Tuesday, January 23, 2024

सुभाष चंद्र बोस की जयन्ती पराक्रम दिवस के रूप में ✍️ आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी


जन्म और परिचय 
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम ‘जानकीनाथ बोस’ और माँ का नाम ‘प्रभावती’ था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।
राजनीति:-
1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।
कांग्रेस अध्यक्ष:- 
1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस ‘विद्रोही अध्यक्ष’ ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।
आज़ादी के लिए प्रयास:-
इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।
सक्रिय राजनीति में:
सक्रिय राजनीति में सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का। नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है। 
शादी और परिवार:- 
सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं। नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।
आज़ाद हिन्द सरकार:- 
‘नेताजी’ के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ की स्थापना की तथा ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” दिया।
मौत के कारणों पर विवाद :-
18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। दुर्घटना में नेताजी मारे गए थे या फिर वह बच गए थे और सर्बिया चले गए थे? या फिर ‘विमान हादसा’ महज एक ‘आड़’ थी उन्हें सुरक्षित निकल जाने देने के लिए? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो 70 सालों से भारतीयों का, खासकर बंगालियों का, पीछा कर रहे हैं, उन्हें परेशान कर रहे हैं। लेकिन, रहस्य है कि बेपर्दा होने का नाम ही नहीं लेता। नेताजी के वारिसों का एक धड़ा (जिसमें उनकी बेटी अनिता फाफ भी शामिल हैं) और सुभाषचंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के कुछ बुजुर्ग योद्धा मानते हैं कि विमान हादसे में नेताजी की मौत हुई थी और उनकी अस्थियां टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में सुरक्षित रखी हुई हैं। नेताजी के परिजन, प्रशंसक, शोध करने वाले हादसे की इस कहानी से सहमत नहीं हैं। अनिता फाफ 2013 में कोलकाता आई थीं। उन्होंने कहा था, ‘यह नेताजी के लिए शानदार घर वापसी होती। उनकी अस्थियां भारत लाई जातीं और उन्हें यहां गंगा में प्रवाहित किया जाता।’नेताजी के वंशज और हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सौगत रॉय भी यही मानते हैं कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई थी। वह इस हादसे में जिंदा बच गए लोगों की गवाही का पुरजोर हवाला देते हैं। नेताजी के मामले की जांच शाहनवाज खान समिति (1956), जी.डी. खोसला समिति (1970) और एम.के. मुखर्जी आयोग (2006) ने की। जांच तो हुई, लेकिन नतीजा नहीं निकला। शाहनवाज खान समिति और जी.डी. खोसला समिति ने माना कि विमान हादसे में नेताजी की मौत हुई थी, लेकिन मुखर्जी आयोग ने इस बात को खारिज कर दिया कि नेताजी की मौत किसी हादसे में हो चुकी है। इस मामले में शोध करने वाले और लेखक अनुज धर मुखर्जी आयोग के नतीजों से सहमत हैं। धर ने कहा, ‘मुखर्जी आयोग को और मुझे भी भेजे गए पत्र में ताइवान के अधिकारियों ने यही कहा है कि 18 अगस्त, 1945 को कोई हादसा नहीं हुआ था।’उन्होंने कहा, ‘ऐसी कई गोपनीय फाइलें हैं, जो साबित कर देंगी कि विमान हादसे की बात जापानियों और नेताजी ने जान बूझकर फैलाई थी ताकि उन्हें सोवियत रूस निकल जाने का मौका मिल सके।’
          नेताजी की सहयोगी रह चुकीं लक्ष्मी सहगल इससे सहमत नहीं थीं। उनका कहना था कि विमान हादसा और उसमें नेताजी की मौत एक सच्चाई है। इसका रिकॉर्ड इसलिए नहीं है, क्योंकि हारने से पहले जापानियों ने अपने युद्ध अपराधों पर पर्दा डालने के लिए सभी दस्तावेज नष्ट कर दिए थे। नेताजी के विमान हादसे के दस्तावेज इसी की भेंट चढ़ गए।अब नेताजी के घरवालों और उनके चाहने वालों की मांग है कि केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार इस मामले से जुड़ी सभी फाइलों को सार्वजनिक करे। इससे साफ हो जाएगा कि विमान हादसे में मरने वाला एक जापानी सैनिक इचिरो ओकुरा था, न कि नेताजी।नेताजी के सहयोगी कर्नल हबीबुररहमान ने शाहनवाज समिति से कहा था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई थी। कहते हैं कि आखिरी वक्त में कर्नल रहमान, नेताजी के साथ थे और हादसे में बच गए थे। लेकिन हादसे की कहानी से असहमत लोगों का कहना है कि कर्नल रहमान ने सच नहीं बोला और उन्होंने ऐसा नेताजी के कहने पर ही किया। नेताजी के बड़े भाई शरत चंद्र बोस ने कर्नल रहमान से पूछताछ की थी। शरत चंद्र बोस के पोते चंद्र कुमार ने अपने पिता अमीय नाथ के हवाले से बताया, ‘शरत चंद्र बोस ने घंटों कर्नल रहमान से विमान हादसे के बारे में पूछताछ की थी और फिर उनकी बात को खारिज कर दिया था।’
नेताजी का स्मारक:- 
 लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने के लिए सरकार दिल्ली में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्मारक बनवाई है । राष्ट्रीय अभिलेखागार दिल्ली में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़ी 25 फाइलों को सार्वजनिक किया गया है और उन्हें वेब पोर्टल पर जारी किया गया है। उनकी जयंती को देशभर में पराक्रम दिवस के तौर पर मनाया जाता है।उन्होंने भारत के युवाओं को भारत के उस पराक्रम के साथ जोड़ने का काम किया है।
नेताजी की टाइटिल की चोरी- 
समाजवादी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बिना किसी भी प्रकार की समानता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की "नेताजी "टाइटिल की अपना लिया है। कुनबे के सभी सदस्य तथा अनुयायी आंख मुदकर सुभाष जी के टाइटिल की धज्जियां उड़ाते हैं। काश! देश के बुद्धिजीवी इस नकल को रोककर सुभाश बाबू का सम्मान को गिरने से बचाते ? उनके सम्मान में कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है--
ऐसा था सुभाष हमारा । 
ऐसा था सुभाष हमारा ।।
महल और चौबारा छोड़ा
तख्त ताज मीनारा छोड़ा।
निज मन का बंधन तोड़ा
अपना सुख वैभव छोड़ा।।1।।
ऐसा था …..
भारत मां के चरणों में
रणभेरी का तान छोड़ा।
तन पर खाकी पहन लिया
सिविल की नौकरी छोड़ा।। 2।।
ऐसा था…….
दुश्मन से टक्कर लेकरके
’जयहिन्द’ का नाद छोड़ा।
वह यहां रहा वह वहां रहा
जहां गया पहुंचा ना थोड़ा।। 3।।
 ऐसा था……
वह मांगा खून देश खातिर
सब कोई दो थोड़ा थोड़ा।
बदले में आजादी का वाद
सबसे मांगा और जोड़ा।। 4।। 
ऐसा था…….
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)

Sunday, January 21, 2024

बढ़ता जा जलवा यू पी में -- आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


हैं    राम     हमारे    यू   पी  में
हैं   श्याम    हमारे    यू  पी  मे

 दशरथ मख भूमि है यू पी में
शांता सृंगीनारी यू पी में।

सृंगी ऋषि आश्रम यू पी में
भरत नंदी ग्राम है यू पी में।

विंध्याचल देवी यू पी में
पाटन देवी भी यू पी में।

शिव  की  काशी  है  यू  पी  मे
रहते    सन्यासी   यू   पी   में।

ब्रज  का  पनघट  है  यू  पी  में
गंगा   का   तट   है   यू  पी  में

यमुना की अठखेली यू पी में
 पाप नाशनी गंगा यू पी में।

 प्रेमाश्रु सरयू बहे यू पी में 
गोमती का क्रंदन यू पी में।

भारद्वाज का आश्रम यू पी में
भृगु का आश्रम हैं यू पी में।

अचिरावती राप्ती यू पी में
गोमती की धारा यू पी में।

व्यास का आश्रम यू पी में 
बाल्मीकि बिठूर है यू पी में
सप्तऋषि भृगु आश्रम यू पी में।
नैमिष का तीरथ है यू पी में।

बाबा बटेसर हैं यू पी में
गाज़ी बाबा हैं यू पी में।

मजार कबीर है यू पी में
बुद्ध भगवान है यू पी में।

वशिष्ठ का आश्रम हैं यू पी में
विश्वामित्र  भूमि है यू पी में।

मत्स्य अवतार हुआ है यू पी में
परशुराम अवतार भी यू पी में।

रामानन्द संस्थापक यू पी में 
रसखान रहीम भी यू पी में।

गौतम बुद्ध की धरती यू पी मे
विरुधक का शासन यू पी में।

प्रसेन जीत राजा था यू पी में
गोरख की वाणी यू पी में।

सन्त रविदास हुए थे यू पी में 
राधा स्वामी भी यू पी में।

खुसरो अमीर थे यू पी में 
परमहंस योगानंद यू पी में।

कबीर की साखी यू पी में।
आदिनाथ की साधना यू पी में।

स्वामी करपात्री यू पी में 
स्वामी नारायण यू पी में ।

केशव का पांडित्य यू पी में 
जायसी की सूफी यू पी में ।

सूरदास  पद रचे यूपी में
तुलसी रामायण यू पी मे।

देवरहवा बाबा यू पी में 
रामभद्राचार्य भी यू पी में।

वेदों   की   वानी    यू   पी    में
झांसी   की   रानी   यू   पी   में।

शामे अवध रहा यू पी में
बनारस की सुबहे यू पी में ।

मंगल पाण्डेय थे यू पी में
चंद्रशेखर आजाद भी यू पी में।

आचार्य नरेंद्र देव थे यू पी में 
गणेश शंकर विद्यार्थी यू पी में ।

पंत गोविन्द बल्लभ यू पी में 
कमला पति त्रिपाठी यू पी में।

हेमवती नन्दन बहुगुणा यू पी में 
नारायण दत्त तिवारी यू पी में।

नाना जी देशमुख यू पी में
अटल जन्म भूमि है यू पी में।

कल्याण का जलवा यू पी में 
टंडन दास पुरुषोत्तम यू पी में

लोहिया राम मनोहर यू पी में 
सहजानंद सरस्वती यू पी में।

लाल जवाहर नेहरू यू पी में 
शास्त्री लाल बहादुर यू पी में 

मदन मोहन मालवीय यू पी में
इंदिरा गांधी थी यू पी में
    
अटल बिहारी का घर यू पी में
चंद्र शेखर भी थे यू पी में।

बहन मायावती थी यू पी में
मुलायम अखिलेश हैं यू पी में।

 हैं   सभी   सयानें    यू   पी   में
हैं   देश    दिवानें   यू    पी   में।

हम  हिन्दू   जिस   दिन  ठानेंगे
हम    अपनीं    करके    मानेंगे।

श्री  राम    नगरिया    न्यारी  है
मथुरा   काशी    की   बारी   है।

मोदी   का     मेला   यू   पी  में
योगी   का     खेला   यू  पी  में।

अद्भुत   अपनापन   यू   पी  में
अद्भुत    अल्हड़पन  यू  पी  में।

 दशरथ    के   नंदन  यू   पी  में
यशोदा  के  नंदन   यू    पी  में।।

जिनको   बस  सत्ता   प्यारी है
यू  पी  उन   सब  पर  भारी  है।

सम्मान    मिलेगा   यू    पी  में
फिर फूल खिलेगा  यू  पी में।

हम       उदासीनता     त्यागेंगे
घर   छोड़    विभीषण  भागेंगे।

 यह  यू    पी   है   इंसानों   का
 यह  यू   पी   है   भगवानों का।

यह यू पी है विद्वानों का
यह यू पी बीर जवानों का।

बुलडोजर चलता यू पी में।
सब क्राइम भगता यू पी में।

गुंडे प्रदेश को छोड़ रहे
उद्योग प्रदेश में आने लगे।

उत्तर प्रदेश बन रहा है उत्तम 
सनातन प्रदेश बन गया यू पी में।
कवि आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी का परिचय:-
(कवि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)

