नेपाल प्राचीन आर्यावर्त का अंग रहा:-
सांस्कृतिक और पौराणिक संदर्भों में नेपाल प्राचीन आर्यावर्त (या अखंड भारत) का अभिन्न अंग था।वैदिक काल में वेदों और पुराणों के अनुसार, हिमालय का यह क्षेत्र जंबूद्वीप और आर्यावर्त की सीमाओं के भीतर माना जाता था। सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में प्राचीन काल से ही नेपाल की संस्कृति, धर्म और भाषा उत्तर भारत की वैदिक और सनातनी परंपराओं से गहराई से जुड़ी रही है।
मौर्य साम्राज्य के अधीन रहा:-
250 ई. पू. तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा। सम्राट अशोक नेपाल में कई महत्वपूर्ण स्थापनाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे। इनमें शामिल हैं रामग्राम स्तूप, गोटिहवा स्तंभ, निगली सागर अभिलेख, और लुम्बिनी स्तंभ अभिलेख। चीनी तीर्थयात्री फाह्यान (337–422 ई.) और ह्वेन त्सांग (602–664 ई.) अपनी यात्रा की वर्णन में नेपाल क्षेत्र के कनकमुनि स्तूप और अशोक स्तम्भ का उल्लेख करते हैं। ह्वेन त्सांग ने स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की मूर्ति का उल्लेख किया है। गोटिहवा पर एक अशोक स्तम्भ का आधार मिला है, जो निगली सागर से कुछ मील दूर है, जो निगली सागर स्तम्भ का आधार था। इस क्षेत्र में 5वी शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई। 8वी शताव्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया।
879 में नेपाल की नेवार जाति का उदय :-
नेपाल की नेवार जाति (जिन्हें 'नेवा:' भी कहा जाता है) काठमांडू घाटी के मूल निवासी हैं और अपनी समृद्ध कला, अद्वितीय संस्कृति, और व्यापार-कौशल के लिए जाने जाते है। यह समुदाय हिंदू और बौद्ध धर्म का एक अनूठा मिश्रण है, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान उन्हें नेपाल में सबसे विशिष्ट और उन्नत बनाती है। नेवार समुदाय के भीतर ही लगभग 30 से अधिक उप-जातियां और वर्ग हैं। इसमें पुजारी (राजोपाध्याय, देव), किसान (ज्यापू), व्यापारी (साहू), और शिल्पकार शामिल हैं। इनकी मुख्य मातृभाषा 'नेपाल भाषा' (नेवारी) है, जो तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार का हिस्सा है। सदियों से नेवार समुदाय कुशल वास्तुकार, शिल्पकार और व्यापारी रहा है। काठमांडू घाटी के प्रसिद्ध मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों का निर्माण इन्हीं के द्वारा किया गया है।
सन् 879 से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ, फिर भी इन लोगों का नियन्त्रण देशभर में कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। 11वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भूभाग में दिखा। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बुद्धधर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा। नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि, सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरात वंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं।
1757 से अंग्रेजों का अभ्युदय :-
23 जून 1757 में भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त के नदिया जिले के प्लासी मैदान के युद्ध के बाद अंग्रेज भारत में पैर पसार चुके थे । इस दौरान उन्होंने व्यापारिक लाभ कमाने के लिए धीरे- धीरे भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू कर दिया था। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य दोनों ही क्षेत्रीय विस्तार में लगे हुए थे। अंग्रेजों ने कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे जैसे प्रमुख ठिकानों से भारत में अपना प्रभाव मजबूत कर लिया था ।
दूसरी ओर, नेपाल अपनी विस्तार नीतियों के तहत पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल तथा दक्षिण में अवध तक अपना विस्तार कर रहा था।
