Saturday, October 25, 2025

बरसाने की श्री लाड़ली जी महाराज मन्दिर का चमत्कारिक इतिहास ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज बरसाना, उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से 43 किमी. दूर भानुगढ़ ब्रह्मांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर न केवल एक आध्यात्मिक शरणस्थली है, बल्कि भगवान श्री कृष्ण और उनकी अल्हादिनी शक्ति श्री राधा रानी  के बीच शाश्वत प्रेम का भी प्रमाण है। इस मंदिर को बरसाना की लाडली मंदिर और श्री जी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह श्री राधा रानी  के भक्तों का सबसे प्रिय मंदिर है, जो इस स्थान पर आकर खुद को बहुत धन्य महसूस करते हैं। 

प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर :- 

श्रीवृषभानु जी की राजधानी होने के कारण बरसाने का प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर था। वाराहपुराण एवं प‌द्मपुराण में ऐसी कथा आती है कि ब्रहमाजी ने तपस्या के बल पर श्रीकृष्ण से लीला- दर्शन का वरदान प्राप्त किया था। फल स्वरूप लीला दर्शनार्थ वे ब्रहमांचल के रूप में यहां स्थापित इस पर्वत को वृहत्सानु पर्वत के नाम से हुए। ब्रहमाजी के चार्तुमुखी स्वरूप के समान यहां वृहत्सानु की चार चोटियां हैं- भानुगढ़, दानगढ़, विलासगढ़ तया मानगढ़।

श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह : राधा प्रेम की मूर्ति:- 

जिस प्रकार श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह हैं, उसी प्रकार राधा प्रेम की मूर्ति हैं। अत: जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं राधा हैं और जहां राधा हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण के बिना राधा या राधा के बिना कृष्ण की कल्पना के संभव नहीं हैं। इसी से राधा ‘महाशक्ति’ कहलाती हैं। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं और ये सदा कृष्ण की आराधना करती हैं, इसीलिए राधिका कहलाती हैं। ब्रज की गोपियां और द्वारका की रानियां इन्हीं श्री राधा की अंशरूपा हैं। ये राधा और ये आनंद सागर श्रीकृष्ण एक होते हुए भी क्रीडा के लिए दो हो गए हैं। राधिका कृष्ण की प्राण हैं। इन राधा रानी की अवहेलना करके जो कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी पा नहीं सकता।’

निष्काम प्रेम और समर्पण:- 

राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। वह श्रीकृष्ण को समर्पित हैं, राधा श्रीकृष्ण से कोई कामना की पूर्ति नहीं चाहतीं। वह सदैव श्रीकृष्ण के आनंद के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार जब मनुष्य सर्वस्व समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन होता है, तभी वह राधाभाव ग्रहण कर पाता है। कृष्ण प्रेम का शिखर राधा भाव है। तभी तो श्रीकृष्ण को पाने के लिए हर कोई राधारानी का आश्रय लेता है।

विविध लीलाएं:- 

मन्दिर में श्री मानबिहारी लाल के दर्शन हैं। मोरकुटी पर श्री श्यामसुन्दर ने मोर बनकर नृत्य करते हुए अपनी श्यामा जू को रिझाया था। गहवर वन की सघन निकुंजें श्री राधा-माधव की सरस केलि की सहज नियोजिका है। इसके निचले भाग में रासमण्डल है, राधा सरोवर है, शंख का चिन्ह दर्शन है और महाप्रभु बल्लभ जी की बैठक है। वहां पर श्री गोपाल जी के दर्शन हैं। यह सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रृंगाराख्य भवरूपा है। तत्स्वरूपा होने के साथ उस परमभाव की भांति उन्मादना उत्पन्न करने में भी पूरी तरह समर्थ है। तभी तो स्वयं रसराज यहां इस राधिका- केलि- महल की किंकरियों के समान महाभावस्था नन्दिनी की कृपा की अभिलाषा लिए सदा रहते हैं।

राजपूताना शैली का मन्दिर:- 

मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज (राधा रानी मंदिर) की स्थापत्य कला राजपूताना शैली पर आधारित है और यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है, जो मुगल वास्तुकला से प्रभावित लगता है। मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से लाल और सफेद पत्थरों से हुआ है, जो राधा और कृष्ण के प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं। इस मंदिर की मुख्य विशेषताएं इसमें मौजूद जटिल नक्काशी, मेहराब, गुंबद और उत्कृष्ट चित्र हैं। पहाड़ी पर बने इस भव्य मंदिर तक पहुँचने के लिए 200 से अधिक सीढ़ियाँ हैं।  

वृषभानु महाराज का महल:- 

सीढ़ियों के नीचे वृषभानु महाराज का महल है, जहाँ राधा, कीर्ति और श्रीदामा की मूर्तियाँ हैं। इसके अलावा पास में ब्रह्मा मंदिर और अष्टसखी मंदिर भी हैं। 

राधा रानी का प्राकट्य :- 

भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को यहाँ विशेष महोत्सव मनाया जाता  है क्योंकि इसी दिन श्री राधा रानी का प्राकट्य  हुआ था और इसी दिन राधाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। मुख्यतः लठमार होली एवं राधाष्टमी यहाँ के सबसे बड़े त्यौहार हैं ।

     बरसाना में ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री लाडिली जी मंदिर और नंदगांव में नंदीश्वर पर्वत पर स्थित नन्द बाबा मंदिर दोनों की एक साझी परंपरा है जिसका निर्वहन साढ़े पांच सौ वर्ष से किया जा रहा है। 

होली में समाज गायन की परंपरा :- 

बसंत पंचमी से लेकर धुलेंडी तक यहाँ होली का उल्लास रहता है इसीलिए कहा जाता है कि ब्रज में फाल्गुन चालीस दिन का होता है। बसंत पंचमी के दिन से दोनों मंदिरों में आधिकारिक रूप से होली की शुरुआत होती है। होली के डांडे रोप दिए जाते हैं और समाज गायन का क्रम शुरू हो जाता है। इसी दिन से मंदिरों में गुलाल उड़ने लगता है, पखावज बजने लगती है और ढप पर थाप पड़ने लगती है। बसंत पंचमी के दिन आदि रसिक कवि जयदेव के पद ‘ललित लवंग लता परिसीलन, कोमल मलय शरीरे’ से समाज गायन शुरू होता है। इसी क्रम में हरि जीवन का पद ‘श्री पंचमि परम् मंगल दिन, मदन महोत्सव आज बसंत बनाय चलीं ब्रज सुन्दरि, लै लै पूजा कौ थार’ का गायन होता है। 

चमत्कारी इतिहास:- 

बरसाना स्थित लाड़ली जी मंदिर का इतिहास चमत्कारी कहानियों से भरा पड़ा है, जो स्थानीय लोगों की पीढ़ियों से चली आ रही हैं। मुगल आक्रमणकारियों के भागने की कहानियों से लेकर दैवीय हस्तक्षेप तक, यह मंदिर हमेशा मज़बूती से खड़ा रहा है। एक विशेष रूप से प्रसिद्ध कहानी एक चोर की है जो मंदिर को लूटने आया था, लेकिन अंधा होकर लौट गया।

       ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री राधा रानी के पवित्र महल को लूटने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन आक्रमण कारी और चोर, दोनों ही हमेशा खाली हाथ ही रहे हैं।एक चोर लूटपाट के इरादे से मंदिर में घुसा। आते ही उसने चौकीदार को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। हमले केबावजूद, चौकीदार ने अपनी उंगली से मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए और कुंडी लगा दी। चोर ने उस पर लगातार हमला किया, उसे लाठियों से मारा और यहाँ तक कि गोलियाँ भी चलाईं, लेकिन चौकीदार को कोई नुकसान नहीं पहुँचा।आखिरकार, चोर की आँखों की रोशनी चली गई और वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। इसी बीच, मंदिर में मौजूद अन्य लोगों नेआपात कालीन घंटी बजा दी, जिससे चोर भाग गया।

      लगभग 200 साल पुरानी एक और घटना है - डाकुओं ने मंदिर में चोरी करने की कोशिश की थी। हालाँकि, लाड़ली सरकार (राधा रानी) ने उनकी योजना को विफल कर दिया। रात के लगभग 11 बजे, डाकू मंदिर के शिखर पर चढ़ गए, और सोने का शिखर चुराने की कोशिश करने लगे। मंदिर के रखवालों को कुछ गड़बड़ होने का आभास हुआ। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाते, चोर अंधे हो गए।


विशाखा सखी विजय लाडली रूप में 

इस लिंक को खोलकर विजुवल की मदद से आप इस कहानी को और अच्छी तरह से समझ सकते हैं - 

https://youtube.com/shorts/h2pGSLxP0qo?si=y7P2mKnhDgfWCdU1


मुस्लिम आक्रमणकरियों से राधा जी की मूर्ति को बचाया गया 

राधा की दूसरी सखी का नाम विशाखा था. विशाखा बहुत सुंदर और इनकी कान्ति सौदामिनी की तरह थी. राधा को कर्पूर-चन्दन से निर्मित वस्तुएं प्रस्तुत करती थीं. ये सुदंर वस्त्र बनाने में निणुण थीं. मुस्लिम आक्रमण के दौरान,जब श्री राधा रानी के पवित्र विग्रह को गुप्त रूप से बरसाना से दूर श्योपुर ले जाया गया था, और वहाँ आठ महीनों तक उनकी पूजा की गई थी।वर्ष 1773 ई. का था। उत्तरी भारत मुगल शासन के साये में था। देश भर के मंदिरों पर अक्सर आक्रमण, लूटपाट और अपवित्रता का दौर चलता रहता था, क्योंकि मुगल शासक सनातन धर्म की आध्यात्मिक नींव को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। उस वर्ष, मुगल सेना बरसाना की ओर बढ़ी, जिसका उद्देश्य बरसाना के लाड़ली जी मंदिर पर कब्ज़ा करना था।उस समय, बरसाना, भरतपुर राज्य के संरक्षण में था, जिस पर वीर राजा सूरजमल के वंशजों का शासन था। उनके पौत्र नरेश मुरारजी इस पवित्र नगरी की रक्षा के लिए तैनात सेना का नेतृत्व कर रहे थे। जल्द ही, बरसाना के पास मुगल और भरतपुर सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ।

