उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के राजा नगर और उनके दरबारी गण नगर राजमहल के पास स्थित खड़ैवा खुर्द निवासी, उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और ज्योतिष शास्त्र के आचार्य पण्डित 'गंगाराम उपाध्याय' से प्रतिदिन संस्कृत पुराण, अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्हें अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द में मकान भी बनवा दिए थे। यहां एक बड़ा कुंवा आज भी मौजूद है। आज से लगभग 15 साल पहले यहां श्री राम बरन चौबे रहते थे जो उपाध्याय वंश के श्री नागेश्वर उपाध्याय के दत्तक पुत्र थे। गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र रहे थे। उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी के तट तक फैला और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीताराम जी को दान कर दिया था ।
15 वर्ष की अथक प्रयास से इस भूमि को साफ सुथरा करके कृषि योग्य बनाकर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने “सीताराम पुर” नामक एक नया गांव बसा लिया था। ये नगर राज्य दरबार के चर्चित विद्वान और सलाहकार थे। ये 1795 ई. तक जीवित रहे । इस गांव को 1950 ई. तक खड़ैवा खुर्द के निवासी 'पुरवा' कह कर बुलाते थे। राजस्व रिकॉर्ड में अलग नाम पाकर भी यह गांव खड़ैवा गांव का एक मजरा या पुरवा तक ही सीमित था।
राजा उदय प्रताप नारायण सिंह (1812- 1857) बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे।
उस समय सीताराम पुर के पंडित सीता राम जी के तीन पुत्र - लक्ष्मन दत्त मनोज दत्त और इंद्र दत्त थे। लक्ष्मन दत्त (1820- 1890 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। ये पूर्व वर्णित गंगाराम के पुत्र सीताराम उपाध्याय के पुत्र थे। जिनको उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था।
लक्ष्मणदत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” की जमींदारी संभालते थे। इनका समय 1840 से 1910 के मध्य था।
बाबा मनोगदत्त के आज्ञाराम और हरि प्रसाद दो पुत्र हुए। आज्ञाराम ब्रिटिश हुकूमत में दरोगा थे। जिनसे जंगबहादुर उपाध्याय का खानदान चला। हरिप्रसाद बाबा के तीन पुत्र हुए, गजराजराम, दौलतराम व छागुरराम। इस उपाध्याय कुल की तीनों पट्टी में महराजराम, धर्मराज राम व गजराजराम का समय लगभग एक साथ था पूरा उपाध्याय वंश इन तीनों नायकों से गौरवान्वित हुआ। इन तीनों लोगों ने सीताराम जी द्वारा स्थापित लछिमन दत्त से संरक्षित कुल को उच्च शिखर तक पहुँचाया।
बाबा गजराज राम अपने भाई दौलतराम के साथ सदैव रहते थे। इनके भाई छांगुर राम की ससुराल खड़ौवा खुर्द में थी उस कुल में एक बुढ़िया थी जिसे पड़ाइन दाई लोग कहते थे। पड़ाइन दाई देशाटन में तीर्थयात्रा करने गयी थीं। वहीं ये दिवंगत हो गयीं उनके घर और खेती की भूमि पर गजराज बाबा ने कब्जा कर लिया। ईंट का दो मंजिला मकान बनवाकर उन्होंने सीतारामपुर के मकान को छांगुरराम बाबा उनके पुत्र रामदुलारे, रामप्यारे वराममिलन को दे दिया।
राजा पोखरनी की तरह खड़ौवा खुर्द का गजराज राम का बंगला मशहूर हो गया। जहाँ आये दिन हाकिम हुक्काम पुलिस दरोगा, कानूनगो, लेखपाल, आते रहते थे। लोग कहते हैं कि पुलिस दरोगा बिना गजराज राम के क्षेत्र के किसी मामले में हाथ नहीं लगाते थे। तीनों पट्टी के राम राजा पोखरनी के दरबार में सदैव आदर
