Wednesday, June 19, 2019

खेत खलिहान व दिशाओ के रखवाले डीवहारे बाबा डा. राधेश्याम द्विवेदी


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भारतीय परिवेश में आस्था, विश्वास, किसी के आदेश, निर्देश, संहिता या व्यवस्था के अनुसार नहीं चलती है। यह तो अपने पूर्वजों की देखा देखी व संकट में अजमाये गये प्रयोगों के आधार पर स्वमेव जन मानस में पनपती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँव के बाहर किसी पुराने पीपल पेड़ के नीचे कुछ अनगढ़ सा पत्थर, या मिटटी की ढूही बनी देखी जा सकती है। गाँव में जब विवाह की रस्म, किसी बच्चे का जन्म, या मुंडन या अन्य कोई उत्सव होता है तो उस स्थान पर कथा कही सुनी जाती है। साथ ही कुछ भोग प्रसाद का चढ़ावा भी किया जाता है। इसे हमारे ग्राम लोक मेंँ डीह बाबा या डीवहारे बाबा के नाम से जानते हैं। इन्हें ग्राम देवता भी कहा जाता है। यह पूजा किसी शास्त्रीय विधान या कर्मकांड के अंतर्गत नहीं होती है। पर जैसा पंडित या बुजुर्ग करा देते हैं यह हो जाती है। मान्यता यह है कि इस पूजा से अनिष्ट नहीं होता है. और अनिष्ट का भय, सुखद भविष्य की लालसा, और अज्ञात के प्रति जिज्ञासा जरुर देखी जाती है। ईश्वर और धर्म का एक मोटी समाज का एक असरकारक फैक्टर होता है। हर संकल्प के पहले जो मन्त्र पढ़े जाते हैं, उनमे ग्राम देवताभ्यो नमः भी कहा जाता है। इस प्रकार यह प्रथम प्रचलित देवता प्रमाणित हो जाते हैं।
आम जनता की पहुंच आसान
प्राचीन काल में संसार की सुख समृद्धि के लिए त्रिदेवों के अलावा व्यन्तर अथवा लघुदेवों का प्रचलन हुआ था। जब समाज में कोई भारी असमानता होती या पापाचार बढ़ जाता तो ज्यादातर भगवान विष्णु का कोई न कोई अवतार की कल्पना की गयी है। कभी कभी मातृ शक्तियां भी प्रकृति व धर्म के संतुलन के लिए अवतरित हुई हैं। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु का तथा पार्वती जी भगवान शंकर के कार्यों में सहयोग करती थीं। यह भी देखा गया है कि मातृ शक्तियां मूल देवों की अपेक्षा जल्दी प्रभावित होकर भक्तों के संकट का निवारण करती हैं। इस कारण यह जन मानस में बहुत ही लोकप्रिय भी होती जा रही है। जब कोई छोटी या समान्य घटना आ जाता या मूल उच्चस्थ देव किसी अन्य कार्य में व्यस्त हो जाता  था। तब उनके गण व गणिकाएं अपने अपने स्वामी द्वारा प्रदत्त शक्तियों के बल पर संसार के सदानुकूल संचालन में सहयोग करते थे। शक्ति हमेशा पूज्य रहे हैं, चाहे जैसी भी हो-तपस्या द्वारा देवताओं की कृपा प्राप्त की है। संसार में कई लोक हैं जिनके देवी-देवता अलग-अलग लोक में रहते हैं तथा जिनकी दूरी अलग-अलग है। नजदीकी लोक में रहने वाले देवी-देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि लगातार ठीक दिशा, समय, साधन का प्रयोग करने से मंत्रों की साइकल्स उस लोक में तथा ईष्टदेव तक पहुंचती है जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं तथा साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

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जादुई शक्तिवाला यक्ष
यक्ष गन्धर्व किन्नर विद्याधरी ये सब उपदेवताओं की श्रेणी में आते है। यक्षों एक प्रकार के पौराणिक चरित्र होता हैं। यक्ष का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है। यच सम्भवत यक्ष का ही एक प्राकृत रूप है। अतएव यक्ष का अर्थ जादू की शक्तिवाला और निस्सन्देह यक्षिणी है। यक्षों को राक्षसों के निकट माना जाता है, यद्यपि वे मनुष्यों के विरोधी नहीं होते, जैसे राक्षस होते है। माना जाता है कि प्रारम्भ में दो प्रकार के राक्षस होते थे एक जो रक्षा करते थे वे यक्ष कहलाये तथा दूसरे यज्ञों में बाधा उपस्थित करने वाले राक्षस कहलाये। यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है जादू की शक्ति। हिन्दू धर्मग्रन्थो में एक अच्छे यक्ष का उदाहरण मिलता है जिसे कुबेर कहते हैं तथा जो धन-सम्पदा में अतुलनीय थे। यक्षों के राजा कुबेर उत्तर के दिक्पाल तथा स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कहलाते हैं। एक यक्ष का प्रसंग महाभारत में भी मिलता है। जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब स्वयं धर्मराज की एक यक्ष के रुप में उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से अनेक गूढ़ यक्ष प्रश्न किए थे। यक्ष तथा भैरव भी हमारे नजदीकी वातावरण में रहते हैं।