पुजारियों का साहस

जैसे-जैसे युद्ध के नगाड़ों की ध्वनि तेज़ होती गई और विजय की कोई निश्चितता न होने के कारण, मंदिर के पुजारियों के सामने एक गंभीर निर्णय आया। वे जानते थे कि श्री राधा रानी के विग्रह की सुरक्षा सर्वोपरि है। गहरी आस्था और दृढ़ निश्चय के साथ, उन्होंने सावधानीपूर्वक देवी को बरसाना से हटाकर युद्धभूमि से दूर एक किलेबंद नगर श्योपुर पहुँचाया। वहाँ, श्योपुर किले की दीवारों के भीतर, एक कुंड के पास एक मंदिर में, देवी की स्थापना की गई। अगले आठ महीनों तक, श्योपुर में भी श्री राधा रानी के सभी दैनिक अनुष्ठान, भोग और उत्सव, बरसाना की तरह ही संपन्न होते रहे। भक्तगण निरन्तर एकत्रित होते रहे और भक्ति की ज्योति, आक्रांताओं की पहुँच से दूर, प्रज्वलित रही।

आक्रमण के दौरान बरसाना

इस बीच, मुगल सेना बरसाना में घुस आई। हफ़्तों तक मंदिरों और गाँवों को लूटा गया, लेकिन जब वे लाड़ली जी मंदिर पहुँचे, तो उन्हें राधा रानी की मूर्ति नहीं मिली। इसके बजाय, श्रद्धालु पुजारियों ने पहले से ही एक वैकल्पिक मूर्ति-श्री राधा रानी की सखी (सखी) का विग्रह- स्थापित कर दिया था। पूजा-अर्चना बिना किसी रुकावट के जारी रही, जिससे मंदिर की पवित्रता कभी भंग न हो।भक्ति और ज्ञान के इस कार्य ने श्री राधा रानी की सेवा की अटूट श्रृंखला को अक्षुण्ण बनाए रखा। आक्रमण के अंधकारमय दिनों में राधा रानी के स्थान पर खड़ी हुई, प्रतिस्थापन देवी को "विजय लाडली" के रूप में पूजनीय माना गया - विजयी लाडली, जो भय पर विश्वास की विजय का प्रतीक है।

जब युद्ध समाप्त हुए और शांति लौटी, तो श्री राधा रानी के मूल विग्रह को श्योपुर से बरसाना वापस लाया गया। फिर भी, उन आठ महीनों की स्मृति स्थानीय परंपराओं में भक्ति, साहस और धर्म-रक्षा के एक ज्वलंत उदाहरण के रूप में अंकित है।

यह गोस्वामियों की अटूट भक्ति ही है कि राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में भी उन्होंने श्री राधा रानी की पूजा को कभी नहीं रोका। अपने बलिदान से उन्होंने एक ऐसी परंपरा की रक्षा की जो आज भी लाखों भक्तों को प्रेरित करती है।

    इस प्रकार उनकी सखी (विग्रह) की एक वैकल्पिक मूर्ति को 'विजय लाडली' के नाम से बरसाने के मंदिर में पूजा के लिए स्थापित किया गया था। जब मुगल सेना बरसाना के लाड़ली जी मंदिर पहुँची, तो उन्हें राधा जी की मूल मूर्ति नहीं मिली। इसके बजाय, पुजारियों ने राधा जी की सखी (सखी) की एक प्रतिस्थापन मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया था। इस प्रतिस्थापन देवी को 'विजय लाडली' के रूप में पूजा गया, जो भक्तों के विश्वास की जीत का प्रतीक था।युद्ध समाप्त होने के बाद, राधा जी की मूल मूर्ति को श्योपुर से वापस बरसाना लाया गया था। यह घटना स्थानीय परंपराओं में भक्ति, साहस और धर्म-रक्षा की एक मिसाल के रूप में दर्ज है।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉट्सप नं.+919412300183)









दक्षिण का विचित्र मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मन्दिर आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी


मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर भारत के तमिलनाडु राज्य के मदुरई नगर, में स्थित एक ऐतिहासिक मन्दिर है।  यह मंदिर वैगई नदी के दक्षिणी किनारे पर बना है। वैगइ नदी  तेनी ज़िले में पश्चिमी घाट की वरुसुनाडु पहाड़ियों में उत्पन्न होती है और इसका अंत रामनाथपुरम जिले में पंबन ब्रिज के करीब अलगनकुलम के पास पाक जलसंधि में विलय होने से होता है। इस नदी के तट पर निर्मित इस मन्दिर को अरुलमिगु मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या अरुलमिगु मीनाक्षी अम्मन थिरुकोविल भी कहा जाता है। यह हिन्दू देवता शिव (सुन्दरेश्वरर) एवं उनकी भार्या देवी पार्वती (मीनाक्षी या मछली के आकार की आंख वाली देवी के रूप में) दोनो को समर्पित है। यह  मछली पांड्य राजाओं का राजचिह्न था यह मंदिर पांड्य राजाओं द्वारा संरक्षित है । यह मन्दिर तमिल भाषा के गृहस्थान 2500 वर्ष पुराने मदुरई नगर की जीवनरेखा है।
      मीनाक्षी देवी मन्दिर मदुरई के बारे में इस विजुवल लिंक से और आसानी से इतिहास समझा जा सकता है - 

