Friday, November 6, 2026

पण्डित राम चरित्र पांडेय ‘पावन’ : एक राजनेता की काव्य कुशलता (बस्ती के छंदकार भाग कड़ी 37)✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

  पण्डित राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता के पूर्व से ही बस्ती जिले के एक बेहद कद्दावर कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने जिले कीशुरुआती राजनीति की दिशा तय की थी। उनका जन्म भाद्र कृष्ण पक्ष 6 मंगलवार सम्वत् 1941 वि० तदनुसार 1884 ई को हर्रैया तहसील के ‘बेलभरिगा राम गुलाम’ नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री राम नेवाज पाण्डेय था। वहअपने समय के बहुत बड़े रईस और तालुकदार व्यक्ति थे। वे उस जमाने में कक्षा 4 तक ही पढ़े थे लेकिन घर पर उन्हें हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी की शिक्षा अच्छे ढंग से दी गई थी। घर पर शिक्षा प्राप्त करने के बाद पुनः मैट्रिक करने के प्रयत्न में जब वह लगे तो गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर अपना पढ़ना बन्द कर दिया और स्वतन्त्रता सघर्ष में भाग लेने के कारण इनका व्यक्तित्व राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हो गया। 
    इस आन्दोलन के सिलसिले मे वे प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय रचनाएँ करने लगे थे। वे खड़ी बोली, ब्रज भाषा और भोजपुरी तीनों भाषाओ में ही साधिकार रचनाएँ किया करते थे। अपनी राष्ट्रीय रचनाओ के कारण जहाँ उनको 'पावन' नाम से जाता जाता था वहीं अपनी हास्य रसात्मक रचनाओं के कारण लुच्चेश' के नाम से भी विख्यात थे। भोजपुरी भाषा मे उन्होंने 'गंवार' नाम से अनेक प्रभावपूर्ण रचनाएँ की थी। चुलबुलेपन और व्यंग्य से परिपूर्ण हास्य-रसात्मक रचनाओं के कारण वे पूर्वी जनपदों में अत्यन्त लोकप्रिय थे। 

काव्य की भाषा :-
अवध क्षेत्र के निवासी होने के कारण उनका अवधी भाषा का ज्ञान पैतृक था। ब्रजभाषा के काव्यग्रंथों के अध्ययन से ये ब्रजभाषा के अच्छे ज्ञाता बन गए थे। भोजपुरी के मित्रों के साथ रहने से भोजपुरी के प्रति भी इनका अच्छा लगाव था और खड़ी बोली के राष्ट्रीय स्तर के कवियों के साहचर्य से उसके प्रति भी इनकी रूझान थी। इस प्रकार से अवधी, भोजपुरी, खड़ी बोली और ब्रज भाषा के ज्ञाता थे। पावन जी लुच्चेश और 'गँवार' उपनामों से भी क्रमश हास्य रसात्मक और जन बोलियों की रचनाएँ किया करते थे। आपकी खड़ी बोली की रचनाओ का सम्यक् आस्वाद उन अनेक कवि सम्मेलनों मे जन-साधारण को मिलता था जिनमे आपको ससम्मान आमन्त्रित किया जाता था। भाषा और संस्कृति उनके बहुआयामी लेखन और लोक-संस्कृति से जुड़ाव को दर्शाता है। वे मूल रूप से बस्ती के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे, जहाँ अध्यात्म, संस्कृत और साहित्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोया जाता था। 
    पावन जी कवि सम्मेलन के बड़े शौकीन थे। इनके हास्य रस के छन्द हजारों श्रोताओं को लहालोट कर देते थे। उनकी राजनीति में अपनी अच्छी पैठ थी। वे अपने क्षेत्र में इतने लोक प्रिय थे कि स्वतन्त्रता के पूर्व ही जब देश मे विभिन्न प्रदेशों की विधान सभाओ का पहला चुनाव हुआ तब वे 1937 में काग्रेस की ओर से अपने क्षेत्र के एम०एल०ए० (विधायक) भी चुने गए थे। वह बेहद साधारण पृष्ठभूमि के एक जनप्रिय नेता थे। वह अपने समय में बस्ती में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे।1937 में आजादी के पूर्व हुए चुनाव में उन्होंने देशराज नारंग परिवार से जुड़े गोकुल चन्द नारंग को पराजित किया था। आजादी के बाद बस्ती जिले की राजनीति, विशेषकर हरैया और कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्रों में उनका गहरा प्रभाव था। उस दौर में उनके समर्थन में क्षेत्र में एक नारा बेहद प्रसिद्ध हो चुका था — 

