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Tuesday, October 17, 2023

सिद्धकुंजिका स्त्रोतम दुर्गा सप्तशती की मूल शक्ति है. आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी

शारदीय नवरात्र चल रहा है। वैसे देवी भागवत और दुर्गा सप्त शती का पूर्ण पाठ का प्रचलन हमारे देश में है, पर समय के अभाव  में जो लोग पूरा सप्तशती के पाठ का ना कर पाए वे इस स्त्रोत के पठन , वाचन और श्रवण से भी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं।

सिद्ध कुंजिका स्त्रोत के पाठ का महत्व:-

कुंजिका का अर्थ होता है "कुंजी"। सिद्ध कुंजिका स्त्रोत मां को प्रसन्न करने की चाभी के समान होता है। कुंजिका से तात्पर्य चाबी होता है। यह दुर्गा सप्तशती से प्राप्त शक्ति को जगाने का कार्य करता है। सिद्ध कुंजिका स्रोत पूर्णता का ऐसा गीत है जो वृद्धि के कारण अब छिपा हुआ नहीं है।  सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ से व्यक्ति दुर्गाजी की कृपा सहज रूप से प्राप्त कर लेता है और उसके जीवन में आने वाली समस्याओं से जगदंबा उसे मुक्ति दिला देती है।

          जानकारों का कहना है कि जिस व्यक्ति के पास संपूर्ण दुर्गा सप्तशती चंडी पाठ का समय नहीं है तो वह केवल सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ करके भी पूरी दुर्गा सप्तशती के पाठ का फल प्राप्त कर सकता है। इसका उपयोग बीज उत्किलन के लिए किया जाता है।  इसके बारे में दुनिया के बहुत कम लोग ही जानते हैं और ये अत्यधिक दुर्लभ स्त्रोत है  ।  वर्तमान में लोग शास्त्रों, पुराणों से दूर हो गए हैं। प्राचीन काल से सिद्ध किया जाने वाला ये मंत्र अत्यधिक प्रभावशाली है। इसमें उपस्थित शक्ति किसी का भी भाग्य चमकाकर उसे कीर्तिमान बना सकती है।
         इस स्त्रोत का आध्यात्मिक महत्व भी है क्योंकि यह हमारी ऊर्जाओं पर कार्य करता है। इस मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न हुई ऊर्जा हमें प्रेरित करती है कि हम अपनी चेतना के स्तर से ऊपर उठें। भगवान शिव ने खुद मां पार्वती को सुनाया था ये स्त्रोत। श्री सिद्धकुंजिका स्त्रोतम के 108 दिन लगातार पाठ करने से मनुष्य की ऊर्जाएं बदल जाती हैं। मान-सम्मान, साहस, बल और आंतरिक उन्नति की प्राप्ति के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है।
      श्री सिद्धकुंजिका स्त्रोतम खुद भगवान शंकर के मुख से निकला है। भोले शंकर ने माता पार्वती को ये स्त्रोत सुनाया था। ये अत्यंत गोपनीय मंत्र है जिसे बिना किसी को बताए जपना चाहिए।108 दिन लगातार इस मंत्र का जाप करें यदि 108 बार नहीं कर पा रहे हैं तो नवरात्रि के दौरान तीनों वक्त यानि सुबह,दोपहर और सायंकाल इसे जपें।इसे सिर्फ सुनने मात्र से भी ये सिद्ध हो जाता है।
       शिव ने पार्वती जी से इस प्रकार कहा था --
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजाप: भवेत्।।1।।
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्।।2।।
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्।।3।।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध् येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।।4।।
                      अथ मंत्र:-
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।''
                     ।।इति मंत्र:।।
शिव जी द्वारा आदि शक्ति मां दुर्गा की इस प्रकार वंदना आराधना की गई थी --
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन।।1।।
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन।।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे। ।2।।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।।3।।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण।।4।।
धां धीं धू धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु।।5।।
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।।6।।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।। 7।।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे।। 8।।
इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति।।
यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।
इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे
            कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्।
                    ।।ॐ तत्सत।।
( श्री दुर्गासप्तशती गीता प्रेस गोरखपुर पृष्ठ 230--232)

सिद्ध कुंजिका स्त्रोत पाठ की विधि:-
नवरात्रि और गुप्त नवरात्रि में इसका नियमित पाठ विशेष फलदायी होता है। कुंजिका स्त्रोत्र का पाठ विधि से करने पर अति शीघ्र ही मनोवांछित फल मिलते हैं।
1. सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ विशेष रूप से संधि काल (यानी वह समय जब एक तिथि समाप्त हो रही हो और दूसरी तिथि आने वाली हो) में किया जाता है। विशेष रूप से जब अष्टमी तिथि और नवमी तिथि की संधि हो तो अष्टमी तिथि के समाप्त होने से 24 मिनट पहले और नवमी तिथि के शुरू होने के 24 मिनट बाद तक का जो कुल 48 मिनट का समय होता है । उस दौरान ही माता ने देवी चामुंडा का रूप धारण किया था और चंड-मुंड नाम के राक्षसों का वध किया था। इस दौरान ही कुंजिका स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम फल दायी माना जाता है। यह समय नवरात्रि का सबसे शुभ समय भी माना गया है क्योंकि इसी समय के समाप्त होने के बाद देवी वरदान देने को तत्पर होती हैं।
2. सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ करते समय इसका ध्यान रखना चाहिए कि जब पाठ करते समय बीच में पाठ बंद नहीं करना चाहिए।
3. वैसे सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ दिन में किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त के दौरान इसका पाठ करना सबसे अधिक प्रभावशाली माना जाता है। (ब्रह्म मुहूर्त सूर्य उदय होने से एक घंटा 36 मिनट पहले प्रारंभ होता है और सूर्य देव के समय से 48 मिनट पहले ही समाप्त हो जाता है। इस प्रकार यह कुल 48 मिनट का समय होता है।)
4. वैसे तो अपनी सुविधानुसार किसी भी प्रकार से सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ कर सकते हैं लेकिन यदि लाल आसन पर बैठकर और लाल रंग के कपड़े पहन कर यह स्रोत पढ़ा जाए तो इसका और भी अधिक फल प्राप्त होता है क्योंकि लाल रंग देवी दुर्गा को अत्यंत प्रिय है।
5. यदि किसी विशेष कार्य के लिए  कुंजिका स्त्रोत का पाठ कर रहे हैं तो पाठ शुक्रवार के दिन से प्रारंभ करना चाहिए और पाठ संकल्प लेकर ही शुरू करना चाहिए। जितने दिन के लिए पाठ करने का संकल्प लिया था, उतने दिन पाठ करने के बाद माता को भोग लगाकर छोटी कन्याओं को भोजन कराएं और उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें। इससे मन वांछित फल मिलेंगे।

                 आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी

            परिचय : आचार्य डॉ.राधे श्याम द्विवेदी 

27.06.1957 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्में डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य , ग्रंथालय विज्ञान शास्त्री B.Lib.Sc. तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) "संस्कृत पंच महाकाव्य में नायिका" विषय पर उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए. तथा ’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। डा. हरी सिंह सागर विश्व विद्यालय सागर मध्य प्रदेश से MLIS किया। आप 1987 से 2017 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण वडोदरा और आगरा मण्डल में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। आप अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं। साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर आपकी लेखनी सक्रिय है।


Saturday, August 26, 2023

भगवान शिव का जीता जागता अक्षय स्वरूप मृत संजीवनी महामृत्युंजय मंत्र

मेरी पत्नी की स्वास्थ्य अस्थिर रहता है। विगत एक पखवारे से वायरल बुखार , रक्त शर्करा, अस्थमा - खांसी और स्वास - प्रस्वास की दशा बिगड़ने से वह परेशान रही है। मेरे पुत्र डा. सौरभ द्विवेदी ने कई बार उसे अपने देखरेख में अपने अस्पताल से निरोग किया है।इस बार उसे अन्य चिकत्सक और अस्पताल में भर्ती करा कर निरोग कराया है । मां के सानिध्य के लिए उसने अपने कुछ शुभ चिंतकों से विस्तृत ग्रह दशा का अध्ययन कराया तो मार्केश की दशा का संकेत मिला है। स्वास्थ्य सुधार को स्थाई करने के लिए काशी के सप्त सदस्यीय विद्वत मण्डली से महामृत्युंजय जप और पूजा का सप्त दिवसीय आयोजन बस्ती शहर स्थित कमला सदन नामक मेरे आवास पर विगत तीन दिन से चल रहा है। जिसका पूर्णाहुति दिनाक 31 अगस्त 2023 को सम्पन्न होगा। हमारे नोवा हॉस्पिटल और एपेक्स डायग्नोस्टिक्स के स्टाफ का सहयोग भी सराहनीय रहा है।
          भगवान शिव की आराधना करने से जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है और इनके मंत्रों का जाप करने से जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं. धार्मिक ग्रथों में भगवान शिव के कई स्वरूपों का वर्णन किया गया है. इसमें से भगवान शिव का एक स्वरूप महामृत्युंजय स्वरूप भी है. इस स्वरूप में भगवान शिव हाथों में अमृत लेकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. ऐसे में महामृत्युंजय मंत्र के जाप से व्यक्ति को लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है.भगवान शिव के अनेक स्वरूपों में एक महामृत्युंजय स्वरूप भी है. इसलिए महादेव को मृत्युंजय भी कहा जाता है. वहीं महामृत्युंजय मंत्र में भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप से आयु की रक्षा प्रार्थना की गई है.महामृत्युंजय मंत्र कई प्रकार से जपे जाते हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्र इस प्रकार है -
त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधिम पुष्टिः वर्धनम् ।
उर्वारुकम् इव बन्धनात् मृत्योः मुक्षीय मा अमृतात् ।
       इस मंत्र को जपने की कई सावधानियां और नियम बताए गए हैं. इन नियमों का पालन करके अगर महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाए तो ये ज्यादा प्रभावशाली होता है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप सुबह और शाम दोनों समय किया जा सकता है. अगर कोई संकट की स्थिति है तो इस मंत्र का जाप कभी भी किया जा सकता है. इस मंत्र का जाप शिवलिंग के सामने या भगवान शिव की मूर्ति के सामने करना ज्यादा बेहतर होता है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से करना चाहिए. ऐसा करना शुभ माना जाता है. मंत्र का जाप करने से पहले भगवान शिव को जल और बेलपत्र अर्पित करें और फिर मंत्र का जाप करें. ऐसा करना ज्यादा उत्तम होता है.
सावधानियां और नियम :-
जप से पूर्व गुरु आह्वाहन जरूर करें।
षट कर्म व घी का दीपक जलाएं।
जप घर के पूजन गृह या शिव मंदिर में ही करें।
जप के दौरान ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य है।
जप के दौरान स्वयं बनाया भोजन करें तो उत्तम है।
जप के बाद शांतिपाठ करके उठें।
मन्त्र उच्चारण शुद्ध हो यह ध्यान रखें।
मन्त्र होठ हिले मगर शब्द उच्चारण कोई सुन न सके ऐसा उपांशु जप करें।
जप में रुद्राक्ष की माला का ही प्रयोग करें। यदि रुद्राक्ष में हो तो तुलसी की माला का प्रयोग करें।
जप ऊनी कम्बल के आसन में पूर्व या उत्तर दिशा में करें।
शांतिपाठ अवश्य करें।
पूर्ण मृत संजीवनी मन्त्र –
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्र्यंबकंयजामहे ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ।।
संक्षिप्त मृत संजीवनी मन्त्र –
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
ॐ स्व: भुव: भू: ऊँ स: जूं हौं ऊँ।।


