Monday, June 16, 2025

राजा आर्द से मान्धात्रि/मान्धाता तक की कथा (राम के पूर्वज-9)#आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी

इच्छाकु बंश में राजा सुमति की 55वी पीढ़ी आर्द नामक राजा हुए जिन्होंने अहिंसा और डर छोड़कर असुरों से युद्ध किया! इस युद्ध में राजा ने जिस हिरणा कश्यप को न दिन में मरू न रात में न अस्त्र से न शस्त्र से न देवता न दानव न पशु न पक्षी से मरू ऐसे वरदानी असुर को नाकों चने चबाने पर विवश कर दिया। सारे असुर आर्तनाद करते हुए भाग खड़े हुये जब भी युद्ध होता था। राजा हजारों घोड़ों के वेग से तेज बान चलाते थे ! युद्ध में हिरणाकश्यप के हांथ उठाने से पूर्व हांथो को छेदकर रथ में ही पिरो देते थे!
राजकुमार /राजा युवनाश्व 
राजा युवनाश्व की कहानी भारतीय पौराणिक कथाओं में एक अनोखी और रोचक कथा है, जो भागवत पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित है। यह कहानी न केवल उनके जीवन के अनोखे प्रसंगों को दर्शाती है, बल्कि धर्म, कर्तव्य, और चमत्कारों से भरी है। हिरणाकश्यप युवनाश्व से एक भी युद्ध नहीं जीत पाया, फिर से ब्रह्मा जी ने नर संहार रुकवाते हुए कश्यप ऋषि और सप्त ऋषियों के मध्य संधि कराई गई ।अब अयोध्या से अवध प्रदेश बन गया अर्थात अयोध्या का लगभग सारा भू भाग पुनः अयोध्या के कब्जे में आ गया। यह अयोध्या सरयू नदी के तट अब भी एक तीर्थ में विद्यमान है। इसको बसाने का श्रेय राजा युवनाश्व को है। राजा युवनाश्व के कोई पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए उन्होंने यज्ञ किया। 
युवनाश्व का पुत्र मांधात्री 
युवनाश्व के पुत्र मांधात्री अयोध्या के एक प्रसिद्ध राजा थे। वह इक्ष्वाकु से उन्नीस पीढ़ियों के बाद सिंहासन पर बैठे। अपने पिता की बाईं पसली से उनके जन्म का लेखा जोखा उनकी रानी के लिए पवित्र यज्ञीय पानी पीने के परिणामस्वरूप, और इंद्र के राजकुमार के जन्म के समय इंद्र द्वारा कही गई बातों के कारण उनके नाम को स्पष्ट रूप से बताने के लिए मंधात्री कहलाए।कहा जाता है कि मंधात्री ने भारत का आधा सिंहासन प्राप्त किया था और एक दिन में पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त की थी, पुराणों के अनुसार मंधत्री एक महान चक्रवर्ती और सम्राट थे। उन्हें विष्णु का पांचवा अवतार (अवतार) माना जाता था। वह एक महान बलिदानकर्ता थे और कहा जाता है कि उन्होंने राजस्थान में सौ अश्वमेध यज्ञ किए थे। 
राजा को गर्भ धारण करना पड़ा:- 
एक दिन यज्ञ मंडप में ही राजा मांधात्री को नींद आ गई। कुछ काल बाद बड़े जोर की प्यास लगी, किन्तु पानी कहीं नहीं मिला। लाचार हो राजा ने मंडप में ही रखा हुआ अभिमन्त्रित जल पी लिया और फिर सो गए। सवेरे पुरोहित ब्राह्मणों ने पूछताछ की कि मंडप में रखा हुआ अभिमंत्रित जल का क्या हुआ ? राजा ने बताया, जोर की प्यास लगी थी, वह पानी मैं पी गया। पुरोहितों ने कहा महाराज बड़ा अनर्थ किया आपने। वह जल अभिमन्त्रित था। उसमें गर्भ की शक्ति थी। वह जल रानी के लिए था। अब आपके ही गर्भ रहेगा। आपके ही पेट से सन्तान उत्पन्न होगी। राजा बहुत घबराए, किन्तु उपाय ही क्या था ? समय आने पर राजा ने गर्भ धारण किया। अन्त में राजा का पेट चीरा गया और उसमें से मान्धाता का जन्म हुआ। राजा को इतना कष्ट हुआ कि उनके प्राण पखेरू उड़ गये। युवनाश्व के पुत्र मानधात्री को महान प्रतापी राजा मान्धाता हुए।