कुवेर का सहयोगी यक्ष
लक्ष्मी जी जहां ध्यान नहीं दे पाती तो वहां कुबेर देव अपना कार्य संचालित करते थे। कुवेर के सहयोगियों को यक्ष कहा जाता था। इसकी श्रेणी में यक्षिणी, योगिनी, अप्सरा, किन्नरी आते हैं। एक साधना कर्ण-पिशाचिनी भी होती है जिससे हम भूत व भविष्य का ज्ञान कर सकते हैं तथा दूसरों को बताकर अचंभित किया जा सकता है। यक्षिणियां कई वनस्पतियों के नाम से भी जानी जाती हैं। अप्सराएं 8 होती हैं तथा 8 ही किन्नरियां होती हैं। इनका मुख्य कार्य धनप्राप्ति कराना होता है, जो इन्हें प्रसन्न कर प्राप्त कर सकता है। योगिनियां भी 8 होती हैं। कई बार प्रयास करने पर भी ये आती नहीं हैं तो इन्हें कुट्टन मंत्रों द्वारा जबरदस्ती भी बुलाया जा सकता है। यदि यह नहीं भी सामने आएं, तो भी जीवन के कार्यों में सफलता दिलवाती देती हैं।
कार्तिक पूर्णिमा को विशेष आयोजन
कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को यक्ष जाति के लोग अपने सम्राट कुबेर के साथ विलास करते हैं और अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद भी करते हैं। सर्वत्र हर्षोल्लास व प्रेमोन्माद की वर्षा करती रहती हैं। इसलिए इस रात्रि को यक्ष रात्रि कहा जाता है। वराह पुराण व वात्स्यायन के कामसूत्र में भी इसका उल्लेख यक्ष रात्रि के रूप में किया गया है। कालांतर में इस अवसर पर यक्षाधिपति कुबेर के पूजन की परंपरा शुरू हुई। उत्तरी भारत के अनेक गांवों में यक्ष वृक्ष, यक्ष चैरा के प्रमाण आज भी मिलते हैं। काशी का लहुराबीर इसी तरह के नाम का बोधक है। इसका वर्तमान एर्व व्यापक रूप डीह या डिवहारे बाबा और जाख-जाखिनी की पूजा के रूप में आज भी गांवों में प्रचलित है। पर्वतीय जातियों में अब भी यक्ष पूजा की परंपरा है।
 खुदाई में मिली अनेक प्रतिमाएं
विभिन्न स्थानों पर की गई पुरातात्विक खुदाई में कुषाण काल की अनेक प्रतिमाएं मिली हैं जिसमें यक्षपति कुबेर और लक्ष्मी को एक साथ दिखाया गया है। कुछ प्रतिमाओं में कुबेर को अपनी पत्नी इरिति के साथ दिखाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में कुबेर और उनकी पत्नी इरिति का ही पूजन किया जाता रहा होगा। कालांतर में इरिति का स्थान लक्ष्मी ने ले लिया और आगे चलकर कुबेर के स्थान पर गणेशजी को प्रतिष्ठित कर दिया गया। कुछ स्थानों पर आज भी गणेश-लक्ष्मी के साथ कुबेर व इंद्र की पूजा की जाती है। यक्ष रात्रि के साथ लक्ष्मी के जुडने का कारण धन की देवी तथा इसी दिन विष्णु से उनके विवाह का होना कहा जाता है। देखा जाय तो कुबेर व लक्ष्मी की प्रकृति में समानता अधिक है। कुबेर धन के देवता हैं और लक्ष्मी धन की देवी हैं। अंतर केवल यह है कि कुबेर की मान्यता यक्ष जाति में है और लक्ष्मी की देव व मानव जाति में। कालांतर में जब हमारे यहां विभिन्न जातियों व संस्कृतियों का समन्वय हुआ तो आपस में एक-दूसरे की मान्यताओं को स्वीकार करना स्वाभाविक था। इसलिए कुबेर और लक्ष्मी को एक ही रूप मानकार उनकी पूजा की जाने लगी।
कुबेर को छोड़ लक्ष्मी के साथ गणेश की निकटता बड़ी
