Showing posts with label कृषि जगत. Show all posts
Showing posts with label कृषि जगत. Show all posts

Monday, November 22, 2021

कृषि कानून की वापसी कई नए सवाल भी डा. राधे श्याम द्विवेदी

 
      गुरुनानक जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की है।देश के नाम संबोधन में पीएम मोदी ने किसानों से अब घर लौटने की अपील की और कहा कि इस कानून को खत्म करने प्रक्रिया शीतकालीन सत्र में शुरू हो जाएगी। पीएम मोदी ने कहा कि हमारी तपस्या में ही कमी रही होगी, जिसकी वजह से हम कुछ किसानों को नहीं समझा पाए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा 'पांच दशक के अपने सार्वजनिक जीवन में मैंने किसानों की मुश्किलों, चुनौतियों को बहुत करीब से अनुभव किया है।'

            कृषि कानूनों के संदर्भ में पीएम मोदी ने कहा कि बरसों से ये मांग देश के किसान, देश के कृषि विशेषज्ञ, देश के किसान संगठन लगातार कर रहे थे। पहले भी कई सरकारों ने इस पर मंथन किया था। इस बार भी संसद में चर्चा हुई, मंथन हुआ और ये कानून लाए गए। किसानों की स्थिति को सुधारने के इसी महाअभियान में देश में तीन कृषि कानून लाए गए थे। मकसद ये था कि देश के किसानों को, खासकर छोटे किसानों को, और ताकत मिले, उन्हें अपनी उपज की सही कीमत और उपज बेचने के लिए ज्यादा से ज्यादा विकल्प मिले। लेकिन इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए। कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि कानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास किया।   

               उन्होंने आगे कहा कि हमारी सरकार, किसानों के कल्याण के लिए, खासकर छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गांव गरीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्य निष्ठा से, किसानों के प्रति समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये कानून लेकर आई थी। आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूं कि हमने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि कानूनों को खत्म करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे।

           पीएम मोदी ने कहा कि एमएसपी को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए, ऐसे सभी विषयों पर, भविष्य को ध्यान में रखते हुए, निर्णय लेने के लिए, एक कमेटी का गठन किया जाएगा। इस कमेटी में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि होंगे, किसान होंगे, कृषि वैज्ञानिक होंगे, कृषि अर्थशास्त्री होंगे। उन्होंने कहा कि आज ही सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़ा एक और अहम फैसला लिया है। जीरो बजट खेती यानि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए, देश की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर क्रॉप पैटर्न को वैज्ञानिक तरीके से बदलने के लिए।
          तीनों कृषि कानून वापसी के पीएम नरेंद्र मोदी के फैसले के बाद किसानों ने टीकरी और सिंघु बॉर्डर पर जश्न मनाया। किसानों ने कहा कि गुरुपर्व पर यह उनके संघर्ष की जीत है। किसान संगठनों ने आंदोलन वापस होने पर कुंडली बॉर्डर पर लड्डू बांटे।
         भाकियू नेता शमशेर सिंह दहिया ने कहा कि यह किसानों की बहुत बड़ी जीत है। इसमें संयुक्त मोर्चे को बहुत बहुत बधाई है। एक साल बाद देर आए दुरुस्त आए प्रधानमंत्री ने आखिरकार किसानों की मांगें मान ली है, क्योंकि यह एक सच्ची लड़ाई थी।
