Saturday, November 20, 2021

शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों की उत्पति कथा : डा. राधे श्याम द्विवेदी

जिसकी अनेक स्रोतों से पुष्टि निम्न प्रकार से हुई है:-
1. विश्वकर्मा द्वारा सूर्यदेव को तराश कर शाकद्वीप ब्राह्मण की उत्पत्ति कथा :-
सूर्य देव अपना तेज छंटवाने के लिए विश्वकर्मा के पास गये थे। विश्वकर्मा ने उसी समय उनका रूप बारह भागों में विमल करके उन्हें तरासा गया यथा- 1. आदित्य, 2. दिवाकर, 3. भास्कर, 4. प्रभाकर, 5. सहस्त्रांशु, 6. त्रिलोचन, 7. हरिदश्व, 8. रवि, 9. दिनकर, 10. द्वादशात्मक, 11. त्रिमूर्ति, 12. विष्णु नाम से उपरोक्त बारह रूप बनाये, तब तेज राशि से उत्पन्न जो भणिका चूर्ण निकला था उसे अमोघ वीर्य जानकर वायुमण्डल में फैंक दिया और महान शक्तिशाली वायु उसको बहुत समय तक ग्रहण किये हुए था। कुछ समय पश्चात सूर्यदेव की इच्छा से क्षीरसागर के आगे छठे द्वीप में पृथ्वी पर गिर पड़ा। सूर्य के तेज की राशि से उस समय अठारह भाग होकर शाकद्वीपीय ब्राह्मण हुए। वे सूर्य के समान तेजस्वी, ब्रह्मविद्या के ज्ञाता एवं निर्गुण ब्रह्म के नित्य उपासक देवताओं के समान तपस्वी थे। वे वेद मंत्रों से निर्गुण परम पुरुष की स्तुति करने लगे। तब सूर्य मण्डल में स्थित गायत्री देवी उनकी साङ्गोपांग क्रम बद्ध स्तुति को सुनकर शाकद्वीप में गयी। देवी ने कहा मैं प्रसन्न हूँ। आप मेरे प्रेम पात्र है, आप सदा उत्तम कार्य करेंगे। निर्गुण रूप को भजिये और अद्भुत सुख को भोगिये। मेरे अंश से उत्पन्न इन शक्तियों को सुख पूर्वक ग्रहण कीजिये। आप इन्हीं शक्तियों (स्त्रियों) से सपत्नीक होंगे। इस प्रकार वेद की माता गायत्री की कृपा से ब्राह्मण सपत्नीक हो गये। नित्य ब्रह्मविद्या के जानने वाले वे ब्राह्मण उन मंत्रों के प्रभाव से सूर्य के समान तेजस्वी हुए और शाकद्वीप में होने से शाकद्वीपीय कहलाये। 
2. प्रियव्रत राजा के बेटों के सूर्य मंदिर की प्रतिष्ठा हेतु
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की उत्पन्न कथा : - 
प्रियव्रत राजा ने पृथ्वी में सात भाग करके अपने सात बेटो को राजा बनाया। जम्बूद्वीप बड़े बेटे न्युग्रोध को दिया तथा शाकद्वीप को अपने छोटे बेटे महामति (मेघातियि) को। महामति अपने भ्रातृ प्रेम के कारण जम्बुद्वीप आते-जाते थे। महामति ने विमान के समान सूर्य मन्दिर बनाया एवं सुवर्ण की प्रतिमा बनवायी। उस मन्दिर एवं मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के योग्य पुरुष नहीं दिखे तो चिंता करते करते सूर्य भगवान की शरणागति ली। भक्त को चिंतित देखकर सूर्य भगवान ने प्रत्यक्ष दर्शन दिये एवं पूछा कि किस चिन्ता से व्याकुल हो रहे हो शीघ्र हमें कहो, ताकि तुम्हारा दुष्कर कार्य सिद्ध करें। तब राजा ने कहा कि मैंने आपका मन्दिर बनवाया सुवर्ण की सुन्दर प्रतिमा बनवाई लेकिन इस द्वीप में ब्राह्मण तो हैं ही नहीं, इस कारण प्रतिष्ठा कौन करायेगा, इस कारण चिन्ता हो रही है। सूर्य भगवान ने चिंतन किया कि तीन वर्ण है वे प्रतिष्ठा नहीं करा सकते और हमारे पूजन के अधिकारी भी नहीं हैं। यह विचार करते ही श्वेत वर्ण के आठ पुरुष वेद पढ़ते हुए सूर्य देव के शरीर से निकले। वे कष्ठाय वस्त्र धारण किये हुए, हाथ में कमल पुष्प एवं करडं धारण किये हुए थे। उन्होने कहा कि पिता हम आपके पुत्र है हमारे लिए क्या आज्ञा है ? 
सूर्य देव ने कहा पुत्रों इस राजा के वचन को करो तथा राजा से कहा ये मेरे पुत्र मन्दिर की प्रतिष्ठा करा देंगे। प्रतिष्ठा के बाद मन्दिर इनको अर्पण कर देना।
3.शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में प्रथम आगमनकी कथा:-