सांस्कृतिक प्रवाह में जब शैव संप्रदाय का महत्व समाज में बढने लगा तो गणेशजी की प्रतिष्ठा बढ़ी। गणेशजी ऋद्धि-सिद्धि के देवता माने जाते हैं। ये दोनों उनकी पत्निया के रुप में पूजी जाती हैं। कुबेर देव केवल धन के ही अधिपति हैं। लक्ष्मी जी केवल धन की नहीं, यश, सुख व कृषि आदि की देवी हैं, इसलिए लक्ष्मी के साथ गणेश की निकटता मानी जाने लगी। मत्स्यपुराण के अनुसार स्वयं कुबेर ही वाराणसी में आकर अपने यक्ष स्वभाव को छोड़कर भगवान शिव के गणनायक और मंगल मूर्ति गणेश बन गए। गणेश जी के गनानन स्वरूप को छोड़ दिया जाय तो उनकी शेष आकृति कुबेर से काफी मिलती है। वही लम्बोदर और स्थूल शरीर गणेश जी का भी है और   कुबेर का भी।
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दिव्य ताकतों वाली ये शक्तियां
जो लोग बचपन से लेकर शहरों में पले-बढ़े हैं, उन्हें डीह बाबा, देवी माई का चैरा या बरम (ब्रह्म) देवता की बात नहीं समझ में आएगी। लेकिन गांवों के लोग इन दिव्य ताकतों से अच्छी तरह परिचित होंगे। डीह बाबा अक्सर गांव की चैहद्दी पर बिराजते हैं। अगर आप गांव से बाहर कहीं जा रहे हों और गलती से उन्हें नमन करना भूल गए तो वो आपको रास्ता भटका सकते हैं। आपका कार्य वाधित भी कर सकते हैं। यदि उनको सम्मान के साथ स्मरण कर लिया तो कार्य पूर्ण होने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही आपमें एक आत्मविश्वास भी बन जाता है। जो आपको सकारात्मक उर्जा का संचरण कर सकता है। बरम बाबा भी बेहद लाभदायक या खतरनाक दोनों रुप में होते हैं। इसी तरह पानी में डूबकर मरे अविवाहित नौजवान भी आते हैं जो बुडुवा कहलाते हैं। ये भी लोक में तरह तरह के होनी अनहोनी के प्रेरक बन जाते हैं। इन सभी छोटी मोटी शक्तियों को कुछ छोटे मोटे कार्य व पूजा से शान्त या अनुकूल किया जा सकता है। इनकी अवहेलना नुकसानदायी हो सकता है। इनकी कृपा से व्यक्ति व समाज में नई स्फूर्ति का संचरण होता है। अतः इन्हें नजरन्दाज नही करना चाहिए। यदि गल्ती हो भी जाय तो उसे सुधारा भी जा सकता है। ये कट्टर स्वभाव के कत्तई नहीं होते अपितु अपने भक्तों पर इनकी कृपा समयानुकूल होती रहती है।


Tuesday, June 11, 2019

ग्रामदेवता की शास्त्र सम्मत पूजा डा. राधेश्याम द्विवेदी

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 सनातनी हिन्दू जन ब्रह्मा, विष्णु, महेश और ऋषि मुनियोंकी संतानें हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पुत्रों और पुत्रियों से ही देव (सुर), दैत्य (असुर), दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, वानर, नाग, चारण, निषाद, मातंग, रीछ, भल्ल, किरात, अप्सरा, विद्याधर, सिद्ध, निशाचर, वीर, गुह्यक, कुलदेव, स्थानदेव, ग्राम देवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वैताल, भैरव, क्षेत्रपाल तथा मानव आदि की उत्पत्ति हुई। हिन्दू लेखों के अनुसार, धर्म में तैंतीस प्रकार देवी-देवता बताये गये हैं। संपूर्ण हिन्दू वंश वर्तमान में गोत्र, प्रवर, शाखा, वेद, शर्म, गण, शिखा, पाद, तिलक, छत्र, माला, विभिन्न देवता शिव, विनायक, कुलदेवी, कुलदेवता, इष्टदेवता, राष्ट्रदेवता, गोष्ठ देवता, भूमि देवता, ग्राम देवता, भैरव और यक्ष आदि में विभक्त हो गया है। देवताओं की कुल संख्या 33 कोटि बताई जाती है। इनमें आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं। वहीं 12 आदित्य - अंशुमान, आर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, वैवस्त और विष्णु हैं। 8 वसुओं में - आप, धुव्र, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभाष शामिल हैं। इसके अलावा 11 रुद्र हैं जिनमें मनु, मन्यु, शिव, महत, ऋतुध्वज, महिनस, उम्रतेरस, काल, वामदेव, भव और धृत ध्वज शामिल हैं। 2 अश्विनी - अश्विनी तथा कुमार। इस प्रकार 12 आदित्य और 8 वसु और 11 रुद्र और 2 अश्विनी कुमारों को मिलाकर 33 केटि देवी-देवता कहे जाते हैं।                                          
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लोकदेवता के रूप में अष्ट लोकपाल