राजा युवनाश्व का परिचय,
संतान प्राप्ति का यज्ञ और चमत्कार:- 
युवनाश्व, इक्ष्वाकु वंश के एक प्रतापी राजा थे, जो अपनी प्रजा के लिए समर्पित और धर्मनिष्ठ शासक थे। उनकी सबसे बड़ी चिंता थी कि उनके कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे उत्तराधिकारी के लिए चिंतित रहते थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अपने गुरुओं और ऋषियों से सलाह ली। युवनाश्व ने संतान प्राप्ति के लिए एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया, जिसका संचालन महान ऋषियों ने किया। यज्ञ के अंत में, ऋषियों ने एक पवित्र जल का कलश तैयार किया, जिसमें दिव्य शक्ति थी। इस जल को युवनाश्व की रानी को पीना था, ताकि वह गर्भवती हो सके। यह कलश यज्ञशाला में रखा गया था, और रानियों को इसे अगले दिन ग्रहण करना था।
       एक रात युवनाश्व को बहुत प्यास लगी। वह यज्ञशाला में पहुंचे और बिना कुछ सोचे-समझे उस पवित्र कलश का जल पी लिया, जो उनकी रानी के लिए रखा गया था। यह एक अनजाने में हुआ कार्य था, लेकिन इसके परिणाम चमत्कारी थे।
युवनाश्व का गर्भवती होना:- 
पवित्र जल की शक्ति इतनी प्रबल थी कि युवनाश्व स्वयं गर्भवती हो गए, जो कि एक असाधारण और अभूतपूर्व घटना थी। जब ऋषियों को इस बात का पता चला, तो वे भी आश्चर्यचकित हुए। समय आने पर, युवनाश्व के उदर से एक सुंदर और स्वस्थ पुत्र का जन्म हुआ। यह जन्म किसी चमत्कार से कम नहीं था। इस पुत्र का नाम मान्धाता रखा गया, जो आगे चलकर एक महान और यशस्वी राजा बने।
मान्धाता का शासन और युवनाश्व का अंत:- 
मान्धाता ने अपने पिता युवनाश्व के बाद इक्ष्वाकु वंश की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया। वे अपनी बुद्धिमत्ता, शौर्य, और धर्मनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हुए। कहा जाता है कि मान्धाता ने पृथ्वी के बड़े हिस्से पर शासन किया और उनके नाम पर ही पृथ्वी को "मान्धात्री" कहा गया।
       युवनाश्व ने अपने पुत्र को राजगद्दी सौंपने के बाद तपस्या और आध्यात्मिक जीवन की ओर ध्यान दिया। उनकी यह अनोखी कहानी हमें यह सिखाती है कि ईश्वरीय शक्ति और नियति के सामने मानव की योजनाएं बदल सकती हैं, और चमत्कार किसी भी रूप में हो सकते हैं।
कहानी का नैतिक और महत्व:- 
युवनाश्व की कहानी हमें यह सिखाती है कि
नियति अप्रत्याशित हो सकती है। युवनाश्व ने कभी नहीं सोचा था कि वे स्वयं गर्भवती होंगे, लेकिन यह ईश्वरीय इच्छा थी। विश्वास और धर्म का महत्व: युवनाश्व ने हर परिस्थिति में धर्म और कर्तव्य का पालन किया।






