उस समय भारतीय इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ था, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखा गया । 23 जून 1757 ई को बंगाल के प्लासी के मैदान में भागीरथी नदी के तट पर (कलकत्ता के पास) बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मध्य अंग्रेजों की ओर से रॉबर्ट क्लाइव ने नेतृत्व कर भारत में ब्रिटिश शासन की नींव डाल रखी थी। नवाब के सेनापति 'मीर जाफर' ने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया था और नवाब को धोखा देकर अंग्रेजों को भारत में स्थित शासन करने का अवसर प्रदान किया था। भारत में 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में पैर पसार चुके थे । इस दौरान उन्होंने व्यापारिक लाभ कमाने के लिए धीरे- धीरे भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू कर दिया था।
एंग्लो-नेपाल युद्ध के कारण -
एंग्लो-नेपाल युद्ध से पूर्व के वर्षों में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य दोनों ही क्षेत्रीय विस्तार में लगे हुए थे। अंग्रेजों ने कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे जैसे प्रमुख ठिकानों से भारत में अपना प्रभाव मजबूत कर लिया था । वहीं दूसरी ओर, नेपाल अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल तथा दक्षिण में अवध तक अपना विस्तार कर रहा था।
उत्तर में चीन और तिब्बत पर अधिकार करने में उसे ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं था। इसलिए भारतीय भू भाग पर उनकी गृद्ध दृष्टि लग गई थी। चूंकि उनका खान पान और लाइफ स्टाइल काफी कुछ अलग था और वे छिटपुट गौराल्ला युद्ध में माहिर थे। उन्हें भारत को सोने की चिड़िया पहचानने की शक्ति पनप गई थी। मुस्लिम अफगान और अंग्रेजों की खुली लूट की पोल उनके मस्तिष्क में स्थान ले चुकी थी। इसलिए वे भारत को सेफ और बहुमूल्य लक्ष्य को भेदने के लिए उतावले हो गए थे।
नेपाल एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति -
18वीं शताब्दी में नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह के शासनकाल में स्थापित नेपाल राज्य ने विजयों के माध्यम से तेजी से विस्तार किया। 19वीं शताब्दी के आरंभ तक, यह एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर चुका था।
भारत में अपना प्रभाव मजबूत करने की चाहत रखने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के विस्तार को इस क्षेत्र में अपने हितों के लिए खतरा मान लिया था। प्रारंभिक तनाव सीमा विवादों और परस्पर विरोधी महत्वाकांक्षाओं के कारण उत्पन्न हुए थे।
आंग्ल-नेपाल युद्ध :-
एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816), जिसे गोरखा युद्ध के नाम से भी जाना जाता है , ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था। अमर सिंह थापा की कमान में गोरखा सेना में 5,000 से 8,000 सैनिक थे। संख्या में कम होने के बावजूद, उन्हें परिचित भूभाग पर लड़ने का लाभ मिला, जिससे उन्हें रणनीतिक बढ़त प्राप्त हुई। ऊबड़-खाबड़ भूभाग ने पूर्वी भारतीय सेना (ईआईसी) की रसद व्यवस्था को बाधित किया, जिसमें तोपखाने के परिवहन और सैनिकों की आपूर्ति में कठिनाइयाँ शामिल थीं। गोरखाओं के किले, जो अक्सर पहाड़ियों की चोटियों पर स्थित थे, अत्यधिक रक्षात्मक थे, जिससे पूर्वी भारतीय सेना के हमलों में समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
ईस्ट इंडिया कंपनी को एक बड़ी हार जितगढ़ की लड़ाई में मिली , जहां जनरल वुड की सेना को गोरखा कमांडर उजिर सिंह थापा ने हरा दिया था।एक अन्य ईआईसी सेना का नेतृत्व कर रहे मेजर जनरल गिलेस्पी, 1814 के अंत में देहरादून के पास जैतक के किले पर कब्जा करने के प्रयास के दौरान शुरुआती हताहतों में से एक थे।
28 फरवरी 1816 को मकवानपुर की लड़ाई में ओचटरलोनी के नेतृत्व में ईआईसी को निर्णायक जीत मिली, जब उन्होंने सड़कों का निर्माण करके भारी तोपों को तैनात करने के रणनीतिक प्रयास किए थे।
