नवंबर 1801 में अवध के नवाब शुजा- उद- दौला का उत्तराधिकारी सआदत अली खान ने गोरखपुर को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा था तब गोरखपुर को एक जिला बनाया गया था। जिसमे मौजूद जिला बस्ती और आसपास के क्षेत्र का भी समावेश था। सन् 1801 के पूर्व यह अवध प्रान्त के अंतर्गत मुगलों के अप्रत्यक्ष नियंत्रण में आता था । उस समय यह क्षेत्र वाराणसी मंडल के गोरखपुर जिले की सीमा का हिस्सा था। 1801 में अंगेजों के अधीन बस्ती एक तहसील की इकाई के रूप में आया है। तभी से यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया, उस समय यहां कानून-व्यवस्था और राजस्व वसूली एक बड़ी चुनौती थी।
गोरखपुर के पहले कलेक्टर श्री रूटलेज थे।1829 में, गोरखपुर को इसी नाम के एक डिवीजन का मुख्यालय बनाया गया था, जिसमें गोरखपुर, गाजीपुर और आज़मगढ़ के जिले शामिल थे। श्री आर.एम. बिराद को पहली बार आयुक्त नियुक्त किया गया था।
कैप्टन माल्कोम मक्लोइड राजस्व वसूली के लिए नियत
रूटलेज कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये। आदेश को लागू करने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने मदद के लिए सेना बढा दिया था। कप्तान माल्कोम मक्लोइड ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के एक सैन्य अधिकारी थे। जिनका मुख्य ऐतिहासिक संबंध उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले और गोरखपुर क्षेत्र के इतिहास से है। उन्हें मुख्य रूप से क्षेत्र में राजस्व (लगान) वसूली और कानून- व्यवस्था स्थापित करने के लिए जाना जाता है।
गोरखपुर के पहले ब्रिटिश कलेक्टर 'रूटलेज' ने जब भूमि राजस्व की वसूली के लिए सख्त कदम उठाए, तो स्थानीय जमींदारों और जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। कलेक्टर के आदेशों को कड़ाई से लागू करने और राजस्व वसूलने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने ब्रिटिश सेना के साथ आगे बढ़कर प्रशासन की मदद की थी। इस सैन्य हस्तक्षेप के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।
1865 में, बस्ती नया जिला बना
1865 में, नया जिला बस्ती गोरखपुर से बनाया गया था जहां अंग्रेज इस क्षेत्र से अधिक से अधिक राजस्व की वसूली कर रहे थे , वही स्थानीय शासक भी अपनी मनमानी करते रहे हैं। अवध (फैजाबाद) के सीधे नियंत्रण के बावजूद पटना, जौनपुर तथा बहराइच के नबाबों व सरदारों ने भी लूटपाट मचाया रखा था। परगना अमोढ़ा तो अंग्रेजों के अधीन सबसे बाद में आया है। अकबर के समय तक यह अवध का भाग ही बना रहा। चूंकि अंग्रेज इसे जब तक पूर्णरूपेण अपने अधीन नहीं कर लिए, उनकी गतिविधियां इस क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही रही है।
कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम कैप्टन गंज नाम मिला :-
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्थित 'कैप्टनगंज' कस्बे का नाम कैप्टन मैलकाम मैकलाॅज के नाम पर ही पड़ा है। ब्रिटिश काल के दौरान उनके यहां सैन्य शिविर (कैंप) लगाने और क्षेत्र में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण इस जगह को 'कैप्टनगंज' कहा जाने लगा।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में विद्रोह की आग भड़की, तब ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा था। इतिहास के स्थानीय संदर्भों के अनुसार, स्थिति को नियंत्रित करने और ब्रिटिश सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए कैप्टन माल्कोम मक्लोइड ने अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ बस्ती और उसके आस-पास के क्षेत्रों की ओर कूच किया था।