लोकदेवता के रूप में अष्ट लोकपालों की विशेष मान्यता है। इनमें अधिकांश वैदिक देवता है जो पौराणिक युग में अपना पूर्व महत्व खोकर अष्टदिक्पालों की कोटि में आ गए। फिर भी इनका महत्व निरंतर बना रहा। ये बौद्ध तथा जैन देवपरिवार में भी मान्यताप्राप्त हुए। पुराणानुसार दसों दिशाओं का पालन करनेवाला देवता दिक्पाल होता है। यथा-पूर्व के इन्द्र, अग्निकोण के वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्यकोण के नैऋत, पश्चिम के वरूण, वायु कोण के मरूत्, उत्तर के कुबेर, ईशान कोण के ईश, ऊर्ध्व दिशा के ब्रह्मा और अधो दिशा के अनंत। दिक्पाल की संख्या 10 मानी गई है। वाराह पुराण के अनुसार इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है। जिस समय ब्रह्मा सृष्टि करने के विचार में चिंतनरत थे उस समय उनके कान से दस कन्याएँ उत्पन्न हुईं जिनमें मुख्य 6 और 4 गौण थीं (1) पूर्वा, (2) आग्नेयी, (3) दक्षिणा, (4) नैऋती, (5) पश्चिमा (6) वायवी, (7) उत्तरा, (8) ऐशानी, (9) ऊद्ध्व और (10) अध। ब्रह्मा की उन दस कन्याओं ने ब्रह्मा का नमन कर उनसे रहने का स्थान और उपयुक्त पतियों की याचना की। ब्रह्मा ने कहा तुम लोगों का जिस ओर जाने की इच्छा हो जा सकती हो। शीघ्र ही तुम लोगों को अनुरूप पति भी दूँगा।
इसके अनुसार उन कन्याओं ने एक एक दिशा की ओर प्रस्थान किया। इसके पश्चात् ब्रह्मा ने आठ दिग्पालों की सृष्टि की और अपनी कन्याओं को बुलाकर प्रत्येक लोकपाल को एक एक कन्या प्रदान कर दी। इसके बाद वे सभी लोकपाल उन कन्याओं में दिशाओं के साथ अपनी दिशाओं में चले गए। इन दिग्पालों के नाम पुराणों में दिशाओं के क्रम से निम्नांकित है:-(1) पूर्व के इंद्र, (2) दक्षिणपूर्व के अग्नि, (3) दक्षिण के यम, (4) दक्षिण पश्चिम के सूर्य, (5) पश्चिम के वरुण, (6) पश्चिमोत्तर के वायु, (7) उत्तर के कुबेर और (8) उत्तरपूर्व के सोम। शेष दो दिशाओं अर्थात् ऊर्ध्व या आकाश की ओर वे स्वयम् चले गए और नीचे की ओर उन्होंने शेष या अनंत को प्रतिष्ठित किया।
निकटस्थ देवी देवता सुगमः-
ध्यान देने वाली बात यह है कि कई लोक हैं जिनके देवी-देवता अलग-अलग लोक में रहते हैं तथा जिनकी दूरी अलग-अलग है। नजदीकी लोक में रहने वाले देवी-देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि लगातार ठीक दिशा, समय, साधन का प्रयोग करने से मंत्रों की साइकल्स उस लोक में तथा ईष्टदेव तक पहुंचती है जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं तथा साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं। भूत, प्रेम व ब्रह्म राक्षस इत्यादि हमारे आसपास ही रहते हैं तथा अल्प प्रयास से सिद्ध होते हैं। क्षेत्रपाल तथा भैरव भी हमारे नजदीकी वातावरण में रहते हैं। पितरों का भी एक लोक है तथा सबसे नजदीकी लोक यक्ष व यक्षिणियों का है। थोड़े प्रयास ही इन्हें प्रसन्न किया जा सकता है।
खेत का स्वामी खेतपाल
हिंदू धर्म और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, खेतपाल, जो कि खेत का स्वामी है, एक देवता है जो मूल रूप से दक्षिण भारत में विशेष रूप से खेत का देवता था। कुछ समय के लिए, क्षत्रपाल एक सामान्य नाम बन गया, जो भूमि के टुकड़े या पार्सल या किसी विशेष क्षेत्र ( संस्कृत में क्षेत्र) से जुड़े देवताओं पर लागू होता है। उनके मंदिरों का निर्माण आम तौर पर शिव को समर्पित मंदिरों के पूर्वोत्तर कोने पर किया जाता है , और उस विशेष अनुष्ठान की प्रभावकारिता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक अनुष्ठान से पहले उनकी पूजा की जाती है।
भैरव की पूजा
भैरव का अर्थ होता है - भय + रव = भैरव अर्थात् भय से रक्षा करनेवाला। हिन्दुओं के एक देवता हैं जो शिव के रूप हैं। इनकी पूजा भारत और नेपाल में होती है। हिन्दू और जैन दोनों भैरव की पूजा करते हैं। भैरवों की संख्या 64 है।