"खाएंगे पिएंगे नारंग का, 
लेकिन वोट रामचरित्र पाण्डेय को।"

भाद्र कृष्ण पक्ष अष्टमी सं० 2014 वि० तदनुसार 4 अगस्त 1997 ई को पावन जी ने लम्बी बीमारी के बाद बस्ती धरा को त्यागकर पावन गोलोक वासी हुए। उनके परिवार की न्याय और वकालत के क्षेत्र में भी पहचान रही है। बस्ती जुडिशरी के रिकॉर्ड के अनुसार, उनके पुत्र गोपाल चंद पांडेय वर्ष 1972 में सिविल बार बस्ती में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए हैं जो रंजीत कॉलोनी, मालवीय रोड, बैरिहवा, बस्ती में रहते हैं।    
 
कवियों का सानिध्य :-
पावन जी ऐसी परम्परा के कवि थे जहाँ रईसी अधिक थी। रंगपाल जी और द्विजेश का सान्निध्य इन्हें बराबर मिलता रहता था। रामाज्ञा प्रसाद द्विवेदी 'समीर' इनके अभिन्न मित्रों में से थे। पावन जी एक प्रतिभा सम्पन्न छन्दकार थे। राजनीति में रहने के कारण लखनऊ और कानपुर के छन्दकारों से इनका बड़ा घनिष्ठ संबंध था। सनेही और हितैषी मण्डल के छन्दकारों के साथ इनका जितना सम्बन्ध था उससे कम नहीं गुप्त , हरिऔध और माखन लाल चतुर्वेदी आदि से था। वह शेरवानी और चूडीदार पैजामा पहनते थे और पान आदि का अध्यधिक सेवन किया करते थे। उनके कवि मित्रों का दरबार उनके घर पर ही लगा रहता था।

कवित्त और सवैया छंदों की साधना :- 
पंडित राम चरित्र पांडेय 'पावन' जी पारंपरिक भारतीय छंदों (जैसे दोहा, सवैया, कवित्त और चौपाई) के बड़े ज्ञाता थे। उनकी रचनाओं में मात्राओं और वर्णों का अनुशासन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वे मुख्य रूप से काव्य कला की परंपरा और छंद विधा के संरक्षण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य की प्राचीन और समृद्ध धरोहर—कवित्त और सवैया छंदों में उत्कृष्ट रचनाएँ की हैं। जहाँ आधुनिक काल में मुक्त छंदों का चलन बढ़ा, वहीं 'पावन' जी ने अपनी लेखनी को शास्त्रीय नियमों में बांधकर रखा। उनके सवैया और कवित्त में अद्भुत लय, आंतरिक संगीत और तुकबंदी होती थी, जो श्रोताओं को तुरंत मंत्रमुग्ध कर देती थी। 

सरल और लोक-उन्मुख भाषा: 
'पावन' और 'गंवार' जैसे उपनाम इस बात के प्रतीक हैं कि वे अपनी कविताओं में आम जनमानस और ठेठ लोक-भाषा की सादगी को समेटे हुए थे ताकि एक साधारण व्यक्ति भी काव्य का आनंद ले सके।

काव्य साधना के मुख्य विषय: 
उनकी रचनाओं के इतिहास को देखें तो उनका झुकाव मुख्य रूप से भक्ति रस, राष्ट्रीय चेतना, और ग्रामीण अंचल के यथार्थ पर था। उन्होंने सनातन संस्कृति, भगवान श्रीराम के चरित्र और लोक- कल्याण की भावना को अपनी कविताओं का मुख्य आधार बनाया।

प्रकाशित रचनाएं -
आपकी विभिन्न विधयक रचनाओ के तीन-चार सकलन ही प्रकाशित हुए थे। इसके अलावा अनेक राजनीतिक सामाजिक तथा धामिक विकृतियों पर व्यग्य करने मे आप बहुत सिद्धहस्त थे ।
1. माता पिता स्तवन 
2. ढेलाष्टक
3. कुरकुराष्टक 