के पात्र बने रहते थे। तीनों पटटी के तीनों भाइयों की शान शौकत क्षेत्र के चारों ओर में मशहूर थी। जहाँ बस्ती के दक्षिणी भूभाग के सभी जमींदारों की हुआ करती थी।
कांग्रेस का आन्दोलन जब अपने चरम सीमा पर पहुँच गया तो 1930-40 के इस उपाध्याय परिवार ने कांग्रेसी नेताओं को तन मन धन से छिपे चोरी मदद लेता था। इसमे गजराज राम का सहयोग बहुत अच्छा था। गजराज राम का 18का जनता जनार्दन से सदैव भरा रहता था। मैंने बढ़े गजराज बाबा को देखा वे लम्बे कद के थे। धोती कुर्ता उनका रोज घुला जाता था। पड़ोस के सभी ह के लोग गजराज बाबा का आदर करते थे। उनकी खेती बहुत जची होती थी। वो लड़कपन में उनके सिरवार कन्हैया उर्फ लोचन कहार छः बैलों की खेती कराते थे। हमारे खानदान में गजराज राम का सम्मान था। क्योंकि वे तीनों पट्टी को अपना परिवार समझते थे। मेरे पिता केदारनाथ जी को गजराज बाबा बहुत मानते थे। पट्टी के तीनों भाई सदैव एक दूसरे की बैठक में मिलते रहते थे।
बाबा गजराज राम के कोई पुत्र नहीं था। उनके भाई दौलतराम के एकलौते पुत्र विश्वम्भरनाथ बहुत सुन्दर शक्तिशाली गौर वर्ण के जवान थे। महराज राम की पट्टी में ईश्वरनाथ तथा धर्मराज राम की पट्टी में रामशंकर तथा गजराज राम की पट्टी में विश्वम्भरनाथ व रामदुलारे बहुत शक्तिशाली होनहार नवयुवक थे। लेकिन दुर्भाग्य रहा ये सभी 25 से 30 वर्ष की आयु में ही दिवंगत हो गये।
विश्वम्भरनाथ के बाइस वर्ष की अवस्था में राधेश्याम नामक एकलौते पुत्र हुए। विश्वम्भर नाथ 25 वर्ष की अवस्था में महामारी से काल कवलित हो गये।
राधेश्याम जी का लालन- पालन सब बाबा दौलतराम पर आ गया। बाबू राधेश्याम का पालन-पोषण राजा रूपेन्द्रनारायण के पुत्र लाल भूपेन्द्रनारायण के समान हुआ था। क्योंकि गजराज राम का रहन-सहन एक अच्छे स्टेट के स्तर से कम नहीं था। लाल भूपेन्द्रनारायण पोखरनी स्टेट बाबू राधे श्याम के समकालीन थे।
बाबा गजराज ने इनकी शिक्षा दीक्षा अंग्रेजी माध्यम से दिलाई थी जब राधेश्याम जी नौवीं कक्षा में राजकीय इण्टर कॉलेज बस्ती में गये तो उस समय कोई अंग्रेज प्रिन्सिपल था। गजराज राम ने अपने कुल के लछिमन दत्त का जब परिचय दिया तो प्रिन्सपल बहुत खुश हुआ। बाबू राधेश्याम अंग्रेजी वेशभूषा में रहते हुए एक सुन्दर जवान थे। वे उस समय शूट पहनकर राजाओं के लड़कों में बैठते थे। उनका रहन-सहन बहुत ऊँचा था। उनकी सेवा के लिए गजराज बाबा ने एक नौकर लगा दिया था।
खड़ैवा के छिन्नू कहांर हमारे बचपन में सन 1950 के आस पास बतलाते थे कि राधेश्याम बच्चा का सम्मान सभी अध्यापक करते थे। इनकी सुन्दरता से जिले के अच्छे घरानों के लड़के प्रभावित रहते थे। बाबू राधेश्याम जब हाईस्कूल पास किये तो इन्हें नौकरी करने की धुन लग गयी और दरोगा भर्ती में जाने को तैयार हुए।
बाबा गजराज राम ने कहा कि हमारा इकलौता पौत्र नौकरी नहीं करेगा किन्तु राधेश्याम जी ने जिद किया कि आप भी मेरे साथ चलिए। भर्ती में जो डी.आई.जी. आये थे उनको गजराज बाबा ने अपना परिचय दिया और अपने पूर्वज लछिमन दत्त व साहबराम व आज्ञाराम को जब बतलाया तो अंग्रेज डी.आई.जी. बाबू राधेश्याम का चेकिंग करके तुरन्त भर्ती का आदेश दे दिया।