नेपाली गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया तो चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दिया था और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश कर दिया था।
18वीं शताब्दी में नेपाल का विस्तार:- 18वीं शताब्दी में नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह के शासनकाल में स्थापित नेपाल राज्य ने विजयों के माध्यम से तेजी से विस्तार किया था। पहाड़ी इलाकों के साथ साथ मैदानी क्षेत्रों में इनका अभियान बड़ी तेजी से चला था। 19वीं शताब्दी के आरंभ तक, नेपाल एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर चुका था। भारत में अपना प्रभाव मजबूत करने की चाहत रखने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के विस्तार को इस क्षेत्र में अपने हितों के लिए खतरा मान लिया था।
आंग्ल-नेपाल युद्ध :-
फलत: एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816) में हुआ था जिसे गोरखा युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था। उस समय अमर सिंह थापा की कमान में गोरखा सेना में 5,000 से 8,000 सैनिक थे। संख्या में कम होने के बावजूद, उन्हें परिचित भू भाग पर लड़ने का लाभ मिला, जिससे उन्हें रणनीतिक बढ़त प्राप्त हुई। ऊबड़- खाबड़ भू भाग ने पूर्वी भारतीय सेना की रसद व्यवस्था को बाधित किया, जिसमें तोपखाने के परिवहन और सैनिकों की आपूर्ति में कठिनाइयाँ शामिल थीं। गोरखाओं के किले, जो अक्सर पहाड़ियों की चोटियों पर स्थित थे, अत्यधिक रक्षात्मक थे, जिससे पूर्वी भारतीय सेना के हमलों में समस्याएँ उत्पन्न हुईं। दोनों देश के बीच यह युद्ध अंग्रेजों की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप 1816 में सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत पहले नेपाल के नियंत्रण में रहे विभिन्न क्षेत्रों को ब्रिटिश भारतीय गणराज्य को सौंप दिया गया। सुगौली वर्तमान समय में बिहार राज्य के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित है। नेपाल की ओर से कोई शाही परिवारी इस संधि में समलित ना होकर इस राज्य के राजगुरु गजराज मिश्र सन्धि की कार्यवाही में भाग लिए थे। उनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय भी थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक प्रमुख ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने हस्ताक्षर किये थे। ये भी कोई संवैधानिक पक्षकार नहीं थे अपितु ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक प्रतिनिधि ही थे। इस संधि के अनुसार नेपाल के कुछ हिस्सों को ब्रिटिश भारत में शामिल किया गया , काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति हुई और ब्रिटेन की सैन्य सेवा में गोरखाओं को भर्ती करने की अनुमति दी गयी थी। साथ ही इसके द्वारा नेपाल ने अपनी किसी भी सेवा में किसी अमेरिकी या यूरोपीय कर्मचारी को नियुक्त करने का अधिकार भी खो दिया। इस संधि पर 2 दिसम्बर 1815 को हस्ताक्ष्रर किये गये और 4 मार्च 1816 का इसका अनुमोदन किया गया।
एंगलो-नेपाल युद्ध में नेपाल ने नालापानी गढी तथा अलमोडा में विलायती सैनिकों की बड़ी क्षति पहुँचाया था लेकिन नेपाली सैनिक कमाण्डर के इच्छा विपरीत नेपाल नरेश ने सन्धि का प्रस्ताव किया था।
इस संधि ने एंग्लो-नेपाली युद्ध का अंत किया था।1816 में सुगौली संधि पर हस्ताक्षर के साथ एंग्लो-नेपाली युद्ध समाप्त हुआ, जिसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारी लाभ हुआ। परिणाम स्वरूप नेपाल को महत्वपूर्ण भूभाग गढ़वाल, कुमाऊं, मसूरी, देहरादून और दार्जिलिंग सहित कई बड़े क्षेत्र खोने पड़े और अंग्रेजों के साथ उसके राजनीतिक संबंधों में बदलाव आया। महाकाली नदी की सीमा वर्तमान भू-राजनीतिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण बनी हुई है।नेपाल ने गढ़वाल और कुमाऊं जिलों को सौंप दिया और तराई क्षेत्र पर अपने दावों को त्याग दिया।नेपाल ने सिक्किम में अपने क्षेत्रीय दावों से भी हाथ खींच लिया। ब्रिटिश सेना से हार के बावजूद, नेपाल एक स्वतंत्र राज्य बना रहा।
