Tuesday, March 10, 2026

नगर रियासत बस्ती द्वारा “उपाध्याय इस्टेट” को मान्यता धर्मराज-महराजराम का युग(भाग 3)✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

धर्मराज व महराजराम को उपाध्याय इस्टेट का साफा पहनाया गया था 
गोरखपुर और अवध क्षेत्र में अंग्रेजों ने 1801 में देशी राजाओं से सत्ता छीनी थी।इस समय बांसी में राजा सर्वजीत सिंह 1777-1808 ई.तक शासन किए थे। इसके बाद उनकी रानी रणजीत कुँवरि 1808-1813 ई. तक रियासत के शासन प्रशासन का संचालन किया था। संतान न होने के कारण राजा श्रीप्रकाश सिंह 1813-1840 ई. में दत्तक पुत्र के रूप में उनवल से यहां लाए गए थे। इसके बाद 
राजा महिपति सिंह तृतीय 1840-1863 ई. तक अंग्रेजों की कृपा से सत्ता का संचालन किया था।इसके बाद बांसी के राजा महेन्द्र सिंह को 1863 मेंउत्तराधिकार मिला था। उन्हें आगरा के दरबार में चैम्पियन आफ द स्टार आफ इण्डिया की उपाधि प्रदान की गई थी। उनकी मृत्यु 1668 में हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र राजा रामसिंह द्वितीय को 1863- 1913 को उत्ताधिकार मिला था। 1886 में दुराचरण के कारण महेंद्र सिंह को मिली उपाधि वापस ले ली गयी थी। परन्तु दस वर्ष बाद पुनः उपाधि लौटा दी गयी थी। राजा सार्वजनिक जीवन से अलग हट गये थे।उनकी सम्पत्ति उनके पुत्र लाल रत्नसेन सिंह द्वितीय 1913-18 को उत्तराधिकार में मिला था। यह राज्य इस समय अपनी उन्नति की अवस्था में था। 1907 में संपूर्ण संपत्ति बांसी में 76,338 एकड़ , रसूलपुर में 16,435 एकड़ , बस्ती में 12,110 थी। इसमें बस्ती और मगहर और गोरखपुर के बड़ी संख्या के गांवों को अपने अधीन कर लिया था। राजा की ननकार की भूमि राजस्व मुक्ति थी और यह लगभग 86 गांवों में थी। इनमें 25 गांवों में स्वयं राजा के कब्जे थे।शेष उनके करिन्दों व सहायकों के कब्जे थे। उन्हें इस सम्पत्ति के उप भू स्वामियों से कर प्राप्त होता था।
    इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह द्वितीय 1913-1918 थे। जिनके कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे। वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमसन आने वाले थे जो क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा करने वाले थे। उन लोगों का चन्दो ताल के आस पास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय इस्टेट सीतारामपुर के दोनोंदरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर इस्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय इस्टेट के धर्मराज और महराजराम को इस्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय इस्टेट की मान्यता दी गई थी। -(डा.मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)
महराजराम उपाध्याय इस्टेट प्रमुख के साथ आनरेरी मजिस्ट्रेट भी बने 
