Sunday, May 24, 2026

संस्कृति से आविर्भूत कुवानो नदी की रहस्यमयी दास्तान ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

कुवानो नदी अपने आप में एक ऐसी रहस्यमयी प्रकृतिक संरचना है ,जिसके तह तक पहुंचने में अभी तक कोई भी सफल नहीं हो सका है। ऐतिहासिक दृष्टि से कुवानों नदी उत्तर कोशल के भूभाग में बहती है। यह घाघरा की एक सहायक नदी है। प्रवाहित नदियों में यह घाघरा के बाद दूसरी प्रमुख नदी है। पूर्वकालीन बहराइच एवं वर्तमान श्रावस्ती जिले के पूर्वी निचले भाग के चिलवरिया नामक स्थल से एक ताल के सोते के रुप में प्रारम्भ होकर बसऊपुर में लगभग 13 किमी तक एक नाले के रुप में बहने वाला यह जल स्रोत बलरामपुर में पहुंचते- पहुंचते नदी का रुप ले लेता है। पश्चिम से पूरब की ओर जैसे-जेसे यह नदी आगे बढ़ती है। इसका फैलाव बढ़ने के साथ ही इसकी गहराई भी बढ़ती जाती है। नदी का प्राचीन नाम सुन्दरिका, कर्दमी, उद्दालिकी और सुवर्णा भी कहा जाता है। स्कन्द पुराण वैष्णव खंड के भूमि वाराह खण्ड में इस नदी को सुवर्ण भूखरी (स्वर्णा) के नाम से जानते हैं। कुंवे से निकलने के कारण इसे कूप वाहिनी भी कहते हैं। 

कुंवे और नाले से उदसृत नदी

इसका उद्गम कोई पहाड़ ना होकर एक सामान्य सा प्राकृतिक नाला है जो नदी के तलहटी के कुओं से जल को ग्रहण कर अपना अस्तित्व बनाये रखती है। तराई के अवशेष के रुप में अब यही एक नदी है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक कड़ी है। यह उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के बसऊपुर गांव के पास से एक जल स्रोत से निकलती है। जो कुंआ के स्रोत जैसा होने के कारण इसे कुंआ से निकलने की बात आम जनमानस में व्याप्त है। अतः इसी कारण इसका नाम कुंआनों पड़ा है । यह पश्चिम से पूरब की तरफ बहती हुई जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे इसकी चौड़ाई और गहराई भी बढ़ती जाती है। इस नदी की विचित्रता जमीन के अन्दर से निकलने वाले वे हजारों छोटे-छोटे जलस्रोत हैं, जो नदी  के रुप में बहने के लिए इसे जल उपलब्ध कराते हैं। यही कारण है कि चाहे जितना सूखा पडे कुआनो नदी में पानी कभी कम नहीं होता। सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने इंग्लैंड से पंप मंगाकर जंगल में लगाया था। जिससे आठ किलोमीटर के दायरे में सिचाई की जाती थी। आज यह पंप जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं। 

      बलरामपुर में पहुंचते-पहुंचते यह नदी का रुप ले लेता है। इसकी लंबाई 195 किमी. है। बलरामपुर से निकल कर पूर्व दिशा में जब यह बस्ती जिले में पहुंचती है तो वहां की यह मुख्य नदी हो जाती है। यह संत कबीर नगर में बूढ़ी राप्ती से मिलकर आगे बढ़ती हुई गोरखपुर जिले के दक्षिण ग्रामीण अंचल से होकर शाहपुर के पास मलौली नामक ग्राम के नजदीक घाघरा नदी में समा जाती है। 

स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी जल :- 

नदी का पानी कभी बहुत निर्मल और पारदर्शी हुआ करता था। इसके गहरे अंतःकरण में जलीय वनस्पति और जीव जन्तुओ को भी देखा जा सकता है। इसकी स्वच्छता के बारे में लोगों का कहना है कि अगर ऊपर से एक सुई भी गिरा दी जाए तो उसके इसके तल में वह ऊपर से आसानी से देखी जा सकती है। नदी का पानी जितना निर्मल है उतना ही पारदर्शी भी।गहरे तल में स्थित वनस्पतियों को भी ऊपर से ही देखा जा सकता है। यही कारण है कि वन्य जीव भी यहां पाए जाते हैं जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं।

