Tuesday, May 12, 2026

बौद्धकाल का महाआश्रम महसों और सेतव्या का स्तूप✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


     उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले में कुवानों नदी (जिसका पुराना नाम सुन्दरीका रहा) के तटपर स्थित महसों एक एतिहासिक गाँव है। इस गांव का तप्पा कपरी महसों विकास क्षेत्र व तहसील भी बस्ती ही है। बौद्ध काल में इसे ब्राह्मण का आश्रम, जिसे पहले महाआश्रम कहा जाता था। बाद में इसे महातीर्थ भी कहा जाने लगा था। सुन्दरी भारद्वाजसूत्त में कहा गया है कि भगवान बुद्ध ने सुन्दरिका नदी (कुवानों नदी) के तट पर ब्राह्मण सुन्दरिका भारद्वाज से धर्म से सम्बंधित शास्त्रार्थ किया था। यह स्थान सुन्दरिका भारद्वाज आश्रम के रुप में भी पहचाना गया तथा स्तूप का अवशेष भी मिला है। 

संदर्भ: (-पुरातत्व संख्या:21, पृ. 45 एवं प्रागधारा संख्या: 8, पृ.113 )  

      यहां कपिल नामक ब्राह्मण की भार्या से पिप्पली नामक संभवतः महाकश्यप पुत्र उत्पन्न हुआ था।

(-संदर्भ:बुद्धचर्या पृ. 38 ) 

     बौद्ध परंपरा और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पिप्पली और महाकाश्यप एक ही व्यक्ति के दो नाम या चरण हैं। महा काश्यप का जन्म का नाम 'पिप्पली' (या पिप्पली मानव) था। जब वे भगवान बुद्ध के शिष्य बने, तो बुद्ध ने उन्हें महाकाश्यप (महान ऋषि) नाम उपाधि स्वरूप प्रदान किया था।

     महाकाश्यप बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे और वे अपनी तपस्या और तपस्वी प्रथाओं (धुतांग) के लिए जाने जाते थे। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, उन्होंने प्रथम बौद्ध संगीति का नेतृत्व किया था।

सुन्दरिका भारद्वाज प्रसिद्ध बौद्ध ब्राह्मण :- 

सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध परंपरा के एक प्रसिद्ध ब्राह्मण हैं, जिनका उल्लेख मज्झिम निकाय सप्तम वत्थसुत्त में मिलता है। वे सुन्दरिका नदी के तट पर अग्निपूजा और अग्निहोत्र का पालन करते थे। सुन्दरिका कोसल में एक नदी, जो पापों को धोने में कारगर मानी जाती है। 

  (-संदर्भ:मज़्झिम निकाय 39)।

    वहाँ सुंदरिका भारद्वाज ने अग्नि के सम्मान में यज्ञ किए और ऐसे ही एक यज्ञ के दौरान बुद्ध से मुलाकात की।   

   (-संदर्भ:संयुक्त निकाय,आई.167,

संयुक्त निकाय, पी.पी.79)

भगवान बुद्ध से भेंट: सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न देखा। शुरुआत में वे बुद्ध को मुंडक (सिर मुंडवाया हुआ) समझकर उनसे पीछे हटने लगे, लेकिन फिर उनके पास जाकर धर्म-चर्चा की।

     एक समय बुद्ध सुंदरिका नदी के किनारे कोसल प्रांत में रह रहे थे। उस समय ब्राह्मण जाति के सुंदरिका भारद्वाज सुंदरिका नदी के किनारे अग्नि यज्ञ कर रहे थे। फिर उसने चारों दिशाओं में देखा और सोचने लगा, “अब मैं इस भेंट का भोजन किसे दूं?

     महज क्षुद्र राजनीति के लिए गौतम, मौर्य, बैस ,सेंगर जैसे प्राचीन क्षत्रिय वंशों से पृथक राजपूत उत्पत्ति की मनगढ़ंत थ्योरी गढ़ने वाले मूर्ख वामियों के लिए ये पृष्ठ 3rd- 1c Bce,मतलब 2000 वर्ष पहले , पाली भाषा की सुत्तपिटक के खुद्दक निकाय से है जिसमें "राजपुत्तो" शब्द क्षत्रिय पर्याय के रूप में आया है, जिसमें स्वयं बुद्ध सुन्दरिका भारद्वाज नामक ब्राह्मण से कह रहे हैं....