Tuesday, July 4, 2023

सावन : भगवान शिव का प्रिय महीना शुरू हो गया है। डा. राधे श्याम द्विवेदी



       भगवान शिव के भक्तों का सावन महीना बहुत महत्व पूर्ण होता है. इसे देवों के देव महादेव का प्रिय माह माना गया है. सनातन परम्परा में हिन्दू संवत में इसका पाचवां क्रम है.संयोग से हमे इस भौतिक शरीर को इस धरा पर आने का अवसर भी इसी माह में मिला है। इसलिए मेरे लिए और भी भावनात्मक लगाव इस माह से हो रहा है. 
           शिव जी की आराधना के लिए सावन का महीना उत्तम माना गया है. जो भक्त सावन में नियमित रूप से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और सावन में पड़ने वाले हर सोमवार का व्रत करते हैं, शिव जी की भक्ति के साथ पोज पाठ और तदनुरूप उद्यापन करते हैं,उनकी हर मनोकामना पूरी होती है.

सावन का महीना खास होता है :-

        इस साल 2023 ई में सावन का महीना कई मायनों से बेहद खास होने वाला है. इस बार आपके पास शिव जी को प्रसन्न करने के लिए पूरे दो माह का समय होगा. अधिक ( मलमास) पुरुषोत्तम मास की वजह से इस बार सावन महीने की शुरुआत 04 जुलाई को हो चुकी है और समापन 31 अगस्त 2023 को होगा. प्रत्येक तीसरे साल में 33 दिनों का अलग अतिरिक्त महीना बन जाता है जिसे अधिकमास कहा जाता है और इसकी वजह से ही वर्ष 2023 में सावन दो महीनों का हो रहा है. 

      भगवान शिव को कई और नामों से पुकारा जाता है जैसे- महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ इत्यादि. तंत्र साधना में भगवान शिव को भैरव के नाम से भी जाना जाता है. भगवान शिव को वेद में रुद्र के नाम से भी जाना जाता है.

          शिव इंसान की चेतना के अन्तर्यामी हैं यानी इंसान के मन की बात पढ़़ने वाले हैं. इनकी अर्धांग्नि यानि देवी शक्ति को माता पार्वती के नाम से जाना जाता है. भगवान शिव के दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं और एक पुत्री अशोक सुंदरी भी हैं. शिव जी ज्यादातर योगी या ध्याान की मुद्रा में ही देखे जाते हैं. उनकी पूजा शिवलिंग और मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है. शिव जी के गले में हमेशा नाग देवता विराजमान रहते हैं और इनके हाथों में डमरू और त्रिशूल दिखाई देता हैं. भगवान सदाशिव परम ब्रह्म है. अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान इन्हीं को ईश्वर कहते हैं.
        अकेले रहकर अपनी इच्छा से सभी ओर विचरण करने वाले सदाशिव ने अपने शरीर से देवी शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने अंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी.देवी शक्ति को पार्वती के रूप में जाना गया और भगवान शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी.वहीं देवी शक्ति को प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकार रहित माना गया.
           देवी महापुराण के मुताबिक, एक बार जब नारदजी ने अपने पिता ब्रह्माजी से सवाल किया कि इस सृष्टि का निर्माण किसने किया? आपने, भगवान विष्णु ने या फिर भगवान शिव ने? आप तीनों को किसने जन्म दिया है यानी आपके तीनों के माता-पिता कौन हैं?तब ब्रह्मा जी ने नारदजी से त्रिदेवों के जन्म की गाथा का वर्णन करते हुए कहा कि देवी दुर्गा और शिव स्वरुप ब्रह्मा के योग से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई है। यानि प्रकृति स्वरुप दुर्गा ही माता हैं और ब्रह्म यानि काल-सदाशिव पिता हैं.

      एक बार श्री ब्रह्मा जी और श्री विष्णु जी का इस बात पर झगड़ा हो गया कि ब्रह्मा जी ने कहा मैं तेरा पिता हूँ क्योंकि यह सृष्टि मुझसे उत्पन्न हुई है, मैं प्रजापिता हूँ. इस पर विष्णु जी ने कहा कि मैं तेरा पिता हूँ, तू मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुआ है. सदाशिव ने विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच आकर कहा, हे पुत्रों! मैंने तुमको जगत की उत्पत्ति और स्थिति रूपी दो कार्य दिए हैं, इसी प्रकार मैंने शंकर और रूद्र को दो कार्य संहार और तिरो गति दिए हैं, मुझे वेदों में ब्रह्म कहा है. मेरे पाँच मुख हैं, एक मुख से अकार (अ), दूसरे मुख से उकार (उ), तीसरे मुख से मकार (म) , चौथे मुख से बिन्दु (.) तथा पाँचवे मुख से नाद (शब्द) प्रकट हुए हैं, उन्हीं पाँच अववयों से एकीभूत होकर एक अक्षर ओम् (ऊँ) बना है, यह मेरा मूल मन्त्र है. उपरोक्त शिव महापुराण के प्रकरण से सिद्ध हुआ कि श्री शकंर जी की माता श्री दुर्गा देवी (अष्टंगी देवी) है तथा पिता सदाशिव अर्थात् “काल ब्रह्म” है.


शिव को सबसे ज्यादा क्या पसंद है:-

         बहुत से लोग जानते हैं कि शिव का पसंदीदा पौधा बेल है, और उन्हें भांग, धतूरा, दूध, चंदन और भस्म भी पसंद है. वे बड़े आसानी से बहुत ही साधारण पूजा सामग्री से संतुष्ट हो जाते हैं. हमे उनके इस लोक कल्याण रूप और सुलभता का अधिक से पूजा भक्ति और अर्चना में सलग्न रहना चाहिए.

Monday, September 5, 2022

ॐ कृं कृष्णाय नमः' मूल मंत्र


                       ॐ कृं कृष्णाय नमः'
यह श्रीकृष्ण का बताया मूलमंत्र है जिसके प्रयोग से व्यक्ति का अटका हुआ धन प्राप्त होता है। इसके अलावा इस मूलमंत्र का जाप करने से घर-परिवार में सुख की वर्षा होती है। धार्मिक उद्देश्यों के अनुसार यदि आप इस मंत्र का लाभ पाना चाहते हैं तो प्रातःकाल नित्यक्रिया व स्नानादि के पश्चात एक सौ आठ बार माला के जरिए इसका जाप करें।
         ऐसा करने वाले जातक अपनी सभी बाधाओं एवं कष्टों से सदैव मुक्त रहते हैं। इस मंत्र के जप से कहीं भी अटका धन तुरंत प्राप्त होता है। इस लिंक से इसे बहुत सामान्य तरीके से जाना जा सकता है।
https://youtube.com/playlist?list=RDfQBIcd3Xxls&playnext=1

Tuesday, January 25, 2022

स्वामी एकरसानन्द सरस्वती की अध्यात्म साधना डा. राधेश्याम द्विवेदी

 


स्वामी एकरसानन्द सरस्वती एक महान सन्त थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के लिए समर्पित किया है। उनका जन्म 29 अगस्त 1866 को राजस्थान के जोधपुर जिले के भूरियाना गांव के एक ब्राहमण परिवार में पंडित राधा कृष्ण और उनकी पत्नी पालूबाई के घर हुआ था। बचपन में उनका मूल नाम नारायण दास था। वह बचपन से ही विनम्र दया आदर आदि गुणों से युक्त थे। उन्होंने ऊपरी हिमालय की घाटियों स्थित बदरी नाथ धाम जाकर गहन ध्यान का अभ्यास किया , तत्पश्चात वे काशी प्रस्थान कर गये। वहां उनकी भेंट उनके गुरु स्वामी गणेशानन्द जी से हुई। उन्होंने नारायण दास को अपना शिष्य बनाया और दीक्षा के बाद उनका नया नाम एकरसानन्द रखा। काशी में बेदों की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे विभिन्न धार्मिक स्थानों जैसे मथुरा, बृन्दाबन, हरिद्वार ऋषिकेष आदि स्थानों की यात्रा कीं मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ पहुंचने पर वहां के राजा ने उनका अत्यन्त आदर भाव से स्वागत किया था।

दैवी सम्पदा मण्डल की स्थापना:-

स्वामी एकरसानन्द सरस्वती ने श्रीमद् भगवत गीता के 16वें अध्याय में वर्णित दैवी सम्पति पर आधारित ’’सर्वभूतहितो रताः’’ के सिद्धान्तों पर 1914 ई. में दैवी सम्पदा मण्डल की स्थापना मैनपुरी के पंजाबी बाग में किया । यह संगठन जाति सम्प्रदाय तथा धर्म का भेदभाव किए बिना , समस्त मनुष्य जाति में निर्भीकता, अंतःकरण की शुद्धता, आध्यात्मिक ज्ञान हेतु निरन्तर ध्यान और योगाभ्यास , दानशीलता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, अहिंसा, सत्यवादी होने, त्याग, शान्ति, दया, अनाशक्ति, कोमलता,विनयशीलता ,क्षमा और घौर्य आदि गुणों को बढ़ावा देने के प्रति समर्पित है।

दस उपदेश

स्वामी एकरसानन्द सरस्वती के अनुयायी उनके दस उपदेश का शव्दशः पालन करतेे हैं। ये उपदेश प्रेम, सहानुभूति तथा ईश्वर के प्रति समर्पण भाव का संदेश देते हैं। उनके द्वारा बनाये गये दस उपदेश इस प्रकार है -