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       हिन्दु पौराणिक कथानुसार भगवान शिव सुन्दरेश्वरर रूप में अपने गणों के साथ पांड्य राजा मलयध्वज की पुत्री राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने मदुरई नगर में आये थे। मीनाक्षी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है। इस मन्दिर को देवी पार्वती के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है।
दिव्य विवाह 
देवी मीनाक्षी का विवाह भगवान सुंदरेश्वर से सोमवार, 20 फरवरी 3138 ईसा पूर्व को मदुरै में हुआ था, जब चंद्र कन्या राशि में था और सूर्य मेष राशि में था। तमिल नववर्ष सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ शुरू होता है और हर साल, नए साल की शुरुआत के 10 दिन बाद, मंदिर में मीनाक्षी त्रिल कल्याणम (विवाह) होता है। पांड्य तमिल शब्द पांडी (बैल) से भी जाना जाता है , क्योंकि प्राचीन तमिल लोग बैल को पुरुषत्व और वीरता का प्रतीक मानते थे। सुंदरेश्वर लिंग कृतयुग से प्रकट होता है। देवताओं के राजा इंद्र अपने गुरु की हत्या के दोषी थे और उन्हें एक भिखारिन के रूप में दुनिया में भटकने का श्राप मिला था। वे काशी (वाराणसी), कांची और तिरुकदावूर गए ।
राजा कुलशेखर पांड्यन की राजधानी में रहने वाले एक व्यवसायी धनंजय ने जंगल के बीच में इस मंदिर को देखा और राजा को बताया था । तमिल साहित्य में विष्णु को जिसमें मीनाक्षी का भाई माना जाता है, इस विवाह में   कन्यादान करने के लिए सहमत हुए, क्योंकि उस समय मीनाक्षी के पिता नहीं थे। ये विष्णु स्वयं कृष्ण हो सकते हैं, जो उस समय द्वारका में थे ।
स्थापत्य एवं वास्तु:- 
इस मन्दिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है, एवं इसका कारण इसका विस्मय कारक स्थापत्य ही है। इस इमारत समूह में 12 भव्य गोपुरम हैं, जो अतीव विस्तृत रूप से शिल्पित हैं। इन पर बडी़ महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गई है, जो देखते हृदय में स्थान बना लेती है। यह मन्दिर तमिल लोगों का एक अति महत्वपूर्ण  प्रतीक है, एवं इसका वर्णन तमिल साहित्य में पुरातन काल से ही होता रहा है। हालांकि वर्तमान निर्माण आरम्भिक सत्रहवीं शताब्दी का बताया जाता है।
इतिहास :- 
देवी पार्वती का हाथ भगवान शिव के हाथों में देते हुए (पाणिग्रहण संस्कार करते हुए) दिखाया गया है। देवी के भ्राता भगवान विष्णु (हिन्दू आलेखों के अनुसार) भगवान शिव पृथ्वी पर सुन्दरेश्वरर रूप में स्वयं देवी पार्वती पृथ्वी पर मिनाक्षी से विवाह रचाने के लिए अवतरित हुए। देवी पार्वती ने पूर्व में पाँड्य राजा मलयध्वज, मदुरई के राजा की घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके घर में एक पुत्री के रूप में अवतार लिया था।वयस्क होने पर उसने नगर का शासन संभाला था । तब भगवान आये और उनसे विवाह प्रस्ताव रखा, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस विवाह को विश्व की सबसे बडी़ घटना माना गया, जिसमें लगभग पूरी पृथ्वी के लोग मदुरई में एकत्र हुए थे। भगवान विष्णु स्वयं, अपने निवास बैकुण्ठ से इस विवाह का संचालन करने आये। ईश्वरीय लीला अनुसार इन्द्र के कारण उनको रास्ते में विलम्ब हो गया। इस बीच विवाह कार्य स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा संचालित किया गया। बाद में क्रोधित भगवान विष्णु आये और उन्होंने मदुरई शहर में कदापि ना आने की प्रतिज्ञा की। और वे नगर की सीमा से लगे एक सुन्दर पर्वत अलगार कोइल में बस गये। बाद में उन्हें अन्य देवताओं द्वारा मनाया गया एवं उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरर का पाणिग्रहण कराया। यह विवाह एवं भगवान विष्णु को शांत कर मनाना, दोनों को ही मदुरई के सबसे बडे़ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसे चितिरई तिरुविझा या अझकर तिरुविझा, यानि सुन्दर ईश्वर का त्यौहार  कहते हैं। इस दिव्य युगल द्वारा नगर पर बहुत समय तक शासन किया गया। यह भी मना जाता है, कि इन्द्र को भगवान शिव की मूर्ति शिवलिंग रूप में मिली और उन्होंने मूल मन्दिर बनवाया। इस प्रथा को आज भी मन्दिर में पालन किया जाता है ― त्यौहार की शोभायात्रा में इन्द्र के वाहन को भी स्थान मिलता है।
वर्तमान मंदिर:- 
आधुनिक ढांचे को तिरुज्ञानसंबन्दर, प्रसिद्ध हिन्दू शैव मतावलम्बी संत ने इस मन्दिर को आरम्भिक सातवीं शती का बताया है औरिन भगवान को आलवइ इरैवान कहा है।इस मन्दिर में मुस्लिम शासक मलिक कफूर ने 1310 में खूब लूटपाट की थी। और इसके प्राचीन घटकों को नष्ट कर दिया। फिर इसके पुनर्निर्माण का उत्तरदायित्व आर्य नाथ मुदलियार (1559-1600 A.D.), मदुरई के प्रथम नायक के प्रधानमन्त्री, ने उठाया। वे ही 'पोलिगर प्रणाली' के संस्थापक थे। फिर तिरुमलय नायक, लगभग 1623 से 1659 का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान हुआ। उन्होंने मन्दिर के वसंत मण्डप का निर्माण कराया था।
मन्दिर का वर्तमान परिमाप  :- 
इस मन्दिर का गर्भगृह 3500 वर्ष पुराना है, इसकी बाहरी दीवारें और अन्य बाहरी निर्माण लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने हैं। इस पूरे मन्दिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मन्दिर भारी भरकम निर्माण है और उसकी लम्बाई 254मी एवं चौडा़ई 237 मी है। मन्दिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है, जो कि उसकी दो परिसीमा प्राकार (चार दीवारी) में बने हैं। इनमें दक्षिण द्वार का गोपुरम सर्वोच्च है।
मीनाक्षी मंदिर में बने हैं दो विशेष मंदिर :- 
मीनाक्षी मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके परिसर में दो मंदिर है। एक मंदिर है मीनाक्षी मंदिर और दूसरे को कहा जाता है प्रधान मंदिर। यहां मीनाक्षी देवी के एक हाथ में तोता है और दूसरे हाथ में एक छोटी-सी तलवार है। इनके मंदिर की दीवार पर एक कल्याण उत्सव का एक चित्र अंकित किया गया है। जबकि दूसरे मंदिर में सुंदरेश्वर देव का मंदिर है, जिन्हें शिव का अवतार माना जाता है। यहां पाणिग्रहण समारोह में सुंदरेश्वर देव का हाथ मीनाक्षी देवी के हाथों में सौंपा जाता है। एक ओर जहां हिन्दू धर्म में कन्यादान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ मीनाक्षी देवी मंदिर में एक अनुपम परम्परा देखी जाती है। मान्यता है कि हर रात्रि सुंदरेश्वर मीनाक्षी के देवी के गर्भगृह में यात्रा करते हैं। इस दौरान दोनों दम्पति साथ रहते हैं, जिन्हें इस समय पर कोई परेशान नहीं करता।
मीनाक्षी देवी का नाम मीनाक्षी रखने का कारण:- 
पौराणिक कहानी के अनुसार मदुरै के राजा मलयध्वज पांड्या और उनकी पत्नी ने पुत्र पाने के लिए यज्ञ किया था। इस यज्ञ से उन्हें जो पुत्री प्राप्त हुई, उसकी आयु तीन वर्ष थी। एक सामान्य बच्चे से आयु में बड़ी जन्मीं पुत्री की एक विशेष बात यह थी कि उसकी आंखें मछली की तरह बड़ी-बड़ी और सुडौल थी। इस कारण से राजा मलयध्वज और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्री का नाम मीनाक्षी रखा।
तीन स्तन के साथ जन्मी थी मीनाक्षी देवी :- 
मीन के समान आंखे होने के अलावा राजा मलयध्वज की पुत्री के तीन स्तन भी थे। अपनी पुत्री के तीन स्तन देखकर राजा-रानी बहुत दुखी हुए। यह देखकर भगवान शिव ने राजा को दर्शन देखकर कहा कि जब उनकी पुत्री के लिए योग्य वर मिल जाएगा, तो यह तीसरा स्तन अपने आप गायब हो जाएगा। शिव ने यह भी कहा कि उनकी पुत्री बहुत ही साहसी भी होगी, इसी कारण राजा की तरह उनकी पुत्री भी उनके राज्य पर राज करेगी।
      साहसी मीनाक्षी देवी पूरे संसार को जीतना चाहती थी
मीनाक्षी देवी बहुत ही साहसी थी। इस कारण से पूरे संसार पर राज करना चाहती थी। अपने उद्देश्य को पूर करने के लिए रानी मीनाक्षी ने कई राजाओं को हराया। राजा ही नहीं, मीनाक्षी देवी ने कई देवताओं को भी पराजित किया। अपने विजय रथ पर सवार होकर मीनाक्षी देवी एक दिन एक वन में पहुंची, जहां पर उन्हें एक युवा सन्यासी मिला। जब मीनाक्षी देवी इस सन्यासी से मिली, तो उनका तीसरा स्तन खुद ही गायब हो गया। स्तन गायब होते ही उन्हें समझ आया कि शिव की कही बात के अनुसार यह सन्यासी ही उनका योग्य वर है। यह सन्यासी कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव ही थे। इस सन्यासी नाम था सुंदरेश्वर देव। सुंदरेश्वर को देखकर रानी मीनाक्षी को स्मरण हुआ कि वे पहले भी इस युवक से मिल चुकी हैं और उन्हें याद आ गया कि वे पार्वती का अवतार हैं और यह सन्यासी भगवान शिव है। सन्यासी के साथ मीनाक्षी देवी वापस मदुरै पहुंची, जहां पर उनका विवाह सुंदरेश्वर देव से हुआ।
मन्दिर की मूर्तियां:- 
शिव मन्दिर समूह के मध्य में स्थित है, जो देवी के कर्म काण्ड बाद में अधिक बढने की ओर संकेत करता है। इस मन्दिर में शिव की नटराज मुद्रा भी स्थापित है। शिव की यह मुद्रा सामान्यतः नृत्य करते हुए अपना बांया पैर उठाए हुए होती है, परन्तु यहां उनका दांया पैर उठा है। एक कथा अनुसार राजा राजशेखर पांड्य की प्रार्थना पर भगवान ने अपनी मुद्रा यहां बदल ली थी। यह इसलिये था, कि सदा एक ही पैर को उठाए रखने से, उस पर अत्यधिक भार पडे़गा। यह निवेदन उनके व्यक्तिगत नृत्य अनुभव पर आधारित था। यह भारी नटराज की मूर्ति, एक बडी़ चांदी की वेदी में बंद है, इसलिये इसे वेल्ली अम्बलम् (रजत आवासी) कहते हैं। इस गृह के बाहर बडे़ शिल्प आकृतियां हैं, जो कि एक ही पत्थर से बनी हैं। इसके साथ ही यहां एक वृहत गणेश मन्दिर भी है, जिसे मुकुरुनय विनायगर् कहते हैं। इस मूर्ति को मन्दिर के सरोवर की खुदाई के समय निकाला गया था। मीनाक्षी देवी का गर्भ गृह शिव के बांये में स्थित है। और इसका शिल्प स्तर शिव मन्दिर से निम्न है।
सहस्र स्तंभ मण्डप :- 
प्रातः वेला में सहस्र स्तंभ मण्डप का यह एक भाग होता है आयिराम काल मण्डप या सहस्र स्तंभ मण्डप या हजा़र खम्भों वाला मण्डप, अत्योच्च शिल्प महत्त्व का है। इसमें 985 (ना कि 1000) भव्य तराशे हुए स्तम्भ हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुरक्षण में है। ऐसी धारणा है, कि इसका निर्माण आर्य नाथ मुदलियार ने कराया था। मुदलियार की अश्वारोही मूर्ति मण्डप को जाती सीड़ियों के बगल में स्थित है। प्रत्येक स्तंभ पर शिल्पकारी की हुई है, जो द्रविड़ शिल्पकारी का बेहतरीन नमूना है। इस मण्डप में मन्दिर का कला संग्रहालय भी स्थित है। इसमें मूर्तियाँ, चित्र, छायाचित्र एवं चित्रकारी, इत्यादि के द्वारा इसका 1200 वर्ष का इतिहास देख सकते हैं। इस मण्डप के बाहर ही पश्चिम की ओर संगीतमय स्तंभ स्थित हैं। इनमें प्रत्येक स्तंभ थाप देने पर भिन्न स्वर निकालता है। स्तंभ मण्डप के दक्षिण में कल्याण मण्डप स्थित है, जहां प्रतिवर्ष मध्य अप्रैल में चैत्र मास में चितिरइ उत्सव मनाया जाता है। इसमें शिव - पार्वती विवाह का आयोजन होता है।
मीनाक्षी मन्दिर का पवित्र सरोवर :- 
पवित्र मंदिर तालाब पोर्थमारई कुलम ("स्वर्ण कमल वाला तालाब") जिसे आदि तीर्थम के नाम से भी जाना जाता है , आकार में (50 मीटर) गुणा (37 मीटर) है। किंवदंती के अनुसार, शिव ने एक सारस से वादा किया था कि यहाँ कोई मछली या अन्य समुद्री जीवन नहीं पनपेगा और इस प्रकार तालाब में कोई समुद्री जानवर नहीं पाया जाता है। कहा जाता है कि तालाब में विशाल स्वर्ण कमल शिव की इच्छा से इंद्र के लिए खिल गया था। यह मन्दिर के भीतर भक्तों हेतु अति पवित्र स्थल है। भक्तगण मन्दिर में प्रवेश से पूर्व इसकी परिक्रमा करते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है "स्वर्ण कमल वाला सरोवर"।एक पौराणिक कथानानुसार, भगवान शिव ने एक सारस पक्षी को यह वरदान दिया था, कि इस सरोवर में कभी भी कोई मछली या अन्य जलचर पैदा होंगे और ऐसा ही है भी।तमिल धारणा अनुसार, यह नए साहित्य को परखने का उत्तम स्थल है। अतएव लेखक यहां अपने साहित्य कार्य रखते हैं, एवं निम्न कोटि के कार्य इसमें डूब जाते हैं, एवं उच्च श्रेणी का साहित्य इसमें तैरता है, डूबता नहीं।
उत्सव एवं त्यौहार :- 
इस मन्दिर से जुड़ा़ सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है मीनाक्षी तिरुकल्याणम, जिसका आयोजन चैत्र मास (अप्रैल के मध्य) में होता है। इस उत्सव के साथ ही तमिल नाडु के अधिकांश मन्दिरों में वार्षिक उत्सवों का आयोजन भी होता है। इसमें अनेक अंक होते हैं, जैसे कि रथ-यात्रा (तेर तिरुविझाह) एवं नौका उत्सव (तेप्पा तिरुविझाह)। इसके अलावा अन्य हिन्दू उत्सव जैसे नवरात्रि एवं शिवरात्रि भी यहाँ धूम धाम से मनाये जाते हैं। तमिलनाडु के सभी शक्ति मन्दिरों की भांति ही, तमिल माहीने आदि (जुलाई 15-अगस्त 17 ) और (जनवरी 15 से फ़रवरी 15 ) में आने वाले सभी शुक्रवार बडे़ हर्षोल्लस के साथ मनाए जाते हैं। मन्दिरों में खूब भीड़ होती है। मंदिर में दूर से दर्शकों को दर्शन कराया जाता है। प्रकाश की व्यवस्था संतोष जनक नहीं है। स्थानीय भाषा में लिखे साइनेज से उत्तर भारतीय दर्शकों को बहुत असुविधा होती है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