सुगौली संधि की शर्तें:-
संधि की शर्तें निम्नलिखित थीं: -
1- ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच सदैव शांति और मित्रता रहेगी।
2- नेपाल के राजा उन सभी भूमि दावों का परित्याग कर देंगे जो युद्ध से पहले दोनो राष्ट्रों के मध्य विवाद का विषय थे और उन भूमियों की संप्रभुता पर कंपनी के अधिकार को स्वीकार करेंगे।
3- नेपाल के राजा शाश्वत रूप से निम्न उल्लिखित सभी प्रदेशों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देंगे:
(क) काली और राप्ती नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ख) बुटवाल को छोडकर राप्ती और गंडकी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ग) गंडकी और कोशी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अधिकार स्थापित किया गया है।
(घ) मेची और तीस्ता नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(च) मेची नदी के पूर्व के भीतर प्रदेशों का सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र। साथ ही पूर्वोक्त क्षेत्र गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिन के भीतर खाली किया जाएगा।
4- नेपाल के उन सरदारों और प्रमुखों, जिनके हित पूर्वगामी अनुच्छेद (क्रमांक 3) के अनुसार उक्त भूमि हस्तांतरण द्वारा प्रभावित होते हैं, की क्षतिपूर्ति के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी, 2 लाख रुपये की कुल राशि पेंशन प्रतिवर्ष के रूप में देने को तैयार है जिसका निर्णय नेपाल के राजा द्वारा लिया जा सकता है।
5- नेपाल के राजा, उनके वारिस और उत्तराधिकारी काली नदी के पश्चिम में स्थित सभी देशों पर अपने दावों का परित्याग करेंगे और उन देशों या उनके निवासियों से संबंधित किसी मामले में स्वयं को सम्मिलित नहीं करेंगे।
6- नेपाल के राजा, सिक्किम के राजा को उनके द्वारा शासित प्रदेशों के कब्जे के संबंध में कभी परेशान करने या सताने की किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं होंगे। यदि नेपाल और सिक्किम के बीच कोई विवाद होता है तो उसे ईस्ट इंडिया कंपनी की मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।
7- एतद्द्वारा नेपाल के राजा, ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश, अमेरिकी या यूरोपीय नागरिक को अपनी किसी भी सेवा में ना तो नियुक्त करेंगे ना ही उसकी सेवाओं को बनाये रखेंगे।
8- एतद्द्वारा नेपाल और ब्रिटेन (ईस्ट इंडिया कंपनी) के बीच स्थापित शांति और सौहार्द के संबंधों की सुरक्षा और उनमें सुधार के उद्देश्य से, यह सहमति बनती है कि एक का मान्यता प्राप्त मंत्री, दूसरे की अदालत में रहेगा।
9- इस संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा इस तारीख से 15 दिनों के भीतर किया जाएगा और उसे लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रेडशॉ को सौंपा जाएगा, जो उसे अगले 20 दिनों में या उससे पहले (यदि साध्य हो), गवर्नर जनरल से अनुमोदित करा कर राजा को सुपुर्द करेंगे।
10.इसके बाद दिसम्बर 1816 में एक उत्तरगामी समझौते पर सहमति बनी जिसके अनुसार नेपाल को मेची नदी के पूर्व और महाकाली नदी के पश्चिम के बीच का तराई क्षेत्र वापस लौटा दिया गया। इस समझौते के फलस्वरूप दो लाख रुपए प्रतिवर्ष की क्षतिपूर्ति राशि के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। एक भूमि सर्वेक्षण के द्वारा दोनों राष्ट्रों के बीच की सीमा को तय करने का प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया था।
संधि की वैधता :-