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ग्रामदेवता
ग्रामीण जनजीवन में प्रकृति की पूजा का प्रचलन था। प्रकृति पुजा में नदी पहीड़ वृक्ष तालाब सरोवर आदि का पूरा का पूरा ध्यान दिया जाता था। इसी क्रम में ग्राम देवी अथवा ग्राम देवताओं की पूजा पद्धति का प्रचलन भी हुआ है। मनुष्य और देवता में अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। पहले देवताओं ने मनुष्य को बनाया ,फिर मनुष्य ने देवताओं को मान मनोवल किया। दूसरे शब्दों मे अगर यूं कहे कि मनुष्य देवता के बिना जी नही सकता और देवता का अस्तित्व मनुष्य के बिना शून्य जैसा है। हड़प्पा और मोहन जोदाड़ों की खुदाई इस विश्वास को काफी बल देती है कि प्राचीन काल से उपासना की परंपरा चली आ रही है।
जिस जिस चीज से लोग डरते थे उसको प्रसन्न करने के लिए उसकी पूजा अर्चना शुरू कर देते थे। पहले लोग प्रकृति की पूजा करते थे फिर अपने घरो मे पूजा करने लगे जो कालांतर मे एक गोत्र या कुल की पूजा कहलाती रही । इसी प्रकार  अपने वास स्थान या गांव की सुरक्षा के लिए ,दैविक या भौतिक या प्राकृतिक आपदा जैसे आग ,बाढ़ ,महामारी ,बाहरी आक्रमण आदि से दूर रखने के लिए गांव की सीमा पर ग्राम देवता या कुल देवता की स्थापना की गई। एसा पाया गया है कि  भारत के अधिकांश हिस्सों  में ग्राम देवता स्त्रियाँ होती हैं, जैसे सत्ती माई ,काली माई ,दुरगा माई ,चंडीमाई ,शीतला माई व समय माई आदि। मगर कहीं कहीं पुरुष देवता भी होते हैं ,जैसे भैरो बाबा , बजरंग बली ,ब्रम्हा  शंकर ,नंदी ए जोगीबीर बाबा डीवहारे बाबा आदि ।
किसी समय मे स्थापित होने वाले ये पवित्र स्थान गाव से बाहर या सीमा पर ऐसे निर्जन ,सुनसान खेतों , झाड़ियों या गाछों के बीच हुआ करते जहां कम आबादी के कारण शाम ढलते ही भयानक और रोमहर्षक वातावरण  विभिन्न प्रकार के भूत ,प्रेत ,चुड़ैल ,आदि की दंतकथाओ के विकास और प्रचलन से उत्पन्न भय से  मनुष्यों को निजात दिलाया करते थे। दीपावली के दिन यहां पर दीपक रखे जाने की परम्परा है तो कहीं कहीं लोग वार्षिक पूजा भजन तथा भंडारा तक भी करते है।
पीपल या बरगद की विशाल वृक्षों की शाखाओ से बंधे नए लाल लंगोट ,लाल पीले ,कपड़े या झंडे या त्रिशूल ,सिंदूर पुते पत्थर के आकृति आदि उन्हें आसुरी या पैचासिक प्रवृत्तियों से , प्राकृतिक आपदाओ से ,मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करता था। उनकी दृढ़ आस्था और विश्वास के प्रतीक ये न्याय के देवता उनके  आपसी और सामाजिक झगड़ों के निबटारे के लिए वास्तव मे न्यायाधीश का कार्य करते । उन्हें अगाध विश्वास था कि अगर कोई बलशाली उसकी संपत्ति हड़पेगा ,उसे बिना कसूर के सताएगा तो ये देवता आततायी को अवश्य दंडित करेंगे ।
इसके अलावा बहुत सारे पवित्र पेड़ों एवं झाड़ों जैसे पीपल ,बरगद केला ,बेल ,शमी ,तुलसी ,आवला  आदि की जानवरो की ,साँपो की पूजा भी वहां होती ,समय समय पर भजन कीर्तन होता ,जिससे उनकी आध्यात्मिक शक्तियां और भी बलवती होती थी। नगर या ग्राम की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के लिए राजे महाराजे ग्राम या नगर देवता की मूर्ति स्थापित कराते थे। उनकी विधिवत पूजा करवाते थे। उस  इलाके के सारे लोग अपने परिवार की सुख शांति के लिए उनकी उपासना करते और बच्चों के जन्म ,मुंडन ,उपनयन ,शादी ब्याह आदि मांगलिक मौको पर सर्व प्रथम उस सर्वाधिक आदरणीय एवं  प्रतिष्ठित स्थान को न्योता जाता ,तदुपरांत वहां  जाकर अपनी अगाध भक्ति , निष्ठा और आस्था का परिचय दिया जाता था। सुहागिने देवता को प्रसन्न करने के लिए एक से एक भक्ति पूर्ण गीत बनाती और बड़ी श्रद्धा व भावुकता से उसे गाती हैं।