Wednesday, October 22, 2025

महिला सूफी संत खातून 'बड़ी बुआ' ✍️डा राधेश्याम द्विवेदी


बड़ी बीबी, बड़ी बुआ, बड़ी किताब 
अयोध्या में महिला सूफी संतों के कुछ लोकप्रिय दरगाहों में से एक बड़ी बुआ की दरगाह है, इन्हें बड़ी बीबी, बड़ी बुआ और बड़ी किताब भी कहा जाता है जो शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए दिल्ली की बहन है। बड़ी बुआ के नाम से मशहूर अलैहा बीबी आला रूहानी हैसियत वाली थीं। उनकी दरगाह बेनीगंज स्थित आईटीआई के सामने स्थित है ।
दरगाह बड़ी बीबी साहिबा
अयोध्या की रौशन तारीख़ का जीता जागता सुबूत और अयोध्या के सर्व-धर्म सद्भाव का शानदार नमूना है।आपके दर पर हर धर्म, वर्ग, पंथ के लोग आते हैं और फ़ुयूज़-ओ-बरकात से नवाज़े जाते हैं।
डॉ. दबीर अहमद की कृति शहर के औलिया के अनुसार बड़ी बुआ अत्यंत नियम संयम से रहने वाली स्त्री फकीर थीं। इनका समय 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 18वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। उनकी रूहानियत और संदेश किस कदर मानवीय थी, इसका परिचय राममंगलदास से मिलता है।
संत राममंगलदास की निष्ठा 
दिग्गज संत राममंगलदास का बड़ी बुआ के वजूद से गहन आध्यात्मिक सरोकार था, वे उनकी मजार पर प्राय: जाया करते थे। 1977 में उन्होंने बड़ी बुआ की कब्र का जीर्णोद्धार भी कराया। आध्यात्मिक गुरु जय सिंह चौहान कहते हैं, सूफी संतों का इस्लाम की प्रमुख शाखा के रूप में अपने उद्गमस्थल से लंबा सफर तय कर अयोध्या आना महज संयोग नहीं था अपितु वे अयोध्या की दिव्यता से वाकिफ थे। बड़ी किताब को प्रसिद्ध सूफी संत खातून की कब्र कहा जाता है। बड़ी किताब बहुत अल्लाह वाली थी। हर तरह की इबादत करती थी । बादमें उसका नाम बहुत धूमिल हो गया और हिंदू-मुस्लिम सब उनके दर पर ज्ञान मन यादगार बने रहे। 
ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम:- 
ये महिला संत देखने में भी खूबसूरत थीं।सुंदरता के कारण निकाह के कई प्रस्ताव मिलने के बावजूद, उन्होंने खुद को गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। लोगों के मुताबिक, स्थानीय मौलवियों ने बीबी के निकाह से इंकार करने के कारण उन्हे बहुत परेशान किया था। कहते हैं पुरानी खूबसूरती पर फैजाबाद के शहर कोतवाल फिदा हो गए थे। कोतवाल, जो बीबी की ओर आकर्षित हुआ था, ने उन्हें एक दूत के माध्यम से निकाह का प्रस्ताव भेजा। जब उसने दूत से बात करने से मना कर दिया और सीधे कोतवाल से मिलने की जिद की तो वह उसके घर पहुंच गया। जब कोतवाल से पूछा कि वे उनसे शादी क्यों करना चाहते हैं, तो कोतवाल ने कहा कि उसे उसकी आँखों से प्यार है। किंवदंती है कि उसने अपनी आँखें बाहर निकालकर कोतवाल को सौंप दिया। इससे कोतवाल हैरान रह गया। बड़ी बुआ ने सावधान करते हुए कहा,  “याद रखो कि फैज़ाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम।” कहते उसी के बाद फैजाबाद से उजड़ाना शुरू हुआ और नवाब आसफुद्दौला फैजाबाद की जगह नोएडा को अपनी राजधानी बना लिया गया। यह महसूस करते हुए कि बीबी कोई साधारण महिला नहीं हैं, बल्कि खुदा की सच्ची भक्त हैं, कोतवाल साहब ने बड़ी बीबी के चरणों में गिर गए और दया की भीख माँगी।अजीबो-गरीब सी खामोशी पसरी नजर आई। फैजाबाद के चौक से खरीदकर किसी को फूल चढ़ाने के लिए लाया गया। फूल लेकर चले तो फूल प्रतिष्ठित होने से पहले ही मुरझा गए।

यतीम-ख़ाना ,मस्जिद और मदरसा :- 
उनकी याद में बीबी की कब्र के पास बना एक अनाथालय अनाथों को शरण देता है और उन्हें मुफ्त शिक्षा प्रदान करता है। इसके साथ ही साथ यहां मस्जिद और मदरसा भी बना हुआ है जिसमें गरीब यतीम को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है।