1. संधि के अनुच्छेद 9 के अनुसार संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा होना अनिवार्य था, लेकिन राजा गीर्वान युद्ध बिक्रम शाह द्वारा अनुमोदित संधि का अभिलेख निर्णायक रूप से नहीं मिलता है।
2. दिसम्बर 1815 को इस संधि पर नेपाल सरकार की ओर से राज गुरु गजराज मिश्रा और उनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय थे और कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ द्वारा हस्ताक्षर किये गये। 4 मार्च 1816 को चंद्र शेखर उपाध्याय और जनरल डेविड ऑक्टरलोनी द्वारा मकवानपुर में संधि की हस्ताक्षरित प्रतियों का आदान प्रदान किया गया।
संधि के अनुसार कुमाऊं, गढ़वाल, दार्जिलिंग आदि के बदले लगभग आधा मिथिला नेपाल को दे दिया गया था। ये संधि दो विदेशियों के बीच हुआ था लेकिन इसके कारण हमारे अपने ही मैथिल हमारे लिए विदेशी हो गए। संधि ब्रिटिश सरकार भी नहीं बल्कि एक फॉरेन कम्पनी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी और तो और इसके क्लाउज 9 के अनुसार नेपाली राजा का सिग्नेचर जरूरी था लेकिन उसके बदले राजगुरु गजराज मिश्रा का सिग्नेचर से खानापूर्ति कर दी गई। दो विदेशियों के संधि का फ़ल मिथिला अपने घर के बंटवारे से भोगता रहा है। कानूनन इलीगल इस संधि के आज लगभग 200 वर्ष हो चुके हैं लेकिन किसी सरकार का ध्यान इस पर नहीं गया, आज भी वहाँ नेपाल में मैथिलों को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर मधेशी कहा जाता है और कई नागरिक सुविधाओं से वंचित रक्खा गया है।
3. कुछ लोगों कहना है कि चूंकि संधि, नेपाली राजशाही और अंग्रेजों के बीच हुई थी इसलिए इसे नेपाल गणराज्य और भारत गणराज्य के मध्य लागू नहीं किया जा सकता।
अंग्रेजों द्वारा नेपाल को विशेष दर्जा दिया गया :-
अंग्रेजों ने नेपाल का केवल कुछ भू-भाग अपने साम्राज्य में मिलाया, लेकिन वे नेपाल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने और सम्मान करने पर मजबूर हुए क्योंकि वे नेपाल को अपने उत्तर की ओर एक बफर स्टेट के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे। मार्च 1816 में नेपाल ने अपनी कुछ भूमि अंग्रेजों को दे दी और काठमांडू में अंग्रेजी रेजीडेंसी की स्थापना हो गई। 21 दिसंबर 1923 को ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई थी। औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को एक पूर्ण स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाई।
गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत हुई :-
नेपाली सैनिकों की बहादुरी ने अंग्रेजों को काफी प्रभावित किया था जिसके परिणाम स्वरूप गोरखाओं की भर्ती ब्रिटिश सेना में होने लगी थी। अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत में भी यह परम्परा कायम है। गोरखा आज भी भारतीय सेना का एक अभिन्न और अत्यंत सम्मानित हिस्सा है।ब्रिटिश सेना के लिए यह एक बहुत ही शक्तिशाली और वफादार सैन्य टुकड़ी साबित हुई।
राणा शासन और अंग्रेजों की मित्रता:-
1846 से 1951 के बीच नेपाल में राणा शासन था राणा शासक अंग्रेजों के पक्के समर्थक बन गए और उन्होंने 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दबाने में अंग्रेजों की भारी मदद की थी बदले में अंग्रेजों ने नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति अपनाई। राणाओं ने 1951 तक ब्रिटिश भारत के समर्थन से 104 वर्षों तक नेपाल पर शासन किया, और शाह वंश के राजाओं को केवल नाममात्र का शासक बनाकर रखा। सत्ता में बने रहने के लिए, राणा प्रशासन ब्रिटिश कठपुतली शासन में तब्दील हो गया और नेपाल को अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय संबंधों से अलग-थलग रखा गया। राणाओं ने अपने अन्यायपूर्ण शासन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने के लिए 1923 में ब्रिटेन के साथ शाश्वत शांति और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। वे प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल थे और उन्होंने ब्रिटिश सेना को नेपाली भाड़े के सैनिक मुहैया कराए । यह प्रथा आज भी जारी है। नेपाल ने 4 सितंबर, 1939 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की, द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा मोर्चे पर लड़ा और अंग्रेजों को सामग्री और सैन्य सहायता प्रदान की।
