Thursday, November 6, 2025

महाशक्तियों का त्रिकोण:काली खोह मंदिर, मिर्जापुर✍️आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

विंध्य पर्वत पर स्थित मां विंध्यवासिनी का मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां पर माता अपने तीन स्वरूपों में  विराजमान हैं। शक्ति आराधना के लिए विंध्य पर्वत पौराणिक काल से ही प्रसिद्ध है। यहां पर महालक्ष्मी के रूप में मां विंध्यवासिनी मां , महाकाली के रूप में मां काली खोह की देवी और महासरस्वती के रूप में मां अष्टभुजा देवी विराजमान हैं। यही कारण है कि इसे महा शक्तियों का त्रिकोण भी कहा जाता है, जो श्रद्धालु यहां मां से कोई कामना करता है, मां उसे जरूर पूरा करती हैं। 

        काली खोह मंदिर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल का एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच में स्थित है और घने जंगलों से घिरा हुआ है, जो इसे एक रहस्यमय आकर्षण देता है। यह मंदिर, विंध्यवासिनी मंदिर से लगभग 2 किमी दूर वनक्षेत्र में काफी एकांत और भीड़-भाड़ से मुक्त क्षेत्र में स्थित है । यहां विशेष अवसरों पर ही भीड़ भाड़ देखी जा सकती है। सामान्य दिनों में कम लोग ही दिखाई देते हैं।

कई परंपराएं : स्वयंभू मां कालिका

यह मंदिर देवी काली को समर्पित है, जिन्हें बुराई का नाश करने वाली और अपनेभक्तों की रक्षक माना जाता है। मंदिर परिसर एक चट्टान की गुफा से बना है। बाद में इसे मन्दिर के रूप में रूपांतरित किया गया है। माना जाता है कि यह लगभग 5000 साल पुराना स्थल है। कहा जाता है की रक्तबीज को मरने के बाद माँ काली इसी गुफा में आई थी। काली खोह में माँ काली की ऐसी प्रतिमा के दर्शन होते है जो पूरी दुनिया में और कही नहीं है। माँ यहाँ आकाश की ओर देखते हुए खेचरी मुद्रा में दर्शन देती है और भक्तो के दुखो का निवारण करती है।

        माँ काली की मूर्ति स्वयंभू है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली है। यह मूर्ति गुफा के अंदर स्वाभाविक रूप से विकसित हुई है। 

शिवजी पर चरण पड़ने से शर्मिन्दित 

महाशक्ति माँ काली राक्षस रक्तबीज के संहार करते समय माँ काली विकराल रूप धारण कर ली थी उनको शांत करने हेतु शिव जी युद्ध भूमि में उनके सामने लेट गये थे। जब माँ काली का चरण शिव जी पर पड़ा तो लज्जावश पहाडियों के खोह में छुप गयी। इस कारण से ये स्थान काली खोह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

      मंदिर में रहस्य और आध्यात्मिकता का एक आभा मंडल है, जो पूरे देश से भक्तों और आगंतुकों को आकर्षित करता है। काली खोह मंदिर इस क्षेत्र के सबसे प्राचीन और पूजनीय मंदिरों में से एक है और स्थानीय लोगों के दिलों में एक विशेष स्थान रखता है। 

देव- दुर्दशा से कुपित हो काले रंग का वरण 

जब देवता दैत्यों से भयभीत हो रहे थे, तब उन्होंने भगवती पार्वती की स्तुति की। यह करुण कथा सुनकर वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। परिणाम स्वरूप माता का रंग काला पड़ गया। इसी कारण भगवती माँ काली, चंडी, चामुंडा और चंडिका आदि नामों से प्रसिद्ध हुईं। 

सती का कंचुक (वस्त्र)गिरने वाला शक्तिपीठ

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी सती ने यज्ञ में आत्मदाह किया,तो भगवान शिव उनके शव को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया, और जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई। कहा जाता है कि काली खोह वही स्थान है जहां सती का कंचुक (वस्त्र) गिरा था, जिससे यह क्षेत्र एक प्रमुख शक्ति पीठ बन गया।

     कंस के हाथ से बच निकली थी       योगमाया

काली खोह मंदिर हिंदू पौराणिक कथाओं और शक्ति की किंवदंतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है।पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस ने योगमाया (विष्णु की दिव्य शक्ति) को मारने का प्रयास किया , तो वह चमत्कारिक रूप से बच निकलीं और अपना दिव्य रूप धारण कर लिया। कृष्ण के हाथों कंस की आसन्न मृत्यु के बारे में उसे चेतावनी देने के बाद , वह विंध्याचल लौट गईं , जहां वह इस गुफा में देवी काली के रूप में प्रकट हुईं।

राक्षसी शक्तियों से रक्षा के लिए अवतरित

ऐसा माना जाता है कि काली खोह मंदिर वह स्थान है जहां काली माता निवास करती हैं , जो बुराई के विनाश और अच्छाई की विजय का प्रतीक है । ऐसा कहा जाता है कि देवी काली विंध्याचल क्षेत्र को राक्षसी शक्तियों से बचाने के लिए यहां प्रकट हुई थीं।भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में दर्शन करने और प्रार्थना करने से दैवीय सुरक्षा, शक्ति और नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति मिलती है ।


समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

कालीखोह मंदिर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर एक चट्टानी गुफा को तराश कर बनाया गया है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह लगभग 5000 साल पुराना है। इस मंदिर में रहस्य और आध्यात्मिकता का एक ऐसा आभामंडल है जो देश भर से भक्तों और आगंतुकों को आकर्षित करता है। मंदिर की अनूठी वास्तुकला, रहस्यमय आकर्षण और आध्यात्मिक महत्व इसे खुद से जुड़ने और ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। मंदिर में साल भर कई त्यौहार और मेले आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। मंदिर में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार नवरात्रि है, जिसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। त्यौहार के दौरान, मंदिर को रोशनी और फूलों से सजाया जाता है और भक्त विशेष प्रार्थना और विभिन्न अनुष्ठान करते हैं।

रक्तबीज संहारक स्वरूप

रक्तबीज नामक राक्षस की, जिसे यह वरदान प्राप्त था कि यदि कोई उसका वध करता है तो उसके शरीर से निकलने वाला रक्त जहाँ-कहीं भी गिरेगा वहाँ अपने आप नये-नये रक्तबीज दानव पैदा हो जायेंगे। एक बार अपने तप-बल के चलते दानव रक्तबीज ने देवलोक पर अपना अधिकार कर लिया। वह सभी देवताओं को सताने लगा। देवतागण भयभीत होकर देवलोक छोड़ दिये। दानव रक्तबीज ने चारों तरफ त्राहि-त्राहि मचा दी थी। देवताओं में यह चिंता व्याप्त हो गयी कि इस अदभुत वरदान प्राप्त राक्षस रक्तबीज का संहार किस प्रकार किया जाये।


ब्रह्मा जी की विनती से धरा स्वरूप

ब्रह्मा जी ने माँ विन्ध्यवासनी से विनती की थी कि वे माँ काली का ऐसा रूप धारण करें जिनका मुख आसमान की ओर हो, ताकि ऊपर देवलोक में दानव रक्तबीज के वध के बाद उसका रक्त धरती पर गिरने के पहले ही काली माँ उस राक्षस के रक्त का पान कर लें, जिससे उसके रक्त की एक भी बूंद धरती पर न गिरने पाये और धरती दानवों की उत्पत्ति से बची रहे। माँ विन्ध्य- वासनी ने देवताओं की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। उन्होनें रक्तबीज का वध करने के लिये माँ काली का खेचरी मुद्रा वाला रूप धारण किया। उसके बाद माँ ने उस दानव रक्तबीज का संहार किया और उसका सारा रक्त पी गयीं। जिसके कारण धरती पर राक्षस रक्तबीज के रक्त की एक भी बूंद नहीं गिरी और इस प्रकार धरती पर दानवों का साम्राज्य होने से बच गया। धरती वासियों का सदा कल्याण चाहने वाली काली खोह वाली माँ आज भी विंध्य पर्वत पर अपने भक्तों का दुख हर रही हैं।

कालीमां का उग्र नृत्य

रक्तबीज और उसकी सेना का नाश करने के बाद, काली का क्रोध बेकाबू हो गया। उन्होंने अपना विनाशक नृत्य शुरू कर दिया, जिससे संसार के विनाश का खतरा पैदा हो गया। देवता चिंतित हो गए,क्योंकि प्रकृति का संतुलन भी खतरे में था। तब भगवान शिव उसे रोकने और शांत करने के लिए आगे आए। वे युद्धभूमि में लाशों के बीच लेट गए और खुद काली के पैरों के नीचे आ गए। जब काली ने उन पर पैर रखा, तो उन्हें अचानक एहसास हुआ कि वे क्या कर रही हैं और उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने शर्मिंदगी से अपनी जीभ बाहर निकाली और अपना नृत्य रोकदिया। इससे संसार में शांति लौट आई। शिव पर पैर रखने का यह कार्य उनकी विनाशकारी ऊर्जा के जम जाने का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि यद्यपि काली में अपार शक्ति है, फिर भी वह अनियंत्रित नहीं है।

खेचरी मुद्रा में मां का मुखमंडल

इस मंदिर की सबसे अलग विशेषता है कि मां का मुख यहां पर खेचरी मुद्रा में यानी ऊपर की तरफ है।देश के ज्यादातर मंदिरो में मां के विग्रह का मुख सामने की तरफ होता है. लेकिन मिर्जापुर जनपद के विंध्याचल में स्थित मां काली देवी का मस्तक ऊपर आकाश की तरफ है। इसे खेचरी मुद्रा कहते हैं। अपने अनोखेपन के लिये प्रसिद्ध यह विश्व का एकमात्र मंदिर है। इस महाकाली मंदिर को लोग काली खोह के नाम से जानते हैं। इस मंदिर का तंत्र साधना के लिए सबसे ज्यादा महत्व है। पुराणों के अनुसार जब रक्तबीज दानव ने स्वर्ग लोक पर कब्जा कर सभीदेवताओं को वहां से भगा दिया था। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित अन्य देवताओं की प्रार्थना पर मां विंध्यवासिनी ने महाकाली का ऐसा रूप धारण किया था।

