Saturday, June 27, 2026

आत्मा की यात्रा : मृत्यु के बाद के घटना क्रम ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


गरुड़ पुराण की कथा:-

गरुण पुराण हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है। इसमें ऐसा उल्लेख है कि, इसके पाठ से आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य के कर्मो का फल मनुष्य को जीवन में और मृत्यु के बाद भी मिलता है। इसलिए कर्मो के ज्ञान मृत्यु के बाद मृतक को गरुड़ पुराण का श्रवण कराने से मृतक को जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सत्य का ज्ञान जान सकता है।

गरुण पुराण का परिचय:-

गरुड़ पुराण  में 19,000 श्लोक है। परन्तु वर्तमान समय में पाण्डुलिपियों में कुल 8,000 श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस पुराण को पूर्वखण्ड और उत्तरखण्ड दो भागो में विभाजित किया गया है। पूर्वखण्ड में 229 अध्याय हैं। उत्तरखण्ड में अध्यायों की संख्या 34 से लेकर 49 तक मिलती है। पूर्वखण्ड को आचार खण्ड भी कहते हैं। उत्तरखण्ड को प्रेतखण्ड’ या ‘प्रेतकल्प’ भी कहा जाता है।

अधिकांश सामग्री पुराण के पूर्वखण्ड में-

गरुड़ पुराण की 90 प्रतिशत सामग्री पूर्वखण्ड में है, और 10 प्रतिशत सामग्री उत्तरखण्ड में है। गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड में विविध विषयों का समावेश किया गया है। इसमें जीव और जीवन से सम्बन्धित कथाऐं हैं। प्रेतखण्ड में मुख्य मनुष्य के मृत्यु बाद जीव की गति और उससे जुड़े हुए कर्मो से सम्बन्धित कथाऐं है। गरुड़ पुराण वैसा नहीं हे, जैसा पुराण के लिए भारतीय साहित्य में कहा गया है। इस पुराण में वर्णित कथाऐ भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ को सुनाई थी। फिर गरुड़ जी ने महर्षि कश्यप को सुनाई थी।

    गरुड़ पुराण के पूर्वखण्ड में भगवान विष्णु की भक्ति और उपासना की विधियों का वर्णन है। प्रेतखण्ड में प्रेत कल्प का विस्तार से वर्णन के साथ-साथ विभिन्न नरकों में जीव के जाने का वर्णन मिलता है। इसमें मृत्यु के बाद आत्मा की क्या गति होती है, आत्मा किस प्रकार की योनियों में जन्म लेता उसका वर्णन, प्रेत योनि से मुक्ति किस प्रकार पाई जाती उसका वर्णन, और नरकों के दारूण दुख से कैसे मोक्ष प्राप्त करने का वर्णन आदि का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।

भगवान श्री हरी विष्णु का वाहन पक्षीराज गरुड़ को कहा जाता है। एक बार भगवान विष्णु से पक्षीराज गरुड़ ने प्रश्न पूछा की मृत्यु के बाद प्राणियों की स्थिति, जीव की यमलोक-यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से संबंधित अनेक गूढ़ एवं रहस्य युक्त है। हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में तीन जन्म से पूर्व, चार जीवन कालमें तथा एक संस्कार मृत्यु के उपरान्त किया जाने वाला अन्तिम अर्थात् अन्त्येष्टि कर्म है, जिस का सम्बन्ध दाह संस्कार व अन्य अनुष्ठानों से है।

       ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार मृत्यु से बारह दिनों तक मृतक की आत्मा अपने आवास व सगे-सम्बन्धियों के आस-पास ही रहती है। मृतक की आत्मा अन्त्येष्टि कर्म का संचालन कर रहे पुरोहित के शरीर में भी देवरूप में प्रवेश करती है। शास्त्रों के अनुसार मृतक की आत्मा गरुड़पुराण की कथा को सुनती है जिससे  उसे मुक्ति मिल सके। ‘पितृमेधसूत्र‘ के अनुसार जिस प्रकार मनुष्य को जीवन में संस्कार के निर्वहन से जय मिलती है, उसी प्रकार मरणोपरान्त किए जाने वाले अन्त्येष्टि संस्कार के निर्वहन से मृतक को स्वर्ग प्राप्त होता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए दो संस्कार ऋणस्वरूप हैं जिन्हें करना अनिवार्य है, पहला- जन्म से सम्बन्धित जातकर्म और दूसरा – अन्त्येष्टिकर्म ।