अष्टाचक्रा दिव्य अयोध्या ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

अयोध्या वैकुंठ नगर है :- 

अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी सम्पन्नता की तुलना स्वर्ग और मानव शरीर के आत्म तत्व परम पिता परमेश्वर से की गई है। जो देवताओं, राक्षसों,शत्रुओं तथा पातक समूह से जीती ना जा सके उसे अयोध्या कहते हैं। अर्थात सत्व गुण विष्णु, रजो गुण ब्रह्मा और। तमो गुण शंकर से परे गुणातीत अवध धाम कहलाता है। ब्रह्मांड स्थित अवध या अयोध्या ही भूतलपिण्ड स्थित अयोध्या धाम है। भगवान ने गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में स्वम कहा है --
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि।
त्रिविध ताप भव रोग नसावनि।।
   आगे पुनः गोस्वामी तुलसीदास ने इसकी महत्ता इन शब्दों में की है --
जद्यपि सब वैकुंठ बखाना। 
बेद पुरान विदित जगु जाना।
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ।
यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
    राष्ट्र कवि राम धारी सिंह दिनकर ने भी कहा है --
है अयोध्या अवनि की अमरावती
इंद्र हैं दशरथ विदित वेदव्रती।
वह मृतकों को मात्र पार उतारती
यह जीवितों को यही से तारती।।
        "अयोध्या दर्शन" गीता प्रेस , गोरखपुर से प्रकाशित पुस्तक में पण्डित श्री रामकुमार दास जी के आलेख "साकेत -- दिव्य अयोध्या" के पृष्ठ 57- 58 पर भगवान राम के अष्टाचक्र अयोध्या का वर्णन किया है। जो अथर्ववेद के दसवें कांड के दूसरे सूक्त के 27 से 33 तक सात मंत्रों और कुछ अन्य संपूरित साक्ष्यों के आधार पर निर्मित किया गया है। इसी प्रकार कुछ भिन्नता लिए एम.सी. जोशी ने अयोध्या का उल्लेख करने का दावा तैत्तिरीय आरण्यक श्लोक में किया गया है, जो अथर्ववेदइ से कुछ भिन्नताओं के साथ पाया गया है ।
अष्टचक्र नवद्वार देवानां पूरयोध्या
तस्यं हिरण्यकोष:
स्वर्गो लोको ज्योतिषावतार यो वै तं ब्राह्मणो वेदमृतेनावृत: ॐ पुम् तस्मै ब्रह्मा च
ब्रह्मा च आयुः कीर्तिं प्रजां दादूः विभ्रजमानाम्
हरिणि यशसा सपरिवृतम्
पुरं हिरण्ययि ब्रह्मा विवेशपराजितम्।
अनुवाद :देवताओं की नगरी अयोध्या (अभेद्य) में आठ मंडप (चक्र भी) और नौ प्रवेश द्वार हैं; इसके अंदर स्वर्ण खजाना -गुंबद, दिव्य संसार है, जो हमेशा के लिए प्रकाश (उत्तरी ध्रुव) से प्रकाशित होता है। जो कोई भी इसे रचनाकार के अमृत से चित्रित करता है, उसे शहर के रूप में जाना जाता है,उसे ब्रह्मा (सूर्य) और ब्रह्मा (चंद्रमा) द्वारा लांग आयु, औपचारिक और संत प्राप्त होंगे।इस शहर में हमेशा चमकते, चमकते और यश (प्रसिद्धि और चमक) से निर्माता ने एंट्री की है। अब अथर्ववेद का वर्णन देखें --

तद्वा अथ॑र्वण: शिरो॑ देवकोश: समु॑ब्जित: ।
तत्प्राणो अभि र॑क्षति शिरो अन्नमथो मन॑: ॥
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 27)

अथर्व प्रजापति द्वारा प्रदत्त सिर शीर्ष भाग सरलता से विद्यमान है। वह दोनों का सुरक्षित खजाना है। उस सिर का संरक्षण प्राण अन्न और मन करते हैं। शिर मस्तिष्क का असाधारण सामर्थ्य ऋषि जानते समझते रहे हैं। उसके दिव्य संपदाओं का अक्षय भण्डार मानते रहे हैं। अत्र प्राण और मन उसके क्रमशः स्थूल सूक्ष्म और कारण तंत्र के संरक्षण हैं।
           आगे के मन्त्रों में दिव्य अयोध्या नगरी के उपलक्षण से ब्रह्मांड एवम शरीर रूपी आवास को विलक्षण विशेषताओं तथा उनके निवासी दिव्य पुरुष का वर्णन है।

ऊर्ध्वो नु सृष्टा३स्तिर्यङ् नु सृष्टा३:0 सर्वा दिश: पुरु॑ष आ ब॑भूवाँ३ ।
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 28)

जो पुरुष ब्रह्म की नगरी के ज्ञाता हैं , जिसके कारण ही उसे पुरुष ही कहा गया है , पुरुष ऊपरी दिशा तिरछी दिशा तथा सभी दिशाओं में उत्पन्न होकर अपने प्रभाव का परिचय देते हैं। ऋषियों का यह नियंत्रण और सृजन शील चेतन तत्त्व सभी प्रधानों -- सभी दिशाओं में दिखाई देने लगता है।

"पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते ॥
यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्। 
तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः ॥"
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 29)

" जो कोई ब्रह्म के अर्थात परात्पर परमेश्वर, परमात्मा , जगदादि कारण, अचिंत्य वैभव श्री सीतानाथ रामजी के
 पुरी को जानता है उसे भगवान और भगवान जी के पार्षद --सब लोग चक्षु,प्राण और प्रजा देते हैं। इस पुरी के स्वामी को पुरुष कहते हैं। अर्थात जिसका प्रतिदिन नाम स्मरण किया जाता है,उस पुरुष की पुरी को जानने के लिए श्रुति कह रही है। जो कोई अनन्त शक्ति सम्पन्न सर्व व्यापक,सर्व नियंता,सर्वशेषी, सर्वाधार श्री रामजी की अमृत अर्थात मोक्षानंद से परिपूर्ण जो निश्चय के साथ उस अयोध्या पुरी  को जानता है। उसके लिए साक्षात ब्रह्मऔर ब्रह्म के सम्बन्धी अर्थात भगवान के - "हनुमान,सुग्रीव, अंगद, मयंद, सुषेण, द्विविद, दरीमुख,कुमुद, नील, नल, गवाक्ष, पनस, गन्ध मादन,विभीषण, जामवान और दधिमुख" --ये प्रधान षोडश पार्षद अथवा नित्य और मुक्त सर्वजीव मिलकर उत्तम दर्शन --शक्ति, उत्तम प्राण शक्ति अर्थात आयुष्य और बल तथा सन्तान आदि देते हैं।"

न वै तं चक्षु॑र्जहाति न प्राणो जरस॑: पुरा ।
पुरं यो ब्रह्म॑णो वेद यस्या: पुरु॑ष उच्यते॑ ॥
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 30)

"जिस पुरी का स्वामी परम पुरुष,कहा जाता रहा, अर्थात जिसका निरूपण सर्वत्र वेद शास्त्रों में किया जाता है और वहां भी 28वे मंत्र के पूर्व मंत्रों में जिस पुरुष का निरूपण किया गया है, परब्रह्म श्री राम की इस पुरी अयोध्या को जो कोई जानता है, उस प्राणी को दर्शन शक्ति --अर्थात बाह्य और आभ्यंतर नेत्र तथा शारीरिक और आत्मिक बल मृत्यु से पूर्व निश्चय ही नहीं छोड़ते।"
         आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, ब्रह्म की उस पूरी के नाम और रूप को स्पष्ट रूप से यह मंत्र बताता है --
अष्टाच॑क्रा नव॑द्वारा देवानां पूर॑योध्या ।
तस्यां॑ हिरण्यय: कोश॑: स्वर्गो ज्योतिषावृ॑त: ॥
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 31)

अयोध्या आठ आवरण पहियों वाला है, इसके प्रधान नौ दरवाजे हैं। जो दिव्यगुण विशिष्ट,भक्ति प्रपत्ति यम नियम आदि मान, परम भागवत चेतना से सेवनीय है। उस अयोध्या पुरी में बहुत ऊंचा अथवा बहुत सुन्दर जो प्रकाश पुंज से ढका हुआ सुवर्णमय मण्डप है। इस मंत्र में अयोध्या का स्वरूप वर्णन है। आठ चक्र और नौ द्वारों वाली यह अयोध्या देवों की पुरी है, उसमें प्रकाश वाला कोष है , जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है । मनुष्य का शरीर ही देवों की अयोध्या पुरी है | इसमें आठ चक्र हैं ।
प्रथम चक्र
अयोध्या पुरी के चारो ओर कनकोज्जवल दिव्य प्रकाशात्मक आवरण है, जो भीतर से निकलने पर और बाहर से प्रवेश करने पर प्रथम आवरण या प्रथम चक्र है।

ब्रह्मज्योतिरयोध्यायाः प्रथमावर्णे शुभम्।
यत्र गच्छनती कैवल्याः सोहमस्मीति वदिनः ।।
( वशिष्ठ संहिता 26 /1 साकेत सुषमा में उद्धृत)

अयोध्या के सर्व प्रथम घेरे में शुभ्र ब्रह्ममयी ज्योति प्रकाशित है। सोहम सोहम या अहम ब्रहमास्मी कहने वाले कैवल्य कमी पुरुष मरने पर इसी ज्योति में प्रवेश करते हैं।
उस आवरण में सर्वत्र दिव्य भव्य प्रकाशमात्र रहता है।
द्वितीय चक्र
बाहर से प्रवेश करने पर द्वितीय किंतु भीतर से निकलने पर
सप्तम आवरण या सप्तम चक्र है, जिसमे प्रवाहमाना सरयू जी हैं --
अयोध्या नगरी नित्या सच्चीनंद रूपिणी। 
यस्यानशंशेन वैकुंठो गोलोकादि: प्रतिष्ठितः।।
 यत्र श्री सरयू नित्या प्रेम वारि प्रवाहिणी। 
यस्यानशंशेन संभूता विरजा दिसरिद्वर:।।
(साकेत सुषमा लेखक पण्डित सरयू प्रसाद पृष्ठ 7)

अयोध्या नगरी नित्य है। वह सच्चीनंद स्वरूपा है। वैकुंठ और गोलोक आ भगवद्धाम अयोध्या के अंश के अंश से निर्मित हैं। इसी नगरी के बाहर सरयू नदी है। जिसमे श्री राम जी के प्रमश्रुओं का जल ही प्रवाहित हो रहा है। विरजा आदि नदियां इसी सरयू के किसी अंश से उद्भूत हैं। इसमें अयोध्या के 12 नाम बतलाए गए हैं।
साकेतके पुरद्वारे सरयू केलिकारिणी 
( बृहद ब्रह्म संहिता पाद 3, अध्याय 1)
उस अयोध्या के द्वार पर सरयू नदी कीड़ा करती रहती है।
तृतीय चक्र
बाहर से प्रवेश करने पर तीसरा किंतु भीतर से निकलने पर
छठा आवरण या चक्र है, जिसमे महा शिव ,महा ब्रह्मा, महेंद्र,वरुण,कुबेर,धर्मराज, दिकपाल, महासूर्य, महाचन्ड 
यक्ष गंधर्व किन्नर गुह्यक विद्याधर सिद्ध चारण अष्टादश सिद्धियां और नव निधियां दिव्य स्वरूप से निवास करती हैं।
चतुर्थ चक्र
बाहर से चौथा और भीतर से को पांचवा आवरण है उसमें 
दिव्य विग्रहधारी वेद, उपवेद पुराण उपपुराण ज्योतिष रहस्य, तन्त्र,नाटक,काव्य, कोश,ज्ञान,कर्मयोग ,वैराग्य,यम, नियम काल,कर्म और गुण आदि निवास करते हैं।
पंचम चक्र
बाहर से पांचवा और भीतर से चौथा आवरण है उसमें 
भगवान का मानसिक ध्यान करने वाले योगी और ध्यानी जन निवास करते हैं। साकेत के इस घेरे में विद्वान लोग उस सच्चिनमय ज्योति रूप ब्रह्म का निवास बतलाते हैं जो निष्क्रिय, निर्विकल्प निर्विशेष, निराकार, ज्ञानाकार, निरंजन वाणी का अविषय, प्रकृतिजन्य (सत्व रज आदि) गुणों से रहित, सनातन, अन्त रहित,सर्व साक्षी, सम्पूर्ण इंद्रियों एवम उनके विषयों की पकड़ में ना आने वाला,अपितु उन सबको प्रकाश देने वाला, संन्यासियों, योगियों तथा ज्ञानियों का लय स्थान है।
          इस आवरण में महा विष्णु लोक, रमा वैकुंठ, अष्ट भुज, भूमापुरुष का लोक, महा ब्रह्म लोक और महा शम्भु लोक है। गर्भोदकशायी और क्षीराब्धिशायी,भगवान विष्णु --ये सभी अयोध्या के चतुर्थ चक्र में रहकर उसी नगरी का सेवन करते हैं।
षष्ठम चक्र
जो बाहर से छठा और भीतर से तीसरा आवरण है उसमें 
मिथिला पुरी,चित्रकूट, वृन्दावन, महा वैकुंठ, अथवा भूत वैकुंठ आदि विराजमान है। सत्या के उत्तर भाग में भगवान विष्णु का महा वैकुंठ नामक सनातन परम धाम है, जिसका वेदों ने बखान किया है।
सप्तम चक्र
 जो बाहर से जाने पर सातवां और भीतर से निकलने पर दूसरा आवरण है उसमें दिव्य द्वादशोपवन एवम चार कीड़ा पर्वत हैं। साकेत के अंतर्गत शोभायुक्त श्री श्रृंगार वन, अदभुत विहार वन,, दिव्य परिजात वन, उत्तम अशोक वन, तमाल वन, रसाल (आम्र)वन, चम्पक वन, चन्दन वन, रमणीय प्रमोद वन,श्री नाग केशर वन, अनन्त वन, रम्य कदम्ब वन --ये बारह उपवन हैं।
       ( रुद्र्यामल अयोध्या भाग 30/48 -- 50 )
अष्टम चक्र
 अष्टम चक्र बाहर से जाने पर आठवां और भीतर से निकलने पर पहला आवरण है उसमें नित्यमुक्त भगवद पार्षद रहते हैं और भगवान के अनंतानन्त अवतार भी इसी में रहते हैं। साकेत के दक्षिण द्वार पर श्री राम के प्रति वात्सल्य भाव रखने वाले श्री हनुमान जी( द्वारपाल के रूप में) विराज मान हैं। उसी द्वार देश में संतानिक नाम का वन है, जो श्री हरि (श्रीराम) को प्रिय है। (अयोध्या दर्शन गीता प्रेस गोरखपुर के पृष्ठ 60 -- 64 के आधार पर)
         इस प्रकार ये आठ चक्र, अर्थात् नस नाड़ियों के विशेष गुच्छे इस शरीर में मज्जातन्तु के केन्द्र रूप है, इन चक्रों में अनंत शक्तियाँ भरी हैं। इस अद्भुत मानव शरीर के अनेक नाम शास्त्रों में वर्णन किये गये हैं, इसे ब्रह्मपुरी ब्रह्मलोक और अयोध्या भी कहते हैं।
शरीर के नवद्वार की तरह अयोध्या के भी नवद्वार –
ये नौ द्वार हैं, दो आँख, दो कान, दो नाभि का छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये आठवाँ गुद्दा द्वारा और नौवाँ मूत्र द्वार है। इन प्रसिद्ध नौ द्वारों वाली होने से इस नगरी का द्वारावती द्वार आदि भी नाम है। ये देवताओं या दिव्य गुण युक्त, आत्माओं के ठहरने का स्थान है। इससे रहने वाले समस्त जड़ और चेतन देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं। यहां अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में, वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।
     परम आत्म तत्व, भौतिक मानव शरीर और आयुर्वेद में एक जैसी रचना व्यवस्था है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में आठ चक्र होते हैं। ये हमारे शरीर से संबंधित तो हैं लेकिन हम इन्हें अपनी इन्द्रियों द्वारा महसूस नहीं कर सकते हैं। इन सारे चक्रों से निकलने वाली उर्जा ही शरीर को जीवन शक्ति देती है। आयुर्वेद में योग, प्राणायाम और साधना की मदद से इन चक्रों को जागृत या सक्रिय करने के तरीकों के बारे में बताया गया है। जिस प्रकार से शरीर में व्यवस्था होती है उसी प्रकार की व्यवस्था अयोध्या पुरी में भी की गयी। मानव शरीर (अष्टचक्राः) आठ चक्र और नौ द्वारों से युक्त देवों की अयोध्या कभी पराजित न होने वाली नगरी है । इसी पुरी में ज्योति से ढका हुआ, परिपूर्ण हिरण्यमय, स्वर्णमय कोश है यह स्वर्ग है। आत्मिक आनन्द का भण्डार परमात्मा इसी में निहित है।
(विभिन्न सांप्रदायिक ग्रन्थों में आवरनस्थ निवासियों के स्थानों में यत्र तत्र फेर भी है,परंतु तत्त निवासियों के नामों में हेर फेर नहीं है।)

