Thursday, April 9, 2026

अयोध्या का दिव्य और पौराणिक स्थल: स्वर्गद्वार ✍️आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

सरयू के दक्षिणी तट पर बसी अयोध्या नगरी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के पूर्वजों की नगरी माना जाता है। प्राचीन काल में यह नगरी साकेत अथवा कौशल देश के नाम से भी विख्यात रही है - 

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या”, 

यानी आठ चक्रों और नौ द्वारों से युक्त अयोध्या साक्षात् ईश्वर की नगरी है। वेदों में वर्णित इस नगरी को स्वर्ग की उपाधि दी गयी है। कहा जाता है कि यह सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी हुआ करती थी और बीतते वक्त के साथ साथ यहां हिंदू, सिक्ख, बौद्ध, जैन एवं मुस्लिम आदि धर्मों का भी प्रभाव देखा जा सकता है। सातवीं शताब्दी में भारत आये चीनी यात्री ह्वेनसांग के लेखों में भी कहा गया है कि अयोध्या में लगभग 20 बौद्ध मंदिर और अनेकों बौद्ध भिक्षुकों का वास था।

अयोध्या के सबसे अति विशिष्ट स्थलो में श्री राम जन्म भूमि मंदिर (रामकोट) है, जहाँ नव निर्मित भव्य मंदिर में रामलला अपने पूरे परिकरों के साथ विराजमान हो गए हैं। अन्य प्रमुख स्थलों में हनुमान गढ़ी, राज द्वार, कनक भवन, सरयू नदी के घाट, राम की पौड़ी, स्वर्ग द्वार और गुप्तार घाट आदि प्रमुख है। श्री रुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या माहात्म्य में शंकरजी ने पार्वतीजी से इस प्रकार कहा है - 

प्रथमं तत्र तीर्थं तु कथयामिवरानने। 

स्वर्गद्वारं समुत्पन्नं प्रथमं सरयूतटे ॥ 

- (श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या माहात्म्य  चौथा अध्याय, श्लोक 1)

अर्थ : हे वरानने! अयोध्यापुरीका सर्वप्रथम तीर्थ स्वर्गद्वार; जो कि सरयूजी के किनारे विराजमान है; उसका मैं तुमसे सबसे पहले वर्णन करता हूँ ॥ 

मुक्ति (भूत) गली है आस्था, रहस्य और विज्ञान का केंद्र :- 

मुक्तिद्वारमिदं ज्ञेयं स्वर्गप्राप्तिकरं नृणाम्।

स्वर्गद्वारस्य माहात्म्यं विस्तराद् वक्तुमीश्वरः।

नहि कश्चिदतो वच्मि संक्षेपाच्छृणु सुव्रते।

- (श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या माहात्म्य  चौथा अध्याय, श्लोक 2)

अर्थ: हे उत्तम व्रतको धारण करने वाली पार्वती! इस तीर्थ को मुक्ति का द्वार तथा मनुष्यों को स्वर्ग देने वाला समझो। इस स्वर्ग द्वार-तीर्थ की महिमा का कोई भी विस्तार पूर्वक वर्णन करनेमें समर्थ नहीं है। 

ग्रन्थों में उल्लिखित है ये स्थान :- 

भगवान राम की नगरी अयोध्या में स्वर्गद्वार के नाम से एक ऐसा स्थल है, जिसकी मान्यता विष्णुपुराण, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या माहात्म्य : रुद्रयामलोक्त एवं स्कन्दपुराणोक्त और अयोध्या दर्शन आदि आध्यात्मिक ग्रन्थों में विस्तार से दिया गया है।

8 हजार से ज्यादा मंदिर हैं अयोध्या में- 

अयोध्या मंदिरों की नगरी है । यहां लगभग 8,000 मठ, मंदिर,आश्रम और आवासीय भवन हैं, जिनमें से लगभग 1,080 को मठों, आश्रमों और मंदिरों के रूप में पहचाना गया है, जबकि बाकी आवासीय हैं। जर्जर मंदिरों की संख्या 182 से 500+ तक बताई गई है, लेकिन इसकी कोई निश्चित आधिकारिक आंकड़ा एकत्र नहीं किया जा सका है। 

अवस्थिति:- 

अयोध्या का स्वर्गद्वार मोहल्ला सरयू के किनारे बसा हुआ है। सरयू नदी के उत्तरी गोण्डा की तरफ पुल बनने से पहले इस दैवी सरिता की धारा स्वर्ग द्वार मुहल्ले से स्पर्श कर बहती थी। आज प्राचीन सरयू नदी के स्थल पर राम की पैड़ी बन गई है।

सरयू नदी अयोध्या से दूर हटती गोण्डा और बस्ती जिले के भू भाग को अपने आंचल में समेटती जा रही है। अयोध्या और उत्तर प्रदेश प्रशासन कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं है।

सत्यायां सप्तहरयो वर्तन्ते पुण्यवर्धनाः । गुप्तहरिश्चक्रहरिस्तथा विष्णुहरिः प्रिये ॥

धर्महरिर्बिल्वहरिस्तथा पुण्यहरिः शुभः । एतेषां दर्शनाद् देवि पुण्यवृद्धिः प्रजायते ॥ 

- (श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या माहात्म्य पांचवां अध्याय, श्लोक ३६,३७)

