Thursday, January 20, 2022

डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को ‘भारत गौरव’ सारस्वत सम्मान

बस्ती । विक्रमशिला हिन्दी विद्या पीठ द्वारा वरिष्ठ कवि डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को उनके योगदान के लिये ‘भारत गौरव’ सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया है। गुरूवार को उनके सम्मान में वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति एवं प्रेमचन्द साहित्य एवं जन कल्याण संस्थान की ओर से कलेक्टरी परिसर में एक संगोष्ठी आयोजित कर वक्ताओं ने उनका उत्साहवर्धन करते हुये अंग वस्त्र एवं फूल मालाओं के साथ स्वागत किया।
शिव हर्ष किसान पी.जी. कालेज के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रामदल पाण्डेय ने कहा कि हिन्दी कविता के क्षेत्र में डॉ. जगमग की साहित्य यात्रा स्वंय में विविधता लिये हुये हैं। उनकी कृति ‘चाशनी’ से लेकर ‘ किसी की दिवाली किसी का दिवाला’ विलाप खण्ड काव्य, ‘हम तो केवल आदमी है’ ‘ सच का दस्तावेज’ ‘बाल सुमन’ आदि कृतियों में वे कभी हास्य तो कभी गंभीर दर्शन के रूप में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त करते हुये उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। डा.पाण्डेय ने कहा कि इन दिनों जगमग जी स्वामी विवेकानन्द पर केन्द्रित महाकाव्य का सृजन कर रहे हैं, निश्चित रूप से उनका साहित्यिक संसार घोर तमस में समाज का पथ पदर्शन करेगा।
कवि एवं चिकित्सक डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि डा. जगमग ने जहां स्वयं अनेकों कृतियां समाज को दिया वहीं वे पूर्वान्चल में समर्थ कवियों की पीढी तैयार कर रहे हैं। निश्चित रूप से यह कठिन कार्य है, नई पीढी उनसे बहुत कुछ सीख सकती है। वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि डा. जगमग का रचना संसार जन सरोकारों से जहां सीधा जुड़ा है। उनके कटाक्ष और तीखे व्यंग्य श्रोताओं की जुबान पर चढ़े हुये है। डॉ. त्रिभुवन प्रसाद मिश्र ने कहा कि डॉ. जगमग का जीवन साहित्य को समर्पित है। कवि सम्मेलनों में वे आम आदमी की भावना को सहज रूप में छू जाते हैं।
अपनों द्वारा किये गये सम्मान से अभिभूत डा. जगमग ने कहा कि उन्होने जिस तरह से जीवन को देखा उसे शव्दों में उतार दिया। यह क्रम अनवरत जारी है।
डॉ. राम कृष्ण लाल ‘जगमग’ को सम्मानित किये जाने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य रूप से श्याम प्रकाश शर्मा, विनय कुमार श्रीवास्तव, ओम प्रकाश धर द्विवेदी, रमाकान्त तिवारी, पेशकार मिश्र, दीपक सिंह प्रेमी, शाद अहमद शाद, दीनानाथ यादव, गणेश आदि अनेक विद्वत जनों ने उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।

