भूमिका :-
डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी के शोध प्रबंध: “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो वर्ष 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है । तृतीय अध्याय का नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है। बीस कवियों का विस्तृत और 18 छन्दकारों की सूची संक्षेप में परिचयात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जनपदीय छन्द परमपरा विकास में तृतीय चरण का योगदान सर्वाधिक रहा है। इस चरण के कवियों ने तृतीय चरण के छन्द विधान को उत्कर्ष देने के साथ-साथ चतुर्थ चरण के कवियों का मार्गदर्शन भी किया है। 18 छन्दकारों की सूची डॉ सरस जी के शोध प्रबंध में पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से एक श्री चन्द्रबली त्रिपाठी जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय :-
स्वर्गीय पंडित चन्द्र बली त्रिपाठी का जन्म
जन्म 1893 ई में हुआ था। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, संस्कृत व दर्शनशास्त्र के प्रकांड विद्वान और लेखक थे। वे महामना मदन मोहन मालवीय जी के बेहद करीबी सहयोगी भी रहे थे। वे संस्कृत हिन्दी के विद्वान थे। ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली के छंदकार के रूप में बहुचर्चित हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का पं० चन्द्रबली त्रिपाठी दामाद और दुर्गावती त्रिपाठी पुत्री थी। दुर्गावती त्रिपाठी जन्म 13 अक्टूबर 1902 में मिर्ज़ापुर में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की पुत्री (बेटी) के रूप में हुआ था उन्होंने अपने ज़माने की सोच, समझ और व्यवहार से बहुत बहुत आगे रहीं।
उनका विवाह पं० चन्द्रबली त्रिपाठी के साथ हुआ जो संस्कृत और हिंदी के उच्चकोटि के प्रख्यात विद्वान और छंदकार थे।
पं० चन्द्रबली त्रिपाठी और प्रकाशक दुर्गावती त्रिपाठी का मूल निवास उत्तर प्रदेश का प्राचीन बस्ती वर्तमान सिद्धार्थ नगर जिला रहा । जहां कोटिया नामक गांव शोहरतगढ़ तहसील में बढ़नी ब्लॉक में स्थित एक आबाद गाँव है। 2011 की जनगणना के अनुसार, यहाँ 70 परिवारों में 400 लोग रहते हैं और इसका क्षेत्रफल 33.39 हेक्टेयर है। स्थानीय संदर्भों में नखही ग्राम पंचायत, जोगिया खास सीडी ब्लॉक शामिल हैं । उनका निकटतम शहर सिद्धार्थ नगर है, जो वहां से लगभग 36 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रमुख कार्य -
पं० चन्द्रबली त्रिपाठी एक प्रतिष्ठित लेखक थे, जिन्होंने 'उपनिषद रहस्य' तथा 'धर्मराज युधिष्ठिर' जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। उनके परिवार का साहित्यिक जुड़ाव शुक्ल जी की विरासत से बहुत गहरा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने 1957 में प्रकाशित हुई पुस्तक 'महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (संस्मरण)' का संपादन भी किया था, जिसकी प्रकाशक उनकी धर्म पत्नी श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी थीं।
पंडित चंद्रबली मणि त्रिपाठी बस्ती में अधिवक्ता थे। बस्ती जिला मुख्यालय के मालवीय रोड पर इनका अपना खुद का मकान है। यही से रहकर इन्होंने अपने पुत्र चंद्रचूड़ मणि को पढ़ाया था। जिसके बाद बेटा प्रोफेसर बना । कोटिया गांव में स्थित इनकी निजी भूमि पर परिवार के सदस्य खेती किसानी करते है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कोटिया ग्राम के मूल निवासी पण्डित चन्द्रबली त्रिपाठी से विवाह के उपरान्त मुख्यालय बस्ती में रह कर उन्होंने वो कर दिखाया जो किसी 'ब्राह्मण' कुलवधू के लिए आज भी संभव नहीं। घर के 'उठाऊ इज़्ज़तघर' की सफाई करने वाले गोकुल नामक भंगी के गंभीर रूप से रुग्ण होने पर स्वयं भोजन और पथ्य ले कर दो मील पैदल चल कर लगभग पंद्रह दिन उसकी सेवा-सुश्रूषा करना; पड़ोस के नन्दौर गाँव के मौलवी हसन अली के घर आने पर उन्हें घर के बर्तनों में भोजन कराने तथा उनके बीमार होने पर अपने हाथों उनकी हर तरह से उनकी तीमारदारी, साफ़ सफाई और देखरेख; बिहार में आये 1934 के भीषण भूकम्प और 1943 में बंगाल के दुर्भिक्ष में अन्न-वस्त्र-धन जुटा कर