आज के हमारे सभ्य समाज में प्रायः बलि प्रथा समाप्त हो गयी है। इसके बाद भी अनेक स्थानो पर लोग मिट्टी के हाथी ,घोड़े या ऐसी ही कुछ प्रतिकात्मक चीजें मन्नत पूरा हो जाने पर चढ़ाते हैं।अलग अलग गावों मे अपनी समुदाय या जाति के आधार पर लोग अपने देवता की स्थापना करते हैं । जो लोगों  के रक्षक ,जनकल्याण कारक  ,और असीम शक्ति पूंज के रूप मे आज भी पूजे जाते हैं। मुंबा देवी किसी जमाने मे मुंबई की ग्राम देवी ही थी । कोलकाता की काली जी की स्थिति भी प्रायः एसी ही है। गोहाटी की कामाख्या आदि ग्राम देवी के साथ सती के रुप में भी पूजी जाती है। पहाड़ो मे भी अनेक देवी देवता है जिन्हें वहां के स्थानीय लोग अपने इलाके का रक्षक मानते हैं,और उनके रुष्ट होने पर भयंकर प्रलय की बात कहते हैं। ,इसका एक ताजा उदाहरण केदारनाथ के प्रलय से जोड़ा जाता है। बहुत से आदिवासी बहुल इलाको मे आज भी लोग अपने इस ग्राम्य देवता की उपासना साल मे एक बार ,ढ़ोल ,मजीरे ,पिपही ,के साथ नाच गाकर बड़े पैमाने पर  उत्सव मना कर करते हैं। प्रकृति मे फैली अपार सकारात्मक ऊर्जा से, प्राण वायु से नवीन चेतना प्राप्त कर अपनी मानवीय जिंदगी को बेहतरीन और सुखमय बनाने का हमारे प्रातः स्मरणीय ऋषिओ ,मुनियो ,पूर्वजों आदि द्वारा दिखाया गया यह आध्यात्म का मार्ग निस्संदेह अद्भुत एवं परम वैज्ञानिक है। सनातन धर्म के छत्तीस कोटि देवी देवताओ मे ये सभी शामिल हैं। लोगों ने अपनी जाति और व्यवसाय के अनुकूल अपने अपने देवता को चित्रित कर पूजा किये जाने का विधान बनाया है। भारत में पूरब से पश्छिम ,उत्तर से दक्छिन तक ही नहीं ,सनातन धर्म के अवशेषों को अपने सीने मे सँजोए विश्व मे जहां जहां भारत वंशी हैं,अपने अपने कुल या ग्राम देवता को अपने से जुदा कर ही नहीं सकते हैं।




Friday, June 7, 2019

संभव नहीं है समझना माया के मन की बात-- डा. राधेश्याम द्विवेदी



इस विषय का शुभारम्भ मैं कबीरदासजी के एक पद से करता हूं -
माया महा ठगनी हम जानी।।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरे बानी।।
केसव के कमला वे बैठी शिव के भवन भवानी।।
पंडा के मूरत वे बैठीं तीरथ में भई पानी।।
योगी के योगन वे बैठी राजा के घर रानी।।
काहू के हीरा वे बैठी काहू के कौड़ी कानी।।
भगतन की भगतिन वे बैठी बृह्मा के बृह्माणी।।
कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी।।

जिस प्रकार अपने घर की सुंदरता को देखने के लिए घर से बाहर निकलना ही पड़ता है , बाहर निकल के ही घर की सुंदरता दिखायी पड़ती है , वर्ना सुनी सुनायी सी बात लगती है ऐसा जैसे बाहर खड़े कुछ लोग यूँ कह रहे हो कि ये घर सुंदर है या हो सकता है , पर खुद इस कथन का यकीं नहीं हो पता । इसी प्रकार माया के सुंदर और जटिल महल को  समझने के लिए माया से बाहर आके ही देखना  सम्भव है। तभी माया और उसके गहरे प्रभाव को समझा और जाना जा सकता है ।ध्यान रहे, बचने के लिए आपको सतत प्रयास करना पड़ेगा क्यूंकि माया रुपी चादर की बुनावट अति महीन है  और जिसमे सिर्फ मात्र " केंद्रित-ध्यान " ही आपका सहयोगी है। और यदि ध्यान के गहरे क्षणो में ह्रदय के तार में वो ही आंदोलन महसूस हो जाये तो चूकना नहीं छलांग लगाने में देर नहीं करना , क्यूंकि माया महा ठगनी हम जानी , तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले बोले माधुरी बनी। सत्य है माया का कोहरा हर वख्त  गिरफ्त में लेने को तैयार है। कभी भी किसी को भी , ज्ञानी अज्ञानी किसी को नहीं बख्शती। ज्ञानी को ज्ञान से घेरती है और अज्ञानी को अज्ञान से। जब तक माया जनित कोहरा गहराया नहीं अर्थात आपमें कुछ भी आत्मिक या चेतना का अर्थ जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है , यही वख्त है जब पूरी आत्मिक शक्ति से इस कोहरे से दो दो हाथ किये जाएँ , समझा जाये कि मर्म क्या है आखिर इस माया का , वैसे इतना बुरा भी नहीं , यही तो है जो संसार को चला रही है। वर्ना संसार का अस्तित्व ही क्या पर जो समझ सके और कमल के पत्ते के सामान स्वयं के मस्तिष्क को माया के छल में  खुद को  लिप्त होने से बचा सके तो उसका कार्य पूरा हुआ , फिर माया को अपना काम करने दिया जाये और आप अपना आत्मिक उथान करे। और यदि आपका आत्मिक उत्थान कार्य पूरा होता सा लगे तो आस पास के जिज्ञासु की भी यथोचित मदद सिर्फ करुणावश करे , कोई बल प्रयोग न स्वयं के साथ न सामने वाले के साथ।