मां के मुंह में प्रसाद का पता नहीं चलता 

रक्तबीज नामक दानव को ब्रह्मा जी का वरदान था कि अगर उसका एक बूंद खून धरती पर गिरेगा तो उससे लाखों दानव पैदा होंगे। इसी दानव के वध हेतु महा काली ने रक्त पान करने के लिए अपना मुंह खोल दिया जिससे एक बूंद भी खून धरती पर न गिरने पाये। रक्तबीज नामक दानव का वध करने के बाद से मां का एक रूप ऐसा भी है। कहा जाता है इस मुख में चाहे जितना प्रसाद चढ़ा दीजिए कहां जाता है? आज तक इसका पता कोई नहीं कर पाया। 

तांत्रिक साधना का केंद्र

कालीखोह को तांत्रिकों की साधना स्थली के रूप में भी जाना जाता है। यहां मान्यता है कि गुफा में एक अदृश्य सुरंग है जोसीधे गंगा नदी तक जाती है, जिसका उपयोग प्राचीन काल में साधक तांत्रिक साधनाओं के लिए करते थे। नवरात्रि की रातों में यहां तंत्र-मंत्र की गुप्त साधनाएं की जाती हैं, जिनमें कई साधकों को विशेष अनुभव प्राप्त होते हैं। यह स्थान ऊर्जा, तपस्या और साधना का अद्भुत केंद्र है। काली खोह मंदिर में तंत्र साधना के लिए तांत्रिक नवरात्र की सप्तमी तिथि को मां के सातवें स्वरूप कालरात्रि की साधना करते हैं। आम भक्त भी पूरी श्रद्धा के साथ मां का दर्शन करते हैं।  यहां पर तंत्र विद्याओं की बड़ी आसानी से सिद्धि हो जाती है, इस कारण से तांत्रिकों का यहां बड़ा जमावड़ा लगता है। भक्त यहां पर अपनीमनोकामना पूर्ण कराने के लिए मां के दर्शन करनेआते हैं।

मन्दिर तक पहुंच 

प्रयाग वाराणसी हाईवे से प्रवेश करने पर हनुमान जी का एक मानव प्रतिमूर्ति आकर्षण का केंद्र देखा जा सकता है। इसके बाद बाजार में फूल,पत्ती, माला और प्रसाद की दुकान देखी जा सकती है। इसके विपरीत अष्टभुजा मंदिर से वापस रोपवे की रास्ते आने पर सबसे पहले सिद्धिदात्री दुर्गा मंदिर के प्रांगण का बाहरी भाग देखा जा सकता है । इससे और आगे चलने पर हवन कुंड बना हुआ है । फिर श्रद्धालु को मंदिर का प्रवेश द्वार दिखाई देता है । इसमें सीड़िया बनी हुई है और लाइन से मंदिरों की पंक्तियां बनी हैं। 

मन्दिर का अंतःभाग : विशाल प्रांगण

मंदिर परिसर में एक गर्भगृह और एक विशाल प्रांगण है जहाँ भक्त प्रार्थना और विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। मंदिर को जटिल नक्काशी और चित्रों से सजाया गया है, जिनमें हिंदू पौराणिक कथाओं के विभिन्न दृश्य दर्शाए गए हैं। यह मंदिर अपनीअनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है, जिसमें प्राचीन और आधुनिक शैलियों का मिश्रण है।

अलौकिक-शांत वातावरण

गुफा में प्रवेश करते ही भक्त अलौकिक और शांत वातावरण का अनुभव करते हैं, जो इस स्थान को विशेष बनाता है। यह मंदिर न केवल पूजा-पाठ के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।

उभरी हुई आँखों वाला भयंकर स्वरूप

मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो उभरी हुईआँखों वाला एक भयंकर स्वरूप है। इसके ऊपर दो रक्षक हैं। मंदिर लाल रंग से रंगा हुआ है। माँ काली की मूर्ति एक छोटे से गुफा मंदिर में स्थित है, जिसे संशोधित किया गया है। यह मूर्ति काले पत्थर की है और इसमें दो सदैव सजग आँखें अपने भक्तों को देखती रहती हैं। ये आँखें चाँदी से सुसज्जित हैं।भक्त यहाँ शांति, समृद्धि और भय व शत्रुओं पर विजय पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। जादुई फल पाने की चाह रखने वाले तांत्रिक साधक काली खोह में देवी काली की पूजा करते हैं।

     'काली' का अर्थ है अंधकार को नष्ट करने वाली देवी,जबकि 'खोह' का मतलब गुफा होता है । इस प्रकार, काली खोह वास्तव में वह पवित्र गुफा है जहां मां काली की मूर्ति विराजमान है। 

दस महाविद्या देवियों की छवियां 

माँ काली ब्रह्मांड की प्रचंड, सुरक्षात्मक और परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, और उनके दस अलग-अलग रूप उस दिव्य स्त्री ऊर्जा के गहन प्रतीक हैं जो हम सभी में प्रवाहित होती है। इन्हें दस विद्या देवी या महाविद्या भी कहते हैं। हिंदू धर्म में ज्ञान की दस देवियाँ इस प्रकार हैं: काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। ये देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं और उनकी पूजा तंत्र- मंत्र में की जाती है। यह मां को समर्पित 10 छोटे छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है।