स्कन्ध पुराण की कथा केअनुसार शाकद्वीपवासी सूर्य नारायण को परब्रह्म स्वरूप में मानते थे पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन्द्रादि उनके लिए नगण्य नहीं थे। स्कन्ध पुराण के प्रयास खण्ड में एक बड़े महत्व का प्रसंग आता है। प्रभास (सोमनाथ) चन्द्रशेखर (शिवजी) का मुख्यगढ़ है। बात उस समय की है जब ब्रह्माजी की आयु ८ वर्ष की थी (अभी ब्रह्माजी की आयु ५१ वर्ष हो चुकी है) (ब्रह्माजी का १ दिन ४३,२०,००० वर्ष इतने ही वर्षों की १ रात्री होती है) उस समय ब्रह्माजी ने प्रभास क्षेत्र में यज्ञ किया था। उस यज्ञ में एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण के पधारने का उल्लेख है। उस शाकद्वीपीय ब्राह्मण को समस्त ऋषि मुनियों ने एवं इन्द्रादि देवताओं ने भी श्रेष्ठतम पण्डित स्वीकार किया एवं उसे दान आदि लेने के लिए कहा। उस शाकद्वीपीय ब्राह्मण ने कहा मैं भिक्षुक ब्राह्मण नहीं हूँ, जो दान आदि लेने आये हैं उन्हें दान आदि दीजिये। मैं शाकद्वीपीय ब्राह्मण हूं । मुझे वरदान देने हैं तो यह दीजिये कि इस जन्म में इसी समय मुझे देवत्व प्राप्त हो जाय कि मैं यज्ञ के भागीदारों में गिना जाऊ। भगवान शंकर ने यह निर्णय दिया कि आज से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण देवता होता है, इसको विष्णु के साथ-साथ विश्वदेवा नाम से यज्ञ में भाग दिया जाता रहेगा।
4.शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को जम्बूद्वीप में द्वितीय आगमन :
 दशरथ के पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने हेतु
24वें त्रेतायुग में (वर्तमान में 28वां त्रेतायुग बीत चुका है, 28वां कलयुग चल रहा है) वशिष्ठजी के कहने पर पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने हेतु महाराज दशरथ स्वयं जाकर शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को लेकर आये थे। श्री दिव्यद्वीप श्री शाकद्वीपीय से,विप्रो को बुलवाया गया था।
5.शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों का तृतीय आगमन
 एवं भारत खण्ड में बसना - 
साम्ब पुराण एवं भविष्य पुराण में इसकी विस्तृत कथा आई हुई है। संक्षेप में शाप वश साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया, उनकी अस्थियां ही शेष बची थी अर्थात शरीर लगभग गल गया, तब नारद जी का आगमन हुआ उन्होंने सूर्य भगवान की आराधना उपदेश दिया। साम्ब ने तीन वर्ष तक मित्रवन में भगवान सूर्य की आराधना की। सूर्य भगवान प्रसन्न हुए एवं उन्होंने कुष्ठ रोग से मुक्ति देकर अनन्य भक्ति का वरदान दिया। पूजा आराधना करते समय साम्ब ने चन्द्र भागा नदी में आती हुई एक सुन्दर मूर्ति देखी। उसने मूर्ति को रख लिया एवं सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया। मूर्ति की प्रतिष्ठा हेतु गुरु गौरमुख के पास गये। गौरमुख ने कहा कि भगवान सूर्य नारायण की पूजा शाकद्वीपीय ब्राह्मण ही कर सकते है। साम्ब अपने पिता श्री कृष्ण के पास गये एवं उनकी आज्ञा से गरुड़ पर सवार हो शीघ्र शाकद्वीप पहुँच गये। उन्होंने वहा अति तेजस्वी महात्मा मगों को सूर्य भगवान की आराधना करते देखा। साम्ब बोला आप लोग धन्य है, आप सबका दर्शन सबके लिए कल्याण कारी है। मैं भगवान सूर्य की पूजा हेतु आपको लेने आया हँू। साम्ब की विनती सुनकर १८ कुलों के मग ब्राह्मण सपरिवार गरुडज़ी पर बैठकर मूल स्थान आये। उन्होंने भगवान सूर्य नारायण की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की साम्ब ने वह मन्दिर एवं साम्बपुर उन ब्राह्मणों को समर्पित कर दिया। कुछ शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को उन्होंने  द्वारिका बुलवा लिया था। कुछ समय बाद वे शाकद्वीपीय ब्राह्मण वापस शाकद्वीप जाने का कहने लगे तो उन्हें रोक लिया गया।