Sunday, June 15, 2025

पिताजी की 97वीं जयंती पर सादर स्मरण और श्रद्धांजलि

मेरे बाबूजी का नाम शोभाराम दूबे है , जिन्हें हम बचपन से “बाबूजी” ही कहकर पुकारा करते थे। इनका जन्म 15 जून 1929 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के हर्रैया तहसील के कप्तानगंज विकास खण्ड के दुबौली दूबे नामक गांव मे एक कुलीन परिवार में हुआ था। घर का माहौल अनुकूल नहीं था। परिवार का पालन पोषण तथा शिक्षा के लिए बाबूजी को उनके पिताजी पंडित मोहन प्यारे जी लखनऊ लेकर चले गये थे। उन्होने 1945 में लखनऊ के क्वींस ऐग्लो संस्कृत हाई स्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा उस समय ‘प्रथम श्रेणी’ से अंग्रेजी, गणित, इतिहास एवं प्रारम्भिक नागरिकशास्त्र आदि अनिवार्य विषयों तथा हिन्दी और संस्कृत एच्छिक विषयों से उत्तीर्ण की है। इन्टरमीडिएट परीक्षा 1947 में कामर्स से द्वितीय श्रेणी में अंग्रेजी, बुक कीपिंग एण्ड एकाउन्टेंसी, विजनेस मेथेड करेसपाण्डेंस, इलेमेन्टरी एकोनामिक्स एण्ड कामर्सियल ज्याग्रफी तथा स्टेनो- टाइपिंग विषयों से उत्तीर्ण किया था। 

सरकारी सेवा में:- 

बाबूजी सहकारिता विभाग में सरकारी सेवा में लिपिक पद पर नियुक्ति पाये थे। बाद में बाबूजी ने विभागीय परीक्षा देकर लिपिक पद से आडीटर के पद पर अपनी नियुक्ति पा लिये थे। अब बाबूजी का कार्य का दायरा बदल गया और अपने विभाग के नामी गिरामी अधिकारियों में बाबूजी का नाम हो गया था। बाबूजी अपने सिद्धान्त के बहुत ही पक्के थें उन्होने अनेक विभागीय अनियमितताओं को उजागर किया था इसका कोपभाजन भी उन्हें बनना पड़ा था। उस समय उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश का ही भाग था। बाबूजी को टेहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल भी जाना पड़ा था। वैसे वे अधिकांशतः पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही अपनी सेवाये दियें हैं। बस्ती तो वे कभी रहे नहीं परन्तु गोण्डा, गोरखपुर, देवरिया, बलिया, आजमगढ, बहराइच, गाजीपुर, जौनपुर तथा फैजाबाद आदि स्थानों पर एक से ज्यादा बार अपना कार्यकाल बिताया है। बाबूजी का आडीटर के बाद सीनियर आडीटर के पद पर प्रोन्नति पा गये थे। सीनियर आडीटर के जिम्मे जिले की पूरी जिम्मेदारी होती थी। बाद में यह पद जिला लेखा परीक्षाधिकारी के रुप में राजपत्रित हो गया। कभी- कभी बाबूजी को दो- दो जिलों का प्रभार भी देखना पड़ता था। जब कोई अधिकारी अवकाश पर जाता था तो पास पड़ोस के अधिकारी के पास उस जिले का अतिरिक्त प्रभार भी संभालना पड़ता था। 1975  में बाबूजी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी. ए. की उपधि प्राप्त की थी।

