इतिहास के अद्भुत रहस्य
Friday, April 4, 2025
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Saturday, March 29, 2025
डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" एक समर्पित कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21)
डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21
डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस'
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
जीवन परिचय:-
डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' के शोध प्रबंध "बस्ती के छंदकार" की पांडुलिपि के पृष्ठ 591पर मंजुल का संदर्भ उपलब्ध है। डा. रामनरेश सिंह "मंजुल"का जन्म 15 दिसम्बर 1940 को बस्ती के गौर ब्लाक के ग्राम-सिद्धौर में हुआ था।उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। जिला मुख्यालय स्थित सक्सेरिया इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद गोरखपुर के सेंट एंड्यूज डिग्री कॉलेज से स्नातक किया।
अध्यापन कार्य :-
वर्ष 1961 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. उतीर्ण करने के बाद सहजनवां के कोलाराम मस्करा इंटर कॉलेज में प्रवक्ता बने। अध्यापन कार्य करते हुए ही हिन्दी से परास्नातक की शिक्षा पूरी की। एल.टी.करने के बाद पीएचडी की। अंग्रेजी प्रवक्ता के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया। सहजनवां में छह वर्ष अध्यापन के बाद वह गौर के कृषक इंटर कॉलेज में वर्ष 1967 में बतौर प्रवक्ता शिक्षण कार्य करने लगे थे । 1973 में नेशनल इंटर कालेज हर्रैया के प्रधानाचार्य बने। लगातार तीस वर्ष तक सेवा देने के बाद 30 जून 2003 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्य सृजन में उन्होंने पूर्णकालिक समय देना शुरू कर दिया। रुहेलखंड विश्व विद्यालय से पीएचडी करने के दौरान ही आधुनिक गीत सम्राट डॉ. शम्भूनाथ सिंह के सानिध्य में ही नवगीत लिखने की प्रेरणा मिली।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी मंजुल की कृतियां हिंदी जगत में सराही जा रही है। वे मंचों पर अपनी रचनाओं से श्रोताओं कमंत्र मुग्ध कर दिया करते थे। वे कहा करते हैं कि साहित्यकार एवं कवि ही समय-समय पर समाज को जगाने का कार्य करते हैं। मंजुल जी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन को अपना काव्यादर्श मानते थे।
संगठन में सक्रियता :-
प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश अध्यक्ष व संरक्षक के तौर पर हमेशा शिक्षकों के हित का मुद्दा उठाते रहे। यह गीतो के साथ खड़ी बोली और व्रजभाषा में सवैया और धनाक्षरी छन्दों को लिखने और पढ़ने में बड़ी पटुता रखते हैं। रेडियो स्टेशन से इनकी कविताएँ प्राय: प्रसारित होती रहीं है। मंजरी मौलश्री अंक 10, मार्च 1979 में उनका एक गीत इस प्रकार प्रकाशित हुआ है -
याद तुम्हारी (गीत)
याद तुम्हारी ऐसी जैसे हिरन छलांग भरे,
अथवा कोई रतन जौहरी कंचन काट धरे ।
याद तुम्हारी ऐसी जैसे सावन मेघ झरे,
अथवा कोई राजहंसिनी मानस में विचरे ।।
बैठा कोई श्रान्त पथिक सा चंदन गाछ तरे,
यक्ष सदृश आकुल अंतर से मेघ दूत उचरे।
साधों की वीना बज जाये तार-तार सिहरे,
वे मौसम की याद तुम्हारी पागल प्राणकरे।
प्रकाशित कृतियाँ :-
'साहित्य का मर्म तथा धर्म' (निबंध संग्रह-2006),
'आदमी कितना अकेला' (काव्य संग्रह/गीत)।
सम्मान:-