   पावन जी के घर जब डा.सरस जी अपने शोध प्रबंध के सिलसिले में गए थे तो पावन जी के सुपुत्र श्री बद्री प्रसाद पांडेय “ऋषि बाबू” से इनकी 13 हस्त लिखित डायरियाँ देखने को मिली थी। इनके डायरी के देखने से ऐसा ज्ञात होता है कि ये 14 वर्ष की अवस्था ही कविता करने लगे थे। सभी डायरियों में इनकी फुटकर कविताएँ इनके ही हाथों से लिखी गई हैं। प्रायः कविताओं पर तिथि का भी अंकन हुआ था । इनके अधिकांशतः छंद तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं में देखने को मिलते हैं। इनकी समस्या पूर्तियां बड़ी ही सद्यः ज्ञात होती थीं।

गावै राग फाग चौताल को उड़ाय धावै, 
पावै दिन दूनो निशि चार गुनो मोदरी ॥ 
राउ रंक एक भाउ पाइकै निहाल होते, गावत कबीर नही जानत सहोदरी ॥
रंग घोरि नावैं रोरी कुंकुम उडावें तापै, 
गीत बहु गावें करि साजन को गोद री ॥ मोद को समूह जूह खेद को हरैया वीर, फागुन न आयो सखी रागन की टोकरी ॥

  पावन जी का यह छन्द उनके किशोर अवस्था का छन्द है जिसमें श्रृंगार की छटा एक किशोर कवि के मुख से अन्तर्मन की अभिव्यक्ति के रूप में छन्द के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं। दिनांक 04. 03.1905 ई० का समय था पावन जी घोड़े पर सवार होकरके अपने निवास स्थान बेलभरिया से हरगाँव जा रहे थे वहाँ बसंत वैभव से उनका किशोर मन झूम उठा। उन्होनें छन्द बसन्त को इस प्रकार लिखा है -

आयो है बसन्त छहरायो हैं छटान आज, छायो है लतानन में नवल वितान को । पनस, रसाल, निम्ब, नेबुला, कदम्ब जेते, सब सरसायो ढंग मन्मथ महान को । चातक चकोर भौर भीरन गनै को सखि,
भली बनी आई पीही कोकिला सुगान को। जो पै बगरायो है जहाँन मैं प्रभा को निज दीन्यो पै निसान ऋतुराज विटपन को।।

   उन्होनें होली छन्द इस प्रकार लिखा है -

आयी आजु मंजु कुंज पुंजन बितान बीच. 
सुषमा सनेह सजो हास्य घट ढलि गो । कीरति किशोरी थोरी वयस अथोरी बाल, संग लै सुलाल धरिवे को चुप चलिगो । श्यामा वेश धारि करतारि है चरित्र तहाँ, जसुदा कुमार सखियाँ समूह हलिगो, 
जौ लौ जान प्यारी पिचकारी लै सुधारी, 
तो लौ गोरे गालन गुलाल लाल मलिगो ।।

    इन दोनों छन्दों में पावन जी की तरूणाई झलक उठी है। पावन जी उस समय अपना साहित्यिक उप नाम का नामकरण नहीं कर सके थे क्योंकि होली गीत के पांचवे पंक्ति में अपने नाम के एक भाग ‘चरित्र’ शब्द का प्रयोग किया गया है। अनुप्रास की छटा में कवि का मनोरम तरुणाई की उमंग लिये कूक उठा है। अन्तिम छन्द में संयोग का जो पावन का रंगीला हृदय खींचा है वह बड़ा ही भावपूर्ण है। उनके युवा अवस्था का ही एक छन्द और देखें-

जौवन भोरी किशोरी कोऊ 
कुंजरा की रसालन लै परगाम लौं, 
बेचिवे के हित बैठी तहाँ 
छवि की कथा फैली आराम लौं धामलौं । 
देखिवे दौरे दुचंद सवै सुनि 
पावन हूँ पहुँचे तोहि ठाम लौं । 
दौरि के दीन्हीं दवाइ दुहूः 
बोली वा जवै चलो आमलो अमलो ।।

