Thursday, November 16, 2017

स्लम में बस गया परिवार - डा. ज्ञानेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

बात प्यारी लगती है, 
पर अब लौट कर जाएँ तो जाएँ कहां? 
पहले त्योहारों में, 
मुंडनछेदन में, कथा - भागवत में और छोटे -मोटे जलसों में दिन मजे से कट जाते थे। 
मगर नौकरी की चाह में 
बेटी के ब्याह में 
मुकदमे की तारीख में 
दबंगों के खौफ में 
लोगों को हैरान परेशान बहुत देखा है। 
हरे भरे खेत में बाग और खलिहान में पडोसी की गडी हुई आँख थी। 
बाप की चिंता में खडी बेटी जवान थी। 
पड़ोसियों की हाय हाय और शोहदों की नजर से माँ और बापू परेशान थे। 
वर की खोज और दहेज की तैयारी में टूट गई पनही और बिक गए धान थे। 
बेटा नकारा फिरे मारा मारा लानत बरामत होवे सुबह-शाम थी।
चलो परदेश अब नहीं कुछ ढंग इस देश में, 
बैठ गए ट्रेन में मुसाफिर के वेष में। 
साल भर बाद चिट्ठी आई गांव से 
बहिनी की शादी मा का लगइहो 
आके का करिहो, 
कौन मुहं  देखइहो जो खाली हाथ अइहो 
पठ्यो परदेशी ने साथी के हाथ रुपया पचास और लट्ठे का थान। 
बन गए बंधुआ बेगार खुराक पोशाक में, 
एक साल पूरा करेंगे काम लालाजी की दुकान में। 
कर्ज में डूबे पिताजी की बिक गई भैंस - गाय, 
खेत गिरवी होगए खलिहान हुआ भांय भांय। 
दबंगों ने इज्जत की कर दी ऐसी तैसी 
छोड़ दियो गांव और छूट गईं भैंसी 
बेटे के पास पंहुच कर करने लगे बेगार 
गांव से निकलकर स्लम में बस गया फिर से परिवार।



हिन्दी यात्रा-साहित्य का इतिहास डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' का यायावरी जीवन - डा. राधेश्याम द्विवेदी