बन-बिलाव की बाहुल्यता :- 

कुआनो नदी के इस जंगल के सबसे प्रसिद्ध वन्यजीव फिसिंग कैट(बन बिलाव) है, जो यहां बहुतायत में पाए जाते हैं।  फिशिंग कैट का फर भूरे-धूसर रंग का होता है, जिस पर काले धब्बे और धारियाँ होती हैं। माथे से गर्दन तक छह से आठ काली रेखाएँ होती हैं, जो कंधों पर छोटी- छोटी पट्टियों और धब्बों में बँट जाती हैं। गालों पर सफेद निशान और काले धब्बे होते हैं और आँखों के चारों ओर सफेद फर होता है। कान छोटे और गोल होते हैं, और कानों के पीछे का भाग काला होता है। सामने से देखने पर, इनके बीच में एक विशिष्ट सफेद धब्बा दिखाई देता है। 

अनेक छोटी छोटी नदियां द्वारा मिलता है जल :-

श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है। यह अपना पाट कभी नहीं बदलती। इसने अपने प्रवाह से भूमि रक्षिका का स्वरूप बनाए रखा है। इसी में विसुही नदी भी आकर समाहित हो जाती है। यह खुरगूपुर गांव से उत्तर गोंडा जनपद की सीमा में प्रवेश से 4 किमी. इसका आकार नदी का हो जाता है। 

     यह गोण्डा के बीचोबीच होकर भानपुर तहसील की दक्षिण सीमा पर गुलरिहा रसूलपुर से बस्ती मण्डल को प्रवेश करती है। पूरब की दिशा में बढ़ते हुए कुआनो नदी बस्ती जिले की लगभग 130 किमी. की एक प्रमुख नदी बन जाती है।

       कुंवानों नदी का सफर नामा 

कुआनो नदी बस्ती जिले के सल्टौवा, बस्ती सदर और बनकटी विकास खण्डों से होकर महुली होते हुए संत कबीर नगर में जाती है। यह बस्ती पूर्व, बस्ती पश्चिम, नगर पश्चिम, नगर पूर्व, महुली पूर्व तथा महुली पश्चिम परगनों को पृथक भी करती है। । नदी अपने मार्ग में बस्ती, संत कबीर नग़र और गोरखपुर जिले से होकर बहती है। जो मुखलिसपुर कस्बे के पास बूढी राप्ती में मिलकर घाघरा नदी में समा जाती है। 

     पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के मूल निवासी कवि, पत्रकार तथा दिनमान पत्रिका के भूतपूर्व संपादक स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपने गांव के निकट बहने वाली ’’कुआनो नदी का दर्द’’ विषय पर कविताओं का एक सिरीज लिखकर उसे जीवंत बना दिया है। नदी के दोनों किनारों पर जामुन, बेंत व महुआ के जंगल पाए जाते हैं। इसका जल जमुना की भांति नीला है व सर्पाकार रूप में यह बहती है।

    जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं। कंटीले बेंत के जंगलो से गुजरती हुई यह नदी अद्भुत दृश्य पैदा करती है। यह नदी अपने आप में एक रहस्य है, जिसे खुद प्रकृति ने बनाया है और जिस रहस्य तक पहुंचने में कोई अभी तक कामयाब नहीं हुआ है। इसके तट पर साल,सागौन के अतरिक्त दुर्लभ सिरस वृक्ष की प्रजाति भी पाई जाती है। नदी के दोनो ओर झाडियों की लम्बी श्रंखला है जो दुर्लभ भी है। कुआनो नदी के कारण जैवविविधता की दृष्टि से यह इलाका काफी समृद्ध है। वनस्पतियों की एक लम्बी प्रजाति यहां पाई जाती है. कुछ दुर्लभ वस्पतियां भी नदी के तल में मौजूद हैं। जल का प्रवाह धीमा होने के कारण तमाम फ्लोटिंग प्लान्ट्स भी इस नदी में पाए जाते हैं।

आवागमन के जलमार्ग के रूप में प्रयुक्त 

प्राचीन समय यहां तक कि मुगल काल तक घाघरा व कुवानों आदि नदियां ही आवागमन का प्रमुख साधन हुआ करती थीं। कुवानों नदी से दूर दराज के इलाकों में नाव द्वारा सामान की ढ़ुलाई भी पहले होती थी। रवई, मनवर तथा कठनइया आदि इसकी अनेक सहायक नदियां हैं। 

