Friday, April 4, 2025

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् हिन्दी भावानुवाद


शिव उवाच–
"देवि त्वं भक्त सुलभे सर्वकार्य विधायिनी
कलौहि कार्यसिद्ध्यर्थम उपायं ब्रूहि यत्नतः"
हिंदी भावानुवाद 
शिव बोले- हो सुलभ भक्त को, 
कार्य नियंता हो देवी! 
एक उपाय प्रयत्न मात्र है, 
कार्य-सिद्धि की कला यही।।

देव्युवाच –
"शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट साधनम्
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते"
हिंदी भावानुवाद
देवी बोलीं- सुनें देव हे!, 
कला साधना उत्तम है। 
स्नेह बहुत है मेरा तुम पर, 
स्तुति करूँ प्रकाशित मैं।।

ॐ अस्य श्री दुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्री महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वत्यो देवताः श्री दुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः
हिंदी भावानुवाद
ॐ मंत्र सत् श्लोकी दुर्गा, 
ऋषि ‌नारायण छंद अनुष्टुप। 
देव कालिका रमा शारदा, 
दुर्गा हित हो पाठ नियोजित।। 

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
हिंदी भावानुवाद
ॐ चेतना ज्ञानी जन में, 
मात्र भगवती माँ ही हैं। 
मोहित-आकर्षित करती हैं,
 मातु महामाया खुद ही।१। 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि
दारिद्र्यदुःखभयहारिणी का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।2।
हिंदी भावानुवाद
भीति शेष जो है जीवों में, 
दुर्गा-स्मृति हर लेती, 
स्मृति-मति हो स्वस्थ्य अगर तो, 
शुभ फल हरदम है देती। 
कौन भीति दारिद्रय दुख हरे, 
अन्य न कोई है देवी। 
कारण सबके उपकारों का, 
सदा आर्द्र चितवाली वे।२।

सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्रयंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।3।
हिंदी भावानुवाद
मंगलकारी मंगल करतीं, 
शिवा साधतीं हित सबका। 
त्र्यंबका गौरी, शरणागत, 
नारायणी नमन तुमको।३। 

शरणागतदीनार्त परित्राण पराणये
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते।4।
हिंदी भावानुवाद
दीन-आर्त जन जो शरणागत, 
परित्राण करतीं उनका। 
सबकी पीड़ा हर लेती हो, 
नारायणी नमन तुमको।४। 

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते।5।
हिंदी भावानुवाद
सब रूपों में, ईश सभी की, 
करें समन्वित शक्ति सभी। 
देवी भय न अस्त्र का किंचित्, 
दुर्गा देवि नमन तुमको।५। 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।6।
हिंदी भावानुवाद
रोग न शेष, तुष्ट हों तब ही, 
रुष्ट काम से, अभीष्ट सबका। 
जो आश्रित वह दीन न होता, 
आश्रित पाता प्रेय अंत में।६। 

सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि
एवमेव त्वया कार्यम स्मद्वैरिविनाशनम्।7।
हिंदी भावानुवाद
सब बाधाओं को विनाशतीं, 
हैं अखिलेश्वरी तीन लोक में। 
इसी तरह सब कार्य साधतीं, 
करें शत्रुओं का विनाश भी।७। 

इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गास्त्रोतं संपूर्णं।
इति सातश्लोकों वाली दुर्गा स्त्रोत सम्पूर्ण हुआ।



Saturday, March 29, 2025

डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" एक समर्पित कवि (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21)

डा.रामनरेश सिंह "मंजुल" बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 21 

डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 

आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 


जीवन परिचय:- 

डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' के शोध प्रबंध  "बस्ती के छंदकार" की पांडुलिपि के पृष्ठ 591पर मंजुल का  संदर्भ उपलब्ध है। डा. रामनरेश सिंह "मंजुल"का जन्म 15 दिसम्बर 1940 को बस्ती के गौर ब्लाक के ग्राम-सिद्धौर में हुआ था।उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। जिला मुख्यालय स्थित सक्सेरिया इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद गोरखपुर के सेंट एंड्यूज डिग्री कॉलेज से स्नातक किया। 

अध्यापन कार्य :- 

वर्ष 1961 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. उतीर्ण करने के बाद सहजनवां के कोलाराम मस्करा इंटर कॉलेज में प्रवक्ता बने। अध्यापन कार्य करते हुए ही हिन्दी से परास्नातक की शिक्षा पूरी की। एल.टी.करने के बाद पीएचडी की। अंग्रेजी प्रवक्ता के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया। सहजनवां में छह वर्ष अध्यापन के बाद वह गौर के कृषक इंटर कॉलेज में वर्ष 1967 में बतौर प्रवक्ता शिक्षण कार्य करने लगे थे । 1973 में नेशनल इंटर कालेज हर्रैया के प्रधानाचार्य बने। लगातार तीस वर्ष तक सेवा देने के बाद 30 जून 2003 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्य सृजन में उन्होंने पूर्णकालिक समय देना शुरू कर दिया। रुहेलखंड विश्व विद्यालय से पीएचडी करने के दौरान ही आधुनिक गीत सम्राट डॉ. शम्भूनाथ सिंह के सानिध्य में ही नवगीत लिखने की प्रेरणा मिली। 