भेजना; औपचारिक शिक्षा के बिना बांग्ला, पाली, ब्राह्मी में प्रवीणता, बौद्ध धर्म में गहरी अभिरुचि; लुम्बिनी, श्रावस्ती, सारनाथ, महादेवा और सिसवनिया जैसे प्राचीन ढूहों, टीलों, पुरास्थलों का भ्रमण अवगाहन; स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी; उनके व्यक्तित्व के विलक्षण पहलुओं के द्योतक हैं। इतना ही नहीं, अपने संकलन में से लखनऊ संग्रहालय को पुरावेष भेंट किए और बस्ती में संग्रहालय की स्थापना करायी। कोपिया के प्राचीन टीले का निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला कि यहाँ शीशा गलाने के प्राचीन कालीन उद्योग रहे होंगे और सन 2004 के आस पास आलोक कुमार कानूनगो द्वारा कराए गए उत्खनन से उसकी पक्की तस्दीक हुई, समझती हैं।
'दुर्गावती दादी अम्माँ' की शख्शियत ऐसी अपनी रही कि जिसने 'वटवृक्ष के नीचे किसी और वृक्ष के न पनपने' और किसी स्त्री की पहचान उसके पिता, पति या पुत्र-पौत्रों की पहचान से जुडी होने' जैसी आम धारणाओं को अपने मामले में पूरी तरह झुठला दिया। वे केवल इसलिए नहीं जानी जाएंगी कि वे हिंदी के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य राम चंद्र शुक्ल जी ज्येष्ठा पुत्री और तब के पूर्वांचल के जाने माने पण्डित चंद्रबली त्रिपाठी की धर्मपत्नी रहीं; ना ही इसलिए कि उन्होंने जन्म दिया सुविख्यात चार-चार प्रतिभाशाली पुत्रों को डॉक्टर चंद्रचूड़ मणि - बौद्ध विद्वान, श्री चंद्रमौलि मणि - प्रखर मेधा के धनी और रेलवे के उच्चाधिकारी, श्री श्री चन्द्रभाल त्रिपाठी - पिछली शती के पांचवें दशक के जाने माने छात्र नेता, लखनऊ विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष, चिंतक और मानव शास्त्री तथा श्री चंद्रधर त्रिपाठी - भारतीय प्रशानिक सेवा (आई ए एस), और ना तो इस कारण कि उनके पौत्रों ने महा निदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय, आई आई टी दिल्ली में गणित के प्रोफेसर अथवा दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जैसे ऊंचे ऊंचे मुकाम हासिल किए। वे जानी जाती रहेंगी अपनी दुर्लभ प्रतिभा की बदौलत, माँ, अम्माँ, दादी अम्माँ के ममत्व भाव से कहीं ज्यादा करुणामूर्ति, विदुषी और क्रांतिकारी के रूप में।
बस्ती वालों को तो इस बात का गौरव भान रहेगा ही कि 'ऐसी निराली दादी अम्माँ रहीं हमरे कोटिया वाली, इससे आगे बढ़ कर वे पूरे पूर्वांचल, देश और मानवता के लिए वे सदैव एक अजस्र प्रेरणा-स्रोत बनी रहेंगी। समाज का ताना-बाना सुदृढ़ हो कर टिका रहता है ऐसी ही विभूतियों के योगदान से।
दुर्गावती के पति पण्डित चन्द्र बली त्रिपाठी की प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय समाज में नारी आदर्शों का विकास' के हिंदी संस्करण का प्रकाशन "दुर्गावती त्रिपाठी प्रकाशन, बस्ती, उत्तर प्रदेश" द्वारा वर्ष 1991 में किया गया था। पण्डित जी की मृत्यु 1985 ई में हुई थी।
सिसवनिया पच्चीसा जिला बस्ती में पुरातात्विक खोज :-
बस्ती जिले के सदर बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं उनके पुत्र चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:”बस्ती बसुधा”, पृष्ठ 84 )
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनन:
बाद के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. बी.आर. मणी बचपन में अपने दादी मां श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं पिता डॉ चंद्र मणि त्रिपाठी के अनुभवों और स्मृतियों को चिर स्थाई करते हुए एक उत्खनन दल गठित करते हुए वर्ष 1995-96 और 1996-97 के दौरान यहाँ वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत उत्खनन कार्य कराया था। सिसवनिया में मुख्य उत्खनन के साथ-साथ डॉ. बी. आर. मणी की देखरेख में बस्ती और सिद्धार्थनगर जिलों में व्यापक सर्वेक्षण भी किया गया, जिसके तहत लगभग 126 नए पुरातात्विक स्थलों की खोज की गई थी। इसी दौरान देउरांव, पिपरी, ओरई, धर्मसिंहवा और मुंडियार जैसे निकटवर्ती क्षेत्रों में भी प्रारंभिक परीक्षण खुदाई की गई थी।
लेखक परिचय :-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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