चाह-ए-सेहतः–
चाह-ए-सेहत" का कुआँ हज़रत चिराग़ देहलवी द्वारा बनवाया गया था, जिसे अयोध्या में लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे। यह कुआँ उस समय काफी प्रसिद्ध था और आज भी मौजूद है। 
इतिहास: यह कुआँ हज़रत चिराग़ देहलवी ने अपनी हवेली में खुदवाया था, जो एक सूफी संत थे।"चाह-ए-सेहत" का अर्थ है "स्वास्थ्य का कुआँ"।अयोध्या के लोग इस कुएँ के पानी को चमत्कारी और स्वास्थ्य वर्धक मानते थे और इसका खूब इस्तेमाल करते थे।
     1940 तक एक कुआँ मुस्लिम यतीम-ख़ाना की इमारत के शिमाली जानिब कोने पर मौजूद था जो अ’वाम-ओ- ख़्वास में चाह-ए-सेहत के नाम से मशहूर था।लोगों का अ’क़ीदा था कि हज़रत बड़ी बुआ रहमतुल्लाहि अ’लैहा की बरकत से इस कुएँ के पानी में शिफ़ाई’ तासीर है।लोग अक्सर ला-इ’लाज अमराज़ के मरीज़ों और आसेब-ज़दा लोगों को इस कुँए का पानी पिलाने के लिए ले जाते थे और उनको शिफ़ा हासिल होती थी।बा’द ज़माने में न जाने किन लोगों के मशवरे पर इस कुँए को पटवा दिया गया और इसके फ़ुयूज़-ओ-बरकात से लोगों के महरूम कर दिया गया।इस कुँए की पुख़्ता ईंटों की गोलाई का निशान चंद सालों तक मौजूद था जो अपनी अ’ज़्मत-ए-रफ़्ता का इज़्हार कर रहा था।
हज़रत बड़ी बुआ का सालाना उ’र्सः-
यहाँ साल में 2 बार उ’र्स लगता है। दरगाह-ए-बड़ी बुआ समाजिक एकता,सद्भावना-ओ-तहज़ीब का अ’ज़ीम मरकज़ है।
15 सफ़र को दरगाह शरीफ़ के ख़ादिमान और इ’लाक़े के लोगों की तरफ़ से उ’र्स का इं’इक़ाद होता है।
16 सफ़र को हर साल दरगाह हज़रत अ’ब्दुर्रहमान शहीद फ़तह गंज की जानिब से बड़ी शान-ओ-शोक़त से सालाना नज़्र-ओ-नियाज़ का एहतिमाम किया जाता है।
मौलाना अनवार नई’मी जलालपुरी (प्रिंसपल दारुल उ’लूम बहार शाह, फ़ैज़ाबाद) और उनके अहबाब हर साल ई’दुल-अज़हा के बा’द आने वाली जुमे’रात को ह़ज़रत बड़ी बुआ का सालाना उ’र्स करते हैं।




फैजाबाद नवाबी समय की निशानियां ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

पतित पावनी माँ सरयू नदी रूप में अवतरित होकर सदियोँ से मानव कल्याण करती आ रही है। अयोध्या बहुत समय तक कौसल राज्य की राजधानी हुआ करती थी। महाकाव्य रामायण के अनुसार राम का जन्म यहीं हुआ था। संतों का कहना है कि धर्म की पुरानी किताबों में भी इस शहर का नाम अयोध्या ही मिलता है । फैजाबाद एक ऐसा शहर रहा है, जो कई बार बनता बिगड़ता रहा है, कभी इसने अपना चरमोत्कर्ष देखा है तो कभी उपेक्षाएं भी झेली हैं। शायर सैय्यद शमीम अहमद शमीम ने  फैजाबाद शहर के लिए लिखा है– 

सभ्यताओं का इसे शीशमहल कहते हैं। कुछ ऐसे हैं जो जन्नत का बदल कहते हैं।”

अनेक नाम:- 

अयोध्या के कई ऐतिहासिक और पौराणिक नाम मिलते हैं, जिनमें अयोध्या, पूर्वदेश,साकेत, कोसल, कोसलपुर, कौशलानंदनी, उत्तर कोसल,धर्मपुर, अवधपुरी, रघुवरपुर, रामनगरी, और उत्तमपुरी और आदि बारह नाम प्रमुख हैं। ये सभी नाम शहर के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हैं। इसका उल्लेख बौद्ध और जैन ग्रंथों के साथ-साथ हिंदू धर्म ग्रंथों में भी मिलता है।

फ़ैज़ = फ़ायदा से बना फैजाबाद नाम:- 

अयोध्यापुरी में फ़ैज़ाबाद शहर की स्थापना अवध के पहले नबाव सआदत अली खान ने 1730 में अपनी राजधानी बनाकर की थी और अयोध्या का नाम बदलकर फ़ैज़ाबाद कर दिया  था। यह ऐसी जगह है, जहाँ से सबको फ़ैज़ (फ़ैज़ का मतलब फ़ायदा) हो रहा है। इस तरह इस जगह का नाम फ़ैज़ से फ़ैज़ाबाद हो गया। ऐसी जगह, जहाँ सबको आराम और फ़ायदा मिल रहा था, सबकी ख़्वाहिशें पूरी हो रही हो उसे फैजाबाद कहा गया है।

फ़ैज़ाबाद से रहा नवाबों का रिश्ता :- 

उस दौर में दिल्ली पर मुग़ल बादशाहों का शासन था। मुग़ल शासक अलग-अलग रियासतों की ज़िम्मेदारी सूबेदारों को सौंपते थे। ये सूबेदार ही रियासत से जुड़े फ़ैसले लेते थे। इसी क्रम में साल 1722 ई. में अवध रियासत की ज़िम्मेदारी सआदत ख़ान को सौंपी गई थी। इन सूबेदारों को नवाब कहा जाता है। इनका ओहदा नवाब वज़ीर का था, जो प्रधानमंत्री के बराबर का पद होता था । अवध के सबसे पहले नवाब वज़ीर को दिल्ली दरबार से सआदत ख़ान को 'बुरहान-उल-मुल्क' का ख़िताब मिला था। उनका असली नाम मीर मोहम्मद अमीन था। वे 1722 से 1739 तक नवाब वज़ीर रहे, मगर उन्होंने यहाँ ज़्यादा समय नहीं बिताया था। उस समय लड़ाइयों का दौर रहा था। सआदत ख़ान एक लड़ाके थे। वे ज़्यादातर समय जंग के मैदान में ही रहते थे। शुरू में वे सरयू के तट पर तम्बू में दरबार लगाना शुरू किया था।बाद में जरूरत के मुताबिक यहां कई भवनों का निर्माण शुरू किया गया था।

              कलकत्ता फोर्ट

फैजाबाद सैन्य मुख्यालय बना :- 

नवाब सफदरजंग ने 1739-54 में इसे अपना सैन्य मुख्यालय यहां बनाया।इसके बाद शुजाउद्दौला ने फैजाबाद में किले का निर्माण कराया था। यह वह दौर था जब यह शहर अपनी बुलंदियों पर था।लखनऊ से इसकी दूरी सिर्फ130 किमी थी, लेकिन इसे छोटा कोलकाता भी कहा जाता था क्योंकि नवाब उधर से होते हुए यहां आए थे और अपनी तहजीब और रंग ढंग भी लेते आए थे।

सफ़दरजंग ने डाली थी आधुनिक फ़ैज़ाबाद की नींव :- 

1739 में सआदत ख़ान की मौत के बाद उनके दामाद, जो उनके भांजे भी थे, दूसरे नवाब वज़ीर बने।उनका असली नाम मिर्ज़ा मोहम्मद मुक़ीम था।'सफ़दरजंग' नाम उन्हें दिल्ली दरबार से ख़िताब में मिला था। सफ़दरजंग ने भी अवध में बहुत कम समय बिताया था, क्योंकि उन पर कई और ज़िम्मेदारियाँ भी थीं।मोहम्मद मुक़ीम ज़्यादातर समय बाहर रहते थे। फिर भी उन्होंने फ़ैज़ाबाद में बहुत-सी इमारतों की नींव रखी थी। यह भी कह सकते हैं कि आधुनिक फ़ैज़ाबाद की नींव उनके काल में ही पड़ी।

शुजाउद्दौला ने किया था फ़ैज़ाबाद का विकास:- 

शुजाउद्दौला का समय एक तरह से फैजाबाद के लिए स्वर्णकाल कहा जा सकता है। उस दौरान फैजाबाद ने जो समृद्धि हासिल की वैसी दोबारा नहीं कर सका। फ़ैज़ाबाद में विकास का ज़्यादातर काम शुजाउद्दौला के काल में ही हुआ था। बड़े-बड़े बगीचे, महल और ऐतिहासिक स्थल, जो अब ख़त्म हो चुके हैं, ये सब उनके ही दौर में बने थे। उन्होंने इसे व्यापार का केंद्र बना दिया था। उस दौर में यहां कई इमारतों का निर्माण हुआ जिनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं।

सुजा-उद्-दौला के उत्तराधिकारी असफ-उद-दौला ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाई। उपर्युक्त नवाबों के शासन काल के दौरान फैजाबाद में कई स्मारकीय भवन बनाए गए, जिनमें से गुलाबबाड़ी, बहू वेगम का मकबरा, बनीखानम की कब्र और हाजी इकबाल की कब्र आदि निशानियां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के केन्द्रीय संरक्षित स्मारक है।


     -:फैजाबाद की प्रमुख निशानियां :- 

दिलकुशा कोठी :- 

अवध के तीसरे नवाब शुजा-उद-दौला, जो 1754 से 1775 तक नवाब थे, ने बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजों द्वारा पराजित होने के बाद 1752 के आसपास यहां दिलकुशा कोठी का निर्माण किया था।

                दिलकुशा बंगला

1752 में अवध के दूसरे नवाब सफ़दरजंग की मृत्यु हो गई।उनके बाद उनके बेटे शुजाउद्दौला अवध के तीसरे नवाब वज़ीर बने थे। शुजाउद्दौला का परिवार दिलकुशा की पहली मंज़िल पर रहता था। पिछले दो नवाबों के उलट, शुजाउद्दौला ने फ़ैज़ाबाद में काफ़ी समय बिताया था । उन्हीं के दौर में कच्चे बंगले के रूप में इसका निर्माण हुआ और यह दिलकुशा बंगला बन गया।