अर्थ: श्रीशंकरजी पार्वतीजीसे कहते हैं कि हे प्रिये! सत्या अर्थात् अयोध्यापुरीमें सात 'हरि' हैं। अयोध्या के प्राचीन रामकोट से 700 मीटर उत्तर में स्थित स्वर्गद्वार के पास सात हरियों से स्वर्ग द्वार बना हुआ है। उनके नाम क्रमशः चन्द्रहरि, चक्रहरि, गुप्तहरि, विष्णुहरि, धर्महरि, बिल्वहरि और पुण्यहरि हैं। हे देवि! इनके दर्शनोंसे पुण्यकी वृद्धि होती है ।

यहां सरयू नदी किनारे स्वर्ग द्वार के विभिन्न आवासीय और धार्मिक स्थल है, जहां करीब 1500 घर बने हुए हैं। स्वर्ग द्वार तीर्थ क्षेत्र प्राचीन काल में ही बसा था। त्रेता युग में भगवान राम स्वर्ग द्वार से ही निकल कर सरयू नदी के गुप्तार घाट पर अपनी इह लीला समेटी थी। उनके साथ-साथ इस मोहल्ले में बसे लोग भी इस पावन नदी में समाहित हो गए थे। लक्ष्मण जी इसी तीर्थ स्थल के सहस्रधार (वर्तमान लक्ष्मण किला) से ही अपनी लीला का संवरण किया था।

स्वर्ग द्वार कहने के पीछे का रहस्य :-

अयोध्या का स्वर्गद्वार विशिष्ट महत्व वाला क्षेत्र कहा जाता है। इसे स्वर्ग द्वार कहने के पीछे का रहस्य को समझना जरूरी है।

सहस्त्रधारामारभ्य पूर्वतः सरयूजले ॥ षट्त्रिंशदधिकं प्रोक्तं धनुषां षट्शतानि च। स्वर्गद्वारस्य विस्तारः पुराणज्ञैः प्रकीर्तितः ॥ 

- (श्रीरुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या माहात्म्य  चौथा अध्याय , श्लोक 3)

सरयू तट के सहस्त्र धारा तीर्थ से लेकर पूर्व दिशा में 636 धनुष या 1272 गज या 1.16 किमी. तक पुराण के ज्ञाताओं ने स्वर्गद्वार का विस्तार बतलाया है।अयोध्या में स्वर्गद्वार के नाम से एक विशिष्ट महत्व वाला प्राचीन स्थल है, जिसकी मान्यता विष्णु पुराण और वाल्मीकि रामायण में मिलता है।

स्वर्ग द्वार नाम पुकारने के चार कारण- 

1.विश्वामित्र की यज्ञस्थली के रूप में - 

इस स्वर्गद्वार की स्थापना विश्वामित्र ने की थी। विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु की सेवा से खुश होकर वरदान मांगने को कहा, जिस पर राजा त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग प्राप्ति का वरदान मांगा। महर्षि विश्वामित्र ने इसके लिए विशेष यज्ञ कराया, जिस स्थान में यज्ञ हुआ, उसी स्थान को स्वर्गद्वार के नाम से जाना जाता है। यहीं से राजा त्रिशंकु को स्वर्ग भेजा गया था। विश्वामित्र ने काल की गणना के अनुसार सरयू की सहस्त्र धारा से पूर्व की ओर 200 धनुष और फिर दक्षिण ओर 200 धनुष की जमीन का माप किया। विश्वामित्र ने उसी क्षेत्र में यज्ञ शुरू किया।,इसी स्थान से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजा गया। इस घटना के बाद से ही इस स्थान को 'स्वर्गद्वार' के नाम से जाना जाता है, जो एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। 

2.प्रभु राम की दिव्य लीला स्थली :- 

मुक्ति गली आज भी धार्मिक आस्था और रहस्यों का प्रतीक बनी हुई है। जहां एक ओर विज्ञान इसे समझने की कोशिश कर रहा है, वहीं श्रद्धालु इसे प्रभु राम की नगरी की दिव्य देन मानते हैं। 

चतुर्धा च तनुं कृत्वा देवदेवो हरिः स्वयम् ।

अत्रैव रमते नित्यं भ्रातृभिः सह राघवः ॥ 

- (सन्दर्भ: उपरोक्त श्लोक २२) 

अर्थ: परम ब्रह्म भगवान विष्णु अपने स्वरूप को चार शरीर में व्यक्त करके रघुवंशशिरोमणि श्रीराम के रूप में अवतरित होकर अपने तीनों भाइयों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ यहां नित्य विहार करते रहे हैं।


3. शिवजी की कृपा वाला विशेष क्षेत्र- 

नागेश्वरनाथ मंदिर को लेकर मान्यता है कि इसकी स्थापना भगवान राम के पुत्र कुश ने की थी। कहा जाता है कि सर्वप्रथम प्राचीन अयोध्या का जीर्णोद्धार महाराज कुश ने ही किया था। मान्यता है कि एक बार सरयू नदी में विहार करते हुए कुश की अंगूठी पानी में गिर गई जो एक नाग कन्या को मिली। महाराज कुश ने अंगूठी लौटाने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया। इस पर कुश नाराज हो गए और दण्ड देने के लिए धनुष का संधान करने वाले थे। नागकन्या के पिता ने कुश के कोप से बचने के लिए भगवान शिव की प्रार्थना की। भगवान शिव जी प्रकट हुए और कुश को शांत कराया साथ ही नागकन्या का विवाह भी उनसे करा दिया। इसके उपरांत महाराज कुश ने भगवान शिव से यहीं बसने की प्रार्थना की। इनकी प्रार्थना पर भगवान शिवलिंग नागेश्वर नाथ के रूप में स्थापित हुए।