परिवहन निगम में प्रतिनियुक्ति पर:- 

विभाग में अच्छी छवि होने के कारण बाबूजी को प्रतिनियुक्ति पर उ. प्र. राज्य परिवहन में भी कार्य करने का अवसर मिला था। ये क्षेत्रीय प्रबन्धक के कार्यालय में बैठते थे और उस मण्डल के आने वाले सभी जिला स्तरीय कार्यालयों के लेखा का सम्पे्रेक्षण करते थे। उनकी नियुक्ति कानपुर के केन्द्रीय कार्यशाला में 23.12.1982 को हुआ था। यहां से वे औराई तथा इटावा के कार्यालयों के मामले भी देखा करते थे। अपनी सेवा का शेष समय बाबूजी ने राज्य परिवहन में पूरा किया था। 1985 में वह कानपुर से गोरखपुर कार्यालय में सम्बद्ध हो गये थे। यहां से वे आजमगढ़ के कार्यालय के मामले भी देखा करते थे। गोरखपुर कार्यालय से वे 30.06.1987 में सेवामुक्त हुए थे। बाबूजी अपने पैतृक जन्मभूमि पर कम तथा अपने ससुराल वाले जगह पर ज्यादा रहने लगे थे। वे बाहर भी अकेले रहते थे। माता जी को बहुत कम अपने पास रख पाते थे क्योकि घर पर नानाजी भी तो अकेले थे। मेरे भाई साहब को बाबूजी के पास फैजाबाद, बहराइच, गाजीपुर तथा जौनपुर में रहकर पढ़ने का मौका मिल गया था। मुझे उनका सानिघ्य बाहर नहीं मिल पाया तथा उनके साथ समय विताने का अवसर कम मिल पाया था। हमें जब भी अपने पढ़ाई तथा बच्चे के पढ़ाई से समय मिलता मैं उनके आवास यानी अपने ननिहाल स्वयं, पत्नी तथा बच्चे के साथ अवश्य जाता रहा और वह बहुत ही प्रसन्न होते थे ।मैंने सोचा था कि जब मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हूंगा तो बाबूजी के साथ समय बिताउगां। उनके सुख दुख में भागी बनूंगा। पर ईश्वर ने एसा करने नहीं दिया। हमें थोड़े-थोड़े समय के लिए उनके साथ रहने का अवसर ही मिल पाया। इस बात का मुझे बहुत मलाल रहा है। 

अंतिम विदाई:- 

17 जनवरी 2011 में वह महान आत्मा हमेशा हमेशा के लिए हमसे दूर होकर परम तत्व में बिलीन हो गया। उनकी प्रेरणा व स्मृतियां आज भी मेरे व मेरे परिवार को सम्बल प्रदान करती है। जब मैं इस स्थिति में हुआ कि मेरे बच्चे अकेले मेरे देखरेख में रहने के लिए उपयुक्त हो गये तो मैं अपनी पत्नी को अपनी मांजी की सेवा के लिए घर पर कर दिया और अपने जिन्दगी के आखिरी के लगभग 8 साल मुझे अकेले बाहर गुजारना पड़ा है। मेरी सेवा के कुछ ही दिन बचे हुए थे। अकेले रहते-रहते पुराने लोगों की यादें बहुत आती रहती थी। अतीत की स्मृतियों में बार-बार जाना ही पड़ता है। उनकी पावन स्मृति को शत शत नमन और श्रद्धांजलि।

   

