Tuesday, November 3, 2026

पिता सी प्रतिभा वाली पुत्री दुर्गावती त्रिपाठी ✍️( बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 34)आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

          श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की ज्येष्ठ पुत्री स्मृतिशेष श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी का जन्म 13 अक्टूबर 1902 में मिर्ज़ापुर में हुआ था । वह अपने ज़माने की सोच, समझ और व्यवहार से बहुत बहुत आगे रहीं। उनका विवाह ग्राम सेखुई, कोटिया, तहसील शोहरतगढ़ जिला सिद्धार्थ नगर   (उस  समय  के जिला  बस्ती) के मूल निवासी पं०चन्द्रबली त्रिपाठी के साथ हुआ था, जो संस्कृत और हिंदी के उच्चकोटि के प्रख्यात विद्वान और छंदकार थे। कोटिया नामक गांव शोहरतगढ़ तहसील में बढ़नी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास जोगिया खास ब्लॉक में स्थित एक आबाद गाँव है।  2011 की जनगणना के अनुसार, यहाँ 70 परिवारों में 400 लोग रहते हैं और इसका क्षेत्रफल 33.39 हेक्टेयर है। स्थानीय संदर्भों में यह नखही ग्राम पंचायत, जोगिया खास  ब्लॉक शामिल हैं । उनका निकटतम शहर सिद्धार्थ नगर है, जो वहां से लगभग 36 किमी की दूरी पर स्थित है।

             पं०चन्द्रबली त्रिपाठी

पण्डित चन्द्रबली त्रिपाठी से विवाह के उपरान्त वह अपने पति के साथ तत्कालीन जिला मुख्यालय बस्ती में रह कर वह कर दिखाया जो किसी 'ब्राह्मण' कुलवधू के लिए आज भी संभव नहीं है। उन्होंने घर के 'उठाऊ इज़्ज़तघर' की सफाई करने वाले गोकुल नामक भंगी के गंभीर रूप से रुग्ण होने पर स्वयं भोजन और पथ्य ले कर दो मील पैदल चल कर लगभग पंद्रह दिन उसकी सेवा-सुश्रूषा किया था। पड़ोस के नन्दौर गाँव के मौलवी हसन अली के घर आने पर उन्हें घर के बर्तनों में भोजन कराने तथा उनके बीमार होने पर अपने हाथों उनकी हर तरह से उनकी तीमारदारी, साफ़ सफाई और देखरेख की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई थी। बिहार में आये 1934 के भीषण भूकम्प और 1943 में बंगाल के दुर्भिक्ष में अन्न-वस्त्र-धन जुटा कर भेजवाने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह औपचारिक शिक्षा के बिना बांग्ला, पाली, ब्राह्मी में प्रवीणता प्राप्त कर ली थीं। उनकी बौद्ध धर्म में गहरी अभिरुचि थी। उन्होंने लुम्बिनी, श्रावस्ती, सारनाथ, महादेवा और सिसवनिया जैसे प्राचीन ढूहों, टीलों, पुरास्थलों का भ्रमण किया था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी भी निभाई थी जो उनके व्यक्तित्व के विलक्षण पहलुओं का द्योतक हैं। इतना ही नहीं, अपने संकलन में से लखनऊ संग्रहालय को पुरावेष भेंट किया था । उन्होंने बस्ती में संग्रहालय की स्थापना करायी थी।बस्ती में यह संग्रहालय सेक्सेरिया स्कूल और गांधी कला भवन में संचालित रहा। उन्होंने कोपिया के प्राचीन टीले का निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला कि यहाँ शीशा गलाने के प्राचीन उद्योग रहे होंगे और सन 2004 के आसपास डेकन कालेज के प्रोफेसर डॉ. आलोक कुमार कानूनगो द्वारा कराए गए उत्खनन से उसकी पक्की पुष्टि  भी हुई है। 