                                 डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस
यात्रा-साहित्य का उद्देश्य : यात्रा करना मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। हम अगर मानव इतिहास पर नज़र डालें तो पाएँगे कि मनुष्य के विकास की गाथा में यायावरी का महत्वपूर्ण योगदान है। अपने जीवन काल में हर आदमी कभी-न-कभी कोई-न-कोई यात्रा अवश्य करता है लेकिन सृजनात्मक प्रतिभा के धनी अपने यात्रा अनुभवों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर यात्रा-साहित्य की रचना करने में सक्षम हो पाते हैं। यात्रा-साहित्य का उद्देश्य लेखक के यात्रा अनुभवों को पाठकों के साथ बाँटना और पाठकों को भी उन स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित करना है। इन स्थानों की प्राकृतिक विशिष्टता, सामाजिक संरचना, सामाज के विविध वर्गों के सह-संबंध, वहाँ की भाषा, संस्कृति और सोच की जानकारी भी इस साहित्य से प्राप्त होती है।
आरंभिक युग :-हिंदी साहित्य में अन्य गद्य विधाओं की भाँति ही भारतेंदु-युग से यात्रा-साहित्य का आरंभ माना जा सकता है। उनके संपादन में निकलने वाली पत्रिकाओं में ‘हरिद्वार’, ‘लखनऊ’, ‘जबलपुर’, ‘सरयूपार की यात्रा’, ‘वैद्यनाथ की यात्रा’ और ‘जनकपुर की यात्रा’ आदि यात्रा-साहित्य प्रकाशित हुआ। इन यात्रा-वृतांतों की भाषा व्यंग्यपूर्ण है और शैली बड़ी रोचक और सजीव है। इस समय के यात्रा-वृतांतों में हम दामोदर शास्त्री कृत ‘मेरी पूर्व दिग्यात्रा’ (सन् 1885), देवी प्रसाद खत्री कृत ‘रामेश्वर यात्रा’ (सन् 1893) को महत्वपूर्ण मान सकते हैं किंतु यह यात्रा-साहित्य परिचयात्मक और किंचित स्थूल वर्णनों से युक्त है।
बाबू शिवप्रसाद गुप्त द्वारा लिखे गए यात्रा-वृतांत ‘पृथ्वी प्रदक्षिणा’ (सन् 1924) को हम आरंभिक यात्रा-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान दे सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता चित्रात्मकता है। इसमें संसार भर के अनेक स्थानों का रोचक वर्णन है। लगभग इसी समय स्वामी सत्यदेव परिव्राजक कृत ‘मेरी कैलाश यात्रा’ (सन् 1915) तथा ‘मेरी जर्मन यात्रा’ (सन् 1926) महत्वपूर्ण हैं। इन्होंने सन् 1936 में ‘यात्रा मित्र’ नामक पुस्तक लिखी, जो यात्रा-साहित्य के महत्व को स्थापित करने का काम करती है। विदेशी यात्रा-विवरणों में कन्हैयालाल मिश्र कृत ‘हमारी जापान यात्रा’ (सन् 1931), रामनारायण मिश्र कृत ‘यूरोप यात्रा के छः मास’ और मौलवी महेशप्रसाद कृत ‘मेरी ईरान यात्रा’ (सन् 1930) यात्रा-साहित्य के अच्छे उदाहरण हैं।
स्वतंत्रता-पूर्व युग :-यात्रा-साहित्य के विकास में राहुल सांकृत्यायान का योगदान अप्रतिम है। इतिवृत्त-प्रधान शैली होने के बावजूद गुणवत्ता और परिमाण की दृष्टि से इनके यात्रा-वृतांतों की तुलना में कोई दूसरा लेखक कहीं नहीं ठहरता है। ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘रूस में 25 मास’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘यात्रा के पन्ने’, ‘जापान, ईरान, एशिया के दुर्गम खंडों में’ आदि इनके कुछ प्रमुख यात्रा-वृतांत हैं। राहुल सांकृत्यायन के यात्रा-साहित्य में दो प्रकार की दृष्टि को साफ देखा जा सकता है। उनके एक प्रकार के लेखन में यात्राओं का केवल सामान्य वर्णन है और दूसरे प्रकार के यात्रा-साहित्य को शुद्ध साहित्यिक कहा जा सकता है। इस दूसरे प्रकार के यात्रा-साहित्य में राहुल सांकृत्यायन ने स्थान के साथ-साथ अपने समय को भी लिपिबद्ध किया है। सन् 1948 में इन्होंने ‘घुम्मकड़ शास्त्र’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिससे यात्रा करने की कला को सीखा जा सकता है। इनका अधिकांश यात्रा-साहित्य सन् 1926 से 1956 के बीच लिखा गया।
स्वातंत्रयोत्तर युग :- राहुल सांकृत्यायन के बाद यात्रा-साहित्य में बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि-कथाकार अज्ञेय का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। अज्ञेय अपने यात्रा-साहित्य को यात्रा-संस्मरण कहना पसंद करते थे। इससे उनका आशय यात्रा-वृतांतों में संस्मरण का समावेश कर देना था। उनका मानना था कि यात्राएँ न केवल बाहर की जाती हैं बल्कि वे हमारे अंदर की ओर भी की जाती हैं। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ (सन् 1953) और ‘एक बूँद सहसा उछली’ (सन् 1960) उनके द्वारा लिखित यात्रा-साहित्य की प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ में उनके भारत भ्रमण का वर्णन है और दूसरी पुस्तक ‘एक बूँद सहसा उछली में’ उनकी विदेशी यात्राओं को शब्दबद्ध किया गया है। अज्ञेय के यात्रा-साहित्य की भाषा गद्य भाषा के नए मुकाम तक ले जाती है।
आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में बहुतायत से यात्रा-साहित्य का सृजन हुआ। अनेक प्रगतिशील लेखकों ने इस विधा को समृिद्ध प्रदान की। रामवृक्ष बेनीपुरी कृत ‘पैरों में पंख बाँधकर’ (सन् 1952) तथा ‘उड़ते चलो उड़ते चलो’, यश्पाल कृत ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’ (सन् 1953), भगवतशरण उपाध्याय कृत ‘कलकत्ता से पेकिंग तक’ (सन् 1953) तथा ‘सागर की लहरों पर’ (सन् 1959), प्रभाकर माचवे कृत ‘गोरी नज़रों में हम’ (सन् 1964) उल्लेखनीय हैं।