भगवान विष्णु द्वारा पक्षीराज गरुड़ को दिया गया ज्ञान -

गरुड़जी की जिज्ञासा शान्त करने लिए भगवान विष्णु ने उन्हें जो ज्ञानमय उपदेश दिया था, इसे ही गरुड़ पुराण कहते है। गरुड़जी के प्रश्न पूछने पर ही स्वयं भगवान विष्णु के मुख से मृत्यु के उपरान्त के गूढ़रहस्य और परम कल्याणकारी वचन प्रकट हुए थे। भगवान श्रीहरी विष्णु का निर्धारित प्रमुख पुराण वैष्णव पुराण है। गरुड़ पुराण का ज्ञान ब्रह्माजी ने महर्षि वेदव्यास को सुनाया था। तत्पश्चात् महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्य महर्षि सूतजी को तथा महर्षि सूतजी ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषि-मुनियों को प्रदान किया था। बाद में  यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ा और महर्षि वेदव्यास ने इसे लिपिबद्ध कर(संकलित) कर दिया।

गरुण पुराण श्रेष्ठ पुराण :-

हिंदू धर्म में कुल 18 महापुराणों का उल्लेख मिलता है. सभी पुराणों का अपना-अपना विशेष महत्व है. लेकिन सभी पुराणों में गरुड़ पुराण को श्रेष्ठ माना गया है। गरुड़ पुराण अन्य 18 पुराणों में 17वां पुराण है. इसमें अन्य सभी पुराणों का सार वर्णित है. यही कारण है कि, इसे अन्य 17 पुराणों की अपेक्षा अधिक महत्व और श्रेष्ठ माना गया है।

13 दिनों तक होता है पाठ -

गरुड़ पुराण में जन्म के साथ ही मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्थिति के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है. इसके अनुसार, जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो मृतक की आत्मा पूरे 13 दिनों तक घर के आस पास ही रहती है. इसलिए 13 दिनों तक गरुड़ पुराण का पाठ घर पर रखा जाता है, जिससे कि मृतक की आत्मा को शांति व मोक्ष प्राप्त हो. इसे लोग अक्सर सिर्फ तेरहवीं तक सुनते हैं। इसमें कहानी नहीं, हिसाब है। 

     भगवान विष्णु गरुड़ जी के पूछने पर बताते हैं कि शरीर छूटने के बाद जीव के साथ क्या होता है। कोई कल्पना नहीं, कोई डरावनी फिल्म नहीं, बल्कि कर्म के भौतिकी का नक्शा ही दिखाया जाता है।

मृत्यु अंत नहीं,स्थानांतरण है -

पुराण कहता है, मृत्यु कोई अंत नहीं होता है यह केवल आत्मा का स्थानांतरण है। जैसे पुराने कपड़े उतार कर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा स्थूल शरीर छोड़ कर सूक्ष्म शरीर पहनती है। पर इस पहनावे में कोई जेब नहीं होती, सिर्फ कर्म फल का हिसाब होता है।

1. यमदूतों का आगमन और अंगूठे बराबर शरीर -

प्राण निकलते समय सबसे पहले दृष्टि बदलती है। घर वाले रो रहे होते हैं, डॉक्टर नब्ज देख रहा होता है, पर मरने वाला देखता है दो आकृतियों को। गरुड़ पुराण उन्हें यमदूत कहता है। रूप भयानक, आँखें लाल, हाथ में पाश। वे किसी को मारने नहीं आते, वे लेने आते हैं।

    उसी क्षण आत्मा अंगूठे के आकार का एक यातना शरीर धारण कर लेती है। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इसमें हड्डी मांस नहीं, सिर्फ वेदना सहने की क्षमता होती है। ताकि जो सुख दुख स्थूल शरीर से भोगे थे, उनका फल अब बिना शरीर के भी भोगा जा सके।