तस्मि॑न्हिरण्यये कोशे त्र्यद्गरे त्रिप्र॑तिष्ठिते ।
तस्मिन्यद्यक्षमा॑त्मन्वत्तद्वै ब्र॑ह्मविदो॑ विदु: ॥
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 32)

उस विशाल सुवर्ण मय मण्डप में आत्मा के समान जो पूजनीय देव विराजमान है, उसी को ब्रह्म स्वरूप ज्ञानवान जन जानते हैं। अथवा विद्वान जन उसी यक्ष को --उसी परमोपास्य देव को परात्पर सनातन महापुरुष जानते हैं।जिस कोश में वह यक्ष विराजमान है,उसमे तीन अरे लगे हुए हैं। अर्थात सत चित आनन्द -- तीन अरों पर वह मण्डप बना हुआ है। तथा चित अचित् एवम ईश्वर तीनों में प्रतिष्ठित -- आदृत है।
इस मंत्र में स्पष्ट ही कहा गया है कि अयोध्या के मध्य में जो सुवर्ण मय मणि मण्डप है, उसमे विराजमान देव को ही विद्वान लोग ब्रह्म कहते हैं। अयोध्या के मणि मण्डप में भगवान श्री राम के अतिरिक्त अन्य कोई भी विराजमान नहीं है। अतः श्री राम जी ही परम ब्रह्म है। इसी अर्थ को पद्म पुराण उत्तर खंड अध्याय 228 में भी विस्तार से वर्णित किया गया है।
     भक्त लोग मर कर भगवान विष्णु के उस परम धाम वैकुंठ में जाते हैं जो नाना प्रकार के निवासियों से परिपूर्ण है। परम आनन्द दायक ब्रह्म वही है।वही भगवान श्री हरि का निवास्थान है।वह परकोटों, सात मंजिल महलों तथा रत्न जड़ित प्रसादों से घिरा हुआ है।उसी वैकुंठ धाम के मध्य में जो दिव्य नगरी है, वही अयोध्या नाम से विख्यात है। वह नाना प्रकार के मणियों और सोने के चित्रों से संपन्न है और परकोटो और द्वारों से घिरी हुई है।
      उस अयोध्या नगरी के मध्य में एक ऊंचा एवम दिव्य मंडप है, जो वहां के राजा का निवास स्थान है। उसके मध्य में एक आकर्षक और चमकीला सिंहासन है, जो अपने पायों के रूप में स्थित धर्मादि सनातन देवताओं से घिरा हुआ है।अथवा धर्म ज्ञान महैश्वर्य एवम वैराग्य -- इन पायों के रूप में स्थित है। अथवा पायों के रूप में क्रमश: ऋग्वेद, सामवेद यजुर्वेद और अथर्ववेद इन चारों वेदों के ही द्वारा वह सिंहासन घिरा हुआ है। शक्ति आधार शक्ति चिच्छक्ति और सदा शिवा --ये धर्मार्थ चार देवताओं की शक्तियां कही गई हैं।
       उक्त सिंहासन के मध्य में एक अष्ट दल कमल है जिससे प्रातः कालीन सूर्य की आभा निकलती है। उसके मध्य में कर्णिका भाग को सावित्री कहते हैं जिसपर समस्त देवताओं के स्वामी परातपर पुरुष विराजमान रहते हैं। जो नील कमल की पंखुड़ी जैसे वर्ण वाले हैं। उनमें करोड़ों सूर्यों का प्रकाश है। वे नित्य युवा कुमार भवापन्न भी रहते हैं। वे स्नेह युक्त सुकुमार प्रफुल्ल कमलवत आभा वाले और कोमल चरण सरोरुहों से सम्पन्न हैं।
        अष्टदल कमल विभिन्न रत्नों से घिरा हुआ है।उस पर विराजमान रघु श्रेष्ठ,वीर शिरोमणि, धनुर्वेद में निष्णात, मंगलायतन कमल लोचन श्री राम का ध्यान करना चाहिए।
     साकेत सुषमा में इसे और स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि --क्षीरसागर का बैकुंठ, रमा बैकुंठ, महा बैकुंठ, कारण
बैकुंठ और वीरजापार आदि वैकुंठ --इन पांचों बैकुंठों का
तथा अन्य अनन्त वैकुंठों का मूलाधार --"अयोध्या - साकेत" ही है। वह साकेत पुरी मूल प्रकृति से परे अखंड और अपरिवर्तनीय ब्रह्ममय है, विरजा के दूसरे तीर पर दिव्य मंडप वाली अयोध्या साकेत स्थित है। इसी अयोध्या में श्री सीताराम जी की नित्य विहार भूमि है।

प्रभ्राज॑मानां हरि॑णीं यश॑सा संपरी॑वृताम् ।
पुरं॑ हिरण्ययीं ब्रह्मा वि॑वेशाप॑राजिताम् ॥
(अथर्ववेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 33)

सर्वांतर्यामी श्री राम जी अत्यन्त प्रकाशमयी मन को हरण करने वाली अथवा सर्व पापों का नाश करने वाली तथा अनन्त कीर्ति से युक्त और सर्व पुरियो में अजेय उस अयोध्या पुरी में प्रविष्ट हैं अर्थात विराजमान हैं।
          इस सूक्त और ततसंपूरित अन्य साक्ष्यों में मानव शरीर, उसकी विशेषताओं, गुणों, ब्रह्मांड की प्रकृति और उसके अस्तित्व के संबंध में विभिन्न दार्शनिक प्रश्न उठाए गए हैं। "मनुष्य की अद्भुत संरचना" में मानव कैसा है। संरचना या शरीर. और वह शरीर इतना शक्तिशाली है कि यह किसी भी और सभी बाहरी नकारात्मक प्रभावों, ताकतों का विरोध करने में सक्षम है जो हमारे स्वयं के साथ-साथ ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने यानी मोक्ष प्राप्त करने और ब्रह्म के साथ एक होने में बाधा हैं।
           प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर बीबी लाल जैसे विद्वानों के अनुसार , इस संदर्भ में अयोध्या शब्द एक व्यक्ति वाचक संज्ञा (एक शहर का नाम) नहीं है, बल्कि एक विशेषण है, जिसका अर्थ है "अभेद्य" श्लोक मानव शरीर (पुर) को आठ चक्रों के रूप में वर्णित करता है और उसके द्वार के नौ छिद्र - (पृष्ठ 47)
      ऐसा देखने में आएगा कि व्हिटनी ने अयोध्या शब्द को व्यक्ति वाचक संज्ञा के अर्थ में नहीं, यानी शहर के नाम के रूप में नहीं, बल्कि दो भागों वाले एक यौगिक शब्द के रूप में लिया है। अ-योध्या। पहले भाग का नकारात्मक अर्थ है, और दूसरा उस धातु युद्ध से लिया गया है, जिसका अर्थ है पूरे शब्द का 'अभेद्य' होना। यह केवल सही व्याख्या है, यह उस संदर्भ से बिल्कुल स्पष्ट है जिसमें यह शब्द आता है।
       इस प्रकार उपरोक्त उद्धृत अथर्वेद दसवां कांड , दूसरा सूक्त मंत्र संख्या 31 का तात्पर्य यह है कि वह शरीर (पुर) जिसमें पुरुष रहता है वह अभेद्य (अ+योध्या) है, जिसमें आठ चक्र (अष्ट-चक्र) और नौ द्वार (नव-द्वार) हैं।
       मंत्र क्रमांक में वर्णित अयोध्या पुरी (नगर) 31 वास्तव में मानव संरचना है जिसे देवताओं का शहर या स्वर्ग कहा जाता है जिसे "ब्रह्मपुरी, ब्रह्म नगरी, अमरावती, देवनागरी और अयोध्या आदि" नामों से भी जाना जाता है। ये नाम वैदिक साहित्य में हमारी संरचना के लिए रूपक रूप से उपयोग किए जाते हैं। लेकिन पौराणिक ग्रंथों में, ये देवताओं के अलग-अलग निवास हैं।
     मंत्रों का उद्देश्य हमें यह संदेश देना है कि हमारा शरीर हम स्वयं हैं और हमारी संरचना छह बाधाओं जैसे किसी भी विकार के लिए अभेद्य है। हमारा शरीर एक महान गढ़ है और यदि हम स्वयं की विशेषताओं और शक्तियों का उपयोग करते हैं तो बाहरी विनाशकारी ताकतें इसे पकड़ने या तोड़ने में असमर्थ हैं। स्वर्ग जाने के लिए हम ज्यादा बाहर नहीं जाना चाहते। स्वर्ग स्वयं हमारे अंदर है क्योंकि परमात्मा उसमें निवास करता है। हमारा शरीर उसका निवास स्थान है, और इसीलिए यह पुरी (मानव शरीर) अभेद्य है।' हमें बस इस तथ्य को समझने की जरूरत है।
       प्रसिद्ध लेखक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा इस मंत्र की हिंदी व्याख्या यहां दी गई है । उनके सूक्त के अनुवाद से यह स्पष्ट है कि यह अयोध्या मानव शरीर है जिसमें ब्रह्मा निवास करते हैं और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।
          चैतन्य देवों में आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीति पूर्वक रहते हैं। इनमें परस्पर प्रेम की गंगा बहती है, किसी को किसी अंग से द्वेष नहीं, सबके काम बंटे हुये हैं। अपने-अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं। भुजायें सब शरीर की रक्षा के लिये सूचना मिलते ही दौड़ती है। मानव शरीर परस्पर युद्धों से रहित अयोध्या जैसा ही है। इस शरीर में 72000 नाड़ियाँ हैं, इनमें इग्ला, पिग्ला और सुषुम्ना तीन नाड़ियाँ विशेष हैं, ये तीन नाड़ियाँ मूलाधार चक्र से प्रारम्भ होकर समस्त शरीर में, अपना जाल सा बनाती हैं। जो पुरुष अपनी केन्द्र शक्तियों को जगाना चाहते हैं । जिस पुरुष ने जिस शक्ति को जगाया, उसने उसी से मनोवाँछित आनन्द प्राप्त किया। प्राचीन ऋषि, मुनि और देवताओं ने अधिकाँशतया अपनी अध्यात्म शक्तियों को जगाया था, इसीलिये तीनों काल, अर्थात् भूत, भविष्य व वर्तमान की बातों को जान लेना, अपनी इच्छानुसार शरीर बदल लेना, अपनी आयु को इच्छानुसार बढ़ा लेना तथा मोक्षादि सुख प्राप्त कर लेना उन्हें सब सुलभ होता था।
     लखनऊ से प्रकाशित संस्कृति पर्व पत्रिका "चक्रस्थ अयोध्या" विषय को प्रमुखता देते हुए नवम्बर 2023 का अपना अप्रतिम विशेषांक प्रकाशित कर रहा है। इसके दिव्य प्रधान संपादक श्री हनुमान जी महाराज हैं। नियमित संपादक डॉ. संजय तिवारी ,संस्थापक ,"भारत संस्कृति न्यास" हैं। भारत की आधुनिक संत परंपरा के देदीव्यमान नक्षत्र , अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री पूज्य स्वामी जीतेंद्रानंद जी सरस्वती के अभिभावकत्व एवं निर्देशन में अब संस्कृति पर्व का "चक्रस्थ अयोध्या" अंक अपना स्वरूप ग्रहण कर रहा है। इस अतिविशिष्ट अंक में वह सब कुछ प्राप्त होगा जो उत्सुकता के साथ कोई भी श्री अयोध्याजी और श्री रामजन्म भूमि के बारे में जानने की इच्छा रखते हैं। इस अंक के संपादकीय संरक्षक पद्मश्री आचार्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी हैं। "चक्रस्थ अयोध्या" संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में निरंतर प्रयत्नशील मासिक पत्रिका संस्कृति पर्व ने श्री अयोध्या जी में 22 जनवरी 2024 को भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर निर्मित भव्य श्रीराम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा एवं लोकार्पण के अवसर पर एक अति विशिष्ट अंक प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। "चक्रस्थ अयोध्या"शीर्षक के इस अंक में अतिविशिष्ट सामग्री प्रस्तुत की जा रही है। मेरे जैसे अन्य अनेक विद्वान इस अंक में सहयोग कर रहे हैं। यह अंक निश्चय ही ऐतिहासिक और संग्रहणीय बन रहा है। मेरी अंतः उर से शुभकामनाएं इसके साथ है। इस अंक में जिन विषयों को समायोजित करने का लक्ष्य है उनमें कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं_
 1. श्री अयोध्या जी का उद्भव और महात्म्य
 2. श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास 
 3. श्री राम जन्मभूमि आंदोलन का 500 वर्षों का संघर्ष
 4. श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के निमित्त न्यायिक प्रक्रिया
 5. श्रीराम जन्म भूमि के ऐतिहासिक प्रमाण
 6. श्रीराम जन्मभूमि की प्राप्ति के लिए समाज का बलिदान
 7. श्री राम जन्मभूमि : ऐतिहासिक तिथि 6 दिसंबर 1992 
 8. श्रीराम रथ यात्रा
 9. शीर्ष न्यायालय का निर्णय 
 10. मंदिर की आधारशिला , 5 अगस्त का प्रधानमंत्री का ऐतिहासिक उद्बोधन
 11. नव्य अयोध्या
  12. अन्य अनेक आलेख और रिपोर्ट आदि।
लेखक आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी का परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)
 