प्रतीत होता है कि 1801 ई. से ही कैेप्टनगंज बस्ती जिले का महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था और यह अंग्रेजों का एक सुरक्षित तथा सुविधापूर्ण स्थल बन गया था। मैलकाम मैकलाॅज की तैनाती के दौरान इस सीमावर्ती क्षेत्र (बुटवल और नेपाल सीमा) में गोरखाओं के साथ ब्रिटिश सेना की कई झड़पें हुईं। इस क्षेत्र की अशांति और सामरिक महत्व को देखते हुए उनके सैन्य अभियानों ने आगे चलकर ऐतिहासिक एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814– 1816) की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई थी।
1815 व 1816 ई. में जिले के उत्तरी क्षेत्र बांसी तथा मगहर में सियारमार एक खानाबदोस जाति के लोगों ने लूटपाट करना शुरू कर दिया था। मई 1816 ई. में इस दल ने कैप्टनगंज से उस समय का 6,000 रूपया लूट लिया था। एसा लुका छिपी का खेल 1857 ई तक पूरे जिले में चलता रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के 1857 के विद्रोह के समय पूरे देश में अंगे्रजों पर संकट के बादल मड़राने लगे थे। सभी अंग्रेज जान बचााकर भाग रहे थे । उन्हें व उनके परिवार पर संकट बरकरार था।
बस्ती कल्कट्री पर पहले अफीम तथा ट्रेजरी की कोठी हुआ करती थी। यहां 17वीं नेटिव इनफेन्ट्री की एक टुकड़ी सुरक्षा के लिए लगाई गई थी। इस यूनिट का मुख्यालय आजमगढ ़बनाया गया था। जहां 5 जून 1857 को विद्रोह भड़क उठा था। 6 अंगे्रज भगोड़ों का एक दल नांव द्वारा अमोढ़ा होते हुए कप्तानगंज स्थित अंग्रेज कैप्टन के शरण में आया था। तहसीलदार ने उन्हें चेतावनी दिया था कि शीघ्र बस्ती छोड़ दें।
दिल्ली व अवध के नबाब के प्रतिनिधि राजा सैयद हुसेन अली उर्फ मोहम्मद हसन उत्तर प्रदेश के बदायूं (सहसवान, काजी मोहल्ला) के मूल निवासी थे। वह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के सम्राट और अवध के नवाब के प्रमुख प्रतिनिधि और एक महान क्रांतिकारी सेनानी थे। उन्होंने कर्नल लेनाक्स ,उनकी पत्नी तथा बेटी को अपनी संरक्षा में ले रखा था। पेप्पी ने इन्हें भी मुक्त कराया था। 12 अगस्त 1857 को मोहम्मद हसन के नेतृत्व में बागियों ने कैप्टनगंज को अपने अधीन कर रखा था।
अमोढ़ा के देशी सैनिकों से 17 अप्रैल तथा 25 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों को बुरी तरह मात खाना पड़ा था। छः अंग्रेज अधिकारियों को छावनी में अपने जान गवाने पड़े थे। फैजाबाद से सेना बुलाकर विद्रोह को दबाना पड़ा था। छावनी बाजार के पीपल के पेड़ पर 150 विद्रेहियों को फांसी पर लटकाया गया था। अनेक अंग्रेजों की कब्रें व स्मारक भी सरकार ने बनवाये हैं। राफक्राफ्ट कैप्टनगंज आ गया तथा जून 1858 के आरम्भ तक यहां कैम्प किया था। अंग्रेजी सेना मो. हसन के पीछे पड़ी थी। वह भागते छिपते अंग्रेजी सेना के शरण में 4 मई 1859 को चला आया था । उसे क्षमा करते हुए सीतापुर की एक छोटी सी रियासत गुजारे में दी गई थी। गोपाल सिंह नामक सूर्यवंशी एक जमीदार को कैप्टनगंज का तहसील देकर कृतकृत्य किया गया था। उसे अनुदान में जमीन भी दिया गया था।
बांसी के राजा रत्नसेन को उपहार में मिला था रतास गांव :-
कैप्टनगंज जो रतास नामक एक छोटा सा गांव था , कैप्टन स्तर के एक सैन्य अधिकारी द्वारा स्थापित सैनिक कार्यालय तथा बाजार 1861-62 तक स्थापित हो चुका था । 1865 में यहां तहसील तथा मुंसफी न्यायालय स्थापित हो चुके थे। रतास अंग्रेजो द्वारा राजा बांसी को दिया गया भेंट था क्योंकि उन्होने अंग्रेजों की काफी मदद की थी। प्रतीत होता है कि बांसी के राजा रतन सेन के नाम को स्थायी प्रदान करने के कारण रतास का नाम पड़ा होगा। यही रतास आगे चलकर कैप्टनगंज ब्रिटिस टाउन मुंसफी व तहसील की शक्ल लिया था। आजादी के बाद इसका नाम कप्तानगंज कर दिया गया।