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ की ओर से साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा गया है। आयोजित समारोह के दौरान मंजुल को ताम्र पत्र एवं दो लाख रुपये का चेक दिया गया। डा.रामनरेशन सिंह ‘मंजुल’ को 1997 में उत्तर प्रदेश राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।मंजुल को वर्ष 2006 में ललित निबंध व शोध निबन्धों की संग्रह की पुस्तक ‘साहित्य का मर्म व धर्म’ के लिए कई साहित्यिक मंचों पर सम्मानित किया गया था। गीत संग्रह ‘आदमी कितना अकेला’ पर 2014 में बलबीर सिंह पुरस्कार मिला। उन्हें राष्ट्रीय साहित्य साधना सम्मान, इन्दौर, म०प्र०, फरोग ए उर्दू सोसाइटी द्वारा 'रामचन्द्र शुक्ल सम्मान', कादम्बिनी साहित्य संस्था द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान' भी मिल चुका है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद में हिन्दी व अंग्रेजी के पेपर सेटर के पर अपनी सेवाएं दी। अवध विश्वविद्यालय भी इनकी सेवाओं को लेता रहता है। पत्र पत्रिकाएं कादंबनी, सरस्वती सुमन, स्वतंत्र भारत, पायनियर, नवगीत आदि में इनकी कविताएं व लेख प्रकाशित होते रहे हैं।
सम्पर्क सूत्र:-
राजघाट हरैया, जनपद-वस्ती, दूरभाष: 05546-233500, मोबाइल: 9415151858
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
( मोबाइल नंबर +91 8630778321;
वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)
अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’। (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18)
अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’ (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18) (उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संकलन के पूर्ण परिचय वाले अंतिम कवि )लेखन :डॉ. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' ,सम्पादन : आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
जीवन परिचय
रामलखन मौर्य 'मयूर' जी का जन्म 19 - 7-1948 ई.को बस्ती जिले के सदर तहसील के बहादुर पुर ब्लाक के नगर खास गांव जो अब नगर बाजार और नगर पंचायत है, मे हुआ है। उनके पिता का नाम श्री नवीन मौर्य है। शिक्षा, हिन्दी और अर्थशास्त्र से एम०ए०, बीएड.,साहित्यरत्न और शास्त्री है। ये लिखने-पढ़ने के अधिक शौकीन रहे हैं। जनता इण्टर कालेज नगर बाजार में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।
प्रकाशित कृतियाँ :-
1.उद्गार
2. शृंगार शतक
1.उद्गार काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :-
उद्गार में अगभग 60 पृष्ठ हैं। यह विविध प्रसंगों पर लिखी गई कविताओं का संग्रह है। गिरिराज के प्रति लिखा गया उनका एक द्रष्टव्य है-
उत्तुंग शिखर दुर्लघ्य सदा
तब विजय गीत को गाते है।
तेरे असीम अंचल में जन
सौन्दर्य निरखने जाते हैं।
निर्भर झर झर करते हैं कहीं
सरिता कल कल करती बहती।
है कहाँ मनोहर दृश्य विस्तृत
शुभ छटा जहां नर्तन करती
है शुभ निसर्ग शाश्वत स्वरूप
छवि धाम तुम्हें मेरा वन्दन ।।
- ('उदगार' संग्रह का "गिरिराज" शीर्षक )
अन्य कविताओ में मेरा गाँव, वीरो बढ़े चलो, बसंत, वर्षा की बूंद, सुमन, राष्ट्र शक्ति, बढ़े चलो , कदम-कदम, जलते द्वीप , बदलो समाज, सहकारिता, नव वर्ष, उया, सरिता, क्यों पीते हो, सीमा का प्रहरी, प्यारा हिन्दुस्तान, तरु आदि कविताएँ मयूर जी ने बड़ी तन्मयता के साथ लिखा है।
अधिकाँश कविताओं में प्राकृतिक चित्रण अच्छा बन पढ़ा है। कविताएँ खड़ी बोली में की गई हैं। उनके भावो में प्रवाह और कथन में लालित्य कूट कूट कर भरा है।
2.शृंगार शतक काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :-
मयूर जी का दूसरा काव्य-सग्रह "शृंगार शतक सवैया और मनहरण छन्दों में किया गया है। कहीं-कहीं पर भोजपुरी क्रियाएँ मिल जाने से भावो में चारुता अधिक आ गई है-