इस दो-मंज़िला इमारत की हर मंज़िल पर क़रीब 10 कमरे थे। कोठी की पहली मंज़िल पर नवाब शुजाउद्दौला और उनका परिवार रहता था, जबकि निचली मंज़िल पर उनके दरबार के लोग रहते थे , जहाँ से वे रियासत से जुड़े फ़ैसले करते थे।

सैनिकों के लिए कैंटोनमेंट एरिया :- 

शुजाउद्दौला के सैनिक भी दिलकुशा के परिसर में रहते थे।कोठी के चारों तरफ़ सैकड़ों बैरक बने थे, जिनमें सैनिक रहते थे। इसी स्थल को पहले अंग्रेजों और बाद में भारतीय सेना ने अपना कैंटोनमेंट क्षेत्र बनाया था। प्रशासनिक कामों में लगे कर्मियों के रहने के लिए कोठी के बाहरी इलाक़े को रिहायशी इलाक़े में विकसित कर दिया गया था। वहाँ पुरानी सब्ज़ी मंडी, टकसाल, दिल्ली दरवाज़ा, रकाब- गंज, हंसु कटरा जैसी जगहें बनाई गई थीं।

एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक:- 

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (एएसआई) की मॉन्यूमेंट्स की सूची में उस समय फ़ैज़ाबाद की 57 जगहें थीं, इनमें बाग, क़िले, मक़बरे जैसी जगहें हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही को संरक्षित करके रखा गया है। वर्तमान में संरक्षित स्मारकों की ये संख्या घट कर आठ रह गई हैं ।

फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में पांच ऐतिहासिक नबाबी और तीन अयोध्या पौराणिक टीले : मणि पर्वत,कुबेर पर्वत और सुग्रीव पर्वत के अयोध्या के धर्म स्थल असंरक्षित प्रकिया में हैं। इसके अलावा अन्यानेक गैर संरक्षित स्मारक भी अपना खास मुकाम बनाए रखे हैं।

1.बेनी खानम का मकबरा फैजाबाद 

बनी खानम का मकबरा नवाबी काल का एक महत्वपूर्ण स्मारक है। बनी खानम नवाब नजम-उद्-दौला की पत्नी थीं। यह मकबरा बनी खानम के गुलाम अल्मस अली खां ने बनवाया था। इस इमारत का निर्माण १८ वीं सदी के उत्तरार्द्ध में किया गया। इस मकबरे का भूतल आयाताकार है जिस पर निर्मित वर्गाकार कक्ष के मध्य में कब्र स्थित है। गुम्बद पूर्णतया गुलाब बाड़ी शैली में बना है। इसके निर्माण में लखौरी ईंटो और गचकारी का प्रयोग किया गया है, परन्तु फर्श का निर्माण पत्थरों से किया गया है। फैजाबाद के रेतिया स्थित आकाशवाणी के पास बनीखानम का मकबरा ऐतिहासिक धरोहर व पुरातत्व संरक्षित है। वक्फ बनी खानम मकबरा, 1359 फसली के अभिलेख में भी दर्ज है। 

2.गुलाब बाड़ीऔर शुजाउद्दौला का मकबरा फैजाबाद:- 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित एकमात्र विरासत गुलाब बारी (गुलाबों का बगीचा) है, जो विभिन्न प्रकार के फूलों और एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के लिए जाना जाता है। गुलाबबाड़ी नवाबी वास्तुशैली का सुन्दर नमूना है। इस चारबाग शैली में निर्मित बगीचे को सफदर जंग ने बनवाया था। नवाब के शासनकाल के दौरान महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों की मेजबानी के लिए गुलाब बारी काइस्तेमाल किया जाता था। वास्तुकला की इस्लामी शैली में निर्मित, भव्य मकबरा यूपी में सबसे अच्छी तरह से डिजाइन किए गए स्मारकों में से एक है।गुलाब बाड़ी में दो बाहरी प्रांगण एवं एक मुख्य प्रांगण है। बाहरी प्रांगण में प्रवेश के लिए मेहराबदार दो सुन्दर दरवाजे हैं। दूसरे प्रांगण में प्रवेश हेतु भी भव्य प्रवेश द्वार है। मुख्य द्वार के उत्तर ओर बाहरी दीवार से लगी एक मस्जिद तथा उसके दक्षिण की तरफ एक दो मंजिला इमारत है जिसे बनाने का ध्येय अज्ञात है। यह संभवतः इमामबाड़ा है। बगीचे के चारों ओर पानी की नालियां हैं। मकबरा त्रितलीय है जिस पर गुम्बद निर्मित है। प्रथम तल एक बड़ा वर्गाकार चबूतरा है , जिस पर एक बड़ा वर्गाकार केन्द्रीय कक्ष है । जिसके चारों ओर छोटे वर्गाकार और आयताकार कक्ष और स्तम्भ युक्त बरामदे हैं। कब्र केन्द्रीय कक्ष में स्थित है। यह ऊँची छत से युक्त छोटा वर्गाकार केन्द्रीय भाग है जिसके ऊपर गोलाकार गुम्बद के साथ वातायन बने हैं।

प्रवेश द्वार पर राष्ट्रीय प्रतीक के साथ एक बड़ा स्तंभ है। कहा जाता है कि यह देश का अकेला ऐसा मकबरा है, जहां पर भारत सरकार ने अशोक स्तंभ लगवाया था। इसके साथ एक सुव्यवस्थित पैदल मार्ग, जिसके दोनों ओर लहराते नारियल के पेड़ लगे हैं, जो एक प्राचीन धनुषाकार प्रवेश द्वार की ओर जाता है। बगीचे में एक सुंदर मस्जिद और एक छोटा सा प्रहरीदुर्ग भी है जो इसके ठीक बगल में खड़ा है। मकबरे के धनुषाकार मार्ग से घूमने पर एक आकर्षक अनुभव होता है।

यह विशाल बगीचा शुजाउद्दौला और उनके परिवार की कब्रों को घेरे पूरे क्षेत्र में फैला है। इस बगीचे को सन् 1775 में स्थापित किया गया था और इसमें कई प्रजातियों के गुलाब पाये जाते हैं। गुलाब के पौधों को बड़ी सतर्कता के साथ लगाया गया है और पूरे बगीचे को पारलौकिक दृश्य प्रदान करता है। इसी परिसर में एक इमामबाड़ा या इमाम की कब्र भी स्थित है जो स्वंय में एक आकर्षण है।

बागवानी करती है आकर्षित

गुलाब बाड़ी परिसर की खूबसूरती में यहां की बागवानी चार चांद लाती है। इमारत के चारों तरफ गुलाबों की बागवानी की गई है, जिसमें बेहद खूबसूरत अनेक प्रकार के गुलाब के पौधे लगाए गए हैं।इस बाग में लाल, गुलाबी, पीले, सफेद रंग के गुलाब खिलते हैं। जब यहां गुलाब के फूल खिलते हैं तो वह यहां आने वाले हर पर्यटक का दिल जीत लेते हैं।

शुजा-उद्-दौला का मकबरा:- 

1775 ई० में जब नवाब शुजा-उद्-दौला की मृत्यु हुई तो उन्हे इसी मकबरे में दफनाया गया। इस मकबरे का निर्माण अनेक चरणों में किया गया। यह अच्छे अनुपात में निर्मित एक प्रभावशाली भवन है। इसमें प्रवेश करने के लिए दो बड़े वाह्य प्रवेशद्वार हैं और तीसरा द्वार मकबरे तक ले जाता है। यह लखौरी ईंटों से निर्मित है जिस पर चूने का प्लास्टर किया गया है।

3.बहू-बेगम का मकबरा फैजाबाद:

बहूबेगम का मकबरा मिनी ताजमहल के रूप में पहचाना जाता है। यह शुजाउद्दौला की रानी उन्मत्तुज़ोहरा बानो बेगम के लिए बनाया गया स्मारक है । बहू बेगम का मकबरा वर्ष 1816 में निर्मित किया गया था। बहू बेगम का मकबरा सफेद संगमरमर से बना है और 42 मीटर ऊँचा है। बहू बेगम के मकबरे के ऊपर से शहर का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। इसे पूरे अवध में अपनी तरह का सबसे बेहतरीन और अनोखा माना जाता है। मकबरा मुगल स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इतिहास गवाह है कि सन् 1816 में इस मकबरे को ताजमहल की भव्यता के साथ बनाने का प्रयास किया गया था। चन्द्रमा की दूधिया रौशनी में सफेद संगमरमर अपनी चमक धारण कर लेता है और ऐसा लगता जैसे कि मकबरे को अमरत्व की चमक मिल जाती है।       

      उनमातुज्जोहरा बानो बेगम ने अपने जीवन-काल में ही इसकी तामीर शुरू करा दी थी लेकिन पूरा होने के पहले ही उनका इंतकाल हो गया है। उनके वजीर दराब अली खां ने इसे पूरा कराया था । मकबरे के  स्थापत्य शैली की शानदार विशेषता है कि भीषण गर्मी में भी यहां शीतलता का अनुभव होता है। उस वक्त इसके निर्माण में करीब 3 लाख रुपये की लागत आई थी। ऐतिहासिक धरोहर व पुरातत्व संरक्षित बहू बेगम का मकबरा भी वक्फ बोर्ड की सूची में शामिल है । बहू बेगम जो नवाब शुजा-उद्-दौला की पत्नी और नवाब आसफ-उद्-दौला की मां थी,की मृत्यु 1816 ई० में हुई थी।