जिस प्रकार ब्रह्म और जीव का मानवीकरण किया गया है उसी प्रकार भारत के राजनीतिक क्षितिज पर बसपा सुप्रिमों कुमारी बहन मायावती का चरित्र व आचरण झलकता है। राजनीति में यह प्रयोग बिल्कुल अनूठा और विलक्षण है। आइये इस पर भी एक नजर डाल लेते हैं।
बसपा सुप्रिमों कुमारी बहन मायावती का उत्तर प्रदेश के इतिहास में 4 बार मुख्यमंत्री के पद पर पहुंचने वाली पहली नेता हैं। उनका रिकार्ड सबसे अलग रहा। वह अपने व अपने पार्टी के स्वार्थ पर कुछ भी करने से पीछे नहीं हटने वाली है। नौतिकता आचरण व मर्यादा उनके डिक्शनरी में है ही नहीं। जो जो उन्हें सम्मान देगा समय व अवसर देखकर वह उन सबको सबक सिखाने में कभी पीछे रहनेवाली नहीं है। उनका सपा से पहला गठवंधन हुआ था जिसे मायावती पहली बार जून 1995 में एसपी के साथ गठबंधन तोड़ कर बीजेपी और अन्य दलों के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थीं। तब उनका कार्यकाल महज 4 महीने का था। वह दूसरी बार 1997 और तीसरी बार 2002 में मुख्यमंत्री बनीं और तब उनकी पार्टी बीएसपी का बीजेपी के साथ गठबंधन था। सितंबर 1997 में बीजेपी-बीएसपी गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया, मगर बीएसपी के समर्थन वापस लेने के बाद उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए बीएसपी और कांग्रेस से टूट कर वजूद में आए जन बसपा और लोकतांत्रिक कांग्रेस से गठबंधन करना पड़ा। जिन्होंने मायावती का ट्रैक रिकॉर्ड देखा है वह उसके हर गतिविधियों से वाकिफ हैं। वह ढाई दशक में अपनी राजनीतिक सहयोगी रही बीजेपी को तीन बार और सपा को एक बार छोड़ चुकी हैं. तो ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि मायावती एक बार फिर अपनी ‘इस्तेमाल करके छोड़ने की नीति’ पर चलने का फैसला ले चुकी हैं। “यूज एंड थ्रो” की राजनीति का नेतृत्व किया, मगर बीएसपी के समर्थन वापस लेने के बाद उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए बीएसपी और मायावती का कोई मुकाबला नहीं।
 2019 में जिस दिन बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने हाथ मिलाया था, उसी दिन स्पष्ट हो गया था कि ये गठबंधन लंबा चलने वाला नहीं है। दो राजनीतिक शत्रुओं के बीच ये समझौता अविश्वास, संदेह के आधार पर और सबसे अहम, दोनों सहयोगियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए हुआ था। ये गठबंधन कमजोर इसलिए भी रह गया क्योंकि इसे चुनाव से एकदम पहले बनाया गया जबकि इस तरह के गठबंधनों को परिपक्व होने में वक्त लगता है। इतना वक्त ही नहीं था कि ये संदेश जमीनी स्तर तक पहुंच पाता, जिससे दोनों पार्टियों के वोट एक-दूसरे को मिल पाते और ना ही दोनों पार्टियों ने उतनी कोशिश की जितनी की जानी चाहिए थी।
इस दौरान मायावती ने प्रधानमंत्री का सपना संजोना फिर से शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें लग रहा था कि चुनाव नतीजे आने पर त्रिशंकु संसद की स्थिति बन सकती है। उन्होंने ऐसे बयान लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के 15 दिनों से भी कम वक्त में दिए हैं। अखिलेश के साथ गठबंधन करने से उन्हें 10 सीटें मिल गईं जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। शायद उन्हें ऐसा भी लगा कि अखिलेश अब भी एक राजनीतिक नौसिखिया हैं, जो आगे चलकर उनकी पार्टी के किसी काम नहीं आएंगे। इसलिए उन्होंने गठबंधन खत्म करने का फैसला किया। उन्होंने भविष्य के लिए दरवाजें सिर्फ इसलिए खुले रखे हैं