पुराने समय में सरयू के किनारे बसे लालगंज सहित अन्य क्षेत्रों के लोग इसी नदी के माध्यम से नाव में बैठकर गांव से शहर व शहर से गांव पहुंचते थे। इस नदी में जब प्रवाह था तो यह व्यापार का साधन भी रही। पांच दशक से पहले इसकी चैड़ाई 48 मीटर से अधिक थी और गहराई 80 मीटर से भी ज्यादा। वर्तमान में इसमें काफी कमी आई है। चैड़ाई अब पन्द्रह से बीस मीटर रह गयी है वहीं गहराई दस से बारह मीटर बची है। 

   कभी यह जलमार्ग के रूप में भी व्यवसायियों के आवागमन का मार्ग थी, मछुआरों की आजीविका का साधन थी , नदी में छोटी-छोटी नाम के साथ दिन-रात मछलियां पकड़ने का काम करते थे, लेकिन प्रदुषण के चलते अब इसमें मछलियां भी नहीं रही।नदी नाले का रूप धारण कर लिया है। अतः अब यहां मछुआरों को रोजी-रोटी जो आराम से चला करती थी , वह बंद हो गई है और वह पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।


      कुंवानों नदी के विविध घाट 


श्रावस्ती जिले में घघरिया घाट

श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है। 

चोरघटा घाट बलरामपुर:- 

चोरघटा घाट उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख स्थान है। इस पर 13 साल के लंबे इंतजार के बाद वर्तमान पुल बनकर तैयार हो गया है। जिससे  बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो गया है।

अइला घाट, बस्ती :- 

हर्रैया तहसील को भानपुर से जोड़ने वाला कुआनों नदी पर स्थित अइला घाट है । अइला घाट और पुल गौर ब्लाक के उत्तरी छोर पर स्थित अइला कला गांव के निकट कुआनो नदी के तट पर स्थित है।

  पनिभरवा घाट बस्ती:- 

बस्ती और गोंडा जिलों की सीमा के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और स्थानीय घाट है। लोगों द्वारा पानी भरने का एकमात्र स्रोत होने के कारण इसे पनिभरवा घाट नाम मिला।

भैंसहवा घाट, बस्ती :- 

इस घाट पर भैंसों को नहलाने और पानी पिलाने के कारण इस घाट का नाम भैंसहवा घाट पड़ा है। भैंसहवा घाट कुआनो नदी के तट पर स्थित एक शांत और ग्रामीण परिवेश वाला क्षेत्र है। 

देईपार-भैंसहवा घाट, बस्ती :- 

भैंसहवा घाट उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।सल्टउआ के पास स्थित देईपार से भैंसहवा को जाने वाले मार्ग को प्रमुख घाट के रूप में जाना जाता है। यह घाट जिला बस्ती के अंतर्गत बलुआ चौबे क्षेत्र  के पास कुआनो नदी के प्राकृतिक तट पर स्थित है।

शिवा घाट, बस्ती :-

सोनहा-शिवाघाट , पैकोलिया शिवा घाट मार्ग से जुड़ा यह एक महत्वपूर्ण घाट है वर्तमान समय में इस पर पुल बन गया है।

चौरा घाट, बस्ती:- 

बस्ती जिले के सलतौवा गोपालपुर ब्लाक सलतौवा से 7 किमी दूर कुआनो नदी पर स्थित चौरा घाट एक प्रमुख स्थान है। पास ही में अजगैबा का सुंदर जंगल है जहां नदी तट पर विष्णु भगवान का सुन्दर मन्दिर है।

महादेवा घाट, बस्ती:-

अजगैवा जंगल से तीजू गंज को जोड़ने वाली इस सड़क के कुआनो नदी पर पर बने महादेवा पुल से होकर आमा न्याय पंचायत के गांवों के लोगों का आना-जाना रहता है।

        नील कोठी के अवशेष 

बक्सई घाट, बस्ती:- 

बक्सई घाट, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में वाल्टर गंज कस्बे के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।आजादी के पहले अंग्रेज अफसर कुआनो नदी के किनारे बक्सई घाट पर बड़े पैमाने पर नील की खेती कराते थे। नील कोठी और नील उत्पादन के लिए बनाए गए नील हौज, अंग्रेज अफसर के बैठका का अवशेष आज भी बक्सई गांव में मौजूद हैं। नील के हौज तक पहुंचने के लिए पश्चिम की तरफ सीढ़ी बनाई गई थी। नाली, कुंआ, नील हौज और सीढ़ी अभी भी मौजूद है। 