   इस छन्द में किशोर कवि की आपबीती उच्च शृंखला दर्शनीय है। अमलो शब्द से श्लेष छटा में युवक छन्दकार ने जो आनन्द लिया है उसकी तलाश कौन रसिक नहीं करता होगा।
    पावन जी श्रृंगार के बड़े ही तीखे छन्दकार थे। उनके छन्दों की चोट से श्रोता और काव्यं रसिक मर्माहत हुए बिना बच नहीं सकते थे। पावन जी के निगाहों से गुजरती हुई रूपवती तस्वीर भावुकों के मन दर्पण में चित्रित हुए बिना रह नहीं सकती थी। अभावों की मस्त चकोरी सी नायिका का एक चित्र देखिए -

किन केतऊ कोऊ कहै कछु पावन प्रेम के पंक फंसी सी रहै, 
धनिभाव की भोरी चकोरी नितै नव नेह की डोरी लसीसी रहै । 
मिलिवे सुघा बिन्दु कहानी कहा चिनगी निसों चोंच कसी सी रहै, 
निसिद्यौस वियोग फंसी सी रहै तऊ नेह ससी मैं धसी सी रहे।।

   पावन जी के इस छन्द में श्रृंगार रस छलक पड़ा है। इसमें वियोग भाव पनप उठा है।1913 मे मखौड़ा में कवि सम्मेलन हुआ था। वहाँ पर पावन जी ने जो छंद पढ़ा था वह प्रस्तुत है-

जिस पवित्र स्थान में हैं आज आये वन्धुवर, 
उसका भी कुछ हाल कहता आपसे दरकार है। 
है यही उत्पाद की श्रीराम से सुन्दर सपूत, जो हमारा इष्ट व परमात्मा अवतार है।।

     इस छन्द पर गुप्त जी के भारत भारती का प्रभाव है। जो किशोर कवि के उद्गार के रूप में व्यक्त हुआ था। 1916 में विक्रम- जोत में छत्रिय सम्मेलन हुआ था, उस समय दहेज विरोधी छन्द पावन जी ने इस प्रकार पढ़ा था-

करना हमें उपदेश तो अब पूर्व सा आता नहीं। 
आचार्य वंशी है इसी से चुप रहा जाता नहीं।
ईति को जीतो कलेजा भीति का भी तोड दो ।
बस यही है कामना सतले असत को छोड़ दो। 
सुत कनयकाओं के बराबर बेचने में पाप है।
निष्याप बनने को दहेज अब मांगना सब छोड़ दो। 
उद्धार कर दो घर्म का धारा बहा फिर प्रेम की।
उमड़ी हुई यह वाटिका नन्दन बनाकर छोड़ दो।।

    इस कविता में लगभग 150 पंक्तियाँ उनकी डायरी में देखने को मिली जिसमें सामाजिक सुधारों के प्रति कवि के भाव व्यक्त किये गये हैं।

पावन जी के राष्ट्रीय विचार-
पावन जी राष्ट्रीय विचारों के कवि थें। वे
व्यक्तिगत सत्याग्रह में ब्रिटिश सरकार द्वारा 14 सितंबर 1940 को साढ़े चार माह की सजा काट चुके हैं। (संदर्भ: श्री चन्द्र बली मिश्र कृत -"बस्ती वसुधा", पृष्ठ -106)। 
वे परतन्त्रता की बेड़ियों में कसी भारत माता के असहाय सपूत थे इसलिए उन्हें स्वाधीनता के लिए सदैव लगन लगी रहती थी। एक छन्द देखिए -

गारिबे गरूर है अगारी रूचै बैरिन के, 
पैरन यै आपने हमै भी कछु बूत है।
दीनता मैं, हीनता मैं, पीनता आधीनता मैं, घरम घुरीनता की करनी अकूत है । 
रंग रूप भेदन प्रभेदन के वेदन तैं ,
कहिवे परत जाको अमित सबूत है ।
जन्मभूमि राम के कलैया के वरैया यातें, काले है जरूर पै न काली करतुति है ।।

   यह अंग्रेजों के प्रति कही गई अन्योक्ति कितनी सार्थक है। हिन्दी के प्रति पावन जी की पंक्तियाँ कितनी भाव प्रधान हैं-

उन्नति उषा कढ़ी तम व्योम है एकता भानु प्रभा गहने लगी । 
कारे मलिन्दन की अवली अरविन्द कोरी कली लहने लगी । 
त्यो पछुवा को प्रपच गयो अस पुरबी बात बढ़ी रहने लगी । 
आम भीनी सनेह सनी अब हिन्द में हिन्दी हवा बहने लगी ।।