Sunday, January 16, 2022

बाबूजी स्वर्गीय शोभाराम दूबे की पुण्य तिथि 17 जनवरी पर सादर श्रद्धांजलि

मेरे परम पूज्य बाबूजी स्वर्गीय शोभाराम दूबे का जन्म 15 जून 1929 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के हर्रैया तहसील के कप्तानगंज विकास खण्ड के दुबौली दूबे नामक गांव मे एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार का पालन पोषण तथा शिक्षा के लिए बाबूजी को उनके पिताजी पंडित मोहन प्यारे जी लखनऊ लेकर चले गये थे। जहां उन्होने 1945 में लखनऊ के क्वींस ऐग्लो संस्कृत हाई स्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा उस समय ‘प्रथम श्रेणी’ से अंग्रेजी, गणित, इतिहास एवं प्रारम्भिक नागरिक शास्त्र आदि अनिवार्य विषयों तथा हिन्दी और संस्कृत एच्छिक विषयों से उत्तीर्ण की है। उन्होंने इन्टरमीडिएट परीक्षा 1947 में कामर्स ग्रुप से द्वितीय श्रेणी में अंग्रेजी, बुक कीपिंग एण्ड एकाउन्टेंसी, विजनेस मेथेड करेसपाण्डेंस, इलेमेन्टरी एकोनामिक्स एण्ड कामर्सियल ज्याग्रफी तथा स्टेनो- टाइपिंग विषयों से उत्तीर्ण किया था।
          दादाजी पण्डित मोहनप्यारे द्विवेदी के शिक्षण तथा व्यवहार से प्रभावित सहकारिता विभाग के किसी अधिकारी ने गुरुदक्षिणा के रुप में बाबूजी को पहले कम उम्र के कारण अस्थाई रुप में तथा बादमें 18 साल की उम्र होने पर स्थाई रुप में सरकारी सेवा में लिपिक पद पर नियुक्ति दिलवा दिया था। बाद में बाबूजी ने विभागीय परीक्षा देकर लिपिक से आडीटर के पद पर अपनी नियुक्ति करा लिये थे।
           बाबूजी अपने सिद्धान्त के बहुत ही पक्के थें उन्होने अनेक विभागीय अनियमितताओं को उजागर किया था । इसका कोप भाजन भी उन्हें बनना पड़ा था। प्रताड़ना स्वरूप उनकी उल्टी -सीधी पोस्टिंग दी जाती रही। टेहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल जो उस समय यूपी में था, की चढ़ाई करना पड़ा था।
          फैजाबाद में सहकारिता विभाग का एक बहुत बड़ा घोटाला जिसमें कांग्रेसी नेता विश्वनाथ कपूर संलिप्त थे,बाबूजी के द्वारा ही उजागर हुआ था। अयोध्या का क्षेत्र फैजाबाद सदर विधानसभा क्षेत्र के तहत तब आता था।1967 के चुनाव में अयोध्या अलग विधान सभा सीट बना था। जहां 1969 में कांग्रेस के विश्वनाथ कपूर जीतने में कामयाब रहे।1969  में आईएनसी के विश्वनाथ कपूर  19569 तथा उनके प्रतिद्वंदी बीकेडी के  राम नारायण त्रिपाठी को 15652 मत मिले थे।उनके द्वारा हुए घोटाले का स्थानीय और फिर उच्च न्यायालय में विचारण हुवा था। जिला सहकारी बैंक फैजाबाद, जिसमें श्री विश्वनाथ कपूर, अधिवक्ता प्रबंध निदेशक थे और श्री जोखान सिंह कैशियर थे और एलन खान कार्यवाहक प्रबंधक थे और महराज बक्स सिंह सामग्री समय पर सहायक लेखाकार थे, राज्य अधिनियम द्वारा या उसके तहत स्थापित एक निगम है और , इसलिए उक्त आरोपी व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 21 खंड 12वीं के अर्थ में लोक सेवक थे।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन हाई कोर्ट में  स्टेटऑफ़ यूपी बनाम विश्वनाथ कपूर और अन्य केस चला था। इसका निस्तारण 14 जनवरी 1980 को न्यायमूर्ति टी मिश्रा द्वारा हुवा था। इस संदर्भित प्रश्न का न्यायमूर्ति का उत्तर इस प्रकार रहा है- यूपी सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत एक सहकारी समिति एक केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके तहत स्थापित निगम नहीं है ।इस उत्तर के साथ कागजात माननीय एकल न्यायाधीश के समक्ष रखे जाने का आदेश पारित किया गया था।
       इस प्रकार विभागीय घोटालों को प्रकाश में लाने पर मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी श्री अवधेश चंद्र दुबे ने बाबू जी को लखनऊ में बुलाकर सिस्टम को सुधारने को छोड़ अपना कार्यकाल सामान्य रूप में बिताने की नसीहत दी थी।
         बाबूजी का आडीटर के बाद सीनियर आडीटर के पद पर प्रोन्नति पा गये थे। सीनियर आडीटर के जिम्मे जिले की पूरी जिम्मेदारी होती थी। बाद में यह पद जिला लेखा परीक्षाधिकारी के रुप में राजपत्रित हो गया। कभी- कभी बाबूजी को दो- दो जिलों का प्रभार भी देखना पड़ता था। जब कोई अधिकारी अवकाश पर जाता था तो पास के अधिकारी के पास उस जिले का अतिरिक्त प्रभार भी संभालना पड़ता था। बहराइच में सेवा के दौरान 1975  में बाबूजी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी. ए. की उपधि प्राप्त की थी।
        विभाग में अच्छी छवि होने के कारण बाबूजी को प्रतिनियुक्ति पर उ. प्र. राज्य परिवहन में भी कार्य करने का अवसर मिला था। ये क्षेत्रीय प्रबन्धक के कार्यालय में बैठते थे और उस मण्डल के आने वाले सभी कार्यालयों के लेखा का सम्पे्रेक्षण करते थे। उनकी नियुक्ति कानपुर के केन्द्रीय कार्यशाला में 23.12.1982 को हुआ था। यहां से वे औराई तथा इटावा के कार्यालयों के मामले भी देखा करते थे। अपनी सेवा का शेष समय बाबूजी ने राज्य परिवहन में पूरा किया था। 1985 में वह कानपुर से गोरखपुर कार्यालय में सम्बद्ध हो गये थे। यहां से वे आजमगढ़ के कार्यालय के मामले भी देखा करते थे। गोरखपुर कार्यालय से वे 30.06.1987 में सेवामुक्त हुए थे।
            संयोग से उनके सेवामुक्त होने के पहले 12 मार्च 1987 को मैं बडौदा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अपना दायित्व निभाना शुरु कर दिया था।  बाबूजी अपने पैतृक जन्मभूमि दुबौली दूबे पर कम तथा  नेवासा वाले जगह मरवटिया पाण्डेय पर ज्यादा रहने लगे थे। मेरे बाबूजी घर पर कम समय दे पाते थे। हां, महीने में एक दो चक्कर जरुर लग जाता था। सेकण्ड सटरडे के साथ सनडे को वह जरुर घर आते थे। वे बाहर अकेले रहते थे। माता जी को बहुत कम अपने पास रख पाते थे , क्योकि घर पर नानाजी भी तो अकेले थे। हमें जब भी अपने पढ़ाई तथा बच्चे के पढ़ाई से समय मिलता मैं उनके आवास मरवटिया पाण्डेय यानी अपने ननिहाल स्वयं, पत्नी तथा बच्चे के साथ अवश्य जाता और वह बहुत ही प्रसन्न होते थे। हमारे आगरा में सरकारी सेवा के दौरान अपनी मातृ भूमि पर 17 जनवरी 2011को उन्होंने आखिरी सांसें ली थी और हमारे परिवार पर उनका शाया हमेशा हमेशा के लिए उठ गया। सोचा था कि जब मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हूंगा तो बाबूजी के साथ समय बिताउगां। उनके सुख दुख में भागी बनूंगा। पर ईश्वर ने एसा करने का अवसर नहीं दिया। हमें थोड़े-थोड़े समय के लिए उनके साथ रहने का अवसर ही मिल पाया।  इस कारण जब मैं इस स्थिति में हुआ कि मेरे बच्चे अकेले मेरे देखरेख में रहने के लिए उपयुक्त हो गये तो मैं अपनी पत्नी को अपनी मांजी की सेवा के लिए घर पर कर दिया और अपने जिन्दगी के आखिरी के लगभग 8 साल मुझे अकेले बाहर गुजारना पड़ा है।
           बाबू जी को परमधाम गए ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गए।उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धा के प्रसून अर्पित करते हुए उनके शांतिमय पारलौकिक जीवन की परमपिता से प्रार्थना करता हूं।

Thursday, January 13, 2022

भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र नैमिषारण्य:- डा. राधे श्याम द्विवेदी