पहला               संसार को स्वप्नवत जानों।

दूसरा               अति साहस रखो।

तीसरा              अखण्ड प्रफुल्लित रहो दुख में भीं।

चैथा                 परमात्मा का स्मरण करो, जितना बन सके।

पांचवां              किसी को दुख मत दो, बने तो सुख दो।

छठा                 सभी पर अति प्रेम करो।

सातवां              नूतन बालवत स्वभाव रखो।

 आठवां             मर्यादानुसार चलो।

 नौवां                 अखण्ड पुरुषार्थ करो, गंगा प्रवाहवत, आलसी मत बनों।

 दसवां               जिसमें तुमको नीचा देखना पड़े एसा काम मत करो।

व्यवहार जगत में उपरोक्त दसो सूत्र मनुष्यों के चारित्रिक  भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं। इनमें से यदि एक मात्र दसवें सूत्र को भली भांति अपना लिया जाये तो फिर व्यक्ति का कल्याण सुनिश्चित है।

स्वामी एकरसानन्द सरस्वती की अध्यात्मिक गतिविधियां

स्वामी एकरसानन्द सरस्वती के अनुयायी उनके सत्कर्मों को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके अनुयायी विभिन्न संस्थाओं से जुड़े हैं। जैसे स्वामी एकरसानन्द सरस्वती आश्रम, स्वामी एकरसानन्द सरस्वती संस्कृत महावियालय, श्री एकरासनन्द आदर्श इन्टर कालेज ,श्री एकरसानन्द धर्मार्थ आयुर्वेदिक अस्पताल, श्री एकरसानन्द गोशाला आदि। स्वामी एकरसानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित दैवी सम्पदा मण्डल  मानव जाति की सेवा में कार्यरत रहा है।दैवी सम्पदा के सभी संस्थान जन कल्याण की दिशा में कार्यरत हैं। और सम्मेलनों, ध्यान व योग शिक्षण शिविरों , सत्संगों,प्रवचनों तथा समागमों के आयोजनों के माध्यम से लोगों में संयम,, उत्तम आचरण और अध्यात्म को प्रोत्साहित कर रहे हैं। मैनपुरी के पंजाबी कालोनी में दैवा सम्पदा मण्डल, आश्रम तथा संस्कृत महाविद्यालय संचालित हो रहा है। जन हित के तमाम कार्य करने के कारण शासन प्रशासन में इस आश्रम का विशेष महत्व है। 9 सितम्बर 1938 को स्वामी एकरसानन्द सरस्वती जी का निधन हो गया है। उनके सम्मान में भारत सरकार के डाक तार विभाग ने 500 पेसे का डाक टिकट जारी किया है।

स्वामी हरिहरानन्द को राज्यमंत्री का दर्जा         

मैनपुरी के दैवी सम्पदा मण्डल के और एकरसानन्द आश्रम के महामण्डलेश्वर स्वामी हरिहरानन्द जी महराज को 4 अक्तूबर 2018 को मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य मंत्री का दर्जा प्रदान कर रखा है। इस संस्था के माध्यम से गरीबों और आदिवासियों के जीवन उत्थान और गौ संरक्षण के लिए काम करने वाले महामण्डलेश्वर को मध्य प्रदेश की सरकार ने नर्मदा के किनारे के क्षेत्रों में पौधारोपण, जल संरक्षण व स्वच्छता के विषयों पर जन जागरुकता अभियान चलाने की गठित कमेटी का सदस्य बनाया गया है। स्वामी हरिहरानन्द जी का आश्रम विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है। मैनपुरी शहर से सटे संसारपुर में आश्रम की ओर से बृहद गोशाला बनवायी जा रही है।

मियागंज कन्नौज की धर्मनिष्ठा: स्वामी एकरसानंद सरस्वती के तीन विशिष्ट शिष्य:-

कन्नौज के पूर्वी इलाके में स्थित मियागंज एक ऐसा ग्राम है जिसे अब ऋषि नगर के नाम से जानते हैं। वहां तीन महान संतों का जन्म हुआ जिन्होंने पूरे देश में ख्याति अर्जित की है। स्वामी सुखदेवानन्द, स्वामी नारदानंद और स्वामी भजनानंद जी हैं। स्वामी सुखदेवानन्द का गृहस्थ नाम प्रयाग नरायन था और स्वामी भजनानंद का नाम लङैते लाल था। बाबूराम स्वामी नारदानंद के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल की मिठाई की दुकान थी। तीनों स्वामी एकरसानंद सरस्वती के दर्शन करने गए और वहीं पर उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया। उसी समय सवामी विचारानंद और समतानंद भी उसी गाँव मे हुए और इसे संयोग ही कहा जायेगा कि पहले से ही विरक्त भाव मे चल रहे इन तीनो विभूतियों की पत्नियों ने एक एक कर संसार को छोड़ दिया और अपने पति को परमार्थ गमन के लिए मुक्त कर दिया।  बाबूराम पांडेय स्वामी नारदानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल स्वामी भजनानंद के नाम से विख्यात हुए और प्रयाग नरायन स्वामी सुखदेवानंद के नाम से विख्यात हुए। तीनो ने एक साथ सन्यास ग्रहण किया।

1.नारदानंद सरस्वती द्वारा नौमिषारण्य में अध्यात्म विद्यापीठ केंद्र की स्थापना:-

यहां स्वामी श्रीनारदनंदजी महाराज का आश्रम तथा एक ब्रह्मचर्याश्रम है, जहां ब्रह्मचारी प्राचीन पद्धति से शिक्षा प्राप्त करते हैं। आश्रम में साधक लोग साधना की दृष्टि से रहते हैं। धारणा है कि कलियुग में समस्त तीर्थ नैमिष क्षेत्र में ही निवास करते हैं। नैमिषारण्य भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है, जिसे जगदाचार्य स्वामी नारदानंद सरस्वती जी ने यथासंभव संवारने का प्रयास किया था। स्वामी नारदानंद सरस्वती ने नैमिष में आश्रम बनाया जो आज अपने विशाल रूप में है। स्वामी नारदानंद सादगी के प्रतीक थे। स्वामी नारदानंद जी का जन्म कन्नौज के पास मिश्रागंज में ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह दो भाई-बहन थे। उनकी विवाह भी हुआ था। बाद में एकरसानंद से प्रभावित होकर घरबार छोड़कर समाज हित में अपने को लगा दिया था। उनकी कई वर्षो की तपस्या व आशीर्वाद से लाखों भक्तों का कल्याण हुआ। उन्होंने  देश-विदेश में 286 आश्रमों का संचालन किया और नैमिषारण्य को अपनी तपस्थली बनाकर वहां चारों आश्रमों का संचालन किया। ब्रहमचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास वर्ण की अलग-अलग व्यवस्था की। इनका जन्म मास अगहन की शुक्लपक्ष सप्तमी को हुआ था। महाराज जी के सानिध्य में लाखों भक्तों का कल्याण हुआ और बहुत से विरक्त संत व आचार्यो की फौज तैयार कर जनसेवा में जीवन लगा दिया। उन्होंने बताया कि समस्त 286 आश्रमों पर वानप्रस्थ ब्रहमचारी को पूजा व देखरेख के लिए नियुक्त किया।
          स्वामी नारदानंद पहले स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी महाराज फिर पंडित मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आये और उनकी सम्मति से वर्णाश्रम खोलने की योजना बनाई। स्वामी नारदानंद ने उत्तर भारत में जनमानस को धर्म और आध्यात्म के प्रति प्रेरित किया। भारत भक्त समाज की स्थापना पर सन 1959 में स्वामी जी मे यह आह्वान किया। आओ उठो आज परमात्मा की स्वकर्तव्य द्वारा पूजा की शुभ बेला है। मातृभूमि की पुकार है। नैमिष व्यासपीठ की स्थापना की जो आज भी मिसाल वट वृक्ष की भांति विद्यमान है।

2. स्वामी सुखदेवानंद द्वारा परमार्थ निकेतन ऋषिकेश की स्थपना

कन्नौज जिले के मियांगंज ग्राम में ब्राह्मण परिवार म जन्में प्रयाग नरायन स्वामी सुखदेवानंद के नाम से विख्यात हुए। इनका जन्म 1901 ई. में हुआ था। वे परमार्थ निकेतन आश्रम लक्ष्मण झूला ऋषिकेश के संस्थापकऔर श्री दैवी संपदा महामंडल के नायक व प्रमुख रहे। परमार्थ निकेतन भारत देश के उत्तराखंड राज्य में ऋषिकेश में स्थित एक आश्रम है। यह हिमालय की गोद में गंगा के किनारे स्थित है। इसकी स्थापना 1942 में सन्त सुकदेवानन्द जी महाराज (1901-1965) ने की थी।परमार्थ निकेतन स्वामी सुकदेवानंद ट्रस्ट का मुख्यालय भी है जो  बिना लाभ वाला धार्मिक आध्यात्मिक संगठन धर्म अध्यात्म और संस्कृति के लिए समर्पित है। 1965 में स्वामी जी ने अपनी पंचभौतिक शरीर छोड़कर परम तत्व में विलीन हो गए थे। सन् 1986 स्वामी चिदानन्द सरस्वती इसके अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक मुखिया हैं।

परमार्थ निकेतन आश्रम के संस्थापक, श्री दैवी संपद महामंडल के नायक व प्रख्यात संत महामंडलेश्वर स्वामी सुखदेवानंद सरस्वती महाराज थे। गंगा नदी की तरफ से परमार्थ निकेतन का दृश्य बहुत ही मन भावन है। परमार्थ निकेतन स्वर्गाश्रम ऋषिकेश का सबसे बड़ा आश्रम है। इसमें 1000 से भी अधिक कक्ष हैं। आश्रम में प्रतिदिन प्रभात की सामूहिक पूजा, योग एवं ध्यान, सत्संग, व्याख्यान, कीर्तन, सूर्यास्त के समय गंगा-आरती आदि होते हैं। इसके अलावा प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद चिकित्सा एवं आयुर्वेद प्रशिक्षण आदि भी दिए जाते हैं। आश्रम में भगवान शिव की 14 फुट ऊँची प्रतिमा स्थापित है। आश्रम के प्रांगण में कल्पवृक्ष भी है जिसे हिमालय वाहिनी के विजयपाल बघेल ने रोपा था। स्वामी सुखदेवानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों के संदेशों को आचरण में उतारना चाहिए। परमार्थ निकेतन किसी धार्मिक जातीय या राष्ट्रीय भेदभाव के बिना सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला है। पिछले 25 वर्षों से साध्वी भगवती परमार्थ निकेतन में यहां निवास करते हुए सदाचार की शिक्षा दे रही हैं।