बाबू राधेश्याम अपनी माता और दादा के आखों के तारे थे। तीसरे दिन उन्हें गोरखपुर जाना पड़ा। वहाँ दरोगा की प्रारम्भिक ट्रेनिंग इतनी कड़ी थी कि बाबू राधेश्याम घोडे बैठते समय कुछ चोट खा गये। जब छिन्नू कहाँर गजराज बाबा के पास सूचना लेकर आये तो पूरा परिवार रोने गाने लगा था। खानदान के धर्मराज राम बाह महराज राम आदि बँगले पर पहुँचे। उस समय जमीनदारी का समय था। बाबू राधेश्याम गजराज बाबा की पट्टी के सर्वप्रिय सदस्य थे। सारा जवार उन्हें बच्चा साहब कहकर सम्बोधित करता था। वे पोखरनी के लाल साहब राजा भूपेंद्र
प्रताप नारायण के मित्र थे। उन्हें राजा खानदान अपने समकक्ष गौरव देता था।
खानदान के सभी बुजुर्गों ने गजराज राम जी से निवेदन किया कि बच्चा साहब को नौकरी पर न भेजें। वे इकलौते वंश वृक्ष हैं। दरोगा की नौकरी जेखिम की नौकरी है। राधेश्याम बच्चा सीधे व सुकुमार हैं। उन्हें नौकरी से लौटाने क प्रस्ताव सुनकर बाबा गजराज राम जी गोरखपुर पहुँचे और लाइन साहब के सामने बच्चा राधेश्याम को घर चलने को कहा। राधेश्याम जी कड़ी ट्रेनिंग से कर चुके थे। उन्होंने लाइन साहब से निवेदन किया कि हमारे परिवार के लोग नौकरी करने के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए मैं त्यागपत्र दे रहा हूँ।
त्यागपत्र देकर बाबू राधेश्याम जी घर आ गये और उस वर्ष वे पढ़ाई से वंचित हो गये। उसके कई साथी शहर से आया करते थे और उन्हें अपना नाम लिखाने की प्रेरणा दिया करते थे।उस समय राजकीय इण्टर कॉलेज बस्ती में केवल हाई स्कूल था। इण्टर करने के लिए उन्हें गोरखपुर के सेंट एंड्रूज कालेज में नाम लिखाना था। बाबा गजराज राम उन्हें अपने आंखों से दूर रखना नहीं चाहते थे। लेकिन लोगों के कहने और बच्चा राधेश्याम जी की राय से 1944 में गोरखपुर में नाम लिखा गया था।
उस समय 1942 का अंग्रेजों भारत छोडो का कांग्रेसी आन्दोलन बहुत तेज था। तमाम छात्र अध्यापक एवं जनता गाँधी जी के आवाहन पर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध कर रही थी। बाबू राधेश्याम गोरखपुर में सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के सम्पर्क में आये। उन्होंने जुलाई महीने में इण्टरमीडिएट में नाम लिखवाया था। सितम्बर में आन्दोलन में भाग लेकर नेताओं के साथ जुड़कर कांग्रेस में कार्य करना प्रारम्भ किया और आजीवन कांग्रेसी बने रहे। आन्दोलन काल में जब ये बस्ती आये तो लोगों ने इनका बड़ा सम्मान दिया। उस समय इन्होंने कृपाशंकर लाल व रामशंकर लाल तथा बाबू कटेश्वरनाथ से मुलाकात किया। लोगों ने युवक राधेश्याम को प्रोत्साहित किया। युवक राधेश्याम जब कांग्रेसी रूप में क्षेत्र में आये तो नगर बाजार के सरजू भगत डारीडीहा के रामफेर शुक्ल और खड़ौवा जाट के जगेश्वर चौधरी ने इनकी प्रशंसा किया। बाबू राधेश्याम जी ने क्षेत्र के तमाम नवयुवकों को कांग्रेस का मेम्बर बनाया।
फागुन का महीना था गजराज बाबा अपने बँगले पर बैठे थे। कई आराम कुर्सियाँ लगी थीं। बरामदे में तीन तख्त बिछे थे कि चौकीदार ने सूचित किया कि आज सरकार थानेदार साहब कोतवाली से आप के दरबार में दस बजे आ रहे हैं। पास में बैठे रामराज व रामलाल व बड्डर बाबा रामरत्न पाण्डेय व कौलेश्वर खवास पूछ पड़े कि आज दरोगा जी आ रहे हैं क्या बात है?