       बहुमुखी प्रतिभा के धनी मंजुल की कृतियां हिंदी जगत में सराही जा रही है।  वे मंचों पर अपनी रचनाओं से श्रोताओं कमंत्र मुग्ध कर दिया करते थे। वे कहा करते हैं कि साहित्यकार एवं कवि ही समय-समय पर समाज को जगाने का कार्य करते हैं। मंजुल जी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन को अपना काव्यादर्श मानते थे।

संगठन में सक्रियता :- 

       प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश अध्यक्ष व संरक्षक के तौर पर हमेशा शिक्षकों के हित का मुद्दा उठाते रहे।  यह गीतो के साथ खड़ी बोली और व्रजभाषा में सवैया और धनाक्षरी छन्दों को लिखने और पढ़ने में बड़ी पटुता रखते हैं। रेडियो स्टेशन से इनकी कविताएँ प्राय: प्रसारित होती रहीं है। मंजरी मौलश्री अंक 10, मार्च 1979 में उनका एक गीत इस प्रकार प्रकाशित हुआ है - 

              याद तुम्हारी (गीत)

याद तुम्हारी ऐसी जैसे हिरन छलांग भरे, 

अथवा कोई रतन जौहरी कंचन काट धरे ।

याद तुम्हारी ऐसी जैसे सावन मेघ झरे, 

अथवा कोई राजहंसिनी मानस में विचरे ।।

बैठा कोई श्रान्त पथिक सा चंदन गाछ तरे, 

यक्ष सदृश आकुल अंतर से मेघ दूत उचरे।

साधों की वीना बज जाये तार-तार सिहरे,

वे मौसम की याद तुम्हारी पागल प्राणकरे।

प्रकाशित कृतियाँ :- 

'साहित्य का मर्म तथा धर्म' (निबंध संग्रह-2006),

'आदमी कितना अकेला' (काव्य संग्रह/गीत)।

सम्मान:- 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ की ओर से साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा गया है। आयोजित समारोह के दौरान मंजुल को ताम्र पत्र एवं दो लाख रुपये का चेक दिया गया। डा.रामनरेशन सिंह ‘मंजुल’ को 1997 में उत्तर प्रदेश राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।मंजुल को वर्ष 2006 में ललित निबंध व शोध निबन्धों की संग्रह की पुस्तक ‘साहित्य का मर्म व धर्म’ के लिए कई साहित्यिक मंचों पर सम्मानित किया गया था। गीत संग्रह ‘आदमी कितना अकेला’ पर 2014 में बलबीर सिंह पुरस्कार मिला। उन्हें राष्ट्रीय साहित्य साधना सम्मान, इन्दौर, म०प्र०, फरोग ए उर्दू सोसाइटी द्वारा 'रामचन्द्र शुक्ल सम्मान', कादम्बिनी साहित्य संस्था द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान' भी मिल चुका है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद में हिन्दी व अंग्रेजी के पेपर सेटर के  पर अपनी सेवाएं दी। अवध विश्वविद्यालय भी इनकी सेवाओं को लेता रहता है। पत्र पत्रिकाएं कादंबनी, सरस्वती सुमन, स्वतंत्र भारत, पायनियर, नवगीत आदि में इनकी कविताएं व लेख प्रकाशित होते रहे हैं।

सम्पर्क सूत्र:- 

राजघाट हरैया, जनपद-वस्ती, दूरभाष: 05546-233500, मोबाइल: 9415151858 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

( मोबाइल नंबर +91 8630778321; 

वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)


अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’। (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18)

अर्थशास्त्री कवि रामलखन मौर्य 'मयूर’  (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 18)   (उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संकलन के पूर्ण परिचय वाले अंतिम कवि )लेखन :डॉ. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस'  ,सम्पादन : आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

जीवन परिचय 

रामलखन मौर्य 'मयूर' जी का जन्म 19 - 7-1948 ई.को बस्ती जिले के सदर तहसील के बहादुर पुर ब्लाक के नगर खास गांव जो अब नगर बाजार और नगर पंचायत है, मे हुआ है। उनके पिता का नाम श्री नवीन मौर्य है। शिक्षा, हिन्दी और अर्थशास्त्र से एम०ए०, बीएड.,साहित्यरत्न और शास्त्री है। ये लिखने-पढ़ने के अधिक शौकीन रहे हैं। जनता इण्टर कालेज नगर बाजार में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।

प्रकाशित कृतियाँ :- 

1.उद्‌गार 

2. शृंगार शतक 

1.उद्‌गार काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :- 

उद्‌गार में अगभग 60 पृष्ठ हैं। यह विविध प्रसंगों पर लिखी गई कविताओं का संग्रह है। गिरिराज के प्रति लिखा गया उनका एक द्रष्टव्य है-

उत्तुंग  शिखर दुर्लघ्य सदा

तब विजय गीत को गाते है।

तेरे असीम अंचल में जन

सौन्दर्य निरखने जाते हैं।

निर्भर झर झर करते हैं कहीं

सरिता कल कल करती बहती।

है कहाँ मनोहर दृश्य विस्तृत

शुभ छटा जहां नर्तन करती 

है शुभ निसर्ग  शाश्वत स्वरूप

छवि धाम तुम्हें मेरा वन्दन ।।

 - ('उदगार' संग्रह का "गिरिराज" शीर्षक )