बाराह छतर घाट बस्ती :-

यह घाट जिला मुख्यालय से पश्चिम कुवानों नदी के तट पर लगभग 15 किमी दूर पर स्थित है। यह जगह बाराह मंदिर के लिए मुख्य रूप से प्रसिद्ध है। पौराणिक किताबों में इसे वियाग्रापुरी के रूप में जाना जाता है। नदी के किनारे संसारपुर नामक एक गांव है, जो भगवान शिव के पौराणिक स्थान के लिए प्रसिद्ध है। यह टिनिच रेल स्टेशन से दो मील पूर्व और कुआनो नदी के दक्षिण तट पर, रेल के पुल से आधे मील पर एक ग्राम है, जो जनश्रुति के अनुसार 'वराह अवतार' की स्थली है। भगवान विष्णु ने अपने वाराह अवतार के रूप में यहां एक कुंड की खुदाई की थी। परिणाम स्वरूप जमीन से पानी की धारा निकली थी। यह मेला स्थानीय संस्कृति और आस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जिसका आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है। कनिंघम और कार्लाइल ने इसे बौद्ध साहित्य का 'कोलिया' नामक स्थान पहचाना है, जो 'सिद्धार्थ' (बाद में महात्मा बुद्ध) की माता मायादेवी के पिता कोलिय वंशीय सुप्रबुद्ध की राजधानी थी।

सियरापार घाट, बस्ती :- 

सियरापार घाट उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में वाल्टरगंज क्षेत्र के अंतर्गत कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। सियारों और जंगली जानवरों की बहुलता के कारण यह नाम मिला है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ग्रामीण संस्कृति के लिए जाना जाता है। यह स्थान बस्ती जिले के सदर तहसील के अंतर्गत कुआनो नदी के तट पर बसा हुआ है।

रघुनाथपुर घाट बस्ती :- 

बस्ती जिले के वाल्टरगंज थाना क्षेत्र में स्थित रघुनाथपुर का कुआनो घाट एक प्रमुख स्थानीय तट है। रघुनाथपुर और आस-पास के निवासियों द्वारा 'छठ पूजा' जैसे बड़े त्योहार मनाए जाते हैं।

खीरीघाट , बस्ती:-

खीरीघाट खास पंचायत बस्ती सदर ब्लॉक में स्थित है। जो जिला मुख्यालय से 2 किमी दूरी पर कुंवानों नदी के तट पर बसा है ।

चकचई घाट, बस्ती :- 

गौर पैकोलिया मार्ग पर हर्रेया तहसील में  यह गांव कुंवानों नदी के तट पर स्थित है।

कछुआड़ घाट, बस्ती:-

बस्ती जिले की कुवानों नदी का कछुआड़ घाट है जिसपर पुल व अप्रोच निर्माण के लिए राज्य सेतु निगम की तरफ से प्रस्तावित है।

राजा घाट , बस्ती:-

बस्ती और गोण्डा जिले की सीमा पर कुआनो नदी के तट पर स्थित 'राजा घाट' एक प्रसिद्ध स्थान है。यह क्षेत्र बस्ती जिले के अंतर्गत आता है और अपने शांत परिवेश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजा घाट पुल  के लिए जाना जाता है।

गोनारे घाट , बस्ती :- 

गोनारे घाट बस्ती जिले की महादेवा विधानसभा क्षेत्र में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। यह स्थान स्थानीय ग्रामीणों और क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग (घाट) और स्थानीय धार्मिक आस्था का केंद्र है। यह घाट बस्ती मुख्यालय से दक्षिण-पूर्व में लालगंज क्षेत्र के पास स्थित है।

चांदमारी घाट, बस्ती :- 

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है। यह स्थान कुआनो नदी के किनारे बसा है, जो जिले की सबसे महत्वपूर्ण पवित्र नदियों में से एक है। कुआनो नदी आस्था का प्रमुख केंद्र है।     


मोहटा (भदेश्वर नाथ ) घाट, बस्ती :-

भादेश्वर नाथ बस्ती शहर से लगभग 5-6 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां भगवान शिव का एक प्रसिद्ध मंदिर है । 