Saturday, June 14, 2025

नव विवाहित दंपतियों में हत्या की बढ़ती घटनाएं # डा. राधे श्याम द्विवेदी

लड़कियाँ के कुछ खास गुण 
लड़कियाँ प्राकृतिक रूप से सहनशील होती हैं। वे किसी भी परिस्थिति में जल्दी अनुकूल हो जाती हैं। उन्हें अनुकूल होने में समय नहीं लगता । वे परिस्थिति के अनुसार क्या और कब बोलना चाहिए ये भी अच्छे से जानती हैं। वे खुद कोसजने संवरने में बहुत आगे होती हैं। वे भली भांति जानती हैं जो भी संसाधन उपलब्ध हो उसमें बेहतर कैसे दिखना है।
        आधुनिक शिक्षा, माता पिता द्वारा उन्हें स्वावलंबी बनाना और किशोरावस्था में उन पर पैनी निगाह ना रखना तथा माता पिता द्वारा उन्हें भोला मासूम ही समझना ही ऐसे घटनाओं को पनपने का अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इनको सार्वजनिक दंड भी नहीं मिलता इससे समाज में इनके गलत इरादों के प्रति सबक का संदेश भी नहीं जा पाता है। कुछ लड़कियां भाववेश में आकर गलत कदम उठा लेती हैं, बाद में पश्चाताप भी करती हैं लेकिन अपनी जिंदगी के साथ समाज में जहर घोल ही जाती हैं। कुछ का अंजाम भी बुरा होता है और वे दुनिया की जलीलत न सह पाने के कारण अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर देती हैं। महिला आयोग, सामाजिक सुधार विभाग और न्यायपालिका को इस विषय पर और मुखरित होना चाहिए।
आचार्य चाणक्य की नीति  
आचार्य चाणक्य भारत के प्राचीनतम और सबसे बुद्धिमान नीतिशास्त्रियों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने जीवन के हर पहलू को बहुत ध्यान और गहराई से समझा और बताया कि इंसान की आदतें उसका आने वाला समय तय करती हैं। उनके मुताबिक, एक महिला पूरे घर की जान होती है, वो चाहे तो अपने परिवार को खुशहाल बना सकती है और अगर उसके बर्ताव में गड़बड़ हो, तो वही घर परेशानी से भर सकता है। चाणक्य नीति में ऐसी महिलाओं के बारे में बताया गया है, जिनकी कुछ बुरी आदतें परिवार की शांति, इज्जत और तरक्की को धीरे-धीरे खत्म कर देती हैं। ये बातें किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को सच्चाई समझाने और सुधार की ओर ले जाने के लिए कही गई हैं।आज के समय में भी इन बातों का मतलब उतना ही जरूरी है जितना पुराने जमाने में था।
गलत आदतों से घर श्मशान बन जाता है :- 
एक समझदार और सुलझी हुई महिला पूरे परिवार को खुश और मजबूत बना सकती है. लेकिन अगर उसमें गलत आदतें आ जाएं, तो वही महिला घर को बिगाड़ भी सकती है। चाणक्य नीति आज भी यही सिखाती है कि सच्चा सुख, प्यार, सम्मान और पैसा तभी टिक सकता है जब घर की महिला संतुलन और समझदारी से काम ले।
अपने पैसे या सुंदरता का घमंड करना:- जो महिला अपनी सुंदरता, पैसे या परिवार की शोहरत पर घमंड करती है, धीरे-धीरे अकेली रह जाती है। घमंड से कोई किसी की इज्जत नहीं करता। जब घर में प्यार की जगह अहंकार आ जाता है, तो रिश्ते टूटने लगते हैं। चाणक्य ने कहा है कि घमंड करने वाली औरत अपने ही हाथों से अपना घर बर्बाद कर सकती है।
पति की कमाई को कम समझना:- 
अगर कोई महिला अपने पति की कमाई से खुश नहीं रहती, उसे ताने देती है या दूसरों से तुलना करती है, तो इससे पति का मन टूट जाता है।वो दुखी हो जाता है और रिश्तों में खटास आने लगती है। चाणक्य कहते हैं कि ऐसी स्त्री अपने ही घर की नींव को हिला देती है। धीरे-धीरे परिवार में तनाव और पैसों की तंगी बढ़ जाती है।
शादी, हनीमून और मर्डर का त्रिकोण:- 
जिस तरह से नव विवाहित दंपतियों की हत्या की घटनाएं सुनने को मिल रही हैं यह बहुत ही शर्मनाक है और इस बात पर विचार करना उतना ही आवश्यक है कि समाज किस दिशा में जा रहा है और हम अपने बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं। अभी हाल ही में कुछ चरित्र बहुत ही सुर्खियों में रहे कुछ के नाम इस प्रकार है - 
1- मुस्कान रस्तोगी
2- निकिता सिंघानिया और
3- सोनम रघुवंशी आदि आदि।
       इंदौर में राजा और सोनम की अरेंज मैरिज हुई थी। शादी के चंद दिन बाद हनीमून पर निकला ये कपल कामाख्या मंदिर के दर्शन की बात कहकर मेघालय जा पहुंचा। लेकिन 12 दिन बाद पहाड़ियों में राजा की लाश मिली और सोनम गायब थी। लेकिन जब हकीकत सामने आई तो यह मामला महज कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश और मर्डर का निकला. जिसमें सुपारी किलर भी हायर किए गए थे।
शादी का रिश्ता विश्वास और एक दूसरे के आत्मसात से बनता है:- 
शादी जैसे पवित्र रिश्ते में विश्वास सबसे बड़ा स्तंभ होता है। जब इस रिश्ते में हत्या जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो सामाजिक विश्वास और मूल्यों पर आघात पहुंचता है।विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों का भी बंधन होता है। जब ऐसा कोई अपराध होता है, तो दोनों परिवार मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं।
नकारात्मक दृष्टिकोण:- 
ऐसी घटनाएं समाज में नवविवाहित दंपतियों को लेकर एक नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर सकती हैं। विशेषकर महिलाओं को लेकर शंका और अविश्वास बढ़ सकता है, जो उचित नहीं है।
 नव विवाहिता को अनुकूल माहौल मिले :- 
नारियां आज भी देवी स्वरूपा है, उन्हें अनुकूल बनना, बनाया जाना और रखना चाहिए। तलाक भी इतनी आसानी से नहीं मिलना चाहिए। जब पति का परिवार सब तरह से अनुकूल बना लेता है तो बहू को,उसके माता पिता को भी अनुकूल बनाने में सहयोग और प्रेरणा देना ही चाहिए। लड़की के पसन्द के अनुरूप ही शादी का रिश्ता फाइनल करनाचाहिए। इसे अपने मान- सम्मान में बाधा ना मानकर अनुकूल सद्प्रेरणा देनी चाहिए। कॉन्वेंट और भौतिक शिक्षा के साथ संस्कार कथा ,कीर्तन और बड़े बुजुर्गों के निगाहबान में ही रहना चाहिए। तलाक तो अंतिम विकल्प होना चाहिए । हत्या और अप्राकृतिक कृत्य तो कभी भी नहीं होना चाहिए।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।