    यमदूत पाश डाल कर खींचते हैं। पुराण कहता है, आत्मा पीछे मुड़ कर देखती है। अपना घर, अपना नाम, अपनी देह। पर अब कोई सुनता नहीं। यही पहला कष्ट है, मोह का टूटना।

2. छियासी हजार योजन का रास्ता -

यमलोक की दूरी गरुड़ पुराण में 86,000 योजन बताई गई है। एक योजन लगभग आठ से नौ मील। यानी ऐसा रास्ता जिसे पैदल चलना पड़े तो महीनों लगें।

      यह रास्ता किसी हाईवे जैसा नहीं। न छाया, न पानी, न अन्न। कहीं तपती रेत, कहीं बर्फ जैसी ठंड, कहीं अंधेरा इतना कि अपना हाथ न दिखे। रास्ते में कांटे, जलते अंगारे, और हिंसक पशु।

     सबसे बड़ी यातना बाहर नहीं, भीतर है। आत्मा इस पूरे रास्ते अपने ही जीवन की फिल्म देखती है। कौन सा झूठ बोला, किसका हक मारा, किस भूखे को लौटाया। यमदूत कुछ नहीं कहते, सिर्फ चलाते हैं। पछतावा ही सबसे भारी बोझ बनता है। पुराण यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सत्य कहता है। मृत्यु के बाद दंड कोई बाहर से नहीं देता, हमारे कर्म ही रास्ता बन जाते हैं।

3. वैतरणी नदी सबसे प्रसिद्ध पड़ाव -

इस यात्रा का सबसे प्रसिद्ध पड़ाव है वैतरणी। सौ योजन चौड़ी, रक्त, मवाद, हड्डियों से भरी। जल खौलता हुआ, उसमें मगर, घड़ियाल जैसे जीव रहते हैं। गरुड़ पुराण में इसका उपाय भी बताया है, गोदान। जिसने जीवन में गाय का दान किया हो, श्रद्धा से, दिखावे से नहीं, उसे नदी पार कराते समय एक गाय आती है। आत्मा उसकी पूंछ पकड़ लेती है और बिना डूबे पार हो जाती है।

    यहाँ गाय सिर्फ पशु नहीं, प्रतीक है। गाय देने का अर्थ है पोषण देना, किसी का जीवन आसान करना होता है। जिसने जीते जी दूसरों को पार लगाया, उसे मरने पर पार लगाने वाला मिल जाता है। जिसने सिर्फ लिया, वह वैतरणी में डूबता उतरता है।

4. मृत्यु के बाद आत्मा की 16 नगरों की यात्रा -

वैतरणी के बाद आत्मा सीधे यमराज के दरबार नहीं आता। आत्मा को सोलह नगरों से गुजरना पड़ता है। हिंदू धर्म में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गरुड़ पुराण में इस यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें आत्मा को 16 विभिन्न नगरों (शहरों) से गुजरना पड़ता है। यह नगर आत्मा के कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करते हैं और इसे मोक्ष या पुनर्जन्म की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। 

1. सौम्यपुर -

गरुड़ पुराण के अनुसार, सौम्यपुर मृत्यु के बाद यमपुरी (यमलोक) की यात्रा का पहला मुख्य पड़ाव या नगर है,जहां आत्मा को यमराज के दूतों द्वारा ले जाया जाता है। यहां आत्मा को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का स्मरण कराया जाता है।

2. सौरिपुर -

गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प, दूसरा अध्याय) के अनुसार सौरिपुर वह दूसरा प्रमुख पड़ाव (नगर) है, जहाँ मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा पहुँचती है। इस नगर में काल (मृत्यु) का रूप धारण करने वाले जंगम नामक राजा का वास होता है। सौरिपुर पहुँचने पर जीव अत्यंत भयभीत हो जाता है और वहीं विश्राम करने की इच्छा करने लगता है ।इस पुरी में प्रवेश करने के बाद, मृत जीव अपने परिजनों द्वारा किए गए श्राद्ध (मासिक/त्रैपाक्षिक पिण्डदान) को खाकर और जल ग्रहण करके ही इस नगर को पार कर पाता है। इस नगर में उन आत्माओं को दंड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन काल में अधर्म का आचरण किया होता है।