Tuesday, January 9, 2024

बस्ती के लाल बाबा योगेन्द्र की जन्म शताब्दी शुरू ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी


प्रारंभिक जीवन:-

बाबा योगेन्द्र (7 जनवरी 1924 - 10 जून 2022) एक भारतीय कलाकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक और संस्कार भारती के संस्थापक सदस्यों में से एक थे । बाबा योगेन्द्र का जन्म 7 जनवरी 1924 को ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश में ) के बस्ती जिले के बभनगांवा (गांधीनगर) में वकील विजय बहादुर श्रीवास्तव के घर हुआ था।  दो वर्ष की उम्र में उनके सिर से मां का साया उठ गया। फिर उन्हें पड़ोस के एक परिवार में बेच दिया गया। इसके पीछे यह मान्यता थी कि इससे बच्चा दीर्घायु होगा। उस पड़ोसी माँ ने ही अगले दस साल तक उन्हें पाला। वकील साहब कांग्रेस और आर्यसमाज से जुड़े थे। जब मोहल्ले में आर एस एस (संघ) की शाखा लगने लगी, तो उन्होंने योगेन्द्र को भी वहाँ जाने के लिए कहा गया।
कला साधकों को एक माला में पिरोया :-
पद्मश्री से सम्मानित संस्कार भारती के संस्थापक बाबा योगेन्द्र ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने हजारों कला साधकों को एक माला में पिरोने का कठिन काम कर दिखाया।भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक के वरिष्ठ प्रचारक और संस्कार भारती के संस्थापक बाबा योगेन्द्र को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया है। संस्कार भारती संस्था के माध्यम से उन्होंने कला साधकों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। बस्ती में जन्मे योगेन्द्र दा का मुख्यालय माधव भवन, आगरा रहा है। माधव भवन में ही आरएसएस का बृज प्रांत कार्यालय है।
नानाजी देशमुख का प्रभाव :-
छात्र जीवन में उनका सम्पर्क गोरखपुर में संघ के प्रचारक नानाजी देशमुख से हुआ। योगेन्द्र जी यद्यपि सायं शाखा में जाते थे; पर नानाजी प्रतिदिन प्रातः उन्हें जगाने आते थे, जिससे वे पढ़ सकें। एक बार तो तेज बुखार की स्थिति में नानाजी उन्हें कन्धे पर लादकर डेढ़ कि.मी. पैदल चलकर पडरौना गये और उनका इलाज कराया। इसका प्रभाव योगेन्द्र पर इतना पड़ा कि उन्होंने शिक्षा पूर्ण कर स्वयं को संघ कार्य के लिए ही समर्पित करने का निश्चय कर लिया। देश के समर्पित प्रदर्शनी लगाईं।उनके सानिध्य में 1942 में संघ शिक्षा वर्ग में शामिल हुए। इसके बाद 1945 में संघ के प्रचारक बन राष्ट्र की सेवा में स्वयं के जीवन को समर्पित कर दिया।
संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता:-
योगेन्द्र ने 1942 में लखनऊ में प्रथम वर्ष ‘संघ शिक्षा वर्ग’ का प्रशिक्षण लिया। 1945 में वे प्रचारक बने और गोरखपुर, प्रयाग, बरेली, बदायूँ, सीतापुर आदि स्थानों पर संघ कार्य किया। उनके मन में एक सुप्त कलाकार सदा मचलता रहता था। देश-विभाजन के समय उन्होंने एक प्रदर्शनी बनायी, जिसने भी इसे देखा, वह अपनी आँखें पोंछने को मजबूर हो गया। फिर तो ऐसी प्रदर्शिनियों का सिलसिला चल पड़ा। शिवाजी, धर्म गंगा, जनता की पुकार, जलता कश्मीर, संकट में गोमाता, 1857 के स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा, विदेशी षड्यन्त्र, माँ की पुकार,आदिआदि ने संवेदनशील मनों को झकझोर दिया। ‘भारत की विश्व को देन’ नामक प्रदर्शनी को विदेशों में भी प्रशंसा मिली।
नए कलाकारों को मंच दिया:-
संघ नेतृत्व ने योगेन्द्र की इस प्रतिभा को देखकर 1981 ई0 में ‘संस्कार भारती’ नामक संगठन का निर्माण कर उसका कार्यभार उन्हें सौंप दिया। योगेन्द्र के अथक परिश्रम से यह आज कलाकारों की अग्रणी संस्था बन गयी है। अब तो इसकी शाखाएँ विश्व के अनेक देशों में स्थापित हो चुकी हैं। योगेन्द्र शुरू से ही बड़े कलाकारों के चक्कर में नहीं पड़े। उन्होंने नये लोगों को मंच दिया और धीरे-धीरे वे ही बड़े कलाकार बन गये। इस प्रकार उन्होंने कलाकारों की नयी सेना तैयार कर दी।
हस्तलेख मोतियों जैसा:-
संस्कार भारती के राजेश पंडित ने बताया कि योगेन्द्र की सरलता एवं अहंकार शून्यता उनकी बड़ी विशेषता है। किसी प्रदर्शनी के निर्माण में वे आज भी एक साधारण मजदूर की तरह काम में जुट जाते हैं। जब अपनी खनकदार आवाज में वे किसी कार्यक्रम का ‘आँखों देखा हाल’ सुनाते हैं, तो लगता है, मानो आकाशवाणी से कोई बोल रहा है। उनका हस्तलेख मोतियों जैसा है। इसीलिए उनके पत्रों को लोग संभालकर रखते हैं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की है कि योगेन्द्र ‘बाबा’ दीर्घायु रहकर इसी प्रकार कला के माध्यम से देशसेवा करते रहें। वह गोरखपुर, प्रयाग, बरेली, बदायूं, सीतापुर आदि स्थानों पर आरएसएस प्रचारक के तौर पर काम किया। एक बार भारत पाकिस्तान बंटवारे को लेकर आरएसएस के शिक्षा वर्ग में एक प्रदर्शनी लगी थी। जिसका प्रभाव उनके मनो मस्तिष्क पर पड़ा। उसके बाद उन्होंने ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन शुरू कर दिया। शीर्ष नेतृत्व ने योगेन्द्र जी की इस प्रतिभा को देखकर 1981 में ‘संस्कार भारती नामक संगठन का निर्माण कर उसका कार्यभार उन्हें सौंप दिया। योगेन्द्र जी के अथक परिश्रम से यह संगठन कला साधकों के लिए बेहतर प्लेटफार्म बना है।
संस्कार भारती के संस्थापक :-
संस्कार भारती, की स्थापना ललित कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना लाने का उद्देश्य सामने रखकर की गयी थी। इसकी पृष्ठभूमि में भाऊराव देवरस, हरिभाऊ वाकणकर, नानाजी देशमुख, माधवराव देवले और योगेन्द्र जी जैसे मनीषियों का चिन्तन तथा अथक परिश्रम था।संस्कार भारती, की स्थापना ललित कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना लाने का उद्देश्य सामने रखकर की गयी थी। इसकी पृष्ठभूमि में भाऊराव देवरस, हरिभाऊ वाकणकर, नानाजी देशमुख, माधवराव देवले और योगेन्द्र जी जैसे मनीषियों का चिन्तन तथा अथक परिश्रम था। १९५४ से संस्कार भारती की परिकल्पना विकसित होती गयी और १९८१ में लखनऊ में इसकी बिधिवत स्थापना हुई। १९८८ में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी (रंगभरी एकादशी) को मीरजापुर इकाई का गठन किया गया। सा कला या विमुक्तये अर्थात् "कला वह है जो बुराइयों के बन्धन काटकर मुक्ति प्रदान करती है" के घोष-वाक्य के साथ आज देशभर में संस्कार भारती की १२०० से अधिक इकाइयाँ कार्य कर रही हैं। समाज के विभिन्न वर्गों में कला के द्वारा राष्ट्रभक्ति एवं योग्य संस्कार जगाने, विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण व नवोदित कलाकारों को प्रोत्साहन देकर इनके माध्यम से सांस्कृतिक प्रदूषण रोकने के उद्देश्य से संस्कार भारती कार्य कर रही है। १९९० से संस्कार भारती के वार्षिक अधिवेशन कला साधक संगम के रूप में आयोजित किये जाते हैं।           संगीत, नाटक, चित्रकला, काव्य, साहित्य और नृत्य विधाओं से जुड़े देशभर के स्थापित व नवोदित कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।भारतीय संस्कृति के उत्कृष्ट मूल्यों की प्रतिष्ठा करने की दृष्टि से राष्ट्रीय गीत प्रतियोगिता, कृष्ण रूप-सज्जा प्रतियोगिता, राष्ट्रभावना जगाने वाले नुक्कड़ नाटक, नृत्य, रंगोली, मेंहदी, चित्रकला, काव्य-यात्रा, स्थान-स्थान पर राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आदि बहुविध कार्यक्रमों का आयोजन संस्कार भारती द्वारा किया जाता है।
संस्कार भारती से जुड़ाव:-