महाराज कुश ने उनका पूजनकर मंदिर का निर्माण कराया। तभी से इसी स्वर्गद्वार के नागेश्वरनाथ मंदिर में कैलाश निवासी देवाधिदेव भगवान शिव भी वास करते हैं। इस कारण इसे स्वर्ग द्वार कहा जाने लगा।

4. ब्रह्मा सहित दैवी शक्तियों का वास- 

ब्रह्मलोकं परित्यज्य चतुर्वक्त्रः सनातनः ।

अत्रैव रमते नित्यं देवैः सह पितामहः ॥ 

- (सन्दर्भ: उपरोक्त श्लोक २३) 

सनातन चतुर्मुख पितामह ब्रह्माजी भी ब्रह्मलोक को छोड़कर देवगणों के साथ नित्य इसी स्वर्गद्वारमें रमण करते हैं ॥

मुनयो देवताः सिद्धाः साध्या यक्षा मरुद 

गणा:।

यज्ञोपवीतमात्रेण विभागं चक्रिरे भुवः ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक १७) 

मुनि, देवता, सिद्ध, साध्य, यक्ष और मरुद्गण- इन सभीने स्वर्गद्वार में रहने की कामना से अपने-अपने निवास हेतु 'यज्ञोपवीत' परिमाण से वहाँ के भूभागका बँटवारा किया था ।

मध्याह्नेऽत्र प्रकुर्वन्ति सान्निध्यं देवतागणाः। 

तस्मादत्र प्रकुर्वन्ति मध्याह्ने स्नानमादरात्॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक १८) 

समस्त देवगण मध्याह्नकालमें इस स्वर्गद्वार तीर्थ में नियमतः उपस्थित हो जाते हैं, इसलिये यहाँपर भक्त जन उत्कट श्रद्धा से मध्याह्न के समय भी स्नान करते हैं।

तत्र सिद्धा महात्मानो मुनयः पितरस्तथा ।

स्वर्गं प्रयान्ति ते सर्वे स्वर्गद्वारं तु तत्स्मृतम्। 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २१) 

उस स्वर्गद्वार तीर्थ में सिद्धलोग, महात्मा गण, मुनि समूह तथा पितर लोग भी स्नानादि सत्कर्म करके स्वर्ग गमन करते हैं, इसलिये यह तीर्थ 'स्वर्गद्वार' शब्द से विख्यात है ।

उपवास और दान की महत्ता :- 


कुर्वन्त्यनशनं ये तु स्वर्गद्वारे जितेन्द्रियाः ।

प्रयान्ति परमं स्थानं ये च मासोपवासिनः ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक १९) 

जो लोग इस स्वर्गद्वार तीर्थ में इन्द्रियों को जीतकर उपवास करते हैं तथा जो लोग यहाँ एक मास तक निराहार रहते हैं, वे उत्तम दिव्यलोक को प्रयाण करते हैं ।

अन्नदानरता ये च रत्नदा भूमिदा नराः।

गोवस्त्रदाश्च विप्रेभ्यस्ते यान्ति परमां गतिम् 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २०) 

जो लोग स्वर्गद्वारमें सुयोग्य अधिकारी ब्राह्मणों को सत्कार पूर्वक अन्नदान, रत्नदान, भूमिदान, गोदान तथा वस्त्रदान देते हैं, वे जन उत्तमोत्तम गति को प्राप्त होते हैं।

स्वर्गद्वारमें प्राण छोड़ने वाला विष्णु लोक का अधिकारी :- 

अकामोवा सकामोवाचापितिर्यग्गतोऽपिवा।

स्वर्गद्वारे त्यजन् प्राणान्विष्णुलोकेमहीयते।

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक १६) 

अर्थ: चाहे कामना हीन हो या कामना वाला हो अथवा पशु-पक्षियों की योनि में गया हुआ प्राणी हो, यदि वह भी स्वर्गद्वार में प्राण छोड़ता है, तो विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।

मेरुमन्दरतुल्योऽपि राशिः पापस्य कर्मणः ।

स्वर्गद्वारं समासाद्य पापं व्रजति संक्षयम् ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २४) 

यदि सुमेरु तथा मन्दराचल पर्वत के तुल्य भी पापकर्मों की राशियाँ हों, तो भी स्वर्गद्वार में पहुँचे हुए प्राणी के वे पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं ।

या गतिर्ज्ञानतपसां या गतिर्यज्ञयाजिनाम् ।

स्वर्गद्वारे मृतानां तु सा गतिर्विहिता तथा ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २५) 

जो गति ज्ञानी तपस्वियों की होती है तथा जो गति यज्ञ करने वालों को मिलती है, वही गति स्वर्गद्वार तीर्थ में शरीर छोड़ने वालों को मिलती है।

ऋषिदेवासुरगणैर्जपहोमपरायणैः     । 

यतिभिर्मोक्षकामैश्च स्वर्गद्वारो निषेव्यते।

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २६) 

