पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल के सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है जो काठमांडू शहर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व में सुंदर और पवित्र बागमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ पर रोज हजारों की संख्या में भक्त दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरा करते हैं। 'पशुपति' के - पशु का मतलब 'जीवन'और 'पति' का मतलब ‘स्वामी’ या ‘मालिक’ होता है , यानी 'जीवन के मालिक' या 'जीवन के देवता' को पशुपति भगवान कहा गया है । यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है। मुख्य पगोडा शैली का मंदिर सुरक्षित आंगन में स्थित है जिसका संरक्षण नेपाल पुलिस द्वारा किया जाता है। पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने का प्रयास किया गया है।
पौराणिक मान्यताएं :-
1. इस मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।
2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।
3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद अपने ही बंधुओं की हत्या करने की वजह से पांडव बेहद दुखी थे। उन्होंने अपने भाइयों और सगे संबंधियों को मारा था। इसे गोत्र वध कहते हैं। उनको अपनी करनी का पछतावा था और वे खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। खुद को इस दोष से मुक्त कराने के लिए वे शिव की खोज में निकल हुए थे।
शिव जी नहीं चाहते थे कि जो जघन्य कांड पांडवों ने किया है, उससे उनको इतनी आसानी से मुक्ति दे दी जाए। इसलिए पांडवों को अपने पास देखकर उन्होंने एक बैल का रूप धारण कर लिया और वहां से भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन पांडवों को उनके भेद का पता चल गया और वे उनका पीछा करके उनको पकड़ने की कोशिश में लग गए। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। इसी भागा दौड़ी के दौरान शिव जमीन में लुप्त हो गए और जब वह पुन: अवतरित हुए, तो उनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर बिखर गए।
शिव जी ने नेपाल की पूरी भौगोलिक स्थिति को इस्तेमाल करते हुए एक तांत्रिक शरीर की रचना की, ताकि वहां रहने वाले सभी लोग और हरेक प्राणी एक बड़े मकसद के साथ जिए। नेपाल के पशुपति नाथ में उनका मस्तक गिरा था और तभी इस मंदिर को तमाम मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। केदारनाथ में बैल का कूबड़ गिरा था। बैल के आगे की दो टांगें तुंगनाथ में गिरीं। यह जगह केदार के रास्ते में पड़ता है। बैल का नाभि वाला हिस्सा हिमालय के भारतीय इलाके में गिरा। इस जगह को मध्य-महेश्वर कहा जाता है। यह एक बहुत ही शक्तिशाली मणि पूरक लिंग है। बैल के सींग जहां गिरे, उस जगह को कल्पनाथ कहते हैं। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग जगहों पर मिले।
मन्दिर का विस्तार :-
यह मंदिर आश्रमों के साथ एक बड़े हिस्से में फैला हुआ है जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को एक अलग परम शांति का अनुभव करवाता है। यह मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। मंदिर की द्वी स्तरीय छत का निर्माण तांबे से किया गया है जिनपर सोने की परत चढाई गई है।
मंदिर वर्गाकार के एक चबूतरे पर बना है जिसकी आधार से शिखर तक की ऊंचाई 23मी.7 सेमी.है। मंदिर का शिखर सोने का है जिसे गजुर कहते हैं। परिसर के भीतर दो गर्भगृह है एक भीतर और दुसरी बाहर। भीतरी गर्भगृह वह स्थान है जहां शिव की प्रतिमा को स्थापित किया गया है जबकि बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है। भीतरी आंगन में मौजूद मंदिर और प्रतिमाओं में वासुकि नाथ मंदिर, उन्मत्ता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मूर्ति, और 184 शिवलिंग मूर्तियां प्रमुख रूम से मौजूद है जबकि बाहरी परिसर में राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग और पंद्र शिवालय गुह्येश्वरी मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट स्थिति है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है। किसी समय यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी।
पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।
निर्माण का समय :-
इस मंदिर का इतिहास 400 ईसा पूर्व का है, जिसका निर्माण नेपाल के पूर्ववर्तियों द्वारा समय-समय पर कराया गया है। सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में इस मंदिर का निर्माण कराया था। 605 ईस्वी में अमशु वर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुगृहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया था।
यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला के कारण 1979 ईस्वी में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया है। यह मंदिर नेपाली पैगोडा शैली में पुनर्निर्मित है, जिसकी छत सोने की है और चारों द्वार चांदी से मढ़े हुए हैं। अप्रैल 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में पशुपति नाथ मंदिर के कुछ बाहरी इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थी जबकि पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर और मंदिर की गर्भगृह को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई थी।
पंचमुखी शिवलिंग :-
मंदिर में भगवान शिव की एक पांच मुंह वाली मूर्ति है। पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर देख रहा मुख वामवेद या अर्धनारीश्वर है, तो दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोर कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है।
सोने की छत और चांदी के दरवाजे और असीम सम्पत्ति :-
इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। मंदिर में सोने और चांदी का बहुतायत से प्रयोग किया गया है, जो इसकी भव्यता और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। यह मुख्य मंदिर नेवारी वास्तुकला शैली में निर्मित है। इसकी दो मंजिला छतें तांबे की हैं जिन पर सोने की परत चढ़ी हुई है । मंदिर के द्वार चांदी की चादरों से ढके हुए हैं। हाल ही में, मंदिर के शिवलिंग के चारों ओर एक सोने की 'जलहरी' भी स्थापित की गई है, जो मंदिर की समृद्ध विरासत का हिस्सा है।
नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के पास नौ किलो सोना, 316 किलो चांदी है. इसके अलावा मंदिर का 1.29 अरब रुपया (नेपाली मुद्रा) बैंकों में जमा है. इसका जिक्र एक मीडिया रिपोर्ट में किया गया है।मंदिर के शासी निकाय की ओर से प्रकाशित आंकड़ों के अनसार, मंदिर में पिछले 56 साल में चढ़ावे के रूप में 9.27 किलो सोना, 316 किलो चांदी चढ़ाए गए हैं। माना जाता है कि पशुपतिनाथ मंदिर शुमार नेपाल के सबसे ज्यादा पैसे वाला हिंदू मंदिरों में शुमार है. यहां रोज हजारों नेपाली और भारतीय नागरिक पैसे, सोना और चांदी का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इन आंकड़ों का जिक्र हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट में की गई है।
पीतल का विशाल नन्दी :-
पश्चिमी द्वार की ठीक सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है जिसका निर्माण पीतल से किया गया है। इस परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है।
भारतीय ,नेपाली ब्राह्मण पुजारी :-
पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। बाद में 'मल्ल राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को मंदिर का प्रधान पुरोहित नियुक्त कर दिया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे थे। बाद में में प्रचंड सरकार के काल में भारतीय ब्राह्मणों का एकाधिकार खत्म कर नेपाली लोगों को पूजा का प्रभाव सौंप दिया गया।
दर्शन का समय :-
ये मंदिर प्रत्येक दिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। केवल दोपहर के समय और साय पांच बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर में जाने का सबसे उत्तम समय सुबह सुबह जल्दी और देर शाम का होता है। पुरे मंदिर परिसर का भ्रमण करने के लिए 90 से 120 मिनट का समय लगता है।
लेखक
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8 निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001उत्तर प्रदेश INDIA मोबाइल नंबर +91 9412300183
No comments:
Post a Comment