योगेन्द्र ने आरएसएस के लिए गोरखपुर, इलाहाबाद , बरेली , बदायूँ और सीतापुर में प्रचार किया । 1981 में, आरएसएस ने कला और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए एक इकाई संस्कार भारती बनाई। योगेन्द्र संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने खुद को आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारकों में से एक के रूप में स्थापित किया । जिन्हे कभी पीठ पर लाड अस्पताल ले गए थे नानाजी देशमुख ।
जीवन कुछ मुख्य बिंदु:-
कला के साधकों को एक मंच पर लाने के लिए पद्मश्री बाबा योगेंद्र ने संस्कार भारती संस्था की स्थापना की थी। योगेन्द्र ने 1942 में लखनऊ में ‘संघ शिक्षा वर्ग’ का प्रशिक्षण लिया था। 1945 में वे प्रचारक बने। उन्होंने गोरखपुर, प्रयाग, बरेली, सीतापुर समेत कई स्थानों पर संघ के लिए कार्य किया। कई बड़े प्रदर्शनी निर्माण जिसमे अखण्ड भारत और कश्मीर विभाजन, देश दर्शन ( कानपुर ), 1950 गोरक्षा प्रदर्शनी, कुम्भ मेला गोरक्षा प्रदर्शनी 1952, 1956 में स्वत्रंता संग्राम प्रदर्शनी, 1974 इमरजेंसी की पूरी कहानी टक्कर लेने वालों की प्रदर्शनी, 1979 द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन में धर्म गंगा प्रदर्शनी, 1997 से 99 के बीच 2500 कलासाधकों को सम्मानित किया।
देहावसान:-
बाबा योगेन्द्र मई के पहले सप्ताह में गोरखपुर प्रवास पर आए थे। 11 मई को नौतनवां में उन्हें शादी समारोह में शामिल होने जाना था। उसी दिन उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। उन्हें दिव्यमान हास्पिटल गोरखपुर ले गया। स्वास्थ्य में सुधार न होने पर उन्हें 14 मई को मेदांता हास्पिटल लखनऊ में भर्ती कराया गया। 26 मई को राममनोहर लोहिया संस्थान में भर्ती कराया गया।10 जून 2022 को अस्पताल में उनकी मौत हो गई।बाबा के न रहने की खबर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शोक की लहर दौड़ गई। बाबा के पार्थिव शरीर को सुबह दस बजे अस्पताल से आरएसएस संघ कार्यालय भारतीय भवन राजेन्द्र नगर लाया गया। जहां उनके अंतिम दर्शन के लिए उनके चाहने वालो का भारी तांता लगा रहा l
जीवन में मिले सम्मान पुरस्कार:-
2018 में, भारत सरकार ने उन्हें कला में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया, जो देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।  2005-2006 में भाऊराव देवरस सम्मान लखनऊ। 2008 अहिल्याबाई राष्ट्रीय पुरस्कार इंदौर।उन्हें कला के क्षेत्र में 2018 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

बाबा योगेन्द्र की जन्म शताब्दी शुरू:-
संस्कार भारती के संस्थापक पूज्य बाबा योगेंद्र जी के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में भारत वर्ष के प्रायः हर शहर कस्बे में विशेष कर मऊ मेरठ शाहजहां पुर बरेलीअलीगढ़ प्रयाग गोरखपुर सिद्धार्थ नगर बस्ती भोपाल उज्जैन औरंगाबाद इंदौर में माता पूजन आराधना एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया गया।
संस्कार भारती आगरा ब्रज प्रांत द्वारा कला ऋषि योगेंद्र बाबा का जन्म शताब्दी समारोह रविवार को सूरसदन सभागार में मनाया गया। समारोह में साहित्य, संगीत, चित्रकला, नाट्य एवं लोक कला की 28 स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया। चित्रकला प्रदर्शनी भी लगाई गई।
जमशेदपुर में साहित्य, रंगमंच एवं ललित कलाओं को समर्पित अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती की जमशेदपुर महानगर इकाई के तत्वावधान में मंगलवार को संस्थापक पद्मश्री बाबा योगेन्द्र की जन्म शताब्दी मनायी गयी. इस अवसर पर भारतमाता पूजन कार्यक्रम “आराधना” के तहत स्वाधीनता आंदोलन में जन सहभागिता का दर्शन विषय पर विचार गोष्ठी तुलसी भवन के प्रयाग कक्ष में हुई।
गोरखपुर में अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती के संस्थापक बाबा साहेब के जन्म शताब्दी वर्ष पर गोरक्ष प्रांत ने संघ एवं वृत्त चित्र का आयोजन किया। जिसमें नगर के वरिष्ठ कला साधकों के अलावा नगर के साहसी नागरिक भी उपस्थित रह रहे हैं। कार्यक्रम की शुरुआत बाबा के चित्र पर पुष्प निकेश का किया गया। बाद में बाबा साहब के जीवन पर आधारित अस्त्रों का प्रदर्शन किया गया।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)



Monday, January 8, 2024

भगवान राम के षोडश पार्षद ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

जिस प्रकार संसार में कार्य चलाने के लिये मनुष्यों को सहायकों की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार सृष्टि के पालनकर्ता श्रीहरि को भी अपना कार्य करने के लिए सहायकों की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रयोजन से श्रीहरि के भी मुख्य 16 पार्षद यानी सहायक हैं, जिनको समय-समय पर समाज को सार्थक संदेश देने के लिए श्रीहरि पृथ्वी पर भेजते रहते हैं। मान्यता है कि आज भी उनमें से कुछ पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं और श्रीहरि के भक्तों को संकटों से बचाते हैं, धर्म पथ पर चलाते हैं। वे निर्दिष्ट कार्य करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. सबकी अपनी- अपनी भूमिकाएं हैं, जिन्हें वे पूरी निष्ठा के साथ निभाते रहते हैं। "अयोध्या दर्शन" गीता प्रेस , गोरखपुर से प्रकाशित पुस्तक में पण्डित श्री राम कुमार दास जी के आलेख "साकेत -- दिव्य अयोध्या" के पृष्ठ 57- 58 पर भगवान राम के षोडश पार्षदो के नाम का उल्लेख किया है। जो  अथर्वेद के इस डेढ़ मंत्रों के आधार पर उल्लखित किया गया है।
"पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते ॥
यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्। 
तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः ॥"
           (अथर्वेद 10/2/28- 29)
इस डेढ़ मंत्रों का निहितार्थ इस प्रकार है --
" जो कोई ब्रह्म के अर्थात परात्पर परमेश्वर, परमात्मा , जगदादि कारण, अचिंत्य वैभव श्री सीतानाथ रामजी के
 पुरी को जानता है उसे भगवान और भगवान जी के पार्षद --सब लोग चक्षु,प्राण और प्रजा देते हैं। इस पुरी के स्वामी को पुरुष कहते हैं। अर्थात जिसका प्रतिदिन नाम स्मरण किया जाता है,उस पुरुष की पुरी को जानने के लिए श्रुति कह रही है। जो कोई अनन्त शक्ति सम्पन्न सर्व व्यापक,सर्व नियंता,सर्वशेषी, सर्वाधार श्री रामजी की अमृत अर्थात मोक्षानंद से परिपूर्ण जो निश्चय के साथ उस अयोध्या पुरी  को जानता है। उसके लिए साक्षात ब्रह्मऔर ब्रह्म के सम्बन्धी अर्थात भगवान के - "हनुमान,सुग्रीव, अंगद, मयंद, सुषेण, द्विविद, दरीमुख,कुमुद, नील, नल, गवाक्ष, पनस, गन्ध मादन,विभीषण, जामवान और दधिमुख" --ये प्रधान षोडश पार्षद अथवा नित्य और मुक्त सर्वजीव मिलकर उत्तम दर्शन --शक्ति, उत्तम प्राण शक्ति अर्थात आयुष्य और बल तथा सन्तान आदि देते हैं।"
नारायण की भांति रामजी के भी षोडश पार्षद:-
पुराणों में भगवान नारायण के 16 प्रमुख पार्षद बताए गए हैं. ये पार्षद जय, विजय, विष्वक्सेन, प्रबल, बल, नन्द, सुनन्द, सुभद्र, भद्र, चण्ड, प्रचण्ड, कुमुद, कुमुदाक्ष, शील, सुशील और सुषेण हैं. भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार, इनमें प्रधान पार्षद विष्वक्सेन के अलावा जय, विजय, प्रबल और बल भक्तों का मंगल करने वाले हैं। नन्द, सुनन्द, सुभद्र और भद्र भव रोगों को हरने वाले हैं. चण्ड, प्रचण्ड, कुमुद और कुमुदाक्ष विनीत भाव से कृपा करने वाले और शील, सुशील व सुषेण भावुक भक्तों का पालन करते हैं.
           अभी तक भगवान विष्णु से षोडश पार्षदों का ही उल्लेख मिलता रहा परंतु इस लेख में पण्डित श्री राम कुमार दास जी ने भगवान राम के षोडश पार्षदों का नामोल्लेख किया है। हां भगवान राम के सेना के 18 पदम यूथपतियों का जिक्र राम चरित मानस में अवश्य मिलता है। भक्तमाल के बीसवें छ्न्द में नाभादास ने राम के सहचर वर्ग को इस प्रकार गिनाया है।
"दिनकर सुत हरिराज बालिबछ केसरि औरस।
दधिमुख द्विविद मयंद रिच्छपति सम को पौरस।।
उल्का सुभट सुषेन दरीमुख कुमुद नील नल।
सरभ रु गवै गवाच्छ पनस गन्धमादन अतिबल।।
पद्म अठारह यूथपति रामकाज भट भीर के।
सुभ दृष्टि वृष्टि मो पर करौ जे सहचर रघुबीर के।।"
पार्षद की सेनापति जैसी जिम्मेदारी:-
भगवान राम ने इन वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई कर रावण की सेना से भीषण युद्ध कर विजय प्राप्त की थी. दस दिनों तक चले इस युद्ध में वानर सेना ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया था।
राम जी के षोडश पार्षद :--
सुग्रीव:- 
वानरों के राजा सुग्रीव श्रीराम की सेना के प्रमुख प्रधान 10,00,000 से ज्यादा सेना के यह सेना अध्यक्ष थे.सुग्रीव रामायण के एक प्रमुख पात्र थे। बालि इनके बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम सूर्य नारायण और माता का नाम ऋक्षराज था। बालि और सुग्रीव का पालन षोषण महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहल्या ने किया था। हनुमान के कारण भगवान श्री राम से उनकी मित्रता हुई थी। 
हनुमान:- 
श्रीराम सेना के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे.हनुमान वानरों के राजा केसरी और उनकी पत्नी अंजना के छः पुत्रों में सबसे बड़े और पहले पुत्र हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।
अंगद:
बाली तथा तारा का पुत्र वानर यूथ पति एवं प्रधान योद्धा. अंगद रामदूत भी थे. अंगद ने युद्ध में अदुभुत साहस दिखाया. उन्होंने रावण के पुत्र नरान्तक और रावण की सेना के प्रमुख योद्धा महापार्श्व का वध किया था.
विभीषण:- 
विभीषण रामायण के एक प्रमुख पात्र हैं। वे रावण के भाई थे।विभीषण बहुत ही बड़े राम भक्त थे। उन्होंने लंका में रहते हुए भी राम भक्ति की, जहाँ भगवान श्री राम का शत्रु रावण का राज था। विभीषण रावण का सबसे छोटा भाई था, जिसने लंका पर शासन किया था। वह ऋषि पुलस्त्य के पुत्र ऋषिविश्रवा और केकसी के सबसे छोटे पुत्र थे। लंका के राजा रावण उनके बड़े भाई थे। हालाँकि विभीषण राक्षस जाति के थे, लेकिन वे पवित्र थे और श्री राम के भक्त थे । उनका व्यवहार सच्चे ब्राह्मणो जैसा था। उन्होंने अपने बड़े भाइयों के साथ ब्रह्मा जी की तपस्या की थी, एवं  वरदान में अपने लिए ये माँगा की वे हमेशा धर्म-पथ पर चले।    
जामवंत:- 
रीछ सेना के सेनापति एवं प्रमुख सलाहकार. यह कुशल योद्धा के साथ ही मचान बांधने और सेना के लिए रहने की कुटिया बनने में भी कुशल थे.जाम्बवन्त रामायण के एक प्रमुख पात्र हैं। वे ऋक्ष प्रजाति के थे।उनका सन्दर्भ महाभारत से भी है। स्यमंतक मणि के लिये श्री कृष्ण एवं जामवन्त में नंदिवर्धन पर्वत (तत्कालीन नाँदिया, सिरोही, राजस्थान ) पर २८ दिनो तक युध्द चला। जामवंत को जब श्रीकृष्ण के भीतर श्रीराम के दर्शन हुए तब जामंवत ने अपनी पुत्री जामवन्ती का विवाह श्री कृष्ण द्वारा स्थापित शिवलिंग ( रिचेश्वर महादेव मंदिर नांदिया ) की शाक्शी में करवाया। युद्ध मे जाम्बवन्त ने यग्यकूप नामक राक्षस का वध किया था। हनुमान की माता अंजना ने जाम्बवन्त को अपना बड़ा भ्राता माना था जिससे वह शिवान्श हनुमान के मामा बन गये।
नल:- 
नल (सफेद वानर) यह वानर सेना में इंजीनियर रहे हैं। समुद्र पर सेतु का निर्माण इनकी देखरेख में हुआ था।सुग्रीव की सेना का वानर वीर और सुग्रीव के सेना नायक। सेतुबंध की रचना इनके माध्यम से की गई थी।
नील:- 
नील सुग्रीव का सेनापति थे, जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे, सेतुबंध की रचना में सहयोग दिया था। सुग्रीव सेना में इंजीनियर और सुग्रीव के सेना नायक। नील के साथ 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।नल और नील को ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे जिस चीज को छुएंगे वह पानी में नहीं डूबेगी.रामायण में, नील अग्निके देवता, अग्नि के पुत्र और "तेज, प्रतिष्ठा और कौशल में कपिश्रेष्ठ" के रूप में वर्णित है।  महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण भाग राम की पत्नी सीता को इसमें वानर सेना द्वारा निभाई गई भूमिका का वर्णन किया गया है, जिसमें लंका के राक्षस राजा रावण ने अपहरण कर लिया था। महाकाव्य को बनाने वाली कई कहानियों के अलग-अलग रूपांतरों का निर्माण किया गया है। वह वानर राजा सुग्रीव के अधीनस्थ वानर सेना के कमांडर-इन-चीफ हैं, और उन्हें लंका के राक्षस राजा रावण (आधुनिक श्रीलंका के रूप में जाना जाता है) के विरुद्ध राम की लड़ाई में सेना का नेतृत्व करने और हत्या करने वाले थे। के रूप में वर्णित है। 
द्विविद:- 
ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था. इनके भाई मैंद ने भी युद्ध में भाग लिया था.द्विविद सुग्रीव के मन्त्री और मैन्द के भाई थे। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। द्विविद को भौमासुर का मित्र भी कहा गया है। वानर यूथपति द्विविद अश्विनी कुमारो के अंश से जनमे हुए थे।
केसरी: -
केसरी एक पुरुष वानर है , और हिंदू पौराणिक कथाओं में एक पात्र है । वह हनुमान के पिता और अंजना के पति हैं ।यह महान योद्धा 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहे थे। शैव परंपरा में विष्णु की मदद से शिव से एक उत्पन्न पुत्र की मांग की गई थी, जो रावण को मारने के लिए राम का अवतार लेने वाला था। शिव और पार्वती ने वानर का रूप धारण किया और संभोग में लगे रहे। जब वायु प्रकट हुई, तो उसने अपनी उपस्थिति बताई, और पार्वती ने अपने अंदर के बच्चे को प्रकट किया। पार्वती ने वानर के रूप में गर्भपात को कैलाश ले जाने से मना कर दिया। जैसा कि शिव ने निर्देश दिया था, पार्वती ने बच्चे को वायु से बचाया था, जिसने इसे अंजना के गर्भ में रखा था, जिसने हनुमान को जन्म दिया था। 
शतबली :- 
शतबली,एक कुशल मल्ल योद्धा था। उसके साथ भी 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी। यह सुग्रीव के नेतृत्व में एक महान वानर था। उसके पास सुग्रीव से भी बड़ी विशाल वानरों की सेना थी। वह सीता की खोज के लिए उत्तरी क्षेत्रों में प्रतिनियुक्त वानरों का नेता था। (वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड सर्ग 43, : पुराणिक इनसाइक्लोपीडिया)। शतबलि को 20 करोड़ योद्धाओं के साथ आग्नेय दिशा की ओर से आक्रमण करने के लिए भगवान् ने तैनात किया।
मैन्द:-
मंद द्विविद नामक दो भाई भी सुग्रीव के यूथ पति थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहां वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। ये दोनों भाई दीर्घजीवी थे। रामायण के बाद भी ये जिंदा रहे और महाभारत काल में भी इनकी उपस्थिति मानी गई थी।यह भी कहा जाता है कि एक बार महाभारत के सहदेव किष्किन्धा नामक गुफा में जा पहुंचे। वहां वानरराज मैन्द और द्विविद के साथ उन्होंने सात दिनों तक युद्ध किया था। परंतु वे उन दोनों महान योद्धाओं का कुछ बिगाड़ नहीं सके। तब दोनों वानर भाई प्रसन्न होकर सहदेव से बोले- ‘पाण्डव प्रवर! तुम सब प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान धर्मराज के कार्य में कोई विघ्न नही पड़ना चाहिये।’ मैंद (वानर) अश्विनी कुमारो के अंश से उत्पन्न हुआ था।
 सुषेण वैद्य:-
रामायण आदि के अनुसार यह वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का वैद्य था । वह धर्म के अंश से उत्पन्न हुए थे। इसने राम रावण के युद्ध में रामचंद्र की विशेष सहायता की थी ।उनके साथ वेगशाली वानरों की सहस्र कोटि सेना थी। सुषेण वैद्य सुग्रीव के ससुर थे। पहले ये लंका के राजा राक्षसराज रावण का राजवैद्य थे। बालि की पत्नी अप्सरा तारा सुषेण की धर्म पुत्री थीं। बालि वध के बाद तारा का विवाह सुग्रीव से कर दिया गया था। वैसे बालि की पत्नी रूमा थीं। अंगद बालि का पुत्र था। उन सुषेण का जन्म वरुण के अंश से हुआ था।
दधिमुख:-
वानरों में वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान दधिमुख भयंकर तेज से सम्पन्न वानरों की विशाल सेना साथ लेकर आये। वे बड़े सौम्य, भगवत भक्त और मधुरभाषी थे। जिनके मुख (ललाट) पर तिलक का चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करने वाले थे। इन्हें चंद्रमा का अंश कहा जाता है। वह वानर राज सुग्रीव का मामा था। उन्हें सुग्रीव के मधुवन नामक मनोहर बाग की रखवाली का भी दायित्व भी मिला था। जब हनुमान जी ने सीता का पता लगा वापस लौटे तो बानर दल खुशी में उपवन से फल खाने , शहद पीने और बाग उजारने की सूचना सुग्रीव को दी। वह दधिमुख वीर वानर मुझे सूचित करता है कि अंगद के नेतृत्व में उन युद्ध के समान वनवासियों ने शहद पी लिया है और बाग के फल खाने के लिए हैं। जो लोग अपने मिशन में विफल रहे थे, वे इस तरह से पलायन में शामिल नहीं होते। निश्चित रूप से वे सफल रहे हैं क्योंकि उन्होंने लकड़ी को नष्ट कर दिया है। इसी कारण से उन्होंने उन लोगों को घुटनों से पकड़ लिया है जिन्होंने अपनी लीला-क्रीड़ा में बाधा डाली है और उस वीर दधिमुख का तिरस्कार किया है जिसे मैंने स्वयं अपने बाग का संरक्षक नियुक्त किया था। अंगद के नेतृत्व में उन वीर वानरों ने निश्चित रूप से मधुर वन को उजाड़ दिया है। दक्षिणी क्षेत्र की खोज करने के बाद, उनके वापसी पर इस बाग ने अपने लोलुपता को उत्तेजित कर दिया, जिसके बाद उन्होंने इसे लूट लिया और शहद पी लिया, पहरेदारों पर हमला किया और उन्हें अपने घुटनों से पकड़ लिया। अपने पराक्रम के लिए विख्यात यह मृदुभाषी दधिमुख बानर मुझे यह समाचार सुनाने आया है।
परपंजद पनस :-
यह रामदल का एक बंदर यूथ पति था। विभीषण के चार मंत्रियों में से एक पनस रहा। यह 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहा था । उनका जन्म वृहस्पति के अंश से हुआ था। पनस बुद्धिमान तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेका आया था। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार पनस की सेना में 50 लाख सैनिक थे। वह परियात्र पर्वत पर रहता था।
कुमुद:-
कुमुद के नेतृत्व में 10 करोड़ सैनिक ईशान दिशा से आक्रमण के लिए तैनात किए गए थे|
गन्धमादन:-
गन्धमादन पर्वत पर रहने वाला गन्धमादन नाम से विख्यात वानर वानरों की दस खरब सेना साथ लेकर आया। भगवान् राम को सेना के बायें पार्श्व में गन्धमाधन के नेतृत्व में विशाल सेना थी|गंधमादन (वानर) को कुबेर अपने अंश से उत्पन्न किया था।
गवाक्ष:-
लंगूर वानरों के यूथपति गवाक्ष थे। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार गवाक्ष की सेना 1 करोड़ सैनिक थे। लंका युद्ध में दायीं ओर से सहायता देने के लिए लंगूरपति गवाक्ष उपस्थित थे। गोलांगूल (लंगूर) जाति के वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छः अरब) वानर सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ। वानर यूथपति गवाक्ष यम राज अंश से जनमे थे।
दरीमुख या दुर्मुख :-
रामचन्द्र जी का एक गुप्तचर जिसके द्वारा वे अपनी प्रजा का वृत्तान्त जाना करते थे। इसी के मुँह से उन्होंने सीता का वह वृत्तान्त सुना था जिसके कारण सीता का द्वितीय वनवास हुआ था (उत्तररामचरित) ।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)

