले, "देवी वीटिका के गर्भ मे पल रहा यह शुक ही तुम्हारे पुत्र के रूप मे जन्म लेगा और संसार मे भागवत का प्रचार करेगा ।" 
          वह शुक, देवी वीटिका के गर्भ मे पलने लगा । वह अमर कथा का श्रवण कर अमर हो चुका था और बाहर आकर सांसारिक मोह - माया के बंधन मे बंधना नहीं चाहता था इसलिए नौ महीने की अवधि समाप्त होने के उपरांत भी वह गर्भ से बाहर नहीं आया । उस दिव्य शुक के गर्भ मे होने के उपरांत भी उसकी माता को शारीरिक कष्ट नहीं होता था । वह सूक्ष्म रूप मे ही उस गर्भ मे बारह वर्ष तक रहा । 
          बारह वर्षों के उपरांत भी जब वेदव्यास जी ने उसे बाहर आने की प्रार्थना की तो उसने कहा कि अगर श्री कृष्ण उसे गर्भ मे दर्शन दे और यह वरदान दे की संसार की मोह - माया का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी वह गर्भ से बाहर आएगा । वेदव्यास जी के आग्रह पर श्री कृष्ण ने उस बालक को गर्भ में दर्शन दिए और सांसारिक मोह - माया से मुक्त रहने का आशिर्वाद दिया । 
          बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले ।गर्भ से बाहर आते ही वह बारह वर्ष के किशोर बालक मे परिवर्तित हो गया ।वेदव्यास जी ने उस बालक का नाम शुकदेव रखा । शुकदेव जी ने गर्भ मे ही वेदव्यास जी से शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था।
        जन्म लेते ही शुकदेवजी अपने माता पिता और श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वन में तपस्या के लिए चले गए। ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी। परंतु वात्सल्य भाव से रोते हुए श्री व्यास जी भी उनके पीछे भागे। 
       मार्ग में एक जलाशय में कुछ कन्याएं स्नान कर रही थीं, उन्होंने जब शुकदेव जी महाराज को देखा तो अपनी अवस्था का ध्यान न रख कर शुकदेव जी का आशीर्वाद लिया। लेकिन जब शुकदेव के पीछे मोह में पड़े श्री व्यास वहां पहुंचे तो सारी कन्याएं छुप गयीं। ऐसी सांसारिक विरक्ति से शुकदेव जी महाराज ने तप प्रारम्भ किया।
         महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र को बुलाने के अनेक प्रयास किए परंतु वह सब प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुए । फिर महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों को बुलाया और उन्हें भगवान श्री कृष्ण के साकार रूप से संबंधित आधा श्लोक रटाकर शुकदेव के पास भेजा । 
           वन में वेदव्यास जी के शिष्यों के मुख से भगवान श्री कृष्ण के साकार रूप का वर्णन सुनकर शुकदेव जी अत्यंत प्रभावित हुए । उन्होंने उन शिष्यों से उस श्लोक की अगली पंक्ति सुनाने का आग्रह किया परंतु उन्हें श्लोक की अगली पंक्ति का ज्ञान नहीं था । वह बोले, अगर आपको श्लोक की अगली पंक्ति के बारे में जानना है तो आप हमारे गुरु वेदव्यास जी के पास जाकर पूछिए ।
          शुकदेव जी ने तत्काल ही तपस्या करना छोड़ दिया और अपने पिता वेदव्यास जी के पास पहुंचे ।भगवान वेदव्‍यास 
के सम्‍मुख अध्‍यापन की समस्‍या थी। उन्‍होंने अपने ध्‍यान बल से देखा तो उन्‍हें ज्ञात हुआ कि श्री शुकदेव के अन्‍त: स्‍थल में पहिले से ही श्रीमद्भागवत के संस्‍कार विद्यमान हैं। क्‍योंकि पूर्व जन्‍म में जब वो तोते के गले हुए अंडे के रूप में कैलाश पर्वत पर पड़े हुए थे तब भगवान शंकर के मुख से श्रीमद्भागवत की कथा सुनकर ये जीवित हो गए थे और पार्वती के सो जाने पर भी ऊं ऊं का उच्‍चारण करते हुए स्‍वीकृति वचन देते रहे थे।
              भगवान वेदव्यास जी ने उन्हें श्रीं कृष्ण के साकार रूप से संबंधित अनेक श्लोकों का ज्ञान दिया । परमात्मा के साकार रूप का वर्णन सुनकर शुकदेव का मन अति प्रफुल्लित हो गया उन्होंने अपने पिता से और श्लोक सुनाने का आग्रह किया । वेदव्यास जी ने उनके समक्ष श्रीमद्भागवत महापुराण के सभी 18000 श्लोकों का वर्णन किया । शुकदेव जी ने भागवत पढ़ना अपनी दिनचर्या बना लिया और उसे कंठस्थ कर लिया ।
श्रीमद्भागवत महापुराण का प्राकट्य :-
        नियति ने अपना कार्य कर दिया था । महाराज परीक्षित अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर गंगा नदी के तट पर आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठ चुके थे । महर्षि शुकदेव का जन्म श्रीमद्भागवत को संसार के समक्ष प्रकट करने के लिए हुआ था । जब शुकदेव जी को ज्ञात हुआ की परीक्षित एक ऋषि के श्राप के कारण आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठ गए है तो वे भी उनके दर्शन के लिए पहुंचे ।
      महाराज परीक्षित और शुकदेव जी भगवान कृष्ण के परम भक्त थे । श्रीं कृष्ण ने इन दोनों को गर्भ में ही अपने चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन दिए थे अतः ये दोनों ही माया से परे थे । संसार के कल्याण के लिए महाराज परीक्षित ने शुकदेव से प्रश्न किया की किस प्रकार एक पापी मनुष्य भी सात दिनों के भीतर सांसारिक भव - बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है?