यह माना जाता हैं, कि यह मंदिर रावण द्वारा स्थापित किया गया था। शिवरात्रि और श्रावण माह के अवसर पर यहां विशाल मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों के कई लोग भाग लेते हैं। शिव लिंग एवं भद्रेश्वर का नाम शिव पुराण में भी लिखा मिलता है।  भद्रेश्वर नाथ गांव अधिकतर ब्राह्मण गोस्वामी आबादी वाला गांव है।

मधुपुरी लालगंज , बस्ती :- 

कुंवानों नदी के तट पर कर्दम प्रजापति, महर्षि उद्धालक, ऋषि धौम्य और आरुणि जैसे महान तपस्वियों के आश्रम थे। प्राचीन कुवानों और मनोरमा का संगम मधुपुरी नामक तीर्थ थे जो  महुली क्षेत्र के लालगंज कस्बे से 5 किमी दक्षिण स्थित है। (वामन पुराण अध्याय 55 श्लोक 9, चन्द्रबली “बस्ती बसुधा” पृष्ठ 34 पर उद्धृत)। जहाँ महर्षि उद्दालक मुनि की तपोभूमि  मौजूद है। महर्षि उद्दालक मुनि की तपोभूमि तट पर भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ चैत्र पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद पूजन अर्चन किया था। उसके बाद लिट्टी चोखा बनाकर सभी लोगों ने खाया था। यहां पर लगभग 5 दिनों तक मेले का आयोजन होता है। भगवान श्रीराम के जन्म त्रेता युग के पहले का यह मंदिर है। यह तीन नदियों का संगम है। उस समय पृथ्वी स्वर्ग के समान हो गयी थी।आकाश में उजाले थे और जब तक भगवान वहां मौजूद थे तब तक चारों तरफ भक्ति का माहौल था। वैदिक काल में इन नदियों का नाम उदालती गंगा और मनसा देवी था। इस पवित्र संगम में स्नान करने से मनुष्य के सभी दैहिक, दैविक और भौतिक पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता के साथ जब लंका से रावण का वध कर लौटे थे तो बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र स्थित मनोरमा कुआनो संगम तट पर भगवान श्रीराम और माता सीता सहित अन्य देवताओं ने लिट्टी-चोखा खाया था। तब से यहां पर भारी संख्या मे मेले का आयोजन होता है।

कछुवाड़घाट ,बस्ती :-

महादेवा विधान सभा के कुदरहा क्षेत्र में लालगंज के पास स्थित यह घाट है जिस पर सेतु निगम द्वारा पुल बन गया है।

चन्दोखा घाट, वाल्टरगंज :- 

यह बस्ती का ऐतिहासिक घाट है।चन्दोखा  उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की बस्ती सदर तहसील और ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली एक प्रमुख ग्राम पंचायत है। यह क्षेत्र वाल्टरगंज के समीप स्थित है।

बस्ती का मूड घाट :-

मूर घाट  उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बस्ती सदर ब्लॉक में स्थित एक गाँव और प्रसिद्ध चौराहा है । यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण और शहरी क्षेत्र को जोड़ने वाला स्थल भी है। मूड का अर्थ सर होता है यह बस्ती जिले का शिर  है यानी सर है और यहां से आगे जिले का शरीर है बाजार है हृदय भाग है हाथ पैर हैं। अमरकोश के अनुसार - शरीर में गर्दन से आगे या ऊपर का वह गोलाकार भाग जिसमें आँख, कान, नाक, मुँह, आदि अंग होते हैं, और जिसके अंदर मस्तिष्क रहता है। 1857 के आजादी के आंदोलन से भी यह स्थान जुड़ा हुआ है।1857 की लड़ाई में जब नगर के गौतम राजा ने अंग्रेजों से लोहा लिया तो लगभग 150 सेनानी बंदी बना लिए गए उनके सर कलम कर दिए गए और यहां स्थित पुराने पेड़ के शाखाओ पर  लटका दिए गए तभी से इस घाट को मूड घाट के नाम से जाना जाने लगा। मूड़घाट पर बस्ती शहर आस पास के लोगों का अंतिम संस्कार भी होता है ।

दबीला घाट, बस्ती:-

यह घाट बस्ती जिले के लालगंज और नगर थाना क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। जो बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है।