नैमिषारण्य लखनऊ से ८० किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख ८८००० ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्म पुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं। वाराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमिष मात्र में दानवों का संहार होने से यह 'नैमिषारण्य' कहलाया। वायु, कूर्म आदि पुराणों के अनुसार भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल) यहीं विशीर्ण हुई (गिरी) थी, अतएव यह नैमिषारण्य कहलाया।
              प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।
               तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥
मियागंज कन्नौज की धर्मनिष्ठा :-
स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी महाराज के तीन शिष्य:-
कन्नौज के पूर्वी इलाके में स्थित मियागंज एक ऐसा ग्राम है जिसे अब ऋषि नगर के नाम से जानते हैं। वहां तीन महान संतों का अवतरण हुआ जिन्होंने पूरे देश में ख्याति अर्जित की जिनमे स्वामी सुखदेवानन्द, स्वामी नारदानंद और स्वामी भजनानंद जी हैं। स्वामी सुखदेवानन्द का गृहस्थ नाम प्रयाग नरायन था और स्वामी भजनानंद का नाम लङैते लाल था। बाबूराम स्वामी नारदानंद के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल की मिठाई की दुकान थी। तीनों स्वामी एकरसानंद सरस्वती के दर्शन करने गए और वहीं पर उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया। उसी समय सवामी विचारानंद और समतानंद भी उसी गाँव मे हुए और इसे संयोग ही कहा जायेगा कि पहले से ही विरक्त भाव मे चल रहे इन तीनो विभूतियों की पत्नियों ने एक एक कर संसार को छोड़ दिया और अपने पति को परमार्थ गमन के लिए मुक्त कर दिया। बाबूराम पांडेय स्वामी नारदानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। लङैते लाल स्वामी भजनानंद के नाम से विख्यात हुए और प्रयाग नरायन स्वामी सुखदेवानंद के नाम से विख्यात हुए। तीनो ने एक साथ सन्यास ग्रहण किया।
स्वामी नारदानंद सरस्वती द्वारा अध्यात्म केंद्र की स्थापना:-
 यहां स्वामी श्रीनारदनंदजी महाराज का आश्रम तथा एक ब्रह्मचर्याश्रम है, जहां ब्रह्मचारी प्राचीन पद्धति से शिक्षा प्राप्त करते हैं। आश्रम में साधक लोग साधना की दृष्टि से रहते हैं। धारणा है कि कलियुग में समस्त तीर्थ नैमिष क्षेत्र में ही निवास करते हैं। नैमिषारण्य भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है, जिसे जगदाचार्य स्वामी नारदानंद सरस्वती जी ने यथासंभव संवारने का प्रयास किया था। स्वामी नारदानंद सरस्वती ने नैमिष में आश्रम बनाया जो आज अपने विशाल रूप में है। स्वामी नारदानंद सादगी के प्रतीक थे। स्वामी नारदानंद जी का जन्म कन्नौज के पास मिश्रागंज में ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह दो भाई-बहन थे। उनकी विवाह भी हुआ था। बाद में एकरसानंद से प्रभावित होकर घरबार छोड़कर समाज हित में अपने को लगा दिया था। उनकी कई वर्षो की तपस्या व आशीर्वाद से लाखों भक्तों का कल्याण हुआ। उन्होंने देश-विदेश में 286 आश्रमों का संचालन किया और नैमिषारण्य को अपनी तपस्थली बनाकर वहां चारों आश्रमों का संचालन किया। ब्रहमचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास वर्ण की अलग-अलग व्यवस्था की। इनका जन्म मास अगहन की शुक्लपक्ष सप्तमी को हुआ था। महाराज जी के सानिध्य में लाखों भक्तों का कल्याण हुआ और बहुत से विरक्त संत व आचार्यो की फौज तैयार कर जनसेवा में जीवन लगा दिया। उन्होंने बताया कि समस्त 286 आश्रमों पर वानप्रस्थ ब्रहमचारी को पूजा व देखरेख के लिए नियुक्त किया।
          स्वामी नारदानंद पहले स्वामी एकरसानंद सरस्वती जी महाराज फिर पंडित मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आये और उनकी सम्मति से वर्णाश्रम खोलने की योजना बनाई। स्वामी नारदानंद ने उत्तर भारत में जनमानस को धर्म और आध्यात्म के प्रति प्रेरित किया। भारत भक्त समाज की स्थापना पर सन 1959 में स्वामी जी मे यह आह्वान किया। आओ उठो आज परमात्मा की स्वकर्तव्य द्वारा पूजा की शुभ बेला है।मातृभूमि की पुकार है। नैमिष व्यासपीठ की स्थापना की जो आज भी मिसाल वट वृक्ष की भांति विद्यमान है। 
          नारदानंद नके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी ने नैमिशारण्य में भव्य देवपुरी मंदिर का निर्माण कराया। उन्होंने एक हजार शिवलिंगों की भी स्थापना की तथा सरस्वती सरोवर का निर्माण कराया। 
        नारदानंद के ही प्रमुख शिष्य वेदांती स्वामी सर्वेश्वरानंद सरस्वती मूलत: हरदोई के रहने वाले थे। वह बाल्यकाल में ही घर परिवार त्याग कर नैमिष पीठाधीश्वर स्वामी नारदानंद सरस्वती के आश्रम पहुंच गए थे। वेद कंठस्थ होेने के चलते स्वामी सर्वेश्वरानंद को नैमिष अध्यात्मिक विद्यापीठ का संरक्षक बनाया गया था। स्वामी जी की मृत्यु के बाद उनका पार्थिव शरीर नैमिष आश्रम में ले जाया गया है। यहां उनको समाधि दी गई। 
            वर्तमान में उत्तराधिकारी स्वामी उपेंद्रानंद सरस्वती जी के संरक्षकत्व में संस्था सुचारु रुप से चल रही है।वे नारदानन्द आश्रम नैमिषारण्य के नैमिष व्यास पीठाधीश्वर हैं। आश्रम की व्यवस्था स्वामी नारदानन्द सरस्वती आध्यात्म विद्यापीठ ट्रस्ट द्वारा की जा रही है। 23 अप्रैल 2006 की आम सभा द्वारा सर्वसम्मति से उन्हें शिक्षा सुधार समिति सहित संरक्षक नियुक्त किया गया था।
ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत विद्यालय की स्थापना :-
स्वामी नारदानन्द जी महाराज ने साधकों के लिए एक आश्रम बनवाया था। आश्रम के समीप ब्रह्मचारियों को संस्कृत की शिक्षा देने के लिए ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत विद्यालय की स्थापना की थी। इस विद्यालय का विशाल परिसर इसके गौरवपूर्ण अतीत का बोध कराता है। कभी यहाँ सैकड़ों की संख्या में ब्रह्मचारी संस्कृत शिक्षा प्राप्त करते थे। यह नैमिषारण्य का सबसे समृद्ध और भव्य विद्यालय था। बटुक विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। संस्कृत विद्या और भारतीय संस्कृति से प्रेम करने वाले लोगों को चाहिए कि एऐसे संस्कृत विद्यालयों को गोद लेकर वहाँ शिक्षा और संसाधनों पर कुछ खर्च करें। इससे हमारी हिन्दू संस्कृति जीवन्त रह सके। हर हिन्दू भारतीयों को याद रखना चाहिए, जबतक संस्कृत विद्या जीवित है तभी तक हिन्दू संस्कृति भी जीवित है। अप्रैल से जुलाई के मध्य इन विद्यालयों में जाकर अपने सामर्थ्य के अनुसार पुस्तकें, वस्त्र, खाद्यान्न आदि दान देकर इन विद्यालयों को पोषण करना चाहिए। तीर्थ यात्रा का सच्चा फल तभी मिलेगा
प्रधानाचार्य राम चन्द्र पाण्डेय का लम्बा कार्य काल:-
नारदानन्द सरस्वती द्वारा संस्थापित संस्कृत विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य राम चन्द्र पाण्डेय ने अपने गुरुदेव की स्मृति में अध्यात्म विद्यापीठ ब्रह्मचर्याश्रम मे संस्कृत की शिक्षा गृहण कर रहे विद्यार्थियों को गर्म स्वेटर की वितरण किया और मन लगाकर शिक्षा अध्ययन करने के लिये प्रेरित किया। वे अपने गुरु ब्रह्मलीन स्वामी नारदानन्द सरस्वती का आदेश मानकर अपने जीवन के 45 वर्ष गुरुकुल की सेवा में अध्यापन करते हुये अर्पित किये। उन्होने बताया कि अपने घर से दूर नैमिष आश्रम में आवासीय गुरुकुल में रहकर संस्कृत और संस्कृति की शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र आगे चलकर देश देशांतर में धर्म का प्रचार प्रसार करते हुये भारतीय सनातन संस्कृति की धर्म पताका का संरक्षण व सम्वर्धन करते हैं, इन छात्रों को हम सभी को सहयोग कर उत्साह वर्धन का प्रसार करना चाहिये। 
पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी जी का भी साधना स्थल:-
पंडित मोहन प्यारे द्विवेदी ’’मोहन’’ का जन्म संवत 1966 विक्रमी तदनुसार 01 अप्रैल 1909 ई. में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के हर्रैया तहसील के कप्तानगंज विकास खण्ड के दुबौली दूबे नामक गांव मे एक कुलीन परिवार में हुआ था। पंडित जी को पड़ोस के गांव करचोलिया में 1940 ई. में वहां के प्रधानजी के सहयोग तथा शिक्षा विभाग में भाग दौड़कर एक प्राइमरी विद्यालय खोलना पड़ा था। जो आज भी चल रहा है। 1955 में वह प्रधानाध्यापक पद पर वहीं आसीन हुए थे। इस क्षेत्र में शिक्षा की पहली किरण इसी संस्था के माध्यम से फैला था। राजकीय जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद वह देशाटन व धर्म या़त्रा पर प्रायः चले जाया करते थे। उन्हांने श्री अयोध्याजी में श्री वेदान्ती जी से दीक्षा ली थी। उन्हें सीतापुर जिले का नौमिष पीठ बहुत पसन्द आया था। वहां श्री नारदानन्द सरस्वती के सानिध्य में वह रहने लगे थे। एक शिक्षक अपनी शिक्षण के विना रह नही सकता है। इस कारण पंडित जी नैमिषारण्य के ब्रहमचर्याश्रम के गुरूकुल में संस्कृत तथा आधुनिक विषयों की निःशुल्क शिक्षा देने लगे थे। उन्हें वहां आश्रम के पाकशाला से भोजन तथा शिष्यों से सेवा सुश्रूषा मिल जाया करती थी। गुरूकुल से जाने वाले धार्मिक आयोजनों में भी पंडित जी भाग लेने लगे थे। अक्सर यदि कही यज्ञानुष्ठान होता तो पण्डित जी उनमें जाने लगे थे। वह अपने क्षेत्र में प्रायः एक विद्वान के रूप में प्रसिद्व थे । 15 अपै्रल 1989 को 80 वर्ष की अवस्था में पण्डित जी ने अपने मातृभूमि में अतिम सासें लेकर परम तत्व में समाहित हो गये थे।
नैमिषारण्य का वर्णन पंडित जी ने इस प्रकार किया है :-