हिंदी यात्रा-साहित्य के संदर्भ में मोहन राकेश तथा निर्मल वर्मा को भी बड़े हस्ताक्षर माना जाता है। इन्होंने यात्रा-साहित्य को नए अर्थों से समन्वित किया। मोहन राकेश द्वारा लिखित ‘आखिरी चट्टान तक’ (सन् 1953) में दक्षिण भारत का विस्तार से वर्णन किया गया है। दक्षिण भारतीय जीवन पद्धति के विविध बिम्बों को इसमें लेखक ने यथावत प्रस्तुत कर दिया है। इनके यात्रा-साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कहानी की-सी रोचकता और नाटक का-सा आकर्षण देखा जा सकता है। निर्मल वर्मा ने ‘चीड़ों पर चाँदनी’ (सन् 1964) में यूरोपीय जीवन के चित्रों को उकेरा है। निर्मल वर्मा के यात्रा-साहित्य में न केवल अपने समय का वर्णन रहता है बल्कि इतिहास और संस्कृति के अनेक बिंदुओं को भी इसमें अभिव्यक्ति मिलती है। विदेशी संदर्भों को भी उनके गद्य की सहजता बोझिल नहीं होने देती।
कोई भी लेखक अच्छा लेखक तभी बनता है जब वह जीवन को समीप से देखता है और जीवन को समीप से देखने का सबसे सरल माध्यम यात्रा करना है। रचनात्मक लेखन करने वाला हर लेखक अपने साहित्य में किसी न किसी रूप में यात्रा-साहित्य का सृजन अवश्य करता है। हमने उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण में देखा कि हिंदी में यात्रा विषयक प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। हिंदी गद्य के साथ-साथ इसने भी पर्याप्त विकास किया है। अधिकांश लेखकों ने इस विधा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है
डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' का यायावरी जीवन:- हिन्दी साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान होने के कारण कविता , नाटक कथा उपन्यास तथा यात्रा वृतान्त डा. सरस जी के प्रिय विषय व अभिरूचि हो गये थे। वह एक शिक्षाविद् प्रतिष्ठित कवि एवं उत्कृष्ट साहित्यकार के रूप में जाने जाते थे। काव्य गोष्ठियों में आने जाने के कारण उनमें यायावरी प्रवृति आ गई थी। फलतः वे भारत के कोने से कोने सभी क्षेत्रों का अनेक बार भ्रमण किये हंै। 1975 में नागपुर में होने वाले प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में समलित होकर बस्ती जनपद का प्रतिनिधित्व किया था। इसके उपरान्त उन्होने कामरूप, गोहाटी, शिलांग, चेरापूंजी, जयगांव, गंटोक, कोलकाता , गंगा सागर, जगन्नाथपुरी, जमशेदपुर, गया ,वैद्यनाथ धाम, कोणर्क, नन्दन कानन,नाथद्वारा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, उदयपुर, अजमेर, जोधपुर ,आगरा दिल्ली, मथुरा, नैनीताल मंसूरी ,हरिद्वार, ऋषिकेश, काठमाण्डू, पोखरा तानसेन, दाड़ग, नेल्लौर, तिरूपति मदुरै, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, धनुषकोटि, मद्रास, कांचीपुरम, महाबलीपुरम, हैदराबाद, सासाराम, मुम्बई , नसिक, औरंगाबाद, एलोरा, देवगिरि, त्रयम्बकेश्वर, खुल्दाबाद, ओंकारेश्वर, भोपाल झांसी, मथुरा,उज्जैन, चित्रकूट, रेणकूट हरिद्वार, देहरादून ,यमनोत्री, गंगोत्री, केदानाथ, त्रजुगी नाराण्ण, बद्रीनाथ, देवप्रयाग, जोशीमठ मैहर, पन्ना,खजुराहो, जम्बू, पठानकोट,चण्डीगढ़, अम्बाला, वैष्णवदेवी, शिमला, चम्बा, डलहौजी, कुल्लू, मनाली, टनकपुर कांगड़ा, मैसूर ,द्वारका, पोरबन्दर, सोमनाथ, जूनागढ़, अहमदाबाद, माउन्टआबू, बडोदरा ,उज्जैन,नरायण सरोवर भुज, बंगलौर, तिरूवन्तपुरम, गोवा, कांगड़ा मैसूर, कालीकट, उदुपी, उड़मंगलम तथा वृन्दावन गार्डन आदि स्थलों को अनेकों बार भ्रमण किया है। जिनका पूरा वृतान्त भी तीन भागों में लिखकर प्रकाशित कराया है।
डा. सरस जी ने वाराणसी के काशी विद्यापीठ से ’’बस्ती के छन्दकार’’ विषय पर डा. केशव प्रसाद सिंह के निर्देशन में पी.एच .डी. की उपधि अर्जित की है। जिसमें बस्ती जिले वर्तमान में बस्ती मण्डल के 250 वर्षों के विखरे पड़े साहित्यिक बृतान्तों को एक में संजोया है। इसे तीन भागों में प्रकाशित कराया गया है। इसमें लगभग 100 कवियों को स्थान दिया गया हैं आधे से ज्यादा कवियों को सांगोपांग वर्णन तथा उपलब्ध रचनाओं का एकाधिक नमूना प्रदर्शित करते हुए चित्रित किया गया हैं सामग्री के अभाव में लगभग आधा शतक कवियों का संक्षिप्त उपलब्धियां तथा परिचय प्रस्तुत किया गया है। इस परिचय के आधार पर भविष्य में काम करने वाले अध्येता को काफी सहुलियत होने का अनुमान किया गया है। डा. सरस पचीसों बार आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के गोरखपुर तथा लखनऊ के केन्द्रो पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। उन्होंने बाल साहित्य कला अवकास संस्थान की स्थापना करके अखिल भारतीय बाल साहित्यकार सम्मेलन करके 50 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के बाल साहित्यकारों को सम्मानित किया है। साथ ही ‘‘बालसेतु’’ नामक त्रयमासिक पत्रिका प्रकाशन भी किया है।
प्रकाशित पुस्तकें :- गूंज, नौसर्गिकी , विजयश्री, बलिदान, मधुरिमा, बासन्ती, वृतान्त, संकुल, सौरभ, जय भरत, विवेकानन्द, बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 1 व 2 । बाल साहित्य:- नेहा, स्नेहा, जलेबी, बाल प्रयाण, बाल त्रिशूल भाग 1,2 व 3 , विवेकानन्द, बाल बताशा, पुलु-लुलू झॅइयक झम, गाबड़गिल, चरणपादुका, बाल कथाएं, साहित्य परिक्रमा भाग 1 , 2 इत्यादि। अप्रकाशित काव्य:-चन्द्रगुप्त  महाकाव्य,जय भरत,  क्षमा प्रतिशोध,नगर से नागपुर, बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 3 विषपान, छन्द बावनी आदि।
बाल साहित्य:- नेहा, स्नेहा, जलेबी, बाल प्रयाण, बाल त्रिशूल भाग 1,2 व 3 , विवेकानन्द, बाल बताशा, पुलु-लुलू झॅइयक झम, गाबड़गिल, चरणपादुका, बाल कथाएं, साहित्य परिक्रमा भाग 1 , 2 इत्यादि।