अहमदाबाद विमान दुर्घटना के कुछ चमत्कारिक प्रमाण मिले #आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

मलवे में तब्दील हुआ एयर इंडिया का विमान

गुजरात के अहमदाबाद में 12 जून की सुबह एक भीषण विमान हादसा हुआ, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। अहमदाबाद से लंदन जा रही एक इंटरनेशनल फ्लाइट टेक-ऑफ के कुछ ही मिनटों बाद तकनीकी खराबी के चलते क्रैश हो गई। इस दर्दनाक हादसे में विमान में सवार सभी 241 यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई। हादसा इतना भयावह था कि घटनास्थल पर सिर्फ मलबा, राख और जले हुए हिस्से ही नजर आ रहे थे। यात्रियों के शवों को पहचानना भी मुश्किल हो गया है।इस दुखद और विनाशकारी घटना में जानमाल का भारी नुकसान हुआ।हादसा इतना बड़ा था कि प्लेन के क्रैश होने से सड़क पर भारी मात्रा में मलबा गिरा हुआ, जिसे हटाने का काम जारी है।

तीन दैवी चमत्कार की घटना घटित:- 

इस मलबे से एक व्यक्ति का जीवित बच निकलना, श्रीमद्भगवत गीता का सबूत निकलना और भगवान श्रीकृष्ण के लड्डू गोपाल स्परूप की मूर्ति भी सही सलामत सुरक्षित निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। गीता और लड्डू गोपाल दोनों  वस्तुएं विमान में सवार जयश्री पटेल नाम की महिला के हैंडबैग में थीं। जयश्री पटेल इन दोनों को अपने साथ लंदन ले जा रही थीं।

1.लड्डू गोपाल की मूर्ति मिलना चमत्कार

अहमदाबाद में एयर इंडिया का प्लेन क्रैश हादसे के बाद भगवान श्रीकृष्ण के लड्डू गोपाल स्परूप की मूर्ति मिली है। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, जिसमें लड्डू गोपाल की मूर्ति दिखाई जा रही है। मृतक जयश्री अरवल्ली जिले के मोडासा स्थित खंभीसर गांव की रहने वाली थी। 3 महीने पहले ही उसकी शादी आकाश से हुई थी।अब वह अपनी पति के पास रहने लंदन जा रही थी, लेकिन रास्ते में हादसे का शिकार हो गई और उसके दो सामान बिना किसी नुकसान के बच निकले।