1857 की क्रांति को जब अंग्रजों से भलीभांति संभाला तब आगे की सुव्यवस्था के लिए बस्ती तहसील मुख्यालय को 1865 में जिला मुख्यालय घोषित कर दिया गया। बस्ती , कैप्टनगंज ,खलीलाबाद, डुमरियागंज तथा बांसी नाम से 5 तहसीलें भी घोषित की गई। विशाल भूभाग तथा अमोढ़ा की सक्रियता के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों से संभल नहीं पा रहा था। फलतः 1876 में कैप्टनगंज को तहसील व मुंसफी समाप्त करके हर्रैया में तहसील व मुंसफी बनाई गई । इस प्रकार लगभग 15 सालों तक कैप्टनगंज ब्रिटिश प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई के रूप में बना रहा। 109 ग्राम सभाओं/पंचायतों तथा 11 न्याय पंचायतों को समलित करते हुए 2 अक्टूबर 1956 को पुराना कैप्टनगंज अब नया कप्तानगंज विकास खण्ड का मुख्यालय घोषित किया गया।
इस गाँव का नाम शायद इसलिए पड़ा क्योंकि अवध प्रशासन के दौरान या ब्रिटिश शासन शुरू होने के कुछ समय बाद तक यह एक छोटा मिलिट्री स्टेशन था। यह बस्ती से नौ मील पश्चिम में, फैजाबाद से गोरखपुर जाने वाली प्रांतीय सड़क के दक्षिण में टप्पा नवाई में स्थित है (26° 40' N और 82° 35' E)। बुकानन के समय में यहाँ सिर्फ़ 25 दुकानें थीं, लेकिन बाद में तहसील और मुंसिफ़ का केंद्र बनने के कारण इसका महत्व बढ़ गया। 1876 में तहसील को हरैया स्थानांतरित कर दिया गया और तब से कैप्टनगंज का महत्व कम हो गया। यहाँ अभी भी एक पुलिस स्टेशन, एक पोस्ट-ऑफिस, एक लोअर प्राइमरी स्कूल और 1996 में बना एक पशु-बाड़ा (cattle-pound) है। वर्तमान समय का थाना पुरानी तहसील की इमारत में स्थित है, जो 1857 के विद्रोह के दौरान लड़ाई का केंद्र थी, थाने के पास के बाग में उस घर के अवशेष हैं जहाँ कभी सैनिकों के कमांडर अधिकारी रहते थे। कई वर्षों तक इसका उपयोग मुंसिफ़ कोर्ट के रूप में किया जाता रहा है, लेकिन मुंसिफ़ कोर्ट के हरैया स्थानांतरित होने के बाद से यह इमारत खंडहर हो गई है। गाँव में एक सुंदर मस्जिद है, जिसे हाल ही में एक मुस्लिम निवासी ने बनवाया था; यह एक कलात्मक संरचना है और इसे कुशल कारीगरों ने काफी लागत से बनाया था। गाँव के पूर्व में स्थित पुरानी सराय का उपयोग अभी हाल तक किया जाता है।
यहाँ मुख्य रूप से कुंजड़े और कुचरी जातियाँ रहती हैं। रतास गाँव का कुल क्षेत्रफल 238 एकड़ है, जिसमें से लगभग 190 एकड़ में खेती होती है; राजस्व 350 रुपये है और इसके मालिक बांसी के राजा हैं, जिनके पूर्वज को यह विद्रोह के बाद सरकार से उपहार के रूप में मिला था। राजस्व मौज़े का पुराना नाम रतास है।
(स्रोत:बस्ती डिस्ट्रिक गजेटियर: एच. आर. नोविल ,1907, पृष्ठ 202)
चूंकि ब्रिटिशकाल में यह 10 से अधिक वर्षों तक तहसील मुख्यालय का गौरव प्राप्त कर चुका है इसलिए इसे तहसील घोषित करने के लिए सारी परिस्थितियां भी अनुकूल हैं। इससे यह क्षेत्र मण्डल के अन्य तहसीलों की भांति विकास के पथ पर चल सकेगा। यह स्थान एक तो राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर स्थित है तथा यह रामजानकी मार्ग के दुबौलिया तथा लखनऊ गोरखपुर रेलवे लाइन के टिनिच व गौर नामक स्टेशनों से जुड़ा भी है। विकास की दृष्टि से जब से यहां से तहसील हर्रैया गई यह क्षेत्र पिछड़ता ही रह गया था। यह कस्बे से ज्यादा कुछ नहीं हो सका। यहां विकास की असीम सम्भावनाएं है।
लेखक -
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8, निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,आनन्दनगर,कटरा,बस्ती,
Pin- 272001,उत्तर प्रदेश INDIA
मोबाइल नंबर +91 9412300183
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