इसीलिये मोक्ष की कामना वाले संन्यासी गण और जप, होमादि में तल्लीन हुए ऋषिगण, देवगण एवं असुर गण स्वर्गद्वार तीर्थ का सदैव सेवन करते हैं ।

स्वर्गद्वारि मृतः कश्चिन्नरकं नैव पश्यति। 

केशवानुगृहीताश्च सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २७) 

स्वर्गद्वार में शरीर छोड़ने वाला कोई भी जीव नरकों को नहीं देखता; क्योंकि वे सब स्वर्गद्वार में शरीर त्याग के कारण भगवान्‌ के कृपा पात्र होकर उत्तमोत्तम गति को प्राप्त होते हैं।

भूलोके चान्तरिक्षेवा दिवितीर्थानि यान्यपि। 

अतीत्य तानि तिष्ठन्ति कृतार्थास्तेद्विजातयः।

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २८) 

पृथ्वी तल पर, अन्तरिक्ष में एवं स्वर्ग में जितने भी तीर्थ हैं, उन समस्त तीर्थों का अतिक्रमण करके स्वर्गद्वार सेवी द्विज गण कृतकृत्य हो जाते हैं अर्थात् उनको कुछ करने को शेष नहीं रहता।

विष्णुभक्तिं समासाद्य रमन्ते तु सुनिश्चिताः।

न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ।

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक २९) 

स्वर्गद्वार सेवी भक्तगण भगवान् श्रीविष्णु की भक्ति का आश्रय लेकर उनके समीप में रमण करते हैं, यह बात अटल है। ऐसे लोगों को सैकड़ों कल्प पर्यन्त जन्म- मरणके चक्रमें फिर नहीं आना पड़ता।

हन्यमानोऽपि यो विघ्नैर्वसेदेव शतैरपि। 

स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥ - (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक ३०) 

अयोध्याजी के स्वर्गद्वारादि तीर्थों में निवास करने हेतु आया हुआ मनुष्य यदि सैकड़ों विघ्नोंसे ताड़ित होते हुए भी निरन्तर निवास करता है,भागता नहीं, तो वह पुरुष उस दिव्य लोक में निवास करता है, जहाँ पहुँचकर उसे शोक-ग्लानि-चिन्तादि नहीं सताते हैं ।

स्वर्गद्वारे वियुज्येत स याति परमां गतिम् । 

उत्तरं दक्षिणं चापि त्वयने न विकल्पयेत् । 

सर्वस्तेषां शुभः कालः स्वर्गद्वारे मृताश्च ये ॥ 

- (सन्दर्भ : उपरोक्त श्लोक ३१) 

स्वर्गद्वार में शरीर छोड़ने वाले को सदैव उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। उसके लिये दक्षिणायन में नरक, उत्तरायण में स्वर्ग - यह विकल्प नहीं रहता। स्वर्गद्वार में शरीर छोड़नेवालोंके लिये प्रत्येक समय शुभ समय ही होता है ।

क्षेत्र का वृहद विस्तार :- 

अयोध्या में स्थित स्वर्गद्वार तीर्थ क्षेत्र अति प्राचीन माना जाता है। त्रेता युग की अयोध्या में स्वर्गद्वार अति प्राचीन माना जाता है। सरयू तट के किनारे बसा यह  न केवल नागेश्वरनाथ मंदिर, चंद्रहरि मंदिर, लक्ष्मणघाट शेषावतार मंदिर सहित अनेकों विशिष्ट मंदिरों से युक्त है। स्वर्ग द्वार या राम घाट एक महत्वपूर्ण स्नान घाट भी है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम का अंतिम संस्कार यहीं हुआ था। सहस्त्र धारा से नागेश्वर नाथ मंदिर तक फैली भूमि को आमतौर पर स्वर्गद्वार के नाम से जाना जाता है। इसकी गलियां भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

महत्वपूर्ण स्नान घाट :- 

यह एक महत्वपूर्ण स्नान घाट भी है और एक विशिष्ट क्षेत्र का परिचायक भी है. सरयू नदी की सनातनी पवित्रता, राम आदि चारो भाइयों का कीडा करना,अनेक प्राचीनतम मंदिरों से युक्त यह सिद्ध स्थल के रूप में साक्षात स्वर्ग से कम तनिक भी नहीं है। जहां सहस्र धारा लक्ष्मण घाट लक्ष्मण जी के स्व धाम का स्थल रहा है वहीं गुप्तार तीर्थ भगवान राम उनके परिवार तथा समस्त अयोध्यावासियों का स्वर्गारोहण स्थल के रूप में जाना जाता है। सरयू नदी के तट पर बने अनेक घाटों में सबसे महत्वपूर्ण घाट स्वर्गद्वार है। 

स्वर्गद्वारसमं तीर्थं नास्ति ब्रह्माण्डगोलके।

दिव्यान्यपि च भौमानि तीर्थानिसकलान्यपि 

प्रातरागत्य तिष्ठन्ति तत्र संसृत्य पार्वति ॥ 

तस्मादत्र प्रकर्तव्यं प्रातः स्नानं विशेषतः । सर्वतीर्थावगाहस्य फलप्राप्तिमभीप्सता ॥ 

- (रुद्र्यामालोक्त अयोध्या महात्म्य अध्याय 4 श्लोक 6 व 7)

