उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के सदर तहसील के बहादुरपुर व्लाक में नगर बाजार क्षेत्र खड़ौवा खुर्द नामक गांव के आस पास इलाके में नगर राज्य में गौतम क्षत्रियों के पुरोहित के रूप में भारद्वाज गोत्रीय उपाध्याय वंश के इनके पूर्वजों का आगमन हुआ था । नगर राज्य के राजा उदय प्रताप सिंह के समकालीन उपाध्याय कुल के पूर्वज लक्ष्मन दत्त उपाध्याय एक फौजी अफसर रहा करते थे। यह परिवार शुद्ध सनातनी और कर्मकांडी नियमों का परिपालन करने वाला था।
इसी संस्कार युक्त कुल परम्परा में राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित डा.मुनिलाल उपाध्याय सरस जी के पिता पं. केदार नाथ उपाध्याय का जन्म हुआ था।
डा. सरस जी के अत्यंत आज्ञाकारी और हर समय पग से पग मिलाकर चलने वाले भ्राता लक्ष्मण जैसे आचरण वाले उनके प्रिय व आज्ञाकारी अनुज के रूप में आचार्य पण्डित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय का जन्म इसी परिवार में एक अगस्त 1953 को सीतारामपुर ग्राम में हुआ था। दिनांक 12.10.1957 को पंडित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय जी के पिता श्री केदार नाथ की असामयिक मृत्यु हो गयी थी। उनके परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था।
पिता का असमय निधन हो जाने के कारण विधवा मां पर घर परिवार की सारी जिम्मेदारी आ गयी थी। श्री वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय जी उस समय केवल 4 साल के तथा कक्षा 1 के छात्र थे। सरल स्वभाव वाली उनकी मां किसी प्रकार परिवार को टूटने व बिखरने से बचा पाई थी। दोनो बच्चों को बहुत ही कठिनाई से पाला पोसा और शिक्षा दीक्षा दिलाई।
वशिष्ठ जी की पढ़ाई नगर बाजार के प्राइमरी विद्यालय में शुरू हुआ था। जिसे पास कर वह नगर बाजार के ही मिडिल स्कूल में दाखिला लिये थे। माध्यमिक कक्षाएं उन्होंने श्री झिनकू लाल इन्टर कालेज कलवारी से उत्तीर्ण किया था। 1968 में नगर बाजार का जनता विद्यालय जू.हा. स्कूल हो गया तो विद्यालय के प्रबन्धक श्री मोहर नाथ पाण्डेय ने पं. शिवकुमार त्रिपाठी के माध्यम से अठारह वर्ष के वशिष्ठ प्रसाद जी से विवाह का प्रस्ताव रखा। पहले तो वशिष्ठ प्रसाद जी के अग्रज डॉ मुनि लाल उपाध्याय 'सरस'जी ने विवाह को टालने का प्रयास किया लेकिन बाद में यह रिश्ता तय कर शादी करना पड़ा था।
पण्डित वशिष्ठ प्रसाद हाई स्कूल परीक्षा 1970 में तथा इन्टर मीडिएट परीक्षा 1972 में पास किए थे। उस समय दो वर्षीय बी ए परीक्षा 1974 में वह किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय बस्ती से पास किए थे। जनता इण्टर कालेज नगर बाजार बस्ती के प्रबंधक जी के दबाव के कारण उनके ही विद्यालय में श्री वशिष्ठ प्रसाद जी को सहायक अध्यापक बनाया गया था। उनकी एल. टी. ग्रेड में सहायक अध्यापक के रूप में प्रथम नियुक्ति एक अगस्त 1975 में जनता इन्टर कालेज नगर बाजार बस्ती में हुई थी।