यह मकबरा भी कई चरणों में बना। इसकी शुरुआत उनके सलाहकार द्वारा 1816 ई० में की गई। बाद में इसका निर्माण अन्य संरक्षकों ने किया। स्मारक में बाहरी प्रांगण और मुख्य प्रांगण है। बाहरी प्रांगण आकार में बड़ा और आयताकार है। इसमें प्रवेश के लिए एक भव्य मेहराबदार प्रवेशद्वार है, जिसमें कई कमरे बने हैं। द्वार के चारों तरफ दीवारों के सहारे आवास हेतु कमरे बने हैं। पूर्व दिशा में एक अन्य द्वार है तथा तीसरा द्वार दक्षिण में है जिससे होकर मुख्य प्रांगण में प्रवेश किया जा सकता है। यह वृहद चतुर्भुजाकार प्रांगण एक बाह्य दीवार से घिरा है जिसके कोनों पर अष्टकोणीय बुर्ज बने हैं। इसमें पूर्व और पश्चिम दिशा में दो छोटे मेहराबदार द्वितलीय मंडप बने हैं। मकबरे के भूतल पर बहुत बड़ा चबूतरा बना है। इसके मध्य में वर्गाकार कक्ष है, जिसके चारोंओर वर्गाकार औरआयताकार कक्षों की श्रृंखला और संकरे गलियारे बने हैं। इस तल का मध्य भाग पत्थरों से निर्मित बिना अलंकरण के है, लेकिन इसका बाहरी भाग ईंटो से बना और अलंकृत है। किनारों पर मेहराबदार इसका अष्टकोणीय मण्डप हैं। मकबरे की छत सुन्दर पुष्प वल्लरियों से अलंकृत है। यह मकबरा सम्भवतः नवाबी काल के सबसे सुन्दर मकबरों में से एक है। इस इमारत की देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग करता है।

4.सदरजहाँ बेगम के हिजड़े हाजी इकबाल का मकबराः-

हाजी इकबाल के मकबरे का निर्माण एक ऊंचे चबूतरे पर बुर्जयुक्त चहारदीवारी के अन्दर किया गया है, जो इसे अन्य इमारतों से अलग किलानुमा बनाता है। यह एक अष्टकोणीय संरचना है, जिसका निर्माण लखौरी ईंटों एवं चूने के प्लास्टर से किया गया है। केन्द्रीय गुम्बद के चारों तरफ छोटे-छोटे अन्य गुम्बद भी बने हैं। इस परिसर के पश्चिम की ओर 18वीं सदी ई० में बनी एक मस्जिद भी स्थित है। हाजी इकबाल का मकबरा, मस्जिद और उन्हें घेरने वाला पूरा परिसर एक संरक्षित स्मारक है।

5.सूफी संत खातून 'बड़ी बुआ' की कब्र एवं यतीमखाना:- 

अयोध्या में महिला सूफी संतों के कुछ लोकप्रिय दरगाहों में से एक बड़ी बुआ की दरगाह है, इन्हें बड़ी बीबी, बड़ी बुआ और बड़ी किताब भी कहा जाता है जो शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए दिल्ली की बहन है। बड़ी किताब को प्रसिद्ध सूफी संत खातून की कब्र कहा जाता है। बड़ी किताब बहुत अल्लाह वाली थी। हर तरह की इबादत करती थी । बादमें उसका नाम बहुत धूमिल हो गया और हिंदू-मुस्लिम सब उनके दर पर ज्ञान मन यादगार बने रहे। 

ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम:- 

ये महिला संत देखने में भी खूबसूरत थीं।सुंदरता के कारण निकाह के कई प्रस्ताव मिलने के बावजूद, उन्होंने खुद को गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। लोगों के मुताबिक, स्थानीय मौलवियों ने बीबी के निकाह से इंकार करने के कारण उन्हे बहुत परेशान किया था। कहते हैं पुरानी खूबसूरती पर फैजाबाद के शहर कोतवाल फिदा हो गए थे। कोतवाल, जो बीबी की ओर आकर्षित हुआ था, ने उन्हें एक दूत के माध्यम से निकाह का प्रस्ताव भेजा। जब उसने दूत से बात करने से मना कर दिया और सीधे कोतवाल से मिलने की जिद की तो वह उसके घर पहुंच गया। जब कोतवाल से पूछा कि वे उनसे शादी क्यों करना चाहते हैं, तो कोतवाल ने कहा कि उसे उसकी आँखों से प्यार है। किंवदंती है कि उसने अपनी आँखें बाहर निकालकर कोतवाल को सौंप दिया। इससे कोतवाल हैरान रह गया। बड़ी बुआ ने सावधान करते हुए कहा,  “याद रखो कि फैज़ाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम।” कहते उसी के बाद फैजाबाद से उजड़ाना शुरू हुआ और नवाब आसफुद्दौला फैजाबाद की जगह नोएडा को अपनी राजधानी बना लिया गया। यह महसूस करते हुए कि बीबी कोई साधारण महिला नहीं हैं, बल्कि खुदा की सच्ची भक्त हैं, कोतवाल साहब ने बड़ी बीबी के चरणों में गिर गए और दया की भीख माँगी।अजीबो-गरीब सी खामोशी पसरी नजर आई। फैजाबाद के चौक से खरीदकर किसी को फूल चढ़ाने के लिए लाया गया। फूल लेकर चले तो फूल प्रतिष्ठित होने से पहले ही मुरझा गए।

यतीम-ख़ाना ,मस्जिद और मदरसा :- 

उनकी याद में बीबी की कब्र के पास बना एक अनाथालय अनाथों को शरण देता है और उन्हें मुफ्त शिक्षा प्रदान करता है। इसके साथ ही साथ यहां मस्जिद और मदरसा भी बना हुआ है जिसमें गरीब यतीम को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है।

    –: कई मोहल्ले बसाए गए थे:- 

1765 में उन्होंने चौक शब्जी मंडी और तिरपौलिया का निर्माण कराया और बाद में इसके दक्षिण में अंगूरीबाग और मोतीबाग, और शहर के पश्चिम में आसफबाग और बुलंदबाग का निर्माण कराया गया ।

पुरानी सब्ज़ी मंडी:- 

चौक पुरानी सब्जी मंडी की उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन की एक पुरानी शब्जी मण्डी रही है।इस मण्डी के शब्जी और फल की आपूर्ति सरकारी और गैर सरकारी सभी लोगों के लिए की जाती रही है। पुराने लोगों का कहना है कि जब शाही परिवार के लोग इस बाजार में प्रवेश करते हैं तो दुकानदार दुकान छोड़ देते थे। केवल लड़कियां और औरतें ही दुकान पर रहती हैं।

टकसाल चौराहा :- 

यह माता के मन्दिर के पास है। इस जगह के पास हैं: फैजाबाद शहर, धारा रोड चौराहा अयोध्या , रिकाबगंज चौराहा , श्री परशुराम चौराहा , फ़तेहगंज चौराहा आदि स्थित है। नबाब के समय में यहां सिक्के ढाले जाते थे।

दिल्ली दरवाज़ा :- 

पुराने समय में इसी दरवाजे से दिल्ली की तरफ कूच किया जाता था। अब वह दरवाजे वाली संरचना नहीं दिखाई पड़ती है। यह वार्ड घंटाघर चौक से भी सटा हुआ है, जो क्षेत्र में पर्यटकों के मध्य बहुत प्रसिद्द है।इस वार्ड में आने वाले मोहल्लों में दिल्ली दरवाजा, खुर्द महल, अंगूरी बाग़ कॉलोनी, दीवानी मिसल आंशिक सम्मिलित हैं। परिणाम स्वरूप  फैजाबाद नगर परिषद् के 29 / 38 वार्ड में से एक दिल्ली दरवाजा वार्ड भी अयोध्या नगर निगम का हिस्सा बन गयाहै। इस इलाके का परिसीमन उत्तर में विश्राम घाट से पालिका सीमा परिक्रमा रोड तक, दक्षिण में अंगूरीबाग चौराहा के सामने से गुदड़ी बाजार चौराहा तक, पूर्व में गुदड़ी बाजार चौराहा से विश्राम घाट तक, पश्चिम में अंगूरीबाग स्कूल के सामने से राज शिशु मन्दिर रोड से नाला पुलिया से शिवमन्दिर बाएं हिस्से तक फैला हुआ है।

रकाबगंज, चौराहा :- 

रिकाबगंज चौराहा के पास हैं: श्री परशुराम चौराहा , टकसाल चौराह , G.I.C. तिराहा अयोध्या , पुष्पराज चौराहा , नियावां चौराहा अयोध्या  आदि स्थित है।यह एक व्यवसायिक क्षेत्र के रूप में आज भी देखा जा सकता है।

हंसु कटरा:- 

गुदड़ी बाजार और सैन्य मन्दिर के मध्य नियावां मोहल्ले में यह कटरा स्थित है। इसके एक तरफ चौक शब्जी मंडी तो दूसरी ओर परिक्रमा मार्ग भी देखा जा सकता है।

चौक :- 

1765 में अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने चौक के चारों तरफ प्रवेश द्वारों पर हेरिटेज गेट का निर्माण कराया था।अब योगी सरकार इन गेटों का कायाकल्प करवाने जा रही है। नवाबी दौर में इस द्वार को बनाने के लिए जिस पदार्थ का उपयोग किया गया था उसी पदार्थ का उपयोग यानी की चूना और सुर्खी से ही चारों गेटों का सुंदरीकरण किया जाएगा।