अर्थ:- स्वर्ग और पृथ्वी के समस्त तीर्थ प्रातः काल यहां अपनी उपस्थिति देते हैं । जिस श्रद्धालु को सभी तीर्थों के स्नान और पूजन का फल प्राप्त करना हो उसे यहां आकर स्नान करना चाहिए।

   

त्यजन्ति प्राणिनः प्राणान् स्वर्गद्वारे तु ये नराः। 

प्रयान्ति परमं स्थानं विष्णोस्ते नात्र संशयः।

 - (रुद्र्यामालोक्त अयोध्या महात्म्य अध्याय 4 श्लोक 8)

अर्थ: इस घाट को नागेश्वर और मुक्तिदाता के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि यहां मरने वाले व्यक्ति सीधे विष्णु लोक जाते हैं।

पतित पावन क्षेत्र:-

मुक्तिद्वारमिदं यस्मात् स्वर्गप्राप्तिकरंनृणाम्।

स्वर्गद्वारमिति ख्यातं तस्मात्तीर्थमनुत्तमम् ॥ 

स्वर्गद्वारं सुदुष्प्राप्यं देवैरपि न संशयः ।

यद् यत् कामयते तत्र तत्तदाप्नोति मानवः

स्वर्गद्वारे परा सिद्धिः स्वर्गद्वारे परा गतिः ॥ 

जप्तं दत्तं हुतं पूर्वं तपस्तप्तं कृतं च यत्। 

ध्यानमध्ययनं दानं सर्वं भवति चाक्षयम् ॥ 

जन्मान्तरसहस्त्रेण यत्पापं समुपार्जितम् ।

स्वर्गद्वारं प्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम् ॥ 

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वैवर्णसंकराः। कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पाप योनयः।।

कीटाः पिपीलकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।

कालेन निधनं प्राप्ताः स्वर्गद्वारे शृणु प्रिये ॥ 

कौमोदकीकराः सर्वे पद्माक्षा गरुडध्वजाः । 

शुभं विष्णुपुरं दिव्यं प्रयान्ति भवनं हरेः ॥ 

- ( संदर्भ: उपरोक्त अध्याय 4 श्लोक 9 से 15 तक )

अर्थ:- इस तीर्थ में स्नान करने से सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है.स्वर्गद्वार में जो तप, जप, हवन, दर्शन, ध्यान ,अध्ययन  एवं दान आदि किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर , म्लेच्छ, संकीर्ण पापयोनि, कीड़े मकोड़े, मृग, पक्षी जो भी स्वर्गद्वार में काल से मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे सब  गरुड़ध्वज रथ पर आरूढ़ हो सुंदर कल्याण में बैकुंठ धाम में जाते हैं। जो स्वर्गद्वार में ब्राह्मणों को अन्नदान, रत्न दान, भूमि दान, गोदान तथा वस्त्र दान करते हैं, वे सब श्री हरि के धाम को जाते हैं।

स्वर्गद्वार क्षेत्र के प्रमुख मन्दिर:-

सहस्रधारा से नागेश्वरनाथ मंदिर तक की भूमि का टुकड़ा आमतौर पर अयोध्या में स्वर्ग द्वार के रूप में होता है।  सरयू नदी के सामने घाट पर इमारतों को देख सकते हैं। वे 18वीं शताब्दी में मुख्य रूप से राजा सफदर जंग के दरबार में हिंदू नवाब नवल राय बनवाए गए थे। घाटों पर बनी इमारतों से देखने में बहुत खूबसूरत हैं। वर्तमान में नदी का तल उत्तर की ओर स्थानांतरित हो गया है। 1960 के दशक के दौरान नए पुल के परिवेश में वर्तमान में नए घाटों का निर्माण किया गया था, जो देखने में एक उत्कृष्ट दृश्य देते हैं। इस घाट पर प्रमुख मंदिर राम मंदिर और बड़े-नारायण मंदिर हैं। काल गंगा और ताम्र वराह कनेक्शन तीर्थम हैं। इस घाट के पास सांग वेद स्कूल है, जो एक प्रसिद्ध वेद स्कूल है, जहां भगवान राम के जन्मदिन के दौरान विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं । यहां अनेक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मठ-मंदिर हैं।

स्वर्ग द्वार का महत्व:- 

यहाँ भूल-भुलिया जैसी है गलियां, एक बार में नहीं निकल पाते लोग। 1500 से ज्यादा घरों के बीच बसे इस मोहल्ले में करीब 60 से ज्यादा संकरी गलियां हैं। इन गलियों में अक्सर लोग खो जाते हैं। अपरिचित व्यक्ति इन सकरी गलियों में आ तो जाता है, लेकिन अपने आप बाहर नहीं निकल पाता। यहां छोटे-बड़े घरों के अलावा महल जैसे बंगले भी हैं। अच्छे- अच्छे जानकार भी गलियों में बने घरों का पता नहीं ढूंढ़ पाते थे।

नागेश्वरनाथ के ही निकट है अयोध्या का भौगोलिक नाभि केंद्र :- 

गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रो. सर्वेशकुमार ने बी.एच.यू. के भू-वैज्ञानिक प्रो. राना पी. बी. सिंह के निर्देशन में “कल्चरल लैंड स्केपिंग एंड हेरिटेज ऑफ अयोध्या” विषय पर शोध करते हुए पाया कि अयोध्या शहर का भौगोलिक केंद्र ( नाभि) नागेश्वर नाथ मंदिर के ही निकट है। प्रो. कुमार के अनुसार इस स्थान पर सर्वे के दौरान इलेक्ट्रो मैगनेटिक फील्ड की खोज हुई थी।