हम गांव के लोग गरीब हई
चली आवे महाजन द्वार हमारे ।
बड़ी भाग्य हमरो है जागलि बा
कइली हम राउर के सत्कारे ।
संवरी सजि सारी दशा हमरी
मुस्काई जो आप सनेह पधारे ।
हम धन्य हुए हैं प्रमोद भरे
करुणा से भरे प्रभु आप निहारे ।।
- ( श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 32)
बसंत पर लिखा गया एक छन्द दर्शनीय है -
आयो बना दिगंत सज्यो
चहु ओर छटा छटकी छविकारी ।
शीतल मन्द समीर चल्यो
मदमाती बनाती लगी मनुहारी।
वन वीरच फुल्यो शीत पुरयो
अरुणाई पुपल्लव है दुतिकारी
मदमाली नटी सगरी धरती
मधुमास प्रमत्त हुए नर नारी।।
- (श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 15)
मयूर जी जो आधुनिक चरण के सवैया और घनाक्षरी के बड़े अच्छे छन्दकार है। उनके छन्दो में प्राकृतिक सौष्ठव के साथ मानवीय सस्पर्शों का स्वर गूंजता दिखाई पड़ता है। जीवन की गहराई में कवि का अन्तर्मन डूब डूब कर छन्दो के गुलदस्तों को सजाने का सदैव प्रयास करता है। मयूर जी को मंचो पर अच्छा सम्मान मिलता है। आधुनिक युग के छन्द परम्परा के विकास में उनका योगदान भविष्य में बहुत अच्छा होगा, ऐसी सभावनाएँ है।
Friday, March 28, 2025
डा.रामकृष्ण लाल"जगमग" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 17)
बस्ती के एक और सशक्त लेखक वागीश जी शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)
बस्ती के सशक्त लेखक वागीश शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी
वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। वे वर्तमान समय में हिन्दी-साहित्य के सबसे गहरे और तीक्ष्ण ,सिद्धांसतार, आलोचक, निबंधकार एवं उपन्यासकार हैं। उनकी प्रतिभा आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जैसी ही दिखती हैं एक गणितज्ञ को साहित्य की ऐसी परख विरले देखने को मिलता है। उनके बारे में सर्च करने पर बहुत ही विलक्षण चरित्र देखने को मिलता है। गद्य साहित्य की प्रचुरता के कारण 'बस्ती के छंदकार' के लेखक स्मृति शेष डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने शायद उन्हे अपने अध्ययन में ना ले सकें। उन्हें उचित स्थान देने से बस्ती मण्डल खुद को गौरवान्वित महशूस कर सकता है। इसलिए उनके अप्रकाशित भाग 3 की श्रृंखला में इस कड़ी को पिरोया जा रहा है।
स्वनाम धन्य श्री वागीश जी एक वैज्ञानिक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने गणित में स्नातकोत्तर किया है और आईआईटी दिल्ली में गणित के प्रोफ़ेसर भी रहे। उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, 1946 ई. को इस धरती पर अपने गाँव थरौली, तप्पा बड़गों पगार, परगना महुली पश्चिम, तहसील सदर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश में जन्म लिया । बस्ती में वे एक ठाकुरद्वारे में रहते थे जिसे बस्ती राज-परिवार की रानी दिगम्बर कुँवरि ने बनवाया था। ये 1857 के प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी बाबू कुँवर सिंह की बहिन थीं किन्तु ये स्वयं अंगरेज़ों के साथ थीं जिसके नाते बस्ती का राज्य विक्टोरिया शासनकाल में कुछ बढ़ेआकार के साथ बचा रहा। वे वर्षों दिल्ली के आई. आई. टी. संस्थान में गणित पढ़ाते रहे और फिर सेवानिवृत्त होकर बस्ती में भी रहे हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उन्होंने निराला की प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ की बहुत ही सुन्दर टीका लिखी है जो ‘छन्द छन्द पर कुमकुम’ नाम से प्रकाशित हुई है। उन्होंने देवकीनन्दन खत्री की उपन्यास श्रृंखला ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ पर भी किताब लिखी है। उन्होंने ‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर कई निबंधों की श्रृंखला भी लिखी है। वागीश जी हिन्दी में ग़ालिब की शायरी के सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं और उन्होंने उस पर भी टीका लिख रखी है जो प्रकाशित होना बाक़ी है।