     अन्य कविताओ में मेरा गाँव, वीरो बढ़े चलो, बसंत, वर्षा की बूंद, सुमन, राष्ट्र शक्ति, बढ़े चलो , कदम-कदम, जलते द्वीप , बदलो समाज, सहकारिता, नव वर्ष, उया, सरिता, क्यों पीते हो, सीमा का प्रहरी, प्यारा हिन्दुस्तान, तरु आदि कविताएँ  मयूर जी ने बड़ी तन्मयता के साथ लिखा है।

       अधिकाँश कविताओं में  प्राकृतिक चित्रण अच्छा बन पढ़ा है। कविताएँ खड़ी बोली में की गई हैं। उनके भावो में प्रवाह और कथन में लालित्य कूट कूट कर भरा है।

2.शृंगार शतक काव्य संग्रह का संक्षिप्त परिचय :- 

मयूर जी का दूसरा काव्य-सग्रह "शृंगार  शतक सवैया और मनहरण छन्दों में किया गया है। कहीं-कहीं पर भोजपुरी क्रियाएँ मिल जाने से भावो में चारुता अधिक आ  गई है- 

हम  गांव के लोग गरीब हई 

चली आवे महाजन द्वार हमारे ।

बड़ी भाग्य हमरो है जागलि बा 

कइली हम राउर के सत्कारे ।

संवरी सजि सारी दशा हमरी 

मुस्काई जो आप सनेह पधारे । 

हम  धन्य हुए हैं प्रमोद भरे

करुणा से भरे प्रभु आप निहारे ।।

-  ( श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 32)

      बसंत पर लिखा गया एक छन्द दर्शनीय है  - 

आयो बना दिगंत सज्यो  

चहु ओर छटा छटकी छविकारी ।

शीतल मन्द  समीर चल्यो 

मदमाती बनाती लगी मनुहारी। 

वन वीरच फुल्यो शीत पुरयो 

अरुणाई पुपल्लव है दुतिकारी

मदमाली नटी सगरी धरती 

मधुमास प्रमत्त हुए नर नारी।।

 -  (श्रृंगार शतक, छन्द सख्या 15)

    मयूर जी जो आधुनिक चरण के सवैया और घनाक्षरी  के बड़े अच्छे छन्दकार है। उनके छन्दो में प्राकृतिक सौष्ठव के साथ मानवीय  सस्पर्शों का स्वर गूंजता दिखाई पड़ता है। जीवन की गहराई में कवि का अन्तर्मन डूब डूब कर छन्दो के गुलदस्तों को सजाने का सदैव प्रयास करता है। मयूर जी को मंचो पर अच्छा सम्मान मिलता है। आधुनिक युग के छन्द परम्परा के विकास में उनका योगदान भविष्य में बहुत अच्छा होगा, ऐसी सभावनाएँ है।



Friday, March 28, 2025

डा.रामकृष्ण लाल"जगमग" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 17)