गौरा घाट, बस्ती:- 

बस्ती जिले के साउघाट ब्लॉक के अंतर्गत गौरा चौराहा एक प्रमुख और व्यस्त स्थानीय क्षेत्र है। यहाँ कई आवश्यक सामुदायिक, सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियाँ होती हैं। बस्ती-बांसी मार्ग पर स्थित होने के कारण यह क्षेत्र आवागमन और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

मंसूरनगर का घाट, सन्त कबीर नगर:- 

संत कबीर नगर का पुरैना मंसूर क्षेत्र कुवानो नदी के निकटवर्ती इलाकों से जुड़ा हुआ है। स्थानीय विकास योजनाओं के अंतर्गत नदी और घाटों तक पहुंचने के लिए संपर्क मार्गों के निर्माण का कार्य भी हुआ है।

पिण्डिया घाट, सन्त कबीर नगर:- 

पिण्डिया क्षेत्र संत कबीर नगर के धनघटा तहसील के अंतर्गत आता है।

  बनकटा घाट,संतकबीर नगर :- 

संतकबीर नगर के बनकटा घाट पक्का पुल की मांग होती रही है। 

गोरया घाट ,संतकबीर नगर :- 

नाथ नगर संतकबीर नगर में है। इसके अलावा अनेक दर्जन छोटे बड़े घाट व पुल इस नदी की शोभा में चार चांद लगाते है।


सभ्यता - संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण :-


सभ्यता और संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण शान्त तथा स्थिर स्वभाव के कारण इस नदी के तटों पर सभ्यता और संस्कृति के अक्षुण्य प्रमाण आज भी देखे जाते हैं। प्राचीन टीले तथा प्राचीन संस्कृतियों के प्रमाण पर्याप्त मात्रा में यहां मिलते है। 1874-76 में कनिघम के नेतृत्व में कार्लाइल ने यहां का सर्व प्रथम सर्वेक्षण किया था उसके बाद 1890 में ए.फयूहरर ने तथा बाद में बनारस लखनऊ गोरखपुर विश्वविद्यालयों के पुराविदों, भारतीय पुराततव सर्वेक्षण तथा उत्तर प्रदेश पुरातत्व संगठन  लखनऊ के विद्वानों ने समय समय पर इस क्षेत्र के धरोहरों को खोजा और संजोया है। कुछ छोटे मोटे परीक्षण के तौर पर उत्खनन भी हुए हैं। लखनऊ विश्व विद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के डा. डी. के श्रीवास्तव तथा एस के चौधरी ने कुवानें के तटीय 33 साइटों का परीक्षण किया है जिनमें सात अति प्राचीन का विषद विश्लेषण प्रस्तुत किया है। ये स्थल हैं बड़ागांव, बराण्डा बांदा, चमरहुआ घाट,  सिसवनिया देवरांव , गहिरवारे , कोडरा तथा शकरौला आदि है। यदि इनका विषद उत्खनन कराया जाय तो संतकबीर नगर के लहुरादेवा तथा गोरखपुर के धुरियापार व इमिलिया खुर्द जैसी महत्वपूर्ण जानकारिया व प्रमाण यहां मिल सकते हैं। हर्रैया तहसील का खिरनीपुर घनघटा संत कबीर नगर का मुण्डियारी बस्ती तहसील का ओरई , सुसीपार उत्तर व दक्षिण, ठोकवा, ताड़ी पचीसा,सिद्धोनी घाट,सिलहरा, गेरार या गेदार आदि भी पुरातात्विक स्थल कुवानें की शान्त व स्थिर चरित के कारण ही बच पाये हैं।

        सांस्कृतिक परंपराएं

खिरनीपुर:-

बस्ती जिले के हर्रैया तहसील का खिरनीपुर कुवानों के तट पर स्थित है जहां स्तुप का अवशेष होना बताया गया है।

चमरहुआ घाट:-

बस्ती तहसील का चमरहुआ घाट कुवानों के तट पर स्थित है जहां पूर्ववर्ती उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां ईंट के रोड़े भी पाये गये है। 

सिद्धोनी घाट:-

बस्ती/भानपुर तहसील का सिद्धोनी घाट कुवानों के तट पर स्थित है। यहां प्राचीन स्तूप पुराना नगर तथा प्राचीन ईंटे पायी गयी हैं । इसे गौतम बुद्ध के जीवन यात्रा से सम्बन्धित भी बताया जाता है। 