परिवारिक पृष्ठभूमि:-
1.पण्डित शूलपाणि पूर्वज पुरुष
वागीश शुक्ल जी के पूर्वज पण्डित शूलपाणि शुक्ल थे , जो बस्ती से थरौली के रास्ते में थरौली से तीन किलोमीटर पहले पड़ने वाले महसों में रहते थे, जहाँ के राजा द्वारा किये गये किसी अपमान से क्षुब्ध् होकर वे अनशन पर बैठ गये थे और उनका प्राणान्त हो गया जिसके बाद उनके पुत्रों ने ब्रह्महत्यारे के राज्य में जल न ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करके महसों छोड़ दिया और किसी अन्य आश्रय की तलाश में निकल पड़े। उनमें से एक को थरौली के तत्कालीन निवासियों ने अपने गाँव में शरण दे दी और अन्य भाई आगे चले गये। थरौली महुली राज्य में पड़ता था। यह चंगेरवा और महादेवा के पास में है। इस समय थरौली ग्राम पंचायत बस्ती जिला परिषद के बनकटी पंचायत समिति भाग में एक ग्रामीण स्थानीय निकाय है । थरौली ग्राम पंचायत क्षेत्राधिकार के अंतर्गत कुल 4 गांव हैं।
2.पण्डित शिवदीन वृद्ध प्रपितामह
पण्डित शिवदीन शुक्ल थरौली में बस गये पूर्वज के वंश में वागीश जी के वृद्ध प्रपितामह पण्डित शिवदीन शुक्ल हुए थे उनके दो पुत्र हुए। पण्डित रामप्रसाद शुक्ल और पण्डित रामअवतार शुक्ल।
3.रामप्रसाद शुक्ल प्रपितामह
पण्डित रामप्रसाद शुक्ल वागीश जी के सगे प्रपितामह रहे। उनके एक और प्रपितामह पण्डित रामअवतार शुक्ल रहे । इन दो भाइयों का परिवार एक ही रसोई में था किन्तु वागीश जी के होश सँभालने तक चूल्हे अलग हो चुके थे हालाँकि सभी लोग एक ही मकान में अलग-अलग बरामदे बाँट कर रहते थे।इस प्रकार पण्डित रामप्रसाद शुक्ल के दोनों पुत्रों- पण्डित शुभनारायण शुक्ल और उनके छोटे भाई पण्डित जयनारायण शुक्ल- के परिवार मिल कर वह परिवार बनाते थे जो उस समय‘संयुक्त परिवार रहा है।
4.पण्डित जयनारायण शुक्ल पितामह
यह मकान यों तो उनके पितामह पण्डित जयनारायण शुक्ल ने बनवाया था किन्तु बँटवारे में ज़ाहिर है कि उन लोगों के हिस्से में दो ही बरामदे और उनसे जुड़ी कोठरियाँ आनी थी।
5.शुभनारायण शुक्ल पिता
वागीश जी अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थे ।वे संस्कृत के आचार्य थे.और पण्डित जयनारायण शुक्ल के वंशजों से बने संयुक्त परिवार के हमारे अपने टुकड़े में इस समय उनकी पीढ़ी में वे तथा उनके पितृव्य पण्डित जयदेव शुक्ल के पुत्र देवेन्द्र शुक्ल मौजूद हैं।
6.वागीश शुक्ल का जीवन परिचय:-वागीश जी की माता श्रीमती विद्यावती देवी यद्यपि चैदह वर्ष की अवस्था से ही अपने पितृकुल में गुरुजनों की शुश्रुषा कर रही थीं, तथापि उनके घर में बारह वर्ष बीत जाने पर भी उनके कोई सन्तान न हुई और उन्होंने किसी बड़ी-बूढ़ी की सलाह पर ऋषि पंचमी का व्रत प्रारम्भ किया। परिणाम स्वरूप ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, सन 1946 ई को इस धरती पर वागीश जी ने जन्म लिया। [उनकी पत्नी इंदुमती का जन्म 1951और मृत्यु 2023 में हुई थी। दोनों की शादी 1965 और वैधुर्य 2023 ई में हुआ है।] नवीं में पढ़ते हुए ही वागीश जी ने अपनी पहली कविता लिखी जिसकी प्रथम पंक्ति थीः ‘पर्यंक-त्याग क्यों ओ बोले’।