नए उठते कुछ सवाल :-
1. जनाकांक्षाओं का नाम दे दबाव बनाया गया:-
    यह शुभ संकेत नहीं कि संसद से पारित कानून सड़क पर उतरे लोगों की जिद से वापस होने जा रहे हैं। यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भविष्य में ऐसा न हो, अन्यथा उन तत्वों का दुस्साहस ही बढ़ेगा, जो मनमानी मांगें लेकर सड़क पर आ जाते हैं। तुष्टिकरण और उन्माद हटे। अगर भारत माता के शरीर पर इतना बड़ा घाव करके भी हम कुछ नहीं सीख पाये, तो यह हम सबका दुर्भाग्य ही होगा। लोकतंत्र में लोगों की इच्छाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जोर-जबरदस्ती को जनाकांक्षाओं का नाम दे दिया जाए। यह बिल्कुल ठीक नहीं कि किसानों और खासकर छोटे किसानों का भला करने वाले कृषि कानून सस्ती राजनीति की भेंट चढ़ गए। इन कानूनों की वापसी आम किसानों की जीत नहीं, एक तरह से उनकी हार ही है, क्योंकि वे जहां जिस मुकाम जिस हाल में थे,आज भी वहीं खड़े दिखने लगे हैं।
2. किसान आन्दोलन सिर्फ विरोध के लिए खड़ा किया गया :-
    कृषिआन्दोलन को करीब से देखने और उसका विश्लेषण करने वाले बताते हैं कि यह किसान आन्दोलन सिर्फ सरकार के विरोध के लिए खड़ा किया गया था, जिसके लिए फंडिंग विदेशों से भी आती थी। पूरे आन्दोलन के दौरान कई बार देश में अस्थिरता लाने के कई प्रयास भी हुए, कुछ में आन्दोलनकारी सफल हुए तो कुछ में विफल। चाहे वो इस साल की शुरूआत में लाल किले में खालिस्तानी झंडा फहराने में कामयाब हुए तथाकथित किसानों का मामला हो, या फिर देश में टूलकिट के माध्यम से एक विशेष जंग छेड़ने की तैयारी। कई उतार-चढ़ाव आये पर किसान आन्दोलन पनपता रहा। और इसी की आड़ में सुलगती रही विपक्षी दलों की राजनीति की आग। अंततः इनका एक मकसद कनून वापसी से पूरा हो गया।अब वे अपने विरोध के नए नए प्रतिमान खोज लेंगे।
3.संविधान व राष्ट्र के संघीय ढांचे के विपरीत:-
     इस मामले को इतना समय देना और कुछ अलग तरह के किसानों के दबाव में आने के कारण ये निर्णय लेना पड़ा लगता है। कई राज्यों के चुनाव में भी यह फैक्टर प्रभाव कारी रहा। लगता है भाजपा उत्तर प्रदेश और पंजाब आदि पांच राज्यों के आसन्न चुनाव में डैमेज कंट्रोल बचाने के लिए यह निर्णय लेना पड़ा। सरकार पर आगे और तरह के दबाव भी आ सकते हैं। सीएए और यूएपीए का विरोध, संविधान बचाओ देश बचाओ और भी तरह तरह के नारे देकर विपक्ष अपनी जमीन बचाने में लगा है। टिकैत , जयंत सिंह, ममता,शरद पवार तथा शिवसेना आदि जिन्हें खोने के लिए कुछ भी नहीं है।इसलिए यह प्रयोग देश संविधान और राष्ट्र के संघीय ढांचे के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता है। इस कानून की वापसी से भारतीय गणतंत्र, भारतीय संविधान और उन असंख्य जनता का अपमान हुवा है जिन्होंने भारी बहुमत से सरकार को अपना जनमत दिया था। जहां पूरी बहस और वैधानिक प्रक्रिया के ज़रिए कानून बना था।जिसे अक्षम विपक्ष ने काले कानून की संज्ञा देकर खुद का वजूद मिटा दिया है। अब संसद में सारे घटना क्रम की सफाई देकर विशेषज्ञों की राय से नया कानून निर्मित किया जा सकता है जिसमें टुकड़े टुकड़े गैंग,बार्डर सील करने और लाल किले पर देश का अपमान करने वाले तत्व को दूर रखना होगा।