         प्रमुख पर्यटन स्थल 



1.राष्ट्रीय वन चेतना केंद्र, बस्ती :-

वन विहार जिला मुख्यालय से लगभग 1 किमी दूर गणेशपुर गांव के मार्ग पर कुवानों नदी के किनारे पर स्थित है। बच्चों के लिए एक आकर्षक पार्क और झील सरकार द्वारा एक पिकनिक स्थल के रूप में स्थापित की गई है। नौकायन भी इस जगह पर झील में और साथ ही कुवानों नदी में भी उपलब्ध है। आम तौर पर छुट्टियों और रविवार के दौरान सप्ताह के दूसरे दिनों की तुलना में अधिक लोग पिकनिक मानाने जाते हैं।


2.अमहट घाट ,बस्ती :- 

बस्ती शहर के दो प्रमुख घाट हैं,जो शहर के संस्कार और संस्कृति के इकलौते स्थल है। वहीं अमहट घाट पर सावन व छठ का मेला लगता है। अमहट पुल कुवानो नदी के ऊपर है।

यह शहर के बाहरी इलाके में है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इस पुल का निर्माण किया गया था।यह बस्ती को अयोध्या (58 किमी), फैजाबाद (62 किमी), लखनऊ (1 9 0 किमी) स्थित था। पुल के पास ही कुवानो नदी पर शिव मंदिर है। यह शहर के राफेल टाफ़ेल से दूर एक अच्छी जगह है। बहुत से लोग पूजा के लिए यहां आते हैं, सुबह लोग सैर के लिए आते है, व्यायाम करते हैं और विश्राम करते हैं। नगर पालिका बस्ती द्वारा नव निर्मित सरदार पटेल उद्यान इस स्थल की शोभा बढ़ा रहे हैं।

3.चंगेरवा पार्क :-

बस्ती जिले (महसो क्षेत्र) में स्थित एक स्थानीय पार्क और पर्यटन स्थल है। यह क्षेत्र के निवासियों और परिवारों के लिए एक बेहतरीन पिकनिक और घूमने की जगह है। यह सुंदर फूलों और लॉन के साथ घूमने और घूमने के लिए एक अच्छी जगह है और कुवानो नदी के किनारे स्थित है। यहां जाने से पहले हर किसी को एक बार सोचना पड़ता है। ये पार्क बस्ती शहर से लगभग 15 किमी दूर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है जहां जाना काफी दुर्लभ है। इस पार्क में पहुंचने के लिए आपको अपने निजी संसाधन का ही सहारा लेना पड़ेगा। यहां किसी भी प्रकार की कोई भी टैक्सी, ऑटो, रिक्शा या बस नहीं जाती है।

      इस पार्क की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही अर्थात धीरे-धीरे समय के साथ इस पार्क की भव्यता और सुंदरता में ह्रास हो रहा है।शांतिपूर्ण दौरे के लिए सबसे अच्छी जगह ने मन को सुकून देने वाला माहौल दिया सुंदर वास्तुकार मछलियां तालाबों में शानदार हैं। यह जगह बिल्कुल स्वर्ग उद्यान की तरह है । यह खूबसूरत जगह बस्ती और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक रत्न है। छोटे फोटो शूट और पिकनिक आउटिंग के लिए बहुत हरे और विशाल अच्छे स्थान हालांकि बाहर कोई स्टॉल नहीं हैं। 

सिसवनिया पच्चीसा :-

बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था।। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:बस्ती बसुधा पृष्ठ 84 )

बौद्धनगर सेतव्या आज का कुटियवा :- 

यह  बौद्ध स्थल बस्ती ज़िला मुख्यालय से 9 किमी पूरब निकट सोनूपार से आगे दसकोलवा पैट्रोल पंप से दक्षिण दिशा में ताड़ीपचीसा गाँव के दक्षिण पश्चिम दिशा में एक टीले के रुप में है इसे स्थानीय लोग कुटिया कहते हैं। थे स्थल कुआनों नदी दे बाएँ स्थित है। सुत्त निपात और दीघनिकाय में यह स्थल सेतव्या के नाम से उल्लिखित है जिसे प्रोफ़ेसर अंगनेलाल जी ने उत्तरप्रदेश के  बौद्ध केंद्र में वर्णित किया है। यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है। 