Wednesday, January 3, 2024

तुलसीदास के “दोहाशतक” में श्रीराम जन्मभूमि विध्वंस का सटीक वर्णन ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

यह तर्क हमेशा दिया जाता रहा है कि अगर बाबर ने राम मंदिर तोड़ा होता तो यह कैसे सम्भव होता कि महान रामभक्त और राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास इसका वर्णन पाने इस ग्रन्थ में नहीं करते । यही प्रश्न इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष भी था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने साहित्य व रचनाओं में अपने समय की प्रमुख घटनाओं का, राम जन्म भूमि पर हुए अत्याचार तथा बाबरी मस्जिद के बनाये जाने का उल्लेख किया है। इलाहाबाद उच्च  न्यायालय में जब बहस शुरू हुई तो श्री रामभद्राचार्य जी को भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक विशेषज्ञ गवाह के तौर पर बुलाया गया और इस सवाल का उत्तर पूछा गया।  उन्होंने कहा कि यह सही है कि श्री रामचरित मानस में इस घटना का वर्णन नहीं है लेकिन तुलसीदास जी ने इसका वर्णन अपनी अन्य कृति 'तुलसी दोहा शतक' में किया है जो कि श्री रामचरित मानस से कम प्रचलित है। तुलसी दास जी ने दोहा शतक 1590 मे लिखा था। इसके आठ दोहे , 85 से 92, में मंदिर के तोड़े जाने का स्पष्ट वर्णन है।‘तुलसी दोहा शतक’ में इस बात का साफ उल्लेख किया है कि किस तरह से राम मंदिर को तोड़ा गया है।
       अतः यह कहना गलत है कि तुलसी दास जो कि बाबर के समकालीन भी थे,ने राम मंदिर तोड़े जाने की घटना का वर्णन नहीं किया है और जहाँ तक राम चरित मानस कि बात है उसमे तो कहीं भी मुग़लों की भी चर्चा नहीं है इसका मतलब ये निकाला जाना गलत होगा कि तुलसीदास के समय में मुगल नहीं रहे।
        हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उतपन्न की,कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है । श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञाशु के एक पत्र व्यवहार में "तुलसी दोहा शतक " का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है । हमनें भी उन दोहों के अर्थो को आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है । गोस्वामी जी ने 'तुलसी दोहा शतक' में इस बात का साफ उल्लेख किया है कि किस तरह से राम मंदिर को तोड़ा गया। प्रत्येक दोहे का अर्थ सहित वर्णन नीचे दिया गया है।

मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।
जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥85।।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।
भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥86।।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।
हने पचारि पचारि जन तुलसी काल कराल ॥87।।

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतू अनुमानि ।
तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किय अनखानि ॥88।।

इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन1528 आता है ।श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत (वर्णन न करने योग्य) अनर्थ किये । 

राम जनम महि मंदरहिं,तोरि मसीत बनाय ।
जवहिं बहुत हिन्दू हते,तुलसी कीन्ही हाय ॥89।।

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई  साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर राम समाज ।
तुलसी रोवत ह्रदय हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥90।।

तुलसीदास जी कहते हैं कि मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।
तुलसी रची मसीत तहँ मीरबकी खल नीच ॥91।।

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

रामायन घरि घट जहाँ,श्रुति पुरान उपखान ।
तुलसी जवन अजान तँह,करत कुरान अज़ान ॥92।।

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।       
           तुलसीदास के नाम से चलने वाले ये आठ दोहे 2010 के बाद तब चर्चा में आए जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने अयोध्या मामले पर अपने फ़ैसले में इनका उल्लेख किया। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपने विस्तृत निर्णय में सभी पक्षों द्वारा पेश दलीलों और सबूतों का हवाला दिया है। इसी सिलसिले में पेज नंबर 780 पर हिंदू पक्ष की तरफ़ से पेश हुए स्वामी रामभद्राचार्य के हलफ़नामे का ज़िक्र है और पेज नंबर 783 पर वे दोहे लिखे गए हैं जिनको रामभद्राचार्य ने तुलसीरचित बताया था। ग्रंथ का नाम दिया था - श्री तुलसीशतक।
            स्वामी रामभद्राचार्य रामानंदी संप्रदाय के संत हैं और चित्रकूट में तुलसी पीठ के प्रतिष्ठापक हैं। 1995 के बाद से वह जगद्गुरु अभिषिक्त किए गए और तब से जगद्गुरु रामानंदाचार्य रामभद्राचार्य के नाम से जाने जाते हैं। वह विश्व हिंदू परिषद से भी जुड़े हुए हैं और मंदिर निर्माण आंदोलन में भी सक्रिय हैं। 2015 में वह पद्म विभूषण से भी सम्मानित हुए।
          स्वामी रामभद्राचार्य ने अदालत के सामने इन दोहों का हवाला सबसे पहले 2003 में दिया था लेकिन सात-आठ साल तक कहीं किसी को इनकी भनक भी नहीं लगी। अगर 2010 में न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपने निर्णय में इन दोहों का हवाला नहीं दिया होता तो शायद किसी को पता भी नहीं चलता कि तुलसीदास ने राम मंदिर विध्वंस पर कोई दोहे भी लिखे थे।
अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया है ! इस प्रमाण से यह बात स्पष्ट हो जाता है कि मीर बाक़ी ने रामजन्म मंदिर को तोड़ा, मसजिद बनाई और कई हिंदुओं की हत्या की। ये दोहे 'तुलसी दोहा शतक' नाम के संग्रह से लिए बताए जाते हैं। अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रमाण को अपने आदेश में उल्लेख भी किया है और उसे माना भी है।
                   आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी 
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)