         डा.रामकृष्ण लाल"जगमग"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 17)
    डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
    आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
जीवन परिचय :- 
रामकृष्ण लाल "जगमग" की जन्मतिथि 15 अक्टूबर 1953, है । वे बस्ती जिले के बहादुर पुर ब्लाक के ग्राम-कैथवलिया में पैदा हुए थे। जगमग जी बी०ए०,डी०टी० सी० करने के बाद जिला परिषद के प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन कार्य में लगे हुए थे । जगमग जी हास्य और व्यंग्य के अनूठे कवि है। जगमग जी ने दोहों को अपना करके हास्य और व्यंग्य का पुट दिया है। मंच की दृष्टि से जगमग जी का जितना समादर हो रहा है,वह गिने-चुने लोगों में है।
प्रकाशित कृतियाँ :- 
जगमग’ की अभी तक 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।
1.चाशनी' दुमदार दोहे (प्रथम संस्करण- 1978), (तृतीय संस्करण-2006),अब तक 6 संस्करण प्रकाशित हुए हैं।
2.किसी की दिवाली किसी का दिवाला' (1982)
'3.विलाप' खण्ड काव्य,(1990)
4.हम तो केवल आदमी हैं' (काव्य संकलन-1997)
5.'बाल चेतना' (बालोपयोगी रचनाएं- 2000)।
6.सच का दस्तावेज’ 
7.खुशियों की गौरैया, 
8.‘बाल सुमन’ 
9.'स्वामी विवेकानन्द' - इन दिनों वे स्वामी विवेकानन्द पर केन्द्रित महाकाव्य का सृजन कर रहे हैं। 
      इन कृतियों में वे कभी हास्य तो कभी गंभीर दर्शन के रूप में आम आदमी की पीड़ा व्यक्त करते हुये उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।निश्चित रूप से उनका साहित्यिक संसार घोर तमस में समाज का पथ प्रदर्शन करेगा।
प्रथम दो संग्रहों 'चाशनी’ और 'किसी की दिवाली किसी का दिवाला' का विवेचन :- 
इस शोध प्रबंध के। लिखे जाने 1984 तक जगमग जी की यह दोनो कृतियां प्रकाशित हुई हैं जिसमें दोहे और गजलो का प्रयोग अधिक हुआ है। जगमग जी के काव्य में में युगबोध का स्वरअधिक है। यह समाजवादी प्रवृत्तियों के अधिक निकट है। सम्पादन के क्षेत्र में भी इनका स्थान अच्छा है। “मंजरी मौलश्री" नामक पत्रिका इनके सहयोग और सम्पादकत्व में पिछले तीन वर्षों से छप रही है। "मंजरी- मौलश्री” के द्वारा जगमग जी ने नवोदित छन्दकारों को अच्छा प्रश्रय दे रखा है। जगमग़ जी को कवि सम्मेलनों में सदैव आदर मिलता रहा है। वे स्वयं कवि सम्मेलन कराने के शौकीन हैं। पत्रिका के माध्यम से प्रान्तीय और राष्ट्रीय स्तर कवियों की कविताएं छापकर जिले के कवियों का मार्ग दर्शन कर रहे हैं। उनमें व्यवहार कुशलता कूट-कूट कर भरी है। राजनीतिक खेमा के लोगो के साथ-साथ अधिकारियो से भी साहित्यिक योगदान प्राप्त करने में सफल रहते हैं । जगमग जी की भाषा में हिन्दी के साथ उर्दू का सम्मिश्रण पाया जाता है। उनके मुक्तकों में तीखा प्रहार दर्शनीय रहता है। इनका सम्पूर्ण साहित्य मानतीय संवेदनाओं के सन्ननिकट है।
पुरस्कार और सम्मान : - 
अनेकानेक राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा समय समय पर जगमग जी को सम्मानित किया जाता रहा है। उनका दायरा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। उन्हें भारतीय सेना संस्थान, दिल्ली द्वारा काव्य भूषण सम्मान, विक्रमशिला विद्यापीठ भागलपुर द्वारा विदया वाचस्पति मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा साहित्य वृहस्पति सम्मान 20 05 2018 को ,भारत गौरव 20 जनवरी 2022 को, अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव भूटान में 03 मई 2024 को , साहित्य गौरव 20 01 2025 को तथा वैज्ञानिक योगदान के लिए 06032025 को 'साहित्य वाचस्पति' पुरस्कार से अलंकृत किया गया है। सम्भव है इस सूची में कुछ नाम छूट भी गए हो। हम उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की मंगल कामना करते हैं। उनका दुमदार दोहे बहुचर्चित रहे हैं- 

           कुछ दुमदार दोहे 

हतनी कुठा बढ़ गई, भूल गये हर फर्ज । कुछ नालायक कर रहे, पूज्य बाप से अर्ज ।।
आप अब चले जाइए ।

गांधी बाबा देश का, डूब रहा है नाम । पाँचो चेले आपके निकले नमक हराम ।।
गुरु कुछ करो दवाई ॥

पहले अपने बाप का, नाम करो उजियार । और अंधेरे में करो, जो जी चाहे यार ।।
न कोई कुछ बोलेगा ।।

बिद्यालय को क्या कहूं, लुप्त हुआ हर ज्ञान छात्रों से अब मांगते, शिक्षक जीवन-दान ।।
यही शिक्षा की इति है ।।

कहा उन्होंने चुप रहो, मत लो मेरा टोह । छोड़ नहीं सकता कभी, मैं सत्ता का मोह ॥
लाख तुम करो घिसाई ॥

कहा कृष्ण ने क्या कहूं, मित्र सुदामा आज। फटे हाल हूं आपकी, कैसे रक्खू लाज ।।
जेब देखो है खाली ॥

कुछ लोगों ने प्रेम से, गरमाया जब दूध । इतने में सब लड़ पड़, आपस में दूग मूंदे ।।
मलाई हम खायेंगे ॥

सुनिये मेरी बात को, सेठ जानकी दास । मरते दम कुछ रूपये, लेते जाना पास ।।
वहां भी बिजनेस करना ।।











बस्ती के एक और सशक्त लेखक वागीश जी शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)

बस्ती के सशक्त लेखक वागीश शुक्ल (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 20)

आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। वे वर्तमान समय में हिन्दी-साहित्य के सबसे गहरे और तीक्ष्ण ,सिद्धांसतार, आलोचक, निबंधकार एवं उपन्यासकार हैं। उनकी प्रतिभा आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जैसी ही दिखती हैं एक गणितज्ञ को साहित्य की ऐसी परख विरले देखने को मिलता है। उनके बारे में सर्च करने पर बहुत ही विलक्षण चरित्र देखने को मिलता है। गद्य साहित्य की प्रचुरता के कारण 'बस्ती के छंदकार' के लेखक स्मृति शेष डा मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' जी ने शायद उन्हे अपने अध्ययन में ना ले सकें। उन्हें उचित स्थान देने से बस्ती मण्डल खुद को गौरवान्वित महशूस कर सकता है। इसलिए उनके अप्रकाशित भाग 3 की श्रृंखला में इस कड़ी को पिरोया जा रहा है।