1.मां काली 

काली प्रथम महाविद्या हैं। समय और परिवर्तन की प्रचंड देवी,  काली ब्रह्मांड की अपरिमित शक्ति का प्रतीक हैं। उनका रंग श्याम है और तीन आँखें हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। काली को नुकीले दाँतों, बिखरे बालों और चार हाथों के साथ दर्शाया गया है, जिनमें से दो में त्रिशूल और तलवार है, जबकि अन्य दो में एक भस्म किया हुआ राक्षस का सिर और सिर से टपकते रक्त को इकट्ठा करने वाला एक कटोरा है। देवी काली हमें परिवर्तन की अनिवार्यता और अपनी परछाइयों, यानी दोषों को स्वीकार करने के महत्व के बारे में सिखाती हैं।

2.धूमावती

धूमावती माता दस महाविद्याओं में से एक हैं। वह देवी पार्वती का एक क्रोधित और विकराल रूप मानी जाती हैं। उन्हें विधवा देवी, धूमावती, एकांत और आत्मनिरीक्षण में प्राप्त ज्ञान का प्रतीक हैं। उनका रंग धुएँ के रंग का, धूसर है, त्वचा झुर्रीदार है, मुँह सूखा है और कुछ दाँत टूटे हुए हैं।धूमावती को सफ़ेद साड़ी पहने और रथ /कौवे पर बैठी हुई दिखाया गया है, जिसके दो हाथ हैं, जिनमें से एक हाथ आशीर्वाद दे रहा है और दूसरा हाथ सूप की टोकरी लिए हुए है। धूमावती की यह प्रतिमा दुख, क्रोध, भय, थकावट, बेचैनी, भूख और प्यास का प्रतीक है। वह हमें अपनी कमज़ोरियों में शक्ति ढूँढ़ना सिखाती हैं।

3.बगलामुखी

अपने शत्रुओं को निस्तेज करने वाली देवी के रूप में विख्यात, बगलामुखी को एक चमकदार सुनहरे रंग, तीन चमकदार आँखों और लहराते काले बालों के साथ दर्शाया गया है। उनका स्वरूप सौम्य है और वे पीले वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित हैं। वे गदा धारण करती हैं और मदनासुर नामक राक्षस को अपनी जीभ से पकड़कर उसे वश में रखती हैं। उन्हें या तो सिंहासन पर विराजमान या सारस पर विराजमान दर्शाया गया है।

4.तारा

करुणा की देवी के रूप में विख्यात, तारा वह मार्गदर्शक हैं जो हमें अनिश्चितता के शून्य से निकलने में मदद करती हैं। समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव द्वारा विष ग्रहण करने के बाद, उन्होंने स्वयं को माता के रूप में प्रकट किया था ताकि वे उन्हें स्वस्थ कर सकें और उनका पालन-पोषण कर सकें। माँ तारा का रंग नीला है और उन्हें सिर पर मुकुट और गले में सर्प लपेटे हुए दर्शाया गया है। वे उग्रता और दया के बीच संतुलन की प्रतीक हैं।

5.मातंगी 

श्यामला, जिसका अर्थ है "काला रंग", के नाम से भी जानी जाने वाली मातंगी को आमतौर पर पन्ने जैसे हरे रंग, बेकाबू काले बालों, तीन शांत आँखों और शांत भाव के साथ दर्शाया जाता है। वह लाल वस्त्र पहनती हैं और विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित हैं। राजसी सिंहासन पर विराजमान, उनके चार हाथों में तलवार, कपाल और वीणा है, जबकि उनका चौथा हाथ अपने भक्तों को आशीर्वाद देता है।

6.भैरवी

इन्हें  त्रिपुर भैरवी भी कहा जाता है। एक क प्रचंड रक्षक, भैरवी, भगवान शिव के शक्तिशाली रूप, भैरव का स्त्री रूप हैं। उनका रंग अग्नि जैसा लाल है, उनकी तीन उग्र आँखें हैं और बिखरे हुए बाल अर्धचंद्राकार जूड़े में बंधे हैं।उनके सिर पर दो सींग हैं और उनके रक्तरंजित मुख के दोनों सिरों से दाँत निकले हुए हैं। भैरवी की यह शक्तिशाली प्रतिमा निर्भयता की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक है। वह हमें अपने भय का सामना करना और अपनी कठिनाइयों से और भी मज़बूत होकर उभरना सिखाती हैं।, 

7.छिन्नमस्ता

त्याग की देवी, छिन्नमस्ता हमें उन चीज़ों को त्यागने के लिए प्रेरित करती हैं जो अब हमारे काम की नहीं रहीं। उन्होंने जय और विजय की संतुष्टि के लिए अपना सिर बलिदान कर दिया, जो रज और तम के प्रतीक हैं। छिन्नमस्ता को कटे हुए सिर, बिखरे बालों और चार हाथों के साथ दर्शाया गया है, जिनमें से दो हाथों में तलवार और उनका अपना कटा हुआ सिर है, और बाकी दो हाथों में फंदा और मदिरापान का पात्र है। उनकी कथा हमें जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