टेढ़ी-मेढ़ी, पतली और सैकड़ों भूल भुलैया वाली गालियों से युक्त :- 

इस मोहल्ले के भीतर सैकड़ों गलियां बहुत ही टेढ़ी-मेढ़ी वह पतली हैं। कई गलियां तो ऐसी हैं कि यहां रहने वाले लोग भी जीवन में शायद ही कभी वहां से गुजरते हों। ये गली न सिर्फ अयोध्या की पहचान है, बल्कि उन लोगों के लिए आशा की किरण है, जिनके परिवार में प्रारब्ध या कर्म बस मानसिक रोगी हो जाते हैं। साधु-संतो के इहलीला मोहल्ले में एक भूत वाली गली भी है। बताया जाता है कि इन गलियों में कोई भी पागल एक बार आता है, तो ठीक होकर ही अपने घर जाता है। 

 बन्द हो चुका है भूत वाली गली :- 

मान्य‍ता है कि यहां घूम रहा पागल इंसान भी खुद नहीं बता पाता था कि वह कब सही हो गया। मोहल्ले में एक गली ऐसी है, जिसे बंद कर दिया गया है। गली के एंट्री गेट पर ताला जड़ा हुआ है। लोग बताते हैं कि इसे ही भूत वाली गली माना जाता है।

हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने की योजना :- 

अयोध्या का स्वर्गद्वार क्षेत्र आस्था का केंद्र है। स्वर्गद्वार क्षेत्र को हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी की जा रही है। प्रमुख सचिव, पर्यटन व संस्कृति जितेंद्र कुमार ने इसका प्रस्ताव संस्कृति विभाग से मांगा है। अयोध्या को हेरिटेज घोषित करने में दस आध्यात्मिक ऊर्जा स्थलों में यूनेस्को से आई टीम ने नागेश्वर नाथ मंदिर के आस पास के स्थल को चिह्नित किया गया था। दिवाली की पूर्व संध्या पर यहां से हेरिटेज यात्रा भी निकलती है। स्वर्गद्वार क्षेत्र को हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी की जा रही है। दस आध्यात्मिक ऊर्जा स्थलों में यूनेस्को से आई टीम ने नागेश्वर नाथ मंदिर के आस पास के स्थल को चिह्नित किया गया है। 

क्षेत्र के प्रमुख मन्दिर 

सरयू नदी के घाटों के साथ ही नदी तट पर अनेक मंदिर भी हैं, जिनमें सूर्यमंदिर और नागेश्वरनाथ मंदिर सर्वाधिक महत्व के माने जाते हैं। यहां कालेराम मंदिर, चंद्रहरि महादेव मंदिर, शेषावतार मंदिर, सहस्र धारा घाट, सरयू मंदिर, हनुमत सदन, हनुमत निवास सहित अन्य सिद्ध स्थान हैं जो पौराणिक एवं रामायण कालीन माने जाते हैं। यहां चतुर्भुज का मंदिर और विधि जी का मंदिर भी बना हुआ है।

स्वर्गद्वार में ठीक होते मानसिक रोगी :- 

मान्यता है कि नागेश्वरनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द चुंबकीय शक्तियों के प्रभाव के कारण ही मानसिक रोगी ठीक हो जाते हैं। इसी मान्यता के कारण बाहर के जिलों से लोग अपने बीमार परिवारी जनों को यहां लाकर छोड़ जाते हैं। पीढ़ियों से इस मोहल्ले में रहने वाले डॉक्टर पद्माकर पांडे भाई जी इस वार्ड के पार्षद रहे हैं. वे आयुर्वेद के चिकित्सक हैं और इसी वार्ड में अपनी क्लीनिक दशकों से चला रहे हैं. उनके पिता और पितामह भी इसी सेवा कार्य से जुड़े हुए थे. डॉक्टर पद्माकर पांडे कहते हैं कि उनकी उम्र 60 साल है और उन्होंने बचपन में देखा है कि लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ रोगियों को जंजीरों या रस्सी में बांधकर इस मोहल्ले में लाकर घुमाया करते थे. अब भी लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को इस मोहल्ले में छोड़ जाते हैं.

आते सभी दिखते हैं, जाते कोई नहीं

अयोध्या के कण-कण में दिव्य शक्तियां हैं। स्वर्गद्वार मोहल्ले में नवग्रह स्थित हैं और इन्हीं के आस-पास मुक्ति गली है। माना जाता है कि जब कोई विक्षिप्त व्यक्ति उस खास चक्र पर पैर रखता है, तो वह चमत्कारिक रूप से ठीक हो जाता है। उन्होंने कहा कि “आते हुए पागल को तो सबने देखा है, लेकिन जाते हुए कभी किसी ने नहीं देखा” यही अयोध्या की इस गली को और रहस्यमय बना देता है।