3. नागेन्द्र भवन -

यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अन्य लोगों को अत्यधिक कष्ट दिया हो, उन्हें यहां दंड भोगना पड़ता है। गरुड़ पुराण के अनुसार “नागेन्द्र भवन नगर” आत्मा की यात्रा का एक भयावह स्थान बताया गया है। ये वर्णन अत्यंत रहस्यमयी माना जाता है।  कहा जाता है कि यहां का वातावरण भय, अंधकारऔर कष्ट से भरा होता है।विशाल सर्पों और भयानक दृश्य देखकर आत्मा भय महसूस करती है। पाप कर्म करने वाली आत्मा के लिए यह मार्ग अत्यंत कठिन बताया गया है। इसलिए धर्म और पुण्य को आत्मा की सबसे बड़ी रक्षा कहा गया है।

4. गन्धर्व नगर -

गंधर्व नगर इस यात्रा का तीसरा मुख्य पड़ाव है। इस नगर में वे आत्माएँ जाती हैं जिन्होंने अपने जीवन में पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाया हो।मृतक के परिजन द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए तीसरे महीने जो श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है, आत्मा उसका उपभोग इसी नगर में करती है। इस पड़ाव पर पहुँचने तक आत्मा पूरी तरह से प्रेत योनि में आ चुकी होती है। 

   गंधर्व' देवताओं के गायक और संगीतकार माने जाते हैं। पुराणों में 'गंधर्व नगर' माया, भ्रम या मृगतृष्णा (Mirage) को भी कहा जाता है, जो पल भर के लिए दिखाई देता है और फिर गायब हो जाता है। तीसरे महीने के पिंडदान से उसे यहाँ तृप्ति मिलती है, जिसके बाद वह अगले यानी चौथे महीने की यात्रा के लिए आगे बढ़ती है।

5. क्रूरपुर -

क्रूरपुर (क्रूरनगर) पांचवा नगर है, जिसे सबसे भयंकर और क्रूर माना गया है।   यह नगर उन आत्माओं के लिए है जो लोभ, कपट और अन्य दुष्कर्मों में लिप्त रहे हैं। उन्हें यहाँ तीव्र यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। पापी जीवों की आत्मा जब यमदूतों के साथ यात्रा करती है, तब वे पांचवें महीने में 'क्रोंचपुर' होते हुए क्रूरपुर नगर में पहुंचते है। इस नगर का वातावरण और यहां रहने वाले प्राणी अत्यंत क्रूर और भयानक होते हैं। यहाँ उन आत्माओं को कठोर दण्ड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवन में लोभ, मोह, और ईर्ष्या के वशीभूत होकर पाप किए हों। यहाँ यमदूत आत्मा को निर्दयता से घसीटते हैं और यातना देते हैं। इन पांच महीनों और 15 दिनों की यात्रा में पहली बार जीव इस नगर में थोड़ा अन्न-जल ग्रहण करता है और विश्राम के बाद आगे की यात्रा पर बढ़ता है।

6. चित्रभवन -

क्रूरपुर के बाद आत्मा चित्रभवन नामक नगर में पहुंचती है, यह यमलोक का छठा पड़ाव है, जहाँ चित्रगुप्त और यमराज का भाई विचित्र शासन करता है। साढ़े छह महीने की यात्रा के बाद यमदूतों द्वारा प्रताड़ित की जाती हुई आत्मा 'चित्र भवन' (चित्रपुर) नगर में प्रवेश करती है। यह यमदूतों द्वारा आत्मा को प्रताड़ित किए जाने का स्थान भी माना जाता है।अत्यंत विशालकाय और भयानक रूप वाले राजा विचित्र को देखकर प्रेत रूप में भटक रही आत्मा बुरी तरह भयभीत हो जाती है और कांपने लगती है। यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्म किए हैं। उन्हें यहाँ मिश्रित अनुभव होते हैं।

7. वह्निपुर -

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के अनुसार, वह्निपुर यमपुरी का वह मुख्य द्वार है जहाँ पापी आत्माओं को यमदूत ले जाते हैं। वह्नि' का अर्थ अग्नि होता है। इस भवन में पहुँचते ही पापी जीवों को जलती हुई रेत, कँटीले जंगलों और आग की लपटों से गुजरना पड़ता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि यमपुरी के चार द्वार हैं, और पापी जीवों को दक्षिण दिशा के द्वार से ले जाया जाता है। इस मार्ग पर पापी जीवों को भयानक यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।