गजराज बाबा की अवस्था 70 वर्ष से ऊपर थी उनके समय और उम्र का उतार था। दरोगा जी अपने चार सिपाहियों के साथ ठीक दस बजे बाबा गजराज राम की बैठक में पहुँचे और आपस में सलाम करके आराम कुर्सियों पर बैठ गये। गजराज बाबा के आदेश से लोचन व सरजू कहाँर ने ताजा-ताजा गन्ने का रस तैयार कराया ओर आलू डालकर हरी-हरी मटर का दाना धनियाँ की चटनी के साथ पेश किया। उधर कोल्हू चल रहा था। चाक पर गुड़ उतर चुकी थी। गुड़ की महक से कोल्हार ही नहीं दरवाजा भी महक रहा था।
दरोगा जी के पास बैठे जगन्नाथ सिंह सिपाही ने कहा कि सरकार बाबा का गुड़ तैयार है। ताजा-ताजा गुड़ भी थोड़ा खा लें। यह सुन कर गजराज बाबा ने कहा सरजू दस-दस भेली बाँध कर पाँच जगह रख दो-दो बोरी मटर भी तोड़वाकर मँगालो। दरोगा साहब अपने गाँव आये हैं इनके साथ-साथ इनके बच्चे भी देशी गुड़ का स्वाद लें। सरजू कहार जी सरकार लाने चले गये। इधर लोचन कहार ताजा-ताजा गुड़ चार जगह कटोरे में रखकर ताजे ताजे मक्खन के साथ दरोगा जी के सामने उपस्थित हुए। गजराज बाबा बोले दरोगा जी आप थोडा जलपान करें मैं अभी आ रहा है।
बाबा गजराज राम के आतिथ्य से दरोगा जी मूल गये कि वे क्या करने आये हैं। अपनी बैठक में गजराज बाबा के आते ही दरोगा जी ने कहा कि उपाध्याय जी कुछ आपसे बात करनी है। जो हमारे आपके बीच केवल होगी। बाबा गजराज ने सन्तु से कहा कि दो कसी आम के पेड़ के नीचे लगाओ। दरोगा जी और गजराज बाबा जब पेड़े के नीचे बैठे तो लोग तरह-तरह की अटकलें लगाने लगे। दरोगा जी ने कहा, बाबा जी आप के पौत्र राधेश्याम पर वारण्ट है । आप पुलिस के हमेशा हमदर्द हैं । यह कोतवाली के पुराने लोगों ने मुझे बतलाकर भेजा है। बाबा पुलिस कानून के शिकंजे में जब किसी को जकड़ देती है तो वह उसे शान्त नहीं छोड़ती। आप एक पुरुषार्थी आदमी हैं। इस समय कांग्रेसी आन्दोलनकारियों पर बड़ी कड़ाई चल रही है। हम लोग भी भारतीय हैं चाहते है कि देश आजाद हो। लेकिन कुछ बोल नहीं सकते हैं। आप राधेश्याम को हमसे बात करा दें हम उनको समझा दें जिससे आगे कोई समस्या न खड़ी हो।
बाबा गजराज राम के बुलाने पर राधेश्याम जी दरोगा जी के सामने खड़े हुए। एक स्टूल पर बैठ गये। दरोगा जी ने कहा जनाब उपाध्याय बाबा के नाती जी आपको क्या घटा है जो अपने परिवार का नाम बदनाम कर रहे हैं। दरोगा जी की बात सुनकर युवा राधेश्याम जी ने कहा दरोगा जी मैं एक भारतीय हूँ। अपने देशकी आजादी के लिए लड़ रहा हूँ यह कोई गलत काम तो नहीं है। दरोगा जी ने कहा विद्यार्थी जी आपके खानदान के लछिमन दत्त और आज्ञाराम तथा साहबराम का नाम ब्रिटिश शासन के वफादारों में दर्ज है। आप उसका