नगर निगम अयोध्या द्वारा संचालित स्वर्गद्वार वार्ड नम्बर 55 :-

अयोध्या नगरी में स्वर्गद्वार वार्ड नंबर 55 है ,श्री महेन्द्र कुमार शुक्ला स्वर्गद्वार वार्ड नंबर 55 के सभासद हैं।  इस वार्ड को स्वर्ग समान अयोध्या नगरी का प्रारंभिक बिंदु के रूप में देखा जा सकता है। यह वार्ड अपने आप में बेहद खास है क्योंकि यही से अयोध्या की प्रसिद्द पंचकोसी परिक्रमा का आरंभ और अंत होता है। यहां अयोध्या के विख्यात मंदिर और घाट भी स्थित हैं, जिनका पौराणिक महत्व काफी अधिक है। अयोध्या और फैजाबाद नगर पालिका के विलय से पूर्व यह वार्ड अयोध्या नगर पालिका का ही एक हिस्सा था, जो अब नगर निगम अयोध्या द्वारा संचालित किया जाता है।  इस वार्ड के उत्तर में सरयू नदी तक, दक्षिण में तुलसी उद्यान से पाली मन्दिर के सामने से होते हुए राजेन्द्र निवास तक, पूरब में पुराने पुल से मुख्य मार्ग होते हुए तुलसी उद्यान तक एवं पश्चिम में राजेन्द्र निवास से गौही मंन्दिर धर्मशाला होते हुए सरयू नदी तक विस्तृत है। वार्ड के प्रमुख मोहल्लों में स्वर्गद्वार, उर्दु बाज़ार मोहल्ला, लक्ष्मण घाट आंशिक, नया घाट, राम की पैडी आंशिक तथा नागेश्वरनाथ मंदिर, राम की पैडी, नया घाट, तुलसी उद्यान, विश्वकर्मा मंदिर, नरसिंह भवन, ग्वालियर मंदिर, श्री काले राम मंदिर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं. इसके साथ ही वार्ड की शिक्षा सुविधा की बात यदि की जायें तो यहां अवध विद्या मंदिर जूनियर हाई स्कूल, पूर्व माध्यमिक विद्यालय, एसएमबी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सहित अन्य प्राइवेट विद्यालय भी मौजूद हैं, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा व्यवस्था मुहैया कराते हैं।


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)


Monday, April 6, 2026

आचार्य पण्डित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय "नीरस" ✍️आचार्य डा. राधे श्याम द्विवेदी


उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के सदर तहसील के बहादुरपुर व्लाक में नगर बाजार क्षेत्र खड़ौवा खुर्द नामक गांव के आस पास इलाके में नगर राज्य में गौतम क्षत्रियों के पुरोहित के रूप में भारद्वाज गोत्रीय उपाध्याय वंश के  इनके पूर्वजों का आगमन  हुआ था । नगर राज्य के राजा उदय प्रताप सिंह के समकालीन उपाध्याय कुल के पूर्वज लक्ष्मन दत्त उपाध्याय एक फौजी अफसर रहा करते थे। यह परिवार शुद्ध सनातनी और कर्मकांडी नियमों का परिपालन करने वाला था। 


इसी संस्कार युक्त कुल परम्परा में राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित डा.मुनिलाल उपाध्याय सरस जी के पिता पं. केदार नाथ उपाध्याय का जन्म हुआ था।

 

बाद में डा.मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ जी का जन्म 10.04.1942 ई. में सीतारामपुर में श्री केदारनाथ उपाध्याय के परिवार में हुआ था। 

डा. सरस जी के अत्यंत आज्ञाकारी और हर समय पग से पग मिलाकर चलने वाले भ्राता लक्ष्मण जैसे आचरण वाले उनके प्रिय व आज्ञाकारी अनुज के रूप में आचार्य पण्डित वशिष्ठ प्रसाद  उपाध्याय का जन्म इसी परिवार में एक अगस्त 1953 को सीतारामपुर ग्राम में हुआ था। दिनांक 12.10.1957 को पंडित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय जी के पिता श्री केदार नाथ की असामयिक मृत्यु हो गयी थी। उनके परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। 

पिता का असमय निधन हो जाने के कारण विधवा मां पर घर परिवार की सारी जिम्मेदारी आ गयी थी।  श्री  वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय जी उस समय केवल 4 साल के तथा कक्षा 1 के छात्र थे। सरल स्वभाव वाली उनकी मां किसी प्रकार परिवार को टूटने व बिखरने से बचा पाई थी। दोनो बच्चों को बहुत ही कठिनाई से पाला पोसा और शिक्षा दीक्षा दिलाई। 

वशिष्ठ जी की पढ़ाई  नगर बाजार के प्राइमरी विद्यालय में शुरू हुआ था। जिसे पास कर वह नगर बाजार के ही मिडिल स्कूल में दाखिला लिये थे। माध्यमिक कक्षाएं उन्होंने श्री झिनकू लाल इन्टर कालेज कलवारी से उत्तीर्ण किया था। 1968 में नगर बाजार का जनता विद्यालय जू.हा. स्कूल हो गया तो विद्यालय के प्रबन्धक श्री मोहर नाथ पाण्डेय ने पं. शिवकुमार त्रिपाठी के माध्यम से अठारह वर्ष के वशिष्ठ  प्रसाद जी से विवाह का प्रस्ताव रखा। पहले तो वशिष्ठ प्रसाद जी के अग्रज डॉ मुनि लाल उपाध्याय 'सरस'जी ने विवाह को टालने का प्रयास किया लेकिन बाद में यह रिश्ता तय कर शादी करना पड़ा था।