अप्रकाशित काव्य:-चन्द्रगुप्त  महाकाव्य,जय भरत,  क्षमा प्रतिशोध,नगर से नागपुर, बस्ती जनपद के साहित्यकार भाग 3 विषपान, छन्द बावनी आदि।
                             
 इस लेख के लेखक 
डा. राधेश्याम द्विवेदी

सबदिन रहत ना एक समान (कविता) - डा. राधेश्याम द्विवेदी



साधो, सबदिन रहत ना एक समान
कबहु चढ़त-कबहुं उतरत, जानत ना कोई सकल जहांन।
इतिहास की बात है नहिखौ, अनुभव से जीयत है जहांन।
पूरखों के बातन सच माने,कौनो बातन मां ना मांगे प्रमान।
उनको दकियानूसी ही समझे, खुद को समझे ज्ञाता विज्ञान।
गांव से निकला शहर में सैरा, महानगरों की चकाचैधान।
अन्त समय फिर गांव में आये, ज्ञान-विज्ञान सब रहा धरान।
दोनों टाइम रोटी ही मिलि रही, तन ढ़कने का बस्त्र सुहान।
अन्न ना मिलता भूख लगति रही, अब मिलिबें को भूख ना भान।
अन्त समय कछु भी नहिं जावै, खाया पीया ही सब आवै काम।
परमेश्वर की गती है निराली, कोई भी ना जान पाया है जहांन ।। 
  