शुभ तपोभूमि ऋषि-मुनियों की, 
नैमिष’ ‘मिश्रिख’की पावन माटी।.
जहां अस्थिदान दे चुके दधीचि,
 यह त्याग तपस्या की परिपाटी।
यहां चक्र तीर्थ पावन पुनीत है,
 ललिता मैया की छवि सुभाटी ।
मैया सीता का धाम यहां , 
कण-कण में बसे श्रीराम सुहाटी।।1।।

तीर्थ नैमिष धाम की पहचान, 
बन रही यहां की गोमती मइया।
देव-ऋिषियों का गुणगान, 
कर रही यहां की प्यारी गइया।
ज्ञान गौरव भक्ति का भाव,
भर रही इसके तट के रहवइया।
तीर्थ-मठ-मंदिर-गुरु ऋषियों, 
का धाम यह है गुरुवइया।।2।।

धेनुए सुहाती हरी भूमि पर जुगाली किये, 
मोहन बनाली बीच चिड़ियों का शोर है।
अम्बर घनाली घूमै जल को संजोये हुए,
 पूछ को उठाये धरा नाच रहा मोर है।
सुरभि लुटाती घूमराजि है सुहाती यहां, 
वेणु भी बजाती बंसवारी पोर पोर है।
गूंजता प्रणव छंद छंद क्षिति छोरन लौ,
 स्नेह को लुटाता यहां नितसांझ भोर है।। 3।।

प्रकृति यहां अति पावनी सुहावनी है, 
पावन में पूतता का मोहन का विलास है।
मन में है ज्ञान यहां तन में है ज्ञान यहां,
 धरती गगन बीच ज्ञान का प्रकाश है।
अंग अंग रंगी है रमेश की अनूठी छवि,
 रसना पै राम राम रस का निवास है।
शान्ति सुहाती यहां हिय में हुलास लिये, 
प्रभु के निवास हेतु सुकवि मवास है।।4।।
            विद्यालय के वर्तमान प्रधानाचार्य जो पूर्व में एबीवीपी से सक्रिय रुप में जुड़े रहे आचार्य हरिओम शुक्ल की देखरेख विद्यालय अध्ययन -अध्यापन और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सुचारु रुप से संचालित कर रहा है।