    राष्ट्रीयता का स्वर इस छन्द का प्राण है। पछुवा हवा अंग्रेजियत का प्रतीक है। अन्धकार पर अरूणादेय के माध्यम से अंग्रेजी पर हिन्दी का पाश्चात्य सम्यता पर पौरवात्य का प्रभाव सांस्कृतिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में बड़ा अन्योक्ति परक है। उसी ही क्रम में एक और छन्द प्रस्तुत है-

लाइये पावन मंजु विचार हिये केहि भांति स्वजाति जगाइये । 
गाइये द्यौस निशा हरि को परिरंच प्रपंच न वंच कहाइये । 
हारिये द्वेष दुराग्रह द्वंद्व अमंद सुमारग नेह के धाइये । 
धाइये जो बल सिंह समान पै गीदड़ पै जनि हाथ चलाइये ।।

    प्रस्तुत छन्द में एक घटना का चित्रण है। पावन जी अपने सीरवार मनोहर सिंह के साथ हरिगाँव जा रहे थे। दोनों घोड़े पर सवार थे। मनोहर अपने बरछे से गीदड़ पर प्रहार करना चाहा तब तक पावन जी ने उन्हें रोक दिया और हरिगाँव पहुँचने पर यह छन्द पढ़ करके तुरन्त सुनाया।

सुदामा चरित :- 
पावन जी बड़े ही सामाजिक भावधारा के कवि थे। 'सुदामा चरित पर उन्होनें अपनी डायरी में 9 छन्द लिखा है। उसमें से एक छन्द देखें-

आते ही रुला दिया हमारे द्वारिकेश को, वेस था न भूषा थी नर ऐसा नर था ।
पीठि पै न पट था लंगोटी लटी छोटी लंक, वोटी थी न हाँड हाँड आ रहा नजर था । कौन था कहाँ का था सघा था कौन यंत्र मंत्र।
बोला भी न मुख से न नीचा किया कर था।
उलटे झुरे से मुँड ले गया खिला के कुछ, पागल बना दिया अजीव जादूगर था ।।

    सुदामा चरित्र के सभी छन्द पावन जी के काव्य कौशल के प्रतीक हैं ।पावन जी के सामाजिक सुधार के छन्द बड़े अच्छे हैं। बेगार लेने वालों पर कैसा व्यंग्य है -

नमक हराम वरजोर बेईमान सारे नाम के नकारे से बिचारे काज करते । 
बोल-बोलि ताने वार-वार लौ सुझाय हारे लाख समुझाये पै न केह कान धरते।
जोतिवे को बोहवे को रंच न फिकिर, हिय में दाना परा खेत में तो चोथि चोथि चरते। 
मिलिहैं न ठौर रौखा हूँ बीच बैठिवे को ऐसे पाजियों को जो मजूरी मुफ्त हरते।।

    शोषक और शोषित का ऐसा चित्र कम ही देखने को मिलता है।

पावन जी और उनका फटकाराष्टक-
हास्य रस के परिप्रेक्ष्य में 'लुच्चेश' नाम रखकर पावन जी ने जिन छन्दों की सर्जना किया है वे व्यंगयात्मक हास्य रस से सराबोर है। यथा -

कहा था तुम्हें जो कुछ गोरियों ने काला कभी, 
बात ही थी ह्याँ तो गोरे लात से लचाहूँ मैं । नेह से नचाया तुम्हें छोहरी छबीलियों ने, वासना विसासेनी सनेहन संचा हूँ मैं । दावानल ब्रज का जरा सका था फूस-फास अजब निरासा की दवारि सैं तँचाहूँ मैं । करोगे बराबरी ‘लुचेश’ की कहाँ से हरी बाजी बाजी बात में तुम्हारा भी चचाहूँ मैं।।

    पुनः एक छन्द और प्रस्तुत है -

रीझते नहीं हौ तो न रीझो मन मालिक हौ। जी चहै पसीजो या बने ही रहो पूरे संठ । माखन मलाई मेवा मिश्री चखाओं चाहै, घोटिं घोटि घोटि कै पिलाओ घोंटिविषगंठ। एक ही सलाह बस देता है 'लुचेश' तुम्हें, बुद्धिमान मानो अनुमानो या महान लंड । चैन कै समझया मैं कन्हैया सुनो या न सुनो
पीर के हरइया परे भीर तो लगा लो कंठ।। 