      स्वनाम धन्य श्री वागीश जी एक वैज्ञानिक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने गणित में स्नातकोत्तर किया है और आईआईटी दिल्ली में गणित के प्रोफ़ेसर भी रहे। उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, 1946 ई. को इस धरती पर अपने गाँव थरौली, तप्पा बड़गों पगार, परगना महुली पश्चिम, तहसील सदर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश में जन्म लिया । बस्ती में वे एक ठाकुरद्वारे में रहते थे जिसे बस्ती राज-परिवार की रानी दिगम्बर कुँवरि ने बनवाया था। ये 1857 के प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी बाबू कुँवर सिंह की बहिन थीं किन्तु ये स्वयं अंगरेज़ों के साथ थीं जिसके नाते बस्ती का राज्य विक्टोरिया शासनकाल में कुछ बढ़ेआकार के साथ बचा रहा। वे वर्षों दिल्ली के आई. आई. टी. संस्थान में गणित पढ़ाते रहे और फिर सेवानिवृत्त होकर बस्ती में भी रहे हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उन्होंने निराला की प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ की बहुत ही सुन्दर टीका लिखी है जो ‘छन्द छन्द पर कुमकुम’ नाम से प्रकाशित हुई है। उन्होंने देवकीनन्दन खत्री की उपन्यास श्रृंखला ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ पर भी किताब लिखी है। उन्होंने ‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर कई  निबंधों की श्रृंखला भी लिखी है। वागीश जी हिन्दी में ग़ालिब की शायरी के सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं और उन्होंने उस पर भी टीका लिख रखी है जो प्रकाशित होना बाक़ी है।

           परिवारिक पृष्ठभूमि:- 

1.पण्डित शूलपाणि पूर्वज पुरुष

वागीश शुक्ल जी के पूर्वज पण्डित शूलपाणि शुक्ल थे , जो बस्ती से थरौली के रास्ते में थरौली से तीन किलोमीटर पहले पड़ने वाले महसों में रहते थे, जहाँ के राजा द्वारा किये गये किसी अपमान से क्षुब्ध्  होकर वे अनशन पर बैठ गये थे और उनका प्राणान्त हो गया जिसके बाद उनके पुत्रों ने ब्रह्महत्यारे के राज्य में जल न ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करके महसों छोड़ दिया और किसी अन्य आश्रय की तलाश में निकल पड़े। उनमें से एक को थरौली के तत्कालीन निवासियों ने अपने गाँव में शरण दे दी और अन्य भाई आगे चले गये। थरौली महुली राज्य में पड़ता था। यह चंगेरवा और महादेवा के पास में है। इस समय थरौली ग्राम पंचायत बस्ती जिला परिषद के बनकटी पंचायत समिति भाग में एक ग्रामीण स्थानीय निकाय है । थरौली ग्राम पंचायत क्षेत्राधिकार के अंतर्गत कुल 4 गांव हैं। 

2.पण्डित शिवदीन वृद्ध प्रपितामह

पण्डित शिवदीन शुक्ल थरौली में बस गये पूर्वज के वंश में वागीश जी के वृद्ध प्रपितामह पण्डित शिवदीन शुक्ल हुए थे उनके दो पुत्र हुए। पण्डित रामप्रसाद शुक्ल और पण्डित रामअवतार शुक्ल।

3.रामप्रसाद शुक्ल प्रपितामह

पण्डित रामप्रसाद शुक्ल वागीश जी के सगे प्रपितामह रहे। उनके एक और प्रपितामह पण्डित रामअवतार शुक्ल रहे । इन दो भाइयों का परिवार एक ही रसोई में था किन्तु वागीश जी के होश सँभालने तक चूल्हे अलग हो चुके थे हालाँकि सभी लोग एक ही मकान में अलग-अलग बरामदे बाँट कर रहते थे।इस प्रकार पण्डित रामप्रसाद शुक्ल के दोनों पुत्रों- पण्डित शुभनारायण शुक्ल और उनके छोटे भाई पण्डित जयनारायण शुक्ल- के परिवार मिल कर वह परिवार बनाते थे जो उस समय‘संयुक्त परिवार रहा है।

4.पण्डित जयनारायण शुक्ल पितामह

यह मकान यों तो उनके पितामह पण्डित जयनारायण शुक्ल ने बनवाया था किन्तु बँटवारे में ज़ाहिर है कि उन लोगों के हिस्से में दो ही बरामदे और उनसे जुड़ी कोठरियाँ आनी थी।

5.शुभनारायण शुक्ल पिता

वागीश जी अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थे ।वे संस्कृत के आचार्य थे.और पण्डित जयनारायण शुक्ल के वंशजों से बने संयुक्त परिवार के हमारे अपने टुकड़े में इस समय उनकी पीढ़ी में वे तथा उनके पितृव्य पण्डित जयदेव शुक्ल के पुत्र देवेन्द्र शुक्ल मौजूद हैं।