फैजाबाद में घंटाघर

घंटाघर का अर्थ है 'घड़ी का घर'। यह शहर के केंद्र में स्थित एक विशाल मीनार है। यह इमारत फैज़ाबाद का मुख्य बिंदु है क्योंकि शहर के भीतर की सभी दूरियाँ इसी मीनार से मापी जाती हैं। मुख्य चौक के नाम से भी जाना जाने वाला यह क्षेत्र सब्ज़ियों और मसालों का मुख्य बाज़ार भी है।

त्रिपोलिया शाही बाजार :- 

त्रिपोलिया नाम से मुगलकाल में चर्चित बाजार को वर्तमान में चौक के नाम से जाना जाता है । मुगल नवाब शुजाउद्दौला ने फ़ैज़ाबाद को अवध की राजधानी बनाने के बाद शहर के बीचोबीच एक शाही बाजार की स्थापना की। तीन तरफ ऊंची दीवारों से त्रिपोलिया बाजार से घिरा है। वर्तमान में यहां घंटाघर है। पुराने लोगों का कहना है कि जब शाही परिवार के लोग इस बाजार में प्रवेश करते हैं तो दुकानदार दुकान छोड़ देते थे। केवल लड़कियां और औरतें ही दुकान पर रहती हैं।

फैजाबाद संग्रहालय

फैजाबाद संग्रहालय, फैजाबाद के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है। इस संग्रहालय में ऐतिहासिक और पौराणिक वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित है। इस सुव्यवस्थित संग्रहालय में न केवल शहर के इतिहास और संस्कृति को देखने और समझने का अवसर मिलेगा, बल्कि सदियों पुराने फैजाबाद के लोगों के जीवन को भी समझने का अवसर मिलेगा। बर्तन, कटलरी, युद्ध के हथियार, चाँदी के बर्तन, रोज़मर्रा की चीज़ें और ऐसी ही कई चीज़ें यहाँ प्रदर्शित हैं। फैजाबाद के इतिहास को जानने के लिए यह ज़रूर देखने लायक जगहों में से एक है।

           -: बाग-बगीचे :- 

नवाबकालीन बाग-बगीचे लालबाग, अंगूरीबाग, आसफ बाग, मोतीबाग, जवाहिरबाग भले ही खत्म हो गए हों पर उनकी जगह बनी इमारतें शहर को खूबसूरत बना रही हैं।

लालबाग :- 

लालबाग को शुजाउद्दौला ने स्थापित कराया था। फैजाबाद में लालबाग वर्तमान में मकबरा है जो एक वास्तुशिल्प स्मारक है, जो उत्तर मुगल काल की वास्तुकला का उदाहरण है और यह लगभग 1801 ई में बना था। यह फैजाबाद के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह उत्तर मुगल काल की वास्तुकला शैली को दर्शाता है।यह छोटी छोटी मेहराबें और लटकते छज्जों से युक्त  हैं। यह मुगल स्थापत्य कला की जटिल डिजाइन और भव्य प्रवेश द्वार संरचनाओं को प्रदर्शित करता है।

अंगूरीबाग :- 

नियावां चौक रोड, अंगूरी बाग के पास यह इलाका लगता है । कभी अंगूर की बाग वाली इस भूमि में बाग तो उजड़ चुके हैं। अब आवासीय कालोनी बन कर रह गई है।

आसफ बाग :- 

यह अवध के नवाब आसफ-उद-दौला के समय से संबंधित है, जिन्होंने फैजाबाद में कई निर्माण कराए थे। यह संभावना है कि "आसफ बाग" आसफ-उद-दौला से जुड़ा कोई बगीचा, बाग या स्थापत्य संबंधी स्थल हो सकता है, क्योंकि वे फैजाबाद के प्रमुख नवाबों में से एक थे और उन्होंने लखनऊ राजधानी स्थानांतरित करने से पहले शहर में कई शानदार इमारतें बनवाई थीं। 

कंपनी गार्डन  : - 

सरयू नदी के किनारे गुप्तार घाट से सटे, कंपनी गार्डन, ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित एक वनस्पति उद्यान है। यह एक सुव्यवस्थित, विशाल उद्यान है जो हरियाली के बीच स्थित है। इसमें कई एकड़ में फैला एक बाग भी है। यहाँ से पौधे और पेड़ भी खरीदे जा सकते हैं। बक्सर के युद्ध के बाद नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा निर्मित कलकत्ता किले के अवशेष भी पैदल दूरी पर हैं।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)



Monday, October 20, 2025

सुग्रीव किला को श्री रामजन्मभूमि ने किया आत्मसात ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

सर्व धर्म समभाव वाली रही अयोध्या 

अयोध्या सप्तपुरियों में एक है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध कौन नहीं रींझा। सिखों का पवित्र ब्रह्मकुंड है। मस्लिमों के हजरत नूंह का रिश्ता यही से बताया जाता है। शीश पैगंबर की मजार है। जैन धर्म के छह तीर्थांकरों की जन्मभूमि है। बौद्ध दार्शनिक अश्वघोष यहीं पैदा हुए। महात्मा बुद्ध ने कई चतुर्मास यहां किए। रामजन्मभूमि है, हनुमानगढ़ी है, कनक भवन है, दशरथ महल है, अशर्फी भवन है। न जाने कितने ऐसे स्थल है जों अपने में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। भारतीय पुरातत्व सूची में एक साथ तीन स्मारकों को दर्ज किया गया है जिसमें पहला मणि पर्वत, दूसरा कुबेर पर्वत व तीसरा सुग्रीव पर्वत है। 

सुग्रीव किला :- 

मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान राम वानर सेना के साथ लंका पर विजय प्राप्त करके वापस अयोध्या पहुंचे तो महाराजा भरत ने एक किला बनवाया. यह किला श्रीराम और उनके साथ आने वालों के स्वागत के लिए बनाया गया था. बताया जाता है कि यहीं पर सबका भव्य स्वागत हुआ. बाद में श्रीराम ने यह किला अपने परम मित्र सुग्रीव को सौंप दिया. तभी से यह किला सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि यहां पर दर्शन करने आने वालों के सभी शत्रु परास्त हो जाते हैं.

हनुमानगढ़ी किले के बिलकुल पास

यह सुग्रीव किला हनुमानगढ़ी किले के बिलकुल पास है, लेकिन यह उसके मुकाबले कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है. श्रीराम जन्मभूमि परिसर के निकट स्थित सुग्रीव किला अपने आप में एक ऐसा ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है, जिसके दर्शन मात्र से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है।

 


इस प्राचीन किले का निर्माण महाराजा भरत ने त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत हेतु रत्नों से करवाया था। तत्पश्चात, अयोध्या नरेश भगवान श्रीराम ने यह स्थान महाराजा सुग्रीव को अयोध्या में रहने के लिए दिया था। तभी से यह प्रसिद्ध स्थान सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है। आज भी इस स्थान की पौराणिकता पुरातत्व विभाग में दर्ज है। अयोध्या में श्री राम जन्म भूमि परिसर के करीब स्थित सुग्रीव किले का जीर्णोद्धार महाराजा विक्रमादित्य ने कराया था. इस मंदिर में आज भी भगवान श्री राम, माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ राजा सुग्रीव की भी पूजा होती है. धार्मिक मान्यता है कि जब प्रभु राम लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे तो उनके साथ वानर राज सुग्रीव भी अयोध्या आए थे. श्री राम के स्वागत में महाराजा भरत ने माणियो से यह किला बनवाया था . जिसके बाद इस स्थान को महाराजा सुग्रीव को अयोध्या में रहने के लिए के लिए दे दिया था . तभी से यह प्रसिद्ध स्थान सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है.

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारकों की श्रेणी में सूचीबद्ध इस किले के संस्थापक आचार्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य थे. वे देवरहा बाबा के शिष्य थे. जब राम मंदिर आंदोलन चला तो शुरुआती दिनों में यही सुग्रीव किला विश्व हिन्दू परिषद की गतिविधियों का केंद्र स्थान बना.

योगी ने किया था राज गोपुरम (फैसिलिटी सेंटर) का अनावरण

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ ने 20 नवंबर 2024 को अयोध्या का दौरा किया था. इस दौरान सीएम योगी ने सुग्रीव किला में गोपुरम का अनावरण किया था. गौरतलब है कि गोपुरम मंदिरों का मुख्य प्रवेश द्वार होता है. यह हिंदू मंदिरों के स्थापत्य का प्रमुख अंग भी होता है. गोपुरम को मंदिर की सुरक्षा और प्रवेश द्वार का भी प्रतीक माना गया है. कहा जाता है यह पृथ्वी और स्वर्ग के बीच की सीमा को भी दर्शाता है. गोपुरम को आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर से जुड़ाव का द्वार भी माना जाता है.


वर्तमान स्थिति 

आप हाल ही में, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए सुग्रीव परिसर के मार्ग का निर्माण पूरा हो चुका है. इस मार्ग में राजस्थान के गुलाबी पत्थर लगाए गए हैं और इसमें श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं, जैसे कि लॉकर और व्हीलचेयर की सुविधा आदि को बढ़ाया गया है.


        आचार्य डा. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। (वॉट्सप नं.+919412300183)