इस स्थान पर पहुँचते ही पापी जीवों को अग्नि की भयंकर गर्मी, भूख-प्यास और यातनाओं का सामना करना पड़ता है।इस स्थान में आत्माओं को अग्नि के दंड से गुजरना पड़ता है। यह नगर मुख्य रूप से उन लोगों के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अनैतिक कार्य किए हैं।

8. सन्निहितालय -

गरुड़ पुराण में 'सन्निहितालय' का अर्थ यमलोक (आत्मा के परलोक गमन) के मार्ग में आने वाले आठवें नगर या पड़ाव से है। इस स्थान पर पहुँचकर आत्मा को उसके पिछले जीवन की सभी अच्छी-बुरी घटनाओं का विस्तार से अनुभव कराया जाता है, जिससे वह अपने कर्मों की सच्चाई भली-भांति समझ सके। यहाँ आत्मा को उसके पूरे जीवन की सभी घटनाओं का अनुभव कराया जाता है, ताकि उसे अपने कर्मों की वास्तविकता का ज्ञान हो सके।

9. रौद्रपुर-

पौराणिक कथाओं में 'रुद्रपुर' का संबंध भगवान शिव से जुड़ा हुआ माना जाता है। सनातन धर्म में ऐसे कई ऐतिहासिक और प्राचीन शिव मंदिर हैं जिन्हें रुद्रपुर नाम दिया गया है, जहाँ गरुड़ पुराण के गूढ़ रहस्यों, आत्मकल्याण और मोक्ष मार्ग पर चर्चाएं होती हैं। इस नगर में वे लोग आते हैं जो क्रोधी स्वभाव के थे और जिन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक क्रूरता दिखाई हो।

10. प्रेतपुर -

गरुड़ पुराण के अनुसार 'प्रेतपुर' (या यमपुर) यमलोक के मार्ग में स्थित वह पहला/दसवां पड़ाव या नगर है जहाँ पापी आत्माओं को पहुँचाया जाता है। यह नगर अत्यंत भयंकर और कष्टदायक है, जिसकी दूरी 25 योजन मानी गई है। यहीं से आत्मा की कर्मों के अनुसार भयानक सजाओं की प्रक्रिया शुरू होती है।जो लोग अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों का पालन नहीं करते, वे इस नगर में प्रेत योनि में रहते हैं।

11. पिशाचपुर -

पिशाचपुर 16 पड़ावों में से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। जो आत्माएं जीवन में बुरे कर्म, चोरी, हिंसा या पर-स्त्री गमन करती हैं, उन्हें यमराज के दूत यातनाएं देते हुए पिशाचपुर की ओर ले जाते है ।इस पड़ाव पर आत्मा को भूख, प्यास, और विभिन्न प्रकार के राक्षसी जीवों (पिशाचों) द्वारा भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है। यह पड़ाव आत्मा को उसके पापों का बोध कराता है। जो व्यक्ति लोभी, छल-कपट में लिप्त रहते हैं, वे इस नगर में पिशाच रूप में रहते हैं।

12. शैलग्राम -

शालिग्राम (शैलग्राम) गरुड़ पुराण के अनुसार मोक्ष का एक अत्यंत पवित्र पड़ाव है। जब कोई प्राणी शरीर त्यागने लगता है, तब शालिग्राम शिला और तुलसी के सानिध्य में प्राण त्यागने से उसकी मुक्ति सुनिश्चित होती है।मृत्यु के समय मरणासन्न व्यक्ति के निकट शालिग्राम शिला और तुलसी का होना उसे वैकुंठ धाम तक का मार्ग प्रशस्त करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, आतुर काल (मृत्यु के निकट समय) में शालिग्राम की पूजा और विष्णु मंत्रों का जाप प्राण त्याग रहे व्यक्ति की सद्गति के लिए ज़रूरी बताया गया है। शालिग्राम शिला की उपस्थिति में किए गए श्राद्ध, एकादशाह कर्म (मृत्यु के ग्यारहवें दिन) और वृषोत्सर्ग से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने परोपकार किए हैं और जिनका पुण्य कर्म अधिक होता है।