न ब्राह्मणो नोम्हि न राजपुत्तो, 

न वेस्सायनो उद कोचि नोम्हि।

गोत्तं परिञ्‍ञाय पुथुज्‍जनानं, 

अकिञ्‍चनो मन्त चरामि लोके ।।

      सुन्दरिका भारद्वाज ने देखा कि बुद्ध एक वृक्ष की जड़ में ध्यान कर रहे थे और उन्होंने अपना वस्त्र सिर और चेहरे पर ओढ़ रखा था। अपने बाएं हाथ में भोजन और दाएं हाथ में घड़ा लेकर वह बुद्ध के पास पहुंचा। जब बुद्ध ने सुंदरिका के कदमों की आहट सुनी, तो उन्होंने अपना सिर और चेहरा खोल दिया।सुंदरिका ने सोचा, "यह तो गंजा आदमी है, इसका सिर मुंडा हुआ है!"और वह वापस मुड़ना चाहता था।

      लेकिन सुंदरिका के मन में एक दूसरा विचार आया, “ ब्राह्मण जाति के कुछ पुजारी भी गंजे होते हैं। क्यों न मैं उनके पास जाकर उनकी जाति के बारे में पूछ लूँ?”

      तब सुंदरिका बुद्ध के पास गई और पूछा, “हे प्रभु, आप किस जाति में पैदा हुए थे?”

बुद्ध:

       किसी के जन्म के बारे में मत पूछो।इसके बजाय, मुझसे पूछो कि मैं अपना जीवन कैसे जीता हूँ।

कोई भी लकड़ी आग पैदा कर सकती है। “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति निम्न जाति का है या उच्च जाति के परिवार से। यदि वह व्यक्ति ऊर्जावान, बुद्धिमान है और गलत काम करने के अपराध बोध से प्रेरित होकर बुराई से दूर रहता है, तो वह लोगों में एक उत्कृष्ट व्यक्ति है।”

   “कुछ ऐसे श्रेष्ठ पुरुष हैं जो जीवन के सत्य को जानकर शांत हो गए हैं। वे ज्ञान के उच्चतम स्तर तक पहुँच चुके हैं। उन्होंने आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण कर ली है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को ही उपहार दिए जाने चाहिए जो भेंट के योग्य हों।”

सुंदरिका:

     “मेरा यज्ञ सफल रहा होगा, तभी तो आज मुझे ऐसे महान व्यक्ति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ! क्योंकि मैंने पहले कभी आप जैसा कोई नहीं देखा था, इसीलिए पहले साधारण लोग मेरे अर्पण का भोजन ग्रहण करते थे।भोज कीजिए, गुरु गौतम, आप सचमुच एक ब्राह्मण हैं। ”

बुद्ध:

    “मेरे श्लोकों को सुनने के बाद मुझे दिया गया भोजन मेरे खाने योग्य नहीं है। सुंदरिका, सत्य को जानने वालों का यह मार्ग नहीं है।बुद्ध श्लोकों के उच्चारण के बाद अर्जित उपहारों को अस्वीकार करते हैं।

     सुंदरिका, यही बुद्धों का शुद्ध आचरण है, यही उनका जीवन जीने का तरीका है। अन्य प्रबुद्ध भिक्षु भी हैं जो दोष और संदेह से मुक्त हैं। उन्हें अपना भोजन और पेय अर्पित करो। वे पुण्य साधकों के लिए उपजाऊ भूमि हैं। ”

      सुंदरिका ने पूछा, “तो फिर, हे गौतम स्वामी, मुझे इस प्रसाद का भोजन किसे देना चाहिए?”

     “सुंदरिका, इस संसार में, जहाँ देवता, मार, ब्रह्मा और मनुष्य विद्यमान हैं, बुद्ध या उनके शिष्य के सिवा कोई ऐसा नहीं है जो इस दूध-चावल को खाकर ठीक से पचा सके। इसलिए, सुंदरिका, इस दूध-चावल को किसी घासविहीन स्थान पर या ऐसे जल में फेंक दो जहाँ कोई जीव-जंतु न हों।”

     तो सुंदरिका ने दूध-चावल को निर्जीव जल में डाल दिया। पानी में डालते ही दूध-चावल से सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। जैसे दिन भर गर्म की गई लोहे की गेंद को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आती है, धुआँ निकलता है और भाप निकलती है, ठीक वैसे ही दूध-चावल को पानी में डालने पर सरसराहट और चटकने की आवाज़ आई, धुआँ निकला और भाप निकली। तब सुंदरिका घबराकर, रोंगटे खड़े होते हुए, भगवान बुद्ध के पास गए और उनके निकट खड़े हो गए। भगवान बुद्ध ने सुंदरिका से श्लोकों में कहा:

     “सुंदरिका, यह मत सोचो कि लकड़ी जलाने से तुम्हारा जीवन शुद्ध हो जाएगा। यह तो केवल बाहरी जलन है। कुशल और श्रेष्ठ जन इस प्रकार की शुद्धि को स्वीकार नहीं करते।“मैंने लकड़ी जलाना छोड़ दिया है। सुंदरिका, मैं अपने भीतर प्रकाश प्रज्वलित करता हूँ।

     यह ज्ञान का निरंतर प्रकाश है। मेरा मन सदा एकाग्र रहता है। मैं मुक्त मन से अपना प्रबुद्ध जीवन जीता हूँ।”

    “सुंदरिका, तुम अपने तपस्वी आधिपत्य के अहंकार से बोझिल हो। तुम्हारा जीवन क्रोध में जल रहा है और झूठ की राख छोड़ रहा है। तुम्हारी जीभ यज्ञ में इस्तेमाल होने वाले चम्मच के समान है। परन्तु, तुम्हारे हृदय में प्रकाश प्रज्वलित होना चाहिए। एक प्रशिक्षित मन उज्ज्वल होता है।”

       “सुंदरिका, बुद्ध का धम्म, सद्गुणों से घिरे किनारों वाला एक सरोवर है । शांत मन से जीना सदा श्रेष्ठ लोगों द्वारा प्रशंसित है। धम्म के कुशल अभ्यासी उस सरोवर में स्नान करते हैं और बिना भीगे दूसरे किनारे तक पहुँच जाते हैं ।”

     “सुंदरिका , सत्य, श्रेष्ठ धम्म, संयमपूर्ण जीवन और ब्रह्मचर्य जैसे अच्छे गुणों का अभ्यास करने से व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है ।

इसलिए, आपको सद्गुणों से युक्त श्रेष्ठ व्यक्तियों की पूजा करनी चाहिए । मैं ऐसे व्यक्ति को 'धम्म का अनुसरण करने वाला' कहता हूँ।”

    जब बुद्ध ने इस धम्म का उपदेश दिया, तब सुंदरिका ने बुद्ध से कहा:

     “उत्कृष्ट, गुरु गौतम! उत्कृष्ट! जैसे कोई उलटी चीज़ को सीधा कर दे, छिपी हुई चीज़ को प्रकट कर दे, भटके हुए को रास्ता दिखा दे, या अंधेरे में दीपक जला दे ताकि अच्छी नज़र वाले लोग देख सकें, उसी प्रकार गुरु गौतम ने मुझे धम्म का उपदेश दिया, जो अनेक रूपों में स्पष्ट है। मैं गुरु गौतम, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ। भंते, क्या मैं आपके अधीन भिक्षु बन सकता हूँ?”

      और वे बुद्ध के शिष्य बन गए। दीक्षा लेने के कुछ ही समय बाद, भंते सुंदरिका भारद्वाज, जो एकांत में रहते हुए, एकांत प्रिय, लगनशील, भावुक और दृढ़ थे, ने इसी जीवन में आध्यात्मिक मार्ग के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर लिया । उन्होंने अपनी बुद्धि से उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जिसके लिए एक पुत्र गृहस्थ जीवन छोड़कर भिक्षु बनता है।

        उन्होंने यह अहसास किया: “पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो गया है। आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हो गई है। दुखों को समाप्त करने के लिए जो करना था, वह हो चुका है। अब पुनर्जन्म नहीं होगा।” अतः भंते सुंदरिका भारद्वाज प्रबुद्ध भिक्षुओं में से एक बन गए।

(-संदर्भ:संयुक्त निकाय 7.9 सुंदरिका सुत्त: सुंदरिका)


सुन्दरिका भारद्वाज ने भगवान् को कहा था “आश्चर्य! हे गौतम!! आश्चर्य! हे गौतम! यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम के पास मैं प्रब्रज्या (= संन्यास) पाऊँ, उपसम्पदा पाऊँ।”

      सुन्दरिका भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् के पास प्रब्रज्या, उपसम्पदा पाई। उपसम्पदा पाने के बाद, आयुष्मान् भारद्वाज एकान्त में प्रमादरहित, उद्योग युक्त, आत्मनिग्रही हो विहरते, थोड़े ही समय मे जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य के अन्त में (निर्वाण) को, इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्त कर विहरने लगे। ‘जन्म क्षीण हो गया नहीं है’ जान लिया। सुन्दरिका भारद्वाज बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने के बाद आयुष्मान भारद्वाज के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आयुष्मान् भारद्वाज अर्हतों में से एक हुये। 


सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव:- 

बाद में यह स्थान सूर्यवंशियों राजपूतों का गांव बन गया। और महाश्रम से बिगड़ कर महसों नाम कहा जाने लगा। ।जैसे सरनत राजपूतों के उद्गम की सटीक जानकारी नहीं है उसी प्रकार इस वंश की भी सटीक जानकारी नहीं मिलती है।