इसी समय से वे जेब में इलायची - लोंग रखने लगे थे। जिसकी बहुत दिनों बाद परिणति तम्बाकू का पान खाने में हुई। यह आदत एकाध बार छूटने के बावुजूद ताउम्र तक क़ायम रही है। बँसिया की लठिया’ से शुरू होने वाली कविता छपी थी।एक संस्कृत विद्यालय के वाचनालय में देवकीनन्दन खत्री के सारे उपन्यास उन्होंने वहीं पढ़े। अंगरेज़ी अच्छी करने के चक्कर में आपके पिता जी ने ‘ब्लिट्ज़’ नामक साप्ताहिक उनके लिए मँगवाना शुरू किया था। इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान उनकी कोठरी में एक चटाई भर की जगह थी जिस पर सिर गड़ाये वे तब तक एक लालटेन के सहारे पढ़ते रहते थे जब तक सोने का समय न हो जाय और फिर वह चटाई बिस्तर का काम देती थी।
वज़ीफ़े और गोल्ड मेडल के साथ ही उनका शुमार अब बी.ए. प्रथम वर्ष के पढ़ाकू छात्रों में था । लेक्चर’ के दौरान वे पिछली बेंच पर बैठते थे और प्रायः एक दूसरे की काॅपियों पर कुछ-न-कुछ - मसलन चिरकीन के शेर- लिखा करते थे।
हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अँग्रेज़ी वाङ्मय के गहरे और गम्भीर अध्येता, आलोचक और अनुवादक वागीश शुक्ल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली) 1970 से 2012 ) सेवा किए फिर सेवा निवृत्त होकर नौ वर्ष तक बस्ती में रहे । 2021 से पुनः दिल्ली में रह रहे हैं।
वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उनके लिखने का ढंग निराला है। वे कोई भी अवधारणा सीधे सीधे व्यक्त करने के स्थान पर पाठक को वैचारिकता के उस स्थान तक ले जाते हैं जहाँ वह अवधारणा रूप ले रही होती है।
रचनायें:-
वागीश जी ने लगभग एक दर्जन रचनाएं लिखी हैं,जो देश के प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई है तथा अमेज़न आदि केंद्रों के माध्यम से विक्रय के लिए उपलब्ध हैं।
1.छन्द छन्द पर कुमकुम : राम की शक्ति पूजा'
(इसकी यह टीका निराला की राम शक्ति पूजा पाठ, टीका आदि की अनेक नयी विधियाँ भारतीय प्रसंग में प्राकु-आधुनिक हूँ, भले इधर वे हिन्दी आलोचना के परिसर से बाहर ही रहती आयी हूँ । 'राम की शक्तिपूजा' की यह टीका निराला की कविता को उसकी पूरी अर्थाभा, आशयों और अन्तर्ध्वनियाँ में, समकालीन सन्दर्भों और पारम्परिक स्मृति के अत्यन्त सर्जनात्मक रसायन के रूप में पुनरायत्त करने का अवसर सुलभ कराती है।)
2. गालिब के लगभग पूरे साहित्य की विस्तृत टीका और व्याख्या, जो प्रकाशित होना बाक़ी है।
3. Sanskrit studied ,Samvat 2063 64 ,in 2 vols.
4.आहोपुरुषिका अनुवाद (मेघदूतम्' को छोड़ दूँ तो पत्नी के वियोग में इतना झंझावाती विषाद, आहोपुरुषिका )
5.समालोचना "उसे निहारते हुए"
6.समालोचना "प्रचण्ड प्रवीर का कथा लेखन"
7.प्रतिदर्शन (कुछ निबंध)
(प्रतिदर्शन है वागीश शुक्ल के अब तक के लेखन के चुनिंदा अंशों का। वे न केवल विद्वान-आलोचक हैं, वे अपनी पीढ़ी और अपनी पहली पीढ़ी में भी आदर्श हैं। उनकी विद्याएँ संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी, व्याकरण, आधुनिक गणित और उत्तर आधुनिकता तक विस्तृत हैं।
8.शहंशाह के कपड़े कहां हैं ( निबन्ध)
9.उर्दू साहित्य का देव नागरी में लिपिकरण कुछ समस्याएं कुछ सुझाव
10.चंद्रकांता संतति का तिलस्म
11.' चिकितुषी' त्रिपुरा रहस्य चर्या खण्ड का सम्पादन
12.‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर निबन्ध की श्रृंखला
13.कई बरसों से एक सुदीर्घ उपन्यास पर काम जारी है।
वागीश जी का फोन नम्बर 08765934624,09868541851
ईमेल : wagishs@yahoo.com
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
मोबाइल नंबर +91 8630778321;
वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)