डॉ. मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” के सूचीबद्ध मध्योत्तर (तृतीय) कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार
नाम दिया गया है। बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान भाग दो द्वारा समित संख्या में 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इन छन्दकारों का परिचय और छन्दों का विवरण किसी न किसी साहित्य प्रेमी से उपलब्ध किया जा सका है, इसलिए एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से महात्मा गूंगदास जी एक सामान्य कवि है। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय -
महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के एक उच्चकोटि के संत और ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि थे। उनका जन्म राप्ती नदी के तट पर स्थित जिगिना (जिगना) ग्राम जिला बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में संवत 1960 विक्रमी के आस पास एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। महात्मा गूंगदास पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के बलरामपुर-गोंडा क्षेत्र के एक सिद्ध संत और महाकवि थे। जनपद बलरामपुर के अंतिम पूर्वी छोर पर बूढ़ी राप्ति नदी के तट पर स्थित "राम तलहा कुटी" (राम तला कुटी) उन्हीं की तपोभूमि के रूप में विख्यात है, जिसे 'बाबा गूंगदास रामतला कुटी' भी कहा जाता है। यह स्थल सिद्धार्थ नगर जिले के सीमान्तीय क्षेत्र बढ़नी रेलवे स्टेशन और पचपेड़वा स्टेशन के पास में स्थित है। कुटी राम ताल के नाम से राजस्व गांव भी है।
इस स्थल पर पारंपरिक रूप से धार्मिक आयोजन और वार्षिक रामतलहा मेला भी आयोजित किया जाता है। एक अन्य संदर्भ नागरीप्रचारिणी पत्रिका, वर्ष 48 अंक 1, सं० 2010 पृष्ठ 112 पर उल्लिखित विवरण में गोण्डा जिले के पचपेड़वा में इनकी कुटी बताई गई है। वे इस कुटी के महंत थे। उक्त कुटी के वतमांन महंत श्री अज्ञारामदास जी ने इनकी और अपनी गुरु-परंपरा इस प्रकार दी है---
मुन्नादास – उद्धवदास – गूंगदास – फकीरदास – भगवानदास –– परशुराम दास – शत्रुघनदास – लक्ष्मण दास – तिलंगादास-- संगमदास- रामपुलदास- आज्ञारामदास ( वर्तमान महंत ) 2010 के समय तक के रहे हैं।
लोकप्रिय निर्गुण भजन -
गूंग दास अपने सुंदर निर्गुण भजनों और स्थानीय सांस्कृतिक योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे एक सन्यासी और संत होने के साथ-साथ साहित्य प्रेमी थे, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को ब्रजभाषा के माध्यम से कविताओं में ढाला है –
फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी”
कोई जाने न भेदवा तुम्हार,
फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी।”
कवि महात्मा गूंगदास जी का प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोक-भजन "फुलवारी तोहरे नयनवा में लगी" है। यह भजन मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के गोंडा, बलरामपुर और पूर्वांचल क्षेत्रों के संतों और गायकों (जैसे मुनीराम यादव साहेब) द्वारा बेहद श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इनके भजनों में निर्गुण और सगुण भक्ति का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है, जिसमें नैनों (दृष्टि) और अंतरात्मा के रहस्यों को बड़े ही सरल लोक-गीतों के माध्यम से समझाया गया है।
भाषा शैली -
भले ही उनका क्षेत्र (राप्ती तट) मुख्य रूप से अवधी भाषी रहा है, लेकिन उस दौर की साहित्यिक परंपरा और कृष्ण भक्ति के प्रभाव के कारण उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए शुद्ध ब्रज भाषा को चुना।मध्य और उत्तर भारत की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का अनुसरण करते हुए उन्होंने कृष्ण भक्ति, दर्शन और लोक संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से ब्रजभाषा को माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण की बाल- लीलाओं, प्रेम, और भक्ति रस का मार्मिक वर्णन मिलता है।
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