सीता का जमीन में समाने का स्थान डा. राधेश्याम द्विवेदी

                               फलस्वाड़ी अयोध्या या सीतामढ़ी 
          रामायण में कथा है कि देवी सीता धरती से ही प्रकट हुई थीं और अंत में धरती में समा गईं। जिस स्थान पर देवी सीता भूमि में समाई थीं उस स्थान को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। 
           पहली बात तो यह कि माता सीता का धरती में समा जाने के प्रसंग पर मतभेद और विरोधाभाष है। पद्मपुराण की कथा में सीता धरती में नहीं समाई थीं बल्कि उन्होंने श्रीराम के साथ रहकर सिंहासन का सुख भोगा था और उन्होंने भी राम के साथ में जल समाधि ले ली थी।
           प्रमाणिक तौर ये बताना मुश्किल है कि मां सीता ने नैनीताल के सीताबनी पौड़ी के फलस्वाड़ी गांव ही धरती में समा गई थी या उत्तर प्रदेश के संत रविदास नगर (भदोई ) जिले में गंगा किनारे सीता मढ़ी स्थान पर समाधि ली थी टीवी धारावाहिक 'रामायण' के अनुसार, माता सीता ने अयोध्या में ही समाधि ली थी। ऐसे में ये बताना मुश्किल है कि माता सीता ने कहां भू-समाधि ली थी।
            वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के अनुसार प्रभु श्रीराम के दरबार में लव और कुश राम कथा सुनाते हैं। सीता के त्याग और तपस्या का वृतान्त सुनकर भगवान राम ने अपने विशिष्ट दूत के द्वारा महर्षि वाल्मीकि के पास सन्देश भिजवाया, 'यदि सीता का चरित्र शुद्ध है और वे आपकी अनुमति ले यहां आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित करें और मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें तो मैं उनका स्वागत करूंगा।
यह संदेश सुनकर वाल्मीकि माता सीता को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। काषायवस्त्रधारिणी सीता की दीन-हीन दशा देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों का हृदय दुःख से भर आया और वे शोक से विकल हो आंसू बहाने लगे।
        वाल्मीकि बोले, 'श्रीराम! मैं तुम्हें विश्‍वास दिलाता हूं कि सीता पवित्र और सती है। कुश और लव आपके ही पुत्र हैं। मैं कभी मिथ्याभाषण नहीं करता। यदि मेरा कथन मिथ्या हो तो मेरी सम्पूर्ण तपस्या निष्फल हो जाय। मेरी इस साक्षी के बाद सीता स्वयं शपथपूर्वक आपको अपनी निर्दोषिता का आश्‍वासन देंगीं।
           तत्पश्‍चात् श्रीराम सभी ऋषि-मुनियों, देवताओं और उपस्थित जनसमूह को लक्ष्य करके बोले, "हे मुनि एवं विज्ञजनों! मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के कथन पर पूर्ण विश्‍वास है परन्तु यदि सीता स्वयं सबके समक्ष अपनी शुद्धता का पूर्ण विश्‍वास दें तो मुझे प्रसन्नता होगी।"
            राम का कथन समाप्त होते ही सीता हाथ जोड़कर, नेत्र झुकाए बोलीं, "मैंने अपने जीवन में यदि श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्‍त कभी किसी दूसरे पुरुष का चिन्तन न किया हो तो मेरी पवित्रता के प्रमाणस्वरूप भगवती पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दें।" सीता के इस प्रकार शपथ लेते ही पृथ्वी फटी। उसमें से एक सिंहासन निकला। उसी के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने दोनों भुजाएं बढ़ाकर स्वागतपूर्वक सीता को उठाया और प्रेम से सिंहासन पर बिठा लिया। देखते-देखते सीता सहित सिंहासन पृथ्वी में लुप्त हो गया। सारे दर्शक स्तब्ध से यह अभूतपूर्व दृश्य देखते रह गए।इस सम्पूर्ण घटना से राम को बहुत दुःख हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे दुःखी होकर बोले, "मैं जानता हूं, मां वसुन्धरे! तुम ही सीता की सच्ची माता हो। राजा जनक ने हल जोतते हुए तुमसे ही सीता को पाया था, परन्तु तुम मेरी सीता को मुझे लौटा दो या मुझे भी अपनी गोद में समा लो।" श्रीराम को इस प्रकार विलाप करते देख ब्रह्मादि देवताओं ने उन्हें नाना प्रकार से सान्त्वना देकर सौंपा था।
समाधि स्थल पर संशय:-
हालांकि माता सीता ने समाधि कहां ली थी, इस पर संशय है! माता सीता द्वारा धरती में समा जाने की कथाओं में विभिन्न स्थानों का वर्णन है। ऐसे में माता सीता ने कहां पर समाधि ली थी, ये बताना मुश्किल है। 
नैनीताल का सीताबनी: -
एक मान्यता के अनुसार देवी सीता जहां धरती में समाई थीं वह स्थान आज नैनीताल में जिम कार्बेट नेशल पार्क है जो बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित है। यहां कभी महर्षि बाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। भगवान राम द्वार देवी सीता को अयोध्या से निकाले जाने के बाद लक्ष्मणजी देवी सीता को यहीं छोड़ आए थे। यहीं पर देवी सीता ऋषि के आश्रम में रहीं इसलिए इस स्थान को सीताबनी के नाम से जाना गया। जिस समय भगवान राम ने देवी सीता को वनवास का आदेश दिया था उस समय देवी सीता गर्भवती थीं। ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में ही इन्होंने अपने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया था और इनका पालन-पोषण किया था। इस घटना की याद मेंं सीताबनी में देवी सीता की प्रतिमा के साथ उनके दोनों पुत्रों को भी दिखाया गया है।सीताबनी का जिक्र कई धर्म ग्रंथों में मिलता है। रामायाण, स्कंदपुराण और महाभारत में भी इस तीर्थ के महत्व को दर्शाया गया है। महाभारत के 83वें अध्याय में वर्णित श्लोक संख्या 49 से 60 श्लोक तक सीताबनी का उल्लेख किया गया है। स्कंदपुराण में जिन सीतेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन किया गया है, वह यहीं विराजित हैं। स्कंदपुराण के अनुसार, कौशिकी नदी, जिसे वर्तमान में कोसी नदी कहा जाता है के बाईं ओर शेष गिरि पर्वत है। यह सिद्ध आत्माओं और गंधर्वों का विचरण स्थल है। इसी के पास स्थित है लक्ष्मणपुरा। जहां लक्ष्मणजी देवी सीता को अपने रथ से उताकर वन में छोड़ गए थे। तब उदास सीता ने बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में शरण ली थी।आश्रम के पास ही रामपुरा नामक स्थान है। जहां लव-कुश ने भगवान राम द्वारा छोड़ा गया अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ा था। यहां दो पहाड़ियों के बीच की खाई है,खाई में स्थित कुंज की वह स्थान है जहां से माता सीता धरती में समा गई थीं। देवी सीता की पुकार पर धरती माता ने पहाड़ी को दो भागों में चीर दिया था और देवी सीता को अपनी गोद में स्थान दिया।
उत्तराखंड का फलस्वाड़ी गांव:-
कुछ मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड के फलस्वाड़ी गांव में सीता माता ने भू-समाधि ली थी। माना जाता है कि पौड़ी के सितोलस्यूं में ही सीता ने भू-समाधि ली थी. यहां 11वीं शताब्दी के सीता मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और वाल्मीकि आश्रम मौजूद हैं. 
पुरातत्वविद् डॉक्टर यशवंत सिंह कठोच के अनुसार, माना जाता है कि फलस्वाड़ी गांव में ही सीता माता ने भू-समाधि ली थी. जनश्रुतियों के अनुसार यहां पर सीता माता का मंदिर भी था और बाद में वह भी धरती में समा गया था. इससे जुड़ी कथा के अनुसार, यहां नवंबर महीने मनसार का मेला लगता है।फलस्वाड़ी और कोट गांव, जहां लक्ष्मण मंदिर है, मिलकर इस मेले का आयोजन करते हैं. हर साल बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने आते हैं मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में ‘सीता माता सर्किट’ विकसित करने का ऐलान करते हुए कहा कि इन धार्मिक स्थलों की स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता है परंतु अन्य प्रदेशों के लोगों के इनके बारे कम जानकारी है. इसलिए देश भर के श्रद्धालुओं को यहां के धार्मिक महत्व के बारे बताने के लिए प्रचार प्रसार किया जाएगा उत्तराखंड के फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बनेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के अनुसार, यहां पर माता सीता का भव्य मंदिर बनने पर भगवान राम और सीता में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति फलस्वाड़ी गांव जरूर आना चाहेगा। इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु माता सीता के उस स्थल को भी देखना चाहेंगे, जहां पर माता सीता ने भू-समाधि ली थी। फलस्वाड़ी गांव में माता सीता का भव्य मंदिर बनान के लिए इस क्षेत्र के हार गांव से और हर घर से एक शिला एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपये दान स्वरुप लिए जाएंगे। 
रविदास नगर (भदोई )जिले का सीतामढ़ी मंदिर:-
वह गंगा किनारे एक स्थान पर समाधि ली थी। कहा जाता है कि मां सीता ने तब देखा कि लव और कुश भगवान राम का मुकुट लेकर आए गए तो उनसे रहा नहीं गया और वह दुखी होकर धरती में समा गईं। कुछ लोग बिहार स्थित सीतामढ़ी को उनका समाधि स्‍थल बताते हैं तो कई उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर व संत रविदास नगर में गंगा किनारे उनके रहने और समाध‌ि लेने की बात करते हैं। भदोई जिले का सीता समाहित स्थल सीतामढ़ी मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से ११ किलोमीटर गंगा के किनारे स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर माँ सीता से अपने आप को धरती में समाहित कर लिया था। यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है। स्वामी जितेंद्रानंद जी के असीम प्रयास से और श्री प्रकाश नारायण पुंज की मदद से ये स्थान पर्यटक स्थल के रूप में उभर कर आया है
अयोध्या का राज दरबार:-
 रामायण से जुड़ी अन्य किंवदंतियों के अनुसार लव और कुश के बड़े होने पर जब एक बार भगवान राम ने मां सीता को अपने दरबार में बुलाया और पुन: अपने शुद्धता की शपथ लेने की बात कही। तो मां सीता उनकी इस बात से आहत हो गई और धरती मां से उन्हें अपनी गोद में बैठाने का आग्रह किया। जिसके बाद भरे दरबार में धरती फट गई और मां सीता उनकी गोद में समा गईं। अगर इस किंवदंति को सच माना जाए तो माता सीता ने अयोध्या में समाधि ली थी।