महराजराम आनरेरी मजिस्ट्रेट की शक्ति का उपयोग करते थे। महाराज राम के पिता साहबराम दरोगा थे। उनके इकलौते पुत्र महाराज राम उपाध्याय आधे के हिस्सेदार थे। इनके पाँच पुत्र परमेश्वरनाथ ईश्वरनाथ केदारनाथ, तमेश्वरनाथ और चन्द्रिका प्रसाद हुए। महराजराम का शुरू का जीवन बड़ा सुखमय था। इनकी दो शादियां हुई थीं। पहली से परमेश्वर नाथ, ईश्वर नाथ, केदार नाथ और तमेश्वर नाथ नामक चार पुत्र और दूसरी पत्नी से चंद्रिका प्रसाद अकेले पुत्र थे। इस प्रकार यह एक बड़े परिवार के मुखिया थे। उनके प्रयास से पांच-पांच बहुएं सहित 44 पारिवारिक सदस्य एक साथ रहते थे। ये लगभग 1948 ई तक जीवित रहे। ये चार पांच दिन के उपरांत पोखरनी इस्टेट जाया करते थे, जहां इनका काफी सम्मान था। वे अपने पांचों पुत्रों के साथ मिलकर उपाध्याय इस्टेट को अच्छी तरह से संभाल लिए थे।
      परमेश्वर नाथ के दो पुत्र रामबरन व राम सुन्दर घर के विशिष्ट जिम्मेदार व्यक्ति थे। ईश्वरनाथ के कोई पुत्र नहीं था उनकी पत्नी का नाम श्रीमती श्यामराजी था जो 1980 में दिवंगत हुई। वे इस परिवार की वफादार गृहणी थी । यद्यपि इनको जायदात का पाँचवाँ भाग मिला हुआ था, किन्तु इन्होंने परिवार के चारों भाई के लोगों को अपना सम्पूर्ण हिस्सा दे दिया था। केदारनाथ के दो पुत्र डॉ. मुनिलाल और वशिष्ट प्रसाद हुये। केदारनाथ के समय में खानदान का ऐसा गौरव बढ़ा कि क्षेत्र के बड़े-बड़े जमीनदार घरानों की समता में कुल का स्थान स्थापित हो गया था।
परमेश्वरनाथ पहले पुलिस फिर कांग्रेस में शामिल 
1920 से 1950 तक इनके पुत्रों का समय विकासोन्मुख रहा। परमेश्वर नाथ पुलिस की सेवा में थे । बाद में नौकरी छोड़ घर आकर अपने पिता जी के निर्देशन में अपने भाइयों के साथ खेती कराने लगे थे। 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर परमेश्वर नाथ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिए थे । कांग्रेस की मदद करने पर इन्हें खोजने प्रायः पुलिस आया करती थी। ये खुद और अपने पुत्र राम बरन को “सिसवारी रघुबीर सिंह” नामक गांव में आवास बनाकर सीरवारी करते थे। यह गांव बहादुरपुर ब्लाक मुख्यालय से एक किमी. की दूरी पर स्थित है। परमेश्वर नाथ ने इस्टेट का मुकदमा व जमीनदारी की वसूली तहमीन अपने हाथ में लिया था। पूरा परिवार विकास की कड़ी को मजबूत करने में एक दूसरे का सहयोग करने में लगा हुआ था।
   ईश्वरनाथ चौड़ी छाती, बड़ी मूछ वाले, बलवान और पहलवान थे। इनकी कोई संतान जीवित ना बच सकी थी। केदार नाथ और तमेश्वर नाथ का झुकाव कृषि के तरफ था। इसी समय पोखरनी में भूपेंद्र प्रताप नारायण का समय था। इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद जी थे। ये पहलवान और खूब ताकतवर थे। ये उपाध्याय इस्टेट की शान थे। इस प्रकार महराज राम के पांचों पुत्रों ने उपाध्याय स्टेट की जिम्मेदारी बखूबी निभानी शुरू कर दी थी।
ईश्वरनाथ अल्पायु लेकर आए थे 
ईश्वरनाथ 42 साल में ही अपना भौतिक शरीर छोड़ साकेत वासी हो गए थे। नगर के राजा रूपेन्द्र नारायण भी सांत्वना देने के लिए पिता महराजराम के पास आए थे। उनकी विधवा पत्नी ने अपना अलग हिस्सा लेने से मना कर दिया था और उसे अपने संयुक्त परिवार में ही बांट दिया था। ईश्वनाथ की मृत्यु से उपाध्याय परिवार काफी दुःखी था। सभी भाई जब भी कोई मामला आता उनको यादकर रोने लगते। विशेषकर केदारनाथ जो भावुक व्यक्ति थे। ऐसा दुखी हुए कि उनकी चेतना भगवत भक्ति की तरफ उन्मुख हो गयी।महराजराम और उनकी पत्नी ऐसे शोक सागर में डूबी कि उनकी मानसिक स्थिरता कमजोर हो गयी। 



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