    फटकाराष्टक के इन छन्दों में बड़ा पैना तीखा व्यंग्य है। हास्य रस पावन जी का अपना था। हास्य के विविध प्रकरणों पर वे कवियों के बीच में 101 ठहरते थे।समस्या पुर्तियाँ उनकी जुबान पर रहती थीं। इन्हें अपने विधायक होते हुए भी इनकी एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी। इन्हें अपने स्थान की कोई चिन्ता नहीं थी। प्रचार प्रसार से इतना दूर रहते थे किकाव्यानुभूति स्वान्तः सुखाय के लिए मिली थी जिसको उन्होने स्वयं ही स्वीकारा है-

बूढ़ी बैसवारी से लगन लगाते कहूँ, 
चित्त न चढ़ाते जिन्हें हारे भोग केते हैं। मीठ हूँ से मीठतौ हूँ सिठाई जाचत झूठ, या ते सुधा सानी पातरी हूँ टारि देते हैं। आपने मिजाजकी मिलै तोहै मिजाजनी के
ना तो सवै फीके या जहाँ के योग जेते हैं। नये हावभाव नये भाषा वेश भूषहिं सजी कविता कुमारी को 'लुचेश' रस लेते है।।

  इसी ही क्रम में एकऔर छन्द प्रस्तुत है -

पढ़े पंडितो का पद पोस हूँ मैं, 
कवियो का रंग मजमून हूँ मैं । 
हम नाक कटी ईर्ष्यालुओं के, 
किसी अंग विशेष का चूनहूँ मैं । 
मिलै आसन ऊँचा विरोधियों को, 
लिये सामने लम्बा सुतून हूँ मैं । 
कविता कला कामिनी नाचती तो, 
तुकताल मिलाता वफून हूँ, मैं ।।

    इन दोनों छन्दों में कवि की हास्य परक वक्रोक्ति मुखरित हो उठी है।

      पावन जी बड़े ही निर्भीक कवि थे। वे कहने में रंचमात्र भी नहीं डरते थे। तीखा व्यंग्य उनका अपना मौलिक गुण था। स्वाभिमानी तो इतने ये कि जल्दी अपने टेक से झुकते नहीं थे। एक छन्द दखिए -

नेह सो हंकारे तहां जाइये नासिका के बल छाडि छल जूठी पात री हूँ टारि थरि है। पायन परवारि ही सुधारि ही सुआसन को, विजन बतासन हैं सीरे गात करि हैं। 
हरि है जहाँ लौं कठिनाई सेवकाई करि, सुजन समाज में बड़ाई भूरि भरि हैं। 
मानी बनि तानै भौंह पावन की तानि तिन्हें पसन समान मानि रंजहूँ न हरि हैं।।

   पावन जी के मित्रों में जगदीशपुर घराने के कुंवर श्याम नारायण जू देव शर्मा बड़े ही आत्मीय थे। पावन जी का वहाँ बड़ा सम्मान होता था। सैकड़ों छन्द इनसे संबंधित इनकी डायरियों में देखने को मिले हैं। 25. 03.1918 को होली के अवसर पर लिखा गया एक छन्द देखिए-

विनवऊँ जमदाकार मुबारक होली होवै । सुहृय सुदल नित बढ़े शत्रु की टोलीरोवै । हो प्रणाम स्वीकार प्रथम पुनि कृपा भाव सों। 
पावन शुभ आशीष लीजिए श्यामचावसों।।

नीति के छन्द :-
पावन जी ने नीति और धार्मिक भावनाओं पर शताधिक छन्दों की रचना किया है। यह कृष्णोपासक कवि थे। संसार और संसार की निस्सारता को चित्रित करने में पावन जी का एक छन्द प्रस्तुत है-

परम् प्रचण्ड दण्ड तरू गिरि खंडन में, धार्यो है सुधारि वीर सामुहे न जिनके । सक्र हू सकाने देखि भमरि भगाने जिन्हें, तेऊ काल गाल में समाने गिन-गिन के । विज्जु की अभा सी द्वैक छनकी छवीली छटा, 
रेनु की अटा सी वटा नट औ नटिनि के । गोरे-गोरे गातन पै नेक न गरूर की जै, जोवन जवानी ये जालूस चारि दिन के ।।