13. नगर नरक-

यमराज के दरबार में कर्मों का फैसला होने के बाद, पापी आत्माओं को गरुड़ पुराण में वर्णित 28 प्रमुख नरक कुंडों में भेजा जाता है । पाप के आधार पर सजा तय होती है, जैसे:कुंभीपाक नरक: प्राणियों की हत्या करने वालों के लिए खौलते तेल की सजा। तमिश्र नरक: दूसरों की संपत्ति या धन लूटने वालों के लिए। यह स्थान पूर्णतः नरक के समान है, जहाँ आत्माओं को उनके पापों का कठोर दंड दिया जाता है।

14. विष्टिपुर -

यह उन पापी आत्माओं के लिए निर्धारित स्थान है जो जीवन भर दूसरों को धोखा देते हैं, झूठ बोलते हैं और छल-कपट का सहारा लेते हैं। इस नगर में इन पापियों को भयंकर यातनाएं भुगतनी पड़ती हैं।

15. ललाटपुर -

इस पड़ाव में पापी जीवों के ललाट (माथे) पर उनके कर्मों के अनुसार यमदूत गरम लोहे की सलाखों से दागकर भीषण आकृतियां (जैसे बिच्छू या सर्प) बनाते हैं। पापी आत्माओं को यहाँ भयंकर भूख और प्यास से तड़पाया जाता है ।यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने पूर्व जन्म में साधना की थी लेकिन मोह-माया में फंस गए थे।

16. यमपुरी -

गरुड़ पुराण में 'यमपुरी' (यमलोक) को आत्मा की अंतिम यात्रा का मुख्य पड़ाव माना गया है, जहाँ मृत्यु के देवता यमराज का निवास है। यह अंतिम नगर है, जहाँ यमराज आत्मा के कर्मों के अनुसार उसे पुनर्जन्म देने या मोक्ष प्रदान करने का निर्णय लेते हैं। कर्मों के आधार पर आत्मा को यमपुरी के चार विभिन्न द्वारों से प्रवेश मिलता है, जहाँ उसका न्याय और अंतिम गंतव्य तय होता है। यमपुरी और उसके चार द्वार गरुड़पुराण के अनुसार, पापी और पुण्यात्मा दोनों के लिए यमपुरी के मार्ग और द्वार अलग-अलग होते हैं। यमपुरी में प्रवेश के लिए चार दिशाओं में चार द्वार बनाए गए हैं -

पूर्वद्वार: यह द्वार महान संतों, तपस्वियों और सिद्ध योगियों के लिए खुलता है। यहाँ गंधर्व और अप्सराएं आत्मा का स्वागत करती हैं।

पश्चिमद्वार: धर्म-कर्म करने वाले, निस्वार्थ भाव से सेवा करने वालों और तीर्थयात्री जीवात्माओं के लिए यह द्वार होता है।

उत्तरद्वार: सत्य बोलने वालों और माता-पिता की सेवा करने वालों के लिए यह द्वार आरक्षित है।

दक्षिणद्वार: पापी, अधर्मी और क्रूर कर्म करने वालों के लिए यह द्वार खुलता है। इस द्वार से प्रवेश करने के बाद आत्मा को यमराज के भयानक दूतों द्वारा भयंकर नरक और कष्ट भोगने पड़ते हैं।

निष्कर्ष : सत्कर्म ही मोक्ष की कुंजी है- 

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को इन 16 नगरों से गुजरना पड़ता है। यह यात्रा आत्मा के कर्मों के अनुसार सुखद या कष्टदायक हो सकती है। अतः जीवन में सत्कर्म करना और धर्म का पालन करना आवश्यक है ताकि आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर किया जा सके।

     ये सोलह पड़ाव तेरह दिन के पिंडदान से जुड़े हैं। पुराण कहता है, पहले दस दिन में पिंड से सूक्ष्म शरीर के अंग बनते हैं। सिर, आँख, कान, हाथ, पैर। ग्यारहवें बारहवें दिन शक्ति मिलती है। तेरहवें दिन आत्मा यात्रा के योग्य होती है। इसलिए घर में गरुड़ पुराण सुनते हैं, ताकि आत्मा भटके नहीं, रास्ता याद रखे।