विशाल वट वृक्षवत सम्बल - 

दुर्गावती त्रिपाठी को लोग “दादी अम्मा” भी कहते थे। उनकी शख्शियत ऐसी रही कि जिसने 'वटवृक्ष के नीचे किसी और वृक्ष के न पनपने' और किसी स्त्री की पहचान उसके पिता, पति या पुत्र-पौत्रों की पहचान से जुडी होने' जैसी आम धारणाओं को अपने मामले में पूरी तरह झुठला दिया। वह केवल इसलिए नहीं जानी जाती हैं कि वह हिंदी के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य राम चंद्र शुक्ल जी ज्येष्ठा पुत्री और तब के पूर्वांचल के जाने माने पण्डित चंद्रबली त्रिपाठी की धर्मपत्नी रहीं। वह ना ही इसलिए प्रख्यात हुई कि उन्होंने सुविख्यात चार-चार प्रतिभाशाली पुत्रों को जन्म दिया। यथा डॉक्टर चंद्रचूड़ मणि - बौद्ध विद्वान, श्री चंद्रमौलि मणि - प्रखर मेधा के धनी और रेलवे के उच्चाधिकारी, श्री चन्द्रभाल त्रिपाठी -  पिछली शती के पांचवें दशक के जाने माने छात्र नेता, लखनऊ विश्व विद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष, चिंतक और मानव शास्त्री तथा श्री चंद्रधर त्रिपाठी - भारतीय प्रशानिक सेवा (आई. ए. एस.)। वह ना तो इस कारण प्रसिद्धि पाई कि उनका पौत्र  महानिदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय ; अपर महानिदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रहा तथा अयोध्या जैसे अनेक सांस्कृतिक स्थलों का उत्खनन और परीक्षण कर भारत सरकार द्वारा पद्म श्री अर्जित किया है। वह ना तो इस कारण प्रसिद्धि पाई कि उनका पौत्र आई. आई. टी. दिल्ली में गणित के प्रोफेसर अथवा दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जैसे ऊंचे ऊंचे मुकाम हासिल किए थे। अपनी दुर्लभ प्रतिभा की बदौलत, माँ, अम्माँ, दादी अम्माँ के ममत्व भाव से कहीं ज्यादा करुणामूर्ति, विदुषी और क्रांतिकारी के रूप में वह सर्वदा जानी पहचानी जाती रहेंगी। 

 बस्ती वालों को तो इस बात का गौरव भान रहेगा ही कि ऐसी निराली दादी अम्माँ रहीं हमारी कोटिया वाली, इससे आगे बढ़ कर वे पूरे पूर्वांचल, देश और मानवता के लिए वे सदैव एक अजस्र प्रेरणा- स्रोत बनी रहेंगी। समाज का ताना- बाना ऐसी ही विभूतियों के योगदान से सुदृढ़ होकर टिका रहता है ।

     दुर्गावती के पति पण्डित चन्द्र बली त्रिपाठी की प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय समाज में नारी आदर्शों का विकास' के हिंदी संस्करण का प्रकाशन "दुर्गावती त्रिपाठी प्रकाशन, बस्ती, उत्तर प्रदेश" द्वारा वर्ष 1991 में किया गया था। 

सिसवनिया पच्चीसा जिला बस्ती में पुरातात्विक खोज :-

बस्ती जिले के सदर बस्ती तहसील का सिसवनिया गांव महुली महसो राजमार्ग पर कुवानो तट पर स्थित है जो बौद्ध कालीन सेतव्या सिंसपावन विहार का अवशेष भी कहा जाता है। बौद्ध पाली ग्रंथ दीर्घ निकाय के पयासी सूत्र निपात (पराभन नग्न की प्रत्युगाथा) शिशुप बन आदि प्रसंग में ज्ञानधनी इस गांव का नाम सेतव्या पाया गया है। 1944 - 45 में श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं उनके पुत्र चंद्र मणि त्रिपाठी ने कुछ साक्ष्य एकत्र कर पेपर प्रकाशित कराया था। उत्तर कौशल का यह क्षेत्र 600 ई पू में राज्य द्वारा शासित क्षेत्र था। ( चन्द्रबली मिश्रा:”बस्ती बसुधा”, पृष्ठ 84 )

          डॉ. बी.आर. मणी 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा उत्खनन: 

बाद के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण  के पूर्व अपर महानिदेशक डॉ. बी.आर. मणी बचपन में अपने दादी मां श्रीमती दुर्गावती त्रिपाठी एवं पिता डॉ चंद्र मणि त्रिपाठी के अनुभवों और स्मृतियों को चिर स्थाई करते हुए एक उत्खनन दल गठित करते हुए  वर्ष 1995-96 और 1996-97 के दौरान यहाँ वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत उत्खनन कार्य कराया था। सिसवनिया में मुख्य उत्खनन के साथ-साथ डॉ. बी. आर. मणी की देखरेख में बस्ती और सिद्धार्थ नगर जिलों में व्यापक सर्वेक्षण भी किया गया, जिसके तहत लगभग 126 नए पुरातात्विक स्थलों की खोज की गई थी। इसी दौरान भद्रेश्वर नाथ के पास स्थित देउरांव, पिपरी, ओरई, धर्मसिंहवा और मुंडियार जैसे निकटवर्ती क्षेत्रों में भी प्रारंभिक परीक्षण खुदाई की गई थी।

                डॉ. राकेश तिवारी

(मूल स्रोत: डॉ. राकेश तिवारी के फेसबुक वाल दिनांक 21 अक्टूबर 2018 से साभार)


       आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय :-

पता : वार्ड नम्बर 8/ मकान नम्बर 2785, आनंद नगर, कटरा  जिला बस्ती-  PIN 272001(उत्तर प्रदेश)

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)









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