और वे 30 वर्ष रुक गये । जब विप्रो ने वापस जाने का संदेश श्री कृष्ण को भिजवाया तो वे बहुत विफल हो गये। अनन्त: उन्होंने गरुड़ को बुलाकर कहा कि ऐसा यत्न करो कि ये मग (शाकद्वीपीय ब्राह्मण) भारत में ही रह जाये। गरुड़ जी ने ब्राह्मणों से कहा है द्विजोतम मैं आपको लेकर शाकद्वीप जाने के लिए आ गया हँू। मेरी एक शर्त है कि मैं आपके कहने पर रुक जाऊंगा, तब फिर आगे नहीं जाऊंगा। तब मग ब्राह्मणों ने तथास्तु कह दिया। गरुडज़ी ब्राह्मणों को लेकर जा रहे थे। मगध देश में उन्हें रूदन सुनाई दिया, तो उन्होंने देखा राजा मरणासन है एवं प्रजा भी मरने के लिए उद्यम थी। मग ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की पूजा अर्चना करके घृष्टकेतु को चरणामृत पान कराया एवं उपचार किया राजा घृष्टकेतु मग ब्राह्मणों के उपचार से ठीक हो गये। राजा ने उन सबका सम्मान किया वहीं 72 पुरों में बसा दिया। इस तरह शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण भारतवासी हो गये। जो मग ब्राह्मण साम्बपुर में रहगये थे उनके वंश वृद्धि के बाद कुछ परिवार जैसलमेर, बाड़मेर, और औसियाँ में बस गये (सम्वत 162) फिर औसियां से कुछ बीकानेर की तरफ आगे बढ़े व कुछ रूण नगरी की तरफ बढ़े (संवत लगभग 756) रुण से जारोड़ा-मेड़ता रोड में बसे (संवत 1013) धीरे-धीरे सम्पूर्ण राजस्थान में प्रसार हुआ। जो मग (शाकद्वीपीय ब्राह्मण मगध, बिहार में बसे) वहां से उत्तर प्रदेश होते हुए उत्तरी एवं पूर्वी भारत में फैल गये।
6th मत : साम्ब द्वारा शाकद्वीपीयों का आगमन :- 
महाभारत के युद्ध से लगभग 1 से 1½ वर्ष पहले हुआ। श्रीकृष्ण भगवान ने गीता में कहा है कि स्वधर्म ही श्रेष्ठ है, दूसरा धर्म नहीं। तब उन्होंने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को क्यों बुलाया? वे जानते थे कि शक द्रविड़ भील कौल आदि अन्य लोगों का प्रभुत्व हो गया। है चारों और अराजकता फैली गयी है। स्वधर्म का लोप हो गया है। उन्होंने यह कहा है कि समय-समय पर धर्मचक्र लोप हो जाता है अतएव उसकी पुन: स्थापना हेतु ही शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों को बुलाया। वे वेद विज्ञ, वे दांग पुराणों एवं धर्म शास्त्र के ज्ञाता, वाचा सिद्ध एवं वायुगमनी, सिद्धपुरुष थे। भेषज विद्या एवं ज्योतिष विद्या के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्होंने कहा कि सूर्यों में विष्णु में ही हूं।
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के भेद :-
जगत की आदि संस्कृति के प्रवर्तक, परम देवज्ञ, वर्णाश्रम सनातन सभ्यता के आदि जनक-मग, भोजक, ऋतव्रत, यज्वन, मृग ब्रह्मचारी, सूर्यद्वीज, सूर्य ब्राह्मण दिव्य, साध्य आदि शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के गुणवाची नाम कर्म व ज्ञान भेद से है।
 हमे हमारे महान व्यक्तित्व के धनी महापुरुषों की जीवनियां पढ़कर उनके उपदेशों को धारण कर लाभ उठाना चाहिये। हमारे पथ प्रदर्शक महर्षि याज्ञवल्क्य, वराहमिहिर, सुश्रुत, कविमाघ, कविवृन्द, कवि मंछ, मंगल पाण्डे, 21वीं सदी के जानकी वल्लभजी शास्त्री, बलभद्रजी, अजीत जी निरजंन देव सूरिजी, रामनारायणजी जयचन्द्रजी, उगमराजजी खिलाड़ी, डॉ. मेघराजजी, डॉ. मुनीलालजी, रतनलालजी शास्त्री आदि के अलावा भी अनेकों शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने अपने अपने क्षेत्र में हमे दिशा प्रदान की है। उसको हमें निस्वार्थ भाव से ग्रहण करके समाज को प्रगति पथ पर आगे बढ़ाना है। 