स्वामी सुखदेवानंद जी ने पचास-साठ के दशक में मेक इंडिया का नारा दिया था। जिसमें भारतीयों से स्वदेशी निर्माण की व्यापक अवधारणा थी। स्वामी सुखदेवानंद ट्रस्ट के चेयरमैन महामंडलेश्वर स्वामी असंगानंद सरस्वती अध्यक्ष हैं। 1964 में स्वामी सुखदेवानंद सरस्वती द्वारा स्थापित एस.एस. पी. जी  कॉलेज कला, विज्ञान, वाणिज्य, शिक्षा और कंप्यूटर विज्ञान के संकायों में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम चलाता है।

3.महामंडलेश्वर स्वामी भजनानंद

महामंडलेश्वर स्वामी भजनानंद का बचपन का नाम लड़ौत लाल था। वह भी मियां गंज कन्नौज के ब्राह्मण परिवार से थे। चैछी कक्षा पास कर वह व्यापार मिठाई की दुकान संभालने लगे। उनकी मुलाकात मियां गंज कन्नौज के प्रयाग नारायण से हुई जो बाद में स्वामी सुकदेवानंद बने।इनके एक और दोस्त बाबू राम थे जो बाद में स्वामी नारदा नंद बने। इन तीनों का मन भौतिक सुख सुविधाओं में नहीं लगा तो ये लोग स्वामी एकरसानंद सरस्वती के शिष्य बन गए।इसी बीच लड़ौत लाल की पत्नी का देहान्त हो गया तो वहघर त्याग दिए। वह सत्संग साधना में जीवन व्यतीत करने लगे। इन्हें दीक्षा संस्कार देने के पूर्व ही स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी का देहान्त हो गया था। इसलिए वह अपने गुरु भाई स्वामी शतानंद से सन्यास की दीक्षा ले ली। अब इनका नाम भजनानंद हो गया

1947 में स्वामी सुकदेवानंद और स्वामी भजनानंद ने ऋषि केश में स्वर्गाआश्रम में परमार्थ निकेतन की स्थापना किए। 1965 में स्वामी सुकदेवानंद की मृत्यु हो गई तो भजनानंद महा मंडलेश्वर पद पर आसीन हुए। उन्होंने जनता की सेवा करने के लिए इंटर कॉलेज, औषधालय और संस्कृत विद्यालय की स्थापना की।

इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वामी एकरसानन्द जी का अध्यात्म बृक्ष आज उत्तर भारत के विशाल क्षेत्र में अपनी छाया से आहलादित कर रहा है। उनके तीन प्रमुख शिष्यों के अतिरिक्त इन केन्द्रो से दीक्षित अनेक सन्त जन अध्यात्म की ज्योति प्रज्वलित कर रहे है।

 

 

 

 

Saturday, December 25, 2021

तुलसी पूजन दिवस :एक शुद्ध सनातन परम्परा

  
25 दिसंबर का दिन पूरी दुनिया में क्रिसमस (Christmas) के त्योहार के रूप में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह ईसाई समुदाय (Christian Community) का सबसे बड़ा त्योहार है। इस दिन प्रभु यीशु (Lord Yeshu) का जन्म हुआ था। आज के ही दिन तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) भी काफी ट्रेंड हो रहा है। आइए जानते है आखिर क्रिसमस डे के दिन ही तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) क्यों मनाया जाता है?
ऐसे हुई थी तुलसी पूजन दिवस की शुरूआत
25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस आसाराम बापू (Asaram Bapu) के अनुयायी सेलिब्रेट कर रहे है, साथ ही सोशल मीडिया के जरिए इसे प्रमोट भी कर रहे है। आसाराम के अनुयायियों के लगातार पोस्ट करने से तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) अब काफी ट्रेंड हो रहा है। वर्ष 2014 में आसाराम बापू ने तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) की शुरुआत की थी। 
तुलसी धरा के लिए वरदान
 तुलसी केवल एक पौधा ही नहीं है बल्कि धरा के लिए वरदान है। जिसके कारण इसे हिंदू धर्म में पूजनीय और औषधि तुल्य माना जाता है ‘तुलसी पूजन करने से लोगों को चमत्कारिक लाभ मिलता है साथ ही लोगों को तुलसी से होने वाले लाभ की भी जानकारी मिलती है और देश में भारतीय संस्कृति का प्रसार भी होता है।
काफी कम लोग जानते है तुलसी पूजन दिवस
25 दिसंबर को क्रिसमस का त्योहार मनाया जाता है, ये सभी जानते है, लेकिन 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) मनाया जाता है, ये बहुत कम लोग ही जानते है। तुलसी पूजन दिवस (Tulsi Pujan Diwas) में तुलसी के पौधे की पूजा की जाती है, और घर में सुख, शांति की कामना की जाती है। इस दिन लोग तुलसी के नए पौधे भी लगाते है। क्योंकि हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को अत्यधिक शुभ माना गया है।
आयुर्वेद में तुलसी को अमृत कहा गया हैं
सालों से तुलसी के पौधे का उपयोग औषधीय रूप में किया जा रहा है। हिन्दू धर्म में इसे औषधीय मूल्य पौधा कहा गया है। वहीं आयुर्वेद में तुलसी को अमृत कहा गया है, क्योंकि यह औषधि के रूप में काम आती है। कहा जाता है कि जिसके घर में तुलसी का पौधा होता है, उसके यहां हमेशा सुख-शांति बनी रहती है। शास्त्रों में मिलता है कि भगवान श्री हरि भोग को स्वीकार नहीं कर रहे थे, क्योंकि उसमें तुलसी के पत्ते नहीं थे।
आयुर्वेद में तुलसी के पौधे के हर भाग को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बताया गया है। सर्दी खांसी में कारगर हिन्दू धर्म में तुलसी पूजन की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है. लेकिन 2014 से भारत में आज यानी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाई जाती है. इस सम्बंध में तुलसी के आठ नाम महत्त्व पूर्ण हैं।
       
                   तुलसी – नामाष्टक
वृन्दां वृन्दावनीं विश्वपावनी विश्वपूजिताम् |
पुष्पसारां नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनीम् ||
एतन्नामाष्टकं चैतत्स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् |
य: पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ||
भगवान नारायण देवर्षि नारदजी से कहते हैं : “वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नंदिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी – ये तुलसी देवी के आठ नाम हैं | यह सार्थक नामावली स्तोत्र के रूप में परिणत है |जो पुरुष तुलसी की पूजा करके इस नामाष्टक का पाठ करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है | ( ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड :२२.३२-३३)
तुलसी एक दिव्य औषधि तो है ही परंतु इससे भी बढ़कर यह भारतीय धर्म-संस्कृति में प्रत्येक घर की शोभा, संस्कार, पवित्रता तथा धार्मिकता का अनिवार्य प्रतीक भी है।
गरुड़ पुराण में आता है कि ‘तुलसी का पौधा लगाने, पालन करने, सींचने तथा उसका ध्यान, स्पर्श और गुणगान करने से मनुष्यों के पूर्वजन्मार्जित पाप जल कर विनष्ट हो जाते हैं।
पद्म पुराण के अनुसार ‘जो तुलसी के पूजन आदि का दूसरों को उपदेश देता और स्वयं भी आचरण करता है, वह भगवान श्री लक्ष्मीपति के परम धाम को प्राप्त होता है।’
अनेक गुण, अनेक लाभ
वेदों, पुराणों और औषधि-विज्ञान के ग्रंथों में तुलसी के गुणों के आधार पर से उसे विभिन्न नाम दिये गये हैं, जैसे – काया को स्थिर रखने से कायस्था, तीव्र प्रभावी होने से तीव्रा, देव गुणों का वास होने से देवदुंदुभि, रोगरूपी दैत्यों की नाशक होने से दैत्यघ्नि, मन, वाणी व कर्म से पवित्रतादायी होने से पावनी, इसके पत्ते पूत (पवित्र) करने वाले होने से पूतपत्री, सबको आसानी से मिलने से सरला, रस (लार) ग्रंथियों को सचेतन करने वाली होने से सुरसा आदि।
रोगों से रक्षा हेतु कवचः तुलसी मंजरी
तुलसी की मंजरी को भिगोकर शरीर पर छींटना रोगों से रक्षा के लिए कवच का काम करता है। इसके बीजों में पीले-हरे रंग का उड़नशील तेल होता है, जो त्वचा द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर विभिन्न रोगों से रक्षा करता है।
पूज्य श्री के श्रीमुख से तुलसी-महिमा
पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “तुलसी पत्ते पीसकर उसका उबटन बनायें और शरीर पर मलें तो मिर्गी की बीमारी में फायदा होता है। किसी को नींद नहीं आती हो तो 51 तुलसी पत्ते उसके तकिये के नीचे चुपचाप रख देवें, नींद आने लगेगी।
करें तुलसी माला धारणः तुलसी की कंठी धारण करने मात्र से कितनी सारी बीमारियों में लाभ होता है, जीवन में ओज, तेज बना रहता है, रोगप्रतिकारक शक्ति सुदृढ़ रहती है। पौराणिक कथाओं में आता है कि तुलसी माला धारण करके किया हुआ सत्कर्म अनंत गुना फल देता है।
अभी विज्ञानी आविष्कार भी इस बात को स्पष्ट करने में सफल हुए हैं कि तुलसी में विद्युत तत्त्व उपजाने और शरीर में विद्युत-तत्त्व को सजग रखने का अदभुत सामर्थ्य है। जैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि तुलसी का इतना सेवन करने से कैंसर नहीं होता लेकिन हम लोगों ने केवल कैंसर मिटाने के लिए ही तुलसी नहीं चुनी है। हम लोगों का नज़रिया केवल रोग मिटाना नहीं है बल्कि मन प्रसन्न करना है, जन्म मरण का रोग मिटाकर जीते जी भगवद् रस जगाना है।"
सम्पूर्ण विश्व-मानव तुलसी की महिमा को जाने और इसका शारीरिक, मानसिक, दैविक और आध्यात्मिक लाभ ले इस हेतु ‘सबका मंगल सबका भला’ चाहने वाले पूज्य बापू जी ने 25 दिसम्बर को तुलसी पूजन दिवस मनाने की सुंदर सौगात समाज को दी है। विश्वभर में अब यह दिवस व्यापक स्तर पर मनाया जाने लगा है।
गले में तुलसी की माला धारण करने से जीवनीशक्ति बढ़ती है, बहुत से रोगों से मुक्ति मिलती है। शरीर निर्मल, रोगमुक्त व सात्त्विक बनता है।
तुलसी माला से भगवन्नाम जप करने एवं इसे गले में पहनने से आवश्यक एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव पड़ता है, जिससे मानसिक तनाव में लाभ होता है, संक्रामक रोगों से रक्षा होती है तथा शरीर-स्वास्थ्य में सुधार होकर दीर्घायु में मदद मिलती है।
तुलसी को धारण करने से शरीर में विद्युतशक्ति का प्रवाह बढ़ता है तथा जीव-कोशों का विद्युतशक्ति धारण करने का सामर्थ्य बढ़ता है।
गले में तुलसी माला पहनने से विद्युत तरंगे निकलती हैं जो रक्त संचार में रुकावट नहीं आने देतीं। प्रबल विद्युतशक्ति के कारण धारक के चारों ओर आभामंडल विद्यमान रहता है।
गले में तुलसी माला धारण करने से आवाज सुरीली होती है। हृदय पर झूलने वाली तुलसी माला हृदय व फेफड़े को रोगों से बचाती है। इसे धारण करने वाले के स्वभाव में सात्त्विकता का संचार होता है।
तुलसी की माला धारक के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाती है। कलाई में तुलसी का गजरा पहनने से नाड़ी संबंधी समस्याओं से रक्षा होती है, हाथ सुन्न नहीं होता, भुजाओं का बल बढ़ता है।
तुलसी की जड़ें अथवा जड़ों के मनके कमर में बाँधने से स्त्रियों को विशेषतः गर्भवती स्त्रियों को लाभ होता है। प्रसव वेदना कम होती है और प्रसूति भी सरलता से हो जाती है। कमर में तुलसी की करधनी पहनने से पक्षाघात (लकवा) नहीं होता एवं कमर, जिगर, तिल्ली, आमाशय और यौनांग के विकार नहीं होते हैं।
यदि तुलसी की लकड़ी से बनी हुई मालाओं से अलंकृत होकर मनुष्य देवताओं और पितरों के पूजनादि कार्य करे तो वे कोटि गुना फल देने वाले होते हैं। जो मनुष्य तुलसी लकड़ी से बनी माला भगवान विष्णु को अर्पित करके पुनः प्रसादरूप से उसे भक्तिपूर्वक धारण करता है, उसके पातक नष्ट हो जाते हैं।