Wednesday, January 12, 2022

विवाह के समय राम और सीता की उम्र

माता सीता के विवाह के लिए रखे गए स्वयंवर में श्री राम ने शिव धनुष को भंग कर माता सीता से विवाह किया था. रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने एक दोहा लिखा है, जिसे राम और सीता की आयु के बीच कितना अंतर था, यह साफ हो जाता है. मगर विवाह के समय दोनों की उम्र कितनी थी इसके बारे में वाल्मीकि रामायण में मालूम चलता है.

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरितमानस में एक दोहा आता है- “वर्ष अठ्ठारह की सिया, सत्ताईस के राम || 
               कीन्हो मन अभिलाष तब, करनो है सुर काम” ||

इस दोहे से यह साफ हो जाता है कि श्री राम और सीता की उम्र के बीच लगभग 9 वर्ष का अंतर था. मगर इनकी शादी किस उम्र में हुई थी. इसके बारे में वाल्मीकि रामायण में बताया गया है कि विवाह के समय भगवान राम की आयु 13 वर्ष और माता सीता की आयु 6 वर्ष थी.

वाल्मीकि रामायण के अनुसार
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, 18 वर्ष की आयु में माता सीता भगवान राम के साथ वन में चली गई थीं. 14 वर्षों के बाद वो वनवास से लौटीं और 33 वर्ष की आयु में अयोध्या की महारानी बनीं. वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में प्रभु राम और माता सीता की उम्र को लेकर एक प्रसंग मिलता है. इस प्रसंग में सीता, साधु के रूप में आए रावण को अपना परिचय इस प्रकार देती हैं.

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुंजना मानुषान् भोगान् सर्व कामसमृद्धिनी।1।
तत्र त्रयोदशे वर्षे राजामंत्रयत प्रभुः।
अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमंत्रिभिः।2।
परिगृह्य तु कैकेयी श्वसुरं सुकृतेन मे।
मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्।3।
द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।
मम भर्ता महातेजा वयसा पंचविंशक:।
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।।

वनवास के समय की आयु:-
सीता रावण से कहती हैं कि विवाह के बाद 12 वर्ष तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी सुख भोगे हैं. मैं वहां सदा मनोवांछित सुख- सुविधाओं से संपन्न रही हूं. इसके बाद वो कहती हैं कि वन जाते समय मेरे पति की आयु 25 साल थी और मेरे जन्म काल से लेकर वन के लिए प्रस्थान के वक्त तक मेरी अवस्था वर्ष गणना के अनुसार 18 साल की हो गई थी.