उल्लंघन न करो। युवा राधेश्याम जी ने कहा दरोगा जी समय-समय की पुकार होती है जब हमारे खानदान के लोग शासन में नौकर थे तो उनका कर्त्तव्य था कि शासन की वफादारी करें। उन्होंने अपना फर्ज अदा किया। आज सारा भारतवर्ष देश के स्वतन्त्र करने के लिए अंग्रेजी शासन का विरोध कर रहा है। हमें भारतीयों के साथ रहना चाहिए। आप शासन के अधिकारी हैं किन्तु भारतीय भी है। अंग्रेजों शासन जल्द समाप्त होने वाला है इसलिए आप लोग हम लोगों की मदद करें।
बाबा गजराज राम जी ने कहा दरोगा जी बच्चा राधेश्याम जब से गोरखपुर गये और लौटा तब से नेता हो गया। यह लड़का जरूर है लेकिन आपसे जो कुछ कह रहा है मेरी समझ से ठीक है। लेकिन ऐसी तरकीब बताइये कि सांप भी मरे लाठी
न टूटे। आप ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारी हैं। हम आपसे सहयोग चाहते हैं, टकराव नहीं।
हँसते हुए दरोगा जी ने कहा कि बाबा-
खैर खून खाँसी खुशी, व्यसन और मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान।
आप तो मुझसे बहुत अनुभवी हैं। आपका पेड़ बड़ा है इस पर सबकी निगाहें स्वाभाविक रूप से पड़ेंगी। राधेश्याम जी को मैं क्रान्तिकारियों के साथ जाने से नहीं रोक रहा हूँ किन्तु सतर्क होकर रहें कहीं पकड़े न जायँ क्योंकि मेरे सामने भी समस्या है । जब हम लोग एस.पी. मीटिंग में जाते हैं तो गुप्तचर रिपोर्ट पेशकार प्रस्तुत करता है, जब एस.पी. साहब नाम व ग्राम का पता सुनते हैं तो उस दरोगा को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हैं।
राधेश्याम जी ने कहा कि मैं अपना कार्य सतर्क होकर करूँगा आप दरोगा जी निश्चिन्त रहें। बाबा गजराज राम ने कहा दरोगा जी राधेश्याम बच्चा आपके बच्चे हैं इन्हें सम्हालिये। दरोगा जी ने कहा ठीक है बाबा अब हम लोग जा रहे हैं।
बाबा गजराज राम स्वतन्त्रता प्राप्ति के आस-पास दिवंगत हो गये। उन्हीं के साथ 1947-48 के आस-पास महराज राम व धर्मराज राम भी दिवंगत हो गये। गजराज बाबा जिस समय दिवंगत हुए उनकी अर्थी को मैंने मनोरमा नदी पर ले जाते देखाथा। इसी प्रकार धर्मराज राम व बाबा महराज राम भी मेरे बचपन के समय दिवंगत हुए थे। इन तीनों पुरुषार्थी कुलीन महापुरुषों के पीछे उनका एक बड़ा परिवार विकसित और उल्लसित हो रहा था। 1950-60 के बीच तीनों घरानों का उत्कर्ष चरम सीमा पर था।
बाबू राधेश्याम जी उपाध्याय कुल के प्रथम हाईस्कूल उत्तीर्ण व्यक्ति थे। इनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। सन् 1951 में इन्होंने मुझे ए.बी.सी.डी. लिखना सिखलाया था। मेरे पिता केदारनाथ जी बाबू राधेश्याम का सम्मान करते थे। मेरे पिता के पद में भतीजे थे। गजराज राम जी ने मरते समय कहा था कि केदार बाबू बच्चा राधेश्याम का ध्यान रखियेगा। यही कारण था कि बाबू राधेश्याम का सम्पर्क हमारे पिता जी से बना रहता था।
