Saturday, June 20, 2026

सत्ता का अहंकार : बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला

 प्राचीन इतिहास में मगध के राजा घनानंद के द्वारा चाणक्य का अपमान किया था आज के लोकतंत्र में बिहार के मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी ने भरत तिवारी को तो मरवा ही दिया है।

बिहार के आरा में भरत तिवारी की कथित पुलिस एनकाउंटर में मौत और प्राचीन मगध साम्राज्य में धनानंद  द्वारा चाणक्य के अपमान का इतिहास, दोनों ही सत्ता के अहंकार और उसके गंभीर परिणामों से जुड़ी घटनाएं हैं।

चाणक्य का अपमान ऐतिहासिक घटना: 

प्राचीन इतिहास और बौद्ध/जैन ग्रंथों के अनुसार, मगध के नंद वंश के राजा धनानंद को उनके असीम अहंकार और क्रूरता के लिए जाना जाता है।जब आचार्य चाणक्य पाटलिपुत्र पहुंचे, तो राजा धनानंद ने उनके साधारण रूप और लोरंग-रूप का मजाक उड़ाया था। एक जन-कल्याण सभा में धनानंद ने चाणक्य का अपमान करके उन्हें दरबार से बाहर निकाल दिया था। 

      परिणामत: इस घोर अपमान से क्रोधित होकर चाणक्य ने अपनी शिखा(चोटी) खोल दी थी और यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वह संपूर्ण नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक इसे नहीं बांधेंगे। बाद में उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता से मगध साम्राज्य को उखाड़ फेंका।

भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण

बिहार के भोजपुर (आरा) में भरत तिवारी  की पुलिस एनकाउंटर में मौत को लेकर राज्य में भारी राजनीतिक बवाल मचा हुआ है।पुलिस का दावा है कि यह मुठभेड़ में मारा गया, लेकिन वायरल वीडियो और परिजनों के आरोपों के अनुसार उसने हथियार डाल दिए थे और आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद यह कार्रवाई की  गई। 

    इस एनकाउंटर को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और कुछ स्थानीय नेताओं ने इसे सीधे तौर पर सरकार की कानून-व्यवस्था की नीति से जोड़ते हुए आलोचना की है। इस घटना के बाद बिहार में एनकाउंटर और पुलिसिया कार्यप्रणाली को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।

   17 जून की सुबह. भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में एक 30 वर्षीय युवक हाथ में लोडेड पिस्टल लिए अपने घर की छत पर वीडियो बना रहा है. नीचे खड़े बिहार पुलिस और बिहार स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के जवान उसे सरेंडर करने के लिए कह रहे हैं।

    कुछ देर बाद ‘सिस्टम से नाराज’ और अपनी मांगें मनवाने पर अड़े भरत भूषण तिवारी नाम के उस शख्स का एनकाउंटर हो गया. भोजपुर प्रशासन का कहना है कि उसने पुलिसकर्मियों पर करीब 8 राउंड फायरिंग किए जिसके जवाब में जवानों को गोली चलानी पड़ी.

    पुलिस घायल अवस्था में भरत को पटना के PMCH लेकर रवाना हुई जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इसके बाद से ही बिहार पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं. कई BJP नेताओं ने भी सम्राट चौधरी से इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने की मांग की है.इतना ही नहीं इस घटना के बाद एनकाउंटरव्यवस्था को लेकर भी नए सिरे से बहस छिड़ गई है. ऐसे में इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं.

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

भरत तिवारी के एनकाउंटर की घटना से ठीक एक दिन पहले सोशल मीडिया पर एक कथित वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह पुलिस पर पिस्टल ताने नजर आया था. इस वीडियो के संबंध में भोजपुर पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया था कि भरत मानसिक रूप से अस्वस्थ था.

बिहार पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर सबसे पहला सवाल यही उठ रहा है कि एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति का एनकाउंटर कितना उचित है? क्या ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लेने में पूरी व्यवस्था विफल रही? कुछ लोगों का कहना है कि अगर पुलिस को पहले से पता था कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो उसे किसी तरह हिरासत में लेकर इलाज के लिए मानसिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाना चाहिए था.

वहीं वीडियो के आधार पर कुछ लोगों का दावा है कि भरत ने पिस्टल फेंक दी थी और पुलिस के एक जवान ने उसे उठा लिया था.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इसके बाद एनकाउंटर करने की क्या जरूरत थी? भरत की मां का आरोप है कि आत्मसमर्पण करने के बाद भी पुलिस ने उनके बेटे का एनकाउंटर कर दिया.

BJP नेता अश्विनी चौबे ने तो अपनी फेसबुक पोस्ट में गुस्सा जाहिर करते हुए कुछ इस तरह लिखा, "अत्यंत दुखद. लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली इस घटना से मैं व्यथित हूं. कल भोजपुर के बिलौटी, शाहपुर निवासी नवयुवक भरत भूषण तिवारी की पुलिस प्रशासन द्वारा आत्मसमर्पण के बाद गोली मारकर नृशंस हत्या कर दी गई, जो हृदयविदारक है. लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है."

उन्होंने आगे लिखा, "मैं देश के गृह मंत्री अमित शाह से आग्रह करता हूं कि भरत तिवारी की निर्मम हत्या का संज्ञान लेते हुए दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर उच्चस्तरीय जांच का आदेश दें, ताकि समाज में गलत संदेश न जाए. साथ ही मैं बिहार के मुख्यमंत्री से आग्रह करता हूं कि दोषियों को 48 घंटे के भीतर जेल भेजकर बिहार में सुशासन का परिचय दें."