बालसोम गौतम को पांचवी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि संकलन डा.राधे श्याम द्विवेदी

स्मृति शेष बाल सोम जी का परिचय:-
नाम-श्री झूरी सिंह उर्फ बालसोम गौतम
जन्म स्थान ग्राम-खुटहना, तहसील-सदर, जनपद-बस्ती(उप्र)
बालसोम गौतम का जन्म 18 जुलाई1928 कप्तानगंज थाना क्षेत्र के खुटहना गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। वह मथुरा सिंह के इकलौते पुत्र थे। इंटर तक की पढ़ाई किए गौतम ने गोंडा जनपद के विशेषरगंज गन्ना पर्यवेक्षक की नौकरी के साथ साहित्य सृजन का कार्य शुरू किया। बाल सोम गौतम ने मौलिक, श्रीकबीर, पत्रिका सम्पादन, सौगात, तरूमलकाव्य. साहित्य का लेखन किया। जिसके लिए 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सम्मानित किया था। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश सरकार के सिचाई मंत्री धनराज यादव, 2004 में साहित्य एकादमी, 2006 कादम्बरी कल्प द्वारा, 2010 में राज्यपाल द्वारा, 2014 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व 2015 में पुन;साहित्य एकादमी द्वारा सम्मानित किया गया। बालसोम जी की मृत्यु दिनाँक-२०-११-२०१६ को सदर अस्पताल, जनपद-बस्ती(उप्र) में हुई थी।
अन्तिम निवास स्थान-सरस्वती सदन, टिनिच कस्बा, जनपद-बस्ती(उप्र) अंतिम सांस गौर क्षेत्र के साड़ी कल्प गांव में ली। वह 88 वर्ष के थे। उन्होनें अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार कुआनो नदी के वाराह क्षेत्र घाट पर हुआ। मुखाग्नि बडे बेटे सिद्धार्थ ने दी थी।
स्वकथन :-
बालसोम जी ने अपने विषय में लिखा था *ज्ञान के विज्ञान के अथवा कला के क्षेत्र में, हूँ नही कुछ खास अपने विषय में क्या कहूं । हूँ नही लिक्खाड़ कोई या पढ़ाकू बीर ही, स्वल्प शिक्षा प्राप्त लघुमति व्यक्ति अति सामान्य हूँ ।*
बालसोम जी की वर्ष१९७३ में प्रकाशित काव्य संकलन *स्वगत*में श्री हरिशंकर मिश्र, प्रवक्ता-खैर इंटर कालेज, बस्ती ने *बालसोम कौन?* शीर्षक से लिखा-उनिद्र मस्तिक का जागृति बोध छिपाये, मन की तलहटी में निरन्तर गुनगुनाता, भीड़ में घुस कर भी अकेला आत्मलीन; जरा -सा छेड़ने पर निहायत ही वाचाल, अद्यतन कबीर का नन्हा-सा आपरिचित बेलाग संस्करण; ऊपर से शालीनता की सीमा तक दब्बू दिखाई देने वाला, निर्भीकता के बिंदु तक दबंग; कभी छुई-मुई-सा-संवेदनशील, कभी चट्टान -सा निर्मम ।
प्रचीन कालदण्ड पर नवीन के तार बाँधकर जो *स्वगत*बोल रहा है--वह है कवि बालसोम । जो शास्त्र थहाने वाला पंडित नहीं, पंडितो द्वारा चर्चित कवि पुंगव नही, एक़ साधारण-सा असाधारण व्यक्ति है; जिसका पानी भवानी का वरदान है। जिसका काम है शब्दों की जिह्वा पर नये अर्थ धरना, पुरानी दिप-शिखा को नये आलोक से मंडित करना ।
दूर अनाकांक्षी होते हुए कवि कीर्ति का अधिकारी, अपनी परायी सबकी पीड़ा का गायक पपीहा-सा यह व्यक्ति बस्ती के जीवन-वन में पिछले बीस वर्षों से देखा सुना जा रहा है ।युवा कवियों को सुझाव देत हुये सोम जी ने निम्न*गजल*की रचना की थी
सीधा सदा सच्चा लिख ।थोडा लिख पर अच्छा लिख ।। जो भी कुछ लिख पक्का लिख ।चिठ्ठा एक न कच्चा लिख ।।लिख जो भए जन जन को । गाये बच्चा-बच्चा लिख ।। नाव डूबने वाली है ।करें राम ही रक्षा लिख।। बात न माने शायर की । क्यों न खाए गच्चा लिख ।।मत लिख इसके उसके जैसा ।केवल अपने जैसा लिख ।
पांचवी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि:-
बस्ती । 20 नंबर 2021। 'ये शाम और ये फूलों का मुरझाना देख उदासी क्यों, जब तय है होगी सुबह, खिलेंगे फूल हजारों नये-नये’ जैसी रचनाओं से समाज को संदेश देने वाले जन कवि बाल सोम गौतम को उनकी पांचवी पुण्य तिथि पर याद किया गया। बालसोम गौतम स्मृति संस्थान की ओर से शनिवार को प्रेस क्लब के सभागार में आयोजित कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में कवि, शायरों ने बालसोम गौतम के साहित्यिक योगदान पर विमर्श किया।
मुख्य अतिथि आयुष चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि बालसोम गौतम का रचना संसार विविधता लिये हुये हैं। वे अपने समय के सशक्त हस्ताक्षर थे, उनकी कवितायेें हमें संकट में साहस देती है। अध्यक्षता करते हुये कमलापति पाण्डेय ने कहा कि बाल सोम गौतम को याद करना इतिहास के कई बिन्दुओं को खंगालने जैसा है। वे स्वयं में अप्रतिम कवि थे। संचालन करते हुये वरिष्ठ कवि डा. रामकृष्ण लाल जगमग ने बालसोम गौतम से जुड़े अनेक प्रसंगोें, अनुभवों को साझा किया। उनकी कविता ‘ जो भी हो पर सत्य कहूंगा, झरना जैसा सदा बहूंगा, इन्ही किताबों के बल पर मैं, मरने पर भी अमर रहूंगा’ को श्रोताओं ने सराहा।
कविसम्मेलन, मुशायरे में पं. चन्द्रबली मिश्र, विनोद उपाध्याय, सत्येन्द्रनाथ मतवाला, राममणि शुक्ल, सागर गोरखपुरी, रहमान अली रहमान, अफजल हुसेन अफजल आदि की रचनायें सराही गई। बाल सोम गौतम के अधिवक्ता पुत्र सिद्धार्थ गौतम ने अपने पिता की रचनाओं को सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में शान्तनु सिंह, विभोर मिश्र, चन्द्र प्रकाश शर्मा, हनुमत प्रसाद शुक्ल, महेन्द्र उपाध्याय आदि शामिल रहे।