8.कमलात्मिका

इन्हें कमलात्मिका या कमला भी कहते हैं और ये लक्ष्मी का ही स्वरूप मानी जाती हैं। तांत्रिक लक्ष्मी कहलाने वाली कमला देवी कमलों में निवास करती हैं। उनका रंग सुनहरा है, घने काले बाल हैं, तीन शांत आँखें हैं और उनका भाव दयालु है। वे लाल और गुलाबी वस्त्र पहने हैं और आभूषणों और कमलों से सुसज्जित हैं। पूर्ण रूप से खिले हुए कमल पर विराजमान, वे अपने चार हाथों में से दो में कमल धारण करती हैं, जबकि अन्य दो हाथ मनोकामनाएँ पूरी करते हैं और भय से रक्षा करते हैं।

9.भुवनेश्वरी 

ब्रह्मांड की देवी, भुवनेश्वरी, शक्ति के पोषणकारी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका रंग गोरा है और उनकी तीन आँखें हैं। भुवनेश्वरी को पीले और लाल वस्त्र पहने, सुंदर आभूषणों से सुसज्जित, और अपने चार हाथों में से दो में अंकुश और पाश धारण किए हुए दर्शाया गया है।

10. त्रिपुर सुंदरी

इन्हें षोडशी और त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। सौंदर्य और लावण्य की प्रतिमूर्ति, त्रिपुरा, देवी के शाश्वत निवास, मणिद्वीप की अधिष्ठात्री हैं।उन्हें सिंहासन पर विराजमान, लाल या गुलाबी वस्त्र पहने, चार भुजाओं में अंकुश, पाश, धनुष और बाण धारण किए हुए दर्शाया गया है। पाश आसक्ति का प्रतीक है; अंकुश विकर्षण का प्रतीक है; गन्ने का धनुष मन और इच्छाओं का प्रतीक है। इसके अलावा, पुष्प बाण पाँच इंद्रिय विषयों के प्रतीक हैं 

      इनमें से प्रत्येक देवी हमें अपने अनुभवों को देखने का एक अनूठा नज़रिया प्रदान करती है। उनकी ऊर्जाओं से जुड़कर, हम अपने जीवन और अपने आस-पास की दुनिया के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। 

मंदिर वास्तुकला और डिजाइन

काली खोह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा के अंदर स्थित है , जो इसे एक विशिष्ट और रहस्यमय स्वरूप प्रदान करता है।मंदिर के प्रवेश द्वार पर संकरी सीढ़ियां हैं जो गुफा तक जाती हैं , जिससे भय और श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है।गर्भगृह में देवी काली की मूर्ति है , जो गहरे रंग, भयंकर आंखों और तीव्र भाव वाली है । मूर्ति को माला, आभूषण और लाल कपड़े से सजाया गया है , जो शक्ति और बुराई पर विजय का प्रतीक है। मंदिर की दीवारों पर चट्टानी संरचनाएं हैं, जो गुफा को एक प्राचीन और दिव्य वातावरण प्रदान करती हैं।मंद प्रकाश और प्राकृतिक पत्थर से घिरा वातावरण आध्यात्मिक और रहस्यमय वातावरण का निर्माण करता है।भक्तजन आशीर्वाद पाने के लिए सिंदूर, फूल और नारियल चढ़ाते हैं।

बाह्य परिवेश में कालिका कुंड 

कालिका कुंड जो कि यह कुंड काफी रहस्यमय है और कहा जाता है इस कुंड का पानी पीने से बहुत लाभ मिलता है । इस कुंड में स्नान करने से शरीर के सारे रोग भाग जाते हैं । यह कुंड काली खोह मंदिर के पीछे अष्टभुजी मंदिर के रास्ते पर जंगल में प्राकृतिक झरने की शक्ल में त्रिकोणीय कुण्ड है । पास ही लगे हुए दो जल स्रोत भी हैं कुल मिलाकर ये तीनों को कलिका कुण्ड कहा जाता है।

अंतःपरिवेश में भी रोग नाशक तालाब 

मंदिर परिसर में एक पवित्र तालाब भी है। इसे ढक कर सुरक्षा की दृष्टि से एक कुएं की शक्ल दे दिया गया है, जहां श्रद्धालुओं को शुद्ध पानी पीने का अवसर मिलता है।जिसके बारे में माना जाता है कि उसमें उपचार करने की शक्ति है। ऐसा कहा जाता है कि पहले तालाब में डुबकी लगाने और जलपान से कई तरह की बीमारियाँ ठीक हो जाती थी अब जल पीने की ही व्यवस्था बन पाती है।

भैरव बाबा का मंदिर

काली खोह मंदिर के पीछे एक भैरव मंदिर स्थित है और यह मंदिर देशभर से तांत्रिकों को आकर्षित करता है। यह तांत्रिक पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह माँ काली खोह का एक प्रतिष्ठित मंदिर है। यहाँ बैठकर ध्यान करने की जगह है।यहाँ सहजता से ध्यान की अवस्था में जाया जा सकता है।