पी जाऊ जहर घुटके - डा. राधेश्याम द्विवेदी


आगरा मण्डल तूने कैसा ये सबक दे दिया ?
जीवन समर्पित तुझपर तुमने ये सिला दिया।
दिलमें जगह बनाकर सांसों में तुम्हें बसाया।
तुम अन्त में एसे अटके हमको सिला दिया।।
सांसों  में ख्वाब सपने सब इर्द गिर्द आते।
बीते हुए वे लमहे सब रील बनकर चलते।
कुछ कर्ज रह गया है कुछ फर्ज रह गया है।
बार बार तेरी यादें दिल में जो बस गया है।।
आये अनेक अफसर पर एसा नही था कोई।
हम जी जान भी लुटाये कीमत ना आंका कोई।
पद अवसर शरीर सब कुछ छूटेगा यहीं पर।
नेकनीयती ही जाती सब रह जाती धरा पर।।
पाया बहुत यहां पर यहां का होकर जो रहा मैं।
पर अन्त सबक कड़वा भोगा ना कोई जहां पर।
सब स्वार्थ में भरे हैं अपनी ही अपनी देखें।
आने पर खुशी बांटे जाने पर दुख वे देते।।
हम तरस खाते तुमपर तुम भले जैसे भी हो।
हम झेल लेंगें सबकुछ हर कष्ट भी कैसे हो।
जीवन का ये सफर भी कट जाएगा एसे तैसे।
पर तुम यदि खुशी पाओं पीजाऊ जहर घुटके।।



आगरा का लूट और दोहन ही आगरा की पहचान बनी -डा.. राधेश्याम द्विवेदी ’नवीन’