जनेऊ कैसे बनती और धारण की जाती है (4) समापन कड़ी डा. राधे श्याम द्विवेदी

 
लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।
जनेऊ में तीन सूत्र क्यों :- जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
 जनेऊ में नौ तार : - यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।
जनेऊ में पांच गांठ : - यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।
जनेऊ की लंबाई : - यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।
जनेऊधारी के वस्त्र : - जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।
मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।
जनेऊ धारी के अन्य जरूतें : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।
गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है-
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।
ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है। फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म (सिर्फ ईश्वर को मानने वाला) को माने वाला हुआ।
इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है। 
जनेऊ संस्कार का समय :- माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।
हरि: ॐ तत्सत।

स्वर्गीय साधू शरन दूबे की प्रथम पुण्य तिथि

 


      भारतीय जनता पार्टी के  राष्ट्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के बस्ती से लोकसभा सांसद हरीश द्विवेदी के पिता स्वनाम धन्य स्वर्गीय श्री साधू शरन दूबे जी का जन्म 01.01.1943 को  नगर थाना क्षेत्र के ग्राम तेलियाजोत कटया बस्ती में हुआ था। श्री साधू शरन दूबे किसान इंटर कॉलेज मरहा कटया में अपनी सेवा पूरी करने के बाद घर पर रह कर समाज सेवा करते थे। उनकी पत्नी का नाम यशोदा देवी है। दूबे जी सेवा के दौरान हिंदी के शिक्षक थे।  वे 2003 में सेवा निवृत्त हुए थे। जीवन के अंतिम क्षणों में वह कई दिनो से बीमार थे। उन्हें इलाज के लिए लखनऊ के राममनोहर लोहिया मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया था। जहां दिनांक 12. 11.2020 को देर रात उनका निधन हो गया था। वह 77 साल के थे।
        उन्होंने अपने पीछे एक भरा पड़ा परिवार छोड़ रखा है। उनके के तीन पुत्रों में सबसे बडे़ सुभाष चंद्र द्विवेदी बस्ती में कोषागार में कायर्रत हैं। दूसरे नंबर के सांसद हरीश द्विवेदी है। छोटे बेटे बागीस घर पर ही रहकर कृषि का कार्य करते हैं। उनके निधन के बाद सांसद के आवास पर श्रद्धांजलि देने वालो का तांता लगा रहा। 13 नवंबर 2020को देर शाम 7.30 बजे  तेलिया जोत स्थित सांसद के घर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पहुंचे थे। उन्होंने स्व. साधु शरण दूबे के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी थी और उनकी आत्मा के शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की थी।  महादेवा विधायक रवि सोनकर, कप्तानगंज विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ल, सदर विधायक दयाराम चौधरी, रूधौली विधायक संजय प्रताप जायसवाल, बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला, प्रदेश भाजपा मंत्री संजय राय, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष दया शंकर सिंह, विधायक सोनभद्र (रावर्डगंज)भूपेश चौबे, बस्ती के भाजपा जिलाध्यक्ष महेश शुक्ला भी गतात्मा को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। विकास भवन बस्ती पर कर्मचारी संघ ने शोकसभा आयोजित कर साधु शरण को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई थी।
         सांसद हरीश द्विवेदी ने बताते हैं कि  पिता स्व. साधू शरण दूबे की शिक्षा की बदौलत उन्हें जनसेवा करने की प्रेरणा मिली है। उनके द्वारा दी गई शिक्षा से ही उन्हें बेहतर कार्य करने की ऊर्जा मिलती रही है। बेहद सरल और सहज स्वभाव के रहे पिता जी सेवानिवृत्त होने के बाद भी शिक्षण कार्य के प्रति उनका झुकाव बना रहा। उनके पढ़ाये हुए तमाम विद्यार्थी आज अच्छे पदों पर रह कर समाज में रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। आज स्वर्गीय दूबे के प्रथम पुण्य तिथि पर बस्ती जनपद उत्तर प्रदेश और भारत राष्ट्र उन्हें सादर श्रद्धांजलि दे रहा है। हमें उनके दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करने का प्रयास करना चाहिए।

   