भैरव बाबा का हवन कुंड 

काली को हो हो में दर्शन करने वाले लोग इसी कुंड में अपना नारियल गोला और हवन सामग्री अग्नि में समर्पित करते हैं । यहां एक पंडित जी मंत्र पढ़कर उसे संपन्न कराते हैं और अपनी दान दक्षिना प्राप्त करते हैं । साथ ही यह भी कहा जाता है कि देश भर के ओझा-सोखा अपने अपने मरीजों को लाकर इस मंदिर के प्रांगण में स्थित हवन कुंड में अपने साथ लाए व्यक्ति के ऊपर घर किए हुए भूत प्रेत को अपने मंत्रों और पूजा पद्धति से व्यक्ति के ऊपर से उतार कर इसी हवन कुंड में भस्म कर स्थापित कर जाते हैं।

हनुमान मंदिर

कालिखोह से अष्टभुजी मंदिर को जाने वाली सीढ़ी नुमा रास्ते के बाएं तरफ एक छोटे सी संरचना में हनुमान जी का मंदिर है जहां एक पुजारी यजमान का नाम गोत्र पूछ कर संकल्प और दान दक्षिणा करवाते हैं।

आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा यह पावन तीर्थ स्थली

काली खोह मंदिर जहां आम नागरिक को काली सेवक आसानी से मां का दर्शन लाभ नहीं करने देता है। हर मंदिर के सामने एक सेवक व्यवस्था के लिए लगा रहता है जो एक परिवार को मंदिर के सामने दर्शन, पूजन, दान, दक्षिणा और पुजारी द्वारा प्रसाद लेने के लिए सहायता प्रदान करता है। यहां श्रद्धालु दूर से मां के स्वरूप का दर्शन कर आगे बढ़ने नहीं दिया जाता है  हर एक श्रद्धालुओं को पुजारी के माध्यम से दर्शन कराया जाता है। प्रवेश के समय गणेश जी की मूर्ति श्रद्धालु खुले रूप में  देख सकते हैं ।

       मंदिरों की श्रृंखला में पहले मंदिर में माता जी को सिंदूर चढ़ाया जाता है। पुजारी एक कपड़े में कुछ पैसे रखकर कुछ मंत्र उच्चारण कर श्रद्धालु को वापस करते हैं और मोटी रकम दक्षिना के रूप में मांगते हैं ।उनकी पोटली में 20, 50 या 100 के नोट होते हैं। जिससे श्रद्धालुओं को 501, 1100 या 2100 रुपए की डिमांड की जाती है । पोटली को शनिवार या मंगलवार को तिजोरी या मंदिर में रखने की सलाह दी जाती है । इस रकम को खर्च न करने की हिदायत भी दी जाती है। पुजारी अपने पास एक या एक से अधिक सहायक पुजारी भी रखते हैं जो यजमान से पैसा जमा करने का दबाव भी डालते हैं। पुजारी अपनी मुंह मांगी रकम से कम पैसे लेना पसंद नहीं करते हैं । कभी कभी पूरी रकम लौटा भी देते हैं। वे श्रद्धालु की आर्थिक स्थिति भांप कर पूरे परिसर में उससे ज्यादा से ज्यादा रुपया चढ़वाने का दबाव डलवाते हैं । 

     इससे आगे शिव जी का मंदिर शिव लिंग और शिव परिवार के चित्रांकन के साथ देखा जा सकता है जहां पर कोई पुजारी नहीं रहता और ना ही कोई दवाव ही डालता है। फिर आगे एक व्यक्ति द्वार पर रहता है और और एक-एक परिवार को अंदर घुसने देता है । उसे पूजा सामग्री लेकर चढ़वाता है और एक पोटली में फिर कुछ द्रव्य डालकर संकल्प कराकर श्रद्धालुओं को वापस कर देता है । उससे मोटी रकम 501 ,1100 या 2100 की मांग करता है कोई श्रद्धालु लाइन नहीं तोड़ सकता और हर मंदिर पर उसे इसी प्रकार पूजा दक्षिणा देना पड़ता है। इसमें ना तो उसकी रुचि देखी जाती ना ही उसकी आर्थिक स्थिति। श्रद्धालु मंदिर उसके बरामदे उसके आंगन में घूमते घूमते दान-दक्षिणा देते एक आंगन में पहुंचते हैं। जिसके छोर पर भैरव बाबा की गुफा है और वहां लोगों को बैठने के लिए भी प्रेरित किया जाता है। इस प्रकार इस प्रकार इतने उच्च स्तर का मंदिर होते हुए यह आम आम जनता की पहुंच से दूर होता जा रहा है और केवल संपन्न तथा भवबाधा से पीड़ित व्यक्ति ही सही रूप में इस देवी मां का दर्शन पूजन और आवाहन कर पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन को इस कुव्यवस्था को हटाने के लिए सार्थक कदम उठाना चाहिए।

         आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉट्सप नं.+919412300183)

Saturday, November 1, 2025

कान्यकुब्ज और सरयूपारीण ब्राह्मण (द्विवेदी ब्राह्मण इतिहास संख्या 12) ✍️आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी


कान्यकुब्ज ब्राह्मण का इतिहास 
यह एक बड़ा और प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है जिसका नाम कन्नौज से जुड़ा है। उत्तर भारत के कन्नौज और उसके आसपास के क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। ये ब्राह्मण केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा में भी अद्वितीय योगदान देने वाले विद्वान रहे हैं। उनकी विद्या का दायरा वेदों और उपनिषदों से लेकर धर्मशास्त्र, पुराण और संस्कृत साहित्य तक फैला हुआ है। उनके ज्ञान की गहराई और अभ्यास ने उन्हें समाज में सम्मान और उच्च प्रतिष्ठा दिलाई।
विद्या और शिक्षा में योगदान
कन्यकुब्ज ब्राह्मण विद्या के क्षेत्र में अत्यंत उत्कृष्ट रहे हैं। उनकी विद्या केवल शास्त्र तक सीमित नहीं, बल्कि उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाज में ज्ञान और नैतिक मूल्यों का प्रचार किया। वेद और उपनिषद: ये ब्राह्मण चारों वेदों में पारंगत हैं और इनका गहन अध्ययन करते हैं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में उनकी महारत अद्वितीय मानी जाती है।धर्मशास्त्र और पुराण: धार्मिक विधियों और पुराणों में उनकी जानकारी गहन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषणात्मक है। संस्कृत साहित्य में अनेक ग्रंथों का रचनात्मक और भाष्यात्मक योगदान समाज में उनका अमूल्य योगदान दर्शाता है। गुरुकुल परंपरा में कन्यकुब्ज ब्राह्मण शिक्षा की परंपरा में गुरुकुल प्रणाली के प्रमुख स्तंभ रहे, जहां छात्र शास्त्र, धर्म और जीवन मूल्यों का अध्ययन करते थे।     
       साहित्य में कान्यकुब्ज के निम्न नाम उपलब्ध हैं- 'कन्यापुर' (वराहपुराण), 'महोदय','कुशिक','कोश', 'गाधिपुर' 'कुसुमपुर' (युवानच्वांग) और 'कण्णकुज्ज' (पाली)भाषा में मिलता है। कन्यकुब्ज ब्राह्मणों की विद्या, धार्मिक परंपरा और सामाजिक योगदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। उनके ऐतिहासिक योगदान, साहित्यिक कार्य और धार्मिक ज्ञान ने न केवल हिन्दू समाज बल्कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।
        कान्यकुब्ज ब्राह्मण का इतिहास प्राचीन शहर कन्नौज से जुड़ा है, जिसे प्राचीन काल में 'कन्या- कुब्ज' कहा जाता था। पुराणों में कथा है कि पुरुरवा के कनिष्ठ पुत्र अमावसु ने कान्यकुब्ज राज्य की स्थापना की थी। कुशनाभ इन्हीं का वंशज था। इनकी उत्पत्ति की कहानी राजा कुशनाभ के सौ कुब्ज (कुबड़ी) कन्याओं से जुड़ी है, जिन्होंने वायुदेव के श्राप को अस्वीकार कर दिया था, और बाद में राजा ब्रह्मदत्त के स्पर्श से उनका श्राप दूर हुआ। यह वैदिक युग में एक महत्वपूर्ण शिक्षण और सांस्कृतिक केंद्र था। कन्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के लोग हिंदू धर्म के परंपरागत वैदिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वे वैदिक अनुष्ठानों, यज्ञों और मंत्रों के अध्ययन और आचार-विचार में विशेष स्थान रखते हैं। यह क्षेत्र कई समृद्ध राजवंशों का घर रहा, जैसे कि गुप्त, हर्षवर्धन और प्रतिहार आदि ,जो कन्नौज से शासित थे। ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण हर्षवर्धन जैसे साम्राज्यों के दौरान अपने उत्कर्ष पर थे और भारत के कई हिस्सों में फैल गए थे। 
सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण ‘कान्यकुब्ज’
ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण ‘कान्यकुब्ज’ माने जाते हैं। कान्यकुब्ज में दो शब्द हैं। 'कान्य' और 'कुब्ज' अर्थात् सौ कुबड़ी कन्याओं से जिनकी उत्पत्ती हुई, वे कान्यकुब्ज कहलाए। सुप्रसिद्ध आप्टे के विशाल कोष में भी लिखा है कि कन्नौज का नाम ‘कान्यकुब्ज’ है। प्रत्युत 'रामायण' के बालकाण्ड में इस विषय का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र साथ लेकर सिद्धाश्रम से लौटते हैं, तब कुश राजा के राज्य में पहुँचकर राम ने विश्वामित्र से पूछा - 

"भगवन्! कोन्वयं देशः? "

अर्थात् 'इस देश का क्या नाम है।' तब विश्वामित्र ने बताया कि "मेरा जन्म देश यही है और यह देश ब्राह्मणों की उत्पत्ति का केन्द्र है। ये सारे ब्राह्मण क्षत्रियों की सन्तान हैं।" इस प्रकार ‘वर्णसंकर’ का संकेत भी दे दिया था।

ब्रह्मयोनिर्महा नासीत् कुशोनाम महातपः।
अल्किष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जन प्रतिपूजकः॥

अर्थात् "कुश नाम का महातपस्वी राजा ‘ब्रह्मयोनि’ था। उसके वैदर्भी नाम की स्त्री से कुशाम्ब, कुशनाभ आदि चार पुत्र पैदा हुए। कुशाम्ब ने कौशाम्बी बसाया, जिसको आजकल ‘कोसम’ कहते हैं और कुशनाभ क्षत्रिय राजा ने घृताची नाम की स्त्री से सौ सुन्दर कन्याएँ पैदा कीं।