5.चित्रगुप्त का बहीखाता और यमराज का न्याय -

अंत में यमपुरी। बीच में सिंहासन पर यमराज, धर्मराज। पास में चित्रगुप्त। उनके पास कोई कंप्यूटर नहीं, पर बही खाता ऐसा कि एक सांस भी छूटती नहीं।

चित्रगुप्त का अर्थ है, गुप्त चित्र। हमारे मन में जो चित्र बनते हैं, वही रिकॉर्ड होते हैं। यमराज फैसला सुनाते हैं, पर सजा तय नहीं करते, कर्म तय करते हैं।


आगे के तीन रास्ते खुलते हैं-

1. पुण्यात्मा

जिसने दान, सेवा, सत्य को जिया, वह पितृलोक, स्वर्ग या उच्च लोकों में जाता है। वहाँ भी स्थायी घर नहीं, पुण्य खत्म होते ही लौटना पड़ता है।

2. पापी- 

हिंसा, छल, परस्त्री, गुरु अपमान, ऐसे घोर कर्मों वाले को अट्ठाईस नरकों में भेजा जाता है। रौरव जहाँ चीख सुनाई दे, कुंभीपाक जहाँ तेल में उबाला जाए, ये सब प्रतीक हैं उस मानसिक जलन के जो जीवित रहते हुए दूसरों को दी थी।

3. मिश्रित कर्म-

ज्यादातर लोग इसी श्रेणी में आते हैं। थोड़ा अच्छा, थोड़ा बुरा। इन्हें फिर जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों का चक्र। मनुष्य योनि बीच में एक स्टेशन है जहाँ टिकट बदला जा सकता है।

6. तेरह दिन का शोक प्रबंधन विज्ञान -

गरुड़ पुराण को लोग डर की किताब समझते हैं, पर वह शोक प्रबंधन की किताब है। जब घर में मृत्यु होती है, तो दस दिन तक पिंडदान करवाया जाता है। हर पिंड के साथ मंत्र पढ़ा जाता है, यह अंग बन रहा है। यह मनोवैज्ञानिक रूप से परिवार को धीरे धीरे स्वीकार कराता है कि शरीर जा चुका है।

     तेरह दिन तक गरुड़ पुराण सुनने का कारण भी यही है। आत्मा को रास्ता बताया जाता है, और जीवित लोगों को याद दिलाया जाता है कि जीवन अस्थायी है। इसलिए तेरहवीं के बाद कहा जाता है, अब आगे बढ़ो।

     पुराण यह भी कहता है कि हर आत्मा तुरंत जन्म नहीं लेती। कोई मोह के कारण भटकती है, कोई अकाल मृत्यु के कारण प्रतीक्षा करती है। किसी को साल भर लगता है, किसी को क्षण भर। समय वहाँ वैसा नहीं जैसा यहाँ पर है।

नरक का आईना -

गरुड़ पुराण नरक का नक्शा नहीं, आईना है। यमदूत बाहर से नहीं आते, वे हमारे ही डर, लोभ, क्रोध के रूप हैं। वैतरणी कोई नदी नहीं, वह स्वार्थ का समुद्र है। गोदान का अर्थ गाय खरीदना नहीं, जीवन में किसी को सहारा देना है। जब विष्णु गरुड़ को यह कथा सुनाते हैं, तो अंत में कहते हैं, जो इसे सुन कर भी नहीं बदलता, उसके लिए यमलोक दूर नहीं। जो सुन कर जाग जाता है, उसके लिए यमलोक मित्र बन जाता है।

      मृत्यु के बाद की यात्रा कष्टकारी इसलिए नहीं कि कोई देवता क्रूर है, बल्कि इसलिए कि हम जीते जी अपने कंधों पर बोझ बांध लेते हैं। गरुड़ पुराण डराने नहीं, हल्का करने आया है। ताकि छियासी हजार योजन का रास्ता हमें चलना न पड़े, हम यहीं, इसी जीवन में, अपने कर्मों से वैतरणी पार कर लें।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin2720901उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183



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