Friday, November 19, 2021

नोवा हॉस्पिटल बस्ती में विविध रोगों का इलाज शुरू

नोवा हॉस्पिटल बस्ती में विविध रोगों का इलाज शुरू
नोवा हॉस्पिटल बस्ती में अस्थि हड्डी रोगों की विशेषज्ञता के साथ विविध रोगों का इलाज शुरू हो गया है .अस्थि रोग के लिए विशेष रूप से समर्पित बस्ती का नोवा हॉस्पिटल बस्ती में पूर्वांचल उत्तर प्रदेश में अपना विशेष स्थान बना लिया है.
अस्थि रोग (Diseases of Bone) 
अस्थि रोग, मानव हड्डियों को प्रभावित करने वाली कोई भी बीमारी या चोट होती है. जो मानव को प्रभावित करती है. अस्थि रोग या हड्डियों के रोग और चोटें मानव कंकाल प्रणाली के असामान्यताओं के प्रमुख कारण हैं. हालांकि शारीरिक चोट, फ्रैक्चर का कारण बनती है, यह चोट बीमारी का रूप ले लेती है और इंसान पर हावी हो जाती है. फ्रैक्चर हड्डियों की बीमारी के कई सामान्य कारणों में से एक है.
हड्डी की बीमारियों और चोटों को पहले ज्यादा मैकेनिकल माना जाता था न की मेटाबोलिक. हड्डी के बारे में मैकेनिकल और रासायनिक तौर पर बेहतर समझ, एक अधिक एकीकृत जैविक दृश्य को अनुमति देती है और हड्डी से जुड़ी हुई बीमारियों की अच्छी समज आती है ताकि समय से इलाज कराया जा सके.
विभिन्न प्रकार के अस्थि रोग (Diseases of Bone)
1. ओस्टियोमलेशिया एवं रिकेट्स (Osteomalacia and Rickets)
एक व्यस्क व्यक्ति को प्रतिदिन एक ग्राम कैल्शियम तथा 400-800 IU विटामिन-डी की जरुरत होती है. अस्थि के कैल्सीफिकेशन के लिए विटामिन-D की आवश्यकता होती है जो आंत से कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाता है. वयस्कों में कैल्शियम तथा विटामिन-D की कमी से, विशेषकर स्त्रियों में अस्थिम्रदुता (Osteomalacia) नामक रोग हो जाता है. जबकि बच्चों में इसके अभाव के कारण सूखा रोग (Rickets) हो जाता है.
2. ओस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)
‘आस्टियो’ का अर्थ होता है ‘अस्थि’ तथा ‘पोरस’ का ‘मुलायम’ या ‘छिद्रयुक्त’.  ‘ओस्टियोपोरोसिस’ अस्थि ढांचे का ऐसा रोग है, जिसमें अस्थि सघनता के कम होने एवं अस्थिमज्जा की संरचना के ह्रास से हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं तथा उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि ओस्टियोपोरोसिस अस्थि पुननिर्माण प्रक्रिया से सम्बद्ध रोग है जिसमें अस्थियों का क्षय उनके निर्माण की तुलना में अधिक तीव्रता से होता है.
इस रोग में सम्पूर्ण कंकाल विशेषत: मेरुदण्ड प्रभावित होता है तथा कुब्जता (Kyphosis) की दशा प्रकट हो जाती है. ‘ बोन densitometer (हड्डी सघनता जांच-यंत्र) की सहायता से अस्थि-खनिज सघनता की जांच करने के पश्चात ओस्टियो- पोरोसिस की पहचान की जा सकती है. इसके उपचार के निमित डाक्टर की सलाह से विटामिन-डी एवं कैल्शियम का सेवन करना चाहिए.
3. सन्धि शोथ या गठिया (Arthritis)
एक अथवा अनेक सन्धियों का शोथ सन्धि-शोथ (Arthritis) कहलाता है. यह किसी भी आयु के व्यक्ति में पाया जा सकता है. परन्तु सामान्यत: प्रौढ़ तथा वृद्ध व्यक्तियों में अधिक होता है. यह दो प्रकार का होता है: ऑस्टियो और रयूमेटायड अर्थराइटिस.
रयूमेटायड अर्थराइटिस एक प्रकार का polyarthritis  है जो bilateral  तथा सममित (Symmetrical) होता है. सर्वप्रथम यह शोध हाथ व अंगुलियों की लघु संधियों को प्रभावित करता है.
ऑस्टियो अर्थराइटिस एक प्रगामी (Progressive) रोग है जो प्रौढ़ावस्था व वृद्ध अवस्था में पाया जाता है. सामान्यत: यह अस्थि में केवल एक बड़े जोड़ को प्रभावित करता है.
अर्थराइटिस की स्थिति में रोगी को आराम की सलाह दी जाती है. औषधियों में एस्पिरिन या सस्टेरॉयड के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है. भौतिक चिकित्सा द्वारा संधि की गतियों को बनाये रखना जरुरी है. रोगियों को मोटापे पे नियंत्रण रखना चाहिए.
4. वैस्कुलर निक्रोसिस
सामान्यत: बुढ़ापा आने का प्रारंभ जोड़ों के दर्द से ही होता है. यह एक ऐसी ही बिमारी है, जो जोड़ो में तीखे दर्द के कारण रोगी को एक तरह से अपाहिज ही बना देती है. यदि इस रोग की चिकित्सा अच्छी तरह से नहीं की गई, तो यह कुल्हे के अर्थराइटिस में परिवर्तित हो जाता है. फलत: रोगी का चलना-फिरना अत्यंत कठिन हो जाता है.
इस रोग का अंतिम इलाज जोड़ो के बदलाव के लिए की जाने वाली शल्य-चिकित्सा को ही माना जाता है. इससे कुल्हे को लाइलाज स्थिति तक पहुँचने से बचाने में सफलता मिल जाती है. कई शोध-अध्ययनों से पता चला है कि इस रोग के उपचार में ‘विसफोसफोनेट्स’ नामक औषधि काफी प्रभावी सिद्ध हुई है. इसका सेवन विशेषज्ञ-चिकित्सक की देख-रेख में ही करना चाहिए. इस इलाज से मरीज को अब ऑपरेशन की जरुरत नहीं है.
इस क्षेत्र में तमाम लोग एसे भी आते हैं जो किसी अन्य चिकित्सक से इलाज या आपरेशन के बावजूद सही नही हुए हैं. एसे बिगड़े केसों को भी सुधारा जाता है. पहले दवा द्वारा और ना सुधर पाने पर आपरेशन द्वारा सुधारने की व्यवस्था है.
अस्थि के अलावा दर्जनों रोगों के चिकित्सा और निदान भी इस हॉस्पिटल के कुशल चिकित्सकों द्वारा किया जाता है. इस हॉस्पिटल में मानव जीवन से सम्बन्धित प्रायः हर रोग के निदान की व्यवस्था है. इनमें कुछ के नाम दर्शाए जा रहे हैं.नार्मल एवम मेजर आपरेशन कुशल चिकित्सकों द्वारा सम्पन्न होता है. माता और बहनों के शिशुओ की नार्मल और आपरेशन डिलेवरी से जनने को सुविधा उपलब्ध है. इसके साथ ही कुशल चिकित्सकों की टीम द्वारा जनरल और लेप्रोस्कोपिक सर्जरी द्वारा निम्न रोगों का निदान भी होता है. हर्निया हाइड्रोसील पाइल्स कृस्टूला (भगंदर) एवम फिसर की चिकित्सा वा आपरेशन होता है.
बच्चों के हर्निया और हाइड्रोसील मूत्र एवम पथरी रोग की चिकित्सा वा आपरेशन होता है. पित्ताशय की पथरी एपेंडिक्स आंतों के रोग एवम कैंसर का इलाज होता है.गुदा द्वारा आंत का बाहर निकलने के दवा होती है. घेंघा रोग लार ग्रंथियों की गांठ की चिकित्सा वा आपरेशन होता है.बच्चेदानी (गर्भाशय) की समस्या को दूर किया जाता है. स्तन गांठ एवम स्तन कैंसर एवम छाती के रोग का इलाज होता है. इसके अलावा अन्य सभी प्रकार के आपरेशन सम्बन्धित समस्याएं भी दूर की जाती है.