6.वागीश शुक्ल का जीवन परिचय:- 

वागीश जी की माता श्रीमती विद्यावती देवी यद्यपि चैदह वर्ष की अवस्था से ही अपने पितृकुल में गुरुजनों की शुश्रुषा कर रही थीं, तथापि उनके घर में बारह वर्ष बीत जाने पर भी उनके कोई सन्तान न हुई और उन्होंने किसी बड़ी-बूढ़ी की सलाह पर ऋषि पंचमी का व्रत प्रारम्भ किया। परिणाम स्वरूप ज्येष्ठ शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2003 तदनुसार 9 जुलाई, सन 1946 ई को इस धरती पर वागीश जी ने जन्म लिया। [उनकी पत्नी इंदुमती का जन्म 1951और मृत्यु 2023 में हुई थी। दोनों की शादी 1965 और वैधुर्य 2023 ई में हुआ है।] नवीं में पढ़ते हुए ही वागीश जी ने अपनी पहली कविता लिखी जिसकी प्रथम पंक्ति थीः ‘पर्यंक-त्याग क्यों ओ बोले’।इसी समय से वे जेब में इलायची - लोंग रखने लगे थे। जिसकी बहुत दिनों बाद परिणति तम्बाकू का पान खाने में हुई। यह आदत एकाध बार छूटने के बावुजूद ताउम्र तक क़ायम रही है। बँसिया की लठिया’ से शुरू होने वाली कविता छपी थी।एक संस्कृत विद्यालय के वाचनालय में  देवकीनन्दन खत्री के सारे उपन्यास उन्होंने वहीं पढ़े। अंगरेज़ी अच्छी करने के चक्कर में आपके पिता जी ने ‘ब्लिट्ज़’ नामक साप्ताहिक उनके लिए मँगवाना शुरू किया था। इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान उनकी कोठरी में एक चटाई भर की जगह थी जिस पर सिर गड़ाये वे तब तक एक लालटेन के सहारे पढ़ते रहते थे जब तक सोने का समय न हो जाय और फिर वह चटाई बिस्तर का काम देती थी।

     वज़ीफ़े और गोल्ड मेडल के साथ ही उनका शुमार अब बी.ए. प्रथम वर्ष के पढ़ाकू छात्रों में था । लेक्चर’ के दौरान वे पिछली बेंच पर बैठते थे और प्रायः एक दूसरे की काॅपियों पर कुछ-न-कुछ - मसलन चिरकीन के शेर- लिखा करते थे। 

     हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अँग्रेज़ी वाङ्मय के गहरे और गम्भीर अध्येता, आलोचक और अनुवादक वागीश शुक्ल  भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली) 1970 से 2012 ) सेवा किए फिर सेवा निवृत्त होकर नौ वर्ष तक बस्ती में रहे । 2021 से पुनः दिल्ली में रह रहे हैं।

        वागीश शुक्ल हिन्दी के उन विरले लेखकों में हैं जो हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी और इन भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य को गहरायी से जानते हैं। उनका लिखा हुआ सरस और जटिल एक साथ होता है। उनके लिखने का ढंग निराला है। वे कोई भी अवधारणा सीधे सीधे व्यक्त करने के स्थान पर पाठक को वैचारिकता के उस स्थान तक ले जाते हैं जहाँ वह अवधारणा रूप ले रही होती है। 

रचनायें:- 

वागीश जी ने लगभग एक दर्जन रचनाएं लिखी हैं,जो देश के प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हुई है तथा अमेज़न आदि केंद्रों के माध्यम से विक्रय के लिए उपलब्ध हैं।

1.छन्द छन्द पर कुमकुम : राम की शक्ति पूजा' 

(इसकी यह टीका निराला की राम शक्ति पूजा पाठ, टीका आदि की अनेक नयी विधियाँ भारतीय प्रसंग में प्राकु-आधुनिक हूँ, भले इधर वे हिन्दी आलोचना के परिसर से बाहर ही रहती आयी हूँ । 'राम की शक्तिपूजा' की यह टीका निराला की कविता को उसकी पूरी अर्थाभा, आशयों और अन्तर्ध्वनियाँ में, समकालीन सन्दर्भों और पारम्परिक स्मृति के अत्यन्त सर्जनात्मक रसायन के रूप में पुनरायत्त करने का अवसर सुलभ कराती है।)

2. गालिब के लगभग पूरे साहित्य की विस्तृत टीका और व्याख्या, जो प्रकाशित होना बाक़ी है।

3. Sanskrit studied ,Samvat 2063 64 ,in 2 vols.

4.आहोपुरुषिका अनुवाद  (मेघदूतम्' को छोड़ दूँ तो पत्नी के वियोग में इतना झंझावाती विषाद, आहोपुरुषिका )

5.समालोचना "उसे निहारते हुए"

6.समालोचना "प्रचण्ड प्रवीर का कथा लेखन" 

7.प्रतिदर्शन (कुछ निबंध) 

(प्रतिदर्शन है वागीश शुक्ल के अब तक के लेखन के चुनिंदा अंशों का। वे न केवल विद्वान-आलोचक हैं, वे अपनी पीढ़ी और अपनी पहली पीढ़ी में भी आदर्श हैं। उनकी विद्याएँ संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी, व्याकरण, आधुनिक गणित और उत्तर आधुनिकता तक विस्तृत हैं।

8.शहंशाह के कपड़े कहां हैं ( निबन्ध)

9.उर्दू साहित्य का देव नागरी में लिपिकरण कुछ समस्याएं कुछ सुझाव

10.चंद्रकांता संतति का तिलस्म 

11.' चिकितुषी' त्रिपुरा रहस्य चर्या खण्ड का सम्पादन

12.‘समास’ के लिए ‘भक्ति’ पर निबन्ध की श्रृंखला 

13.कई बरसों से एक सुदीर्घ उपन्यास पर काम जारी है।

वागीश जी का फोन नम्बर 08765934624,09868541851 

ईमेल : wagishs@yahoo.com


लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

 मोबाइल नंबर +91 8630778321; 

वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)










   





Wednesday, March 26, 2025

पाम्बन रेलवे खुलने वाला पुल डा. राधे श्याम द्विवेदी

बहुत पहले धनुष्कोटि से मन्नार द्वीप तक पैदल चलकर भी लोग जाते थे। लेकिन १४८० ई में एक चक्रवाती तूफान ने इसे तोड़ दिया। बाद में आज से लगभग चार सौ वर्ष पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक राजा ने उस पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया। अंग्रेजो के आने के बाद उस पुल की जगह पर रेल का पुल बनाने का विचार हुआ। उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्कर से हिलकर टूट चुका था। एक जर्मन इंजीनियर की मदद से उस टूटे पुल का रेल का एक सुंदर पुल बनवाया गया। इस समय यही पुल रामेश्वरम् को भारत से रेल सेवा द्वारा जोड़ता है। यह पुल पहले बीच में से जहाजों के निकलने के लिए खुला करता था।  इस स्थान पर दक्षिण से उत्तर की और हिंद महासागर का पानी बहता दिखाई देता है। उथले सागर एवं संकरे जलडमरू मध्य के कारण समुद्र में लहरे बहुत कम होती है। शांत बहाव को देखकर यात्रियों को ऐसा लगता है, मानो वह किसी बड़ी नदी को पार कर रहे हों।
पाम्बन पुल (Pamban Bridge) भारत के तमिल नाडु राज्य में पाम्बन द्वीप को मुख्यभूमि में मण्डपम से जोड़ने वाला एक रेल सेतु है। इस पुल के निर्माण का प्रयास 1870 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब ब्रिटिश सरकार ने श्रीलंका तक व्यापार संपर्क बढ़ाने का निर्णय लिया था। यह अगस्त 1911 से बनना शुरु हुआ और इसका उदघाटन 24 फ़रवरी 1914 में हुआ था। तब यह भारत का एकमात्र समुद्री सेतु था। 
145 खंभों पर टिका पुल
यहां पहुंचने का सफर भी उतना ही रोमांचक है जितना कि इस मंदिर का महत्व। कंक्रीट के 145 खंभों पर टिका सौ साल पुराने पुल से ट्रेन के द्वारा इस मंदिर में जाया जाता है। अब सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। समुद्र के बीच से गुजरती ट्रेन का नजारा इतना खूबसूरत है कि इसे देखने का अनुभव जीवनभर याद रहता है। यह सन् 2010 में बान्द्रा-वर्ली समुद्रसेतु के खुलने तक भारत का सबसे लम्बा समुद्री सेतु रहा। सन् 1988 में रेल पुल से  समांतर एक सड़क पुल भी बनाया गया जो राष्ट्रीय राजमार्ग 87 का भाग है। 
पुराने ब्रिज के बन्द होने का कारण 
दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था । लगभग 2.2 किमी तक कुल और 143 खंभों वाले इस पुल को 1914 में आधिकारिक तौर पर चालू किया गया था। यह मुंबई का आउटलेट-वर्ली सी लिंक भारत का दूसरा सबसे लंबा समुद्री पुल है। पाम्बन रेलवे पुल भारतीय मुख्य भूमि और पाम्बन द्वीप के बीच 2.065 किलोमीटर लंबा फैला हुआ है। फ्लोरिडा के बाद यह दुनिया के सबसे संक्षारक वातावरण में स्थित है, जिससे इसका रखरखाव एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह स्थान एक चक्रवात-प्रवण उच्च वायु वेग क्षेत्र में भी आता है। पाम्बन रेल पुल शेज़र रोलिंग लिफ्ट तकनीक पर काम करता है, जिससे फ़ेरी की पेशकश होती है, जो 90 डिग्री के कोण पर ऊपर की ओर खुलती है। अरब सागर के नीले विस्तार के अद्भुत दृश्य पेश करने वाली रेल ड्रॉ के दौरान पंबन पुल हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करता रहता है।  
संरचना :- 
रेलवे पुल समुद्र तल से 12.5 मीटर (41 फीट) ऊपर स्थित है और 6,776 फीट (2,065 मीटर) लंबा है। पुल में 143 खम्भे लगे हुए हैं और इसमें दो-पतरों से बना एक बैस्क्यूल खंड बना हुआ है, जिसमें सेज़र रोलिंग टाइप लिफ्ट स्पैन होते हैं, जिन्हें जहाजों के आने-जाने के लिए उठाया जा सकता है। प्रत्येक पतरें का वजन 415 टन (457 टन) है।पुल के दोनों पतरे लीवर का उपयोग करके मैन्युअल रूप से खोले जाते हैं।
पंबन ब्रिज के बारे में खासियत :- 
नए पंबन ब्रिज में 18.3 मीटर के 100 स्पैन और 63 मीटर का एक नेविगेशनल स्पैन शामिल है. यह मौजूदा पुल की तुलना में 3 मीटर ऊंचा है और समुद्र तल से 22 मीटर की नौवहन वायु निकासी प्रदान करता है. इसके निर्माण में इलेक्ट्रो-मैकेनिकल नियंत्रित सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो इसे ट्रेन नियंत्रण प्रणालियों के साथ समन्वित करता है।
पुराने ब्रिज के बन्द होने का कारण 
दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 अप्रैल 2025 को राम नवमी के दिन तमिलनाडु के पंबन पुल का उद्घाटन कर सकते हैं। इससे रामेश्वरम के लिए रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी। यह पुल देश का पहला वर्टिकल सी ब्रिज है। सूत्रों का कहना है कि समुद्री पुल को व्यावसायिक रूप से खोलने की तैयारी पूरी ज़ोरों पर है। दक्षिणी रेलवे के शीर्ष रेलवे अधिकारी पिछले कुछ दिनों से पुल और रामेश्वरम रेलवे स्टेशन का निरीक्षण कर रहे हैं। सूत्रों ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री के श्रीलंका से दो दिन की यात्रा (4 और 5 अप्रैल) से लौटने के तुरंत बाद उद्घाटन होने की संभावना है।
फेसबुक के इस लिंक से इस पुल की घटना को और सुगमता से जाना जा सकता है।
https://www.facebook.com/share/r/1BDkgw33md/
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