गोरखाओं के रक्षात्मक प्रयासों और ईआईसी की आपूर्ति लाइनों के लिए खतरों के बावजूद, ब्रिटिशों के निरंतर अभियान और बेहतर संसाधनों ने नेपाल को शांति के लिए बातचीत करने के लिए मजबूर कर दिया।
क्षेत्रीय संघर्ष: -
सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर हुए टकराव और सर्वेक्षणों के माध्यम से क्षेत्रों का सीमांकन करने के ब्रिटिश प्रयासों ने तनाव को और बढ़ा दिया। 1814 के एंग्लो-नेपाली संघर्ष का तात्कालिक कारण ब्रिटिश संरक्षण में रहे तराई क्षेत्र के बुटवल पर नेपाली कब्ज़ा था।
आर्थिक हित: -
अंग्रेजों का उद्देश्य तिब्बत और चीन के महत्वपूर्ण बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए हिमालय पार के व्यापार मार्गों को सुरक्षित करना था, जो नेपाल द्वारा किए गए क्षेत्रीय विजयों से खतरे में थे। व्यापार समझौतों पर बातचीत के प्रयासों को नेपालियों ने बार-बार ठुकरा दिया, जिससे ब्रिटिश अधिकारियों में निराशा बढ़ती गई।
सुरक्षा संबंधी चिंताएँ:-
ब्रिटिश-नियंत्रित बंगाल से नेपाल की निकटता ने संघर्ष को और भी बढ़ावा दिया। कंपनी को उत्तरी भारत में संभावित ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन बनने का डर था, साथ ही गोरखाओं की पिछली सैन्य सफलताओं ने भी इस डर को और बढ़ा दिया था।इन परस्पर जुड़े हुए क्षेत्रीय, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मुद्दों ने अंततः युद्ध के प्रकोप में योगदान दिया।
नेपाल का नुकसान :-
1816 की सुगौली संधि नेपाल के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप नेपाल की एक तिहाई भूमि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों चली गई। नेपाल का क्षेत्रफल 267,000 वर्ग किलोमीटर से घटकर 147,000 वर्ग किलोमीटर रह गया और देश ने कुमाऊं के रास्ते तिब्बत जाने वाला एक महत्वपूर्ण मार्ग भी खो दिया।
सुगौली सन्धि का मूल पाठ :-
यह संधि 2 दिसंबर, 1815 को हस्ताक्षरित हुई और 4 मार्च, 1816 को इसकी पुष्टि हुई। इस पर नेपाल के महाराजा बिक्रम शाह का प्रतिनिधित्व करते हुए राज गुरु गजराज मिश्रा और चंद्र शेखर उपाध्याय तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैडशॉ ने सहमति व्यक्त की थी। संधि के पूर्ण पाठ में वे प्रमुख प्रावधान शामिल हैं जिन्होंने नेपाल की सीमाओं और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ उसके भविष्य के संबंधों को नया रूप दिया। सुगौली संधि का पूर्ण पाठ यहाँ दिया गया है-
दरबार:
माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा महाराजा बिक्रम साह के बीच शांति संधि, माननीय कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रैडशॉ द्वारा, जिन्हें महामहिम के सबसे माननीय प्रिवी काउंसिल के सदस्य, माननीय कंपनी के निदेशक मंडल द्वारा ईस्ट इंडीज के सभी मामलों का निर्देशन और नियंत्रण करने के लिए नियुक्त किया गया था, परम आदरणीय फ्रांसिस अर्ल ऑफ मोइरा नाइट ऑफ द मोस्ट नोबल ऑर्डर ऑफ द गार्टर द्वारा प्रदत्त पूर्ण शक्तियों के आधार पर, और महाराजा गिरमाउन जोडे विक्रम साह बहादुर, शमशेर जंग की ओर से श्री गुरु गुजराज मिसर और चंद्र शेखर उपाध्याय द्वारा, जिन्हें उक्त नेपाल के राजा द्वारा इस आशय की शक्तियां प्रदत्त की गई थीं, 2 दिसंबर 1815 को संपन्न हुई।
चूंकि माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच युद्ध छिड़ गया है, और चूंकि दोनों पक्ष शांति और मैत्री के उन संबंधों को बहाल करने के लिए पारस्परिक रूप से इच्छुक हैं जो हाल के मतभेदों के उत्पन्न होने से पहले दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विद्यमान थे, इसलिए शांति की निम्नलिखित शर्तों पर सहमति हुई है:
अनुच्छेद – I
माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच चिरस्थायी शांति और मित्रता बनी रहेगी।