माता सीता और मंगल देव पृथ्वी मां की संतानें

          देवी सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं। इसलिए इन्हें ‘जानकी, जनकात्मजा, जनकसुता, वैदेही भी कहा जाता है। राजा जनक को खेत में हल जोतते समय माता सीता मिली थी। माता सुनयना ने मातृत्व को स्वीकार कर पालन किया। भूमी से उत्पन्न होने के कारण ही ‘भूमिपुत्री’ या ‘भूसुता’ कहा जाता है। मिथिला की राजकुमारी होने से ‘मैथिली’ नाम से प्रसिद्ध है।
          मार्गशीर्ष (अगहन) मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि में भगवान श्रीरामचन्द्र तथा जनकपुत्री माता जानकी (सीता) का विवाह हुआ था, तभी से इस पंचमी को ‘विवाह पंचमी पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि विवाह के समय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र उपस्थित थे। कहा जाता है कि उनका विवाह देखने को स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आए थे। दूसरी ओर सभी देवी और देवता भी विभिन्न वेश में उपस्थित थे। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म की बारी आई। इस रस्म में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। विवाह करवाने वाले पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई को बुलाने के लिए कहा तो वहां समस्या खड़ी हो गई, क्योंकि उस समय तक जनक का कोई पुत्र नहीं था। ऐसे में सभी एक दूसरे से विचार करने लगे। इसके चलते विवाह में विलंब होने लगा।
            वाल्मीकी रामायण, श्रीरामचरितमानस आदि प्रसिद्ध ग्रंथों में सीताजी के किसी भी भाई का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता, किंतु कई ग्रंथों में सीताजी के भाई का परिचय प्राप्त होता है।
          श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने 'जानकी मंगल' में मंगल और देवी सीता के बीच भाई-बहन के स्नेह के एक दुर्लभ दृश्य के संकेत दिए गए हैं। जानकी मंगल के अनुसार, देवी सीता की शादी के वक्त जब लावा परसाई रस्म का समय आया तो शादी करा रहे ऋृषिवर ने दुल्हन के भाई को बुलाया। 
           अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देखकर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। तभी अकस्मात एक रक्तवर्ण का युवक उठा और इस रस्म को पूरा करने के लिए आकर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मैं हूँ इनका भाई। दरअसल, वह और कोई नहीं बल्कि स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीरामचन्द्र और सीता का विवाह देखने हेतु वहां उपस्थित हुए थे। चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इसी सम्बन्ध से मंगलदेव माता सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आए।
           अनजान व्यक्ति को इस रस्म को निभाने को आता देख कर राजा जनक दुविधा में पड़ गए। जिस व्यक्ति के कुल, गोत्र एवं परिवार का कुछ आता पता ना हो उसे वे कैसे अपनी पुत्री के भाई के रूप में स्वीकार कर सकते थे। उन्होंने मंगल से उनका परिचय, कुल एवं गोत्र पूछा।
          राजा जनक के आपत्ति लिए जाने के बाद मंगलदेव ने कहा, ‘हे राजन! मैं अकारण ही आपकी पुत्री के भाई का कर्तव्य पूर्ण करने को नहीं उठा हूं। मैं इस कार्य के सर्वथा योग्य हूं। अगर आपको कोई शंका हो तो आप महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस विषय में पूछ सकते हैं।’
        एसी वाणी सुनकर राजा जनक ने महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस बारे में पूछा। दोनों ही ऋषि इस रहस्य को जानते थे अतः उन्होंने इसकी आज्ञा दे दी। 
        मंगल देव अपनी बहन सिया के हाथों में लाजा भर रहे हैं, सीताजी के कर कमलों से ही श्रीराम के भी कर कमल लगे हैं। ऋषिवर के मुख से उच्चारित इस मंत्र के उद्घोष के मध्य सीताजी अपने भाई मंगल द्वारा तीन बार प्रदत्त लाजा का पति श्रीरामचन्द्र संग अग्नि में होम कर रही हैं।
             ॐ अर्यमणं देवं। ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा।
                  ॐ इमांल्लाजानावपाम्यग्न।
                       (पार०गृ०सू० १ /६ /२) 
             इस प्रकार सभी की आज्ञा पाकर मंगलदेव ने माता सीता के भाई के रूप में सारी रस्में निभाई। जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ग्रन्थ जानकी मंगल में इस प्रकार किया है। 
             सिय भ्राता के समय भोम तहं आयउ।
             दुरीदुरा करि नेगु सुनात जनायउ॥
                         (जानकी मंगल १४८)
         जानकी मंगल में बताया गया है कि इस रस्म को मंगल द्वारा पूरा किया गया था। बताया जाता है कि मंगल यहां मां पृथ्वी के आदेश पर वेष बदलकर पहुंचे थे। गौरतलब है कि आज तक शादी में होने वाली लावा परसाई रस्म को दुल्हन का भाई ही पूरी करता है। अगर किसी को अपना भाई नहीं होता है तो दूर के भाई इस रस्म को पूरा करता है। इस तरह मंगल हमारे मामा हुए।
सीताजी यह भाई हैं: इसके अतिरिक्त जैन रामायण में सती सीता महाराज जनक की पुत्री थी | माता का नाम पृथ्वी और भाई का नाम भामंडल था |
           भगवान रामचन्द्र और माता सीताजी का विधिवत विवाह संस्कार हुआ एवं साथ में देवी उर्मिला- श्रीलक्ष्मणजी, देवी मांडवी- श्रीभरतजी एवं देवी श्रुतकीर्ति का विवाह श्रीशत्रुघ्नजी से विवाह संस्कार सम्पन्न हुआ।
           











 