कुशनाभस्तु राजार्षिः कन्याशत मनुत्तमम्।
जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन॥

ये कन्याएँ वायु दोष से कुबड़ी हो गयीं। इन कुबड़ी सौ कन्याओं का विवाह चूली के पुत्र ब्रह्मदत्त से हुआ। ब्रह्मदत्त ब्राह्मण था। उसके स्पर्श मात्र से सभी कन्याओं का कुबड़ापन दूर हो गया।

स्पृष्ट मात्रे तदा पाणौ 
विकुब्जाः विगत ज्वराः।
युक्तं परमया लक्ष्म्या 
बभौ कन्याशतं तदा॥

कान्यकुब्ज ब्राह्मण एक अंतर्विवाही ब्राह्मण समुदाय है,जो मुख्य रूप से उत्तरी भारत में पाया जाता है। उन्हें विंध्य के उत्तर के मूल निवासी पंच गौड़ा ब्राह्मण समुदायों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का गोत्र और विस्तार 
कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के अधिकतम 26 गोत्र है ,परन्तु 19 गोत्र के कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के गोत्र है –
1-कात्यायन
2-शांडिल्य
3-भार्गव 
4- वत्स 
5-भरद्वाज
6-भारद्वाज –( भरद्वाज ऋषि के शिष्य का नाम भारद्वाज था। )
7- कश्यप 
8-काश्यप  
9-कश्यपा
10-कौशिक 
11- गौतम
12- गर्ग 
13-धनञ्जय
14-कविस्तु
15-उपमन्यु
16-वशिष्ठ
17 -संकृत
18-परासर
19- सावर्ण 
      कान्यकुब्ज ब्राह्मण निमनलिखित उपनामो का प्रयोग करते हैं 1) उपाध्याय 2) अग्निहोत्री 3) बाजपेयी 4) दीक्षित 5) शुक्ल 6) त्रिवेदी 7) अवस्थी 8) पाठक 9) तिवारी 10) त्रिपाठी 11) दुबे (द्विवेदी) 12) चौबे (चतुर्वेदी) 13) मिश्रा 14) पांडे 15) पांडेय
     समय के साथ, कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने कन्नौज और अवध क्षेत्र से बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और महाराष्ट्र जैसे अन्य क्षेत्रों में प्रवास किया। औपनिवेशिक काल के दौरान, कई कान्यकुब्ज ब्राह्मण बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, और छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्रों में जमींदार बने, जैसा कि पीलीभीत और हरदोई में देखा गया। अपने उत्कर्ष काल में कान्यकुब्ज जनपद की सीमाएँ कितनी विस्तृत थीं, इसका अनुमान स्कन्दपुराण से और प्रबंध चिंतामणि के उस उल्लेख से होता है जिसमें इस प्रदेश के अंतर्गत छत्तीस लाख गाँव बताए गए हैं। शायद इसी काल में कान्यकुब्ज के कुलीन ब्राह्मणों की कई जातियाँ बंगाल में जाकर बसी थीं। आज के संभ्रांत बंगाली इन्हीं जातियों के वंशज बताए जाते हैं।
कान्यकुब्ज से अलग हुआ
सरयूपारीण ब्राह्मण
यह कान्यकुब्ज समुदाय की ही एक शाखा है। इनके अलग होने का कारण एक पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार श्रीराम द्वारा रावण वध के बाद श्री राम जी को ब्रह्म हत्या का पाप लगा और प्रायश्चित स्वरूप जी यज्ञ करना चाहिए तो कुछ ब्राह्मणों ने सीधे मना न करने के बावजूद सरजू स्नान के बहाने सरयू के दूसरे तट पर आ गए और वहीं बस गई इस प्रकार वे सरजू पारी ब्राह्मण हो गए। जब उन्होंने ब्राह्मणों से यज्ञ करवाया तो कुछ ब्राह्मण स्नान के बहाने सरयू नदी पार कर दूसरी ओर चले गए और उन्होंने यज्ञ में भाग नहीं लिया।ऋषियों और ब्राह्मणों ने राम को ब्रह्म हत्या का दोषी माना पर इससे ज्यादा पाप और ब्राह्मणों की हत्या रावण ने कराया था लेकिन उसके बारे में किसी ऋषि ने कोई टिप्पणी नहीं की।राक्षस राज रावण ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद , अन्य ऋषि मुनियों और वेदपति ब्राह्मणों को खास तौर पर मरवाया करता था , कभी किसी ब्राह्मण ने उसे प्रायश्चित करने नहीं कहा न उसे कभी ब्रह्म हत्या का पाप ही लगा।
    कान्यकुब्ज मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं। सरयूपारीण ब्राह्मण, कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की ही एक शाखा हैं, जिनका नामकरण सरयू नदी पार के निवास के कारण हुआ है। सरयूपारीण मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीस गढ़ और झारखंड जैसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं। सरयूपारीण ब्राह्मण, कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की ही एक शाखा हैं, जिनका नामकरण सरयू नदी पार के निवास के कारण हुआ है। 
सरयूपारीण या सरवरिया ब्राह्मण 
सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयुपार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। इसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।