1975 में सेवा के दौरान वह व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में एम. ए. हिंदी का प्रथम बर्ष पास कर लिये थे।तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक श्री भूधर द्विवेदी के प्रभाव से 1976 में किसान एल. टी. प्रशिक्षण महा विद्यालय में उन्हें एल.टी. शिक्षण पाठयक्रम में प्रवेश लेकर कोर्स पूरा किया था। 1977 में वे एम. ए. हिन्दी द्वितीय बर्ष का अधूरा पाठ्यक्रम पूरा किये थे । बाद में वह संपूर्णानंद संस्कृत विश्व विद्यालय से सम्बद्ध श्री सनातन धर्म वर्धनी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय नगर बाजार बस्ती से प्रथम श्रेणी में साहित्य से आचार्य की परीक्षा भी उत्तीर्ण किए थे। वह 1 जनवरी 1977 से गौतम इन्टर कालेज पिपरा गौतम बस्ती मे अपनी दूसरी नियुक्ति एल. टी. ग्रेड में सहायक अध्यापक के रूप में प्राप्त कर ली थी। यहां 62 साल से ज्यादा समय तक अनवरत 31 मार्च 2016 तक वह अध्यापन कार्य में संलग्न रहे।
वशिष्ठ प्रसाद जी के तीन संताने हैं। ज्येष्ठ पुत्री सुनीता रही जो शादी के बाद ग्राम बनकट, ब्लाक उरुवा बाजार, जिला गोरखपुर में अपने बच्चों के साथ रह रही हैं। 
उसके बाद उनके पुत्र रजनीश कुमार का जन्म हुआ है। जिनकी शिक्षा जनता इण्टर कॉलेज नगर बाजार बस्ती से हुआ है। वे फार्मेसी का डिप्लोमा लेकर चिकित्सा विभाग से फार्मासिस्ट/ कंपाउंडर पद पर सन्त कबीर नगर के विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इनका परिवार और बच्चे बर्तमान में सीतारामपुर में अपने पैतृक गांव में रह रहे हैं।
वशिष्ठ प्रसाद जी की तीसरी संतान अनीता उपाध्याय रही जो वर्तमान में गुड़गांव में अपने पति और बच्चों के साथ रह रही हैं।
श्री वशिष्ठ प्रसाद जी की पत्नी पैर से चलने में असमर्थ थी फिर भी दोनों ने चारों धाम की यात्रा पूरा कर लिया था। जून 2025 में श्री मद भागवत कथा भी सकुशल सुन लिया था। 8 जून 2025 को श्री मद भागवत पुराण कथा की पूर्णाहुति सम्पन्न हुआ था। इसी माह में अस्वस्थता के कारण दिनांक 23 जून 2025 को उनकी श्रीमती जी का देहावसान हो गया था।
परिवार में राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित उत्कृष्ट कोटि के साहित्यकार होते हुए भी आचार्य वशिष्ठ जी का जीवन सादगी से परिपूर्ण रहा है। एक आदर्श और सरल जीवन यापन करने वाले आचार्य पण्डित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय का जीवन एक खुली किताब की तरह है। जिसमे सरलता, तरलता और सूझ - बूझ का असीम भंडार भरा पड़ा है। उनकी छिपी हुई प्रतिभा डा. सरस जी जैसा मुखरित तो नहीं हो सकी , परंतु काव्य साहित्य के अनुशीलन और अंकुरण में वे पीछे कदापि नहीं थे। मुझे विलम्ब से पता चला है कि उन्होंने"नीरस" कविराय के नाम से कुछ कुण्डलियां भी लिख रखी है । जिसे सुधार करके लिपिबद्ध किया जा रहा है। उनकी एक अप्रकाशित रचना इस प्रकार प्रस्तुत की जा रही है -
हे प्रभु तू वेदना दे ।
जैसलमेर सा जीवन मेरा है ,
वेदना ही वेदना जिसमें भरा है।
दर्द की इस अग्नि में तपता गया मैं ,
सह ना पाया मूक हो सहता गया मैं।।
दुख की आंधी चल गई ,
दृष्टि ओझल हो गई ।
रोक पाया मैं नही अपने दृगो को,
अश्रु धारा बह गई ।।
वेदने तू रुक क्षणिक विश्राम कर ले।
मन में सुंदर सृष्टि का संज्ञान कर ले।।
तप्त जीवन व्यस्त जीवन,
दर्द से परिपूर्ण जीवन।
सुख ना पाया दुख ही दुख में,
बह गया संपूर्ण जीवन।।
हे प्रभु तू वेदना दे,बांट ले इसको ना कोई।
यह मुझे उपहार दे दे ,हे प्रभु तू वेदना दे।।
No comments:
Post a Comment