Tuesday, January 2, 2024

श्रीरामचरितमानस’ दिव्य लोकमंगलकारी नीतिपरक ग्रंथ ✍️ आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

 ‘

                 रामचरितमानस एहि नामा। 
                सुनत श्रवण पिया बिश्रमा 
                 मन करि बिषय अनल बन जरै। 
                 होइ सुखी जौं एहिं सर पराई॥

(इसका नाम रामचरितमानस है, जिसका अर्थ है जप को शांति मिलती है। मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानस रूपी झील में आ पड़े तो सुखी हो जाए।)
          त्रेतायुग में आदि कवि महर्षि ‘वाल्मीकि’ द्वारा ‘रामायण’ महाकाव्य की रचना की गई थी। संस्कृत भाषा में होने के कारण वह महाकाव्य जन-जन तक नहीं पहुंच पाया । तो भगवत्कृपा से कलियुग में आदि कवि वाल्मीकि जी ही गोस्वामी तुलसीदास जी के रूप में प्रकट हुए जिन्होंने सरस हिन्दी-अवधी भाषा में ‘श्रीरामचरित मानस’ की रचना किया है 
संसार अपार के पार को सुगम रूप नौका लिए।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित बाल्मीकि तुलसी भयो।।
        श्रीरामचरितमानस के नायक श्रीराम हैं जिनको मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान के रूप में दर्शाया गया है जो हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी हरि नारायण भगवान के अवतार है , जबकि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में भगवान श्रीराम को एक आदर्श चरित्र मानव के रूप में दिखाया गया है, जो सम्पूर्ण मानव समाज को ये सिखाता है जीवन को किस प्रकार जिया जाय भले ही उसमे कितने भी विघ्न हों। प्रभु श्रीराम सर्वशक्तिमान होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। गोस्वामी जी ने श्रीरामचरित का अनुपम शैली में दोहों, चौपाइयों, सोरठों तथा छंद का आश्रय लेकर वर्णन किया है। इसका प्रत्येक दोहा, प्रत्येक सोरठा, प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक छन्द और प्रत्येक शब्द साक्षात् वेद के समान आदरणीय और पूज्य है । श्रीरामचरित मानस परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीराम का ही वांग्मय स्वरूप है । यह दिव्य ग्रन्थ समस्त वेद, शास्त्र, पुराण और उपनिषदों का सार है ।
ईश्वर के आदेश से लेखन:-
गोस्वामी तुलसीदास जी को भगवान शंकर, मारुतिनंदन हनुमान, पराम्बा पार्वती जी, परब्रह्म भगवान श्रीराम और शेषावतार लक्ष्मण जी ने समय-समय पर अपना दर्शन और आशीर्वाद देकर श्रीरामचरितमानस उनसे लिखवाया और भगवान श्रीराम ने ‘शब्दावतार’ के रूप में श्रीरामचरित मानस में प्रवेश किया है । इसीलिए यह मनुष्य को सच्ची चेतना देने वाला और पग-पग पर पथ-प्रदर्शन करने वाला लोक मंगलकारी ग्रन्थ माना गया है ।
संक्षिप्त मानस कथा:-
 जब मनु और सतरूपा परमब्रह्म की तपस्या कर रहे थे। कई वर्ष तपस्या करने के बाद शंकरजी ने स्वयं पार्वती से कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और मैं कई बार मनु सतरूपा के पास वर देने के लिये आये ।
"बिधि हरि हर तप देखि अपारा, 
मनु समीप आये बहु बारा।"
       त्रिदेवों ने बार बार कहा कि जो वर तुम माँगना चाहते हो माँग लो। मनु सतरूपा को तो पुत्र रूप में स्वयं परमब्रह्म को ही माँगना था। फिर ये कैसे उनसे यानी शंकर, ब्रह्मा और विष्णु से वर माँगते? हमारे प्रभु राम तो सर्वज्ञ हैं। वे भक्त के ह्रदय की अभिलाषा को स्वत: ही जान लेते हैं। जब 23 हजार वर्ष और बीत गये तो प्रभु राम के द्वारा आकाशवाणी होती है-
प्रभु सर्वग्य दास निज जानी, 
गति अनन्य तापस नृप रानी।
माँगु माँगु बरु भइ नभ बानी,
 परम गँभीर कृपामृत सानी॥
        इस आकाशवाणी को जब मनु सतरूपा सुनते हैं तो उनका ह्रदय प्रफुल्लित हो उठता है और जब स्वयं परमब्रह्म राम प्रकट होते हैं तो उनकी स्तुति करते हुए मनु और सतरूपा कहते हैं- 
"सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू, 
बिधि हरि हर बंदित पद रेनू। 
सेवत सुलभ सकल सुखदायक, 
प्रणतपाल सचराचर नायक॥" 
       अर्थात् जिनके चरणों की वन्दना विधि, हरि और हर यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही करते है, तथा जिनके स्वरूप की प्रशंसा सगुण और निर्गुण दोनों करते हैं: उनसे वे क्या वर माँगें? इस बात का उल्लेख करके तुलसीदास ने उन लोगों को भी राम की ही आराधना करने की सलाह दी है जो केवल निराकार को ही परमब्रह्म मानते हैं।
भगवान शंकर व श्रीराम की कृपा से लिखा गया ग्रंथ :-
हनुमानजी की कृपा से तुलसीदास जी को श्रीराम जी के दर्शन हुए थे। भगवान राम-लक्ष्मण उन्हें दर्शन देने के लिए घोड़ों पर सवार होकर राजकुमार के वेश में आए थे , परन्तु तुलसीदास जी उन्हें पहचान नहीं पाए । दूसरी बार संवत् 1607, मौनी अमावस्या, बुधवार के दिन प्रात:काल गोस्वामी तुलसीदास जी चित्रकूट के रामघाट पर पूजा के लिए चंदन घिस रहे थे। तब भगवान राम और लक्ष्मण ने आकर उनसे तिलक लगाने के लिए कहा । हनुमानजी ने सोचा कि ये शायद प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण को न पहचान पाएं इसलिए तोते का रूप धर चेतावनी का दोहा पड़ने लगे —
चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर । 
तुलसी दास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर ।।
      भगवान श्रीराम की अद्भुत छवि देखकर तुलसीदास जी अपनी सुध-बुध भूल गए । तब भगवान श्रीराम ने अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने व तुलसीदास जी के तिलक किया और अन्तर्ध्यान हो गए । तुलसीदास जी सारा दिन बेसुध पड़े रहे। तब रात्रि में आकर हनुमानजी ने उन्हें जगाया और उनकी दशा सामान्य की ।
       संवत् 1616 में कामदगिरि में सूरदास जी तुलसीदास जी से मिलने आए और अपना ग्रन्थ ‘सूरसागर’ उन्हें दिखाया और दो पद गाकर सुनाए । तुलसीदास जी ने सूरसागर को हृदय से लगा लिया । 'कामदगिरी' का अर्थ ऐसा पर्वत है, जो सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है। माना जाता है कि यह स्थान अपने वनवास काल के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी का निवास स्थल रहा है। उनके नामों में से एक भगवान कामतानाथ, न केवल कामदगिरी पर्वत के बल्कि पूरे चित्रकूट के प्रमुख देवता हैं।
           इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास काशी में प्रह्लाद-घाट पर एक ब्राह्मण के घर पर रहने लगे । वहां उनकी कवित्व- शक्ति जाग्रत हुई और वह संस्कृत में रचना करने लगे । आश्चर्य यह था कि दिन में वे जितनी रचना करते रात में सब-की-सब गायब हो जातीं । यह घटना रोज होती, तुलसीदास जी को समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या करना चाहिए ?
       आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न में भगवान शंकर ने कहा कि तुम अपनी भाषा में काव्य की रचना करो । तुलसीदास जी उठकर बैठ गए । उनके हृदय में स्वप्न की आवाज गूंजने लगी । उसी समय भगवान शंकर और माता पार्वती दोनों ही उनके सामने प्रकट हुए और बोले -
‘तुम जाकर अयोध्या में रहो और वहीं अपनी मातृभाषा में काव्य-रचना करो। संस्कृत के पचड़े में मत पड़ो । जिससे सबका कल्याण हो वही करना चाहिए । मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान सफल होगी ।’ यह कहकर भगवान शंकर और पार्वती जी अन्तर्ध्यान हो गए ।
       तुलसीदास जी अपने सौभाग्य की प्रशंसा करते हुए अयोध्या में आकर रहने लगे । वे केवल एक बार दूध पीकर रहते थे । संवत् 1631 चैत्र शुक्ल रामनवमी के दिन वही योग बना जो त्रेतायुग में रामजन्म के दिन था ।
सम्बत सोरह सै इकतीसा।
करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।
नवमी भौमवार मधुमासा।
अवध पुरी यह चरित प्रकासा।।
        मानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी। भारत इस अवधि के दौरान मुगल सम्राट अकबर (1556-1605 ई.) के शासनकाल में था। यह तुलसीदास को विलियम शेक्सपियर का समकालीन भी बनाता है। उस समय उनकी आयु 77 साल होती है ।
             प्रात:काल हनुमानजी ने प्रकट होकर तुलसीदास जी का अभिषेक किया । भगवान शंकर, पार्वती, गणेशजी, सरस्वती जी, नारदजी और शेषनाग जी ने तुलसीदास जी को आशीर्वाद दिया । सबकी कृपा और आज्ञा प्राप्त करके तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना शुरु की ।तुलसीदास जी ने श्री राम चरित मानस को दो वर्ष सात मास और छब्बीस दिन में संवत 1633 में लिखकर पूर्ण किया। मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में श्रीराम विवाह के दिन श्रीरामचरितमानस की रचना पूरी हुई । तुलसीदास जी की अयोध्या तुलसीदास जी ने भी अपनी रामचरितमानस में अयोध्या का बड़ी ही भव्यता के साथ वर्णन किया है। तुलसीदास जी ने जिस प्रकार की अयोध्या का वर्णन अपने ग्रंथ में किया है, वह भक्ति भावना से भरी हुई है --
राम धामदा पुरी सुहावनि। 
लोक समस्त बिदित अति पावनि॥
चारि खानि जग जीव अपारा। 
अवध तजें तनु नहिं संसारा॥
             बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि राम की अयोध्या परमधाम देने वाली और मोक्षदायिनी है। जो जीव अयोध्या में अपना शरीर छोड़ते हैं, उन्हें फिर से इस संसार में आने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही तुलसीदास सरयू नदी के बारे में लिखते हैं कि सरयू में केवल स्नान से ही नहीं बल्कि इसके स्पर्श और दर्शनमात्र से भी व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं--
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥
        उत्तरकांड में राम जी के वनवास के वापिस लौटने के बाद भी अयोध्या का वर्णन किया है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि अयोध्यावासियों को घर स्वर्ण और रत्नों से जड़े हुए हैं। घरों की अटारी से लेकर खंबे और फर्श तक अनेक रंग-बिरंगी मणियों से ढले हुए हैं। सरयू नदी के किनारे-किनारे ऋषि-मुनियों ने तुलसी के साथ-साथ बहुत-से पेड़ लगा रखे हैं। अयोध्या, जहां के राजा स्वयं प्रभु राम हैं, वहां की जनता समस्त सुखों से परिपूर्ण है। यह कथा पाखंडियो छल-प्रपञ्च को मिटाने वाली है। पवित्र सात्त्विकधर्म का प्रचार करने वाली है। कलिकाल के पाप-कलापका नाश करने वाली है। भगवत् प्रेम की छटा छिटकाने वाली है। संतो के चित्त में भगवत्प्रेम की लहर पैदा करनेवाली है। भगवत् प्रेम श्री शिवजी की कृपा के अधीन है, यह रहस्य बताने वाली है। इस दिव्य ग्रन्थ की समाप्ति हुई, उसी दिन इसपर लिखा गया--
              शूभमिति हरि: ओम् तत्सत्। 
       देवताओंने जय जयकार की ध्वनि की और फूल बरसाये। श्री तुलसीदास जी को वरदान दिये, रामायण की प्रशंसा की।
          गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब देवभाषा संस्कृत छोड़कर लोकभाषा अवधि में राम चरित मानस ( रामायण ) की रचना की तो उन्हें अपने स्वजातीय और स्वधर्मीय बंधुओं के कोप का भाजन होना पड़ा। कट्टरपंथियों ने उनके कुल गौत्र ,जाति और धर्म को लेकर अनेर्कों भ्रांतियां फैलाई . उनका जीवन दूभर कर दिया उनकी रचना प्रक्रिया को बाधित किया .अंततः उन्होंने अयोध्या की एक मस्जिद में रहकर मांग कर खाते हुए अपनी कृति का लेखन पूर्ण किया। वे कहते हैं कि …