1950 के दशक में लोकतांत्रिक आंदोलनों ने राणाओं को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और भारतीय शासकों के समर्थन से शाह वंश के एक राजा ने फिर से सत्ता संभाली। ऐतिहासिक रूप से राजा, राणाओं और लोकतांत्रिक दलों के बीच 1950 के दिल्ली समझौते के रूप में जाना जाता है। ब्रिटिश भारत के दबावों के अलावा, नेपाल ने 1950 तक किसी बड़े साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का सामना नहीं किया।
अमेरिका व चीन का बढ़ता प्रभाव:-
राणा वंश के पतन के बाद से नेपाल पर संयुक्त राज्य अमेरिका का व्यापक प्रभाव रहा है। हाल ही में नेपाल पर चीन का राजनीतिक प्रभाव भी दिखने लगा है। चूंकि चीन अब संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है, इसलिए अमेरिका चीन से लड़ने के लिए नेपाली धरती का उपयोग करने को उच्च प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिकी कदमों की प्रतिक्रिया स्वरूप, चीन भी हाल ही में नेपाल पर अधिक ध्यान दे रहा है।
सीपीएन की स्थापना:-
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन) की स्थापना 1949 में उन युवाओं द्वारा की गई थी, जिनमें से अधिकांश ने भारत में शिक्षा प्राप्त की थी या किसी न किसी रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। इसे कलकत्ता स्थित भारतीय कम्युनिस्टों का समर्थन प्राप्त था। सीपीएन का क्रांतिकारी स्वरूप इसके संस्थापक सदस्यों के रूसी, चीनी और भारतीय मुक्ति आंदोलनों से प्रभावित होने के कारण था।
भारतके 'सिपाही विद्रोह’ को दबाने के लिए नेपाल ने विशाल सेना भेजा था:-
1857 के भारतीय 'सिपाही विद्रोह' में नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री जंगबहादुर ने अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए 12,000 नेपाली सैनिक भेजे थे।जंग बहादुर द्वारा भेजी गई इस गोरखा सेना ने मुख्य रूप से अवध (लखनऊ) के विद्रोह को दबाने और वहां फंसे ब्रिटिश सैनिकों व अधिकारियों को सुरक्षित निकालने में अंग्रेजी सेना की भारी मदद की थी। इस सहायता के पीछे नेपाल का उद्देश्य अंग्रेजों के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध मजबूत करना और 1816 की सुगौली संधि के बाद नेपाल की संप्रभुता व सीमाओं को सुरक्षित रखना था।
नेपाल राष्ट्र का जन्म :-
धर्मविरोधी, जातिविरोधी तथा राष्ट्रविरोधी कार्यों ने सच्चे नेपाली के मन में सुदृढ़ नेपाल राष्ट्र खड़ा करने की भावना को जन्म दिया। नेपाल की छिन्न-भिन्न राजनीतिक इकाइयों को एक सूत्र में बाँधकर नेपाल राष्ट्र खड़ा करने के लिए वहाँ की राजनीतिक इकाइयों का एकीकरण हुआ।
आधुनिक नेपाल की नींव नेपाल राष्ट्र के एकीकरण से और साम्राज्यवाद के विरोध से निर्मित हुई है। पृथ्वी नारायण शाह के चौथे वैधानिक उत्तराधिकारी श्री राजेंद्र विक्रम शाह ने भारत के सिख, मराठे और मुगलों तथा वर्मा, चीन और अफगानिस्तान में अपने राजदूतों को गुप्त रूप से भेजकर यूरोपीय साम्राज्य वादियों के विरुद्ध एक होकर युद्ध करने के लिए आह्वान किया था।
एंग्लो-नेपाल युद्ध के परिणाम:-