देवरांव स्थल:- 

इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है। साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देची गयी है।

ओरई:-

बस्ती तहसील का ओरई नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है,जो कुषाणकालीन गुप्तकालीन संरचानायें प्राप्त हुई हैं। मुख्यतः लाल पात्र परम्पराओ वाले पात्र के साथ यहां मिट्टी की गुप्तकालीन मुहरें व पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। 

बड़ागांव:-

बस्ती तहसील का बड़ागांव कुवानो तट पर स्थित है जहां लघुअश्मक कोर स्फटिक बिल्लोर क्रिस्टल मनके चकमक चर्ट आदि पुरावशेषों के साथ उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। 

बराण्डा या बांदा:-

बस्ती तहसील का बराण्डा या बांदा नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है जहां उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां मनके मुणमूर्तियां ईंट के रोड़े तथा शुंग व कुषाण से लेकर मध्यकाल तक की संरचनायें भी पायी गयी हैं। 

गहिरवारे:-

बस्ती तहसील का गहिरवारे नामक गांव कुवानो तट पर स्थित है जहां उत्तरी काले चमकीले पात्र से लेकर पूर्व मध्यकालीन संरचानायें प्राप्त हुई हैं। 

कोडरा :- 

बस्ती तहसील का कोडरा गांव कुवानों के तट पर स्थित है कुवानों के तट पर स्थित है। यहां ताम्र पाषाणकालीन पूर्व उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां कारलेनियन व मनके भी प्राप्त हुए है। 

शकरौला :- 

बस्ती तहसील का शकरौला कुवानों के तट पर स्थित है । यहां प्रधानरुप से उत्तरी काले चमकीले पात्र भूरे पात्र काले व लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। 

सुसीपार उत्तर व दक्षिण :-

बस्ती तहसील का सुसीपार उत्तर व दक्षिण महुली महसो राजमार्ग के कुवानों के तट पर स्थित है। उत्तरी सूसीपार में कुषाण कालीन संरचना देखी गयी है। जबकि दक्षिण सूसीपार में उत्तरी काले चमकीले पात्र नव पाषाणकाल ताम्रपाषाणकाल तथा लघुअश्मक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। 

ठोकवा :- 

बस्ती तहसील का ठोकवा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां मुख्य रुप से लाल पात्र परम्परायें कुषाण कालीन संरचनायें मृणमुर्तियां कंगन के टुकड़े आदि प्राप्त हुए हैं। 

ताड़ी पचीसा :- 

बस्ती तहसील का ताड़ी पचीसा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां उत्तरी काले चमकीले पात्र भूरे पात्र काले व लाल पात्र परम्परायें तथा सिक्के हड्डियों के नोक आदि प्राप्त हुए हैं। 

सिलहरा :-

बस्ती तहसील का सिलहरा कुवानों के तट पर स्थित है। यहां लाल पात्र चित्रित भूरे पात्र शीशा कंगन, शुंग कुषाण से मध्यकालीन संरचनायें प्राप्त हुई हैं। 

गेरार या गेदार :-

बस्ती तहसील का गेरार या गेदार कुवानों के तट पर स्थित है। यहां उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। छठी शताब्दी ई पू. से लेकर गुप्कालीन संरचनायें प्राप्त हुई है। शीशे के कंगन भी यहां प्राप्त हुए हैं। 

मुण्डियारी :-

संतकबीर नगर के घनघटा तहसील का मुण्डियारी गांव कुवानों के तट पर स्थित है जहां काले लेपित पात्र, भूरे पात्र तथा लाल पात्र परम्पराओं  के पुरावशेष व कलाकृतियां पायी गयी है। 

     धनी संस्कृतियों का यह भूक्षेत्र कुवानों नदी के शान्त चित्त स्वभाव के कारण संभव हो सका है। पानी के प्राकृति श्रोत इस नदी के गर्भ में होने के कारण संभवतः पानी की कमी इस नदी में नहीं आएगी। इसका प्राकृतिक दोहन तथा प्रदूषण रोकना अति आवश्यक है। इसमें फैक्ट्रियों के कचरे तथा गन्देपानी को तत्काल रोका जाना चाहिए। जलकुम्भी व अनावश्यक जंगली बनस्पतियों से इसे मुक्त किया जाना चाहिए।


लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001 उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183


No comments:

Post a Comment