उपाध्याय इस्टेट के चन्द्रिका प्रसाद के तीन पुत्र हुये - .जिसमें कपिलदेव, सर्वदेव, रंगीलाल में दो भाई आज भी मौजूद हैं। सर्वदेव दिवगंत हो चुके हैं।
कपिलदेव परिवार के सबसे प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। इन्होंने 1947 में मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण किया था। महराजराम के परिवार में कपिलदव उपाध्याय बड़े भाई है और अवस्था में 'सरस' जी से वर्ष बड़े हैं। उन्होंने गांव में सर्वप्रथम हाईस्कूल किया। ये कुशाग्र बुद्धि के थे । उस समय हाईस्कूल नहीं था इसलिये इनकी पढाई आगे नहीं हो सकी और प्रारम्भ में घर पर खेती का कार्य करने लगे। बाद में ये प्रदेश सरकार के बीज भण्डार में सुपरवाइजर बन गए थे। कुछ दिन इन्होंने लगान वसूली में प्रदेश सरकार के अमीन भी थे। इसलिये गाँव के लोग इनको “अमीन साहब” कहने लगे थे।
पारिवारिक बटवारा -
सन् 1956 में महराज राम के पुत्रों में बटवारा पेश हुआ और लेखपाल बरीलाल के नेतृत्व में बँटवारा पाँच भागों में किया गया उस समय चार भाई परमेश्वरनाथ, केदारनाथ, तमेश्वरनाथ, चन्द्रिका प्रसाद चारों भाई बँटवारे में मैजूद ही थे। पाँचवां हिस्सा बाबा महराजराम के आदेशों का पालन करते हुये श्रीमती श्यामराजी का लगा जो दिवंगत ईश्वरनाथ की धर्म पत्नी थीं। दुबरी लाल लेखपाल काफी प्रबुद्ध थे। उन्होंने बंटवारा करके सभी फरीकों को अपना-अपना कब्जा दिलाकर घर में गृहकलह की पूर्णतया लड़ाई होने से बचा लिया।
जिस समय बंटवारा हुआ उस समय 1950 से 1955 तक का समय महराज रामजी पट्टी का सर्वोच्च उत्कर्ष का समय था गाँव जवार पट्टीदार हाकिम हुक्काम सबमें परमेश्वरनाथ व केदारनाथ का सम्मान था। बंटवारे से गृह कलह की अशान्ति ये दोनों लोग नहीं देख सके। और सन् 1956 में परमेश्वर नाथ जी दिवंगत हो गये उनके दिवंगत हो गए, तदोपरांत केदारनाथ बेचैन हो गये थे। जहाँ जाये रोते हुये यही कहते थे,”बाबू चले गये।” एक वर्ष के अन्दर बेचैन,केदारनाथ 12 अक्टूबर 1957 को घर का बोझिल भार डा. मुनि लाल उपाध्याय पर सौंपकर दिवंगत हो गये।
बाबू रामबरन और राम सुन्दर ने जो पहले से घर के प्रतिष्ठित मेम्बर थे, ने अपनी गृहस्थी मजबूत की। रामबरन जी के पुत्र गंगाशरण इण्टर पास होकर सोसाइटी में नौकरी कर रहे हैं। उनके पुत्र शेवेष बी. ए. करके अपना कारोबार फैला रहे हैं। तमेश्वरनाथ के वंशमणि पुत्र थे जो सर्पदंश से 1960 के आसपास दिवंगत हो गये थे। उनके दो पुत्र बालकृष्ण और गोपालकृष्ण भी अपने परिवारिक उत्थान में लगे हुये है। गोपाल कृष्ण एक प्रतिभाशाली जिन्होंने अपने परिश्रम के बल पर परिवार में अच्छा नाम किया है। वे हेल्थ विभाग नवयुवक है में सुपरवाइजर पद से सेवामुक्त हुए हैं तथा एक सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में जन सेवा में गांव में ही जमे हुए हैं। वे परिवार के प्रति शुभेच्छु रहते हैं। नीति मर्यादा का ध्यान रखते हुये संयम से रहते हैं।
कपिलदेव उपाध्याय ने पारिवारिक स्तर को खूब बढ़ाया-
खानदान के कपिलदेव उपाध्याय ने अलग होने के उपरान्त पारिवारिक स्तर को खूब बढ़ाया। उन्होंने चन्द्रिका प्रसाद के नाम को खूब रोशन किया। कोआपरेटिव सुपरवाइजर के पद से सेवा निवृत्त होकर अब गाँव में घर पर पारिवार के साथ रह रहे है। इनका पारिवारिक जीवन बहुत सुखी है।
इनके एक मात्र पुत्र सरस्वती प्रसाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अस्पताल शाखा में स्वास्थ्य निरीक्षक के पद से सेवामुक्त होकर गांव की विरासत संभाल रहे हैं जो एक सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
सरस्वती प्रसाद के ज्येष्ठ पुत्र डॉ. नीरज उपाध्याय का चयन डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्व विद्यालय, सागर मध्य प्रदेश परफोर्मिंग आर्ट विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर हुआ है। डॉ. उपाध्याय के कई सारे शोध पत्र विभिन्न रिसर्च जनरल में प्रकशित हुए हैं। साथ ही राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शोध पत्र शामिल हैं।
सरस्वती प्रसाद के दूसरे धीरज उपाध्याय इस्टेट की अपनी विरासत संभाल रहे हैं।
कपिलदेव जी के नेतृत्व में परिवार विकासोन्मुख रहा। यह परिवार क्षेत्र में
उपाध्याय वंश की पुरानी मर्यादा कायम करने में पूर्ण सक्षम रहा है। इनका सम्बन्ध क्षेत्र के अच्छे-अच्छे लोगों में है। कपिलदेव जी के छोटे भाई रंगीलाल उपाध्याय जो मुझ से दो वर्ष छोटे हैं। एम. एस.सी. एजी. करके विकास खण्ड में ए.डी.ओ. व फार्म मैंनेजर के पद से सेवा निवृत्त हुये है। यह काफी प्रतिभाशाली व मिलन सार व्यक्त्ति हैं । परिवार में इनका बड़ा सम्मान है। ये सदैव अपने पराये का बिना भेद किये गाँव पड़ोस के लोगों की मदद करते रहते हैं। गाना बजाना सुनने के शौकीन है। अच्छे स्वास्थ्य के व्यक्ति है। घर का रहन सहन अच्छे लोगों से जोड़कर रहते है। इनके दो आज्ञाकारी पुत्र इनकी सेवा में श्रवण कुमार के समान रहते हैं। इनके पुत्रों का नाम अशोक कुमार और अनिल कुमार है। एक स्वास्थ्य विभाग में फर्मासिस्ट हैं दूसरे एम. ए. प्राचीन इतिहास और पुरातत्त्व से करके पी-एच. डी. कर एक महाविद्यालय में पढ़ा रहे हैं। दोनों पुत्रों के सहयोग से इनका पूरा परिवार विकसित और प्रगतिशील है। रंगीलाल जी से बात करने पर ज्ञात हुआ कि हमारे परिवार की बहुयें परिवार के प्रति वफादार व मेल जोल से रहने से प्रसन्न रहती हैं। इसलिये मैं परिवार से बहुत स्वतन्त्र और खुश हूँ।
-(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' कृत “इतिवृत्त कथा” पृष्ठ 76,77,78 एवं 79)
प्रस्तुतकर्ता:
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,
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