जम्बू नामक प्राकृतिक द्वीप में आर्यावर्त नामक भूखण्ड को भारत खण्ड के नाम से जाना जाता है। इसी के  अन्तर्गत ब्रजमण्डल की धरती भी है। इसमें स्थित 12 बनों तथा 24 उपबनों का नाम बहुत ही आदर व श्रद्धा के साथ लिया जाता है। इसी ब्रजमण्डल में एक अगर बन भी रहा है, जहां अगर नामक जंगली वृक्षों की कभी बहुलता रही। इसी अगर वन से ही मेरा अस्तित्व बनते बनते आज एक विश्व प्रसिद्ध ताजनगरी आगरा के रुप में आ बना है। अगर वन की पावन भूमि को अभिसिंचित करते हुए मेरा सांस्कृतिक स्वरूप अति समृद्ध रहा है। भारत पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही रहे हैं। जो धर्म बदले उन्हें अच्छी अच्छी जागीरें  दी गयीं। वे बड़ी संख्या में यहां के प्राचीन किलों व मंदिरों को तोड़कर नये किले मस्जिद तथा सैरगाहें बनवाने लगे। हमारे पुरानी करीगरों को काम मिल गया। वे भी अपने जी जान से इस काम को करने लगे। जहां मौका पाया वहां अपने सनातनी चिन्हों व प्रतीकों को भी इन भवनों पर उकेरने लगे। आगरा में इमारतों पर इसे आसानी से देखा व समझा जा सकता है। सदियों से सियासतदारों ने आगरा को लूटा और दोहन किया बादलगढ़ पर ही अकबर ने भव्य किला बनवाया था। ताजेश्वर महादेव मंदिर पर ताजमहल बनाने की बात विल्कुल काल्पनिक तो नहीं है। इसी तरह फतेहपुर सीकरी भी जंगली व पहाड़ी किला नहीं था। यहां जैनियों के इतनी मूर्तियां मिली हैं कि इसे नया कहने के बजाय अतिक्रमण की संज्ञा देना किसी भी सूरत में गलत नहीं होगा। अकबर का मकबरा भी पंचायत हिन्दू मंदिर की शैली में बना देखा जा सकता है। इसी तरह एत्माउद्दौला, मेहताब बाग जैसे दर्जनों स्मारक मेरे ही वक्षस्थल पर ही बने हैं। कुछ की संरक्षण व व्यवस्था के लिए भारत सरकार एक निश्चित शुल्क भी निर्धारित कर रखी है। कुछ निःशुल्क भी है। मेरा ताजमहल तो दुनिया के सात अजूबों में शुमार है। पहले सप्ताह में एक दिन शुक्रवार को यह निःशुल्क देखा जाता था। बाद में यह व्यवस्था वन्द कर दी गयी अब तो इस दिन नागरिकों के लिए ताज बन्द रहता है। केवल नमाजियों के लिए दोपहर बाद खोला जाता है। परम्परा के नाम पर आज ना केवल स्थानीय अपितु भारत व विदेशों के मुस्लिम इस मस्जिद में नमाज पढ़ने से ना तो अपने को रोक पाते हैं और ना ही प्रशासन उसे रोक पाता है। परम्परा के नाम पर ताज परिसर में दशहरा के दिन मेला लगता था जो अब नहीं करने दिया जाता हैं। ताज के अन्दर आंवले की पूजा भी सदियों से चली आ रही थी। जिसे अब हमेशा हमेशा के लिए पेड़ कटवाकर खत्म करवा दिया गया। गौशाला का नाम आज भी चला आ रहा है। इसे हिन्दू जन अपने शिव मंदिर का एक भाग आज भी मानते हैं । आज भी यमुना की रेती या कोरिडोर से ही ताज की पूजा होने की बात मरे कुछ भक्त करते रहते हैं। मैं अपनी वेदना में क्या क्या गिनाऊ आप मुझे क्या क्या समझने लगेगें ? परन्तु यह सत्य है कि एक समय था जब मैं पहले देश की राजधानी था। बाद में मैं आगरा सूबे का, फिर पश्मिोत्तर प्रान्त का और बहुत बाद में आगरा एक मण्डल का मुख्यालय मात्र रह पाया। यही पर प्रदेश का पहला उच्च न्यायालय बना था। समय चक्र ने करवटें बदली। मैं अपनी शान दिन बदिन खोता गया।
मैं सिसक रहा हूं। मैं रो भी नहीं पा रहा हॅू। मैं तड़प रहा हूं। मैं दुखी हूं। मैं उलझन में हूं। सरकार आती है, चली जाती है और मैं वहीं का वहीं रह जाता हूं। मेरी बात विधायक सुनता है, ना सांसद। ना मंत्री सुनता है और नाही संतरी। मुझे अपना अक्षुण्य  गौरवशाली अतीत चाहिए। मुझे चाहिए कल-कल करती यमुना की पहले जैसी निर्मल जल धारा। मुझे सरपट चलती गाड़ियां चाहिए और आसमान में उड़ने वाले तेज गति के वायुयान। मुझे चाहिए मेल मिलाप भाई चारा तथा जो इतिहास मेरा छीन लिया गया है उसे पुनः सुधारा जाय दुबारा लाया जाय। मुझे सुरक्षा चाहिए शान्ति चाहिए तथा निरापद आवागमन का साधन चाहिए। मेरी यमुना में पानी के नाम पर मलमूत्र और फैक्ट्रियों के कचरे मात्र है। दिल्ली, हरियाणा से ही मलमूत्र रहा है। मेरी यमुना को शुद्ध करने के लिए हजारों करोड़ रुपये जल निगम वाले डकार चुके हैं। सिर्फ बारिश में यमुना कुछ समय के लिए भरी हुई दिखती है। इसके बाद तो सिर्फ नाला ही नजर आती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यमुना में गंदगी डाली जा रही है। अब ना तो भैंसें स्नान कर पा रही हैं। ना धोबी कपड़े धो पा रहे हैं। नालों की गंदगी जा रही है। कोई रोकने वाला नहीं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बस देखने के लिए हैं। यमुना में पानी नहीं है तो मेरी कोख से पानी निकाला जा रहा है। आखिर मैं इतना पानी कहां से लाऊं। आज मेरा आंचल तो राजस्थान का रेगिस्तान हो गया है। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हमेशा ही हमारा शोषण किया है। अपनी सियासत को पक्का करने के लिए हर सियासतदारों ने यहां की भोली भली जनता का शोषण किया है। कारीगरों के हाथ कटवा दिये गये। उनके परिश्रम का मूल्य नहीं दिया गया । सत्तादारों ने कर्मचारियों का भरपूर शोषण किया है। यह क्रम आज भी जारी है । आज भी अपनी सत्ता के लिए कर्मचारियों का शोषण बन्द नहीं हैं। कर्मचारियों तथा रिटायरियों के हितलाभ पर बड़े बड़ें कुण्डली मार कर बैठ गये हैं। प्रशासन मे रुचि ना होने वालों को तथा भ्रष्टाचार की उगाही के लिए सामान्य गति से काम नहीं हो रहे हैं। यह रुप प्रायः हर दफतर कार्यालय में देखा जा सकता है। भाषण मात्र देने से पेट की आग नहीं बुझती जनाब। उसके लिए पेट में कुछ अन्न जल जाना चाहिए। जमीनी स्तर पर काम दिखना भी चाहिए। हम जब पुराना इतिहास संजो लेते हैं तो आपके विकास की गंगा के साक्षी बन जायेंगे या सूखी रेगिस्तानी यमुना का बेहाल कारस्तानी भी झेल लेगें। मैं तो यही सूत्र वाक्य दुहराऊंगा-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)