Saturday, March 22, 2025

कृष्ण विहारी लाल “राही" (बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 15)

       कृष्ण विहारी लाल “राही"
(बस्ती के छंदकार भाग 3 कड़ी 15)
     डा. मुनि लाल उपाध्याय 'सरस' 
      आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
कविवर कृष्ण विहारी लाल "राही" बस्ती जनपद के बहुचर्चित गीतकार और कवि हैं। "विकास मार्ग” पत्रिका के सम्पादन के कारण जनपद का कोना- कोना उन्हें जानता है। यह इण्टर परीक्षा के बाद हिंदी विषय से साहित्यरत्न तक शिक्षा अर्जित किये हैं।
प्रकाशित साहित्य  : 1. विकास गीत 
राही जी की प्रथम रचना “विकास गीत” गीतों के सग्रह के रूप में छप चुकी है। गीतों में ग्राम्य जीवन के साथ प्रकृति के मनोहारी रूपों को अधिक संजोया गया है। सरल, सुगम भाषा में लिखे गये राही जी के गीत संवेदनात्मक गहराइयों को छूने में समर्थ हैं। गीतों में लयात्मकता के साथ- साथ भावुकता और तन्मयता भरी पड़ी है। उदबोधन परक गीतों से राही जी ने सदैव अग्रसारित होने का संदेश दिया है। प्रेरणास्पद गीत राष्ट्रीयता का स्वर फूंकने में समर्थ हैं। भारतीय किसानों के समानान्तर पुष्पित और पल्लवित राही जी के गीतों में ग्रामीण जीवन का उद्‌घोष बढ़े ही सम्यक रूप से किया गया है। इन्होंने लगभग 200 गीत और कुछ मुक्तक लिखा है। कवि सम्मेलन के मंचों पर राही जी के गीत गूंजे और सराहे गये हैं। आकाशवाणी से राही जी के सैकड़ों गीतों का प्रसारण हो चुका है। टेलीविजन से राही जी को करोड़ों श्रोताओं ने देखा और सुना है। राही जी पिछये 30 वर्षों ने जनपद के काव्यधारा को सहयोग प्रदान करते हुए उसके विकास में नि:स्वार्थ योगदान देते रहे हैं। उनका सहज व्यक्तित्व अपने में मनोहारी और आदर्श है। गीतों की सर्जना के साथ राही जी छन्दबद्ध रचना के शौकीन हैं। ये छन्दकार और कवियों का बडा स्वागत करते है तथा नवोदित कवियों को सदैव प्रोत्साहित करते रहे हैं । 

किसानी भोजपुरी गीत 

धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।
अन्न धन , फल, फूलबा उपजावै 
हरियर फ़सिलि सुन्नर लहरावै। 
बनयों, बगिया मा छवि का बढ़ायें, 
मटिया से खेत घरवा के चमकावै ।

बाग-बग़चन, खेतवन मा जिनगी के रोशनी कइले 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

कहूं तऽ ई कोइला बनि जावै, 
रंगवा, भरत, तेरूबा दरकार्वे । 
दुनिया ई चनिया से चमकायें, 
सोनवा से ई घरवा के दमकावै।।

धरती पूत किसान जववन, लरिके देखि हरिसैईलै 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

खर-पतवार से मड़इया छवावै,
खदिया  हरिहर तऽ ई बनवावै । 
कबो ई बालू- कन बनि जावै , 
ठोस कहूँ पाथर वनि जावे ।

यकरे अगवा सरगो बुझाला छोट अउ फीक तऽ भइले 
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

ई मटिया चन्नन बनि महके 
जेकरे लगवले मथवा दमकै। 
मटियइ से ई जिनिगियो चमकै, 
हियरा मनावतऽ रोज चहके ।

मील अकसवा ऊपरा से रखवार, जबर त ऽ भइलै
ई धरती हीरा, मोती, सोनबा धन रोजै उगिले।।

(नव सृजन त्रैमासिक जनवरी मार्च 1979 पृष्ठ 6 )