Thursday, January 6, 2022

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का सकुशल वापसी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी कल 5 जनवरी को सुबह बठिंडा पहुंचे, जहां से वे हेलीकॉप्टर से हुसैनीवाला स्थित राष्ट्रीय शहीद स्मारक जाने वाले थे। बारिश और खराब दृश्यता के कारण प्रधानमंत्री ने करीब 20 मिनट तक मौसम साफ होने का इंतजार किया। जब मौसम में सुधार नहीं हुआ तो निर्णय लिया गया कि प्रधानमंत्री सड़क मार्ग से राष्ट्रीय शहीद स्मारक जाएंगे, जिसमें दो घंटे से अधिक समय लगेगा। डीजीपी पंजाब पुलिस द्वारा आवश्यक सुरक्षा प्रबंधों की आवश्यक पुष्टि के बाद प्रधानमंत्री सड़क मार्ग से यात्रा के लिए रवाना हुए।
           हुसैनीवाला स्थित राष्ट्रीय शहीद स्मारक से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर, जब प्रधानमंत्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर पहुंचा तो पाया गया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने सड़क को अवरुद्ध कर दिया है। प्रधानमंत्री 15-20 मिनट तक फ्लाईओवर पर फंसे रहे। यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा में एक बड़ी चूक थी। यह स्थान अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 30किमी के अंदर था जो अति संवेदन शील क्षेत्र में आता है और यहां अनेक विषफोट भी हो चुके हैं।
            प्रधानमंत्री के कार्यक्रम और यात्रा की योजना के बारे में पंजाब सरकार को पहले ही जानकारी दे दी गयी थी। प्रक्रिया के अनुसार, उन्हें लॉजिस्टिक्स व सुरक्षा के साथ-साथ आकस्मिक योजना को तैयार रखते हुए इस सम्बन्ध में आवश्यक व्यवस्था करनी होती है। आकस्मिक योजना को ध्यान में रखते हुए, पंजाब सरकार को सड़क मार्ग से किसी भी यात्रा को सुरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा तैनात करनी चाहिए थी, जिनकी स्पष्ट रूप से तैनाती नहीं की गयी थी। इस सुरक्षा चूक के बाद, बठिंडा हवाई अड्डे पर वापस लौटने का निर्णय लिया गया।
पंजाब में पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में भारी चूक का यह मामला 5 जनवरी को पंजाब के दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफिले को कुछ प्रदर्शन कारियों ने सड़क के रास्ते हुसैनीवाला जाते समय रोक कर वापस जाने के लिए बाध्य
किया।
           कवि कुमार विश्वास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा में चूक के मद्दे पर अपने ताजा ट्वीट में कहा है- 'PM चाहे सरकारी यात्रा पर हों या पार्टी प्रचार के लिए, वे भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री होते हैं। उनकी सुरक्षा में चूक बेहद गंभीर विषय है। हम पहले भी अपने दो-दो प्रधानमंत्रियों इंदिरा जी और राजीव जी को ऐसी चूकों के कारण खो चुके हैं। केंद्र व राज्य की सरकारें इस पर राजनीति करने की बजाय ज़िम्मेदारी तय करें।'
गृह मंत्रालय (एमएचए) ने इस गंभीर सुरक्षा चूक का संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। राज्य सरकार को इस चूक की जिम्मेदारी तय करने और सख्त कार्रवाई करने के संकेत दिए हैं। उच्चतम न्यायालय भी इस पर अब विचार कर रहा है। काश ये सब समय पर होता तो कितना उत्तम रहता।
प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक और कांग्रेस की नीयत:-
पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक के प्रश्न को बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इस घटना ने भारत की राजनीति के गिरते स्तर को सबके सामने खोलकर रख दिया है । 'टंगड़ी मार' राजनीति करने की राहुल गांधी की सोच प्रकट करने वाली यह घटना बताती है कि कांग्रेस के नेता को प्रधानमंत्री बनने की कितनी जल्दी है ? वह संवैधानिक
रास्तों को न अपनाकर हिंसा के माध्यम से सत्ता को प्राप्त करने की युक्तियां खोज रहे हैं। गांधी की अहिंसा में विश्वास रखने वाले गांधीवादियों की ऐसी हालत को देखकर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में गांधी की अहिंसा की हत्या इन लोगों ने ही की है।
 वैसे महात्मा गांधी स्वयं भी टंगड़ी मार थे :-
देखने में साधारण परंतु अंदरूनी तौर पर वे राजनीति करने में एक दक्ष अभ्यासी थे। उन्होंने सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल
के साथ क्या किया था? - इसे सब जानते हैं। अपनी जिद के सामने गांधी ने कई लोगों की राजनीतिक हत्याएं कीं है।
'हत्या', जिद और अहंकार के प्रतीक महात्मा गांधी के उसी गांधीवाद का अनुसरण करते हुए यदि राहुल गांधी भी देश की राजनीति में हिंसा के प्रवेश को सम्मिलित कर राजनीति की दिशा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं तो उनका यह घृणास्पद प्रयास देश के लिए कभी भी अच्छा नहीं हो सकता।
कई प्रश्न खड़े होते हैं:-
         इस घटना से कई प्रश्न खड़े होते हैं पहला प्रश्न तो यही है कि प्रधानमंत्री के काफिले के यात्रा मार्ग की जानकारी केवल पंजाब पुलिस को थी तो उनकी यह जानकारी आम आदमी तक किसने पहुंचाई? यदि पंजाब पुलिस को यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग को रोकेंगे और उस समय कोई भी घटना घटित हो सकती है तो उन्होंने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाया अर्थात प्रदर्शनकारियों को प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग से अलग क्यों नहीं किया? 
यदि पंजाब पुलिस ने यह देख लिया था और समझ लिया था कि प्रदर्शनकारी किसान किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग से हटने वाले नहीं हैं तो उन्होंने समय रहते प्रधानमंत्री का यात्रा मार्ग बदला क्यों नहीं ? 
इंदिरा जी की हत्या राजीव गांधी की हत्या से पंजाब पुलिस को सीख क्यों नही ली। यह भी हो सकता है कि उसी प्रकार की घटना सरकारी वर्दी धारी दुहराने वाले या लापरवाही करने वाले भी हो सकते हैं।
         कांग्रेस के नेता और विशेष रूप से राहुल गांधी इस घटना के बारे में अपनी ओर से चाहे जितनी सफाई दें पर एक बात स्पष्ट है कि राहुल गांधी का छिछोरापन अब देशवासियों को रास नहीं आ रहा है। वह कदम - कदम पर झूठ, छल, फरेब और तुच्छ राजनीति का प्रमाण पहले भी देते रहे हैं , लेकिन सत्ता स्वार्थ के लिए वह इतना गिर जाएंगे , यह तो किसी ने सोचा नहीं था ? राजनीति के प्रति गंभीर चिंतन रखने वाले लोगों ने राहुल गांधी को उस समय ही समझ और परख लिया था जिस समय उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कुछ कागजों को फाड़ कर फेंक दिया था। देश के प्रधानमंत्री के प्रति ऐसा भाव रखने वाले राहुल गांधी कितने छिछोरे हो सकते हैं ? - इस बात की जानकारी देश को मिल तो चुकी थी और उसका परिणाम भी देश के मतदाताओं ने अगले चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर राहुल गांधी और उनकी पार्टी को चखा दिया था परंतु इसके उपरांत भी राहुल गांधी की छिछोरी राजनीति का यह सिलसिला रुका नहीं। वह निरंतर गिरते गए। वास्तव में कांग्रेस के गांधी नेहरू परिवार के लोगों ने देश को अपनी जागीर समझ लिया है। इनके दिमाग खराब हो चुके हैं। इनकी सोच यह बन गई है कि देश को चलाना केवल हमको आता है, और देश की जनता चाहे जो जनादेश दे हम उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
अब देश का मतदाता बहुत जागरूक हो चुका है। कांग्रेस
की मूर्खता और पापों का बोझ ढोते - ढोते आम आदमी की कमर टूट चुकी है। मां भारती घायल है और जितने छल प्रपंच रच रचकर इन्होंने सत्ता के सहारे देश के बहुसंख्यक के साथ अन्याय किया है उसका हिसाब अब चुकता हो रहा है। 
बार - बार चुनाव में हारती कांग्रेस अब इस समय पूर्णतया बौखला चुकी है। उसी बौखलाहट का परिणाम है पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक का यह मामला।
         सारा देश यह जानता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के आने वाले चुनावों में कांग्रेस दिखावटी प्रयास कर रहा है। उधर राजस्थान भी अगले चुनावों में कांग्रेस के हाथों से जाने वाला लगता है।राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस को जनादेश का सम्मान करना सीखना चाहिए। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी है, वह भी इसी देश के रहने वाले हैं।
           लोकतंत्र में किसी भी पार्टी को सरकार बनाने का अधिकार होता है। परंतु इसके लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक उपायों का सहारा लेना ही श्रेयस्कर माना जाता है। कांग्रेस को संवैधानिक और लोकतांत्रिक उपायों का सहारा लेकर जनता जनार्दन का समर्थन जुटाना चाहिए। इसके लिए ठोस राजनीति और ठोस रणनीति पर काम करने के लिए उसके पास कई विकल्प हैं। राजनीति में शोर-शराबे को स्थान देकर उसी के आधार पर सत्ता तक पहुंचने की जिस राजनीति को राहुल गांधी कर रहे हैं उसे किसी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। वह आत्महत्या की डगर पर बढ़ते जा रहे हैं। उनकी सोच बन गई है कि जनता स्वयं ही मोदी को सत्ता से हटा देगी और उस समय एक विकल्प के रूप में केवल वह ही एक ही चेहरा होंगे। जबकि अब उनके साथी अर्थात विपक्षी दल भी उन्हें किसी भी तरह का 'चेहरा ' मानने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि कांग्रेस के भीतर भी यदि निष्पक्ष सर्वे कर लिया जाए तो पता चल जाएगा कि वहां भी उनके विरोध में लोग अधिक निकलेंगे। ऐसे में राहुल गांधी यदि अब भी कोई सुनहरा सपना देख रहे हैं तो इसे उनका एक और छिछोरापन ही कहा जाएगा।