Monday, December 6, 2021

कर्म - भोग : श्रीमद्भभगवतगीता के आधार पर बहुत ही उपयोगी विचार। (सोसल मीडिया Niyojan चिन्तन ग्रुप से साभार)

 
पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता - पिता , भाई - बहन , पति - पत्नि , प्रेमी - प्रेमिका , मित्र - शत्रु , सगे - सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं , सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।
सन्तान के रुप में कौन आता है ?
वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --
ऋणानुबन्ध  :-पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो , वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा , जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।
शत्रु पुत्र  :- पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता - पिता से मारपीट , झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।
उदासीन पुत्र  :- इस प्रकार की सन्तान ना तो माता - पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है । बस , उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने पर यह माता - पिता से अलग हो जाते हैं ।
सेवक पुत्र  :- पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो  बोया है , वही तो काटोगे । अपने माँ - बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी , वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।
आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा।
इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे , उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये।
ज़रा सोचिये , "आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये , वो कितना सोना - चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना - चाँदी , धन - दौलत बैंक में पड़ा रह गया , समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है , खुद ही खा - कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ , वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।"
मैं , मेरा , तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा , कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ *नेकियाँ* ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके *नेकी* करो *सतकर्म* करो ।       
                 ( डा. ज्ञानेन्द्र नाथ श्रीवास्तव)
माता पिता के बारे में एक अनुभव जनित तथ्य -
कहते हैं कि माँ तो माँ ही होती है और पिता भी पिता होता है जो संतान के लिये कुछ भी तप  त्याग कर सकते हैं। यह बात सत्य है। किंतु ऐसा भी देखने में आया है कि एक समय आता है जब माँ बाप भी संतान के साथ पूर्वाग्रह एवं पक्षपात से भर जाते हैं और उनकी सदाशयता तथा सहानुभूति सब लुप्त हो जाती है। जो माता पिता इस स्थिति को प्राप्त होते हैं उनकी भावना संतान के भौतिक जीवन को बहुत नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है । ऐसे माता पिता अपना परलोक बिगाड़ते हैं या नहीं इसका तो कोई साक्ष्य नहीं होता है। 
बचपन में माता का दुलार और पिता का दंभ संतान के दुर्भाग्य का कारण बनता है । युवा एवं प्रौढ़ संतान के प्रति माता पिता की दुर्भावना संतान को दरिद्र बनाती है और उसके ऊपर विपत्तियाँ लाती है। 
बचने के साधन एवं उपाय:-
संतान को चाहिए कि वह माता पिता के गुण अवगुण का विश्लेषण किये विना उनके प्रति पूर्ण समादर एवं शिष्टाचार का भाव बनाये रखे। उनके दुर्वचनों को आशीर्वचन के रूप में देखे। उनकी निंदा न करे और अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग करते हुये उनकी इच्छा पूर्ति करे। उनकी मन से सेवा करे एवं उनके दुर्गुणों पर दृष्टिपात न करते हुये उनकी   मांस-मदिरा की चाहत को भी पूर्ण करे। ऐसी संतान हर बाधा विपत्ति को पार करने में समर्थ होगी। वह समृद्धिशाली होगा और उसका भौतिक जीवन परम सुखमय होगा एवं अध्यात्म में उसकी गति होगी। जिसने यह तप साध लिया वह महाविजयी होगा। उसे मंदिर या तीर्थ जाने और देवदर्शन की  आवश्यकता नहीं होगी।
जो संतान माता पिता पर एहसान जताती है वह दुख एवं विपत्तियों के सागर में निमग्न रहती है ।  बहू और दामाद के दुखों का कारण यही है कि वे अपने सास-ससुर को अपना नहीं पाते हैं और मानसिक दुरोभाव के कारण ही अनायास दुर्भाग्य को निमंत्रण दे बैठते हैं। यह संभव है कि बहू या दामाद के लिये सास-ससुर अच्छे न हो, वे अवसरवादी, स्वार्थी एवं दूषित मनोभाव वाले हो सकते हैं किंतु जिसे सौभाग्य चाहिए उसे इनके हर दुर्गुण को स्वीकारना ही पड़ेगा तभी प्रकृति प्रसन्न होकर सुख सौभाग्य का अवसर प्रदान करती है । यही धर्म है जिसे धारण करना है जिसका पालन करना है। 
विवाह एक सामाजिक प्रक्रिया है जो परिवार और समाज के लोग संपन्न कराते हैं। शारीरिक आकर्षण आयुजन्य होते हैं इसलिए प्रणय विवाह या गंधर्व विवाह भी संभव हैं और सामाजिक विधि विधान को संपन्न कर इनको सामाजिक मान्यता भी मिल जाती है। किंतु परस्पर समर्पण या विद्रोह का भाव बैपरने पर ही विकसित होता है। पति- पत्नी एक -दूसरे के गुण- दोष का विश्लेषण और विवेचन कर परस्पर क्षुब्ध या सुखी -संतुष्ट हो सकते हैं किंतु दोनों ही अपने माता-पिता या जन्मभूमि या पैतृक स्थान की निंदा नहीं सुन सकते हैं या सुनने के बाद प्रसन्न और अनुकूल नहीं रह सकते हैं। आप अपनी माता से भले ही कितना खीझते रहे हों या पिता से जेब खर्च के लिये कितना भी बहस करते रहे हों किंतु पत्नी उसका अंशमात्र भी करे तो आपको सहन नहीं होगा और पुन:श्च यही बात पत्नी के पैतृक संबंधों के प्रति लागू होती है वह भी अपनों के प्रति ऐसा कुछ भी सहन नहीं करेगी। इसलिये सुख का स्रोत है स्वीकार्यता । जो जैसा है उसको विना विश्लेषण के स्वीकार करें। इस तपस्या के द्वारा पति-पत्नी के मन का मिलन होता है। जिस गृहस्थी में पति-पत्नी के मन का मेल हो गया वहाँ लक्ष्मी-सरस्वती क्या ईश्वर स्वयं रहने लगता है।
गृहस्थ जीवन के लिये ये तप विवाह में सप्तपदी के सातवचनों के समय ( अग्नि प्रदक्षिणा करते समय सात भाँवर के साथ) सिखाये जाते हैं। किंतु समारोह के आडंबर, लेन देन के असंतोष, अतिथि एवं  संबंधियों के क्षुब्ध मन एवं आक्रोश (जो कि वर वधू की बारंबार न्योछावर से भी शांत नहीं होते) तथा धूम धाम से भंग-पवित्रता वाले वातावरण में वैसे ही अनसुने रह जाते हैं जैसे कृष्ण के शंखनाद से युधिष्ठिर के पूर्ण  सत्यवचन। अतएव  फल सुखद नहीं होता है और जीवन का सकारात्मक समय क्षुब्ध वातावरण में नकारात्मकता को निमंत्रण दे बैठता है। इसलिए आवश्यक है कि विवाह समारोह सादगीपूर्ण, आडंबरविहीन तथा लेन-देन की अपेक्षाओं से मुक्त हो, क्योंकि इसका उद्देश्य पवित्र है अत: वातावरण भी पवित्र होना चाहिए। अपेक्षाओं से सदा प्रदूषण बढता ही है।
               

Friday, November 12, 2021

माया महाठगनी नही सृष्टि की संवाहिका भी -- डाक्टर राधे श्याम द्विवेदी

माया को महा ठगनी कहना जितना उचित है उतना इससे  इतर गरिमामय स्थान माया और महामाया विषयक अवधारणा हमारे सृष्टि और ब्रह्मांड में मिलता है। भगवती आदि शक्ति दुर्गा मां के वैसे तो अनन्त रूप है, अनन्त नाम है, अनन्त लीलाएं हैं। जिनका वर्णन कहने-सुनने की सामर्थ्य मानवमात्र की नहीं है, लेकिन देवी मां के प्रमुख नौ अवतार  आम जन मानस में प्रचलित है। जिनके नाम महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, योगमाया, शाकम्भरी, श्रीदुर्गा, भ्रामरी व चंडिका या चामुंडा है