भारत के टॉप मेडिकल कॉलेजों की लिस्ट

NEET Counselling 2021: एम्स के अलावा ये हैं देश के टॉप मेडिकल कॉलेज की लिस्ट इस प्रकार है.
NEET Counselling 2021: MCC NEET काउंसलिंग 2021 आधिकारिक वेबसाइट- mcc.nic.in पर आयोजित की जाएगी. भारत भर में एम्स के अलावा अन्य टॉप मेडिकल कॉलेजों की लिस्ट यहां देखें.
NEET Counselling 2021: राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (NEET) उत्तीर्ण करने वाले उम्मीदवारों को MBBS, BDS और आयुष सहित विभिन्न चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिलता है. चिकित्सा परामर्श समिति (एमसीसी) और आयुष प्रवेश केंद्रीय परामर्श समिति (एएसीसीसी) चिकित्सा संस्थानों में सीटें आवंटित करती हैं. एम्स भारत के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में से एक है और यह उच्च कट-ऑफ की मांग करता है, नीट के शीर्ष स्कोरर को एम्स में प्रवेश मिलता है. हालांकि, भारत में ऐसे कई कॉलेज हैं जिनमें छात्र मेडिकल प्रोग्राम के लिए एडमिशन ले सकते हैं. 
AACCC आयुष पाठ्यक्रमों, बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएचएमएस), बैचलर इन यूनानी मेडिसिन एंड सर्जरी (बीयूएमएस), बैचलर ऑफ आयुर्वेद, मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएएमएस) और बैचलर ऑफ सिद्ध मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएसएमएस) में प्रवेश के लिए नीट काउंसलिंग आयोजित करता है. 
MCC NEET 2021 Counselling: टॉप मेडिकल कॉलेजों की सूची
यहां भारत भर के शीर्ष मेडिकल कॉलेजों की सूची दी गई है जिसमें नीट उत्तीर्ण छात्र एमसीसी एनईईटी परामर्श के माध्यम से सीटें प्राप्त कर सकते हैं. 