          श्री शुकदेव ने उन्हें भगवान विष्णु और विशेषकर श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं का ज्ञान दिया । उनके द्वारा वर्णित की गई भगवान विष्णु की दिव्य लीलाओं और कथाओं का संग्रह श्रीमद्भागवत महापुराण के रूप मे संसार के समक्ष प्रकट हुआ ।
श्री शुकदेव के मुख से संसार के पालक श्री हरि की लीलाओ और कथाओं का वर्णन सुनकर महाराज परीक्षित के जन्म - जन्मांतर के पाप नष्ट हो गए, उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और ज्ञान की प्राप्ति हुई । श्रीमद्भागवत की दिव्य कथा का वर्णन कर शुकदेव वहां से चले गए ।
देवताओं को श्रीमद्भागवत का ज्ञान देना :-
वेदव्यास ने उन्हें विद्याध्ययन के लिए देव गुरु वृहस्पति जी के पास भेजा । शुकदेव जी एक विलक्षण शिष्य थे उन्होंने शीघ्र ही विद्याध्ययन का कार्य संपूर्ण कर लिया । उन्होंने देवताओं को श्रीमद्भागवत और महाभारत की कथा का ज्ञान दिया । इसके उपरांत वह पुनः आश्रम में आ गए ।
शुकदेव जी का विवाह :-
शुकदेव जी की आयु विवाह योग्य थी परंतु वह विवाह के बंधन मे नहीं बंधना चाहते थे । उनके पिता ने उन्हें विवाह के लिए सहमत कराने के कई प्रयास किए परंतु वह ब्रह्मचर्य को ग्रहस्थ आश्रम से श्रेष्ठ समझते थे । शुकदेव जी गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश लेना नहीं चाहते थे। व्‍यास जी ने उन्‍हें बहुत समझाया अंत में विदेहराज जनक जी के यहां धर्म की निष्‍ठा एवं मोक्ष का परम आशय पूछने के लिए मिथिला भेजा। राजा जनक ने अनेक प्रकार से परीक्षा लिया।उनकी कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होकर उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया। उनमें पात्रता देखकर उन्‍हें गृहस्‍थाश्रम का महत्‍व बतलाते हुए विवाह करने का उपदेश दिया । महाराज जनक के प्रवंचनो और उदाहरणों से उन्हें ग्रहस्थ आश्रम की श्रेष्ठता का आभास हुआ ।
       शुकदेव जी का विवाह देवी पीवरी से संपन्न हुआ । देवी पीवरी के पिता का नाम वहिषद था, वह स्वर्ग के सुकर लोक मे रहने वाले पितरों के राजा थे । पुराणों में शुकदेव के बारह पुत्रों और एक कन्या के जन्म का वर्णन मिलता है । उनके सभी पुत्र धर्म के मार्ग पर चलने वाले सिद्ध साधक थे ।
         यद्यपि अमर कथा का पान करने से शुकदेव जी अमर थे परंतु वह मानव देह के बंधनों मे बंधना नहीं चाहते थे और उन्हें मानव देह की नश्वरता का पूर्ण ज्ञान था । उन्होंने मनुष्य जन्म के चारो ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, और मनुष्य ऋण से मुक्ति प्राप्त की और अपने पिता वेदव्यास जी की आज्ञा प्राप्त कर सुमेरु पर्वत गए । वहाँ उन्होंने ईश्वर के चरणों में ध्यान लगाकर अपने भौतिक शरीर का त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया । कहते हैं कि शुकदेवजी अजर अमर हैं और वे समय-समय पर श्रेष्ठ पुरुषों को दर्शन देकर उन्हें अपने दिव्य उपदेशों के द्वारा कृतार्थ करते हैं। आज भी शुकदेव जी निराकार रूप में इस जगत मे विद्यमान है । उनके द्वारा वर्णित किया गया श्रीमद्भागवत महापुराण सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । लोग इस दिव्य ग्रंथ का पाठन और श्रवण कर अपना जीवन सार्थक करते है ।जिस जगह शुकदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुए थे वर्तमान समय में वह जगह हरियाणा में कैथल के गाॅंव सजूमा में है।