             











Saturday, November 6, 2021

किसानों की अनदेखी और लुभावनी घोषणाए डा. राधे श्याम द्विवेदी

हाल ही में तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा की पराजय का एक बड़ा कारण सरकार द्वारा किसानों की अनदेखी को भी माना गया है। किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है। आलू गोभी टमाटरऔर प्याज़ जैसी फसलों की लागत तक न निकल पाने के कारण किसानों ने अपनी फसल खेतों में ही नष्ट करते देखे गए हैं।अन्य कृषि उपजों का भी किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाताहै। कहीं कहीं खाद की किल्लत भी देखी गई।
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इस समस्या का हल क्या है?सरकार के इतने प्रयासों के बाद भी कहाँ कमी रह गई है?  अल्पकालिक समाधान के बजाय दीर्घकालिक समाधान कौन से हो सकते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले कृषि क्षेत्र की बेहतरी के उपाय किये जा सकें?
कृषि जगत की समस्याएं:-
किसानों की समस्याएँ अनेक हैं जो कोई नई नहीं हैं; लेकिन उनके समाधान की ईमानदार कोशिशें होती कभी नज़र नहीं आ रही है। किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें भी पिछले कई वर्षों से चर्चा में रहा हैं।
ईमानदार समाधान की ज़रूरत:-
किसानों की समस्याओं के निदान के लिए तीन ऐसे सुधार हैं, जिन पर अविलंब अमल करते हुए किसानों की दुखती रग पर मरहम रखा जा सकता है:-
1.देशभर में किसानों के असंतोष का सबसे बड़ा कारण उनकी उपज का सही मूल्य न मिलना रहा है।अधिकतम न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तविक किसान को दिलाया जाए।
2.कर्ज़ माफी चरणबद्ध रूप में हो।
3.प्रत्यक्ष आय और निवेश की सहायता दी जाए।
कृषि जगत के सुधार:-
सच कहा जाए तो किसानों की समस्याओं को कम करने का रामबाण नुस्खा कृषि बाज़ारों के आमूलचूल सुधारों में छिपा है। जैसे- यमएसपी सिस्टम को मज़बूत बनाकर इसका दायरा बढ़ाया जाए। कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) का मकड़जाल तोड़ लिया जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम,1955 में सुधार किया जाए।Negotiable Warehouse Receipt प्रणाली को सुधारा जाए।किसानों के उत्पादों को बाज़ारों तक पहुँचाने के लिये सप्लाई चेन बनाया जाय।ज़मीनों से जुड़े तथा चकबंदी आदि कानूनों को सरल बनाया जाय।कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाए। कृषि-निर्यात बढ़ाने के लिये अनुकूल माहौल बनाया जाए। फूड प्रोसेसिंग की सुविधाओं का विकास किया जाए। उपभोक्ताओं और बाज़ार के बीच बेहतर संपर्क बनाया जाए।
संरचनात्मक सुधारों की ज़रूरत:-
देखा यह गया है कि समय बीतने के साथ किसानों की हालत सुधरने के बजाय और खराब होती चली गई है। किसानों को संतुष्ट करने के लिये देश के नीति-निर्धारक समय-समय पर जो उपाय करते हैं, वे तात्कालिक राहत पहुँचाने वाले होते हैं। इन उपायों के तहत किसानों को लुभाने वाले कदम उठाए जाते हैं, जबकि ज़रूरत ऐसे संरचनात्मक उपायों की है जो दीर्घकालिक हों और किसानों की समस्या को स्थायी तौर पर हल कर सकें।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन मुफ्त राशन बांटना :-
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत अंत्योदय तथा पात्र गृहस्थी के लाभार्थियों को मुफ्त राशन का वितरण शुरू हुआ है। कोरोना महामारी के मद्देनजर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह निर्णय केअनुसार अंत्योदय कार्ड धारकों को प्रति कार्ड 35 किलो खाद्यान्न (20 किलो गेहूं व 15 किलो चावल) का वितरण किया जा रहा है। यह इस योजना का पहला चरण है जिसमें पात्र गृहस्थी कार्ड धारकों को प्रति यूनिट 5 किलो अनाज (3 किलो गेहूं व 2 किलो चावल) वितरित किया जा रहा है। सामान्य कार्ड धारक को गेहूं का वितरण मूल्य 2 रुपए प्रति किलो तथा चावल का 3 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित किया गया है।  प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तीसरे चरण में निशुल्क खाद्यान्न का वितरण 5 किग्रा प्रति यूनिट के अनुसार हो रहा है ।अंत्योदय कार्डधारकों को अब होली तक फ्री राशन मिलेगा। इसमें 35 किलो चावल, गेहूं के साथ-साथ दाल, तेल और नमक भी दिया जाएगा। वैसे तो मुफ्त राशन की सुविधा नवंबर में समाप्त हो रही थी पर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी ने इस सुविधा को चार माह और बढ़ा दिया है।
यू पी चुनाव भी है :-
यूपी विधानसभा चुनाव 2022 अगले वर्ष होने जा रहा हैं। और यूपी की जनता को दिवाली पर तोहफे ही तोहफे मिल रहे हैं। यूपी सरकार ने पेट्रोल डीजल के उत्पाद शुल्क में कमी और फिर मुफ्त राशन की योजना को चार माह और बढ़ाने का ऐलान किया है।
15 करोड़ गरीब होंगे लाभान्वित :-
सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना की विभीषिका के बीच दो बार देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन दिया। सूबे के 15 करोड़ गरीब भी इससे लाभान्वित हुए, लेकिन यह योजना नवंबर में समाप्त हो रही है, जबकि कोरोना अभी समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में रामराज्य अभिषेक में हम कैसे गरीबों को खाली हाथ जाने दें। ऐलान किया कि होली तक यानि दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च 2022 तक अब अंत्योदय कार्ड धारक को 35 किलो गेहूं और चावल तो मुफ्त मिलेगा ही, साथ में दाल, खाद्य तेल और नमक भी देगें। यही नहीं इस बार हर माह चीनी भी मुफ्त देंगे।
पात्र गृहस्थी कार्डधारक को मिलेंगे कई और सामान :- योगी आदित्यनाथ ने कहा कि, इसके अलावा पात्र गृहस्थी कार्डधारक को भी प्रति व्यक्ति पांच किलो ग्राम गेहूं, चावल के साथ एक किग्रा अरहर की दाल, एक लीटर खाद्य तेल, एक किग्रा नमक और एक किग्रा चीनी मुफ्त में देगें। पहले केवल गेहूं, चावल तक ही यह योजना सीमित थी। उत्तर प्रदेश राज्य सरकार इसमें 1 किलो दाल, 1 लीटर तेल और नमक का एक पैकेट जोड़ेगा।
आम किसानों को उसकी फसलों का वाजिब मुल्य ना मिलने का
एक कारण ये भी है। उत्तर प्रदेश सरकार चुनाव को देखते हुए आम जनता में अपनी पैठ बनाने के लिए मुफ्त राशन के नियमों में बदलाव किया है।  वर्षों से बंद पड़ा चीनी भी अंत्योदय कार्ड धारकों को दिया जाएगा।

                     डा. राधे श्याम द्विवेदी