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ।।
         बादशाह अकबर के नवरत्न अब्दुल रहीम खान-ए- खाना ने हिंदुओं व मुसलमानों को तुलसीराम कृत रामचरितमानस का महत्व बताते हुए उसे वेद और कुरान के समतुल्य बताया । उन्होंने कहा कि ‘रामचरित मानस हिन्दुओं के लिए ही नहीं मुसलमानों के लिए भी आदर्श है।’
उनका यह दोहा देखिए
रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्राण,
हिन्दुअन को वेद सम यवनहिं प्रगट कुरान’
       यह ध्यान देने की बात है कि रामचरित मानस को वेद और कुरान के समकक्ष बताने वाला कोई और नहीं मुगल बादशाह अकबर के अत्यंत करीबी रहीम थे जो गोस्वामी तुलसीदास जी के मित्र थे । जब सब कट्टरपंथी हिन्दू तुलसीदास जी को प्रताड़ित कर रहे थे तब वे मजबूती से तुलसीदास जी के साथ खड़े थे।
          तुलसी दास ने लगभग 12 ग्रंथ लिखे हैं जिसमें सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए हैं ‘रामचरितमानस’ और हनुमान चालीसा.(भगवान हनुमान की स्तुति में 40 श्लोक). आज हनुमान की जो इतना पूजा जाता है उसके पीछे भी तुलसीदास ही हैं। यहां तक कि कवि तुलसीदास ने कई हनुमान मंदिर का निर्माण कराया। उन्होंने कई ‘अखाड़े’ का निर्माण भी कराया। अखाड़ा में हनुमान की मूर्ति की स्थापना कराने का श्रेय भी तुलसीदास को ही जाता है। यह परंपरा उत्तर और मध्य भारत के अखाड़ों में आज भी देखी जा सकती है।
तुलसी के प्रभाव से राम लीला:-
यह बहुत लोग नहीं जानते की देशभर में जो रामलीला होती है उसके पीछे भी कवि तुलसीदास ही हैं. विजयादश्मी (दशहरे) के समय नौ दिनों तक चलने वाली रामलीला का मंचन सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि साउथ- ईस्ट एशिया के कई देशों भी किया जाता है।
श्री गणेश जी द्वारा मानस की प्रतियां अपने लोक को ले जाना:-
श्री रामचरितमानस की रचना के बाद श्री गणेश जी वहाँ आ गए और अपनी दिव्या दिव्य लेखनी से मानस जी की कुछ प्रतियां क्षण भर में लिख ली। उन प्रतियोगिता को लिखकर गोस्वामी जी से कहा कि इस सुंदर मधुर काव्य का रसपान हम अपने लोक में करेंगे और अन्य गणो को भी कराएँगे। ऐसा कहकर गणेश जी अपने लोक को चले गए। श्री रामचरितमानस क्या है, इस बात को सभी अपने-अपने भाव के अनुसार समझते एवं ग्रहण करते हैं। परंतु अब भी उसकी वास्तविक महिमा का स्पर्श विरले ही पुरुष का सके होंगे।
            दुर्लभ हस्तलिखित श्री रामचरित मानस ग्रन्थ में बालकाण्ड, अयोध्या काण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धा काण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सात काण्ड हैं । इन सातों काण्डों में श्रीराम के चरित्र का वर्णन है । इस दिव्य ग्रन्थ की समाप्ति मंगलवार के दिन हुई । तब हनुमानजी पुन: प्रकट हुए और पूरी रामायण सुनी और गोस्वामीजी को आशीर्वाद दिया कि यह कृति तुम्हारी कीर्ति को अमर कर देगी ।
मानस की मूल प्रतियां:-
गोस्वामीजी की हस्तलिखित पूर्ण प्रतिलिपि कही भी उपलब्ध नहीं हैं ।बालकांड की प्रति सबसे पुरानी श्री अयोध्याजी के श्रावण कुंज की हैं जो संवत 1661की लिखी हैं।गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित प्रति में बालकाण्ड की मूल प्रति अयोध्या के श्रावण कुंज में बताई गई है।इस आलेख का लेखक इसे नृत्य राघव कुंज बासुदेव घाट में स्वयं देखा है। जब वह छात्र जीवन में नृत्य राघव कुंज बासुदेव घाट में निवास कर रहा था। दोनों मंदिर एक ही पंथ और महंथ की संपत्ति रही है।
            चित्रकूट भगवान श्री राम की तपोस्थली के राजापुर में आज भी गोस्वामी तुलसीदास की हस्त लिखितअयोध्या कांड की प्रति राजापुर की हैं जो गोस्वामी जी के हाथ की लिखी बताई जाती हैं। रामचरितमानस कई साल बाद भी सहेज कर रखी गई है। श्रद्धालु यहां गोस्वामी तुलसीदास की हस्तलिखित रामचरित मानस को देखते और पढ़ते भी हैं।मंदिर के संत शरद कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि इस महाकाव्य का निर्माण 76 साल की उम्र में तुलसीदासजी ने किया था। 150 पेज की हर पांडुलिपि पर 7 लाइन लिखी है। रामचरित मानस अवधि भाषा में है, जो हिंदी भाषा की एक बोली है। यहां अब केवल अयोध्या कांड बचा है। बाकी सब विलुप्त हो गया है। उन्होंने बताया कि बस अयोध्या कांड बचा है जिसको यहा आकर देखा जा सकता है।
जापानी टिशु पेपर और केमिकल से संरक्षित :-
खुद को मंदिर का उत्तराधिकारी बताने वाले रामाश्रय त्रिपाठी बताते हैं, "2004 में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग, दिल्ली द्वारा पांडुलिपि सुरक्षित करने के लिए प्रयास किया गया। पुरातत्व विभाग ने जापान में बने पारदर्शी टिशु पेपर को इस पर लगाया है। साथ ही कागज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाले कैमिकल्स का भी इस्तेमाल किया है।" राजापुर में राम चरित मानस की अयोध्या काण्ड की पांडुलिपि सुरक्षित है। 11x5 के आकार के 170 पन्ने सुरक्षित हैं। अयोध्या काण्ड की इन पांडुलिपियों में हर हस्तलिखित प्रति में ‘श्री गणेशाय नमः और श्री जानकी वल्लभो विजयते’ लिखा हुआ है। तुलसीदास के पहले शिष्य गणपतराम के वंशज आज भी इस तुलसी और मानस मंदिर में पुजारी बनते चले आ रहे हैं।
          सुंदरकांड की एक प्रति अवध प्रांत के दुल्ही नमक स्थान की मिली हैं जो संवत 1672की लिखी।यह तीनों कांड गोस्वामीजी के समय के लिखे हैं इनके सिवा शेष कांड उनके समय के नही मिल सके।शेष प्रतियों में श्री भागवत दास जी की प्रति सबसे अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक मानी जाती हैं। गोरखपुर की रामचरित मानस में भूमिका में आरंभ में ही दिया हुआ। 
भगवान विश्वनाथ ने दी श्रीरामचरितमानस को मान्यता:-
इसके बाद तुलसीदास जी भगवान की आज्ञा से काशी चले आए और वहां भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को उन्होंने श्रीरामचरितमानस सुनाया । रात को पुस्तक श्रीविश्वनाथ जी के मन्दिर में रख दी गयी । सवेरे जब मन्दिर के पट खोले गए तो उस पर लिखा पाया गया—‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ और नीचे भगवान के हस्ताक्षर थे। मन्दिर में उपस्थित लोगों ने ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की आवाज भी सुनी थी । देवताओं ने जय-जयकार करते हुए फूल बरसाए थे और तुलसीदास जी को वरदान दिए थे ।
श्रीरामचरितमानस के प्रथम श्रोता:-
गोस्वामीजी ने श्रीरामचरितमानस को सबसे पहले संत श्रीरूपारण स्वामीजी को सुनाया जो मिथिला में रहते थे और भगवान श्रीराम को अपना जामाता मानकर प्रेम करते थे । इसके बाद भगवान ने तुलसीदास जी को काशी में रहने की आज्ञा दी ।
राम लक्ष्मण ने पहरेदारी की :-
श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्धि से काशी के संस्कृत विद्वानों को बड़ी ईर्ष्या व चिन्ता होने लगी । वे दल बनाकर गोस्वामीजी की पुस्तक को ही नष्ट करने की कोशिश करने लगे । उन्होंने पुस्तक चुराने के लिए दो चोर भेजे । चोरों ने देखा कि गोस्वामीजी की कुटी के बाहर श्याम और गौर वर्ण के दो वीर बालक पहरा दे रहे हैं । रात भर बड़ी सावधानी से उन्हें पहरा देते देखकर चोर बहुत प्रभावित हुए और श्रीराम व लक्ष्मण के दर्शन से उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी । उन्होंने तुलसीदासजी के पास जाकर पूछा कि तुम्हारे ये पहरेदार कौन हैं? तुलसीदासजी ने गद्गद् कण्ठ से कहा कि तुम लोग धन्य हो जो तुम्हें भगवान के दर्शन प्राप्त हुए । गोस्वामीजी समझ गए कि मेरे कारण प्रभु को कष्ट उठाना पड़ता है इसलिए उनके पास जो कुछ भी था, वह सब लुटा दिया ।
हनुमान जी ने मारण तंत्र से रक्षा की थी:-
तुलसीदासजी ने पुस्तक की मूल प्रति अपने मित्र टोडरमल के घर रख दी और दूसरी प्रति लिखी । अब तो पुस्तक का दिन-दूना प्रचार होने लगा । ईर्ष्यालु पण्डितों ने वटेश्वर मिश्र नामक तान्त्रिक को तुलसीदासजी का अनिष्ट करने के लिए कहा । तान्त्रिक ने मारण-मोहन प्रयोग के लिए भैरव को भेजा । हनुमानजी को तुलसीदासजी की रक्षा करते देखकर भैरव भयभीत होकर लौट आया और मारण प्रयोग तान्त्रिक पर ही उलटा पड़ गया ।
पंडितों ने भी सराहा:-
आखिर में पण्डितों ने मधुसूदन सरस्वतीजी की शरण ली और कहा कि भगवान शिव ने तुलसीदास की पुस्तक सही तो कर दी परन्तु यह किस श्रेणी की पुस्तक है, यह बात नहीं बतलायी है । मधुसूदन सरस्वतीजी ने जब पुस्तक पढ़ी को उस पर अपनी राय लिख दी—
आनन्दकानने ह्यस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु: । 
कवितामंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता ।।
श्रीरामचरितमानस मन्त्रमय है :-
एक बार सूरदासजी से किसी ने पूछा कि कविता सबसे उत्तम किसकी है ? इस पर उन्होंने कहा—‘मेरी ।’ फिर उसने पूछा गया कि गोस्वामी तुलसीदासजी की कविता को आप कैसी समझते हैं ? इस पर सूरदासजी ने कहा—‘वह कविता नही है, मन्त्र हैं ।’ श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां और दोहे आदि मन्त्र की तरह जपने पर महान फल देते हैं, बस मनुष्य को श्रद्धा-विश्वास से श्रीरामचरितमानस का पाठ करना चाहिए ।
श्रीरामचरितमानस है तरन-तारन ग्रन्थ है:-
श्रीरामचरितमानस भारत के हर घर में बड़े आदर के साथ पढ़ी व पूजी जाती है । इसने कितने बिगड़ों को सुधारा है, कितने मोक्ष के अभिलाषियों को मोक्ष की प्राप्ति करायी है । श्रीरामचरितमानस अपनी शरण में आने वाले प्राणी को श्रीरामप्रेम की मस्ती में सराबोर कर श्रीराम से मिलाती है और जीवन को सार्थक कर देती है ।
लोक व्यवहार की सभी बातों का समावेश :-
रामचरितमानस से बढ़कर मानव के लिए कोई नीति-ग्रन्थ नहीं हो सकता । इसमें गुरु-शिष्य, राजा-प्रजा, स्वामी- सेवक, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र-मित्र के आदर्शों के साथ धर्मनीति, राजनीति, कूटनीति, अर्थनीति, सत्य, त्याग, सेवा, प्रेम, क्षमा, परोपकार, शौर्य, दान आदि मूल्यों का सुन्दर विवेचन है । लोक-व्यवहार की सारी बातें हमें इसमें मिल जाती हैं । इसलिए भगवान शंकर द्वारा इस पर लिखे गये ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की कसौटी पर यह खरा उतरता है ।     
विदेशों में भी पूज्य है ये ग्रंथ:-
रामचरितमानस की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब प्रवासी मजदूरों को ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और कई अन्य देशों में ले जाया गया, तो वे कविता पाठ करने और रामलीला करने की समृद्ध परंपरा को अपने साथ ले गए, समय के साथ यह परंपरा वहां भी पनप गई।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुआ है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करता रहता है।)