असाधारण प्रतिभा सम्पन्न लक्ष्मन दत्त
पंडित सीता राम जी के तीन पुत्र - लक्ष्मन दत्त मनोज दत्त और इंद्र दत्त थे। लक्ष्मन दत्त (1820- 1890 ई.)अजानुबाहु थे।
अजानुबाहु एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "जिसकी भुजाएं घुटनों तक लंबी हों"। यह शब्द आमतौर पर एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जो शारीरिक रूप से मजबूत, शक्तिशाली और वीर होता है। भारतीय संस्कृति में, अजानुबाहु को अक्सर देवताओं, राक्षसों, योद्धाओं और राजाओं से जोड़ा जाता है। यह माना जाता था कि इन व्यक्तियों में असाधारण शक्ति और शारीरिक क्षमता होती थी, जो उनकी लंबी भुजाओं द्वारा दर्शायी जाती थी। भगवान राम को लम्बी भुजाओं के कारण इस नाम से पुकारा जाता था। महाभारत में भीम और वर्तमान समय में महात्मा गांधी को अजानुबाहु के रूप में वर्णित किया गया है।
इसके अलावा अजानबाहू का एक और अर्थ होता है - अजं का अर्थ होता है हाथी, बाहु यानी हाथ। हाथी जैसे ताकत वाले को भी कहा जा सकता है। उदाहरण के तोर पर जैसे छत्रपति शिवाजी,अर्जुन, जैसे लोकों के लिये भी इसका प्रयोग हुआ है। संक्षेप में कहना हो तो ज्ञान, कर्म और भक्ति यह तीन गुण जिसमें हो तो उसे अजानबाहु कह सकते हैं।
लक्ष्मनदत्त की अलग थी कद-काठी 1857 की स्वाधीनता के दौरान लक्ष्मन दत्त की आयु कोई 35 वर्ष की थी। वे सबसे अलग दिखते थे। उनकी भर्ती गोरखपुर में हुई थी। 200 लोगों में वे अपनी अलग पहचान बनाए रखे थे। इनकी ऊंचाई और स्वास्थ्य का कोई जवाब नहीं था । इनकी ऊंचाई 7 फिट सीना सवा गज और वजन लगभग दो मन था। ये लगभग 10 सेर दूध, एक सेर घी और एक सेर छुहारा, सवा सेर घी की पूड़ी खाते थे। एक पाव चना,एक पाव किसमिस रोज सबेरे खाते थे। भर्ती में आए किसी भी जवान से लड़ने के लिए तैयार थे। वे रस्साकसी में दस जवान को अकेले पिछाड़ देते थे। वे एक बीर सैनिक थे। वह भारतीय सैनिकों में सदैव चर्चित रहे।
– (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4, 5)
ब्रिटिश सेना में सूबेदार रहे लक्ष्मनदत्त
राजा उदय प्रताप नारायण सिंह (1812- 1857) बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 1890 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। ये पूर्व वर्णित गंगाराम के पुत्र सीताराम उपाध्याय के पुत्र थे। जिनको उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था।
हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” के प्रथम जमींदार
लक्ष्मणदत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय इस्टेट” की जमींदारी संभालते थे। इनका समय 1840 से 1910 के मध्य था। आज्ञाराम जी अपने चाचा लछिमन दत्त के सहयोग से ब्रिटिश हुकूमत में थानेदार के पद पर लगभग 40 वर्षों तक कार्य किये। लखनऊ इनका क्षेत्र था। ये एक तेज तर्रार दरोगा थे इन्हें हाकिम हुक्काम से लेकर उस समय के ताल्लुकेदार लोग खूब जानते व सम्मान देते थे। ये अरबी और फारसी के जानकार थे। अपने पिता के अत्यधिक प्यार को पाकर ये घर की जमीनदारी तक सीमित रह गये। इन्हें डाक्टर मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने सन् 1946 के आस-पास देखा था।- ( वहीं पृष्ठ 55)
आज्ञाराम से धर्मराज, साहबराम से महराजराम तथा हरिप्रसाद से गजराजराम, दौलतराम और छागुरराम पुत्र उत्पन्न हुए। इन सभी की उत्पत्ति 1875 ई. से 1900 ई. के मध्य हुई थी। लछमन दत्त के कोई सन्तान नहीं थी। इनके भाई मनोग दत्त और इन्द्रदत्त के सन्तानें थीं। यहीं से उपाध्याय वंश का हिस्सा दो फलकों में आधा-आधा हो गया। इन्द्रदत्त के पौत्र महाराजराम का पूरी सम्पत्ति में 1/2 भाग और मनोग दत्त के पुत्र आज्ञाराम के पुत्र धर्मराज तथा हरिप्रसाद के पुत्र गजराज राम, दौलतराम, छांगुनराम 1/4, के हिस्सेदार हुए।
दोनों थानाध्यक्षों का कार्यकाल 1890 में जिस समय अपने परिवार के चरम विकास पर था उसी समय इस वंश में अलग होने का भेद उत्पन्न हो गया और महराजराम, धर्मराजराम और गजराज राम आदि का परिवार तीन खण्डों में विभक्त हो गया। इस उपाध्याय वंश का चरमोत्कर्ष काल 1885 में यह क्षेत्र चर्चित था। दोनों दरोगा अक्सर अपने घोड़ों से गाँव पर एक साथ आते थे। हरि प्रसाद जी इस उपाध्याय इस्टेट के पारिवारिक मुखिया थे। -- (डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10)
लक्ष्मन दत्त ने पोखरनी का राजमहल तैयार करवाया था
राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की थी। उपाध्याय इस्टेट के रिटायर्ड सूबेदार लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा बने हुए थे।
1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राजकोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजनकर उन्हें राजा के पद पर अभिषेक कराया।
लाल रूपेंद्र नारायण सिंह के समय में उपाध्याय इस्टेट ने राजा पद वापस दिलवाया
1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया था। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए उपाध्याय इस्टेट के उनके उपरोहित ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हुए थे। कचूरे इस्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबर सलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए थे। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए। -(डा. मुनिलाल उपाध्याय 'सरस' की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)
इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर लिया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया। - (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)
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