      अनुश्रूतियों के अनुसार कत्यूर साम्राज्य आधुनिक उत्तराखण्ड के कुमायूं मण्डल के राजा ब्रह्मदेव थे। ब्रह्मदेव के पौत्र अभय पाल देव ने पिथैरागढ़ के असकोट में अपनी राजधानी बनायी थी। उनके शासन के बाद उनके पुत्र अभयपाल के समय यह साम्राज्य विघटित हो गया। अभयपाल देव के दो छोटे पुत्र अलखदेव और तिलकदेव थे। महाराजा अलख देव और तिलकदेव असकोट को छोड़कर एक बड़ी सेना लेकर 1305 में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गोरखपुर व गोण्डा में आ गये। यह क्षेत्र भयंकर दलदल तथा बनों से आच्छादित था। यहां पर राजभर आदि वासियों का आधिपत्य था। इस क्षेत्र के दक्षिण में  घाघरा तथा पूर्व में राप्ती बहती है जिनसे क्षेत्र की रक्षा होता थी। इन दो राजाओं ने महुली को अपनी राजधानी बना कर पाल वंश का नया प्रशासन प्रारम्भ किया। इसी प्रकार ये फैजाबाद जिले के पूरा बाजार में भी बस गये थे। कहा यह भी जाता है कि ये बाराबंकी के राजा हर्ष से जुड़े थे। पूरा बाजार के परिवार में आदिपुरुष लालजी शाह थे। जबकि बस्ती के महुली के आदि पुरुष अलख देव और तिलकदेव दो भाइयों के वंशज हैं। संभव है ये दोनो एक दूसरे से जुड़े रहे हों। अनुश्रूतियों के अनुसार दोनों भाइयों ने राजभरों के मुखिया कौलविल से महुली की सम्पत्ति अधिग्रहीत की थी। समय बीतते बीतते उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया था। ये अनेक परिवारों में विभक्त हो गये थे। इन घरों के प्रमुखो ने पाल उपनाम धारण किया था । 

(संदर्भ : “बस्ती : एक गजेटियर आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के जिला गजेटियर का वॉल्यूम 23, एचआर नेविल ,आईसीएस, इलाहाबाद द्वारा एफ लुकर, अधीक्षक सरकारी प्रेस, संयुक्त प्रांत द्वारा मुद्रित, 1907 है।)


सिसवानिया सेतव्या सिंसपावन नगर-

बस्ती तहसील का सिसवनिया पच्चीसा गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्धकालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। यह आकार में बड़ा है, इसे नगर साइट कहा जा सकता है। कुंवानो सुन्दरीका नदी की धारा इस भूस्थल को दो तीन भागों में विभक्त कर रखा है।

     पचीसा नाम पच्चीस विशिष्ट लोगों या पच्चीस विशिष्ट गांवों के सम्मिलित स्वरूप की तरफ भी इंगित करता है। यहां अन्वेषण व उत्खनन दोनो हुआ है। यह देखा गया है कि इस प्राचीन स्थल की औसत ऊंचाई 20 मीटर से अधिक रही है। देवराव और सिसवनिया पच्चीसा नदी के तट पर स्थित एकल सांस्कृतिक परिसर के टीले रहे हैं। ये टीले धीरे धीरे समाप्त प्राय होते जा रहे हैं। इनकाअधिग्रहण संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।



      पचीसा ग्राम पंचायत में - मुख्य गांव : पचीसा, छरुआछा उर्फ शोखापुरवा और निपानिया आदि हैं। 2021 में पचीसा की जनसंख्या 594 थी। सिसवनिया में उत्तरी काले चमकीले पात्र धूसर पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। मिट्टी की मोहरे पंचमार्क सिक्के 108 मृणमूर्तियों के अवशेष तथा 650 मृण कलाकृतियां भी यहां पायी गयी है। 

देवरांव बौद्ध विहार:- 

इसी प्रकार पास के देवरांव स्थल से ताम्र पाषाणकालीन द्वितीय मिलेनियम बीसी के प्रमाण भी प्राप्त हुए है।  साथ ही उत्तरी काले चमकीले पात्र काले ओपदार पात्र काले व लाल पात्र तथा लाल पात्र परम्परायें यहां पायी गयी है। यहां शुंग कुषाण व मध्यकालीन संरचनाये देखी गयी है। यह आकार में छोटा है। इसे मठ विहार का स्थल कहा जा सकता है।



लेखक

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,Pin 272001

उत्तर प्रदेश INDIA 

मोबाइल नंबर +91 9412300183





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