कानून में एनकाउंटर जस्टिफाई और लीगलाइज नहीं है: वकील विराग गुप्ता

एनकाउंटर पर उठ रहे सवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि भारत के किसी भी कानून में एनकाउंटर को जस्टिफाई या लीगलाइज नहीं किया गया है. अनुच्छेद 21 में जीवन जीने के अधिकार को एक फंडामेंटल राइट माना गया है.

कानून में साफ है कि सरकार किसी इंसान से उसके जीवन जीने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ कानूनी तौर पर छीन सकती है. एनकाउंटर एक निगेटिव पहलू है. संविधान में कानून के शासन की बात कही गई है. इसका मतलब है कि किसी आरोपी को कोर्ट के फैसले के बाद ही दोषी माना जाएगा. उसे कोर्ट से ही मौत की सजा सुनाई जा सकती है. जब तक कोर्ट में कोई दोषी साबित न हो जाए उसे निर्दोष माने जाने की बात कही गई है.

विराग का कहना है कि जब कानूनी प्रक्रिया में देरी की वजह से फायदा उठाकर कोई अपराधी या माफिया बच निकलते हैं तो इससे दो गलत बातें होती हैं. मॉब लिंचिंग जैसी घटना को बढ़ावा मिलता है. साथ ही सरकारें एनकाउंटर का शॉर्टकट इस्तेमाल करने लगती हैं.

     ये दोनों ही तरीके कानूनी तौर पर सही नहीं है और लॉन्ग टर्म में इसका परिणाम गलत हो सकता है. इसलिए समाज में क्राइम को रोकने का सही इलाज जल्द से जल्द न्याय और कानूनी प्रक्रिया में सुधार है.

 1997 में मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वेंकटचलैया ने एनकाउंटर को लेकर कहा था कि हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे. साथ ही वेंकटचलैया ने कहा था कि अगर यह साबित नहीं हो पाता कि पुलिस ने कानून के तहत एनकाउंटर किया है तब वह हत्या माना जाएगा.

   वेंकटचलैया ने यह भी कहा था कि अगर पुलिस की आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए या CrPC की धारा 46 पुलिस के तहत पुलिस एनकाउंटर करती है तो जायज है. बाकी हर तरह से गैरकानूनी है.

अगर भरत तिवारी मानसिक तौर पर अस्वस्थ तो एनकाउंटर कितना जायज है?

विराग कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ होने की स्थिति में कोई आपराधिक कृत्य करता है तो उसे अदालत के सामने एक कानूनी लाभ मिल सकता है. वह अदालत से कहता है कि अपराध के समय उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और उसका ऐसी घटना को अंजाम देने का इरादा नहीं था तो इस आधार पर उसे राहत मिल सकती है.

हालांकि अगर पुलिस किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के साथ मुठभेड़ कर रही है तो वह उसके साथ एक सामान्य व्यक्ति की तरह भी व्यवहार कर सकती है. पुलिस यह तर्क दे सकती है कि उस व्यक्ति का खुद पर नियंत्रण नहीं था और वह दूसरों के लिए खतरा बन गया था, इसलिए यह कार्रवाई की गई.

विराग गुप्ता के मुताबिक जहां तक भरत तिवारी के मामले का सवाल है, यह जांच का विषय है कि पुलिस ने अनुपातिक बल का इस्तेमाल किया या नहीं. क्या पुलिस ने कमर के नीचे गोली चलाई थी या नहीं. क्या पुलिस की कार्रवाई कानून के दायरे में थी या नहीं. इन सवालों के जवाब बेहद अहम हैं.

उनके अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस का काम अपराधी को रोकना है, न कि उसे दंड देना. दंड देने का अधिकार केवल अदालत को है. पुलिस ही दंड देने लगेगी, तो संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों के विभाजन का उल्लंघन होगा.

मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के एनकाउंटर को लेकर अमेरिकी गैर-लाभकारी संस्था ट्रीटमेंट एडवोकेसी सेंटर के एक शोध में कहा गया है कि गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के पुलिस मुठभेड़ों में मारे जाने की संभावना सामान्य आबादी की तुलना में 16 गुना अधिक होती है. संस्था ने इसके लिए पुलिस व्यवस्था की कमियों और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव को प्रमुख कारण बताया है.

एनकाउंटर को लेकर सम्राट सरकार पर क्यों उठ रहे सवाल?

भरत तिवारी की मौत के बाद सम्राट सरकार की एनकाउंटर नीति पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं. दरअसल, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक बिहार में कुल 14 एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें तीन लोगों की मौत हुई है. इनमें सबसे ज्यादा पांच एनकाउंटर पटना में हुए हैं. इसके अलावा सीवान में तीन, जबकि समस्तीपुर, भागलपुर, खगड़िया, जहानाबाद और भोजपुर में एक-एक एनकाउंटर हुआ है.

29 अप्रैल को सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में घुसकर एक अधिकारी की हत्या के मामले में पुलिस ने रामधनी यादव को एनकाउंटर में मार गिराया था. इसके अलावा 3 मई को सीवान में BJP नेता के भांजे हर्ष की हत्या के मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी सोनू यादव को भी एनकाउंटर में ढेर किया था. बिहार पुलिस के एनकाउंटर में मारे जाने वाला तीसरा व्यक्ति भरत तिवारी है.

दरअसल मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ दिन बाद सम्राट चौधरी ने पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की थी. इस दौरान उन्होंने कहा था, "बिहार में कानून से कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता. जो कोई भी पुलिस को चुनौती देगा, उसे 48 घंटे के भीतर जवाब मिलेगा." माना जा रहा है कि कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए उन्होंने पुलिस को सख्त कार्रवाई की छूट दी है. हालांकि अब इसी नीति पर सवाल उठने लगे हैं.


      रिपोर्टिंग :-- 

डॉ.राधेश्यामद्विवेदी,एडवोकेट ,बस्ती।


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