1816 की सुगौली संधि के बाद, नेपाल को कुमाऊं और गढ़वाल सहित कई क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इन हानियों के बावजूद, नेपाल को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को वार्षिक सब्सिडी नहीं देनी पड़ी, जो कई भारतीय रियासतों को प्राप्त विशेषाधिकार नहीं था। उस समय की कई अन्य संधियों के विपरीत, यह संधि लंबे समय तक प्रभावी रही। परिणाम स्वरूप, नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच आगे कोई संघर्ष नहीं हुआ। नेपाल ने अपने कई हिस्से (जैसे कुमाऊं, गढ़वाल और सिक्किम) खो दिए, लेकिन अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखी।
इसने नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच दीर्घकालिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। नेपाल ने अपने भूभाग का लगभग एक तिहाई हिस्सा खो दिया। इस संधि ने नेपाल के विस्तार को सीमित कर दिया लेकिन उसकी संप्रभुता को संरक्षित रखा।
इसने बाद में भारत-नेपाल सीमा संबंधी चर्चाओं को प्रभावित किया।जिसमे नेपाल को अपनी एक तिहाई भूभाग से हाथ धोना पड़ा लेकिन अपनी सार्व- भौमसत्ता और स्वतन्त्रता कायम रखा।
बाद में अंग्रेजो ने 1822 में मेची नदी (भारतीय नाम महानंदा)नदी व राप्ती नदी के बीच की कुछ तराई का हिस्सा नेपाल को वापस किया उसी तरह 1860 में राणा प्रधानमन्त्री जंगबहादुर से खुश होकर अंग्रेजो ने राप्तीनदी से महाकाली नदी के बीच का तराई का थोडा और हिस्सा नेपाल को लौटाया। लेकिन सुगौली सन्धि के बाद नेपाल ने जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा गँवा दिया । यह क्षेत्र अभी उत्तरांचल राज्य और हिमांचल प्रदेश और पंजाबी पहाडी राज्य मैं सम्मिलित है। पूर्व में दार्जीलिङ और उसके आसपास का नेपाली मूल के लोगों का भूमि (जो अब पश्चिम बंगाल में है) भी ब्रिटिस इन्डिया के अधीन में हो गया तथा नेपाल का सिक्किम के ऊपर का प्रभाव और शक्ति भी नेपाल को त्यागना पडा था।
भारत का विरोध भी जारी है :-
इसके बावजूद, कुछ आम लोग, कुछ राजनीतिक दल और कुछ नेपाली सरकारें भारतीय वर्चस्व का विरोध कर रही हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग सीमा अतिक्रमण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, यहां तक कि इस आंदोलन के लिए शहीद भी हो रहे हैं। हर व्यापार नाकाबंदी के दौरान, सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों का भारतीय पक्ष से रोजाना संघर्ष होता रहा है। कई बार, नेपाली व्यापारियों ने उन भारतीय ट्रकों पर पथराव किया है जिनमें कृषि उत्पाद लदे होते हैं और जिनकी कीमत नेपाली उत्पादों से अधिक होती है। नेपाल सरकार ने जान बूझकर वर्तमान भारत के पिथौरा गढ़ के कुछ सामरिक क्षेत्र में अतिक्रमित क्षेत्रों को शामिल करते हुए नेपाल का एक संशोधित नक्शा एक तरफा रूप से अपनी करेंसी में प्रकाशित कर इसे अपना कहने की मुहिम छोड़ रखा है ।
चीन ने दखलंदाजी बढाई :-
हाल ही में चीन ने नेपाल में अपने दूतावास और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं। नेपाल को प्रभावित करने के लिए चीन की प्रमुख गतिविधियों में सिल्क रोड व्यापार को पुनर्जीवित करने के लिए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) शामिल है।
सीमा विवाद समाप्त नहीं :-
भारत, नेपाल और चीन के त्रि-संगम पर स्थित लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद है। इस विवाद की मुख्य वजह काली नदी का उद्गम स्थान है। भारत के अनुसार नदी का स्रोत काला पानी है, जिससे कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा भारतीय क्षेत्र में आते हैं। इसके विपरीत, नेपाल नदी का स्रोत लिम्पियाधुरा मानता है, जिससे ये तीनों क्षेत्र नेपाल का हिस्सा बन जाते हैं। चीन ने विवादित लिपुलेख क्षेत्र को दोनों देशों के बीच व्यापारिक मार्ग के रूप में उपयोग करने के लिए भारत के साथ समझौता भी किया है। नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र नेपाल का है और ऐसे सौदों में नेपाल की भागीदारी भी आवश्यक है।