2.बिना जली मिली भगवत गीता की पुस्तक:- 

बीते दिन भगवत गीता मिलने का वीडियो भी सामने आया था।इतनी भयंकर आग लगने के बाद भी पुस्तक को कुछ नहीं हुआ और सभी पेज सुरक्षित हैं। गीता के कवर का कुछ पार्ट जला है, शुरुआत के कुछ पन्ने पर जलने के निशान हैं, लेकिन अंदर के सभी पेज सुरक्षित हैं. साथ ही पुस्तक पर बनी देवी-देवताओं की तस्वीरें भी सुरक्षित रहीं हैं।

भगवद्गीता स्वयं श्री कृष्ण का स्वरूप होता है:- 

भगवद्गीता को भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का हिस्सा है और इसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के दौरान उपदेश दिए थे, जो भगवद्गीता के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस ग्रंथ में, कृष्ण को न केवल एक महान योद्धा और मार्गदर्शक के रूप में दिखाया गया है, बल्कि उन्हें परमेश्वर, या भगवान के रूप में भी दर्शाया गया है। उन्हें 'पुरुषोत्तम' या 'परमात्मा' कहा गया है, जो प्रकृति और पुरुष से परे हैं। 

भगवद्गीता में श्री कृष्ण को स्वयं भगवान का स्वरूप माना गया है। जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए स्वयं को "परम पुरुषोत्तम" बताते हैं। इसके कई श्लोकों में श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप और उनकी सर्वव्यापी प्रकृति का वर्णन है।वास्तव में भागवत गीता कोई साधारण ग्रंथ नहीं, भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि यह मेरा ही स्वरूप है। मैं ही परम तत्व हूं, मेरे अतिरिक्त इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। उदाहरण के लिए, अध्याय 10, श्लोक 20 में श्री कृष्ण कहते हैं:- 

अहम् आत्त्मा गुडाकेश

सर्वभूताशयस्थितः। 

अहं आदिश् च मध्यं च 

भूतानां अन्त एव च॥ 

(अर्थ: हे अर्जुन! मैं ही सब भूतों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ, मैं ही सब भूतों का आदि, मध्य और अंत हूँ।)

यह श्लोक बताता है कि श्री कृष्ण न केवल सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं, बल्कि वे ही सृष्टि के आरम्भ, मध्य और अंत में भी विद्यमान हैं। यह उनकी सर्वव्यापी प्रकृति और भगवान के रूप में उनकी स्थिति को दर्शाता है। गीता में, में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में उपदेश दिए, जो कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष जैसे विषयों पर केंद्रित कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग का उपदेश है। गीता को ज्ञान का भंडार माना जाता है, जो जीवन के हर पहलू पर प्रकाश डालता है। यह चरित्र निर्माण का शास्त्र है, जो मनुष्य को सही मार्ग पर चलने और श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है और भक्ति का मार्ग भी बताया है। गीता के अध्याय 11 में, कृष्ण अपना विराट रूप, या विश्वरूप, अर्जुन को दिखाते हैं, जिसमें वे ब्रह्मांड और सभी प्राणियों को अपने भीतर समाहित करते हुए दिखाई देते हैं। भगवद्गीता का सार यह है कि कृष्ण स्वयं परम सत्य हैं और उनका अनुसरण करने से व्यक्ति जीवन के दुखों से पार पा सकता है। इसलिए, भगवद्गीता को कृष्ण का स्वरूप माना जाता है क्योंकि इसमें कृष्ण को भगवान के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उनके उपदेशों का पालन करके, व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान और मुक्ति प्राप्त कर सकता है। 

3. 242 यात्री में से बचकर निकला एक युवक :- 

विमान में सीट नंबर-11ए पर ब्रिटिश नागरिक विश्वाश कुमार रमेश बैठे थे।वह जिंदा बचकर बाहर निकल गए। ये किसी चमत्कार से कम नहीं था। अभी उनका अस्पताल में इलाज चल रहा है। रमेश ने कहा कि हादसे के समय जोरदार धमाका हुआ, चारों तरफ आग ही आग थी। मैं जिंदा हूं ये किसी करिश्मे से कम नहीं है।


       आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।