योगमाया किसे कहा गया है :-

द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, ठीक उनके पहले मां दुर्गा ने योग माया के रूप में जन्म लिया था। मां दुर्गा का यह दिव्य अवतार कुछ समय के लिए था। योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म  के समय यशोदा गहरी नींद में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा भी नहीं था। गर्गपुराण के अनुसार देवकी के सप्तम गर्भ को योगमाया ने ही संकर्षण कर रोहिणी के गर्भ में पहुँचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ था।  इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते हैं।।यह कथा प्रायः सब जानते हैं कि प्राचीन काल में महाबली कंस ने अपनी चचेरी बहन देवकी का विवाह बड़ी धूमधाम से वसुदेव के साथ किया। बहन के विदाई के समय प्रेमवश स्वयं रथ के घोड़ों को हांककर पहुंचाने जा रहा था। उसी समय आकाशवाणी हुई- हे कंस जिस बहन को तू इतने प्रेम पूर्वक पहुंचाने जा रहा है, उसी के आठवे पुत्र के हाथों तेरा वध होगा। आकाशवाणी सुनते ही कंस ने रथ हो रोक दिया। उसकी आंखें क्रोध से रक्त वर्ण (लाल) हो गईं। उसने देवकी को मारने के लिए तत्क्षण म्यान से अपनी तलवार खींच ली। देवकी भय से थर-थर कांपने लगी।

तब वसुदेव ने कंस को समझाते हुए कहा- हे मित्र कंस! इस अबला नारी का वध करने से तुम अपयश के भागी बनोगे। आकाशवाणी के अनुसार तुम्हें इसके आठवे पुत्र से भय है। मैं तुम्हे विश्वास दिलाता हूं कि देवकी का आठवां पुत्र जब जन्म लेगा उसे मैं तुम्हे सौंप दूंगा।कंस को मालूम था कि वसुदेव कभी असत्य नहीं बोलते।  उसने देवकी का वध नहीं किया। उसी क्षण देवर्षि नारद ने जब आकर अनेक प्रकार से कंस को समझाते हुए पृथ्वी पर लकीरें खींचकर बताया कि रेखाओं में से कोई भी रेखा आठवीं हो सकती है।इसी प्रकार देवी का कोई भी पुत्र आठवां हो सकता है।

मूढ़मति कंस ने नारद के वचनों को सुनकर वसुदेव और देवकी को कारागृह में बंद कर दिया और कड़ा पहरा लगा दिया। देवकी के गर्भ से जब प्रथम पुत्र की उत्पत्ति हुई तो पहरेदारों ने जाकर कंस को सूचना दी। कंस उसी समय आया और बालक को ले जाकर पत्थर की शिला पर पटककर मार डाला। इस तरह एक-एक कर उसने देवकी और वसुदेव के छह बालकों की हत्या कर डाली। जब देवकी का सातवां गर्भ हुआ तो भगवती योगमाया ने संकर्षण शक्ति से उस गर्भ को खींचकर गोकुल में निवास कर रही रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। वह बालक पैदा होकर बादमे ‘बलराम’ के नाम से जगत विख्यात हुआ। तदुपरान्त जब आठवें गर्भ के रूप में भगवान श्री कृष्ण जी देवकी के गर्भ में प्रकट हुए, उधर गोकुल में नन्दबाबा के घर भगवती योगमाया कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय कारागृह के सभी पहरेदार योगमाया के वशीभूत होकर गहरी निद्रा में सो गए। वसुदेव की हथकड़ी बेडिय़ां स्वत: खुल गईं। कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गये। जब वे बालक कृष्ण को लेकर काली घटाटोप काली अंधियारी रात में यमुना पार करके गोकुल पहुंचे और कृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उनके पास सोई कन्या को लेकर लौट आए जो कि उसी समय उत्पन्न हुई थी। जिसका ज्ञान यशोदा को भी नहीं था।

कारागार में पहुंचने पर वसुदेव की हथकड़ी बेडिय़ां पुन: अपने आप लग गईं और जो भगवती योगमाया की दिव्य माया थी। वह कन्या जोर-जोर से रोने लगी। बालिका के रोने की आवाज सुनकर सभी पहरेदार जग गए।  उसी क्षण वे जाकर कंस का सूचना दी। यह सुनकर कि देवकी के गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई अप है। वह भागा हुआ आया। तब देवकी कहने लगी हे भैया इसे मत मारो यह तो कन्या है । मृत्यु भय से आक्रान्त कंस ने देवकी की एक न सुनी और कन्या को उसके हाथ से छीन लिया।।तत्पश्चात उसने उस कन्या को पत्थर पर पटकने के लिए हाथ ऊपर उठाया। आकस्मात वह कन्या उसके हाथ से छूट गई और आकाश में जाकर अष्टभुजी देवी रूप धारण कर अट्टहास करती हुई बोली- अरे मूर्ख! तुझे मारने वाला इस धरती पर जन्म ले चुका है। यह कहकर वह देवी अंतरध्यान हो गयी। वहीं देवी योगमाया के नाम से जगत में विख्यात  हुई है ।

विंध्यवासिनी या योगमाया माँ दुर्गा के एक परोपकारी स्वरूप का नाम है। उनकी पहचान आदि पराशक्ति के रूप में की जाती है। उनका मंदिर उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे मिर्ज़ापुर से 8 किमी दूर विंध्याचल में स्थित है।माँ विन्ध्यासिनी त्रिकोण यन्त्र पर स्थित तीन रूपों को धारण करती हैं जो की महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली हैं। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता है।

भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विन्ध्याचल सदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्। हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचल पर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराण में विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।मा

मार्कण्डेयपुराणे अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महादैत्य उत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोप के घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।

शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी (नंद बाबा की पुत्री) कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं । इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है ।सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा है।