पण्डित वशिष्ठ प्रसाद हाई स्कूल परीक्षा 1970 में तथा इन्टर मीडिएट परीक्षा 1972 में पास किए थे। उस समय दो वर्षीय बी ए परीक्षा 1974 में वह किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय बस्ती से पास किए थे। जनता इण्टर कालेज नगर बाजार बस्ती के प्रबंधक जी के दबाव के कारण उनके ही विद्यालय में श्री वशिष्ठ प्रसाद जी को सहायक अध्यापक बनाया गया था। उनकी एल. टी. ग्रेड में सहायक अध्यापक के रूप में प्रथम नियुक्ति एक अगस्त 1975 में जनता इन्टर कालेज नगर बाजार बस्ती में हुई थी। 

1975 में सेवा के दौरान वह व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में एम. ए. हिंदी का प्रथम बर्ष पास कर लिये थे।तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक श्री भूधर द्विवेदी के प्रभाव से  1976 में किसान एल. टी. प्रशिक्षण महा विद्यालय में उन्हें एल.टी. शिक्षण पाठयक्रम में प्रवेश लेकर कोर्स पूरा किया था। 1977 में वे एम. ए. हिन्दी द्वितीय बर्ष का अधूरा पाठ्यक्रम पूरा किये थे । बाद में वह संपूर्णानंद संस्कृत विश्व विद्यालय से सम्बद्ध श्री सनातन धर्म वर्धनी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय नगर बाजार बस्ती से प्रथम श्रेणी में साहित्य से आचार्य की परीक्षा भी उत्तीर्ण किए थे। वह 1 जनवरी 1977 से गौतम इन्टर कालेज पिपरा गौतम बस्ती मे अपनी दूसरी नियुक्ति एल. टी. ग्रेड में सहायक अध्यापक के रूप में प्राप्त कर ली थी। यहां 62 साल से ज्यादा समय तक अनवरत 31 मार्च 2016 तक वह अध्यापन कार्य में संलग्न रहे।


वशिष्ठ प्रसाद जी के तीन संताने हैं। ज्येष्ठ पुत्री सुनीता रही जो शादी के बाद ग्राम बनकट, ब्लाक उरुवा बाजार, जिला गोरखपुर में अपने बच्चों के साथ रह रही हैं। 

उसके बाद उनके पुत्र रजनीश कुमार का जन्म हुआ है। जिनकी शिक्षा जनता इण्टर कॉलेज नगर बाजार बस्ती से हुआ है। वे फार्मेसी का डिप्लोमा लेकर चिकित्सा विभाग से फार्मासिस्ट/ कंपाउंडर पद पर सन्त कबीर नगर के विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इनका परिवार और बच्चे बर्तमान में सीतारामपुर में अपने पैतृक गांव में रह रहे हैं। 

वशिष्ठ प्रसाद जी की तीसरी संतान अनीता उपाध्याय रही जो वर्तमान में गुड़गांव में अपने पति और बच्चों के साथ रह रही हैं।

श्री वशिष्ठ प्रसाद जी की पत्नी पैर से चलने में असमर्थ थी फिर भी दोनों ने चारों धाम की यात्रा पूरा कर लिया था। जून 2025 में श्री मद भागवत कथा भी सकुशल सुन लिया था। 8 जून 2025 को श्री मद भागवत पुराण कथा की पूर्णाहुति सम्पन्न हुआ था। इसी माह में अस्वस्थता के कारण दिनांक 23 जून 2025 को उनकी श्रीमती जी का देहावसान हो गया था।

परिवार में राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित उत्कृष्ट कोटि के साहित्यकार होते हुए भी आचार्य वशिष्ठ जी का जीवन सादगी से परिपूर्ण रहा है। एक आदर्श और सरल जीवन यापन करने वाले आचार्य पण्डित वशिष्ठ प्रसाद उपाध्याय का जीवन एक खुली किताब की तरह है। जिसमे सरलता, तरलता और सूझ - बूझ का असीम भंडार भरा पड़ा है। उनकी छिपी हुई प्रतिभा डा. सरस जी जैसा मुखरित तो नहीं हो सकी , परंतु काव्य साहित्य के अनुशीलन और अंकुरण में वे पीछे कदापि नहीं थे। मुझे विलम्ब से पता चला है कि उन्होंने"नीरस" कविराय के नाम से कुछ कुण्डलियां भी लिख रखी है । जिसे सुधार करके लिपिबद्ध किया जा रहा है। उनकी एक अप्रकाशित रचना इस प्रकार प्रस्तुत की जा रही है -

              हे प्रभु तू वेदना दे ।

जैसलमेर सा जीवन मेरा है ,
वेदना ही वेदना जिसमें भरा है।
दर्द की इस अग्नि में तपता गया मैं ,
सह ना पाया मूक हो सहता गया मैं।।

दुख की आंधी चल गई ,
दृष्टि ओझल हो गई ।
रोक पाया मैं नही अपने दृगो को,
अश्रु धारा बह गई ।।

वेदने तू रुक क्षणिक विश्राम कर ले।
मन में सुंदर सृष्टि का संज्ञान कर ले।।

तप्त जीवन व्यस्त जीवन,
दर्द से परिपूर्ण जीवन।
सुख ना पाया दुख ही दुख में,
बह गया संपूर्ण जीवन।।

हे प्रभु तू वेदना दे,बांट ले इसको ना कोई।
यह मुझे उपहार दे दे ,हे प्रभु तू वेदना दे।।