रैंक 1. एम्स नई दिल्ली – स्कोर 92.07
रैंक 2. पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ – स्कोर 82.62
रैंक 3. क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लौर – स्कोर 75.33
रैंक 4. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस (NIMHNS), बैंगलोर – स्कोर 73.45
रैंक 5. संजय गांधी पोस्ट ग्रजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (SGPGIMS), लखनऊ – स्कोर 72.45
रैंक 6. अमृता विश्व विद्यापीठम, कोयंबटूर – स्कोर 69.25
रैंक 7. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU), वाराणसी – स्कोर 67.62
रैंक 8. जिपमर (JIPMER), पुडुचेरी – स्कोर 67.42
रैंक 9. किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ – रैंक 64.67
रैंक 10. कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज, मणिपाल – स्कोर 63.60

रैंक 11. श्री चित्र तिरुणान इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेस एंड टेक्नोलॉजी, तिरुवनंतपुरम – स्कोर 63.04
रैंक 12. इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेस., नई दिल्ली – स्कोर 61.29
रैंक 13. सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज, बैंगलोर – स्कोर 60.83
रैंक 14. श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च, चेन्नई – स्कोर 58.92
रैंक 15. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU), अलीगढ़ – स्कोर 58.10
रैंक 16. मद्रास मेडिकल कॉलेज एंड गवर्नमेंट जेनरल हॉस्पिटल, चेन्नई – स्कोर 57.88
रैंक 17. मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली – स्कोर 56.35
रैंक 18. वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एंड सफदरजंग हॉस्पिटल, नई दिल्ली – स्कोर 56.20
रैंक 19. डॉ. डीवाई पाटिल विद्यापीठ, पुणे – स्कोर 55.96
रैंक 20. एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, चेन्नई – स्कोर 55.74
(स्रोत :आजतक.इन)

Thursday, November 18, 2021

कान पर जनेऊं लपेटना और 6 माह में बदलना (3) डा. राधे श्याम द्विवेदी


विद्यालयों में प्रायः शिक्षक शरारती बच्चों के कान खींचते हैं। कान खींचने के मूल में एक यह कारण है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करने लगती है। दंड के बाद बच्चे की तंद्रा के जग जाती है। इसी से प्रभावित होकर यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
जनेऊ मे तीन सूत्र ही रखे जाते हैं :-
जनेऊ में मुख्‍य रूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं। साथ ही इन्हें गायत्री मंत्र के तीन चरणों और तीन आश्रमों का प्रतीक भी माना जाता है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
हर धागे में 3-3 करके कुल 9 तार या द्वार होते हैं :-  शरीर में
यज्ञोपवीत के हर एक धागे में तीन-तीन तार होते हैं।जो नौ द्वारों का प्रतिनिधित्व करती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ द्वार शरीर में होते हैं। इस तरह कुल 9 तारों से 9 द्वारों की संख्‍या पूरी मानी जाती है।
जनेऊ की पांच गाठें :-
यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है, जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का प्रतीक भी मानी जाती है।पंच महायज्ञों में वेद पढ़ना ब्रह्मा यज्ञ, तर्पण पितृ यज्ञ, हवन देव यज्ञ, पंचबलि भूत यज्ञ और अतिथियों का पूजन सत्कार अतिथि यज्ञ कहा जाता है।
हमारे पांच ज्ञानेद्रिय नाक ,कान ,आंख ,जीभ , त्वचा से प्राप्त ज्ञान से मस्तिष्क मन और विचार बनाता है। आयुर्वेद में पंच कर्मों का उल्लेख मिलता है। ये 1.वमन 2. विरेचन 3. आस्थापन वस्ति 4. अनुवासन वस्ति 5. नस्य आदि हैं।मनुष्य का शरीर जिन 5 तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) से बना है, उन्हीं तत्वों से ब्रह्मांड भी बना है। जब शरीर में इन 5 तत्वों के अनुपात में गड़बड़ी होती है तो दोष यानी समस्याएं पैदा होती हैं। आयुर्वेद इन तत्वों को फिर से सामान्य स्थिति में लाता है और इस तरह से रोगों का निदान होता है। गठिया, लकवा, पेट से जुड़े रोग, साइनस, माइग्रेन, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, साइटिका, बीपी, डायबीटीज, लिवर संबंधी विकार, जोड़ों का दर्द, आंख और आंत की बीमारियों आदि के लिए पंचकर्म किया जाता है।
4. यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कंठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करना चाहिए।
जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।
धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।
द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।
अन्यानेक लाभ :-
1.जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले।अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
2. कई रोगों का निदान:-.मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
3. काम क्रोध पर नियंत्रण:-माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
4.सामाजिक महत्व अशीम शांति की प्राप्ति : - आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।
जनेऊ पहनने के नियम
1. मल-मूत्र करने से पहले जनेऊ दाहिने कान पर चढ़ा लेनी चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इससे जनेऊ अपवित्र नहीं होता। यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।
अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।
2. जनेऊ का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए तो इसे बदल देना चाहिए।
3. जन्म-मरण के सूतक के बाद भी जनेऊ बदलने की परंपरा है। जनेऊ आम या पीपल के वृक्ष पर टांग दिया जाता है।

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम :-
4.यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।
5.लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं
6.कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।
7.किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
8.विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।
कब कब बदलना चाहिए जनेऊ :-
जब यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।हमारे पांच ज्ञानेद्रिय नाक ,कान ,आंख ,जीभ , त्वचा से प्राप्त ज्ञान से मस्तिष्क मन और विचार बनाता है। जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।जनेऊ में चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।
यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने का मंत्र
ऊॅँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रम् प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीत बलमस्तु तेज:।।
जीर्ण यज्ञोपवीत उतारने का मंत्र
एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया।
जीर्णत्वाच्च परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।
.... क्रमशः.....(4)