Saturday, October 30, 2021

अथ श्री तुलसी महात्म्य कथा

हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को अति पूजनीय माना गया है। तुलसी (ऑसीमम सैक्टम) एक द्विबीजपत्री तथा शाकीय, औषधीय पौधा है। तुलसी का पौधा हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है और लोग इसे अपने घर के आँगन या दरवाजे पर या बाग में लगाते हैं। भारतीय संस्कृति के चिर पुरातन ग्रंथ वेदों में भी तुलसी के गुणों एवं उसकी उपयोगिता का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है।
तुलसी का पौधा
तुलसी का पौधा क्षुप (झाड़ी) के रूप में उगता है और १ से ३ फुट ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ से ढकी होती हैं। पत्तियाँ १ से २ इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं ८ इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं। नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती है। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएँ सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।
ऑसीमम सैक्टम को प्रधान या पवित्र तुलसी माना गया जाता है। इसकी भी दो प्रधान प्रजातियाँ हैं- श्री तुलसी, जिसकी पत्तियाँ हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी (या श्यामा तुलसी) जिसकी पत्तियाँ नीलाभ-कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं। श्री तुलसी के पत्र तथा शाखाएँ श्वेताभ होते हैं जबकि कृष्ण तुलसी के पत्रादि कृष्ण रंग के होते हैं। गुण, धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को ही श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि दोनों ही गुणों में समान हैं।
रासायनिक संरचना
तुलसी में अनेक जैव सक्रिय रसायन पाए गए हैं, जिनमें ट्रैनिन, सैवोनिन, ग्लाइकोसाइड और एल्केलाइड्स प्रमुख हैं। अभी भी पूरी तरह से इनका विश्लेषण नहीं हो पाया है। प्रमुख सक्रिय तत्व हैं एक प्रकार का पीला उड़नशील तेल जिसकी मात्रा संगठन स्थान व समय के अनुसार बदलते रहते हैं। ०.१ से ०.३ प्रतिशत तक तेल पाया जाना सामान्य बात है। 'वैल्थ ऑफ इण्डिया' के अनुसार इस तेल में लगभग ७१ प्रतिशत यूजीनॉल, बीस प्रतिशत यूजीनॉल मिथाइल ईथर तथा तीन प्रतिशत कार्वाकोल होता है। श्री तुलसी में श्यामा की अपेक्षा कुछ अधिक तेल होता है तथा इस तेल का सापेक्षिक घनत्व भी कुछ अधिक होता है। तेल के अतिरिक्त पत्रों में लगभग ८३ मिलीग्राम प्रतिशत विटामिन सी एवं २.५ मिलीग्राम प्रतिशत कैरीटीन होता है। तुलसी बीजों में हरे पीले रंग का तेल लगभग १७.८ प्रतिशत की मात्रा में पाया जाता है। इसके घटक हैं कुछ सीटोस्टेरॉल, अनेकों वसा अम्ल मुख्यतः पामिटिक, स्टीयरिक, ओलिक, लिनोलक और लिनोलिक अम्ल। तेल के अलावा बीजों में श्लेष्मक प्रचुर मात्रा में होता है। इस म्युसिलेज के प्रमुख घटक हैं-पेन्टोस, हेक्जा यूरोनिक अम्ल और राख। राख लगभग ०.२ प्रतिशत होती है।
तुलसी माला
तुलसी माला १०८ गुरियों की होती है। एक गुरिया अतिरिक्त माला के जोड़ पर होती है इसे गुरु की गुरिया कहते हैं। तुलसी माला धारण करने से ह्रदय को शांति मिलती है
तुलसी का औषधीय महत्व
भारतीय संस्कृति में तुलसी को पूजनीय माना जाता है, धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ तुलसी औषधीय गुणों से भी भरपूर है। आयुर्वेद में तो तुलसी को उसके औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्व दिया गया है। तुलसी ऐसी औषधि है जो ज्यादातर बीमारियों में काम आती है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है।
तुलसी विटामिन और खनिज का भंडार है। इसमें मुख्य रुप से विटामिन सी, कैल्शियम, जिंक, आयरन और क्लोरोफिल पाया जाता है। इसके अलावा तुलसी में सिट्रिक, टारटरिक एवं मैलिक एसिड पाया जाता। जो विभिन्न रोगों के रोकथाम के लिए भी उपयोगी है।
तुलसी से लाभ
तुलसी की पत्तियों का प्रयोग तनाव दूर करने लिए 
आज के समय में तनाव बड़ी समस्या बन गई है और इससे आराम पाने के लिए लोग कई तरह की थेरेपी अपनाते हैं। तुलसी पत्ते इस समस्या को कम करने में उपयोगी पाए गए हैं। NCBI ( नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फोर्मेशन ) द्वारा प्रकाशित एक शोध में यह बताया गया है कि इसमें एंटीस्ट्रेस गुण होते हैं, जो स्ट्रेस से तुलसी के पत्ते आराम दिलवा सकते हैं।
हमारे शरीर में कॉर्टिसोल हॉर्मोन की मात्रा को नियमित कर सकते हैं, जो एक तरह का स्ट्रेस हार्मोन होता है। विशेषकर तुलसी की चाय का सेवन करने से तनाव से काफी राहत मिल सकती है । साथ ही साथ एंटीडिप्रेसेंट गुण जो आपकी याददाश्त बेहतर करने में भी सहायक हो सकते है ।
तुलसी सर्दी जुकाम के लिए उपयोगी
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है । सर्दी-जुकाम के साथ बुखार में भी फायदा पहुंचाती है। काली मिर्च और तुलसी को पानी में उबाल कर काढ़ा बनाएं साथ ही मिश्री डाल कर इसको पीने से बुखार से आराम मिलता है। जुकाम होने पर तुलसी को पानी में उबाल कर भाप लेने से भी फायदा होता है ।
चोट लगने पर तुलसी उपयोगी 
कहीं चोट लगने पर तुलसी के पत्ते को फिटकरी के साथ मिलाकर घाव पर लगाने से तुरंत आराम जाता है । तुलसी में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल तत्व चोट के घाव को पकने नहीं देता और ठीक करने में मदद करता है । तुलसी पत्ते को तेल में मिलाकर लगाने से जलन भी कम होती है। क्योंकि एंटीस्ट्रेस एंटीडिप्रेसेंट एंटीबैक्टिरियल गुणों से युक्त है तुलसी के पत्ते ।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए तुलसी के फायदे 
अगर आप इसकी पत्तियां चबाते हैं या फिर इससे हर्बल-टी बनाकर पीते हैं तो उससे शरीर को लाभ होता है। यदि आप की इंसान का इम्युनिटी सिस्टम मजबूत है तो आपको बीमारियां कम लगने के चांस रहने हैं ।
मृत्यु के समय तुलसी के पत्तों का महत्त्व
मृत्यु के समय व्यक्ति के गले में कफ जमा हो जाने के कारण श्वसन क्रिया एवम बोलने में रुकावट आ जाती है। तुलसी के पत्तों के रस में कफ फाड़ने का विशेष गुण होता है इसलिए शैया पर लेटे व्यक्ति को यदि तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस पिला दिया जाये तो व्यक्ति के मुख से आवाज निकल सकती है।
इस विधि से करें तुलसी की पूजा
रोज सुबह स्नान आदि करने के बाद तुलसी के पौधे को कुमकुम, हल्दी और चावल अर्पित करें।
तुलसी के पौधे पर जल चढ़ाएं और भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें।
इसके बाद तुलसी के सामने गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और परिक्रमा करें।
परिक्रमा करते समय ये मंत्र बोलें-
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।
कम से कम 5 परिक्रमा करें। इसके बाद तुलसी की आरती करें-
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता॥
सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर।
रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता॥
बटु पुत्री है श्यामा, सूर बल्ली है ग्राम्या।
विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता॥
हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित।
पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता॥
लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में।
मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता॥
हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी।
प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता॥
हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता॥
जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता॥
कार्तिक माह में तुलसी पूजन के विशेष महत्व
कार्तिक माह में तुलसी के पौधे की पूजा करने का विशेष महत्व है. तुलसी के पौधे को लक्ष्मी जी का प्रतीक माना गया है तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है. इसलिए श्री हरि की पूजा के समय उन्हें तुलसी अर्पित करने से वे जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं. और भक्तों की सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं. 
चतुर्मास की शुरुआत में भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठानी एकादशी के दिन जागते हैं. सालभर के सभी बड़े त्योहार कार्तिक मास में ही पड़ते हैं. कहते हैं कि इस माह में तुलसी की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. 
मान्यता है कि घर में तुलसी का पौधा होने पर नियमित रूप से उसकी पूजा करनी चाहिए. साथ ही रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को पानी नहीं देना चाहिए. कार्तिक मास में सुबह-शाम तुलसी के आगे दीपक जलाना चाहिए. और पूजा-पाछ करना शुभ माना जाता है. इससे घर में दरिद्रता और दुर्भाग्य नहीं आता. माना जाता है तुलसी के पौधे में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का निवास होता है. घर में तुलसी का पौधा रखने और पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है. मान्यता है कि कार्तिक मास में तुलसी के पौधे की पूजा के समय इस मंत्र का जाप किया जाए, तो मनचाहा फल प्राप्त होता है. 
तुलसी मंत्र का जाप इस प्रकार करें-:-
महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी, 
आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोस्तुते।
तुलसी के पत्तों को छूते हुए इस मंत्र का जाप नियमित रूप से करना चाहिए. कहते हैं कि इससे व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं.
मंत्र से पहले रखें इन बातों का ध्यान रखें:-
1. तुलसी मंत्र का जाप करने से इस बात का ध्यान रखें कि पहले अपने ईष्टदेव की पूजा करें. इसके बाद ही तुलसी मंत्र का जाप करें. 
2. तुलसी मंत्र का जाप शुरू करने से पहले तुलसी को प्रणाम करना चाहिए और पौधे में शुद्ध जल अर्पित करने के बाद ही मंत्र का जाप शुरू करें.
3. इसके बाद तुलसी जी का शृंगार हल्दी और सिंदूर चढ़ा कर करें. इसके बाद तुलसी जी के आगे घी का दीपक, धूप और अगरबत्ती जलाएं.
4. इन सब के बाद तुलसी जी के पौधे की 7 बार परिक्रमा लगाएं. इसके बाद ऊपर बताए गए मंत्र का जाप करें. जाप के बाद तुलसी जी को छूकर सभी मनोकामनाएं बोल दें. 


Wednesday, October 20, 2021

शरद पूर्णिमा महोत्सव की खीर डा.राधे श्याम द्विवेदी

शरद पूर्णिमा को जागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा पड़ती हैं। पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है।हिन्दू धर्म में इस दिन को जागर व्रत या कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।
एक परंपरागत कहानी
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है। उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से कपडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
 पूजा का विधान  
इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (3 घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक ग़रीबों को इस प्रसाद रूपी खीर को बांटे और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा किसी दीन दुःखी को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं वह मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
यह व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा और माता लक्ष्मी के पूजन का विधान है। इस दिन माता लक्ष्मी का पूजन मुख्य रूप से फलदायी होता है। इसलिए पूरे श्रद्धा भाव से माता का पूजन करें और उन्हें खीर का भोग अर्पित करें। ऐसा माना जाता है कि इस दिन माता लक्ष्मी के पूजन का अलग महत्‍व है। यह समस्त पापों से मुक्ति दिलाता है। इस दिन चंद्रमा की किरणों से निकलने वाले अमृत से मिलकर बनी खीर का भोग व्यक्ति को निरोगी करने के साथ कई कष्टों से मुक्ति दिलाता है। इस दिन मां लक्ष्मी रात्रि भर भ्रमण करती हैं और इनके पूजन से घर में धन-संपदा का आगमन होता है।
माता लक्ष्मी का प्राकट्य दिवस
समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन मां लक्ष्मी का आविर्भाव समुद्र से हुआ था। इसलिए इस दिन को माता लक्ष्मी के अवतरण दिवस और प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। मां लक्ष्‍मी के जन्‍मदिन पर इन उपायों को करने से आपके घर में होगी धनवर्षा
खीर का महत्व
शरद पूर्णिमा की रात में चांद की किरणों में खीर रखने की परंपरा है। रात्रि के समय जब चंद्रमा अपनी संपूर्ण कलाओं से युक्त हो उस समय खीर से भरा बर्तन चांद की रोशनी में रखकर उसे भोग के रूप में ग्रहण करें। चंद्रमा की रोशनी में रखी हुई खीर खाने से मन और तन को शीतलता मिलती है। ऐसा माना जाता है कि यह खीर अमृत से युक्त होती है। इसलिए इसे घर के सभी लोगों को खाना चाहिए और प्रसाद के रूप में सभी को वितरित करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टिकोण
शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है। जिसकी अमृत वर्षा से खीर भी अमृत के समान हो जाती है। सुबह इसका सेवन करने से रोग खत्म हो जाते हैं और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस दिन खीर चंद्रमा की रोशनी में रखने से उसमें खास तरह के विटामिन आ जाते हैं है। इसलिए यह खीर बहुत स्वास्थ्यवर्धक होती है। दूध में लैक्टिक नामक ऐसिड पाया जाता है। इसके साथ ही चावल में स्टार्च पाया जाता है हैं। जिस वजह से खीर में कई तत्व मिल जाते हैं और इसे स्वास्थवर्धक बना देते हैं।
त्वचा रोग में फायदेमंद
स्किन रोग से परेशान लोगों को शरद पूर्णिमा की खीर खाने से काफी फायदे मिलते हैं। मान्यता है कि अगर किसी भी व्यक्ति को चर्म रोग हो तो वो इस दिन खुले आसमान में रखी हुई खीर खाएं। इसे खाने से कफ और श्‍वांस संबंधी बीमारी भी दूर होती है।
इस प्रकार शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र दर्शन, लक्ष्मी पूजन और खीर के भोग का अलग महत्‍व है। इसलिए इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए पूजन विशेष रूप से फलदायी होगा। वर्ष के बारह महीनों में शरद पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को यह देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।
शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है यानी लक्ष्मी जी पूछती हैं- कौन जाग रहा है? अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है इसलिए इस महीने का नाम अश्विनी पड़ा है। एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें यह सबसे पहला है और आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है। केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट भी। चंद्रमा की किरणों से इस पूर्णिमा को अमृत बरसता है।
आयुर्वेद में महत्व:-
जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को वह शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से जब दवा बनायी जाती है तो वह रोगी के ऊपर तुंरत असर करती है। चंद्रमा को वेद-पुराणों में मन के समान माना गया है- चंद्रमा मनसो जात:। वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानि औषधियों का स्वामी कहा गया है। ब्रह्मपुराण के अनुसार- सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधी 16 कला संपूर्ण हो तो अनुमान लगाइए उस दिन औषधियों को कितना बल मिलेगा।
खीर से रोग होते हैं दूर :-
शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है, शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है। हालांकि, इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है।
कृष्ण का रास:-
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं। कहते हैं जब वृंदावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी। गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं। शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है, जब वर्षा ऋतु अंतिम समय पर होती है। शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है और हेमंत ऋतु आरंभ हो चुकी होती है और इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।