क्योंकि वह आने वाले उपचुनाव में देखना चाहती हैं कि कितने पानी में हैं और ये भी देखना चाहती हैं कि इसी चुनाव में समाजवादी पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है। बसपा प्रमुख ने जोर देकर कहा कि वो अखिलेश के साथ अच्छे निजी रिश्ते बनाए रखेंगी। उन्होंने कहा, “हालांकि, मैं लोकसभा चुनाव के नतीजों को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिससे साफ तौर पर पता चलता है कि अखिलेश अपनी पार्टी के कोर वोटों पर नियंत्रण नहीं कर सके और हमें ये फैसला लेने पर मजबूर होना पड़ा।”
बसपा सुप्रिमों का यह आकलन वास्तविकता से दूर है। वह पार्टी के अनुयाइयों को बंधुवा मजदूर मात्र समझती है। उन्हे खौराती देदेकर किसी काबिल ना बनने को पे्ररित करती रहती है। उन्हें यह नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री सड़क योजना, मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना  तथा रसोई गैस योजना आदि की आपूर्ति करके एनडीए उनके वोट बैंक में कब का सेंध लगा रखा है और आये दिनों यह सेंध खुला प्रवेशद्वार बनता चला जा रहा है। 2014, 2017 और 2019 के चुनावों के परिणामों से वह कोई सीख लेना नहीं चाहती है। उनके सहायक जो पर्चा लिख देते हैं वह सोनिया गांधी की तरह उन्हें बांच देती हैं। ना मायावती में मूल समझ है और ना ही उनके सहायक को जो क्षण-क्षण बदलते परिवेश का सही आकलन ना करके उन्हें रोज-के-रोज प्रेस कांन्फेंस करवाने को मजबूर कर देता है।
राजनीतिक प्रेक्षक यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि भाजपा के दबाव में मायावती ने गठबंधन तोड़ा है।  मायावती आय से अधिक संपत्ति वाले केस में मोदी सरकार के दबाव में आ गई हो सकती हैं। जो बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती थी वह इस बार बड़े उत्साह से ये उपचुनाव लड़ने जा रही है, वह भी गठबंधन तोड़कर। तो यह माना जाए कि यह सब उप चुनाव में भाजपा को फायदा दिलाने के लिए हो रहा है। भले ही सपा और बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव में कुछ करामात न कर पाया हो पर 2022 के विधानसभा चुनाव में पासा पलटने से आशंकित भाजपा ने मायावती पर शिकंजा कस दिया हो। इसमें दो राय नहीं कि न केवल मायावती बल्कि उनके भाई आनंद ने उनके मुख्यमंत्रित्व काल में अकूत संपत्ति अर्जित की है। लोकसभा चुनाव में भी मायावती का भाजपा पर कम और कांग्रेस पर ज्यादा मुखर होना भी भाजपा का दबाव दिखाई दे रहा था। कुछ विश्लेषकों द्वारा सपा से गठबंधन तोड़ना 1995 के गेस्ट हाउस कांड का बदला लेना बताया जा रहा था।


Tuesday, June 4, 2019

शक्ति आसुरी एक हो गयी डा. राधेश्याम द्विवेदी


आसुरी शक्ति के लिए इमेज परिणाम
शक्ति आसुरी एक हो गयी सत्य की ज्योति बुझाने में।
भारत में सब मिलकर के जुटे हैं पूरा सत्य मिटाने में।।1।।
ममता माया नाम है अच्छा काम मनमानी करती है।
दलितों का हिस्सा लेलेकर अपनी झोली में भरती है।।2।।
जिनका मन ना मिल पाये वे एक नाव के पथिक हुए।
सत्य की ज्योति बुझाने में वे पूरी ताकत झोक दिये।।3।।
बार बार असत्य बोलकर सत्य का वे आभास दिये।
गन्दी गन्दी गाली देकर जनमन को विद्रूप किये।।4।।
परिवार कुटुम्ब तक सीमित आगे इससे ना बढ़ पाये।
जो जनजन का काम करे उसको तगड़ी टांग अड़ाये।।5।।
अपने अपने को लुटवाये सम्पत्ति सकल बनाइ लिये।
वोटबैंक की नीति बना तरह तरह पक्षपात किये।।6।।
जनजन का दुख दर्द ना समझे अलीशान वे रहते हैं।
जनता का सेवक कहलाकर जनता को भरमाते हैं।।7।।
सत्यमेव जयते ही रहा सब असत्य समाप्त हुए।
झूठे छल प्रपंच सभी इस जग में नेस्नाबूत हुए।।8।।
सत्य पथिक भटक भटक कर मंजिल अपना पाता है।
असत्य की बोली ऊंची होकर अन्त में मिट जाता है।।9।।
भारत मां का तपसी बालक आज विश्व में छाइ गया।
तरह तरह के शुभ संदेशों से भारत मालामाल हुआ।।10।।