जिस समय मैं 12 वर्ष का था और कक्षा 6 में पढ़ता था। बाबू राधेश्याम जी सीतारामपुर आये। वहाँ मेरे पिता और खानदान के रामबरन व रामसुन्दर भाई बैठे थे। एक बनिया का कुछ हिसाब चल रहा था लेन-देन का हिसाब था। बाबू राधेश्याम जी रामबरन और रामसुन्दर के सहयोग से जोड रहे थे कि मैंने तुरन्त उत्तर दे दिया। हिसाब सही था सब लोग अवाक रह गये। बाबू राधेश्याम जी ने मेरे पिता जी से कहा कि काका यह पढ़ने में ठीक है। इसका भविष्य अच्छा है इन्हें पढने के लिए भेजो और इन पर ध्यान रखें।
बाबू राधेश्याम जी मेरे प्रति सदैव आत्मीय भाव रखते थे और यह कहा करते थे कि यह खानदान का नाम रोशन करेंगे। इसे हमारे चचेरे भाई रामबरन जी ब्रह्म वाक्य समझकर मेरे पीछे पड़ गये। उन्होंने 1955 में मेरा नाम खैर कालेज में बस्ती लिखवाया। इसी बीच मेरे पिता केदारनाथ का देहान्त 12 अक्टूबर 1957 को हो गया। मैं दुखी और दीन हो गया। मेरी हताश माता मुझे पढ़ाना चाहती थी। इसके लिए वह बाबू राधेश्याम से बराबर सम्पर्क बनाये रहती थीं। वे जरूरत पड़ने पर जी खोलकर मदद करते थे।
1956 में घर के बटवारे के समाधान में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। बाबू राधेश्याम जी एक समय मेरे घर आये और मेरी माता का चरण छूते हुए बोले कि काकी आज आपके पुत्र ने हमारे कुल को धन्य कर दिया। 1973 में यह इण्टर कॉलेज का प्रिन्सपल होकर खानदान का गौरव बढ़ा रहा है। खानदान में जो कोई कार्य न कर सका उसको प्रिन्सपल मुनिलाल ने करके दिखा दिया। आप धन्य हैं।
बाबू राधेश्याम जी उपाध्याय कुल के गौरव थे। इनके पाँच पुत्र केसरीनारायण, लखन लाल, पवन कुमार, वीरकृष्ण, दिलीप कुमार आज उनके द्वारा स्थापित खानदान के गौरव को कायम किये हुए हैं। इससमय इस खानदान के पास 40 से 50 एकड़ जमीन है। पवन कुमार अभियन्ता हैं और वीरकृष्ण अवर अभियन्ता है। सभी पाँचों भाइयों के पुत्र-पुत्रियों से घर भरा हुआ है। बाबू राधेश्याम जी 84 वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुए। उनकी धर्मपत्नी भी दिवंगत हो चुकी हैं। यह परिवार अब भी मेरे प्रति सदैव श्रद्धा भाव रखता है क्योंकि ये सब मेरे भतीजे लगते हैं। बाबू राधेश्याम की कीर्ति ध्वजा लिये ये निरन्तर बढ़ते रहें। यही मंगलकामना है।
सन्दर्भ
- (डा. मुनि लाल उपाध्याय सरस कृत “वंशावली ….. का आतंक” इतिवृत,पृष्ठ - 64 से 70 तक)
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