Saturday, October 2, 2021

गया सहित सात पवित्र स्थलों पर पितृ तर्पण

पितरों की आराधना को तर्पण, पिंडदान और पंचबलि कहते हैं।इसे श्राद्ध भी कहा जाता है। इसके लिए देश में है 7 पवित्र पितृ तीर्थ हैं। ब्रह्म पुराण और महर्षि पराशर का कहना है कि पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मणों को दिया जाए वही श्राद्ध है । ग्रंथों में 7 ऐसी जगहों का जिक्र किया गया है, जहां श्राद्ध करने से पितृ पूरी तरह संतुष्ट हो जाते हैं। लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं हो, शारीरिक या आर्थिक परेशानी हो तो ऐसी दशा में मन पर बोझ ना रखते हुए भी ये काम श्राद्धानुसार किया जा सकता है। देश, काल, परिस्थिति को ध्यान में रखकर कहीं भी श्राद्ध हो सकता है। इस बारे में ब्रह्म पुराण के साथ ही महर्षि पराशर कहते हैं कि पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मणों को दिया जाए वही श्राद्ध है। श्राद्ध को तीन भागों में बांटा गया है, नित्य, नैमित्तिक और काम्य , लेकिन भविष्यपुराण में 12 तरह के श्राद्ध बताए गए हैं।
वेद और पुराणों में श्राद्ध
श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द बना है। ग्रंथों में कहा गया है कि श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम् यानि पितृगणों के लिए विधि-विधान से श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म विशेष ही श्राद्ध है। इस बारे में अथर्ववेद, वायु, पद्म और कूर्म पुराण सहित कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।
देश के 7 पवित्र पितृ तीर्थ:-
1. गया (बिहार) यह फल्गु नदी के तट पर बसा है। गया 
में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किए जाने का उल्लेख पुराण
भी मिलता है। पुराणों के अनुसार, गयासुर नाम के एक असुर ने घोर तपस्या करके भगवान से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। भगवान से मिले आशीर्वाद का दुरुपयोग करके गयासुर ने देवताओं को ही परेशान करना शुरू कर दिया। गयासुर के अत्याचार से दु:खी देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि वह गयासुर से देवताओं की रक्षा करें। इस पर विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में भगवान विष्णु ने गयासुर के सिर पर एक पत्थर रख कर उसे मोक्ष प्रदान किया।
2. ब्रह्मकपाल (उत्तराखंड) यह स्थान बद्रीनाथ के निकट ही है। ब्रह्मकपाल में श्राद्ध कर्म सेे पूर्वजों की आत्माएं तृप्त होती हैं व उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
 3. सिद्धनाथ (मध्य प्रदेश) उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित है सिद्धनाथ तीर्थ।
4. प्रयाग (उत्तर प्रदेश) जिस किसी भी व्यक्ति का तर्पण एवं अन्य श्राद्ध कर्म यहां विधि-विधान से संपन्न हो वे जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।
5. मेघंकर (महाराष्ट्र) मान्यताओं के अनुसार मेघंकर तीर्थ को साक्षात भगवान जर्नादन का स्वरूप माना गया है।
6. लक्ष्मण बाण (कर्नाटक) माना जाता है कि यहां श्रीराम ने अपने पिता का श्राद्ध किया था।
7. लोहार्गल (राजस्थान) लोहार्गल वह स्थान है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं।
गया में तर्पण:-
बिहार के गया में भगवान विष्णु के पदचिह्नों पर मंदिर बना है। जिसे विष्णुपद मंदिर कहा जाता है। पितृपक्ष के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। इसे धर्मशिला के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पितरों के तर्पण के पश्चात इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों के दर्शन करने से समस्त दुखों का नाश होता है एवं पूर्वज पुण्यलोक को प्राप्त करते हैं। इन पदचिह्नों का श्रृंगार रक्त चंदन से किया जाता है। इस पर गदा, चक्र, शंख आदि अंकित किए जाते हैं। यह परंपरा भी काफी पुरानी बताई जाती है जो कि मंदिर में अनेक वर्षों से की जा रही है। फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं के अलावा पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है।
गया का विष्णु पद मंदिर:-
विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु का चरण चिह्न ऋषि मरीची की पत्नी माता धर्मवत्ता की शिला पर है। राक्षस गयासुर को स्थिर करने के लिए धर्मपुरी से माता धर्मवत्ता शिला को लाया गया था, जिसे गयासुर पर रख भगवान विष्णु ने अपने पैरों से दबाया। इसके बाद शिला पर भगवान के चरण चिह्न है। माना जाता है कि विश्व में विष्णुपद ही एक ऐसा स्थान है, जहां भगवान विष्णु के चरण का साक्षात दर्शन कर सकते हैं।
विष्णुपद मंदिर सोने को कसने वाला पत्थर कसौटी से बना है, जिसे जिले के अतरी प्रखंड के पत्थरकट्‌टी से लाया गया था। इस मंदिर की ऊंचाई करीब सौ फीट है। सभा मंडप में 44 पीलर हैं। 54 वेदियों में से 19 वेदी विष्णपुद में ही हैं ।विष्णुपद मंदिर के शीर्ष पर 50 किलो सोने का कलश और 50 किलो सोने की ध्वजा लगी है। गर्भगृह में 50 किलो चांदी का छत्र और 50 किलो चांदी का अष्टपहल है, जिसके अंदर भगवान विष्णु की चरण पादुका विराजमान है। इसके अलावे गर्भगृह का पूर्वी द्वार चांदी से बना है। वहीं भगवान विष्णु के चरण की लंबाई करीब 40 सेंटीमीटर है। बता दें कि 18 वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर का जीर्णोद्वार कराया था, लेकिन यहां भगवान विष्णु का चरण सतयुग काल से ही है।  यहां पर पितरों के मुक्ति के लिए पिंडदान होता है। यहां सालों भर पिंडदान होता है। यहां भगवान विष्णु के चरण चिन्ह के स्पर्श से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।   
श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के तर्पण संस्कार के लिए भगवान विष्णु के पदचिह्नों पर बने मंदिर में लोग पूजा संस्कारों के लिए आते हैं। बिहार के गया में स्थित इस मंदिर को विष्णुपद मंदिर के नाम से जाना जाता है। पितृपक्ष के अवसर पर यहां श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए श्राद्ध संस्कार करना अत्यंत आवश्यक मानते हैं। इस मंदिर को धर्मशिला के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पितरों के तर्पण के पश्चात इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों के दर्शन करने से समस्त दुखों का नाश होता है एवं पूर्वज पुण्य लोक को प्राप्त करते हैं। पवित्र फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित विष्णु मंदिर की कई विशेषताएं हैं। मंदिर के शीर्ष पर सोने का कलश, स्वर्ण ध्वजा,गर्भगृह में चांदी का छत्र चांदी का अष्ट पहलू है। सभी 50-50 किलो के हैं। अंदर विष्णु जी की चरण पादुका है। गर्भगृह का पूर्वी द्वार भी चांदी से बना है। भगवान विष्णु के चरण की लंबाई करीब 40 सेंटीमीटर है। जानकारों का कहना है कि 18 वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया था, लेकिन यहां विष्णु जी का चरण सतयुग काल से ही है।
मंदिर कसौटी पत्थर की संरचना :-
विष्णुपद मंदिर का निर्माण सोने को कसने वाली कसौटी पत्थर पर किया गया है। इस मंदिर की ऊंचाई करीब 100 फीट है। सभा मंडप में 44 पिलर हैं। 54 वेदियों में से 19 वेदियां विष्णुपद में ही हैं, जहां पर पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान होता है। यहां साल भर पिंडदान होता है। मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु का चरण चिह्न ऋषि मरीची की पत्नी माता धर्मवत्ता की शिला पर है। कहते हैं कि दैत्य गयासुर को स्थिर करने के लिए धर्मपुरी से माता धर्मवत्ता शिला को लाया गया था, जिसे गयासुर पर रख भगवान विष्णु ने उसे अपने पैरों से दबाया था। इसके बाद शिला पर भगवान के चरण चिह्न बने। विश्व में विष्णुपद ही एक ऐसा स्थान है, जहां भगवान विष्णु के चरण के साक्षात दर्शन किए जा सकते हैं। 
इन विष्णु पदचिह्नों का शृंगार रक्त चंदन से किया जाता है। इस पर गदा, चक्र, शंख आदि अंकित किए जाते हैं। यह परंपरा भी काफी पुरानी बताई जाती है, जो कि मंदिर में अनेक वर्षों से की जारी है। मंदिर परिसर में करीब 160 वर्ष पुरानी धूप घड़ी है। इसे विक्रम संवत 1911 में स्थापित किया गया था। जैसे-जैसे सूर्य पूर्व से पश्चिम की तरफ जाता है तो किसी वस्तु की छाया पश्चिम से पूर्व की तरफ चलती है, सूर्य लाइनों वाली सतह पर छाया डालती है, जिससे दिन में समय के घंटों का पता चलता है। 3 फिट की ऊंचाई पर गोलाकार आकार में एक पाया स्थापित कर ऊपरी हिस्से पर मेटल पर नबंर अंकित हैं इस घड़ी में।
तर्पण की विधि विधान :-
तर्पण में दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल से पितरों को तृप्त किया जाता है। श्राद्ध का फल, दक्षिणा देने पर ही मिलता है। मान्यता है कि चंद्रलोक पर और सूर्यलोक के पास पितृलोक होने से, वहां पानी की कमी है। अत: पूर्वजों का तर्पण, हर पूर्णिमा और अमावस्या पर करें।
श्राद्ध में कुछ जरूरी बातें:-
स्वच्छ वस्त्र पहनकर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध व दान का संकल्प लें। श्राद्ध में पूजा-पाठ की सामग्री के अलावा तर्पण के लिए खासतौर से साफ बर्तन, जौ, तिल, चावल, कुशा घास, दूध और पानी की जरूरत होती है। पिंडदान के लिए तर्पण चावल और उड़द का आटा जरूरी है। ब्राह्मण भोजन के लिए सात्विक भोजन बने। वस्त्रदान से पितरों तक वस्त्र पहुंचाए जाता है। श्राद्ध होने तक कुछ न खाएं।
सीताकुंड है दर्शनीय:-
मंदिर से थोड़ी दूर फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित सीताकुंड है। मान्यता है कि श्रीराम, माता सीता के साथ महाराज दशरथ का पिंडदान करने यहां आए थे, जहां सीता जी ने महाराज दशरथ को बालू फल्गु जल से पिंड अर्पित किया था और यहां बालू से बने पिंड दान का महत्व बढ़ा।