अनुच्छेद – II
नेपाल के राजा युद्ध से पहले दोनों राज्यों के बीच विवाद का विषय रही भूमि पर अपने सभी दावों का त्याग करते हैं और उन भूमि पर माननीय कंपनी के संप्रभुता के अधिकार को स्वीकार करते हैं।
अनुच्छेद-III
नेपाल के राजा एतद्द्वारा माननीय ईस्ट इंडिया कंपनी को निम्नलिखित सभी क्षेत्र शाश्वत रूप से सौंपते हैं, अर्थात्-
पहला : काली और राप्ती नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका।
दूसरा : राप्ती और गंडक नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका (बुटवल खास को छोड़कर)।
तीसरा : गंडक और कुशाहा नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका, जहाँ ब्रिटिश सरकार का अधिकार स्थापित हो चुका है या स्थापित होने की प्रक्रिया में है।
चौथा : मेची और तीस्ता नदियों के बीच का पूरा निचला इलाका।
पाँचवाँ : मेची नदी के पूर्व में पहाड़ियों के भीतर का पूरा क्षेत्र, जिसमें नागरी किला और उसकी ज़मीनें तथा मोरंग से पहाड़ियों की ओर जाने वाला नगरकोट दर्रा शामिल है, साथ ही उस दर्रे और नागरी के बीच का क्षेत्र भी। उपरोक्त क्षेत्र को गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिनों के भीतर खाली कर दिया जाएगा।
अनुच्छेद IV.
पूर्वोक्त अनुच्छेद द्वारा सौंपी गई भूमि के हस्तांतरण से नेपाल राज्य के सरदारों और बरहदारों के हितों को होने वाले नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से, ब्रिटिश सरकार नेपाल के राजा द्वारा चयनित सरदारों को प्रति वर्ष दो लाख रुपये की कुल पेंशन देने के लिए सहमत है, और यह पेंशन राजा द्वारा निर्धारित अनुपात में होगी। चयन होते ही, गवर्नर जनरल की मुहर और हस्ताक्षर के तहत पेंशन के लिए सन्नुद जारी किए जाएंगे।
अनुच्छेद – V
नेपाल का राजा अपने लिए, अपने उत्तराधिकारियों और वारिसों के लिए, काली नदी के पश्चिम में स्थित देशों से किसी भी प्रकार का दावा या संबंध त्यागता है और उन देशों या वहाँ के निवासियों से कभी कोई संबंध न रखने का वचन देता है।
अनुच्छेद - VI
नेपाल का राजा सिक्किम के राजा को उसके क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने में कभी भी परेशान न करने का वचन देता है; परन्तु यदि नेपाल राज्य और सिक्किम के राजा या दोनों में से किसी की प्रजा के बीच कोई मतभेद उत्पन्न होता है, तो ऐसे मतभेदों को ब्रिटिश सरकार के मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा, और नेपाल का राजा उस निर्णय का पालन करने का वचन देता है।
अनुच्छेद-VII
नेपाल के राजा एतद्द्वारा वचन देते हैं कि वे ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश नागरिक को, या किसी यूरोपीय या अमेरिकी राज्य के नागरिक को, अपनी सेवा में न तो लेंगे और न ही रखेंगे।
अनुच्छेद – VIII
दोनों राज्यों के बीच स्थापित मैत्री और शांति के संबंधों को सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए, यह सहमति हुई है कि प्रत्येक राज्य के मान्यता प्राप्त मंत्री दूसरे राज्य के दरबार में निवास करेंगे।
अनुच्छेद – IX
नौ अनुच्छेदों वाली इस संधि की पुष्टि नेपाल के राजा द्वारा इस तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर की जाएगी, और पुष्टिकरण लेफ्टिनेंट-कर्नल ब्रैडशॉ को सौंपा जाएगा, जो बीस दिनों के भीतर, या यदि संभव हो तो उससे पहले, गवर्नर-जनरल का पुष्टिकरण प्राप्त करने और उसे सौंपने का वचन देते हैं। सुगौली में 2 दिसंबर 1815 को संपन्न हुआ। पेरिस ब्रैडशॉ, लेफ्टिनेंट कर्नल, पीए ने 4 मार्च 1816 को दोपहर ढाई बजे मुकवानपुर घाटी में नेपाल के राजा के प्रतिनिधि चंद्र शेखर उपाध्याय से यह संधि प्राप्त की, और ब्रिटिश सरकार की ओर से उन्हें प्रतिपक्ष संधि सौंपी।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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