     पावन जी ब्रजभाषा के उच्च स्तरीय छन्दकार थे। घनाक्षरी मनहरण, सवैया, दोहा, रोला, सोरठा, हरिगीतिका आदि छन्दों के बहुतायत प्रयोग इनके काव्य में मिलते है। छन्दों में सफाई है। भोजपुरी
अवधी और खड़ी बोली का समुचित जान होने के कारण छन्दों की भाषा मिश्रित सी हो गई है। किन्तु वर्णन रीति परम्परा के सन्निकट श्रृंगार और हास्य रस के उत्कृष्ट कवि के रूप में कवि मंचो से लेकर साहित्यिक गोष्ठियों तक पावन जी को सदैव प्रतिष्ठा मिली है। उर्दू शब्दो का यत्र-तत्र प्रयोग तत्कालीन रईसी भरी दरबारी चाल-चलन का प्रभाव सूचित करता है। अलंकारों के प्रयोग में पावन बड़े सहज हैं। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्याक्ति, ब्याज स्तुति यमक आदि अलंकार यत्र-तत्र प्रयुक्त हुए है। मुहावरों का प्रयोग उनके प्रायः अधिकांशतः छन्दों में हुए है। तीखे व्यंगों से कथ्य शिल्प रोचक बना दिया गया है। कहीं-कहीं पर अश्लील शब्दों का भी प्रयोग है। इनके हस्त लिखित डायरियों में लगभग एक हजार छन्द विविध प्रकरणों पर लिखे हए देखने को मिले। सभी छन्द अस्त-व्यस्त क। इनका संकलन करके कई संग्रह रूप दिया जा सकता है। प्रकाशन होने से पावन जी के ऊपर एक स्वतंत्र शोध किया जा सकता है। पावन जी रंगपाल, द्विजेश, परम्परा के महत्वपूर्ण कड़ी है। रंगपाल की के सान्निध्य में और द्विजेश जी के सम्पर्क में रहकर पावन जी ने अपनी कांव्य यात्रा को जनपद के लिए साहित्यिक सम्पन्नता की ओर ले जाने में पर्याप्त सक्षम प्रयास किया है। यदि हरिहरपुर में रंगपाल जी के यहाँ कवि कोविद उपस्थित होकर जनपद के छन्दकारों को छन्दों के व्यापकत्व से शिक्षित दीक्षित कर रहे थे तो द्विजेश जी की छत्रछाया में जनपद के सुधी छन्दकार दीक्षित हो रहे थे। जनपद के पश्चिमांचल में जनपद के ही नहीं प्रान्त के कोने-कोने से पधारने वाले कवि छन्दकारों को पावन जी का आतिथ्य जनपदीय चेतना में प्राण फूंक रहा था। पावन जी का साहित्यिक योगदान बहुत ही विशिष्ट था। वह छन्द परम्परा के उन्नायकों में जनपद के आश्रयदाता और कवि दोनों थे।भाद्र कृष्ण पक्ष अष्टमी सं० 2014 वि० तदनुसार 4 अगस्त 1997 ई को पावन जी ने लम्बी बीमारी के बाद बस्ती धरा को त्यागकर पावन गोलोक वासी हुए। 

स्मृति में अमृत सरोवर का निर्माण -
वर्तमान समय में भारत सरकार के अमृत सरोवर अभियान के तहत उनके गृह ग्राम 'बेलभरिया राम गुलाम' में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए "स्वर्गीय पंडित राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमृत सरोवर" का निर्माण किया गया है। भारत सरकार की 'अमृत सरोवर योजना' के तहत इसका जीर्णोद्धार और सुंदरीकरण किया गया है, ताकि जल संरक्षण के साथ-साथ इस स्थल को एक दर्शनीय और प्रेरणादायी स्थान के रूप में विकसित किया जा सके।

(मूल स्रोत: डा मुनि लाल उपाध्याय ‘सरस’ के शोध प्रबंध:”बस्ती जनपद के छंदकारो का साहित्यिक योगदान” भाग 1, पृष्ठ 111- 121 से साभार)

लेखक परिचय :-
आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी 
8/ 2785, आनंद नगर, कटरा 
जिला बस्ती- 272001(उत्तर प्रदेश)
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


 






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