नेपाल सरकार ने 100 नेपाली रुपये (NPR) के नए नोट पर नया राजनीतिक नक्शा छापा है। इस नक्शे में भारत के तीन विवादित क्षेत्रों- लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी-को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है। भारत सरकार ने इस कदम को एकतरफा और अमान्य बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।फिर भी वह विक्टिम कार्ड खेलकर अपना दबदबा बनाना चाहता है।
नेपाल ने निम्न भारतीय क्षेत्रों को नेपाल में शामिल माना है। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश (कांगड़ा) और उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल (नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून सहित)। उत्तर प्रदेश और बिहार में तराई क्षेत्र से सटे भारतीय शहर—जैसे गोरखपुर, बहराइच, पीलीभीत, बलिया, हाजीपुर और जौनपुर। पूर्व में पूरा सिक्किम और पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी व तीस्ता नदी तक का क्षेत्र।
2023 में भारत के नए संसद भवन में लगे 'अखंड भारत' नक्शे के विरोध में काठमांडू के मेयर ने अपने कार्यालय में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगा दिया था, जिसने काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
भारतीय भूभाग से नेपाल कृतकृत्य :-
ब्रिटिश भारत ने तराई भूमि का कुछ हिस्सा 1816 में ही नेपाल को लौटा दिया गया। 1860 की नेपाल-ब्रिटेन संधि के तहत, अंग्रेजों ने भारत की निचली तराई भूमि का पश्चिमी तराई (मेची से महाकाली के बीच का भाग) नेपाल को वापस सौंप दिया था। इस भूभाग में मुख्य रूप से चार ज़िले आते हैं: कंचनपुर कैलाली बरदिया बांके नेपाली इतिहास में इस क्षेत्र को 'नया मुल्क' (अर्थात 'नया देश') भी कहा जाता है। यह भूमि नेपाल के तत्कालीन शासक जंग बहादुर राणा द्वारा 1857 के सिपाही विद्रोह को दबाने में ब्रिटिश सरकार की सहायता करने के एवज में पुरस्कार स्वरूप लौटाई गई थी।
सुगौली संधि और मिथिला :-
1816 में, ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल की गोरखा राजशाही ने सुगौली संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत, मिथिला क्षेत्र का एक हिस्सा भारत से अलग होकर नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया। इस भाग को नेपाल में, पूर्वी तराई या मिथिला कहा जाता है। भारत की एक अमूल्य विरासत हमेशा हमेशा के लिए नेपाल के अधिकार में आ गई।
सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा:-
इस संधि में राष्ट्रीय परिसीमन को स्पष्ट नहीं किया गया था, इसलिए इसके प्रभाव आज तक कायम है-
1. संधि यह बताने में विफल रही है कि कुछ स्थानों पर एक स्पष्ट वास्तविक सीमा रेखा कहां से गुजरेगी। कई स्थानों पर सीमा के निर्धारण और सीमा स्तंभों की स्थापना को लेकर विवाद है। अनुमान लगाया गया है ऐसे विवादित स्थानों का क्षेत्रफल लगभग 60,000 हेक्टेयर है। ऐसे कई क्षेत्रों में दोनो ओर से अब भी दावे, प्रतिदावे किये जा रहे हैं, जिन पर विचार- विमर्श, विवादों और तर्कों का दौर जारी है।
2. नतीजा यह है कि आज भी नेपाल- भारत की सीमा रेखा के 54 स्थानों पर अतिक्रमण और विवादों के आरोप हैं। प्रमुख क्षेत्रों में कालापानी-लिम्पियाधुरा, सुस्ता, मेची क्षेत्र, टनकपुर, सन्दकपुर, पशुपतिनगर हिले थोरी आदि स्थानों की पहचान की गई है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,
मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8
निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,
आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001
उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
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